निफ्टी में अपोलो हॉस्पिटल्स, आयशर मोटर्स, श्रीराम फाइनेंस, कोल इंडिया, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स सबसे ज्यादा गिरावट वाले शेयरों में शामिल रहे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
भारतीय शेयर बाजार में लगातार पांचवें कारोबारी सत्र में गिरावट देखने को मिली. कल यानि 11 फरवरी को निफ्टी 23,100 से नीचे बंद हुआ है. कारोबारी सत्र के अंत में सेंसेक्स 1,018.20 अंक या 1.32 फीसदी की गिरावट के साथ 76.293.60 पर और निफ्टी 309.80 अंक या 1.32 फीसदी की गिरावट के साथ 23,071.80 पर बंद हुआ. कल लगभग 516 शेयरों में तेजी आई, 3330 शेयरों में गिरावट आई और 92 शेयरों में कोई बदलाव नहीं हुआ.
निफ्टी पर सबसे ज्यादा नुकसान वाले शेयरों में अपोलो हॉस्पिटल्स, आयशर मोटर्स, श्रीराम फाइनेंस, कोल इंडिया और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स शामिल रहे. जबकि सबसे ज्यादा लाभ में रहने वालों शोयरों में अडानी एंटरप्राइजेज, ट्रेंट, भारती एयरटेल और ग्रासिम इंडस्ट्रीज शामिल रहे. ऑटो, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, कैपिटल गुड्स, ऑयल एंड गैस, एनर्जी, एफएमसीजी, हेल्थकेयर, पावर, पीएसयू और रियल्टी में 2-3 फीसदी की गिरावट के साथ सभी सेक्टोरल इंडेक्स लाल निशान पर बंद हुए. निफ्टी मिडकैप इंडेक्स में 3 फीसदी की गिरावट आई. जबकि स्मॉलकैप इंडेक्स में 3.5 फीसदी की गिरावट देखने को मिली.
इन शेयरों में दिख रही खरीददारी
चलिए जानते हैं कि उन शेयरों के बारे में जानते हैं जिनमें मजबूत खरीदारी देखने को मिल रही है. इस लिस्ट में Happiest Minds Technologies, Timken India, Crisil, Cholamandalam Financial Holdings, Schneider Electric Infrastructure, C.E. Info Systems और Oil India हैं. दरअसल, इन शेयरों ने अपना 52 वीक का हाई लेवल पार कर लिया है, जो इनमें तेजी के संकेत देता है. इसलिए आज इन शेयरों पर भी नज़र बनाए रखें.
इन स्टॉक्स में मंदी के संकेत
चलिए अब जानते हैं कि मोमेंटम इंडिकेटर, मूविंग एवरेज कन्वर्जेंस डिवर्जेंस (MACD) ने आज के लिए क्या संकेत दिए हैं. एमएसीडी (MACD) ने KFIN Technologies, HBL Engineering, Elecon Engineering, Godfrey Philips, UNO Minda, BSE और Piramal Pharma के शेयर में मंदी का संकेत दिया है. इसका मतलब है कि अब इन शेयरों में गिरावट शुरू हो गई है.
इन शेयरों में दिख सकता है एक्शन
आज यानी 12 फरवरी 2025 को कुछ शेयर (Stocks in News) एक्शन दिखाने को तैयार हैं. पॉजिटिव ट्रिगर के चलते ये शेयर आज बाजार में फोकस (Stocks to Watch) में रह सकते हैं. अगर इंट्राडे में बेहतर शेयरों की तलाश है तो इन पर नजर (Stock in Focus) रख सकते हैं. आज की इस लिस्ट में BHEL, BEML, Vedanta, SAIL, IRCTC, BERGER PAINTS, KIRLOSKAR OIL ENGINES, CANARA BANK, IRCON International, KOLTE-PATIL DEVELOPERS, INDO AMINES, EID PARRY, Dalmia Bharat Sugar, HUHTAMAKI INDIA, Maruti Suzuki जैसे नाम शामिल हैं.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है).
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान भारत और इंडोनेशिया ने रक्षा, समुद्री सुरक्षा, डिजिटल भुगतान, शिक्षा, स्वास्थ्य, महत्वपूर्ण खनिजों और बंदरगाह विकास समेत कई अहम क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान भारत और इंडोनेशिया ने रक्षा, समुद्री सुरक्षा, डिजिटल भुगतान, शिक्षा, स्वास्थ्य, महत्वपूर्ण खनिजों और बंदरगाह विकास समेत कई अहम क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए. इस दौरान इंडोनेशिया ने भारत की स्वदेशी ब्रह्मोस और अस्त्र मिसाइलें खरीदने का फैसला किया, वहीं दोनों देशों ने यूपीआई को इंडोनेशिया के भुगतान तंत्र से जोड़ने, सबांग बंदरगाह के संयुक्त विकास और इंडोनेशिया में आईआईएम बेंगलुरु का कैंपस खोलने पर भी सहमति जताई. यात्रा के दौरान राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने प्रधानमंत्री मोदी को इंडोनेशिया के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'बिंतांग आदिपूर्णा' से भी सम्मानित किया.
ब्रह्मोस और अस्त्र मिसाइलों की खरीद पर बनी सहमति
भारत और इंडोनेशिया ने रक्षा सहयोग को नई मजबूती देते हुए ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और अस्त्र हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली की खरीद पर सहमति बनाई है. इस समझौते के तहत भारत डायनेमिक्स लिमिटेड इंडोनेशियाई सेना को इन मिसाइल प्रणालियों की आपूर्ति करेगी. दोनों देशों ने समुद्री सुरक्षा, रक्षा आदान-प्रदान, आपदा प्रबंधन और रक्षा उद्योगों के बीच सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति जताई.
सबांग पोर्ट का होगा संयुक्त विकास
दोनों देशों ने इंडोनेशिया के रणनीतिक महत्व वाले सबांग बंदरगाह को संयुक्त रूप से विकसित करने का फैसला किया है. मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित यह बंदरगाह भारत की ग्रेट निकोबार पोर्ट परियोजना के काफी करीब है. माना जा रहा है कि इससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की समुद्री कनेक्टिविटी मजबूत होगी और प्रस्तावित ट्रांसशिपमेंट हब को भी गति मिलेगी.
इंडोनेशिया में भी चलेगा भारत का UPI
दोनों देशों ने भारत के यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) को इंडोनेशिया की भुगतान प्रणाली से जोड़ने का निर्णय लिया है. इससे दोनों देशों के बीच व्यापार, पर्यटन और सीमा-पार भुगतान पहले की तुलना में अधिक आसान और तेज हो सकेंगे. प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यह पहल कारोबार करने में सुगमता बढ़ाने के साथ डिजिटल आर्थिक सहयोग को भी नई दिशा देगी.
इंडोनेशिया में खुलेगा IIM बेंगलुरु का कैंपस
प्रधानमंत्री मोदी ने घोषणा की है कि भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) बेंगलुरु इंडोनेशिया में अपना कैंपस स्थापित करेगा. इसका उद्देश्य शिक्षा और कौशल विकास के क्षेत्र में दोनों देशों के सहयोग को मजबूत करना है. इसके अलावा दोनों देशों ने विशेष इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) के विकास और चुनावी सहयोग पर भी सहमति जताई.
क्रिटिकल मिनरल्स और उद्योगों में बढ़ेगा सहयोग
भारत और इंडोनेशिया ने महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला मजबूत करने पर भी सहमति बनाई है. भारत इंडोनेशिया में स्टील, निकल और रेयर-अर्थ परमानेंट मैग्नेट निर्माण संयंत्रों में निवेश की योजना बना रहा है. इसका उद्देश्य वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में विविधता लाना और महत्वपूर्ण खनिजों की उपलब्धता सुनिश्चित करना है.
स्वास्थ्य, कृषि और सामाजिक योजनाओं में भी साझेदारी
दोनों देशों ने स्वास्थ्य क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई है, जिससे भारतीय दवाओं और चिकित्सा उत्पादों की पहुंच इंडोनेशिया तक आसान होगी. भारत इंडोनेशिया के डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के प्रशिक्षण में भी सहयोग करेगा. इसके अलावा कृषि, दूरसंचार, आपदा प्रबंधन और दोनों देशों के चुनाव आयोगों के बीच भी कई समझौते हुए. भारत अपनी सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और मिड-डे मील जैसी सफल सामाजिक योजनाओं का अनुभव भी इंडोनेशिया के साथ साझा करेगा.
प्रम्बानन मंदिर के संरक्षण में करेगा सहयोग
सांस्कृतिक सहयोग के तहत भारत और इंडोनेशिया ने इंडोनेशिया के ऐतिहासिक प्रम्बानन हिंदू मंदिर परिसर के संरक्षण और जीर्णोद्धार में सहयोग करने पर भी सहमति जताई. इससे दोनों देशों के सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों को और मजबूती मिलने की उम्मीद है.
प्रधानमंत्री मोदी बोले- भारत-इंडोनेशिया संबंधों का शुरू हुआ 'स्वर्णिम अध्याय'
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त प्रेस वार्ता में कहा कि भारत और इंडोनेशिया के बीच व्यापक रणनीतिक साझेदारी लगातार मजबूत हो रही है. उन्होंने कहा कि दोनों देश रक्षा, सुरक्षा, ब्लू इकोनॉमी, समुद्री व्यापार, तकनीक, शिक्षा और संस्कृति सहित हर क्षेत्र में नए अवसरों पर साथ काम कर रहे हैं. प्रधानमंत्री ने विश्वास जताया कि यह यात्रा दोनों देशों के संबंधों के 'स्वर्णिम अध्याय' की शुरुआत साबित होगी, जिसका सकारात्मक प्रभाव पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र और वैश्विक व्यवस्था पर पड़ेगा.
एक्ट ईस्ट नीति को मिलेगी नई मजबूती
प्रधानमंत्री मोदी की यह तीन दिवसीय यात्रा भारत की 'एक्ट ईस्ट' नीति को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है. जकार्ता उनके तीन देशों के दौरे का पहला पड़ाव है. इस यात्रा के दौरान दोनों नेताओं ने पश्चिम एशिया सहित कई क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर भी चर्चा की. प्रधानमंत्री मोदी ने दोहराया कि भारत संवाद, कूटनीति और टू-स्टेट समाधान के माध्यम से स्थायी शांति का समर्थन करता है.
सेबी ने 24 जून 2026 को रिलायंस इंडस्ट्रीज के कंपनी सचिव एवं कंप्लायंस अधिकारी को प्रशासनिक चेतावनी पत्र जारी किया. यह पत्र कंपनी को 6 जुलाई को नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के माध्यम से प्राप्त हुआ.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने रिलायंस इंडस्ट्रीज को इनसाइडर ट्रेडिंग नियमों के कथित उल्लंघन के मामले में प्रशासनिक चेतावनी जारी की है. जांच में कंपनी के दो कर्मचारियों और एक कर्मचारी के करीबी रिश्तेदार द्वारा अप्रकाशित मूल्य-संवेदनशील जानकारी (UPSI) के दौरान शेयरों में ट्रेडिंग करने का मामला सामने आया है. हालांकि, रिलायंस इंडस्ट्रीज ने स्पष्ट किया है कि यह केवल एहतियाती चेतावनी है और इससे कंपनी के वित्तीय या परिचालन कामकाज पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा.
क्या है पूरा मामला?
सेबी ने 1 जून 2024 से 30 अगस्त 2024 के बीच रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयरों में हुई ट्रेडिंग की जांच की थी. इस दौरान नियामक ने सेबी (Prohibition of Insider Trading) Regulations, 2015 के तहत नियमों के अनुपालन की समीक्षा की. जांच में पाया गया कि कंपनी के दो कर्मचारियों और एक कर्मचारी के करीबी रिश्तेदार ने अप्रकाशित मूल्य-संवेदनशील जानकारी (UPSI) की अवधि के दौरान कंपनी के शेयरों में कारोबार किया, जो इनसाइडर ट्रेडिंग नियमों का उल्लंघन माना गया.
कंपनी को मिला चेतावनी पत्र
सेबी ने 24 जून 2026 को रिलायंस इंडस्ट्रीज के कंपनी सचिव एवं कंप्लायंस अधिकारी को प्रशासनिक चेतावनी पत्र जारी किया. यह पत्र कंपनी को 6 जुलाई को नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के माध्यम से प्राप्त हुआ. इसके बाद रिलायंस ने स्टॉक एक्सचेंजों को इसकी जानकारी देते हुए कहा कि यह केवल एहतियाती कदम है और इसका कंपनी के कारोबार या वित्तीय स्थिति पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
किन लोगों के नाम आए सामने?
सेबी ने अपने पत्र के परिशिष्ट (Annexure) में तीन लोगों का उल्लेख किया है.
1. हर्ष जैन ने 5 जुलाई 2024 को 6,385 रुपये में रिलायंस इंडस्ट्रीज के दो शेयर खरीदे.
2. कामिनी जैन, जो एक कर्मचारी की करीबी रिश्तेदार हैं, ने 10 जुलाई 2024 को 35 शेयर 1,09,695.25 रुपये में बेचे और अगले ही दिन 25 शेयर 78,871.25 रुपये में खरीद लिए.
3. हिराई उमंग दोषी ने 18 जुलाई 2024 को 15 शेयर 47,625 रुपये में बेचे.
सेबी ने क्या कहा?
बाजार नियामक के अनुसार, ये लेनदेन सेबी (इनसाइडर ट्रेडिंग निषेध) विनियम, 2015 के विनियम 4(1) तथा सेबी अधिनियम की धारा 12A(d) और 12A(e) का उल्लंघन हैं. सेबी ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि रिलायंस इंडस्ट्रीज को इन लेनदेन की जानकारी तब मिली, जब नियामक ने स्वयं कंपनी को इसकी सूचना दी.
भविष्य के लिए दी सख्त चेतावनी
सेबी ने कंप्लायंस अधिकारी को भविष्य में अधिक सतर्क रहने और इनसाइडर ट्रेडिंग नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने की सलाह दी है. नियामक ने कहा कि यदि भविष्य में इस तरह की घटनाएं दोहराई गईं तो सेबी अधिनियम के तहत उचित कानूनी कार्रवाई की जा सकती है.
रिलायंस इंडस्ट्रीज का जवाब
रिलायंस इंडस्ट्रीज ने कहा है कि वह सेबी की ओर से उठाई गई चिंताओं को दूर करने के लिए आवश्यक कदम उठाएगी. हालांकि, कंपनी ने अभी तक यह नहीं बताया है कि जिन कर्मचारियों और संबंधित व्यक्ति के नाम सामने आए हैं, उनके खिलाफ कोई आंतरिक कार्रवाई की गई है या नहीं.
याप डिजिटल के अलावा अतुल हेगड़े भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम से भी सक्रिय रूप से जुड़े रहे. नवाचार को बढ़ावा देना और नई पीढ़ी के उद्यमियों को सहयोग देना उनकी प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के विज्ञापन और डिजिटल मार्केटिंग उद्योग के प्रमुख नामों में शामिल याप डिजिटल (Yaap Digital) के संस्थापक एवं चेयरमैन अतुल हेगड़े का मंगलवार सुबह दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया. वह 57 वर्ष के थे. उनके निधन से देश के विज्ञापन, मार्केटिंग और स्टार्टअप इकोसिस्टम को बड़ा झटका लगा है.
25 वर्षों से अधिक समय तक उद्योग में निभाई अहम भूमिका
अतुल हेगड़े ने विज्ञापन, ब्रांडिंग और डिजिटल मीडिया क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक समय तक काम किया. इस दौरान उन्होंने खुद को एक दूरदर्शी उद्यमी और डिजिटल-फर्स्ट बिजनेस लीडर के रूप में स्थापित किया. उन्होंने रचनात्मकता, प्रौद्योगिकी और नवाचार के मेल से भारत के बदलते मार्केटिंग परिदृश्य को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
याप डिजिटल दिलाई वैश्विक पहचान
हेगड़े ने याप डिजिटल की स्थापना की और इसे एक एकीकृत मार्केटिंग एवं टेक्नोलॉजी कंपनी के रूप में विकसित किया, जिसकी मौजूदगी भारत के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी है. उनके नेतृत्व में कंपनी ने डिजिटल मीडिया, कंटेंट, इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग, डेटा एनालिटिक्स और प्रौद्योगिकी आधारित मार्केटिंग समाधानों के क्षेत्र में अपनी मजबूत पहचान बनाई.
स्टार्टअप इकोसिस्टम को भी दिया बढ़ावा
याप डिजिटल के अलावा अतुल हेगड़े भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम से भी सक्रिय रूप से जुड़े रहे. उन्होंने रेनमेकर वेंचर्स (Rainmaker Ventures) की सह-स्थापना की और इसके माध्यम से कई शुरुआती चरण के स्टार्टअप्स में निवेश किया तथा युवा उद्यमियों का मार्गदर्शन किया. नवाचार को बढ़ावा देना और नई पीढ़ी के उद्यमियों को सहयोग देना उनकी प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल था.
विज्ञापन से शुरू हुआ था करियर
अतुल हेगड़े ने अपने करियर की शुरुआत विज्ञापन उद्योग से की थी. उन्होंने ब्रांडिंग, संचार और डिजिटल मार्केटिंग के क्षेत्र में व्यापक अनुभव हासिल किया, जिसके बाद याप डिजिटल की स्थापना की. उनका उद्देश्य एक ऐसी स्वतंत्र और प्रौद्योगिकी आधारित एजेंसी नेटवर्क तैयार करना था, जो वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सके.
वित्त वर्ष 2026 में कंपनी का प्रदर्शन रहा मजबूत
हाल के वर्षों में अतुल हेगड़े याप डिजिटल के विस्तार का नेतृत्व कर रहे थे. वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी का प्रदर्शन मजबूत रहा और उसका कर-पश्चात लाभ (PAT) लगभग दोगुना हो गया. उन्होंने कंपनी को तकनीक आधारित, पूर्ण-सेवा (फुल-स्टैक) मार्केटिंग कंपनी के रूप में विकसित करने की महत्वाकांक्षी रणनीति तैयार की थी.
एआई और वैश्विक विस्तार पर था फोकस
हाल ही में उन्होंने कंपनी के अगले चरण के विस्तार की योजना साझा की थी. इसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), स्वामित्व वाले प्रौद्योगिकी प्लेटफॉर्म, रणनीतिक अधिग्रहण और अंतरराष्ट्रीय विस्तार को कंपनी की भविष्य की प्रमुख रणनीति बताया गया था. उनका विजन डेटा, रचनात्मकता, कंटेंट और प्रौद्योगिकी को एकीकृत कर ब्रांडों की बदलती जरूरतों के अनुरूप समाधान उपलब्ध कराना था.
उद्योग के सम्मानित विचारक थे अतुल हेगड़े
अतुल हेगड़े को डिजिटल परिवर्तन, उपभोक्ता व्यवहार, ब्रांडिंग और मार्केटिंग के भविष्य पर उनके विचारों के लिए उद्योग में काफी सम्मान दिया जाता था. वह विभिन्न मंचों पर अपने अनुभव और दृष्टिकोण साझा करते रहते थे. पेशेवर जीवन के अलावा उन्हें स्नीकर्स और समकालीन संस्कृति का भी विशेष शौक था, जो उनकी अलग पहचान का हिस्सा माना जाता था. उनके निधन से भारतीय विज्ञापन और डिजिटल मार्केटिंग उद्योग ने एक दूरदर्शी उद्यमी और मार्गदर्शक को खो दिया.
कंपनी ने 25 मार्च 2026 को IPO के लिए ड्राफ्ट दस्तावेज दाखिल किए थे. प्रस्तावित IPO में 8,000 करोड़ रुपये तक के नए इक्विटी शेयर जारी किए जाएंगे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
बेंगलुरु स्थित मल्टीस्पेशियलिटी हॉस्पिटल चेन मणिपाल हेल्थ एंटरप्राइजेज लिमिटेड (Manipal Health Enterprises) को अपने आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (IPO) के लिए भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) से अंतिम मंजूरी मिल गई है. कंपनी ने 25 मार्च 2026 को IPO के लिए ड्राफ्ट दस्तावेज दाखिल किए थे.
8,000 करोड़ रुपये का होगा फ्रेश इश्यू
प्रस्तावित IPO में 8,000 करोड़ रुपये तक के नए इक्विटी शेयर जारी किए जाएंगे. इसके अलावा, प्रमोटर इम्पीरियस हेल्थकेयर इन्वेस्टमेंट्स पीटीई. लिमिटेड और मणिपाल एजुकेशन एंड मेडिकल ग्रुप इंडिया प्राइवेट लिमिटेड की ओर से 4,32,27,668 इक्विटी शेयरों की बिक्री पेशकश (Offer for Sale-OFS) भी शामिल होगी. OFS के तहत TPG SG Magazine Pte. Ltd, Seventy Second Investment Company LLC, Ammar Sdn Bhd, Novo Holdings Invest Asia A/S और Phoenix Bear Investments LLC भी अपनी हिस्सेदारी बेचेंगे.
जुटाई गई राशि का कहां होगा इस्तेमाल?
कंपनी ने बताया कि फ्रेश इश्यू से जुटाई जाने वाली राशि में से करीब 5,378 करोड़ रुपये का उपयोग उसकी प्रमुख सहायक कंपनी मणिपाल हॉस्पिटल्स प्राइवेट लिमिटेड के बकाया कर्ज और उस पर देय ब्याज के पूर्ण या आंशिक भुगतान के लिए किया जाएगा. इसके अलावा, 574 करोड़ रुपये का इस्तेमाल कंपनी की स्टेप-डाउन सब्सिडियरी सह्याद्री हॉस्पिटल्स प्राइवेट लिमिटेड में अल्पांश हिस्सेदारी (Minority Stake) के अधिग्रहण के लिए किया जाएगा. शेष राशि का उपयोग सामान्य कॉरपोरेट उद्देश्यों के लिए होगा.
प्री-IPO प्लेसमेंट पर भी विचार
कंपनी ने कहा कि वह बुक रनिंग लीड मैनेजर्स के साथ मिलकर 1,600 करोड़ रुपये तक के प्री-IPO प्लेसमेंट पर भी विचार कर सकती है. यदि यह प्लेसमेंट पूरा हो जाता है, तो फ्रेश इश्यू का आकार उसी अनुपात में घटा दिया जाएगा.
देशभर में 38 अस्पतालों का नेटवर्क
मणिपाल हेल्थ एंटरप्राइजेज देशभर में मल्टीस्पेशियलिटी अस्पतालों का संचालन करती है, जहां बाह्य रोगी सेवाओं (OPD) से लेकर जटिल तृतीयक और चतुर्थक स्तर के उपचार उपलब्ध कराए जाते हैं. 30 सितंबर 2025 तक कंपनी के पास 14 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 38 अस्पताल (प्रो-फॉर्मा आधार पर 48 अस्पताल) थे, जिनमें 10,761 लाइसेंस प्राप्त बेड (प्रो-फॉर्मा आधार पर 12,367 बेड) उपलब्ध थे.
CRISIL की रिपोर्ट के अनुसार, अस्पतालों की भौगोलिक मौजूदगी के लिहाज से यह भारत की सबसे बड़ी निजी अस्पताल श्रृंखला है. वहीं बेड क्षमता के आधार पर यह देश की सबसे बड़ी पैन-इंडिया मल्टीस्पेशियलिटी हॉस्पिटल नेटवर्क और अस्पतालों की संख्या के आधार पर दूसरी सबसे बड़ी निजी अस्पताल श्रृंखला है.
नवंबर 2025 में शुरू किया 49वां अस्पताल
कंपनी ने नवंबर 2025 में बेंगलुरु में अपना 49वां अस्पताल शुरू किया, जिसके बाद 31 दिसंबर 2025 तक उसकी लाइसेंस प्राप्त बेड क्षमता बढ़कर 12,631 हो गई. वित्त वर्ष 2025 में कंपनी ने प्रो-फॉर्मा आधार पर 9,263.56 करोड़ रुपये का परिचालन राजस्व दर्ज किया, जो भारत की निजी अस्पताल श्रृंखलाओं में दूसरा सबसे अधिक था. वहीं वास्तविक आधार पर कंपनी का परिचालन राजस्व 8,242.25 करोड़ रुपये रहा.
छह महीने में 571.8 करोड़ रुपये का मुनाफा
30 सितंबर 2025 को समाप्त छह महीने की अवधि में कंपनी का परिचालन राजस्व 4,713 करोड़ रुपये रहा, जबकि इसी अवधि में उसका शुद्ध लाभ 571.8 करोड़ रुपये दर्ज किया गया.
सरकार ने OFS का फ्लोर प्राइस 1,400 रुपये प्रति शेयर तय किया है. संस्थागत निवेशक 7 जुलाई और खुदरा निवेशक 8 जुलाई को इस पेशकश में हिस्सा ले सकेंगे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी कोचिन शिपयार्ड (Cochin Shipyard) में अपनी हिस्सेदारी बेचने का फैसला किया है. इसके लिए ऑफर फॉर सेल (OFS) लाया गया है, जिसके तहत निवेशकों को बाजार कीमत से कम दाम पर शेयर खरीदने का मौका मिलेगा. सरकार ने OFS का फ्लोर प्राइस 1,400 रुपये प्रति शेयर तय किया है, जो सोमवार के बंद भाव से करीब 7% कम है. संस्थागत निवेशक 7 जुलाई और खुदरा निवेशक 8 जुलाई को इस पेशकश में हिस्सा ले सकेंगे.
5.04% तक हिस्सेदारी बेच सकती है सरकार
सरकार पहले चरण में कोचिन शिपयार्ड की 2.52% हिस्सेदारी बेचेगी. यदि निवेशकों की ओर से अच्छी मांग मिलती है, तो अतिरिक्त 2.52% हिस्सेदारी भी बिक्री के लिए लाई जाएगी. इस तरह कुल 5.04% हिस्सेदारी OFS के जरिए बेची जा सकती है.
बाजार भाव से कम रखा गया फ्लोर प्राइस
सरकार ने OFS के लिए 1,400 रुपये प्रति शेयर का फ्लोर प्राइस तय किया है. सोमवार को कोचिन शिपयार्ड का शेयर 1,504.75 रुपये पर बंद हुआ था. इस तरह निवेशकों को बाजार मूल्य की तुलना में करीब 7% कम कीमत पर शेयर खरीदने का अवसर मिलेगा.
कब मिलेगा निवेश का मौका?
OFS के तहत आज यानी 7 जुलाई को संस्थागत निवेशक (Non-Retail Investors) बोली लगा सकेंगे. वहीं 8 जुलाई को खुदरा निवेशकों (Retail Investors) के लिए इश्यू खुलेगा.
क्या होता है OFS?
ऑफर फॉर सेल (OFS) एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके जरिए सरकार या किसी सूचीबद्ध कंपनी का बड़ा शेयरधारक अपनी मौजूदा हिस्सेदारी निवेशकों को बेचता है. इसमें कंपनी नए शेयर जारी नहीं करती, बल्कि पहले से जारी शेयरों की बिक्री की जाती है.
सरकार के पास कितनी हिस्सेदारी?
31 मार्च 2026 तक कोचिन शिपयार्ड में केंद्र सरकार की 67.92% हिस्सेदारी थी. OFS के बाद यह हिस्सेदारी कुछ कम हो जाएगी. यह बिक्री सरकार की विनिवेश रणनीति का हिस्सा है. केंद्रीय बजट 2026-27 में सरकार ने विनिवेश और परिसंपत्ति मुद्रीकरण (Asset Monetisation) के जरिए 80,000 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा है.
शेयर पर दिखा दबाव
OFS की घोषणा के बाद सोमवार को कोचिन शिपयार्ड का शेयर 1.25% की गिरावट के साथ 1,504.75 रुपये पर बंद हुआ. इससे पिछले कारोबारी सत्र में यह 1,523.75 रुपये पर बंद हुआ था. निवेशकों की नजर अब OFS को मिलने वाली प्रतिक्रिया और शेयर की आगे की चाल पर रहेगी.
सहकारिता मंत्रालय के पांचवें स्थापना दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में अमित शाह ने कहा कि सरकार जल्द ही 'भारत टैक्सी' की तर्ज पर सहकारी यूटिलिटी एग्रीगेटर शुरू करेगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्र सरकार सहकारिता क्षेत्र को वित्तीय सेवाओं में मजबूत बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रही है. केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने घोषणा की कि सरकार जल्द ही इफ्को-टोक्यो की तर्ज पर एक सहकारी जीवन बीमा कंपनी स्थापित करेगी. इसके साथ ही 'भारत टैक्सी' मॉडल पर आधारित एक सहकारी यूटिलिटी एग्रीगेटर भी शुरू किया जाएगा. सरकार का मानना है कि इन पहलों से ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बीमा सेवाओं की पहुंच बढ़ेगी और सहकारी समितियों की भूमिका और मजबूत होगी.
सहकारिता क्षेत्र में बीमा सेवाओं का होगा विस्तार
सहकारिता मंत्रालय के पांचवें स्थापना दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में अमित शाह ने कहा कि सरकार जल्द ही 'भारत टैक्सी' की तर्ज पर सहकारी यूटिलिटी एग्रीगेटर शुरू करेगी. उन्होंने कहा कि सामान्य बीमा क्षेत्र में इफ्को-टोक्यो की सफलता से प्रेरणा लेते हुए अब सहकारी जीवन बीमा कंपनी बनाई जाएगी, जिससे बीमा क्षेत्र में सहकारी संस्थाओं की भागीदारी बढ़ेगी.
इफ्को-टोक्यो मॉडल से मिलेगी प्रेरणा
इफ्को-टोक्यो जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की स्थापना वर्ष 2000 में इफ्को और जापान के टोक्यो मरीन ग्रुप के संयुक्त उद्यम के रूप में हुई थी. कंपनी में इफ्को की 51% और टोक्यो मरीन ग्रुप की 49% हिस्सेदारी है. सरकार अब इसी मॉडल को आधार बनाकर सहकारी जीवन बीमा कंपनी विकसित करने की तैयारी कर रही है.
'भारत टैक्सी' का होगा विस्तार
अमित शाह ने कहा कि सहकारी मॉडल के तहत शुरू की गई 'भारत टैक्सी' योजना को अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है. सरकार अगले दो वर्षों में इसका विस्तार देश के 500 शहरों तक करने की योजना बना रही है.
वित्तीय समावेशन को मिलेगा बढ़ावा
ग्रांट थॉर्नटन भारत के पार्टनर एवं फाइनेंशियल सर्विसेज रिस्क लीडर विवेक अय्यर ने कहा कि यह पहल सहकारिता मंत्रालय के वित्तीय समावेशन के व्यापक लक्ष्य का हिस्सा है. उनके अनुसार, सहकारी संस्थाएं पहले से ही सहकारी बैंकों के माध्यम से ऋण और इफ्को-टोक्यो के जरिए सामान्य बीमा क्षेत्र में सक्रिय हैं. अब यह मॉडल जीवन बीमा क्षेत्र तक विस्तारित किया जा सकता है.
उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में सहकारी संस्थाओं की मजबूत पकड़ और लोगों के साथ उनके भरोसेमंद संबंध बीमा की पहुंच बढ़ाने और ग्राहकों तक कम लागत में सेवाएं पहुंचाने में मदद करेंगे. हालांकि, किसी भी सहकारी बीमा कंपनी की सफलता के लिए मजबूत नियामकीय निगरानी और स्पष्ट संचालन व्यवस्था जरूरी होगी.
शुरुआती चरण में है योजना
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सहकारी जीवन बीमा कंपनी की योजना फिलहाल प्रारंभिक चरण में है. शुरुआती चर्चा के मुताबिक, कंपनी के प्रवर्तक देश की प्रमुख सहकारी संस्थाएं होंगी और बाद में अन्य भागीदारों को भी शामिल किया जा सकता है. एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि कंपनी का ढांचा उन बहु-राज्य सहकारी समितियों की तरह हो सकता है, जिन्हें बीज, जैविक खेती और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए अमूल, राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी), इफ्को, कृभको और राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) ने मिलकर स्थापित किया है.
देश में पहले से हैं 26 जीवन बीमा कंपनियां
वर्तमान में भारत में 26 जीवन बीमा कंपनियां संचालित हो रही हैं. प्रस्तावित सहकारी जीवन बीमा कंपनी के शुरू होने से सहकारी क्षेत्र की भागीदारी इस उद्योग में और मजबूत होगी, साथ ही ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बीमा सेवाओं की पहुंच बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है.
सोमवार को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स 521.16 अंक चढ़कर 78,285.07 और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी 50 159.50 अंक की बढ़त के साथ 24,430.35 पर बंद हुआ था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
घरेलू शेयर बाजार ने सोमवार को लगातार चौथे कारोबारी सत्र में मजबूती के साथ कारोबार समाप्त किया था. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स 521.16 अंक चढ़कर 78,285.07 और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी 50 159.50 अंक की बढ़त के साथ 24,430.35 पर बंद हुआ था. मजबूत मॉनसून की उम्मीद, विदेशी निवेशकों की खरीदारी और बैंकिंग शेयरों में तेजी ने बाजार को सहारा दिया. आज बाजार खुलने से पहले निवेशकों की नजर इस बात पर रहेगी कि क्या यह तेजी बरकरार रहती है. खासतौर पर HDFC Bank, महिंद्रा एंड महिंद्रा, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स (BEL), रिलायंस इंडस्ट्रीज और आईसीआईसीआई बैंक जैसे शेयर फोकस में रह सकते हैं.
HDFC Bank समेत इन शेयरों ने दिखाई मजबूती
सोमवार को सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 13 बढ़त के साथ बंद हुए. HDFC Bank में सबसे अधिक 3.59% की तेजी दर्ज की गई. इसके अलावा महिंद्रा एंड महिंद्रा, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स (BEL), रिलायंस इंडस्ट्रीज, आईसीआईसीआई बैंक, मारुति सुजुकी, भारती एयरटेल, इटरनल, सन फार्मा, एशियन पेंट्स, टाटा स्टील, टाइटन और लार्सन एंड टुब्रो के शेयर भी बढ़त के साथ बंद हुए. वहीं दूसरी ओर कोटक महिंद्रा बैंक में सबसे अधिक 3.93% की गिरावट रही. इसके अलावा TCS, बजाज फिनसर्व, पावर ग्रिड, HCL Tech, अल्ट्राटेक सीमेंट, इंडिगो, इंफोसिस, ITC, बजाज फाइनेंस, टेक महिंद्रा, एक्सिस बैंक, भारतीय स्टेट बैंक (SBI), ट्रेंट, हिंदुस्तान यूनिलीवर और NTPC के शेयरों में गिरावट दर्ज की गई.
ब्रॉडर मार्केट में भी रही खरीदारी
ब्रॉडर मार्केट में भी निवेशकों का रुझान सकारात्मक रहा. निफ्टी मिडकैप इंडेक्स 0.45% और निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स 0.75% की बढ़त के साथ बंद हुए. सेक्टरवार प्रदर्शन की बात करें तो निफ्टी रियल्टी इंडेक्स छह महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गया, जबकि निफ्टी ऑटो इंडेक्स एक महीने के उच्च स्तर पर बंद हुआ. निफ्टी ऑयल एंड गैस और निफ्टी कंज्यूमर ड्यूरेबल्स इंडेक्स में भी अच्छी खरीदारी देखने को मिली.
आज इन शेयरों पर रहेगी निवेशकों की नजर
आज के कारोबार में कई शेयर निवेशकों के रडार पर रह सकते हैं. राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) ने टोरेंट फार्मास्यूटिकल्स और जेबी केमिकल्स एंड फार्मास्युटिकल्स के विलय को मंजूरी दे दी है. वरुण बेवरेजेज की केन्या इकाई ने करीब 305 करोड़ रुपये में देवयानी फूड इंडस्ट्रीज केन्या के डेयरी बेवरेज, जूस और पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर कारोबार के अधिग्रहण का समझौता किया है. हेक्सावेयर टेक्नोलॉजीज ने अमेरिकी कंपनी स्मार्टरेंट के साथ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित समाधान विकसित करने के लिए रणनीतिक साझेदारी की है. एम्बेसी डेवलपमेंट्स 1,170 करोड़ रुपये तक के डिबेंचर जारी कर अतिरिक्त पूंजी जुटाएगी. RITES को दक्षिण अफ्रीका से 35.82 मिलियन डॉलर का लोकोमोटिव आपूर्ति ऑर्डर मिला है. प्रिमो केमिकल्स ने फ्लो टेक केमिकल्स में शेष 51% हिस्सेदारी खरीदने को मंजूरी दी है. कॉनकॉर्ड एनवायरो सिस्टम्स के मुख्य वित्तीय अधिकारी अनीश गोयल ने इस्तीफा दे दिया है. सेजवन के ग्रोथ ओई फंड ने कर्णिका इंडस्ट्रीज में 3.2% हिस्सेदारी खरीदी है. एवेन्यू सुपरमार्ट्स (डीमार्ट) ने 300 करोड़ रुपये के कमर्शियल पेपर्स जारी किए हैं, जबकि ब्लू जेट हेल्थकेयर ने अपना क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट (QIP) शुरू कर 531.70 रुपये प्रति शेयर का फ्लोर प्राइस तय किया है. इसके अलावा जून तिमाही के कारोबारी अपडेट भी निवेशकों के फोकस में रहेंगे. ट्रेंट का स्टैंडअलोन राजस्व 19% बढ़कर 5,666 करोड़ रुपये, जुबिलेंट फूडवर्क्स का समेकित राजस्व 14.1% बढ़कर 2,569.3 करोड़ रुपये और टाइटन कंपनी का घरेलू कारोबार 37% तथा अंतरराष्ट्रीय कारोबार 128% बढ़ा है. इन सभी घटनाक्रमों के चलते आज इन शेयरों में अच्छी-खासी हलचल देखने को मिल सकती है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
मेटागो को क्राउडफंडिंग मंच केट्टो (Ketto) के संस्थापकों ने तैयार किया है. कंपनी का कहना है कि भारत में तेजी से बढ़ रही मोटापा और उपापचय संबंधी बीमारियों की चुनौती से निपटने के लिए यह एक समग्र स्वास्थ्य सेवा मॉडल लेकर आई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अभिनेता और उद्यमी कुणाल कपूर ने सोमवार को 'मेटागो' (MetaGO) नामक एक डॉक्टर-आधारित उपापचय स्वास्थ्य मंच (मेटाबॉलिक हेल्थ प्लेटफॉर्म) लॉन्च करने की घोषणा की. यह मंच मोटापा और उससे जुड़ी उपापचय संबंधी बीमारियों से जूझ रहे लोगों को संगठित चिकित्सा देखभाल, जांच सुविधाएं और दीर्घकालिक चिकित्सकीय सहयोग उपलब्ध कराने के उद्देश्य से विकसित किया गया है.
मेटागो को क्राउडफंडिंग मंच केट्टो (Ketto) के संस्थापकों ने तैयार किया है. कंपनी का कहना है कि भारत में तेजी से बढ़ रही मोटापा और उपापचय संबंधी बीमारियों की चुनौती से निपटने के लिए यह एक समग्र स्वास्थ्य सेवा मॉडल लेकर आई है.
केट्टो के अनुभव से जन्मा मेटागो का विचार
मेटागो के संस्थापक कुणाल कपूर, वरुण शेट और जहीर अडेनवाला को इस मंच का विचार केट्टो के साथ एक दशक से अधिक समय तक काम करने के दौरान मिला. इस दौरान उन्होंने हजारों ऐसे परिवारों के साथ काम किया, जो गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए आर्थिक सहायता जुटा रहे थे.
संस्थापकों ने देखा कि टाइप-2 डायबिटीज (Type 2 Diabetes), हृदय रोग, मोटापा और अन्य उपापचय संबंधी बीमारियां न केवल मरीजों बल्कि उनके परिवारों पर भी भारी आर्थिक और मानसिक बोझ डालती हैं. उनका मानना है कि इन बीमारियों की शुरुआत कई वर्ष पहले ही हो जाती है, लेकिन उपचार तब शुरू होता है, जब स्थिति गंभीर हो चुकी होती है.
डॉक्टरों की निगरानी में मिलेगा व्यक्तिगत उपचार
मेटागो का उद्देश्य केवल वजन कम कराना नहीं, बल्कि लोगों के उपापचय स्वास्थ्य में दीर्घकालिक सुधार लाना है. यह मंच डॉक्टरों की सलाह, उपापचय आकलन, व्यक्तिगत उपचार योजना, चिकित्सकीय रूप से उपयुक्त जीएलपी-1 उपचार, पोषण संबंधी मार्गदर्शन, व्यायाम प्रशिक्षण और नियमित स्वास्थ्य निगरानी जैसी सेवाओं को एक साथ उपलब्ध कराता है.
इस मॉडल में वजन प्रबंधन को अल्पकालिक उपाय के बजाय एक निरंतर स्वास्थ्य यात्रा के रूप में देखा गया है, जिससे लोग समय के साथ स्वस्थ जीवनशैली अपना सकें.
'हम वजन घटाने वाली कंपनी नहीं बना रहे' : कुणाल कपूर
मेटागो के सह-संस्थापक कुणाल कपूर ने कहा, "केट्टो के साथ 14 वर्षों तक काम करने के दौरान हमने हजारों परिवारों को गंभीर स्वास्थ्य संकट का सामना करते देखा. इससे यह स्पष्ट हुआ कि मधुमेह, मोटापा और अन्य उपापचय संबंधी बीमारियां वर्षों पहले ही विकसित होना शुरू हो जाती हैं.
यही सोच मेटागो की शुरुआत का कारण बनी. हम कोई वजन घटाने वाली कंपनी नहीं बना रहे हैं. हमारा ध्यान उस समय पर है, जब सही हस्तक्षेप शल्य चिकित्सा नहीं बल्कि डॉक्टर की सलाह हो सकती है."
उन्होंने कहा कि जीएलपी-1 उपचार ने मोटापे के इलाज में नई संभावनाएं पैदा की हैं, लेकिन केवल दवा पर्याप्त नहीं है. स्थायी परिणाम तभी मिलते हैं, जब दवा के साथ डॉक्टरों की निगरानी, संतुलित पोषण, व्यवहार में बदलाव और निरंतर सहयोग भी मिले.
विशेषज्ञ चिकित्सा सेवाएं घर-घर तक पहुंचाने का लक्ष्य
मेटागो के सह-संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी वरुण शेट ने कहा कि भारत ने स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन अब आवश्यकता ऐसी व्यवस्था की है, जो उपापचय संबंधी देखभाल को निरंतर और अधिक समन्वित बनाए.
उन्होंने कहा कि मेटागो शुरुआत से ही डॉक्टर-आधारित मॉडल पर काम करेगा और सेवाएं लोगों के घर तक पहुंचाएगा. कंपनी का लक्ष्य उन उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाओं को हर भारतीय तक पहुंचाना है, जो अब तक सीमित वर्ग के लोगों के लिए उपलब्ध थीं.
चिकित्सकीय निगरानी में अधिक प्रभावी है जीएलपी-1 उपचार
मेटागो की चिकित्सा सलाहकार समिति के सदस्य और हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. कौशल पटेल ने कहा कि जीएलपी-1 उपचार ने मोटापे के इलाज के विकल्पों का विस्तार किया है, लेकिन इसका अधिकतम लाभ तभी मिलता है, जब इसे चिकित्सकीय निगरानी, नियमित उपापचय परीक्षण और स्वस्थ जीवनशैली के साथ जोड़ा जाए.
35 से अधिक जैव संकेतकों की होगी जांच
मेटागो से जुड़ने वाले प्रत्येक सदस्य का 35 से अधिक जैव संकेतकों (बायोमार्कर्स) के आधार पर विस्तृत उपापचय परीक्षण किया जाएगा. इसके साथ विस्तृत चिकित्सकीय मूल्यांकन भी होगा. रिपोर्ट के आधार पर अंतःस्रावी रोग विशेषज्ञ, मधुमेह विशेषज्ञ, हृदय रोग विशेषज्ञ या आंतरिक चिकित्सा विशेषज्ञ व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति और लक्ष्यों के अनुरूप व्यक्तिगत उपचार योजना तैयार करेंगे.
जहां चिकित्सकीय रूप से आवश्यक होगा, वहां जीएलपी-1 उपचार भी योजना का हिस्सा होगा. इसके साथ डॉक्टरों की नियमित निगरानी, पोषण विशेषज्ञों की सलाह, व्यायाम प्रशिक्षण और समय-समय पर स्वास्थ्य समीक्षा जारी रहेगी.
मुंबई पुलिस के लिए लगाया निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर
समुदाय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के तहत मेटागो ने हाल ही में मुंबई पुलिस (Mumbai Police) के लिए एक निःशुल्क उपापचय स्वास्थ्य शिविर आयोजित किया, जिसमें रक्त जांच और मौके पर चिकित्सकों से परामर्श की सुविधा उपलब्ध कराई गई.
कंपनी ने बताया कि आने वाले महीनों में विभिन्न पेशेवर समूहों के लिए भी ऐसे सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, ताकि उपापचय स्वास्थ्य के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाई जा सके.
सरकार जिस योजना को तीसरी बार नए रूप में लॉन्च करने के संकेत दे रही है, जिसने एक दशक में केवल 38 टन सोना जुटाया था, उसी काम को दो पन्नों के एक एक्सचेंज सर्कुलर ने चुपचाप कर दिखाया है, जो बैंक नहीं कर सके: एक ऐसी व्यवस्था तैयार कर दी है, जो घरेलू सोने को रिफाइनरी की भट्ठी से सीधे फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट तक पहुंचाती है, न बैंक, न डिपॉजिट सर्टिफिकेट, न कोई योजना.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
पिछले दो सप्ताह से सोने का बाजार सांस रोके हुए है. सूत्रों के हवाले से आई रिपोर्टों में कहा गया है कि केंद्र सरकार जल्द ही गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम का नया संस्करण घोषित करने वाली है, ज्वैलर्स को "कलेक्शन पार्टनर" बनाया जाएगा, 1,000 टन से अधिक सोना जुटाने का लक्ष्य होगा और घोषणा "अगले दो सप्ताह के भीतर" की जाएगी. इसकी वजह, कथित तौर पर, प्रधानमंत्री की नागरिकों से एक वर्ष तक सोने की खरीद टालने की अपील को बताया जा रहा है. उद्योग संगठनों ने भी उत्साहपूर्वक अपने अनुमान पेश किए हैं: यदि भारत के घरों में मौजूद 25,000 टन सोने का केवल 5% भी मोनेटाइज कर लिया जाए, तो 90 अरब डॉलर की तरलता उपलब्ध हो सकती है.
हालांकि, सरकार की सोच से परिचित लोगों का कहना है कि ऐसी कोई योजना आने वाली नहीं है. और यहां वह असहज करने वाला तथ्य है, जिसे पहले से प्रेस विज्ञप्तियां तैयार कर रहे लोगों को समझना चाहिए: ऐसी किसी योजना की आवश्यकता भी नहीं है. भारतीय परिवारों के सोने का मोनेटाइजेशन पहले ही शुरू हो चुका है, किसी मंत्रालय के जरिए नहीं, बल्कि 1 जुलाई को जारी और 13 जुलाई से प्रभावी MCX सर्कुलर संख्या MCX/PMT/375/2026 के माध्यम से, जिसे बुलियन कारोबार से बाहर शायद ही किसी ने पढ़ने की जहमत उठाई हो.
सर्कुलर वास्तव में क्या करता है
यह सर्कुलर, BIS मानक वाले सोने के लिए मई में MCX द्वारा किए गए गुड डिलीवरी नॉर्म्स संशोधन की निरंतरता में जारी किया गया है. इसके तहत तीन घरेलू रिफाइनरों M. D. Overseas, Kundan Refinery और Zaveri and Company को पैनल में शामिल किया गया है. साथ ही पहले से सूचीबद्ध चार रिफाइनरों, Titan (Tanishq), Augmont, Parker Precious Metals और Sovereign Metals की गुड डिलीवरी सूची का विस्तार MCX के सभी गोल्ड फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट्स तक किया गया है, जिसमें विशेष रूप से बेंचमार्क 1 किलोग्राम गोल्ड कॉन्ट्रैक्ट भी शामिल है. अब सात भारतीय रिफाइनर LBMA सप्लायर्स के साथ मिलकर भारत के सबसे अधिक तरल गोल्ड कॉन्ट्रैक्ट के निपटान के लिए क्रमांकित, 995 शुद्धता वाले गोल्ड बार डिलीवर कर सकते हैं.
यदि परिशिष्टों से आगे पढ़ा जाए, तो इसका महत्व समझना कठिन नहीं है. ये रिफाइनर सोना खनन नहीं करते. उनका कच्चा माल मुख्य रूप से पुनर्चक्रित (रीसाइकल्ड) सोना होता है, पुराने आभूषण, सिक्के और स्क्रैप, जिन्हें वे परिवारों, ज्वैलर्स और एग्रीगेटर्स से खुले बाजार में खरीदते हैं. अब तक इस रीसाइक्लिंग प्रक्रिया का उत्पाद अपारदर्शी भौतिक बाजार तक ही सीमित रहता था.
13 जुलाई से यह प्रक्रिया एक अनिवार्य डिलीवरी वाले फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट पर समाप्त होगी, जिसमें पारदर्शी एक्सचेंज-आधारित मूल्य निर्धारण, चरणबद्ध टेंडर, रैंडम आवंटन और क्लियरिंग कॉरपोरेशन द्वारा गारंटीकृत सेटलमेंट होगा. अब रुद्रपुर या रामपुरा में किसी घर के लॉकर में रखा एक ग्राम सोना भी औपचारिक वित्तीय प्रणाली तक पहुंचने का एक पूर्ण और ऑडिट योग्य मार्ग रखता है: रिफाइनर उसे खरीदेगा, BIS मानक वाले बार में पिघलाएगा और अहमदाबाद, मुंबई या नई दिल्ली में GOLD फ्यूचर्स शॉर्ट के विरुद्ध उसकी डिलीवरी करेगा. न बैंक शाखा. न डिपॉजिट रसीद. न ब्याज दर पर मोलभाव. न कोई योजना.
अर्थशास्त्र भी पहले ही इसके पक्ष में खड़ा हो चुका है. आयात शुल्क के कारण विदेशी सोने की लैंडेड लागत बढ़ गई है, जिससे पुनर्चक्रित घरेलू सोना किसी भी रिफाइनर के लिए सबसे सस्ता कच्चा माल बन गया है. वहीं प्रधानमंत्री की खरीद टालने की अपील के बाद ज्वैलर्स का कहना है कि उनके कारोबार का 40–60% हिस्सा पुराने सोने की रीसाइक्लिंग और एक्सचेंज की ओर स्थानांतरित हो गया है. यानी आपूर्ति स्वयं बाजार तक पहुंच रही है. MCX का यह सर्कुलर उसे संस्थागत रूप से आगे बढ़ने का रास्ता देता है.
जो योजना दो बार विफल हुई, उसे तीसरी बार फिर बेचा जा रहा है
इसकी तुलना उस व्यवस्था के रिकॉर्ड से कीजिए, जिसे सरकार बार-बार पुनर्जीवित करने का वादा करती रही है. गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम (GMS) को 2015 में ठीक उसी उद्देश्य के साथ शुरू किया गया था, जिसकी आज फिर चर्चा हो रही है: सोने के आयात को कम करना, चालू खाते के घाटे को नियंत्रित करना और घरों में निष्क्रिय पड़े सोने को आर्थिक गतिविधि में लाना. एक दशक बाद, वित्त मंत्रालय के अपने आंकड़े बताते हैं कि इस योजना के तहत लगभग 38 टन सोना ही जुटाया जा सका, जबकि भारतीय परिवारों के पास लगभग 25,000 टन सोना होने का अनुमान है. यानी सफलता की दर लगभग 0.15% रही. मार्च 2025 में सरकार ने चुपचाप इस योजना की मध्यम अवधि और दीर्घकालिक जमा योजनाओं को, नवीनीकरण सहित, समाप्त कर दिया और केवल अल्पकालिक बैंक जमा को किसी तरह जारी रखा.
और "ज्वैलर्स को शामिल करने" का विचार भी नया नहीं है. यह वही पुराना विचार है, जिसे सोने से भी कम सावधानी से दोबारा प्रस्तुत किया जा रहा है. अप्रैल 2021 में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा GMS में किए गए संशोधनों में यही व्यवस्था पहले ही लागू की जा चुकी थी, ज्वैलर्स और रिफाइनर Collection and Purity Testing Centres (CPTCs) तथा Gold Mobilisation Collection Testing Agents बन सकते थे, और बैंक उन्हें हैंडलिंग इंसेंटिव के रूप में 1.5% तक भुगतान कर सकते थे. पूरी संरचना पहले से मौजूद थी. संक्षिप्त नाम (Acronyms) भी मौजूद थे. केवल सोना नहीं आया, क्योंकि इस योजना का मूल प्रस्ताव भारतीय परिवारों के व्यवहार के सामने कभी टिक नहीं पाया: अपने आभूषण बैंक को पिघलाने के लिए सौंप दीजिए, बदले में 2.25–2.5% ब्याज और एक टैक्स ट्रेल प्राप्त कीजिए, और अंत में अपने कंगन नहीं, बल्कि एक सोने की बार वापस लीजिए. भारतीय परिवारों ने लगातार दस वर्षों तक इसे तर्कसंगत रूप से अस्वीकार किया. CPTCs का नाम बदलकर "कलेक्शन पार्टनर" कर देने से उत्तर नहीं बदलता, केवल प्रेस विज्ञप्ति बदलती है.
1,000 टन सोना जुटाने का अनुमान विशेष रूप से आलोचना का पात्र है. जनता से यह अपेक्षा की जा रही है कि वह विश्वास करे कि जो ढांचा दस वर्षों में केवल 38 टन सोना जुटा सका, वही अब उससे 26 गुना अधिक सोना जुटा लेगा, केवल इसलिए क्योंकि जिन ज्वैलर्स को 2021 में पहले ही शामिल किया जा चुका था, उन्हें इस बार "एजेंट" के बजाय "पार्टनर" कहा जाएगा. अब तक सामने आई किसी भी व्यवस्था में यह नहीं बताया गया है कि यह अतिरिक्त शून्य आखिर आएगा कहां से.
बाजार ने दिल्ली का इंतजार नहीं किया
असल कहानी यह है कि समस्या का समाधान किसने किया. गोल्ड मोनेटाइजेशन हमेशा एक ऐसी तकनीकी व्यवस्था (Plumbing Problem) थी, जिसे नीति (Policy) का रूप दे दिया गया था: घरेलू सोने के लिए एक विश्वसनीय मूल्यांकनकर्ता (Assayer), एक मानकीकृत उत्पाद, पारदर्शी मूल्य और एक सुनिश्चित खरीदार की आवश्यकता थी. GMS ने यह चारों काम बैंकों से कराने की कोशिश की. लेकिन जिन बैंकों का मंगलसूत्र पिघलाने के कारोबार से स्वाभाविक रूप से कोई संबंध नहीं था, वे इनमें से कोई भी काम प्रभावी ढंग से नहीं कर पाए. इसके विपरीत, रिफाइनर-से-एक्सचेंज की व्यवस्था अपने ढांचे में ही ये चारों सुविधाएं उपलब्ध कराती है, BIS मानक की शुद्धता, क्रमांकित बार, स्पॉट मार्केट से जुड़े सेटलमेंट मूल्य और क्लियरिंग कॉरपोरेशन को प्रतिपक्ष (Counterparty) के रूप में. परिवार को जमा पर 2.5% ब्याज नहीं मिलता, बल्कि उसे उस सोने का पूरा, तत्काल और एक्सचेंज-आधारित मूल्य मिल जाता है, जिसे वह वैसे भी कभी बैंक में जमा नहीं कराने वाला था. यह मोनेटाइजेशन का कोई कमतर रूप नहीं है. वास्तव में यही वह एकमात्र तरीका है, जिसने दुनिया में कहीं भी बड़े पैमाने पर सफलता हासिल की है: रीसाइक्लिंग के माध्यम से एक तरल बाजार में प्रवेश.
बिना कोई बदलाव किए, केवल हिंदी अनुवाद
यहां एक विडंबना है, जिसका आनंद लिया जाना चाहिए. वही नीति-तंत्र, जो अब GMS का तीसरा संस्करण तैयार कर रहा है, उसने इसी महीने पूंजी बाजारों में बैंकों की भागीदारी को सीमित करने के कदम उठाए हैं, RBI के नए कोलेटरल संबंधी निर्देशों ने 1 जुलाई से एक्सचेंजों में कारोबार की मात्रा को बुरी तरह प्रभावित किया है. एक ओर नियामक बैंकों को बाजार की इस संरचना (Market Plumbing) से बाहर निकाल रहा है, वहीं दूसरी ओर सरकार बैंकों (और अब बैंकों को रिपोर्ट करने वाले ज्वैलर्स) को फिर उसी सोना संग्रह (Gold Collection) के कारोबार में धकेलना चाहती है, जिसमें वे दो बार विफल हो चुके हैं. इस बीच, एक्सचेंज इकोसिस्टम ने स्वयं पहल करते हुए और 2019 से लागू मौजूदा SEBI विनियमों के तहत, बिना किसी प्रोत्साहन राशि, कर छूट या लॉन्च कार्यक्रम की मांग किए, पूरी प्रक्रिया को सफलतापूर्वक जोड़ दिया है.
यदि सरकार वास्तव में मदद करना चाहती है, तो उसके लिए ईमानदार कार्यसूची छोटी और साधारण है: रीसाइक्लिंग के लिए बेचे जाने वाले सोने पर पूंजीगत लाभ (Capital Gains) के कर प्रावधानों को तर्कसंगत बनाया जाए, BIS Assaying प्रणाली की विश्वसनीयता बनाए रखी जाए और पैनल में शामिल रिफाइनरों की सूची का विस्तार होने दिया जाए. बाजार को जिस चीज़ की आवश्यकता नहीं है, वह है उस योजना का चौथा संस्करण, जिसका पूरे एक दशक का परिणाम एक मध्यम आकार के बैंक के एक ही वॉल्ट में समा सकता है और जिसकी घोषणा, एक बार फिर, "अगले दो सप्ताह में" किए जाने की बात कही जा रही है.
सोना पहले ही चलना शुरू हो चुका है. वह चंगोदर, मानेसर, होसुर और नरोदा से होकर गुजर रहा है, 995 शुद्धता वाले गोल्ड बार में परिवर्तित हो रहा है और MCX तक पहुंच रहा है. गोल्ड मोनेटाइजेशन पर समाचार मीडिया में आ रही रिपोर्टों के सूत्रों को शायद कोई यह बात बता दे.
MCX सर्कुलर संख्या MCX/PMT/375/2026 दिनांक 1 जुलाई 2026, 13 जुलाई 2026 से प्रभावी, 17 मई 2026 के सर्कुलर MCX/PMT/292/2026 की निरंतरता में जारी किया गया. GMS के तहत जुटाए गए सोने के आंकड़े मार्च 2025 तक के वित्त मंत्रालय के डेटा पर आधारित हैं. पुनर्गठित (Revamped) योजना की कोई घोषणा नहीं होने का दावा इस विषय से परिचित लोगों पर आधारित है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
RBI के नए बैंक गारंटी नियमों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी एक्सचेंज पर असर केवल उसके प्रोडक्ट पोर्टफोलियो से नहीं, बल्कि उसकी मार्जिन संरचना और फंडिंग व्यवस्था से भी तय होता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
कमोडिटी एक्सचेंज MCX की क्लियरिंग कॉरपोरेशन में जमा कुल मार्जिन का लगभग 60% हिस्सा फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) और बैंक गारंटी के रूप में है. इसके मुकाबले BSE की क्लियरिंग इकाई में यह हिस्सा लगभग 30% और NSE की क्लियरिंग इकाई में करीब 34% है. प्रीमियम वॉल्यूम में लगातार तीन कारोबारी सत्रों से आ रही गिरावट यह संकेत देती है कि बाजार को अब इस वास्तविकता का एहसास हुआ है.
जब भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नए बैंक गारंटी नियम आखिरकार 1 जुलाई से लागू हुए और ब्रोकरों तथा प्रोप ट्रेडिंग डेस्क्स को लगातार दूसरी तिमाही में भी कोई राहत नहीं मिली, तब आम धारणा यह थी कि MCX इस बदलाव से सबसे कम प्रभावित रहने वाला एक्सचेंज होगा. तर्क यह दिया जा रहा था कि कमोडिटी डेरिवेटिव्स में फ्यूचर्स का दबदबा है. विश्लेषकों के अनुसार, विकल्प (ऑप्शंस) से जुड़ी इन्वेंट्री और मार्जिन की समस्या, जिसे नए नियमों का सबसे बड़ा असर माना जा रहा था, कच्चे तेल और सोने के फ्यूचर्स पर लागू नहीं होती. साथ ही, यह भी माना जा रहा था कि वर्षों से नियामकीय और कर संबंधी बदलावों के कारण इस सेगमेंट में पहले ही लीवरेज काफी कम हो चुका है. इस प्रकाशन ने भी पिछले सप्ताह इसी तरह का एक तर्क प्रस्तुत किया था.
लेकिन जुलाई के पहले तीन कारोबारी सत्रों ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया. बुधवार को MCX का ऑप्शंस प्रीमियम कारोबार घटा, गुरुवार को इसमें और गिरावट आई तथा शुक्रवार को भी यह लगातार कम हुआ. बाजार सहभागियों का मानना है कि इसका सीधा कारण RBI के नए कोलेटरल नियम हैं, जिनका असर अनुमान से कहीं अधिक बड़ा साबित हो रहा है.
इक्विरस (Equirus) ने नए नियम लागू होने के बाद शुरुआती कारोबारी सत्रों की समीक्षा करते हुए कहा कि ऑप्शंस प्रीमियम कारोबार में गिरावट केवल BSE तक सीमित नहीं रही, जहां एक्सपायरी डे के वॉल्यूम जून की शुरुआत के स्तर से 24% से 37% तक कम रहे, बल्कि MCX में भी हाल के सत्रों में इसी तरह की गिरावट देखने को मिली. दिलचस्प बात यह है कि जुलाई की शुरुआत से पहले MCX का ऑप्शंस कारोबार मजबूत गति में था. जून में जहां फ्यूचर्स कारोबार घटा, वहीं ऑप्शंस का औसत दैनिक कारोबार (Average Daily Turnover) महीने-दर-महीने 8% बढ़ा था.
वह आंकड़ा जिस पर किसी की नजर नहीं गई: 60%
MCX पर असर अनुमान से अधिक क्यों पड़ा, इसका जवाब उसके प्रोडक्ट मिक्स में नहीं बल्कि उसकी क्लियरिंग व्यवस्था के आंकड़ों में छिपा है. RBI का नया नियम फ्यूचर्स और ऑप्शंस के बीच अंतर नहीं करता, बल्कि यह देखता है कि एक्सचेंज के सदस्य अपने मार्जिन की व्यवस्था किस तरह करते हैं. और इस पैमाने पर देखा जाए तो भारत में सबसे अधिक जोखिम MCX पर है, सबसे कम नहीं.
क्लियरिंग कॉरपोरेशनों ICCL, NCL और MCXCCL के आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2025 तक इक्विटी और कमोडिटी बाजारों में कुल मार्जिन 9,750 अरब रुपये (करीब 9.75 लाख करोड़ रुपये) था, जो एक वर्ष पहले के 8,209 अरब रुपये की तुलना में लगभग 19% अधिक है.
इस कुल मार्जिन पूल में MCXCCL की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत छोटी है. इसके पास 546.5 अरब रुपये का मार्जिन है, जो पूरे उद्योग के कुल मार्जिन का लगभग 6% है. इसके मुकाबले BSE की ICCL की हिस्सेदारी लगभग 9% और NSE की NCL की हिस्सेदारी करीब 86% है.
हालांकि, अब सबसे महत्वपूर्ण बात आकार नहीं बल्कि मार्जिन की संरचना (Composition) है. MCXCCL के 546.5 अरब रुपये के मार्जिन में से 324.2 अरब रुपये यानी 59.3% हिस्सा फिक्स्ड डिपॉजिट और बैंक गारंटी के रूप में है. यही वे दो बैंक-आधारित साधन हैं, जिन पर RBI के नए नियमों का सबसे अधिक प्रभाव पड़ रहा है.
BSE में यही अनुपात लगभग 30% (850.4 अरब रुपये में से 256.6 अरब रुपये) है, जबकि NSE की क्लियरिंग कॉरपोरेशन में यह लगभग 34% (8,353 अरब रुपये में से 2,838 अरब रुपये) है. यानी MCX की क्लियरिंग प्रणाली बैंक-आधारित कोलेटरल पर अपने दोनों प्रमुख प्रतिस्पर्धियों की तुलना में लगभग दोगुनी निर्भर है.
कमोडिटी ट्रेडिंग डेस्क बैंक गारंटी पर सबसे अधिक निर्भर क्यों थीं
MCX की मार्जिन बुक का बाकी हिस्सा भी बहुत अधिक राहत नहीं देता. ब्रोकरों से प्राप्त नकद मार्जिन केवल 56.9 अरब रुपये है, जो कुल मार्जिन का लगभग 10% है. सरकारी प्रतिभूतियां, जिन पर नए नियमों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता कुल मार्जिन का 10% से भी कम हिस्सा हैं.
कोलेटरल के रूप में गिरवी रखे गए इक्विटी शेयरों (72.9 अरब रुपये, लगभग 13%) पर अब RBI के नए नियमों के तहत न्यूनतम 40% हेयरकट लागू होगा. इसी तरह, म्यूचुअल फंड यूनिट्स (27.8 अरब रुपये) पर भी समान नियम लागू होंगे.
यदि इन सभी आंकड़ों को जोड़कर देखा जाए, तो MCXCCL के कुल मार्जिन पूल का केवल लगभग एक-चौथाई हिस्सा, जिसमें नकद, सरकारी प्रतिभूतियां और गैर-नकद सोने (Non-Cash Gold) का 10.9 अरब रुपये का छोटा पोर्टफोलियो शामिल है, ऐसे साधनों में है, जिन पर नए नियमों का असर नहीं पड़ेगा. यानी कुल मार्जिन का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा या तो सीधे नए प्रतिबंधों से प्रभावित होगा या उस पर अतिरिक्त हेयरकट लागू होगा.
कमोडिटी डेरिवेटिव्स में भारतीय बाजार के सबसे ऊंचे मार्जिन रेट्स में से कुछ लागू होते हैं. कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के कॉन्ट्रैक्ट्स में शुरुआती मार्जिन सामान्य तौर पर दो अंकों में होता है और बाजार में अस्थिरता बढ़ने पर यह और अधिक हो सकता है.
ऐसे में कमोडिटी बाजार में कारोबार करने वाली मध्यम आकार की प्रोप ट्रेडिंग फर्मों और ब्रोकरेज कंपनियों के लिए इतनी बड़ी राशि नकद मार्जिन के रूप में रखना आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं था.
बैंक गारंटी, जो अक्सर किसी फिक्स्ड डिपॉजिट के आधार पर जारी की जाती थी, उन्हें कम पूंजी लगाकर अधिक मार्जिन उपलब्ध कराने का माध्यम बनती थी. उदाहरण के तौर पर, यदि किसी सदस्य के पास 50 रुपये की अपनी पूंजी होती, तो बैंक गारंटी के जरिए वह MCXCCL के पास 100 रुपये का कोलेटरल दिखा सकता था.
लेकिन अब Commercial Banks – Credit Facilities Amendment Directions, 2026 के तहत प्रत्येक बैंक गारंटी को 100% कोलेटरल से समर्थित होना अनिवार्य कर दिया गया है, जिसमें कम से कम आधा हिस्सा नकद होना चाहिए. इसका अर्थ है कि सस्ती लीवरेज की व्यवस्था समाप्त हो गई है, और इसका सबसे अधिक असर उसी बाजार पर पड़ा है जहां इसका सबसे अधिक उपयोग किया जाता था.
यही वह व्यवस्था है, जिसे ब्लूमबर्ग ने घरेलू प्रोप ट्रेडिंग उद्योग के लिए "बड़ा झटका" बताया था. कर्णा स्टॉक ब्रोकिंग के कार्तिक पी. के अनुसार, बैंक गारंटी पर निर्भर कंपनियों की प्रभावी ट्रेडिंग क्षमता लगभग आधी रह जाएगी. पहले जहां वे अपनी पूंजी का लगभग 1.7 गुना कारोबार कर सकती थीं, वहीं अब यह क्षमता घटकर लगभग 0.85 गुना रह जाएगी.
हालांकि, शुरुआती आकलनों में एक बड़ी चूक हुई. 1 जुलाई से पहले अधिकांश अनुमान इक्विटी इंडेक्स ऑप्शंस पर केंद्रित थे, जहां प्रोप ट्रेडिंग डेस्क का योगदान लगभग 40% माना जाता है. MCX को अपेक्षाकृत कम प्रभावित होने वाला एक्सचेंज माना गया था.
लेकिन क्लियरिंग आंकड़े इसके बिल्कुल विपरीत तस्वीर पेश करते हैं. अपने कुल मार्जिन पूल के अनुपात में देखा जाए तो किसी भी अन्य भारतीय एक्सचेंज की तुलना में MCX के सदस्यों की फंडिंग सबसे अधिक बैंक-आधारित है.
दोहरी चुनौती से जूझ रहा है MCX
MCX के सामने एक और बड़ी चुनौती यह है कि उसके पास वे "शॉक एब्जॉर्बर" नहीं हैं, जिनका लाभ इक्विटी बाजारों के बड़े एक्सचेंज उठा सकते हैं.
उदाहरण के लिए, NSE के ऑप्शंस बाजार में प्रतिभागियों का आधार काफी व्यापक और विविध है. इसमें विदेशी हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग (HFT) फर्म, FPI और GIFT City के माध्यम से आने वाले विदेशी निवेशक, संस्थागत निवेशक और बड़ी संख्या में खुदरा निवेशक शामिल हैं. यदि घरेलू प्रोप ट्रेडिंग डेस्क का कारोबार कम भी हो जाए, तो इन अन्य प्रतिभागियों के जरिए बाजार में लिक्विडिटी बनी रह सकती है.
BSE की स्थिति भी कुछ हद तक ऐसी ही है. भले ही उसका कारोबार मुख्य रूप से थोक निवेशकों पर आधारित हो, लेकिन उसे सेंसेक्स से जुड़े खुदरा निवेशकों का भी समर्थन प्राप्त है.
इसके विपरीत, MCX का कारोबार काफी हद तक उन्हीं घरेलू प्रोप ट्रेडिंग फर्मों और जॉबर्स पर निर्भर है, जो अब RBI के नए कोलेटरल नियमों से सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं.
स्थिति को और कठिन यह तथ्य बनाता है कि विदेशी मार्केट मेकर्स आसानी से उनकी जगह नहीं ले सकते. बैंक, बीमा कंपनियां और अधिकांश विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की कमोडिटी डेरिवेटिव्स में भागीदारी अब भी सीमित है. भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के अध्यक्ष भी पहले स्पष्ट कर चुके हैं कि RBI और IRDAI इस विषय पर अभी भी प्रतिबंधात्मक रुख बनाए हुए हैं.
इस प्रकार, एक ओर नए नियम MCX के प्रमुख लिक्विडिटी प्रदाताओं पर दबाव डाल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर नियामकीय प्रतिबंध संभावित वैकल्पिक प्रतिभागियों को बाजार में आने से रोक रहे हैं. यही कारण है कि जिस एक्सचेंज को सबसे सुरक्षित माना जा रहा था, वहीं जुलाई के पहले तीन कारोबारी सत्रों में लगातार ऑप्शंस प्रीमियम वॉल्यूम में गिरावट दर्ज की गई.
आधिकारिक आंकड़ों में अभी नहीं दिखेगा पूरा असर
फिलहाल इन बदलावों का पूरा प्रभाव आधिकारिक आंकड़ों में दिखाई नहीं देगा. MCX जुलाई महीने के कारोबार के आंकड़े अपनी मासिक रिपोर्ट में जारी करेगा, जबकि क्लियरिंग कॉरपोरेशनों की अगली रिपोर्ट से यह स्पष्ट होगा कि नए नियम लागू होने के बाद मार्जिन के स्वरूप में कितना बदलाव आया है.
फिर भी, बाजार में कारोबार के रुझानों से दिशा स्पष्ट दिखाई देने लगी है और दिसंबर 2025 की मार्जिन बुक यह समझने के लिए पर्याप्त संकेत देती है कि इसका असर किस तरह पड़ रहा है.
जून महीने में बाजार इस बात पर चर्चा कर रहा था कि RBI के नए नियमों से किस एक्सचेंज के ऑप्शंस कारोबार पर सबसे अधिक असर पड़ेगा. लेकिन संभव है कि यह सवाल ही गलत था.
असल मुद्दा कभी ऑप्शंस बनाम फ्यूचर्स नहीं था. वास्तविक सवाल यह था कि कौन-से बाजार प्रतिभागी अपनी बैलेंस शीट के लिए सबसे अधिक बैंक गारंटी और बैंक-आधारित कोलेटरल पर निर्भर थे. और इस पैमाने पर देखा जाए, तो MCX शुरुआत से ही सबसे आगे था.
दिसंबर 2025 तक के मार्जिन आंकड़ों का स्रोत: ICCL, NCL और MCXCCL.
BSE के नकद मार्जिन का अनुमान कुल मार्जिन के 2% के आधार पर लगाया गया है, क्योंकि ICCL नकद, फिक्स्ड डिपॉजिट और बैंक गारंटी को एक साथ दर्शाता है.
NSE के आंकड़े उद्योग के कुल आंकड़ों में से BSE और MCX के आंकड़े घटाकर निकाले गए हैं.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)