अगस्त में सेवा क्षेत्र की गतिविधियों में सुधार से निजी क्षेत्र को मिला सहारा, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग की रफ्तार लगातार कमजोर पड़ी
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
भारत की अर्थव्यवस्था में अगस्त के दौरान निजी क्षेत्र की कारोबारी गतिविधियों में मामूली सुधार देखने को मिला है. हालांकि, इस सुधार का मुख्य आधार सेवा क्षेत्र रहा, जबकि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ पांच साल के सबसे कमजोर स्तर पर पहुंच गई. शुक्रवार को जारी HSBC के फ्लैश PMI सर्वे के अनुसार, सर्विसेज PMI बढ़कर 54.5 हो गया, जबकि मैन्युफैक्चरिंग PMI घटकर 52.9 पर आ गया.
S&P Global द्वारा तैयार HSBC Flash India Composite PMI अगस्त में 54.6 रहा, जो जुलाई में 54.3 था. हालांकि सूचकांक लगातार 61वें महीने 50 के स्तर से ऊपर बना हुआ है, लेकिन अगस्त का आंकड़ा मार्च 2022 के बाद दूसरा सबसे कमजोर स्तर है. PMI का 50 से ऊपर रहना कारोबारी गतिविधियों में विस्तार और 50 से नीचे रहना गिरावट का संकेत देता है.
सर्विसेज में सुधार, मैन्युफैक्चरिंग पर बढ़ा दबाव
अगस्त में सेवा क्षेत्र की कारोबारी गतिविधियों में जुलाई के मुकाबले सुधार हुआ. HSBC Flash India Services PMI Business Activity Index जुलाई के 53.3 से बढ़कर 54.5 पर पहुंच गया. इससे निजी क्षेत्र की कुल गतिविधियों को सहारा मिला. इसके उलट मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में सुस्ती और गहरी हो गई. HSBC Flash India Manufacturing PMI जुलाई के 53.5 से घटकर अगस्त में 52.9 रह गया. उत्पादन और नए ऑर्डर की वृद्धि पांच साल में सबसे कमजोर स्तर पर पहुंच गई.
नए ऑर्डर बढ़े, लेकिन ग्रोथ की रफ्तार रही धीमी
सर्वे के अनुसार, अगस्त में नए ऑर्डर में बढ़ोतरी जारी रही, लेकिन इसकी गति हाल के वर्षों की तुलना में कमजोर रही. सेवा क्षेत्र में मांग में सुधार ने कारोबारी गतिविधियों को गति दी, जबकि मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए उत्पादन और नए ऑर्डर की रफ्तार धीमी पड़ती दिखाई दी.
HSBC की भारत की मुख्य अर्थशास्त्री प्रांजल भंडारी ने कहा कि निजी क्षेत्र के कुल उत्पादन में वृद्धि मोटे तौर पर स्थिर रही और इसे सेवा क्षेत्र की बेहतर गतिविधियों का समर्थन मिला. वहीं, मैन्युफैक्चरिंग में उत्पादन और नए ऑर्डर की वृद्धि की रफ्तार कमजोर हुई है.
रोजगार में सुधार, सेवा क्षेत्र में बढ़ी भर्तियां
सेवा क्षेत्र में बढ़ती मांग का असर रोजगार पर भी दिखाई दिया. कंपनियों ने कामकाज का दबाव संभालने के लिए नए कर्मचारियों की भर्ती बढ़ाई. सर्वे के मुताबिक, कुल रोजगार सृजन में सुधार मुख्य रूप से सर्विस सेक्टर के कारण हुआ. वहीं, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में कर्मचारियों की संख्या में करीब ढाई साल बाद पहली बार गिरावट दर्ज की गई, जो उद्योग क्षेत्र में बढ़ती सुस्ती का संकेत है.
लागत का दबाव कम, ग्राहकों पर बढ़ा बोझ
अगस्त में कंपनियों की इनपुट लागत में बढ़ोतरी की रफ्तार सात महीने के सबसे निचले स्तर पर रही. इसके बावजूद कंपनियों ने बिक्री कीमतों में अपेक्षाकृत तेज वृद्धि की. इससे संकेत मिलता है कि कंपनियां लागत का बड़ा हिस्सा ग्राहकों पर डालने की कोशिश कर रही हैं. मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के पास तैयार माल का स्टॉक ऊंचा बना रहा, जबकि कच्चे माल की खरीद की रफ्तार धीमी हुई.
कुल मिलाकर, अगस्त के PMI आंकड़े भारतीय निजी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में दो अलग-अलग तस्वीर पेश करते हैं. एक ओर सेवा क्षेत्र में सुधार से कारोबारी गतिविधियों को सहारा मिला, वहीं दूसरी ओर मैन्युफैक्चरिंग की कमजोर होती रफ्तार आने वाले महीनों में अर्थव्यवस्था की ग्रोथ के लिए चिंता का विषय बन सकती है.
हर साल 21 अगस्त को मनाया जाने वाला वर्ल्ड एंटरप्रेन्योर डे उन लोगों के योगदान को रेखांकित करता है, जो चुनौतियों में अवसर तलाशते हैं और नए विचारों को कारोबार में बदलने का जोखिम उठाते हैं.
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रितु राणा
भारत में उद्यमिता की तस्वीर तेजी से बदल रही है. आज उद्यमी सिर्फ अपना कारोबार खड़ा करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि रोजगार पैदा करने, स्थानीय कारीगरों और समुदायों को आर्थिक अवसर देने, टिकाऊ उत्पादों को बढ़ावा देने और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं. वर्ल्ड एंटरप्रेन्योर डे के मौके पर भूपेंद्र खनाल, लवली बबीश और विश्वम मोदी जैसे उद्यमियों की कहानियां दिखाती हैं कि सही विचार, डिजिटल प्लेटफॉर्म और कारोबारी मार्गदर्शन के साथ छोटे कारोबार भी बड़े बाजार तक पहुंच बना सकते हैं.
हर साल 21 अगस्त को मनाया जाने वाला वर्ल्ड एंटरप्रेन्योर डे उन लोगों के योगदान को रेखांकित करता है, जो चुनौतियों में अवसर तलाशते हैं और नए विचारों को कारोबार में बदलने का जोखिम उठाते हैं. भारत में इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि MSME सेक्टर देश की आर्थिक गतिविधियों और रोजगार में बड़ी भूमिका निभाता है. MSME मंत्रालय के अनुसार, यह क्षेत्र भारत के GDP में करीब 31.1 प्रतिशत और निर्यात में 48.5 प्रतिशत से अधिक योगदान देता है. साथ ही, यह 33.5 करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार देता है और कृषि के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा रोजगार देने वाला क्षेत्र है.
उद्यमिता से कारोबार के साथ सामाजिक बदलाव
देश के अलग-अलग हिस्सों में उभर रहे उद्यमी अपने कारोबार के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत कर रहे हैं. उनके उत्पाद पारंपरिक हुनर और स्थानीय संसाधनों को नए बाजारों से जोड़ रहे हैं. वहीं, वॉलमार्ट वृद्धि जैसी पहल उन्हें बिजनेस स्किल, डिजिटल कॉमर्स, मेंटरशिप और नए बाजारों तक पहुंच बनाने में मदद कर रही हैं.
ऐसे ही तीन उद्यमियों की यात्रा बताती है कि कारोबार की सफलता केवल राजस्व तक सीमित नहीं है. इसके जरिए रोजगार, स्थानीय समुदायों के लिए अवसर और टिकाऊ विकास का रास्ता भी तैयार किया जा सकता है.
हिमालय की पारंपरिक चीज को बनाया ग्लोबल पेट वेलनेस ब्रांड
Dogsee Chew के संस्थापक भूपेंद्र खनाल ने हिमालय की पारंपरिक चीज बनाने की प्रक्रिया से प्रेरणा लेकर अपने कारोबार की शुरुआत की. उनकी कंपनी ने इस पारंपरिक उत्पाद को आधुनिक पेट वेलनेस प्रोडक्ट में बदलकर ग्लोबल बाजार तक पहुंच बनाई. आज कंपनी के प्राकृतिक डॉग ट्रीट्स 30 से ज्यादा देशों में बेचे जाते हैं.
डिजिटल मार्केटप्लेस पर बढ़ती मौजूदगी ने भी कंपनी की ग्रोथ को गति दी है. पिछले एक साल में कंपनी का ग्लोबल ऑनलाइन कारोबार करीब 300 प्रतिशत बढ़ा है, जबकि ऑनलाइन बिक्री करीब 80 लाख रुपये से बढ़कर 4.2 करोड़ रुपये हो गई. अमेरिका में Walmart Marketplace के जरिए कंपनी हर महीने करीब 20 लाख रुपये की बिक्री कर रही है. वहीं, Flipkart के जरिए घरेलू कारोबार में 51 प्रतिशत की राजस्व वृद्धि दर्ज की गई है.
कंपनी का लक्ष्य इस वित्त वर्ष में 250 करोड़ रुपये का राजस्व हासिल करना है. इसके साथ ही कारोबार ने डेयरी समुदायों के लिए रोजगार और आय के अवसर पैदा किए हैं. अतिरिक्त चीज का इस्तेमाल कर कंपनी खाद्य अपव्यय कम करने में भी योगदान दे रही है.
पर्यावरण अनुकूल उत्पादों के जरिए महिलाओं और कारीगरों को अवसर
Beetroots Eco Living की संस्थापक लवली बबीश ने पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली को बढ़ावा देने के उद्देश्य से अपना कारोबार शुरू किया. उनका ब्रांड नारियल के खोल, बांस और अन्य प्राकृतिक सामग्रियों से टिकाऊ जीवनशैली से जुड़े उत्पाद तैयार करता है.
कंपनी महिला स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय कारीगरों के साथ मिलकर काम करती है. इससे इन समूहों को रोजगार और कमाई के अवसर मिलते हैं. वॉलमार्ट वृद्धि से जुड़ने के बाद कंपनी ने अपने कारोबार को अधिक व्यवस्थित किया और डिजिटल माध्यमों पर अपनी मौजूदगी मजबूत की.
2023 में करीब 50,000 रुपये के राजस्व से शुरुआत करने वाली कंपनी की कमाई 2025 तक 25 गुना बढ़ गई. Flipkart ने भी इस वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और कंपनी की कुल बिक्री में करीब 30 प्रतिशत योगदान दिया. बांस के बाथ टॉवल, नारियल के खोल से बने बाउल और पर्यावरण अनुकूल डेकोर आइटम इसके प्रमुख उत्पादों में शामिल हैं.
छोटे फ्रेगरेंस ब्रांड को डिजिटल मार्केटप्लेस से मिली रफ्तार
Bazuki Perfumes के संस्थापक विश्वम मोदी ने भारत में अपना फ्रेगरेंस ब्रांड खड़ा करने के विचार के साथ कारोबार शुरू किया. वॉलमार्ट वृद्धि से जुड़ने के बाद उन्होंने डिजिटल बिक्री और ऑनलाइन मार्केटप्लेस की क्षमता पर ज्यादा ध्यान दिया.
मेंटर की सलाह के बाद कंपनी ने विज्ञापन पर बड़े खर्च के बजाय पहले बिक्री और कारोबार की बुनियाद मजबूत करने पर फोकस किया. इसका असर कारोबार में भी दिखाई दिया. 2023 में करीब 30 लाख रुपये का कारोबार करने वाली Bazuki Perfumes की बिक्री 2024-25 में बढ़कर 70-80 लाख रुपये तक पहुंच गई. मई 2023 के मुकाबले ऑनलाइन और ऑफलाइन चैनलों की कुल बिक्री में करीब 1000 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई.
कंपनी के उत्पादों की संख्या भी शुरुआती 7-9 SKU से बढ़कर करीब 60 SKU हो गई है. फिलहाल ऑनलाइन मार्केटप्लेस कंपनी की कुल बिक्री में करीब 80 प्रतिशत योगदान देते हैं, जिसमें Flipkart की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत है. कार फ्रेशनर कंपनी के सबसे तेजी से बढ़ते उत्पादों में शामिल है और कुल बिक्री में इसका योगदान करीब 70 प्रतिशत है.
बदल रही है भारतीय उद्यमिता की तस्वीर
भूपेंद्र खनाल, लवली बबीश और विश्वम मोदी की कारोबारी यात्राएं अलग-अलग क्षेत्रों से आती हैं, लेकिन तीनों में एक समान सोच दिखाई देती है. इनका उद्देश्य सिर्फ कारोबार बढ़ाना नहीं, बल्कि रोजगार पैदा करना, स्थानीय समुदायों को आर्थिक अवसर देना, टिकाऊ उत्पादों को बढ़ावा देना और भारतीय MSME इकोसिस्टम को मजबूत करना भी है.
वर्ल्ड एंटरप्रेन्योर डे पर इन उद्यमियों की कहानियां भारत में बदलती उद्यमिता की तस्वीर पेश करती हैं. अब कारोबार की सफलता को सिर्फ राजस्व और मुनाफे से नहीं, बल्कि उससे पैदा होने वाले रोजगार, सामाजिक प्रभाव और लंबे समय तक बनाए जाने वाले आर्थिक मूल्य से भी जोड़ा जा रहा है. यही बदलाव भारत की नई ग्रोथ स्टोरी को आकार दे रहा है.
1.20 करोड़ यात्रियों ने की घरेलू उड़ानों से यात्रा, Akasa Air का लोड फैक्टर सबसे ज्यादा 91.9%
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के घरेलू विमानन क्षेत्र में जुलाई 2026 में यात्री यातायात में सालाना आधार पर 4.8 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई. हालांकि, यात्रियों की संख्या घटने के बावजूद एयरलाइंस ने सीटों का बेहतर इस्तेमाल किया. नागर विमानन महानिदेशालय (DGCA) के आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई में घरेलू एयरलाइंस ने करीब 1.20 करोड़ यात्रियों को उड़ान सेवा दी, जबकि एक साल पहले इसी महीने में यह आंकड़ा करीब 1.26 करोड़ था.
IndiGo की बाजार हिस्सेदारी 67.4%
घरेलू विमानन बाजार में IndiGo का दबदबा जुलाई में भी कायम रहा. एयरलाइन ने महीने के दौरान 80.82 लाख यात्रियों को उड़ान सेवा दी और कुल घरेलू यात्री यातायात में इसकी हिस्सेदारी 67.4 फीसदी रही. Air India और Air India Express को मिलाकर बने Air India Group ने जुलाई में 28.75 लाख यात्रियों को सफर कराया. दोनों एयरलाइंस की संयुक्त बाजार हिस्सेदारी 24 फीसदी रही. वहीं, Akasa Air ने 6.65 लाख यात्रियों के साथ 5.5 फीसदी बाजार हिस्सेदारी हासिल की.
SpiceJet की बाजार हिस्सेदारी 1.6 फीसदी रही. इसके अलावा Star Air की 0.7 फीसदी, Fly91 की 0.5 फीसदी, Alliance Air की 0.4 फीसदी और IndiaOne Air की हिस्सेदारी 0.1 फीसदी से कम रही. इस तरह IndiGo और Air India Group ने मिलकर जुलाई में घरेलू हवाई यातायात का 90 फीसदी से अधिक हिस्सा अपने नाम किया.
Akasa Air का लोड फैक्टर सबसे ज्यादा
यात्रियों की संख्या में गिरावट के बावजूद एयरलाइंस ने विमानों में उपलब्ध सीटों का अच्छा इस्तेमाल किया. जुलाई में Akasa Air का पैसेंजर लोड फैक्टर सबसे अधिक 91.9 फीसदी रहा. इसके बाद SpiceJet का 84.1 फीसदी, Air India Group का 83.2 फीसदी और IndiGo का 82.4 फीसदी रहा. लोड फैक्टर से पता चलता है कि किसी एयरलाइन की उपलब्ध सीटों में से कितनी सीटों पर यात्रियों ने यात्रा की.
0.62% रही उड़ानों की कैंसिलेशन दर
DGCA के आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई में निर्धारित घरेलू एयरलाइंस की कुल कैंसिलेशन दर 0.62 फीसदी रही. इनमें तकनीकी कारण सबसे बड़ी वजह रहे, जिनकी हिस्सेदारी 39.9 फीसदी थी. परिचालन संबंधी कारणों से 27.4 फीसदी उड़ानें रद्द हुईं, जबकि मौसम संबंधी कारणों की हिस्सेदारी 22.7 फीसदी रही. जुलाई में एयरलाइंस को यात्रियों से कुल 2,196 शिकायतें मिलीं. यह प्रति 10,000 यात्रियों पर करीब 1.83 शिकायत के बराबर है.
समय पर उड़ान के मामले में भी IndiGo आगे
देश के 10 सबसे व्यस्त हवाई अड्डों पर प्रमुख घरेलू एयरलाइंस के बीच समय पर उड़ान भरने के मामले में IndiGo सबसे आगे रही. जुलाई में उसका ऑन-टाइम परफॉर्मेंस (OTP) 91.2 फीसदी रहा. Akasa Air 90.8 फीसदी OTP के साथ दूसरे स्थान पर रही, जबकि Air India Group का OTP 88.5 फीसदी रहा. Alliance Air का OTP 76 फीसदी और SpiceJet का 34.6 फीसदी रहा.
हवाई अड्डों की बात करें तो चेन्नई एयरपोर्ट ने 96.7 फीसदी के साथ सबसे बेहतर ऑन-टाइम परफॉर्मेंस दर्ज किया. इसके बाद बेंगलुरु 94 फीसदी और हैदराबाद 92.4 फीसदी के साथ रहे.
उड़ानों में देरी की सबसे बड़ी वजह 'रिएक्शनरी' कारण
जुलाई में उड़ानों में देरी की सबसे बड़ी वजह रिएक्शनरी कारण रहे. कुल देरी में इनकी हिस्सेदारी 65 फीसदी रही. परिचालन संबंधी और एयर ट्रैफिक कंट्रोल से जुड़ी समस्याओं की हिस्सेदारी 7-7 फीसदी रही.
तकनीकी और मौसम संबंधी कारणों से होने वाली देरी की हिस्सेदारी 6-6 फीसदी रही. यात्रियों से जुड़े कारण 3 फीसदी, एयरपोर्ट से संबंधित कारण 2 फीसदी और रैंप से जुड़े कारण 1 फीसदी रहे. बाकी 3 फीसदी देरी अन्य कारणों से हुई.
क्षमता में संतुलित बढ़ोतरी से यातायात पर असर
जुलाई में घरेलू हवाई यातायात में गिरावट के पीछे यात्रा गतिविधियों में मौसमी नरमी और एयरलाइंस की ओर से क्षमता को नियंत्रित तरीके से बढ़ाना प्रमुख कारण रहे. हालांकि, मजबूत पैसेंजर लोड फैक्टर से संकेत मिलता है कि उपलब्ध सीटों का इस्तेमाल अभी भी बेहतर स्तर पर हुआ, भले ही कुल यात्री यातायात में सालाना आधार पर कमी दर्ज की गई.
सेबी ने 20 अगस्त से डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित Power of Attorney जमा करने की दी मंजूरी, नोटरीकरण, अपोस्टिलाइजेशन और कॉन्सुलराइजेशन की जरूरत नहीं होगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (Sebi) ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) के लिए दस्तावेजी प्रक्रिया को आसान बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. सेबी ने FPIs को अब डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित पावर ऑफ एटोनॉमी (PoA) दस्तावेज जमा करने की अनुमति दे दी है. नई व्यवस्था के तहत ऐसे दस्तावेजों के लिए नोटरीकरण, अपोस्टिलाइजेशन या कॉन्सुलराइजेशन की जरूरत नहीं होगी. यह व्यवस्था 20 अगस्त 2026 से लागू हो गई है और इसका उद्देश्य विदेशी निवेशकों के लिए FPI ऑनबोर्डिंग प्रक्रिया को तेज और आसान बनाना है.
डिजिटल PoA के लिए क्या है नियम
नई व्यवस्था के तहत FPIs अपने कस्टोडियन के पक्ष में जारी PoA डिजिटल रूप से जमा कर सकेंगे. दस्तावेज में पता स्पष्ट रूप से दर्ज होना चाहिए और PoA पर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के प्रावधानों के अनुरूप डिजिटल हस्ताक्षर किए जाने जरूरी होंगे. हालांकि, डिजिटल PoA का विकल्प मौजूदा प्रक्रिया के साथ-साथ उपलब्ध रहेगा. यानी विदेशी निवेशक पहले की तरह नोटरीकृत, अपोस्टिलाइज्ड या कॉन्सुलराइज्ड PoA दस्तावेज भी जमा कर सकेंगे.
FPI ऑनबोर्डिंग में कम होगी कागजी प्रक्रिया
सेबी के मुताबिक, डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित PoA को मंजूरी देने से नोटरीकरण, अपोस्टिलाइजेशन और कॉन्सुलराइजेशन जैसी अतिरिक्त प्रमाणिकता प्रक्रियाओं की जरूरत खत्म होगी. इससे विदेशी निवेशकों के दस्तावेज पूरे करने और भारतीय पूंजी बाजार में निवेश शुरू करने में लगने वाला समय कम होने की उम्मीद है.
इस कदम से विदेशी निवेशकों के लिए PoA तैयार करने और जमा करने की प्रक्रिया भी डिजिटल हो जाएगी. इससे भौतिक दस्तावेजों और उनके प्रमाणीकरण पर निर्भरता कम होगी.
डिजिटल ऑनबोर्डिंग को बढ़ावा दे रहा सेबी
डिजिटल PoA की अनुमति सेबी की FPI रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया को डिजिटल बनाने की व्यापक पहल का हिस्सा है. नियामक पहले ही FPI रजिस्ट्रेशन के लिए कॉमन एप्लीकेशन फोरम (CAF) की शुरुआत कर चुका है. इसके अलावा PAN, बैंक अकाउंट और डीमैट अकाउंट से जुड़ी प्रक्रियाओं को भी डिजिटल माध्यम से आसान बनाया गया है.
सेबी ने CAF और अन्य रजिस्ट्रेशन दस्तावेजों पर भारतीय डिजिटल हस्ताक्षर के इस्तेमाल की अनुमति भी दी है. CAF पोर्टल के जरिए डिजिटल हस्ताक्षर की सुविधा देने के साथ-साथ स्कैन की गई प्रतियों के आधार पर FPI रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को भी आसान बनाया गया है.
मास्टर सर्कुलर में किया गया बदलाव
डिजिटल PoA से जुड़ा यह बदलाव FPIs, निर्दिष्ट डिपॉजिटरी प्रतिभागी. (DDPs) और Eligible Foreign Investors (EFIs) के लिए जारी सेबी के मास्टर सर्कुलर में संबंधित प्रावधान में संशोधन के जरिए किया गया है.
सेबी ने यह सर्कुलर Securities and Exchange Board of India Act, 1992 और Sebi (Foreign Portfolio Investors) Regulations, 2019 के तहत अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए जारी किया है. नियामक के अनुसार, इस कदम का उद्देश्य निवेशकों के हितों की रक्षा करते हुए प्रतिभूति बाजार के विकास और बेहतर नियमन को बढ़ावा देना है.
टाटा ग्रुप समर्थित Nelco 2027 के अंत तक करेगी D2D सेवा का ट्रायल, रेगुलेटरी मंजूरी और स्पेक्ट्रम उपलब्धता के आधार पर होगा कमर्शियल लॉन्च
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
टाटा ग्रुप (Tata Group) समर्थित नेल्को (Nelco) भारत के उभरते डायरेक्ट टू डिवाइस (D2D) सैटेलाइट कम्युनिकेशन बाजार में उतरने की तैयारी कर रही है. कंपनी की योजना 2028 की शुरुआत तक भारत और दक्षिण एशिया के चुनिंदा बाजारों में D2D सैटेलाइट कनेक्टिविटी सेवाएं शुरू करने की है. हालांकि, इसका कमर्शियल लॉन्च रेगुलेटरी मंजूरी और स्पेक्ट्रम की उपलब्धता पर निर्भर करेगा. कंपनी 2027 के अंत तक इन सेवाओं का ट्रायल शुरू करने की तैयारी कर रही है.
भारत के साथ बांग्लादेश और श्रीलंका पर नजर
Nelco के D2D ऑफरिंग के शुरुआती बाजारों में भारत के साथ बांग्लादेश और श्रीलंका भी शामिल हो सकते हैं. D2D तकनीक के जरिए मोबाइल फोन और अन्य डिवाइस सीधे सैटेलाइट नेटवर्क से कनेक्ट हो सकेंगे. कंपनी का मानना है कि आने वाले 7 से 10 वर्षों में यह सैटेलाइट कम्युनिकेशन बाजार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है.
कंपनी की रणनीति को उसके Lunar Holdco Inc में किए गए 2 करोड़ डॉलर के निवेश से भी मजबूती मिली है. Lunar Holdco एक सैटेलाइट मोबाइल कनेक्टिविटी कंपनी है, जो Elveo Mobile ब्रांड के तहत काम करती है. Nelco के MD और CEO पीजे नाथ के मुताबिक, इस निवेश का उद्देश्य कंपनी को केवल सैटेलाइट सेवाओं के वितरक के बजाय D2D इकोसिस्टम में एक रणनीतिक भागीदार के रूप में स्थापित करना है.
खुद का सैटेलाइट कंस्टीलेशन बनाने की योजना नहीं
कंपनी अरबों डॉलर खर्च करके अपना खुद का सैटेलाइट कंस्टीलेशन बनाने के बजाय पार्टनरशिप के जरिए इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है. Nelco का फोकस व्यापक सैटेलाइट कनेक्टिविटी इकोसिस्टम में योगदान देने पर है. कंपनी D2D के इस्तेमाल के लिए IoT, स्मार्ट एग्रीकल्चर, एसेट मॉनिटरिंग, कनेक्टेड व्हीकल और समुद्री संचार जैसे क्षेत्रों की संभावनाएं तलाश रही है. शुरुआती स्तर पर Nelco का कारोबार मुख्य रूप से B2B और B2G मॉडल पर केंद्रित रहेगा. इसके तहत कंपनी सीधे ग्राहकों को सेवाएं देने के बजाय टेलीकॉम ऑपरेटरों के साथ मिलकर काम करेगी.
रेगुलेशन और स्पेक्ट्रम से तय होगी लॉन्च की टाइमलाइन
भारत में D2D सेवाओं की शुरुआत काफी हद तक सैटेलाइट कम्युनिकेशन के लिए तैयार किए जा रहे रेगुलेटरी और स्पेक्ट्रम फ्रेमवर्क पर निर्भर करेगी. भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI) सैटेलाइट कम्युनिकेशन नेटवर्क के प्रस्तावित ऑथराइजेशन फ्रेमवर्क के तहत D2D सेवाओं पर इंडस्ट्री से सुझाव मांग रहा है.
D2D सेवाओं के लिए मोबाइल सैटेलाइट सर्विस स्पेक्ट्रम या टेरेस्ट्रियल मोबाइल स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल किया जा सकता है. अगर टेरेस्ट्रियल स्पेक्ट्रम का उपयोग होता है, तो मौजूदा टेलीकॉम ऑपरेटरों के साथ सहयोग जरूरी होगा.
Nelco के मुताबिक, सैटेलाइट कनेक्टिविटी को टेरेस्ट्रियल नेटवर्क के विकल्प के बजाय उसके विस्तार के रूप में देखा जा सकता है. खासकर दूरदराज के इलाकों, पहाड़ी क्षेत्रों और प्राकृतिक आपदा से प्रभावित जगहों पर इसका इस्तेमाल महत्वपूर्ण हो सकता है, जहां पारंपरिक नेटवर्क स्थापित करना मुश्किल या महंगा होता है.
GEO, LEO और MEO के साथ मल्टी-ऑर्बिट रणनीति
D2D Nelco की व्यापक सैटेलाइट रणनीति का सिर्फ एक हिस्सा है. कंपनी ऑर्बिट-एग्नोस्टिक रणनीति पर काम कर रही है, जिसमें ग्राहकों की जरूरत के मुताबिक GEO, LEO और MEO सैटेलाइट के साथ D2D और टेरेस्ट्रियल नेटवर्क को जोड़ा जाएगा.
पीजे नाथ ने कहा कि LEO ब्रॉडबैंड सेवाओं के लॉन्च में देरी से भारतीय सैटेलाइट कम्युनिकेशन बाजार में नए अवसरों की रफ्तार प्रभावित हुई है. हालांकि, Nelco कई LEO ऑपरेटरों के साथ बातचीत जारी रखे हुए है और रेगुलेशन तथा बाजार की परिस्थितियों को देखते हुए संभावित साझेदारियों का आकलन कर रही है.
Reliance Jio समेत बढ़ती प्रतिस्पर्धा को सकारात्मक मानती है कंपनी
सैटेलाइट कम्युनिकेशन क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा को Nelco सकारात्मक रूप में देखती है. Reliance Jio समेत कई कंपनियां इस क्षेत्र में उतरने की तैयारी कर रही हैं. Nelco का मानना है कि भारत जैसे बड़े बाजार में कई सैटेलाइट कनेक्टिविटी प्रदाताओं के लिए पर्याप्त अवसर मौजूद हैं.
कंपनी के अनुसार, सैटेलाइट कम्युनिकेशन का अगला चरण टेरेस्ट्रियल नेटवर्क को खत्म करने के बजाय अलग-अलग तकनीकों को एक साथ जोड़कर कनेक्टिविटी का विस्तार करने का होगा. ऐसे में रेगुलेटरी स्पष्टता के साथ D2D आने वाले वर्षों में भारत और दक्षिण एशिया के कम्युनिकेशन बाजार में एक अहम ग्रोथ सेगमेंट बन सकता है.
नए आधार वर्ष वाली सीरीज में बुनियादी उद्योगों की वृद्धि जून के 6% से घटकर 5.4% पर आई, रिफाइनरी, कोयला और सीमेंट ने संभाली रफ्तार
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश के नौ प्रमुख बुनियादी उद्योगों की वृद्धि दर जुलाई 2026 में घटकर 5.4 फीसदी रह गई, जबकि जून में संशोधित आंकड़ों के अनुसार यह 6 फीसदी थी. वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई में बिजली और लौह अयस्क उत्पादन की रफ्तार में कमी का असर कोर सेक्टर की कुल वृद्धि पर पड़ा. हालांकि, रिफाइनरी उत्पादों के उत्पादन में सुधार के साथ कोयला और सीमेंट क्षेत्र की बेहतर ग्रोथ ने गिरावट को कुछ हद तक सीमित किया.
नई सीरीज का दूसरा आंकड़ा
जुलाई का आंकड़ा नए आधार वर्ष 2022-23 पर आधारित संशोधित बुनियादी उद्योग सूचकांक (ICI) का दूसरा आंकड़ा है. नई सीरीज ने 2011-12 आधार वर्ष वाली पुरानी सीरीज की जगह ली है. इसमें लौह अयस्क को शामिल किए जाने के बाद प्रमुख बुनियादी उद्योगों की संख्या आठ से बढ़कर नौ हो गई है. जुलाई में इन नौ उद्योगों का समग्र सूचकांक बढ़कर 121.2 हो गया, जो जून में 120.7 था.
बिजली और लौह अयस्क की ग्रोथ में गिरावट
कोर सेक्टर इंडेक्स में 30.9 फीसदी की सबसे अधिक हिस्सेदारी रखने वाले बिजली क्षेत्र की वृद्धि दर जुलाई में घटकर 9 फीसदी रह गई, जबकि जून में यह 11.4 फीसदी थी. वहीं, 4.9 फीसदी भारांश वाले लौह अयस्क क्षेत्र की वृद्धि दर जून के 44.5 फीसदी से घटकर जुलाई में 29.5 फीसदी रह गई. लौह अयस्क उत्पादन की रफ्तार में आई इस बड़ी कमी का कुल कोर सेक्टर ग्रोथ पर खासा असर पड़ा.
रिफाइनरी उत्पादन में लौटी तेजी
जुलाई में नौ में से छह प्रमुख उद्योगों में सकारात्मक वृद्धि दर्ज की गई. इनमें लौह अयस्क, बिजली, सीमेंट, इस्पात, रिफाइनरी उत्पाद और कोयला शामिल हैं. दूसरी ओर, प्राकृतिक गैस, कच्चे तेल और उर्वरक उत्पादन में गिरावट रही.
रिफाइनरी उत्पादों का प्रदर्शन खास तौर पर बेहतर रहा. लगातार तीन महीनों की गिरावट के बाद जुलाई में रिफाइनरी उत्पादन 2.7 फीसदी बढ़ा. जून में इसमें 4 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी. वहीं, कोयला और सीमेंट उत्पादन में तेजी ने भी कोर सेक्टर की कुल वृद्धि को सहारा दिया.
अप्रैल-जुलाई में 4.3% बढ़ा कोर सेक्टर
अप्रैल-जुलाई 2026 के दौरान नौ प्रमुख बुनियादी उद्योगों का संचयी सूचकांक 4.3 फीसदी बढ़ा. पिछले साल की समान अवधि में इसमें 1.5 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई थी. इससे संकेत मिलता है कि चालू वित्त वर्ष के शुरुआती महीनों में बुनियादी उद्योगों का प्रदर्शन पिछले साल की तुलना में बेहतर रहा है, हालांकि जुलाई में वृद्धि की रफ्तार कुछ धीमी पड़ी है.
16 साल के उच्च स्तर पर पहुंची चीनी की कीमतों के बीच सरकार ने लिया फैसला, 31 अक्टूबर 2026 तक किया जा सकेगा आयात
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
घरेलू बाजार में चीनी की लगातार बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. सरकार ने 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दे दी है. यह फैसला ऐसे समय आया है जब घरेलू बाजार में चीनी की कीमतें 16 साल के उच्च स्तर पर पहुंच गई हैं और आगामी त्योहारी सीजन में मांग बढ़ने की संभावना है. सरकार की ओर से जारी अधिसूचना के मुताबिक, कच्ची चीनी का आयात 31 अक्टूबर 2026 तक किया जा सकेगा. फिलहाल भारत कच्ची चीनी के आयात पर 100 फीसदी शुल्क लगाता है.
16 साल के हाई पर चीनी की कीमत
चीनी की कीमतों में हाल के दिनों में तेज उछाल देखने को मिला है. NCDEX के आंकड़ों के मुताबिक, 19 अगस्त 2026 को देश के प्रमुख बाजारों में हाजिर चीनी की कीमत बढ़कर 5,530 रुपये प्रति क्विंटल हो गई, जो करीब 16 साल का उच्च स्तर है. वहीं, एक उद्योग संगठन के अनुसार 18 अगस्त को देशभर में चीनी की औसत एक्स-मिल कीमत 5,400-5,500 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई, जबकि एक साल पहले यह करीब 3,900 रुपये प्रति क्विंटल थी. उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 18 अगस्त तक खुदरा चीनी की कीमत सालाना आधार पर करीब 13 फीसदी बढ़कर 52.30 रुपये प्रति किलो हो गई.
त्योहारी सीजन से पहले बढ़ी चिंता
अगस्त से नवंबर के बीच चीनी की मांग आमतौर पर बढ़ जाती है. इस अवधि में गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे प्रमुख त्योहार आते हैं. ऐसे में सरकार के सामने घरेलू बाजार में पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखने और कीमतों को नियंत्रित करने की चुनौती है. शुल्क-मुक्त आयात के फैसले से बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाने और कीमतों पर दबाव कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है.
जमाखोरी रोकने के लिए भी सख्ती
चीनी की कीमतों पर नियंत्रण के लिए सरकार ने इससे पहले थोक खरीदारों के स्टॉक पर भी सीमा तय की है. खाद्य मंत्रालय के आदेश के मुताबिक, हर महीने 10 टन से ज्यादा चीनी की खपत करने वाले थोक उपभोक्ता 15 दिनों की खपत से अधिक स्टॉक नहीं रख सकेंगे. यह आदेश 1 सितंबर से लागू होगा और 30 नवंबर 2026 तक प्रभावी रहेगा. इसके दायरे में कन्फेक्शनरी कंपनियां, सॉफ्ट ड्रिंक निर्माता, फूड प्रोसेसिंग यूनिट, मिठाई विक्रेता और अन्य संस्थागत खरीदार शामिल हैं.
चीनी की कमी की आशंका क्यों बढ़ी?
घरेलू बाजार में चीनी की कीमतों में तेजी के पीछे सीमित उपलब्धता की आशंका भी एक प्रमुख कारण है. भारत ने नवंबर 2025 में 15 लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति दी थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 20 लाख टन कर दिया गया. उद्योग के अनुमान के मुताबिक, इसमें से करीब 8 लाख टन चीनी का निर्यात हो चुका है. ऐसे में घरेलू खपत और निर्यात दोनों को देखते हुए सीजन के अंत में बचने वाले स्टॉक को लेकर चिंता बढ़ी है.
अनुमानों के मुताबिक, 2025-26 सीजन की शुरुआत में करीब 47 लाख टन का शुरुआती स्टॉक था, जबकि एथेनॉल के लिए इस्तेमाल की गई चीनी को घटाने के बाद वास्तविक शुद्ध उत्पादन करीब 2.79 करोड़ टन रहा. घरेलू खपत करीब 2.8 करोड़ टन रहने का अनुमान है. निर्यात को भी शामिल करने पर सीजन के अंत में बचने वाला स्टॉक घटकर करीब 35-39 लाख टन रह सकता है.
चीनी मिलों के लिए क्या होगा असर?
सरकार के इस फैसले से घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ने की उम्मीद है, जिससे कीमतों में नरमी आ सकती है. हालांकि, कीमतों में गिरावट के बावजूद चीनी मिलों के लिए मार्जिन पूरी तरह खत्म होने की संभावना नहीं है. विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर कीमतों में करीब 500 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट भी आती है, तो भी कीमतें उत्पादन लागत से ऊपर रह सकती हैं. इससे मिलों को गन्ना किसानों का बकाया चुकाने में मदद मिल सकती है.
साथ ही, शुल्क-मुक्त आयात से चीनी मिलों और कारोबारियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार से कच्ची चीनी मंगाने का अवसर भी मिलेगा. इससे घरेलू आपूर्ति में कमी की आशंका को कम करने और त्योहारी सीजन में कीमतों को नियंत्रित रखने में सरकार को मदद मिल सकती है.
गुरुवार को सेंसेक्स चार कारोबारी सत्रों की गिरावट के बाद 628.04 अंक चढ़कर 77,537.72 के स्तर पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 153.55 अंक की तेजी के साथ 24,231.85 पर पहुंच गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
लगातार कई दिनों की गिरावट के बाद घरेलू शेयर बाजार में गुरुवार को जोरदार वापसी देखने को मिली. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स चार कारोबारी सत्रों की गिरावट के बाद 628.04 अंक यानी 0.82 फीसदी चढ़कर 77,537.72 के स्तर पर बंद हुआ. वहीं, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी 153.55 अंक यानी 0.64 फीसदी की तेजी के साथ 24,231.85 पर पहुंच गया और लगातार सात सत्रों से जारी गिरावट का सिलसिला भी थम गया.
अब आज बाजार खुलने के साथ निवेशकों की नजर इस बात पर रहेगी कि गुरुवार की मजबूत रिकवरी आगे भी जारी रहती है या फिर ऊपरी स्तरों पर मुनाफावसूली बाजार पर दबाव बनाएगी. अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में नरमी और शॉर्ट कवरिंग ने पिछले सत्र में घरेलू बाजार के सेंटीमेंट को सहारा दिया था. इसके अलावा कई कंपनियों से जुड़े बड़े ऑर्डर, ब्लॉक डील, मैनेजमेंट बदलाव और रेगुलेटरी अपडेट भी आज शेयरों की चाल तय कर सकते हैं.
इटरनल समेत इन शेयरों में रही जोरदार तेजी
गुरुवार के कारोबारी सत्र में सेंसेक्स के 30 में से 26 शेयर बढ़त के साथ बंद हुए. सबसे ज्यादा तेजी इटरनल के शेयर में रही, जो 2.31 फीसदी चढ़कर 327.60 रुपये पर बंद हुआ. इसके अलावा कोटक महिंद्रा बैंक में 1.65 फीसदी, आईटीसी में 1.63 फीसदी, बजाज फाइनेंस में 1.53 फीसदी, एक्सिस बैंक में 1.46 फीसदी, इन्फोसिस में 1.18 फीसदी, पावरग्रिड में 1.07 फीसदी और भारती एयरटेल में 0.96 फीसदी की तेजी दर्ज की गई. वहीं, टाटा स्टील, इंडिगो, एचसीएल टेक और टाइटन गिरावट के साथ बंद हुए. टाटा स्टील में 0.41 फीसदी, इंडिगो में 0.24 फीसदी, एचसीएल टेक में 0.19 फीसदी और टाइटन में 0.04 फीसदी की कमजोरी रही.
इन वजहों से बाजार में लौटी तेजी
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, गुरुवार को घरेलू शेयर बाजार में तेजी के पीछे कई अहम कारण रहे. पिछले कई सत्रों की लगातार गिरावट के बाद निवेशकों ने निचले स्तरों पर खरीदारी की, जबकि शॉर्ट कवरिंग ने भी बाजार को मजबूत सहारा दिया. इसके अलावा अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में नरमी से निवेशकों का सेंटीमेंट बेहतर हुआ. बैंकिंग, फाइनेंशियल और चुनिंदा आईटी शेयरों में खरीदारी ने सेंसेक्स और निफ्टी की तेजी को और मजबूती दी. लगातार गिरावट के बाद बाजार में आई इस रिकवरी ने निवेशकों को राहत दी, हालांकि अब नजर इस बात पर रहेगी कि यह तेजी आज के कारोबार में भी कायम रह पाती है या नहीं.
आज इन शेयरों पर रहेगी खास नजर
आज Saatvik Green Energy के शेयर फोकस में रह सकते हैं. कंपनी की सब्सिडियरी Saatvik Solar Industries को करीब 190 करोड़ रुपये का सोलर फोटोवोल्टिक मॉड्यूल सप्लाई ऑर्डर मिला है. वहीं, RailTel को Western Coalfields से 164.78 करोड़ रुपये का वर्क ऑर्डर मिला है.
Torrent Power में भी अहम मैनेजमेंट बदलाव हुआ है. कंपनी के CFO सौरभ मशरूवाला ने पद से इस्तीफा दे दिया है और विकास पोद्दार को नया CFO नियुक्त किया गया है. दूसरी ओर, Lemon Tree Hotels ने गुजरात के भरूच में 85 कमरों वाला नया होटल शुरू किया है.
KFin Technologies में बड़ी ब्लॉक डील के बाद शेयर पर निवेशकों की नजर रहेगी. General Atlantic Singapore Fund ने कंपनी के करीब 1.51 करोड़ शेयर यानी 8.75 फीसदी हिस्सेदारी लगभग 1,400 करोड़ रुपये में बेची है. वहीं, Niva Bupa Health Insurance को EoM लिमिट के उल्लंघन पर IRDAI की चेतावनी मिली है और कंपनी को छह महीने तक नए बिजनेस स्थान खोलने से रोक दिया गया है.
Tata Motors Passenger Vehicles ने गुजरात के साणंद प्लांट में सामान्य परिचालन फिर शुरू होने की जानकारी दी है. भारी बारिश और बाढ़ के कारण यहां अस्थायी रूप से काम प्रभावित हुआ था. वहीं, Quant Mutual Fund ने Pfizer में करीब 131.25 करोड़ रुपये के अतिरिक्त शेयर खरीदे हैं, जिससे कंपनी के शेयर पर भी नजर बनी रहेगी.
इसके अलावा IndiGo ने जुलाई में घरेलू विमानन बाजार में 67.4 फीसदी हिस्सेदारी बनाए रखी. ऐसे में बाजार की समग्र दिशा के साथ-साथ इन कंपनियों से जुड़े ताजा अपडेट आज कारोबार के दौरान उनके शेयरों में हलचल बढ़ा सकते हैं.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
80 वर्ष के होने पर इंफोसिस के सह-संस्थापक की स्थायी विरासत भारतीय प्रतिभा, पारदर्शी शासन और पेशेवर प्रबंधन को वैश्विक स्तर पर विश्वसनीय बनाने में निहित है.
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डॉ. अनुराग बत्रा
एन आर नारायण मूर्ति आज यानी 20 अगस्त, 2026 को 80 वर्ष के हो गए हैं. 80वां जन्मदिन व्यक्तिगत उपलब्धि का एक पड़ाव है, लेकिन उनके मामले में यह भारत के आर्थिक इतिहास के एक निर्णायक अध्याय पर विचार करने का अवसर भी है. मूर्ति ने अकेले भारतीय आईटी का निर्माण नहीं किया. इस स्तर के किसी भी उद्योग का निर्माण कभी किसी एक व्यक्ति का काम नहीं होता. फिर भी, इसमें कोई संदेह नहीं कि वह उस विश्वसनीयता के प्रमुख वास्तुकारों में से एक थे, जो भारतीय प्रौद्योगिकी सेवाओं ने दुनिया भर में अर्जित की.
जब मूर्ति ने 1981 में Patni Computer Systems में काम करने के बाद छह साथी इंजीनियरों के साथ इंफोसिस (Infosys) की सह-स्थापना की, तब भारत का प्रौद्योगिकी क्षेत्र नया और सीमित था. TCS पहले से ही काम कर रही थी और अन्य अग्रदूत इसकी नींव रख रहे थे, लेकिन यह विचार कि कोई भारतीय कंपनी सॉफ्टवेयर प्रतिभा, प्रबंधन अनुशासन और डिलीवरी की गुणवत्ता के दम पर वैश्विक ग्राहकों को जीत सकती है, अभी बड़े पैमाने पर साबित होना बाकी था.
Infosys ने इसे साबित करने में मदद की.
सिर्फ एक कंपनी से कहीं अधिक
मूर्ति का योगदान केवल उस कंपनी के आकार में नहीं है, जिसे बनाने में उन्होंने मदद की, बल्कि उस उद्यम के मॉडल में भी है, जिसे उन्होंने बढ़ावा दिया. Infosys द्वारा शुरू किए गए ग्लोबल डिलीवरी मॉडल ने क्लाइंट लोकेशन और भारत में डेवलपमेंट सेंटर के बीच काम को बांटा, जिससे भारतीय कौशल और टाइम जोन प्रतिस्पर्धात्मक लाभ में बदल गए. इसने वैश्विक ग्राहकों को दिखाया कि भारतीय इंजीनियर जटिल असाइनमेंट को लगातार और बड़े पैमाने पर संभाल सकते हैं.
मूर्ति के नेतृत्व में Infosys कॉरपोरेट गवर्नेंस, वित्तीय खुलासे और पूर्वानुमानित निष्पादन के लिए भी एक मानक बन गई. 1999 में Nasdaq पर इसकी लिस्टिंग, जो किसी भारतीय आईटी कंपनी की पहली लिस्टिंग थी, ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों को एक महत्वपूर्ण संकेत दिया. इसके कर्मचारी स्टॉक ऑप्शन कार्यक्रम ने प्रमोटर समूह से आगे संपत्ति का बंटवारा किया और भारत के कुछ शुरुआती वेतनभोगी करोड़पतियों को बनाने में मदद की.
ये केवल कॉरपोरेट उपलब्धियां नहीं थीं. उन्होंने इस बात की अपेक्षाएं बढ़ाईं कि एक भारतीय उद्यम क्या बन सकता है.
यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रतिष्ठा एक आर्थिक संपत्ति है. हजारों मील दूर बैठे ग्राहक केवल कोड नहीं खरीद रहे थे. वे एक भारतीय कंपनी के लोगों, प्रक्रियाओं और वादों पर भरोसा कर रहे थे. मूर्ति ने शुरुआत में ही समझ लिया था कि इस भरोसे को बार-बार अर्जित करना होगा. उन्होंने केवल मूल्यवान कंपनी नहीं, बल्कि सम्मानित कंपनी बनाने की बात की. यह अंतर Infosys का केंद्रीय हिस्सा बन गया और भारतीय आईटी को संस्थागत विश्वसनीयता हासिल करने में मदद मिली.
संस्था निर्माण का अनुशासन
मूर्ति की व्यक्तिगत सादगी की अक्सर चर्चा होती है. इससे भी अधिक महत्वपूर्ण उनकी स्पष्टता थी. उन्होंने कठिन समस्याओं को अनुशासन, माप और क्रियान्वयन के माध्यम से हल करने का तरीका अपनाया और अपने आसपास के लोगों से भी उच्च मानकों की अपेक्षा की. उनके लिए पेशेवर उत्कृष्टता केवल एक आकांक्षा नहीं थी. यह एक अनुशासन था.
उनका नेतृत्व इस विश्वास को दर्शाता था कि उत्कृष्टता कोई कभी-कभार किया जाने वाला काम नहीं है. यह उन प्रणालियों से उभरती है, जो प्रदर्शन को दोहराने योग्य बनाती हैं और जवाबदेही को अनिवार्य बनाती हैं.
उस समय जब कई भारतीय कंपनियों की पहचान प्रमोटर परिवारों के साथ गहराई से जुड़ी हुई थी, Infosys ने पेशेवर प्रबंधन, मेरिटोक्रेसी, प्रक्रिया, पारदर्शिता, उत्तराधिकार और साझा स्वामित्व पर आधारित एक वैकल्पिक मॉडल को आगे बढ़ाया.
यही वजह है कि Infosys एक सफल कंपनी से कहीं अधिक बन गई. इसे एक संस्था के रूप में अध्ययन किया जाने लगा. इसने उद्यमियों की एक पीढ़ी को यह प्रमाण दिया कि भारत में जन्मी कंपनी महत्वाकांक्षी हो सकती है, बिना गवर्नेंस को छोड़े; अनुशासन से समझौता किए बिना बड़े पैमाने पर विस्तार कर सकती है और अपनी जड़ों को छिपाए बिना वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकती है.
Infosys से बड़ी विरासत
जैसे-जैसे भारतीय आईटी का विस्तार हुआ, मूर्ति भारतीय उद्यम के लिए एक सार्वजनिक आवाज भी बने. उन्होंने बेहतर शिक्षा, मजबूत संस्थानों, सक्षम नीतियों, बेहतर बुनियादी ढांचे और ऐसे सुधारों की वकालत की, जो भारतीय उद्यमियों को निर्माण और प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बनाएं.
उनके हस्तक्षेप अक्सर स्पष्ट और बेबाक रहे हैं. इस स्पष्टवादिता का यह भी मतलब रहा है कि उनके द्वारा व्यक्त हर विचार से सभी सहमत नहीं रहे हैं. खास तौर पर कार्य संस्कृति पर उनकी टिप्पणियों ने महत्वाकांक्षा, उत्पादकता और कर्मचारियों के कल्याण को लेकर बहस छेड़ी है. हर सुझाव को स्वीकार करना जरूरी नहीं है, लेकिन भारत के भविष्य के साथ जिस गंभीरता से वह लगातार जुड़े हुए हैं, उसे पहचानना जरूरी है.
इसलिए उनका योगदान कॉरपोरेट और संस्थागत, दोनों रहा है. उन्होंने यह साबित करने में मदद की कि भारतीय कंपनियां क्या हासिल कर सकती हैं और उस उपलब्धि से मिली विश्वसनीयता का इस्तेमाल अधिक सक्षम, नैतिक और प्रतिस्पर्धी भारत की वकालत करने के लिए किया.
आज भारतीय प्रौद्योगिकी कंपनियां महाद्वीपों में काम कर रही हैं, भारतीय इंजीनियर दुनिया भर में नेतृत्व के पदों पर हैं और आईटी सेवाएं भारत के सबसे महत्वपूर्ण निर्यात और कुशल रोजगार स्रोतों में बनी हुई हैं.
इस बदलाव के कई रचनाकार हैं. पूरे उद्योग के उदय का श्रेय एक व्यक्ति को देना गलत होगा. लेकिन इसके मानकों, महत्वाकांक्षा और आत्मविश्वास को आकार देने में मूर्ति की भूमिका को कम करके आंकना भी उतना ही गलत होगा.
80 वर्ष की उम्र में नारायण मूर्ति केवल एक सफल प्रौद्योगिकी कंपनी के सह-संस्थापक से कहीं अधिक हैं. वह एक संस्था निर्माता और भारतीय कॉरपोरेट जगत के लिए एक स्थायी संदर्भ बिंदु हैं.
उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि केवल Infosys का आकार या वैश्विक पहुंच नहीं है. यह वह आत्मविश्वास है, जिसे उन्होंने बनाने में मदद की: कि भारत में बनी, भारतीय इंजीनियरों द्वारा संचालित और वैश्विक मानकों के अनुसार संचालित कोई कंपनी दुनिया का भरोसा जीत सकती है.
वह आत्मविश्वास एक उद्योग बन गया. और उस उद्योग ने भारत को बदलने में मदद की.
डॉ. अन्नुराग बत्रा, BW रिपोर्टर्स
(लेखक BW Businessworld Group के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ तथा exchange4media Group के संस्थापक और एडिटर-इन-चीफ हैं.)
SBI रिसर्च के मुताबिक अगस्त में खुदरा महंगाई बढ़कर 4.7% हो सकती है. बेहतर मानसून और खरीफ फसलों की मजबूत बुवाई से साल के अंत में खाद्य महंगाई पर दबाव कम होने की उम्मीद
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में खुदरा महंगाई आने वाले महीनों में फिर बढ़ सकती है और अक्टूबर-नवंबर में यह 6 फीसदी के स्तर को पार कर सकती है. हालांकि, इसके बाद महंगाई में नरमी आने की उम्मीद है और वित्त वर्ष 2026-27 की चौथी तिमाही में यह करीब 5 फीसदी रह सकती है. भारतीय स्टेट बैंक की शोध रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई में 4.45 फीसदी रही उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई अगस्त में बढ़कर 4.7 फीसदी हो सकती है.
अक्टूबर-नवंबर में महंगाई बढ़ने का अनुमान
रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले महीनों में खुदरा महंगाई पर खाद्य कीमतों का दबाव बढ़ सकता है. इसके चलते अक्टूबर और नवंबर में महंगाई 6 फीसदी के पार जा सकती है. हालांकि, साल के आगे बढ़ने के साथ खाद्य आपूर्ति बेहतर होने से कीमतों पर दबाव कम होने की संभावना है. एसबीआई रिसर्च ने कहा कि मानसून की स्थिति में सुधार और खरीफ फसलों की मजबूत बुवाई आने वाले महीनों में खाद्य महंगाई को नियंत्रित करने में मदद कर सकती है.
बारिश में हुआ सुधार
जून में बारिश की कमी करीब 40 फीसदी थी, जो अब घटकर लगभग 13 फीसदी रह गई है. जुलाई में बारिश सामान्य से अधिक रही, जबकि अगस्त में अब तक मानसून सामान्य रहा है. खरीफ फसलों के तहत बोया गया क्षेत्र पिछले मौसम की तुलना में करीब 2 फीसदी कम है. इसके बावजूद कुछ प्रमुख खाद्यान्न उत्पादक राज्यों में सामान्य से कम बारिश के बीच भी बुवाई में अपेक्षाकृत मजबूती बनी हुई है. रिपोर्ट के मुताबिक, यह राज्यों में सिंचाई सुविधाओं में सुधार का संकेत देता है.
ऐतिहासिक रुझानों से भी संकेत मिलता है कि वित्त वर्ष 2026-27 की चौथी तिमाही में महंगाई मौजूदा अनुमानों से कम रह सकती है. साल आगे बढ़ने के साथ खाद्य आपूर्ति मजबूत होने से उपभोक्ता कीमतों पर बढ़ता दबाव कम होने की उम्मीद है.
महंगाई पर आरबीआई की नजर
महंगाई का रुख भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति के लिए भी महत्वपूर्ण रहेगा. आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने संकेत दिया है कि नीतिगत दरों में बदलाव को लेकर कोई नया फैसला लेने से पहले महंगाई की दिशा को लेकर अधिक स्पष्टता जरूरी होगी.
हाल की मौद्रिक नीति समिति की बैठक के विवरण के मुताबिक, मल्होत्रा ने कहा कि पहले की नरम महंगाई दरों के बाद अब कीमतों में सामान्य स्थिति लौटने के संकेत दिखाई दे रहे हैं. ऐसे में मौद्रिक नीति की आगे की दिशा तय करने से पहले और आंकड़ों का इंतजार करना उचित होगा. एसबीआई रिसर्च ने केंद्रीय बैंक के संचार को लेकर भी चिंता जताई है. रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले समय में मौद्रिक नीति के वास्तविक कदम आगे के संकेतों की तुलना में बाजार के लिए अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं. इनमें परिवर्तनीय दर वाली रिवर्स रेपो परिचालन और विदेशी मुद्रा अनिवासी जमा जुटाने की व्यवस्था जैसे कदम शामिल हैं.
वैश्विक बाजारों से भी जोखिम
रिपोर्ट में अमेरिकी ट्रेजरी बाजार में हो रहे बदलावों को भी वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है. अमेरिकी सरकार की ओर से लंबी अवधि के सरकारी कर्ज की पुनर्खरीद बढ़ाने जैसे कदमों से अमेरिकी ट्रेजरी की लंबी अवधि की प्रतिफल दरों को स्थिर रखने में मदद मिल सकती है और इसका असर वैश्विक बाजारों पर भी पड़ सकता है.
बेंचमार्क 10 वर्षीय अमेरिकी सरकारी बॉन्ड सहित लंबी अवधि की प्रतिफल दरों में गिरावट आई है. यह गिरावट अमेरिकी सरकार की छोटी और लंबी अवधि की परिपक्वता वाले कर्ज की आपूर्ति में संभावित बदलाव की उम्मीदों के बीच आई है.
मानसून और खाद्य आपूर्ति रहेगी अहम
भारत में आने वाले महीनों में महंगाई का रुख मुख्य रूप से खाद्य आपूर्ति और मानसून की स्थिति पर निर्भर करेगा. बेहतर बारिश और खरीफ उत्पादन में मजबूती से खाद्य कीमतों पर दबाव कम हो सकता है. वहीं, आरबीआई की मौद्रिक नीति की दिशा भी इस बात पर निर्भर करेगी कि आने वाले महीनों में महंगाई किस तरह आगे बढ़ती है. इसलिए अक्टूबर-नवंबर के दौरान महंगाई में संभावित उछाल के बाद चौथी तिमाही में इसमें आने वाली नरमी बाजार और केंद्रीय बैंक दोनों के लिए महत्वपूर्ण होगी.
विनिर्माण और थर्ड पार्टी लॉजिस्टिक्स की बढ़ती मांग से बाजार को मिला सहारा, मुंबई सबसे बड़ा बाजार बनकर उभरा; दूसरी छमाही में भी मजबूत मांग की उम्मीद
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के औद्योगिक और वेयरहाउसिंग क्षेत्र में मांग लगातार मजबूत बनी हुई है. नाइट फ्रैंक इंडिया की ‘इंडिया वेयरहाउसिंग मार्केट रिपोर्ट-एच1 2026’ के मुताबिक, 2026 की पहली छमाही में देश के आठ प्रमुख बाजारों में औद्योगिक और वेयरहाउसिंग लीजिंग सालाना आधार पर 15 फीसदी बढ़कर 36.8 मिलियन वर्गफुट हो गई. वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, ऊंची माल ढुलाई लागत, मुद्रा में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बावजूद इस क्षेत्र ने बेहतर प्रदर्शन किया है.
विनिर्माण से सबसे ज्यादा मांग
विनिर्माण क्षेत्र औद्योगिक और वेयरहाउसिंग परिसंपत्तियों की मांग का सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है. कुल लीजिंग में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी 46 फीसदी रही और इसने 17 मिलियन वर्गफुट क्षेत्र दर्ज किया. यह पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 17 फीसदी अधिक है.
इसके बाद थर्ड पार्टी लॉजिस्टिक्स यानी 3पीएल क्षेत्र का स्थान रहा. इस क्षेत्र ने 11.1 मिलियन वर्गफुट की लीजिंग की, जो कुल लेनदेन का 30 फीसदी है. 3पीएल क्षेत्र में सालाना आधार पर 27 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई.
मुंबई सबसे आगे
मुंबई 10.7 मिलियन वर्गफुट के साथ औद्योगिक और वेयरहाउसिंग लीजिंग का सबसे बड़ा बाजार रहा. यह शहर के लिए अब तक की सबसे अधिक छमाही लीजिंग है और पिछले साल की समान अवधि से 44 फीसदी अधिक है. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में 5.9 मिलियन वर्गफुट लीजिंग हुई, जो 17 फीसदी अधिक है. वहीं बेंगलूरु में 4 मिलियन वर्गफुट लीजिंग दर्ज की गई, जिसमें 36 फीसदी की बढ़ोतरी हुई.
कोलकाता ने प्रमुख बाजारों में सबसे तेज वृद्धि दर्ज की. यहां लीजिंग 69 फीसदी बढ़कर 2.4 मिलियन वर्गफुट हो गई. अहमदाबाद में यह 15 फीसदी बढ़कर 4.1 मिलियन वर्गफुट रही. इसके विपरीत पुणे, चेन्नई और हैदराबाद में लीजिंग गतिविधियों में क्रमशः 12 फीसदी, 27 फीसदी और 10 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.
समर्पित माल ढुलाई गलियारे से मिला फायदा
पश्चिमी समर्पित माल ढुलाई गलियारे के पूरा होने से भी इस क्षेत्र को फायदा मिला है. इससे विनिर्माण केंद्रों, बंदरगाहों और उपभोक्ता केंद्रों के बीच माल की आवाजाही बेहतर हुई है. नाइट फ्रैंक के मुताबिक, बेहतर संपर्क व्यवस्था ने विनिर्माताओं और लॉजिस्टिक्स कंपनियों को अपनी आपूर्ति श्रृंखला को अधिक प्रभावी ढंग से संचालित करने में मदद की है. इससे भारत उत्पादन और वितरण केंद्र के रूप में और मजबूत हुआ है.
नाइट फ्रैंक इंडिया के अंतरराष्ट्रीय साझेदार, अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक शिशिर बैजल ने कहा कि चुनौतीपूर्ण वैश्विक माहौल के बावजूद औद्योगिक और वेयरहाउसिंग बाजार मजबूत बना हुआ है. विनिर्माण गतिविधियों, बेहतर बुनियादी ढांचे और मजबूत घरेलू मांग से कंपनियों का भरोसा कायम है.
सभी प्रमुख बाजारों में किराये बढ़े
रिपोर्ट के मुताबिक, आठों प्रमुख बाजारों में औद्योगिक और वेयरहाउसिंग परिसंपत्तियों के किराये में बढ़ोतरी हुई. चेन्नई में किराये में सबसे ज्यादा 7 फीसदी की सालाना वृद्धि दर्ज की गई और औसत किराया 25.7 रुपये प्रति वर्गफुट प्रति माह पहुंच गया. पुणे 28.7 रुपये प्रति वर्गफुट प्रति माह के औसत किराये के साथ देश का सबसे महंगा वेयरहाउसिंग बाजार रहा.
मुंबई और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में किराये में 5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. वहीं बेंगलूरु और अहमदाबाद में किराये 6 फीसदी बढ़े. नाइट फ्रैंक ने इसका कारण मजबूत मांग के साथ जमीन खरीद, निर्माण और वित्तपोषण की लागत में लगातार वृद्धि को बताया.
कुल वेयरहाउसिंग स्टॉक 584.9 मिलियन वर्गफुट
2026 की पहली छमाही में भारत का औद्योगिक और वेयरहाउसिंग स्टॉक सालाना आधार पर 14 फीसदी बढ़कर 584.9 मिलियन वर्गफुट हो गया. वहीं रिक्तता दर पिछले साल की समान अवधि के 12.1 फीसदी से घटकर 11.4 फीसदी रह गई. इससे संकेत मिलता है कि नई आपूर्ति के साथ मांग भी मजबूत बनी हुई है.
देश के कुल औद्योगिक और वेयरहाउसिंग स्टॉक में उच्च गुणवत्ता वाली ‘ग्रेड ए’ सुविधाओं की हिस्सेदारी 47 फीसदी रही. यह बेहतर बुनियादी ढांचे वाली परिसंपत्तियों के प्रति कंपनियों की बढ़ती प्राथमिकता को दर्शाता है. कुल राष्ट्रीय स्टॉक में मुंबई की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा 33 फीसदी रही, जबकि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र 20 फीसदी हिस्सेदारी के साथ दूसरे स्थान पर रहा.
दूसरी छमाही में भी मजबूत मांग की उम्मीद
रिपोर्ट के अनुसार, 2026 की दूसरी छमाही में भी औद्योगिक और वेयरहाउसिंग क्षेत्र में मांग मजबूत रहने की उम्मीद है. विनिर्माण क्षमता के विस्तार, लॉजिस्टिक्स सेवाओं की बढ़ती आउटसोर्सिंग, नीतिगत समर्थन और बेहतर बहु-माध्यम परिवहन बुनियादी ढांचे से बाजार को सहारा मिलने की संभावना है. हालांकि, नई और उच्च गुणवत्ता वाली आपूर्ति तैयार करने के सामने जमीन की उपलब्धता, बिखरे हुए भू-स्वामित्व, नियामकीय जटिलताएं और परियोजनाओं की मंजूरी में लगने वाला लंबा समय बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं.