इस सप्ताह का सबसे बड़ा और चर्चित आईपीओ Central Mine Planning & Design Institute (CMPDI) का होगा, जो Coal India की कंसल्टेंसी शाखा है. इस आईपीओ का कुल इश्यू साइज ₹1,842.12 करोड़ है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
शेयर बाजार में जारी उतार-चढ़ाव के बीच इस सप्ताह प्राथमिक बाजार यानी IPO मार्केट में अच्छी हलचल देखने को मिल सकती है. निवेशकों के लिए इस हफ्ते तीन नए आईपीओ खुलने जा रहे हैं, जिनमें दो मेनबोर्ड और एक SME सेगमेंट का इश्यू शामिल है. खास बात यह है कि इनमें से एक आईपीओ सरकारी कंपनी Coal India की सहायक कंपनी का भी है. इसके अलावा इस सप्ताह तीन कंपनियों के शेयर बाजार में लिस्ट होने की भी संभावना है.
इस हफ्ते IPO बाजार में बढ़ेगी हलचल
सोमवार से शुरू हो रहे कारोबारी सप्ताह में निवेशकों को नए आईपीओ में निवेश का मौका मिलेगा. बाजार के उतार-चढ़ाव के बावजूद कंपनियां पूंजी जुटाने के लिए प्राथमिक बाजार का रुख कर रही हैं. इस हफ्ते दो मेनबोर्ड कंपनियों और एक SME कंपनी के आईपीओ निवेशकों के लिए खुलेंगे. साथ ही पिछले दिनों आए तीन आईपीओ की शेयर बाजार में लिस्टिंग भी होगी, जिससे बाजार में गतिविधियां तेज रहने की उम्मीद है.
GSP Crop Science का ₹400 करोड़ का आईपीओ
एग्रोकेमिकल सेक्टर की कंपनी GSP Crop Science इस हफ्ते अपना करीब ₹400 करोड़ का आईपीओ लेकर आ रही है. यह मेनबोर्ड सेगमेंट का इश्यू होगा. निवेशक इसमें एक लॉट के लिए कम से कम 46 शेयरों के लिए बोली लगा सकेंगे. करीब 40 साल पुरानी यह कंपनी कीटनाशक उत्पाद बनाती है और कृषि क्षेत्र में अपनी मजबूत मौजूदगी रखती है.
कंपनी का आईपीओ 16 मार्च से 18 मार्च तक खुला रहेगा. इसका प्राइस बैंड ₹304 से ₹320 प्रति शेयर तय किया गया है. बाजार में इसकी संभावित लिस्टिंग 24 मार्च को हो सकती है. वित्त वर्ष 2025 में कंपनी ने लगभग ₹81 करोड़ का मुनाफा दर्ज किया था.
Coal India की सहायक कंपनी CMPDI का बड़ा इश्यू
इस सप्ताह का सबसे बड़ा और चर्चित आईपीओ Central Mine Planning & Design Institute (CMPDI) का होगा, जो Coal India की कंसल्टेंसी शाखा है. इस आईपीओ का कुल इश्यू साइज ₹1,842.12 करोड़ है.
यह पूरी तरह से ऑफर फॉर सेल (OFS) होगा, जिसका मतलब है कि इसमें सरकार और कोल इंडिया अपनी हिस्सेदारी का कुछ हिस्सा बेचेंगे. यह आईपीओ 20 मार्च से 24 मार्च तक निवेश के लिए खुला रहेगा. इसका प्राइस बैंड ₹163 से ₹172 प्रति शेयर तय किया गया है. बाजार में इसकी संभावित लिस्टिंग 30 मार्च को हो सकती है.
Novus Loyalty Limited का SME आईपीओ
SME सेगमेंट में Novus Loyalty Limited का आईपीओ भी इस हफ्ते खुलने जा रहा है. इस इश्यू का कुल आकार ₹60.15 करोड़ है. इसमें 33 लाख शेयरों का फ्रेश इश्यू और 8 लाख शेयरों का ऑफर फॉर सेल शामिल है.
यह कंपनी फिनटेक, ई-कॉमर्स, सॉफ्टवेयर, बैंकिंग, एफएमसीजी और रियल एस्टेट जैसे कई क्षेत्रों के लिए लॉयल्टी और रिवॉर्ड सॉल्यूशंस प्रदान करती है. कंपनी का आईपीओ 16 मार्च से 20 मार्च तक खुला रहेगा. इसका प्राइस बैंड ₹139 से ₹146 प्रति शेयर रखा गया है और इसकी संभावित लिस्टिंग 25 मार्च को हो सकती है.
इन कंपनियों के शेयरों की होगी लिस्टिंग
नए आईपीओ के अलावा इस सप्ताह तीन कंपनियों के शेयर भी शेयर बाजार में सूचीबद्ध होंगे. इसके बाद निवेशक इन कंपनियों के शेयरों की खरीद-फरोख्त कर सकेंगे. जिन कंपनियों के आईपीओ की लिस्टिंग होने वाली है उनमें Rajputana Stainless, Apsis Aerocom और Raajmarg Infra Investment Trust शामिल हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि इन लिस्टिंग्स के कारण भी बाजार में निवेशकों की गतिविधियां बढ़ सकती हैं.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
WEF के अनुसार, सर्वे में शामिल 98 फीसदी अर्थशास्त्रियों को अगले एक साल में भारत में औसत या उससे बेहतर आर्थिक वृद्धि की उम्मीद है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास संभावनाओं को लेकर वैश्विक अर्थशास्त्रियों का भरोसा बढ़ा है. वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के सितंबर 2026 के ‘चीफ इकोनॉमिस्ट्स आउटलुक’ के मुताबिक, सर्वे में शामिल 74 फीसदी मुख्य अर्थशास्त्रियों को अगले 12 महीनों में भारत में मजबूत या बहुत मजबूत आर्थिक वृद्धि की उम्मीद है. मई में यह आंकड़ा 52 फीसदी था. इस तरह कुछ ही महीनों में भारत के ग्रोथ आउटलुक को लेकर धारणा में उल्लेखनीय सुधार हुआ है.
WEF के अनुसार, सर्वे में शामिल 98 फीसदी अर्थशास्त्रियों को अगले एक साल में भारत में औसत या उससे बेहतर आर्थिक वृद्धि की उम्मीद है. संगठन ने भारत को सर्वे में शामिल क्षेत्रों में सबसे मजबूत ग्रोथ आउटलुक वाला क्षेत्र बताया है. मजबूत घरेलू मांग को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए प्रमुख सहारा माना गया है.
चीन और यूरोप के लिए तस्वीर अलग
भारत के मुकाबले चीन और यूरोप की आर्थिक संभावनाओं को लेकर अर्थशास्त्रियों की राय कमजोर बनी हुई है. चीन में करीब एक-तिहाई मुख्य अर्थशास्त्रियों को अगले 12 महीनों में कमजोर आर्थिक वृद्धि की आशंका है. वहीं, यूरोप सर्वे में सबसे कमजोर क्षेत्र बना हुआ है. 61 फीसदी अर्थशास्त्रियों को यूरोप में कमजोर या बहुत कमजोर ग्रोथ की उम्मीद है.
WEF के आकलन के अनुसार, अमेरिका, दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य एशिया के लिए भी आर्थिक वृद्धि का आउटलुक मजबूत बना हुआ है. हालांकि, इन क्षेत्रों के मुकाबले भारत का समग्र ग्रोथ आउटलुक सबसे मजबूत रहा.
भारत की ग्रोथ उम्मीद 74 फीसदी तक पहुंची
भारत को लेकर अर्थशास्त्रियों की धारणा में बदलाव मई के सर्वे की तुलना में साफ दिखाई देता है. मई 2026 में केवल 52 फीसदी अर्थशास्त्रियों को अगले 12 महीनों में भारत में मजबूत या बहुत मजबूत ग्रोथ की उम्मीद थी. सितंबर में यह आंकड़ा बढ़कर 74 फीसदी हो गया.
WEF ने अगस्त में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान भी बढ़ाकर 6.7 फीसदी किया था. हालांकि, संगठन ने ऊर्जा की ऊंची कीमतों और भू-राजनीतिक जोखिमों को भारत के आर्थिक आउटलुक के लिए प्रमुख चुनौतियों में शामिल किया है.
घरेलू मांग बनी अर्थव्यवस्था का सहारा
भारत की मजबूत घरेलू मांग को आर्थिक वृद्धि की प्रमुख वजहों में माना जा रहा है. WEF के आकलन के अनुसार, आंतरिक मांग इतनी मजबूत बनी हुई है कि बाहरी जोखिमों के बावजूद अर्थव्यवस्था की वृद्धि को सहारा मिल सकता है.
यह आकलन भारत के हालिया आधिकारिक GDP आंकड़ों से पहले किया गया था. अप्रैल-जून तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 7.8 फीसदी रही थी. उम्मीद से बेहतर आर्थिक प्रदर्शन के बाद कई संस्थानों ने भारत की विकास दर के अनुमान में बदलाव किया है.
वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर भी बढ़ा भरोसा
WEF के सर्वे में वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर भी अर्थशास्त्रियों की धारणा में सुधार देखने को मिला है. अब 56 फीसदी मुख्य अर्थशास्त्रियों को उम्मीद है कि अगले 12 महीनों में वैश्विक आर्थिक स्थिति स्थिर रहेगी या उसमें सुधार होगा. मई में केवल 11 फीसदी अर्थशास्त्रियों ने ऐसा अनुमान जताया था. हालांकि, वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने जोखिम अभी भी बने हुए हैं. करीब 97 फीसदी अर्थशास्त्रियों ने भू-राजनीतिक टकरावों को अगले एक साल में अनिश्चितता का संभावित कारण बताया. वहीं, 58 फीसदी अर्थशास्त्रियों को एसेट कीमतों में करेक्शन की आशंका है.
ऊर्जा कीमतें भारत के लिए चुनौती
भारत के मजबूत ग्रोथ आउटलुक के बावजूद ऊर्जा की ऊंची कीमतें चिंता का विषय बनी हुई हैं. भारत अपनी तेल जरूरतों के बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है. ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी का असर आयात बिल, महंगाई और चालू खाते पर पड़ सकता है.
WEF ने भी ऊर्जा की ऊंची कीमतों को भारत की आर्थिक संभावनाओं पर असर डालने वाला प्रमुख जोखिम बताया है. इसके अलावा, पश्चिम एशिया समेत विभिन्न क्षेत्रों में भू-राजनीतिक तनाव वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए अनिश्चितता बढ़ा सकते हैं.
ग्रोथ आउटलुक मजबूत, लेकिन कारोबारी माहौल पर सवाल
भारत के आर्थिक विकास को लेकर भरोसा बढ़ने के बावजूद, मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए कारोबारी माहौल को लेकर तस्वीर उतनी मजबूत नहीं है. मई के सर्वे में भारत को अनुकूल कारोबारी माहौल वाले शीर्ष तीन स्थानों में शामिल करने वाले अर्थशास्त्रियों की हिस्सेदारी 56 फीसदी थी, जो सितंबर में घटकर 40 फीसदी रह गई, यानी, भारत को लेकर वैश्विक अर्थशास्त्रियों का भरोसा मुख्य रूप से उसकी आर्थिक वृद्धि और घरेलू मांग को लेकर मजबूत हुआ है, जबकि निवेश और कारोबारी माहौल से जुड़े कुछ संकेतकों में अभी सुधार की गुंजाइश बनी हुई है.
मंगलवार को बीएसई सेंसेक्स 329.91 अंक यानी 0.44 फीसदी गिरकर 74,529.08 पर बंद हुआ. वहीं, एनएसई निफ्टी 85.30 अंक यानी 0.36 फीसदी की गिरावट के साथ 23,329.00 पर रहा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में बुधवार, 23 सितंबर को कारोबार की शुरुआत कमजोर रह सकती है. गिफ्ट निफ्टी के सुस्त संकेतों और एशियाई बाजारों में मिले-जुले कारोबार के बीच घरेलू बाजार पर दबाव बना रहने की आशंका है. हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में लगातार जारी नरमी बाजार के लिए कुछ राहत दे सकती है. निवेशकों की नजर पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक तनाव, विदेशी निवेशकों की बिकवाली, रुपये की चाल और वैश्विक बाजारों के रुख पर रहेगी. इससे पहले मंगलवार को शुरुआती बढ़त के बावजूद सेंसेक्स और निफ्टी गिरावट के साथ बंद हुए थे.
मंगलवार को 30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स 329.91 अंक यानी 0.44 फीसदी गिरकर 74,529.08 पर बंद हुआ. वहीं, एनएसई का निफ्टी 85.30 अंक यानी 0.36 फीसदी की गिरावट के साथ 23,329.00 पर रहा. सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 23 गिरावट में रहे, जबकि निफ्टी के 50 शेयरों में 35 शेयर लाल निशान में बंद हुए.
गिफ्ट निफ्टी और ग्लोबल संकेतों पर नजर
बुधवार के कारोबार से पहले गिफ्ट निफ्टी के संकेत घरेलू बाजार में कमजोर शुरुआत की ओर इशारा कर रहे हैं. एशियाई बाजारों में भी मिला-जुला कारोबार देखने को मिल रहा है. ऐसे में निवेशकों की नजर अमेरिकी और एशियाई बाजारों के रुझान के साथ डॉलर-रुपये की चाल पर रहेगी. पश्चिम एशिया में जारी तनाव भी बाजार की धारणा को प्रभावित कर सकता है.
क्रूड में नरमी से बाजार को राहत
कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट भारतीय शेयर बाजार के लिए राहत देने वाला संकेत है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 99 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गया है, जबकि अमेरिकी WTI 90 डॉलर प्रति बैरल के नीचे कारोबार कर रहा है. बुधवार सुबह नवंबर डिलीवरी वाला ब्रेंट क्रूड 0.48 फीसदी गिरकर 98.77 डॉलर प्रति बैरल पर था. वहीं, नवंबर डिलीवरी वाला WTI 0.85 फीसदी की गिरावट के साथ 89.75 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया. पिछले छह कारोबारी सत्रों में ब्रेंट क्रूड की कीमत 9 फीसदी से ज्यादा गिर चुकी है.
शुरुआती बढ़त के बाद मंगलवार को फिसला बाजार
मंगलवार को घरेलू बाजार की शुरुआत बढ़त के साथ हुई थी. सेंसेक्स 74,901.50 पर, जबकि निफ्टी 23,454.05 पर खुला था. हालांकि, कारोबार बढ़ने के साथ शुरुआती तेजी कमजोर पड़ गई और दोनों प्रमुख सूचकांक लाल निशान में बंद हुए.
सेंसेक्स 329.91 अंक टूटकर 74,529.08 पर बंद हुआ. वहीं निफ्टी 85.30 अंक गिरकर 23,329.00 पर रहा. सेंसेक्स के 30 शेयरों में केवल 7 शेयर बढ़त में रहे, जबकि 23 शेयरों में गिरावट दर्ज की गई. निफ्टी में भी 35 शेयर नुकसान में बंद हुए.
FII की बिकवाली बनी चुनौती
विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी घरेलू बाजार के लिए दबाव का एक प्रमुख कारण बनी हुई है. 21 सितंबर को विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने भारतीय शेयर बाजार में 576 करोड़ रुपये की शुद्ध बिकवाली की थी. इसके मुकाबले घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) ने 2,797 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी की.
घरेलू संस्थागत निवेशकों की खरीदारी से बाजार को कुछ सहारा मिला है, लेकिन विदेशी पूंजी के प्रवाह और वैश्विक बाजारों की दिशा पर निवेशकों की नजर बनी हुई है.
मंगलवार को इन शेयरों में रही हलचल
सेंसेक्स में इटरनल 1.94 फीसदी की बढ़त के साथ प्रमुख गेनर रहा. इंडिगो 1.58 फीसदी, टाइटन 0.72 फीसदी, टाटा स्टील 0.60 फीसदी और एनटीपीसी 0.15 फीसदी चढ़े. दूसरी ओर, बजाज फिनसर्व 1.62 फीसदी, ट्रेंट 1.47 फीसदी, बजाज फाइनेंस 1.46 फीसदी, सन फार्मा 1.28 फीसदी और टीसीएस 1.13 फीसदी की गिरावट के साथ प्रमुख लूजर रहे.
निफ्टी में कोल इंडिया 3.21 फीसदी की तेजी के साथ सबसे ज्यादा चढ़ा. इटरनल, इंडिगो, टाइटन और डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज में भी बढ़त रही. वहीं, टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स, नेस्ले इंडिया, बजाज फिनसर्व, बजाज फाइनेंस और सन फार्मा दबाव में रहे.
इन शेयरों पर रहेगी नजर
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आज IRB Infrastructure Developers, Pine Labs, Lemon Tree Hotels, Veegaland Developers, LG Electronics India, Allcargo Terminals, Swastika Infra और NATCO Pharma के शेयर अहम कॉरपोरेट अपडेट्स के चलते फोकस में रहेंगे. IRB Infrastructure Developers के बोर्ड ने पुणे और मुंबई स्थित गैर-प्रमुख संपत्तियों को चरणबद्ध तरीके से मोनेटाइज करने की सैद्धांतिक मंजूरी दी है. Mastercard ने Pine Labs में अपनी पूरी 4.31 फीसदी हिस्सेदारी करीब 933.57 करोड़ रुपये में बेच दी है. Lemon Tree Hotels ने महाराष्ट्र के नासिक में अपना पहला होटल Keys Prima by Lemon Tree Hotels शुरू किया है. Veegaland Developers के प्रमोटर और संस्थापक Chittilappilly Thomas Kochuouseph ने कंपनी के 2.69 लाख अतिरिक्त शेयर खरीदे हैं, जो 0.55 फीसदी हिस्सेदारी के बराबर है. LG Electronics India को त्योहारी सीजन में बिक्री में दोहरे अंक की वृद्धि की उम्मीद है और कंपनी एक्सपोर्ट कारोबार का विस्तार करने की योजना बना रही है. Allcargo Terminals का अगस्त 2026 में कंटेनर वॉल्यूम सालाना आधार पर 6 फीसदी बढ़कर 65,600 TEUs रहा. वहीं, NATCO Pharma का बोर्ड 25 सितंबर को करीब 1,300 करोड़ रुपये तक के राइट्स इश्यू पर विचार करेगा.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
भारत, यूरोपीय संघ, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्राजील, बारबाडोस और केन्या ने न्यूयॉर्क में शुरू की ‘बहुपक्षवाद के लिए साझेदार’ पहल; अंतरराष्ट्रीय कानून, शांति और समावेशी विकास के लिए सहयोग बढ़ाने का लक्ष्य
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत, यूरोपीय संघ (EU), ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्राजील, बारबाडोस और केन्या ने संयुक्त राष्ट्र में सुधार और बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत करने के लिए ‘बहुपक्षवाद के लिए साझेदार’ (Partners for Multilateralism- P4M ),पहल शुरू की है. यह पहल 81वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान 21 सितंबर को न्यूयॉर्क में शुरू की गई. सातों शुरुआती सह-प्रायोजक देशों ने P4M समिट की घोषणा को अपनाया.
P4M का उद्देश्य अलग-अलग क्षेत्रों के देशों को अंतरराष्ट्रीय कानून, शांति, समावेशी विकास और साझा समृद्धि जैसे साझा सिद्धांतों के आधार पर एक साथ लाना है. पहल ऐसे समय शुरू हुई है जब दुनिया में भू-राजनीतिक तनाव, संघर्ष, ध्रुवीकरण और संरक्षणवाद बढ़ने के बीच बहुपक्षीय सहयोग को लेकर चिंताएं सामने आ रही हैं.
संयुक्त राष्ट्र में व्यापक सुधार पर जोर
P4M घोषणा में बहुपक्षीय व्यवस्था में सुधार को प्रमुख प्राथमिकता दी गई है. इसमें खास तौर पर संयुक्त राष्ट्र को अधिक प्रभावी, प्रतिनिधित्वपूर्ण, समावेशी और मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप बनाने पर जोर दिया गया है.
सदस्य देशों ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर पर आधारित बहुपक्षीय व्यवस्था आज भी जरूरी है, लेकिन दुनिया के तेजी से बदलते स्वरूप को देखते हुए इसमें सुधार की जरूरत है. देशों के मुताबिक मौजूदा वैश्विक व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक आपस में जुड़ी हुई, जटिल और बहुध्रुवीय हो गई है.
घोषणा में UN80 जैसी पहलों के जरिए बहुपक्षीय संस्थानों को मजबूत और अधिक प्रभावी बनाने की प्रतिबद्धता जताई गई है. इसका उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र की संघर्षों को रोकने, संकटों से निपटने, सतत विकास को बढ़ावा देने, मानवाधिकारों की रक्षा करने और नई वैश्विक चुनौतियों से निपटने की क्षमता को मजबूत करना है.
भारत ने पहले भी उठाया है वैश्विक संस्थाओं में सुधार का मुद्दा
P4M पहल भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में नई दिल्ली में हुए 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में वैश्विक शासन व्यवस्था में व्यापक सुधार की जरूरत पर जोर दिया था. उन्होंने वैश्विक नियमों को तय करने में ग्लोबल साउथ की अधिक भूमिका की बात कही थी.
मोदी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में बदलाव की जरूरत भी बताई थी. ऐसे में P4M के जरिए बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार और उन्हें अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने का मुद्दा भारत की प्राथमिकताओं से भी जुड़ता है.
अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभु समानता पर जोर
P4M घोषणा में अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन, देशों की संप्रभु समानता, क्षेत्रीय अखंडता और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के सिद्धांतों को दोहराया गया है. इसमें बल प्रयोग या बल प्रयोग की धमकी पर रोक के सिद्धांत का भी समर्थन किया गया है.
सदस्य देशों ने कहा कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में अंतरराष्ट्रीय नियमों और सहयोग की भूमिका को मजबूत करना जरूरी है. जलवायु परिवर्तन, नई तकनीकों और अन्य वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है.
व्यापार, तकनीक और जलवायु पर भी सहयोग
P4M का एजेंडा केवल राजनीतिक और सुरक्षा मामलों तक सीमित नहीं है. घोषणा में वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को अधिक मजबूत और लचीला बनाने, बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था में सुधार और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय ढांचे को बेहतर बनाने की बात कही गई है.
इसके अलावा डिजिटल बदलाव, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है. इसका उद्देश्य अलग-अलग क्षेत्रों के देशों के बीच व्यावहारिक सहयोग को बढ़ावा देना है.
अन्य देशों के लिए भी खुला रहेगा मंच
P4M को किसी नए औपचारिक गठबंधन के तौर पर पेश नहीं किया गया है. इसका उद्देश्य अलग-अलग भू-राजनीतिक परिस्थितियों वाले देशों को बहुपक्षीय सहयोग के साझा एजेंडे पर साथ लाना है. यह पहल भविष्य में अन्य क्षेत्रों और देशों की भागीदारी के लिए भी खुली रहेगी.
यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंतोनियो कोस्टा ने P4M को संवाद, गठबंधन निर्माण और व्यावहारिक सहयोग के लिए एक मंच बताया है. उन्होंने कहा कि यह अलग-अलग क्षेत्रों के बीच पुल बनाने और बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार तथा आधुनिकीकरण में योगदान दे सकता है.
न्यूयॉर्क में हुई P4M बैठक
P4M शिखर बैठक 21 सितंबर को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के उच्चस्तरीय सप्ताह के दौरान हुई. इसमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज, बारबाडोस की प्रधानमंत्री मिया मोटली, ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी और केन्या के राष्ट्रपति विलियम रूटो शामिल हुए.
सातों शुरुआती साझेदार देशों ने कहा है कि वे दुनिया के अन्य देशों के साथ नियमित संवाद और समन्वय जारी रखेंगे, ताकि बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत किया जा सके और वैश्विक संस्थाओं में सुधार के लिए व्यावहारिक कदम आगे बढ़ाए जा सकें.
सागरमाला फाइनेंस कॉरपोरेशन अगले सप्ताह कर सकता है देश के पहले ब्लू बॉन्ड का इश्यू, पोर्ट कनेक्टिविटी, जहाज निर्माण और तटीय बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं को मिल सकता है वित्त
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत सस्टेनेबल फाइनेंस के एक नए क्षेत्र में कदम रखने जा रहा है. सागरमाला फाइनेंस कॉरपोरेशन अगले सप्ताह देश का पहला ब्लू बॉन्ड जारी कर सकता है. इसके जरिए करीब ₹1,000 करोड़ तक जुटाने की योजना है. इस रकम का इस्तेमाल समुद्री क्षेत्र, तटीय बुनियादी ढांचे और जल से जुड़ी परियोजनाओं के वित्तपोषण में किया जा सकता है. सागरमाला फाइनेंस कॉरपोरेशन बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्रालय के तहत काम करने वाली सरकारी स्वामित्व वाली वित्तीय संस्था है. प्रस्तावित ब्लू बॉन्ड के जरिए भारत ग्रीन बॉन्ड से आगे बढ़कर सस्टेनेबल डेट मार्केट के एक नए हिस्से में प्रवेश करेगा.
क्या होता है ब्लू बॉन्ड?
ब्लू बॉन्ड ऐसे डेट इंस्ट्रूमेंट होते हैं, जिनसे जुटाई गई रकम का इस्तेमाल समुद्र, महासागर, तटीय क्षेत्रों, नदियों और अन्य जल आधारित पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ी परियोजनाओं के लिए किया जाता है. दुनियाभर में इनका इस्तेमाल समुद्री संरक्षण, टिकाऊ मत्स्य पालन और जल बुनियादी ढांचे जैसी परियोजनाओं के लिए किया जाता रहा है. भारत में प्रस्तावित इश्यू से समुद्री और जल क्षेत्र की लंबी अवधि वाली परियोजनाओं के लिए पूंजी जुटाने का एक नया माध्यम तैयार हो सकता है.
₹1,000 करोड़ तक जुटाने की योजना
सागरमाला फाइनेंस कॉरपोरेशन पहले ही अपने पहले ब्लू बॉन्ड के जरिए ₹1,000 करोड़ तक जुटाने की योजना का संकेत दे चुका है. प्रस्तावित फंड का इस्तेमाल पोर्ट कनेक्टिविटी, जहाज निर्माण, अंतर्देशीय जलमार्ग और तटीय बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं में किया जा सकता है.
इस बॉन्ड इश्यू से कंपनी के लिए कर्ज जुटाने के स्रोतों में भी विविधता आएगी. साथ ही, लंबी अवधि की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के अनुरूप लंबी अवधि का वित्त जुटाने में मदद मिल सकती है. यह इश्यू भारत में ब्लू फाइनेंस के लिए निवेशकों की रुचि को भी परख सकता है. अभी भारत के सस्टेनेबल डेट मार्केट में ग्रीन बॉन्ड का हिस्सा अधिक रहा है.
भारत के सस्टेनेबल फाइनेंस मार्केट को मिलेगा नया विकल्प
भारत का पहला ब्लू बॉन्ड ऐसे समय में आ रहा है जब दुनियाभर में समुद्र और जल से जुड़ी परियोजनाओं के लिए वित्त जुटाने में रुचि बढ़ रही है. सेशेल्स ने 2018 में दुनिया का पहला सॉवरेन ब्लू बॉन्ड जारी किया था.
भारत में सागरमाला फाइनेंस के अलावा वडोदरा नगर निगम भी ब्लू बॉन्ड जारी करने की संभावनाओं पर काम कर रहा है. वडोदरा करीब ₹200 करोड़ का ब्लू बॉन्ड जारी करने पर विचार कर रहा है. इससे पंप हाउस, जल शोधन संयंत्र और साफ पानी के जलाशय जैसी जल संबंधी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को वित्त दिया जा सकता है.
आगे के लिए बन सकता है मॉडल
सागरमाला फाइनेंस का प्रस्तावित इश्यू भारत के डेट मार्केट में एक नए सेगमेंट की शुरुआत कर सकता है. इससे समुद्री, तटीय और जल आधारित बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए भविष्य में इस तरह के बॉन्ड के जरिए फंड जुटाने का रास्ता खुल सकता है. हालांकि, बॉन्ड का अंतिम आकार, जारी करने की तारीख और शर्तें नियामकीय मंजूरियों और उस समय की बाजार परिस्थितियों पर निर्भर करेंगी. इसके बावजूद, प्रस्तावित इश्यू भारत में ब्लू फाइनेंस के विकास की दिशा में एक नया कदम होगा.
जून 2026 तक AIF में कुल निवेश ₹7.1 लाख करोड़ पहुंचा, सालाना आधार पर निवेश प्रतिबद्धता 23.6% बढ़ी; रियल एस्टेट में पहली बार गिरावट
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ऑल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड (AIF) में निवेश का आंकड़ा पहली बार 7 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है. भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) के आंकड़ों के मुताबिक, जून 2026 तक AIF में कुल निवेश बढ़कर 7.1 लाख करोड़ रुपये हो गया. वहीं, इस श्रेणी के फंड्स के लिए कुल निवेश प्रतिबद्धता बढ़कर 17.53 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गई, जो मार्च 2026 के अंत में 16.94 लाख करोड़ रुपये थी. यानी तीन महीने में प्रतिबद्धता में करीब 3.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई.
सालाना आधार पर देखें तो जून 2025 की तुलना में AIF में निवेश प्रतिबद्धता करीब 23.6 फीसदी बढ़ी है. इस दौरान AIF के जरिए जुटाया गया कुल फंड भी बढ़कर 7.58 लाख करोड़ रुपये हो गया. आंकड़े बताते हैं कि वैकल्पिक निवेश का यह सेगमेंट लगातार विस्तार कर रहा है.
क्या होता है AIF
AIF ऐसे निवेश फंड होते हैं जो आमतौर पर पारंपरिक म्यूचुअल फंड या बैंक FD से अलग तरह की संपत्तियों और कंपनियों में निवेश करते हैं. इनमें बड़े निवेशक अपना पैसा लगाते हैं और पेशेवर फंड मैनेजर उस पैसे को अलग-अलग अवसरों में निवेश करते हैं. AIF के जरिए स्टार्टअप और अनलिस्टेड कंपनियां, प्राइवेट इक्विटी, रियल एस्टेट और इंफ्रास्ट्रक्चर, कर्ज/डेट इंस्ट्रूमेंट में निवेश किया जाता है. वहीं, कुछ मामलों में शेयर और अन्य वैकल्पिक जगह भी निवेश होता है.
चार साल में तीन गुना से ज्यादा हुई प्रतिबद्धता
AIF में निवेश प्रतिबद्धता पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है. जून 2021 में यह 4.87 लाख करोड़ रुपये थी, जो जून 2022 में बढ़कर 6.94 लाख करोड़ रुपये हो गई. जून 2023 में यह आंकड़ा 8.45 लाख करोड़ रुपये और जून 2024 में 11.78 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया.
इसके बाद भी बढ़ोतरी का सिलसिला जारी रहा. मार्च 2026 तक AIF में निवेश प्रतिबद्धता 16.94 लाख करोड़ रुपये थी, जो जून 2026 तक बढ़कर 17.53 लाख करोड़ रुपये हो गई.
इस तरह चार साल की अवधि में AIF में निवेश के लिए की गई प्रतिबद्धता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. यह ऐसे समय में हो रहा है जब वैकल्पिक निवेश उत्पादों के प्रति बड़े और संस्थागत निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ी है.
रियल एस्टेट में पहली बार निवेश घटा
AIF के आंकड़ों में एक अहम बदलाव रियल एस्टेट क्षेत्र में देखने को मिला है. जून 2026 तक रियल एस्टेट में कुल निवेश 87,969 करोड़ रुपये रहा, जबकि मार्च 2026 में यह करीब 1.29 लाख करोड़ रुपये था. यानी इस क्षेत्र में तिमाही आधार पर निवेश में गिरावट दर्ज की गई.
हालांकि, निवेश के मामले में रियल एस्टेट अब भी AIF के प्रमुख क्षेत्रों में शामिल है. वहीं वित्तीय सेवाओं, सूचना प्रौद्योगिकी (IT), नॉन-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC), बैंकों, फार्मा और हेल्थकेयर जैसे क्षेत्रों में निवेश लगातार बढ़ रहा है. इन सेक्टरों में बढ़ता निवेश AIF के पोर्टफोलियो के धीरे-धीरे ज्यादा विविध होने का संकेत देता है.
प्रतिबद्धता और निवेश में क्या अंतर है?
AIF के आंकड़ों को समझने के लिए ‘कमिटमेंट’ और ‘इन्वेस्टमेंट’ के बीच अंतर समझना जरूरी है. निवेशक जब किसी AIF में पैसा लगाने की प्रतिबद्धता जताते हैं, तो पूरी रकम आमतौर पर एक साथ फंड में नहीं आती. फंड मैनेजर जरूरत और निवेश के अवसर के अनुसार इसे अलग-अलग किस्तों में बुलाते हैं.
यही वजह है कि कुल निवेश प्रतिबद्धता का आंकड़ा जुटाए गए फंड और वास्तविक निवेश से काफी अधिक रहता है. जैसे-जैसे फंड मैनेजर निवेश के लिए प्रतिबद्ध रकम का इस्तेमाल करते हैं, उसका असर जुटाए गए फंड और वास्तविक निवेश के आंकड़ों में दिखाई देता है.
SEBI के सुधारों से भी मिला सहारा
पिछले कुछ वर्षों में बाजार नियामक SEBI ने AIF के लिए फंड जुटाने और उनके संचालन को आसान बनाने के लिए कई बदलाव किए हैं. नियामक का फोकस इस सेगमेंट के कामकाज को अधिक व्यवस्थित बनाने और निवेश प्रक्रिया को आसान करने पर रहा है.
SEBI निवेशकों को AIF जैसे वैकल्पिक निवेश उत्पादों से जोड़ने के लिए एक्रिडिटेड इन्वेस्टर फ्रेमवर्क की भी समीक्षा करने पर विचार कर रहा है. ऐसे नियामकीय बदलावों से इस सेगमेंट में निवेशकों की भागीदारी और फंड मैनेजरों के लिए पूंजी जुटाने की प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है.
कुल मिलाकर, जून 2026 तक के आंकड़े AIF बाजार के लगातार विस्तार की तस्वीर दिखाते हैं. ₹7.1 लाख करोड़ का वास्तविक निवेश पहली बार ₹7 लाख करोड़ के पार पहुंचना और ₹17.53 लाख करोड़ की निवेश प्रतिबद्धता यह बताती है कि वैकल्पिक निवेश फंड भारतीय निवेश बाजार में लगातार बड़ा स्थान बना रहे हैं.
मजबूत मांग के बीच UltraTech, Ambuja Cement और JSW Cement का फोकस लागत घटाने, क्षमता बढ़ाने और प्रीमियम उत्पादों की बिक्री पर; आने वाले वर्षों में 7-8% सालाना बढ़ सकती है सीमेंट की मांग
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सीमेंट कंपनियों के लिए मांग का माहौल मजबूत बना हुआ है, लेकिन बढ़ती ईंधन और माल ढुलाई लागत मुनाफे पर दबाव डाल रही है. ऐसे में कंपनियां केवल सीमेंट की कीमत बढ़ाकर मार्जिन सुधारने के बजाय लागत घटाने, प्लांट की क्षमता का बेहतर इस्तेमाल करने और प्रीमियम उत्पादों की बिक्री बढ़ाने पर जोर दे रही हैं. अल्ट्राटेक सीमेंट (UltraTech Cement), अंबुजा सीमेंट (Ambuja Cement) और जेएसडब्ल्यू सीमेंट (JSW Cement) की रणनीति में इसका असर साफ दिखाई दे रहा है.
ग्लोबल इनवेस्टमेंट बैंक Jefferies की इंडिया फोरम की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, तीनों कंपनियां आने वाले वर्षों में अलग-अलग तरीकों से लागत कम करने और ऑपरेटिंग प्रॉफिट बढ़ाने की दिशा में काम कर रही हैं. कंपनियों को उम्मीद है कि मजबूत मांग के साथ लागत पर नियंत्रण से उनकी कमाई में सुधार हो सकता है.
3-5 साल में 7-8% बढ़ सकती है सीमेंट की मांग
रिपोर्ट के अनुसार, मकान निर्माण, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और निजी क्षेत्र के निवेश से सीमेंट की मांग उम्मीद से बेहतर बनी हुई है. देश की सबसे बड़ी सीमेंट कंपनियों में शामिल अल्ट्राटेक की मौजूदा उत्पादन क्षमता करीब 20 करोड़ टन सालाना है. कंपनी इसे बढ़ाकर 23.7 करोड़ टन करने की तैयारी में है. 2019 के बाद कंपनी अपनी उत्पादन क्षमता करीब दोगुनी कर चुकी है. अब कंपनी का फोकस सिर्फ नई क्षमता जोड़ने पर नहीं, बल्कि मौजूदा प्लांट्स का बेहतर इस्तेमाल करने पर भी है. क्षमता का उपयोग बढ़ने से प्रति टन सीमेंट उत्पादन की औसत लागत कम हो सकती है, जिससे कंपनी के मुनाफे को सहारा मिलेगा.
अंबुजा सीमेंट: 500 रुपये प्रति टन तक लागत घटाने का लक्ष्य
अंबुजा सीमेंट का जोर भी क्षमता विस्तार के साथ लागत कम करने पर है. कंपनी ने पिछले कुछ वर्षों में ACC, Sanghi, Penna और Orient जैसी कंपनियों या उनकी परिसंपत्तियों को अपने कारोबार में जोड़ा है. हालांकि, कुछ अधिग्रहित परिसंपत्तियों के प्रदर्शन में सुधार उम्मीद से अधिक समय ले रहा है.
कंपनी ने अगले दो वर्षों में अपनी लागत करीब 500 रुपये प्रति टन तक कम करने का लक्ष्य रखा है. इसके लिए लॉजिस्टिक्स पर भी काम किया जा रहा है. अंबुजा चालू वित्त वर्ष के अंत तक सीमेंट की औसत ढुलाई दूरी करीब 15 किलोमीटर कम करने की योजना बना रही है. इससे परिवहन लागत घट सकती है.
कंपनी ऊर्जा लागत कम करने के लिए भी कदम उठा रही है. अंबुजा सीमेंट अपने कुल बिजली इस्तेमाल में ग्रीन एनर्जी की हिस्सेदारी मौजूदा करीब 30 फीसदी से बढ़ाकर 60 फीसदी करना चाहती है. इसके साथ ही मिक्स सीमेंट और ज्यादा कीमत वाले प्रीमियम उत्पादों की हिस्सेदारी बढ़ाने की योजना है. इस रणनीति का मकसद सीमेंट की कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी किए बिना प्रति टन मुनाफा बढ़ाना है.
जेएसडब्ल्यू सीमेंट: 6.8 करोड़ टन होगी क्षमता
जेएसडब्ल्यू सीमेंट भी आने वाले वर्षों में बड़े क्षमता विस्तार की तैयारी कर रही है. कंपनी अपनी मौजूदा करीब 2.41 करोड़ टन सालाना क्षमता को अगले 5 से 7 वर्षों में बढ़ाकर करीब 6.8 करोड़ टन करना चाहती है.
कंपनी के कुल कारोबार में करीब 70 फीसदी हिस्सेदारी दूसरी कंपनियों और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स से आती है. इसलिए इंफ्रा और निर्माण गतिविधियों में तेजी उसके लिए मांग का महत्वपूर्ण आधार बनी हुई है. जेएसडब्ल्यू सीमेंट भी कीमत बढ़ाने के बजाय लागत कम करने पर जोर दे रही है. कंपनी नवीकरणीय ऊर्जा, वैकल्पिक ईंधन, वेस्ट हीट से बिजली उत्पादन और लॉजिस्टिक्स को बेहतर बनाने जैसे उपायों पर काम कर रही है. कंपनी का लक्ष्य प्रति टन ऑपरेटिंग प्रॉफिट को वित्त वर्ष 2025-26 के करीब 900 रुपये से बढ़ाकर लगभग 1,100 रुपये करना है.
कीमतों के बजाय लागत पर क्यों बढ़ा फोकस?
सीमेंट उद्योग में मांग मजबूत रहने के बावजूद कंपनियों के सामने लागत का दबाव बना हुआ है. ईंधन, बिजली और परिवहन खर्च बढ़ने पर कीमत बढ़ाना हमेशा आसान नहीं होता, क्योंकि इससे मांग पर असर पड़ सकता है और बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है. ऐसे में कंपनियों के लिए प्लांट की क्षमता का बेहतर इस्तेमाल, कम दूरी तक माल ढुलाई, सस्ती और नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल तथा प्रीमियम सीमेंट की बिक्री बढ़ाना मुनाफा सुधारने के वैकल्पिक तरीके बन रहे हैं.
कुल मिलाकर, सीमेंट उद्योग में कंपनियों की रणनीति अब सिर्फ ‘कीमत बढ़ाओ और मार्जिन बचाओ’ तक सीमित नहीं रह गई है. मजबूत मांग के बीच उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ लागत घटाने और प्रति टन कमाई बढ़ाने पर जोर है. अगर सीमेंट की मांग अनुमान के मुताबिक बढ़ती है और कंपनियां लागत नियंत्रण के अपने लक्ष्य हासिल करती हैं, तो आने वाले वर्षों में उनके ऑपरेटिंग मार्जिन और मुनाफे को सहारा मिल सकता है.
5 दिन तक प्रभावित हो सकती हैं बैंकिंग सेवाएं, हाफ इयरली क्लोजिंग के बीच हड़ताल से बढ़ सकती है परेशानी
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
बैंक कर्मचारियों की 28 सितंबर से प्रस्तावित देशव्यापी हड़ताल को लेकर वित्त मंत्रालय ने बैंक यूनियनों से आंदोलन वापस लेने की अपील की है. मंत्रालय का कहना है कि कर्मचारियों की कई प्रमुख मांगों पर पहले ही कदम उठाए जा चुके हैं और बाकी मुद्दों को बातचीत के जरिए सुलझाया जा सकता है. यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (UFBU) ने 5 दिन के वर्किंग वीक समेत कई मांगों को लेकर 28 सितंबर से तीन दिन की हड़ताल का ऐलान किया है.
28 सितंबर से 3 दिन की हड़ताल
UFBU की प्रस्तावित हड़ताल 28 सितंबर से शुरू होगी. इससे बैंकिंग सेवाओं पर असर पड़ने की आशंका है. हड़ताल से ठीक पहले सप्ताहांत की छुट्टियां होने के कारण कई जगह लगातार पांच दिन तक बैंक शाखाओं का कामकाज प्रभावित हो सकता है.
इस हड़ताल का समय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बैंकों की हाफ इयरली क्लोजिंग यानी 30 सितंबर के आसपास पड़ रही है. इस दौरान खातों के मिलान, प्रोविजनिंग, ट्रेजरी और अन्य वित्तीय गतिविधियों का काम महत्वपूर्ण होता है. ऐसे में बैंक कर्मचारियों की हड़ताल से ग्राहकों, कारोबारियों और सरकारी लेन-देन से जुड़े काम प्रभावित हो सकते हैं.
सरकार ने गिनाए कर्मचारियों के लिए उठाए गए कदम
वित्त मंत्रालय ने कहा है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक देश की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और सरकार बैंक कर्मचारियों के हितों को ध्यान में रखते हुए कई कदम उठा चुकी है. मंत्रालय के मुताबिक, कर्मचारियों के वेतन और भत्तों में बढ़ोतरी, नया पे-स्केल लागू करने और स्टाफ वेलफेयर फंड का दायरा बढ़ाने जैसे फैसले लिए गए हैं. इसके अलावा असिस्टेंट जनरल मैनेजर से लेकर चीफ जनरल मैनेजर स्तर तक के उच्च पदों की संख्या भी बढ़ाई गई है. कर्मचारियों की मांगों को देखते हुए परफॉर्मेंस लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम को भी बातचीत के बाद स्थगित किया गया था.
वेतन समझौते पर समय से पहले शुरू हुई बातचीत
मंत्रालय ने बताया कि बैंक कर्मचारियों के वेतन संशोधन और भत्तों से जुड़े नए द्विपक्षीय समझौते (Bipartite Settlement) की प्रक्रिया भी समय से पहले शुरू की गई है. सरकार का कहना है कि नवंबर 2027 की निर्धारित समयसीमा से काफी पहले इस प्रक्रिया को पूरा करने का प्रयास किया जा रहा है.
5 दिन के वर्किंग वीक की मांग पर क्या कहा?
बैंक यूनियनों की प्रमुख मांगों में 5 दिन का वर्किंग वीक भी शामिल है. मौजूदा व्यवस्था में बैंक आम तौर पर दूसरे और चौथे शनिवार को बंद रहते हैं, जबकि अन्य शनिवार को कामकाज होता है. सरकार का कहना है कि बाकी शनिवार को बैंक शाखाएं खुली रहने से आम लोगों को बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच मिलती है. मंत्रालय ने कर्मचारियों से अपील की है कि वे हड़ताल के बजाय बातचीत का रास्ता अपनाएं और लंबित मुद्दों का समाधान चर्चा के जरिए निकालें.
सरकार के अनुसार, हड़ताल से बैंकिंग सेवाओं के साथ-साथ आम ग्राहकों, कारोबारियों और स्वयं कर्मचारियों पर भी असर पड़ सकता है.
शापूरजी पलोनजी (SP) ग्रुप के पास टाटा संस की 18.37 फीसदी हिस्सेदारी है. समूह लंबे समय से इस हिस्सेदारी में अधिक तरलता चाहता है, क्योंकि उसकी होल्डिंग और ऑपरेटिंग कंपनियों पर बड़ी मात्रा में कर्ज है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
शापूरजी पलोनजी ग्रुप (SP Group) के चेयरमैन शापूर मिस्त्री ने टाटा संस की सार्वजनिक लिस्टिंग के समर्थन में टाटा ट्रस्ट्स से सहयोग की अपील की है. यह बयान ऐसे समय आया है जब भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की नियामकीय कार्रवाई के बाद टाटा संस पर शेयर बाजार में लिस्टिंग से जुड़े नियमों का पालन करने का दबाव बढ़ गया है. वहीं, टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा लिस्टिंग का विरोध कर रहे हैं.
शापूरजी पलोनजी (SP) ग्रुप के पास टाटा संस की 18.37 फीसदी हिस्सेदारी है. समूह लंबे समय से इस हिस्सेदारी में अधिक तरलता चाहता है, क्योंकि उसकी होल्डिंग और ऑपरेटिंग कंपनियों पर बड़ी मात्रा में कर्ज है. मिस्त्री ने कहा कि लिस्टिंग का मुद्दा शेयरधारकों के बीच विवाद के तौर पर देखने के बजाय सभी संबंधित पक्षों को मिलकर इसका समाधान तलाशना चाहिए. उन्होंने दोनों कारोबारी समूहों के बीच संबंधों को और मजबूत करने की इच्छा भी जताई.
लिस्टिंग को लेकर मिलकर फैसला लेने की अपील
मिस्त्री ने टाटा ट्रस्ट्स, टाटा संस, कंपनी के नेतृत्व, शेयरधारकों और अन्य हितधारकों से लिस्टिंग के मुद्दे पर सामूहिक रूप से विचार करने की अपील की. उन्होंने कहा कि SP ग्रुप और टाटा समूह के बीच संबंध 100 साल से भी ज्यादा पुराने हैं और दोनों समूहों के बीच आगे भी बेहतर सहयोग की संभावनाएं हैं.
उनका यह बयान 17 सितंबर को हुई टाटा संस बोर्ड की बैठक के बाद आया है. इस बैठक में बोर्ड ने एन. चंद्रशेखरन को कार्यकारी चेयरमैन के तौर पर एक और पांच साल का कार्यकाल देने को मंजूरी दी थी. हालांकि, नोएल टाटा ने इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया था.
बोर्ड ने RBI की लागू गाइडलाइंस का पालन करने के लिए जरूरी कदम उठाने और नियामक, टाटा ट्रस्ट्स तथा अन्य हितधारकों से लागू नियमों को लेकर मार्गदर्शन लेने का भी फैसला किया था.
टाटा संस में हिस्सेदारी SP ग्रुप के लिए अहम
SP ग्रुप ने 1965 में पहली बार टाटा संस के शेयर खरीदे थे. इसके बाद समूह ने अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर 18.37 फीसदी कर ली, जिससे वह टाटा संस का सबसे बड़ा अल्पमत शेयरधारक बन गया. हालांकि, टाटा संस के शेयरों से जुड़े प्रतिबंधों के कारण SP ग्रुप के लिए इस हिस्सेदारी को आसानी से भुनाना संभव नहीं रहा है. समूह की कंपनियों पर मौजूद कर्ज के बीच टाटा संस में हिस्सेदारी उसके लिए संभावित नकदी स्रोत के तौर पर महत्वपूर्ण बनी हुई है. टाटा संस की सार्वजनिक लिस्टिंग होने पर इस हिस्सेदारी के लिए बाजार आधारित मूल्य भी तय हो सकता है.
नोएल टाटा ने दिया था 3 फीसदी हिस्सेदारी बेचने का प्रस्ताव
17 सितंबर की बोर्ड बैठक में नोएल टाटा ने एक प्रस्ताव रखा था. इसके तहत SP ग्रुप को टाटा संस में 3 फीसदी तक हिस्सेदारी बेचने के बदले करीब ₹25,000 करोड़ जुटाने का रास्ता सुझाया गया था. इस प्रस्ताव को टाटा संस को निजी कंपनी बनाए रखते हुए SP ग्रुप की नकदी जरूरतों को पूरा करने के वैकल्पिक तरीके के तौर पर देखा गया.
RBI के फैसले से बदला लिस्टिंग का समीकरण
टाटा संस की लिस्टिंग को लेकर बहस उस समय और तेज हो गई जब RBI ने टाटा संस की कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) के रूप में अपना रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने की मांग को खारिज कर दिया. इसके बाद टाटा संस पर अपर-लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC) से जुड़े नियामकीय ढांचे के तहत लागू आवश्यकताओं का पालन करने की स्थिति बनी हुई है, जिसमें संबंधित लिस्टिंग नियम भी शामिल हैं.
बोर्ड की ओर से अनुपालन की प्रक्रिया शुरू करने का फैसला कंपनी के पहले के रुख से बदलाव को दर्शाता है. इससे पहले टाटा संस सार्वजनिक लिस्टिंग से बचने के प्रयास कर रही थी. टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की करीब 66 फीसदी हिस्सेदारी है और वह लिस्टिंग का विरोध कर रहा है. इसके विपरीत, SP ग्रुप लगातार टाटा संस की लिस्टिंग के पक्ष में रहा है.
रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इन APUs को Make-II फ्रेमवर्क के तहत देश में ही विकसित किया गया है. Make-II के तहत उद्योगों की अगुवाई में रिसर्च और डेवलपमेंट को बढ़ावा दिया जाता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
रक्षा मंत्रालय ने भारतीय सेना के T-72 और T-90 टैंकों के लिए सहायक विद्युत इकाइयां (APUs) की खरीद को लेकर एक्यूरेट इंडस्ट्रीयल कंट्रोल्स (Accurate Industrial Controls Private Limited) के साथ ₹586 करोड़ का करार किया है. यह समझौता 21 सितंबर को नई दिल्ली में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की मौजूदगी में हुआ. APU टैंकों के महत्वपूर्ण सिस्टम के लिए बिजली का वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध कराता है. इनमें फायर-कंट्रोल सिस्टम, फायरिंग सर्किट, गन स्टेबिलाइजेशन सिस्टम और टैंक में लगे अन्य उपकरण शामिल हैं. मंत्रालय के मुताबिक, इन APUs को सेना के मैकेनाइज्ड फॉर्मेशन की ऑपरेशनल तैयारियों, विश्वसनीयता और टिकाऊपन को मजबूत करने में मदद मिलेगी.
Make-II के तहत विकसित किए गए हैं APUs
इस खरीद को बख्तरबंद प्लेटफॉर्म में इस्तेमाल होने वाले महत्वपूर्ण सब-सिस्टम के स्वदेशीकरण की दिशा में भी अहम कदम माना जा रहा है. रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इन APUs को Make-II फ्रेमवर्क के तहत देश में ही विकसित किया गया है. Make-II के तहत उद्योगों की अगुवाई में रिसर्च और डेवलपमेंट को बढ़ावा दिया जाता है.
आयात पर निर्भरता कम करने पर जोर
₹586 करोड़ का यह करार रक्षा क्षेत्र में घरेलू विनिर्माण क्षमता बढ़ाने और महत्वपूर्ण रक्षा उपकरणों के लिए आयात पर निर्भरता कम करने की सरकार की व्यापक रणनीति का हिस्सा है. मंत्रालय ने कहा कि यह खरीद 'विकसित भारत@2047' के विजन और मजबूत, आत्मनिर्भर तथा वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी भारतीय रक्षा उद्योग के निर्माण के उद्देश्य के अनुरूप है.
T-72 और T-90 टैंकों के बेड़े में स्वदेशी APUs की तैनाती से इन टैंकों के इलेक्ट्रॉनिक और हथियार प्रणालियों को संचालित करने वाले सहायक सिस्टम को मजबूती मिलने की उम्मीद है. साथ ही, यह रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की दिशा में भी योगदान देगा.
RBI के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 19 से 21 सितंबर के बीच बैंकिंग सिस्टम में शुद्ध नकदी अधिशेष करीब ₹6 लाख करोड़ रहा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से बॉन्ड बेचकर बैंकिंग सिस्टम से अतिरिक्त नकदी निकालने का असर अब दिखाई देने लगा है. बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त नकदी का अधिशेष घटकर करीब ₹6 लाख करोड़ रह गया है. इसके साथ ही बैंकों के बीच एक-दूसरे को दिए जाने वाले overnight loans की ब्याज दर भी बढ़कर 5.24 फीसदी हो गई है, जो RBI की रेपो रेट के करीब है. बॉन्ड बिक्री के साथ GST भुगतान के लिए हुई नकद निकासी ने भी सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी को कम किया है.
सितंबर की शुरुआत में ₹11.16 लाख करोड़ था नकदी अधिशेष
RBI के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 19 से 21 सितंबर के बीच बैंकिंग सिस्टम में शुद्ध नकदी अधिशेष करीब ₹6 लाख करोड़ रहा. सितंबर के पहले सप्ताह में यह बढ़कर ₹11.16 लाख करोड़ के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया था. यानी कुछ ही हफ्तों में बैंकिंग सिस्टम से अतिरिक्त नकदी में काफी कमी आई है.
RBI ने बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी को कम करने के लिए खुले बाजार परिचालन (OMO) के तहत सरकारी बॉन्ड बेचने का फैसला किया है. इसकी पहली नीलामी शुक्रवार को हुई थी. सोमवार को हुई दूसरी OMO नीलामी में भी निवेशकों की मजबूत मांग देखने को मिली. ₹25,000 करोड़ के बॉन्ड बेचने के लिए ₹84,942 करोड़ की बोलियां मिलीं.
कॉल रेट बढ़कर 5.24 फीसदी
बैंकिंग सिस्टम में नकदी कम होने का असर overnight call rate पर भी पड़ा है. यह दर शुक्रवार के 4.92 फीसदी से बढ़कर सोमवार को 5.24 फीसदी पर पहुंच गई. यह RBI की मौजूदा रेपो रेट के लगभग बराबर है. एक प्राथमिक डीलरशिप के वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, नकदी की स्थिति पर OMO और GST भुगतान के लिए हुई नकद निकासी, दोनों का असर पड़ा है. उन्होंने कहा कि इन दोनों वजहों से कॉल रेट रेपो रेट के करीब पहुंच गई है.
सितंबर में ₹1 लाख करोड़ के बॉन्ड बेचने की योजना
RBI ने सितंबर में कुल ₹1 लाख करोड़ के OMO के तहत सरकारी बॉन्ड बेचने की घोषणा की है. इसका मकसद बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त और अपेक्षाकृत लंबी अवधि की नकदी को कम करना है. यह अतिरिक्त नकदी मुख्य रूप से डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा के तहत विदेशी निवेश के बड़े प्रवाह से बनी है. RBI ने अतिरिक्त नकदी को सोखने के लिए लंबी अवधि के वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) जैसे दूसरे उपाय भी किए हैं.
आगे और घट सकती है बैंकिंग सिस्टम की नकदी
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले हफ्तों में बैंकिंग सिस्टम की नकदी स्थिति में और बदलाव हो सकता है. महीने के अंत में सरकारी और अन्य भुगतान की स्थिति बदलने के साथ सिस्टम में नकदी फिर बढ़ या घट सकती है. इसके अलावा RBI की ओर से आगे भी OMO के तहत बॉन्ड बिक्री जारी रहने की संभावना है.
बैंकों के ट्रेजरी अधिकारियों के मुताबिक, आने वाले महीनों में करीब ₹1 लाख करोड़ की एक और OMO बिक्री भी नकदी अधिशेष पर असर डाल सकती है. वहीं, अर्थव्यवस्था में चलन में मौजूद नकदी बढ़ने और बैंक जमा बढ़ने के साथ बैंकों की नकद आरक्षित अनुपात (CRR) से जुड़ी जरूरतें भी बढ़ सकती हैं. इससे सिस्टम में उपलब्ध अतिरिक्त नकदी और कम हो सकती है.
10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड पर भी नजर
IDFC First Bank की मुख्य अर्थशास्त्री गौरा सेन गुप्ता के मुताबिक, फिलहाल करीब ₹13 लाख करोड़ का दीर्घकालिक नकदी अधिशेष है, जिसे पूरी तरह सिस्टम से निकालने में वित्त वर्ष 2028 की दूसरी तिमाही तक का समय लग सकता है.
बाजार प्रतिभागियों के मुताबिक, आगे चलकर 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड 7 फीसदी से बढ़कर 7.25 फीसदी तक जा सकती है. हालांकि, सोमवार को 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड 2 आधार अंक घटकर 7.05 फीसदी पर बंद हुई.