अडानी समूह की कंपनियों - अडानी ग्रीन एनर्जी और अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस के शेयरों में गिरावट देखने को मिल रही है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
अडानी समूह (Adani Group) के साथ लंबे सफर की बात करने वाली एक विदेशी कंपनी अब उसका साथ छोड़ने को आतुर नजर आ रही है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अबू धाबी समूह इंटरनेशनल होल्डिंग कंपनी (IHC) अडानी ग्रुप की 2 कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेचने की तैयारी में है. IHC अडानी ग्रीन एनर्जी (Adani Green Energy) और अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस (Adani Energy Solutions) को अपने पोर्टफोलियो से हटाना चाहती है. हालांकि, IHC ने अडानी समूह की फ्लैगशिप कंपनी अडानी एंटरप्राइजेज (Adani Enterprises) में अपनी रणनीति फिलहाल स्पष्ट नहीं की है. दुबई की कंपनी के इस कदम को अडानी समूह के लिए झटका माना जा रहा है.
किसमें, कितनी है हिस्सेदारी?
अबू धाबी समूह इंटरनेशनल होल्डिंग कंपनी (IHC) ने अडानी समूह की दो कंपनियों से बाहर निकलने को लेकर ज्यादा कुछ नहीं कहा है. उसकी तरफ से केवल इतना बताया गया है कि अपने पोर्टफोलियो को नियंत्रित करने के लिए वो हिस्सेदारी बेच रही है. IHC ने अडानी समूह की तीन कंपनियों में निवेश किया हुआ है. उसके पास अडानी ग्रीन एनर्जी में 1.26% और अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस में 1.41% हिस्सेदारी है. जबकि अडानी एंटरप्राइजेज में उसने 7,700 करोड़ रुपए निवेश किए हैं. IHC के अपनी हिस्सेदारी बेचने की खबर सामने आने के बाद अडानी ग्रीन एनर्जी और अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस के शेयरों में गिरावट देखने को मिली है.
प्रभावित हुए निवेशकों की सोच!
दुबई की इस कंपनी ने पिछले साल अडानी ग्रीन एनर्जी और अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस में 50-50 करोड़ डॉलर का निवेश किया था. IHC के मुख्य कार्यकारी सैयद बसर शुएब (Syed Basar Shuaib) ने उस वक्त कहा था कि IHC अडानी समूह में लॉन्ग टर्म के लिए निवेश करेगी. लिहाजा, ये गौर करने वाली बात है कि एक ही साल में ऐसा क्या हुआ कि कंपनी अडानी समूह की इन कंपनियों का साथ छोड़ना चाहती है. कुछ जानकार मानते हैं कि अडानी समूह को लेकर लगातार सामने आ रहीं गलत खबरों ने निवेशकों को कुछ हद तक सोचने पर मजबूर किया है. हिंडनबर्ग के बाद OCCRP की रिपोर्ट में भी समूह पर गंभीर आरोप लगाए गए थे.
अच्छा नहीं गया ये साल
वैसे, देखा जाए तो ये साल गौतम अडानी और उनकी कंपनियों के लिए अच्छा नहीं रहा. साल की शुरुआत में ही अमेरिकी रिसर्च कंपनी हिंडनबर्ग ने अडानी ग्रुप पर बड़ा बम फोड़ा. इस रिपोर्ट में समूह पर कई गंभीर आरोप लगाए गए, जिसके बाद आसमान की ऊंचाई पर पहुंच चुके अडानी की कंपनियों के शेयर सीधे जमीन पर आ गए. समूह का मार्केट कैप धड़ाम हो गया और नतीजतन गौतम अडानी की दौलत का पहाड़ भी दरकने लगा. दुनिया के अमीरों की लिस्ट में दूसरे नंबर तक पहुंच गए अडानी लुढ़कते हुए इतना नीचे पहुंच गए कि अब तक पुरानी वाली स्थिति में नहीं आ सके हैं.
कंपनी का कहना है कि इस फैसले से करीब 90 हजार सेलर्स, खासकर MSME और D2C ब्रांड्स को अधिक मुनाफा कमाने, कारोबार बढ़ाने और नए ग्राहकों तक पहुंच बनाने में मदद मिलेगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ई-कॉमर्स कंपनी फ्लिपकार्ट (Flipkart) ने अपने प्लेटफॉर्म पर फैशन कैटेगरी के सभी प्रोडक्ट्स के लिए जीरो कमीशन नीति लागू करने का ऐलान किया है. पहले यह सुविधा सिर्फ 1,000 रुपये तक की कीमत वाले फैशन उत्पादों पर उपलब्ध थी. कंपनी का कहना है कि इस फैसले से करीब 90 हजार सेलर्स, खासकर MSME और D2C ब्रांड्स को अधिक मुनाफा कमाने, कारोबार बढ़ाने और नए ग्राहकों तक पहुंच बनाने में मदद मिलेगी.
अब सभी फैशन प्रोडक्ट्स पर नहीं लगेगा कमीशन
फ्लिपकार्ट ने अपनी जीरो कमीशन पॉलिसी का दायरा बढ़ाते हुए इसे फैशन कैटेगरी के सभी प्रोडक्ट्स पर लागू कर दिया है. इससे अब किसी भी कीमत के फैशन प्रोडक्ट पर कंपनी कमीशन नहीं लेगी. इस कदम का उद्देश्य सेलर्स को अधिक कमाई का अवसर देना और फैशन बिजनेस को बढ़ावा देना है.
90 हजार से अधिक सेलर्स को होगा फायदा
कंपनी के मुताबिक, इस फैसले से फैशन कैटेगरी में कारोबार करने वाले करीब 90 हजार विक्रेताओं को लाभ मिलेगा. इनमें बड़ी संख्या में MSME, घरेलू ब्रांड और डायरेक्ट-टू-कंज्यूमर (D2C) कंपनियां शामिल हैं. जीरो कमीशन लागू होने के बाद सेलर्स अपने मार्जिन का बड़ा हिस्सा अपने पास रख सकेंगे, जिससे वे नए उत्पाद लॉन्च करने, कारोबार का विस्तार करने और अपने ब्रांड को मजबूत बनाने में निवेश कर सकेंगे.
AI टूल्स से भी मिलेगी कारोबार बढ़ाने में मदद
फ्लिपकार्ट ने कहा कि सेलर्स को उसके AI आधारित डैशबोर्ड का भी लाभ मिलेगा. इसके जरिए उन्हें ग्राहकों की मांग, बाजार के ट्रेंड और कैटलॉग मैनेजमेंट से जुड़ी अहम जानकारी मिलेगी. इससे वे बेहतर तरीके से अपनी प्रोडक्ट रेंज बढ़ा सकेंगे और देशभर में ज्यादा ग्राहकों तक पहुंच बना सकेंगे.
ग्राहकों को मिलेंगे ज्यादा विकल्प
कंपनी का मानना है कि जब सेलर्स अपने कारोबार का विस्तार करेंगे तो ग्राहकों को भी इसका सीधा फायदा मिलेगा. उन्हें फैशन कैटेगरी में अधिक विकल्प, नए ट्रेंड्स तक तेजी से पहुंच और प्रीमियम प्रोडक्ट्स की बेहतर उपलब्धता मिलेगी. साथ ही प्रतिस्पर्धा बढ़ने से ग्राहकों को बेहतर कीमतों का भी लाभ मिलने की उम्मीद है.
Gen Z ग्राहकों पर कंपनी की खास नजर
फ्लिपकार्ट के अनुसार, फैशन कारोबार में Gen Z उपभोक्ताओं की भूमिका लगातार बढ़ रही है. वर्तमान में फ्लिपकार्ट फैशन के लगभग 50% दर्शक और ग्राहक Gen Z वर्ग से आते हैं. यही वजह है कि कंपनी तेजी से बदलते फैशन ट्रेंड्स और नई मांग को ध्यान में रखते हुए अपने सेलर नेटवर्क को मजबूत करने पर जोर दे रही है.
फ्लिपकार्ट फैशन के वाइस प्रेसिडेंट कपिल थिरानी ने कहा कि भारत का फैशन इकोसिस्टम तेजी से विकसित हो रहा है और इसमें MSME, घरेलू ब्रांड्स तथा D2C कंपनियां महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं.
उन्होंने कहा कि पूरे फैशन कैटेगरी में जीरो कमीशन लागू करना कंपनी का 'सेलर-फर्स्ट' दृष्टिकोण है. इससे विक्रेता नवाचार, नए उत्पादों के विस्तार और ब्रांड निर्माण में अधिक निवेश कर सकेंगे. इसके साथ ही ग्राहकों को ज्यादा विकल्प, नए फैशन ट्रेंड्स और बेहतर कीमतों का लाभ मिलेगा.
फैशन कारोबार को मिलेगा नया बूस्ट
फ्लिपकार्ट का मानना है कि आज फैशन केवल खरीदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोगों की पहचान, संस्कृति और आत्म-अभिव्यक्ति का अहम हिस्सा बन चुका है. ऐसे में जीरो कमीशन जैसी पहल डिजिटल कॉमर्स से जुड़े कारोबारियों को आगे बढ़ने का अवसर देगी और देशभर के ग्राहकों को बेहतर शॉपिंग अनुभव उपलब्ध कराएगी.
ADB ने जुलाई 2026 संस्करण के 'एशियन डेवलपमेंट आउटलुक' में FY27 के लिए भारत की GDP वृद्धि दर का अनुमान 6.9% से घटाकर 6.6% कर दिया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
एशियाई विकास बैंक (ADB) ने वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान 6.9% से घटाकर 6.6% कर दिया है. बैंक का कहना है कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, परिवहन लागत में बढ़ोतरी और उपभोक्ताओं पर बढ़ता महंगाई का बोझ निजी खपत को प्रभावित कर रहा है. हालांकि, इन चुनौतियों के बावजूद ADB का मानना है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बना रहेगा. बता दें, इससे पहले अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने भी वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर (GDP Growth) के अनुमान में मामूली कटौती की है.
IMF ने अपनी अपडेटेड वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक (World Economic Outlook) रिपोर्ट में कहा कि वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की GDP 6.4% की दर से बढ़ेगी. हालांकि, अगले वित्त वर्ष 2027-28 (FY28) के लिए अनुमान बढ़ाकर 6.7% कर दिया गया है. अप्रैल में FY28 के लिए 6.5% ग्रोथ का अनुमान लगाया गया था.
FY27 के लिए GDP ग्रोथ अनुमान में कटौती
ADB ने जुलाई 2026 संस्करण के 'एशियन डेवलपमेंट आउटलुक' में FY27 के लिए भारत की GDP वृद्धि दर का अनुमान 6.9% से घटाकर 6.6% कर दिया है. अप्रैल 2026 में जारी रिपोर्ट में बैंक ने 6.9% की ग्रोथ का अनुमान लगाया था. हालांकि, संशोधित अनुमान के बावजूद ADB का आकलन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के 6.4% के अनुमान से बेहतर है.
क्यों घटाया गया ग्रोथ का अनुमान?
ADB के मुताबिक, कच्चे तेल की लगातार ऊंची कीमतों ने अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा दिया है. ईंधन महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ी है, जिसका असर लगभग हर वस्तु और सेवा की कीमत पर पड़ा है. बैंक का कहना है कि बढ़ती महंगाई के कारण लोगों की खरीदारी क्षमता प्रभावित हुई है, जिससे निजी खपत में कमजोरी देखने को मिल रही है. यही वजह है कि आर्थिक वृद्धि की रफ्तार पहले के अनुमान से धीमी रहने की संभावना है.
पश्चिम एशिया का तनाव भी बना जोखिम
रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित कर रहा है. इसके अलावा मौसम संबंधी जोखिम कृषि उत्पादन पर असर डाल सकते हैं. यदि ये परिस्थितियां बनी रहती हैं तो भारत की आर्थिक वृद्धि पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है.
इन वजहों से अर्थव्यवस्था को मिलेगा सहारा
ADB का मानना है कि चुनौतियों के बावजूद भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था मजबूत बनी रहेगी. इसके पीछे कई सकारात्मक कारक हैं. इनमें विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए सरकार के प्रयास, ईंधन पर टैक्स राहत, लक्षित कर्ज सहायता योजनाएं, सेवा क्षेत्र का मजबूत निर्यात और सरकार का लगातार पूंजीगत व्यय (Capex) शामिल हैं. बैंक का कहना है कि यही कारक आने वाले समय में आर्थिक गतिविधियों को गति देंगे.
FY28 का अनुमान बरकरार
ADB ने वित्त वर्ष 2027-28 (FY28) के लिए भारत की विकास दर का अनुमान 7.3% पर यथावत रखा है. यह अनुमान भी IMF के 6.7% के अनुमान से अधिक है. रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों में संभावित सुधार और विभिन्न देशों के साथ होने वाले व्यापार समझौतों से भारत के निर्यात को फायदा मिल सकता है, जिससे अगले वित्त वर्ष में तेज विकास की उम्मीद है.
महंगाई का अनुमान भी बढ़ाया
ADB ने FY27 के लिए खुदरा महंगाई का अनुमान भी बढ़ा दिया है. अब बैंक को उम्मीद है कि महंगाई दर 5.2% रह सकती है, जबकि अप्रैल में इसे 4.5% रहने का अनुमान जताया गया था. बैंक के मुताबिक, तेल और खाद्य पदार्थों की ऊंची कीमतें तथा रुपये में कमजोरी महंगाई बढ़ने की प्रमुख वजह हैं. हालांकि, FY28 के लिए महंगाई का अनुमान 4% पर बरकरार रखा गया है.
सिर्फ भारत नहीं, पूरे दक्षिण एशिया पर असर
ADB ने दक्षिण एशिया के लिए भी आर्थिक वृद्धि का अनुमान घटाया है. वर्ष 2026 के लिए क्षेत्र की विकास दर का अनुमान 6.3% से घटाकर 6% कर दिया गया है. वहीं, विकासशील एशिया और प्रशांत क्षेत्र के लिए 2026 का ग्रोथ अनुमान 5.1% से घटाकर 4.9% कर दिया गया है.
ऊर्जा संकट और सप्लाई चेन बनी बड़ी चुनौती
ADB का कहना है कि पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, सप्लाई चेन और माल ढुलाई की लागत प्रभावित हुई है. इसका असर पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों पर पड़ रहा है.
भारत अब भी सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल
हालांकि ADB ने FY27 के लिए भारत की विकास दर का अनुमान घटाया है, लेकिन बैंक का भरोसा बरकरार है कि मजबूत घरेलू मांग, सरकारी निवेश, सेवा क्षेत्र का प्रदर्शन और निवेश आकर्षित करने वाली नीतियां भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बनाए रखेंगी. आने वाले महीनों में तेल की कीमतों और वैश्विक भू-राजनीतिक हालात पर भारत की आर्थिक रफ्तार काफी हद तक निर्भर करेगी.
कंपनी ने बताया कि नई पूंजी का इस्तेमाल मैन्युफैक्चरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने, प्रोडक्ट पोर्टफोलियो का विस्तार करने और रणनीतिक विकास योजनाओं को आगे बढ़ाने में किया जाएगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
Piramal Alternatives ने ऑटो कंपोनेंट निर्माता JRG Automotive Industries में 125 करोड़ रुपये का निवेश किया है. इस निवेश का उद्देश्य कंपनी की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाना, नए प्रोडक्ट्स विकसित करना और रणनीतिक अधिग्रहण (Acquisitions) के जरिए कारोबार का विस्तार करना है. यह निवेश Piramal Alternatives के India Credit Opportunities Fund II (PCF II) के माध्यम से किया गया है.
उत्पादन क्षमता बढ़ाने और विस्तार पर होगा फोकस
कंपनी ने बताया कि नई पूंजी का इस्तेमाल मैन्युफैक्चरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने, प्रोडक्ट पोर्टफोलियो का विस्तार करने और रणनीतिक विकास योजनाओं को आगे बढ़ाने में किया जाएगा. इसमें संभावित अधिग्रहण भी शामिल हैं, जिससे कंपनी अपनी बाजार हिस्सेदारी मजबूत कर सके.
यह निवेश India Credit Opportunities Fund II (PCF II) का चौथा निवेश है. यह फंड विभिन्न क्षेत्रों की तेजी से बढ़ती मिड-मार्केट कंपनियों में तीन से चार वर्षों के निवेश क्षितिज के साथ निवेश करता है.
2012 में हुई थी JRG Automotive की स्थापना
साल 2012 में स्थापित और गुरुग्राम मुख्यालय वाली JRG Automotive Industries दोपहिया और यात्री वाहनों के लिए पावरट्रेन-अज्ञेय (Powertrain-Agnostic) इंजेक्शन-मोल्डेड प्लास्टिक कंपोनेंट्स का निर्माण करती है.
कंपनी के उत्तर, पश्चिम और दक्षिण भारत के प्रमुख ऑटोमोबाइल हब में आठ विनिर्माण संयंत्र हैं. JRG Automotive देश की प्रमुख ऑटोमोबाइल कंपनियों (OEMs) को कंपोनेंट्स की आपूर्ति करती है. इसके अलावा कंपनी ने नए उत्पाद क्षेत्रों में विस्तार के लिए वैश्विक कंपोनेंट निर्माताओं के साथ संयुक्त उपक्रम (Joint Ventures) भी स्थापित किए हैं.
फंडिंग से विकास को मिलेगी गति
JRG Automotive Industries India के प्रबंध निदेशक पवन गोयल ने कहा कि यह निवेश कंपनी के ऑर्गेनिक विस्तार और रणनीतिक अधिग्रहण दोनों को गति देगा. इससे घरेलू और वैश्विक बाजारों में बढ़ती मांग को पूरा करने की कंपनी की क्षमता भी मजबूत होगी.
Piramal Alternatives को दीर्घकालिक विकास की उम्मीद
Piramal Alternatives के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) कल्पेश किकानी ने कहा कि JRG Automotive के प्रमुख ऑटोमोबाइल कंपनियों के साथ मजबूत संबंध, प्रति वाहन अधिक कंपोनेंट्स की आपूर्ति करने की क्षमता और नए प्रोडक्ट कैटेगरी में विस्तार की रणनीति कंपनी को दीर्घकालिक विकास के लिए मजबूत स्थिति में रखती है.
मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों पर बढ़ रहा निवेशकों का भरोसा
Piramal Alternatives का कहना है कि यह निवेश उच्च विकास क्षमता वाली विनिर्माण कंपनियों को लचीले क्रेडिट समाधान उपलब्ध कराने की उसकी रणनीति का हिस्सा है. कंपनी का पहला India Credit Opportunities Fund, जिसका आकार 2,100 करोड़ रुपये था, पूरी तरह निवेश किया जा चुका है. इस फंड ने 17 कंपनियों में निवेश किया था, जिनमें से 13 निवेशों से सफलतापूर्वक निकास (Exit) भी हो चुका है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह निवेश भारत की ऑटोमोबाइल सप्लाई चेन, खासकर ऑटो कंपोनेंट निर्माताओं में बढ़ते निवेशकों के भरोसे को दर्शाता है. वाहन उत्पादन और निर्यात के बढ़ते अवसरों के बीच ऐसी कंपनियां क्षमता विस्तार और उत्पाद विविधीकरण के जरिए तेजी से विकास की ओर बढ़ रही हैं.
दस्तावेजों के अनुसार, RBI ने एक बार फिर अपनी पुरानी राय दोहराई है कि बैंकों और अन्य विनियमित वित्तीय संस्थानों को क्रिप्टोकरेंसी या निजी तौर पर जारी किए गए स्टेबलकॉइन्स को रखने, उनमें निवेश करने या किसी भी तरह का एक्सपोजर लेने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में क्रिप्टोकरेंसी को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है. सरकार के आंतरिक दस्तावेजों से पता चला है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अब भी क्रिप्टोकरेंसी पर प्रतिबंध की दिशा में झुकाव रखने वाली नीति का समर्थन कर रहा है. वहीं, आयकर विभाग ने चेतावनी दी है कि विदेशी क्रिप्टो एक्सचेंज और निजी वॉलेट्स के जरिए होने वाले लेनदेन के कारण टैक्स चोरी और निगरानी बड़ी चुनौती बनती जा रही है.
सरकार की चिंता. वित्तीय स्थिरता और टैक्स अनुपालन पर फोकस
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वर्चुअल डिजिटल एसेट्स (VDA) पर अभी तक कोई व्यापक कानून लागू नहीं होने के बावजूद सरकार की प्रमुख एजेंसियां इनके जोखिमों को लेकर सतर्क हैं. दस्तावेज बताते हैं कि नीति-निर्माताओं का मुख्य फोकस वित्तीय स्थिरता बनाए रखने, मौद्रिक संप्रभुता की रक्षा करने और टैक्स अनुपालन को मजबूत करने पर है, क्योंकि देश में क्रिप्टो अपनाने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है.
RBI ने दोहराई प्रतिबंध जैसी नीति की मांग
दस्तावेजों के अनुसार, RBI ने एक बार फिर अपनी पुरानी राय दोहराई है कि बैंकों और अन्य विनियमित वित्तीय संस्थानों को क्रिप्टोकरेंसी या निजी तौर पर जारी किए गए स्टेबलकॉइन्स को रखने, उनमें निवेश करने या किसी भी तरह का एक्सपोजर लेने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए.
केंद्रीय बैंक का मानना है कि ऐसा करने से वित्तीय प्रणाली को अत्यधिक उतार-चढ़ाव वाले डिजिटल एसेट्स से होने वाले जोखिमों से बचाया जा सकेगा और बाजार में संकट की स्थिति में संक्रमण (Contagion) का खतरा भी कम होगा.
स्टेबलकॉइन को लेकर भी जताई चिंता
RBI ने स्टेबलकॉइन को लेकर भी गंभीर चिंता जताई है. केंद्रीय बैंक का कहना है कि विदेशी मुद्रा से जुड़े स्टेबलकॉइन भारत की मौद्रिक संप्रभुता को प्रभावित कर सकते हैं. वहीं, रुपये से जुड़े स्टेबलकॉइन सरकार की 'सीनियोरेज इनकम' यानी मुद्रा जारी करने से होने वाली आय को कम कर सकते हैं और वित्तीय स्थिरता के लिए अतिरिक्त जोखिम पैदा कर सकते हैं.
आयकर विभाग ने टैक्स चोरी पर जताई चिंता
आयकर विभाग ने अपनी समीक्षा में पाया कि मार्च 2023 को समाप्त वित्त वर्ष के दौरान लगभग 6.45 लाख लोगों ने क्रिप्टोकरेंसी में कारोबार किया था. हालांकि इनमें से केवल एक-चौथाई से भी कम लोगों ने अपनी आयकर रिटर्न (ITR) में इन लेनदेन का खुलासा किया.
विभाग का कहना है कि विदेशी क्रिप्टो एक्सचेंज, निजी वॉलेट और पीयर-टू-पीयर (P2P) प्लेटफॉर्म के जरिए होने वाले लेनदेन में वास्तविक लाभार्थियों की पहचान करना और टैक्स वसूलना बेहद मुश्किल हो जाता है.
30% टैक्स और 1% TDS के बावजूद चुनौती बरकरार
भारत में फिलहाल वर्चुअल डिजिटल एसेट्स पर 30 प्रतिशत टैक्स और पात्र लेनदेन पर 1 प्रतिशत TDS लागू है. इसके बावजूद टैक्स विभाग का मानना है कि टैक्स अनुपालन संतोषजनक नहीं है.
दस्तावेजों में यह भी कहा गया है कि क्रिप्टो एसेट्स के मूल्यांकन के अलग-अलग तरीके और एक समान अकाउंटिंग मानकों की कमी के कारण टैक्स निर्धारण और नियामकीय निगरानी जटिल हो जाती है.
अकाउंटिंग नियमों पर भी हो रहा विचार
इन चुनौतियों को देखते हुए कॉरपोरेट मामलों का मंत्रालय (MCA) वर्चुअल डिजिटल एसेट्स के लिए अकाउंटिंग गाइडलाइंस तैयार करने की संभावना पर काम कर रहा है, ताकि वित्तीय रिपोर्टिंग और नियामकीय निगरानी को अधिक प्रभावी बनाया जा सके.
अभी तक नहीं बना व्यापक कानून
भारत ने अभी तक क्रिप्टोकरेंसी को लेकर कोई व्यापक कानून नहीं बनाया है. वर्ष 2021 में निजी क्रिप्टोकरेंसी पर प्रतिबंध लगाने वाला एक मसौदा विधेयक तैयार किया गया था, लेकिन उसे संसद में पेश नहीं किया गया.
इसके बाद से सरकार का रुख यह रहा है कि किसी भी नीति में नवाचार को बढ़ावा देने और वित्तीय स्थिरता, उपभोक्ता सुरक्षा तथा अवैध वित्तीय गतिविधियों जैसे जोखिमों के बीच संतुलन बनाया जाना चाहिए.
भारत दुनिया के सबसे बड़े क्रिप्टो बाजारों में शामिल
नियामकीय अनिश्चितता के बावजूद भारत में क्रिप्टोकरेंसी का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है. सरकारी अनुमान के मुताबिक मई 2026 तक करीब 3.9 करोड़ भारतीयों के पास लगभग 2.1 अरब डॉलर मूल्य की डिजिटल संपत्तियां थीं. यूजर बेस के लिहाज से भारत दुनिया के सबसे बड़े क्रिप्टो बाजारों में शामिल हो चुका है.
दूसरे देशों से अलग है भारत का रुख
दुनिया के कई देशों ने क्रिप्टोकरेंसी को लेकर अलग-अलग नीतियां अपनाई हैं. जापान और सिंगापुर जैसे देशों ने लाइसेंसिंग और नियामकीय ढांचा तैयार किया है, जबकि चीन ने क्रिप्टो गतिविधियों पर व्यापक प्रतिबंध लगा रखा है. भारत फिलहाल ऐसे दौर में है जहां क्रिप्टो ट्रेडिंग पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है, लेकिन सरकार और RBI दोनों ही सतर्क रुख बनाए हुए हैं.
आगे कैसी हो सकती है नीति
उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि हालिया दस्तावेज साफ संकेत देते हैं कि भारतीय नियामकों की प्राथमिकता क्रिप्टो को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि वित्तीय प्रणाली की सुरक्षा, टैक्स अनुपालन को मजबूत करना और बैंकिंग सिस्टम को संभावित जोखिमों से बचाना है.
फिलहाल सरकार की अंतिम क्रिप्टो नीति पर विचार-विमर्श जारी है, लेकिन मौजूदा संकेत बताते हैं कि भविष्य की नीति में वित्तीय स्थिरता, उपभोक्ता संरक्षण और टैक्स अनुपालन को सबसे अधिक प्राथमिकता दी जाएगी.
SBI Funds Management ने अपने IPO का प्राइस बैंड ₹545 से ₹574 प्रति शेयर तय किया है. कंपनी अपने कर्मचारियों को प्रति शेयर ₹54 का विशेष डिस्काउंट भी दे रही है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश की सबसे बड़ी एसेट मैनेजमेंट कंपनी SBI Funds Management के बहुप्रतीक्षित IPO का इंतजार अब खत्म होने वाला है. कंपनी ने इश्यू का प्राइस बैंड ₹545-574 प्रति शेयर तय कर दिया है और रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (RHP) भी दाखिल कर दिया है. यह IPO 14 जुलाई से निवेशकों के लिए खुलेगा. आइए जानते हैं इश्यू की तारीख, लॉट साइज, OFS की डिटेल्स और QIB निवेशकों के लिए हुए अहम बदलाव के बारे में.
₹545-574 तय हुआ प्राइस बैंड
SBI Funds Management ने अपने IPO का प्राइस बैंड ₹545 से ₹574 प्रति शेयर तय किया है. कंपनी अपने कर्मचारियों को प्रति शेयर ₹54 का विशेष डिस्काउंट भी दे रही है. IPO के लिए न्यूनतम लॉट साइज 26 शेयर रखा गया है. इसके बाद निवेशक 26-26 शेयरों के गुणकों में आवेदन कर सकेंगे.
14 जुलाई को खुलेगा IPO
यह IPO 14 जुलाई 2026 को सब्सक्रिप्शन के लिए खुलेगा और 16 जुलाई 2026 को बंद होगा. एंकर निवेशकों के लिए बोली लगाने की प्रक्रिया 13 जुलाई से शुरू होगी, यानी आम निवेशकों के लिए इश्यू खुलने से एक दिन पहले.
पूरी तरह OFS होगा IPO
SBI Funds Management का यह IPO पूरी तरह ऑफर फॉर सेल (OFS) आधारित होगा. इसके तहत कुल 20.37 करोड़ शेयर बेचे जाएंगे, जो कंपनी की चुकता इक्विटी पूंजी का लगभग 10% हिस्सा है.
इस इश्यू में देश का सबसे बड़ा सरकारी बैंक SBI अपनी करीब 6.3% हिस्सेदारी यानी लगभग 12.83 करोड़ शेयर बेचेगा. वहीं, कंपनी का जॉइंट वेंचर पार्टनर Amundi India Holding लगभग 3.7% हिस्सेदारी यानी करीब 7.53 करोड़ शेयर ऑफलोड करेगा.
कंपनी को नहीं मिलेगा IPO का पैसा
चूंकि यह इश्यू पूरी तरह OFS है, इसलिए इससे जुटाई गई राशि कंपनी के पास नहीं जाएगी. IPO से मिलने वाली पूरी रकम SBI और Amundi India Holding को मिलेगी. कंपनी के अनुसार, इश्यू का अंतिम क्रियान्वयन नियामकीय मंजूरी, बाजार की स्थिति और अन्य आवश्यक शर्तों के अधीन रहेगा.
QIB निवेशकों के लिए बदली गई बिडिंग की तारीख
SBI ने एक्सचेंज फाइलिंग में बताया कि पहले जारी किए गए RHP में क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल बायर्स (QIB) की बिडिंग अवधि को लेकर त्रुटि रह गई थी. शुरुआती सूचना में QIB निवेशकों के लिए 15 जुलाई को अंतिम तिथि बताया गया था.
अब कंपनी ने स्पष्ट किया है कि QIB निवेशक भी 16 जुलाई 2026 तक बोली लगा सकेंगे. यानी QIB श्रेणी की बिडिंग अवधि भी IPO के बंद होने वाले दिन तक जारी रहेगी.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
AMFI की रिपोर्ट बताती है कि देश के अधिकांश राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में म्यूचुअल फंड AUM का 65% से अधिक हिस्सा खुदरा निवेशकों के पास है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में म्यूचुअल फंड निवेश का स्वरूप तेजी से बदल रहा है. अब निवेश सिर्फ मुंबई और दिल्ली जैसे बड़े वित्तीय केंद्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि छोटे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) तेजी से लोकप्रिय हो रहा है. AMFI की FY26 वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में SIP के जरिए रिकॉर्ड 3.40 लाख करोड़ रुपये का निवेश हुआ. दिलचस्प बात यह है कि SIP अपनाने के मामले में उत्तर प्रदेश, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्य आगे रहे, जबकि महाराष्ट्र और दिल्ली इस मामले में पीछे रह गए.
छोटे राज्यों में तेजी से बढ़ा SIP का दायरा
AMFI की रिपोर्ट के मुताबिक, भले ही महाराष्ट्र और दिल्ली के पास म्यूचुअल फंड उद्योग के कुल एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) का सबसे बड़ा हिस्सा है, लेकिन SIP अपनाने के मामले में छोटे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने उल्लेखनीय बढ़त हासिल की है. इन क्षेत्रों में निवेशक एकमुश्त निवेश के बजाय नियमित और लंबी अवधि के निवेश को प्राथमिकता दे रहे हैं.
इन राज्यों में सबसे ज्यादा SIP निवेश
SIP के जरिए निवेश के मामले में लक्षद्वीप देश में सबसे आगे रहा. यहां कुल म्यूचुअल फंड AUM का 40% से अधिक हिस्सा SIP के जरिए आया. इसके अलावा उत्तर प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दादरा एवं नगर हवेली और पुडुचेरी में भी कुल AUM का 40% से ज्यादा हिस्सा SIP के माध्यम से जुटाया गया. यह आंकड़े बताते हैं कि इन राज्यों के निवेशक छोटी-छोटी रकम नियमित रूप से निवेश कर लंबी अवधि में संपत्ति बनाने की रणनीति अपना रहे हैं.
छोटे शहरों में बढ़ रही निवेशकों की जागरूकता
ऑप्टिमा मनी के फाउंडर पंकज मठपाल के मुताबिक, छोटे शहरों में म्यूचुअल फंड को लेकर जागरूकता तेजी से बढ़ी है. घटती ब्याज दरों के बीच निवेशकों का रुझान पारंपरिक बचत योजनाओं से हटकर SIP की ओर बढ़ा है. वहीं, इन क्षेत्रों में म्यूचुअल फंड की पहुंच अभी भी सीमित है, इसलिए आगे भी तेज वृद्धि की संभावना बनी हुई है.
दिल्ली और महाराष्ट्र क्यों रह गए पीछे?
रिपोर्ट के अनुसार, सभी राज्यों में SIP की रफ्तार समान नहीं रही. दिल्ली, महाराष्ट्र, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और दमन एवं दीव में कुल म्यूचुअल फंड AUM में SIP की हिस्सेदारी 20% से भी कम रही. इससे संकेत मिलता है कि इन क्षेत्रों में निवेशकों का बड़ा वर्ग अब भी लंपसम निवेश या अन्य निवेश विकल्पों को प्राथमिकता देता है. वहीं, महाराष्ट्र और दिल्ली में संस्थागत निवेशकों की मजबूत मौजूदगी भी इसकी एक प्रमुख वजह मानी जा रही है.
FY26 में SIP निवेश ने बनाया नया रिकॉर्ड
वित्त वर्ष 2025-26 में SIP के जरिए निवेश 19% बढ़कर 3.40 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया. पिछले वित्त वर्ष में यह आंकड़ा 2.86 लाख करोड़ रुपये था. यानी एक साल में SIP निवेश में 54,227 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी दर्ज की गई.
मार्च 2026 तक SIP के तहत कुल एसेट अंडर मैनेजमेंट बढ़कर 14.83 लाख करोड़ रुपये हो गया. वहीं, एक्टिव SIP खातों की संख्या बढ़कर 9.72 करोड़ पहुंच गई. यह दर्शाता है कि बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद निवेशकों का नियमित निवेश पर भरोसा मजबूत बना हुआ है.
FY26 में SIP से जुड़े प्रमुख आंकड़े
1. SIP निवेश: 3.40 लाख करोड़ रुपये
2. SIP AUM: 14.83 लाख करोड़ रुपये
3. एक्टिव SIP खाते: 9.72 करोड़
4. SIP हिस्सेदारी के मामले में सबसे आगे: लक्षद्वीप (AUM का 40% से अधिक SIP के जरिए)
खुदरा निवेशक बने म्यूचुअल फंड उद्योग की सबसे बड़ी ताकत
AMFI की रिपोर्ट बताती है कि देश के अधिकांश राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में म्यूचुअल फंड AUM का 65% से अधिक हिस्सा खुदरा निवेशकों के पास है. इससे स्पष्ट है कि म्यूचुअल फंड अब केवल बड़े संस्थागत निवेशकों का माध्यम नहीं रह गया, बल्कि आम परिवारों की वित्तीय योजना का भी अहम हिस्सा बन चुका है.
लक्षद्वीप, त्रिपुरा, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह, अरुणाचल प्रदेश और बिहार में कुल म्यूचुअल फंड AUM का 95% से अधिक हिस्सा व्यक्तिगत निवेशकों के पास है. दूसरी ओर, महाराष्ट्र और दिल्ली में व्यक्तिगत निवेशकों की हिस्सेदारी क्रमशः 48.28% और 44.36% रही, जो इन बाजारों में संस्थागत निवेशकों की मजबूत मौजूदगी को दर्शाती है.
बदल रहा है भारत में म्यूचुअल फंड निवेश का भूगोल
AMFI की रिपोर्ट से साफ है कि भारत में म्यूचुअल फंड निवेश का दायरा तेजी से छोटे शहरों, कस्बों और राज्यों तक फैल रहा है. SIP के प्रति बढ़ता भरोसा और खुदरा निवेशकों की मजबूत भागीदारी इस बदलाव की सबसे बड़ी पहचान बनकर उभरी है. आने वाले वर्षों में म्यूचुअल फंड उद्योग की वृद्धि सिर्फ मुंबई और दिल्ली जैसे वित्तीय केंद्रों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि देश के करोड़ों आम निवेशकों की नियमित बचत और अनुशासित निवेश इसके विकास को नई दिशा देंगे.
IMF का कहना है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा और मजबूत घरेलू मांग तथा सेवा क्षेत्र की बदौलत अर्थव्यवस्था की रफ्तार बरकरार रहेगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर (GDP Growth) के अनुमान में मामूली कटौती की है. IMF ने अब भारत की विकास दर 6.4% रहने का अनुमान लगाया है, जबकि अप्रैल 2026 में इसे 6.5% बताया गया था. हालांकि, IMF का कहना है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा और मजबूत घरेलू मांग तथा सेवा क्षेत्र की बदौलत अर्थव्यवस्था की रफ्तार बरकरार रहेगी.
FY27 के लिए ग्रोथ अनुमान घटाया
IMF ने अपनी अपडेटेड वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक (World Economic Outlook) रिपोर्ट में कहा कि वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की GDP 6.4% की दर से बढ़ेगी. हालांकि, अगले वित्त वर्ष 2027-28 (FY28) के लिए अनुमान बढ़ाकर 6.7% कर दिया गया है. अप्रैल में FY28 के लिए 6.5% ग्रोथ का अनुमान लगाया गया था.
निजी खपत और सेवा क्षेत्र बने रहेंगे ग्रोथ के इंजन
IMF के मुताबिक, भारत की आर्थिक वृद्धि को मजबूत निजी खपत (Private Consumption) और सेवा क्षेत्र (Services Sector) का समर्थन मिलता रहेगा. इन्हीं कारकों की वजह से भारत वैश्विक स्तर पर सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था बना रहेगा.
महंगे कच्चे तेल ने बढ़ाई चिंता
IMF के विश्व आर्थिक अध्ययन प्रभाग की प्रमुख डेनिज इगन ने कहा कि भारत के ग्रोथ अनुमान में बदलाव के पीछे दो प्रमुख वजहें हैं. पहली, हाल के आर्थिक आंकड़े और हाई-फ्रीक्वेंसी इंडिकेटर्स उम्मीद से बेहतर रहे हैं, जिससे आर्थिक गतिविधियों में मजबूती दिखाई दी है.
लेकिन दूसरी ओर, ऊर्जा की बढ़ती कीमतों ने इस सकारात्मक प्रभाव को काफी हद तक कम कर दिया. उनके मुताबिक, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का असर भारत में खुदरा ईंधन कीमतों पर भी पड़ सकता है, जिससे आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ने की आशंका है.
FY28 में फिर तेज हो सकती है विकास दर
IMF का मानना है कि वित्त वर्ष 2027-28 में ऊर्जा कीमतों से जुड़े झटकों का असर कम होगा. ऐसे में भारतीय अर्थव्यवस्था दोबारा गति पकड़ सकती है और GDP ग्रोथ 6.7% तक पहुंच सकती है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मध्यम अवधि में भारत की विकास दर करीब 6.5% के आसपास बनी रहने की संभावना है.
वैश्विक अर्थव्यवस्था की रफ्तार भी रहेगी धीमी
IMF के अनुसार, वैश्विक अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 2026 में 3% और 2027 में 3.4% रहने का अनुमान है. यह 2024-25 की औसत 3.5% वृद्धि से कम है, हालांकि अप्रैल में जारी किए गए IMF के अनुमान के मुकाबले इसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया है.
बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स कारोबार के दौरान 1,914 अंक तक लुढ़क गया, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी 23,900 के नीचे फिसल गया था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
घरेलू शेयर बाजार में बुधवार को भारी बिकवाली के बाद आज निवेशकों की नजर बाजार की दिशा तय करने वाले कई बड़े ट्रिगर्स पर रहेगी. कल अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ईरान को लेकर दिए बयान से वैश्विक बाजारों में घबराहट फैल गई थी, जिसके चलते सेंसेक्स कारोबार के दौरान करीब 1,900 अंक तक टूट गया और निवेशकों की करीब 10 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति साफ हो गई. ऐसे माहौल में आज TCS के तिमाही नतीजे, SBI Funds Management के IPO, Tata Steel के प्रोडक्शन अपडेट और कई अन्य कॉर्पोरेट घोषणाएं बाजार की चाल तय कर सकती हैं.
कल क्यों टूटा था शेयर बाजार?
बुधवार को वैश्विक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के कारण भारतीय शेयर बाजार में जोरदार बिकवाली देखने को मिली. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स कारोबार के दौरान 1,914 अंक तक लुढ़क गया, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी 23,900 के नीचे फिसल गया. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ईरान को लेकर दिए बयान के बाद निवेशकों ने जोखिम वाले एसेट्स से दूरी बनाई, जिसका असर दुनियाभर के बाजारों के साथ भारतीय बाजार पर भी दिखाई दिया. बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी, रुपये की कमजोरी और विदेशी संकेतों ने बाजार पर दबाव बनाए रखा.
आज इन शेयरों पर रखें नजर
आज शेयर बाजार में कई बड़े कॉर्पोरेट अपडेट्स के चलते कई शेयरों पर निवेशकों की नजर रहेगी. सबसे अहम, आज बाजार बंद होने के बाद TCS अपने पहली तिमाही के नतीजे जारी करेगी. वहीं SBI Funds Management का IPO 14 जुलाई से खुलेगा, जिसके लिए कंपनी ने 545-574 रुपये प्रति शेयर का प्राइस बैंड तय किया है. TVS Motor और Indian Oil ने LPG सिलेंडर की लास्ट-माइल डिलीवरी को बेहतर बनाने के लिए रणनीतिक साझेदारी की है. Tata Steel ने जून तिमाही में भारत में कच्चे इस्पात का उत्पादन 11% बढ़ाकर 58.2 लाख टन और डिलीवरी 9% बढ़ाकर 51.7 लाख टन रहने की जानकारी दी है.
HFCL ने AI और डेटा सेंटर सेगमेंट के लिए OptiQ AI ब्रांड लॉन्च किया है, जबकि NALCO और NLC India ने ओडिशा में 1,080 मेगावाट के कैप्टिव पावर प्लांट के लिए संयुक्त उद्यम बनाने का समझौता किया है. इसके अलावा IRB Infrastructure की जून टोल कलेक्शन 28% बढ़कर 808 करोड़ रुपये रही, Indian Bank को 5,000 करोड़ रुपये तक पूंजी जुटाने की मंजूरी मिली है, Phoenix Mills की रिटेल खपत में 32% की वृद्धि दर्ज की गई है और BofA Securities ने Knack Packaging में 0.58% हिस्सेदारी खरीदी है. वहीं Flipkart ने बताया कि उसके फूड और न्यूट्रिशन कारोबार में 50% की सालाना बढ़ोतरी हुई है, जिसमें टियर-2 और छोटे शहरों की हिस्सेदारी 60% से अधिक रही.
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि बुधवार की तेज गिरावट के बाद आज शुरुआती कारोबार में अस्थिरता बनी रह सकती है. हालांकि यदि वैश्विक संकेतों में सुधार आता है और कॉर्पोरेट अपडेट सकारात्मक रहते हैं, तो बाजार में रिकवरी की भी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
सेल के सीएमडी डॉ. अशोक कुमार पांडा ने कहा कि स्टील किसी भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. इसका प्रत्यक्ष योगदान भले ही 7-8 प्रतिशत के आसपास हो, लेकिन यह पूरे औद्योगिक विकास को गति देता है.
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रितु राणा
भारत का स्टील उद्योग अब केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उसका भविष्य स्क्रैप आधारित स्टील निर्माण, सर्कुलर इकोनॉमी, ग्रीन टेक्नोलॉजी और डीकार्बोनाइजेशन पर निर्भर करेगा. आने वाले वर्षों में आयरन ओर महंगा हो सकता है, जबकि स्क्रैप सबसे महत्वपूर्ण कच्चे माल के रूप में उभरेगा. साथ ही इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस (EAF) तकनीक, नवीकरणीय ऊर्जा और आधुनिक तकनीकें भारतीय स्टील उद्योग की दिशा तय करेंगी. यह बात एम-जंक्शन (mjunction) द्वारा आयोजित 13वें भारतीय स्टील मार्केट (Steelathon) सम्मेलन में स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक (CMD) डॉ. अशोक कुमार पांडा ने अपने संबोधन में कही.
उन्होंने कहा कि हमारी जिम्मेदारी केवल स्टील का उत्पादन करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि स्टील का हर टन उत्पादक से उपभोक्ता, उपभोक्ता से रिसाइक्लर और फिर नए स्टील के रूप में उत्पादन चक्र में वापस लौटे. यही वास्तविक सर्कुलर इकोनॉमी का मॉडल है और इसी दिशा में उद्योग को आगे बढ़ना होगा.
स्टील सेक्टर 'सनशाइन' नहीं, 'सनराइज' इंडस्ट्री
SAIL CMD ने कहा कि कई लोग स्टील उद्योग को 'सनशाइन इंडस्ट्री' कहते हैं क्योंकि इसमें प्रतिस्पर्धा तीव्र है, लागत का दबाव रहता है और मुनाफा सीमित होता है. लेकिन उनके अनुसार यह वास्तव में 'सनराइज इंडस्ट्री' है, क्योंकि इसमें विकास की अपार संभावनाएं हैं और आने वाले वर्षों में यह भारत की आर्थिक प्रगति का प्रमुख आधार बनने वाला है.
उन्होंने कहा कि स्टील किसी भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. इसका प्रत्यक्ष योगदान भले ही 7-8 प्रतिशत के आसपास हो, लेकिन यह पूरे औद्योगिक विकास को गति देता है. कोविड-19 महामारी के दौरान जब अर्थव्यवस्था ठहर गई थी, तब स्टील उद्योग ने उत्पादन के साथ-साथ मेडिकल ऑक्सीजन उपलब्ध कराकर भी देश की जरूरतों को पूरा किया.
उन्होंने कहा कि सरकार की पूरी विकास योजना में स्टील एक प्रमुख घटक है. इसलिए स्टील उत्पादन बढ़ाने के साथ रेलवे, जलमार्ग, सड़क और लॉजिस्टिक्स को भी समान गति से विकसित करना होगा.
भारत में स्टील की मांग दुनिया से तेज बढ़ रही
उन्होंने कहा कि विकसित देशों में स्टील की मांग स्थिर या घट रही है, जबकि भारत में यह करीब 7-8 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है. प्रति व्यक्ति स्टील खपत अभी भी विकसित देशों की तुलना में कम है, इसलिए आने वाले वर्षों में मांग में तेज वृद्धि की संभावना है.
उन्होंने बताया कि भारत की स्टील उत्पादन क्षमता करीब 180-190 मिलियन टन तक पहुंच चुकी है और उद्योग 300 मिलियन टन क्षमता के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है. हालांकि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा. रेलवे, सड़क, जलमार्ग, बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन जैसे बुनियादी ढांचे को भी समान गति से विकसित करना होगा.
लौह अयस्क पर निर्भरता घटानी होगी
उन्होंने कहा कि फिलहाल भारत में अधिकांश स्टील उत्पादन ब्लास्ट फर्नेस-बेसिक ऑक्सीजन फर्नेस (BF-BOF) तकनीक से होता है, जहां मुख्य कच्चा माल लौह अयस्क (Iron Ore) है. अभी तक लौह अयस्क अपेक्षाकृत सस्ता रहा है, लेकिन भविष्य में टैक्स, रॉयल्टी और अन्य शुल्कों के कारण इसकी लागत बढ़ सकती है. ऐसे में स्टील उद्योग को वैकल्पिक कच्चे माल की ओर बढ़ना होगा.
स्क्रैप बनेगा भविष्य का सबसे अहम कच्चा माल
SAIL CMD ने कहा कि जिस स्क्रैप को कभी बेकार समझा जाता था, वही अब स्टील उद्योग का सबसे मूल्यवान संसाधन बनने जा रहा है. भविष्य में स्क्रैप केवल कबाड़ नहीं रहेगा, बल्कि स्टील उत्पादन का प्रमुख कच्चा माल होगा. उन्होंने कहा कि ऑटोमोबाइल स्क्रैपिंग जैसी नीतियां घरेलू स्तर पर स्क्रैप की उपलब्धता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएंगी.
उन्होंने यह भी कहा कि स्क्रैप का महत्व केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है. पूरी दुनिया में आयरन ओर का तेजी से खनन हो रहा है और भविष्य में प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा. ऐसे में स्क्रैप रिसाइक्लिंग संसाधनों की सुरक्षा और दीर्घकालिक स्टील उत्पादन के लिए भी जरूरी होगी.
ग्रीन स्टील के लिए EAF तकनीक होगी अहम
उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस (EAF) आधारित स्टील उत्पादन भविष्य में तेजी से बढ़ेगा क्योंकि इससे कार्बन उत्सर्जन काफी कम होता है. हालांकि फिलहाल इसकी लागत अधिक है, लेकिन सस्ती बिजली, नवीकरणीय ऊर्जा और नई तकनीकों के विस्तार से यह उत्पादन पद्धति अधिक प्रतिस्पर्धी बन जाएगी.
उन्होंने कहा कि EAF तकनीक की सबसे बड़ी लागत बिजली है. यदि उद्योग को सस्ती और विश्वसनीय बिजली उपलब्ध होती है तो ग्रीन स्टील का उत्पादन तेजी से बढ़ सकेगा.
कार्बन उत्सर्जन कम करना सबसे बड़ी चुनौती
उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर डीकार्बोनाइजेशन अब स्टील उद्योग की सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है. यूरोप सहित कई देशों में कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) जैसे नियम लागू किए जा रहे हैं. ऐसे में भारतीय स्टील उद्योग को उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ कार्बन फुटप्रिंट भी कम करना होगा.
उन्होंने कहा कि बेहतर परिचालन, नई तकनीक, ईंधन की खपत कम करना, स्वच्छ कच्चे माल का उपयोग और रिसाइक्लिंग इस लक्ष्य को हासिल करने के प्रमुख साधन होंगे.
SAIL CMD ने कहा कि तकनीक के विकास के साथ उद्योग में 'वेस्ट' की परिभाषा बदल रही है. पहले कम ग्रेड वाले आयरन ओर और स्टील स्लैग को बेकार माना जाता था, लेकिन आज नई तकनीकों की मदद से यही संसाधन उपयोगी कच्चे माल में बदल चुके हैं. उन्होंने कहा कि ब्लास्ट फर्नेस स्लैग का उपयोग सीमेंट उद्योग में, जबकि स्टील स्लैग का उपयोग सड़क निर्माण और अन्य औद्योगिक कार्यों में हो रहा है. भविष्य में लगभग हर औद्योगिक उप-उत्पाद का दोबारा उपयोग संभव होगा.
AI और सप्लाई चेन तय करेंगे उद्योग का भविष्य
उन्होंने कहा कि भविष्य का स्टील उद्योग केवल उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगा. इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), फाइनेंस, ट्रेडिंग, स्टील एवं स्क्रैप ट्रेड, स्लैग ट्रेड, वैल्यू अनलॉकिंग, सप्लाई चेन मैनेजमेंट और पारदर्शी बाजार व्यवस्था जैसी पूरी वैल्यू चेन महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी.
उन्होंने कहा कि स्टीलाथॉन सम्मेलन का उद्देश्य इसी पूरे इकोसिस्टम पर चर्चा करना है ताकि स्टील, स्क्रैप और स्लैग की निर्बाध सप्लाई चेन विकसित की जा सके और भारत वैश्विक स्टील उद्योग में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त को और मजबूत कर सके. यह पॉइंट आर्टिकल में नहीं आया था.
मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को भी मजबूती मिलेगी: विनय वर्मा
एम-जंक्शन के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी विनय वर्मा ने स्वागत भाषण में कहा, "अब स्क्रैप को कचरा नहीं माना जाता, बल्कि यह भविष्य का स्टील है."
उन्होंने कहा, "भारत में स्टील की मांग लगातार बढ़ रही है. ऐसे में स्क्रैप केवल एक उप-उत्पाद नहीं रहेगा, बल्कि रणनीतिक कच्चे माल के रूप में उभरेगा. जितना अधिक स्टील स्क्रैप हम वापस हासिल करेंगे, उतनी ही हमारी आयरन ओर और आयातित स्क्रैप पर निर्भरता कम होगी. इससे भारत के मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को भी मजबूती मिलेगी."
उन्होंने कहा, एम-जंक्शन का उद्देश्य डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से स्क्रैप उत्पन्न करने वालों और स्टील निर्माताओं को जोड़ना है, ताकि पारदर्शिता बढ़े, बेहतर मूल्य खोज हो और पूरी वैल्यू चेन अधिक मजबूत बन सके."
ग्रामीण आय पर दबाव से माइक्रोफाइनेंस कंपनियों की रिकवरी को झटका लगने की आशंका
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
कमजोर मानसून और बढ़ती महंगाई ने भारत के माइक्रोफाइनेंस सेक्टर की चिंताएं फिर बढ़ा दी हैं. ग्रामीण आय पर दबाव बढ़ने से करीब 35 अरब डॉलर (लगभग 3 लाख करोड़ रुपये) के माइक्रोफाइनेंस लोन पोर्टफोलियो पर डिफॉल्ट का जोखिम गहराने लगा है. रेटिंग एजेंसी S&P Global Ratings का कहना है कि यदि बारिश सामान्य से कम रहती है, तो कर्ज चुकाने की क्षमता कमजोर होगी और माइक्रोफाइनेंस कंपनियों की लोन ग्रोथ भी प्रभावित हो सकती है.
कमजोर मानसून से लोन ग्रोथ पर असर
रिपोर्ट्स के अनुसार, कमजोर मानसून की स्थिति में माइक्रोफाइनेंस कंपनियां अंडरराइटिंग मानकों को और सख्त कर सकती हैं. वहीं, ग्रामीण आय घटने से कर्जदारों की पुनर्भुगतान क्षमता भी कमजोर होगी. उन्होंने बताया कि लगभग 20 फीसदी माइक्रोफाइनेंस उधारकर्ताओं ने दो या उससे अधिक संस्थानों से कर्ज लिया हुआ है. ऐसे कर्जदारों में डिफॉल्ट की दर अपेक्षाकृत अधिक देखी जा रही है.
दो वर्षों से दबाव में रहा सेक्टर
पिछले दो वर्षों में तेज कर्ज वितरण के कारण कई उधारकर्ता अत्यधिक कर्ज के बोझ तले दब गए थे, जिससे डिफॉल्ट बढ़ा और माइक्रोफाइनेंस कंपनियों को जोखिम प्रबंधन के लिए कड़े कदम उठाने पड़े. हालांकि, उद्योग संगठनों के दिशानिर्देशों के बाद कंपनियों ने कर्ज वितरण में सावधानी बरतनी शुरू की, जिससे हाल के महीनों में स्थिति कुछ स्थिर होती दिखाई दी थी. लेकिन कमजोर मानसून ने इस सुधार की रफ्तार पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं.
इन कंपनियों का सबसे अधिक एक्सपोजर
माइक्रोफाइनेंस क्षेत्र में प्रमुख संस्थानों में बंधन बैंक, CreditAccess Grameen, Satin Creditcare Network और Muthoot Microfin शामिल हैं. मार्च 2026 के अंत तक बंधन बैंक की कुल लोन बुक का लगभग 23 फीसदी हिस्सा माइक्रोफाइनेंस और माइक्रो-लेंडिंग से जुड़ा था.
मानसून और महंगाई दोनों बने चुनौती
सेंट्रल बैंक की जून रिपोर्ट के मुताबिक, लगातार सात तिमाहियों की गिरावट के बाद जनवरी-मार्च तिमाही में माइक्रोफाइनेंस क्रेडिट में सुधार दर्ज किया गया था. इससे सेक्टर की रिकवरी की उम्मीद बढ़ी थी. हालांकि, 12 वर्षों के सबसे सूखे जून के बाद जुलाई में भी सामान्य से कम बारिश की आशंका जताई जा रही है. कमजोर मानसून से फसल उत्पादन और कृषि आय प्रभावित हो सकती है, जिससे ग्रामीण परिवारों की खर्च करने और कर्ज चुकाने की क्षमता कमजोर पड़ सकती है.
इसके अलावा, पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में जारी तनाव के कारण ईंधन, उर्वरक और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी का जोखिम भी बना हुआ है, जिससे महंगाई और बढ़ सकती है.
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सबसे अधिक निर्भर माइक्रोफाइनेंस
गीता चुघ के अनुसार, माइक्रोफाइनेंस कंपनियों का करीब 80 फीसदी एक्सपोजर ग्रामीण क्षेत्रों में है. इसमें लगभग 35 फीसदी कर्ज सीधे कृषि क्षेत्र, 9 फीसदी कृषि-आधारित उद्यमों और 20 फीसदी पशुपालन से संबंधित गतिविधियों में दिया गया है.
सेंट्रल बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, अन्य क्षेत्रों में क्रेडिट क्वालिटी में सुधार देखने को मिला है, लेकिन कृषि क्षेत्र में सुधार अपेक्षाकृत धीमा रहा है और इसी क्षेत्र में सबसे अधिक नॉन-परफॉर्मिंग लोन (NPL) दर्ज किए गए हैं.
आगे क्या है जोखिम?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कमजोर मानसून और ऊंची महंगाई दोनों स्थितियां लंबे समय तक बनी रहती हैं, तो ग्रामीण आय पर दबाव और बढ़ेगा. इसका सीधा असर माइक्रोफाइनेंस कंपनियों की रिकवरी, लोन ग्रोथ और एसेट क्वालिटी पर पड़ सकता है. ऐसे में आने वाली तिमाहियों में इस सेक्टर पर निवेशकों और नियामकों की नजर बनी रहेगी.