Apple की मांग में आखिर क्‍यों हुई इतनी बड़ी गिरावट? क्‍या है इसकी वजह

जानकार मानते हैं कि इसके पीछे की जो सबसे बड़ी वजह है वो ये है कि पिछले कुछ समय में IT सेक्‍टर में आई मंदी के कारण लोगों ने खर्च कम कर दिया है. इसके कारण शिपमेंट में दो अंकों की गिरावट आई है. 

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Monday, 10 April, 2023
APPLE

दुनिया भर की कंपनियों में कॉस्‍ट कटिंग में हो रही कमी के कारण जहां ले ऑफ हो रहे हैं वहीं दूसरी ओर जो लोग काम कर रहे हैं अब उन्‍होंने भी खर्च करने में कटौती कर दी है. इसका असर अलग-अलग कंपनियों के उत्‍पादन और बाजार पर पड़ता है. अब खबर ये आई है कि Apple Inc. के पर्सनल कंप्यूटर शिपमेंट में पहली तिमाही में 40.5% की गिरावट आई, जो पीसी मैन्‍यूफैक्‍चर्स के लिए इस साल की कठिन शुरुआत के तौर पर देखी जा रही है.


सभी के शिपमेंट में हुई है कमी 
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार IDC की हालिया रिपोर्ट कहती है कि ये गिरावट सिर्फ APPLE में ही नहीं है बल्कि ये गिरावट दूसरी कंपनियों के शिपमेंट में भी देखने को मिल रही है. हालिया रिपोर्ट कहती है कि  सभी पीसी निर्माताओं द्वारा शिपमेंट 29% से 56.9 मिलियन यूनिट तक गिर गया. सबसे बड़ी बात ये है कि ये 2019 के शुरुआती स्तर से भी नीचे गिर गया.  लेकिन बावजूद इसके इस बाजार की टॉप कपंनियों में शामिल Lenovo ग्रुप लिमिटेड और डेल टेक्नोलॉजीज इंक ने 30% से अधिक की गिरावट दर्ज की, जबकि HP इंक 24.2% नीचे था. बाजार की हालत ये है कि कोई भी इस मंदी से नहीं बचा है. बाजार में मांग इतनी कम  हो गई है कि Asustek Computer Inc. 30.3% की गिरावट के साथ टॉप 5 से बाहर हो गई.

पिछले साल बढ़ गया था खर्च 
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार रिसर्च फर्म का कहना है कि पिछले साल के मुकाबले इस साल कंज्‍यूमर खर्च कम हो गया है जो कि पिछले साल लगभग डबल डिजिट में पहुंच गया था. इसके कारण शिपमेंट में गिरावट आई है और दुनिया की अग्रणी मेमोरी चिप आपूर्तिकर्ताओं के बीच माल जमा हो रहा है. सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी ने पिछले हफ्ते ये कहा कि 2009 के बाद सबसे कम मुनाफा होने के कारण वो अपने मेमोरी उपकरणों के उत्‍पादन में कमी करने जा रहा है. 


तीसरे और चौथे क्‍वार्टर से है उम्‍मीद 
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार आईडीसी के अनुसंधान प्रबंधक जितेश उबरानी ने कहा, पिछले कुछ महीनों में चैनल इन्वेंट्री कम होने के बावजूद अभी भी ये बेहतर चार से छह सप्ताह की सीमा से ऊपर बना हुआ है. बावजूद इन परिस्थितियों के कंपनियां उम्‍मीद कर रही हैं कि आने वाले तीसरे और चौथे क्‍वार्टर में भारी छूट के साथ उनके लिए स्थिति अनुकूल बनेगी. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इंडस्‍ट्री को एक उम्मीद यहां से दिख रही है कि कम होती मांग कंपनियों को और समय दे पाएगी क्‍योंकि कई कंपनियां अपने कारखाने चीन के बाहर लगाने को लेकर विकल्‍प तलाश रहे हैं. वाशिंगटन डीसी और चीन के बीच पैदा होते तनाव के कारण Apple धीरे-धीरे अपनी मैन्‍यूफैक्‍चरिंग लोकेशन में विविधता लाने की कोशिश कर रहा है. IDC के शोधकर्ता 2024 में इस बात को लेकर उम्‍मीद कर रहे हैं  कि उम्र बढ़ने वाले हार्डवेयर से बाजार में बदलाव आएगा और स्थिति सुधरेगी.  


भारत, ईयू समेत 7 देशों ने P4M पहल शुरू की, संयुक्त राष्ट्र में सुधार पर दिया जोर

भारत, यूरोपीय संघ, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्राजील, बारबाडोस और केन्या ने न्यूयॉर्क में शुरू की ‘बहुपक्षवाद के लिए साझेदार’ पहल; अंतरराष्ट्रीय कानून, शांति और समावेशी विकास के लिए सहयोग बढ़ाने का लक्ष्य

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 22 September, 2026
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Tuesday, 22 September, 2026
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भारत, यूरोपीय संघ (EU), ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्राजील, बारबाडोस और केन्या ने संयुक्त राष्ट्र में सुधार और बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत करने के लिए ‘बहुपक्षवाद के लिए साझेदार’ (Partners for Multilateralism- P4M ),पहल शुरू की है. यह पहल 81वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान 21 सितंबर को न्यूयॉर्क में शुरू की गई. सातों शुरुआती सह-प्रायोजक देशों ने P4M समिट की घोषणा को अपनाया.

P4M का उद्देश्य अलग-अलग क्षेत्रों के देशों को अंतरराष्ट्रीय कानून, शांति, समावेशी विकास और साझा समृद्धि जैसे साझा सिद्धांतों के आधार पर एक साथ लाना है. पहल ऐसे समय शुरू हुई है जब दुनिया में भू-राजनीतिक तनाव, संघर्ष, ध्रुवीकरण और संरक्षणवाद बढ़ने के बीच बहुपक्षीय सहयोग को लेकर चिंताएं सामने आ रही हैं.

संयुक्त राष्ट्र में व्यापक सुधार पर जोर

P4M घोषणा में बहुपक्षीय व्यवस्था में सुधार को प्रमुख प्राथमिकता दी गई है. इसमें खास तौर पर संयुक्त राष्ट्र को अधिक प्रभावी, प्रतिनिधित्वपूर्ण, समावेशी और मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप बनाने पर जोर दिया गया है.

सदस्य देशों ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर पर आधारित बहुपक्षीय व्यवस्था आज भी जरूरी है, लेकिन दुनिया के तेजी से बदलते स्वरूप को देखते हुए इसमें सुधार की जरूरत है. देशों के मुताबिक मौजूदा वैश्विक व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक आपस में जुड़ी हुई, जटिल और बहुध्रुवीय हो गई है.

घोषणा में UN80 जैसी पहलों के जरिए बहुपक्षीय संस्थानों को मजबूत और अधिक प्रभावी बनाने की प्रतिबद्धता जताई गई है. इसका उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र की संघर्षों को रोकने, संकटों से निपटने, सतत विकास को बढ़ावा देने, मानवाधिकारों की रक्षा करने और नई वैश्विक चुनौतियों से निपटने की क्षमता को मजबूत करना है.

भारत ने पहले भी उठाया है वैश्विक संस्थाओं में सुधार का मुद्दा

P4M पहल भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में नई दिल्ली में हुए 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में वैश्विक शासन व्यवस्था में व्यापक सुधार की जरूरत पर जोर दिया था. उन्होंने वैश्विक नियमों को तय करने में ग्लोबल साउथ की अधिक भूमिका की बात कही थी.

मोदी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में बदलाव की जरूरत भी बताई थी. ऐसे में P4M के जरिए बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार और उन्हें अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने का मुद्दा भारत की प्राथमिकताओं से भी जुड़ता है.

अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभु समानता पर जोर

P4M घोषणा में अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन, देशों की संप्रभु समानता, क्षेत्रीय अखंडता और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के सिद्धांतों को दोहराया गया है. इसमें बल प्रयोग या बल प्रयोग की धमकी पर रोक के सिद्धांत का भी समर्थन किया गया है.

सदस्य देशों ने कहा कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में अंतरराष्ट्रीय नियमों और सहयोग की भूमिका को मजबूत करना जरूरी है. जलवायु परिवर्तन, नई तकनीकों और अन्य वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है.

व्यापार, तकनीक और जलवायु पर भी सहयोग

P4M का एजेंडा केवल राजनीतिक और सुरक्षा मामलों तक सीमित नहीं है. घोषणा में वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को अधिक मजबूत और लचीला बनाने, बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था में सुधार और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय ढांचे को बेहतर बनाने की बात कही गई है.

इसके अलावा डिजिटल बदलाव, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है. इसका उद्देश्य अलग-अलग क्षेत्रों के देशों के बीच व्यावहारिक सहयोग को बढ़ावा देना है.

अन्य देशों के लिए भी खुला रहेगा मंच

P4M को किसी नए औपचारिक गठबंधन के तौर पर पेश नहीं किया गया है. इसका उद्देश्य अलग-अलग भू-राजनीतिक परिस्थितियों वाले देशों को बहुपक्षीय सहयोग के साझा एजेंडे पर साथ लाना है. यह पहल भविष्य में अन्य क्षेत्रों और देशों की भागीदारी के लिए भी खुली रहेगी.

यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंतोनियो कोस्टा ने P4M को संवाद, गठबंधन निर्माण और व्यावहारिक सहयोग के लिए एक मंच बताया है. उन्होंने कहा कि यह अलग-अलग क्षेत्रों के बीच पुल बनाने और बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार तथा आधुनिकीकरण में योगदान दे सकता है.

न्यूयॉर्क में हुई P4M बैठक

P4M शिखर बैठक 21 सितंबर को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के उच्चस्तरीय सप्ताह के दौरान हुई. इसमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज, बारबाडोस की प्रधानमंत्री मिया मोटली, ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी और केन्या के राष्ट्रपति विलियम रूटो शामिल हुए.

सातों शुरुआती साझेदार देशों ने कहा है कि वे दुनिया के अन्य देशों के साथ नियमित संवाद और समन्वय जारी रखेंगे, ताकि बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत किया जा सके और वैश्विक संस्थाओं में सुधार के लिए व्यावहारिक कदम आगे बढ़ाए जा सकें.
 


भारत लॉन्च करेगा ₹1,000 करोड़ का पहला ब्लू बॉन्ड, समुद्री और जल परियोजनाओं को मिलेगा फंड

सागरमाला फाइनेंस कॉरपोरेशन अगले सप्ताह कर सकता है देश के पहले ब्लू बॉन्ड का इश्यू, पोर्ट कनेक्टिविटी, जहाज निर्माण और तटीय बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं को मिल सकता है वित्त

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 22 September, 2026
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Tuesday, 22 September, 2026
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भारत सस्टेनेबल फाइनेंस के एक नए क्षेत्र में कदम रखने जा रहा है. सागरमाला फाइनेंस कॉरपोरेशन अगले सप्ताह देश का पहला ब्लू बॉन्ड जारी कर सकता है. इसके जरिए करीब ₹1,000 करोड़ तक जुटाने की योजना है. इस रकम का इस्तेमाल समुद्री क्षेत्र, तटीय बुनियादी ढांचे और जल से जुड़ी परियोजनाओं के वित्तपोषण में किया जा सकता है. सागरमाला फाइनेंस कॉरपोरेशन बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्रालय के तहत काम करने वाली सरकारी स्वामित्व वाली वित्तीय संस्था है. प्रस्तावित ब्लू बॉन्ड के जरिए भारत ग्रीन बॉन्ड से आगे बढ़कर सस्टेनेबल डेट मार्केट के एक नए हिस्से में प्रवेश करेगा.

क्या होता है ब्लू बॉन्ड?

ब्लू बॉन्ड ऐसे डेट इंस्ट्रूमेंट होते हैं, जिनसे जुटाई गई रकम का इस्तेमाल समुद्र, महासागर, तटीय क्षेत्रों, नदियों और अन्य जल आधारित पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ी परियोजनाओं के लिए किया जाता है. दुनियाभर में इनका इस्तेमाल समुद्री संरक्षण, टिकाऊ मत्स्य पालन और जल बुनियादी ढांचे जैसी परियोजनाओं के लिए किया जाता रहा है. भारत में प्रस्तावित इश्यू से समुद्री और जल क्षेत्र की लंबी अवधि वाली परियोजनाओं के लिए पूंजी जुटाने का एक नया माध्यम तैयार हो सकता है.

₹1,000 करोड़ तक जुटाने की योजना

सागरमाला फाइनेंस कॉरपोरेशन पहले ही अपने पहले ब्लू बॉन्ड के जरिए ₹1,000 करोड़ तक जुटाने की योजना का संकेत दे चुका है. प्रस्तावित फंड का इस्तेमाल पोर्ट कनेक्टिविटी, जहाज निर्माण, अंतर्देशीय जलमार्ग और तटीय बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं में किया जा सकता है.

इस बॉन्ड इश्यू से कंपनी के लिए कर्ज जुटाने के स्रोतों में भी विविधता आएगी. साथ ही, लंबी अवधि की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के अनुरूप लंबी अवधि का वित्त जुटाने में मदद मिल सकती है. यह इश्यू भारत में ब्लू फाइनेंस के लिए निवेशकों की रुचि को भी परख सकता है. अभी भारत के सस्टेनेबल डेट मार्केट में ग्रीन बॉन्ड का हिस्सा अधिक रहा है.

भारत के सस्टेनेबल फाइनेंस मार्केट को मिलेगा नया विकल्प

भारत का पहला ब्लू बॉन्ड ऐसे समय में आ रहा है जब दुनियाभर में समुद्र और जल से जुड़ी परियोजनाओं के लिए वित्त जुटाने में रुचि बढ़ रही है. सेशेल्स ने 2018 में दुनिया का पहला सॉवरेन ब्लू बॉन्ड जारी किया था.

भारत में सागरमाला फाइनेंस के अलावा वडोदरा नगर निगम भी ब्लू बॉन्ड जारी करने की संभावनाओं पर काम कर रहा है. वडोदरा करीब ₹200 करोड़ का ब्लू बॉन्ड जारी करने पर विचार कर रहा है. इससे पंप हाउस, जल शोधन संयंत्र और साफ पानी के जलाशय जैसी जल संबंधी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को वित्त दिया जा सकता है.

आगे के लिए बन सकता है मॉडल

सागरमाला फाइनेंस का प्रस्तावित इश्यू भारत के डेट मार्केट में एक नए सेगमेंट की शुरुआत कर सकता है. इससे समुद्री, तटीय और जल आधारित बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए भविष्य में इस तरह के बॉन्ड के जरिए फंड जुटाने का रास्ता खुल सकता है. हालांकि, बॉन्ड का अंतिम आकार, जारी करने की तारीख और शर्तें नियामकीय मंजूरियों और उस समय की बाजार परिस्थितियों पर निर्भर करेंगी. इसके बावजूद, प्रस्तावित इश्यू भारत में ब्लू फाइनेंस के विकास की दिशा में एक नया कदम होगा.
 


AIF निवेश ने बनाया नया रिकॉर्ड, पहली बार ₹7 लाख करोड़ के पार पहुंचा आंकड़ा

जून 2026 तक AIF में कुल निवेश ₹7.1 लाख करोड़ पहुंचा, सालाना आधार पर निवेश प्रतिबद्धता 23.6% बढ़ी; रियल एस्टेट में पहली बार गिरावट

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 22 September, 2026
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Tuesday, 22 September, 2026
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ऑल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड (AIF) में निवेश का आंकड़ा पहली बार 7 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है. भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) के आंकड़ों के मुताबिक, जून 2026 तक AIF में कुल निवेश बढ़कर 7.1 लाख करोड़ रुपये हो गया. वहीं, इस श्रेणी के फंड्स के लिए कुल निवेश प्रतिबद्धता बढ़कर 17.53 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गई, जो मार्च 2026 के अंत में 16.94 लाख करोड़ रुपये थी. यानी तीन महीने में प्रतिबद्धता में करीब 3.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई.

सालाना आधार पर देखें तो जून 2025 की तुलना में AIF में निवेश प्रतिबद्धता करीब 23.6 फीसदी बढ़ी है. इस दौरान AIF के जरिए जुटाया गया कुल फंड भी बढ़कर 7.58 लाख करोड़ रुपये हो गया. आंकड़े बताते हैं कि वैकल्पिक निवेश का यह सेगमेंट लगातार विस्तार कर रहा है. 

क्या होता है AIF

AIF ऐसे निवेश फंड होते हैं जो आमतौर पर पारंपरिक म्यूचुअल फंड या बैंक FD से अलग तरह की संपत्तियों और कंपनियों में निवेश करते हैं. इनमें बड़े निवेशक अपना पैसा लगाते हैं और पेशेवर फंड मैनेजर उस पैसे को अलग-अलग अवसरों में निवेश करते हैं.  AIF के जरिए  स्टार्टअप और अनलिस्टेड कंपनियां, प्राइवेट इक्विटी, रियल एस्टेट और इंफ्रास्ट्रक्चर, कर्ज/डेट इंस्ट्रूमेंट में निवेश किया जाता है. वहीं, कुछ मामलों में शेयर और अन्य वैकल्पिक जगह भी निवेश होता है. 

चार साल में तीन गुना से ज्यादा हुई प्रतिबद्धता

AIF में निवेश प्रतिबद्धता पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है. जून 2021 में यह 4.87 लाख करोड़ रुपये थी, जो जून 2022 में बढ़कर 6.94 लाख करोड़ रुपये हो गई. जून 2023 में यह आंकड़ा 8.45 लाख करोड़ रुपये और जून 2024 में 11.78 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया.

इसके बाद भी बढ़ोतरी का सिलसिला जारी रहा. मार्च 2026 तक AIF में निवेश प्रतिबद्धता 16.94 लाख करोड़ रुपये थी, जो जून 2026 तक बढ़कर 17.53 लाख करोड़ रुपये हो गई.

इस तरह चार साल की अवधि में AIF में निवेश के लिए की गई प्रतिबद्धता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. यह ऐसे समय में हो रहा है जब वैकल्पिक निवेश उत्पादों के प्रति बड़े और संस्थागत निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ी है.

रियल एस्टेट में पहली बार निवेश घटा

AIF के आंकड़ों में एक अहम बदलाव रियल एस्टेट क्षेत्र में देखने को मिला है. जून 2026 तक रियल एस्टेट में कुल निवेश 87,969 करोड़ रुपये रहा, जबकि मार्च 2026 में यह करीब 1.29 लाख करोड़ रुपये था. यानी इस क्षेत्र में तिमाही आधार पर निवेश में गिरावट दर्ज की गई.

हालांकि, निवेश के मामले में रियल एस्टेट अब भी AIF के प्रमुख क्षेत्रों में शामिल है. वहीं वित्तीय सेवाओं, सूचना प्रौद्योगिकी (IT), नॉन-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC), बैंकों, फार्मा और हेल्थकेयर जैसे क्षेत्रों में निवेश लगातार बढ़ रहा है. इन सेक्टरों में बढ़ता निवेश AIF के पोर्टफोलियो के धीरे-धीरे ज्यादा विविध होने का संकेत देता है.

प्रतिबद्धता और निवेश में क्या अंतर है?

AIF के आंकड़ों को समझने के लिए ‘कमिटमेंट’ और ‘इन्वेस्टमेंट’ के बीच अंतर समझना जरूरी है. निवेशक जब किसी AIF में पैसा लगाने की प्रतिबद्धता जताते हैं, तो पूरी रकम आमतौर पर एक साथ फंड में नहीं आती. फंड मैनेजर जरूरत और निवेश के अवसर के अनुसार इसे अलग-अलग किस्तों में बुलाते हैं.

यही वजह है कि कुल निवेश प्रतिबद्धता का आंकड़ा जुटाए गए फंड और वास्तविक निवेश से काफी अधिक रहता है. जैसे-जैसे फंड मैनेजर निवेश के लिए प्रतिबद्ध रकम का इस्तेमाल करते हैं, उसका असर जुटाए गए फंड और वास्तविक निवेश के आंकड़ों में दिखाई देता है.

SEBI के सुधारों से भी मिला सहारा

पिछले कुछ वर्षों में बाजार नियामक SEBI ने AIF के लिए फंड जुटाने और उनके संचालन को आसान बनाने के लिए कई बदलाव किए हैं. नियामक का फोकस इस सेगमेंट के कामकाज को अधिक व्यवस्थित बनाने और निवेश प्रक्रिया को आसान करने पर रहा है.

SEBI निवेशकों को AIF जैसे वैकल्पिक निवेश उत्पादों से जोड़ने के लिए एक्रिडिटेड इन्वेस्टर फ्रेमवर्क की भी समीक्षा करने पर विचार कर रहा है. ऐसे नियामकीय बदलावों से इस सेगमेंट में निवेशकों की भागीदारी और फंड मैनेजरों के लिए पूंजी जुटाने की प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है.

कुल मिलाकर, जून 2026 तक के आंकड़े AIF बाजार के लगातार विस्तार की तस्वीर दिखाते हैं. ₹7.1 लाख करोड़ का वास्तविक निवेश पहली बार ₹7 लाख करोड़ के पार पहुंचना और ₹17.53 लाख करोड़ की निवेश प्रतिबद्धता यह बताती है कि वैकल्पिक निवेश फंड भारतीय निवेश बाजार में लगातार बड़ा स्थान बना रहे हैं.
 


सीमेंट कंपनियों की नई रणनीति, कीमत बढ़ाने के बजाय लागत घटाकर मुनाफा बढ़ाने पर जोर: रिपोर्ट

मजबूत मांग के बीच UltraTech, Ambuja Cement और JSW Cement का फोकस लागत घटाने, क्षमता बढ़ाने और प्रीमियम उत्पादों की बिक्री पर; आने वाले वर्षों में 7-8% सालाना बढ़ सकती है सीमेंट की मांग

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Published - Tuesday, 22 September, 2026
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Tuesday, 22 September, 2026
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सीमेंट कंपनियों के लिए मांग का माहौल मजबूत बना हुआ है, लेकिन बढ़ती ईंधन और माल ढुलाई लागत मुनाफे पर दबाव डाल रही है. ऐसे में कंपनियां केवल सीमेंट की कीमत बढ़ाकर मार्जिन सुधारने के बजाय लागत घटाने, प्लांट की क्षमता का बेहतर इस्तेमाल करने और प्रीमियम उत्पादों की बिक्री बढ़ाने पर जोर दे रही हैं. अल्ट्राटेक सीमेंट (UltraTech Cement), अंबुजा सीमेंट (Ambuja Cement) और जेएसडब्ल्यू सीमेंट (JSW Cement) की रणनीति में इसका असर साफ दिखाई दे रहा है.

ग्लोबल इनवेस्टमेंट बैंक Jefferies की इंडिया फोरम की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, तीनों कंपनियां आने वाले वर्षों में अलग-अलग तरीकों से लागत कम करने और ऑपरेटिंग प्रॉफिट बढ़ाने की दिशा में काम कर रही हैं. कंपनियों को उम्मीद है कि मजबूत मांग के साथ लागत पर नियंत्रण से उनकी कमाई में सुधार हो सकता है.

3-5 साल में 7-8% बढ़ सकती है सीमेंट की मांग

रिपोर्ट के अनुसार, मकान निर्माण, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और निजी क्षेत्र के निवेश से सीमेंट की मांग उम्मीद से बेहतर बनी हुई है. देश की सबसे बड़ी सीमेंट कंपनियों में शामिल अल्ट्राटेक की मौजूदा उत्पादन क्षमता करीब 20 करोड़ टन सालाना है. कंपनी इसे बढ़ाकर 23.7 करोड़ टन करने की तैयारी में है. 2019 के बाद कंपनी अपनी उत्पादन क्षमता करीब दोगुनी कर चुकी है. अब कंपनी का फोकस सिर्फ नई क्षमता जोड़ने पर नहीं, बल्कि मौजूदा प्लांट्स का बेहतर इस्तेमाल करने पर भी है. क्षमता का उपयोग बढ़ने से प्रति टन सीमेंट उत्पादन की औसत लागत कम हो सकती है, जिससे कंपनी के मुनाफे को सहारा मिलेगा.

अंबुजा सीमेंट: 500 रुपये प्रति टन तक लागत घटाने का लक्ष्य

अंबुजा सीमेंट का जोर भी क्षमता विस्तार के साथ लागत कम करने पर है. कंपनी ने पिछले कुछ वर्षों में ACC, Sanghi, Penna और Orient जैसी कंपनियों या उनकी परिसंपत्तियों को अपने कारोबार में जोड़ा है. हालांकि, कुछ अधिग्रहित परिसंपत्तियों के प्रदर्शन में सुधार उम्मीद से अधिक समय ले रहा है.

कंपनी ने अगले दो वर्षों में अपनी लागत करीब 500 रुपये प्रति टन तक कम करने का लक्ष्य रखा है. इसके लिए लॉजिस्टिक्स पर भी काम किया जा रहा है. अंबुजा चालू वित्त वर्ष के अंत तक सीमेंट की औसत ढुलाई दूरी करीब 15 किलोमीटर कम करने की योजना बना रही है. इससे परिवहन लागत घट सकती है.

कंपनी ऊर्जा लागत कम करने के लिए भी कदम उठा रही है. अंबुजा सीमेंट अपने कुल बिजली इस्तेमाल में ग्रीन एनर्जी की हिस्सेदारी मौजूदा करीब 30 फीसदी से बढ़ाकर 60 फीसदी करना चाहती है. इसके साथ ही मिक्स सीमेंट और ज्यादा कीमत वाले प्रीमियम उत्पादों की हिस्सेदारी बढ़ाने की योजना है. इस रणनीति का मकसद सीमेंट की कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी किए बिना प्रति टन मुनाफा बढ़ाना है.

जेएसडब्ल्यू सीमेंट: 6.8 करोड़ टन होगी क्षमता

जेएसडब्ल्यू सीमेंट भी आने वाले वर्षों में बड़े क्षमता विस्तार की तैयारी कर रही है. कंपनी अपनी मौजूदा करीब 2.41 करोड़ टन सालाना क्षमता को अगले 5 से 7 वर्षों में बढ़ाकर करीब 6.8 करोड़ टन करना चाहती है.

कंपनी के कुल कारोबार में करीब 70 फीसदी हिस्सेदारी दूसरी कंपनियों और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स से आती है. इसलिए इंफ्रा और निर्माण गतिविधियों में तेजी उसके लिए मांग का महत्वपूर्ण आधार बनी हुई है. जेएसडब्ल्यू सीमेंट भी कीमत बढ़ाने के बजाय लागत कम करने पर जोर दे रही है. कंपनी नवीकरणीय ऊर्जा, वैकल्पिक ईंधन, वेस्ट हीट से बिजली उत्पादन और लॉजिस्टिक्स को बेहतर बनाने जैसे उपायों पर काम कर रही है. कंपनी का लक्ष्य प्रति टन ऑपरेटिंग प्रॉफिट को वित्त वर्ष 2025-26 के करीब 900 रुपये से बढ़ाकर लगभग 1,100 रुपये करना है.

कीमतों के बजाय लागत पर क्यों बढ़ा फोकस?

सीमेंट उद्योग में मांग मजबूत रहने के बावजूद कंपनियों के सामने लागत का दबाव बना हुआ है. ईंधन, बिजली और परिवहन खर्च बढ़ने पर कीमत बढ़ाना हमेशा आसान नहीं होता, क्योंकि इससे मांग पर असर पड़ सकता है और बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है. ऐसे में कंपनियों के लिए प्लांट की क्षमता का बेहतर इस्तेमाल, कम दूरी तक माल ढुलाई, सस्ती और नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल तथा प्रीमियम सीमेंट की बिक्री बढ़ाना मुनाफा सुधारने के वैकल्पिक तरीके बन रहे हैं.

कुल मिलाकर, सीमेंट उद्योग में कंपनियों की रणनीति अब सिर्फ ‘कीमत बढ़ाओ और मार्जिन बचाओ’ तक सीमित नहीं रह गई है. मजबूत मांग के बीच उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ लागत घटाने और प्रति टन कमाई बढ़ाने पर जोर है. अगर सीमेंट की मांग अनुमान के मुताबिक बढ़ती है और कंपनियां लागत नियंत्रण के अपने लक्ष्य हासिल करती हैं, तो आने वाले वर्षों में उनके ऑपरेटिंग मार्जिन और मुनाफे को सहारा मिल सकता है.


बैंक हड़ताल पर सरकार की अपील, 28 सितंबर से प्रस्तावित स्ट्राइक वापस लेने को कहा

5 दिन तक प्रभावित हो सकती हैं बैंकिंग सेवाएं, हाफ इयरली क्लोजिंग के बीच हड़ताल से बढ़ सकती है परेशानी

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Published - Tuesday, 22 September, 2026
Last Modified:
Tuesday, 22 September, 2026
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बैंक कर्मचारियों की 28 सितंबर से प्रस्तावित देशव्यापी हड़ताल को लेकर वित्त मंत्रालय ने बैंक यूनियनों से आंदोलन वापस लेने की अपील की है. मंत्रालय का कहना है कि कर्मचारियों की कई प्रमुख मांगों पर पहले ही कदम उठाए जा चुके हैं और बाकी मुद्दों को बातचीत के जरिए सुलझाया जा सकता है. यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (UFBU) ने 5 दिन के वर्किंग वीक समेत कई मांगों को लेकर 28 सितंबर से तीन दिन की हड़ताल का ऐलान किया है.

28 सितंबर से 3 दिन की हड़ताल

UFBU की प्रस्तावित हड़ताल 28 सितंबर से शुरू होगी. इससे बैंकिंग सेवाओं पर असर पड़ने की आशंका है. हड़ताल से ठीक पहले सप्ताहांत की छुट्टियां होने के कारण कई जगह लगातार पांच दिन तक बैंक शाखाओं का कामकाज प्रभावित हो सकता है.

इस हड़ताल का समय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बैंकों की हाफ इयरली क्लोजिंग यानी 30 सितंबर के आसपास पड़ रही है. इस दौरान खातों के मिलान, प्रोविजनिंग, ट्रेजरी और अन्य वित्तीय गतिविधियों का काम महत्वपूर्ण होता है. ऐसे में बैंक कर्मचारियों की हड़ताल से ग्राहकों, कारोबारियों और सरकारी लेन-देन से जुड़े काम प्रभावित हो सकते हैं.

सरकार ने गिनाए कर्मचारियों के लिए उठाए गए कदम

वित्त मंत्रालय ने कहा है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक देश की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और सरकार बैंक कर्मचारियों के हितों को ध्यान में रखते हुए कई कदम उठा चुकी है. मंत्रालय के मुताबिक, कर्मचारियों के वेतन और भत्तों में बढ़ोतरी, नया पे-स्केल लागू करने और स्टाफ वेलफेयर फंड का दायरा बढ़ाने जैसे फैसले लिए गए हैं. इसके अलावा असिस्टेंट जनरल मैनेजर से लेकर चीफ जनरल मैनेजर स्तर तक के उच्च पदों की संख्या भी बढ़ाई गई है. कर्मचारियों की मांगों को देखते हुए परफॉर्मेंस लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम को भी बातचीत के बाद स्थगित किया गया था.

वेतन समझौते पर समय से पहले शुरू हुई बातचीत

मंत्रालय ने बताया कि बैंक कर्मचारियों के वेतन संशोधन और भत्तों से जुड़े नए द्विपक्षीय समझौते (Bipartite Settlement) की प्रक्रिया भी समय से पहले शुरू की गई है. सरकार का कहना है कि नवंबर 2027 की निर्धारित समयसीमा से काफी पहले इस प्रक्रिया को पूरा करने का प्रयास किया जा रहा है.

5 दिन के वर्किंग वीक की मांग पर क्या कहा?

बैंक यूनियनों की प्रमुख मांगों में 5 दिन का वर्किंग वीक भी शामिल है. मौजूदा व्यवस्था में बैंक आम तौर पर दूसरे और चौथे शनिवार को बंद रहते हैं, जबकि अन्य शनिवार को कामकाज होता है. सरकार का कहना है कि बाकी शनिवार को बैंक शाखाएं खुली रहने से आम लोगों को बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच मिलती है. मंत्रालय ने कर्मचारियों से अपील की है कि वे हड़ताल के बजाय बातचीत का रास्ता अपनाएं और लंबित मुद्दों का समाधान चर्चा के जरिए निकालें.

सरकार के अनुसार, हड़ताल से बैंकिंग सेवाओं के साथ-साथ आम ग्राहकों, कारोबारियों और स्वयं कर्मचारियों पर भी असर पड़ सकता है.
 


टाटा संस की लिस्टिंग के समर्थन में उतरे शापूर मिस्त्री, टाटा ट्रस्ट्स से मांगा सहयोग

शापूरजी पलोनजी (SP) ग्रुप के पास टाटा संस की 18.37 फीसदी हिस्सेदारी है. समूह लंबे समय से इस हिस्सेदारी में अधिक तरलता चाहता है, क्योंकि उसकी होल्डिंग और ऑपरेटिंग कंपनियों पर बड़ी मात्रा में कर्ज है.

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Published - Tuesday, 22 September, 2026
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Tuesday, 22 September, 2026
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शापूरजी पलोनजी ग्रुप (SP Group) के चेयरमैन शापूर मिस्त्री ने टाटा संस की सार्वजनिक लिस्टिंग के समर्थन में टाटा ट्रस्ट्स से सहयोग की अपील की है. यह बयान ऐसे समय आया है जब भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की नियामकीय कार्रवाई के बाद टाटा संस पर शेयर बाजार में लिस्टिंग से जुड़े नियमों का पालन करने का दबाव बढ़ गया है. वहीं, टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा लिस्टिंग का विरोध कर रहे हैं.

शापूरजी पलोनजी (SP) ग्रुप के पास टाटा संस की 18.37 फीसदी हिस्सेदारी है. समूह लंबे समय से इस हिस्सेदारी में अधिक तरलता चाहता है, क्योंकि उसकी होल्डिंग और ऑपरेटिंग कंपनियों पर बड़ी मात्रा में कर्ज है. मिस्त्री ने कहा कि लिस्टिंग का मुद्दा शेयरधारकों के बीच विवाद के तौर पर देखने के बजाय सभी संबंधित पक्षों को मिलकर इसका समाधान तलाशना चाहिए. उन्होंने दोनों कारोबारी समूहों के बीच संबंधों को और मजबूत करने की इच्छा भी जताई.

लिस्टिंग को लेकर मिलकर फैसला लेने की अपील

मिस्त्री ने टाटा ट्रस्ट्स, टाटा संस, कंपनी के नेतृत्व, शेयरधारकों और अन्य हितधारकों से लिस्टिंग के मुद्दे पर सामूहिक रूप से विचार करने की अपील की. उन्होंने कहा कि SP ग्रुप और टाटा समूह के बीच संबंध 100 साल से भी ज्यादा पुराने हैं और दोनों समूहों के बीच आगे भी बेहतर सहयोग की संभावनाएं हैं.

उनका यह बयान 17 सितंबर को हुई टाटा संस बोर्ड की बैठक के बाद आया है. इस बैठक में बोर्ड ने एन. चंद्रशेखरन को कार्यकारी चेयरमैन के तौर पर एक और पांच साल का कार्यकाल देने को मंजूरी दी थी. हालांकि, नोएल टाटा ने इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया था.

बोर्ड ने RBI की लागू गाइडलाइंस का पालन करने के लिए जरूरी कदम उठाने और नियामक, टाटा ट्रस्ट्स तथा अन्य हितधारकों से लागू नियमों को लेकर मार्गदर्शन लेने का भी फैसला किया था.

टाटा संस में हिस्सेदारी SP ग्रुप के लिए अहम

SP ग्रुप ने 1965 में पहली बार टाटा संस के शेयर खरीदे थे. इसके बाद समूह ने अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर 18.37 फीसदी कर ली, जिससे वह टाटा संस का सबसे बड़ा अल्पमत शेयरधारक बन गया. हालांकि, टाटा संस के शेयरों से जुड़े प्रतिबंधों के कारण SP ग्रुप के लिए इस हिस्सेदारी को आसानी से भुनाना संभव नहीं रहा है. समूह की कंपनियों पर मौजूद कर्ज के बीच टाटा संस में हिस्सेदारी उसके लिए संभावित नकदी स्रोत के तौर पर महत्वपूर्ण बनी हुई है. टाटा संस की सार्वजनिक लिस्टिंग होने पर इस हिस्सेदारी के लिए बाजार आधारित मूल्य भी तय हो सकता है.

नोएल टाटा ने दिया था 3 फीसदी हिस्सेदारी बेचने का प्रस्ताव

17 सितंबर की बोर्ड बैठक में नोएल टाटा ने एक प्रस्ताव रखा था. इसके तहत SP ग्रुप को टाटा संस में 3 फीसदी तक हिस्सेदारी बेचने के बदले करीब ₹25,000 करोड़ जुटाने का रास्ता सुझाया गया था. इस प्रस्ताव को टाटा संस को निजी कंपनी बनाए रखते हुए SP ग्रुप की नकदी जरूरतों को पूरा करने के वैकल्पिक तरीके के तौर पर देखा गया.

RBI के फैसले से बदला लिस्टिंग का समीकरण

टाटा संस की लिस्टिंग को लेकर बहस उस समय और तेज हो गई जब RBI ने टाटा संस की कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) के रूप में अपना रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने की मांग को खारिज कर दिया. इसके बाद टाटा संस पर अपर-लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC) से जुड़े नियामकीय ढांचे के तहत लागू आवश्यकताओं का पालन करने की स्थिति बनी हुई है, जिसमें संबंधित लिस्टिंग नियम भी शामिल हैं.

बोर्ड की ओर से अनुपालन की प्रक्रिया शुरू करने का फैसला कंपनी के पहले के रुख से बदलाव को दर्शाता है. इससे पहले टाटा संस सार्वजनिक लिस्टिंग से बचने के प्रयास कर रही थी. टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की करीब 66 फीसदी हिस्सेदारी है और वह लिस्टिंग का विरोध कर रहा है. इसके विपरीत, SP ग्रुप लगातार टाटा संस की लिस्टिंग के पक्ष में रहा है.
 


T-72 और T-90 टैंकों के लिए ₹586 करोड़ का करार, रक्षा मंत्रालय खरीदेगा स्वदेशी APUs

रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इन APUs को Make-II फ्रेमवर्क के तहत देश में ही विकसित किया गया है. Make-II के तहत उद्योगों की अगुवाई में रिसर्च और डेवलपमेंट को बढ़ावा दिया जाता है.

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Published - Tuesday, 22 September, 2026
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Tuesday, 22 September, 2026
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रक्षा मंत्रालय ने भारतीय सेना के T-72 और T-90 टैंकों के लिए सहायक विद्युत इकाइयां (APUs) की खरीद को लेकर एक्यूरेट इंडस्ट्रीयल कंट्रोल्स (Accurate Industrial Controls Private Limited) के साथ ₹586 करोड़ का करार किया है. यह समझौता 21 सितंबर को नई दिल्ली में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की मौजूदगी में हुआ. APU टैंकों के महत्वपूर्ण सिस्टम के लिए बिजली का वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध कराता है. इनमें फायर-कंट्रोल सिस्टम, फायरिंग सर्किट, गन स्टेबिलाइजेशन सिस्टम और टैंक में लगे अन्य उपकरण शामिल हैं. मंत्रालय के मुताबिक, इन APUs को सेना के मैकेनाइज्ड फॉर्मेशन की ऑपरेशनल तैयारियों, विश्वसनीयता और टिकाऊपन को मजबूत करने में मदद मिलेगी.

Make-II के तहत विकसित किए गए हैं APUs

इस खरीद को बख्तरबंद प्लेटफॉर्म में इस्तेमाल होने वाले महत्वपूर्ण सब-सिस्टम के स्वदेशीकरण की दिशा में भी अहम कदम माना जा रहा है. रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इन APUs को Make-II फ्रेमवर्क के तहत देश में ही विकसित किया गया है. Make-II के तहत उद्योगों की अगुवाई में रिसर्च और डेवलपमेंट को बढ़ावा दिया जाता है.

आयात पर निर्भरता कम करने पर जोर

₹586 करोड़ का यह करार रक्षा क्षेत्र में घरेलू विनिर्माण क्षमता बढ़ाने और महत्वपूर्ण रक्षा उपकरणों के लिए आयात पर निर्भरता कम करने की सरकार की व्यापक रणनीति का हिस्सा है. मंत्रालय ने कहा कि यह खरीद 'विकसित भारत@2047' के विजन और मजबूत, आत्मनिर्भर तथा वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी भारतीय रक्षा उद्योग के निर्माण के उद्देश्य के अनुरूप है.

T-72 और T-90 टैंकों के बेड़े में स्वदेशी APUs की तैनाती से इन टैंकों के इलेक्ट्रॉनिक और हथियार प्रणालियों को संचालित करने वाले सहायक सिस्टम को मजबूती मिलने की उम्मीद है. साथ ही, यह रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की दिशा में भी योगदान देगा.
 


आरबीआई की बॉन्ड बिक्री का असर, बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त नकदी घटकर ₹6 लाख करोड़

RBI के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 19 से 21 सितंबर के बीच बैंकिंग सिस्टम में शुद्ध नकदी अधिशेष करीब ₹6 लाख करोड़ रहा.

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Published - Tuesday, 22 September, 2026
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Tuesday, 22 September, 2026
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भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से बॉन्ड बेचकर बैंकिंग सिस्टम से अतिरिक्त नकदी निकालने का असर अब दिखाई देने लगा है. बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त नकदी का अधिशेष घटकर करीब ₹6 लाख करोड़ रह गया है. इसके साथ ही बैंकों के बीच एक-दूसरे को दिए जाने वाले overnight loans की ब्याज दर भी बढ़कर 5.24 फीसदी हो गई है, जो RBI की रेपो रेट के करीब है. बॉन्ड बिक्री के साथ GST भुगतान के लिए हुई नकद निकासी ने भी सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी को कम किया है.

सितंबर की शुरुआत में ₹11.16 लाख करोड़ था नकदी अधिशेष

RBI के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 19 से 21 सितंबर के बीच बैंकिंग सिस्टम में शुद्ध नकदी अधिशेष करीब ₹6 लाख करोड़ रहा. सितंबर के पहले सप्ताह में यह बढ़कर ₹11.16 लाख करोड़ के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया था. यानी कुछ ही हफ्तों में बैंकिंग सिस्टम से अतिरिक्त नकदी में काफी कमी आई है.

RBI ने बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी को कम करने के लिए खुले बाजार परिचालन (OMO) के तहत सरकारी बॉन्ड बेचने का फैसला किया है. इसकी पहली नीलामी शुक्रवार को हुई थी. सोमवार को हुई दूसरी OMO नीलामी में भी निवेशकों की मजबूत मांग देखने को मिली. ₹25,000 करोड़ के बॉन्ड बेचने के लिए ₹84,942 करोड़ की बोलियां मिलीं.

कॉल रेट बढ़कर 5.24 फीसदी

बैंकिंग सिस्टम में नकदी कम होने का असर overnight call rate पर भी पड़ा है. यह दर शुक्रवार के 4.92 फीसदी से बढ़कर सोमवार को 5.24 फीसदी पर पहुंच गई. यह RBI की मौजूदा रेपो रेट के लगभग बराबर है. एक प्राथमिक डीलरशिप के वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, नकदी की स्थिति पर OMO और GST भुगतान के लिए हुई नकद निकासी, दोनों का असर पड़ा है. उन्होंने कहा कि इन दोनों वजहों से कॉल रेट रेपो रेट के करीब पहुंच गई है.

सितंबर में ₹1 लाख करोड़ के बॉन्ड बेचने की योजना

RBI ने सितंबर में कुल ₹1 लाख करोड़ के OMO के तहत सरकारी बॉन्ड बेचने की घोषणा की है. इसका मकसद बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त और अपेक्षाकृत लंबी अवधि की नकदी को कम करना है. यह अतिरिक्त नकदी मुख्य रूप से डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा के तहत विदेशी निवेश के बड़े प्रवाह से बनी है. RBI ने अतिरिक्त नकदी को सोखने के लिए लंबी अवधि के वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) जैसे दूसरे उपाय भी किए हैं.

आगे और घट सकती है बैंकिंग सिस्टम की नकदी

बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले हफ्तों में बैंकिंग सिस्टम की नकदी स्थिति में और बदलाव हो सकता है. महीने के अंत में सरकारी और अन्य भुगतान की स्थिति बदलने के साथ सिस्टम में नकदी फिर बढ़ या घट सकती है. इसके अलावा RBI की ओर से आगे भी OMO के तहत बॉन्ड बिक्री जारी रहने की संभावना है.

बैंकों के ट्रेजरी अधिकारियों के मुताबिक, आने वाले महीनों में करीब ₹1 लाख करोड़ की एक और OMO बिक्री भी नकदी अधिशेष पर असर डाल सकती है. वहीं, अर्थव्यवस्था में चलन में मौजूद नकदी बढ़ने और बैंक जमा बढ़ने के साथ बैंकों की नकद आरक्षित अनुपात (CRR) से जुड़ी जरूरतें भी बढ़ सकती हैं. इससे सिस्टम में उपलब्ध अतिरिक्त नकदी और कम हो सकती है.

10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड पर भी नजर

IDFC First Bank की मुख्य अर्थशास्त्री गौरा सेन गुप्ता के मुताबिक, फिलहाल करीब ₹13 लाख करोड़ का दीर्घकालिक नकदी अधिशेष है, जिसे पूरी तरह सिस्टम से निकालने में वित्त वर्ष 2028 की दूसरी तिमाही तक का समय लग सकता है.

बाजार प्रतिभागियों के मुताबिक, आगे चलकर 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड 7 फीसदी से बढ़कर 7.25 फीसदी तक जा सकती है. हालांकि, सोमवार को 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड 2 आधार अंक घटकर 7.05 फीसदी पर बंद हुई.


ONGC की ‘समुद्र मंथन’ में पहली सफलता, महानदी बेसिन में मिली प्राकृतिक गैस

ONGC ने बताया कि महानदी बेसिन में ‘समुद्र मंथन’ अभियान के तहत खोदा गया यह उसका पहला कुआं है. MN-DW18-1-H-D नाम के इस कुएं को 1,623 मीटर की लक्षित गहराई तक खोदा गया था.

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Published - Tuesday, 22 September, 2026
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Tuesday, 22 September, 2026
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ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन (ONGC) को ओडिशा तट के पास गहरे समुद्र में प्राकृतिक गैस की खोज में सफलता मिली है. कंपनी ने ‘समुद्र मंथन’ डीपवॉटर एक्सप्लोरेशन अभियान के तहत कोणार्क से करीब 43 किलोमीटर दूर महानदी अपतटीय बेसिन में खोदे गए पहले कुएं में 1,441 से 1,452 मीटर की गहराई पर गैस की खोज की है. ONGC के अनुसार, कुएं से पिछले तीन दिनों से गैस का प्रवाह बना हुआ है और दबाव भी उत्साहजनक है. हालांकि, इस खोज को व्यावसायिक रूप से विकसित करने से पहले इसका आगे मूल्यांकन किया जाएगा.

1,623 मीटर की गहराई तक खोदा गया कुआं

ONGC ने बताया कि महानदी बेसिन में ‘समुद्र मंथन’ अभियान के तहत खोदा गया यह उसका पहला कुआं है. MN-DW18-1-H-D नाम के इस कुएं को 1,623 मीटर की लक्षित गहराई तक खोदा गया था. 18 सितंबर को कंपनी को 1,441 से 1,452 मीटर की गहराई के बीच प्राकृतिक गैस मिली.

कंपनी के अनुसार, खोज के बाद से कुएं में गैस का प्रवाह जारी है और इसका दबाव एवं फ्लो उत्साहजनक बना हुआ है. हालांकि, खोज की वास्तविक क्षमता और आर्थिक व्यवहार्यता का आकलन आगे के परीक्षण और मूल्यांकन के बाद किया जाएगा.

जल्द उत्पादन शुरू होने की संभावना

ONGC के अनुसार, खोज स्थल ओडिशा तट से अपेक्षाकृत कम दूरी पर है. ऐसे में अगर यह खोज व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य साबित होती है तो इसके विकास और गैस को बाजार तक पहुंचाने में मौजूदा बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल किया जा सकता है. कंपनी का कहना है कि पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस नियम, 2025 के तहत साझा बुनियादी ढांचे के इस्तेमाल से गहरे समुद्र में मिले संसाधनों को उत्पादन में लाने में मदद मिल सकती है.

यह खोज भारत के घरेलू प्राकृतिक गैस उत्पादन को बढ़ाने की दिशा में भी अहम हो सकती है, हालांकि इसके वास्तविक प्रभाव का आकलन खोज के आकार, उत्पादन क्षमता और व्यावसायिक व्यवहार्यता स्पष्ट होने के बाद ही किया जा सकेगा.


लगातार चौथे दिन चढ़ा बाजार, गिफ्ट निफ्टी 23,500 के पार; इन शेयरों पर रहेगी नजर

शुक्रवार को सेंसेक्स 19.63 अंक की गिरावट के साथ 74,294.96 पर बंद हुआ था, जबकि निफ्टी 75.80 अंक की बढ़त के साथ 23,346.40 पर बंद हुआ था.

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Published - Tuesday, 22 September, 2026
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Tuesday, 22 September, 2026
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भारतीय शेयर बाजार ने सोमवार को लगातार चौथे कारोबारी सत्र में बढ़त दर्ज की. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स 564.03 अंक यानी 0.76 फीसदी चढ़कर 74,858.99 पर, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज  (NSE) निफ्टी 67.90 अंक यानी 0.29 फीसदी की तेजी के साथ 23,414.30 पर बंद हुआ. मंगलवार को भी बाजार की शुरुआत मजबूत रहने के संकेत मिल रहे हैं. शुरुआती कारोबार में GIFT Nifty 23,500 के पार पहुंच गया है. वहीं, ब्रेंट क्रूड करीब 100 डॉलर प्रति बैरल पर है और अमेरिकी बाजारों में भी सोमवार को तेजी रही. इन संकेतों के बीच आज Hindustan Copper, Waaree Energies, Pine Labs और Lenskart Solutions समेत कई शेयर कॉरपोरेट अपडेट्स के कारण फोकस में रह सकते हैं.

सोमवार को सेंसेक्स के 24 शेयरों में तेजी

सोमवार को सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 24 बढ़त के साथ बंद हुए, जबकि 6 शेयरों में गिरावट रही. UltraTech Cement 4.11 फीसदी की तेजी के साथ सबसे बड़ा गेनर रहा. HCL Tech 3.42 फीसदी, Eternal 2.59 फीसदी, Titan 2.49 फीसदी और ITC 1.93 फीसदी चढ़े. वहीं, Bharti Airtel 1.93 फीसदी की गिरावट के साथ सबसे बड़ा लूजर रहा. Power Grid में 1.15 फीसदी, Infosys में 0.97 फीसदी, Adani Ports में 0.72 फीसदी और Tata Steel में 0.62 फीसदी की गिरावट रही.

निफ्टी में 30 शेयर चढ़े

निफ्टी के 50 शेयरों में से 30 बढ़त और 20 गिरावट के साथ बंद हुए. Eternal 2.77 फीसदी की बढ़त के साथ टॉप गेनर रहा. HCL Tech 2.54 फीसदी, ITC 1.79 फीसदी, Sun Pharma 1.72 फीसदी और Reliance Industries 1.71 फीसदी चढ़े. गिरावट वाले शेयरों में Bharti Airtel 3.33 फीसदी टूटकर सबसे आगे रहा. Adani Ports 2.02 फीसदी, Bajaj Finance 1.83 फीसदी, Power Grid 1.55 फीसदी और Adani Enterprises 1.49 फीसदी नीचे बंद हुए.

आज बाजार के लिए क्या संकेत?

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, मंगलवार के कारोबार से पहले GIFT Nifty 23,500 के पार कारोबार कर रहा है. इससे घरेलू बाजार में मजबूत शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं. हालांकि, बाजार खुलने के बाद दिशा वैश्विक संकेतों और घरेलू कारोबार के आधार पर बदल सकती है.

ब्रेंट क्रूड करीब 100 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है. पिछले पांच दिनों में इसकी कीमत करीब 8 फीसदी घट चुकी है. दूसरी ओर, AI शेयरों में तेजी और क्रूड में नरमी के बीच अमेरिकी बाजार भी सोमवार को मजबूत रहे. Nasdaq करीब 600 अंक चढ़ा, जबकि S&P 500 और Dow Jones में भी करीब आधे से एक फीसदी तक की तेजी रही.

इन शेयरों पर रहेगी नजर

आज Hindustan Copper ने अगले 5-6 वर्षों में 7,000 करोड़ रुपये से अधिक के कैपेक्स की योजना के चलते फोकस में है. Waaree Energies को एक प्रमुख सोलर डेवलपर से 2 GW सोलर मॉड्यूल सप्लाई का ऑर्डर मिला है. Pine Labs में Mastercard Asia/Pacific करीब 4.3 फीसदी हिस्सेदारी ब्लॉक डील के जरिए बेच सकती है. Lenskart Solutions में Platinum Jasmine A 2018 Trust ने 3.5 करोड़ शेयर यानी करीब 2.01 फीसदी हिस्सेदारी 2,390.57 करोड़ रुपये में बेची है.

इसके अलावा, Patanjali Foods के एक Sunrich Sunflower Oil बैच की बिक्री पर खाद्य सुरक्षा कार्रवाई हुई है. Edelweiss Financial Services 300 करोड़ रुपये तक के NCD जारी कर फंड जुटाएगी. Canara Bank को Basel III Additional Tier-I Bonds की NSE डेट लिस्टिंग की मंजूरी मिली है. Suryoday Small Finance Bank के बोर्ड ने 400 करोड़ रुपये तक के NCD इश्यू को मंजूरी दी है, जबकि Share India Securities 200 करोड़ रुपये तक जुटाने के लिए कन्वर्टिबल वारंट जारी करेगी.

Lloyds Metals 1,550 करोड़ रुपये तक के NCD जारी करने के साथ क्षमता विस्तार पर 140 करोड़ रुपये निवेश करेगी. वहीं, GRSE के बोर्ड ने रायचक में ग्रीनफील्ड शिपयार्ड के लिए 2,896 करोड़ रुपये के कैपिटल बजट को मंजूरी दी है. Reliable Data Services भी 200 करोड़ रुपये तक फंड जुटाने की तैयारी में है.