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घर खरीदने से क्यों पीछे हट रही है यंग जनरेशन? EMI से ज्यादा किराए और निवेश को दे रही प्राथमिकता

प्रॉपर्टी प्लेटफॉर्म NoBroker के सर्वे के अनुसार, 46 फीसदी किराएदार लंबे समय तक किराए पर रहने को बेहतर विकल्प मानते हैं. इनमें 25-34 वर्ष आयु वर्ग के 53 फीसदी और 35-44 वर्ष के 48 फीसदी लोग शामिल हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 months ago

भारत में अपना घर होना लंबे समय से सफलता की निशानी माना जाता रहा है, लेकिन अब मिलेनियल्स और जेन-जी की सोच तेजी से बदल रही है. महंगी प्रॉपर्टी, बढ़ती होम लोन EMI और करियर में लचीलापन बनाए रखने की चाह के चलते युवा घर खरीदने के बजाय किराए पर रहना पसंद कर रहे हैं. प्रॉपर्टी प्लेटफॉर्म NoBroker की रिपोर्ट के मुताबिक, 46 फीसदी किराएदार लंबे समय तक किराए के मकान में रहने को बेहतर विकल्प मानते हैं. उनका मानना है कि EMI में पैसा बांधने के बजाय निवेश और वित्तीय आजादी ज्यादा अहम है.

किराए के घर को मिल रही पहली पसंद

भारत में लंबे समय तक अपना घर खरीदना हर परिवार का सपना माना जाता रहा है, लेकिन अब यह सोच बदल रही है. खासकर मिलेनियल्स और जेन-जी प्रोफेशनल्स घर खरीदने की जल्दबाजी नहीं कर रहे हैं. वे लंबी अवधि के होम लोन की जिम्मेदारी लेने के बजाय किराए के मकान में रहकर अपनी वित्तीय स्वतंत्रता बनाए रखना चाहते हैं.

प्रॉपर्टी प्लेटफॉर्म NoBroker के सर्वे के अनुसार, 46 फीसदी किराएदार लंबे समय तक किराए पर रहने को बेहतर विकल्प मानते हैं. इनमें 25-34 वर्ष आयु वर्ग के 53 फीसदी और 35-44 वर्ष के 48 फीसदी लोग शामिल हैं.

EMI के मुकाबले किराया कहीं ज्यादा किफायती

युवाओं के इस बदलते रुझान की सबसे बड़ी वजह तेजी से बढ़ती प्रॉपर्टी कीमतें और महंगी होम लोन EMI हैं. देश के प्रमुख शहरों में घर की मासिक EMI अब किराए की तुलना में दोगुने से भी अधिक हो गई है. पिछले पांच वर्षों में गुरुग्राम का EMI-टू-रेंट रेशियो 1.86 से बढ़कर 2.68 हो गया है. बेंगलुरु में यह 2.38, हैदराबाद में 2.47 और मुंबई में 2.19 तक पहुंच चुका है. यानी जिस घर का मासिक किराया 50 हजार रुपये है, उसे खरीदने पर EMI एक लाख रुपये या उससे अधिक बैठ सकती है.

निवेश और वित्तीय आजादी को दे रहे प्राथमिकता

रिपोर्ट के अनुसार, युवा अब डाउन पेमेंट और भारी EMI में पैसा फंसाने के बजाय उसी रकम को म्यूचुअल फंड, शेयर बाजार और अन्य निवेश विकल्पों में लगा रहे हैं. उनका मानना है कि इससे बेहतर रिटर्न मिलने के साथ-साथ जरूरत पड़ने पर शहर या नौकरी बदलने की आजादी भी बनी रहती है.

बेंगलुरु के एक 31 वर्षीय आईटी प्रोफेशनल का कहना है कि अगले 20 वर्षों तक हर महीने एक लाख रुपये की EMI भरने से बेहतर है कि उसी राशि का निवेश किया जाए और करियर के अनुसार शहर बदलने की सुविधा बनी रहे.

लाइफस्टाइल भी बदल रही है प्राथमिकता

अब किराए पर रहना केवल मजबूरी नहीं, बल्कि एक सोचा-समझा फैसला बन चुका है. युवा बेहतर लोकेशन, गेटेड सोसाइटी, पूरी तरह फर्निश्ड अपार्टमेंट और आधुनिक सुविधाओं वाले घरों को प्राथमिकता दे रहे हैं.

बेंगलुरु में 3-BHK फ्लैट्स की मांग उनकी उपलब्धता से कहीं अधिक है. वहीं मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन (MMR) में कुल किराये की मांग का करीब एक-तिहाई हिस्सा ऐसे घरों का है, जिनका मासिक किराया 40,000 रुपये से अधिक है. इससे साफ है कि बेहतर लाइफस्टाइल के लिए युवा अधिक किराया देने को भी तैयार हैं.

करियर में लचीलापन भी बड़ा कारण

हाइब्रिड वर्क कल्चर, तेजी से बदलती नौकरियां और अलग-अलग शहरों में करियर के अवसर भी युवाओं के फैसले को प्रभावित कर रहे हैं. कई प्रोफेशनल्स तब तक घर खरीदना नहीं चाहते, जब तक यह तय न हो जाए कि भविष्य में वे किस शहर में स्थायी रूप से बसेंगे.

इसी बदलते ट्रेंड का असर रेंटल मार्केट पर भी दिखाई दे रहा है. NoBroker के अनुसार, मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन में किराये में सालाना 11 फीसदी की सबसे अधिक वृद्धि दर्ज की गई है. इसके बाद चेन्नई में 8 फीसदी, बेंगलुरु में 7 फीसदी तथा हैदराबाद और दिल्ली-एनसीआर में लगभग 3 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.

बदल रही है 'घर' की परिभाषा

विशेषज्ञों का मानना है कि नई पीढ़ी के लिए घर अब केवल एक संपत्ति नहीं, बल्कि एक वित्तीय निर्णय बन गया है. युवा फिलहाल अपनी पूंजी को निवेश, करियर और बेहतर जीवनशैली पर खर्च करना ज्यादा समझदारी मान रहे हैं. यही वजह है कि महानगरों में किराए का बाजार लगातार मजबूत होता जा रहा है और आने वाले वर्षों में यह रुझान और तेज हो सकता है.
 


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