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निजीकरण विरोधियों के कंधों पर टिकी सरकार क्या निजीकरण पर बढ़ पाएगी आगे?

मोदी सरकार के पिछले दो कार्यकालों में निजीकरण को तवज्जो दी गई है, लेकिन इस बार स्थिति थोड़ी अलग हो सकती है.

नीरज नैयर 2 years ago

मोदी सरकार (Modi Govt) देश के कम से कम 11 एयरपोर्ट्स को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी में है. एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सरकार बड़े और छोटे कई हवाईअड्डों का निजीकरण कर सकती है. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या वाकई सरकार के लिए निजीकरण पर पहले की तरह आगे बढ़ना आसान होगा? इससे पहले लगातार दो बार भाजपा ने केंद्र में पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई थी, जबकि इस बार उसे सहयोगियों की मदद से सत्ता की सीढ़ी चढ़नी पड़ी है. नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू इस सीढ़ी को थामने वाले प्रमुख सहयोगी हैं. खास बात यह है कि दोनों ही निजीकरण पर मोदी सरकार के खिलाफ आवाज उठा चुके हैं.

नायडू ने लिखा था PM को पत्र
करीब तीन साल पहले यानी 2021 में तेलुगू देशम पार्टी (TDP) प्रमुख एन. चंद्रबाबू नायडू (Chandrababu Naidu) ने केंद्र के राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड (National Steel Corporation Limited) के निजीकरण के फैसले का विरोध किया था. उन्होंने बाकायदा PM मोदी को पत्र लिखकर अपनी नाराज़गी जताई थी और निजीकरण रोकने की अपील की थी. राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड जिसे विशाखापत्तनम स्टील प्लांट के नाम से जाना जाता है, में मोदी सरकार ने 100% हिस्सेदारी बेचने का ऐलान किया था. इस मुद्दे पर आंध्र प्रदेश में जमकर विरोध-प्रदर्शन हुआ. इसका विरोध करने वालों में नायडू भी शामिल थे. उन्होंने केंद्र से कहा था कि प्लांट को बेचने के बजाए उसे पुनर्जीवित करने के लिए वैकल्पिक उपाय तलाशे जाएं.

नीतीश ने खुलकर किया था विरोध 
इसी तरह, जनता दल (यूनाइटेड) के मुख्य नीतीश कुमार रेलवे के निजीकरण के विरोधी रहे हैं. उन्होंने कई मौकों पर खुलकर अपना विरोध भी जाहिर किया है. 2019 ने नीतीश कुमार ने कहा था कि रेलवे का निजीकरण नहीं किया जाना चाहिए. उन्होंने बतौर रेलमंत्री अपने कामकाज की तारीफ करते हुए यह भी कहा था कि जब वह रेल मंत्री थे तब केंद्र सरकार अधिकांश सार्वजनिक कंपनियों को बंद कर रही थी लेकिन उन्होंने रेलवे में 2 नए निगम -IRCTC और रेल विकास निगम (RVNL) का गठन किया था. जिसके तहत कई नई परियोजनाएं शुरू की गईं. नीतीश का मानना है कि रेलवे के परिचालन में कई सुविधाओं को PPP मोड में दिया जा सकता है, लेकिन रेलवे का निजीकरण नहीं किया जाना चाहिए.  

'साथ' पर दरक सकता है वोट बैंक   
अब सवाल यह उठता है कि निजीकरण के दो विरोधियों के सहयोग से टिकी मोदी सरकार क्या निजीकरण पर पहले की तरह आगे बढ़ पाएगी? केंद्रीय वित्‍त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट 2023 में रेलवे में निजीकरण बढ़ाने का ऐलान किया था. उन्होंने कहा था कि रेलवे में निजी भागेदारी बढ़ाई जाएगी. इया ऐलान का इसका मतलब है कि सरकार रेलवे के कई कामकाज निजी हाथों में सौंप सकती है. जाहिर है इसका असर रेल कर्मचारियों पर पड़ेगा. तो क्या नीतीश कुमार इस मुद्दे पर सरकार का साथ देंगे? भले ही नीतीश और नायडू केंद्र सरकार के सहयोगी हैं, लेकिन राज्यों में उनकी अपनी सरकार भी है. लिहाजा, निजीकरण पर मोदी सरकार का साथ राज्य में उनके वोट बैंक को चोट पहुंचा सकता है. ऐसे में इसकी पूरी संभावना है कि मोदी सरकार सरकारी संपत्तियों को निजी हाथों में सौंपने के अपने पैशन पर मजबूती से आगे न बढ़ पाए. 

इन्हें बेचना चाहती है सरकार
मोदी सरकार ने अपने पहले दो कार्यकालों में कई सरकारी कंपनियों को निजी हाथों में सौंपने का खाका तैयार किया था. चूंकि सरकार पूर्ण बहुमत में थी, इसलिए उसने आम जनता से लेकर सियासी विरोध को भी दरकिनार कर दिया. सरकार IDBI बैंक से हाथ छुड़ाना चाहती है. आईडीबीआई बैंक में मोदी सरकार के पास 49.24% और एलआईसी की 45.48% हिस्सेदारी है. सरकार अपनी पूरी हिस्सेदारी बेचने के मूड में है. इसके अलावा, राष्ट्रीय केमिकल फर्टिलाइजर (RCF), नेशनल फर्टिलाइजर लिमिटेड (NFL), फर्टिलाइजर एंड केमिकल त्रावणकोर लिमिटेड (FACT) सहित 8 फर्टिलाइजर कंपनियां भी उसकी निजीकरण की लिस्ट में शामिल हैं. इसी तरह, शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (Shipping Corp) और जनरल इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (GIC) के अलावा कुछ सरकारी बैंकों को भी सरकार निजी हाथों में सौंपने की इच्छा दर्शा चुकी है. 

निजीकरण के गिनाए थे नुकसान 
हालांकि, ये बात अलग है कि बैंकों के निजीकरण को लेकर 2022 में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के एक लेख में कई आशंकाएं व्यक्त की गई थीं. RBI ने कहा था कि बैंकों के निजीकरण का फायदे से अधिक नुकसान हो सकता है. RBI ने अपने लेख में सरकार को इस मामले में ध्यान से आगे बढ़ने की सलाह दी थी. उसका कहना था कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बड़े पैमाने पर निजीकरण से फायदे से अधिक नुकसान हो सकता है. केंद्रीय बैंक के बुलेटिन में प्रकाशित लेख में कहा गया था कि निजी क्षेत्र के बैंक लाभ को अधिकतम करने में अधिक कुशल हैं, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने में बेहतर प्रदर्शन किया है.  

अध्ययनों का दिया था हवाला
लेख में आगे कहा गया था कि निजीकरण कोई नई अवधारणा नहीं है और इसके फायदे-नुकसान सबको पता हैं. पारंपरिक दृष्टि से सभी दिक्कतों के लिए निजीकरण प्रमुख समाधान है, जबकि आर्थिक सोच ने पाया है कि इसे आगे बढ़ाने के लिए सतर्क दृष्टिकोण की ज़रूरत है. लेख में कई अध्ययनों का हवाला देते हुए बताया गया था कि सरकारी बैंकों ने कार्बन उत्सर्जन कम करने वाले उद्योगों में वित्तीय निवेश को उत्प्रेरित करने में अहम भूमिका निभाई है. इस वजह से ब्राजील, चीन, जर्मनी, जापान और यूरोपीय संघ जैसे देशों में हरित बदलाव को प्रोत्साहन मिला है. गौरतलब है कि सरकार ने 2020 में 10 राष्ट्रीयकृत बैंकों का चार बड़े बैंकों में विलय कर दिया था. इसके बाद सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की संख्या घटकर 12 रह गई है. इस लेख को लेकर खूब बवाल भी मचा था, जिसके बाद RBI को स्पष्टीकरण देते हुए कहना पड़ा था कि लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और ये आरबीआई के विचार नहीं हैं. 


 


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