केमिकल्स, टेक्सटाइल, टेलीकॉम और नेटवर्क इक्विपमेंट तथा सोलर पीवी मैन्युफैक्चरिंग को नीति आयोग ने भारत के औद्योगिक विस्तार, रोजगार और निर्यात के लिए अहम सेक्टर बताया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
भारत के सामने 2047 तक दुनिया के बड़े मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में उभरने का बड़ा लक्ष्य है. इस दिशा में केमिकल्स, टेक्सटाइल, टेलीकॉम और नेटवर्क इक्विपमेंट तथा सोलर फोटोवोल्टिक यानी सोलर पीवी मैन्युफैक्चरिंग जैसे चार सेक्टर अहम भूमिका निभा सकते हैं. नीति आयोग ने गुरुवार को जारी अपनी नई रिपोर्ट में कहा कि भारत को इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाने, घरेलू सप्लाई चेन को मजबूत करने और हाई-वैल्यू मैन्युफैक्चरिंग की ओर तेजी से बढ़ने की जरूरत होगी.
नीति आयोग की रिपोर्ट 'Key Sectors to Position India as a Global Manufacturing Hub' में इन चार सेक्टरों को औद्योगिक विस्तार, रोजगार सृजन और निर्यात बढ़ाने की बड़ी क्षमता वाले क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया गया है.
भारत के पास कई बड़े फायदे
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के पास मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मजबूत बनाने के लिए कई अनुकूल परिस्थितियां मौजूद हैं. इनमें बड़ा घरेलू बाजार, युवा कार्यबल, लगातार बेहतर होता इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश आकर्षित करने के लिए तैयार किया जा रहा नीतिगत माहौल शामिल है.
वैश्विक स्तर पर कंपनियों द्वारा अपनी सप्लाई चेन को एक ही देश पर निर्भर रखने के बजाय अलग-अलग देशों में फैलाने की कोशिश भी भारत के लिए बड़ा अवसर बन सकती है. इससे भारतीय कंपनियों को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई नेटवर्क में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का मौका मिलेगा.
आयात निर्भरता और स्किल की कमी बड़ी चुनौती
हालांकि, नीति आयोग ने साफ कहा कि सिर्फ इन फायदों के आधार पर भारत दुनिया की अग्रणी मैन्युफैक्चरिंग अर्थव्यवस्था नहीं बन सकता. महत्वपूर्ण कच्चे माल और इनपुट के लिए आयात पर निर्भरता, बिखरी हुई सप्लाई चेन, इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स की कमियां, घरेलू स्तर पर सीमित वैल्यू एडिशन, तकनीकी बाधाएं और कुशल श्रमिकों की कमी जैसी चुनौतियां भारत की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को प्रभावित कर रही हैं.
इन चुनौतियों से निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के साथ उद्योग, शैक्षणिक संस्थानों, वित्तीय संस्थाओं और इनोवेशन इकोसिस्टम को मिलकर काम करना होगा. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत को केवल असेंबली आधारित उत्पादन तक सीमित रहने के बजाय ग्लोबल वैल्यू चेन में गहरी भागीदारी बढ़ानी होगी.
केमिकल सेक्टर में बढ़ानी होगी घरेलू क्षमता
नीति आयोग ने केमिकल सेक्टर में घरेलू स्तर पर फीडस्टॉक की उपलब्धता बढ़ाने, इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर विकसित करने और डाउनस्ट्रीम वैल्यू एडिशन को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया है. इसी तरह अन्य प्रमुख सेक्टरों में भी घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने और सप्लाई चेन से जुड़े जोखिम कम करने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे.
एक नीति नहीं, लंबे समय की रणनीति जरूरी
रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया की प्रमुख मैन्युफैक्चरिंग अर्थव्यवस्थाओं के अनुभव से पता चलता है कि औद्योगिक विकास किसी एक नीति या कदम से संभव नहीं है. इसके लिए नीतियों में निरंतरता, औद्योगिक क्लस्टर, मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर, लक्षित प्रोत्साहन, तकनीक और कौशल विकास में लगातार निवेश जरूरी होगा.
भारतीय कंपनियों और अंतरराष्ट्रीय बाजारों के बीच मजबूत जुड़ाव को भी महत्वपूर्ण बताया गया है. ग्लोबल वैल्यू चेन में ज्यादा भागीदारी से भारतीय कंपनियों को नई तकनीक तक पहुंच, निर्यात बढ़ाने और घरेलू स्तर पर ज्यादा वैल्यू एडिशन का अवसर मिल सकता है.
'विकसित भारत @2047' में मैन्युफैक्चरिंग की अहम भूमिका
रिपोर्ट जारी करते हुए नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक कुमार लाहिड़ी ने कहा कि 'विकसित भारत @2047' के लक्ष्य के तहत देश के आर्थिक और औद्योगिक बदलाव में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की केंद्रीय भूमिका होगी.
उन्होंने कहा कि मैन्युफैक्चरिंग निवेश, इनोवेशन और निर्यात को बढ़ावा देने के साथ गुणवत्तापूर्ण रोजगार पैदा कर सकता है, उत्पादकता बढ़ा सकता है और अर्थव्यवस्था के अलग-अलग क्षेत्रों के बीच संबंधों को मजबूत कर सकता है.
लाहिड़ी के मुताबिक, भारत की युवा आबादी भी देश के लिए बड़ी ताकत है. करीब 28 साल की औसत आयु वाले कार्यबल के जरिए भारत अपनी जनसांख्यिकीय क्षमता का बेहतर इस्तेमाल कर सकता है. नीति आयोग का मानना है कि सही नीतियों, बेहतर कौशल, मजबूत सप्लाई चेन और तकनीकी क्षमता के साथ मैन्युफैक्चरिंग भारत को 2047 तक वैश्विक आर्थिक ताकत बनाने में अहम भूमिका निभा सकता है.
रक्षा मंत्रालय ने करीब 1 लाख करोड़ रुपये के मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट प्रोग्राम के लिए प्रक्रिया शुरू कर दी है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय वायुसेना के बेड़े को मजबूत करने और रक्षा विनिर्माण में आत्मनिर्भरता को नई रफ्तार देने की दिशा में सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. रक्षा मंत्रालय ने करीब 1 लाख करोड़ रुपये की लागत वाले नए मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट प्रोग्राम के लिए टेंडर प्रक्रिया शुरू कर दी है. इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत भारत में ही 60 नए सैन्य परिवहन विमान बनाए जाने का प्रस्ताव है. अमेरिकी कंपनी लॉकहीड मार्टिन और ब्राजील की एम्ब्रेयर के बीच इस प्रोजेक्ट के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा होने की संभावना है.
टाटा, अडानी, महिंद्रा और HAL को बुलावा
रक्षा मंत्रालय ने इस प्रोग्राम के लिए टाटा समूह, अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस, महिंद्रा और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी HAL समेत प्रमुख भारतीय कंपनियों को शामिल किया है. ये कंपनियां किसी वैश्विक ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर के साथ साझेदारी कर भारतीय वायुसेना की जरूरतों के लिए बोली लगाएंगी. चयन प्रक्रिया में तकनीकी मूल्यांकन, एयरक्राफ्ट ट्रायल और टेक्नो-कमर्शियल प्रस्तावों को आधार बनाया जाएगा. प्रोजेक्ट के बड़े आकार और तकनीकी जटिलताओं को देखते हुए अंतिम चयन में दो साल से ज्यादा का समय लग सकता है.
C-130J और C-390 के बीच हो सकता है मुकाबला
भारतीय वायुसेना की तकनीकी जरूरतों को देखते हुए इस दौड़ में मुख्य मुकाबला लॉकहीड मार्टिन के C-130J और एम्ब्रेयर के C-390 मिलेनियम एयरक्राफ्ट के बीच होने की संभावना है. लॉकहीड मार्टिन ने भारत में टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड को अपना साझेदार बनाया है. टाटा समूह पहले से ही एयरबस के साथ मिलकर वडोदरा में C-295 मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट का निर्माण कर रहा है.
दूसरी ओर, एम्ब्रेयर ने पहले इस प्रोग्राम के लिए महिंद्रा के साथ साझेदारी की घोषणा की थी. हालांकि, कंपनी अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस के साथ भी संभावित साझेदारी पर विचार कर सकती है. एम्ब्रेयर और अडानी ने हाल ही में नागरिक यात्री विमानों के निर्माण से जुड़े सहयोग की भी घोषणा की है.
AN-32 और IL-76 बेड़े की लेंगे जगह
नए मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट भारतीय वायुसेना के पुराने AN-32 और IL-76 विमानों के बेड़े को चरणबद्ध तरीके से बदलने में अहम भूमिका निभाएंगे. इनका इस्तेमाल सैन्य बलों की रणनीतिक, सामरिक और ऑपरेशनल एयरलिफ्ट जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जाएगा.
C-295 प्रोग्राम के बाद यह भारत में स्थापित होने वाली दूसरी बड़ी मिलिट्री एयरक्राफ्ट मैन्युफैक्चरिंग लाइन हो सकती है. करीब 1 लाख करोड़ रुपये के इस प्रोजेक्ट से न सिर्फ भारतीय वायुसेना की परिवहन क्षमता मजबूत होने की उम्मीद है, बल्कि देश में एयरोस्पेस और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को भी बड़ा बढ़ावा मिल सकता है.
जुलाई में आयात 76.22 अरब डॉलर के 9 महीने के उच्च स्तर पर पहुंचा. कच्चे तेल और इलेक्ट्रॉनिक सामान की भारी खरीदारी से व्यापार घाटा बढ़कर 31.98 अरब डॉलर हो गया, हालांकि निर्यात में करीब 20% की मजबूत वृद्धि दर्ज की गई.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के विदेशी व्यापार मोर्चे पर जुलाई में आयात का दबाव बढ़ता नजर आया. कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक सामान, उर्वरक और कोयले की खरीद में तेज बढ़ोतरी के चलते देश का व्यापार घाटा बढ़कर छह महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गया. जुलाई में भारत का कुल आयात 76.22 अरब डॉलर रहा, जो 9 महीने का सबसे ऊंचा स्तर है. हालांकि राहत की बात यह रही कि वस्तु निर्यात में भी करीब 20% की मजबूत बढ़ोतरी दर्ज की गई और यह 44.24 अरब डॉलर पर पहुंच गया.
31.98 अरब डॉलर पर पहुंचा व्यापार घाटा
वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई में भारत का व्यापार घाटा बढ़कर 31.98 अरब डॉलर हो गया. जून में यह 30.42 अरब डॉलर और जुलाई 2025 में 27.88 अरब डॉलर था. इस तरह एक महीने और एक साल, दोनों आधार पर व्यापार घाटे में बढ़ोतरी दर्ज की गई. जुलाई में वस्तुओं का आयात सालाना आधार पर करीब 18% बढ़कर 76.22 अरब डॉलर पर पहुंच गया. आयात पर हुआ यह खर्च अक्टूबर 2025 के 76.73 अरब डॉलर के बाद दूसरा सबसे अधिक है.
कच्चे तेल और इलेक्ट्रॉनिक्स का आयात तेजी से बढ़ा
जुलाई में कच्चे तेल का आयात सालाना आधार पर करीब 18% बढ़कर 18.31 अरब डॉलर हो गया. इलेक्ट्रॉनिक सामान का आयात 46% की तेज वृद्धि के साथ 14.37 अरब डॉलर पहुंच गया. इसके अलावा उर्वरक आयात 55% बढ़कर 2.48 अरब डॉलर और कोयले का आयात 29% बढ़कर 3.05 अरब डॉलर रहा. सोने का आयात भी जुलाई में बढ़कर 4.16 अरब डॉलर पहुंच गया, जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में करीब 5% अधिक है. इन प्रमुख वस्तुओं की आयात मांग बढ़ने से देश का कुल आयात बिल काफी ऊंचा रहा.
निर्यात में करीब 20% की मजबूत बढ़त
आयात में तेज बढ़ोतरी के बावजूद जुलाई में वस्तु निर्यात का प्रदर्शन मजबूत रहा. भारत का वस्तु निर्यात करीब 20% बढ़कर 44.24 अरब डॉलर पहुंच गया. यह मई में दर्ज 45.42 अरब डॉलर के बाद अब तक का दूसरा सबसे ऊंचा स्तर है. वाणिज्य विभाग के मुताबिक, निर्यात में वृद्धि के पीछे ऊंची कीमतों और पश्चिम एशिया में आपूर्ति बाधित होने के बाद वहां भारतीय उत्पादों की मांग बढ़ना प्रमुख कारण रहा. इंजीनियरिंग सामान का निर्यात भी जुलाई में 18% बढ़कर 12.24 अरब डॉलर हो गया.
सेवाओं से मिला सहारा
जुलाई में सेवा निर्यात करीब 6% बढ़कर 35.89 अरब डॉलर रहने का अनुमान है, जबकि सेवा आयात करीब 10% बढ़कर 18.94 अरब डॉलर रहने का अनुमान लगाया गया है. इससे सेवाओं का व्यापार अधिशेष करीब 16.95 अरब डॉलर रहा.
भारतीय रिजर्व बैंक इस महीने के अंत में सेवा व्यापार से जुड़े अंतिम आंकड़े जारी कर सकता है. ऐसे में वस्तुओं के व्यापार घाटे में बढ़ोतरी के बावजूद सेवा क्षेत्र का मजबूत अधिशेष देश के समग्र बाहरी व्यापार संतुलन को कुछ राहत दे सकता है.
गुरुवार को बीएसई सेंसेक्स 113.61 अंक यानी 0.15% की तेजी के साथ 78,079.96 अंक पर बंद हुआ. वहीं, एनएसई का निफ्टी50 40.10 अंक यानी 0.16% की गिरावट के साथ 24,395.85 अंक पर बंद हुआ.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच घरेलू शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव का दौर बना हुआ है. पिछले कारोबारी सत्र में सेंसेक्स आखिरी घंटे की खरीदारी से हरे निशान में लौट आया, जबकि निफ्टी गिरावट के साथ बंद हुआ. अब आज बाजार खुलने से पहले निवेशकों की नजर वैश्विक संकेतों, रुपये की चाल और कॉरपोरेट खबरों पर रहेगी. SBI के 50 करोड़ डॉलर के बॉन्ड इश्यू से लेकर L&T के बड़े ऑर्डर, UltraTech Cement और Urban Company में हुई ब्लॉक डील तथा MSCI India Index में बदलाव तक कई ऐसे ट्रिगर हैं, जिनसे चुनिंदा शेयरों में आज जोरदार हलचल देखने को मिल सकती है.
सेंसेक्स 113 अंक चढ़ा, निफ्टी 40 अंक फिसला
पिछले कारोबारी सत्र में बीएसई सेंसेक्स 113.61 अंक यानी 0.15% की तेजी के साथ 78,079.96 अंक पर बंद हुआ. वहीं, एनएसई का निफ्टी50 40.10 अंक यानी 0.16% की गिरावट के साथ 24,395.85 अंक पर बंद हुआ. कारोबार के ज्यादातर हिस्से में दोनों प्रमुख इंडेक्स दबाव में रहे, लेकिन आखिरी घंटे में खरीदारी से सेंसेक्स हरे निशान में लौट आया. इस दौरान रुपये में भी कमजोरी देखने को मिली. रुपया डॉलर के मुकाबले 0.1% गिरकर 95.44 पर बंद हुआ, जबकि पिछले सत्र में यह 95.33 के स्तर पर बंद हुआ था.
सेंसेक्स के 30 में से 19 शेयरों में तेजी
सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 19 बढ़त के साथ बंद हुए. इंडिगो में सबसे ज्यादा 2.86% की तेजी रही. इसके अलावा एनटीपीसी, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, एलएंडटी, हिंदुस्तान यूनिलीवर, इटरनल, टेक महिंद्रा, बजाज फिनसर्व, एशियन पेंट्स और ट्रेंट के शेयरों में भी खरीदारी देखने को मिली. दूसरी ओर आईसीआईसीआई बैंक, टाइटन, रिलायंस इंडस्ट्रीज, अल्ट्राटेक सीमेंट, इन्फोसिस और टाटा स्टील दबाव में रहे.
मेटल शेयरों पर दबाव, केमिकल सेक्टर में तेजी
सेक्टरवार प्रदर्शन की बात करें तो निफ्टी मेटल में 1% से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई और यह सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाला सेक्टर रहा. हिंडाल्को इंडस्ट्रीज, अल्ट्राटेक सीमेंट और ग्रासिम इंडस्ट्रीज निफ्टी50 के प्रमुख गिरने वाले शेयरों में शामिल रहे. वहीं, निफ्टी केमिकल इंडेक्स में सबसे ज्यादा तेजी देखने को मिली. ब्रॉडर मार्केट में निफ्टी मिडकैप इंडेक्स 0.15% और निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स 0.27% की तेजी के साथ बंद हुए.
आज इन शेयरों में दिख सकता है एक्शन
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आज के कारोबार में कई कॉरपोरेट खबरों के चलते चुनिंदा शेयरों में जोरदार हलचल देखने को मिल सकती है. SBI की लंदन ब्रांच ने 5.25% कूपन दर पर बॉन्ड जारी कर 50 करोड़ डॉलर जुटाए हैं, जबकि Piramal Pharma में करीब 6% हिस्सेदारी की 1,750 करोड़ रुपये की ब्लॉक डील की संभावना है. Saatvik Green Energy की सहायक कंपनी को 476 करोड़ रुपये का सोलर PV मॉड्यूल ऑर्डर मिला है, वहीं Aditya Birla Real Estate की सब्सिडियरी Birla Estates ने नवी मुंबई के वाशी में रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट में एंट्री की है, जिससे करीब 2,600 करोड़ रुपये की आय की उम्मीद है. BHEL ने ग्रीन हाइड्रोजन प्रोजेक्ट्स के लिए नॉर्वे की Hystar AS के साथ रणनीतिक साझेदारी की है. Urban Company में भी SBI Mutual Fund समेत कई बड़े निवेशकों के बीच करोड़ों रुपये के शेयरों की खरीद-बिक्री हुई है. वहीं MSCI की अगस्त समीक्षा में Adani Energy Solutions, Groww की पैरेंट कंपनी Billionbrains Garage Ventures, Laurus Labs और Lenskart Solutions को MSCI India Index में शामिल किया गया है, जबकि Balkrishna Industries, SBI Cards और Astral को बाहर किया जाएगा. L&T को 10,000 करोड़ रुपये से 15,000 करोड़ रुपये के बीच का बड़ा AI इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट मिला है, जबकि UltraTech Cement में प्रमोटर इकाई Pilani Investment and Industries Corporation ने करीब 2,896 करोड़ रुपये के शेयर बेचे हैं. इसके अलावा Tata Sons के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन के उत्तराधिकारी को लेकर शुरू हुई प्रक्रिया पर भी निवेशकों की नजर बनी रहेगी.
आज बाजार के लिए क्या होंगे अहम संकेत?
विशेषज्ञों का कहना है कि शुक्रवार के कारोबार में निवेशकों की नजर पश्चिम एशिया में जारी तनाव और उसके वैश्विक बाजारों पर पड़ने वाले असर पर रहेगी. इसके अलावा डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल भी महत्वपूर्ण होगी. पिछले सत्र में सेंसेक्स में आखिरी घंटे की रिकवरी ने चुनिंदा शेयरों में खरीदारी की दिलचस्पी दिखाई, लेकिन निफ्टी का गिरावट के साथ बंद होना बाजार में अभी भी सतर्कता का संकेत देता है. ऐसे में आज बैंकिंग, मेटल, आईटी के साथ-साथ SBI, L&T, UltraTech Cement, Urban Company और MSCI से जुड़े शेयरों में खास हलचल देखने को मिल सकती है. निवेशकों की नजर वैश्विक संकेतों के साथ इन कॉरपोरेट ट्रिगर्स पर भी बनी रहेगी.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
एन चंद्रशेखरन फरवरी 2027 के बाद टाटा संस के चेयरमैन पद पर दोबारा नियुक्ति नहीं चाहते हैं. टाटा ट्रस्ट्स ने उनके फैसले का सम्मान करते हुए उत्तराधिकारी चुनने की प्रक्रिया शुरू कर दी है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
टाटा ट्रस्ट्स ने टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन के अगले कार्यकाल के लिए दोबारा नियुक्ति की पेशकश नहीं करने के फैसले का समर्थन किया है. चंद्रशेखरन का मौजूदा कार्यकाल 20 फरवरी 2027 को समाप्त होगा. इसके बाद टाटा संस की कमान किसे सौंपी जाएगी, इसे लेकर चयन प्रक्रिया शुरू कर दी गई है.
सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (SDTT) ने गुरुवार को जारी एक बयान में कहा कि उसके नॉमिनी डायरेक्टर्स को 12 अगस्त को चंद्रशेखरन का ईमेल मिला था, जिसमें उन्होंने बताया कि वह दोबारा नियुक्ति के लिए अपना नाम पेश नहीं करेंगे. ट्रस्ट ने पिछले करीब एक दशक के दौरान टाटा संस और टाटा ग्रुप के नेतृत्व और योगदान के लिए चंद्रशेखरन की सराहना भी की.
नए चेयरमैन के लिए बनेगी चयन समिति
सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के ट्रस्टियों ने टाटा संस के Articles of Association के तहत एक चयन समिति गठित करने का प्रस्ताव पारित किया है. यह समिति टाटा संस के अगले चेयरमैन के लिए उम्मीदवार की सिफारिश करेगी.
टाटा ट्रस्ट्स ने कहा कि वह नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया को सुचारू, समयबद्ध और व्यवस्थित तरीके से पूरा करने के लिए टाटा संस को पूरा समर्थन देगा. यह प्रक्रिया टाटा संस और पूरे टाटा ग्रुप के मूल्यों और दीर्घकालिक हितों के अनुरूप होगी. ट्रस्ट ने कहा कि वह ग्रुप में महत्वपूर्ण बदलाव, विकास और परिवर्तन के दौर में चंद्रशेखरन के योगदान के लिए उनका आभार व्यक्त करता है.
दोबारा नियुक्ति को नहीं मिला सर्वसम्मत समर्थन
चंद्रशेखरन ने दोबारा कार्यकाल नहीं लेने का फैसला इसलिए किया क्योंकि उनकी पुनर्नियुक्ति के प्रस्ताव को टाटा संस के बोर्ड का सर्वसम्मत समर्थन नहीं मिला था. अपने पत्र में चंद्रशेखरन ने कहा कि सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट ने सर्वसम्मति से उनके कार्यकाल को पांच साल बढ़ाने की सिफारिश करने का फैसला किया था. इसके बाद इस प्रस्ताव को टाटा संस की नॉमिनेशन एंड रिम्यूनरेशन कमेटी और बोर्ड ने भी रिकॉर्ड किया और इसकी सिफारिश की. हालांकि, उनके मुताबिक 24 फरवरी को टाटा संस के बोर्ड के सामने प्रस्ताव रखा गया, लेकिन एक बोर्ड सदस्य के समर्थन नहीं देने के कारण इसे आगे नहीं बढ़ाया जा सका. चंद्रशेखरन ने कहा कि सर्वसम्मत समर्थन नहीं मिलने की स्थिति में उन्होंने इस फैसले को टालना उचित समझा.
छह महीने तक नहीं हो सका फैसला
चंद्रशेखरन ने अपने पत्र में यह भी कहा कि बोर्ड की बैठक के करीब छह महीने बाद भी इस मुद्दे पर कोई अंतिम फैसला नहीं हो पाया. उन्होंने कहा कि फरवरी 2027 के बाद नेतृत्व को लेकर समय रहते फैसला होना जरूरी है, ताकि कर्मचारियों, निवेशकों, भागीदारों और अन्य हितधारकों के बीच स्पष्टता बनी रहे.
टाटा संस में ट्रस्ट्स की 65.9% हिस्सेदारी
टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस में 65.9 फीसदी हिस्सेदारी है. ऐसे में नए चेयरमैन के चयन की प्रक्रिया में ट्रस्ट्स की अहम भूमिका होगी. अब चंद्रशेखरन के मौजूदा कार्यकाल के समाप्त होने से पहले नए चेयरमैन के चयन की प्रक्रिया पूरी की जाएगी, ताकि टाटा संस और टाटा ग्रुप में नेतृत्व परिवर्तन सुचारू तरीके से हो सके.
भारत में AI इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर बड़ा निवेश सामने आया है. लार्सन एंड टुब्रो (L&T) को करीब ₹10,000 करोड़ से ₹15,000 करोड़ का बड़ा ऑर्डर मिला है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते इस्तेमाल के बीच भारत में बड़े पैमाने पर AI इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने की दिशा में अहम कदम उठाया गया है. इसी क्रम में लार्सन एंड टुब्रो (L&T) को भी AI इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ा करीब ₹10,000 करोड़ से ₹15,000 करोड़ का ऑर्डर मिला है. इस प्रोजेक्ट के तहत चेन्नई में भारत की सबसे बड़ी सिंगल-क्लस्टर AI फैक्ट्री विकसित की जाएगी.
कंपनी ने जानकारी दी है कि इस AI फैक्ट्री में 10,000 NVIDIA B300 GPU लगाए जाएंगे. यह प्रोजेक्ट अमेरिकी AI क्लाउड कंपनी Together AI के लिए तैयार किया जाएगा. इसका इस्तेमाल बड़े स्तर पर AI मॉडल की ट्रेनिंग, डेटा प्रोसेसिंग, इंफरेंस और फाइन-ट्यूनिंग जैसे कामों के लिए किया जाएगा.
L&T की AI फैक्ट्री में क्या होगा?
इस प्रोजेक्ट को L&T की AI इंफ्रास्ट्रक्चर सब्सिडियरी LTN कम्यूट विकसित करेगी. यह Vyoma.AI का हिस्सा है. AI फैक्ट्री को चेन्नई में मौजूद Vyoma के डेटा सेंटर कैंपस में तैयार किया जाएगा. चेन्नई स्थित यह कैंपस आगे चलकर गीगावाट-स्केल AI इंफ्रास्ट्रक्चर साइट के रूप में विकसित करने की योजना है. प्रोजेक्ट के पहले चरण की क्षमता 250 मेगावाट रखी गई है, जबकि पावर इंफ्रास्ट्रक्चर को 150 MVA के लिए तैयार किया जा रहा है. इससे भविष्य में AI फैक्ट्री की क्षमता बढ़ाने की गुंजाइश रहेगी.
हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग से लेकर AI ऑपरेशंस तक
फैसिलिटी में डेटा सेंटर के साथ हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग, तेज नेटवर्किंग, लो-लेटेंसी इंटरकनेक्ट, पैरेलल स्टोरेज और AI ऑपरेशंस से जुड़ी सुविधाएं शामिल होंगी. इसका उद्देश्य कंपनियों को एक ही प्लेटफॉर्म पर बड़े AI वर्कलोड को शुरू करने और जरूरत के मुताबिक उसकी क्षमता बढ़ाने की सुविधा देना है. बड़े AI मॉडल की ट्रेनिंग और डेटा प्रोसेसिंग के लिए इस तरह का हाई-एंड इंफ्रास्ट्रक्चर महत्वपूर्ण माना जाता है.
L&T पहली बार बड़े स्तर पर AI Factory कारोबार में उतरेगी
यह प्रोजेक्ट L&T के लिए भी खास है, क्योंकि कंपनी पहली बार बड़े पैमाने पर AI Factory बिजनेस में प्रवेश कर रही है. कंपनी का लक्ष्य तेजी से बढ़ रहे AI इंफ्रास्ट्रक्चर बाजार में अपनी मौजूदगी मजबूत करना है. L&T के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर एसएन सुब्रह्मण्यन ने कहा कि AI अब लगभग हर इंडस्ट्री का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है. उनके मुताबिक, यह AI फैक्ट्री भारत को अगली पीढ़ी के AI इंफ्रास्ट्रक्चर का वैश्विक हब बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. Together AI के को-फाउंडर और CEO विपुल वेद प्रकाश ने भी इस साझेदारी को अहम बताया. उन्होंने कहा कि दुनिया में AI को बड़े पैमाने पर उपलब्ध कराने के लिए बहुत बड़े और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होगी.
रिजर्व बैंक ने लोन की कीमत तय करने के लिए एक समान फ्रेमवर्क का ड्राफ्ट जारी किया है. इसमें फ्लोटिंग रेट वाले रिटेल और MSME लोन को बाहरी बेंचमार्क से जोड़ने, स्प्रेड में मनमानी रोकने और छोटे कर्ज पर APR की सीमा तय करने का प्रस्ताव है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकों और अन्य रेगुलेटेड लेंडर्स के लिए लोन की ब्याज दर तय करने का एक समान फ्रेमवर्क प्रस्तावित किया है. इसका मकसद कर्ज की कीमत तय करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाना, अलग-अलग संस्थानों के बीच ब्याज दर तय करने के तरीकों में अंतर कम करना और उधार लेने वालों को मनमाने शुल्क या ब्याज से बचाना है.
RBI के ड्राफ्ट नियमों में बोर्ड से मंजूर प्राइसिंग पॉलिसी, बेंचमार्क आधारित ब्याज दर और रिस्क के आधार पर स्प्रेड तय करने की व्यवस्था का प्रस्ताव है. साथ ही कम वैल्यू वाले और माइक्रोफाइनेंस लोन में बहुत ज्यादा ब्याज वसूलने से बचाने के लिए भी सुरक्षा उपाय सुझाए गए हैं. ड्राफ्ट पर 11 सितंबर 2026 तक लोगों और संबंधित पक्षों से सुझाव मांगे गए हैं. प्रस्तावित नियम 1 अप्रैल 2027 से लागू किए जाने हैं.
फ्लोटिंग रेट लोन पर बड़ा बदलाव
RBI के प्रस्ताव के मुताबिक, कमर्शियल बैंकों के सभी फ्लोटिंग रेट वाले रिटेल या पर्सनल लोन और MSME लोन को किसी बाहरी बेंचमार्क से जोड़ना जरूरी होगा. इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि RBI की नीतिगत दरों में बदलाव का असर ग्राहकों तक ज्यादा पारदर्शी तरीके से पहुंचे.
बाहरी बेंचमार्क किसी एक बैंक के नियंत्रण में नहीं होता. ऐसे में रेपो रेट या अन्य संबंधित बेंचमार्क में बदलाव होने पर लोन की ब्याज दर में बदलाव का असर ग्राहकों तक अपेक्षाकृत स्पष्ट तरीके से पहुंच सकेगा. हालांकि, NBFCs, ऑल इंडिया फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस, रीजनल रूरल बैंक और कोऑपरेटिव बैंकों के लिए बाहरी बेंचमार्क अपनाना अनिवार्य नहीं होगा. उन्हें इस बारे में फैसला लेने की छूट रहेगी.
बैंक मनमाने तरीके से स्प्रेड नहीं बढ़ा सकेंगे
प्रस्तावित फ्रेमवर्क में लोन की ब्याज दर को बेंचमार्क और रिस्क-बेस्ड स्प्रेड से जोड़ने की व्यवस्था है. स्प्रेड में क्रेडिट रिस्क प्रीमियम, ऑपरेटिंग कॉस्ट, टर्म प्रीमियम और बिजनेस स्ट्रैटेजी प्रीमियम जैसे हिस्से शामिल हो सकते हैं.
RBI ने प्रस्ताव दिया है कि अगर उधार लेने वाले की क्रेडिट प्रोफाइल में बदलाव आता है, तभी क्रेडिट रिस्क प्रीमियम में बदलाव किया जा सके. वहीं स्प्रेड के अन्य हिस्सों में आम तौर पर तीन साल से पहले बदलाव नहीं किया जा सकेगा, हालांकि कुछ विशेष परिस्थितियों में छूट दी जा सकती है.
फ्लोटिंग रेट वाले लोन में बेंचमार्क, रीसेट की अवधि और रीसेट की तारीख की जानकारी लोन एग्रीमेंट में स्पष्ट रूप से देनी होगी. प्रस्ताव के तहत बेंचमार्क को आम तौर पर तीन महीने से ज्यादा के अंतराल पर रीसेट नहीं किया जा सकेगा.
छोटे लोन पर APR की सीमा का प्रस्ताव
RBI ने कम वैल्यू वाले और माइक्रोफाइनेंस लोन के लिए अलग सुरक्षा उपाय का भी प्रस्ताव रखा है. रेगुलेटेड संस्थाओं को एनुअल परसेंटेज रेट यानी APR पर स्पष्ट सीमा तय करनी होगी. इसमें ब्याज के साथ अन्य शुल्क भी शामिल होंगे, ताकि छोटे कर्ज लेने वालों पर अत्यधिक लागत का बोझ न पड़े.
प्रस्ताव के मुताबिक, ₹50,000 तक के पर्सनल लोन को कम वैल्यू वाला लोन माना जाएगा. छोटे और सीमांत किसानों को दिए जाने वाले शॉर्ट-टर्म एग्रीकल्चरल लोन में कुल ब्याज और शुल्क मूल राशि से अधिक नहीं होने का भी प्रस्ताव है.
पुराने लोन को भी नए फ्रेमवर्क में लाने की तैयारी
ड्राफ्ट के अनुसार, मौजूदा लोन को 1 अप्रैल 2029 तक एक बार की मैपिंग प्रक्रिया के जरिए प्रस्तावित नए फ्रेमवर्क में शामिल किया जाना होगा. इससे पुराने और नए दोनों तरह के लोन पर ब्याज दर तय करने की व्यवस्था को धीरे-धीरे एक समान किया जा सकेगा.
₹1,000 करोड़ से ज्यादा डिपॉजिट वाले लेंडर्स के लिए अलग व्यवस्था
जिन लेंडर्स के पास कुल डिपॉजिट ₹1,000 करोड़ से अधिक है, उनके लिए प्रस्तावित इंटरनल बेंचमार्क मार्जिनल कॉस्ट ऑफ फंड्स पर आधारित होगा. इसकी गणना घरेलू डिपॉजिट और उधारी की मार्जिनल कॉस्ट के तीन महीने के मूविंग एवरेज के आधार पर की जाएगी. ऐसे लेंडर्स को हर महीने के पहले कैलेंडर दिन अपना इंटरनल बेंचमार्क सार्वजनिक करना होगा.
RBI ने कहा है कि बैंकों के बीच MCLR तय करने की मौजूदा प्रक्रिया में काफी अंतर पाया गया है. इसी वजह से ज्यादा स्पष्ट और सिद्धांत आधारित फ्रेमवर्क की जरूरत महसूस हुई है.
ग्राहकों के लिए क्या बदलेगा?
नए प्रस्ताव से लोन लेने वालों के लिए सबसे बड़ा फायदा पारदर्शिता के रूप में सामने आ सकता है. ग्राहक यह बेहतर तरीके से समझ सकेंगे कि उनके लोन की ब्याज दर किस बेंचमार्क से जुड़ी है, स्प्रेड किन हिस्सों से बना है और ब्याज दर कब और कैसे रीसेट होगी.
खासकर फ्लोटिंग रेट वाले बैंक लोन में RBI की नीतिगत दरों में बदलाव का असर ग्राहकों तक ज्यादा स्पष्ट तरीके से पहुंचने की उम्मीद है. वहीं छोटे कर्ज और माइक्रोफाइनेंस लोन में APR की सीमा से अत्यधिक ब्याज और शुल्क पर लगाम लगाने में मदद मिल सकती है.
RBI के प्रस्तावित निर्देश बैंक, NBFC, कोऑपरेटिव बैंक, हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों और ऑल इंडिया फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस पर लागू होंगे. हालांकि, अलग-अलग संस्थानों और लोन कैटेगरी के लिए कुछ विशेष प्रावधान और छूट भी तय की गई हैं.
भारत और दक्षिण अफ्रीका के नेतृत्व वाले पांच देशों के समूह साउदर्न अफ्रीकन कस्टम्स यूनियन यानी SACU ने प्रस्तावित ट्रेड डील के लिए बातचीत का औपचारिक खाका तय कर लिया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत और पांच सदस्यीय दक्षिणी अफ्रीकी सीमा शुल्क संघ (SACU) के बीच प्रस्तावित प्रेफरेंशियल ट्रेड एग्रीमेंट को लेकर बुधवार को टर्म ऑफ रेफरेंस (ToR) पर हस्ताक्षर किए गए. इसके साथ ही दोनों पक्षों के बीच होने वाली बातचीत का दायरा, उद्देश्य और बुनियादी नियम औपचारिक रूप से तय हो गए हैं. केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि बातचीत में तेजी जरूरी है, लेकिन जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि वार्ता को वर्षों तक खींचने के बजाय एक तय और सीमित समयसीमा में पूरा किया जाना चाहिए. दोनों पक्षों ने एक महीने के भीतर बातचीत शुरू करने और एक साल में इसे पूरा करने का लक्ष्य रखा है.
किन मुद्दों पर होगी बातचीत?
प्रस्तावित समझौते के शुरुआती चरण में वस्तुओं के व्यापार से जुड़े आठ प्रमुख क्षेत्रों को शामिल किया गया है. इनमें बाजार तक पहुंच, मूल स्थान के नियम (Rules of Origin), सीमा शुल्क प्रक्रिया और व्यापार सुगमता, व्यापार उपचार, सैनिटरी और फाइटोसैनिटरी उपाय, तकनीकी व्यापार बाधाएं, विवाद निपटान तथा कानूनी और अन्य सामान्य प्रावधान शामिल हैं. वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने कहा कि बातचीत आगे बढ़ने के साथ इन क्षेत्रों में कुछ नए मुद्दे जोड़े या कुछ प्रावधान हटाए भी जा सकते हैं. ToR पर वाणिज्य विभाग के अतिरिक्त सचिव यशवीर सिंह और SACU की मुख्य वार्ताकार न्दीताह न्घीपोंडोका-रोबियाती ने हस्ताक्षर किए. यह दस्तावेज दोनों पक्षों के बीच आगे होने वाली बातचीत का औपचारिक रोडमैप उपलब्ध कराता है.
2025-26 में भारत-SACU व्यापार $16.81 अरब
भारत और SACU के बीच व्यापार तेजी से बढ़ रहा है. वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों के बीच कुल द्विपक्षीय व्यापार 16.81 अरब डॉलर रहा. इसमें भारत का निर्यात 7.55 अरब डॉलर रहा. SACU में दक्षिण अफ्रीका के अलावा बोत्सवाना, नामीबिया, लेसोथो और इस्वातिनी शामिल हैं. पीयूष गोयल ने कहा कि भारत SACU के संवेदनशील माने जाने वाले क्षेत्रों का सम्मान करेगा. इसके साथ ही भारत को भी अपने संवेदनशील क्षेत्रों को लेकर SACU से समान सहयोग और विचार की उम्मीद है.
हेल्थकेयर और IT में सहयोग बढ़ाने पर जोर
वाणिज्य मंत्री ने कहा कि प्रस्तावित समझौता दोनों पक्षों को मौजूदा बाजारों से आगे बढ़ने और वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी भागीदारी मजबूत करने में मदद कर सकता है. उन्होंने हेल्थकेयर और सूचना प्रौद्योगिकी यानी IT को सहयोग बढ़ाने वाले अहम क्षेत्रों के तौर पर रेखांकित किया. भारत SACU देशों को किफायती दवाइयों, तकनीकी क्षमताओं और प्रतिभा विकास के क्षेत्र में सहयोग दे सकता है. गोयल ने कहा कि शुरुआत उन क्षेत्रों से की जानी चाहिए जहां दोनों पक्ष एक-दूसरे की क्षमताओं के पूरक हैं और आगे चलकर सहयोग का दायरा बढ़ाया जा सकता है.
ग्लोबल ट्रेड अनिश्चितता के बीच अहम कदम
SACU की मुख्य वार्ताकार न्दीताह न्घीपोंडोका-रोबियाती ने कहा कि समूह एक संतुलित, पारस्परिक रूप से लाभकारी और विकास-केंद्रित समझौता चाहता है. वहीं, वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने कहा कि तय समयसीमा में समझौते को पूरा करना वैश्विक व्यापार में बढ़ती अनिश्चितता के बीच सकारात्मक संकेत देगा. उनके मुताबिक, समय पर होने वाली ऐसी साझेदारियां वैश्विक व्यापार को गति देने में मदद कर सकती हैं.
ओडिशा सरकार ने अपनी सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग और फैबलेस पॉलिसी में संशोधन को मंजूरी दे दी है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ओडिशा सरकार ने सेमीकंडक्टर उद्योग को बढ़ावा देने के लिए अपनी प्रोत्साहन नीति का दायरा बढ़ा दिया है. राज्य सरकार अब इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन यानी ISM से मंजूर सेमीकंडक्टर परियोजनाओं को पात्र पूंजीगत खर्च यानी कैपेक्स का 25% तक अतिरिक्त वित्तीय समर्थन देगी. ओडिशा कैबिनेट ने राज्य की सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग एंड फैबलेस पॉलिसी में संशोधनों को मंजूरी दे दी है. यह वित्तीय सहायता केंद्र सरकार की मदद के साथ दी जाएगी और परियोजनाओं की तय प्रगति के चरणों तथा ISM द्वारा मंजूर फंड जारी होने के अनुरूप वितरित की जाएगी.
अब उपकरण, केमिकल और सप्लाई चेन कंपनियां भी दायरे में
संशोधित नीति के तहत पात्र निवेश का दायरा केवल सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग तक सीमित नहीं रहेगा. अब सेमीकंडक्टर उपकरण, सेमीकंडक्टर-ग्रेड केमिकल्स, विशेष गैसों, एडवांस्ड मटेरियल और सप्लाई चेन के अन्य महत्वपूर्ण घटकों से जुड़ी परियोजनाओं को भी प्रोत्साहन के दायरे में शामिल किया गया है.
राज्य की मौजूदा नीति में पहले से सेमीकंडक्टर निर्माण, असेंबली, टेस्टिंग, मार्किंग और पैकेजिंग शामिल हैं. इसके अलावा आउटसोर्स्ड सेमीकंडक्टर असेंबली एंड टेस्ट यानी ATMP/OSAT, डिस्प्ले मैन्युफैक्चरिंग और फैबलेस चिप डिजाइन से जुड़ी गतिविधियां भी इस नीति के तहत आती हैं.
बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए मिलेगा कस्टमाइज्ड पैकेज
ओडिशा सरकार अब सेमीकंडक्टर उपकरण, कच्चे माल और अन्य महत्वपूर्ण इनपुट से जुड़े बड़े या मेगा प्रोजेक्ट्स के लिए विशेष और कस्टमाइज्ड इंसेंटिव पैकेज भी दे सकेगी. इसके लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली हाई-लेवल कमेटी की सिफारिश के बाद राज्य कैबिनेट की मंजूरी जरूरी होगी.
मुख्य सचिव अनु गर्ग ने कहा कि इस संशोधन से राज्य को महत्वपूर्ण क्षेत्रों में बड़े निवेश के लिए अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से प्रोत्साहन पैकेज तैयार करने की सुविधा मिलेगी. ऐसे मामलों में सामान्य इंसेंटिव बड़े निवेश के आकार और जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकते हैं.
पांच कंपनियों ने दिए प्रस्ताव
ओडिशा ने पहली बार सितंबर 2023 में अपनी सेमीकंडक्टर नीति को अधिसूचित किया था. इसके बाद मार्च 2024 और जुलाई 2025 में इसमें संशोधन किए गए. राज्य सरकार के अनुसार, अब तक पांच कंपनियां सेमीकंडक्टर सेक्टर में निवेश के प्रस्ताव दे चुकी हैं, जिनमें से दो परियोजनाओं को इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के तहत समर्थन मिल चुका है.
मजबूत सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम बनाने पर फोकस
नई नीति के जरिए ओडिशा केवल चिप मैन्युफैक्चरिंग परियोजनाओं तक सीमित रहने के बजाय एक व्यापक और एकीकृत सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम विकसित करना चाहता है. इसके तहत अपस्ट्रीम और सपोर्टिंग इंडस्ट्रीज को भी प्रोत्साहन ढांचे में शामिल किया गया है.
सरकार का कहना है कि विस्तारित नीति ISM 2.0 के उद्देश्यों के अनुरूप है. इसका मकसद निवेशकों का भरोसा बढ़ाना, घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को प्रोत्साहित करना और उच्च मूल्य वाली नौकरियों का सृजन करना है. इससे स्किल डेवलपमेंट को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है, साथ ही सेमीकंडक्टर उद्योग को सामान और सेवाएं उपलब्ध कराने वाले माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज यानी MSMEs के लिए भी नए अवसर पैदा हो सकते हैं.
CAG की ऑडिट रिपोर्ट में वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट और कंस्ट्रक्शन सेक्टर में GST नियमों के उल्लंघन के 1,334 मामले सामने आए हैं. इनमें से 903 मामलों में विभाग ने आपत्तियां स्वीकार की हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (CAG) ने वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट और कंस्ट्रक्शन सेक्टर में GST नियमों के उल्लंघन से जुड़े ₹401.42 करोड़ के 1,334 मामलों का पता लगाया है. इनमें से सेंट्रल बोर्ड ऑफ इनडायरेक्ट टैक्सेज एंड कस्टम्स यानी CBIC ने 903 मामलों में ₹268.36 करोड़ की ऑडिट टिप्पणियों को स्वीकार कर लिया है. हालांकि, इन मामलों में अब तक सिर्फ ₹15.88 करोड़ की वसूली की जा सकी है.
मार्च 2024 को समाप्त अवधि के लिए तैयार CAG की राजस्व विभाग से जुड़ी रिपोर्ट बुधवार को संसद में पेश की गई. ऑडिट के दौरान 850 टैक्सपेयर्स और GST विभाग के 71 कार्यालयों के GST रिटर्न और अन्य रिकॉर्ड की जांच की गई. मुख्य रूप से 2020-21 और 2021-22 की अवधि की पड़ताल की गई, जबकि कुछ मामलों में यह जांच 2023-24 तक बढ़ाई गई, ताकि यह देखा जा सके कि पुरानी कमियां अब भी जारी हैं या नहीं.
गलत टैक्स छूट और ITC दावों में मिली गड़बड़ी
ऑडिट में सड़कों, पुलों, रेलवे और मिट्टी से जुड़े कॉन्ट्रैक्ट्स में रियायती GST दरों या छूट के गलत दावे सामने आए. सरकारी निकायों के लिए किए गए कार्यों पर टैक्स का कम भुगतान, बिल्डर्स और डेवलपर्स द्वारा रिवर्स चार्ज मैकेनिज्म के तहत कम टैक्स जमा करना, इनपुट टैक्स क्रेडिट यानी ITC के अनियमित दावे और टैक्स भुगतान व ITC दावों के बीच बेमेल जैसी कई गड़बड़ियां पाई गईं. CAG के मुताबिक, केवल 123 मामलों में इन अनियमितताओं का राजस्व पर ₹190.98 करोड़ का असर पड़ा. वहीं, 522 टैक्सपेयर्स से जुड़ी 1,057 अन्य कमियों में ₹188.98 करोड़ का राजस्व प्रभाव सामने आया.
392 टैक्सपेयर्स के रिकॉर्ड अधूरे मिले
ऑडिट के दौरान रिकॉर्ड हासिल करने में भी कई मुश्किलें सामने आईं. 392 टैक्सपेयर्स से जुड़े 431 मामलों में जरूरी दस्तावेज पूरी तरह उपलब्ध नहीं कराए गए. इन मामलों में टैक्स देनदारी, ITC और रियायती GST दरों से जुड़े करीब ₹2,732.56 करोड़ के बेमेल की पहचान हुई. इसके अलावा 22 मामलों में विभागीय सिस्टम से मूल रिटर्न और अन्य जरूरी विवरण ही उपलब्ध नहीं थे, जिससे ₹36.09 करोड़ के संभावित बेमेल का संकेत मिला.
71 में से 57 GST कार्यालयों में मिलीं कमियां
CAG की रिपोर्ट में GST विभाग के आंतरिक नियंत्रण और निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठाए गए हैं. जांच किए गए 71 कार्यालयों में से 57 में कमियां पाई गईं. कई जगह टैक्सपेयर्स की जांच समय पर नहीं हुई या प्रक्रिया में खामियां रहीं. ऑडिट और जोखिम प्रबंधन महानिदेशालय से जारी जोखिम अलर्ट पर भी कई मामलों में जरूरी कार्रवाई पूरी नहीं की गई. CAG ने इसे राजस्व की सुरक्षा के लिए चिंता का विषय बताया है.
GSTN की 56 पुरानी समस्याओं में से 38 का समाधान
रिपोर्ट में GST नेटवर्क यानी GSTN के IT सिस्टम के CAG ऑडिट के तीसरे चरण का भी जिक्र किया गया है. पिछले ऑडिट में बताई गई 56 लंबित समस्याओं में से GSTN ने 38 का समाधान कर दिया है. एक समस्या का आंशिक समाधान किया गया है और तीन पर काम जारी है, जबकि बाकी मुद्दे अभी भी पूरी तरह दूर नहीं हुए हैं.
रजिस्ट्रेशन मॉड्यूल में कमजोर वेरिफिकेशन, मंजूरी या रजिस्ट्रेशन कैंसिलेशन में देरी, रिटर्न मॉड्यूल में ITC पात्रता और ब्याज गणना से जुड़ी अधूरी जांच जैसी समस्याएं बनी हुई हैं. IGST सेटलमेंट और कंपोजीशन लेवी स्कीम के तहत टैक्सपेयर्स की निगरानी में भी कमियां सामने आई हैं.
CAG ने दी निगरानी और वेरिफिकेशन बढ़ाने की सलाह
CAG ने विभाग को सलाह दी है कि सड़क, पुल, रेलवे और मिट्टी से जुड़े कॉन्ट्रैक्ट्स में रियायत का दावा करने वाले सब-कॉन्ट्रैक्टर्स की जांच और आंतरिक ऑडिट को मजबूत किया जाए. ऐसे दावों की जांच के लिए सिस्टम में बेहतर वेरिफिकेशन कंट्रोल लगाए जाएं.
रिपोर्ट में रिवर्स चार्ज मैकेनिज्म वाले मामलों पर विशेष ध्यान देने और आयकर विभाग के साथ बेहतर समन्वय की भी सिफारिश की गई है, ताकि CBDT द्वारा पकड़ी गई बेहिसाब आय के मामलों में संभावित GST देनदारी की भी जांच की जा सके.
रिपोर्ट से साफ है कि GST कलेक्शन में बढ़ोतरी के बावजूद कंस्ट्रक्शन और वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट सेक्टर में टैक्स अनुपालन से जुड़ी खामियां अब भी राजस्व के लिए जोखिम बनी हुई हैं. विभाग ने कई मामलों में CAG की टिप्पणियां स्वीकार भी कर ली हैं और वसूली की प्रक्रिया शुरू की है, लेकिन बड़ी राशि से जुड़े मामलों में वसूली की रफ्तार अभी भी काफी धीमी दिखाई देती है.
कंपनी का शुद्ध मुनाफा सालाना आधार पर करीब 270% बढ़कर ₹222 करोड़ पहुंच गया, जबकि रेवेन्यू 43.3% बढ़कर ₹2,714 करोड़ से ज्यादा रहा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
चश्मा बनाने और बेचने वाली प्रमुख कंपनी लेंसकार्ट (Lenskart) ने वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में मजबूत वित्तीय नतीजे पेश किए हैं. अप्रैल-जून तिमाही में कंपनी का शुद्ध मुनाफा सालाना आधार पर करीब 270% बढ़कर ₹222 करोड़ पहुंच गया. एक साल पहले की समान तिमाही में कंपनी का मुनाफा करीब ₹60 करोड़ था.
इस दौरान कंपनी का कुल रेवेन्यू भी 43.3% की बढ़ोतरी के साथ ₹2,714.2 करोड़ हो गया. प्रीमियम प्रोडक्ट्स की बढ़ती बिक्री, खुद के उत्पादों की मैन्युफैक्चरिंग और बेहतर ऑपरेटिंग मार्जिन ने कंपनी के प्रदर्शन को मजबूती दी.
EBITDA में 75% की बढ़ोतरी, मार्जिन भी सुधरा
कंपनी का EBITDA सालाना आधार पर 75.1% बढ़कर ₹588.5 करोड़ रहा. EBITDA मार्जिन भी एक साल पहले के 17.7% से बढ़कर 21.7% हो गया. कंपनी का कंसोलिडेटेड प्रोडक्ट मार्जिन पहली बार 70% के स्तर को पार कर गया. कंपनी की रणनीति अपने उत्पादों की मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाने और प्रीमियम सेगमेंट पर फोकस करने की रही है. इसका फायदा कंपनी को बेहतर मार्जिन के रूप में मिला है.
छोटे शहरों में तेजी से बढ़ा नेटवर्क
लेंसकार्ट अब सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं है और टियर-2 व छोटे शहरों में तेजी से अपना नेटवर्क बढ़ा रही है. अप्रैल-जून तिमाही के दौरान कंपनी ने कुल 132 नए स्टोर खोले, जिनमें से 116 भारत में हैं. कंपनी ने इस दौरान देश के 50 नए शहरों में भी एंट्री की. भारत में खुले नए स्टोर्स में से 83 टियर-2 और उससे छोटे शहरों में हैं. इसके साथ ही कंपनी के कुल एक्टिव स्टोर्स की संख्या बढ़कर 3,459 हो गई. भारत में प्रति स्टोर बिक्री में 24.3% की बढ़ोतरी दर्ज की गई.
लेंसकार्ट गोल्ड के सदस्य 93 लाख के पार
कंपनी के लॉयल्टी प्रोग्राम लेंसकार्ट गोल्ड के सदस्यों की संख्या बढ़कर 93.5 लाख हो गई है. इस मेंबरशिप से होने वाली आय 57.4% बढ़कर ₹66 करोड़ रही. वहीं, इस तिमाही में कंपनी ने दुनियाभर में करीब 70 लाख आई टेस्ट किए, जो पिछले साल की तुलना में लगभग 40% अधिक है. भारत में करीब 60 लाख लोगों ने आंखों की जांच कराई. इनमें से लगभग आधे ऐसे ग्राहक थे, जिन्होंने पहली बार अपनी आंखों का टेस्ट कराया.
चश्मों की बिक्री बढ़ी, औसत कीमत भी ऊपर गई
कंपनी की कुल बिक्री की मात्रा 25.7% बढ़ी. भारत में चश्मों की औसत बिक्री कीमत 6.4% बढ़कर ₹1,856 हो गई. इससे यह संकेत मिलता है कि ग्राहकों का रुझान बेहतर और प्रीमियम प्रोडक्ट्स की ओर बढ़ रहा है.
विदेशों में भी मजबूत हुई पकड़
लेंसकार्ट का अंतरराष्ट्रीय कारोबार भी तेजी से बढ़ रहा है. जापान, मिडिल ईस्ट और दक्षिण-पूर्व एशिया के बाजारों से कंपनी का रेवेन्यू 38% बढ़कर ₹1,203 करोड़ पहुंच गया. सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए कंपनी चीन की अपनी जॉइंट वेंचर फ्रेमकार्ट में हिस्सेदारी 51% से बढ़ाकर 70% करने की तैयारी में है. इसके लिए करीब ₹10.6 करोड़ का निवेश किया जाएगा. फ्रेमकार्ट कंपनी की 30% से अधिक जरूरतों को पूरा करती है. इसके अलावा, लेंसकार्ट दक्षिण कोरिया में ओनडेज़ कोरिया के जरिए भी अपने कारोबार का विस्तार कर रही है.
शेयर का प्रदर्शन
मजबूत तिमाही नतीजों के बावजूद 12 अगस्त को लेंसकार्ट का शेयर 0.71% की मामूली गिरावट के साथ ₹585 पर बंद हुआ. हालांकि, पिछले छह महीनों में शेयर 14.04% चढ़ा है, जबकि एक साल में इसमें 45.13% की तेजी दर्ज की गई है. कंपनी का मार्केट कैप करीब ₹1.02 लाख करोड़ है.