इस नई QNA सीरीज के लागू होने से भारत के GDP आंकड़े ज्यादा पारदर्शी, भरोसेमंद और नीति-निर्माण के लिए उपयोगी बनेंगे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
भारत में आर्थिक आंकड़ों की गणना के तरीके में एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव होने जा रहा है. सरकार फरवरी 2026 से नई तिमाही राष्ट्रीय लेखा (QNA) सीरीज लागू करने जा रही है, जिससे GDP के आंकड़े पहले से ज्यादा सटीक, रियल टाइम और भरोसेमंद बनेंगे. नई सीरीज में 2022-23 को बेस ईयर बनाया गया है और इसे 27 फरवरी 2026 को जारी किया जाएगा.
ज्यादा डेटा सोर्स, ज्यादा सटीक तस्वीर
नई QNA सीरीज में GDP के आकलन के लिए कई नए डेटा सोर्स जोड़े गए हैं. अब सामान, सेवाओं और बिजनेस के प्रकार के हिसाब से ज्यादा डिटेल्ड आंकड़े जुटाए जाएंगे. इसके अलावा ई-वाहन और प्राकृतिक गैस के इस्तेमाल से जुड़े डेटा को भी GDP कैलकुलेशन में शामिल किया जाएगा. इससे खास तौर पर उन सेक्टरों की तस्वीर साफ होगी, जहां अब तक तेज और भरोसेमंद आंकड़ों की कमी थी.
बेंचमार्किंग में बदलेगा तरीका, IMF के मानकों से होगा मेल
अब तक 2011-12 बेस ईयर वाली सीरीज में सालाना और तिमाही आंकड़ों के बीच अक्सर असंगति देखने को मिलती थी, जिससे शॉर्ट-टर्म एनालिसिस और मौसमी ट्रेंड समझना मुश्किल हो जाता था. नई सीरीज में IMF के 2017 क्वार्टरली नेशनल अकाउंट्स मैनुअल की सिफारिशों को अपनाया जाएगा. पुरानी प्रो-राटा मेथड की जगह अब प्रोपोर्शनल बेंचमार्किंग लागू होगी.
डेंटन मेथड से घटेगी कृत्रिम अस्थिरता
नई प्रणाली में सेक्टर-वाइज असेसमेंट के आधार पर प्रोपोर्शनल डेंटन मेथड का इस्तेमाल किया जाएगा. यह तकनीक तिमाही या मासिक हाई-फ्रिक्वेंसी डेटा को सालाना आंकड़ों से बेहतर तरीके से जोड़ती है और ग्रोथ रेट की असली चाल को बनाए रखती है. सरकार का कहना है कि इससे तिमाही GDP सीरीज में अनावश्यक उतार-चढ़ाव कम होंगे और इंडिकेटर्स की वास्तविक स्थिति सामने आएगी.
उत्पादन पक्ष में बड़े सुधार
उत्पादन के मोर्चे पर भी कई अहम बदलाव किए गए हैं. कृषि क्षेत्र में अब विस्तारित फसल उत्पादन डेटा के आधार पर वॉल्यूम एक्सट्रापोलेशन होगा. मैन्युफैक्चरिंग में आउटपुट और इनपुट के लिए डबल डिफ्लेशन तकनीक अपनाई जाएगी, जो पुराने सिंगल डिफ्लेशन सिस्टम से ज्यादा सटीक मानी जाती है. इसके अलावा वार्षिक उद्योग सर्वे के नए वेट्स को भी शामिल किया जाएगा. बैंकिंग सेक्टर में फाइनेंशियल इंटरमीडिएशन सर्विसेज का आकलन अब तिमाही लोन और डिपॉजिट रेट्स के आधार पर होगा.
मांग पक्ष और राज्यों के आंकड़ों में भी होगा बदलाव
मांग पक्ष में तिमाही प्राइवेट कंजम्प्शन को अब नीचे से ऊपर की पद्धति से तैयार किया जाएगा. इसमें COICOP 2018 क्लासिफिकेशन, लेटेस्ट कंजम्प्शन सर्वे और बिजली, गैस, रेलवे जैसे सेक्टरों के प्रशासनिक डेटा का इस्तेमाल होगा. वहीं, राज्यों के लिए GSDP गणना में भी ज्यादा डायनामिक अप्रोच अपनाई जाएगी. अब सर्विस सेक्टर में राज्यों की हिस्सेदारी फिक्स्ड रेशियो की जगह रियल टाइम GDP आउटवर्ड सप्लाई डेटा से तय होगी.
निर्माण क्षेत्र में भी बदलेगा आकलन का तरीका
कंस्ट्रक्शन सेक्टर के GVA का आकलन अब HSN और SAC आधारित GDP डेटा से किया जाएगा, जो कंस्ट्रक्शन से जुड़े सामानों और सेवाओं पर आधारित होगा. पुराने सीमेंट और स्टील कंजम्प्शन जैसे कंपोजिट इंडिकेटर्स की जगह यह नया और ज्यादा सटीक तरीका अपनाया जाएगा.
दोनों देशों ने ऊर्जा सुरक्षा, रणनीतिक तेल भंडारण, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ग्रीन एनर्जी और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे अहम क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत और जापान ने अपनी आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को नई ऊंचाई देने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. जापान भारत में ₹1 ट्रिलियन (करीब ₹1 लाख करोड़) से अधिक का निवेश करेगा, जबकि दोनों देशों ने ऊर्जा सुरक्षा, रणनीतिक तेल भंडारण, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ग्रीन एनर्जी और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे अहम क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई है. इन पहलों का उद्देश्य भारत में निवेश, रोजगार, तकनीकी विकास और सुरक्षित ऊर्जा आपूर्ति को मजबूत करना है.
भारत-जापान की रणनीतिक साझेदारी को नई मजबूती
भारत और जापान के बीच आर्थिक और रणनीतिक सहयोग लगातार विस्तार पा रहा है. अगस्त 2025 से अब तक दोनों देशों के बीच 120 से अधिक समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर हस्ताक्षर हो चुके हैं. इन समझौतों के तहत जापान भारत में ₹1 ट्रिलियन (करीब ₹1 लाख करोड़) से अधिक का निवेश करेगा. यह निवेश सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ग्रीन एनर्जी, ऑटोमोबाइल, स्टील, डिजिटल टेक्नोलॉजी और कृषि समेत कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में किया जाएगा.
ऊर्जा सुरक्षा पर विशेष फोकस
दोनों देशों ने वैश्विक भू-राजनीतिक चुनौतियों और ऊर्जा बाजार में बढ़ती अनिश्चितताओं के बीच तेल और गैस की सुरक्षित, सस्ती और निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए सहयोग बढ़ाने का फैसला किया है. इसके तहत भारत और जापान रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Oil Reserves) के प्रबंधन, कच्चे तेल के भंडारण, आपूर्ति सुरक्षा और आपातकालीन परिस्थितियों में ऊर्जा उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए अपने अनुभव साझा करेंगे. इसका उद्देश्य किसी भी वैश्विक संकट के दौरान घरेलू ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित होने से बचाना है.
तीसरे देशों में भी करेंगे संयुक्त निवेश
भारत और जापान केवल द्विपक्षीय सहयोग तक सीमित नहीं रहेंगे. दोनों देश तीसरे देशों में तेल और गैस परियोजनाओं में संयुक्त निवेश की संभावनाएं तलाशेंगे. साथ ही ऊर्जा बाजार से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां साझा करेंगे और नए ऊर्जा स्रोतों के विकास पर भी मिलकर काम करेंगे.
समुद्री परिवहन होगा अधिक सुरक्षित
तेल और गैस की वैश्विक आपूर्ति का बड़ा हिस्सा समुद्री मार्गों से होता है. इसे देखते हुए दोनों देशों ने ऊर्जा परिवहन को अधिक सुरक्षित, विश्वसनीय और मजबूत बनाने के लिए सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई है. ऊर्जा परिवहन से जुड़े बुनियादी ढांचे में संयुक्त निवेश की संभावनाओं पर भी काम किया जाएगा.
सेमीकंडक्टर, AI और ग्रीन एनर्जी में बड़े प्रोजेक्ट
जापान का निवेश भारत के कई राज्यों में नई परियोजनाओं के रूप में दिखाई देगा.
1. हरियाणा में Daikin रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) सेंटर स्थापित करेगी.
2. Sumitomo Corporation औद्योगिक सहयोग और रिन्यूएबल एनर्जी परियोजनाओं में निवेश करेगी.
3. गुजरात में Fujifilm सेमीकंडक्टर मटेरियल्स का उत्पादन शुरू करेगी.
4. Suzuki नए मैन्युफैक्चरिंग प्लांट के लिए जमीन अधिग्रहित कर रही है.
5. असम में Suzuki R&D, NDDB और NEDF के सहयोग से बायोगैस प्लांट लगाया जाएगा.
6. Toho Koki और IIT गुवाहाटी मिलकर सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम विकसित करेंगे.
भविष्य की तकनीकों पर रहेगा जोर
ग्रीन एनर्जी और अत्याधुनिक तकनीकों के क्षेत्र में भी कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं शुरू होंगी.
1. Mitsubishi Gas Chemical और ACME ग्रीन मेथेनॉल परियोजना पर काम करेंगे.
2. IHI और ACME बड़े पैमाने पर ग्रीन अमोनिया उत्पादन संयंत्र स्थापित करेंगे.
3. NTT Data अगली पीढ़ी की टेलीकॉम तकनीक और सबमरीन केबल नेटवर्क में निवेश करेगी.
4. हैदराबाद में Mitsubishi Electric और IIT Hyderabad AI, क्वांटम टेक्नोलॉजी और सुरक्षा क्षेत्र के लिए विशेषज्ञ मानव संसाधन तैयार करेंगे.
5. Yaqumo और IISc क्वांटम टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम विकसित करेंगे.
रोजगार और मैन्युफैक्चरिंग को मिलेगा बढ़ावा
ऑटोमोबाइल क्षेत्र में Toyota कर्नाटक के बिदादी में नया प्लांट स्थापित करेगी, जहां हर वर्ष लगभग एक लाख वाहनों का उत्पादन होगा और करीब 2,800 लोगों को रोजगार मिलने की उम्मीद है. वहीं JFE Steel और JSW Steel एकीकृत स्टील परियोजना में निवेश करेंगे.
संस्थागत सहयोग भी होगा मजबूत
ऊर्जा क्षेत्र में भारत की Indian Strategic Petroleum Reserves Limited (ISPRL) और राष्ट्रीय तेल कंपनियां जापान की JOGMEC तथा JBIC जैसी संस्थाओं के साथ तकनीकी, वित्तीय और रणनीतिक सहयोग बढ़ाएंगी.
इसके अलावा India-Japan Joint Working Group on Petroleum and Natural Gas के तहत नियमित बैठकें आयोजित की जाएंगी, जिनमें चल रही परियोजनाओं की समीक्षा और भविष्य के सहयोग की दिशा तय की जाएगी.
भारत को क्या होगा फायदा?
विशेषज्ञों का मानना है कि जापान का यह निवेश और ऊर्जा सहयोग भारत में हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग, सेमीकंडक्टर उद्योग, हरित ऊर्जा, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा सुरक्षा को नई मजबूती देगा. इसके साथ ही रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, विदेशी निवेश बढ़ेगा और वैश्विक सप्लाई चेन में भारत की स्थिति पहले से अधिक मजबूत होगी.
$1.4 अरब की अडानी डील, जटिल कॉरपोरेट संरचनाएं, फैमिली ट्रस्ट और एक ऐसा नेटवर्क, जिसकी कड़ियां चुपचाप पनामा नहर तक पहुंचती हैं. (भाग-1)
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
29 जून को अदाणी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (APSEZ) ने भारत के सबसे नए गहरे समुद्री बंदरगाह विझिंजम इंटरनेशनल सीपोर्ट में अपनी 49 प्रतिशत हिस्सेदारी 1.397 अरब डॉलर में बेचने का समझौता किया. कंपनी की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में खरीदार का नाम टर्मिनल इन्वेस्टमेंट लिमिटेड (TiL) बताया गया, जो दुनिया की सबसे बड़ी कंटेनर शिपिंग कंपनी मेडिटेरेनियन शिपिंग कंपनी (MSC) की पोर्ट्स इकाई है. यह खबर प्रकाशित हुई, नियामकीय दस्तावेजों में दर्ज हुई और कुछ ही समय में सामान्य कारोबारी खबर बनकर रह गई.
लेकिन शायद ऐसा नहीं होना चाहिए था.
क्योंकि प्रेस विज्ञप्ति में जिस कंपनी का नाम खरीदार के रूप में सामने आया, वास्तविकता उससे कहीं अधिक जटिल है. विझिंजम में हिस्सेदारी लेने वाली कंपनी दुनिया के दर्जनों देशों के संयुक्त व्यापारी बेड़ों से भी अधिक कंटेनर शिपिंग क्षमता नियंत्रित करती है. इसके बावजूद जिनेवा स्थित एक फैमिली ऑफिस के बाहर शायद ही कोई स्वतंत्र रूप से यह सत्यापित कर सकता है कि उसकी वास्तविक वित्तीय स्थिति क्या है. भारत ने यह माना कि विझिंजम में हिस्सेदारी MSC ने खरीदी है, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती.
आखिर MSC है कौन?
वह परिवार जो कभी अपनी कहानी नहीं बताता
MSC पूरी तरह जिनेवा के अपोंटे (Aponte) परिवार के नियंत्रण में है. इसकी शुरुआत वर्ष 1970 में हुई थी, जब जियानलुइगी अपोंटे, जो उस समय इटली के सोरेंटो और कैप्री द्वीप के बीच फेरी चलाते थे, ने अपनी पत्नी राफाएला अपोंटे-डायमंट के साथ 2 लाख डॉलर का ऋण लेकर जर्मनी का एक पुराना मालवाहक जहाज खरीदा.
करीब 56 वर्षों बाद यही कंपनी दुनिया की सबसे बड़ी शिपिंग लाइन बन चुकी है. चूंकि MSC कभी शेयर बाजार में सूचीबद्ध नहीं हुई और न ही उसने इस तरह का सार्वजनिक कर्ज लिया, जिससे उसे बाहरी निवेशकों के प्रति जवाबदेह होना पड़े, इसलिए आज भी कंपनी पूरी तरह अपोंटे परिवार के नियंत्रण में है.
इसमें कोई गैरकानूनी बात नहीं है. लेकिन इसका मतलब यह भी है कि जब इतनी निजी कंपनी किसी रणनीतिक सौदे में खरीदार बनकर सामने आती है, तो आमतौर पर उपलब्ध सार्वजनिक दस्तावेज, जैसे शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनियों की जानकारी या बॉन्ड प्रॉस्पेक्टस, यह बताने में सक्षम नहीं होते कि सौदे के पीछे वास्तविक वित्तपोषण कौन कर रहा है.
अप्रैल 2026 में कंपनी का नियंत्रण बिना किसी सार्वजनिक घोषणा के अगली पीढ़ी को सौंप दिया गया. डिएगो अपोंटे और एलेक्सा अपोंटे वागो को जिनेवा में पंजीकृत पारिवारिक ट्रस्टों के माध्यम से कंपनी का नियंत्रण मिला. इस बदलाव की कोई सार्वजनिक फाइलिंग सामने नहीं आई. इसके कुछ ही महीनों बाद इसी पारिवारिक कंपनी ने भारत के सबसे रणनीतिक बंदरगाहों में से एक विझिंजम में हिस्सेदारी खरीदने का समझौता कर लिया.
खरीदार, जिसका नाम सामने नहीं आया
चूंकि MSC की अपनी वित्तीय जानकारी सार्वजनिक नहीं है, इसलिए यह समझने का एकमात्र तरीका कि विझिंजम बंदरगाह में खरीदी गई हिस्सेदारी के पीछे वास्तव में कौन है, आधिकारिक दस्तावेजों की पड़ताल करना है. लेकिन यह पड़ताल उस दिशा में नहीं जाती, जिसकी ओर प्रेस विज्ञप्ति इशारा करती है.
वास्तव में शेयर खरीद समझौते (Share Purchase Agreement) पर हस्ताक्षर मुंडी लिमिटेड (Mundi Limited) ने किए हैं. यह कंपनी टर्मिनल इन्वेस्टमेंट लिमिटेड (TiL) की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी है, जो MSC की पोर्ट्स इकाई है.
लेकिन TiL भी अंतिम होल्डिंग कंपनी नहीं है. यह एक ऐसी होल्डिंग कंपनी के अधीन कार्य करती है, जिसके बारे में भारत में बहुत कम लोग जानते हैं. इसका नाम टर्मिनल इन्वेस्टमेंट लिमिटेड होल्डिंग एस.ए. (Terminal Investment Limited Holding S.A.) है, जो जिनेवा या स्विट्जरलैंड में नहीं, बल्कि लक्जमबर्ग में पंजीकृत है.
यहीं से यह कहानी केवल एक शिपिंग कंपनी की नहीं रह जाती.
कहानी में BlackRock की एंट्री
यूरोपीय आयोग (European Commission) के समक्ष इस वर्ष दाखिल एक नियामकीय दस्तावेज में लक्जमबर्ग स्थित इस कंपनी का कानूनी विवरण दिया गया है. दस्तावेज के अनुसार, यह कंपनी MSC Mediterranean Shipping Company Holding S.A. और BlackRock Inc. के "अप्रत्यक्ष और संयुक्त नियंत्रण (Indirect and Joint Control)" में है.
यानी इस संरचना में दुनिया की सबसे बड़ी एसेट मैनेजमेंट कंपनी BlackRock भी शामिल है.
BlackRock वर्तमान में करीब 13.9 ट्रिलियन डॉलर की परिसंपत्तियों (Assets Under Management) का प्रबंधन करती है. यह राशि दुनिया के लगभग सभी देशों की वार्षिक अर्थव्यवस्था से अधिक है. केवल अमेरिका** और चीन की अर्थव्यवस्था ही इससे बड़ी हैं.
केवल निवेशक नहीं, रणनीतिक साझेदार
यूरोपीय संघ (EU) के मर्जर कानून के तहत "संयुक्त नियंत्रण (Joint Control)" का अर्थ केवल किसी कंपनी में हिस्सेदारी होना नहीं है.
इसका मतलब है कि BlackRock को TiL के प्रमुख रणनीतिक फैसलों पर महत्वपूर्ण अधिकार प्राप्त हैं. इनमें कंपनी का बजट, कारोबारी रणनीति, बिजनेस प्लान और वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्तियां जैसे फैसले शामिल हैं. यानी BlackRock केवल मुनाफे में हिस्सेदार नहीं, बल्कि रणनीतिक निर्णयों में भी प्रभाव रखती है.
यह हिस्सेदारी BlackRock को वर्ष 2024 में ग्लोबल इंफ्रास्ट्रक्चर पार्टनर्स (Global Infrastructure Partners - GIP) के अधिग्रहण के बाद मिली. GIP के पास TiL में लगभग 20 प्रतिशत हिस्सेदारी है.
GIP के चेयरमैन अदेबायो "बायो" ओगुनलेसी TiL के निदेशक मंडल (Board of Directors) में भी शामिल हैं. दिलचस्प बात यह है कि GIP के अधिग्रहण के बाद उन्हें BlackRock के बोर्ड में भी शामिल किया गया.
यानी एक ही व्यक्ति दोनों संस्थाओं के निदेशक मंडल का हिस्सा है. इस तरह वह अप्रत्यक्ष रूप से भारत के एक रणनीतिक बंदरगाह से जुड़े निर्णयों में भी भूमिका निभाता है.
यह नेटवर्क आखिर कितना व्यापक है?
विझिंजम बंदरगाह इस वैश्विक संरचना का अकेला हिस्सा नहीं है.
ग्लोबल इंफ्रास्ट्रक्चर पार्टनर्स (GIP) के जरिए BlackRock पहले से ही दुनिया के कई महत्वपूर्ण परिवहन और बुनियादी ढांचा परिसंपत्तियों में हिस्सेदारी रखती है. इनमें गैटविक, एडिनबर्ग और सिडनी हवाई अड्डे, मलेशिया के राष्ट्रीय एयरपोर्ट ऑपरेटर, पोर्ट ऑफ मेलबर्न और ब्रिटेन के पील पोर्ट्स शामिल हैं.
इसके अलावा टर्मिनल इन्वेस्टमेंट लिमिटेड (TiL) के माध्यम से BlackRock को अब क्रिस्टोबाल (Cristóbal) बंदरगाह का अंतरिम नियंत्रण भी प्राप्त है. यह बंदरगाह पनामा नहर के दोनों प्रमुख कंटेनर टर्मिनलों में से एक है.
यह बदलाव ऐसे समय हुआ, जब पनामा ने एक हांगकांग की कंपनी से उसका संचालन अधिकार वापस ले लिया. यह फैसला ऐसे दौर में आया, जब अमेरिका और चीन के बीच पनामा नहर पर प्रभाव को लेकर तनाव लगातार बढ़ रहा है.
हालांकि पनामा नहर का स्वामित्व और संचालन अब भी पनामा कैनाल अथॉरिटी के पास है, लेकिन नहर से जुड़े प्रमुख बंदरगाहों का नियंत्रण धीरे-धीरे वैश्विक निवेशकों के एक सीमित समूह के हाथों में सिमटता जा रहा है.
अडानी ने किसे बेची हिस्सेदारी?
लेख के अनुसार, अडानी समूह ने विझिंजम बंदरगाह का निर्माण किया और अपनी 49 प्रतिशत हिस्सेदारी उस कंपनी को बेची, जिसे वह MSC के नाम से जानता था.
लेकिन सवाल यह है कि क्या इस सौदे के पीछे मौजूद वास्तविक कॉरपोरेट संरचना और उसके प्रभाव का पूरा आकलन किया गया था? क्योंकि MSC के पीछे मौजूद संस्थागत ढांचे में ऐसे वैश्विक निवेशकों की मौजूदगी दिखाई देती है, जिनका प्रभाव केरल से लेकर पनामा नहर तक फैले रणनीतिक बुनियादी ढांचे पर नजर आता है.
आगे क्या?
यहीं से यह कहानी केवल भारत के एक बंदरगाह तक सीमित नहीं रहती.
यह सवाल उठाती है कि दुनिया के महत्वपूर्ण बंदरगाहों, हवाई अड्डों और अन्य रणनीतिक बुनियादी ढांचों का वास्तविक स्वामित्व और नियंत्रण किन संस्थाओं के पास है. साथ ही यह भी कि वैश्विक स्तर पर बार-बार कुछ चुनिंदा नाम ही ऐसे अहम परिसंपत्तियों के पीछे क्यों दिखाई देते हैं.
(क्रमशः...)
भाग-2 में: BlackRock के वैश्विक पोर्ट नेटवर्क, उसके निवेश साम्राज्य और अरब सागर के केरल से लेकर पनामा नहर तक फैले रणनीतिक बंदरगाहों पर उसके बढ़ते प्रभाव का विश्लेषण प्रस्तुत किया जाएगा.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
इस उपलब्धि के साथ Laxhar Evidence Labs उत्तर प्रदेश की पहली ऐसी फॉरेंसिक लैब बन गई है, जिसे सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में NABL की मान्यता मिली है. ह
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पूर्व टीवी संपादक और फॉरेंसिक पत्रकार इंद्रजीत राय ने उत्तर प्रदेश में राज्य की पहली मान्यता प्राप्त फॉरेंसिक प्रयोगशाला' स्थापित कर एक नया कीर्तिमान बनाया है. उनकी कंपनी Laxhar Evidence Labs Private Limited को नेशनल एक्रेडिटेशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लेबोरेटरीज (NABL) से फॉरेंसिक परीक्षण के लिए आधिकारिक मान्यता प्राप्त हुई है.
इस उपलब्धि के साथ Laxhar Evidence Labs उत्तर प्रदेश की पहली ऐसी फॉरेंसिक लैब बन गई है, जिसे सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में NABL की मान्यता मिली है. साथ ही यह भारत की पहली निजी मल्टी-डिसिप्लिनरी फॉरेंसिक प्रयोगशाला भी बन गई है, जिसे एक साथ डिजिटल फॉरेंसिक, फिजिकल फॉरेंसिक और क्राइम सीन मैनेजमेंट तीनों क्षेत्रों में NABL मान्यता हासिल हुई है.
पत्रकारिता से फॉरेंसिक साइंस तक का सफर
इंद्रजीत राय ने दो दशकों से अधिक समय तक टीवी पत्रकारिता में अपराध से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग और खोजी पत्रकारिता की. वे ABP News में एग्जीक्यूटिव एडिटर, Zee News में डिप्टी एडिटर और Network18 में क्राइम एडिटर जैसे वरिष्ठ पदों पर कार्य कर चुके हैं.
उन्होंने भारत में फॉरेंसिक पत्रकारिता को नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इसी योगदान के लिए उन्हें World Book of Records से भी सम्मानित किया गया. वर्षों तक फॉरेंसिक विज्ञान का अध्ययन और रिपोर्टिंग करने के बाद उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की और विशेषज्ञ वैज्ञानिकों की टीम के साथ Laxhar Evidence Labs की स्थापना की.
इंद्रजीत राय ने कहा कि पत्रकार के रूप में उन्होंने वर्षों तक सवाल पूछे और तथ्यों की तलाश की. अब फॉरेंसिक विज्ञान उन्हें वैज्ञानिक साक्ष्यों के माध्यम से उन सवालों के जवाब देने का अवसर देता है. उनका उद्देश्य जांच एजेंसियों के साथ-साथ हर उस नागरिक तक विश्वसनीय फॉरेंसिक सेवाएं पहुंचाना है, जो सच्चाई जानना चाहता है.
कड़ी जांच के बाद मिली NABL मान्यता
NABL की मान्यता प्रयोगशाला की वैज्ञानिक क्षमता, परीक्षण पद्धतियों, गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली, तकनीकी प्रक्रियाओं, उपकरणों, विशेषज्ञ कर्मियों और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुपालन की विस्तृत जांच के बाद प्रदान की गई है. इसके लिए NABL की विशेषज्ञ टीम ने प्रयोगशाला का व्यापक ऑन-साइट ऑडिट भी किया.
किन सेवाओं की मिलेगी सुविधा
नोएडा के सेक्टर-73 स्थित एन्थूरियम टॉवर में स्थापित यह प्रयोगशाला निम्नलिखित सेवाएं प्रदान करती है.
1. डिजिटल फॉरेंसिक
2. मोबाइल और क्लाउड फॉरेंसिक
3. ऑडियो एवं वीडियो फॉरेंसिक
4. फिंगरप्रिंट परीक्षण
5. हस्तलेखन और हस्ताक्षर परीक्षण
6. फॉरेंसिक दस्तावेज जांच
7. क्राइम सीन जांच एवं प्रबंधन
8. टेक्निकल सर्विलांस काउंटर-मेजर्स (TSCM)
9. फॉरेंसिक सलाह और विशेषज्ञ राय
निजी और सरकारी दोनों क्षेत्रों को मिलेगा लाभ
भारत में अब तक अधिकांश फॉरेंसिक जांच सरकारी प्रयोगशालाओं तक सीमित रही है. Laxhar Evidence Labs का उद्देश्य इस कमी को दूर करते हुए आम नागरिकों, अधिवक्ताओं, कॉर्पोरेट कंपनियों, वित्तीय संस्थानों, बीमा कंपनियों, स्टार्टअप्स और जांच एजेंसियों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप प्रमाणित फॉरेंसिक सेवाएं उपलब्ध कराना है.
अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप लैब
Laxhar Evidence Labs को ISO/IEC 17025:2017 मानक के तहत मान्यता प्राप्त है. प्रयोगशाला को 20 मान्यता प्राप्त परीक्षण क्षेत्रों में लैबोरेटरी टेस्टिंग और ऑन-साइट टेस्टिंग दोनों की अनुमति मिली है. इसके अलावा कंपनी कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय, MSME, DPIIT, उत्तर प्रदेश आईटी एवं इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग और Government e-Marketplace (GeM) में भी पंजीकृत है. साथ ही इसे ISO 9001:2015 गुणवत्ता प्रबंधन प्रमाणन भी प्राप्त है.
इंद्रजीत राय का कहना है कि Laxhar Evidence Labs का उद्देश्य फॉरेंसिक विज्ञान को आम लोगों के लिए अधिक सुलभ बनाना और वैज्ञानिक उत्कृष्टता तथा अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों के माध्यम से भारत की न्याय प्रणाली को और अधिक मजबूत करना है.
भारत और सेशेल्स ने कृषि अनुसंधान और शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग को मजबूत बनाने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत और सेशेल्स ने कृषि क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग को नई दिशा देने के लिए बड़ा कदम उठाया है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और सेशेल्स के कृषि विभाग ने कृषि अनुसंधान, शिक्षा, तकनीक हस्तांतरण और क्षमता निर्माण को बढ़ावा देने के लिए एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं. इसके साथ ही दोनों देशों ने 2026 से 2031 तक के लिए पांच वर्षीय कार्ययोजना भी तैयार की है, जिसमें जलवायु-अनुकूल कृषि, बागवानी और खाद्य सुरक्षा जैसे प्रमुख क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा.
भारत-सेशेल्स के बीच कृषि सहयोग पर MoU
भारत और सेशेल्स ने कृषि अनुसंधान और शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग को मजबूत बनाने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं. यह समझौता भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और सेशेल्स के कृषि विभाग के बीच हुआ है. यह समझौता दोनों देशों के बीच कृषि अनुसंधान, शिक्षा, क्षमता निर्माण (Capacity Building), तकनीक हस्तांतरण (Technology Transfer) और आधुनिक कृषि पद्धतियों के आदान-प्रदान को बढ़ावा देने के लिए एक व्यापक ढांचा तैयार करता है. इसके तहत संयुक्त शोध कार्यक्रम चलाए जाएंगे, साथ ही वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और छात्रों के आदान-प्रदान को भी प्रोत्साहित किया जाएगा.
2026-2031 के लिए तैयार हुई पांच वर्षीय कार्ययोजना
समझौते को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए दोनों देशों ने 2026 से 2031 तक की पांच वर्षीय कार्ययोजना पर भी हस्ताक्षर किए हैं. इस कार्ययोजना में निम्नलिखित प्रमुख क्षेत्रों पर विशेष फोकस रहेगा.
1. क्लाइमेट-स्मार्ट एग्रीकल्चर (जलवायु-अनुकूल कृषि)
2. हॉर्टिकल्चर (बागवानी)
3. पोस्ट-हार्वेस्ट मैनेजमेंट (फसल कटाई के बाद प्रबंधन)
4. पशुधन विकास
5. सतत खाद्य एवं पोषण सुरक्षा
प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान हुआ समझौता
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अनुसार, यह समझौता भारत के प्रधानमंत्री की सेशेल्स की आधिकारिक यात्रा के दौरान संपन्न हुआ. मंत्रालय ने कहा कि इस पहल का उद्देश्य दोनों देशों के कृषि संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाना, कृषि उत्पादकता में सुधार करना, तकनीकी क्षमता विकसित करना और सतत कृषि विकास को बढ़ावा देना है.
जलवायु परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा से निपटने में मिलेगी मदद
मंत्रालय के मुताबिक, यह साझेदारी जलवायु परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा जैसी उभरती वैश्विक चुनौतियों से निपटने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी. साथ ही, इससे कृषि क्षेत्र में नवाचार और आधुनिक तकनीकों को अपनाने में तेजी आएगी.
वैश्विक कृषि साझेदारी को मिल रही मजबूती
ICAR अब तक दुनिया भर के विभिन्न संस्थानों के साथ 100 से अधिक समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर हस्ताक्षर कर चुका है. मंत्रालय का कहना है कि सेशेल्स के साथ हुआ यह नया समझौता ग्लोबल साउथ के देशों के साथ भारत की साझेदारी को और मजबूत करेगा तथा सतत कृषि, नवाचार और वैश्विक खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को आगे बढ़ाएगा.
स्वारा बेबी डिस्पोजेबल हाइजीन उत्पादों का निर्माण करती है. कंपनी बेबी केयर, एडल्ट इनकॉन्टिनेंस और फेमिनिन हाइजीन सेगमेंट में कई प्रोडक्ट बनाती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
बेबी डायपर और हाइजीन प्रोडक्ट्स बनाने वाली स्वारा बेबी (Swara Baby) ने ₹1,000 करोड़ के शुरुआती सार्वजनिक निर्गम (IPO) के लिए भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) के पास ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) दाखिल किया है. इस आईपीओ के जरिए कंपनी विस्तार, निवेश और कारोबार को नई गति देने की तैयारी में है. IPO में फ्रेश इश्यू के साथ-साथ ऑफर फॉर सेल (OFS) भी शामिल होगा, जिसमें फर्स्टक्राई की पैरेंट कंपनी ब्रेनबीज सॉल्यूशंस (Brainbees Solutions) अपनी हिस्सेदारी का एक हिस्सा बेचेगी.
₹1,000 करोड़ का होगा IPO
स्वारा बेबी के प्रस्तावित IPO का कुल आकार ₹1,000 करोड़ है. इसमें ₹500 करोड़ के नए इक्विटी शेयर (Fresh Issue) जारी किए जाएंगे, जबकि शेष राशि ऑफर फॉर सेल (OFS) के जरिए जुटाई जाएगी. OFS के तहत ब्रेनबीज सॉल्यूशंस, जो फर्स्टक्राई (FirstCry) की पैरेंट कंपनी है, ₹300 करोड़ तक के शेयर बेचेगी. वर्तमान में ब्रेनबीज के पास स्वारा बेबी में 76.59% हिस्सेदारी है, जिससे वह कंपनी की सबसे बड़ी शेयरधारक बनी हुई है.
कौन हैं कंपनी के प्रमोटर?
स्वारा बेबी के प्रमोटर आलोक बिड़ला हैं, जिन्हें हाइजीन प्रोडक्ट्स इंडस्ट्री में 18 वर्षों से अधिक का अनुभव है. कंपनी के प्रमुख प्रमोटरों में आलोक बिड़ला के साथ ब्रेनबीज सॉल्यूशंस भी शामिल है.
कई हाइजीन कैटेगरी में कारोबार
स्वारा बेबी डिस्पोजेबल हाइजीन उत्पादों का निर्माण करती है. कंपनी बेबी केयर, एडल्ट इनकॉन्टिनेंस और फेमिनिन हाइजीन सेगमेंट में कई उत्पाद बनाती है. वर्ष 2021 के बाद कंपनी ने खुद को एक सिंगल-प्रोडक्ट निर्माता से मल्टी-कैटेगरी बिजनेस में बदल लिया है. कंपनी के पोर्टफोलियो में बेबी पैंट-स्टाइल डायपर, बेबी टेप-स्टाइल डायपर, एडल्ट पैंट-स्टाइल डायपर, एडल्ट टेप-स्टाइल डायपर, सैनिटरी नैपकिन, पैंटी लाइनर्स समेत कुल सात उत्पाद श्रेणियों में प्रोडक्ट शामिल हैं.
FY25 में रहा मजबूत प्रदर्शन
वित्त वर्ष 2024-25 (FY25) में स्वारा बेबी ने ₹84 करोड़ का राजस्व (Revenue) दर्ज किया, जबकि कंपनी का शुद्ध लाभ (PAT) ₹5.2 करोड़ रहा.
प्रोडक्ट इनोवेशन पर भी फोकस
कंपनी लगातार नए उत्पाद विकसित करने पर जोर दे रही है. पिछले वर्ष स्वारा बेबी ने फर्स्टक्राई के BabyHug ब्रांड के तहत एक ऐसा डायपर लॉन्च किया, जिसमें पारंपरिक वुड पल्प का उपयोग घटाकर लगभग 7% कर दिया गया. कंपनी का दावा है कि इस तकनीक का इस्तेमाल करने वाली वह भारत की पहली निर्माता है.
हाइजीन बिजनेस का विस्तार
ब्रेनबीज सॉल्यूशंस ने दिसंबर 2025 में KA Hygiene और Solis Hygiene का अधिग्रहण करने की घोषणा की थी, ताकि हाइजीन प्रोडक्ट्स कारोबार को और मजबूत किया जा सके. इसी दौरान स्वारा बेबी ने अमेरिका में Swara Corp की स्थापना भी की, जिसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों में डायपर और अन्य हाइजीन उत्पादों के कारोबार का विस्तार करना है.
ये होंगे IPO के लीड मैनेजर
कंपनी के प्रस्तावित IPO के लिए JM Financial और Avendus Capital को बुक-रनिंग लीड मैनेजर नियुक्त किया गया है.
नियामक ने स्पष्ट किया है कि खाद्य उत्पादों को दवा जैसी प्रभावशीलता या विशेष स्वास्थ्य लाभ देने वाला बताना नियमों का उल्लंघन है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अगर आप एनर्जी ड्रिंक का सेवन करते हैं, तो यह खबर आपके लिए महत्वपूर्ण है. देश के खाद्य सुरक्षा नियामक फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) ने Red Bull समेत कम से कम छह प्रमुख एनर्जी ड्रिंक कंपनियों को नोटिस जारी किया है. नियामक का आरोप है कि ये कंपनियां अपने उत्पादों के प्रचार और पैकेजिंग पर ऐसे दावे कर रही हैं, जो भारतीय खाद्य सुरक्षा नियमों के अनुरूप नहीं हैं.
इन कंपनियों को मिला नोटिस
FSSAI के अनुसार, नोटिस पाने वाली कंपनियों में Red Bull, Monster Energy, PepsiCo India की Adrenaline Rush, Reliance Consumer Products की Campa Energy Drink और Hell Energy जैसे प्रमुख ब्रांड शामिल हैं.
किन दावों पर जताई आपत्ति?
FSSAI ने कहा कि "शरीर और दिमाग को तरोताजा करता है", "फोकस बढ़ाता है" और "एनर्जी लेवल बढ़ाता है" जैसे दावे खाद्य उत्पादों के लिए अनुमत नहीं हैं. ऐसे दावों से यह संदेश जाता है कि उत्पाद किसी विशेष स्वास्थ्य लाभ या चिकित्सीय प्रभाव प्रदान करता है, जो नियमों का उल्लंघन है. नियामक ने अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम पोस्ट में भी स्पष्ट किया कि खाद्य उत्पादों को दवा या स्वास्थ्यवर्धक उत्पाद की तरह प्रस्तुत नहीं किया जा सकता.
एनर्जी ड्रिंक के लिए अभी नहीं हैं अलग मानक
FSSAI का कहना है कि भारत में फिलहाल एनर्जी ड्रिंक के लिए अलग से कोई आधिकारिक मानक तय नहीं किए गए हैं. ऐसे में कंपनियां अपने उत्पादों के प्रचार में ऐसे दावे नहीं कर सकतीं, जिनसे उपभोक्ताओं को विशेष स्वास्थ्य लाभ मिलने का भ्रम पैदा हो.
तेजी से बढ़ रहा है भारत का एनर्जी ड्रिंक बाजार
रिसर्च फर्म IMARC Group के मुताबिक, भारत का एनर्जी ड्रिंक बाजार वर्ष 2025 में करीब **1.5 अरब डॉलर** का था. इसके वर्ष 2034 तक बढ़कर 2.9 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. शहरीकरण, युवाओं की बढ़ती आबादी और फिटनेस के प्रति बढ़ती रुचि इस बाजार के विस्तार की प्रमुख वजहें मानी जा रही हैं.
पहले भी कार्रवाई कर चुका है FSSAI
यह पहला मौका नहीं है जब FSSAI ने भ्रामक दावों पर सख्ती दिखाई हो. पिछले वर्ष नियामक ने शुगर-आधारित रीहाइड्रेशन ड्रिंक बनाने वाली कंपनियों को निर्देश दिया था कि वे अपने उत्पादों को ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्यूशन (ORS) तभी कहें, जब वे WHO के निर्धारित मानकों पर खरे उतरें. अब इसी तरह की कार्रवाई एनर्जी ड्रिंक कंपनियों के खिलाफ भी की गई है.
भारत और यूरोपीय संघ ने यूरोपीय शिप रीसाइक्लिंग रेगुलेशन (EUSRR) के तहत भारतीय शिप रीसाइक्लिंग यार्ड्स को मान्यता दिलाने की दिशा में हुई प्रगति की समीक्षा की.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत शिप रीसाइक्लिंग उद्योग में वैश्विक नेतृत्व हासिल करने की दिशा में बड़ा कदम उठा रहा है. केंद्र सरकार ने अगले दशक में करीब 16,000 जहाजों की रीसाइक्लिंग का लक्ष्य तय किया है. इसके लिए 8 अरब डॉलर (करीब ₹76,000 करोड़) की वित्तीय सहायता का ऐलान किया गया है. साथ ही भारत और यूरोपीय संघ (EU) ने टिकाऊ एवं पर्यावरण-अनुकूल शिप रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देने के लिए सहयोग मजबूत करने पर सहमति जताई है.
अगले दशक में 16,000 जहाजों की रीसाइक्लिंग का लक्ष्य
केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने कहा कि भारत अगले 10 वर्षों में करीब 16,000 जहाजों की रीसाइक्लिंग का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है. सरकार ने शिपबिल्डिंग और शिप रीसाइक्लिंग सेक्टर को गति देने के लिए 8 अरब डॉलर (करीब ₹76,000 करोड़) की वित्तीय सहायता की घोषणा की है.
EU के साथ बढ़ेगा सहयोग
भारत और यूरोपीय संघ ने टिकाऊ शिप रीसाइक्लिंग के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई है. दोनों पक्षों ने यूरोपीय शिप रीसाइक्लिंग रेगुलेशन (EUSRR) के तहत भारतीय शिप रीसाइक्लिंग यार्ड्स को मान्यता दिलाने की दिशा में हुई प्रगति की समीक्षा की. वर्तमान में भारत के 30 से अधिक यार्ड EU की मंजूरी पाने की प्रक्रिया में हैं.
रोजगार और पर्यावरण दोनों को मिलेगा लाभ
सोनोवाल ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलने से भारतीय रीसाइक्लिंग सुविधाओं की वैश्विक स्वीकार्यता बढ़ेगी. इससे पर्यावरण-अनुकूल रीसाइक्लिंग को बढ़ावा मिलेगा, नए रोजगार पैदा होंगे और समुद्री क्षेत्र में टिकाऊ विकास को मजबूती मिलेगी.
संयुक्त कार्य समूह बनाने का प्रस्ताव
यूरोपीय आयोग की आयुक्त जेसिका रोसवाल ने भारतीय यार्ड्स की प्रगति की सराहना करते हुए प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए एक संयुक्त कार्य समूह (JWG) बनाने का प्रस्ताव रखा. उन्होंने कहा कि अंतिम निर्णय से पहले EU सदस्य देशों के साथ इस विषय पर चर्चा की जाएगी. साथ ही भारतीय शिप रीसाइक्लिंग सुविधाओं का दौरा करने की भी इच्छा जताई.
भारत की वैश्विक हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही
संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन (UNCTAD) के अनुसार, वैश्विक शिप रीसाइक्लिंग में भारत की हिस्सेदारी 2024 के 30.1 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 35.4 प्रतिशत हो गई है. वर्ष 2025 में भारत ने 2.99 मिलियन ग्रॉस टन (GT) जहाजों की रीसाइक्लिंग की, जो 2024 के 1.86 मिलियन GT की तुलना में लगभग 60 प्रतिशत अधिक है.
अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो रहे यार्ड
सरकार के अनुसार, भारतीय शिप रीसाइक्लिंग यार्ड्स ने अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण और सुरक्षा मानकों के अनुरूप अपने बुनियादी ढांचे को मजबूत किया है. इनमें एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट, वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन प्रणाली, श्रमिकों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं और आवास जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं. सरकार नियमित और बिना पूर्व सूचना के निरीक्षण के जरिए पर्यावरण संरक्षण, श्रमिक सुरक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित कर रही है.
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट (FSR) के विश्लेषण में एलारा सिक्योरिटीज ने कहा है कि NBFC क्षेत्र की परिसंपत्ति गुणवत्ता, पूंजी स्थिति और ऋण वसूली मजबूत बनी हुई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ताजा वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट (Financial Stability Report-FSR) के विश्लेषण में एलारा सिक्योरिटीज ने कहा है कि देश का गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (NBFC) क्षेत्र मजबूत स्थिति में है. परिसंपत्ति गुणवत्ता में सुधार, पर्याप्त पूंजी और प्रमुख ऋण श्रेणियों में घटते जोखिम के चलते सेक्टर की स्थिति बेहतर बनी हुई है. हालांकि, सोने की ऊंची कीमतों के कारण गोल्ड लोन में तेजी से बढ़ोतरी ऐसे क्षेत्र के रूप में उभर रही है, जिस पर लगातार नजर रखने की जरूरत होगी.
सबसे तेजी से बढ़ा गोल्ड लोन सेगमेंट
एलारा सिक्योरिटीज के अनुसार, पिछले दो वर्षों में गोल्ड लोन की वृद्धि अन्य रिटेल लोन श्रेणियों की तुलना में कहीं अधिक रही है और इसमें NBFCs की सबसे बड़ी भूमिका रही है. वित्त वर्ष 2024 से 2026 के दौरान गोल्ड लोन की वृद्धि दर गैर-हाउसिंग रिटेल लोन की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) से लगभग दोगुनी रही. वर्तमान में NBFC के कुल रिटेल लोन पोर्टफोलियो में गोल्ड लोन की हिस्सेदारी 17.4 प्रतिशत तक पहुंच गई है.
FY26 में गोल्ड लोन पोर्टफोलियो लगभग दोगुना
रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में NBFCs का गोल्ड लोन पोर्टफोलियो सालाना आधार पर 96.5 प्रतिशत बढ़ा, जबकि पूरे उद्योग की वृद्धि दर 54.5 प्रतिशत रही. देश में बकाया गोल्ड लोन अब कुल उपभोक्ता ऋण का लगभग 11 प्रतिशत हिस्सा बन चुके हैं. इसकी बड़ी वजह सोने की रिकॉर्ड ऊंची कीमतें हैं. रिपोर्ट के अनुसार, नए गोल्ड लोन का मूल्य बकाया गोल्ड लोन से करीब 13 लाख करोड़ रुपये अधिक रहा. इससे संकेत मिलता है कि कई ग्राहक पुराने लोन का नवीनीकरण (रोलओवर) कर अधिक मूल्य वाले सोने के बदले बड़ी राशि उधार ले रहे हैं.
जोखिम फिलहाल नियंत्रित, लेकिन सतर्कता जरूरी
एलारा का मानना है कि फिलहाल जोखिम नियंत्रित है क्योंकि अधिकतर ऋण मौजूदा ग्राहकों को ही दिए जा रहे हैं. नए ग्राहकों की हिस्सेदारी लगभग 6 प्रतिशत पर स्थिर बनी हुई है, जबकि लोन-टू-वैल्यू (LTV) अनुपात 60 प्रतिशत से नीचे है. इसके बावजूद ब्रोकरेज ने चेतावनी दी है कि यदि सोने की कीमतों में अधिक उतार-चढ़ाव आता है तो जोखिम बढ़ सकता है.
NBFC सेक्टर की परिसंपत्ति गुणवत्ता में सुधार
रिपोर्ट में NBFC सेक्टर की समग्र स्थिति को सकारात्मक बताया गया है. विभिन्न श्रेणियों में स्लिपेज रेशियो में गिरावट दर्ज की गई है. मिडिल-लेयर NBFCs का स्लिपेज रेशियो घटकर 3 प्रतिशत रह गया है, जबकि अपर-लेयर NBFCs में यह 4.8 प्रतिशत है.
RBI का नॉन-बैंकिंग स्टेबिलिटी इंडिकेटर (NBSI) भी अपने दीर्घकालिक औसत से नीचे बना हुआ है, जो प्रणालीगत जोखिम में कमी का संकेत देता है. वहीं, सेक्टर का पूंजी पर्याप्तता अनुपात (CRAR) करीब 24.6 प्रतिशत है, जो नियामकीय आवश्यकता से काफी अधिक है.
MSME और माइक्रोफाइनेंस में भी स्थिति बेहतर
एलारा सिक्योरिटीज ने MSME और माइक्रोफाइनेंस सेक्टर में भी सुधार की बात कही है. MSME पोर्टफोलियो में सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां (GNPA) घटकर 5.4 प्रतिशत रह गई हैं. सेवा क्षेत्र में यह अनुपात केवल 3.1 प्रतिशत है.
माइक्रोफाइनेंस क्षेत्र में भी शुरुआती स्तर का तनाव कम हुआ है. 31 से 180 दिन तक बकाया रहने वाले ऋण मार्च 2026 में घटकर 1.8 प्रतिशत रह गए, जबकि छह महीने पहले यह 4.4 प्रतिशत था. इससे उधारकर्ताओं की भुगतान क्षमता में सुधार का संकेत मिलता है.
उपभोक्ता ऋण बना विकास का प्रमुख आधार
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में घरेलू उधारी का सबसे बड़ा आधार उपभोक्ता ऋण बना हुआ है. गैर-हाउसिंग रिटेल लोन अब कुल घरेलू उधारी का 58.4 प्रतिशत हिस्सा हैं, जो वित्त वर्ष 2025 में 54.9 प्रतिशत था. वहीं, उपभोग आधारित ऋण कुल घरेलू उधारी का लगभग आधा हिस्सा बनाते हैं. वित्त वर्ष 2025-26 में NBFCs का उपभोक्ता ऋण पोर्टफोलियो 22.5 प्रतिशत की दर से बढ़ा, जो बैंकों की तुलना में लगभग 5 प्रतिशत अधिक है.
उपभोक्ता ऋण में NBFCs का GNPA अनुपात घटकर 1.1 प्रतिशत रह गया, जबकि बैंकों में यह 1.2 प्रतिशत है. हालांकि बिजनेस लोन श्रेणी में जोखिम अपेक्षाकृत अधिक बना हुआ है, लेकिन वहां भी GNPA घटकर 1.8 प्रतिशत पर आ गया है.
बैंकों का NBFC पर बढ़ा भरोसा
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि NBFCs के वित्तपोषण में बैंकों की हिस्सेदारी बढ़ रही है. पिछले एक वर्ष में बैंकों की हिस्सेदारी बढ़कर 43.5 प्रतिशत हो गई है, जो इस क्षेत्र में उनके बढ़ते भरोसे को दर्शाती है. हालांकि, 50,000 रुपये से कम के छोटे व्यक्तिगत ऋण बाजार में NBFCs की हिस्सेदारी घटकर 30.7 प्रतिशत रह गई है. इस श्रेणी में फिनटेक कंपनियों का दबदबा बढ़कर 56.8 प्रतिशत हो गया है. हालांकि इस सेगमेंट में डिफॉल्ट का स्तर अभी भी अपेक्षाकृत ऊंचा बना हुआ है.
FY27 में इन क्षेत्रों पर रहेगी नजर
एलारा सिक्योरिटीज का मानना है कि NBFC सेक्टर में प्रणालीगत जोखिम फिलहाल नियंत्रित हैं और मजबूत परिसंपत्ति गुणवत्ता, पर्याप्त पूंजी तथा बेहतर उधारकर्ता प्रोफाइल इसके प्रमुख कारण हैं. हालांकि वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान गोल्ड लोन और MSME ऋण ऐसे दो क्षेत्र होंगे, जिन पर सबसे अधिक नजर रहेगी. यदि सोने की कीमतों में अधिक उतार-चढ़ाव आता है या आर्थिक परिस्थितियां बदलती हैं, तो नियामकीय निगरानी और सख्त हो सकती है.
इस योजना के तहत इस्पात उत्पादन में स्वच्छ तकनीकों और वैकल्पिक कच्चे माल के उपयोग को बढ़ावा दिया जाएगा, ताकि उद्योग के कार्बन फुटप्रिंट को कम किया जा सके.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के इस्पात उद्योग को पर्यावरण के अनुकूल बनाने की दिशा में केंद्र सरकार बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है. सरकार अगले तीन महीनों में 5,000 करोड़ रुपये की ग्रीन स्टील योजना लॉन्च कर सकती है. इस योजना का उद्देश्य स्वच्छ तकनीकों को बढ़ावा देना, कार्बन उत्सर्जन कम करना और 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन के राष्ट्रीय लक्ष्य को हासिल करने में इस्पात क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाना है.
कैबिनेट की मंजूरी के लिए जाएगा प्रस्ताव
सरकारी अधिकारियों के अनुसार, प्रस्तावित योजना को फिलहाल 'नेशनल स्ट्रेटेजी फॉर सस्टेनेबल सेकेंडरी स्टील' नाम दिया गया है. इसे जल्द ही केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के लिए पेश किया जाएगा. योजना का लाभ सभी इस्पात उत्पादकों को मिलेगा, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा सेकेंडरी स्टील निर्माताओं के लिए निर्धारित किया जा सकता है, जिनका देश के कुल इस्पात उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान है.
स्वच्छ तकनीकों को मिलेगा बढ़ावा
इस योजना के तहत इस्पात उत्पादन में स्वच्छ तकनीकों और वैकल्पिक कच्चे माल के उपयोग को बढ़ावा दिया जाएगा, ताकि उद्योग के कार्बन फुटप्रिंट को कम किया जा सके. ऐसे समय में यह पहल सामने आई है, जब भारत घरेलू मांग को पूरा करने के लिए इस्पात उत्पादन क्षमता बढ़ा रहा है और साथ ही पेरिस जलवायु समझौते के तहत अपने पर्यावरणीय लक्ष्यों को भी पूरा करने की दिशा में काम कर रहा है.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में प्रति टन कच्चे इस्पात के उत्पादन पर लगभग 2.55 टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है, जबकि वैश्विक औसत करीब 1.9 टन प्रति टन है. इससे स्पष्ट होता है कि इस क्षेत्र में उत्सर्जन कम करने की बड़ी चुनौती मौजूद है.
सेकेंडरी स्टील उत्पादकों को मिलेगा अधिक लाभ
उद्योग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि इस योजना का सबसे अधिक लाभ सेकेंडरी स्टील उत्पादकों को मिलने की संभावना है, क्योंकि उनके पास आधुनिक और कम-कार्बन तकनीकों में निवेश के लिए अपेक्षाकृत सीमित पूंजी होती है. योजना के माध्यम से ऊर्जा दक्ष प्रक्रियाओं, स्वच्छ ईंधन और नई उत्पादन तकनीकों को अपनाने में सहायता दी जाएगी, जिससे उत्सर्जन घटाने के साथ उत्पादन क्षमता भी बेहतर होगी. यह पहल सरकार के ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग अभियान और टिकाऊ औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने की व्यापक रणनीति का भी हिस्सा मानी जा रही है.
2030 के लक्ष्य और 2070 के नेट-जीरो मिशन पर फोकस
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कच्चा इस्पात उत्पादक देश है और सरकार ने वर्ष 2030 तक देश की वार्षिक इस्पात उत्पादन क्षमता 300 मिलियन टन तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है. इस लक्ष्य को हासिल करने के साथ-साथ कार्बन उत्सर्जन में कमी लाना भी सरकार और उद्योग दोनों के लिए बड़ी प्राथमिकता बन चुका है.
यदि इस योजना को मंजूरी मिलती है, तो यह इस्पात क्षेत्र के डीकार्बोनाइजेशन के लिए सरकार की अब तक की सबसे बड़ी वित्तीय पहलों में से एक होगी और भारत में प्रतिस्पर्धी ग्रीन स्टील इकोसिस्टम विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है.
Samsung Catalyst Fund समेत कई वैश्विक निवेशकों ने किया निवेश, अब तक 60 मिलियन डॉलर की फंडिंग हासिल
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
AI और GPU आर्किटेक्चर विकसित करने वाली कंपनी OXMIQ Labs Inc. ने 35 मिलियन डॉलर की सीरीज-A फंडिंग जुटाने का ऐलान किया है. इस निवेश के साथ कंपनी अब तक कुल 60 मिलियन डॉलर की पूंजी जुटा चुकी है. इस फंडिंग का इस्तेमाल कंपनी अपने लाइसेंस योग्य GPU आर्किटेक्चर OxCore के विस्तार के लिए करेगी, जिससे सेमीकंडक्टर कंपनियां और AI सिस्टम निर्माता बिना पूरा चिप प्रोग्राम विकसित किए अपनी जरूरत के मुताबिक कस्टम AI सिलिकॉन तैयार कर सकेंगे.
इस निवेश दौर का नेतृत्व Fundomo और Samsung Catalyst Fund ने संयुक्त रूप से किया. इसके अलावा MediaTek, AM Intelligence Labs, Pegatron Venture Capital, CDIB-TEN, Darwin Ventures, Morgan Creek Digital समेत कई वित्तीय और रणनीतिक निवेशकों ने भी इसमें भागीदारी की.
AI इंफ्रास्ट्रक्चर की बढ़ती मांग को पूरा करने पर फोकस
कंपनी का कहना है कि AI आधारित सेवाओं की बढ़ती मांग के कारण मौजूदा कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पर दबाव बढ़ रहा है. इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए OXMIQ ने Atoms to Agents अवधारणा पर आधारित नई GPU आर्किटेक्चर विकसित की है, जो सिलिकॉन IP, कॉन्फिगरेबल सिस्टम और सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म को एक साथ जोड़ती है.
OxCore में एक साथ तीन कंप्यूट इंजन
OXMIQ की प्रमुख तकनीक OxCore एक स्केलेबल और लाइसेंस योग्य GPU कोर है, जिसमें तीन अलग-अलग कंप्यूट इंजन एक साथ काम करते हैं.
1. CUDA®-कम्पैटिबल GPU इंजन
2. Tensor Processing Engine
3. Orchestration Engine (CPU)
कंपनी के अनुसार, यह डिजाइन डेटा ट्रांसफर को कम करता है, जिससे AI वर्कलोड के दौरान ऊर्जा दक्षता और कंप्यूटिंग प्रदर्शन बेहतर होता है. यह तकनीक छोटे AI सिस्टम से लेकर बड़े डेटा सेंटर तक आसानी से स्केल की जा सकती है. फिलहाल इसका लाइव डेमो FPGA प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है.
OxQuilt देगा कस्टम AI चिप बनाने की सुविधा
कंपनी ने OxQuilt नामक नई चिपलेट इंटीग्रेशन आर्किटेक्चर भी विकसित की है. इसकी मदद से विभिन्न प्रकार के कंप्यूट चिपलेट और मेमोरी को एक ही पैकेज में जोड़ा जा सकता है.
कंपनी का दावा है कि यह तकनीक किसी एक फाउंड्री या मेमोरी सिस्टम पर निर्भर नहीं है. ग्राहक अपनी जरूरत के अनुसार अलग-अलग प्रोसेस नोड, मेमोरी तकनीक, इंटरकनेक्ट स्टैंडर्ड और एडवांस पैकेजिंग विकल्प चुन सकते हैं. इससे कंपनियां कम लागत में कस्टम AI सिलिकॉन तैयार कर सकेंगी.
डेवलपर्स के लिए तैयार किया सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म
OXMIQ ने हार्डवेयर के साथ एक व्यापक सॉफ्टवेयर स्टैक भी विकसित किया है. OxPython के जरिए डेवलपर्स बिना किसी कोड में बदलाव किए मौजूदा CUDA® और PyTorch® एप्लिकेशन OxCore पर चला सकेंगे. कंपनी के मुताबिक यह प्लेटफॉर्म नए AI मॉडल्स के लिए पहले दिन से ही सपोर्ट उपलब्ध कराता है.
पूंजी बचाने वाला बिजनेस मॉडल
कंपनी का कहना है कि उसका बिजनेस मॉडल पूरी चिप बनाने के बजाय आर्किटेक्चर IP लाइसेंसिंग पर आधारित है. इससे ग्राहक परियोजनाओं के जरिए राजस्व भी मिलता है और कंपनी को बड़े पैमाने पर पूंजी खर्च करने की आवश्यकता भी नहीं पड़ती.
Samsung Catalyst Fund ने जताया भरोसा
Samsung Catalyst Fund के एसवीपी एवं मैनेजिंग डायरेक्टर डेविड (डेडे) गोल्डश्मिट ने कहा कि OXMIQ का नया AI कोर और सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म बड़े पैमाने पर AI वर्कलोड के लिए अधिक कुशल और कस्टम समाधान उपलब्ध कराता है. उन्होंने कहा कि कंपनी की तकनीक भविष्य के AI इंफ्रास्ट्रक्चर को नई दिशा दे सकती है.
वहीं Fundomo के पार्टनर राजीव सुरती ने कहा कि OXMIQ का मॉडल ग्राहकों को चिप, मेमोरी और पैकेजिंग को अपनी जरूरत के अनुसार डिजाइन करने की स्वतंत्रता देता है, जिससे AI कंप्यूटिंग की लागत में कमी आएगी.
बोर्ड में शामिल हुए जिम केलर
कंपनी ने अपने बोर्ड और सलाहकार समूह का भी विस्तार किया है. प्रसिद्ध चिप आर्किटेक्ट और Tenstorrent के CEO जिम केलर OXMIQ के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में शामिल हो गए हैं. वहीं Intel के पूर्व प्रोसेस टेक्नोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. वल्लुरी (बॉब) राव कंपनी के सलाहकार बने हैं.
OXMIQ के संस्थापक एवं CEO राजा कोडुरी ने कहा कि खुली और लाइसेंस योग्य GPU आर्किटेक्चर दुनिया भर की डिजाइन टीमों को अपनी जरूरत के अनुसार AI सिलिकॉन विकसित करने की आजादी देगी. उन्होंने कहा कि AI तभी वास्तव में सभी के लिए उपयोगी बन सकता है, जब इसकी कंप्यूटिंग लागत कम हो और अधिक से अधिक कंपनियां इस तकनीक का इस्तेमाल कर सकें.
भारत में AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी होगा फोकस
AM Intelligence Labs के साथ मिलकर OXMIQ भारत में 5 गीगावॉट AI फैक्ट्री विकसित करने की दिशा में भी काम कर रही है. इसमें से 3 गीगावॉट क्षमता नवीकरणीय ऊर्जा आधारित AI कंप्यूटिंग प्लेटफॉर्म के रूप में विकसित की जाएगी. कंपनी ने बताया कि वह सेमीकंडक्टर कंपनियों, AI सिस्टम निर्माताओं, नियोक्लाउड कंपनियों और रोबोटिक्स क्षेत्र के संगठनों के साथ साझेदारी के लिए भी काम कर रही है.