अमेरिका ने स्टील और आयरन आयात पर 25% टैरिफ लगाने का फैसला लिया है. ट्रंप प्रशासन के इस फैसले से कई देशों पर असर देखने को मिलेगा.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने स्टील और एल्युमीनियम इंपोर्ट पर 25% टैरिफ लगाने का आदेश जारी कर दिया है. टैरिफ स्टील और एल्युमीनियम के सभी अमेरिकी इंपोर्ट्स पर व्यापक रूप से लागू होंगे, जिसमें कनाडा और मैक्सिको भी शामिल हैं, जो अमेरिका के लिए टॉप दो मेटल सप्लायर हैं. ये टैरिफ फिनिश्ड मेटल प्रोडक्ट्स पर भी लागू होगा, जिसका मकसद रूस और चीन जैसे देशों की ओर से मौजूदा ड्यूटीज को दरकिनार करने की कोशिशों पर लगाम लगाना है.
सभी पर लागू होगा 25% टैरिफ
एक अमेरिकी अधिकारी के मुताबिक ट्रंप अपनी इस कोशिश के बारे में बताते हैं कि इससे घरेलू उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा और अमेरिका में ज्यादा से ज्यादा ज्यादा नौकरियां पैदा होंगी, लेकिन ये भी चेतावनी दी कि इससे मेटल के दाम बढ़ेंगे. नई दरें 4 मार्च से प्रभावी होंगी.
ट्रंप ने सोमवार को ओवल ऑफिस में इन फैसलों पर हस्ताक्षर करते हुए कहा, "अनिवार्य रूप से, हम बिना किसी अपवाद के, सभी एल्यूमीनियम और सभी स्टील पर 25% टैरिफ लगा रहे हैं, और इसका मतलब ये होगा कि संयुक्त राज्य अमेरिका में बहुत सारे बिजनेस खुलने जा रहे हैं.' हालांकि ट्रंप ने संकेत दिया कि US-मेड एयरक्राफ्ट को ध्यान में रखते हुए वो ऑस्ट्रेलिया को एक छूट देने पर विचार कर सकते हैं.
किन देशों पर सबसे ज्यादा असर दिखेगा?
स्टील और एल्युमीनियम पर 25% टैरिफ लगाने का फैसला मुख्य तौर पर कनाडा, मैक्सिको, यूरोप और जापान जैसे देशों पर देखने को मिलेगा. आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि भारत भी इससे पूरी तरह बच नहीं सकता है. सप्लाई ज्यादा बढ़ने से कीमतों पर असर दिखेगा और ये भारत के स्टील मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए अच्छा नहीं होगा.
भारत के लिए क्या है चुनौती?
मीडिया रिपोर्ट में Moody's Ratings के AVP, Hui Ting Sim के हवाले से कहा गया है कि भारतीय स्टील उत्पादकों के लिए अपने प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. बीते 12 महीने के दौरान भारत में स्टील आयात बढ़ने से कीमतों पर पहले ही असर देखने को मिल रहा है. स्टील कंपनियों के नतीजों पर इसका असर दिख रहा.
भारत के आयरन और स्टील आयात में 4% की गिरावट आई है, जबकि आयरन और स्टील आयात में चीन और इंडोनेशिया की हिस्सेदारी बढ़ी है. चीन के आयरन और स्टील आयात में 2024 में 20% की बढ़त दिखी है. जबकि इंडोनेशिया के आयात में पिछले साल की तुलना में 10% की बढ़ोतरी हुई है. कारोबारी साल 2025 के पहले छह महीनों में वियतनाम का भारत में आयरन और स्टील का आयात भी दोगुना हो गया. ये भारत के लिए पांचवां सबसे बड़ा स्टील आयातक देश बन गया है. दो साल पहले यह 19वें स्थान पर था.
लगातार दो हफ्तों की गिरावट के बाद भारत का विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड स्तर से काफी नीचे आ गया है. वैश्विक तनाव और मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच RBI की सक्रिय भूमिका जारी है, जिससे रुपये की स्थिरता बनाए रखी जा सके.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) में एक बार फिर गिरावट दर्ज की गई है, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 1 मई को समाप्त सप्ताह में देश का कुल विदेशी मुद्रा भंडार 7.794 अरब डॉलर घटकर 690.693 अरब डॉलर रह गया. यह गिरावट लगातार दूसरे सप्ताह देखने को मिली है, जिससे आर्थिक दबाव और वैश्विक अनिश्चितताओं का असर साफ दिखाई देता है.
लगातार दूसरे सप्ताह गिरावट
इससे पहले वाले सप्ताह में भी विदेशी मुद्रा भंडार में 4.82 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई थी, जिसके बाद यह 698.487 अरब डॉलर पर आ गया था. लगातार दो हफ्तों में गिरावट ने बाजार की चिंताओं को बढ़ा दिया है.
रिकॉर्ड स्तर से नीचे आया भंडार
विदेशी मुद्रा भंडार ने फरवरी 27 को समाप्त सप्ताह में 728.494 अरब डॉलर का रिकॉर्ड स्तर छुआ था. हालांकि इसके बाद से इसमें लगातार गिरावट देखने को मिल रही है. मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक बाजारों में अस्थिरता का असर उभरते बाजारों की मुद्राओं पर पड़ा है, जिसमें भारत भी शामिल है.
RBI की बाजार में सक्रिय भूमिका
रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की बिक्री के जरिए हस्तक्षेप किया है. इसका उद्देश्य मुद्रा बाजार को स्थिर बनाए रखना और अचानक गिरावट से बचाना है.
विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों में गिरावट
ताजा आंकड़ों के अनुसार, विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां, जो कुल भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा हैं, 2.797 अरब डॉलर घटकर 551.825 अरब डॉलर रह गईं. इनमें यूरो, ब्रिटिश पाउंड और जापानी येन जैसी गैर-अमेरिकी मुद्राओं में बदलाव का प्रभाव शामिल होता है.
सोने के भंडार में तेज गिरावट
इस अवधि में सोने के भंडार में भी बड़ी गिरावट दर्ज की गई. यह 5.021 अरब डॉलर घटकर 115.216 अरब डॉलर रह गया.
अन्य घटकों में मामूली बढ़ोतरी
स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (SDR) में हल्की बढ़ोतरी देखी गई और यह 15 मिलियन डॉलर बढ़कर 18.789 अरब डॉलर हो गया. वहीं अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) में भारत की आरक्षित स्थिति भी 8 मिलियन डॉलर बढ़कर 4.863 अरब डॉलर पर पहुंच गई.
लगातार दो हफ्तों की गिरावट के बाद भारत का विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड स्तर से काफी नीचे आ गया है. वैश्विक तनाव और मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच RBI की सक्रिय भूमिका जारी है, जिससे रुपये की स्थिरता बनाए रखी जा सके.
SBI के Q4 नतीजे संतुलित लेकिन दबाव वाले रहे. एक ओर मजबूत लोन ग्रोथ और रिकॉर्ड वार्षिक मुनाफा रहा, तो दूसरी ओर गैर-ब्याज आय में गिरावट और मार्जिन पर दबाव ने तिमाही प्रदर्शन को कमजोर किया.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश के सबसे बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही के नतीजे जारी कर दिए हैं. बैंक का शुद्ध लाभ सालाना आधार पर बढ़ा जरूर है, लेकिन गैर-ब्याज आय में भारी गिरावट और मार्जिन पर दबाव ने निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया. नतीजों के बाद बाजार में बैंक के शेयरों में तेज गिरावट देखने को मिली.
Q4 में मुनाफा 5.58% बढ़ा, लेकिन गति धीमी
मार्च तिमाही (Q4 FY26) में SBI का शुद्ध लाभ 5.58 फीसदी बढ़कर 19,684 करोड़ रुपये पर पहुंच गया. हालांकि, पिछली तिमाही (Q3) की तुलना में इसमें 6.39 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई, जो बैंकिंग प्रदर्शन में धीमेपन का संकेत देती है.
गैर-ब्याज आय में बड़ी गिरावट ने बढ़ाया दबाव
तिमाही के दौरान बैंक की गैर-ब्याज आय 29 फीसदी घटकर 17,314 करोड़ रुपये रह गई. यह गिरावट मुख्य रूप से निवेश बिक्री में 1,471 करोड़ रुपये के घाटे के कारण रही, जबकि पिछले साल इसी अवधि में बैंक को 6,879 करोड़ रुपये का लाभ हुआ था. इसके अलावा 100 करोड़ रुपये का मार्क-टू-मार्केट (MTM) घाटा भी दर्ज किया गया, जिसने कुल मुनाफे पर अतिरिक्त दबाव डाला.
ब्याज आय में सुधार, लेकिन मार्जिन पर असर
गैर-ब्याज आय में कमजोरी के बावजूद बैंक की शुद्ध ब्याज आय (NII) 4.1 फीसदी बढ़कर 44,380 करोड़ रुपये रही. यह वृद्धि मुख्य रूप से 16.9 फीसदी की मजबूत ऋण वृद्धि के कारण देखने को मिली. हालांकि, शुद्ध ब्याज मार्जिन (NIM) पर दबाव बना रहा और यह सालाना आधार पर 3% गिरकर तथा तिमाही आधार पर 18 बेसिस पॉइंट घटकर 2.93% पर आ गया. बैंक प्रबंधन के अनुसार, ब्याज दरों में कटौती का पूरा असर इस तिमाही में दिखा है.
पूरे वित्त वर्ष 2026 में रिकॉर्ड मुनाफा
कमजोर तिमाही प्रदर्शन के बावजूद पूरे वित्त वर्ष 2026 में SBI का प्रदर्शन मजबूत रहा. बैंक का शुद्ध लाभ 80,032 करोड़ रुपये के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया, जो सालाना आधार पर 12.9% की वृद्धि दर्शाता है. यह दिखाता है कि बैंक की लंबी अवधि की कमाई क्षमता अब भी मजबूत बनी हुई है, भले ही तिमाही में उतार-चढ़ाव देखने को मिला हो.
परिसंपत्ति गुणवत्ता में सुधार जारी
बैंक की परिसंपत्ति गुणवत्ता में भी सुधार देखा गया. सकल NPA घटकर 1.49% पर आ गया, जबकि शुद्ध NPA 0.39% पर स्थिर रहा. साथ ही प्रावधान खर्च में भी 21% की गिरावट दर्ज की गई, जो यह संकेत देती है कि बैड लोन पर दबाव धीरे-धीरे कम हो रहा है और बैंक की बैलेंस शीट मजबूत हो रही है.
शेयर बाजार में गिरावट
शुक्रवार को नतीजों के बाद निवेशकों की प्रतिक्रिया नकारात्मक रही. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) पर SBI का शेयर 6.62% गिरकर 1,019.55 रुपये पर बंद हुआ. बाजार में यह गिरावट मुख्य रूप से गैर-ब्याज आय में कमजोरी और मार्जिन पर दबाव के कारण देखी गई.
बैंक प्रबंधन ने वित्त वर्ष 2027 के लिए लगभग 3% NIM का अनुमान जताया है. साथ ही, यदि ऋण वृद्धि 13–15% के दायरे में बनी रहती है, तो जमा दरों में बड़े बदलाव की संभावना सीमित रहने की उम्मीद है.
गूगल की सबसे बड़ी योजनाओं में से एक विशाखापत्तनम में बनने वाला AI डेटा हब है. यह प्रोजेक्ट भारत का पहला गीगावाट-स्केल AI इंफ्रास्ट्रक्चर हब होगा, जिसमें तीन बड़े डेटा सेंटर कैंपस शामिल होंगे.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
दुनिया की दिग्गज टेक कंपनी गूगल (Google) भारत में एक बड़े निवेश प्लान पर काम कर रही है. कंपनी का फोकस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) इंफ्रास्ट्रक्चर, डेटा सर्वर और ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग जैसे हाई-टेक क्षेत्रों पर है. केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इस बात की पुष्टि करते हुए कहा कि गूगल भारत में बड़े पैमाने पर टेक्नोलॉजी इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने के अवसरों पर विचार कर रहा है. यह कदम भारत को ग्लोबल डिजिटल और AI मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की दिशा में अहम माना जा रहा है.
AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर फोकस, अरबों डॉलर का निवेश
गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई ने हाल ही में कंपनी के कैपिटल एक्सपेंडिचर में भारी बढ़ोतरी की घोषणा की है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस निवेश का बड़ा हिस्सा AI इंफ्रास्ट्रक्चर और डेटा सेंटर विकास पर खर्च किया जाएगा. कंपनी पहले ही भारत में लगभग 15 अरब डॉलर (करीब 1.25 लाख करोड़ रुपये) के निवेश की योजना का संकेत दे चुकी है. यह निवेश विशेष रूप से गीगावाट-स्केल AI इकोसिस्टम विकसित करने के लिए किया जा रहा है.
विशाखापत्तनम में बनेगा भारत का पहला AI गीगावाट हब
गूगल की सबसे बड़ी योजनाओं में से एक विशाखापत्तनम में बनने वाला AI डेटा हब है. यह प्रोजेक्ट भारत का पहला गीगावाट-स्केल AI इंफ्रास्ट्रक्चर हब होगा, जिसमें तीन बड़े डेटा सेंटर कैंपस शामिल होंगे. इस परियोजना के लिए आंध्र प्रदेश सरकार ने लगभग 600 एकड़ जमीन आवंटित की है. यह केंद्र भारत में AI और क्लाउड कंप्यूटिंग के भविष्य को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकता है.
अडानी और एयरटेल के साथ साझेदारी
इस बड़े प्रोजेक्ट कोगूगल ने भारतीय कंपनियों के साथ मिलकर आगे बढ़ाने का फैसला किया है. इसमें AdaniConneX जैसी कंपनियां शामिल हैं. यह साझेदारी भारत में मजबूत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने और डेटा सेंटर नेटवर्क को विस्तार देने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है.
भारत में मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने की रणनीति
केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि भारत अब इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग का एक भरोसेमंद ग्लोबल हब बनता जा रहा है. सरकार चाहती है कि वैश्विक टेक कंपनियां अपने सर्वर, GPU और चिप निर्माण भारत में ही करें. इससे न सिर्फ निवेश बढ़ेगा बल्कि देश में रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे.
AI और क्लाउड सेक्टर में बड़ा बदलाव
गूगल क्लाउड के सीईओ थॉमस कुरियन ने इस प्रोजेक्ट को भारत के डिजिटल भविष्य के लिए एक “टर्निंग पॉइंट” बताया है. वहीं गूगल क्लाउड के ग्लोबल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रमुख बिकाश कोली के मुताबिक यह AI हब भारत को वैश्विक AI अर्थव्यवस्था में मजबूत स्थान दिलाएगा. विशेषज्ञों का मानना है कि यह निवेश भारत में क्लाउड कंप्यूटिंग, डेटा प्रोसेसिंग और AI डेवलपमेंट को नई रफ्तार देगा.
भारत बन सकता है AI पावरहाउस
गूगल का यह मेगा प्लान साफ संकेत देता है कि आने वाले वर्षों में भारत वैश्विक AI और टेक्नोलॉजी इंफ्रास्ट्रक्चर का एक प्रमुख केंद्र बन सकता है. डेटा सेंटर, ड्रोन और AI सिस्टम में होने वाला यह निवेश देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि नियमित वेतन वाली नौकरियों में काम करने वाली महिलाओं को नौकरी की सुरक्षा, लिखित अनुबंध, पेड लीव और सोशल सिक्योरिटी जैसे लाभ मिलने की संभावना अधिक रहती है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश में महिलाओं की रोजगार स्थिति को लेकर आई SBI Research की नई रिपोर्ट में बड़ा खुलासा हुआ है. रिपोर्ट के मुताबिक, जो महिलाएं अपने परिवार की मुखिया होती हैं, उनके नियमित वेतन वाली नौकरी में होने की संभावना अन्य महिलाओं की तुलना में 4.4 प्रतिशत ज्यादा होती है.
यह अध्ययन पहली बार भारत के पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) के यूनिट-लेवल डेटा के आधार पर किया गया है. रिपोर्ट बताती है कि परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी संभालने वाली महिलाएं अधिक स्थिर और सुरक्षित रोजगार की ओर बढ़ रही हैं.
नियमित नौकरी में बेहतर सुरक्षा और सुविधाएं
रिपोर्ट में कहा गया है कि नियमित वेतन वाली नौकरियों में काम करने वाली महिलाओं को नौकरी की सुरक्षा, लिखित अनुबंध, पेड लीव और सोशल सिक्योरिटी जैसे लाभ मिलने की संभावना अधिक रहती है.
शोधकर्ताओं ने इसके लिए वर्क क्वालिटी इंडेक्स (WQI) तैयार किया, जिसमें तीन मुख्य पहलुओं को शामिल किया गया.
1. लिखित जॉब कॉन्ट्रैक्ट
2. पेड लीव की सुविधा
3. सोशल सिक्योरिटी लाभ
जिस कर्मचारी का WQI ज्यादा होता है, उसकी नौकरी को बेहतर गुणवत्ता वाली नौकरी माना गया है.
महिलाओं के लिए अब भी चुनौतीपूर्ण है रोजगार बाजार
हालांकि रिपोर्ट में महिला मुखियाओं की स्थिति बेहतर बताई गई है, लेकिन कुल मिलाकर महिलाओं के लिए रोजगार की स्थिति अब भी चिंताजनक बनी हुई है. रिपोर्ट के अनुसार, महिला कर्मचारियों के अनौपचारिक रोजगार (Informal Jobs) में होने की संभावना पुरुषों की तुलना में 4.8 प्रतिशत अधिक है. ऐसे रोजगार में न तो लिखित अनुबंध होता है और न ही पेड लीव या सोशल सिक्योरिटी की सुविधा मिलती है.
भारत में करीब 80 से 90 प्रतिशत कार्यबल अब भी अनौपचारिक रोजगार क्षेत्र में काम कर रहा है, जिसमें महिलाओं की हिस्सेदारी काफी ज्यादा है.
राज्यों के बीच रोजगार गुणवत्ता में बड़ा अंतर
SBI की रिपोर्ट में अलग-अलग राज्यों की रोजगार गुणवत्ता और श्रम भागीदारी दर की भी तुलना की गई है.
बेहतर प्रदर्शन वाले राज्य
कर्नाटक, तमिलनाडु और ओडिशा जैसे राज्यों में रोजगार भागीदारी और नौकरी की गुणवत्ता दोनों बेहतर पाई गईं.
कमजोर स्थिति वाले राज्य
उत्तर प्रदेश, बिहार और पंजाब में रोजगार भागीदारी और नौकरी की गुणवत्ता दोनों कम दर्ज की गईं.
ज्यादा काम लेकिन कम गुणवत्ता
राजस्थान और छत्तीसगढ़ में ज्यादा लोग काम कर रहे हैं, लेकिन वहां नौकरी की गुणवत्ता कमजोर है. इसका मतलब है कि रोजगार तो मिल रहा है, लेकिन उसमें सुरक्षा और सुविधाओं की कमी है.
ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा अनौपचारिक रोजगार
रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण क्षेत्रों में अनौपचारिक रोजगार की स्थिति ज्यादा गंभीर है. करीब 59 प्रतिशत अनौपचारिक कर्मचारी ग्रामीण इलाकों में काम करते हैं, जबकि 41 प्रतिशत शहरी क्षेत्रों में हैं. कृषि क्षेत्र अकेले 42 प्रतिशत अनौपचारिक रोजगार का हिस्सा है.
इसके अलावा ट्रेड, होटल और अन्य सेवा क्षेत्रों में भी बड़ी संख्या में लोग बिना सुरक्षा वाले रोजगार में काम कर रहे हैं.
न्यूनतम वेतन से कम कमाई कर रहे लाखों कर्मचारी
रिपोर्ट में मजदूरी को लेकर भी गंभीर चिंता जताई गई है. अध्ययन के अनुसार, भारत में करीब 25 प्रतिशत अस्थायी कर्मचारी न्यूनतम वेतन से कम कमाई कर रहे हैं. छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड में सबसे ज्यादा कर्मचारी न्यूनतम मजदूरी से कम वेतन पा रहे हैं. महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में भी लगभग एक-तिहाई अस्थायी कर्मचारी कम भुगतान का सामना कर रहे हैं.
महिलाएं कुल अंडरपेड कर्मचारियों में लगभग 45 प्रतिशत हिस्सेदारी रखती हैं, जबकि अस्थायी कार्यबल में उनकी हिस्सेदारी केवल 25 प्रतिशत है. यह वेतन असमानता की गंभीर तस्वीर पेश करता है.
ट्रेनिंग और स्किल डेवलपमेंट से बदल सकती है तस्वीर
रिपोर्ट में स्किल ट्रेनिंग को रोजगार सुधार का बड़ा माध्यम बताया गया है. जिन कर्मचारियों ने किसी प्रकार की ट्रेनिंग ली है, उनके अनौपचारिक रोजगार में रहने की संभावना 4.8 प्रतिशत तक कम हो जाती है.
महिलाओं के मामले में सरकारी फंडिंग वाली ट्रेनिंग से स्वरोजगार की संभावना 5.8 प्रतिशत बढ़ती है, जबकि खुद के खर्च पर ली गई ट्रेनिंग से नियमित नौकरी मिलने की संभावना 3 प्रतिशत तक बढ़ जाती है.
रोजगार सुधार के लिए सख्त कदम जरूरी
रिपोर्ट में कहा गया है कि महिलाओं की बेहतर रोजगार भागीदारी के लिए स्किल डेवलपमेंट, औपचारिक रोजगार और सोशल सिक्योरिटी को बढ़ावा देना बेहद जरूरी है. इसके साथ ही न्यूनतम वेतन कानून का सख्ती से पालन कराने और अनौपचारिक रोजगार को कम करने के लिए बड़े श्रम सुधारों की आवश्यकता बताई गई है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि महिलाओं को बेहतर ट्रेनिंग, रोजगार सुरक्षा और वित्तीय अवसर मिलें, तो उनकी आय और नौकरी की गुणवत्ता दोनों में बड़ा सुधार हो सकता है.
यह IPO देश के स्टार्टअप और ई-कॉमर्स सेक्टर के लिए भी बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि निवेशकों की नजर लंबे समय से क्विक कॉमर्स कंपनियों पर टिकी हुई है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत की तेजी से उभरती क्विक कॉमर्स कंपनी जेप्टो (Zepto)अब शेयर बाजार में बड़ी एंट्री करने जा रही है. 10 मिनट में ग्रॉसरी डिलीवरी के लिए मशहूर यह स्टार्टअप अपने मेगा IPO के जरिए निवेशकों के बीच नया उत्साह पैदा करने की तैयारी में है. बाजार नियामक संस्था भारतीय प्रतिभूति एवं विनियम बोर्ड (SEBI) से मंजूरी मिलने के बाद कंपनी का पब्लिक लिस्टिंग का रास्ता लगभग साफ हो चुका है.
कंपनी इस IPO के जरिए करीब ₹7,500 करोड़ से ₹9,300 करोड़ तक जुटाने की योजना बना रही है. माना जा रहा है कि यह फंडिंग Zepto को अपने बिजनेस विस्तार और प्रतिस्पर्धियों के खिलाफ मजबूत स्थिति बनाने में बड़ी मदद करेगी.
₹9300 करोड़ तक जुटाने की तैयारी
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जेप्टो अपने IPO के जरिए 80 करोड़ डॉलर से 1 अरब डॉलर तक की पूंजी जुटा सकती है. भारतीय मुद्रा में यह रकम लगभग ₹9,300 करोड़ तक पहुंचती है. कंपनी फिलहाल अपने अपडेटेड ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (UDRHP) को अंतिम रूप देने में लगी हुई है. यदि सब कुछ तय समय के अनुसार रहा, तो अगले 2 से 3 महीनों के भीतर कंपनी शेयर बाजार में लिस्ट हो सकती है.
यह IPO देश के स्टार्टअप और ई-कॉमर्स सेक्टर के लिए भी बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि निवेशकों की नजर लंबे समय से क्विक कॉमर्स कंपनियों पर टिकी हुई है.
सिर्फ 4 साल में स्टार्टअप से स्टॉक मार्केट तक
जेप्टो की शुरुआत साल 2020 में हुई थी और बेहद कम समय में कंपनी ने बाजार में अपनी मजबूत पहचान बना ली. महज चार वर्षों में IPO तक पहुंचना किसी भी भारतीय स्टार्टअप के लिए बड़ी उपलब्धि माना जाता है. लिस्टिंग के बाद Zepto देश की पहली ऐसी “प्योर प्ले क्विक कॉमर्स” कंपनी बन सकती है, जिसका मुख्य फोकस केवल फास्ट डिलीवरी बिजनेस मॉडल पर आधारित है. कंपनी की तेज ग्रोथ और ग्राहकों के बीच बढ़ती लोकप्रियता ने इसे भारत के सबसे चर्चित स्टार्टअप्स में शामिल कर दिया है.
ब्लिंकिट और इंस्टामार्ट को चुनौती देने की तैयारी
क्विक कॉमर्स सेक्टर में प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ती जा रही है. जेप्टो को बाजार में पहले से मौजूद बड़े खिलाड़ियों जैसे Blinkit, Swiggy Instamart, Amazon Now, Flipkart Minutes और BigBasket जैसी कंपनियों से कड़ी टक्कर मिल रही है. इसी वजह से कंपनी अब अपने नेटवर्क, डिलीवरी इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी को मजबूत करने पर बड़ा निवेश करना चाहती है. IPO से जुटाई जाने वाली राशि का बड़ा हिस्सा बिजनेस विस्तार और नए शहरों में पहुंच बढ़ाने पर खर्च किया जा सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में क्विक कॉमर्स सेक्टर भारत में ई-कॉमर्स का सबसे तेजी से बढ़ने वाला हिस्सा बन सकता है.
रिकॉर्ड रफ्तार से बढ़ रहे हैं ऑर्डर
जेप्टो की ग्रोथ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कंपनी के दैनिक ऑर्डर में जबरदस्त उछाल आया है. कुछ समय पहले तक कंपनी हर दिन करीब 15 से 17 लाख ऑर्डर डिलीवर करती थी, जबकि अब यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 25 लाख ऑर्डर प्रतिदिन तक पहुंच गया है. ग्राहकों की बढ़ती संख्या यह दिखाती है कि भारत में 10 मिनट डिलीवरी मॉडल तेजी से लोकप्रिय हो रहा है और लोग तेजी से क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स की ओर आकर्षित हो रहे हैं.
निवेशकों की नजर रहेगी IPO पर
जेप्टो का IPO आने वाले समय में भारतीय शेयर बाजार के सबसे चर्चित इश्यू में से एक बन सकता है. खासतौर पर युवा निवेशक और टेक स्टार्टअप्स में दिलचस्पी रखने वाले लोग इस IPO पर नजर बनाए हुए हैं. हालांकि, किसी भी IPO में निवेश करने से पहले कंपनी की वित्तीय स्थिति, वैल्यूएशन और बाजार जोखिमों को समझना बेहद जरूरी होता है.
मुंबई में आयोजित एक इंडस्ट्री इंटरैक्शन कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को और मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत और इजिप्ट ने द्विपक्षीय व्यापार को 12 अरब डॉलर तक पहुंचाने के लिए डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, फिनटेक, स्टार्टअप, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, लॉजिस्टिक्स और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया है. मुंबई में आयोजित एक इंडस्ट्री इंटरैक्शन कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को और मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया.
भारत-मिस्र रणनीतिक साझेदारी को मिल रही नई गति
मुंबई में मिस्र की कौंसल जनरल डालिया मोहम्मद नाजिह मोहम्मद तवाकोल ने कहा कि भारत और मिस्र के बीच ऐतिहासिक और मजबूत द्विपक्षीय संबंध रहे हैं. उन्होंने बताया कि जून 2023 में हुए स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट और अक्टूबर 2025 में आयोजित पहले इंडिया-इजिप्ट स्ट्रैटर्जिक डायलॉग (Egypt-India Strategic Dialogue) के बाद दोनों देशों के बीच डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, फिनटेक, स्टार्टअप और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में सहयोग तेजी से बढ़ा है.
विदेशी निवेश के लिए मिस्र खोल रहा नए अवसर
तवाकोल ने कहा कि मिस्र सरकार व्यापार को आसान बनाने और छोटे एवं मध्यम उद्योगों (SMEs) को समर्थन देने पर फोकस कर रही है. उन्होंने कहा कि मिस्र में विदेशी निवेशकों के लिए कई क्षेत्रों में बड़े अवसर मौजूद हैं, जिनमें शामिल हैं:
1. रिन्यूएबल एनर्जी और ग्रीन हाइड्रोजन
2. पर्यटन और हॉस्पिटैलिटी
3. कृषि और एग्रीबिजनेस
4. IT सेवाएं और बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग
5. मैन्युफैक्चरिंग
6. फार्मास्युटिकल्स और हेल्थकेयर
7. लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्टेशन
भारतीय कंपनियों के लिए मिस्र बन सकता है रणनीतिक गेटवे
कार्यक्रम में मौजूद उद्योग प्रतिनिधियों ने कहा कि मिस्र की इंडस्ट्रियल फ्री जोन नेटवर्क और उसकी भौगोलिक स्थिति भारतीय निर्यातकों के लिए अफ्रीका, भूमध्यसागरीय और मध्य-पूर्वी बाजारों तक पहुंचने का अहम केंद्र बन सकती है.
MVIRDC वर्ल्ड ट्रेड सेंटर मुंबई के चेयरमैन और ऑल इंडिया एसोसिएशन ऑफ इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष विजय कलंत्री ने लॉजिस्टिक्स कनेक्टिविटी के जरिए व्यापार की संभावनाओं को रेखांकित किया. उन्होंने कहा, “भारत और मिस्र के बीच मजबूत रणनीतिक साझेदारी है और दोनों देशों के आर्थिक संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं. वर्तमान में द्विपक्षीय व्यापार लगभग 5 अरब डॉलर का है और 2030 तक इसे 12 अरब डॉलर के पार ले जाने का साझा लक्ष्य रखा गया है.”
सुएज नहर को बताया वैश्विक व्यापार की अहम कड़ी
उन्होंने वैश्विक व्यापार प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने में समुद्री मार्गों की अहम भूमिका पर भी जोर दिया. उन्होंने कहा, “मिस्र लॉजिस्टिक्स, मैन्युफैक्चरिंग, पर्यटन, प्राकृतिक संसाधन और सुएज नहर के जरिए कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों में बड़े अवसर प्रदान करता है. सुएज नहर आज भी वैश्विक कार्गो मूवमेंट, व्यापार दक्षता और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है.”
वीजा और एयर कनेक्टिविटी पर भी चर्चा
कार्यक्रम में निवेशकों के लिए वीजा प्रक्रियाओं को आसान बनाने और दोनों देशों के बीच एयर कनेक्टिविटी बेहतर करने पर भी चर्चा हुई. इजिप्ट की वाइस कौंसल दीना अल्बाहे ने कहा, “वीजा प्रक्रिया सरल है और इसकी शर्तें भी आसान हैं. मिस्र पात्र आवेदकों को सिंगल-एंट्री, मल्टीपल-एंट्री और पांच साल तक के वीजा प्रदान करता है. निवेशक कंपनी में शेयरधारक या पूंजी निवेश करने वाले पार्टनर के रूप में पात्रता हासिल कर सकते हैं, जिसे GAFI की सिफारिशों का समर्थन प्राप्त होता है.”
व्यापार और यात्रा को मिलेगा बढ़ावा
इजिप्टएयर की डालिया हाफेज ने कहा कि बेहतर एयर कनेक्टिविटी व्यापार और पर्यटन दोनों को बढ़ावा देने में मदद करेगी. भारत और मिस्र के बीच बढ़ती रणनीतिक साझेदारी आने वाले वर्षों में व्यापार, निवेश और तकनीकी सहयोग को नई ऊंचाई दे सकती है. डिजिटल टेक्नोलॉजी, लॉजिस्टिक्स और ग्रीन एनर्जी जैसे क्षेत्रों में सहयोग दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाएगा.
बाजार में भारी गिरावट के बीच LIC ने दिखाई आक्रामक निवेश रणनीति, Bajaj Finance, Infosys, TCS और IRFC समेत कई बड़ी कंपनियों में निवेश बढ़ाया है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में मार्च तिमाही के दौरान जब भारी बिकवाली का माहौल था और निवेशकों में घबराहट बढ़ रही थी, उसी समय देश की सबसे बड़ी घरेलू संस्थागत निवेशक कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) ने बड़ा दांव खेलते हुए करीब 18,500 करोड़ रुपये का निवेश किया. LIC ने उन कंपनियों के शेयर खरीदे, जिनमें तिमाही के दौरान 20% से 30% तक की गिरावट देखने को मिली थी. बाजार के जानकार इसे “बाय द डिप” रणनीति का सबसे बड़ा उदाहरण मान रहे हैं.
Bajaj Finance में सबसे बड़ा निवेश
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, LIC ने इस तिमाही में सबसे ज्यादा खरीदारी बजाज फाइनेंस (Bajaj Finance) के शेयरों में की. कंपनी ने करीब 2.32 करोड़ अतिरिक्त शेयर खरीदकर लगभग 2,167 करोड़ रुपये का निवेश किया. खास बात यह रही कि इस दौरान Bajaj Finance का शेयर करीब 19% टूट चुका था. इसके अलावा LIC ने Bharti Airtel में 2,153 करोड़ रुपये और TCS में 2,143 करोड़ रुपये का निवेश किया.
IRFC में हिस्सेदारी बढ़ने से बाजार में चर्चा तेज
सबसे ज्यादा चर्चा इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉर्पोरेशन (IRFC) में बढ़ाई गई हिस्सेदारी को लेकर हो रही है. LIC ने IRFC के 18.72 करोड़ अतिरिक्त शेयर खरीदे, जिनकी अनुमानित वैल्यू करीब 2,044 करोड़ रुपये रही. मार्च तिमाही में IRFC का शेयर लगभग 30% गिरा था. इसके बावजूद LIC ने इस PSU कंपनी में अपनी हिस्सेदारी 1.10% से बढ़ाकर 2.54% कर दी.
आईटी और डिफेंस सेक्टर पर भी जताया भरोसा
LIC ने आईटी सेक्टर में भी मजबूत भरोसा दिखाया. कंपनी ने Infosys में करीब 1,897 करोड़ रुपये और HAL में लगभग 1,819 करोड़ रुपये का निवेश किया. इस दौरान इंफोसिस (Infosys) का शेयर करीब 23% और हिंदुस्तान एयरोनॉटिकेस (HAL) का शेयर लगभग 21% तक टूट चुका था. इसके अलावा एचसीएल (HCL Technologies), हुंडई (Hyundai Motor India) और मारुति सुजुकी (Maruti Suzuki) भी LIC की प्रमुख खरीदारी वाली कंपनियों में शामिल रहीं.
बैंकिंग शेयरों में की मुनाफावसूली
जहां एक ओर LIC ने कई गिर चुके शेयरों में खरीदारी की, वहीं दूसरी ओर कंपनी ने कुछ बैंकिंग और मेटल शेयरों में मुनाफावसूली भी की. सबसे बड़ी बिकवाली भारतीय स्टेट बैंक (SBI) में देखने को मिली, जहां LIC ने करीब 4,626 करोड़ रुपये के शेयर बेचे. इसके अलावा आईसीआईसीआई (ICICI Bank) और एचडीएफसी (HDFC Bank) में भी हिस्सेदारी कम की गई.
लंबी अवधि के नजरिए से निवेश
विशेषज्ञों का मानना है कि LIC ने बाजार की कमजोरी को लंबी अवधि के निवेश अवसर के रूप में देखा है. बड़े और मजबूत फंडामेंटल वाली कंपनियों में गिरावट के दौरान निवेश कर LIC ने यह संकेत दिया है कि वह अल्पकालिक उतार-चढ़ाव के बजाय लंबी अवधि के रिटर्न पर फोकस कर रही है.
मजबूत वित्तीय प्रदर्शन के बाद कंपनी ने अपने निवेशकों के लिए 90.50 रुपये प्रति शेयर का फाइनल डिविडेंड भी घोषित किया है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
एफएमसीजी सेक्टर की दिग्गज कंपनी ब्रिटानिया (Britannia Industries) ने वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही में शानदार प्रदर्शन किया है. कंपनी का मुनाफा बढ़कर 679.68 करोड़ रुपये पहुंच गया है, जबकि मजबूत बिक्री और प्रीमियम प्रोडक्ट्स की बढ़ती मांग ने इसके नतीजों को मजबूती दी है. इसी के साथ कंपनी ने निवेशकों के लिए 90.50 रुपये प्रति शेयर का फाइनल डिविडेंड भी घोषित किया है.
Q4 में 21% बढ़ा मुनाफा
मार्च 2026 तिमाही में ब्रिटानिया का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 21.6% बढ़कर 679.68 करोड़ रुपये हो गया, जो पिछले साल इसी अवधि में 559.13 करोड़ रुपये था. कंपनी की कुल आय भी बढ़कर 4,718.92 करोड़ रुपये पर पहुंच गई, जबकि एक साल पहले यह 4,432.19 करोड़ रुपये थी. मजबूत मांग और प्रोडक्ट पोर्टफोलियो ने इस वृद्धि में अहम भूमिका निभाई.
रेवेन्यू और प्रॉफिट में लगातार मजबूती
कंपनी का प्रॉफिट बिफोर टैक्स (PBT) भी बढ़कर 785.11 करोड़ रुपये हो गया, जबकि पिछले वर्ष इसी तिमाही में यह 751.93 करोड़ रुपये था. Q4 में कंपनी की बिक्री 7.1% बढ़कर 4,686 करोड़ रुपये रही. यह लगातार बेहतर होती उपभोक्ता मांग को दर्शाता है.
पूरे वित्त वर्ष में मजबूत प्रदर्शन
पूरे वित्त वर्ष 2026 में कंपनी का प्रदर्शन स्थिर और मजबूत रहा.
1. कुल रेवेन्यू: 19,151.59 करोड़ रुपये (पिछले साल 17,942.67 करोड़ रुपये)
2. नेट प्रॉफिट: 2,537.01 करोड़ रुपये (16.4% की बढ़ोतरी)
यह आंकड़े बताते हैं कि कंपनी की ग्रोथ लगातार स्थिर बनी हुई है.
डिजिटल और प्रीमियम प्रोडक्ट्स से बढ़ी बिक्री
कंपनी के MD और CEO Rajneet Singh Kohli ने बताया कि तिमाही के शुरुआती महीनों में कारोबार लगभग 9% की रफ्तार से बढ़ा. उन्होंने कहा कि ई-कॉमर्स चैनल से कंपनी को मजबूत योगदान मिला है, जिसका हिस्सा करीब 6% तक पहुंच गया है. साथ ही क्रोइसां, वेफर्स और अन्य प्रीमियम प्रोडक्ट्स की मांग में भी तेज बढ़ोतरी देखी गई.
बाहरी चुनौतियों का असर भी दिखा
कंपनी ने बताया कि मार्च महीने में वेस्ट एशिया में जारी संघर्ष के कारण इंटरनेशनल बिजनेस प्रभावित हुआ और सप्लाई चेन पर भी असर पड़ा. हालांकि घरेलू मांग ने इस प्रभाव को काफी हद तक संतुलित किया.
निवेशकों के लिए 90.50 रुपये का डिविडेंड
ब्रिटानिया के बोर्ड ने FY26 के लिए 1 रुपये फेस वैल्यू वाले प्रत्येक शेयर पर 90.50 रुपये के फाइनल डिविडेंड की सिफारिश की है. यह प्रस्ताव कंपनी की 107वीं वार्षिक आम बैठक (AGM) में शेयरधारकों की मंजूरी के बाद लागू होगा. इस घोषणा के बाद बाजार में कंपनी के शेयर को लेकर सकारात्मक रुख देखा गया.
शेयर बाजार में भी दिखा असर
नतीजों से पहले NSE पर Britannia का शेयर 1.77% की बढ़त के साथ 5,885.50 रुपये पर बंद हुआ, जो निवेशकों के भरोसे को दर्शाता है.
ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज ने Q4 में मजबूत वित्तीय प्रदर्शन के साथ यह साबित किया है कि प्रीमियम प्रोडक्ट्स, डिजिटल बिक्री और स्थिर डिमांड इसके ग्रोथ इंजन बने हुए हैं. वहीं 90.50 रुपये का डिविडेंड निवेशकों के लिए बड़ी राहत और आकर्षक रिटर्न का संकेत है.
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि अब सोलर सेक्टर में स्टोरेज-इंटीग्रेटेड प्रोजेक्ट्स जैसे FDRE, RTC और Solar+BESS तेजी से बढ़ रहे हैं.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
निवेश सलाहकार संस्था वैल्यूक्वेस्ट इन्वेस्टमेंट एडवाइजर (ValueQuest Investment Advisors) की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सोलर ऊर्जा की वार्षिक मांग वित्त वर्ष 2030 (FY30) तक लगभग 85 गीगावाट (GW) तक पहुंच सकती है. रिपोर्ट में कहा गया है कि डेटा सेंटर, ग्रीन हाइड्रोजन और चौबीसों घंटे स्वच्छ ऊर्जा की बढ़ती मांग आने वाले वर्षों में सोलर सेक्टर की वृद्धि को तेज करेगी.
नए मांग चालक बढ़ाएंगे सोलर विस्तार
ValueQuest की रिपोर्ट के अनुसार, FY29 से भारत में हर साल अतिरिक्त 15 से 20 GW सोलर मांग उत्पन्न हो सकती है. यह मांग मुख्यधारा के विश्लेषक अनुमानों में अभी शामिल नहीं है, जिससे भविष्य में सोलर विस्तार और तेज हो सकता है. रिपोर्ट का अनुमान है कि FY30 तक भारत की कुल वार्षिक सोलर मांग सतर्क अनुमान के आधार पर 85 GW तक पहुंच सकती है.
चार प्रमुख विकास इंजन
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का सोलर बाजार अब चार प्रमुख क्षेत्रों से संचालित हो रहा है:
1. यूटिलिटी-स्केल सोलर प्रोजेक्ट
2. कमर्शियल और इंडस्ट्रियल ओपन एक्सेस प्रोजेक्ट
3. कृषि सोलराइजेशन (KUSUM योजना के तहत)
4. रूफटॉप सोलर इंस्टॉलेशन
भारत ने FY26 में लगभग 45 GW सोलर क्षमता जोड़ी, जो तेज़ी से बढ़ते विस्तार को दर्शाता है. रिपोर्ट के अनुसार, पहले 50 GW सोलर क्षमता स्थापित करने में 11 साल लगे, अगले 50 GW में 3 साल लगे, जबकि अंतिम 50 GW सिर्फ 14 महीनों में जोड़ा गया.
स्टोरेज आधारित प्रोजेक्ट्स से बढ़ेगी मांग
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि अब सोलर सेक्टर में स्टोरेज-इंटीग्रेटेड प्रोजेक्ट्स जैसे FDRE, RTC और Solar+BESS तेजी से बढ़ रहे हैं. एक सामान्य 100 MW सोलर टेंडर में लगभग 140 MW मॉड्यूल लगते हैं, जबकि स्टोरेज आधारित जटिल प्रोजेक्ट्स में यह जरूरत बढ़कर लगभग 200 MW DC तक पहुंच जाती है. इससे मॉड्यूल की मांग में तेज वृद्धि होती है.
वैश्विक सोलर विस्तार और भारत की स्थिति
रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर तेजी से इंस्टॉलेशन के बावजूद सोलर अभी भी कुल बिजली उत्पादन का 10% से कम हिस्सा है. दुनिया में हर आधे दिन में लगभग 1 GW सोलर क्षमता जोड़ी जा रही है. भारत और चीन में लगभग 11% बिजली उत्पादन सोलर से हो रहा है, जबकि यूरोप में यह आंकड़ा करीब 10% है.
डेटा सेंटर और AI से नई मांग
रिपोर्ट में कहा गया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित डेटा सेंटर सोलर मांग को नया बढ़ावा दे रहे हैं. भारत में अब तक 300 से अधिक डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी जा चुकी है. अमेजन वेब सर्विसेज (AWS), माइक्रोसॉफ्ट और गूगल जैसी कंपनियों ने भारत में प्रत्येक के लिए 2 से 3 लाख करोड़ रुपये तक के निवेश की घोषणा की है.
ग्रीन हाइड्रोजन से भी बढ़ेगा सोलर उपयोग
रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के तहत भारत का लक्ष्य 2030 तक सालाना 5 मिलियन टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का है. हर 1 मिलियन टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन के लिए लगभग 20 GW सोलर क्षमता की आवश्यकता होगी, जिससे यह सेक्टर भी सोलर मांग का बड़ा चालक बन सकता है.
निष्कर्ष
ValueQuest की रिपोर्ट का कहना है कि डेटा सेंटर, ग्रीन हाइड्रोजन और ऊर्जा भंडारण आधारित प्रोजेक्ट्स भारत के सोलर सेक्टर को नई गति देंगे. FY30 तक 85 GW वार्षिक मांग का अनुमान देश को वैश्विक नवीकरणीय ऊर्जा बाजार में और मजबूत स्थिति में ला सकता है.
GTRI ने सुझाव दिया है कि भारत को अपनी टैरिफ और कस्टम्स प्रणाली का व्यापक पुनर्गठन करना चाहिए. ऐसा न करने पर देश वैश्विक निवेश और व्यापार अवसरों की दौड़ में पीछे रह सकता है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वैश्विक व्यापार शोध संस्था ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनीशिएटिव (GTRI) की एक नई रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत को अपने टैरिफ (आयात शुल्क) और कस्टम्स प्रणाली में व्यापक सुधार करने की आवश्यकता है. ताकि व्यापार लागत कम हो सके और निर्यात प्रतिस्पर्धा को बढ़ाया जा सके. रिपोर्ट के अनुसार, भारत की मौजूदा टैरिफ संरचना अब राजस्व जुटाने का प्रभावी साधन नहीं रही है. बल्कि यह व्यापार लागत को बढ़ा रही है. जिससे भारत के वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनने के लक्ष्य पर असर पड़ सकता है.
टैरिफ और कस्टम्स में जटिलता से बढ़ रही लागत
GTRI ने अपनी फ्लैगशिप रिपोर्ट में कहा कि आयात शुल्क और जटिल कस्टम्स प्रक्रियाओं ने व्यापार में कई तरह की अक्षमताएं पैदा की हैं. जो कंपनियों और निर्यातकों पर अतिरिक्त बोझ डालती हैं.
इतिहास में टैरिफ का उपयोग घरेलू उद्योगों की सुरक्षा और राजस्व संग्रह के लिए किया जाता था. लेकिन आज इसकी जटिल संरचना उत्पादन लागत बढ़ा रही है. और वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धा को कमजोर कर रही है.
23 सुधारों की सिफारिश
रिपोर्ट में टैरिफ प्रणाली को सरल बनाने और कस्टम्स प्रक्रियाओं को आधुनिक बनाने के लिए 23 सिफारिशें दी गई हैं. इनमें शामिल हैं.
1. टैरिफ ढांचे का सरलीकरण.
2. प्रक्रियाओं में पारदर्शिता बढ़ाना.
3. कस्टम्स प्रशासन का आधुनिकीकरण.
4. व्यापार को आसान बनाने के लिए सिस्टम को अधिक दक्ष बनाना.
GTRI का कहना है कि इन सुधारों से लेन-देन लागत घटेगी. माल की क्लीयरेंस तेज होगी. और भारत की व्यापार नीति वैश्विक मानकों के अनुरूप बनेगी.
नीतिगत स्थिरता की जरूरत
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि टैरिफ दरों में बार-बार बदलाव से निवेशकों और कंपनियों में अनिश्चितता पैदा होती है. जिससे सप्लाई चेन और निवेश योजनाएं प्रभावित होती हैं. इसलिए नीति में अधिक स्थिरता और पूर्वानुमान जरूरी है.
वैश्विक व्यापार में बदलाव से बढ़ा दबाव
रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब वैश्विक व्यापार व्यवस्था बड़े बदलावों से गुजर रही है. अमेरिका और चीन के बीच व्यापार तनाव और भू-राजनीतिक घटनाओं ने कंपनियों को अपने सप्लायर देशों को विविध बनाने के लिए प्रेरित किया है. इन परिस्थितियों में भारत के लिए अवसर बने हैं. लेकिन इसका लाभ उठाने के लिए उसे टैरिफ स्थिरता. लॉजिस्टिक्स दक्षता और व्यापार सुगमता जैसे क्षेत्रों में सुधार करना होगा.
उच्च आयात शुल्क से बढ़ रही उत्पादन लागत
GTRI के अनुसार. इंटरमीडिएट वस्तुओं (कच्चे माल) पर अधिक आयात शुल्क भारतीय मैन्युफैक्चरिंग की लागत बढ़ा रहे हैं. जिससे निर्यात अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में कमजोर पड़ रहा है.
वैश्विक सप्लाई चेन में एकीकरण की जरूरत
रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि टैरिफ ढांचे को सरल बनाया जाए. और अनावश्यक बाधाओं को हटाया जाए. तो भारतीय उद्योग वैश्विक सप्लाई चेन में बेहतर तरीके से जुड़ सकते हैं. इससे उत्पादन और निर्यात दोनों में वृद्धि होगी.
GTRI ने सुझाव दिया है कि भारत को अपनी टैरिफ और कस्टम्स प्रणाली का व्यापक पुनर्गठन करना चाहिए. ऐसा न करने पर देश वैश्विक निवेश और व्यापार अवसरों की दौड़ में पीछे रह सकता है. संस्था ने कहा कि एक दूरदर्शी व्यापार नीति ही भारत को एक मजबूत और प्रतिस्पर्धी वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बना सकती है.