अडानी ग्रुप और हिंडनबर्ग की कहानी के बाद अब सवाल ये है कि क्या हम हिम्मत इकठ्ठा करके सच का सामना कर पायेंगे या फिर सिस्टम में PN जैसे लूप होल्स बने रहेंगे?
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
मुझे, (प्रबल बासु रॉय, डायरेक्टर एवं एडवाइजर चेयरमैन कॉर्पोरेट बोर्ड्स को) लगा पिछले दो हफ्तों में हिंडनबर्ग रिपोर्ट आने के बाद से मचे शोर और बेकार के राजनीतिक विचारों को शांत हो जाने देना चाहिए. इतनी गंभीर हालत के बारे में बहुत सी भावनाओं को परे रखकर आवश्यक बात कहना, इसके बाद ही ठीक होगा. मुझे लगता है इस पूरे घटनाक्रम में पांच केंद्रीय समस्याएं हैं. बेहतर होगा कि हम एक उद्यमी के जोश और जोखिम लेने के उसके दृष्टिकोण को ठगी के साथ न मिलाएं. इसीलिए मैं सबसे उचित मुद्दों को बिजनेस मॉडल रिस्क, कैपिटल एफिशिएंसी, स्टॉक मैनीपुलेशन, संस्थागत गवर्नेंस, कॉर्पोरेट गवर्नेंस और घोर पूंजीवाद में बांट रहा हूं.
पिछले तीन सालों में शानदार परफोर्मेंस की ये है वजह
रिपोर्ट में उठाये गए बहुत से पॉइंट्स कंपनी के बिजनेस मॉडल की जोखिम धारणा और हाई लेवेरेज पर इसकी अत्यधिक निर्भरता के बारे में हैं. हालांकि जोखिम के दृष्टिकोण से इंफ्रास्ट्रक्चर कम्पनीज के लिए 1 से नीचे का करंट रेशो असामान्य नहीं है लेकिन यह किसी भी तरह से ठगी से जुड़ा हुआ नहीं है. गिरते हुए ऑपरेटिंग मार्जिन्स (7% से 3.6%) के साथ काफी हाई रेवेन्यु ग्रोथ (25% से 110%) और गिरती हुई कैपिटल एफिशिएंसी (15% से 3%) कम करंट रेशो के खतरे को काफी बढ़ा देते हैं. प्रोजेक्ट्स हासिल करने के लिए विरोधियों से कम कीमतें बताना और सेल में एसेट्स को जल्दी खरीदने के लिए ज्यादा कीमत अदा करना, पिछले कुछ सालों से कंपनी की ग्रोथ के पीछे का कारण हो सकते हैं.
एक ऐसा बिजनेस मॉडल तब तक आर्थिक ताकत पर असर डालता है जब तक वह कैपिटल की बड़ी मात्रा हासिल करना शुरू नहीं कर देता और पेबैक का समय नहीं बढ़ जाता. ज्यादा लम्बे समय तक उसके फाइनेंशियल सर्वाइवल के लिए यही सबसे जरूरी होता है. ऐसे बिजनेस मॉडल को खतरनाक कहा जा सकता है लेकिन ढोंगी नहीं कहा जा सकता. इस बारे में थोड़ी और बात करने पर पता चलता है कि कंपनी का मार्केट कैपिटल पिछले तीन सालों में 800% से ज्यादा बढ़ा है जिसका रिजल्ट हमें 20000 करोड़ की कीमत वाले FPO के रूप में देखने को मिला था. इस सबके पीछे कंपनी द्वारा कैपिटल इकठ्ठा करने के लिए ध्यानपूर्वक बनायी गयी रणनीति थी.
देश की व्यवस्था में हैं लूपहोल्स
यह फैक्ट कि कंपनी की ग्रोथ में मजबूत होती वित्तीय स्थिति शामिल नहीं थी और बहुत सी ग्लोबल कम्पनीज के विपरीत इसे ग्रोथ मिली, एक बहुत ही छोटे ग्रुप द्वारा इन्वेस्टमेंट से कपनी के शेयर्स की ट्रेडिंग बहुत ही कम मात्रा में होना, कंपनी पर स्टॉक मैनीपुलेशन के सवाल खड़ा करता है. इस कहानी में फ्रॉड की संभावना को समझने के लिए हमें ग्लोबल फाइनेंशियल मार्केट्स के मैकेनिज्म और उपकरणों के साथ साथ हमारे रेगुलेशंस में लूपहोल्स को भी समझना होगा. जैसा हमने 2008 की ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस के समय पर देखा था, स्ट्रक्चर्ड उत्पादों के डेरिवेटिव्स को दुनिया भर में बहुत सी थीम्स, एसेट क्लासेज, और टोटल रिटर्न स्वैप्स जैसी रणनीतियों समेत, अंतर्राष्ट्रीय बैंकों और ब्रोकरेज के द्वारा ज्यादा बड़ी HNI (हाई नेट इनकम) के लिए बेचा जाता है. इन केसों में असली मालिक की पहचान अस्पष्ट ही रहती है. हमारी मार्केट्स में ऐसे उपकरणों को बहुत ही आराम से लाया जा सकता है जिसके लिए हमारे देश में PN (पार्टिसिपेटरी नोट्स) जैसी व्यवस्था बहुत ही आरामदायक है और इसे कई दशकों से मंजूरी मिली हुई है.
FPI कैसे है लूपहोल
इस तरह भारत में PN व्यवस्था होने की वजह से FPI (फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट) का रास्ता अभी भी खुला हुआ है और यह एक ऐसा लूपहोल है जिसका इस्तेमाल दुनिया भर के इन्वेस्टर्स मार्केट को ऊपर ले जाने या नीचे लाने के लिए करते रहते हैं. अगर मान लिया जाए कि FPO लाने से पहले कैपिटल इकठ्ठा करने के लिए अडानी ग्रुप ऑफ कम्पनीज के स्टॉक्स को जानबूझकर ऊपर ले जाया गया था तो मॉरिशस के रास्ते मल्टी-लेयर्ड इन्वेस्टमेंट स्ट्रक्चर लाने कि बजाय बहुत आराम से PN का इस्तेमाल किया जा सकता था. साल 2000 की शुरुआत से की गयी PN इन्वेस्टमेंट्स की वजह से पैदा हुई विकृतियों के मुकाबले इस मामले में सिर्फ स्केल (3 सालों में 800% से ज्यादा) ही बाकी मामलों की तुलना में बहुत ज्यादा है, लेकिन फिर छोटा सोचना तो अडानी के DNA में ही नहीं है. इसी तरह यह भी माना जा सकता है कि कंपनी के शेयर्स को नीचे लाने के लिए भी इसी तकनीक का इस्तेमाल किया गया होगा और हिंडनबर्ग की रिपोर्ट को ट्रिगर के रूप में इस्तेमाल किया गया होगा.
SEBI और RBI के क्षेत्रों में भी हैं समस्याएं
लेकिन बदकिस्मती से एक फ्री मार्केट में ऐसा ही होता है. कैपिटल इकठ्ठा करने के बारे में सोचने के दौरान अडानी ग्रुप ने इस जोखिम के बारे में नहीं सोचा होगा कि PN फ्लोस दोनों ही तरफ काम करते हैं. और क्योंकि 75% शेयर्स के मालिक खुद अडानी ही हैं (दोस्तों, एसोसिएट्स, और LIC जैसी निष्क्रिय संस्थाओं द्वारा 10% से 15% अतिरिक्त शेयर्स भी इन के पास ही हैं) तो ऐसी स्थिति में सबसे लॉजिकल अनुमान यही लगता है कि PN द्वारा विदेशी पार्टिसिपेंट्स की मदद से ग्रुप पर हमला किया गया होगा. इंडिया में PN द्वारा इतनी बड़ी शॉर्ट सेलिंग पहले कभी नहीं देखि गयी है. इसके अलावा स्टॉक्स की शॉर्ट सेलिंग की मांग करने वाली एक्टिविस्ट एनालिस्ट रिपोर्टें भी अनूठी नहीं हैं, लेकिन इन रिपोर्टों से असली कीमत पर तब तक असर नहीं पड़ता जब तक उनके रिलीज होने की टाइमिंग को मार्केट में भाग लेने वालों के द्वारा की जा रही शॉर्ट सेलिंग की बड़ी मांगों के साथ बिलकुल परफेक्ट तरीके से मैच न किया जाए. मार्केट में भाग लेने वाले ये लोग कौन हो सकते हैं, ये करोड़ों खरबों रुपये का सवाल है. साथ ही, इंडियन मार्केट्स में स्टॉक्स की लिक्विडिटी को देखते हुए, फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट्स, पुट ऑप्शंस और डीप आउट ऑफ द मनी पुट ऑप्शंस ऐसे डोमेस्टिक उपकरण हैं जिनका इस्तेमाल इन ब्रोकरेज को विदेशी प्रभाव से बचाने और इनके प्रॉफिट के लिए किया जाता रहा है. इनके और इनके लाभकारी मालिकों के बारे में आसानी से जानकारी मिल सकती है. ये सभी समस्याएं SEBI और RBI के क्षेत्रों में आती हैं इसलिए हमें इनसे जवाब की उम्मीद बनाकर रखनी चाहिए.
रेगुलेशंस में हैं ये समस्याएं
अब हम बात करेंगे रेगुलेशंस से जुड़ी समस्याओं के बारे में. अडानी ग्रुप के स्टॉक्स को इतनी ज्यादा ऊंचाई तक ले जाने वाले मुख्य कारणों में से एक इंडिया में स्टॉक डेरिवेटिव्स के अलावा स्टॉक्स की शॉर्ट सेलिंग को अनुमति न देना है. इंडिया में स्टॉक की शॉर्ट सेलिंग के लिए केवल सिक्योरिटीज बोर्रोविंग एंड लेंडिंग मैकेनिज्म SLB है, जिसे बहुत ही ध्यान से इस्तेमाल करना पड़ता है और यह बहुत ही भारी मैकेनिज्म है. ज्यादातर के लिए इंडिया केवल एक ‘लॉन्ग ओनली मार्केट’ है. शोर्ट सेलर्स के लिए हमारे दिलों में जो गुस्सा और नफरत है वह गलत है. हमें इस बात को समझना चाहिए कि शोर्ट सेलर्स ऐसे हालातों में फाइनेंशियल मार्केट्स को बैलेंस करने का काम करते हैं. इसीलिए, मुझे लगता है कि जो भी हुआ वो हमारे रेगुलेशंस के बीच स्थित स्ट्रक्चरल गैप की वजह से हुआ. न तो अडानी और न ही विदेशी इन्वेस्टर्स अपने फायदे के लिए इन लूपहोल्स का ढंग से इस्तेमाल कर पाए. जहां अडानी ने कैपिटल इकठ्ठा करने के लिए अपने स्टॉक की कीमतों को बढ़ाया. वहीं, विदेशी इन्वेस्टर्स ने अडानी द्वारा इंडियन मार्केट में शेयर्स की ओवर-प्राइसिंग की मदद से ऊपर उठाये गए आरबिट्रेज को खराब कर दिया, हां इस सबकी कीमत कुछ इंडियन इन्वेस्टर्स को भी चुकानी पड़ी.
कम फ्लोटिंग स्टॉक्स और अस्थिर सिक्योरिटीज
स्ट्रक्चर के अनुसार भी अडानी ग्रुप ने इस तबाही को एक परफेक्ट मौके के रूप में पेश किया था. अडानी के पास बहुत ही कम फ्लोटिंग स्टॉक्स हैं क्योंकि सीमेंट जुड़वा (ACC और अम्बुजा) के अलावा 70% से 74% तक स्टॉक्स आधिकारिक रूप से प्रमोटर्स की होल्डिंग्स हैं. एक ठीक ठाक अंदाजा लगाएं, तो पता चलता है कि दोस्तों और एसोसिएट्स के पास 5% से 7% और LIC जैसी निष्क्रिय संस्था के पास लगभग 5% शेयर्स होंगे जिसके बाद मार्केट में एक्टिव ट्रेडिंग के लिए केवल 10% से 15% हिस्सा ही बचता है. कुछ ही लिस्टेड एंटिटीज वाला यह कैपिटल स्ट्रक्चर, अधिग्रहण की स्थिति में प्रमोटर्स के लिए एक सुरक्षा कवच साबित होता है. लेकिन साथ ही यह सिक्योरिटीज कम फ्लोटिंग स्टॉक्स की वजह से बहुत ही अस्थिर भी होती हैं. इंटरेस्टेड और कॉनसनट्रेटेड खरीदी या बिक्री होने पर इन सिक्योरिटीज के ऊपर स्टॉक मैनीपुलेशन के आरोप भी लगाए जा सकते हैं. हिंडनबर्ग ने अडानी के स्टॉक्स पर बढ़ते हुए यही आरोप लगाया था और जब स्टॉक में एक बड़ी गिरावट देखने को मिली तब उसका मूल कारण भी यही होना चाहिए था. मुख्य पॉइंट यही है कि स्टॉक्स में ऐसी मूवमेंट के दौरान हमें एक व्यक्ति चाहिए होता है जिसे मार्केट की बोलचाल में ‘जॉकी’ कहा जाता है. यह व्यक्ति शुरूआती गति को बनाये रखता है और स्टॉक्स के ऊपर जाने या नीचे आने पर उनकी गति को संतुलित करता है. यह सब अपने आप नहीं हो सकता. इस मामले में प्रमुख सामजिक कम्पनीज का उदाहरण देखा जा सकता है जिनकी गवर्नेंस बेदाग और शुद्ध है. विप्रो जैसी कंपनी, जिसके 85% से 90% स्टॉक्स प्रमोटर्स, एसोसिएट्स, और ट्रस्ट्स के पास हैं लेकिन फिर भी उसके स्टॉक्स ने कभी उपर जाते हुए या नीचे उतरते हुए बहुत वाइल्ड घुमाव नहीं देखा है. इसके पीछे एक ही प्रमुख कारण है और वो है प्रमोटर्स की विश्वसनीयता और फाइनेंशियल स्टेटमेंट्स में अटूट विश्वास.
सर्जिकल स्ट्राइक में पकड़ा गया अडानी ग्रुप
इस स्ट्राइक की सीक्रेसी और सुनिश्चितता को देखते हुए इसे एक मिलिट्री ऑपरेशन से कम नहीं कहा जा सकता. बहुत ही सुव्यवस्थित तरीके से प्लान्ड, जबरदस्त टाइमिंग, और शानदार ढंग से लागू किये गए इस Kamikaze Attack में अगर कोई अडानी को ऑफ गार्ड पकड़ सकता था तो वो यह फैक्ट था कि इंडिया में इस ग्रुप के सामने खड़े होने की कोई हिम्मत नहीं करेगा. और आगे चलकर इसी बेशर्मी या कहें ओवर कॉन्फिडेंस की बदौलत विदेशी किनारों से हुई सर्जिकल स्ट्राइक में अडानी ग्रुप को नींद के दौरान ही दबोच लिया गया. जॉकी कौन था यह जानना बहुत ही जरूरी है लेकिन इस घटना ने इंडिया की फाइनेंशियल मार्केट्स को इन फैसलों से पैदा हुए खतरों से इंट्रोड्यूस किया है और साथ ही आने वाले समय में समान लक्षणों वाली ऐसी और अधिक एन्टिटीज के लिए संभावनाओं को भी खोला है. इसीलिए PN व्यवस्था पर रेगुलेशन को एलिमिनेट न सही पर कसने की जरूरत तो है ही. इसके साथ साथ रेगुलेटर्स द्वारा कहानी के फेज 1 को तीन सालों तक भरी रोशनी में चलाने की अनुमति देने पर उनकी जवाबदेही को भी कसना होगा.
डेमोक्रेसी में जरूरी है जवाबदेही
मुझे देश के लेवल पर किसी कॉर्पोरेट गवर्नेंस के मुद्दे से कोई परेशानी नहीं है. बहुत अच्छे तरीके से नियंत्रित किए जाने वाले US और यूरोप के बाजारों ने भी बिजनेसों को सिस्टम के साथ खिलवाड़ करते देखा है. Enron (एनरोन) से लेकर बर्नी मैडऑफ (Bernie Madoff), Theranos (थेरानोस) और Wirecard (वायरकार्ड) जैसे नामों से बनी यह लिस्ट बहुत ही लम्बी है. लेकिन पिछले कुछ सालों के दौरान यह होने के बाद जो चीज सबसे जरूरी रही है वह है लूपहोल्स को बंद करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति और जवाबदेही को ठीक करना. संसद में अडानी स्टॉक की कीमतों को अप्राकृतिक बढ़ावा दिए जाने पर लगातार सवाल उठते रहे हैं. इसके साथ ही जोश से भरी हमारी MP (सांसद) महुआ मोइत्रा द्वारा SEBI, CVC और ED जैसी एजेंसिस को बार बार लिखे गए पत्रों को साल 2019 से ही इग्नोर किया जा रहा है. महुआ मोइत्रा ने वही काम किया जो सभी सांसदों को करना तो चाहिए लेकिन ज्यादातर कर नहीं पाते. ऐसा एक डेमोक्रेसी में संभव है यह कमेन्ट बहुत ही परेशान करने वाला है और साथ ही जवाबदेही के लिए हमारे संसद के सिस्टम की प्रधानता पर भी सवाल उठाता है. अडानी बोर्ड और CFO/CEO द्वारा रिलेटेड पार्टी ट्रांजेक्शन की तरफ से इग्नोरेंस और इन्वेस्टर्स की अस्पष्टता वाली बात मानना थोड़ा मुश्किल है हालांकि तकनीकी तौर पर यह नहीं कहा जा सकता कि बोर्ड और CFO/CEO अनुपालन नहीं कर रहे हैं.
अडानी के लिए भविष्य की यात्रा होगी मुश्किल
घोर कैपिटलिज्म की बात करें तो इस घटना पर अभी संसद चुप है और बेहतर यही होगा कि इस समस्या का समाधान वहीं हो. लेकिन हिंडनबर्ग एपिसोड से नुक्सान हो चुका है. इससे अडानी को विश्व भर में इक्विटी और डेब्ट के रूप में कैपिटल इकठ्ठा करने में मुश्किल होगी क्योंकि क्रेडिट एजेंसिस ने कंपनी को डाउनग्रेड कर दिया है और MSCI जैसे निष्क्रिय सूचकांकों से भी कंपनी को बाहर कर दिया गया है. और कंपनी के बिजनेस मॉडल को देखते हुए कैपिटल के फ्लो पर इसकी निर्भरता, भविष्य में इसकी ग्रोथ और रिटर्न्स की उम्मीदों में बदलाव करने होंगे. कंपनी के लिए अच्छी बात है कि उसके पास कैश फ्लो के पॉजिटिव बिजनेस और जमीनी स्तर पर एसेट्स हैं. आगे की मुश्किल यात्रा में सबसे जरूरी चीज कंपनी की मैनेजमेंट एफिशिएंसी है. कंपनी के स्टॉक्स की कीमतों में बीच टर्म में देखने को मिलेगा कि वह हिंडनबर्ग रिपोर्ट के आने से पहले वाले लेवल के मुकाबले कम पर ही सेटल हो जायेंगी.
देश की राजनीति पर क्या होगा असर?
राजनीति के सम्बन्ध में बात करें तो इस घटना से राजनीतिक आउटकम पर किसी भी प्रकार का असर नहीं पड़ेगा क्योंकि मोदी सरकार ने मुश्किल समय में फॉरेन पॉलिसी डेब्ट की हैंडलिंग, गरीबों और वंचितों के उत्थान के लिए इकॉनोमिक और सामाजिक पॉलिसी में बदलाव जैसे अनेक क्षेत्रों में शानदार परफॉर्म किया है. पूरी मार्केट पर इस घटना का गहरा असर पड़ेगा खासकर बीच टर्म में जब PN व्यवस्था को हटाया जाएगा या उसको बदला जाएगा. हमारे हाई वैल्यूएशन और कैपिटल की कीमतों में होती वृद्धि की बदौलत यह तीसरी बार होगा जब मार्केट में तेजी को रोका जाएगा. लेकिन मैं मानता हूं कि जिस देश में कानूनी तौर पर धारक बांड्स का इस्तेमाल राजनीतिक पार्टियों को फण्ड करने के लिए किया जाता है वहां PN जैसे अस्पष्ट उपकरणों पर प्रतिबन्ध लगाने या उन्हें रोकने के लिए कोई खास बड़े फैसले नहीं लिए जायेंगे. बुल मार्केट्स में हमारे राजनीतिक और कॉर्पोरेट स्टेक के चलते आने वाले समय में हमें शॉर्ट सेलिंग की अनुमति नहीं मिलेगी. इसीलिए हमारी मार्केट्स में उपलब्ध ये कैसिनो ऐसे ही चलते रहेंगे क्योंकि हम सच जानते तो हैं लेकिन उसको संभाल पाने में असमर्थ हैं या कहें उसे समझना नहीं चाहते.
साफ इमेज और भ्रष्टाचार मिटाने के नारे को बनाये रखने के लिए प्रधानमंत्री मोदी को अपने स्टाइल के अनुसार दृढ़ निश्चय करते हुए दिखना होगा. और मुझे आने वाले कुछ हफ्तों में सरकार और रेगुलेटर्स से ठोस एक्शन की उम्मीद है. क्या हमें हमारे खोखले हो चुके संस्थानों पर विश्वास करना चाहिए या नहीं इस सवाल का जवाब वक्त ही देगा. ये इस बात पर भी निर्भर करेगा कि क्या हम इस घटना से कुछ सीख पाए या नहीं और क्या हमने हिम्मत करके हकीकत से डील किया या नहीं. तब तक एक से ज्यादा तरीकों में हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बम अडानी पर मंडराते रहेंगे.
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इस प्रस्तावित कानून का उद्देश्य अचल संपत्तियों को ब्लॉकचेन तकनीक के जरिए टोकनाइज करने के लिए एक मजबूत कानूनी ढांचा तैयार करना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
महाराष्ट्र सरकार जमीन और अचल संपत्तियों के लेन-देन को डिजिटल बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रही है. राज्य ब्लॉकचेन आधारित लैंड टोकनाइजेशन के लिए देश का पहला कानूनी ढांचा तैयार करने की तैयारी में है. प्रस्तावित कानून के तहत जमीन की जानकारी और संपत्ति के मूल्य को डिजिटल टोकन में बदला जा सकेगा, जिससे प्रॉपर्टी ट्रांजैक्शन में पारदर्शिता बढ़ने के साथ प्रक्रिया भी तेज हो सकती है.
महाराष्ट्र डिजिटाइजेशन एंड एक्सचेंज ऑफ लैंड टोकन एसेट’ अधिनियम का काम शुरू
महाराष्ट्र सरकार ने ‘महाराष्ट्र डिजिटाइजेशन एंड एक्सचेंज ऑफ लैंड टोकन एसेट’ (DELTA) अधिनियम की दिशा में कदम बढ़ा दिया है. इस प्रस्तावित कानून का उद्देश्य अचल संपत्तियों को ब्लॉकचेन तकनीक के जरिए टोकनाइज करने के लिए एक मजबूत कानूनी ढांचा तैयार करना है. टोकनाइजेशन एक ऐसी डिजिटल प्रक्रिया है, जिसमें किसी वास्तविक संपत्ति या उसकी जानकारी को डिजिटल टोकन में बदला जाता है. ब्लॉकचेन तकनीक की मदद से इन डिजिटल रिकॉर्ड को सुरक्षित और पारदर्शी तरीके से दर्ज किया जा सकता है.
जमीन की छिपी वैल्यू को सामने लाने की कोशिश
राज्य सरकार का मानना है कि जमीन जैसी अचल संपत्तियों की वास्तविक क्षमता और छिपे हुए मूल्य को सामने लाकर नए आर्थिक अवसर तैयार किए जा सकते हैं. महाराष्ट्र का लक्ष्य साल 2030 तक 1 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का है और इस दिशा में सरकार नए राजस्व स्रोतों की तलाश कर रही है.
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की अध्यक्षता में हुई बैठक में प्रस्तावित कानून के मसौदे पर चर्चा की गई. मुख्यमंत्री कार्यालय के अनुसार, फडणवीस ने अधिकारियों को ऐसा कानूनी ढांचा तैयार करने के निर्देश दिए हैं, जिसमें ब्लॉकचेन आधारित प्रॉपर्टी ट्रांजैक्शन को स्पष्ट कानूनी मान्यता मिल सके.
SEBI, BSE और NSE के विशेषज्ञों वाली समिति बनाएगी सरकार
सरकार इस कानून का विस्तृत मसौदा तैयार करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करेगी. इसमें भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI), बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE), नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के प्रतिनिधियों के अलावा ब्लॉकचेन और एसेट टोकनाइजेशन क्षेत्र के विशेषज्ञ शामिल होंगे.
प्रस्तावित व्यवस्था के तहत अचल संपत्तियों को उनके वास्तविक मूल्य के आधार पर डिजिटल टोकन में बदला जा सकेगा. इन टोकन के जरिए ब्लॉकचेन प्लेटफॉर्म पर लेन-देन संभव होगा.
प्रॉपर्टी डील और लोन प्रक्रिया हो सकती है आसान
सरकार का कहना है कि इस व्यवस्था से जमीन के मालिकाना हक को लेकर स्पष्टता बढ़ेगी और संपत्ति से जुड़े लेन-देन ज्यादा सुरक्षित और तेज हो सकेंगे. इसके अलावा संपत्ति को बैंक लोन के लिए गिरवी रखने की प्रक्रिया भी आसान हो सकती है.
महाराष्ट्र सरकार का मानना है कि टोकनाइजेशन से प्रॉपर्टी मालिक अपनी संपत्ति के वास्तविक मूल्य का बेहतर इस्तेमाल कर सकेंगे और बाजार में नई तरह की वित्तीय गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा.
अंतरराष्ट्रीय नियमों का अध्ययन करेगी सरकार
मुख्यमंत्री फडणवीस ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि कानून को अंतिम रूप देने से पहले दुनिया भर में एसेट टोकनाइजेशन से जुड़े नियमों और मॉडलों का अध्ययन किया जाए. अगर महाराष्ट्र इस प्रस्ताव को लागू करता है तो वह ब्लॉकचेन आधारित जमीन टोकनाइजेशन के लिए कानूनी ढांचा तैयार करने वाला देश का पहला राज्य बन सकता है. सरकार का कहना है कि यह कदम शासन व्यवस्था में नई तकनीक के इस्तेमाल और आर्थिक विकास को गति देने में मदद करेगा.
पूर्व बीएसई चेयरमैन, चार्टर्ड अकाउंटेंट और कॉरपोरेट गवर्नेंस विशेषज्ञ एस. रवि ने पिछले चार दशकों में भारतीय वित्तीय संस्थानों को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
कुछ करियर सुर्खियों में रहकर बनते हैं, जबकि कुछ संस्थानों को भीतर से मजबूत करने के लिए शांत और निरंतर काम करते हुए. एस. रवि (सेथुरथनम रवि) का चार दशक लंबा करियर इसी दूसरी श्रेणी का उदाहरण है. भारतीय वित्तीय व्यवस्था में जब-जब भरोसे और पारदर्शिता की जरूरत महसूस हुई, तब-तब उन्होंने कॉरपोरेट गवर्नेंस, नियामकीय अनुपालन और संस्थागत सुधारों के जरिए अहम भूमिका निभाई. आज एस रवि अपना जन्मदिन मना रहे हैं, उनका सफर भारतीय वित्तीय संस्थानों को मजबूत बनाने की कहानी के रूप में देखा जाता है. तो चलिए इस खास मौके पर उनकी पेशेवर यात्रा और योगदान के बारे में विस्तार से जानते हैं.
सटीकता और अनुशासन से हुई करियर की शुरुआत
एस. रवि ने जबलपुर और भोपाल से अपनी शिक्षा प्राप्त की. उन्होंने फेलो चार्टर्ड अकाउंटेंट (FCA) के रूप में प्रशिक्षण लिया और सूचना प्रणाली ऑडिट (Information Systems Audit) तथा दिवाला एवं अक्षमता (Insolvency) जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता हासिल की. ऐसे समय में, जब कॉरपोरेट गवर्नेंस पर ज्यादा चर्चा नहीं होती थी, उन्होंने तकनीक, अनुपालन और वित्तीय अनुशासन के संगम पर अपनी पहचान बनाई.
पंजाब एंड सिंध बैंक में निभाई अहम जिम्मेदारी
साल 2003 में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और भारत सरकार ने उन्हें पंजाब एंड सिंध बैंक के बोर्ड में शामिल किया. उस समय सार्वजनिक क्षेत्र का यह बैंक परिचालन और अनुपालन से जुड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा था. एस. रवि ने बैंक में परिचालन सुधार, नियामकीय अनुपालन और पुनर्गठन की प्रक्रिया को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. यह जिम्मेदारी भले ही सुर्खियों में नहीं रही, लेकिन संस्थान की मजबूती के लिए बेहद अहम साबित हुई.
बीएसई में किया आधुनिकीकरण का नेतृत्व
साल 2017 से 2019 तक उन्होंने बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) के चेयरमैन के रूप में कार्य किया. उनके कार्यकाल में डिजिटल ट्रेडिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को आधुनिक बनाने, कॉरपोरेट गवर्नेंस मानकों को मजबूत करने और छोटे एवं मझोले उद्यमों (SMEs) तथा स्टार्टअप्स के लिए पूंजी बाजार तक पहुंच आसान बनाने पर विशेष जोर दिया गया. उनका फोकस अल्पकालिक उपलब्धियों की बजाय संस्थागत मजबूती पर रहा.
कई प्रमुख कंपनियों के बोर्ड में निभाई भूमिका
एस. रवि निजी क्षेत्र में भी लंबे समय से सक्रिय हैं. वह रवि राजन एंड कंपनी LLP के मैनेजिंग पार्टनर हैं, जहां वे कंपनियों को जोखिम प्रबंधन, नियामकीय अनुपालन और विकास रणनीति पर सलाह देते हैं. इसके अलावा वह ONGC, IDBI बैंक, आदित्य बिड़ला कैपिटल, उषा मार्टिन और PCBL सहित 45 से अधिक कंपनियों के बोर्ड में विभिन्न जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. ऊर्जा, बैंकिंग, विनिर्माण और पूंजी बाजार जैसे विविध क्षेत्रों में उनका अनुभव उन्हें कॉरपोरेट गवर्नेंस के प्रमुख विशेषज्ञों में शामिल करता है.
नए दौर के वित्तीय मुद्दों पर भी सक्रिय
एस. रवि आज भी वित्तीय क्षेत्र से जुड़े समकालीन मुद्दों पर सक्रिय रूप से अपनी राय रखते हैं. फिनटेक, डिजिटल फाइनेंस, सतत और नैतिक निवेश (Sustainable & Ethical Investing), क्रिप्टोकरेंसी विनियमन तथा ESG (Environmental, Social and Governance) मानकों जैसे विषयों पर उनकी विशेषज्ञता उद्योग जगत में महत्वपूर्ण मानी जाती है.
संस्थानों को मजबूत बनाने वाली विरासत
67 वर्ष की उम्र में एस. रवि की पेशेवर यात्रा यह बताती है कि किसी भी मजबूत वित्तीय व्यवस्था की नींव केवल बड़े फैसलों से नहीं, बल्कि वर्षों तक लगातार किए गए सुधारों, पारदर्शिता और जवाबदेही से तैयार होती है. भारतीय वित्तीय क्षेत्र में उनका योगदान इसी संस्थागत मजबूती और भरोसे की विरासत के रूप में याद किया जाता है.
ट्रंप के मुताबिक, यह चरणबद्ध टैरिफ व्यवस्था इसलिए बनाई गई है ताकि फार्मास्युटिकल कंपनियों को अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग प्लांट और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर स्थापित करने के लिए पर्याप्त समय मिल सके. उन्हों
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जेनेरिक दवाओं के आयात को लेकर नई टैरिफ नीति की घोषणा की है. इसके तहत 1 अगस्त 2026 से अगले दो वर्षों तक अमेरिका में आयात होने वाली जेनेरिक दवाओं पर कोई आयात शुल्क नहीं लगेगा. हालांकि, इसके बाद एक वर्ष के लिए 100% और फिर 200% तक टैरिफ लगाया जाएगा. ट्रंप का कहना है कि इस नीति का उद्देश्य दवा कंपनियों को अमेरिका में उत्पादन इकाइयां स्थापित करने के लिए समय देना और घरेलू फार्मा विनिर्माण को बढ़ावा देना है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए इस नई नीति की घोषणा की. उन्होंने कहा कि 1 अगस्त 2026 से अमेरिका में आयात होने वाली सभी जेनेरिक दवाओं पर दो वर्षों तक शून्य (0%) टैरिफ लागू रहेगा. इसके बाद तीसरे वर्ष में 100% आयात शुल्क लगाया जाएगा और उसके बाद इसे बढ़ाकर 200% कर दिया जाएगा.
विदेशी उत्पादन पर कम होगी निर्भरता
ट्रंप के मुताबिक, यह चरणबद्ध टैरिफ व्यवस्था इसलिए बनाई गई है ताकि फार्मास्युटिकल कंपनियों को अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग प्लांट और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर स्थापित करने के लिए पर्याप्त समय मिल सके. उन्होंने कहा कि इससे विदेशी उत्पादन पर निर्भरता कम होगी और अमेरिका में जेनेरिक दवाओं का निर्माण दोबारा मजबूत होगा.
ट्रंप ने अपने पोस्ट में लिखा, "यह कदम अमेरिका में जेनेरिक दवा उत्पादन को फिर से स्थापित करने के लिए उठाया गया है." उन्होंने यह भी कहा कि जो कंपनियां निर्धारित समय के भीतर अमेरिका में उत्पादन इकाइयां स्थापित नहीं करेंगी, उन्हें बाद में 100% और फिर 200% तक आयात शुल्क का सामना करना पड़ेगा.
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह नई नीति केवल जेनेरिक दवाओं पर लागू होगी. पेटेंट, ब्रांडेड और इनोवेटिव दवाओं से जुड़ी मौजूदा नीति में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा. ट्रंप ने कहा कि इन दवाओं के लिए लागू मौजूदा व्यवस्था सफल रही है और इसे यथावत रखा जाएगा.
ट्रंप का दावा
ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका भर में अभूतपूर्व गति से नई फार्मास्युटिकल विनिर्माण इकाइयां स्थापित की जा रही हैं, हालांकि उन्होंने इस संबंध में कोई विस्तृत जानकारी साझा नहीं की.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम ट्रंप प्रशासन की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत रणनीतिक क्षेत्रों में घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए टैरिफ का इस्तेमाल किया जा रहा है. फार्मास्युटिकल सेक्टर भी इन्हीं रणनीतिक क्षेत्रों में शामिल है.
इस नीति का सबसे बड़ा असर वैश्विक जेनेरिक दवा निर्यातकों पर पड़ सकता है. खासकर भारत जैसे देशों पर, जो अमेरिका को जेनेरिक दवाओं के सबसे बड़े निर्यातकों में शामिल हैं. यदि कंपनियां अमेरिका में उत्पादन नहीं बढ़ाती हैं, तो भविष्य में बढ़े हुए टैरिफ का असर उनके निर्यात और प्रतिस्पर्धात्मकता पर पड़ सकता है. फिलहाल व्हाइट हाउस ने इस नीति के क्रियान्वयन, संभावित छूट या किन उत्पादों और देशों को राहत मिल सकती है, इससे जुड़े विस्तृत दिशा-निर्देश जारी नहीं किए हैं.
सरकार ने संसद में बताया कि इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम के तहत सरकारी तेल कंपनियों ने तीन इथेनॉल सप्लाई वर्षों में 1.72 लाख करोड़ रुपये से अधिक मूल्य का इथेनॉल खरीदा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्र सरकार के इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम को गति देने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) ने पिछले तीन इथेनॉल सप्लाई वर्षों (ESY) में इथेनॉल की खरीद पर 1.72 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए हैं. सरकार ने संसद में बताया कि इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम के तहत घरेलू स्तर पर गन्ने और अनाज से तैयार फ्यूल-ग्रेड इथेनॉल की खरीद लगातार बढ़ रही है, जिससे आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने और स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने में मदद मिल रही है.
राज्यसभा में एक लिखित जवाब में पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने बताया कि सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों ने इथेनॉल सप्लाई ईयर (ESY) 2023-24 में 48,757 करोड़ रुपये, ESY 2024-25 में 73,996 करोड़ रुपये और ESY 2025-26 में जून तक 49,577 करोड़ रुपये मूल्य का इथेनॉल खरीदा. इस तरह तीन वर्षों में कुल खरीद 1.72 लाख करोड़ रुपये से अधिक रही.
501 इथेनॉल निर्माण इकाइयां हुईं पंजीकृत
मंत्री ने बताया कि 16 जुलाई 2026 तक इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल कार्यक्रम के तहत डिनेचर्ड एनहाइड्रस इथेनॉल की आपूर्ति के लिए 501 इथेनॉल निर्माण इकाइयों का पंजीकरण किया जा चुका है. उन्होंने कहा कि सरकारी तेल कंपनियां घरेलू स्रोतों से इथेनॉल खरीदती हैं. इसके लिए गन्ने से प्राप्त C-हेवी और B-हेवी शीरा (Molasses), गन्ने का रस, शुगर सिरप तथा अनाज आधारित फीडस्टॉक जैसे खराब अनाज, भारतीय खाद्य निगम (FCI) का अतिरिक्त चावल और मक्का का उपयोग किया जाता है.
OMCs खुद भी कर रही हैं इथेनॉल का उत्पादन
सरकार के अनुसार, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOCL), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) की सहायक कंपनी HPCL बायोफ्यूल्स लिमिटेड भी फ्यूल-ग्रेड इथेनॉल का उत्पादन कर रही हैं.
IOCL की उत्पादन क्षमता 228 किलोलीटर प्रतिदिन है और उसने ESY 2025-26 में 30 जून तक 712 किलोलीटर इथेनॉल का उत्पादन किया. BPCL की क्षमता 200 किलोलीटर प्रतिदिन है और उसने 76 किलोलीटर उत्पादन किया. वहीं HPCL बायोफ्यूल्स की दैनिक क्षमता 120 किलोलीटर है और उसने इस अवधि में 9,373 किलोलीटर इथेनॉल का उत्पादन किया.
इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की बिक्री में उत्तर प्रदेश अव्वल
सरकार ने बताया कि ESY 2024-25 के दौरान इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की सबसे अधिक बिक्री उत्तर प्रदेश में हुई, जहां 124.98 करोड़ लीटर पेट्रोल की बिक्री दर्ज की गई. इसके बाद महाराष्ट्र (110.66 करोड़ लीटर), तमिलनाडु (92.18 करोड़ लीटर), कर्नाटक (79.24 करोड़ लीटर) और गुजरात (56.29 करोड़ लीटर) का स्थान रहा. सरकार का कहना है कि पंजीकृत सप्लायर नेटवर्क और घरेलू उत्पादन क्षमता में लगातार वृद्धि से देशभर में इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल कार्यक्रम के विस्तार को मजबूती मिल रही है.
नए इंडेक्स में केवल उन कंपनियों को जगह दी गई है जो कारोबार में अहिंसा और नैतिकता के सिद्धांतों पर खरी उतरती हैं. इसका उद्देश्य निवेशकों को एथिकल इन्वेस्टिंग के लिए नया बेंचमार्क उपलब्ध कराना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में नैतिक और जिम्मेदार निवेश को बढ़ावा देने के लिए नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) ने 'निफ्टी 500 अहिंसा इंडेक्स' लॉन्च किया है. इस इंडेक्स में निफ्टी 500 की केवल उन्हीं कंपनियों को शामिल किया गया है, जिनका कारोबार अहिंसा के सिद्धांतों के अनुरूप माना गया है और जो अपने उत्पादों, सेवाओं या व्यावसायिक गतिविधियों के जरिए जानबूझकर पशुओं को नुकसान नहीं पहुंचाती हैं. NSE ने इस इंडेक्स को Ahimsagain Foundation के सहयोग से उसके 'अहिंसा इन्वेस्टमेंट मूवमेंट (AIM)' फ्रेमवर्क के तहत विकसित किया है.
क्या है अहिंसा इन्वेस्टमेंट मूवमेंट (AIM)?
NSE के मुताबिक, AIM फ्रेमवर्क किसी कंपनी के उत्पादों, सेवाओं और कारोबारी प्रक्रियाओं का मूल्यांकन करता है और यह जांचता है कि वे अहिंसा और नैतिक व्यावसायिक आचरण के सिद्धांतों के कितने अनुरूप हैं. इसी आधार पर कंपनियों को इंडेक्स में शामिल या बाहर रखा जाता है. यह इंडेक्स एसेट मैनेजर्स के लिए एक बेंचमार्क के रूप में काम करेगा, जिसके आधार पर एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ETF), इंडेक्स फंड और अन्य निवेश उत्पाद विकसित किए जा सकेंगे.
तीन श्रेणियों में होता है मूल्यांकन
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, कंपनियों को ग्रीन, ऑरेंज और रेड श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है. 'ऑरेंज' और 'रेड' श्रेणी में आने वाली कंपनियों को इस इंडेक्स में शामिल नहीं किया गया है, जबकि 'ग्रीन' श्रेणी की कंपनियों को जगह मिली है.
किन कंपनियों को मिली जगह, कौन बाहर?
NSE Indices की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, निफ्टी 500 अहिंसा इंडेक्स में किसी भी बैंकिंग कंपनी या रिलायंस समूह की किसी कंपनी को शामिल नहीं किया गया है. वहीं, सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी), ऑटोमोबाइल, रियल एस्टेट और कई अन्य क्षेत्रों की कंपनियों को इस इंडेक्स में स्थान मिला है.
Ahimsagain Foundation का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य निवेश को करुणा, दया और जिम्मेदार कारोबारी मूल्यों की ओर प्रोत्साहित करना है. संस्था का मानना है कि नैतिक निवेश को प्राथमिकता देने वाले निवेशकों के लिए अब तक स्पष्ट विकल्पों की कमी थी, जिसे यह इंडेक्स दूर करने का प्रयास करेगा.
मंगलवार को बीएसई सेंसेक्स 238.41 अंक यानी 0.31% गिरकर 77,470.11 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 50.80 अंक यानी 0.21% टूटकर 24,187.70 पर आ गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में बुधवार को कमजोर शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं. GIFT Nifty करीब 79 अंक की गिरावट के साथ 24,102 के स्तर पर कारोबार करता दिखा, जिससे संकेत है कि घरेलू बाजार दबाव के साथ खुल सकते हैं. पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के कारण निवेशकों का रुख सतर्क बना हुआ है. मंगलवार को भी घरेलू बाजार लगातार दूसरे कारोबारी सत्र में गिरावट के साथ बंद हुए थे.
मंगलवार को बीएसई सेंसेक्स 238.41 अंक यानी 0.31% गिरकर 77,470.11 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 50.80 अंक यानी 0.21% टूटकर 24,187.70 पर आ गया. कारोबार के दौरान सेंसेक्स 300 अंक से अधिक और निफ्टी 24,100 के करीब तक फिसल गया था.
HDFC बैंक, रिलायंस और SBI ने बढ़ाया दबाव
सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 10 गिरावट के साथ बंद हुए. HDFC बैंक में 2% से अधिक की गिरावट दर्ज की गई. इसके अलावा रिलायंस इंडस्ट्रीज, भारतीय स्टेट बैंक (SBI), टीसीएस, इंफोसिस, पावर ग्रिड और ट्रेंट के शेयरों में भी बिकवाली देखने को मिली.
वहीं, बजाज फिनसर्व सबसे अधिक करीब 2% की बढ़त के साथ बंद हुआ. इसके अलावा इंटरग्लोब एविएशन (इंडिगो), अल्ट्राटेक सीमेंट, एचसीएल टेक, महिंद्रा एंड महिंद्रा, टाइटन, कोटक महिंद्रा बैंक और मारुति सुजुकी के शेयरों में भी तेजी रही.
ब्रॉडर मार्केट ने दिखाई मजबूती
बेंचमार्क सूचकांकों में गिरावट के बावजूद व्यापक बाजार का प्रदर्शन बेहतर रहा. निफ्टी मिडकैप इंडेक्स 0.30% और निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स 0.53% की बढ़त के साथ बंद हुए. सेक्टोरल इंडेक्स में निफ्टी PSU बैंक और निफ्टी IT सबसे ज्यादा दबाव में रहे, जबकि निफ्टी केमिकल और निफ्टी सीमेंट इंडेक्स में सबसे अधिक तेजी दर्ज की गई.
आज इन कंपनियों के तिमाही नतीजे
आज बाजार की नजर जून तिमाही (Q1) के नतीजों पर रहेगी. अडानी ग्रीन एनर्जी, अदाणी पावर, भारत पेट्रोलियम (BPCL), हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL), डॉ. रेड्डीज लैबोरेट्रीज, इंडसइंड बैंक, JSW एनर्जी, नेस्ले इंडिया, टाटा कम्युनिकेशंस, यूनाइटेड स्पिरिट्स, यूको बैंक, UTI एसेट मैनेजमेंट, निप्पॉन लाइफ इंडिया एसेट मैनेजमेंट, HFCL, SRF, तनला प्लेटफॉर्म्स और शॉपर्स स्टॉप समेत कई कंपनियां आज अपने वित्तीय नतीजे जारी करेंगी. नतीजों के बाद इन शेयरों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है.
एशियाई बाजारों में मजबूती, लेकिन तेल की कीमतें चिंता का कारण
हालांकि वॉल स्ट्रीट में मंगलवार को अच्छी तेजी देखने को मिली और उसके बाद अधिकांश एशियाई बाजार भी बढ़त के साथ कारोबार कर रहे हैं. जापान का निक्केई 225 और दक्षिण कोरिया का कोस्पी मजबूत रहे. इसके बावजूद अमेरिका-ईरान तनाव के चलते कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भारतीय बाजार के लिए चिंता का विषय बनी हुई है.
ब्रेंट क्रूड जुलाई वायदा करीब 1.7% की बढ़त के साथ 92.54 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. वहीं, सोने और चांदी की कीमतों में भी क्रमशः 1.21% और 1.9% की तेजी दर्ज की गई. बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि निकट अवधि में वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रम, कच्चे तेल की चाल और कॉरपोरेट नतीजे भारतीय शेयर बाजार की दिशा तय करेंगे.
इन शेयरों पर भी रखें नजर
आज के कारोबार में कई शेयर निवेशकों के रडार पर रहेंगे. मारुति सुजुकी ने बढ़ती इनपुट लागत के चलते अगस्त से अपने सभी मॉडलों की कीमतों में अधिकतम 30,000 रुपये तक बढ़ोतरी का ऐलान किया है. JSW Energy ने TJPS में 150 करोड़ रुपये का अतिरिक्त निवेश कर अपनी हिस्सेदारी 20.7% कर ली है. PC Jeweller ने एक और बैंक का कर्ज समय से पहले चुका दिया है और अब तक 14 में से पांच बैंकों का कर्ज समाप्त कर चुकी है. वहीं, Anant Raj ने डेटा सेंटर और क्लाउड सर्विसेज कारोबार को रियल एस्टेट बिजनेस से अलग करने की योजना को मंजूरी दी है. इसके अलावा Aurobindo Pharma की इकाई CuraTeQ Biologics को ब्राजील में GMP मंजूरी मिली है, Aditya Birla Capital ने अपनी हेल्थ इंश्योरेंस इकाई में 123.89 करोड़ रुपये का निवेश किया है, जबकि Bliss GVS Pharma, Manba Finance और Ashoka Buildcon भी अपने-अपने कॉर्पोरेट अपडेट के चलते निवेशकों की नजर में रहेंगे.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
हाइपरस्केलर और क्लाउड कंपनियों की बढ़ती मांग से जनवरी-जून 2026 के दौरान 258 मेगावाट आईटी क्षमता जुड़ी. देश की कुल परिचालन डेटा सेंटर क्षमता बढ़कर 1.8 गीगावाट आईटी पहुंची.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत का डेटा सेंटर बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है. प्रॉपर्टी कंसल्टेंसी फर्म सैविल्स इंडिया (Savills India) की रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2026 की पहली छमाही (जनवरी-जून) में देश में 258 मेगावाट (MW IT) नई डेटा सेंटर क्षमता जुड़ी, जो पिछले साल की समान अवधि के 162 मेगावाट की तुलना में 59.3% अधिक है. इसी अवधि में डेटा सेंटर स्पेस का अवशोषण (Absorption) भी सालाना आधार पर 31.1% बढ़कर 278 मेगावाट आईटी हो गया. नई क्षमता जुड़ने के साथ देश की कुल परिचालन डेटा सेंटर क्षमता बढ़कर 1.8 गीगावाट (GW IT) पहुंच गई है.
हाइपरस्केलर कंपनियां बनीं सबसे बड़ी मांग का स्रोत
रिपोर्ट के अनुसार, डेटा सेंटर बाजार में तेजी का प्रमुख कारण हाइपरस्केलर, क्लाउड सर्विस प्रोवाइडर और बड़े उद्यमों (एंटरप्राइज) की लगातार बढ़ती मांग रही. जनवरी-जून 2026 के दौरान कुल डेटा सेंटर अवशोषण में हाइपरस्केलर कंपनियों की हिस्सेदारी 80% से अधिक रही. इस अवधि में देश के प्रमुख बाजारों में डेटा सेंटर परियोजनाओं के लिए 120 एकड़ से अधिक जमीन के सौदे भी किए गए, जो इस क्षेत्र में निवेशकों की बढ़ती रुचि को दर्शाता है.
मुंबई और चेन्नई रहे सबसे बड़े बाजार
डेटा सेंटर लीजिंग के मामले में मुंबई देश का सबसे बड़ा बाजार बना रहा. पहली छमाही में कुल अवशोषण का 38% हिस्सा अकेले मुंबई का रहा, जबकि चेन्नई की हिस्सेदारी 26% रही. दोनों शहरों ने मिलकर इस अवधि के दौरान देश की कुल लीजिंग गतिविधि का लगभग दो-तिहाई हिस्सा हासिल किया, जिससे भारत के डेटा सेंटर इकोसिस्टम में उनकी मजबूत स्थिति बनी रही.
बिजली और जमीन की उपलब्धता सबसे बड़ी चुनौती
सैविल्स इंडिया में डायरेक्टर एवं लीड- डेटा सेंटर सर्विसेज श्रीहरि श्रीनिवासन ने कहा कि यह क्षेत्र स्थापित ऑपरेटरों के साथ-साथ नए डेवलपर्स को भी आकर्षित कर रहा है, जो तेजी से बढ़ते डेटा सेंटर बाजार में अपनी मौजूदगी मजबूत करना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि क्लाउड सेवाओं के बढ़ते उपयोग के कारण पारंपरिक एंटरप्राइज मांग कुछ धीमी हुई है, लेकिन हाइपरस्केलर और बड़े उद्यमों की मांग बाजार के विस्तार को लगातार समर्थन दे रही है.
श्रीनिवासन के मुताबिक, नियो-क्लाउड (Neo-Cloud) सेवा प्रदाताओं की बढ़ती मांग आने वाले वर्षों में बाजार को और मजबूती देगी. भारत की लागत संबंधी प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त और तेजी से विकसित हो रहे डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के कारण वैश्विक कंपनियां इसे रणनीतिक गंतव्य के रूप में देख रही हैं.
हालांकि, उन्होंने कहा कि प्रमुख डेटा सेंटर बाजारों में पर्याप्त बिजली आपूर्ति और उपयुक्त भूमि की उपलब्धता अब भी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है.
नई क्षमता जोड़ने में मुंबई सबसे आगे
नई क्षमता जोड़ने के मामले में भी मुंबई पहले स्थान पर रहा. पहली छमाही में देश में जुड़ी कुल नई डेटा सेंटर क्षमता का 55% हिस्सा मुंबई में विकसित हुआ. इसके बाद चेन्नई की हिस्सेदारी 20% और हैदराबाद की 10% रही.
वहीं, टियर-2 शहरों ने भी कुल नई आपूर्ति में 7% योगदान दिया, जिससे संकेत मिलता है कि डेवलपर्स अब पारंपरिक डेटा सेंटर हब से बाहर भी विस्तार कर रहे हैं.
2030 तक 7 गीगावाट से अधिक क्षमता का अनुमान
सैविल्स इंडिया का अनुमान है कि तेज डिजिटलाइजेशन, क्लाउड सेवाओं का बढ़ता उपयोग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित वर्कलोड और डेटा लोकलाइजेशन की बढ़ती जरूरतों के चलते वर्ष 2030 तक भारत की परिचालन डेटा सेंटर क्षमता 7 गीगावाट (GW IT) से अधिक हो जाएगी.
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2026 के अंत तक नई क्षमता और डेटा सेंटर स्पेस का अवशोषण दोनों 600 मेगावाट आईटी के आंकड़े को पार कर सकते हैं. इस दौरान हैदराबाद, मुंबई और कई टियर-2 शहर डेटा सेंटर उद्योग के प्रमुख ग्रोथ मार्केट के रूप में उभरने की संभावना है.
कम मात्रा में कच्चा तेल खरीदने के बावजूद भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ा. अमेरिका-ईरान तनाव के बीच वैश्विक बाजार में तेल की ऊंची कीमतों का असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी दिखने लगा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी का असर भारत के आयात खर्च पर साफ नजर आने लगा है. वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में देश का कच्चे तेल का आयात बिल सालाना आधार पर 61% बढ़कर 49.8 अरब डॉलर पहुंच गया. दिलचस्प बात यह है कि इस दौरान भारत ने पिछले साल की तुलना में कम कच्चा तेल आयात किया, लेकिन ऊंची वैश्विक कीमतों के कारण आयात पर खर्च काफी बढ़ गया.
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल-जून तिमाही में भारत ने 59.8 मिलियन टन कच्चा तेल आयात किया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 62.6 मिलियन टन था. यानी आयात की मात्रा करीब 4% घट गई, लेकिन कुल आयात बिल 49.8 अरब डॉलर तक पहुंच गया.
जून महीने में भी यही रुझान देखने को मिला. इस दौरान भारत ने 18.9 मिलियन टन कच्चा तेल आयात किया, जो एक साल पहले की तुलना में 7% कम है. इसके बावजूद जून का आयात बिल 48% बढ़कर 14.7 अरब डॉलर हो गया.
अमेरिका-ईरान तनाव से बढ़ीं वैश्विक कीमतें
विशेषज्ञों के मुताबिक, आयात बिल बढ़ने की सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल रही. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव तथा हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में आपूर्ति बाधित होने की आशंकाओं ने वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों को ऊंचे स्तर पर पहुंचा दिया.
अप्रैल और मई के दौरान ब्रेंट क्रूड कई बार 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया. अप्रैल में युद्धविराम की खबरों के बाद कीमतें कुछ समय के लिए करीब 90 डॉलर प्रति बैरल तक आईं, लेकिन तनाव बढ़ने पर यह 126 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गईं. मई में भी कीमतें लंबे समय तक 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रहीं.
हालांकि जून में ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत घटकर 83.22 डॉलर प्रति बैरल रह गई, लेकिन पूरे तिमाही के दौरान ऊंची कीमतों का असर भारत के आयात बिल पर दिखाई दिया.
भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का 85% से अधिक हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है. ऐसे में वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में मामूली बढ़ोतरी भी देश की अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर डालती है.
यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो इससे देश का आयात बिल बढ़ सकता है, चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) गहरा सकता है और महंगाई पर भी दबाव बढ़ सकता है. इसका असर रुपये की विनिमय दर और सरकार के वित्तीय संतुलन पर भी पड़ सकता है.
विशेषज्ञों का अनुमान है कि भारत हर साल करीब 1.8 से 2 अरब बैरल कच्चा तेल आयात करता है. ऐसे में यदि कच्चे तेल की कीमत में प्रति बैरल 1 डॉलर की बढ़ोतरी होती है, तो देश का वार्षिक आयात बिल लगभग 2 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है.
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में तेल की कीमतों की दिशा काफी हद तक पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति और वैश्विक मांग पर निर्भर करेगी. यदि तनाव बना रहता है, तो भारत के लिए ऊर्जा आयात लागत और महंगाई दोनों पर दबाव बढ़ सकता है.
NRI निवेशकों ने FCNR-B जमा में दिखाई मजबूत दिलचस्पी. RBI की स्वैप सुविधा के तहत कुल 20.7 अरब डॉलर जुटे, विशेषज्ञों ने आगे और तेज पूंजी प्रवाह की जताई उम्मीद.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की विदेशी मुद्रा आकर्षित करने की विशेष FCNR (B) डिपॉजिट योजना को शुरुआती चरण में ही जोरदार प्रतिक्रिया मिली है. योजना शुरू होने के महज 42 दिनों के भीतर अनिवासी भारतीयों (NRI) ने भारतीय बैंकों में 17.41 अरब डॉलर का FCNR-B डिपॉजिट किया है. इससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserve) को मजबूती मिली है और रुपए को सहारा मिलने की उम्मीद बढ़ी है.
RBI के मुताबिक, 17 जुलाई तक उसकी डॉलर स्वैप सुविधा के तहत कुल 20.72 अरब डॉलर का प्रवाह हुआ, जिसमें सबसे बड़ा योगदान FCNR-B डिपॉजिट का रहा. इसके अलावा विदेशी मुद्रा ऋण (Foreign Currency Borrowing) के जरिए 1.97 अरब डॉलर और एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग (ECB) के माध्यम से 1.34 अरब डॉलर आए. केंद्रीय बैंक ने कहा कि 8 जून से योजना के तहत लगातार विदेशी मुद्रा का प्रवाह बना हुआ है और बाजार से अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है.
सितंबर तक खुली रहेगी FCNR-B विंडो
RBI ने 5 जून को इस विशेष योजना की घोषणा की थी, जिसे 8 जून से लागू किया गया. इसका उद्देश्य वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच विदेशी पूंजी आकर्षित करना, भुगतान संतुलन (Balance of Payments) को मजबूत करना और रुपये पर दबाव कम करना है.
योजना के तहत बैंक नए FCNR-B डिपॉजिट जुटाकर डॉलर को RBI के साथ रियायती दर पर स्वैप कर सकते हैं. FCNR-B विंडो 30 सितंबर तक खुली रहेगी, जबकि OFCB और ECB से जुड़ी सुविधाएं 31 दिसंबर तक उपलब्ध रहेंगी.
अनुमान से अधिक निवेश की उम्मीद
IDFC फर्स्ट बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री गौरा सेनगुप्ता ने इस योजना को "बेहद अच्छी शुरुआत" बताया है. उनका कहना है कि मौजूदा रफ्तार को देखते हुए FCNR-B के जरिए कुल 50 अरब डॉलर से अधिक का निवेश भी आ सकता है. उन्होंने अगस्त और सितंबर में पूंजी प्रवाह और तेज होने की संभावना जताई है.
वहीं, ECB के जरिए अतिरिक्त 20 अरब डॉलर आने का अनुमान भी बरकरार रखा गया है. उनके मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 में भारत का भुगतान संतुलन अधिशेष (BoP Surplus) करीब 25 अरब डॉलर रह सकता है, जिससे रुपये की स्थिरता को समर्थन मिलेगा.
PNB समेत कई बैंकों को मजबूत प्रतिक्रिया
पंजाब नेशनल बैंक (PNB) के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी अशोक चंद्रा ने कहा कि शुरुआती आंकड़े उम्मीद से बेहतर हैं और यह योजना के प्रति निवेशकों की मजबूत रुचि को दर्शाते हैं. उन्होंने कहा कि बैंक को उम्मीद थी कि 15 अगस्त के बाद निवेश बढ़ेगा, लेकिन मौजूदा रुझान इससे पहले ही सकारात्मक संकेत दे रहे हैं. PNB का लक्ष्य इस योजना के तहत 2.5 अरब डॉलर के FCNR-B डिपॉजिट जुटाने का है, जिसमें अब तक 425 मिलियन डॉलर प्राप्त हो चुके हैं.
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि विदेशी फंडिंग की लागत बढ़ने से बैंक बड़े FCNR-B डिपॉजिट को प्राथमिकता दे रहे हैं. वहीं, अमेरिका और ब्रिटेन जैसे बाजारों में टैक्स नियमों और अनुपालन संबंधी चिंताओं के कारण कुछ NRI अभी भी सतर्क रुख अपनाए हुए हैं.
बार्कलेज की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, अगले कुछ महीनों में 25-30 अरब डॉलर तक का FCNR प्रवाह संभव है, हालांकि 2013 जैसी रिकॉर्ड पूंजी आमद की संभावना फिलहाल कम दिखाई देती है. रिपोर्ट में कहा गया है कि शुरुआती प्रतिक्रिया सकारात्मक है, लेकिन बाजार की 40-50 अरब डॉलर की ऊंची उम्मीदों तक पहुंचने के लिए अगले कुछ महीनों का प्रदर्शन अहम रहेगा.
जून तिमाही में राजस्व 65% बढ़कर ₹21,689 करोड़ पहुंचा. घरेलू और निर्यात बाजार में रिकॉर्ड बिक्री से कंपनी ने बनाया नया कीर्तिमान, विशेषज्ञों ने आगे भी सकारात्मक रुख जताया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
दोपहिया और तिपहिया वाहन निर्माता बजाज ऑटो (Bajaj Auto) ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में उम्मीद से बेहतर नतीजे पेश किए हैं. जून तिमाही में कंपनी के कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट में सालाना आधार पर 46% बढ़ोतरी दर्ज हुई है. जबकि परिचालन से होने वाला राजस्व 65% की तेज बढ़ोतरी के साथ 21,689 करोड़ रुपये रहा. रिकॉर्ड एक्सपोर्ट, घरेलू बाजार में मजबूत मांग और बेहतर प्रोडक्ट मिक्स ने कंपनी के प्रदर्शन को नई ऊंचाई पर पहुंचाया.
खर्च बढ़ा, लेकिन मुनाफे पर नहीं पड़ा असर
कंपनी ने मंगलवार को जारी नतीजों में बताया कि अप्रैल-जून तिमाही के दौरान उसका कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट 3,225.63 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले साल की समान अवधि से 45.9% अधिक है. परिचालन से राजस्व बढ़कर 21,688.83 करोड़ रुपये हो गया, जबकि कुल आय 22,376.69 करोड़ रुपये रही, जिसमें 687.86 करोड़ रुपये की अन्य आय भी शामिल है.
तिमाही के दौरान कंपनी का कुल खर्च 68% बढ़कर 17,949.85 करोड़ रुपये हो गया. कच्चे माल और कंपोनेंट की लागत बढ़कर 13,261.30 करोड़ रुपये रही, जबकि कर्मचारी लाभ पर खर्च भी बढ़कर 1,387.09 करोड़ रुपये हो गया. इसके बावजूद बेहतर कीमत, अनुकूल प्रोडक्ट मिक्स, विदेशी मुद्रा से हुई कमाई और लागत नियंत्रण के चलते कंपनी ने मजबूत लाभप्रदता बनाए रखी.
स्टैंडअलोन कारोबार में भी रिकॉर्ड प्रदर्शन
स्टैंडअलोन आधार पर बजाज ऑटो का राजस्व 37% बढ़कर रिकॉर्ड 17,244 करोड़ रुपये पहुंच गया. कंपनी ने बताया कि इंटरनल कंबशन इंजन (ICE) और इलेक्ट्रिक वाहनों, घरेलू और निर्यात बाजारों के साथ-साथ दोपहिया और तिपहिया दोनों श्रेणियों में दोहरे अंक की वृद्धि दर्ज की गई.
कंपनी का स्टैंडअलोन EBITDA पहली बार 3,500 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया, जबकि कर पश्चात लाभ (PAT) 2,983 करोड़ रुपये रहा. दोनों आंकड़ों में सालाना आधार पर 40% से अधिक की वृद्धि हुई.
रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा एक्सपोर्ट
बजाज ऑटो ने कहा कि जून तिमाही में कंपनी ने अब तक का सबसे अधिक तिमाही एक्सपोर्ट वॉल्यूम और एक्सपोर्ट रेवेन्यू दर्ज किया. पहली बार निर्यात 7 लाख यूनिट के आंकड़े को पार कर गया.
लैटिन अमेरिका में मजबूत मांग, अफ्रीका में तेज वृद्धि और खासतौर पर नाइजीरिया में कारोबार तीन गुना होने से कंपनी को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बड़ा फायदा मिला. वहीं, कमर्शियल वाहनों के निर्यात में भी करीब 70% की वृद्धि दर्ज की गई.
घरेलू बाजार में भी सभी प्रमुख सेगमेंट में डबल डिजिट ग्रोथ रही, जिससे घरेलू राजस्व 26% बढ़ा. कंपनी ने कहा कि आने वाले समय में 125cc-160cc मोटरसाइकिल पोर्टफोलियो में अपग्रेड से उसकी प्रतिस्पर्धी स्थिति और मजबूत होगी.
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
विशेषज्ञों के अनुसार, बजाज ऑटो के पहली तिमाही के नतीजे बाजार के अनुमान से बेहतर रहे हैं. मजबूत वॉल्यूम ग्रोथ और बेहतर मार्जिन ने सप्लाई चेन और इनपुट लागत की चुनौतियों के बावजूद प्रदर्शन को सहारा दिया. उनका मानना है कि EV और एक्सपोर्ट कारोबार को लेकर मैनेजमेंट की आगे की रणनीति निवेशकों के लिए अहम रहेगी.
विशेषज्ञों ने कहा कि घरेलू और निर्यात दोनों बाजारों में मजबूत मांग के चलते कंपनी ने बेहतर प्रदर्शन किया है. हालांकि, उन्होंने निवेशकों को आने वाली तिमाहियों में मार्जिन, मानसून के असर और मांग की स्थिरता पर नजर रखने की सलाह दी.
नतीजों के बाद बजाज ऑटो का शेयर शुरुआती उतार-चढ़ाव के बाद लगभग सपाट कारोबार करता दिखा. हालांकि कारोबार के समय करीब 1% की गिरावट रही. इसके बावजूद वर्ष 2026 में अब तक कंपनी का शेयर करीब 9% का रिटर्न दे चुका है.