पीरामल एंटरप्राइजेज की 100 प्रतिशत सहायक कंपनी PCHL ने 90,000 करोड़ रुपये का DHFL लोन पोर्टफोलियो अधिग्रहित किया था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
पलक शाह
बाजार नियामक SEBI पीरामल समूह (Piramal Group) से जुड़े पूर्व DHFL (दीवान हाउसिंग फाइनेंस) लोन पोर्टफोलियो को लेकर व्हिसलब्लोअर (Whistleblower) द्वारा उठाए गए आरोपों की जांच कर रहा है. सूत्रों ने BW बिजनेसवर्ल्ड को बताया है कि DHFL को दिवालियापन प्रक्रिया में दाखिल किया गया था, जिसके बाद इसे पीरामल समूह ने अधिग्रहित किया. व्हिसलब्लोअर ने पीरामल कैपिटल एंड हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड (PCHFL) के खिलाफ ये आरोप लगाए हैं कि इसने DHFL से अधिग्रहित लोन को भारी छूट पर कुछ संस्थाओं को ट्रांसफर किया और इन संस्थाओं ने बाद में DHFL के मूल उधारकर्ता के साथ लोन को एक उच्च कीमत पर निपटा लिया, जिससे PCHFL और पीरामल एंटरप्राइजेज के सार्वजनिक शेयरधारकों को नुकसान हुआ है.
PCHFL ने 34,250 करोड़ रुपये में किया DHFL का अधिग्रहण
सितंबर 2021 में PCHFL DHFL के साथ मर्ज हो गई और लगभग 90,000 करोड़ रुपये के डेट पोर्टफोलियो का नियंत्रण प्राप्त किया. PCHFL द्वारा DHFL का अधिग्रहण 34,250 करोड़ रुपये में हुआ, जिसमें करीब 14,700 करोड़ रुपये की नकद अग्रिम भुगतान और लगभग 19,550 करोड़ रुपये के कर्ज उपकरणों (10 वर्षीय NCDs, 6.75 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर पर) का जारी किया गया. PCHFL, जो कि PEL (पीरामल एंटरप्राइजेज लिमिटेड) की 100% सहायक कंपनी है, के लाखों सार्वजनिक शेयरधारक हैं, जिनमें खुदरा निवेशक, म्यूचुअल फंड, LIC, अन्य वित्तीय संस्थान और विदेशी निवेशक शामिल हैं, इसलिए, PCHFL को होने वाला कोई भी नुकसान सीधे PEL के सार्वजनिक शेयरधारकों को प्रभावित करता है.
व्हिसलब्लोअर के आरोप
व्हिसलब्लोअर ने आरोप लगाया है कि PCHFL ने DHFL से अधिग्रहित लोन को कुछ संस्थाओं को भारी छूट पर ट्रांसफर किया और ये संस्थाएं पीरामल समूह के प्रमोटरों से जुड़ी हुई थीं. BW के पास व्हिसलब्लोअर के पत्र की एक प्रति है. 7 नवंबर को सेबी और पीरामल समूह को भेजे गए एक ईमेल का अभी तक कोई जवाब नहीं आया है. व्हिसलब्लोअर पत्र की प्रति दोनों ईमेल के साथ संलग्न की गई थी. SEBI और पीरामल समूह से उत्तर प्राप्त होने पर इस कहानी में जोड़े जाएंगे. यह आरोप लगाया गया है कि Encore Natural Polymers Pvt. Ltd. और APRN Enterprises Pvt. Ltd. पीरामल समूह के प्रमोटरों से जुड़ी हो सकती हैं और इन कंपनियों को कर्ज का एक हिस्सा भारी छूट पर ट्रांसफर किया गया. पहले कर्ज PCHFL से Encore को भारी छूट पर ट्रांसफर किया गया और फिर Encore ने इसे APRN को बेचा. DHFL का मूल उधारकर्ता बाद में APRN के साथ कर्ज का निपटारा 650 करोड़ रुपये (अधिक) की कीमत पर किया, जो PCHFL द्वारा बेचे गए कर्ज से कहीं अधिक था, इस प्रकार PEL के शेयरधारकों को नुकसान हुआ.
इन संस्थाओं को ट्रांसफर किया लोन
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार PCHFL ने DHFL से विरासत में मिले 5,546 करोड़ रुपये के खराब लोन पोर्टफोलियो की बिक्री शुरू की थी, जिसमें 46 प्रतिशत रिकवरी थ्रेशोल्ड के साथ 2,550 करोड़ रुपये का बाइंडिंग बिड मूल्य निर्धारित किया गया था. व्हिसलब्लोअर पत्र में कहा गया है कि 2,000 करोड़ रुपये से अधिक के लोन लेन-देन, जिसमें सुधाकर शेट्टी (DHFL के मूल उधारकर्ता) के तीन साहना समूह की संस्थाओं के साथ संबंधित लेन-देन थे, इन्हें Encore Natural Polymers Pvt. Ltd. को महज 250 करोड़ रुपये में बेचा गया था. फिर, Encore ने इन कर्जों को APRN Enterprises Pvt. Ltd. को 450 करोड़ रुपये में बेचा, जिसने सुधाकर शेट्टी के साहना समूह के साथ कर्ज को 900 करोड़ रुपये में निपटा लिया. व्हिसलब्लोअर के अनुसार Encore Natural Polymers को पीरामल समूह के प्रमोटरों से जोड़ा जाता है. अजय पीरामल और मर्चेंट फैमिली (Encore के प्रमोटर) के बीच रिश्ते और उनके बीच वित्तीय लेन-देन की जांच की जा रही है. सार्वजनिक डेटा के अनुसार सुधीर अजितकुमार मर्चेंट, जो Encore Natural Polymers Pvt. Ltd. के अध्यक्ष हैं, पहले पीरामल रियल्टी प्राइवेट लिमिटेड के अध्यक्ष और पीरामल एस्टेट्स प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक रह चुके हैं. वहीं, सुधीर मर्चेंट APRN Enterprises में अपने कंपनी Encore के माध्यम से 65% का नियंत्रित हिस्सेदारी रखते हैं, यह आरोप व्हिसलब्लोअर ने लगाया है.
APRN के प्रमोटर्स और निदेशक अरविंद अग्रवाल, गौतम अग्रवाल और आदित्य अग्रवाल हैं. इसके अलावा, एक और संस्था Emblem Holdings APRN में 64.96 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखती है, Gaiety Holdings की APRN में 7.09% हिस्सेदारी है और Nifty Holdings की APRN में 8.74% हिस्सेदारी है. दिलचस्प बात यह है कि Emblem Holdings Pvt. Ltd., Gaiety Holdings Private Limited और Nifty Holdings Private Limited के रजिस्टर्ड ऑफिस पते बिल्कुल वही हैं जो APRN के हैं, जहां मर्चेंट फैमिली की बहुमत हिस्सेदारी है, यह बस परिपत्र स्वामित्व है. जब शेट्टी के साहना समूह की संस्थाओं ने APRN Enterprise Pvt. Ltd. से कर्ज का निपटारा 900 करोड़ रुपये से अधिक में किया, तो APRN Enterprise Pvt. Ltd. ने बहुत ही कम समय में 100 प्रतिशत का मुनाफा 450 करोड़ रुपये का कमाया. जब Encore, जिसने PCHFL से कर्ज 200 करोड़ रुपये में खरीदी थी, इसे APRN को बेचा, तो उसने भी 200 करोड़ रुपये का त्वरित मुनाफा कमाया," व्हिसलब्लोअर ने कहा.
शेट्टी के साहना समूह ने कैसे उत्पन्न की नकदी?
सीबीआई ने आरोप लगाया है कि DHFL ने कथित तौर पर 14,683 करोड़ रुपये से अधिक की राशि को नौ रियल एस्टेट कंपनियों के माध्यम से डायवर्ट किया, जिन पर उस समय के अध्यक्ष-कम-मैनेजिंग डायरेक्टर कपिल वधावन, निदेशक धीरज वधावन और व्यवसायी सुधाकर शेट्टी का नियंत्रण था, जिनके पास वित्तीय हित थे. इन रियल एस्टेट कंपनियों का - जिनमें से पांच शेट्टी के साहना समूह की हैं और अन्य चार- सीबीआई की जांच में सामने आया कि इन कंपनियों को DHFL द्वारा कर्ज वितरित किए गए थे, जो कपिल वधावन और धीरज वधावन के निर्देश पर हुआ था. यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने सीबीआई से संपर्क किया और ये आरोप लगाया है कि अमारिलिस रियल्टर्स, गुलमर्ग रियल्टर्स और स्काईलार्क बिल्डकॉन पर DHFL के प्रति 98.33 करोड़ रुपये बकाया हैं और दर्शन डेवलपर्स और सिग्टिया कंस्ट्रक्शंस पर 3,970 करोड़ रुपये बकाया हैं ये सभी कंपनियां साहना समूह से संबंधित हैं.
रियल एस्टेट विशेषज्ञों ने क्या कहा?
व्हिसलब्लोअर के अनुसार, 6 फरवरी 2023 को प्रकाशित हिंदुस्तान टाइम्स के एक समाचार रिपोर्ट, जिसका शीर्षक था "वर्ली 'डिस्टेस सेल': दामानी की बेटियां 28 खरीदारों में शामिल," से यह स्पष्ट होता है कि साहना समूह ने APRN Enterprises के साथ कर्ज निपटाने के लिए धन कैसे जुटाया. समाचार रिपोर्ट में कहा गया था, "D-Mart के मालिक राधाकिशन दामानी, उनका परिवार और करीबी सहयोगियों ने वर्ली में 28 यूनिट्स को एक बड़ी डील में डिस्काउंट रेट्स पर कुल 1,238 करोड़ रुपये में खरीदी. उद्योग सूत्रों का कहना है कि यह bulk deal सुधाकर शेट्टी को बचाने के लिए हो सकती है, जिनकी कंपनी SkyLark Buildcon Pvt. Ltd. इस प्रोजेक्ट में साझेदार है. कंपनी ने 2019 में DHFL (अब पीरामल फाइनेंस) से 1,000 करोड़ रुपये का कर्ज लिया था, और यूनिट्स को कोलैटरल के रूप में रखा गया था. रियल एस्टेट विशेषज्ञों का कहना है कि पुनर्भुगतान के लिए ऋणदाताओं के दबाव के कारण ही फ्लैट रियायती दरों पर बेचे गए होंगे.
15 अक्टूबर से ₹2,000 से अधिक के मर्चेंट UPI भुगतान पर 0.4% MDR लागू होने का प्रस्ताव है. सर्वे के मुताबिक, अतिरिक्त शुल्क लगने पर 76% यूजर्स बड़े भुगतान के लिए कैश, कार्ड या बैंक ट्रांसफर का रुख कर सकते हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) भुगतान पर 15 अक्टूबर से ₹2,000 से अधिक के मर्चेंट 0.4% मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू होने के बाद UPI ट्रांजैक्शन की कुल वैल्यू में करीब 10% और ट्रांजैक्शन वॉल्यूम में करीब 4% की गिरावट आ सकती है. LocalCircles के मर्चेंट और कंज्यूमर सर्वे के आधार पर यह अनुमान लगाया गया है. सर्वे के मुताबिक, MDR लागू होने के बाद अधिक राशि वाले UPI भुगतान का एक हिस्सा कैश, क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड और बैंक ट्रांसफर की ओर जा सकता है.
₹2,000 से अधिक के भुगतान UPI वैल्यू का 67%
LocalCircles के CEO सचिन तापड़िया के मुताबिक, यह अनुमान MDR लागू होने से पहले किए गए अलग-अलग मर्चेंट और कंज्यूमर सर्वे पर आधारित है. अगस्त में ₹2,000 से अधिक के भुगतान मर्चेंट UPI ट्रांजैक्शन का केवल करीब 4% थे, लेकिन इनका हिस्सा कुल मर्चेंट UPI भुगतान की वैल्यू में 67% था. इन भुगतानों की कुल राशि करीब ₹6 लाख करोड़ प्रति माह बैठती है.
अगस्त 2026 में UPI के जरिए कुल 24.51 अरब ट्रांजैक्शन हुए, जिनकी वैल्यू ₹29.82 लाख करोड़ रही. इनमें मर्चेंट भुगतान की संख्या 15.51 अरब और वैल्यू ₹8.95 लाख करोड़ रही. ऐसे में ₹2,000 से अधिक के मर्चेंट भुगतान संख्या में कम होने के बावजूद UPI की कुल वैल्यू पर बड़ा असर डाल सकते हैं.
MDR लगने पर 76% यूजर्स बदल सकते हैं भुगतान का तरीका
2 अक्टूबर को जारी LocalCircles के कंज्यूमर सर्वे में 76% लोगों ने कहा कि अगर UPI इस्तेमाल करने पर अतिरिक्त शुल्क देना पड़ा तो वे बड़े भुगतानों के लिए कैश, कार्ड या बैंक ट्रांसफर का इस्तेमाल कर सकते हैं. केवल 14% लोगों ने कहा कि अगर मर्चेंट MDR का बोझ उन पर डालता है तो वे अतिरिक्त राशि देकर भी UPI का इस्तेमाल जारी रखेंगे.
अगर ₹2,000 से अधिक के UPI भुगतान पर मर्चेंट ग्राहक से अतिरिक्त शुल्क लेता है, तो 27% लोग कैश का इस्तेमाल करेंगे, जबकि 26% क्रेडिट कार्ड की ओर जाने की बात कही. 14% डेबिट कार्ड और 4% बैंक ट्रांसफर, NEFT या IMPS का इस्तेमाल कर सकते हैं.
भविष्य में ₹2,000 से अधिक के भुगतान के लिए 26% लोगों ने क्रेडिट कार्ड और इतने ही लोगों ने कैश को पसंदीदा विकल्प बताया. 13% ने डेबिट कार्ड और 11% ने बैंक ट्रांसफर को प्राथमिकता दी. वहीं, केवल 20% लोगों ने कहा कि अतिरिक्त शुल्क लगने के बावजूद UPI उनका सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला माध्यम रहेगा.
UPI वॉल्यूम पर 4% असर का अनुमान
LocalCircles के मुताबिक, MDR लागू होने के पहले पूरे महीने में UPI की कुल वैल्यू में करीब 10% की गिरावट आ सकती है. वहीं, ट्रांजैक्शन वॉल्यूम में करीब 4% की कमी का अनुमान है.
इस 4% गिरावट में करीब 1% सीधा असर उन ट्रांजैक्शन पर पड़ सकता है जिन पर MDR लागू होगा. बाकी करीब 3% गिरावट उपभोक्ताओं के भुगतान व्यवहार में बदलाव से हो सकती है. यानी जहां मर्चेंट अतिरिक्त शुल्क लगाएंगे, वहां ग्राहक UPI के बजाय दूसरे भुगतान माध्यमों का इस्तेमाल कर सकते हैं.
### ₹2,000 तक UPI भुगतान पर नहीं लगेगा शुल्क
MDR एक तरह का शुल्क है, जो डिजिटल भुगतान को प्रोसेस करने के लिए मर्चेंट की ओर से बैंक और भुगतान कंपनियों को दिया जाता है. प्रस्तावित व्यवस्था के तहत 15 अक्टूबर से ₹2,000 से अधिक के व्यक्ति से मर्चेंट (P2M) UPI भुगतान पर 0.4% MDR लागू होगा.
सरकार ने 14 सितंबर को ₹2,000 तक के मर्चेंट UPI भुगतान और RuPay डेबिट कार्ड ट्रांजैक्शन पर जीरो चार्ज जारी रखने का फैसला किया था. UPI QR कोड के जरिए हर महीने ₹1 लाख तक प्राप्त करने वाले छोटे मर्चेंट भी प्रस्तावित MDR से बाहर रहेंगे. LocalCircles का अनुमान है कि मर्चेंट UPI ट्रांजैक्शन का करीब 96% हिस्सा इस व्यवस्था से प्रभावित नहीं होगा.
सरकार ने कहा- ग्राहकों से MDR नहीं वसूला जाएगा
सरकार का कहना है कि MDR का बोझ ग्राहकों पर नहीं डाला जाना चाहिए. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सितंबर में कहा था कि इस शुल्क की जिम्मेदारी ग्राहकों की नहीं है. सरकार भारतीय बैंक संघ (IBA) के साथ मिलकर ऐसा तंत्र तैयार कर रही है, जिसके जरिए बैंक मर्चेंट्स की निगरानी कर सकें और यह सुनिश्चित किया जा सके कि MDR ग्राहकों से न वसूला जाए.
ज्यादातर मर्चेंट MDR का बोझ उठाने को तैयार नहीं
LocalCircles के 32,796 मर्चेंट्स के सर्वे में 41% ने कहा कि वे ₹2,000 से अधिक के UPI भुगतान पर कोई MDR नहीं देंगे. वहीं, 9% मर्चेंट UPI भुगतान स्वीकार ही नहीं करते. सिर्फ 17% मर्चेंट 0.4% या उससे अधिक MDR वहन करने के लिए तैयार दिखे. 15% ने कहा कि वे अधिकतम 0.04% MDR ही स्वीकार करेंगे.
LocalCircles के मुताबिक, MDR का बोझ उठाने को तैयार नहीं होने वाले मर्चेंट कीमत बढ़ा सकते हैं, अलग से शुल्क लगा सकते हैं या ग्राहकों को कैश, कार्ड और बैंक ट्रांसफर जैसे विकल्पों की ओर भेज सकते हैं.
जीरो MDR व्यवस्था में हो रहा बदलाव
प्रस्तावित MDR व्यवस्था UPI पर लंबे समय से चली आ रही जीरो-MDR व्यवस्था में बड़ा बदलाव है. UPI के विस्तार में इस व्यवस्था की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. अगस्त में संसद ने Payment and Settlement Systems Act, 2007 की धारा 10A में संशोधन किया था. इससे RuPay डेबिट कार्ड और UPI ट्रांजैक्शन पर शुल्क लगाने पर लगी व्यापक रोक हट गई और केंद्र को यह तय करने की अनुमति मिली कि किन भुगतान माध्यमों को शुल्क मुक्त रखा जाएगा.
सरकार ने UPI सिस्टम को बनाए रखने की लागत का भी हवाला दिया है. UPI ट्रांजैक्शन के लिए प्रोत्साहन राशि वित्त वर्ष 2023-24 में बढ़कर ₹3,631 करोड़ पहुंच गई थी, जबकि वित्त वर्ष 2026-27 के लिए ₹2,000 करोड़ का प्रावधान किया गया है. वित्तीय सेवा विभाग ने संसदीय समिति को बताया है कि लंबे समय तक जीरो MDR व्यवस्था को बनाए रखना वित्तीय रूप से टिकाऊ नहीं हो सकता.
नई व्यवस्था में ₹2,000 तक के भुगतान और व्यक्ति से व्यक्ति (P2P) UPI ट्रांसफर पर कोई शुल्क नहीं होगा. ₹75,000 या उससे अधिक के ट्रांजैक्शन पर MDR अधिकतम ₹300 तक सीमित रहेगा. रेलवे, टेलीकॉम, इंश्योरेंस, ईंधन और कृषि इनपुट से जुड़े भुगतान पर ₹5 का फ्लैट शुल्क होगा, जबकि कैपिटल मार्केट से जुड़े भुगतान पर 0.02% MDR लगेगा.
कारोबारी संगठनों ने किया विरोध
प्रस्तावित MDR का कारोबारी संगठनों ने भी विरोध किया है. उनका कहना है कि मर्चेंट बिल को अलग-अलग हिस्सों में बांट सकते हैं, ग्राहकों को बैंक ट्रांसफर की ओर भेज सकते हैं या अतिरिक्त लागत की भरपाई के लिए कीमतों में बदलाव कर सकते हैं.
कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) ने इस व्यवस्था का विरोध किया है, जबकि चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री ने इसे वापस लेने की मांग की है. 30 सितंबर को CAIT के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने वित्त मंत्री से मुलाकात की थी, जिसके बाद प्रस्तावित 'नो UPI डे' प्रदर्शन वापस ले लिया गया.
LocalCircles ने सुझाव दिया है कि शुरुआत में ₹2,000 से अधिक के भुगतान पर 0.4% MDR सिर्फ बड़े कॉरपोरेट मर्चेंट्स पर लागू किया जाए और MSMEs को इससे बाहर रखा जाए. संगठन का अनुमान है कि इससे संभावित MDR राजस्व का करीब 98% हासिल किया जा सकता है, जबकि छोटे कारोबारियों पर असर भी सीमित रहेगा.
सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के आंकड़ों के मुताबिक, अगस्त 2026 में देश का औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) 8% बढ़ा, जो जुलाई के 6.7% की तुलना में अधिक है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के कपड़ा उद्योग में अगस्त में उत्पादन के स्तर पर अलग-अलग रुझान देखने को मिले. एक ओर कपड़ा उत्पादन में सालाना आधार पर 13.1% की बढ़ोतरी हुई, वहीं तैयार परिधानों यानी कपड़ों के उत्पादन में 7.4% की गिरावट दर्ज की गई. इससे उद्योग के कच्चे माल और मध्यवर्ती उत्पादों वाले हिस्से तथा तैयार परिधानों के कारोबार के बीच अंतर और बढ़ गया है.
सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के आंकड़ों के मुताबिक, अगस्त 2026 में देश का औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) 8% बढ़ा, जो जुलाई के 6.7% की तुलना में अधिक है. विनिर्माण क्षेत्र के 23 उद्योग समूहों में से 18 ने अगस्त में सालाना आधार पर वृद्धि दर्ज की.
अप्रैल-अगस्त में कपड़ा उत्पादन 11.9% बढ़ा
चालू वित्त वर्ष 2026-27 के अप्रैल-अगस्त के दौरान कपड़ा उत्पादन में 11.9% की संचयी वृद्धि दर्ज की गई. इसके विपरीत, इसी अवधि में तैयार परिधानों का उत्पादन 5.6% घट गया. इससे संकेत मिलता है कि कपड़ा क्षेत्र के शुरुआती चरणों में उत्पादन मजबूत रहने के बावजूद तैयार कपड़ों की मांग और उत्पादन में कमजोरी बनी हुई है.
औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में कपड़ा क्षेत्र का भार 3.27 और तैयार परिधानों का भार 1.97 है. पूरे IIP में विनिर्माण क्षेत्र का भार 76.062 है. शेष भार खनन एवं उत्खनन, बिजली एवं गैस आपूर्ति तथा जल आपूर्ति, सीवरेज और कचरा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों का है.
परिधान उत्पादन में लगातार उतार-चढ़ाव
पिछले एक साल में तैयार परिधानों के उत्पादन में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. सितंबर 2025 में उत्पादन 2% और अक्टूबर में 7.3% घटा था. इसके बाद नवंबर में 6.7% और दिसंबर में 17% से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई.
2026 की शुरुआत में यह सुधार टिक नहीं पाया. जनवरी में परिधान उत्पादन 8.6% और फरवरी में 3.4% घटा. मार्च में उत्पादन 4.8% बढ़ा, लेकिन अप्रैल में 10% से अधिक की गिरावट आई. इसके बाद मई में 3.6% और जून में 2.3% की वृद्धि दर्ज की गई.
जुलाई में परिधान उत्पादन फिर 2.3% घटा और अगस्त में 7.2% की गिरावट दर्ज की गई. यानी कुल औद्योगिक उत्पादन में अगस्त में तेज वृद्धि के बावजूद तैयार परिधानों का उत्पादन कमजोर रहा.
इसके उलट, कपड़ा उत्पादन में अगस्त से दिसंबर 2025 के बीच अक्टूबर को छोड़कर लगातार मासिक वृद्धि दर्ज की गई. अक्टूबर 2025 में इसमें 7.7% की गिरावट आई थी. इसके बाद जनवरी 2026 में कपड़ा उत्पादन 5.7% और फरवरी में 24.2% घटा. हालांकि, मार्च में इसमें करीब 48% की जोरदार वृद्धि हुई और अगस्त तक मजबूत उत्पादन का रुझान बना रहा.
यार्न और कपड़े की मांग अलग, परिधान कारोबार पर निर्यात का असर
अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (AEPC) के चेयरमैन ए. शक्तिवेल के मुताबिक, कपड़ा और तैयार परिधान IIP की अलग-अलग श्रेणियां हैं और ये उत्पादन प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों को दर्शाती हैं. कपड़ा क्षेत्र में यार्न और फैब्रिक जैसे शुरुआती चरण शामिल होते हैं, जिनका उत्पादन कच्चे माल की कीमतों, इन्वेंटरी और मध्यवर्ती मांग से प्रभावित होता है.
उन्होंने कहा कि तैयार परिधान उत्पादन मूल्यवर्धन की अंतिम कड़ी है और यह निर्यात ऑर्डर, खरीदारों के पास मौजूद इन्वेंटरी और वैश्विक खुदरा मांग से ज्यादा सीधे तौर पर जुड़ा है. हाल में यार्न की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है. इसके अलावा भू-राजनीतिक और व्यापार संबंधी अनिश्चितताओं का असर भी परिधान उत्पादन पर तेजी से पड़ सकता है, क्योंकि यह बाहरी मांग पर अधिक निर्भर है.
घरेलू बाजार भी बड़ा सहारा
भारत के कपड़ा और परिधान उद्योग के लिए घरेलू बाजार भी काफी महत्वपूर्ण है. कपड़ा मंत्रालय के नेशनल हाउसहोल्ड सर्वे 2024 के अनुसार, भारत का कुल कपड़ा बाजार करीब 14.95 लाख करोड़ रुपये का था. इसमें घरेलू बाजार की हिस्सेदारी करीब 12.02 लाख करोड़ रुपये यानी लगभग 80% थी.
भारत ने 2030 तक परिधान निर्यात को बढ़ाकर 40 अरब डॉलर करने का लक्ष्य रखा है. फिलहाल यह करीब 16 अरब डॉलर है. उद्योग नए मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) और दूसरे देशों में बाजार पहुंच बढ़ाकर निर्यात बाजार में विविधता लाने की कोशिश कर रहा है.
नेशनल अकाउंट्स स्टैटिस्टिक्स 2025 के अनुसार, पिछले तीन वर्षों के औसत आधार पर कपड़ा और परिधान क्षेत्र का देश की GDP में करीब 2% और विनिर्माण सकल मूल्यवर्धन (GVA) में करीब 11% योगदान रहा है.
शक्तिवेल ने कहा कि परिधान विनिर्माण में लंबे समय तक गिरावट रहने से विनिर्माण, मूल्यवर्धन, निर्यात, निवेश और रोजगार प्रभावित हो सकते हैं. उन्होंने कहा कि मौजूदा IIP आंकड़ों पर करीब से नजर रखने की जरूरत है. साथ ही उद्योग नए बाजारों में पहुंच बढ़ाने और निर्यात के लिए नए अवसर तलाश रहा है.
अप्रैल-अगस्त में परिधान निर्यात 9.1% घटा
वित्त वर्ष 2026-27 के अप्रैल-अगस्त के दौरान भारत का परिधान निर्यात 9.1% घटा है. यह वैश्विक बाजार में चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों को दर्शाता है. हालांकि, शक्तिवेल के मुताबिक हाल के महीनों में गिरावट की रफ्तार कुछ कम हुई है.
उद्योग को आगामी त्योहारी सीजन से घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मांग में सुधार की उम्मीद है. कंपनियां विदेशों में त्योहारी सीजन और क्रिसमस से जुड़े ऑर्डर पर भी नजर रख रही हैं. नए FTA और व्यापक बाजार पहुंच से निर्यात बाजार में विविधता बढ़ने की उम्मीद है, जबकि घरेलू बाजार अतिरिक्त मांग का आधार उपलब्ध कराता है.
उद्योग को अगले 2-3 महीनों में सुधार की उम्मीद
मुंबई स्थित निर्यातक और Technocraft Industries के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक शरद सराफ ने मौजूदा विनिर्माण सुस्ती को चक्रीय बताया. उन्होंने अगले दो से तीन महीनों में वृद्धि में सुधार की उम्मीद जताई. उन्होंने बताया कि उनकी कंपनी फिलहाल क्रिसमस से जुड़े ऑर्डर पर काम कर रही है, जिससे निर्यात बाजार में गतिविधि जारी रहने का संकेत मिलता है.
सराफ के मुताबिक, विनिर्माण इकाइयों को स्थायी आधार पर कुशल कर्मचारियों की जरूरत होती है. ऑर्डर बुक के आधार पर कंपनियों को अतिरिक्त कर्मचारियों की भर्ती भी करनी पड़ती है. ऐसे में उत्पादन और ऑर्डर के स्तर के अनुसार श्रम की जरूरत में बदलाव आता रहता है.
कुल मिलाकर, चालू वित्त वर्ष के पहले पांच महीनों के IIP आंकड़े कपड़ा और तैयार परिधान क्षेत्र के बीच स्पष्ट अंतर दिखाते हैं. कपड़ा उत्पादन में शुरुआती गिरावट के बाद मजबूत सुधार हुआ है, जबकि तैयार परिधान उत्पादन अभी भी पिछले साल के स्तर से नीचे है. अब उद्योग की नजर आगामी निर्यात ऑर्डर, त्योहारी मांग, नए व्यापार समझौतों और नए बाजारों में पहुंच बढ़ाने पर है.
इस सप्ताह नया इश्यू लाने वाली एकमात्र कंपनी R K Fashion Accessories है. कोलकाता स्थित यह कंपनी नकली आभूषणों के वितरण का कारोबार करती है. कंपनी आईपीओ के जरिए 34.99 करोड़ रुपये जुटाने की योजना बना रही है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के प्राथमिक बाजार में इस सप्ताह गतिविधियां अपेक्षाकृत धीमी रहने वाली हैं. 5 अक्टूबर से शुरू हो रहे सप्ताह में सिर्फ एक नया आईपीओ खुलने जा रहा है, जबकि 29 कंपनियां शेयर बाजार में सूचीबद्ध होंगी. खास बात यह है कि इस सप्ताह एक भी नया मेनबोर्ड आईपीओ बाजार में नहीं आएगा.
R K Fashion Accessories खोलेगी आईपीओ
इस सप्ताह नया इश्यू लाने वाली एकमात्र कंपनी R K Fashion Accessories है. कोलकाता स्थित यह कंपनी नकली आभूषणों के वितरण का कारोबार करती है. कंपनी आईपीओ के जरिए 34.99 करोड़ रुपये जुटाने की योजना बना रही है. इसके तहत 42.67 लाख नए शेयर जारी किए जाएंगे. आईपीओ के लिए मूल्य दायरा 77 से 82 रुपये प्रति शेयर तय किया गया है.
9 महीने में 1.21 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा जुटे
2026 के पहले नौ महीनों में भारतीय प्राथमिक बाजार में आईपीओ गतिविधियां काफी मजबूत रही हैं. जनवरी से सितंबर के बीच 275 कंपनियों ने आईपीओ के जरिए 1.21 लाख करोड़ रुपये से अधिक जुटाए हैं. इनमें 96 मेनबोर्ड कंपनियां शामिल हैं, जिन्होंने करीब 1.13 लाख करोड़ रुपये जुटाए. अकेले अगस्त और सितंबर में कंपनियों ने आईपीओ के जरिए 65,175 करोड़ रुपये जुटाए हैं.
इस साल अब तक बड़े आईपीओ में National Stock Exchange of India का 22,563 करोड़ रुपये का आईपीओ सबसे बड़ा रहा. इसके अलावा SBI Funds Management ने 9,795 करोड़ रुपये, Manipal Health Enterprises ने 9,275 करोड़ रुपये, Indo-MIM ने 3,812 करोड़ रुपये, Clean Max Enviro Energy Solutions ने 3,080 करोड़ रुपये और Dhoot Transmission ने 3,067 करोड़ रुपये जुटाए.
इस सप्ताह 10 आईपीओ होंगे बंद
सप्ताह के शुरुआती दो दिनों में पहले से खुले 10 आईपीओ बंद होंगे. मेनबोर्ड सेगमेंट में Vishal Nirmiti और Nityas Gems & Jewellery के आईपीओ 5 अक्टूबर को बंद होंगे. वहीं, एसएमई सेगमेंट में Dove Soft, EverestIMS Technologies, Omara Ventures India, Eventions, SJP Ultrasonics और Sollfege Smart Electronics के आईपीओ 5 अक्टूबर को बंद होंगे. Acme India Industries, Paramount Syntex और TNA Solutions के आईपीओ 6 अक्टूबर को बंद होंगे.
29 कंपनियों की होगी शेयर बाजार में एंट्री
इस सप्ताह कुल 29 कंपनियां शेयर बाजार में सूचीबद्ध होंगी. इनमें 8 मेनबोर्ड और 21 एसएमई कंपनियां शामिल हैं. 5 अक्टूबर को Orient Cables India, Runwal Enterprises, Acevector और German Green Steel & Power के शेयर BSE और NSE पर सूचीबद्ध होंगे. इसके बाद 6 अक्टूबर को Shah Investor's Home और SRIT India की लिस्टिंग होगी. Vishal Nirmiti और Nityas Gems & Jewellery के शेयर 8 अक्टूबर को बाजार में सूचीबद्ध होंगे.
एसएमई सेगमेंट में Himalayan Solar और Bench Mark Infotech Services के शेयर 5 अक्टूबर को NSE Emerge पर सूचीबद्ध होंगे. वहीं Sai Urja Indo Ventures और Dudani Retail की लिस्टिंग BSE SME पर होगी.
6 अक्टूबर को Acme Universal Safezone 9, Pind Hospitality और Shivchem Agro की लिस्टिंग प्रस्तावित है. 7 अक्टूबर को Green Asia Impex, Papadmalji Agro Foods, Black Opal Consultants और Vans Electroengineerings बाजार में दस्तक देंगी.
8 अक्टूबर को 8 एसएमई कंपनियों की लिस्टिंग होगी, जबकि Acme India Industries, Paramount Syntex और TNA Solutions के शेयर 9 अक्टूबर को सूचीबद्ध होने की उम्मीद है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
एवरेस्ट को वापस मंगाए गए उत्पाद का पूरा रिकॉर्ड रखने और तय समय-सीमा के भीतर जरूरी जानकारी तथा स्टेटस रिपोर्ट जमा करने को कहा गया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) ने एवरेस्ट के पैक्ड जीरा पाउडर के एक बैच को बाजार से तुरंत वापस मंगाने का आदेश दिया है. रेगुलेटरी जांच में इस उत्पाद में एजोक्सीस्ट्रोबिन और थियामेथोक्सम नामक कीटनाशकों के अंश तय अधिकतम सीमा से ज्यादा पाए गए, जिसके बाद सैंपल को 'असुरक्षित' घोषित किया गया. इसके अलावा, FSSAI ने खाद्य सुरक्षा और साफ-सफाई से जुड़े गंभीर उल्लंघनों के चलते 'क्रिएटिव बेकर्स एंड कन्फेक्शनर्स प्राइवेट लिमिटेड' का लाइसेंस भी तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है.
जीरा पाउडर के सैंपल में मिले कीटनाशक
FSSAI के मुताबिक, गोवा में M/s रिवरसाइड रिसॉर्ट्स एंड हॉलिडे होम्स प्राइवेट लिमिटेड के परिसर से एवरेस्ट के पहले से पैक किए गए जीरा पाउडर का रेगुलेटरी सैंपल लिया गया था. फूड एनालिस्ट की जांच में एजोक्सीस्ट्रोबिन और थियामेथोक्सम के अंश तय अधिकतम अवशेष सीमा से अधिक पाए गए. इसके बाद फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट, 2006 के तहत सैंपल को 'असुरक्षित' घोषित किया गया.
एवरेस्ट को इस रिपोर्ट के खिलाफ अपील का मौका दिया गया, जिसके बाद सैंपल को रेफरल फूड लेबोरेटरी भेजा गया. FSSAI के अनुसार, रेफरल लेबोरेटरी ने भी सैंपल को असुरक्षित पाया और कीटनाशकों की मात्रा तय सीमा से अधिक होने की पुष्टि की.
पूरे बैच को वापस मंगाने का निर्देश
रेफरल लेबोरेटरी की रिपोर्ट के बाद FSSAI ने संबंधित जीरा पाउडर के पूरे बैच को तुरंत बाजार से वापस मंगाने का निर्देश दिया. एवरेस्ट को वापस मंगाए गए उत्पाद का पूरा रिकॉर्ड रखने और तय समय-सीमा के भीतर जरूरी जानकारी तथा स्टेटस रिपोर्ट जमा करने को कहा गया है. रेगुलेटर ने कंपनी को भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न हो, इसके लिए सुधारात्मक कदम उठाने और रिकॉल प्रक्रिया पूरी होने के बाद रिपोर्ट जमा करने का भी निर्देश दिया है.
क्रिएटिव बेकर्स का लाइसेंस भी निलंबित
एक अलग कार्रवाई में FSSAI ने 'क्रिएटिव बेकर्स एंड कन्फेक्शनर्स प्राइवेट लिमिटेड' का लाइसेंस तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया. यह कंपनी पूर्वी भारत में 'द शुगर एंड स्पाइस' नाम से रिटेल चेन चलाती है. निरीक्षण के दौरान खाद्य पदार्थ बनाने और संभालने वाली जगहों पर साफ-सफाई और हाइजीन से जुड़ी गंभीर कमियां पाई गईं.
रेगुलेटर के मुताबिक, परिसर में गंदगी, ग्रीस, धूल, मकड़ी के जाले और मक्खियां पाई गईं. खराब होने वाले कच्चे माल को खुले में रखा गया था, जबकि कच्चे और अर्ध-तैयार उत्पादों के लिए जंग लगे तथा ठीक से साफ नहीं किए गए कंटेनरों का इस्तेमाल किया जा रहा था.
कीड़े-मकौड़ों से बचाव के इंतजाम भी अपर्याप्त
FSSAI के निरीक्षण में कीड़े-मकौड़ों का काफी प्रकोप और उन्हें रोकने के अपर्याप्त इंतजाम भी सामने आए. इनमें मक्खियों को रोकने के प्रभावी उपायों की कमी, चूहों से बचाव के उचित इंतजाम नहीं होना और खिड़कियों तथा खुले स्थानों पर कीटरोधी जालियों का अभाव शामिल था.
इसके अलावा, खाद्य पदार्थ संभालने वाले क्षेत्रों में कचरा, पुराना स्टॉक, रिजेक्टेड लॉट और कबाड़ जमा पाया गया. परिसर में जंग लगे उपकरण, उखड़ता पेंट, सीलन और टूटी हुई फर्श की टाइलें भी मिलीं.
जरूरी खाद्य सुरक्षा रिकॉर्ड नहीं मिले
FSSAI ने कहा कि कंपनी की ओर से पानी और तैयार उत्पादों की टेस्टिंग, समय-तापमान की निगरानी, उपकरणों का कैलिब्रेशन, प्रिवेंटिव मेंटेनेंस, मॉक रिकॉल, ग्राहकों की शिकायतों, छानने और ऑडिट से जुड़े जरूरी रिकॉर्ड और सिस्टम भी उचित तरीके से बनाए नहीं गए थे. लाइसेंस निलंबित किए जाने के बाद कंपनी को निलंबन की अवधि के दौरान खाद्य कारोबार से जुड़ी सभी गतिविधियां बंद करने का निर्देश दिया गया है.
बीते कारोबारी सत्र यानी 1 अक्टूबर को सेंसेक्स 570.59 अंक यानी 0.79 फीसदी गिरकर 71,909.70 पर और निफ्टी 198.50 अंक यानी 0.88 फीसदी टूटकर 22,421.95 पर बंद हुआ था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में सोमवार, 5 अक्टूबर को सकारात्मक शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं. गिफ्ट निफ्टी करीब 130 अंक की बढ़त के साथ 22,650 के पार कारोबार कर रहा है. एशियाई बाजारों में भी जोरदार तेजी है, जबकि कच्चे तेल की कीमतों में ऊपरी स्तरों से नरमी से घरेलू बाजार को कुछ राहत मिल सकती है. हालांकि, ऊंची अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और विदेशी निवेशकों की बिकवाली बाजार की तेजी को सीमित कर सकती है. इससे पहले 1 अक्टूबर को सेंसेक्स 570.59 अंक यानी 0.79 फीसदी गिरकर 71,909.70 पर और निफ्टी 198.50 अंक यानी 0.88 फीसदी टूटकर 22,421.95 पर बंद हुआ था.
गिफ्ट निफ्टी से सकारात्मक संकेत
सोमवार सुबह गिफ्ट निफ्टी में करीब 130 अंकों की तेजी रही और यह 22,650 के पार कारोबार करता दिखा. इससे घरेलू बाजार में खरीदारी के साथ शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं. बाजार की नजर अब वैश्विक संकेतों, विदेशी निवेशकों की गतिविधियों और आगामी आर्थिक घटनाक्रम पर रहेगी.
एशियाई बाजारों में तेजी
अमेरिका के कमजोर रोजगार आंकड़ों के बाद एशियाई बाजारों में सोमवार को तेजी देखने को मिल रही है. कमजोर रोजगार आंकड़ों से अमेरिकी फेडरल रिजर्व पर ब्याज दरों में आक्रामक बढ़ोतरी का दबाव कुछ कम होने की उम्मीद है. MSCI एशिया पेसिफिक इंडेक्स करीब आधे फीसदी ऊपर है, जबकि जापान का निक्केई करीब 2.5 फीसदी चढ़ा है. दक्षिण कोरिया का बाजार नेशनल फाउंडेशन डे की छुट्टी के कारण बंद है.
कच्चे तेल में नरमी
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में ऊपरी स्तरों से नरमी आई है. ब्रेंट क्रूड करीब आधे फीसदी की गिरावट के साथ 101 डॉलर प्रति बैरल के आसपास और WTI क्रूड करीब 90 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है. कच्चे तेल की कीमतों में नरमी भारत जैसे तेल आयातक देश के लिए सकारात्मक मानी जाती है, क्योंकि इससे आयात लागत और महंगाई के दबाव को कुछ राहत मिल सकती है.
RBI MPC बैठक पर नजर
निवेशकों की नजर आज से शुरू हो रही RBI की मौद्रिक नीति समिति यानी MPC की बैठक पर भी रहेगी. बैठक 7 अक्टूबर को खत्म होगी. ब्याज दरों पर RBI के फैसले और उसके रुख से बाजार की दिशा प्रभावित हो सकती है.
इन शेयरों पर रहेगी नजर
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, सोमवार को भारत कोकिंग कोल, DLF, HDFC Bank, अरबिंदो फार्मा, हिंडाल्को इंडस्ट्रीज, बजाज फाइनेंस, TCS, यस बैंक और हिंदुस्तान जिंक समेत कई शेयर चर्चा में रहेंगे. भारत कोकिंग कोल को झारखंड सरकार की ओर से 3,816.83 करोड़ रुपये की कथित बकाया राशि की वसूली से जुड़ा नोटिस मिला है. DLF की गुरुग्राम स्थित लग्जरी आवासीय परियोजना 'द ऑरेवा' की सभी इकाइयां करीब 1,985 करोड़ रुपये की बिक्री के साथ बिक चुकी हैं. HDFC Bank को अनुप बागची को तीन साल के लिए प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी नियुक्त करने की RBI से मंजूरी मिली है. बजाज फाइनेंस के बोर्ड ने शेयर जारी करने और परिवर्तनीय वारंट के जरिए कुल 17,500 करोड़ रुपये तक जुटाने की मंजूरी दी है. TCS ने Best Buy के साथ समझौता किया है, जिसके तहत भारत में Best Buy का ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर TCS को हस्तांतरित किया जाएगा. अरबिंदो फार्मा को अमेरिका में पेराम्पैनल दवा के निर्माण और बिक्री के लिए FDA की अंतिम मंजूरी मिली है. हिंडाल्को इंडस्ट्रीज और अलुकेम ने प्रस्तावित अधिग्रहण का समझौता आपसी सहमति से समाप्त कर दिया है. वहीं, नैक पैकेजिंग को 150 करोड़ रुपये का ऑर्डर मिला है, जबकि रेल विकास निगम का ईस्ट कोस्ट रेलवे से मिला ऑर्डर रद्द हो गया है. यस बैंक के ऋण और अग्रिम सालाना आधार पर 24 फीसदी बढ़कर 3.1 लाख करोड़ रुपये हो गए हैं. हिंदुस्तान जिंक का खनन से प्राप्त धातु उत्पादन 5 फीसदी बढ़कर 2.71 लाख टन और बिक्री योग्य धातु उत्पादन 7 फीसदी बढ़कर 2.64 लाख टन रहा.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
बैंकों ने कोर्ट को यह भी बताया कि मामले में अटैच की गई कुछ शेयर होल्डिंग्स अभी भी बरकरार हैं और उनकी बिक्री नहीं हुई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
विजय माल्या से जुड़े बैंक लोन मामले में SBI की अगुवाई वाले बैंकों के कंसोर्टियम ने बॉम्बे हाई कोर्ट में रिकवरी को लेकर बड़ा अपडेट दिया है. बैंकों के मुताबिक, 31 अगस्त 2026 तक विजय माल्या से करीब ₹8,751.86 करोड़ की रकम अभी वसूल की जानी बाकी है. यह राशि कानूनी और अन्य खर्चों को शामिल किए बिना बताई गई है.
बैंकों ने कोर्ट को बताया कि डेट रिकवरी ऑफिसर (DRO) की प्रक्रिया के जरिए अब तक करीब ₹10,270 करोड़ की राशि अस्थायी रूप से रिकवर की जा चुकी है. इसके अलावा मुकदमा दायर होने से पहले ₹544.58 करोड़ की रिकवरी हुई थी. हालांकि, बैंकों का कहना है कि इन रिकवरी आंकड़ों को बाकी बकाया राशि से अलग करके नहीं देखा जा सकता.
जनवरी में ₹8,135 करोड़ था बकाया
SBI-led कंसोर्टियम की ओर से दाखिल हलफनामे के अनुसार, जनवरी 2026 में विजय माल्या पर करीब ₹8,135.63 करोड़ की देनदारी बकाया बताई गई थी. इसके बाद ब्याज और अन्य देनदारियों के जुड़ने से 31 अगस्त 2026 तक यह रकम बढ़कर ₹8,751.86 करोड़ हो गई. इससे साफ है कि बैंकों की ओर से अब तक हजारों करोड़ रुपये की रिकवरी किए जाने के बावजूद मामले में पूरी देनदारी की वसूली अभी बाकी है.
माल्या ने बैंकों की रिकवरी पर उठाया था सवाल
विजय माल्या ने 2020 में बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया था और अपने खिलाफ चल रहे आपराधिक मामलों को खत्म करने की मांग की थी. उन्होंने दावा किया था कि बैंकों ने उनकी देनदारी से अधिक रकम रिकवर कर ली है और बैंकिंग विवाद का निपटारा हो चुका है. हालांकि, बैंकों ने अपने ताजा हलफनामे में इस दावे का विरोध किया है. उनका कहना है कि माल्या से अभी भी बड़ी रकम की वसूली बाकी है.
कुछ अटैच शेयरों की बिक्री अभी बाकी
बैंकों ने कोर्ट को यह भी बताया कि मामले में अटैच की गई कुछ शेयर होल्डिंग्स अभी भी बरकरार हैं और उनकी बिक्री नहीं हुई है. इसका मतलब है कि रिकवरी की प्रक्रिया अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है और अटैच संपत्तियों से आगे भी वसूली की प्रक्रिया जारी रह सकती है.
ED ने ₹14,131 करोड़ की संपत्तियों का दिया जिक्र
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने कोर्ट में अलग से बताया कि करीब ₹14,131.6 करोड़ की चल और अचल संपत्तियां SBI-led कंसोर्टियम को लौटाई गई हैं. हालांकि, ED ने यह भी स्पष्ट किया कि बैंक की देनदारी की रिकवरी और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े आपराधिक मामलों को अलग-अलग आधार पर देखा जाना चाहिए. यानी बैंकों की ओर से कर्ज की वसूली और आपराधिक मामलों की कानूनी स्थिति एक-दूसरे से अलग मुद्दे हैं. विजय माल्या से जुड़े इस मामले में बैंकों की रिकवरी प्रक्रिया और कोर्ट में चल रही कानूनी कार्यवाही दोनों जारी हैं.
आंध्र प्रदेश सरकार के मुताबिक, हॉर्टिकल्चर हब को तीन चरणों में विकसित किया जाएगा. तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार परियोजना के लिए ₹40,352 करोड़ का योगदान देगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आंध्र प्रदेश के मदनपल्ले में शुक्रवार को मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू और केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ₹1 लाख करोड़ की अनुमानित लागत वाले ग्लोबल हॉर्टिकल्चर हब की आधारशिला रखी. इसके साथ ही इंडियन स्कूल ऑफ एग्रीकल्चर (ISA) की भी नींव रखी गई. यह संस्थान कृषि क्षेत्र में तकनीक, रिसर्च और इनोवेशन को बढ़ावा देने पर केंद्रित होगा. परियोजना के तहत 10 जिलों के 5,869 गांवों को 201 क्लस्टर के जरिए जोड़ा जाएगा.
सरकार देगी ₹40,352 करोड़, निजी निवेश जुटाने की योजना
आंध्र प्रदेश सरकार के मुताबिक, हॉर्टिकल्चर हब को तीन चरणों में विकसित किया जाएगा. तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार परियोजना के लिए ₹40,352 करोड़ का योगदान देगी. इसके अलावा करीब ₹60,000 करोड़ का निजी निवेश जुटाने का लक्ष्य रखा गया है.
यह परियोजना अनंतपुर, अन्नामय्या, चित्तूर, कुरनूल, नंद्याल, श्री सत्य साईं, तिरुपति, कडप्पा, प्रकाशम और मार्कापुरम जिलों में लागू की जाएगी. इन 10 जिलों में 303 मंडलों और 5,869 गांवों को परियोजना के दायरे में शामिल किया गया है.
6 लाख हेक्टेयर बढ़ाया जाएगा खेती का क्षेत्र
सरकार मौजूदा 8.41 लाख हेक्टेयर के हॉर्टिकल्चर यानी बागवानी क्षेत्र को 6 लाख हेक्टेयर और बढ़ाने की योजना बना रही है. इसके बाद परियोजना के तहत कुल 14.41 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बागवानी खेती को कवर करने का लक्ष्य है.
परियोजना के जरिए बागवानी उत्पादन को मौजूदा 222 लाख मीट्रिक टन से बढ़ाकर 435 लाख मीट्रिक टन करने का लक्ष्य रखा गया है. सरकारी जानकारी के अनुसार, इससे 10 जिलों के करीब 9.6 लाख किसानों को सीधे लाभ मिलने की उम्मीद है.
कृषि में AI और आधुनिक तकनीक पर जोर
इंडियन स्कूल ऑफ एग्रीकल्चर को इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस की तर्ज पर विकसित करने की योजना है. इसका उद्देश्य आधुनिक तकनीक, रिसर्च और इनोवेशन के जरिए कृषि क्षेत्र के विकास को बढ़ावा देना है. रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने राज्य सरकार के साथ मिलकर इस संस्थान की स्थापना और संचालन में सहयोग करने की पेशकश की है.
ISA किसानों को तकनीक आधारित मार्गदर्शन देने के साथ कृषि क्षेत्र की प्रमुख चुनौतियों के समाधान विकसित करने पर काम करेगा. इसके तहत डिजिटल एग्रीकल्चर, प्रिसीजन फार्मिंग, फसल निगरानी, स्मार्ट सिंचाई और मार्केट इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों पर फोकस किया जाएगा.
कृषि मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने की कोशिश
हॉर्टिकल्चर हब का उद्देश्य केवल खेती का रकबा और उत्पादन बढ़ाना नहीं है, बल्कि कृषि से जुड़ी पूरी मूल्य श्रृंखला को मजबूत करना भी है. इसके तहत उत्पादन के साथ प्रोसेसिंग, मार्केटिंग और निर्यात से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर को विकसित करने पर जोर दिया जाएगा.
सरकार का लक्ष्य रायालसीमा क्षेत्र में बागवानी उत्पादन को तकनीक से जोड़कर किसानों की बाजार तक पहुंच बेहतर करना और कृषि उत्पादों की वैल्यू बढ़ाना है. परियोजना के तीन चरणों में लागू होने से इसके तहत आने वाले गांवों और किसानों को चरणबद्ध तरीके से जोड़े जाने की योजना है.
कंपनी के मुताबिक, इस पहल का उद्देश्य स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने के साथ किसानों और ग्रामीण समुदायों के लिए नए आर्थिक अवसर पैदा करना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
रिलायंस इंडस्ट्रीज (RIL) आंध्र प्रदेश में कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) प्लांट स्थापित करने के लिए ₹1 लाख करोड़ के निवेश की योजना बना रही है. कंपनी के कार्यकारी निदेशक अनंत एम. अंबानी ने इस निवेश की घोषणा की. प्रस्तावित परियोजनाओं से 3 लाख से अधिक रोजगार पैदा होने और आने वाले दशकों में राज्य के लिए करीब ₹60,000 करोड़ का राजस्व उत्पन्न होने का अनुमान है. कंपनी के मुताबिक, इस पहल का उद्देश्य स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने के साथ किसानों और ग्रामीण समुदायों के लिए नए आर्थिक अवसर पैदा करना है.
कृषि कचरे से बनेगी कंप्रेस्ड बायोगैस
अनंत अंबानी ने 2 अक्टूबर को मदनपल्ले में रायालसीमा हॉर्टिकल्चर हब और इंडियन स्कूल ऑफ एग्रीकल्चर (ISA) के शिलान्यास कार्यक्रम में निवेश की जानकारी दी. उन्होंने कहा कि प्रस्तावित सीबीजी प्लांट कृषि अवशेष, पशुओं के गोबर, खाद्य कचरे और अन्य जैविक सामग्री से मीथेन युक्त गैस तैयार करेंगे.
सीबीजी का इस्तेमाल पारंपरिक प्राकृतिक गैस के विकल्प के तौर पर किया जा सकता है. इन परियोजनाओं से कृषि कचरे के उपयोग, ग्रामीण रोजगार और नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन के लिए नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है.
अंबानी ने कहा कि देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले किसान अब ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने में भी योगदान दे सकते हैं. उनके मुताबिक, इससे भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिल सकता है.
रायालसीमा में बढ़ेगा रिलायंस का क्लीन एनर्जी फोकस
प्रस्तावित निवेश आंध्र प्रदेश में रिलायंस की व्यापक स्वच्छ ऊर्जा रणनीति का हिस्सा है. कंपनी रायालसीमा क्षेत्र में क्लीन एनर्जी के साथ एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग के अवसरों पर भी काम कर रही है.
अनंत अंबानी के अनुसार, जून 2024 से आंध्र प्रदेश सरकार ने 388 मेगा प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी है. इन परियोजनाओं में ₹14 लाख करोड़ से अधिक के निवेश की प्रतिबद्धता और करीब 11 लाख रोजगार पैदा होने की संभावना है. राज्य सरकार के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि इनमें से करीब एक-तिहाई निवेश रायालसीमा क्षेत्र में आने की उम्मीद है.
यह घोषणा रिलायंस की अप्रैल 2025 में की गई योजना के बाद आई है. उस समय कंपनी ने आंध्र प्रदेश में 500 सीबीजी प्लांट स्थापित करने के लिए ₹65,000 करोड़ के निवेश की घोषणा की थी. हालांकि, नए ₹1 लाख करोड़ के प्रस्ताव का पहले की योजना से सटीक संबंध और दोनों योजनाओं की अलग-अलग समयसीमा अभी स्पष्ट नहीं की गई है.
खेती में AI और आधुनिक तकनीक पर भी जोर
रिलायंस इंडियन स्कूल ऑफ एग्रीकल्चर को रणनीतिक निवेश, डिजिटल क्षमताओं, तकनीकी विशेषज्ञता और इंडस्ट्री पार्टनरशिप के जरिए सहयोग देने की योजना बना रही है.
प्रस्तावित संस्थान में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और आधुनिक कृषि तकनीकों को पारंपरिक खेती के ज्ञान के साथ जोड़ा जाएगा. इसके प्रमुख क्षेत्रों में कीटों की भविष्यवाणी, ड्रोन से फसल की निगरानी, प्रिसीजन इरिगेशन, रोबोटिक्स और फसलों की कीमतों से जुड़ी जानकारी शामिल होगी.
अंबानी ने कहा कि जियो गांवों में वर्चुअल क्लासरूम के जरिए भारतीय भाषाओं में किसानों के प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाने के लिए संस्थान के साथ सहयोग करेगा. इसके अलावा ग्रामीण युवाओं को डिजिटल तकनीक से लैस कृषि विस्तार कार्यकर्ताओं के रूप में प्रशिक्षित करने की भी योजना है.
₹40,000 करोड़ के हॉर्टिकल्चर हब का प्रस्ताव
रायालसीमा हॉर्टिकल्चर हब को क्षेत्र में तकनीक आधारित कृषि को बढ़ावा देने और कृषि मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने के उद्देश्य से विकसित किया जा रहा है. अनंत अंबानी के मुताबिक, इस हब के लिए ₹40,000 करोड़ के निवेश का प्रस्ताव है.
वहीं, व्यापक सरकारी परियोजना को ₹1 लाख करोड़ की पहल के तौर पर बताया गया है, जिसमें ₹40,000 करोड़ की केंद्रीय सहायता और ₹60,000 करोड़ का निजी निवेश शामिल है. परियोजना का उद्देश्य बागवानी खेती का विस्तार, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार और रायालसीमा की निर्यात क्षमता को मजबूत करना है.
अंबानी ने कार्यक्रम में कहा कि इन पहलों का उद्देश्य ग्रामीण उद्यमों को बढ़ावा देना, गांवों को मजबूत करना, टिकाऊ विकास को आगे बढ़ाना और किसानों की आय तथा जीवन स्तर में सुधार के लिए नए अवसर तैयार करना है.
प्रस्तावित निवेश ऐसे समय में आया है जब आंध्र प्रदेश बड़े औद्योगिक निवेश आकर्षित करने, नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता बढ़ाने और कृषि क्षेत्र को आधुनिक बनाने पर जोर दे रहा है. हालांकि, ₹1 लाख करोड़ के निवेश, रोजगार और राजस्व से जुड़े अनुमानों का वास्तविक असर परियोजनाओं के क्रियान्वयन, पूंजी निवेश और इनके पूरा होने के बाद मिलने वाले परिणामों पर निर्भर करेगा.
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि भारत एक बड़ा बाजार और उत्पादक देश है, जो अपनी घरेलू जरूरतों के साथ वैश्विक मांग को पूरा करने में भी योगदान देता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत ने G20 के वाणिज्य एवं व्यापार मंत्रियों की बैठक में कुछ भारतीय सेक्टरों में कथित ‘ओवरकैपेसिटी’ को लेकर उठाई गई चिंताओं को खारिज किया है. वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि भारत एक बड़ा बाजार और उत्पादक देश है, जो अपनी घरेलू जरूरतों के साथ वैश्विक मांग को पूरा करने में भी योगदान देता है. उन्होंने कहा कि उत्पादन और सप्लाई चेन का विस्तार जरूरी है, लेकिन इसके नाम पर विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों से बाहर जाकर कदम नहीं उठाए जाने चाहिए.
अमेरिका ने G20 में उठाया था ओवरकैपेसिटी का मुद्दा
यह मुद्दा अमेरिका की अगुवाई में G20 बैठक के दौरान उठाया गया. अमेरिका की ओर से चिंता जताई गई कि कुछ देशों में स्टील, टेक्सटाइल, ऑटोमोबाइल और केमिकल जैसे क्षेत्रों में जरूरत से ज्यादा उत्पादन क्षमता वैश्विक बाजार में असंतुलन पैदा कर सकती है और दूसरे देशों के उद्योगों को प्रभावित कर सकती है.
अमेरिका अलग से सेक्शन 301 के तहत भारत समेत करीब 60 देशों में कुछ प्रमुख क्षेत्रों की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता की जांच भी कर रहा है. इस जांच में यह देखा जा रहा है कि किसी देश की अतिरिक्त उत्पादन क्षमता से अमेरिकी उद्योगों के हितों पर असर पड़ रहा है या नहीं.
भारत ने WTO नियमों पर दिया जोर
पीयूष गोयल ने बैठक में भारत का पक्ष रखते हुए कहा कि उत्पादन क्षमता और सप्लाई चेन का विस्तार अपने आप में गलत नहीं है. भारत जैसे बड़े देश के लिए घरेलू जरूरतों को पूरा करने के साथ वैश्विक आपूर्ति में योगदान देना भी महत्वपूर्ण है. उन्होंने यह भी कहा कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था में किसी भी तरह के ऐसे कदम से बचना चाहिए जो WTO के नियमों के दायरे से बाहर हों या विकासशील देशों पर अतिरिक्त बोझ डालें.
गोयल के मुताबिक, G20 प्रेसिडेंसी की ओर से जिन क्षेत्रों में उत्पादन क्षमता को लेकर चिंता जताई गई है, उनमें भारत के पास ऐसी संरचनात्मक अतिरिक्त क्षमता नहीं है, जिसे दूसरे देशों के उद्योगों के लिए नुकसानदेह माना जाए.
डंपिंग को लेकर भारत की भी चिंता
बैठक में भारत ने डंपिंग और बेहद कम कीमत पर दूसरे देशों के बाजारों में सामान पहुंचाए जाने को लेकर भी चिंता जताई. गोयल ने कहा कि कई देशों ने इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि कुछ देश अपने हितों को बढ़ावा देने के लिए ऐसी नीतियां अपना सकते हैं, जिससे वैश्विक बाजार में डंपिंग की स्थिति बन सकती है.
भारत लंबे समय से विभिन्न क्षेत्रों में कम कीमत वाले आयात और घरेलू उद्योगों पर उनके प्रभाव का मुद्दा उठाता रहा है. खासतौर पर स्टील और कुछ अन्य औद्योगिक उत्पादों के मामले में भारतीय उद्योगों की ओर से डंपिंग को लेकर चिंता जताई जाती रही है.
भारत-अमेरिका ट्रेड डील के लिहाज से भी अहम मुद्दा
ओवरकैपेसिटी और डंपिंग का मुद्दा ऐसे समय में सामने आया है, जब भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित ट्रेड डील को लेकर बातचीत चल रही है. अमेरिका की ओर से भारतीय औद्योगिक क्षेत्रों और व्यापार नीतियों से जुड़े कई मुद्दे उठाए जा रहे हैं.
ऐसे में G20 मंच पर भारत की ओर से WTO के नियमों और विकासशील देशों के हितों पर दिया गया जोर व्यापार वार्ता के व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण है. भारत का रुख है कि वैश्विक व्यापार में उत्पादन और सप्लाई चेन का विस्तार नियम आधारित व्यवस्था के भीतर होना चाहिए और इसके लिए विकासशील देशों पर असमान बोझ नहीं डाला जाना चाहिए.
यह नुकसान भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से रुपये में बैंकों की नेट ओपन पोजीशन पर 100 मिलियन डॉलर की सीमा तय किए जाने के बाद हुआ.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय बैंकों को 2026 की पहली छमाही में विदेशी मुद्रा कारोबार से करीब 500 मिलियन डॉलर का मार्क-टू-मार्केट नुकसान उठाना पड़ा. यह नुकसान भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से रुपये में बैंकों की नेट ओपन पोजीशन पर 100 मिलियन डॉलर की सीमा तय किए जाने के बाद हुआ. नए नियमों के तहत बैंकों को कम समय में अपनी पोजीशन घटानी या फिर दोबारा संतुलित करनी पड़ी. हालांकि, बाद में बाजार में स्प्रेड बढ़ने और पोजीशन सामान्य होने से बैंकों ने शुरुआती नुकसान में से करीब 400 मिलियन डॉलर की भरपाई कर ली.
RBI ने 100 मिलियन डॉलर की तय की थी सीमा
RBI ने 27 मार्च को निर्देश जारी कर अधिकृत डीलर बैंकों की ऑनशोर रुपये की एंड-ऑफ-डे नेट ओपन पोजीशन को 100 मिलियन डॉलर तक सीमित कर दिया था. बैंकों को 10 अप्रैल तक अपनी पोजीशन इस सीमा के भीतर लानी थी. इसके चलते बैंकों को अपने फॉरेक्स ट्रेडिंग बुक में तेजी से बदलाव करना पड़ा.
यह बदलाव ऐसे समय में हुआ जब रुपये में उतार-चढ़ाव ज्यादा था. विदेशी निवेशकों की ओर से पूंजी निकासी हो रही थी और कंपनियों की ओर से मुद्रा जोखिम से बचाव यानी करेंसी हेजिंग की मांग भी मजबूत थी. इन परिस्थितियों ने बैंकों के लिए अपनी फॉरेक्स पोजीशन को कम करना या फिर दोबारा संतुलित करना चुनौतीपूर्ण बना दिया.
कम समय में पोजीशन घटाने से बढ़ा दबाव
RBI की नई सीमा से बैंकों की ओर से अपनी बुक पर रखे जा सकने वाले विदेशी मुद्रा जोखिम की मात्रा कम हो गई. इसका असर ग्राहकों को फॉरेक्स लिक्विडिटी उपलब्ध कराने और उनके जोखिम को कुछ समय के लिए अपने पास रखने की बैंकों की क्षमता पर भी पड़ा.
क्रिसिल कोएलिशन ग्रीनविच के मार्केट स्ट्रक्चर एंड टेक्नोलॉजी के वाइस प्रेसिडेंट नितिन अगिचा के मुताबिक, नए RBI नियमों को लागू करने के लिए मिला कम समय बैंकों के लिए बड़ी चुनौती बना. उन्हें रुपये में अधिक उतार-चढ़ाव, विदेशी निवेशकों की निकासी और कंपनियों की मजबूत हेजिंग मांग के बीच तेजी से अपनी पोजीशन बदलनी पड़ी.
कुछ बैंकों के लिए संबंधित पक्षों से जुड़े डेरिवेटिव के जरिए अपने जोखिम को संतुलित करने की क्षमता भी सीमित हो गई. जोखिम लेने की क्षमता घटने और पोजीशन में बदलाव के लिए कम समय मिलने से ट्रेडिंग बुक को दोबारा व्यवस्थित करने की लागत बढ़ी और सामान्य मार्केट-मेकिंग गतिविधियों पर भी असर पड़ा.
बाजार में स्प्रेड बढ़ने से 400 मिलियन डॉलर की भरपाई
शुरुआत में हुए मार्क-टू-मार्केट नुकसान का एक बड़ा हिस्सा बाद में कम हुआ. नए नियामकीय ढांचे के अनुरूप बाजार में कारोबार की स्थितियां बदलने लगीं और डीलरों ने कम बैलेंस-शीट क्षमता तथा ज्यादा एग्जीक्यूशन रिस्क को ध्यान में रखते हुए कीमतों में बदलाव किया.
इसके चलते बाजार में स्प्रेड बढ़ा और बैंकों की पोजीशन धीरे-धीरे सामान्य स्तर पर आने लगी. रिसर्च के मुताबिक, इससे बैंकों को शुरुआती करीब 500 मिलियन डॉलर के नुकसान में से लगभग 400 मिलियन डॉलर की भरपाई करने में मदद मिली.
20 अप्रैल को RBI ने कुछ प्रतिबंधों में ढील भी दी. इसके तहत संबंधित पक्षों के बीच होने वाले कुछ लेनदेन के लिए सीमित अपवाद की अनुमति दी गई. हालांकि, ऑनशोर डिलीवरेबल मार्केट में 100 मिलियन डॉलर की नेट ओपन पोजीशन सीमा बरकरार रही.
कच्चे तेल की कीमतों ने भी बढ़ाई फॉरेक्स में अस्थिरता
बैंकों के ट्रेडिंग नुकसान की यह स्थिति केवल RBI के नए नियमों तक सीमित नहीं थी. उस दौरान भारतीय विदेशी मुद्रा बाजार पर कच्चे तेल की कीमतों का भी दबाव था. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर काफी निर्भर है.
क्रिसिल कोएलिशन ग्रीनविच के मुताबिक, भारत अपनी जरूरत का करीब 85 फीसदी कच्चा तेल और 50 फीसदी प्राकृतिक गैस आयात करता है. ऐसे में ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी से आयात के लिए विदेशी मुद्रा की जरूरत बढ़ती है, जिसका असर रुपये पर पड़ सकता है.
रिसर्च के अनुसार, जनवरी से जुलाई 2026 के बीच भारत का आयात बिल 20 फीसदी बढ़ा और कुल आयात 95.9 अरब डॉलर तक पहुंच गया. यह 2011 के बाद सबसे ऊंचा स्तर बताया गया है. आयात में बढ़ोतरी से विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ी, जबकि रुपये पर पूंजी प्रवाह और वैश्विक जोखिम से जुड़े दबाव भी बने रहे.
बैंकों की फॉरेक्स जोखिम क्षमता पर असर
RBI की ओर से विदेशी मुद्रा पोजीशन पर लगाई गई सीमा का असर सिर्फ शुरुआती मार्क-टू-मार्केट नुकसान तक सीमित नहीं है. ओपन करेंसी पोजीशन पर सख्त सीमा से बैंकों की ग्राहकों से जुड़े फॉरेक्स जोखिम को अपने पास रखने और बाजार में लिक्विडिटी उपलब्ध कराने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है.
क्रिसिल कोएलिशन ग्रीनविच के डायरेक्टर आमिर हजरिया के अनुसार, आगे रुपये की स्थिति RBI की नीतियों, पूंजी प्रवाह में सुधार, वैश्विक जोखिम धारणा और ऊर्जा आयात पर भारत की संरचनात्मक निर्भरता जैसे कई कारकों पर निर्भर करेगी.
पहली छमाही का यह घटनाक्रम दिखाता है कि बैंकों की विदेशी मुद्रा पोजीशन से जुड़े नियामकीय बदलाव कम समय में ट्रेडिंग बुक, बाजार की लिक्विडिटी और कंपनियों की हेजिंग लागत पर असर डाल सकते हैं.