भारत में कंपनी की एंट्री 1996 में हुई और दिल्ली उसका पहला बाजार बना. उस समय केवल 30-40 महिलाओं की एक टीम बिक्री का कामकाज संभालती थी.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
शायद ही कोई ऐसा होगा जो फूड स्टोरेज कंटेनर बनाने वाली कंपनी टपरवेयर (Tupperware) के नाम से परिचित न हो. भारतीय घरों में इस अमेरिकी कंपनी ने सालों तक राज किया है. खाना रखने के एयरटाइट प्लास्टिक के डिब्बों से लेकर टिफिन बॉक्स तक टपरवेयर लगभग हर भारतीय की चहेती बनी रही. हालांकि, ये 'राज' अब खत्म होने को है. टपरवेयर गंभीर संकट से जूझ रही है और उसने अपना कारोबार समेटने के संकेत दिए हैं. कोरोना महामारी ने इस महशूर कंपनी को ऐसा जख्म दिया है, जिसका इलाज खोज पाना उसके लिए मुश्किल हो गया है.
फाउंडर थे कैमिकल इंजीनियर
एक जमाने में टपरवेयर (Tupperware) के प्रोडक्ट्स भारतीयों के बीच इस कदर लोकप्रिय हो गए थे कि इसे भारतीय कंपनी ही समझा जाता था, लेकिन यह एक अमेरिकी कंपनी है जिसकी स्थापना 1946 में हुई थी. इस कंपनी के फाउंडर कैमिकल इंजीनियर अर्ल सिलस टपर थे. उन्होंने प्लास्टिक के ऐसे कंटेनर विकसित किए, जो नॉन-टॉक्सिक, टिकाऊ और फ्लेक्सिबल थे. साथ ही, इनमें किसी भी प्रकार की गंध नहीं होती थी. अर्ल टपर के उत्पाद बेशक बेजोड़ थे, लेकिन उन्हें लोगों तक पहुंचाने के लिए दमदार बिक्री मॉडल की जरूरत थी.
काम आ गया 'पार्टी प्लान'
1950 के दशक की शुरुआत में टपरवेयर से एक नाम जुड़ा - ब्राउनी वाइज और कंपनी की किस्मत ही बदल गई. ब्राउनी ने जल्द ही महसूस किया कि अगर कंपनी के उत्पादों को लोकप्रिय करना है, तो महिलाओं को साथ लाना होगा. इसके लिए उन्होंने एक खास रणनीति बनाई जिसे - 'पार्टी प्लान' नाम दिया गया. इसके तहत वह महिलाओं से मिलतीं, उन्हें पार्टी करना सिखातीं. हर बार किसी एक के घर पर पार्टी होती और सभी वहां जुटते. ऐसे में खाना रखने के लिए डिब्बों की जरूरत भी पड़ती. बस उसी मौके पर ब्राउनी वाइज टपरवेयर का जिक्र छेड़ देतीं.
महिलाओं को मिला काम
ब्राउनी वाइज ने महिलाओं को न लेवल टपरवेयर के प्रोडक्ट खरीदने के लिए प्रेरित किया, बल्कि उन्हें टपरवेयर को कमीशन पर बेचना भी सिखाया. महिलाओं के पास घर बैठे पैसा आने लगा, यह रणनीति इतनी कारगर हुई कि धीरे-धीरे कंपनी ने अमेरिका से बाहर निकलकर भारत सहित कई देशों में अपनी पैठ बना ली. भारतीय महिलाओं के लिए टपरवेयर के डिब्बे इतने अजीज हो गए कि उनके खो जाने पर घरवालों की क्लास लगना तय था. टपरवेयर की खास बात ये है कि वो अपने प्रोडक्ट्स में लगातार बदलाव करती रही.
ये भी पढ़ें: कोई धंधा छोटा नहीं होता, पावभाजी बेच बनाई IceCream की 300 करोड़ की कंपनी
भारत में इस साल हुई एंट्री
टपरवेयर ने ऐसे डिब्बे तैयार किए, जिसमें खाना न तो खराब होता था और न ही उनकी गंध फ्रीज में फैलती थी. कंपनी की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि क्वीन एलिजाबेथ भी टपरवेयर के प्रोडक्ट्स इस्तेमाल करती थीं. भारत में कंपनी की एंट्री 1996 में हुई और दिल्ली उसका पहला बाजार बना. उस समय केवल 30-40 महिलाओं की एक टीम बिक्री का कामकाज संभालती थी. लेकिन धीरे-धीरे उसने भारत पर अपनी पकड़ इतनी मजबूत कर ली कि किसी दूसरी कंपनी के लिए कोई मौका नहीं था. 2009 में कंपनी ने भारत में एक्वासेफ बोतल लांच की और 2010 में देहरादून में एक नया मेनुफैक्चरिंग प्लांट भी लगाया. 2012 में गुरुग्राम में कंपनी के इंडियन हेड ऑफिस का उद्घाटन हुआ था.
कंपनी के पास कैश की किल्लत
इतनी ऊंचाइयों पर पहुंचने के बाद भी आज कंपनी मुश्किल दौर से गुजर रही है. अमेरिकी कंपनी ने टपरवेयर का कहना है कि वो अपना कारोबार रखने की स्थिति में नहीं है. 2020 तक कंपनी अच्छा कारोबार कर रही थी, लेकिन कोरोना महामारी ने उसकी आर्थिक कमर तोड़ दी. लॉकडाउन जैसे हालातों ने टपरवेयर को इतना बड़ा नुकसान पहुंचाया कि उसके लिए आर्थिक संकट से बाहर निकलना लगभग असंभव हो गया. कंपनी इस वक्त नकदी की कमी से जूझ रही है. यदि टपरवेयर अपना कारोबार बंद करती है, तो एक ऐसी कंपनी हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी जिसने लंबे समय तक लोगों के दिलों पर राज किया.
DIPAM की देर रात आई सफाई में घटनाओं के क्रम, निजी बैंकों को तुलनात्मक सूची से हटाने या फेयरफैक्स की अंतिम चेतावनी को खारिज नहीं किया गया. इसके बजाय सरकार ने एक नया आंकड़ा 627 करोड़ रुपये सामने रखा और पुष्टि की कि सौदे के अपने सलाहकार ने ही बैंक का मूल्यांकन किया था.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
DIPAM का कहना है कि पुस्तिका दिशानिर्देश है, नियम नहीं.
वित्त मंत्रालय ने IDBI बैंक को फेयरफैक्स फाइनेंशियल को बेचे जाने के तरीके पर बिजनेसवर्ल्ड की रिपोर्ट का जवाब दिया है. यह रिपोर्ट निवेश एवं लोक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग (DIPAM) के 13 अगस्त के एक आंतरिक नोट पर आधारित थी.
DIPAM की सफाई हमें 29 अक्टूबर को रात 9:45 बजे मिली, यानी खबर प्रकाशित होने के करीब 10 घंटे बाद.
सफाई में यह नहीं कहा गया कि नोट फर्जी, अधूरा या गलत तरीके से उद्धृत किया गया है. इसमें उसी नोट के प्रावधानों का हवाला देते हुए उसके भीतर से ही तर्क दिए गए हैं. साथ ही, इसमें तीन ऐसी बातें भी जोड़ी गई हैं, जिनके बारे में सरकार ने पहले कुछ नहीं कहा था.
सरकार ने किन बातों का खंडन नहीं किया
सफाई में नोट के निम्नलिखित किसी भी बिंदु का खंडन नहीं किया गया है:
घटनाओं का क्रम
पहले दौर की बोलियां मार्च में खोली गई थीं. फेयरफैक्स की संशोधित बोली 13 जुलाई को खोली गई. उसी दिन पुरानी रिजर्व प्राइस को 'गलत' घोषित कर दिया गया और उसे 'खारिज कर दिया गया तथा उस पर विचार नहीं किया गया.'
निजी बैंकों को क्यों हटाया गया
नोट में कहा गया था कि निजी बैंकों को शामिल करने से 'रिजर्व प्राइस का जरूरत से ज्यादा आकलन हो जाता है.' सफाई में इस पंक्ति पर कोई जवाब नहीं दिया गया है.
शेयर की कीमत का दो तरह से इस्तेमाल
नोट में शेयर की कीमत को 'मूल्यांकन के उद्देश्य से अनुपयोगी' बताया गया था. इसके बाद बोली स्वीकार करने के पक्ष में यह तर्क दिया गया कि शेयर बाजार में शेयर की कीमत बोली से कम पर कारोबार कर रही थी.
फेयरफैक्स की अंतिम चेतावनी
उसके पत्र में 81 रुपये प्रति शेयर की बोली को 'अंतिम प्रस्ताव' बताया गया था और कहा गया था कि अगर बोली बढ़ाने के लिए कहा गया तो वह इसे वापस ले लेगी.
पैसों का दबाव
नोट में 'असाधारण राजकोषीय दबाव', विदेशी मुद्रा भंडार में कमी और रुपये की कमजोरी का हवाला दिया गया था.
कबाड़ बिक्री की मिसाल
नोट में कबाड़ की नीलामी के लिए रेलवे स्टोर्स कोड के नियमों का सहारा लिया गया था.
सुरक्षा संबंधी चिंता
गृह मंत्रालय ने एक बोलीदाता के बारे में 'अतिरिक्त जानकारी' दी थी.
सरकार ने किन बातों की पुष्टि की
सौदे के अपने सलाहकार ने दो मूल्यांकनों में से एक किया था
हमारी रिपोर्ट में बताया गया था कि बिक्री प्रक्रिया संचालित करने के लिए नियुक्त ट्रांजैक्शन एडवाइजर KPMG ने एक मूल्यांकन तैयार किया था. DIPAM ने इसकी पुष्टि की है. विभाग के अनुसार, प्रोटोकॉल के तहत कारोबारी मूल्यांकन 'हमेशा ट्रांजैक्शन एडवाइजर के माध्यम से किया जाता है.' विभाग ने यह भी कहा कि KPMG ने इस काम के लिए 'आगे पेशेवर विशेषज्ञों की नियुक्ति की थी.' हालांकि, उनके नाम नहीं बताए गए हैं.
कैबिनेट के फैसले के बाद चावला ने दोनों मूल्यांकनकर्ताओं को स्वतंत्र बताया था. अब DIPAM का कहना है कि वे 'एक-दूसरे से स्वतंत्र' थे. विभाग ने यह नहीं कहा कि वे सौदे से भी स्वतंत्र थे.
बोली में बढ़ोतरी का आकार
हमारी रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि फेयरफैक्स की बढ़ी हुई बोली से करीब 3,900 करोड़ रुपये अतिरिक्त मिले. DIPAM ने यह आंकड़ा 3,917 करोड़ रुपये बताया है.
टैक्स कवर कैसे काम करता है
DIPAM का कहना है कि 'केवल अतिरिक्त कर मांग, यदि उसका भुगतान किया जाता है, तो ही प्रतिपूर्ति के लिए पात्र होगी.' दूसरे शब्दों में, अगर टैक्स विभाग IDBI के खिलाफ कोई मामला जीतता है, तो सरकार नए मालिक को वह पैसा वापस करेगी. हमारी रिपोर्ट में भी यही बताया गया था.
सरकार को कहां आपत्ति है और उसका अपना नोट क्या कहता है
1. 'दिशानिर्देश हैं, नियम नहीं'
DIPAM का कहना है: उसकी प्रक्रियाएं 'संकेतात्मक दिशानिर्देशों की प्रकृति की हैं, न कि कठोर नियमों या विनियमों की.' वर्ष 2017 के कैबिनेट फैसले के तहत विनिवेश पर सचिवों का कोर ग्रुप (CGD) 'आवश्यकतानुसार बदलावों पर विचार कर सकता है.'
नोट में कहा गया है: यही बात नोट में भी कही गई है. इसमें यह भी कहा गया है कि अधिकारियों को बोलियों की जानकारी दिए बिना रिजर्व प्राइस तय की जाती है और स्वीकार किया गया है कि 'शुरुआत में इस प्रक्रिया को अपनाया गया था, लेकिन बोलियां रिजर्व प्राइस से कम थीं.'
इसे नियम कहा जाए या दिशानिर्देश, नोट स्वीकार करता है कि प्रक्रिया अपनाई गई, बोलियां असफल रहीं और फिर उस प्रक्रिया को छोड़ दिया गया.
2. 'रिजर्व प्राइस न घटाई गई और न बढ़ाई गई'
DIPAM का कहना है: पहली प्रक्रिया 'फंक्टस ऑफिसियो' हो गई थी. इसका मतलब है कि बोलियां मंजूर नहीं होने के बाद वह प्रक्रिया अपने आप समाप्त हो गई.
नोट में कहा गया है: CGD ने फैसला किया था कि 'वह रिजर्व प्राइस जिसे CGD ने गलत घोषित किया था', उसका दोबारा इस्तेमाल 'नहीं किया जा सकता और उसे खारिज कर दिया जाना चाहिए तथा उस पर विचार नहीं किया जाना चाहिए.'
सरकार के अपने प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार, पुरानी रिजर्व प्राइस 94.42 रुपये प्रति शेयर थी, जबकि नया बेंचमार्क 75.99 रुपये था.
3. 'डबल ब्लाइंड' प्रक्रिया
DIPAM का कहना है: 'सर्वश्रेष्ठ प्रस्ताव के लिए बोलियां आमंत्रित करने से पहले अप्रैल 2026 में CGD ने मूल्यांकन पद्धति की समीक्षा की थी.' मूल्यांकनकर्ताओं ने 'मई 2026 में ही संशोधित मूल्यांकन पर काम शुरू कर दिया था.' प्रक्रिया 'डबल ब्लाइंड' बनी रही, क्योंकि बोलीदाता को मूल्यांकन की जानकारी नहीं थी और मूल्यांकनकर्ताओं ने बोलियां नहीं देखी थीं. केवल CGD को ही पूरी तस्वीर देखने का मौका मिला.
नोट में कहा गया है: पहले दौर की बोलियां 12 मार्च को खोली गई थीं, यानी अप्रैल में हुई समीक्षा से पहले. फेयरफैक्स की संशोधित बोली 13 जुलाई को खोली गई और रैंकिंग का नतीजा CGD के सामने रखा गया. उसी दिन हुई दूसरी बैठक में CGD ने निर्देश दिया कि बाजार मूल्यांकन का 'इस्तेमाल नहीं किया जा सकता' और तुलनात्मक मूल्यांकन के लिए केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को शामिल किया जाए. इसके बाद ये निर्देश मूल्यांकनकर्ताओं को भेज दिए गए.
हो सकता है कि मूल्यांकनकर्ताओं ने बोलियां नहीं देखी हों, लेकिन उन्हें निर्देश देने वाले अधिकारियों ने बोलियां देखी थीं.
4. केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ही क्यों?
DIPAM का कहना है: किसी बैंक की तुलनीय बिक्री उपलब्ध नहीं थी, इसलिए सभी सूचीबद्ध सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को तुलना के लिए इस्तेमाल किया गया. IDBI को 'केवल नियामकीय उद्देश्यों' के लिए निजी बैंक माना जाता है और निवेशक 'इसे सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई के रूप में ही मूल्यांकित करते रहे.'
नोट में कहा गया है: 'तुलनात्मक बैंकों की सूची में निजी क्षेत्र के बैंकों को शामिल करने से रिजर्व प्राइस का जरूरत से ज्यादा आकलन हो जाता है.'
627 करोड़ रुपये का सवाल
DIPAM ने पहली बार खरीदार को दिए गए टैक्स कवर की राशि बताई है:
'इस मद में संभावित देनदारी केवल 627 करोड़ रुपये हो सकती थी, जबकि बोली से प्राप्त कीमत में 3,917 करोड़ रुपये की वृद्धि हुई.'
पहली नजर में देखें तो सरकार ने 627 करोड़ रुपये का जोखिम अपने ऊपर लिया और बदले में 3,917 करोड़ रुपये अधिक प्राप्त किए.
लेकिन 627 करोड़ रुपये विवादित कुल टैक्स राशि नहीं हो सकती.
13 अगस्त के नोट में कहा गया है कि यह अनुमान IDBI के टैक्स सलाहकार डेलॉयट के जोखिम आकलन के आधार पर तैयार किया गया था. इसमें कहा गया है कि यह अनुमान हाईकोर्ट में टैक्स अपीलों की 12.07 फीसदी सफलता दर के साथ 'अच्छी तरह मेल खाता है.' इससे संकेत मिलता है कि यह जोखिम के आधार पर निकाली गई राशि है, यानी संभावित नुकसान, न कि वह पूरी राशि जिसकी भरपाई करने पर सरकार सहमत हुई है.
यह टैक्स कवर सभी विवादित आयकर मांगों पर लागू होता है, 'चाहे उन्हें IDBI के खातों में आकस्मिक देनदारियों के रूप में दर्ज किया गया हो या नहीं.' DIPAM ने अभी तक यह नहीं बताया है कि कुल कितनी टैक्स राशि विवादित है.
अभी भी अनुत्तरित सवाल
सरकार ने कुल कितने विवादित टैक्स की भरपाई करने पर सहमति दी है?
मूल्यांकन के लिए KPMG ने किन 'पेशेवर विशेषज्ञों' को नियुक्त किया था?
निजी बैंकों को हटाने के लिए नोट में एक वजह और सफाई में दूसरी वजह क्यों दी गई है?
क्या KPMG और BDO की मूल्यांकन रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएंगी?
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और द मार्केट माफिया: क्रॉनिकल ऑफ इंडियाज हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कैबल दैट वेंट स्कॉट-फ्री के लेखक हैं. यह पुस्तक भारत के वित्तीय बाजारों के अंधेरे पहलुओं को उजागर करते हैं. मुंबई में करीब दो दशक तक जमीनी स्तर पर रिपोर्टिंग करने वाले पलक ने धन, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की पड़ताल की है. उनके लेख भारत के प्रमुख वित्तीय समाचार पत्रों, जिनमें द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं. 19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुए पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक में मुंबई की गैंगवार की जगह संगठित अपराध के अधिक परिष्कृत रूप ने ले ली है. इसमें कॉरपोरेट इमारतों के भीतर चलने वाली सफेदपोश वित्तीय धोखाधड़ी शामिल है. इसी अनुभव ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया, जहां उन्होंने भारत की 'सफेद धन' अर्थव्यवस्था की जटिल कार्यप्रणाली को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम वित्तीय दुनिया की चमकदार सतह के पीछे काम करने वाले समूहों को उजागर करता है. सच सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे लोग नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें भारतीय पत्रकारिता में एक ऐसी प्रभावशाली आवाज बनाती है जो यथास्थिति को चुनौती देने और खुद को कानून से ऊपर समझने वालों को बेनकाब करने से नहीं हिचकती.)
पिछले साल की ऊंची आधार दर और GST दरों में कटौती के असर से खर्च में आई कमी, अक्टूबर-नवंबर में त्योहारी खरीदारी बढ़ने से रिकवरी की उम्मीद
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में क्रेडिट कार्ड से होने वाला खर्च सितंबर में सालाना आधार पर 5.9 फीसदी घटकर 2.04 लाख करोड़ रुपये रह गया. फरवरी 2021 के बाद यह पहली बार है, जब क्रेडिट कार्ड खर्च में सालाना आधार पर गिरावट दर्ज की गई है. पिछले साल की ऊंची आधार दर (हाई बेस) को इस गिरावट की प्रमुख वजह माना जा रहा है. हालांकि, विश्लेषकों को उम्मीद है कि अक्टूबर और नवंबर में त्योहारी खरीदारी बढ़ने के साथ क्रेडिट कार्ड खर्च में फिर तेजी आएगी.
केयरएज (CareEdge) की रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर 2025 में वस्तु एवं सेवा कर (GST) की दरों में कटौती और त्योहारी खरीदारी जल्दी शुरू होने के कारण क्रेडिट कार्ड खर्च में तेज उछाल आया था. पिछले साल सितंबर के अंत में जीएसटी काउंसिल ने दरों में बदलाव की घोषणा की थी. यह फैसला त्योहारी सीजन के साथ आया, जिससे मासिक क्रेडिट कार्ड खर्च बढ़कर 2.17 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया था.
सितंबर 2025 में क्रेडिट कार्ड खर्च सितंबर 2024 की तुलना में करीब 23 फीसदी और अगस्त 2025 के मुकाबले 13.3 फीसदी बढ़ा था. इस साल त्योहारी बिक्री अक्टूबर में शुरू होने की उम्मीद है. ऐसे में त्योहारी खरीदारी का बड़ा हिस्सा अक्टूबर में होने की संभावना है.
ऑनलाइन क्रेडिट कार्ड खर्च में 12.5% की गिरावट
सितंबर में ऑनलाइन क्रेडिट कार्ड खर्च सालाना आधार पर 12.5 फीसदी घटकर 1.26 लाख करोड़ रुपये रह गया, जबकि पिछले साल इसी महीने में यह 1.44 लाख करोड़ रुपये था.
इसके उलट, पॉइंट ऑफ सेल (POS) यानी दुकानों और अन्य कारोबारी प्रतिष्ठानों पर कार्ड से होने वाले भुगतान में 7.18 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई. सितंबर में POS ट्रांजैक्शन बढ़कर 77,751.47 करोड़ रुपये हो गए, जो पिछले साल इसी महीने में 72,543.89 करोड़ रुपये थे.
HDFC बैंक के खर्च में बढ़ोतरी, SBI और ICICI में गिरावट
प्रमुख क्रेडिट कार्ड जारी करने वाले बैंकों में HDFC बैंक ने सितंबर में सालाना आधार पर 7.52 फीसदी की वृद्धि दर्ज की. बैंक का क्रेडिट कार्ड खर्च बढ़कर 65,139.72 करोड़ रुपये हो गया. अगस्त की तुलना में भी इसमें 6.22 फीसदी की बढ़ोतरी हुई.
देश के सबसे बड़े स्वतंत्र क्रेडिट कार्ड जारीकर्ता SBI कार्ड के खर्च में सालाना आधार पर 14.09 फीसदी की गिरावट आई और यह 34,895 करोड़ रुपये रह गया. मासिक आधार पर भी इसमें करीब 1.2 फीसदी की कमी दर्ज की गई.
ICICI बैंक के क्रेडिट कार्ड खर्च में सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई. सितंबर में इसका खर्च सालाना आधार पर 26.26 फीसदी और मासिक आधार पर 4.4 फीसदी घटकर 30,911.48 करोड़ रुपये रह गया. वहीं, Axis बैंक का क्रेडिट कार्ड खर्च सालाना आधार पर 11 फीसदी घटकर 23,148.67 करोड़ रुपये रहा. हालांकि, अगस्त की तुलना में इसमें 1.95 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई.
क्रेडिट कार्ड की संख्या बढ़कर 12.53 करोड़ हुई
क्रेडिट कार्ड से कुल खर्च में गिरावट के बावजूद नए कार्ड जारी होने का सिलसिला जारी रहा. सितंबर में देश में कुल क्रेडिट कार्ड की संख्या बढ़कर 12.531 करोड़ हो गई. प्रमुख बैंकों ने त्योहारी सीजन से पहले अपने ग्राहक आधार का विस्तार किया.
HDFC बैंक ने सितंबर में 2,80,353 नए क्रेडिट कार्ड जोड़े, जिससे उसके कुल कार्ड की संख्या बढ़कर 2.737 करोड़ हो गई. ICICI बैंक ने 29,621 कार्ड जोड़े और उसकी कुल संख्या 1.986 करोड़ पहुंच गई.
इसी तरह SBI कार्ड ने 2,08,026 नए कार्ड जारी किए, जिससे उसके कुल कार्ड की संख्या 2.316 करोड़ हो गई. Axis बैंक ने 2,59,525 कार्ड जोड़े और उसके कुल कार्ड की संख्या बढ़कर 1.655 करोड़ हो गई.
कुल मिलाकर, सितंबर में नए क्रेडिट कार्ड जुड़ने की संख्या में सालाना आधार पर 10.5 फीसदी की वृद्धि हुई. नवंबर 2024 के बाद यह नए कार्ड जारी होने की सबसे तेज वृद्धि दर है. इससे संकेत मिलता है कि कुल खर्च में गिरावट के बावजूद बैंकिंग क्षेत्र में क्रेडिट कार्ड का ग्राहक आधार लगातार बढ़ रहा है.
पर्यटन, बायोफ्यूल, एयरोस्पेस और डिफेंस समेत 11 क्षेत्रों में निवेश को मिली हरी झंडी, 7,296 रोजगार के अवसर पैदा होने का अनुमान; सात पर्यटन परियोजनाओं और तीन कंप्रेस्ड बायोगैस संयंत्रों को भी मंजूरी
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ओडिशा सरकार ने राज्य में औद्योगिक निवेश और रोजगार के अवसर बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. सरकार ने 12 जिलों में 3,855.38 करोड़ रुपये के 22 औद्योगिक निवेश प्रस्तावों को मंजूरी दी है. इन परियोजनाओं का विस्तार पर्यटन, बायोफ्यूल, मैन्युफैक्चरिंग, एयरोस्पेस एवं डिफेंस, फार्मास्यूटिकल्स, इंफ्रास्ट्रक्चर और पैकेजिंग समेत 11 क्षेत्रों में होगा. इनसे 7,296 लोगों को रोजगार मिलने का अनुमान है.
इन निवेश प्रस्तावों को ओडिशा की मुख्य सचिव अनु गर्ग की अध्यक्षता में हुई स्टेट लेवल सिंगल विंडो क्लीयरेंस अथॉरिटी (SLSWCA) की 151वीं बैठक में मंजूरी दी गई. सरकार के मुताबिक, इन परियोजनाओं का उद्देश्य राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों में औद्योगिक गतिविधियों का विस्तार करना और पारंपरिक उद्योगों के साथ उभरते क्षेत्रों में निवेश को प्रोत्साहित करना है.
इन परियोजनाओं के लिए अंगुल, बालासोर, भद्रक, कटक, गंजाम, गंजाम, जाजपुर, झारसुगुड़ा, खुर्दा, नयागढ़, पुरी, संबलपुर और सुंदरगढ़ जिलों में निवेश प्रस्तावित है.
पर्यटन क्षेत्र में 1,035 करोड़ रुपये का निवेश
मंजूर किए गए प्रस्तावों में पर्यटन क्षेत्र सबसे बड़ा निवेश आकर्षित करने वाला क्षेत्र है. इसके तहत सात परियोजनाओं में कुल 1,035.62 करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा. इनमें पांच सितारा होटल, लग्जरी रिसॉर्ट, डेस्टिनेशन रिसॉर्ट और रिवरफ्रंट हॉस्पिटैलिटी प्रोजेक्ट शामिल हैं.
आशीर्वाद इंजीनियरिंग एंड कंस्ट्रक्शन खुर्दा में 310 करोड़ रुपये की लागत से पांच सितारा होटल बनाएगी. वहीं, स्वामी रिसॉर्ट्स ने 153 करोड़ रुपये के निवेश से एक और पांच सितारा होटल स्थापित करने का प्रस्ताव दिया है. इन दोनों परियोजनाओं से क्रमशः 270 और 249 लोगों को रोजगार मिलने की उम्मीद है.
इसके अलावा झारसुगुड़ा में 150 करोड़ रुपये की लागत से कन्वेंशन सेंटर वाला पांच सितारा लग्जरी रिसॉर्ट बनाया जाएगा. पुरी में 135 करोड़ रुपये के डेस्टिनेशन रिसॉर्ट और 120 करोड़ रुपये के पांच सितारा होटल का प्रस्ताव है. वहीं, मां भट्टारिका मिनरल्स कटक में 64.04 करोड़ रुपये की लागत से रिवरफ्रंट रिसॉर्ट विकसित करेगी.
बायोफ्यूल और पैकेजिंग क्षेत्र में भी बड़े निवेश
राज्य में कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए तीन परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है. इन पर कुल 680 करोड़ रुपये का निवेश होगा और इनकी संयुक्त उत्पादन क्षमता 29,700 टन सालाना होगी.
इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन अंगुल, जाजपुर और संबलपुर में 360 करोड़ रुपये के निवेश से 14,850 टन सालाना क्षमता वाला CBG संयंत्र स्थापित करेगी. किनेता ग्लोबल सुंदरगढ़ में 170 करोड़ रुपये की लागत से 8,250 टन सालाना क्षमता का संयंत्र लगाएगी. वहीं, श्री मेटालिक्स बायो एनर्जी ने बालासोर में 150 करोड़ रुपये के निवेश का प्रस्ताव दिया है.
पेपर, पैकेजिंग और प्लास्टिक क्षेत्र में भी 1,029.91 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्तावों को मंजूरी मिली है. अलीशा टोरेंट क्लोजर्स नयागढ़ में 529.91 करोड़ रुपये के निवेश से बोतलबंद पेय पदार्थों के लिए कैप और क्लोजर बनाने की इकाई स्थापित करेगी. वहीं, स्टार्क रिज खुर्दा में 500 करोड़ रुपये की लागत से पेपर और पेपर उत्पादों की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाएगी.
स्टार्क रिज की प्रस्तावित इकाई में सालाना 1.08 लाख टन कॉरुगेटेड बॉक्स, 48,000 टन पेपर बैग, 48,000 टन मोनो कार्टन और 99,000 टन कागज का उत्पादन किया जाएगा. इस परियोजना से 1,710 लोगों को रोजगार मिलने का अनुमान है.
एयरोस्पेस और डिफेंस सेक्टर में 117 करोड़ का निवेश
ओडिशा में एयरोस्पेस और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए खुर्दा में दो परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है. स्टोनहॉक टेक्नोलॉजीज 65 करोड़ रुपये के निवेश से ड्रोन और अनमैन्ड एरियल सिस्टम (UAS) बनाने की एकीकृत इकाई स्थापित करेगी. वहीं, क्लासिक टेक्नोलॉजिस्टिक्स एंड ट्रेड 52 करोड़ रुपये के निवेश से एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग इकाई लगाएगी.
इन दोनों परियोजनाओं से कुल 1,170 रोजगार के अवसर पैदा होने का अनुमान है. इनमें स्टोनहॉक की परियोजना से 800 और क्लासिक टेक्नोलॉजिस्टिक्स की इकाई से 370 लोगों को रोजगार मिलेगा.
फार्मा और स्टील मैन्युफैक्चरिंग को भी मंजूरी
फार्मास्यूटिकल्स क्षेत्र में अमृताश हेल्थकेयर खुर्दा में 152.69 करोड़ रुपये का निवेश करेगी. प्रस्तावित इकाई में सालाना 1,500 मिलियन टैबलेट, 210 मिलियन कैप्सूल और 48 मिलियन इंजेक्शन बनाने की क्षमता होगी. इससे करीब 520 लोगों को रोजगार मिलने की संभावना है.
इसके अलावा स्टील डाउनस्ट्रीम और औद्योगिक मैन्युफैक्चरिंग की तीन परियोजनाओं में 323.81 करोड़ रुपये के निवेश को मंजूरी दी गई है. साहा स्टील संबलपुर में 72.81 करोड़ रुपये, एमपीआईएल स्टील स्ट्रक्चर्स जाजपुर में 200 करोड़ रुपये और आर्मर इंडस्ट्रीज सुंदरगढ़ में 51 करोड़ रुपये का निवेश करेगी.
लॉजिस्टिक्स और केमिकल सेक्टर में भी विस्तार
आरबी एबोड्स गंजाम में 209.35 करोड़ रुपये के निवेश से एक इंटीग्रेटेड लॉजिस्टिक्स पार्क स्थापित करेगी. इस परियोजना में 5 मेगावाट क्षमता का रूफटॉप सोलर पावर प्लांट भी शामिल होगा. इससे 345 लोगों को रोजगार मिलने का अनुमान है.
केमिकल और पेट्रोकेमिकल क्षेत्र की दो परियोजनाओं में 225 करोड़ रुपये के निवेश को मंजूरी मिली है. आरिश कोटिंग टेक्नोलॉजी खुर्दा में 50 करोड़ रुपये की लागत से इंडस्ट्रियल पेंट मैन्युफैक्चरिंग यूनिट स्थापित करेगी. वहीं, प्रोएक एनर्जी भद्रक में 175 करोड़ रुपये के निवेश से कैल्साइंड और ग्रेफाइटाइज्ड पेट्रोलियम कोक का उत्पादन करेगी.
इसके अलावा लिंडे साउथ एशिया सर्विसेज खुर्दा में 82 करोड़ रुपये के निवेश से ग्लोबल कॉम्पिटेंसी सेंटर स्थापित करेगी. यह सेंटर ट्रांसपोर्ट और रिमोट ऑपरेशंस पर काम करेगा और इससे 210 लोगों को रोजगार मिलने की उम्मीद है.
ओडिशा सरकार के मुताबिक, ये निवेश प्रस्ताव राज्य में औद्योगिक क्षमताओं के विस्तार, नए निवेश आकर्षित करने और रोजगार सृजन की रणनीति का हिस्सा हैं. ये परियोजनाएं सरकार के समृद्ध ओडिशा 2036 विजन के तहत विकास प्राथमिकताओं को भी आगे बढ़ाएंगी.
अल्केमी ग्रोथ कैपिटल के नेतृत्व में हुआ निवेश, अगले 3-4 वर्षों में देशभर में 40 से अधिक सेंटर और 4,000 से ज्यादा बेड की क्षमता विकसित करने की योजना
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के प्रमुख मानसिक स्वास्थ्य, नशामुक्ति और डिमेंशिया देखभाल नेटवर्क में शामिल जागृति रिहैबिलिटेशन सेंटर ने सीरीज A फंडिंग राउंड में 28 करोड़ रुपये जुटाए हैं. दिल्ली स्थित हेल्थकेयर और कंज्यूमर वेलनेस पर केंद्रित वेंचर कैपिटल फंड अल्केमी ग्रोथ कैपिटल ने इस निवेश का नेतृत्व किया है. यह संगठन का पहला संस्थागत निवेश है. इससे पहले जागृति ने अपने आंतरिक संसाधनों के जरिए नेटवर्क का विस्तार किया था.
वर्ष 2008 में स्थापित जागृति ने 2019 में दो केंद्रों से अपनी विस्तार यात्रा शुरू की थी. अब इसका नेटवर्क नौ शहरों में 19 से अधिक केंद्रों तक पहुंच चुका है. कंपनी इस निवेश का इस्तेमाल नए शहरों में विस्तार, क्लिनिकल सुविधाओं और कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने, विशेष देखभाल कार्यक्रमों को विकसित करने और बीमा कंपनियों तथा कॉरपोरेट संस्थानों के साथ साझेदारी मजबूत करने में करेगी.
कंपनी की योजना अगले 3-4 वर्षों में टियर-1 और टियर-2 शहरों में अपने केंद्रों की संख्या बढ़ाकर 40 से अधिक और बेड की क्षमता 4,000 से ज्यादा करने की है.
मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती मांग के बीच निवेश
भारत में मानसिक स्वास्थ्य, नशामुक्ति और पुनर्वास सेवाओं की मांग बढ़ रही है. हालांकि, इस क्षेत्र में सेवाएं अभी भी काफी हद तक छोटे स्वतंत्र केंद्रों और अलग-अलग क्लीनिकों के माध्यम से उपलब्ध हैं. ऐसे में एक संगठित नेटवर्क के जरिए समान क्लिनिकल मानकों के साथ बड़े स्तर पर सेवाएं उपलब्ध कराने की संभावनाएं बढ़ रही हैं.
जागृति रिहैबिलिटेशन सेंटर के संस्थापक एवं निदेशक डॉ. अमर शिंदे ने कहा कि यह पहला संस्थागत निवेश संगठन की यात्रा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है. वर्ष 2008 में इसकी शुरुआत इस उद्देश्य से की गई थी कि लोगों और उनके परिवारों को व्यवस्थित, संवेदनशील और चिकित्सकीय मार्गदर्शन के साथ देखभाल मिल सके. अब इस निवेश से देशभर में अधिक लोगों तक गुणवत्तापूर्ण मानसिक स्वास्थ्य और पुनर्वास सेवाएं पहुंचाने में मदद मिलेगी.
अल्केमी को मानसिक स्वास्थ्य क्षेत्र में नया अवसर
अल्केमी ग्रोथ कैपिटल की संस्थापक और मैनेजिंग पार्टनर अलका गोयल ने कहा कि भारतीय स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में मानसिक स्वास्थ्य सबसे बड़े लेकिन अभी तक कम संगठित क्षेत्रों में से एक है. जागृति ने मानसिक स्वास्थ्य, पुनर्वास और बुजुर्गों की देखभाल के क्षेत्र में भरोसेमंद पहचान बनाई है.
उन्होंने कहा कि संस्थागत निवेश लेने से पहले ही जागृति ने नौ शहरों में अपना मॉडल स्थापित कर लिया था और इसके पीछे एक पेशेवर प्रबंधन टीम तैयार की थी. अल्केमी का मानना है कि जागृति देश में मानसिक स्वास्थ्य, पुनर्वास और बुजुर्गों की देखभाल के क्षेत्र में एक प्रमुख विशेषीकृत हेल्थकेयर नेटवर्क बन सकती है.
अल्केमी का यह निवेश मानसिक स्वास्थ्य और पुनर्वास सेवाओं के क्षेत्र में उसका पहला निवेश है. इसके पोर्टफोलियो में डायग्नोस्टिक्स क्षेत्र की रेडक्लिफ लैब्स, मेडिकल डिवाइस कंपनी मेडविटल, आईवीडी डीपटेक क्षेत्र की डाटर कैंसर जेनेटिक्स, इमरजेंसी मेडिकल रिस्पॉन्स सेवा मेडुलेंस, ऑटोनॉमस मोबिलिटी रोबोट कंपनी अल्फाड्रॉइड और फार्मा मैन्युफैक्चरिंग में फिजिकल एआई पर काम करने वाली ल्यूमास शामिल हैं.
82 हजार से अधिक लोगों को दे चुका है सेवाएं
पुणे में वर्ष 2008 में मनोचिकित्सक डॉ. अमर शिंदे और विजया शिंदे ने जागृति की शुरुआत 10 बेड वाले केंद्र के रूप में की थी. वर्ष 2019 में हेमंत शिंदे बतौर सह-संस्थापक और सीईओ संगठन से जुड़े. उनके नेतृत्व में यह एक पेशेवर प्रबंधन वाले नेटवर्क के रूप में विकसित हुआ.
वर्तमान में जागृति के नौ शहरों में 19 से अधिक केंद्र हैं, जहां 1,600 से ज्यादा बेड और 40 से अधिक डॉक्टरों की टीम उपलब्ध है. संगठन अब तक मानसिक स्वास्थ्य, नशे और मादक पदार्थों के सेवन से जुड़ी समस्याओं तथा न्यूरोलॉजिकल देखभाल कार्यक्रमों के तहत 82,000 से अधिक लोगों को सेवाएं दे चुका है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) ने नौसेना के लिए आठ नेक्स्ट जेनरेशन कोरवेट (NGC) के निर्माण को मंजूरी दे दी है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत अपनी समुद्री सुरक्षा और नौसैनिक ताकत को मजबूत करने के लिए आठ नए अत्याधुनिक युद्धपोत बनाने जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार को हुई कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की बैठक में 40,000 करोड़ रुपये से अधिक की इस परियोजना को मंजूरी दी गई. इन युद्धपोतों का निर्माण स्वदेशी तकनीक और आधुनिक स्टेल्थ डिजाइन के आधार पर किया जाएगा.
सरकारी अधिकारियों के मुताबिक, इन आठ युद्धपोतों के निर्माण के लिए आने वाले कुछ दिनों में कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) और गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (GSL) के साथ अनुबंध पर हस्ताक्षर किए जाएंगे. इस परियोजना का उद्देश्य भारतीय नौसेना की मारक क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ देश में रक्षा विनिर्माण को भी प्रोत्साहित करना है.
2,000 टन वजन और 55 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार
नौसेना के लिए बनाए जाने वाले ये नेक्स्ट जेनरेशन कोरवेट करीब 2,000 टन वजन के होंगे. इनकी अधिकतम गति लगभग 30 नॉट्स यानी करीब 55 किलोमीटर प्रति घंटा होगी. इन युद्धपोतों को भारतीय नौसेना द्वारा विकसित नए स्टेल्थ डिजाइन पर तैयार किया जाएगा, जिससे दुश्मन के रडार की पकड़ में आने की आशंका कम होगी.
इन युद्धपोतों का निर्माण आधुनिक जहाज निर्माण तकनीकों के इस्तेमाल से किया जाएगा. इन्हें मल्टी-रोल प्लेटफॉर्म के रूप में विकसित किया जाएगा, ताकि समुद्र में अलग-अलग तरह के सुरक्षा और सैन्य अभियानों को अंजाम दिया जा सके.
2030 तक नौसेना को मिलेगा पहला युद्धपोत
रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इन आठ युद्धपोतों में से पहला जहाज 2030 तक भारतीय नौसेना को सौंपने का लक्ष्य रखा गया है. हालांकि, निर्माण की समय-सीमा को और कम करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं.
ये युद्धपोत हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में समुद्री सुरक्षा से जुड़े विभिन्न मिशनों को पूरा करने में सक्षम होंगे. इनके शामिल होने से भारतीय नौसेना की ऑपरेशनल क्षमता और युद्ध की तैयारी को मजबूती मिलने की उम्मीद है.
आत्मनिर्भर भारत को भी मिलेगा बढ़ावा
आठों युद्धपोतों का देश में निर्माण किया जाना रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. इससे घरेलू शिपबिल्डिंग उद्योग को बढ़ावा मिलेगा और सरकारी शिपयार्ड की निर्माण क्षमता का भी विस्तार होगा.
यह परियोजना प्रधानमंत्री के सागर (SAGAR- क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास) विजन के अनुरूप भी है. इसके जरिए भारत हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी समुद्री सुरक्षा क्षमता मजबूत करने के साथ स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने पर जोर दे रहा है.
केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री ने कहा कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में किसानों और घरेलू हितधारकों के संवेदनशील हितों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा. उनके मुताबिक, समझौते से भारत को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में नए अवसर मिलेंगे.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने गुरुवार को कहा कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते को अंतिम रूप दिए जाने के बाद भारत को मजबूत प्रतिस्पर्धी लाभ मिलेगा. उन्होंने भरोसा दिलाया कि इस समझौते में किसानों और अन्य घरेलू हितधारकों के हितों की पूरी तरह रक्षा की जाएगी.
इंस्टीट्यूट फॉर स्टडीज इन इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में गोयल ने कहा कि इस समझौते में घरेलू हितों से जुड़े किसी भी संवेदनशील मुद्दे पर समझौता नहीं किया जाएगा. इसके साथ ही भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार में नए अवसर पैदा होंगे.
गोयल ने कहा, "मुझे पूरे विश्वास के साथ यह घोषणा करने का साहस है कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते का पूरा विवरण सामने आने के बाद भारत के लोग इसका जश्न मनाएंगे, क्योंकि इसमें हमारे किसानों या किसी भी हितधारक के संवेदनशील हितों से जरा भी समझौता नहीं किया गया है."
उन्होंने आगे कहा, "इसके उलट, भारत को बहुत मजबूत प्रतिस्पर्धी लाभ मिलेगा. और व्यापार प्रतिस्पर्धी लाभ पर ही आधारित होता है."
मंत्री का यह बयान भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता को लेकर बढ़ी उम्मीदों के बीच आया है. इस महीने की शुरुआत में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के भारत दौरे के बाद बातचीत को लेकर सकारात्मक संकेत मिले थे. इस यात्रा के दौरान रुबियो ने संकेत दिया था कि कुछ ही हफ्तों में व्यापार समझौते को अंतिम रूप दिया जा सकता है. गोयल भी हाल में दोहरा चुके हैं कि बातचीत अंतिम चरण के करीब है.
छह साल में आठ व्यापार समझौते
भारत ने पिछले छह वर्षों में आठ व्यापार समझौते किए हैं और घरेलू निर्यातकों के लिए व्यापारिक साझेदारियों में विविधता लाने तथा बाजार तक पहुंच बढ़ाने के प्रयासों के तहत कई अन्य देशों के साथ बातचीत कर रहा है.
चालू वित्त वर्ष में भारत ने ओमान, ब्रिटेन और न्यूजीलैंड के साथ तीन मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) को लागू किया है. सरकार दिसंबर तक यूरोपीय संघ (EU) के साथ भी समझौते पर हस्ताक्षर करने का लक्ष्य लेकर चल रही है.
गोयल ने कहा कि इन समझौतों में 38 विकसित और अपेक्षाकृत समृद्ध देश शामिल हैं. उनके मुताबिक, इन देशों की अर्थव्यवस्थाएं भारत के साथ प्रतिस्पर्धा करने के बजाय एक-दूसरे की पूरक हैं.
उन्होंने कहा, "हम एक-दूसरे के पूरक हैं. जिन उत्पादों का हमें निर्यात करना है, उनकी जरूरत उन्हें है और जिन उत्पादों का उन्हें निर्यात करना है, उनकी जरूरत हमें है. यह दोनों पक्षों के लिए फायदे की स्थिति है."
संतुलित व्यापार समझौतों पर जोर
मंत्री ने संतुलित व्यापार समझौते करने के महत्व पर भी जोर दिया. उन्होंने कहा कि पहले हुए कुछ समझौतों के कारण भारत का व्यापार घाटा बढ़ा था. गोयल ने कहा, "असंतुलित समझौते आपको बहुत आगे नहीं ले जा सकते. 2014 से पहले हुए सभी समझौते वैश्विक अर्थव्यवस्था के केवल 10 लाख करोड़ डॉलर के हिस्से को कवर करते थे और मुख्य रूप से ऐसे देशों के साथ थे, जिनसे हमारी प्रतिस्पर्धा थी."
2014 से पहले भारत ने जापान और दक्षिण कोरिया के साथ-साथ दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संगठन (ASEAN) के सदस्य देशों के साथ व्यापार समझौते किए थे. गोयल का तर्क है कि इनमें से कई समझौते असंतुलित थे और इनके लागू होने के बाद भारत का व्यापार घाटा काफी बढ़ गया.
RCEP से बाहर रहने के फैसले को बताया अहम
गोयल ने नवंबर 2019 में क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP) समझौते की बातचीत से भारत के बाहर निकलने के फैसले का भी बचाव किया. उन्होंने कहा कि इस समझौते में शामिल होने से घरेलू विनिर्माण क्षेत्र पर प्रतिकूल असर पड़ सकता था.
RCEP में ASEAN के सदस्य देशों के अलावा ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जापान, दक्षिण कोरिया और चीन शामिल हैं. भारत शुरुआत में इस समझौते की बातचीत का हिस्सा था, लेकिन घरेलू उद्योगों के लिए बाजार पहुंच और सुरक्षा उपायों से जुड़े मुद्दों का समाधान नहीं होने की चिंता के कारण नवंबर 2019 में इससे बाहर हो गया था.
गोयल ने इस फैसले को भारत के विनिर्माण क्षेत्र के लिए निर्णायक मोड़ बताया. उनका कहना था कि इस समझौते में शामिल होने का मतलब घरेलू उद्योगों को चीनी आयात से अधिक प्रतिस्पर्धा के सामने ला देना होता.
उन्होंने कहा, "मैं आपको बताता हूं कि 4 नवंबर, 2019 को बैंकॉक में लिया गया एक फैसला ही इसकी वजह है कि आज हम विनिर्माण और भारत के उद्योगों की चर्चा कर रहे हैं." उन्होंने आगे कहा, "अन्यथा, हम भारत में चीनी सामान बेचने वाले सेल्समैन और सेल्सगर्ल्स का देश बनकर रह जाते."
अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन्स ने यूरोप की लिक्विड स्टोरेज और टर्मिनल कंपनी Evos Terminals के लिए 3.3 अरब डॉलर का बाध्यकारी प्रस्ताव दिया है. पांच देशों में फैले इस कंपनी के नेटवर्क में आठ टैंक टर्मिनल शामिल हैं.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अडानी समूह अपने अंतरराष्ट्रीय कारोबार के विस्तार की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है. अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन्स (APSEZ) ने यूरोप में कारोबार करने वाली लिक्विड स्टोरेज और टर्मिनल कंपनी Evos Terminals को खरीदने के लिए 3.3 अरब डॉलर यानी करीब 31 हजार करोड़ रुपये से अधिक की बोली लगाई है. इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले से जुड़े लोगों ने यह जानकारी दी है.
गौतम अडानी की अगुवाई वाली कंपनी इस सौदे के जरिए यूरोप के पोर्ट और एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहती है. खासकर ऐसे समय में जब भू-राजनीतिक अस्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं. पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर अडानी समूह के घरेलू पोर्ट वॉल्यूम पर भी पड़ा है. ऐसे में यूरोप में विस्तार कंपनी के लिए रणनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है.
पांच देशों में फैला है Evos का कारोबार
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, करीब पांच साल पुरानी Evos Terminals का स्वामित्व ग्लोबल एसेट मैनेजर Igneo Infrastructure Partners के पास है. यह First Sentier Group का हिस्सा है. कंपनी के पास यूरोप के पांच देशों के सात प्रमुख बंदरगाहों पर आठ टैंक टर्मिनल हैं. इनकी कुल स्टोरेज क्षमता 64 लाख क्यूबिक मीटर है. इस नेटवर्क के कारण Evos वैश्विक पोर्ट ऑपरेटरों और समुद्री इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के लिए रणनीतिक महत्व रखती है.
वर्ष 2025 में कंपनी का EBITDA 20 करोड़ यूरो रहने का अनुमान था. हालांकि, यह भी स्पष्ट किया गया है कि मौजूदा रियायती समझौतों को उनकी निर्धारित समाप्ति तिथि 1 नवंबर, 2028 के बाद आगे नहीं बढ़ाया जाएगा.
Evos के पोर्टफोलियो में गैसोलीन जैसे पारंपरिक मोटर ईंधन के भंडारण के साथ-साथ पर्यावरण के अनुकूल ईंधन भी शामिल हैं. इनमें बायोडीजल, सस्टेनेबल एविएशन टर्बाइन फ्यूल, ग्रीन नेफ्था, बायो-इथेनॉल, ई-मेथनॉल और बायो-मरीन फ्यूल शामिल हैं. इस तरह कंपनी का कारोबार पारंपरिक ईंधन के साथ ऊर्जा बदलाव से जुड़े नए विकल्पों तक फैला हुआ है.
कई वैश्विक कंपनियों ने दिखाई थी दिलचस्पी
इस साल की शुरुआत में Evos के मालिक Igneo ने कंपनी की बिक्री प्रक्रिया संचालित करने के लिए Morgan Stanley को नियुक्त किया था. इस प्रक्रिया में कई वैश्विक निवेशकों और कंपनियों ने दिलचस्पी दिखाई. इनमें KKR, EQT और अन्य वित्तीय निवेशक, Macquarie, Goldman Sachs Alternatives और BlackRock जैसे प्राइवेट इक्विटी समूह, CPP Investments जैसे पेंशन फंड तथा LBC Tank Terminals और Exolum जैसे ऑपरेटर शामिल थे.
आने वाले हफ्तों में हो सकता है अंतिम फैसला
मामले से जुड़े लोगों के मुताबिक, APSEZ ने इस सप्ताह की शुरुआत में प्रतिस्पर्धी नीलामी प्रक्रिया के तहत बाध्यकारी प्रस्ताव जमा किया है. आने वाले कुछ हफ्तों में इस पर अंतिम फैसला होने की उम्मीद है.
इस बीच Evos ने जुलाई में अपनी फाइनेंसिंग इकाई Evos Finance BV के जरिए 95 करोड़ यूरो का कर्ज जुटाया था. इस राशि का इस्तेमाल कंपनी ने अपने मौजूदा कर्ज के बड़े हिस्से को रीफाइनेंस करने के लिए किया. कंपनी ने प्राइवेट प्लेसमेंट और बैंक लोन के मिश्रण से यह वित्तपोषण जुटाया और इस प्रक्रिया में इन्वेस्टमेंट-ग्रेड रेटिंग भी हासिल की.
उस समय कंपनी के CEO हैरी डीन्स ने कहा था कि इससे Evos को अपनी रणनीति को अधिक प्रभावी ढंग से लागू करने में मदद मिलेगी. ऊर्जा बदलाव के दौर में ग्राहकों के साथ कारोबार बढ़ाने के नए अवसर सामने आ रहे हैं.
ब्रिटेन में ABP की बोली में मिली थी हार
Evos के अधिग्रहण की यह कोशिश ऐसे समय में हो रही है, जब पिछले सप्ताह अडानी समूह को ब्रिटेन की Associated British Ports (ABP) को खरीदने की 10 अरब पाउंड की दौड़ में IFM से हार का सामना करना पड़ा था.
इसके बाद बुधवार को APSEZ के प्रबंधन ने बताया कि कंपनी अपने वैश्विक विस्तार की योजना के तहत बंदरगाहों और टर्मिनलों सहित 20 संपत्तियों का मूल्यांकन कर रही है. कंपनी के CEO अश्वनी गुप्ता ने अर्निंग कॉल के दौरान कहा कि APSEZ की मुख्य ताकत कंटेनर कारोबार है. इसलिए कंपनी सबसे पहले उन अवसरों पर ध्यान देती है, जहां कंटेनर कारोबार के विस्तार की संभावना है. इसके साथ ही कंपनी लिक्विड टर्मिनलों में भी अवसर तलाश रही है. उन्होंने कहा कि भविष्य में बंदरगाह ऊर्जा बदलाव के लिए प्रवेश द्वार के रूप में काम कर सकते हैं.
APSEZ की अंतरराष्ट्रीय मौजूदगी
APSEZ भारत में 15 बंदरगाहों और टर्मिनलों का संचालन करती है. इसके अलावा इजराइल, तंजानिया, श्रीलंका और ऑस्ट्रेलिया में भी कंपनी की चार अंतरराष्ट्रीय सुविधाएं हैं. कंपनी 140 से अधिक तरह के लिक्विड कार्गो को संभालती है. उसके नए परिचालन खुलासों के मुताबिक, घरेलू स्तर पर उसकी कार्गो हैंडलिंग क्षमता 653 मिलियन मीट्रिक टन है.
अडानी समूह अपने समुद्री कारोबार के दूसरे क्षेत्रों में भी अंतरराष्ट्रीय विस्तार कर रहा है. समूह के मरीन प्लेटफॉर्म Astro Offshore ने यूरोप में अपनी डीपवाटर इंजीनियरिंग और ऑफशोर एग्जीक्यूशन क्षमताओं को मजबूत करने के लिए Oceaneering International के साथ एक अनुबंध किया है. इसके साथ ही APSEZ ने यूरोप में विशेष समुद्र के नीचे किए जाने वाले कार्यों के क्षेत्र में भी कदम रखा है.
वित्त मंत्रालय के एक आंतरिक नोट से पता चलता है कि अधिकारियों ने IDBI Bank के लिए Fairfax की बोली खोली और उसके बाद नए नियमों के तहत नए मूल्यांकन कराने के आदेश दिए. बैंक की जो कीमत आंकी गई, वह बोली से कम निकली.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
13 जुलाई, 2026 को नई दिल्ली में सरकारी अधिकारियों ने एक सीलबंद लिफाफा खोला. इसमें IDBI Bank के लिए Fairfax Financial की अंतिम पेशकश थी. उसी दिन उन्होंने बैंक की प्रस्तावित बिक्री के लिए तय पुरानी कीमत को खारिज कर दिया. इसके बाद यह तय करने के लिए नए नियमों के तहत नए मूल्यांकन कराने के आदेश दिए गए कि क्या यह पेशकश पर्याप्त है.
नए मूल्यांकन में कीमत बोली से कम आई. अक्टूबर में कैबिनेट ने 81 रुपये प्रति शेयर के भाव पर बिक्री को मंजूरी दे दी. सरकार ने कहा कि बोली 75.99 रुपये के स्वतंत्र मानक मूल्य से अधिक थी.
यह पूरा घटनाक्रम निवेश और सार्वजनिक संपत्ति प्रबंधन विभाग (DIPAM) के 10 पन्नों के एक आंतरिक नोट में दर्ज है. वित्त मंत्रालय का यही विभाग बैंक की बिक्री कर रहा है. यह नोट 13 अगस्त, 2026 का है और इस पर DIPAM के सचिव अरुणिश चावला के हस्ताक्षर हैं. BW ने यह नोट देखा है.
यह नोट विनिवेश पर सचिवों के कोर ग्रुप (CGD) के लिए तैयार किया गया था. यह वरिष्ठ अधिकारियों का वह समूह है जो बिक्री की प्रक्रिया चला रहा है. नोट में उनसे उस बोलीदाता को खरीदार के रूप में सिफारिश करने को कहा गया है, जिसे इसमें "QIP-3" कहा गया है. यही वह बोली है जिसे बाद में कैबिनेट ने मंजूरी दी: Fairfax की बोली.
नोट: इस खबर को नीचे DIPAM की प्रतिक्रिया के साथ अपडेट किया गया है. विभाग ने न तो नोट के अस्तित्व से इनकार किया है और न ही खबर में बताए गए घटनाक्रम के क्रम को खारिज किया है. खबर प्रकाशित होने के समय BW के ईमेल का PIB, DIPAM और वित्त मंत्रालय की ओर से कोई जवाब नहीं मिला था. उस समय कहा गया था कि जवाब मिलने पर उसे खबर में शामिल किया जाएगा.
अपने ही शब्दों में बताए गए नियम का उल्लंघन
सरकारी नीलामी में न्यूनतम कीमत पहले से तय की जानी चाहिए और यह प्रक्रिया बोली लगाने वालों की पेशकश से अनजान रहकर होनी चाहिए. अधिकारियों को यह जानकारी नहीं होनी चाहिए कि बोलीदाताओं ने कितनी कीमत की पेशकश की है.
नोट में भी यही बात कही गई है. इसमें DIPAM की अपनी नियमावली, इंडिकेटिव बुकलेट ऑन स्ट्रैटेजिक डिसइन्वेस्टमेंट का हवाला दिया गया है:
"सरकारी अधिकारियों को रिजर्व प्राइस तय करते समय बोलीदाताओं की ओर से लगाई गई वित्तीय बोलियों की राशि की जानकारी नहीं होगी, क्योंकि रिजर्व प्राइस तय होने से पहले वित्तीय बोलियां नहीं खोली जाती हैं."
अगले ही वाक्य में स्वीकार किया गया है कि इस नियम को छोड़ दिया गया:
"शुरुआत में इस प्रक्रिया को अपनाया गया था, लेकिन बोलियां रिजर्व प्राइस से कम थीं."
सीधे शब्दों में कहें तो सरकार ने एक बार नियम का पालन किया. बोलियां तय कीमत से कम रहीं. इसलिए उसने नियम का पालन करना बंद कर दिया.
नोट में दी गई तारीखें घटनाक्रम का क्रम बताती हैं:
12 मार्च, 2026: पहले दौर की बोलियां खोली गईं. दोनों बोलियां न्यूनतम कीमत से कम थीं. दोनों बोलीदाताओं से इस कीमत से मेल खाने वाली बोली लगाने को कहा गया. नोट में कहा गया है, "दोनों बोलीदाताओं ने रिजर्व प्राइस से मेल खाने से इनकार कर दिया."
2 और 27 अप्रैल: CGD ने मूल्यांकन एजेंसियों के साथ बैठक कर उनके तरीकों की समीक्षा की.
1 जून: Fairfax ने संशोधित सीलबंद बोली जमा की.
13 जुलाई, पहली बैठक: अधिकारियों ने Fairfax की संशोधित बोली खोली और उसे पहले स्थान पर रखा.
13 जुलाई, दूसरी बैठक: CGD ने फैसला किया कि पुरानी न्यूनतम कीमत का "दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता और इसे छोड़ दिया जाना चाहिए तथा नजरअंदाज किया जाना चाहिए." इसके बाद नए नियमों के तहत नए मूल्यांकन कराने का आदेश दिया गया.
13 अगस्त: मूल्यांकनकर्ताओं की रिपोर्ट आ गई. नोट में कहा गया कि उनके आकलन के मुकाबले Fairfax की बोली "उचित प्रतीत होती है."
पहली न्यूनतम कीमत 94.42 रुपये प्रति शेयर सार्वजनिक की जा चुकी है. बिजनेस स्टैंडर्ड ने खबर दी थी कि Fairfax की पहली बोली 75 रुपये थी. नया मानक मूल्य 75.99 रुपये इससे एक रुपये से भी कम अधिक है.
कीमत कैसे कम की गई
मूल्यांकनकर्ताओं को केवल दोबारा कोशिश करने के लिए नहीं कहा गया था. अधिकारियों ने उन्हें यह भी बताया कि मूल्यांकन किस तरह करना है. CGD की बैठक के मिनट्स दोनों एजेंसियों को भेजे गए और उनसे "उचित कार्रवाई करने" को कहा गया. इस प्रक्रिया में तीन बदलाव किए गए.
पहला: शेयर की कीमत को मूल्यांकन से बाहर कर दिया गया. जब IDBI के शेयर की कीमत अधिक थी, तो नोट में उसे बेकार बताया गया. इसमें कहा गया कि कीमत में "लगभग 100%" का उतार-चढ़ाव होने से "बाजार मूल्यांकन के उद्देश्य से उपयोगी नहीं रह जाता." CGD ने आदेश दिया कि बाजार मूल्यांकन का "इस्तेमाल नहीं किया जा सकता."
लेकिन जब शेयर की कीमत बोली से नीचे आ गई, तो उसी नोट में उसका सहारा लिया गया. इसमें कहा गया, "चूंकि बाजार मूल्य लगातार तीन महीने तक बोली में तय कीमत से नीचे रहा, इसलिए एक राय यह थी कि H-1 बोली प्रस्ताव को उचित परिणाम के रूप में स्वीकार किया जा सकता है." H-1 का मतलब सबसे अधिक बोली लगाने वाला है.
शेयर की कीमत को बढ़ाकर मूल्य तय करने के लिए बहुत अविश्वसनीय माना गया, लेकिन कम कीमत के पक्ष में तर्क देने के लिए पर्याप्त माना गया.
दूसरा: निजी बैंकों को तुलना से बाहर कर दिया गया. एक मूल्यांकन में IDBI की कीमत दूसरे बैंकों से तुलना करके तय की गई थी. CGD ने आदेश दिया कि इसमें केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को शामिल किया जाए. नोट में खुद "निजी क्षेत्र के बैंकों के बहुत ऊंचे बाजार मूल्य" का जिक्र है.
नोट स्वीकार करता है कि RBI 2019 से IDBI को निजी बैंक मानता है. लेकिन इसे "पूरी तरह तकनीकी कारण" बताकर खारिज कर दिया गया. इसके बाद निजी बैंकों को बाहर रखने का असली कारण बताया गया:
"तुलना के लिए निजी क्षेत्र के बैंकों को शामिल करने से रिजर्व प्राइस का अनुमान अधिक हो जाता है."
सीधे शब्दों में कहें तो निजी बैंकों को इसलिए बाहर किया गया क्योंकि उनसे IDBI की कीमत अधिक दिखाई देती. जबकि IDBI को एक निजी मालिक को बेचा जा रहा है, जो इसे निजी बैंक के रूप में चलाएगा.
तीसरा: संपत्ति का मूल्यांकन करने वाली एजेंसी को बताया गया कि क्या सुधार करना है. दूसरी एजेंसी ने IDBI की संपत्तियों, जिनमें जमीन और इमारतें शामिल हैं, का मूल्यांकन किया. CGD ने उससे कहा कि वह "ऐसे अनुमान दे जो परिदृश्यों के बजाय पेशेवर राय को दर्शाते हों और बैंक की ओर से दी गई अचल संपत्तियों के मूल्यांकन को सही करने में विफल न हों." इसके अलावा ब्रांड जैसी अमूर्त संपत्तियों को मूल्यांकन में शामिल करने के दायरे को भी सीमित किया गया.
Fairfax के मामले में अलग रवैया
सरकार ने IDBI का मूल्यांकन उसके बाजार भाव पर करने से इनकार कर दिया. बिक्री को मंजूरी मिलने के एक दिन बाद Fairfax के चेयरमैन प्रेम वत्स ने कहा कि Go Digit और IIFL Capital में Fairfax की अपनी हिस्सेदारी को IDBI में "उनके संबंधित बाजार मूल्यों" पर स्थानांतरित किया जाएगा.
'स्वतंत्र' मूल्यांकनकर्ता
सरकार ने यह नहीं बताया है कि 75.99 रुपये के मानक मूल्य के पीछे दो मूल्यांकन किस एजेंसियों ने किए थे. हालांकि, नोट में इसका जिक्र है.
KPMG India ट्रांजैक्शन एडवाइजर है. यह वह कंपनी है जिसे बिक्री की प्रक्रिया संचालित करने के लिए नियुक्त किया गया था. इसने IDBI की तुलना सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से करके मूल्यांकन किया. BDO Valuation Advisory LLP संपत्ति मूल्यांकनकर्ता है. इसने IDBI की संपत्तियों का मूल्यांकन किया.
कैबिनेट के फैसले के बाद चावला ने पत्रकारों से कहा था कि दो स्वतंत्र मूल्यांकन सलाहकारों ने बैंक का मूल्यांकन किया है. लेकिन नोट के अपने विवरण के अनुसार, दोनों में से एक मूल्यांकन उस सलाहकार ने किया था जिसकी जिम्मेदारी बिक्री पूरी कराना थी.
रियायतें और अल्टीमेटम
बिना कीमत बताए टैक्स में राहत
पहले दौर की बोली नाकाम रहने के बाद सरकार ने बोलीदाताओं को वह रियायत दी, जिसकी मांग दोनों ने की थी. उसने IDBI के विवादित आयकर मामलों की जिम्मेदारी उठाने पर सहमति जताई. CGD ने फैसला किया:
"ऐसी सभी विवादित आयकर मांगों के लिए क्षतिपूर्ति दी जाएगी, चाहे उन्हें IDBI के खातों में आकस्मिक देनदारियों के रूप में दर्ज किया गया हो या नहीं."
इसका मतलब है कि अगर IDBI ये मामले हारता है, तो नए मालिक के बजाय करदाताओं पर जोखिम आएगा. इसमें वे मामले भी शामिल हैं जिन्हें बैंक के खातों में जोखिम के रूप में दर्ज तक नहीं किया गया है.
नोट इसे "कम संभावना वाली घटना" और "सरकार के लिए नकदी के लिहाज से तटस्थ" बताता है. इसका तर्क है कि यदि कर विभाग जीतता है, तो सरकार खरीदार को पैसा वापस दे देगी. दूसरे शब्दों में, सरकार उस टैक्स को छोड़ रही है जिसे वह अन्यथा वसूल सकती थी.
कितनी राशि दांव पर है?
नोट में इसका जिक्र नहीं है. इसमें दावा किया गया है कि ऊंची बोली "क्षतिपूर्ति के तहत जोखिम में डाली गई राशि के मूल्य से कहीं अधिक है", लेकिन दोनों में से कोई भी आंकड़ा नहीं दिया गया है. यदि Fairfax की बोली 75 रुपये से बढ़कर 81 रुपये प्रति शेयर हुई, तो यह बढ़ोतरी करीब 3,900 करोड़ रुपये है. सरकार के अपने दावे के अनुसार, टैक्स संबंधी राहत का मूल्य इससे कम होना चाहिए.
मानो या छोड़ दो वाला प्रस्ताव। संशोधित बोली के साथ Fairfax ने एक पत्र भेजा. नोट में इसका हवाला दिया गया है:
"यह हमारी अंतिम पेशकश है और हमें विश्वास है कि यह हमारे दृढ़ विश्वास को दर्शाती है. हम पारदर्शी रहना चाहते हैं: यदि दोबारा बोली लगाने या बोलियों में और बढ़ोतरी करने को कहा जाता है, तो हम सम्मानपूर्वक इस प्रक्रिया से हट जाएंगे."
सरकार ने इसका विरोध नहीं किया. उसने इसे स्वीकार कर लिया.
मेज पर एक ही बोलीदाता। दूसरे बोलीदाता QIP-2 ने संशोधित बोली जमा ही नहीं की. उसने केवल इतना कहा कि उसकी पुरानी, कम कीमत वाली बोली अब भी कायम है. बोली लगाने के लिए मंजूरी पाने वाले चार पक्षों में से दो ने कभी बोली ही नहीं लगाई. नोट में कहा गया कि प्रक्रिया नए सिरे से शुरू करने का कोई फायदा नहीं था: "नई EoI जारी करने पर सफलता की संभावना बहुत कम होगी."
जल्दबाजी क्यों: सरकार को पैसे की जरूरत थी
सार्वजनिक रूप से सरकार इसे भारत के वित्तीय क्षेत्र में अब तक का सबसे बड़ा विदेशी निवेश बता रही है. लेकिन आंतरिक नोट में इसका एक सीधा कारण बताया गया है: सरकारी खजाने पर दबाव है.
आर्थिक मामलों के विभाग का हवाला देते हुए इसमें कहा गया है कि इस साल "मध्य पूर्व संघर्ष के प्रभाव के कारण असाधारण राजकोषीय दबाव देखने को मिला है." इसमें नुकसान का विवरण दिया गया है:
- उर्वरक और LPG की लागत में बढ़ोतरी.
- पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में कटौती, जिसके परिणामस्वरूप "राजस्व का काफी नुकसान हुआ."
- "विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आई है और रुपये पर भी दबाव रहा है."
नोट के मुताबिक, इस बिक्री से "राजकोषीय दबाव कम होगा" और इससे मिलने वाली नकदी "ऐसे साल में महत्वपूर्ण होगी, जब बजट का गणित दबाव में रहेगा."
कबाड़ बेचने के नियमों का सहारा
मूल न्यूनतम कीमत से कम पर बिक्री को सही ठहराने के लिए नोट में कुछ असामान्य उदाहरणों का सहारा लिया गया है. इसमें स्वीकार किया गया है कि सामान्य वित्तीय नियमों (GFR) में शेयर बेचने का कोई प्रावधान नहीं है. इसलिए इसमें वस्तुओं के निपटान से जुड़े नियमों का हवाला दिया गया. इसके बाद कबाड़ की नीलामी के लिए रेलवे स्टोर्स कोड का जिक्र किया गया:
"हालांकि, रिजर्व प्राइस से कम बोलियां डिपो अधिकारी द्वारा स्वीकार की जा सकती हैं, यदि ऐसा करना उचित पाया जाए और डिपो अधिकारी इसके कारणों को लिखित रूप में दर्ज करे."
नोट खुद इसे "सरकार के नियंत्रण वाले किसी बैंक के निजीकरण का पहला मामला" बताता है.
सुरक्षा संबंधी चिंता। गृह मंत्रालय ने दोनों बोलीदाताओं को मंजूरी दी थी, लेकिन उनमें से एक के संबंध में "अतिरिक्त जानकारी" दी थी. एक सुरक्षा समिति ने 25 फरवरी को "चिह्नित मुद्दों" की समीक्षा की और दोनों को मंजूरी दे दी. नोट में यह नहीं बताया गया है कि किस बोलीदाता को चिह्नित किया गया था या क्यों.
नोट में क्या नहीं बताया गया
नोट में Fairfax को खरीदार के रूप में सिफारिश की गई है. इसमें Fairfax की Go Digit और IIFL Capital में अपनी हिस्सेदारी IDBI में स्थानांतरित करने की योजना का जिक्र नहीं है. इसमें बोली की रकम, मूल्यांकन के आंकड़े या टैक्स संबंधी राहत की राशि भी नहीं दी गई है.
सरकार का पक्ष है कि 81 रुपये की कीमत दोनों मूल्यांकनों से अधिक थी और IDBI के शेयरों में कम कारोबार होने के कारण वे बैंक की वास्तविक कीमत नहीं दर्शा सकते थे.
अब ये सवाल उठते हैं:
- Fairfax की बोली खोले जाने के बाद मूल्यांकन कराने के आदेश क्यों दिए गए?
- क्या सरकार KPMG और BDO की रिपोर्ट सार्वजनिक करेगी?
- सरकार ने कितने रुपये के विवादित टैक्स की जिम्मेदारी लेने पर सहमति जताई है?
- गृह मंत्रालय ने किस बोलीदाता को चिह्नित किया था और क्यों?
- क्या बिक्री को मंजूरी देते समय कैबिनेट को Go Digit और IIFL की योजना के बारे में जानकारी थी?
अपडेट
उपरोक्त खबर 29 अक्टूबर को दोपहर 1:23 बजे प्रकाशित हुई थी.
इस खबर से संबंधित सवाल PIB, DIPAM और वित्त मंत्रालय को बुधवार, 28 अक्टूबर को सुबह 11:50 बजे भेजे गए थे.
DIPAM की ओर से स्पष्टीकरण 29 अक्टूबर को रात 9:45 बजे मिला.
DIPAM की प्रतिक्रिया
विभाग इस बात से इनकार नहीं करता कि नोट असली है या खबर में दिए गए किसी भी उद्धरण में कोई गलती है. उसके प्रमुख बिंदु, उसके अपने शब्दों में:
प्रक्रिया पर: DIPAM की आंतरिक प्रक्रियाएं "संकेतात्मक दिशानिर्देशों के स्वरूप में हैं, न कि कठोर नियमों या विनियमों के रूप में." 2017 के कैबिनेट फैसले के तहत CGD को "आवश्यकता के अनुसार बदलावों पर विचार करने" का अधिकार है.
रिजर्व प्राइस पर: "रिजर्व प्राइस न तो घटाई गई थी और न ही बढ़ाई गई थी. शुरुआती बोलियों को मंजूरी नहीं मिलने के बाद पहला दौर स्वयं निष्प्रभावी हो गया था."
समय पर: मूल्यांकन की पद्धति की "अप्रैल, 2026 में CGD ने सर्वश्रेष्ठ पेशकश वाली बोलियां आमंत्रित करने से पहले समीक्षा की थी." मूल्यांकनकर्ताओं ने "मई, 2026 में ही संशोधित मूल्यांकन पर काम शुरू कर दिया था. यह प्रक्रिया पूरी तरह दोहरी गोपनीयता वाली रही, क्योंकि बोलीदाता को मूल्यांकन की जानकारी नहीं थी और मूल्यांकनकर्ताओं ने बोलियां नहीं देखी थीं."
टैक्स संबंधी राहत पर: "इस आधार पर संभावित देनदारी केवल 627 करोड़ रुपये हो सकती थी, जबकि बोली से प्राप्त कीमत में 3,917 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई."
IDBI की तुलना केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से करने पर: कोई तुलनीय सौदा उपलब्ध नहीं था और "बाजार निवेशक इसे सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई के रूप में ही मूल्यांकित करते रहे."
DIPAM का पूरा स्पष्टीकरण पढ़ने के लिए 30 अक्टूबर को प्रकाशित होने वाली हमारी अगली खबर पढ़ें.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और द मार्केट माफिया: क्रॉनिकल ऑफ इंडियाज हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कैबल दैट वेंट स्कॉट-फ्री के लेखक हैं. यह पुस्तक भारत के वित्तीय बाजारों के अंधेरे पहलुओं को उजागर करते हैं. मुंबई में करीब दो दशक तक जमीनी स्तर पर रिपोर्टिंग करने वाले पलक ने धन, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की पड़ताल की है. उनके लेख भारत के प्रमुख वित्तीय समाचार पत्रों, जिनमें द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं. 19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुए पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक में मुंबई की गैंगवार की जगह संगठित अपराध के अधिक परिष्कृत रूप ने ले ली है. इसमें कॉरपोरेट इमारतों के भीतर चलने वाली सफेदपोश वित्तीय धोखाधड़ी शामिल है. इसी अनुभव ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया, जहां उन्होंने भारत की 'सफेद धन' अर्थव्यवस्था की जटिल कार्यप्रणाली को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम वित्तीय दुनिया की चमकदार सतह के पीछे काम करने वाले समूहों को उजागर करता है. सच सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे लोग नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें भारतीय पत्रकारिता में एक ऐसी प्रभावशाली आवाज बनाती है जो यथास्थिति को चुनौती देने और खुद को कानून से ऊपर समझने वालों को बेनकाब करने से नहीं हिचकती.)
गुरुवार को बीएसई सेंसेक्स 905.01 अंक यानी 1.24 फीसदी की बढ़त के साथ 74,151.04 पर बंद हुआ. वहीं, एनएसई निफ्टी 237.90 अंक यानी 1.05 फीसदी चढ़कर 22,900 के पार पहुंच गया.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
गुरुवार की जोरदार रिकवरी के बाद शुक्रवार को भारतीय शेयर बाजार की शुरुआत कमजोर रहने के संकेत मिल रहे हैं. अमेरिकी बाजारों में गिरावट और एशियाई बाजारों में भारी बिकवाली से निवेशकों का रुख सतर्क है. गिफ्ट निफ्टी 23,000 के नीचे फिसल गया है, जबकि ब्रेंट क्रूड 117 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है. पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी बाजार के लिए चिंता का विषय बनी हुई है. इस बीच आज कई बड़ी कंपनियां सितंबर तिमाही के नतीजे जारी करेंगी. ऐसे में वैश्विक संकेतों के साथ कंपनियों के वित्तीय प्रदर्शन और कारोबारी अपडेट पर भी निवेशकों की नजर रहेगी.
गुरुवार को सेंसेक्स 905 अंक चढ़ा, निफ्टी 22,900 के पार बंद
पिछले कारोबारी सत्र यानी गुरुवार, 29 अक्टूबर को भारतीय शेयर बाजार में जोरदार रिकवरी देखने को मिली. सेंसेक्स और निफ्टी दोनों बढ़त के साथ बंद हुए. कारोबार की शुरुआत मिले-जुले वैश्विक संकेतों के बीच लगभग सपाट हुई थी, लेकिन दिन बढ़ने के साथ खरीदारी तेज हो गई. खासतौर पर आईटी और बैंकिंग शेयरों में खरीदारी ने बाजार को मजबूती दी. ऑटो सेक्टर को छोड़कर लगभग सभी सेक्टरों में तेजी रही.
बीएसई सेंसेक्स 905.01 अंक यानी 1.24 फीसदी की बढ़त के साथ 74,151.04 पर बंद हुआ. वहीं, एनएसई निफ्टी 237.90 अंक यानी 1.05 फीसदी चढ़कर 22,900 के पार पहुंच गया. अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ओर से ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करने के फैसले से भी निवेशकों को राहत मिली. फेड ने प्रमुख ब्याज दर को 3.75 से 4 फीसदी के दायरे में बरकरार रखा.
गिफ्ट निफ्टी 23,000 के नीचे, कमजोर शुरुआत के संकेत
शुक्रवार को घरेलू बाजार की शुरुआत दबाव में रहने की आशंका है. गिफ्ट निफ्टी करीब 60 अंकों की गिरावट के साथ 23,000 के नीचे कारोबार कर रहा है. इससे भारतीय बाजार में भी कमजोर शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं. पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के बीच निवेशक सतर्क रुख अपना सकते हैं.
ब्रेंट क्रूड 117 डॉलर के पार, बढ़ी चिंता
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर उछाल आया है. ब्रेंट क्रूड करीब 2 फीसदी की तेजी के साथ 117 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया है. वहीं, अमेरिकी क्रूड WTI की कीमत 102-103 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में है.
पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने और अमेरिका की ओर से ईरान पर दोबारा सैन्य कार्रवाई की आशंका के बीच तेल की कीमतों पर दबाव बना हुआ है. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है. ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में लंबे समय तक तेजी रहने से देश के आयात बिल, महंगाई और अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है. इसका प्रभाव शेयर बाजार में निवेशकों की धारणा पर भी देखने को मिल सकता है.
अमेरिकी बाजारों में तीन दिन की तेजी पर लगा ब्रेक
गुरुवार को अमेरिकी शेयर बाजारों में गिरावट दर्ज की गई. लगातार तीन कारोबारी सत्रों से जारी तेजी के बाद डाओ जोंस, नैस्डैक और S&P 500 समेत प्रमुख इंडेक्स गिरावट के साथ बंद हुए. नैस्डैक में सबसे ज्यादा दबाव देखने को मिला और यह 1.37 फीसदी टूट गया. वहीं, डाओ जोंस 0.25 फीसदी और S&P 500 करीब 0.3 फीसदी गिरा.
एशियाई बाजारों में भारी बिकवाली
शुक्रवार को एशियाई बाजारों में भी बिकवाली का दबाव है. शुरुआती कारोबार में दक्षिण कोरिया का कोस्पी इंडेक्स 5.5 फीसदी से ज्यादा टूट गया, जबकि जापान का निक्केई 225 करीब 3 फीसदी गिर गया. शंघाई कंपोजिट में भी करीब 1 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.
टेक्नोलॉजी और सेमीकंडक्टर कंपनियों को लेकर निवेशकों की चिंता इस गिरावट की प्रमुख वजहों में शामिल है. बड़ी टेक कंपनियां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़े प्रोजेक्ट्स में भारी निवेश कर रही हैं, लेकिन इस निवेश से भविष्य में होने वाले मुनाफे को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है. इसका असर टेक्नोलॉजी शेयरों पर पड़ रहा है.
आज इन शेयरों पर रहेगी निवेशकों की नजर
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, शुक्रवार को रिलायंस इंडस्ट्रीज, जियो प्लेटफॉर्म्स, इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, सन फार्मा, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, वरुण बेवरेजेज, बैंक ऑफ बड़ौदा, गेल, आदित्य बिड़ला कैपिटल और मैक्स हेल्थकेयर के शेयरों पर नजर रहेगी. ये कंपनियां आज सितंबर तिमाही के वित्तीय नतीजे जारी करेंगी. इसके अलावा इक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक के शेयरों में एमडी और सीईओ पीएन वासुदेवन के इस्तीफे के बाद हलचल रह सकती है. कंपनी के शेयर में गुरुवार को 20 फीसदी की गिरावट आई थी. कोल इंडिया ने सितंबर तिमाही में सालाना आधार पर 57 फीसदी की बढ़त के साथ 6,547 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा दर्ज किया है. वहीं, ट्रेंट का मुनाफा 25 फीसदी बढ़कर 468 करोड़ रुपये रहा. कंपनी के चेयरमैन पद से नोएल एन टाटा के हटने की खबर भी चर्चा में है. इंडिगो की पैरेंट कंपनी ने सितंबर तिमाही में 1,879.1 करोड़ रुपये का कंसोलिडेटेड घाटा दर्ज किया है, हालांकि पिछले साल के मुकाबले घाटा कम हुआ है. वेदांता ऑयल एंड गैस 746 करोड़ रुपये के मुनाफे के साथ घाटे से उबरी है, जबकि फिनो पेमेंट्स बैंक को 20.9 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है. एफकॉन्स इन्फ्रास्ट्रक्चर को उत्तर प्रदेश में कुल 3,469 करोड़ रुपये के दो बड़े ईपीसी कॉन्ट्रैक्ट मिले हैं. गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स का सितंबर तिमाही में शुद्ध मुनाफा 13.84 फीसदी बढ़कर 522.92 करोड़ रुपये रहा. वहीं, इंडियन होटल्स और अदाणी एयरपोर्ट होल्डिंग्स ने आठ एयरपोर्ट होटलों के संचालन के लिए समझौता किया है. इसके अलावा सैजिलिटी में करीब 12 फीसदी हिस्सेदारी की संभावित ब्लॉक डील भी निवेशकों के रडार पर रहेगी. इस सौदे का अनुमानित मूल्य 2,377 करोड़ रुपये है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
जियो ने 30,200 करोड़ रुपये जुटाए. उसी दिन रिलायंस का बाजार मूल्य 51,700 करोड़ रुपये घट गया. बाहरी निवेशकों ने भारत के सबसे चर्चित शेयर को छूट पर खरीदा, जबकि जिन लोगों के पास यह पहले से था, उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयरधारकों के साथ हुआ अन्याय?
बुधवार को मुकेश अंबानी के कारोबारी साम्राज्य के लिए सबसे बड़ा दिन था.
जियो प्लेटफॉर्म्स की लिस्टिंग 21 फीसदी प्रीमियम पर हुई और शेयर करीब 27 फीसदी की बढ़त के साथ बंद हुआ. पहले ही दिन यह भारत की दूसरी सबसे मूल्यवान कंपनी बन गई. अंबानी समूह कुल बाजार मूल्य के मामले में टाटा समूह से आगे निकल गया. मुंबई के मरीन ड्राइव से लेकर दुबई के बुर्ज खलीफा तक जश्न मनाया गया, रोशनी और शो आयोजित किए गए.
लेकिन एक समूह इस जश्न से बाहर रह गया: वे लोग, जिनके पास जियो पहले से था.
रिलायंस इंडस्ट्रीज के 2 करोड़ से अधिक शेयरधारक रिलायंस के शेयरों के जरिए जियो के मालिक रहे हैं, जब से इसका पहला सिम कार्ड बेचा गया था. बुधवार को जब उनकी कंपनी का सबसे कीमती कारोबार तालियों की गड़गड़ाहट के बीच बाजार में उतरा, तब उन्होंने अपने ही शेयर को गिरते हुए देखा.
रिलायंस का शेयर 3.19 फीसदी गिरकर 1,158 रुपये पर आ गया, जो इसके 52 सप्ताह के निचले स्तर से सिर्फ 5.80 रुपये ऊपर था.
दिन का गणित
आइए, आंकड़ों को समझते हैं.
30,188 करोड़ रुपये: जियो ने आईपीओ से इतनी रकम जुटाई.
51,700 करोड़ रुपये: उसी दिन रिलायंस के शेयरधारकों के बाजार मूल्य में इतनी गिरावट आई.
कारोबारी सत्र की शुरुआत में रिलायंस का मूल्य करीब 16.19 लाख करोड़ रुपये था. सत्र के अंत में यह घटकर 15.67 लाख करोड़ रुपये रह गया.
मूल कंपनी को अपनी सहायक कंपनी द्वारा जुटाई गई रकम से 1.7 गुना अधिक का नुकसान हुआ. यह मूल्य को सामने लाने की प्रक्रिया नहीं थी. लिस्टिंग के दिन उन शेयरधारकों के लिए मूल्य का विनाश हुआ, जिन्होंने सबसे लंबे समय तक इंतजार किया था.
बाहरी निवेशकों ने छूट पर खरीदा
आईपीओ ने बाजार को वह सौदा दिया, जो रिलायंस के शेयरधारकों को कभी नहीं मिला.
बाहरी निवेशकों ने जियो को 1,119 रुपये प्रति शेयर पर खरीदा. शाम तक इसकी कीमत 1,417.50 रुपये हो गई. एंकर निवेशकों, संस्थानों, हाई नेटवर्थ इंडिविजुअल्स (HNIs) और खुदरा निवेशकों को एक ही दिन में 27 करोड़ नए शेयरों पर करीब 8,000 करोड़ रुपये का सामूहिक लाभ हुआ.
लिस्टिंग हुई. पिछले दरवाजे का रास्ता बंद हुआ. शेयर गिर गया.
रिलायंस के शेयरधारकों को उनकी हिस्सेदारी के अनुपात में जियो के शेयर नहीं मिले. इसके बजाय उन्हें दो चीजें मिलीं:
हिस्सेदारी में कमी.
आईपीओ नए शेयर जारी करके लाया गया था, इसलिए जियो में रिलायंस की हिस्सेदारी 66.43 फीसदी से घटकर करीब 64.48 फीसदी रह गई. नया पैसा जियो में आया, जिसका ज्यादातर इस्तेमाल उसका कर्ज चुकाने में होना है, जबकि नए शेयर बाहरी निवेशकों को मिले.
कतार में एक जगह.
एक आरक्षित कोटे के तहत रिलायंस के शेयरधारक बाकी निवेशकों के समान कीमत पर लॉटरी के जरिए जियो के शेयरों के लिए आवेदन कर सकते थे.
देखिए, इसका मूल्य कितना था. 12 शेयरों के एक लॉट के आवंटन से बुधवार को 3,582 रुपये का लाभ हुआ. उसी दिन रिलायंस के हर शेयर पर 38.20 रुपये का नुकसान हुआ.
94 से अधिक रिलायंस शेयर रखने वाले किसी भी शेयरधारक को रिलायंस में हुए नुकसान की रकम, जियो के एक लॉट से हुए लाभ से अधिक थी. इतनी हिस्सेदारी का मूल्य मुश्किल से 1.1 लाख रुपये था. शेयरधारकों को मिला कथित ‘इनाम’ उनके अपने ही नुकसान से मिट गया.
वह चेतावनी, जिस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया
इस स्थिति का अनुमान दो साल पहले ही लिखित रूप में लगाया गया था.
जब पहली बार जियो की लिस्टिंग पर चर्चा हुई थी, तब जेफरीज ने दो रास्ते बताए थे. रिलायंस फाउंडेशन के बजाय जियो फाइनेंशियल सर्विसेज के मामले की तरह स्पिन-ऑफ किया जाता, तो हर रिलायंस शेयरधारक को सीधे जियो के शेयर मिलते और होल्डिंग कंपनी पर लागू छूट से बचा जा सकता था. आईपीओ के जरिए रिलायंस अपना नियंत्रण बनाए रख सकती थी, लेकिन ब्रोकर ने चेतावनी दी थी कि इससे होल्डिंग कंपनी पर 20 फीसदी या उससे अधिक की छूट लागू हो सकती है.
जेफरीज का अनुमान था कि स्पिन-ऑफ से रिलायंस के शेयर में 15-18 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है. रिलायंस ने आईपीओ का रास्ता चुना.
इसका समझौता स्पष्ट था. स्पिन-ऑफ से जियो पर प्रमोटरों का प्रभावी नियंत्रण करीब 66 फीसदी से घटकर लगभग 33 फीसदी रह जाता. आईपीओ ने नियंत्रण रिलायंस के हाथों में बनाए रखा. अब बाजार ने उस नियंत्रण की कीमत तय कर दी है और रिलायंस के अल्पांश शेयरधारक इसकी कीमत चुका रहे हैं.
टेलीकॉम कारोबार से कम मूल्य का पूरा कारोबारी समूह
यह वह आंकड़ा है, जिसे हर रिलायंस शेयरधारक को लेकर चिंतित होना चाहिए.
जियो में रिलायंस की 64.48 फीसदी हिस्सेदारी का मूल्य अब करीब 8.41 लाख करोड़ रुपये है. पूरी रिलायंस कंपनी का मूल्य 15.67 लाख करोड़ रुपये है.
इससे बाकी सभी कारोबारों के लिए 7.26 लाख करोड़ रुपये बचते हैं: भारत का सबसे बड़ा रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स, सबसे बड़ा पेट्रोकेमिकल कारोबार, देश की सबसे बड़ी रिटेल चेन, तेल और गैस कारोबार तथा नवीकरणीय ऊर्जा में वह निवेश, जिसे अंबानी ने रिलायंस का भविष्य बताया है.
इन सभी का संयुक्त मूल्य अब टेलीकॉम कंपनी में रिलायंस की हिस्सेदारी के मूल्य से भी कम आंका जा रहा है, जिसकी लिस्टिंग सिर्फ एक दिन पहले हुई थी.
जो निवेशक जियो में निवेश करना चाहते हैं, उन्हें अब इसके लिए रिलायंस के शेयर खरीदने की जरूरत नहीं है. बाजार में चल रही चर्चाओं के मुताबिक, बुधवार को निवेशकों ने इसी दिशा में कदम उठाना शुरू कर दिया. बताया जा रहा है कि वेल्थ डेस्क और फैमिली ऑफिस जियो को सीधे खरीदने के लिए रिलायंस के शेयर बेच रहे थे.
लंबी गिरावट
बुधवार की गिरावट कोई एक दिन की घटना नहीं थी.
सितंबर में रिलायंस का शेयर 17 महीने के निचले स्तर पर पहुंच गया था. जियो का आईपीओ राहत देने वाला कदम माना जा रहा था, जिससे आखिरकार कंपनी के भीतर छिपे मूल्य को सामने आने की उम्मीद थी. निवेशकों ने जियो में अप्रत्यक्ष निवेश के विकल्प के रूप में आईपीओ से पहले रिलायंस के शेयर खरीदे थे.
अब रिलायंस का शेयर 1,611.80 रुपये के 52 सप्ताह के उच्च स्तर से 28 फीसदी नीचे है. पिछले एक साल में इसमें 22 फीसदी और छह महीने में 17 फीसदी की गिरावट आई है. छह साल पहले मेटा, गूगल और वैश्विक फंडों को जियो की हिस्सेदारी बेचने के बाद रिलायंस का शेयर रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचा था. इस बार जियो की लिस्टिंग ने इसे नए निचले स्तरों की ओर धकेल दिया.
बचाव में क्या तर्क दिए जाएंगे?
उनके पास भी कुछ तर्क हैं और उन्हें सुना जाना चाहिए.
मूडीज ने आईपीओ को क्रेडिट के लिहाज से सकारात्मक बताया था, क्योंकि इससे प्राप्त 27,500 करोड़ रुपये जियो इन्फोकॉम का कर्ज चुकाने में इस्तेमाल होंगे और पूरे समूह की ब्याज लागत कम होगी. रिलायंस का जियो पर नियंत्रण अब भी बरकरार है. उसकी हिस्सेदारी का मूल्य अब बाजार भाव के आधार पर तय हो रहा है. 115 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर कच्चे तेल की कीमतों और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के फैसले से पहले सतर्कता ने भी पूरे बाजार पर दबाव डाला. एयरटेल का शेयर भी गिरा.
लेकिन इनमें से कोई भी बात यह नहीं समझाती कि उसी दिन बाहरी निवेशकों ने 8,000 करोड़ रुपये कमाए, जबकि अंदरूनी शेयरधारकों को 51,700 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.
असली परीक्षा कल होगी
रिलायंस 30 अक्टूबर, शुक्रवार को सितंबर तिमाही के नतीजे जारी करेगी. पहली बार विश्लेषक ऐसी रिलायंस का मूल्यांकन करेंगे, जिसका सबसे बड़ा विकास इंजन अब अलग से बाजार में कारोबार कर रहा है और जिसका मूल्य बाजार भाव पर तय हो रहा है. साथ ही, होल्डिंग कंपनी पर छूट भी लागू हो रही है.
मुकेश अंबानी के सामने अब सवाल यह नहीं है कि जियो का मूल्य 13 लाख करोड़ रुपये है या नहीं. बाजार इसका जवाब दे चुका है.
सवाल यह है कि एक दशक तक जियो की तरक्की को वित्तपोषित करने वाले रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयरधारकों को उसका मूल्य किसी और के पास जाता हुआ क्यों देखना पड़ा.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और द मार्केट माफिया: क्रॉनिकल ऑफ इंडियाज हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कैबल दैट वेंट स्कॉट-फ्री के लेखक हैं. यह पुस्तक भारत के वित्तीय बाजारों के अंधेरे पहलुओं को उजागर करते हैं. मुंबई में करीब दो दशक तक जमीनी स्तर पर रिपोर्टिंग करने वाले पलक ने धन, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की पड़ताल की है. उनके लेख भारत के प्रमुख वित्तीय समाचार पत्रों, जिनमें द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं. 19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुए पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक में मुंबई की गैंगवार की जगह संगठित अपराध के अधिक परिष्कृत रूप ने ले ली है. इसमें कॉरपोरेट इमारतों के भीतर चलने वाली सफेदपोश वित्तीय धोखाधड़ी शामिल है. इसी अनुभव ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया, जहां उन्होंने भारत की 'सफेद धन' अर्थव्यवस्था की जटिल कार्यप्रणाली को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम वित्तीय दुनिया की चमकदार सतह के पीछे काम करने वाले समूहों को उजागर करता है. सच सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे लोग नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें भारतीय पत्रकारिता में एक ऐसी प्रभावशाली आवाज बनाती है जो यथास्थिति को चुनौती देने और खुद को कानून से ऊपर समझने वालों को बेनकाब करने से नहीं हिचकती.)