अच्छी खबरः ऐसा हुआ तो ही मिलेगी महंगाई से राहत, इकोनॉमी को लग जाएंगे पंख

इस बार अगर पूरे देश में बारिश का स्तर सामान्य रहा तो भी यह देश की इकोनॉमी को सुहाना करने वाला होगा। जहां एक तरफ जून में देश के तमाम हिस्सों में 50 फीसदी से अधिक सूखा रहा

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Sunday, 03 July, 2022
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नई दिल्लीः इस बार अगर पूरे देश में बारिश का स्तर सामान्य रहा तो भी यह देश की इकोनॉमी को सुहाना करने वाला होगा। जहां एक तरफ जून में देश के तमाम हिस्सों में 50 फीसदी से अधिक सूखा रहा, वहीं अगले तीन महीनों की बारिश महंगाई से लोगों को राहत दिला सकती है। एक्सपर्ट की मानें तो ग्रामीण क्षेत्रों में जो फिलहाल महंगाई की दर मई माह में सात फीसदी तक पहुंच गई थी, उसमें भी राहत मिलेगी।

खाद्यान, सब्जियां हो जाएंगी सस्ती

दलहन, तिलहन सहित इस वक्त फल-सब्जियों की कीमतें आसमान पर पहुंच गई हैं। मानसून फिलहाल देश के ज्यादातर हिस्सों में पहुंच तो गया है। फिलहाल पूर्वी, दक्षिण और पश्चिमी हिस्से में बारिश अच्छी हुई है, लेकिन मध्य और उत्तरी भारत में मानसून अभी पहुंचा ही है। हालत ये है कि जून माह में देश के आधे हिस्से में मानसून सक्रिय था वहीं आधे हिस्से में जून के आखिर और जुलाई के पहले हफ्ते में बारिश होना शुरू हुई है।

खाद्य वस्तुओं पर महंगाई की मार

केंद्र सरकार के द्वारा जारी डाटा के अनुसार मई में महंगाई दर 7.04 फीसदी थी जो कि अप्रैल के मुकाबले कम थी। अप्रैल में यह दर 7.79 फीसदी थी। यह दर खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ने और रूस-यूक्रेन का युद्ध शुरू होने के बाद से हुई थी।

इकोनॉमी को मानसून देगा बूस्टर डोज

 जैसे कोरोना काल में सरकार लोगों को चौथे चरण से बचाने के लिए बूस्टर डोज भी दे रही है, वैसे ही इकोनॉमी को ऐसा डोज मानसून से मिलने जा रहा है। एसएलसीएम ग्रुप के सीईओ संदीप सभरवाल के अनुसार, लगातार चौथे साल मानसून के सामान्य रहने की उम्मीद है जो इकोनॉमी पर एक पॉजिटिव इम्पैक्ट देगा।

इनकी कीमतों में भी आएगी कमी

कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटी के सीनियर इकोनॉमिस्ट सुवोदीप रक्शित ने कहा कि फल-सब्जी के अलावा फर्टिलाइजर्स, खाद्य तेल और मेटल्स की कीमतों में भी कमी आने की संभावना है। मानसून के अच्छा रहने से भारत में इन ग्लोबल आइटम्स की कीमतों में भी कमी आने की संभावना है।

खेती पर 14 फीसदी निर्भरता  

खेती पर भारत की जीडीपी की 14 फीसदी निर्भरता है और यह 42 फीसदी लोगों को रोजगार मुहैया कराता है। ग्राम उन्नति के फाउंडर अनीश जैन ने कहा कि जहां देश की 55 फीसदी भूमि पर खेती होती है, तो इसका अच्छे मानसून से असर पड़ना स्वाभाविक है, क्योंकि इससे जुड़ी इंडस्ट्री भी सीधे तौर पर लाभान्वित होती है।

गेहूं, दाल और चावल जो भारत के खाने में अपना एक अभिन्न स्थान रखते हैं उनको भारी बारिश चाहिए होती है उगने के लिए। बारिश अच्छी होने पर खेती अच्छी होती है वर्ना सूखे की मार पड़ती है। ग्रामीण भारत के लिए खरीफ की फसल अच्छी होना जरूरी है, क्योंकि यह वहां की महंगाई पर असर डालता है। अगर फसल अच्छी होगी तो ग्रामीण इलाकों में महंगाई कम होगी, जो इकोनॉमी के लिए अच्छी बात है।
 


2030 तक भारत की रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता 530 GW पहुंचने का अनुमान, सौर ऊर्जा की होगी 80% से ज्यादा हिस्सेदारी: IEA

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के मुताबिक, भारत की रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता 2030 तक बढ़कर करीब 530 गीगावॉट हो सकती है. इस विस्तार में सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी 80 फीसदी से अधिक रहने का अनुमान है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 07 November, 2026
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Saturday, 07 November, 2026
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भारत में नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) के क्षेत्र में तेजी से विस्तार होने की उम्मीद है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) की रिपोर्ट के अनुसार, देश की रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता 2030 तक करीब 530 गीगावॉट (GW) तक पहुंच सकती है. इस बढ़ोतरी में सौर ऊर्जा सबसे बड़ी भूमिका निभाएगी. इसके साथ ही भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रिन्यूएबल एनर्जी ग्रोथ मार्केट बन सकता है.

IEA की 'इंडिया रिन्यूएबल एनर्जी मार्केट रिपोर्ट 2026' के मुताबिक, 2026 की चौथी तिमाही में भारत की रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता 300 GW के पार पहुंच गई. पिछले एक दशक में इसमें करीब चार गुना बढ़ोतरी हुई है. यह देश की कुल बिजली उत्पादन क्षमता में नवीकरणीय ऊर्जा के बढ़ते योगदान को दर्शाता है.

रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक भारत की सोलर फोटोवोल्टिक (PV) क्षमता 350 GW से अधिक हो सकती है, जबकि पवन ऊर्जा की क्षमता करीब 90 GW तक पहुंचने का अनुमान है. वहीं, बड़े हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स के शुरू होने और पंप्ड स्टोरेज में निवेश बढ़ने से जलविद्युत क्षमता 75 GW तक पहुंच सकती है.

इस विस्तार के साथ भारत 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता हासिल करने के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ेगा. देश ने 2025 में ही अपनी स्थापित बिजली क्षमता का 50 फीसदी गैर-जीवाश्म स्रोतों से हासिल करने का लक्ष्य पूरा कर लिया था. यह तय समयसीमा से पांच साल पहले की उपलब्धि थी.

IEA का अनुमान है कि 2030 तक हर साल 50 GW से अधिक नई रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता जोड़ी जाएगी. 2025 में यह बढ़ोतरी 49 GW रही थी. वहीं, तेजी से विकास वाले परिदृश्य में दशक के अंत तक सालाना नई क्षमता बढ़कर 70 GW तक पहुंच सकती है.

बिजली उत्पादन में रिन्यूएबल एनर्जी की हिस्सेदारी बढ़ेगी

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में रिन्यूएबल एनर्जी से बिजली उत्पादन 2025 के करीब 500 टेरावॉट-घंटे (TWh) से बढ़कर 2030 तक लगभग 950 TWh हो सकता है. इसके परिणामस्वरूप देश के कुल बिजली उत्पादन में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी 2025 के करीब 25 फीसदी से बढ़कर 2030 तक 35 फीसदी पहुंचने का अनुमान है.

इसमें सौर ऊर्जा सबसे बड़ा योगदान देगी. दशक के अंत तक रिन्यूएबल एनर्जी से होने वाले कुल बिजली उत्पादन में सोलर PV की हिस्सेदारी आधे से अधिक हो सकती है. 2025 से 2030 के बीच सौर ऊर्जा से बिजली उत्पादन तीन गुना होने का अनुमान है. वहीं, पवन ऊर्जा से बिजली उत्पादन में करीब 50 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है.

IEA ने इस वृद्धि के पीछे प्रतिस्पर्धी नीलामी प्रक्रिया, अनुकूल नीतिगत ढांचे और तकनीकी लागत में कमी को प्रमुख कारण बताया है. इसके अलावा, वाणिज्यिक और औद्योगिक उपभोक्ताओं की ओर से नवीकरणीय बिजली की बढ़ती मांग भी इस क्षेत्र में नई क्षमता जोड़ने में मदद करेगी.

इंफ्रास्ट्रक्चर और परियोजनाओं में देरी बनी चुनौती

रिन्यूएबल एनर्जी क्षेत्र की संभावनाओं के बावजूद IEA ने बुनियादी ढांचे और परियोजनाओं के क्रियान्वयन से जुड़ी कई चुनौतियों की ओर ध्यान दिलाया है. एजेंसी के मुताबिक, बढ़ती नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को संभालने के लिए ट्रांसमिशन नेटवर्क का तेजी से विस्तार, एनर्जी स्टोरेज की क्षमता बढ़ाना और बिजली व्यवस्था में लचीलापन लाना जरूरी होगा.

इसके अलावा, जमीन अधिग्रहण से जुड़ी समस्याएं, परियोजनाओं को पूरा करने में देरी और बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) की कमजोर वित्तीय स्थिति भी इस क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है कि इन बाधाओं को दूर करने से 2026 से 2030 के दौरान रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता स्थापित करने की रफ्तार 20 फीसदी से अधिक बढ़ सकती है. इससे भारत के स्वच्छ ऊर्जा विस्तार को और मजबूती मिलेगी.


NSE-Augmont के EGR सेगमेंट में पहले दिन ₹33.11 करोड़ का कारोबार, 2.27 लाख कॉन्ट्रैक्ट्स की ट्रेडिंग

NSE और Augmont की साझेदारी में इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट (EGR) सेगमेंट में 6 नवंबर को लाइव ट्रेडिंग की शुरुआत हुई. पहले ही दिन इसमें 33.11 करोड़ रुपये का कारोबार दर्ज किया गया.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 07 November, 2026
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Saturday, 07 November, 2026
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नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) और इंटीग्रेटेड गोल्ड प्लेटफॉर्म ऑगमोंट (Augmont) की साझेदारी में शुरू हुए इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट (EGR) सेगमेंट ने पहले ही दिन अच्छा प्रदर्शन किया है. शुक्रवार, 6 नवंबर को इस सेगमेंट में लाइव ट्रेडिंग के पहले दिन कुल 33.11 करोड़ रुपये का कारोबार हुआ. NSE के रात 10 बजे तक के आंकड़ों के मुताबिक, एक्सचेंज पर कुल 2,27,444 EGR कॉन्ट्रैक्ट्स का कारोबार हुआ.

यह भारत के इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड मार्केट के विकास की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है. गौरतलब है कि NSE ने इसी साल 18 मई को EGR में लाइव ट्रेडिंग शुरू की थी.

NSE और Augmont के संयुक्त बयान के अनुसार, पहले दिन बाजार में कीमतों का निर्धारण व्यवस्थित तरीके से हुआ. कारोबार के दौरान EGR की कीमतें 1,450.50 रुपये से 1,465 रुपये के सीमित दायरे में रहीं.

NSE-Augmont की साझेदारी से मजबूत होगा गोल्ड ट्रेडिंग इकोसिस्टम

देश में इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट (EGR) इकोसिस्टम को मजबूत करने और एक्सचेंज के जरिए नियंत्रित स्पॉट गोल्ड मार्केट विकसित करने के लिए NSE ने Augmont Enterprises के साथ साझेदारी की है.

इस सहयोग के तहत NSE अपने एक्सचेंज इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध कराएगा, जबकि Augmont इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट बनाने, उन्हें भुनाने, लिक्विडिटी उपलब्ध कराने, डिलीवरी और कीमतों के निर्धारण से जुड़ी सेवाओं में सहयोग करेगा.

इस व्यवस्था के तहत Augmont EGR के निर्माण, वॉल्ट में सोना रखने, रिडेम्पशन और लिक्विडिटी से जुड़े इकोसिस्टम को संभालेगा. वहीं, NSE ट्रेडिंग के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध कराएगा. इस पहल का उद्देश्य सोने के कारोबार में पारदर्शिता बढ़ाना और निवेशकों को संगठित एक्सचेंज आधारित बाजार में भागीदारी का अवसर देना है.

EGR के जरिए फिजिकल गोल्ड का इलेक्ट्रॉनिक स्वामित्व

इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट (EGR) के तहत प्रत्येक रिसीट 100 मिलीग्राम फिजिकल गोल्ड का प्रतिनिधित्व करती है. इसके बदले का वास्तविक सोना भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) से नियंत्रित वॉल्ट में सुरक्षित रखा जाता है.

निवेशक अपने डीमैट अकाउंट के जरिए EGR की खरीद-बिक्री कर सकते हैं. इसका तरीका शेयरों में ट्रेडिंग करने जैसा है. इसके अलावा, लागू नियमों और प्रक्रियाओं के तहत निवेशक अपने इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड को फिजिकल सोने में भी बदल सकते हैं.

इस सेगमेंट में T+1 सेटलमेंट व्यवस्था लागू है. यानी जिस दिन कारोबार किया जाता है, उसके अगले कारोबारी दिन लेनदेन का निपटान एक्सचेंज की निर्धारित क्लियरिंग और सेटलमेंट व्यवस्था के जरिए होता है.

इस प्लेटफॉर्म पर 995 और 999 शुद्धता सहित अलग-अलग शुद्धता मानकों में गोल्ड रिसीट उपलब्ध हैं. छोटी मात्रा में गोल्ड रिसीट की उपलब्धता से उन निवेशकों को भी इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड में निवेश का अवसर मिलने की उम्मीद है, जो कम मात्रा में सोना खरीदना चाहते हैं.

बाजार में EGR की स्वीकार्यता बढ़ाने पर Augmont का जोर

बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, किसी नए बाजार सेगमेंट के लिए शुरुआती कारोबार की मात्रा, लगातार खरीद और बिक्री के भाव उपलब्ध होना और कीमतों का व्यवस्थित तरीके से तय होना महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं.

उनका मानना है कि यह पहल फिजिकल गोल्ड को अधिक सुलभ और पारदर्शी बनाने के साथ ही भारत के औपचारिक वित्तीय इकोसिस्टम से जोड़ने में अहम भूमिका निभा सकती है. Augmont कीमती धातुओं के कारोबार की पूरी वैल्यू चेन में काम करती है. कंपनी का कारोबार गोल्ड रिफाइनिंग, होलसेल ट्रेडिंग, डिजिटल गोल्ड, ज्वेलरी, गोल्ड के बदले कर्ज और रिटेल सेवाओं तक फैला हुआ है.

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सरकार ने चावल बिक्री का लक्ष्य दोगुना किया, OMSS के तहत अब 50 लाख टन बेचेगी

सरकार 31 अक्टूबर तक ई-नीलामी के जरिए 25 लाख टन चावल बेच चुकी है. इसके साथ ही चावल और धान के स्टॉक की साप्ताहिक जानकारी देना भी अनिवार्य कर दिया गया है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 07 November, 2026
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Saturday, 07 November, 2026
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केंद्र सरकार ने घरेलू बाजार में चावल की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने और कीमतों में स्थिरता बनाए रखने के लिए बड़ा कदम उठाया है. सरकार ने ओपन मार्केट सेल स्कीम (डोमेस्टिक) यानी OMSS (D) के तहत वित्त वर्ष 2026-27 के लिए चावल बिक्री का लक्ष्य दोगुना कर दिया है. अब इस योजना के तहत 25 लाख मीट्रिक टन (LMT) के बजाय 50 लाख मीट्रिक टन चावल बेचा जाएगा.

उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के मुताबिक, सरकार 31 अक्टूबर 2026 तक निजी कारोबारियों को ई-नीलामी के माध्यम से 25 लाख मीट्रिक टन चावल बेच चुकी है. पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह बिक्री 11 लाख मीट्रिक टन रही थी.

सरकार का कहना है कि खाद्यान्न, विशेष रूप से चावल की कीमतों पर लगातार नजर रखी जा रही है. जमाखोरी रोकने, बाजार में आपूर्ति बढ़ाने और उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए कई नीतिगत कदम उठाए जा रहे हैं.

चावल और धान के स्टॉक की जानकारी देना अनिवार्य

सरकार ने देशभर में चावल और धान का भंडारण करने वाली सभी संबंधित इकाइयों के लिए स्टॉक की जानकारी देना अनिवार्य कर दिया है. 6 नवंबर 2026 को जारी आदेश के तहत व्यापारियों, थोक विक्रेताओं, खुदरा कारोबारियों, बड़ी रिटेल चेन और प्रोसेसर या मिलर्स को अपने स्टॉक का ब्योरा देना होगा.

इसके तहत छह श्रेणियों में स्टॉक की जानकारी देनी होगी. इनमें बासमती चावल, नॉन-बासमती प्रीमियम चावल, नॉन-बासमती चावल, उसना चावल, टूटे चावल और धान शामिल हैं. सभी संबंधित कारोबारियों और संस्थाओं को सरकार के फूड स्टॉक पोर्टल पर पंजीकरण कराना होगा. इसके अलावा प्रत्येक शुक्रवार को अपने स्टॉक की जानकारी अपडेट करनी होगी.

सरकार ने चेतावनी दी है कि पोर्टल पर पंजीकरण नहीं कराने या निर्धारित स्टॉक सीमा का उल्लंघन करने वाली इकाइयों के खिलाफ आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 6 और 7 के तहत कार्रवाई की जा सकती है.

पांच दक्षिणी राज्यों को स्टॉक लिमिट लगाने की मंजूरी

केंद्र सरकार ने पांच दक्षिणी राज्यों को चावल और धान पर स्टॉक लिमिट लगाने की सहमति भी दे दी है. इनमें आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना शामिल हैं. इन राज्यों को जरूरत के अनुसार उचित नियंत्रण आदेश जारी करके स्टॉक की सीमा तय करने की अनुमति दी गई है. ये प्रतिबंध 31 जनवरी 2027 तक लागू रहेंगे. इस कदम का उद्देश्य खासतौर पर दक्षिण भारत में उपभोक्ताओं को उचित कीमतों पर पर्याप्त मात्रा में चावल उपलब्ध कराना है. केंद्र और संबंधित राज्य सरकारें मिलकर इन प्रतिबंधों के क्रियान्वयन की निगरानी करेंगी, ताकि जमाखोरी और कालाबाजारी पर रोक लगाई जा सके.

भारत राइस की अतिरिक्त खेप भी बाजार में उतरेगी

बाजार में चावल की उपलब्धता बढ़ाने के लिए सरकार भारत राइस (Bharat Rice) का अतिरिक्त आवंटन भी कर रही है. इसके लिए तीन एजेंसियों को जिम्मेदारी दी गई है. इनमें नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (NAFED), नेशनल कोऑपरेटिव कंज्यूमर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (NCCF) और केंद्रीय भंडार शामिल हैं.

इन एजेंसियों को भारत राइस के वितरण के लिए अतिरिक्त माध्यम तलाशने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि खासतौर पर दक्षिणी राज्यों में इसकी पहुंच बढ़ाई जा सके.

सरकार को उम्मीद है कि अतिरिक्त आवंटन से बाजार में चावल की आपूर्ति बढ़ेगी, उपभोक्ताओं को सस्ती दरों पर चावल उपलब्ध होगा और खुदरा कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिलेगी.

चावल की कीमतों पर नियंत्रण के लिए सरकार की पहल

सरकार के ये कदम घरेलू बाजार में चावल की उपलब्धता बढ़ाने और कीमतों को स्थिर रखने की व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं. इसके तहत खुले बाजार में बिक्री बढ़ाने, स्टॉक की निगरानी सख्त करने और रियायती दरों पर मिलने वाले भारत राइस का वितरण बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है.

सरकार का मानना है कि OMSS (D) के तहत बिक्री का लक्ष्य दोगुना करने और स्टॉक की साप्ताहिक जानकारी अनिवार्य करने से चावल की आपूर्ति व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ेगी. साथ ही, घरेलू बाजार में पर्याप्त स्टॉक बनाए रखने और उपभोक्ताओं को उचित कीमतों पर चावल उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी.

 


भारतीय इक्विटी फंड्स का उभरते बाजारों से बेहतर प्रदर्शन, 17 साल में सबसे बड़ी बढ़त

अमेरिकी इक्विटी फंड्स में भी 32 अरब डॉलर का निवेश आया. वहीं, ग्लोबल इमर्जिंग मार्केट (GEM) फंड्स में 3.6 अरब डॉलर का निवेश दर्ज किया गया, जो तीन महीने का उच्चतम स्तर है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 07 November, 2026
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Saturday, 07 November, 2026
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वैश्विक निवेशकों के बीच भारतीय शेयर बाजार की सापेक्ष स्थिति में सुधार के संकेत मिल रहे हैं. एलारा सिक्योरिटीज की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत पर केंद्रित इक्विटी फंड्स ने चार सप्ताह की अवधि में उभरते बाजारों (Emerging Markets) के फंड्स को मई 2009 के बाद सबसे बड़े अंतर से पीछे छोड़ दिया है. वहीं, विदेशी निवेशकों की निकासी की रफ्तार भी धीमी हुई है और पिछले सप्ताह यह चार महीने के निचले स्तर पर रही.

भारतीय शेयर बाजार के लिए वैश्विक निवेशकों के रुख में सुधार के संकेत मिले हैं. एलारा सिक्योरिटीज (Elara Securities) की 6 नवंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत पर केंद्रित इक्विटी फंड्स ने चार सप्ताह की अवधि में उभरते बाजारों के फंड्स के मुकाबले सबसे बेहतर प्रदर्शन किया है. यह मई 2009 के बाद दोनों के प्रदर्शन के बीच सबसे बड़ा अंतर है.

रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक शेयर बाजारों में निवेश प्रवाह में उतार-चढ़ाव के बीच भारत केंद्रित फंड्स से विदेशी निवेशकों की निकासी भी धीमी हुई है. बीते सप्ताह इन फंड्स से 90 मिलियन डॉलर की निकासी हुई, जो पिछले चार महीनों में सबसे कम है.

हालांकि, लॉन्ग-ओनली फंड्स (Long-only Funds) से निवेशकों ने 161 मिलियन डॉलर निकाले. इसकी आंशिक भरपाई एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ETFs) में आए 71 मिलियन डॉलर के निवेश से हुई. एलारा सिक्योरिटीज का मानना है कि भारतीय बाजार के सापेक्ष प्रदर्शन में सुधार और निकासी की रफ्तार धीमी होने से विदेशी निवेशकों के लिए भारत से पैसा निकालकर दूसरे बाजारों में लगाने का आकर्षण कम हो सकता है. इससे भविष्य में वैश्विक निवेशकों का भारतीय बाजार में आवंटन बढ़ने की संभावना बन सकती है.

वैश्विक इक्विटी फंड्स में 89 अरब डॉलर का निवेश

रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक इक्विटी फंड्स में लगातार दूसरे सप्ताह मजबूत निवेश देखने को मिला. 4 नवंबर को समाप्त सप्ताह में इन फंड्स में 89 अरब डॉलर का निवेश आया, जो जून 2026 के बाद किसी एक सप्ताह का सबसे ऊंचा स्तर है.

इस दौरान चीन वैश्विक निवेशकों के लिए सबसे पसंदीदा बाजार बना रहा. पिछले चार सप्ताह में चीन के इक्विटी फंड्स में 86 अरब डॉलर का निवेश आया, जो इस अवधि के कुल वैश्विक इक्विटी निवेश का 32 फीसदी है. चीनी शेयरों में विदेशी निवेशकों की भागीदारी भी बढ़ती दिखी. बीते सप्ताह वहां 2.3 अरब डॉलर का निवेश आया, जो छह महीने का उच्चतम स्तर है.

अमेरिकी इक्विटी फंड्स में भी 32 अरब डॉलर का निवेश आया. वहीं, ग्लोबल इमर्जिंग मार्केट (GEM) फंड्स में 3.6 अरब डॉलर का निवेश दर्ज किया गया, जो तीन महीने का उच्चतम स्तर है.

ताइवान में घरेलू निवेशकों की भागीदारी मजबूत रही. वहां इक्विटी फंड्स में एक सप्ताह के दौरान रिकॉर्ड 8.9 अरब डॉलर और पिछले चार सप्ताह में कुल 23 अरब डॉलर का निवेश आया. घरेलू निवेशकों ने बाजार में गिरावट के दौरान भी खरीदारी जारी रखी. ऐसा ही रुझान जून-जुलाई 2026 के बाजार करेक्शन के दौरान भी देखने को मिला था, जब ताइवान के इक्विटी फंड्स में 28 अरब डॉलर का निवेश आया था.

इसके उलट, दक्षिण कोरिया के इक्विटी फंड्स से बीते सप्ताह 282 मिलियन डॉलर की निकासी हुई. मौजूदा बाजार करेक्शन के दौरान अब तक वहां कुल 6 अरब डॉलर का निवेश आया है, जो जून-जुलाई 2026 के करेक्शन के दौरान आए 14 अरब डॉलर से 55 फीसदी कम है.

ETF में बढ़ा निवेश, लॉन्ग-ओनली फंड्स से निकासी जारी

रिपोर्ट में भारत के ETF और लॉन्ग-ओनली फंड्स के निवेश प्रवाह में बड़ा अंतर सामने आया है. पारंपरिक लॉन्ग-ओनली फंड्स से जहां लगातार बड़ी निकासी हो रही है, वहीं ETF में नया निवेश आ रहा है. इससे भारतीय इक्विटी फंड्स से कुल निकासी का दबाव कम करने में मदद मिली है.

एलारा सिक्योरिटीज के मुताबिक, उभरते बाजारों की तुलना में भारत का सापेक्ष प्रदर्शन इससे पहले सितंबर 2014 और अप्रैल 2021 में देखे गए स्तरों तक पहुंचा था. हालांकि, उन दोनों मौकों के बाद इसमें तेज उलटफेर देखने को मिला था.

वहीं, लॉन्ग-ओनली फंड्स की तुलना में भारत केंद्रित ETF का बेहतर प्रदर्शन जनवरी 2025 के बाद सबसे मजबूत स्तर पर पहुंच गया है.

इंडस्ट्रियल और टेलीकॉम फंड्स से निकासी

वैश्विक स्तर पर सेक्टर आधारित फंड्स की बात करें तो इंडस्ट्रियल फंड्स से लगातार तीसरे महीने निकासी जारी रही. बीते सप्ताह भी इनसे 1 अरब डॉलर निकाले गए. हालांकि, जनवरी 2025 से अगस्त 2026 के बीच इन फंड्स में रिकॉर्ड 71 अरब डॉलर का निवेश आया था. इसके मुकाबले पिछले 12 सप्ताह में केवल 4.9 अरब डॉलर की निकासी हुई है.

वैश्विक टेलीकॉम फंड्स से भी इस साल अब तक की सबसे बड़ी 1.1 अरब डॉलर की निकासी दर्ज की गई. पिछले चार सप्ताह के दौरान इन फंड्स में निवेश का प्रवाह नकारात्मक रहा.

इस अवधि में फाइनेंशियल, हेल्थकेयर और टेक्नोलॉजी सेक्टर ही ऐसे क्षेत्र रहे, जिनके वैश्विक फंड्स में निवेश आया. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सप्ताह के निवेश आंकड़ों में वैश्विक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) निवेश थीम में आखिरी दो कारोबारी सत्रों के दौरान हुई घबराहट में बिकवाली शामिल नहीं है. ऐसे में ये आंकड़े वैश्विक निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता में आए ताजा बदलाव को पूरी तरह नहीं दर्शाते हैं.

 


दो सप्ताह में करीब 3.9 अरब डॉलर घटा भारत का विदेशी मुद्रा भंडार, 717 अरब डॉलर पर आया

RBI के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 30 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में देश का फॉरेक्स रिजर्व 2.6 अरब डॉलर घटकर 717 अरब डॉलर रह गया. इससे पिछले सप्ताह भी इसमें करीब 1.27 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई थी.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 07 November, 2026
Last Modified:
Saturday, 07 November, 2026
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भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) में गिरावट का सिलसिला जारी है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से शुक्रवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, 30 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 2.6 अरब डॉलर घटकर 717 अरब डॉलर पर आ गया. इससे पहले 24 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में भी इसमें 1.269 अरब डॉलर की कमी आई थी और यह घटकर 719.7 अरब डॉलर रह गया था.

गौरतलब है कि 4 सितंबर को समाप्त सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 785.7 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था. उस समय विदेशों में रहने वाले भारतीयों की जमा राशि से जुड़ी एक विशेष स्वैप योजना के तहत बैंकों ने करीब 133 अरब डॉलर जुटाए थे, जिससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई थी. हालांकि, रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के बाद से इसमें लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है.

विदेशी मुद्रा संपत्तियों में 2.08 अरब डॉलर की कमी

आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा फॉरेन करेंसी असेट्स (FCA) होता है. 30 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में इसमें 2.08 अरब डॉलर की गिरावट आई और यह घटकर 591.11 अरब डॉलर रह गया.

फॉरेन करेंसी असेट्स में अमेरिकी डॉलर के अलावा यूरो, पाउंड और जापानी येन जैसी अन्य प्रमुख विदेशी मुद्राएं भी शामिल होती हैं. इन मुद्राओं के मूल्य में होने वाले उतार-चढ़ाव का असर भी भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है.

सोने के भंडार का मूल्य भी घटा

विदेशी मुद्रा संपत्तियों के साथ देश के सोने के भंडार के मूल्य में भी गिरावट आई है. समीक्षाधीन सप्ताह में गोल्ड रिजर्व का मूल्य 559 मिलियन डॉलर घटकर 102.5 अरब डॉलर रह गया.

वहीं, स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (SDR) में 47 मिलियन डॉलर की कमी दर्ज की गई और यह घटकर 18.5 अरब डॉलर पर आ गया. हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) में भारत की रिजर्व पोजिशन में 3 मिलियन डॉलर की बढ़ोतरी हुई. यह बढ़कर 4.79 अरब डॉलर हो गई.

 


दूसरी तिमाही में मुनाफे में आई शिपरॉकेट, ₹0.6 करोड़ का शुद्ध लाभ दर्ज; रेवेन्यू 34.7% बढ़ा

शिपरॉकेट का ऑपरेटिंग रेवेन्यू सालाना आधार पर 34.7 फीसदी बढ़कर 673.6 करोड़ रुपये हो गया, जो पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में 500.2 करोड़ रुपये था.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Friday, 06 November, 2026
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Friday, 06 November, 2026
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ई-कॉमर्स को लॉजिस्टिक्स और अन्य सेवाएं उपलब्ध कराने वाली कंपनी शिपरॉकेट (Shiprocket) ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में मुनाफा दर्ज किया है. सितंबर तिमाही में कंपनी का कंसोलिडेटेड शुद्ध लाभ 0.6 करोड़ रुपये रहा, जबकि पिछले साल की समान तिमाही में उसे 20.3 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा हुआ था. कंपनी को चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (Q1 FY27) में भी 13.7 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा हुआ था.

रेवेन्यू में 34.7% की बढ़ोतरी

शिपरॉकेट का ऑपरेटिंग रेवेन्यू सालाना आधार पर 34.7 फीसदी बढ़कर 673.6 करोड़ रुपये हो गया, जो पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में 500.2 करोड़ रुपये था. तिमाही आधार पर भी कंपनी के रेवेन्यू में 13.8 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई. पहली तिमाही में यह 592.1 करोड़ रुपये रहा था.

खर्च में भी हुई बढ़ोतरी

सितंबर तिमाही में कंपनी का कुल खर्च सालाना आधार पर 29.6 फीसदी बढ़कर 692.9 करोड़ रुपये हो गया, जबकि पिछले वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में यह 534.8 करोड़ रुपये था. हालांकि, कंपनी के खर्च में बढ़ोतरी की रफ्तार ऑपरेटिंग रेवेन्यू की तुलना में कम रही.

इस दौरान कंपनी की अन्य आय बढ़कर 19.9 करोड़ रुपये हो गई, जो पिछले साल की समान तिमाही में 14.3 करोड़ रुपये थी. इससे कंपनी की कुल आय 693.5 करोड़ रुपये पर पहुंच गई. तिमाही के दौरान कंपनी की कुल आय उसके कुल खर्च से मामूली अधिक रही. सितंबर तिमाही में शिपरॉकेट ने किसी टैक्स खर्च की जानकारी नहीं दी.

बता दें, शिपरॉकेट के शेयर अगस्त 2026 में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) पर लिस्ट हुए थे.


CenturyPly का दूसरी तिमाही का राजस्व 28.5% बढ़कर 1,780 करोड़ रुपये पहुंचा

कंपनी ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में अब तक का सबसे अधिक तिमाही राजस्व दर्ज किया. प्लाईवुड, एमडीएफ, लैमिनेट्स और लॉजिस्टिक्स कारोबार में मजबूत वृद्धि से कंपनी के प्रदर्शन को सहारा मिला.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Friday, 06 November, 2026
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Friday, 06 November, 2026
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सेंचुरी प्लाईबोर्ड्स (इंडिया) लिमिटेड (CenturyPly) ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में 1,780 करोड़ रुपये का अब तक का सबसे अधिक तिमाही राजस्व दर्ज किया है. यह पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 28.5 प्रतिशत अधिक है. कंपनी के प्रमुख कारोबारों में वृद्धि के साथ पूंजी पर रिटर्न (ROCE) भी सुधरकर 16.67 प्रतिशत पर पहुंच गया.

प्लाईवुड कारोबार का राजस्व 28.6% बढ़ा

कंपनी के प्लाईवुड कारोबार का राजस्व 28.6 प्रतिशत बढ़कर 982 करोड़ रुपये हो गया. वहीं, मीडियम डेंसिटी फाइबरबोर्ड (MDF) कारोबार ने 380 करोड़ रुपये का अब तक का सबसे अधिक तिमाही राजस्व दर्ज किया. लैमिनेट्स कारोबार के राजस्व में भी 20.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई.

पार्टिकल बोर्ड कारोबार में 211% की बढ़ोतरी

पार्टिकल बोर्ड कारोबार का राजस्व पहली बार तिमाही के दौरान 100 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया. इस खंड में 211 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. वहीं, कंपनी के लॉजिस्टिक्स कारोबार में 72.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई.

ROCE सुधरकर 16.67% पर पहुंचा

कंपनी के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर केशव भजांका ने कहा कि कारोबार के अलग-अलग क्षेत्रों को विकसित होते देखना उत्साहजनक है. नए ग्रोथ इंजन भी अब बड़े स्तर पर योगदान देने लगे हैं. उन्होंने कहा कि कंपनी का ROCE बढ़कर 16.67 प्रतिशत होना इस बात को दर्शाता है कि कारोबार के विस्तार के साथ परिचालन दक्षता और पूंजी के बेहतर इस्तेमाल पर भी ध्यान दिया जा रहा है.

भजांका के मुताबिक, कंपनी को अभी कई क्षेत्रों में काम करना है. नई उत्पादन क्षमताओं को बढ़ाने और फर्नीचर फिटिंग्स कारोबार में विस्तार के साथ आगे विकास की संभावनाएं हैं. उन्होंने कहा कि मौजूदा तिमाही के नतीजे कंपनी को आगे बढ़ने के लिए मजबूत आधार देते हैं.
 


“अगर बोर्ड बंटा हुआ है, तो सभी की ब्रांड वैल्यू घटती है”

रवि राजन एंड कंपनी के संस्थापक एवं मैनेजिंग पार्टनर और BSE के पूर्व चेयरमैन एस रवि ने BW Businessworld के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ अनुराग बत्रा के साथ इस बातचीत में उत्तराधिकारियों के मूल्यांकन, सार्वजनिक विवादों से कारोबार को बचाने और संपत्ति सृजन में कॉरपोरेट गवर्नेंस की अहमियत पर चर्चा की.

डॉ. अनुराग बत्रा by
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Friday, 06 November, 2026
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रवि राजन एंड कंपनी के संस्थापक एवं मैनेजिंग पार्टनर और BSE के पूर्व चेयरमैन एस रवि ने BW Businessworld के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ अनुराग बत्रा के साथ बातचीत में पारिवारिक कारोबार में उत्तराधिकार की योजना, अगली पीढ़ी के नेतृत्व का आकलन और सार्वजनिक विवादों से कंपनी की प्रतिष्ठा को बचाने जैसे अहम मुद्दों पर अपनी राय रखी. उन्होंने बताया कि कारोबार की दीर्घकालिक सफलता और संपत्ति सृजन के लिए मजबूत कॉरपोरेट गवर्नेंस, स्पष्ट उत्तराधिकार योजना और बोर्ड की एकजुटता कितनी जरूरी है. प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

अगली पीढ़ी को नेतृत्व सौंपने से पहले प्रमोटर को किन बातों का आकलन करना चाहिए?

सबसे पहले अगली पीढ़ी के गुणों और क्षमताओं का आकलन करना चाहिए. दूसरा, उनकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को समझना चाहिए. तीसरा, यह देखना चाहिए कि वे मौजूदा कारोबारी मॉडल में किस तरह खुद को शामिल करेंगे. कोई व्यक्ति कारोबार में रुचि रखने वाला और भविष्य को लेकर दूरदर्शी हो सकता है, जबकि किसी दूसरे व्यक्ति में कारोबारी समझ या इसमें रुचि ही न हो. हर व्यक्ति अलग होता है.

परिवारों का विस्तार हुआ है और अब उनके पास स्थिर कारोबार, संपत्ति और पूंजी है. अगली पीढ़ी के विचार और कारोबारी मॉडल अलग हैं, लेकिन उसे अपने पूर्वजों की विरासत भी आगे बढ़ानी है. मैं देख रहा हूं कि परिवार उत्तराधिकार की योजना के अनुरूप अपने कारोबारी मॉडल में बदलाव कर रहे हैं.

अगर अगली पीढ़ी कारोबार चलाने के बजाय फैमिली ऑफिस को प्राथमिकता दे तो क्या होगा?

कुछ युवाओं ने देखा है कि पिछली पीढ़ी ने लाइसेंस, सरकार और सही कारोबारी माहौल तैयार करने के लिए कितनी मेहनत की. उन्हें लग सकता है कि परिवार के पास पर्याप्त संपत्ति और डिविडेंड से होने वाली आय है. ऐसे में पेशेवर लोगों को कारोबार संभालने दिया जाए और वे अपना फैमिली ऑफिस बनाएं. इसमें बिल्कुल कुछ गलत नहीं है. यह व्यक्तिगत पसंद है और हमें इसे स्वीकार करना चाहिए.

लेकिन जब तक आप पूरे समय निवेश के काम में नहीं लगे हैं, तब तक फैमिली ऑफिस में आपका केवल 20 या 30 फीसदी समय ही लग सकता है. युवा पीढ़ी को भी व्यस्त रहना होगा और ऐसा काम तलाशना होगा, जिसे करने में उसकी रुचि हो.

क्या उत्तराधिकार की योजना पर प्रमोटर परिवार से आगे भी पर्याप्त ध्यान दिया जाता है?

अक्सर लोग सोचते हैं कि उत्तराधिकार केवल परिवार के भीतर होता है. लेकिन यह अगली पीढ़ी के अधिकारियों और बोर्ड के सदस्यों से भी जुड़ा है. बोर्ड में हर किसी का एक कार्यकाल होता है. ऐसे में अगली जिम्मेदारी किसे सौंपी जाएगी? कुछ कंपनियां अगले 10 या 15 वर्षों के लिए बोर्ड में पदों की योजना बना रही हैं.

जब कोई संस्थान बहुत अधिक एक व्यक्ति पर केंद्रित हो जाता है, तो शेयरधारकों और प्रबंधन के बीच अंतर करना चुनौती बन जाता है. अच्छे लोग रिटायर होते हैं, लेकिन क्या आपने अपने अगले जनरल मैनेजर, वाइस प्रेसिडेंट या प्रेसिडेंट की योजना बनाई है? उत्तराधिकार की योजना स्वामित्व, बोर्ड और प्रमुख प्रबंधकीय कार्मिकों (Key Managerial Personnel) के स्तर पर होनी चाहिए.

जब उत्तराधिकार को लेकर मतभेद सार्वजनिक हो जाते हैं, तो क्या होता है?

अगर बोर्ड बंटा हुआ है और यह बात सार्वजनिक हो जाती है, तो सभी की ब्रांड वैल्यू घटती है. इसमें कोई विजेता नहीं होता. यह व्यक्ति और कंपनी, दोनों के लिए नुकसान है. हम अगली पीढ़ी के सामने कैसी मिसाल पेश कर रहे हैं?

पेशेवर लोगों ने कारोबार की वृद्धि में बहुत बड़ा योगदान दिया है, लेकिन वे कंपनी के संरक्षक भी हैं. ब्रांड की रक्षा करना सभी पेशेवरों का सबसे महत्वपूर्ण दायित्व है. स्वतंत्र निदेशकों और ट्रस्टियों की भूमिका कॉरपोरेट गवर्नेंस, नीतियों और भविष्य को लेकर होती है, लेकिन उन्हें स्वामित्व के अधिकारों में हस्तक्षेप करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.

हर व्यक्ति हर बात पर सहमत नहीं हो सकता. महत्वपूर्ण सवाल यह है कि कारोबारों को सफलतापूर्वक अलग कैसे किया जा सकता है.

पारिवारिक कारोबार के बंटवारे में किस व्यावहारिक जटिलता पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है?

क्रॉस गारंटी एक बड़ी चुनौती है. मान लीजिए कोई समूह 30 या 40 वर्षों से अस्तित्व में है और उसकी कंपनियों ने एक-दूसरे के लिए गारंटी दी हुई है. जब कारोबार अलग होते हैं, तो इन गारंटी का समाधान कैसे किया जाएगा? इसके लिए आपको बैंकरों और नियामकों पर निर्भर रहना पड़ता है. बंटवारे के बाद भी मैं आपके कारोबार के लिए जिम्मेदार क्यों रहूं?

ऐसा मध्यम आकार के कारोबारों में भी होता है. वे बढ़ते हैं और अलग-अलग क्षेत्रों में प्रवेश करते हैं, लेकिन पहले दी गई गारंटी जारी रहती है, क्योंकि उस समय कर्ज लिया गया था. हमें ऐसे स्पष्ट नियामकीय प्रावधानों की जरूरत है, जिनसे कारोबारों का हस्तांतरण और बंटवारा आसान हो सके.

भारत के आशाजनक उद्यमशीलता माहौल की राह में क्या बाधा बन सकता है?

हमने अच्छा काम किया है और कई अच्छी कंपनियां सामने आ रही हैं. हमें सकारात्मक उदाहरण दिखाई देते हैं, लेकिन असफलताएं भी हैं. प्रमुख शेयरधारकों के बीच अक्सर अच्छे समझौते नहीं होते. शेयरधारकों के समझौते कमजोर होते हैं. प्रमोटर्स और हितधारकों को एक साथ रहना चाहिए.

नई पीढ़ी की कंपनियों के लिए काफी संभावनाएं हैं, लेकिन उन्हें अधिक स्पष्ट कॉरपोरेट गवर्नेंस की जरूरत है. जिन लोगों का गवर्नेंस अच्छा होगा, उन्हें निवेश आसानी से मिलेगा. निवेशक फंड के दुरुपयोग या हेराफेरी नहीं चाहते. जब IPO के बाद प्रमोटर्स की दिलचस्पी कारोबार के बजाय निजी संपत्ति, घर और फ्लैट बनाने में अधिक हो जाती है, तो इससे निवेश का माहौल बेहतर नहीं होता.

आप अपनी कंपनी में उत्तराधिकार की योजना किस तरह बना रहे हैं?

इस पर काम चल रहा है. मेरा बेटा यहां है और मैंने उसे अपनी जगह बनाने की आजादी दी है. अकाउंटिंग के दायरे में टैक्स, ऑडिट, पारिवारिक समझौते, ट्रस्ट, वसीयत और फॉरेंसिक कार्य शामिल हैं. हर कोई सब कुछ नहीं कर सकता. किसी एक क्षेत्र को चुनना, उसमें विशेषज्ञता हासिल करना और आगे बढ़ना जरूरी है.

ग्राहक हमारे काम का पैमाना हैं. सेवा क्षेत्र के कारोबार में सबसे महत्वपूर्ण पूंजी लोग होते हैं. इसमें आपका ज्ञान और उस दिन दी गई सलाह शामिल होती है. अगर सलाह गलत हो, तो इसकी कीमत चुकानी पड़ती है. चार्टर्ड अकाउंटेंसी फर्म में उत्तराधिकार का मतलब भरोसा है. अगली पीढ़ी को ग्राहकों के साथ उस भरोसे को अगले स्तर तक ले जाना होगा.

डॉ. अनुराग बत्रा, BW रिपोर्टर्स 

(डॉ. अनुराग बत्रा BW Businessworld के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ तथा exchange4media Group के संस्थापक हैं. पहली पीढ़ी के उद्यमी और मीडिया जगत की प्रमुख हस्ती होने के साथ-साथ वह एंजेल निवेशक, लेखक, टेलीविजन होस्ट और उद्यमियों एवं मीडिया पेशेवरों के मेंटर भी हैं. वह कई कॉरपोरेट और संस्थागत बोर्डों में सेवाएं दे रहे हैं और प्रबंधन शिक्षा से लंबे समय से जुड़े हैं.

MDI गुरुग्राम के पूर्व छात्र डॉ. बत्रा इसके बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में रह चुके हैं और MDI एलुमनाई एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रहे हैं. वह इंटरनेशनल एकेडमी ऑफ टेलीविजन आर्ट्स एंड साइंसेज के सदस्य भी हैं. उन्हें पढ़ने का शौक है और उनका मानना है कि जब जुनून ही पेशा बन जाता है, तो काम को एक गहरा उद्देश्य मिल जाता है.)


सेबी का जापानी समझौता: ऐसे नुकसान का निपटारा, जो अब अस्तित्व में ही नहीं है

एक पूर्णकालिक सदस्य ने निप्पॉन से जुड़े आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. दूसरे सदस्य अभी फैसला नहीं कर पाए हैं. बॉन्ड फिर से जीवित हो गए हैं. और सेबी चेयरमैन की डायरी बार-बार निप्पॉन से टकरा रही है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Friday, 06 November, 2026
Last Modified:
Friday, 06 November, 2026
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पलक शाह

सायोनारा, तर्क

सेबी (SEBI) के लिए यह साल जापानी रंग में रंगा रहा है. चेयरमैन ओसाका गए, जापान के कौंसुल जनरल सेबी आए और सेबी का आदेश जारी होने से पहले ही निप्पॉन का पैसा आ गया. यहां तक कि लेह में 11,500 फीट की ऊंचाई पर भी चेयरमैन ने निप्पॉन इंडिया की शाखा में जाने का समय निकाल लिया. यह शहर की एकमात्र म्यूचुअल फंड कंपनी की शाखा है.

निप्पॉन लाइफ इंडिया एसेट मैनेजमेंट (NAM India) ने यस बैंक के AT-1 बॉन्ड मामले में समझौता करने के लिए सेबी को 96.76 करोड़ रुपये का भुगतान किया है. पैसा कागजी कार्रवाई से पहले पहुंच गया. इस भुगतान को उचित ठहराने वाला आदेश अभी तक पारित नहीं हुआ है. अन्य जगहों पर किसी सौदे पर हस्ताक्षर होने से पहले किए गए भुगतान को अग्रिम राशि कहा जाता है. सेबी में इसे सैद्धांतिक मंजूरी कहा जाता है.

इस आदेश के लिए दो पूर्णकालिक सदस्यों की जरूरत है. मामले से परिचित लोगों के मुताबिक, संदीप प्रधान इस पर हस्ताक्षर कर चुके हैं. केवीआर मूर्ति ने अभी हस्ताक्षर नहीं किए हैं. 15 अक्टूबर से यह फाइल आगे नहीं बढ़ी है. इसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने उन बॉन्ड को फिर से जीवित कर दिया था, जिन्हें खत्म माना जा रहा था.

AT-1 बॉन्ड अब तक किसी टीवी धारावाहिक के खलनायक से भी ज्यादा बार खत्म होकर वापस आ चुके हैं. इस बार उनका फिर से जीवित होना सेबी के समझौते को भी अपने साथ ले डूब सकता है.

वह नुकसान, जो हुआ ही नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें यस बैंक के 8,415 करोड़ रुपये के AT-1 बॉन्ड को मार्च 2020 में राइट-डाउन करने के फैसले को रद्द कर दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने इसे पूरी तरह अवैध और अमान्य बताया.

सेबी का अगस्त 2024 का कारण बताओ नोटिस एक आंकड़े पर आधारित है. इसमें योजनाओं के AT-1 बॉन्ड निवेश का मूल्य शून्य माना गया और निवेशकों का नुकसान 1,828.70 करोड़ रुपये आंका गया. समझौता भी इसी आधार पर टिका है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, 15 अप्रैल 2026 को सेबी के एक पत्र के जरिए भुगतान की गई राशि का करीब 93 फीसदी, यानी लगभग 89.74 करोड़ रुपये, उन निवेशकों को देने की बात कही गई थी, जिन्हें नुकसान हुआ था.

अब इन बॉन्ड की पूरी कीमत वापस मिल गई है. ब्याज के बकाया भुगतान को जोड़ने पर योजनाओं को करीब 2,900 करोड़ रुपये मिल सकते हैं. यह समझौते के तहत मिलने वाली राशि से लगभग 30 गुना अधिक है. और चूंकि निप्पॉन इंडिया ने 6 मार्च 2020 को इन बॉन्ड को साइड-पॉकेट में डाल दिया था, इसलिए इसकी वसूली उन सभी निवेशकों को मिलेगी, जिनके पास उस दिन यूनिट थीं. इसमें वे निवेशक भी शामिल हैं, जिन्होंने बाद में अपनी यूनिट बेच दी थीं.

इसलिए सवाल क्रिकेट स्कोरबोर्ड जितना छोटा है: आखिर किस नुकसान का समझौता किया जा रहा है?

सेबी जीते तो भी तर्क हारे

अगस्त 2025 में सेबी ने इसी मामले में अनिल अंबानी, जय अनमोल अंबानी और राणा कपूर की समझौते की अपीलें खारिज कर दी थीं. खबरों के मुताबिक, इसकी वजह निवेशकों को हुआ बड़ा नुकसान और पूरे बाजार पर पड़ने वाला प्रभाव बताया गया था. ये वही आधार हैं, जिनके तहत सेबी के नियम किसी मामले में समझौते से इनकार करने की अनुमति देते हैं.

एक ही नोटिस. एक ही लेनदेन. एक ही नुकसान. प्रमोटर्स से कहा गया कि मामला इतना गंभीर है कि इसमें समझौता नहीं हो सकता. लेकिन जिन फंड हाउस ने बॉन्ड खरीदे थे, उन्हें समझौता मिल गया.

अगर नुकसान के आधार पर अंबानी और कपूर को समझौते से बाहर रखा गया, तो यही आधार फंड हाउस पर भी लागू होना चाहिए. और अगर ऐसा नहीं था, तो 15 अक्टूबर के बाद शायद नुकसान बचा ही नहीं है. ऐसे में उन्हें समझौते से इनकार करने का सेबी का आधार भी खत्म हो गया है. सेबी नुकसान का तर्क दे सकता है या समझौते का. दोनों बातें एक साथ नहीं हो सकतीं.

इस महीने के नए समझौता नियमों के तहत जिन आवेदकों के आवेदन पहले खारिज हो चुके हैं, उन्हें दोबारा आवेदन करने के लिए एक बार 90 दिन का मौका दिया गया है. वकीलों को उम्मीद है कि NAM India के आदेश को आधार बनाकर समानता के अधिकार के तहत चुनौती दी जा सकती है. समझौते का उद्देश्य विवाद खत्म करना होता है. लेकिन सेबी में यह मामला तीन नए विवादों की शुरुआत कर सकता है.

सेबी के पास बचाव का एक तर्क है

सेबी के धोखाधड़ी-रोधी नियमों के तहत कार्रवाई के लिए नुकसान होना जरूरी नहीं है. इसके अलावा, 88.59 करोड़ रुपये की प्रबंधन फीस की वसूली और एक्सपोजर सीमा के उल्लंघन का मामला सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी बना हुआ है. यह तर्क अपनी जगह सही है. लेकिन तब आदेश में स्पष्ट रूप से कहा जाना चाहिए कि यह राशि नुकसान के लिए नहीं, बल्कि आचरण के लिए ली जा रही है. साथ ही यह भी बताना होगा कि समान आचरण के लिए एक नोटिस पाने वाली कंपनी को समझौते की अनुमति क्यों दी जा रही है, जबकि दूसरी को नहीं.

नवंबर में अप्रैल के गणित पर हस्ताक्षर करने का मतलब होगा कि सेबी उस आधार को सही ठहरा रहा है, जिसे सुप्रीम कोर्ट खारिज कर चुका है.

एक हस्ताक्षर, एक खामोशी

यह फाइल सबसे पहले कमलेश वार्ष्णेय के पास गई थी, लेकिन उन्होंने खुद को इस मामले से अलग कर लिया. इसके बाद फाइल मूर्ति और प्रधान के पास पहुंची. मामले से परिचित लोगों के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मूर्ति ने इस पर संकोच जताया. समझौता पैनल का सामूहिक फैसला होता है, महज औपचारिक मुहर नहीं. अगर मूर्ति यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह आदेश अब भी तर्कसंगत है, तो संभव है कि वह इस इमारत में अकेले व्यक्ति हों, जो यह सवाल खुलकर पूछ रहे हैं.

सूत्रों के मुताबिक, दो साल तक NAM India और उसके अधिकारियों ने नोटिस के जवाब में मामले के गुण-दोष पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. छोटे फंड हाउस को शायद ही कभी दो साल तक चुप रहने की ऐसी छूट मिलती है. वे यह सोच सकते हैं कि इस फाइल को किस कतार में रखा गया था.

CBI को इसकी जानकारी नहीं मिली

CBI ने कपूर और अनिल अंबानी के खिलाफ रिलायंस निप्पॉन म्यूचुअल फंड और यस बैंक के बीच कथित 2,797 करोड़ रुपये के लेनदेन के बदले लाभ (Quid Pro Quo) के मामले में आरोपपत्र दाखिल किया है. आरोपपत्र देखने वाले लोगों के मुताबिक, इसमें सिक्का और त्रिपाठी की भूमिकाओं का भी जिक्र है. साथ ही पूरक आरोपपत्र दाखिल करने की छूट भी रखी गई है. BW Businessworld को NAM India की ओर से CBI की इस कार्रवाई के बारे में कोई एक्सचेंज डिस्क्लोजर नहीं मिला.

सिक्का AMFI के अध्यक्ष हैं, जो 75 लाख करोड़ रुपये के उद्योग का प्रतिनिधित्व करता है. एक एजेंसी उनके खिलाफ अपनी जांच पूरी कर रही है. दूसरी एजेंसी ने अपनी जांच का रास्ता खुला रखा है.

पांचवां T

तुहिन कांत पांडे ने सेबी की कमान संभालते समय चार T का वादा किया था: भरोसा (Trust), पारदर्शिता (Transparency), टीमवर्क (Teamwork) और टेक्नोलॉजी (Technology). पांचवां T, यानी समय (Timing), सबसे मुश्किल साबित हो रहा है.

22 जनवरी: निप्पॉन लाइफ के मुख्यालय वाले शहर ओसाका में निवेशकों की बैठक हुई. ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है, जिससे पता चले कि उन्होंने निप्पॉन लाइफ से मुलाकात की थी. और हमारा यह सुझाव भी नहीं है कि उन्होंने ऐसा किया. भूगोल कोई सबूत नहीं है. यह महज भूगोल है.

15 अप्रैल: सेबी का समझौता पत्र NAM India को भेजा गया.

22 जुलाई: जापान के मुंबई स्थित कौंसुल जनरल ने उनसे शिष्टाचार मुलाकात की.

15 सितंबर: लेह में सेना के लिए AMFI के निवेशक जागरूकता कार्यक्रम के दौरान उन्होंने निप्पॉन इंडिया की शाखा का दौरा किया. यह इस क्षेत्र में किसी म्यूचुअल फंड हाउस का पहला कार्यालय है. 11,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस शहर में एकमात्र फंड हाउस वही था, जो अपने नियामक के हस्ताक्षर का इंतजार कर रहा था.

सूत्रों के मुताबिक, निप्पॉन लाइफ भारत-जापान क्रिकेट मैच की मेजबानी भी कर रही है.

इनमें से कोई भी बात अपने आप में अनुचित नहीं है. लेकिन एक नियामक को निष्पक्ष दिखना भी जरूरी है.

जब किसी समझौते का तथ्यात्मक आधार खत्म हो चुका हो और फिर भी उसे हस्ताक्षर के लिए आगे बढ़ाया जा रहा हो, जबकि चेयरमैन का पूरा साल आवेदक के समूह और उसके देश के लोगों के साथ सौहार्दपूर्ण मुलाकातों में बीता हो, तो यह महज छवि का सवाल नहीं रह जाता. यही मुख्य मुद्दा बन जाता है.

शीर्ष स्तर पर खामोशी

सेबी ने विस्तृत सवालों का जवाब नहीं दिया. CBI ने भी निप्पॉन के खिलाफ अपने मामले पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.

सेबी अब भी इस फाइल को वापस भेजकर गणना दोबारा कर सकता है. या फिर नवंबर में अप्रैल के समझौते पर हस्ताक्षर कर सकता है और आने वाले वर्षों तक ट्रिब्यूनल तथा उन नोटिस पाने वालों को इसका जवाब देता रह सकता है, जिन्हें उसने समझौते से बाहर कर दिया था.

फिलहाल, पैसा जमा हो चुका है, एक पेन रुक चुका है और दूसरा अब भी मूर्ति की जेब में है.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.

19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)

 


वेदांता की पूर्व डिप्टी CFO स्वाति चौहान ने शुरू की अपनी कंपनी, निवेशक संबंधों पर करेगी काम

गुरुग्राम की Vaydha Advisory स्मॉल और मिड-कैप कंपनियों को निवेशक संबंध (Investor Relations), IPO की तैयारी, कंपनियों के विभाजन और अधिग्रहण से जुड़ी सलाह देगी.

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Published - Friday, 06 November, 2026
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Friday, 06 November, 2026
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वेदांता ग्रुप की पूर्व डिप्टी CFO स्वाति चौहान ने अपनी नई कंपनी वैधा एडवाइजरी (Vaydha Advisory) की शुरुआत की है. गुरुग्राम स्थित यह कंपनी भारत की  स्मॉल और मिड-कैप सूचीबद्ध कंपनियों को निवेशक संबंधों (IR) से जुड़ी सलाह और सेवाएं देगी. चौहान अक्टूबर 2026 से इस कंपनी की संस्थापक के तौर पर काम कर रही हैं.

चौहान ने अपनी लिंक्डइन पोस्ट में बताया कि वेदांता में निवेशक संबंधों से जुड़े काम के दौरान उन्होंने महसूस किया कि कंपनियों के वित्तीय नतीजे हमेशा अपने आप पूरी कहानी नहीं बताते. निवेशकों को यह समझना भी जरूरी होता है कि कंपनी का प्रदर्शन किन वजहों से प्रभावित हो रहा है, विकास के लिए पूंजी कहां से आ रही है और भविष्य की कारोबारी रणनीति क्या है. उन्होंने कहा कि Vaydha का उद्देश्य कंपनियों के प्रबंधन को अपनी कारोबारी और निवेश संबंधी योजनाएं निवेशकों के सामने स्पष्ट और लगातार प्रभावी ढंग से रखने में मदद करना है.

तीन प्रमुख क्षेत्रों में देगी सलाह

Vaydha की लिंक्डइन प्रोफाइल के मुताबिक, कंपनी की सेवाओं को तीन प्रमुख क्षेत्रों में बांटा गया है. इनमें सामान्य निवेशक संबंध सेवाएं, रणनीतिक निवेशक संबंध और विशेष कारोबारी परिस्थितियों से जुड़ी सलाह शामिल हैं.

सामान्य निवेशक संबंध सेवाओं के तहत कंपनी वित्तीय नतीजों की घोषणा, अर्निंग्स कॉल की स्क्रिप्ट तैयार करने और प्रबंधन को निवेशकों के सवालों के जवाब देने की तैयारी में मदद करेगी. वहीं, रणनीतिक सेवाओं में निवेशकों की पहचान और विश्लेषकों के साथ संवाद बढ़ाने पर ध्यान दिया जाएगा.

इसके अलावा, कंपनी आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (IPO) की तैयारी, कंपनियों के विभाजन (डिमर्जर) और अधिग्रहण से जुड़े मामलों में भी सलाह देगी.

कंपनी की प्रोफाइल में धातु, खनन और प्राकृतिक संसाधनों सहित पांच क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने की बात कही गई है. इसके अलावा, कंपनी में दो से 10 कर्मचारियों की टीम होने का उल्लेख है. स्वाति चौहान खुद ग्राहकों से जुड़े कामकाज का नेतृत्व करेंगी.

वेदांता में पांच साल से अधिक का अनुभव

स्वाति चौहान ने वेदांता ग्रुप में पांच साल और तीन महीने तक काम किया. इस दौरान उन्होंने तीन अलग-अलग पदों पर जिम्मेदारी संभाली. अप्रैल 2024 से मई 2026 तक वह अनिल अग्रवाल फाउंडेशन में डिप्टी CFO रहीं. इससे पहले सितंबर 2022 से मार्च 2024 तक उन्होंने वेदांता में डिप्टी हेड-इन्वेस्टर रिलेशंस और मार्च 2021 से सितंबर 2022 तक ग्रुप फाइनेंशियल प्लानिंग एंड एनालिसिस (FP&A) में एसोसिएट जनरल मैनेजर के तौर पर काम किया.

वेदांता में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने 4 अरब डॉलर के कर्ज के पुनर्वित्त (Debt Refinancing) और समूह के पांच अलग-अलग कंपनियों में विभाजन से जुड़ी निवेशक संवाद प्रक्रिया में भी सहयोग किया.

वेदांता से पहले चौहान Apollo LogiSolutions, Delhivery और Wisdom Mart जैसी कंपनियों में काम कर चुकी हैं. Vaydha की लिंक्डइन प्रोफाइल में Lenovo का नाम भी उनके पूर्व पेशेवर अनुभव से जुड़ी कंपनियों में शामिल है.