शेयर बाजार की चाल आज कैसी रहेगी सटीक तौर पर बताना मुश्किल है, लेकिन कुछ शेयरों में तेजी के संकेत ज़रूर मिले हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
शेयर बाजार (Stock Market) में निवेश करने वालों के लिए मंगलवार का दिन अच्छा रहा. अप्रैल में खुदरा महंगाई दर में आई नरमी के साथ ही कुछ दिग्गज शेयरों में लिवाली के चलते बाजार में मजबूती आई. इस दौरान, बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) का 30 शेयरों पर आधारित सेंसेक्स 328.48 अंक चढ़कर 73,104.61 और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का निफ्टी 113.80 अंक उछलकर 22,217.85 पर बंद हुआ. Sensex की कंपनियों में SBI, M&M, JSW स्टील, लार्सन एंड टुब्रो, NTPC और इंडसइंड बैंक जैसे शेयर लाभ में रहे. चलिए जानते हैं कि आज कौनसे शेयर ट्रेंड में रह सकते हैं.
MACD के ये हैं संकेत
शुरुआत करते हैं MACD के संकेतों से. मोमेंटम इंडिकेटर मूविंग एवरेज कन्वर्जेंस डिवर्जेंस (MACD) ने आज के लिए केवल 4 शेयरों में तेजी का रुख दर्शाया है. HG Infra Engineering, BEML, Honeywell Automation और Symphony के भाव में उछाल देखने को मिल सकता है. HG इंफ़्रा के शेयर कल 15% की शानदार तेजी के साथ 1,370 रुपए पर बंद हुए थे. BEML 3.36% की बढ़त के साथ 3,800, Honeywell करीब 1 प्रतिशत की मजबूती के साथ 47,700 और Symphony करीब 4 प्रतिशत की तेजी एक साथ 994 रुपए पर पहुंच गया था. इसी तरह, MACD ने Axis Bank, Carborundum Universal, Colgate-Palmolive और TRF में मंदी का संकेत दिया है. लिहाजा इन शेयरों में निवेश को लेकर सावधान रहें.
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इन पर भी बनाए रखें नजर
अब उन शेयरों के बारे में जानते हैं जिनमें मजबूत खरीदारी देखने को मिल रही है. इस लिस्ट में अनिल अग्रवाल की वेदांता के साथ ही Finolex Industries, Timken India, Apar Industries, JSPL, CG Power, Industrial Solutions और M&M शामिल हैं. Vedanta के शेयर कल करीब 5 प्रतिशत चढ़कर 433.05 रुपए पर पहुंच गए थे. बीते 5 दिनों में इस शेयर ने 7.38% और इस साल अब तक 68.40% का रिटर्न दिया है. इसी तरह, Finolex Industries के लिए भी कल का दिन बेहद शानदार रहा. कंपनी का शेयर इस दौरान करीब 11 प्रतिशत की मजबूती हासिल करते हुए 299.50 रुपए के लेवल पर पहुंच गया. वहीं, Clean Science & Technology के शेयरों में बिकवाली का दबाव नजर आ रहा है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है).
बॉम्बे रेयॉन पर ₹7,358 करोड़ का सार्वजनिक धन बकाया रहते हुए कंपनी का अंत हो गया. तारापुर में एक समानांतर कपड़ा साम्राज्य अब भी चल रहा है. क्या बॉम्बे रेयॉन के कर्जदाताओं, परिसमापक और जांच एजेंसियों को इसकी जानकारी है?
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
तारापुर में कपड़ा साम्राज्य
बॉम्बे रेयॉन के परिसमापक के पास नीलामी के लिए फ्लैट, दो कारें और 196 लूम कार्ड बचे थे. कंपनी के कर्मचारियों को प्रति रुपये के दावे पर सिर्फ 14 पैसे मिले. लेकिन उसी औद्योगिक क्षेत्र में कपड़ा कारोबार की एक दूसरी कंपनी चल रही है. इसमें 41.13% हिस्सेदारी रखने वाली निजी कंपनी ने कभी कंपनी रजिस्ट्रार के पास बॉम्बे रेयॉन के अपने ईमेल पते का इस्तेमाल करते हुए दस्तावेज दाखिल किए थे.
बॉम्बे रेयॉन फैशंस लिमिटेड खुद को भारत की सबसे बड़ी शर्ट निर्माता कंपनी बताती थी. इसके 13 प्लांट थे. कंपनी हर साल 10 करोड़ मीटर कपड़ा बनाती थी और इसमें करीब 38,000 कर्मचारी काम करते थे. एक समय इसके शेयर ₹400 से ऊपर कारोबार करते थे.
2013 से 2017 के बीच भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की अगुवाई वाले सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के एक समूह ने कंपनी को तीन बार संकट से उबारा. अगस्त 2018 में एसबीआई ने ₹2,260.79 करोड़ के अपने कर्ज एक्सपोजर को ₹900 करोड़ में बेच दिया. जून 2022 में ₹1.61 करोड़ का बकाया रखने वाले एक धागा कारोबारी की याचिका पर कंपनी को दिवाला प्रक्रिया में शामिल किया गया. 9 नवंबर 2023 को ₹7,358.95 करोड़ के स्वीकार किए गए दावों के साथ कंपनी को परिसमापन में भेजने का आदेश दिया गया.
बैंकों की ओर से कंपनी को बचाने की ये तीनों कोशिशें सामान्य प्रक्रिया नहीं थीं. 2013 में एसबीआई के नेतृत्व वाले कर्जदाताओं के समूह ने कॉरपोरेट डेट रिस्ट्रक्चरिंग (सीडीआर) व्यवस्था के तहत बॉम्बे रेयॉन के करीब ₹4,000 करोड़ के कर्ज का पुनर्गठन किया. 2016 में मामला ज्वाइंट लेंडर्स फोरम के पास पहुंचा. 2017 में एक खबर आई कि कंपनी ने कर्मचारियों के भविष्य निधि (पीएफ) अंशदान का दुरुपयोग किया है. इसके बाद एसबीआई ने कंपनी को स्ट्रेस्ड एसेट्स के सस्टेनेबल स्ट्रक्चरिंग की योजना (एस4ए) के तहत रखा. इस व्यवस्था में प्रमुख बैंक को प्रमाणित करना होता है कि मौजूदा नकदी प्रवाह से कम से कम आधे कर्ज का भुगतान किया जा सकता है.
इस प्रमाणन के 14 महीने बाद एसबीआई ने ₹1,361 करोड़ के डिस्काउंट पर कर्ज बेच दिया. पांच साल बाद कंपनी का परिसमापन हो गया.
2,027 कर्मचारियों ने कुल ₹29.93 करोड़ का दावा किया था, लेकिन इनमें से सिर्फ ₹4.10 करोड़ स्वीकार किए गए.
जुलाई 2024 में परिसमापक ने पूरी बची हुई कंपनी को चालू कारोबार के रूप में ₹18.32 करोड़ के आरक्षित मूल्य पर बेचने की पेशकश की. इसके बाद से वह बेंगलुरु में फ्लैट, एक टोयोटा इनोवा, एक स्कोडा कोडियाक, बेल्लारी में एक पवनचक्की और 196 इलेक्ट्रिकल लूम कार्ड की नीलामी करता रहा है. रिकॉर्ड में सबसे हालिया नोटिस 10 जून 2026 का है.
बॉम्बे रेयॉन का अंत यहीं हो गया
लेकिन कॉरपोरेट पतन का एक ऐसा पहलू भी है, जिसकी कोई जांच नहीं करता.
बैंक अपने नुकसान को बट्टे खाते में डाल देता है, कर्मचारियों को प्रति रुपये पर 14 पैसे मिलते हैं, फाइल परिसमापक के पास चली जाती है और कहानी खत्म हो जाती है. लेकिन इस मामले में सार्वजनिक रिकॉर्ड बताते हैं कि कहानी खत्म नहीं हुई. बॉम्बे रेयॉन से जुड़े लोग और उसके आसपास की संरचनाएं कंपनी के साथ गायब नहीं हुईं.
प्रमोटर परिवार के उपनाम वाली एक कंपनी, जिसमें बॉम्बे रेयॉन के अपने वित्त प्रमुख और कर्मचारी हिस्सेदार हैं, उसी औद्योगिक क्षेत्र में एक चालू स्पिनिंग मिल को नियंत्रित करती है. इस तथ्य को साबित करने वाले सभी दस्तावेज सार्वजनिक रिकॉर्ड में उपलब्ध हैं. कोई भी बैंक अधिकारी, समाधान पेशेवर या जांचकर्ता इन्हें देख सकता है. इनके लिए किसी विशेष वारंट या समन की जरूरत नहीं है.
गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (एसएफआईओ) ने जांच शुरू कर दी है. फाइलों में उसे क्या मिलेगा, यह इस रिपोर्ट में बताया गया है.
समानांतर साम्राज्य: लिनेन आर्ट
मुंबई से 80 किलोमीटर उत्तर में एमआईडीसी तारापुर औद्योगिक क्षेत्र स्थित है. इसी क्षेत्र में बॉम्बे रेयॉन का प्रोसेसिंग कॉम्प्लेक्स था. यहां एक दूसरी कपड़ा कंपनी भी चल रही है.
लिनेन आर्ट प्राइवेट लिमिटेड प्लॉट डी-8 में 12,544 स्पिंडल संचालित करती है. एक क्रेडिट रेटिंग आकलन में इसे भारत का तीसरा सबसे बड़ा लिनेन यार्न निर्माता बताया गया है. इसका परिचालन लाभ 2020-21 में ₹24.64 करोड़ से बढ़कर 2022-23 में ₹35.21 करोड़ हो गया. कंपनी के पास मशीनरी, कर्मचारी और ऑडिट किए गए खाते हैं.
लिनेन आर्ट का गठन 27 दिसंबर 2013 को हुआ था. यह बॉम्बे रेयॉन के बोर्ड द्वारा 19 जुलाई 2013 को पहले कॉरपोरेट डेट रिस्ट्रक्चरिंग को मंजूरी दिए जाने के पांच महीने बाद की बात है.
कंपनी के रिकॉर्ड में इसके संस्थापक निदेशकों के रूप में प्रशांत जनार्दन अग्रवाल और अमन अग्रवाल के नाम दर्ज हैं. उस समय दोनों बॉम्बे रेयॉन फैशंस के निदेशक थे.
31 मार्च 2023 की स्थिति के अनुसार, लिनेन आर्ट के सदस्यों का रजिस्टर 11 नामों का है. कुल 3.89 करोड़ शेयरों में से सबसे बड़ी हिस्सेदारी एशवेल टेक्सटाइल्स प्राइवेट लिमिटेड के पास है. इसके पास 1.60 करोड़ शेयर यानी 41.13% हिस्सेदारी है.
इसके अतिरिक्त 21.98% हिस्सेदारी छह कंपनियों के पास है. इन सभी कंपनियों का पंजीकृत पता एक ही है: रूम नंबर 5, सातवीं मंजिल, 2ए गणेश चंद्र एवेन्यू, कोलकाता 700013.
लेकिन इस कहानी में एशवेल टेक्सटाइल्स सबसे महत्वपूर्ण है.
8 दिसंबर 2007 को एशवेल टेक्सटाइल्स प्राइवेट लिमिटेड, जिसका सीआईएन U17299MH2006PTC163103 है, ने कंपनी रजिस्ट्रार के पास फॉर्म 20बी पर अपना वार्षिक रिटर्न दाखिल किया.
कंपनी के वैधानिक ईमेल पते वाले कॉलम में, जिसके माध्यम से कंपनी रजिस्ट्रार उससे संपर्क करता है, यह पता दर्ज था: [mail@bombayrayon.com]
इस रिटर्न पर निदेशक चंद्रेश कल्याणजी देधिया ने डिजिटल हस्ताक्षर किए थे. उनका डीआईएन 01436487 है. हस्ताक्षर के साथ जुड़े प्रमाणपत्र में ईमेल पता [chandresh.dedhia@bombayrayon.com]दर्ज है.
उस वर्ष की शेयरधारिता एक ही श्रेणी में दर्ज की गई थी: “निदेशक या निदेशकों के रिश्तेदार — 100.00”. दो शेयरधारक थे. चुकता पूंजी ₹1,00,000 थी, जबकि अधिकृत पूंजी ₹3.5 करोड़ थी.
यानी प्रमोटर परिवार के उपनाम वाली एक निजी कंपनी कंपनी रजिस्ट्रार से उसी सूचीबद्ध कंपनी के ईमेल डोमेन के जरिए संपर्क कर रही थी.
बारह साल बाद एशवेल टेक्सटाइल्स के पास 29,19,150 शेयर और 21 शेयरधारक थे. इनमें से चार नाम सामान्य निवेशकों के नहीं हैं.
ए. आर. मुंद्रा — आशाराम मुंद्रा, डीआईएन 00019234 — बॉम्बे रेयॉन फैशंस के कार्यकारी निदेशक (वित्त) और मुख्य वित्त अधिकारी थे. वह 31 दिसंबर 2021 तक इस पद पर रहे. कंपनी के पतन के दौरान उसके खातों पर हस्ताक्षर करने वाले इस व्यक्ति के पास उस कंपनी के 23,450 शेयर हैं, जो लिनेन आर्ट को नियंत्रित करती है.
5.93% हिस्सेदारी रखने वाले गंगाधर कोटियन बॉम्बे रेयॉन के कर्मचारी हैं. उनका नाम 5 अगस्त 2026 के एसएफआईओ समन में भी है, जिसने इस जांच की शुरुआत की. बॉम्बे रेयॉन की दिवाला प्रक्रिया के दौरान उन्होंने खुद ₹28,64,199 का दावा दाखिल किया, जिसे पूरी तरह स्वीकार कर लिया गया. उन्होंने 33 कर्मचारियों के दावों के लिए अधिकृत प्रतिनिधि के रूप में भी काम किया. इनमें कंपनी के चेयरमैन अमन जनार्दन अग्रवाल का ₹2,15,15,008 का दावा भी शामिल था. पूरी फाइल में यह एकमात्र कर्मचारी दावा था, जिस पर “संबंधित पक्ष: हां” का निशान लगा था. इसे भी पूरी तरह स्वीकार किया गया.
सुधीर गोयल और स्मिता गोयल के पास नवी मुंबई के ऐरोली स्थित एक ही फ्लैट के पते पर दर्ज हिस्सेदारी है. दोनों के पास मिलाकर 8.54% हिस्सेदारी है. सुधीर गोयल ने बॉम्बे रेयॉन के खिलाफ कर्मचारी के रूप में ₹22,81,041 का दावा किया था, जिसे पूरा स्वीकार कर लिया गया. वह प्राध्वी मल्टीट्रेड और ग्रीन शील्ड एंटरप्राइजेज के निदेशक भी हैं. ये उन चार कंपनियों में शामिल हैं, जिनके बॉम्बे रेयॉन के खिलाफ ₹162 करोड़ के दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया गया था.
चंद्रेश देधिया और नाजिम खान, जो 2007 में मूल शेयरधारक थे और जिन्होंने बॉम्बे रेयॉन के ईमेल पते वाले दस्तावेज दाखिल किए थे, अब भी शेयरधारकों के रजिस्टर में मौजूद हैं.
बाकी शेयरधारकों के पते सामान्य आवासीय इलाकों के हैं. इनमें कांदिवली, बोरीवली, मलाड, मुलुंड, ठाणे, वसई और गोरेगांव के फ्लैट शामिल हैं. एक शेयरधारक, जिसके पास 5.20% हिस्सेदारी है, ने घाटकोपर पश्चिम में एक चॉल का पता दिया है.
21 में से 19 शेयरधारकों की हिस्सेदारी 3.6% से 7.0% के बीच है. किसी की भी हिस्सेदारी 7.04% से अधिक नहीं है. रजिस्टर में किसी भी कॉरपोरेट इकाई का नाम नहीं है. कागजों पर कोई भी कंपनी को नियंत्रित नहीं करता.
एशवेल टेक्सटाइल्स ने अपने 2019 के लेटरहेड पर पंजीकृत कार्यालय का पता 402, चौथी मंजिल, कमला हब, एन.एस. रोड नंबर 1, जुहू स्कीम, विले पार्ले (पश्चिम) दर्ज किया है. यही पता एपिक यार्न्स प्राइवेट लिमिटेड ने कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय को दिया है. एपिक यार्न्स का गठन अगस्त 2019 में प्रशांत अग्रवाल के बेटों आयुष और अक्षत अग्रवाल ने किया था.
दोनों रजिस्टरों पर हस्ताक्षर करने वाला व्यक्ति
31 मार्च 2019 की तारीख वाली एशवेल टेक्सटाइल्स के 21 शेयरधारकों की सूची के निचले हिस्से में निदेशक शितांशु बिपिन वोरा के हस्ताक्षर हैं.
लिनेन आर्ट के सदस्यों का रजिस्टर, जिसकी तारीख 9 अगस्त 2023 है और जिसमें एशवेल टेक्सटाइल्स की 41.13% हिस्सेदारी दर्ज है, उस पर भी उसी व्यक्ति ने उसी पदनाम से हस्ताक्षर किए हैं.
वह इस हिस्सेदारी के दोनों पक्षों में मौजूद हैं. वह प्रमाणित करते हैं कि लिनेन आर्ट की मालिक कंपनी का मालिक कौन है और यह भी प्रमाणित करते हैं कि उसी कंपनी के पास लिनेन आर्ट की हिस्सेदारी है.
शितांशु वोरा खुद भी लिनेन आर्ट के दूसरे सबसे बड़े शेयरधारक हैं. उनके नाम पर 19.52% हिस्सेदारी है. माटुंगा के उसी पते पर रहने वाली शीतल वोरा के पास अतिरिक्त 5,000 शेयर हैं. लिनेन आर्ट की 15.42% हिस्सेदारी रखने वाली मेयूबेन वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक भी वोरा दिसंबर 2012 से हैं.
उनकी व्यक्तिगत हिस्सेदारी और जिन दो कंपनियों के बोर्ड में वह हैं, उनकी हिस्सेदारी को जोड़ने पर लिनेन आर्ट की करीब 76% हिस्सेदारी शितांशु वोरा या उनके द्वारा निर्देशित कंपनियों के नियंत्रण में आती है.
डीआईएन 00054986 के तहत दाखिल उनके कॉरपोरेट रिकॉर्ड में 22 कंपनियों का उल्लेख है. इनमें से तीन संबंध महत्वपूर्ण हैं.
वह जनवरी 2006 से जनवरी 2017 तक क्लिनवेंट रियल एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड के पूर्णकालिक निदेशक थे. नवंबर 2018 तक वह इसके बोर्ड में बने रहे. सार्वजनिक निदेशक रिकॉर्ड के अनुसार, यह कंपनी प्रशांत अग्रवाल से जुड़ी हुई है. यानी लिनेन आर्ट के अस्तित्व में आने से सात साल पहले से वह इस कंपनी में पूर्णकालिक कार्यकारी थे.
वह अगस्त 2019 में एपिक यार्न्स के गठन के दिन से अप्रैल 2021 तक इसके निदेशक रहे. एपिक यार्न्स ने कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय के पास जो ईमेल पता दर्ज कराया था, वह [shitanshu.vora@linenart.in] है.
अक्टूबर 2019 में वह स्कॉट्स गारमेंट्स लिमिटेड के बोर्ड में शामिल हुए.** बेंगलुरु की इस कंपनी के पूर्व निदेशकों में प्रशांत और अमन अग्रवाल दोनों शामिल थे. लिनेन आर्ट में उनके सह-निदेशक विमल कुमार गोयनका भी इससे जुड़े थे. अग्रवाल आठ साल पहले इस कंपनी से जा चुके थे. लेकिन यहां एक समान क्रम दिखाई देता है: दो अलग-अलग कंपनियों में पहले अग्रवाल बोर्ड में आते हैं और बाद में वोरा तथा गोयनका.
दिसंबर 2018 से फरवरी 2020 के बीच, यानी बॉम्बे रेयॉन के तारापुर कारोबार को उससे अलग किए जाने से पहले के 18 महीनों में, वोरा ने कपड़ा और उससे जुड़े क्षेत्रों की आठ कंपनियों के बोर्ड में पद संभाले. इनमें एशवेल टेक्सटाइल्स भी शामिल थी.
एशवेल टेक्सटाइल्स की शेयरधारिता, बॉम्बे रेयॉन के ईमेल डोमेन से 2007 में दाखिल दस्तावेज और अग्रवाल परिवार की कंपनियों से उनके संबंधों पर शितांशु बिपिन वोरा और लिनेन आर्ट प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक विमल कुमार गोयनका को ईमेल के जरिए विस्तृत सवाल भेजे गए. दोनों ने कोई जवाब नहीं दिया.
एशवेल नाम की दो कंपनियां
एशवेल नाम दो अलग-अलग कंपनियों में दिखाई देता है. इन दोनों के बीच का अंतर इस पूरी कहानी का अहम हिस्सा है.
एशवेल होल्डिंग कंपनी प्राइवेट लिमिटेड बॉम्बे रेयॉन की घोषित प्रमोटर इकाई थी, जिसके पास सूचीबद्ध कंपनी की 7.92% हिस्सेदारी थी. 31 मार्च 2016 की स्थिति के अनुसार, इसके शेयरधारकों के रजिस्टर में नीदरलैंड के एम्स्टेलवीन स्थित क्रिज्समैन 15-8 के पते वाली एएए यूनाइटेड बी.वी. के पास इसके कुल 86.38 करोड़ शेयरों में से 85.84 करोड़ शेयर थे. यानी 99.38% हिस्सेदारी. शेष हिस्सेदारी रेनॉल्ड शर्टिंग लिमिटेड के पास थी. अमन अग्रवाल और प्रशांत अग्रवाल के नाम पर भी 25,000-25,000 शेयर थे.
नीदरलैंड की कंपनी एएए यूनाइटेड बी.वी. ने अप्रैल 2009 में ₹333 करोड़ में बॉम्बे रेयॉन की 20.67% हिस्सेदारी खरीदी थी. बाद में उसके पास परिवार की घोषित प्रमोटर इकाई एशवेल होल्डिंग की 99.38% हिस्सेदारी और सूचीबद्ध कंपनी की सीधे अपने नाम पर 13.83% हिस्सेदारी आ गई. इस डच कंपनी के पीछे कौन है और उसने प्रमोटर होल्डिंग कंपनी का नियंत्रण किस कीमत पर हासिल किया, इसका विवरण भारतीय रिकॉर्ड में नहीं है. एसएफआईओ, सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय इसकी जांच कर सकते हैं.
दोनों कॉरपोरेट शेयरधारक खुद बॉम्बे रेयॉन के प्रमोटर समूह का हिस्सा थे. एएए यूनाइटेड बी.वी. के पास सूचीबद्ध कंपनी की सीधे 13.83% हिस्सेदारी थी, जबकि रेनॉल्ड शर्टिंग के पास 3.98% हिस्सेदारी थी.
इस तरह एक एशवेल कंपनी का स्वामित्व खुले तौर पर परिवार और एक डच इकाई के पास था. इसी कंपनी के पास उस कंपनी में परिवार की घोषित हिस्सेदारी थी, जो बाद में विफल हो गई.
दूसरी एशवेल कंपनी ने बॉम्बे रेयॉन के ईमेल पते का इस्तेमाल कर दस्तावेज दाखिल किए. इसमें कंपनी के वित्त प्रमुख और कर्मचारी हिस्सेदार हैं और यह उस कारोबार में नियंत्रणकारी हिस्सेदारी रखती है, जो अब भी चल रहा है.
दोनों कंपनियों के दस्तावेजों पर, जहां जरूरी था, एक ही निदेशक के हस्ताक्षर हैं.
यह जानने के लिए गहन जांच जरूरी है कि क्या बॉम्बे रेयॉन से कोई पैसा दूसरी जगह भेजा गया था, क्या एशवेल टेक्सटाइल्स एक नाममात्र की स्वामित्व संरचना है या इन कंपनियों का संचालन एक इकाई के रूप में किया गया था.
एसएफआईओ बॉम्बे रेयॉन की जांच कर रहा है, लेकिन उसकी प्रक्रिया और कामकाज बेहद धीमा है. जांच को अधिकृत करने वाला एसएफआईओ का आदेश 30 अक्टूबर 2025 का है. रिकॉर्ड में पहला समन नौ महीने से अधिक समय बाद, 5 अगस्त 2026 को जारी किया गया.
रिकॉर्ड एक सवाल खड़ा करते हैं, जिसका जवाब दस्तावेजों में मौजूद है.
एशवेल टेक्सटाइल्स में 21 शेयरधारकों की हिस्सेदारी के लिए पैसा किसने दिया और इसका लाभ किसे मिल रहा है?
2007 में इस कंपनी के दो शेयरधारक और ₹1 लाख की पूंजी थी. 2019 तक इसके 21 शेयरधारक, 29.19 लाख शेयर और तारापुर की एक स्पिनिंग मिल में नियंत्रणकारी हिस्सेदारी थी.
इन दोनों स्थितियों के बीच की दूरी तय करने के लिए किसी ने पैसा लगाया था.
अगली कड़ी: एक ही साल में लिनेन आर्ट में आए ₹100 करोड़, वह कर्जदाता जिसने बॉम्बे रेयॉन का कर्ज ₹1,361 करोड़ के डिस्काउंट पर खरीदा और सप्लायर के ₹483 करोड़ के वे बिल, जिनका हिसाब बॉम्बे रेयॉन की अपनी बहीखातों में नहीं मिल सका.
यह रिपोर्ट कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय, भारतीय दिवाला एवं शोधन अक्षमता बोर्ड और स्टॉक एक्सचेंजों के पास दाखिल रिकॉर्ड तथा बॉम्बे रेयॉन फैशंस लिमिटेड की वार्षिक रिपोर्टों पर आधारित है. शितांशु बिपिन वोरा और विमल कुमार गोयनका को ईमेल के जरिए विस्तृत सवाल भेजे गए थे, लेकिन उन्होंने जवाब नहीं दिया.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.
19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)
AI रैक, सर्वर, स्टोरेज और कूलिंग सिस्टम का होगा निर्माण, भारत के साथ विदेशी बाजारों में भी सप्लाई की योजना
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अडानी ग्रुप अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डेटा सेंटर से जुड़े उपकरणों के निर्माण कारोबार में उतरने की तैयारी कर रहा है. ग्रुप की फ्लैगशिप कंपनी अडानी एंटरप्राइजेज ने अमेरिकी कंपनी Jabil Inc. के साथ 50:50 जॉइंट वेंचर (JV) बनाने के लिए समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं. इस साझेदारी के तहत भारत में AI और डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े उपकरणों का निर्माण किया जाएगा. कंपनियों की योजना इन उपकरणों की आपूर्ति घरेलू बाजार के साथ दूसरे देशों में भी करने की है.
प्रस्तावित जॉइंट वेंचर के तहत AI रैक, सर्वर, स्टोरेज और नेटवर्किंग उपकरण बनाए जाएंगे. इसके अलावा, पावर डिस्ट्रीब्यूशन यूनिट, लिक्विड कूलिंग सिस्टम और ट्रांसफॉर्मर का भी निर्माण किया जाएगा. ये उपकरण बड़े डेटा सेंटर और हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग सिस्टम के संचालन के लिए जरूरी होते हैं. हालांकि, इस साझेदारी को आगे बढ़ाने के लिए दोनों कंपनियों को अंतिम समझौता करना होगा और आवश्यक मंजूरियां हासिल करनी होंगी.
कई गीगावॉट क्षमता वाले AI रैक बनाने की योजना
प्रस्तावित JV के तहत कई गीगावॉट क्षमता वाले AI रैक बनाने की योजना है. AI रैक में हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग सिस्टम को एकीकृत किया जाता है, जिनका इस्तेमाल बड़े AI मॉडल को प्रशिक्षित करने, डेटा प्रोसेसिंग और अन्य कंप्यूटिंग कार्यों में होता है. कंपनियां उपकरणों के निर्माण के साथ उनकी इंस्टॉलेशन और कमीशनिंग से जुड़ी सेवाएं भी उपलब्ध कराएंगी.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस साझेदारी से अडानी ग्रुप को AI और डेटा सेंटर के लिए जरूरी हार्डवेयर निर्माण के क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाने का अवसर मिलेगा. वहीं, Jabil की मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं का इस्तेमाल भारत में उपकरणों के उत्पादन और उनकी आपूर्ति के लिए किया जा सकेगा.
2030 तक 8 गीगावॉट तक पहुंच सकती है डेटा सेंटर क्षमता
भारत में डेटा सेंटर की क्षमता 2030 तक 5 से 8 गीगावॉट तक पहुंचने का अनुमान है. AI का बढ़ता इस्तेमाल, क्लाउड सेवाओं का विस्तार और देश के भीतर डेटा स्टोर करने की जरूरत इस क्षेत्र की मांग बढ़ा रही है.
कंपनियों के मुताबिक, डेटा सेंटर, क्लाउड और AI से जुड़े क्षेत्रों में हाइपरस्केलर्स का प्रस्तावित निवेश 50 अरब डॉलर से अधिक हो सकता है. वहीं, अगले सात वर्षों में वैश्विक AI कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर बाजार में 3 लाख करोड़ डॉलर से अधिक के अवसर पैदा होने का अनुमान है. ऐसे में AI और डेटा सेंटर उपकरणों का निर्माण भारत में उभरते इंफ्रास्ट्रक्चर बाजार का अहम हिस्सा बन सकता है.
AI कारोबार में अडानी ग्रुप की बढ़ेगी मौजूदगी
अडानी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अडानी ने कहा कि AI के विकास के लिए केवल बेहतर एल्गोरिदम पर्याप्त नहीं हैं. इसके लिए ऊर्जा, डेटा सेंटर और एडवांस्ड कंप्यूटिंग से जुड़ा मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर भी जरूरी है. उनके मुताबिक, प्रस्तावित जॉइंट वेंचर से ग्रुप को AI के लिए आवश्यक उपकरणों के निर्माण के क्षेत्र में अवसर मिलेगा. Jabil के CEO माइक डस्टूर ने कहा कि इस साझेदारी से भारत और दुनिया के अन्य बाजारों में डेटा सेंटर उपकरणों की बढ़ती मांग को पूरा करने में मदद मिलेगी.
छह महीने में अडानी एंटरप्राइजेज के शेयर ने दिया 26.59% रिटर्न
इस घोषणा के बीच अडानी एंटरप्राइजेज का शेयर भी निवेशकों के रडार पर है. मंगलवार को BSE पर कंपनी का शेयर 2.39% की बढ़त के साथ 2,694 रुपये पर बंद हुआ. शेयर ने पिछले छह महीनों में 26.59% रिटर्न दिया है. हालांकि, जॉइंट वेंचर का वास्तविक कारोबारी असर उत्पादन क्षमता, अंतिम समझौते, जरूरी मंजूरियों और उपकरणों की मांग जैसे कारकों पर निर्भर करेगा. केवल साझेदारी की घोषणा के आधार पर कंपनी के भविष्य के प्रदर्शन का अनुमान नहीं लगाया जा सकता.
धान की बोआई में 3.5% और मक्के के रकबे में 2.9% की गिरावट, खाद्य आपूर्ति से लेकर कारोबार की लागत तक पर पड़ सकता है असर
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
कमजोर मानसून और अल नीनो की आशंका ने देश में खरीफ फसलों के उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ा दी है. जून से सितंबर के बीच दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान दीर्घकालीन औसत से 12.6% कम बारिश दर्ज की गई. इसका असर फसलों की बोआई पर भी दिखाई दे रहा है. 5 अक्टूबर तक खरीफ फसलों का कुल बोआई क्षेत्र पिछले साल की तुलना में 1.1% और कुल खाद्यान्न फसलों का रकबा 1.6% घट गया. धान, मक्का और दालों की पैदावार प्रभावित होने पर खाद्य आपूर्ति, कारोबार की लागत और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है.
डन एंड ब्रैडस्ट्रीट की रिपोर्ट के अनुसार, उत्पादन पर मौसम का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि फसलों के विकास के महत्वपूर्ण चरणों में बारिश, मिट्टी की नमी और तापमान की स्थिति कैसी रहती है. यदि प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में नमी की कमी और अधिक तापमान का असर लंबे समय तक बना रहता है, तो फसलों की पैदावार घट सकती है. इसका प्रभाव केवल कृषि क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खाद्य प्रसंस्करण, पशु आहार और अन्य कृषि आधारित उद्योगों की लागत पर भी पड़ सकता है.
धान की बोआई में 3.5% की गिरावट
भारत में चावल प्रमुख खाद्यान्न होने के साथ सार्वजनिक वितरण प्रणाली का भी अहम हिस्सा है. चावल मिलों और पैकेटबंद खाद्य पदार्थों के कारोबार में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है. रिपोर्ट के मुताबिक, 5 अक्टूबर तक धान का बोआई क्षेत्र पिछले साल के मुकाबले 3.5% कम रहा.
धान की फसल को विकास के दौरान पर्याप्त पानी और मिट्टी में नमी की जरूरत होती है. खासकर फसल के महत्वपूर्ण चरणों में पानी की कमी होने पर उसकी पैदावार प्रभावित हो सकती है. हालांकि, उत्पादन में संभावित गिरावट का आकलन इस बात से होगा कि फसल की स्थिति आगे कैसी रहती है और प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में बारिश की कमी कितनी गंभीर होती है.
सरकारी भंडार से चावल की आपूर्ति को सहारा
रिपोर्ट में कहा गया है कि दूसरे क्षेत्रों में फसलों की बेहतर स्थिति और सरकार के पास चावल का पर्याप्त भंडार होने से उत्पादन में मामूली गिरावट की भरपाई की जा सकती है. इससे खाद्यान्न की उपलब्धता पर तत्काल बड़े संकट की आशंका कम हो जाती है.
हालांकि, यदि उत्पादन में कमी अनुमान से अधिक होती है, तो सरकारी भंडार पर दबाव बढ़ सकता है. ऐसे में बाजार में चावल की उपलब्धता और कीमतों पर पड़ने वाले असर पर नजर रखना जरूरी होगा. फिलहाल सरकारी भंडार चावल की आपूर्ति में संभावित बाधाओं से निपटने के लिए एक अहम सुरक्षा कवच है.
मक्के का रकबा 2.9% घटा, उद्योगों की बढ़ सकती है लागत
मक्के के बोआई क्षेत्र में भी गिरावट दर्ज की गई है. 5 अक्टूबर तक इसका रकबा पिछले साल की तुलना में 2.9% कम रहा. मक्के की फसल में फूल आने और दाने भरने के दौरान मौसम प्रतिकूल रहने पर पैदावार को नुकसान पहुंचने की आशंका अधिक होती है.
मक्का केवल खाद्यान्न के रूप में ही इस्तेमाल नहीं होता, बल्कि पोल्ट्री, पशु आहार, मछली पालन, स्टार्च, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों और एथेनॉल उत्पादन के लिए भी महत्वपूर्ण कच्चा माल है. ऐसे में इसकी उपलब्धता घटने से कई उद्योगों की लागत बढ़ सकती है.
चावल के मुकाबले मक्के के लिए बड़ा सार्वजनिक भंडार उपलब्ध नहीं है, जिससे उत्पादन में कमी की भरपाई करना मुश्किल हो सकता है. यदि बाजार में मक्के की आपूर्ति घटती है, तो पोल्ट्री और पशुपालन क्षेत्र में चारे की कीमतें बढ़ सकती हैं. इसके अलावा, स्टार्च और एथेनॉल बनाने वाली कंपनियों की लागत पर भी दबाव पड़ सकता है.
हालांकि, कारोबार पर वास्तविक असर इस बात से तय होगा कि आपूर्ति में कितनी कमी आती है और कंपनियां दूसरे स्रोतों से खरीद, वैकल्पिक कच्चे माल या बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों तक पहुंचाने में कितनी सक्षम हैं.
अनाजों के बोआई क्षेत्र में भी गिरावट
रिपोर्ट के अनुसार, अनाजों के कुल बोआई क्षेत्र में 2.3% की कमी दर्ज की गई है. ऐसे में प्रमुख उत्पादक राज्यों में बारिश, मिट्टी की नमी और फसलों की मौजूदा स्थिति पर नजर रखना जरूरी है. यदि कई अनाज उत्पादक क्षेत्रों में एक साथ पैदावार प्रभावित होती है, तो दूसरे क्षेत्रों से आपूर्ति बढ़ाकर कमी की भरपाई करना कठिन हो सकता है.
दालों के मामले में घरेलू उत्पादन में कमी को आयात के जरिए पूरा किया जा सकता है. हालांकि, इससे आपूर्ति वैश्विक कीमतों और रुपये की विनिमय दर पर निर्भर हो जाती है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने या रुपये में कमजोरी आने पर आयात महंगा हो सकता है. ऐसे में दालों की आपूर्ति बनाए रखने के बावजूद घरेलू बाजार में लागत बढ़ने का जोखिम बना रहेगा.
पांच राज्यों की फसल स्थिति पर टिकी नजरें
मौसम की मार का कुल कृषि उत्पादन पर कितना असर पड़ेगा, यह प्रमुख उत्पादक राज्यों में फसलों की स्थिति पर निर्भर करेगा. रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश का 2025-26 में विश्लेषण किए गए 20 राज्यों के कुल खाद्यान्न उत्पादन में 37.7% योगदान रहा. इन राज्यों का संयुक्त उत्पादन 1,400.3 लाख टन था.
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इन प्रमुख उत्पादक राज्यों में फसलों की स्थिति एक साथ बिगड़ती है या नहीं. यदि कई राज्यों में एक साथ उत्पादन घटता है, तो दूसरे क्षेत्रों से अतिरिक्त आपूर्ति के जरिए इसकी भरपाई करना मुश्किल हो सकता है.
इन राज्यों में कृषि आधारित उद्योगों की मौजूदगी भी जोखिम को बढ़ाती है. महाराष्ट्र में अनाज और बीज आधारित पशु आहार बनाने वाले 21% उद्योग स्थित हैं, जबकि आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में चावल मिलों की बड़ी संख्या है. ऐसे में किसी एक क्षेत्र में फसल खराब होने के मुकाबले कई प्रमुख क्षेत्रों में एक साथ उत्पादन प्रभावित होना कारोबार के लिए ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकता है.
गेहूं-चावल के मुकाबले मक्का और दालों पर ज्यादा जोखिम
रिपोर्ट के अनुसार, गेहूं, चावल, मक्का, मोटे अनाज और दालों की अलग-अलग आपूर्ति व्यवस्थाओं के कारण कमजोर मानसून का असर पूरे खाद्यान्न बाजार में समान रूप से दिखाई देना जरूरी नहीं है. इसका प्रभाव कुछ खास कृषि जिंसों और उनसे जुड़े उद्योगों पर अधिक पड़ सकता है.
चावल और गेहूं के पर्याप्त सरकारी भंडार होने से उत्पादन में मामूली गिरावट का उपभोक्ता कीमतों पर तत्काल असर सीमित रह सकता है. इसके विपरीत, मक्का, दालों और कुछ खास क्षेत्रों से होने वाली आपूर्ति पर निर्भर कारोबार को उतनी सुरक्षा नहीं मिलती. इसलिए खाद्य महंगाई के सरकारी आंकड़ों में असर दिखने से पहले ही कंपनियों और कारोबारियों को कच्चे माल की बढ़ती लागत का सामना करना पड़ सकता है.
उत्पादन घटने से कब बढ़ेगी महंगाई?
कमजोर फसल का मतलब यह नहीं है कि महंगाई में तुरंत तेज उछाल आएगा. कीमतों पर वास्तविक दबाव तब बढ़ता है, जब उत्पादन में गिरावट इतनी बड़ी हो जाए कि मौजूदा भंडार, आयात और बाजार में उपलब्ध आपूर्ति से मांग पूरी करना मुश्किल होने लगे.
चावल और गेहूं के मामले में सरकारी भंडार अस्थायी कमी से निपटने में मदद कर सकते हैं. लेकिन मक्का और दालों जैसी फसलों के लिए यह सुरक्षा अपेक्षाकृत कमजोर है. इनकी मांग खाद्य पदार्थों, पशु आहार और औद्योगिक इस्तेमाल, तीनों क्षेत्रों से आती है. इसलिए आपूर्ति में कमी आने पर इनकी कीमतों में तेजी का असर अपेक्षाकृत जल्दी दिखाई दे सकता है.
आने वाले समय में मानसून की स्थिति, मिट्टी में नमी, प्रमुख राज्यों में फसलों की सेहत और उत्पादन के सरकारी अनुमानों पर नजर रहेगी. यदि मौसम संबंधी जोखिम बढ़ते हैं और पैदावार प्रभावित होती है, तो खाद्य आपूर्ति के साथ कृषि आधारित उद्योगों की लागत और महंगाई पर भी दबाव बढ़ सकता है.
मंगलवार, 13 अक्टूबर को बीएसई सेंसेक्स 1,109.10 अंक यानी 1.54 फीसदी चढ़कर 73,033.78 पर बंद हुआ था. एनएसई निफ्टी भी 358.60 अंक यानी 1.60 फीसदी बढ़कर 22,721.95 पर पहुंच गया था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
घरेलू शेयर बाजार में मंगलवार को जोरदार तेजी के बाद बुधवार को कमजोर शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं. गिफ्ट निफ्टी करीब 70 अंक गिरकर 22,800 के नीचे आ गया है, जबकि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच ब्रेंट क्रूड 107 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है. कच्चे तेल की महंगाई से भारत में महंगाई बढ़ने और बाहरी भुगतान संतुलन पर दबाव पड़ने की आशंका है. ऐसे में निवेशकों की नजर वैश्विक बाजारों के संकेतों, कंपनियों के तिमाही नतीजों और चुनिंदा शेयरों से जुड़ी खबरों पर रहेगी.
कल बाजार में आई थी जोरदार तेजी
मंगलवार, 13 अक्टूबर को बीएसई सेंसेक्स 1,109.10 अंक यानी 1.54 फीसदी चढ़कर 73,033.78 पर बंद हुआ था. एनएसई निफ्टी भी 358.60 अंक यानी 1.60 फीसदी बढ़कर 22,721.95 पर पहुंच गया था. इस तेजी से निवेशकों की संपत्ति में करीब 3 लाख करोड़ रुपये का इजाफा हुआ और सेंसेक्स की कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण बढ़कर लगभग 469 लाख करोड़ रुपये हो गया.
आईटी शेयरों में खरीदारी बाजार की तेजी की प्रमुख वजह रही. एचसीएल टेक्नोलॉजीज के मजबूत तिमाही नतीजों के बाद निफ्टी आईटी इंडेक्स में 5 फीसदी से अधिक की तेजी दर्ज की गई. सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 27 बढ़त के साथ बंद हुए. एचसीएल टेक्नोलॉजीज 8.28 फीसदी, टीसीएस 6.59 फीसदी, टेक महिंद्रा 4.90 फीसदी और इन्फोसिस 4.44 फीसदी चढ़े. दूसरी ओर, कोटक महिंद्रा बैंक, मारुति और इटरनल गिरावट के साथ बंद हुए.
कच्चे तेल और वैश्विक संकेतों पर नजर
बुधवार को बाजार के लिए कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें चिंता का विषय बनी हुई हैं. पश्चिम एशिया में तनाव और सऊदी अरब पर मिसाइल व ड्रोन हमलों के बाद आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका से ब्रेंट क्रूड करीब 1.2 फीसदी बढ़कर 106.86 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. अमेरिकी WTI क्रूड भी करीब 1.2 फीसदी चढ़कर 95.25 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता दिखा.
एशियाई बाजारों में मिला-जुला रुख रहा. जापान का निक्केई शुरुआती कारोबार में करीब 200 अंक चढ़ा और कोस्पी में 0.8 फीसदी की तेजी रही, जबकि हैंगसेंग और शंघाई बाजारों में कमजोरी दिखी. अमेरिकी बाजार मंगलवार को बैंकिंग और चिप कंपनियों के शेयरों में दबाव के बीच गिरावट के साथ बंद हुए.
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, कंपनियों के बेहतर नतीजे और आईटी शेयरों में तेजी घरेलू बाजार को सहारा दे रहे हैं, लेकिन पश्चिम एशिया का तनाव और महंगा कच्चा तेल सतर्कता बनाए रख सकते हैं. कमजोर वैश्विक संकेतों के कारण बाजार की शुरुआत दबाव में रह सकती है. आईटी शेयरों में तेजी निवेशकों की चुनिंदा कंपनियों की कमाई की संभावनाओं पर आधारित खरीदारी को दिखाती है.
इन कंपनियों के शेयरों पर रखें नजर
बायोकॉन: Genentech के साथ वैश्विक पेटेंट समझौते के बाद कंपनी को Pebrilzo को लाइसेंस के तहत लॉन्च करने की तारीखें मिली हैं.
हीरो मोटर्स: सितंबर तिमाही में कंपनी का शुद्ध मुनाफा बढ़कर 10.2 करोड़ रुपये हो गया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 4.73 करोड़ रुपये था. आय 24.9 फीसदी बढ़कर 319.3 करोड़ रुपये और EBITDA 92 फीसदी बढ़कर 35.9 करोड़ रुपये रहा. EBITDA मार्जिन 7.3 फीसदी से बढ़कर 11.3 फीसदी हो गया.
हुंडई मोटर समूह: कंपनी समूह ने 2026 से 2032 के बीच भारत में 15.5 अरब डॉलर निवेश करने की योजना बनाई है.
रेलटेल: कंपनी को ओडिशा सरकार के उच्च शिक्षा विभाग से 48.98 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट मिला है. इसके तहत 83 डिजिटल एप्लिकेशन मॉड्यूल तैयार किए जाएंगे और काम पूरा करने की समयसीमा 10 मई 2027 है.
भारत इलेक्ट्रॉनिक्स (BEL): कंपनी को 17 सितंबर के बाद से 533 करोड़ रुपये के अतिरिक्त ऑर्डर मिले हैं.
अडानी एंटरप्राइजेज: कंपनी ने भारत में एआई और डेटा सेंटर उपकरणों के निर्माण व असेंबली के लिए जैबिल के साथ शुरुआती गैर-बाध्यकारी समझौता किया है. प्रस्तावित संयुक्त उद्यम में दोनों कंपनियों की 50-50 फीसदी हिस्सेदारी होगी.
जायडस लाइफसाइंसेज: कंपनी के मोरैया संयंत्र में अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (US FDA) की 5 से 13 अक्टूबर तक हुई जांच में पांच टिप्पणियां दर्ज की गईं.
पॉलीकैब इंडिया: राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) ने कंपनी के खिलाफ दिवाला समाधान प्रक्रिया शुरू करने के 7 अक्टूबर के आदेश पर रोक लगा दी है. मामले में 2.79 करोड़ रुपये के कथित परिचालन बकाये का विवाद है.
बैंक ऑफ बड़ौदा: बैंक और 25 अन्य प्रतिवादियों के खिलाफ एनएमसी हेल्थकेयर समूह और यूएई एक्सचेंज के संस्थापक बीआर शेट्टी ने 15 अरब डॉलर के हर्जाने का मुकदमा दायर किया है. मामले में आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकला है.
एसबीआई फंड्स मैनेजमेंट: कंपनी ने आरएस श्रीनिवास जैन को संयुक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी और प्रमुख प्रबंधकीय कार्मिक नियुक्त किया है. नियुक्ति 13 अक्टूबर से प्रभावी है.
उज्जीवन स्मॉल फाइनेंस बैंक: बैंक का बोर्ड 16 अक्टूबर को सितंबर तिमाही और छमाही के अनऑडिटेड नतीजों पर विचार करेगा. साथ ही चुनिंदा निवेशकों को इक्विटी शेयर जारी कर पूंजी जुटाने के प्रस्ताव पर भी चर्चा होगी.
भारत कोकिंग कोल: कंपनी ने गैर-नियंत्रित क्षेत्र को आपूर्ति किए जाने वाले कच्चे कोकिंग कोल की कुछ श्रेणियों की कीमतों में 0.1 से 14 फीसदी तक बढ़ोतरी को मंजूरी दी है.
आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ इंश्योरेंस: सितंबर तिमाही में कंपनी का कर पश्चात मुनाफा 25 फीसदी बढ़कर 374 करोड़ रुपये रहा. नए कारोबार की वैल्यू 22.3 फीसदी बढ़कर 1,283 करोड़ रुपये हो गई.
टाटा एलेक्सी: कंपनी का तिमाही मुनाफा 10 फीसदी बढ़कर 170.3 करोड़ रुपये रहा, जबकि राजस्व 15 फीसदी बढ़कर 1,055.7 करोड़ रुपये पहुंच गया.
आनंद राठी शेयर एंड स्टॉक ब्रोकर्स: कंपनी का सितंबर तिमाही में मुनाफा 50.3 फीसदी बढ़कर 41.9 करोड़ रुपये और राजस्व 20.3 फीसदी बढ़कर 273.2 करोड़ रुपये रहा.
ट्रांसफॉर्मर्स एंड रेक्टिफायर्स इंडिया: कंपनी का तिमाही मुनाफा 135.3 फीसदी बढ़कर 79.8 करोड़ रुपये और राजस्व 60.7 फीसदी बढ़कर 739.4 करोड़ रुपये हो गया.
आज इन कंपनियों के नतीजों पर रहेगी नजर
बुधवार को आईसीआईसीआई लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस, एचडीबी फाइनेंशियल सर्विसेज, केनरा बैंक, बजाज कंज्यूमर केयर, भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स (BHEL), आदित्य बिड़ला मनी, सिएट, एलेकॉन इंजीनियरिंग, बिलियनब्रेन्स गैराज वेंचर्स (ग्रो की पेरेंट कंपनी) और टाटा टेक्नोलॉजीज के तिमाही नतीजे आने की उम्मीद है. निवेशक इन कंपनियों के मुनाफे, राजस्व और प्रबंधन की टिप्पणियों पर नजर रखेंगे, जिनसे संबंधित शेयरों की दिशा तय हो सकती है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
जियो के ₹27,500 करोड़ के कर्ज खत्म हो जाएंगे. फ्री कैश फ्लो 29 गुना बढ़ गया है. 524 मिलियन ग्राहक. एयरटेल से कम कीमत पर वैल्यूएशन. वे आंकड़े, जिन पर सुर्खियों में ध्यान नहीं दिया गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
वह कहानी, जिस पर सुर्खियों में ध्यान नहीं दिया गया
जियो प्लेटफॉर्म्स (JIO) के आईपीओ को लेकर पिछले दो सप्ताह से सुर्खियों में वैल्यूएशन में कटौती, निवेशकों की सौदेबाजी और एलन मस्क पर ध्यान केंद्रित किया गया है. सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा अब तक छिपा रहा है: ₹27,500 करोड़. यह वह राशि है, जिसका इस्तेमाल जियो अपनी टेलीकॉम इकाई रिलायंस जियो इन्फोकॉम द्वारा लिए गए कर्ज को समय से पहले चुकाने के लिए करेगा. 31 मार्च, 2026 को जियो का नेट डेट ₹27,579 करोड़ था.
चेक क्लियर होने के बाद लगभग ₹79 करोड़ का कर्ज बचेगा. कंपनी की नेट डेट की अपनी परिभाषा के अनुसार, जियो लगभग नेट-डेट-फ्री स्थिति में शेयर बाजार में सूचीबद्ध होगा.
एक कैश मशीन
कर्ज का आंकड़ा कहानी का सिर्फ एक हिस्सा है. इससे बड़ा बदलाव कैश फ्लो में आया है.
दो साल पहले जियो अपनी कमाई का लगभग पूरा हिस्सा 5G पर खर्च कर रहा था. वित्त वर्ष 2024 में EBITDA में से पूंजीगत खर्च घटाने पर मिलने वाली राशि, जो फ्री कैश का एक मोटा अनुमान है, केवल ₹1,449 करोड़ थी. यह वित्त वर्ष 2025 में बढ़कर ₹19,902 करोड़ और वित्त वर्ष 2026 में ₹42,071 करोड़ हो गई. यानी दो साल में लगभग 29 गुना वृद्धि हुई.
5G नेटवर्क तैयार हो चुका है. इसी अवधि में पूंजीगत खर्च ₹53,510 करोड़ से घटकर ₹34,184 करोड़ रह गया, जबकि कमाई लगातार बढ़ती रही. वित्त वर्ष 2026 में जियो ने ₹1.47 लाख करोड़ का राजस्व दर्ज किया, जो 15% अधिक है. कंपनी का EBITDA 51.9% मार्जिन के साथ ₹76,255 करोड़ रहा और शुद्ध लाभ ₹30,049 करोड़ दर्ज किया गया. दो साल में मुनाफा 40% बढ़ा है.
यही वजह है कि आईपीओ से एक भी रुपया आने से पहले जियो का नेट डेट वित्त वर्ष 2024 के ₹48,440 करोड़ से घटकर ₹27,579 करोड़ रह गया. मार्च में जियो के पास ₹43,202 करोड़ की नकदी और निवेश थे.
रुपये में गिरावट के बीच डॉलर का कर्ज चुकाना
जिन कर्जों को चुकाया जा रहा है, वे 16 वैश्विक बैंकों से डॉलर और येन में लिए गए कर्ज हैं. इनमें बैंक ऑफ अमेरिका, सिटी, एचएसबीसी, एमयूएफजी और एसबीआई शामिल हैं. 2020 के बाद से रुपये में लगभग 29% की गिरावट के कारण विदेशी मुद्रा में लिया गया कर्ज हर साल रुपये के लिहाज से महंगा होता गया है. आईपीओ से जियो इस जोखिम को खत्म कर सकेगा.
समय से पहले कर्ज चुकाने पर कोई जुर्माना भी नहीं लगेगा. कर्ज समझौतों में समय से पहले भुगतान की अनुमति "बिना किसी प्रीमियम या ब्रेक कॉस्ट" के दी गई है.
भारती से सस्ता
₹1,119 प्रति शेयर की कीमत पर जियो का वैल्यूएशन वित्त वर्ष 2026 की प्रति शेयर आय के लगभग 33 गुना पर है. इसके सबसे करीबी प्रतिद्वंद्वी भारती एयरटेल का वैल्यूएशन इसी प्रॉस्पेक्टस में 42 गुना था.
इस तुलना के आधार पर, ग्राहकों की संख्या के लिहाज से भारत का सबसे बड़ा टेलीकॉम ऑपरेटर, जिसके 524 मिलियन सब्सक्राइबर हैं, 268 मिलियन ग्राहक 5G का इस्तेमाल करते हैं और 27 मिलियन ग्राहक होम ब्रॉडबैंड से जुड़े हैं (जो भारत में सबसे अधिक है), अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी से सस्ता है.
प्रति यूजर औसत राजस्व (ARPU) दो साल में ₹182 से बढ़कर ₹214 प्रति माह हो गया है और प्रत्येक ग्राहक हर महीने 42 GB डेटा का इस्तेमाल करता है.
देश की चौथी सबसे मूल्यवान कंपनी बनने की राह पर
₹10.3 लाख करोड़ के वैल्यूएशन पर जियो भारत की चौथी सबसे मूल्यवान कंपनी के रूप में सूचीबद्ध होगा. इससे आगे रिलायंस (₹15.84 लाख करोड़), भारती एयरटेल (₹11.27 लाख करोड़) और एचडीएफसी बैंक (₹10.90 लाख करोड़) होंगे, जबकि जियो आईसीआईसीआई बैंक (₹9.72 लाख करोड़) से आगे होगा. यह भारत का पहला आईपीओ होगा, जिसका मूल्यांकन ₹10 लाख करोड़ से अधिक होगा. इससे पहले एलआईसी का वैल्यूएशन लगभग ₹6 लाख करोड़ था, जो उस समय एक मानक बना था.
इन कंपनियों के बीच अंतर कम है. लिस्टिंग के बाद जियो के शेयर में 6% की वृद्धि उसे एचडीएफसी बैंक से आगे कर देगी और 10% से भी कम की बढ़त उसे भारती एयरटेल से आगे पहुंचा देगी.
रिलायंस की छिपी हुई वैल्यू
रिलायंस के शेयरधारकों को भी वैल्यूएशन में बढ़ोतरी का फायदा मिलेगा. जियो में रिलायंस की लगभग 65% हिस्सेदारी आईपीओ मूल्य पर करीब ₹6.6 लाख करोड़ की है, जो रिलायंस के कुल बाजार मूल्य का लगभग 42% है. इसमें उसके तेल से लेकर केमिकल, रिटेल और न्यू-एनर्जी कारोबार की वैल्यू शामिल नहीं है.
2020 के निवेशकों का पैसा दोगुना हुआ
2020 में जियो में ₹1.52 लाख करोड़ निवेश करने वाले 13 वैश्विक निवेशकों का पैसा रुपये के लिहाज से दोगुने से अधिक हो गया है. ₹549 प्रति शेयर की कीमत पर निवेश करने वाले फंड का निवेश 2.04 गुना हो गया है, जबकि ₹488 प्रति शेयर की कीमत पर निवेश करने वाले मेटा और गूगल का निवेश 2.29 गुना हो गया है.
कर्ज-मुक्त होने के आंकड़े में क्या शामिल नहीं है
इसमें एक बड़ी अपवाद वाली देनदारी भी है. जियो पर अभी भी सरकार का ₹1.05 लाख करोड़ बकाया है, जो स्थगित स्पेक्ट्रम भुगतान से संबंधित है. इसका भुगतान आने वाले वर्षों में किस्तों में किया जाना है और इसे कंपनी के नेट डेट के आंकड़े में शामिल नहीं किया गया है. वित्त वर्ष 2026 में वित्त लागत बढ़कर ₹8,653 करोड़ होने की मुख्य वजह इस बकाया राशि पर लगने वाला ब्याज है. आईपीओ से इस देनदारी पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
कर्ज-मुक्त होने का यह मतलब भी नहीं है कि "विकास पर खर्च होने वाला हर रुपया मुनाफे में बदल जाएगा." जिन कर्जों को चुकाया जा रहा है, उन पर ब्याज दरें 1.4–5.18% के बीच हैं, इसलिए सालाना ब्याज की बचत सीमित होगी. आईपीओ से वास्तव में कंपनी की बैलेंस शीट में बदलाव आएगा. 4G और 5G नेटवर्क बनाने के लिए भारी कर्ज लेने वाली कंपनी अब सालाना ₹40,000 करोड़ से अधिक का फ्री कैश पैदा कर रही है और उस पर बैंक का नेट डेट लगभग न के बराबर है.
यह इश्यू 21 अक्टूबर को खुलेगा, लिस्टिंग से पता चलेगा कि निवेशक इस बदलाव को कितना महत्व देते हैं.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.
19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)
ANPR कैमरे, बैरियरलेस टोलिंग और रियल-टाइम मॉनिटरिंग जैसे समाधानों पर रहा फोकस, 300 से ज्यादा ब्रांड ने प्रदर्शित की परिवहन क्षेत्र की तकनीक
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
हाईवे पर वाहनों की पहचान से लेकर ट्रैफिक की निगरानी और बिना बैरियर टोल वसूली तक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और ऑटोमेशन परिवहन क्षेत्र में बदलाव ला रहे हैं. इन तकनीकों से जुड़े समाधानों की झलक नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित ट्रांसपोर्ट + ट्रैफिक इंफ्राटेक एक्सपो 2026 में देखने को मिली. 7 और 8 अक्टूबर को आयोजित इस एक्सपो में 300 से ज्यादा ब्रांड ने हिस्सा लिया. प्रदर्शनी में AI आधारित ट्रैफिक मैनेजमेंट, ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन (ANPR), मल्टीलेन फ्री फ्लो (MLFF) टोलिंग और सड़क सुरक्षा से जुड़े समाधान प्रमुख रहे.
एक्सपो के 14वें संस्करण के साथ रोड इंफ्राटेक एक्सपो, पार्किंग इंफ्राटेक एक्सपो और आईटीएस इंडिया कांग्रेस 2026 भी आयोजित किए गए. 6,500 वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्र में फैली इस प्रदर्शनी में 28 से ज्यादा नए प्रतिभागियों ने भी अपने उत्पाद और तकनीकें पेश कीं.
वाहनों की पहचान से लेकर ट्रैफिक निगरानी तक AI का इस्तेमाल
प्रदर्शनी में पेश किए गए समाधानों में AI आधारित वीडियो एनालिटिक्स, ANPR कैमरे और रियल-टाइम घटना पहचान प्रणाली शामिल रहीं. इन तकनीकों के जरिए वाहनों की पहचान, यातायात की निगरानी और सड़क पर होने वाली घटनाओं का पता लगाने में मदद मिल सकती है.
इसके अलावा, कंपनियों ने कनेक्टेड वाहनों, सार्वजनिक परिवहन, ऊर्जा दक्ष प्रणालियों और सौर ऊर्जा आधारित समाधानों को भी प्रदर्शित किया. परिवहन बुनियादी ढांचे में बिजली आपूर्ति बाधित होने जैसी समस्याओं से निपटने के लिए भी तकनीकी समाधान पेश किए गए.
कंपनियों ने दिखाए ANPR और स्मार्ट टोलिंग से जुड़े उत्पाद
आदित्य इंफोटेक ने एसटीक्यूसी प्रमाणित उत्पादों की रेंज के साथ CP Plus के सर्विलांस कैमरे प्रदर्शित किए. वहीं, विजप्रो कंसलटेक ने रिकॉन ग्लोबल शटर कैमरा पेश किया. कंपनी के मुताबिक, यह AI आधारित ANPR तकनीक और Zebra के FXR90 RFID रीडर को एकीकृत करके वाहनों की पहचान में मदद करता है.
समृद्धि ऑटोमेशंस ने ANPR, मल्टीलेन फ्री फ्लो टोलिंग, कमांड सेंटर और घटना पहचान प्रणालियों से जुड़े समाधान प्रदर्शित किए. नेत्राबिट नेटवर्क्स ने हाईवे यूपीएस समाधान पेश किए, जो बिजली आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट सिस्टम के बुनियादी ढांचे को चालू रखने में मदद करते हैं.
काटालाइन लिमिटेड, न्यूटेक वीडियो सिस्टम्स, गो आईपी ग्लोबल सर्विसेज और प्रमा इंडिया ने भी सड़क मार्किंग, सुरक्षा प्रणालियों, एलईडी वीडियो वॉल, वैरिएबल मैसेज साइन, ऑटोमेटेड बैरियर, RFID रीडर और ANPR तकनीक से जुड़े उत्पाद प्रदर्शित किए.
स्मार्ट परिवहन और विकसित भारत 2047 पर चर्चा
एक्सपो के साथ आयोजित आईटीएस इंडिया कांग्रेस 2026 की थीम 'कनेक्टेड, इंटीग्रेटेड एंड इंटेलिजेंट मोबिलिटी फॉर विकसित भारत 2047' थी. इसमें AI आधारित ट्रैफिक प्रबंधन, डिजिटल प्रवर्तन, बैरियरलेस टोलिंग, कनेक्टेड मोबिलिटी, पीएम गति शक्ति के तहत मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स और इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट सिस्टम के मानकों जैसे विषयों पर चर्चा हुई.
उद्घाटन सत्र में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के अपर सचिव महमूद अहमद ने कहा कि विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को हासिल करने में परिवहन और कनेक्टिविटी की अहम भूमिका है. उन्होंने स्मार्ट, एकीकृत और सुगम परिवहन व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया.
मेसे फ्रैंकफर्ट एशिया होल्डिंग्स लिमिटेड के कार्यकारी निदेशक राज मानेक ने परिवहन क्षेत्र में बुद्धिमान और एकीकृत बुनियादी ढांचे की बढ़ती भूमिका को रेखांकित किया. आईटीएस इंडिया कांग्रेस के अध्यक्ष अखिलेश श्रीवास्तव ने भी बुद्धिमान परिवहन प्रणालियों के विकास के लिए सरकार और उद्योग के बीच संवाद को महत्वपूर्ण बताया.
यह एंगल पहले वाले संस्करण से अलग है, क्योंकि इसमें आयोजन की खबर देने के बजाय परिवहन क्षेत्र में इस्तेमाल हो रही तकनीकों और उनके संभावित उपयोग को प्रमुखता दी गई है. हालांकि, यदि इसे आज प्रकाशित करना है, तो वास्तविक तकनीकी घोषणाओं या किसी खास उत्पाद की नई उपलब्धि की पुष्टि किए बिना उसे नई घोषणा के रूप में पेश नहीं करना चाहिए.
नई दिल्ली में हुआ अनावरण, 1,500 किमी से अधिक रेंज और AI आधारित स्वायत्त लड़ाकू अभियानों के लिए विकसित किया जा रहा विमान; कंपनी का लक्ष्य भारत में ही डिजाइन और निर्माण करना
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत की डिफेंस और एयरोस्पेस इंडस्ट्री में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित तकनीक को बढ़ावा देने की दिशा में Flying Wedge Defence & Aerospace (FWDA) ने अपना FWD Supreme कार्यक्रम पेश किया है. कंपनी ने मंगलवार को नई दिल्ली के ली मेरिडियन होटल में आयोजित कार्यक्रम में भारत के पहले AI-पायलटेड फाइटर एयरक्राफ्ट प्रोग्राम का पूर्ण आकार का स्थिर प्रोटोटाइप प्रदर्शित किया. कंपनी के मुताबिक, इस कार्यक्रम का उद्देश्य AI आधारित स्वायत्त लड़ाकू विमान विकसित करना और भारत की घरेलू एयरोस्पेस निर्माण क्षमताओं को मजबूत करना है.
दुनियाभर में रक्षा क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्वायत्त विमानों और लड़ाकू अभियानों के नए तरीकों पर जोर बढ़ रहा है. ऐसे में FWD Supreme को भारत की इसी दिशा में एक पहल के रूप में पेश किया गया है. कार्यक्रम में रक्षा खरीद महानिदेशक (DG Acquisition) ए. अनबरासु (IAS), वेपन सिस्टम्स के महानिदेशक एयर मार्शल प्रेम कुमार, पश्चिमी कमान के चीफ ऑफ स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल पुनीत आहूजा और ADG Acquisition Tech मेजर जनरल तरुण अग्रवाल शामिल हुए. SketchPixel के CEO और KEYDEF के निदेशक मिगुएल अब्रू भी कार्यक्रम में मौजूद रहे.
स्वायत्त लड़ाकू अभियानों के लिए विकसित होगा विमान
कार्यक्रम में प्रदर्शित FWD Supreme Heavy एक टन श्रेणी का विमान है, जिसे स्वायत्त लड़ाकू अभियानों के लिए विकसित करने की योजना है. कंपनी के अनुसार, इसे खुफिया जानकारी जुटाने, निगरानी और टोही (ISR), हमले तथा अन्य लड़ाकू विमानों के साथ मिलकर अभियान चलाने जैसे विभिन्न कार्यों के लिए कॉन्फिगर किया जा सकता है.
FWDA के सुहास तेजस्कंदा ने कहा कि FWD Supreme भारतीय डिजाइन, इंजीनियरिंग और विनिर्माण के जरिए उन्नत रक्षा क्षमताएं विकसित करने की कंपनी की प्रतिबद्धता को दर्शाता है. उन्होंने कहा कि कंपनी का लक्ष्य AI-पायलटेड लड़ाकू विमानों की एक पूरी श्रृंखला विकसित करना है, जो परिचालन जरूरतों को पूरा करने के साथ किफायती भी हो.
उन्होंने बताया कि 'ऑपरेशन ट्रिपल सेवन' के माध्यम से कंपनी अंतरराष्ट्रीय साझेदारों को भारत के नेतृत्व वाले विकास और विनिर्माण कार्यक्रम से जोड़ना चाहती है. इससे देश की स्वदेशी एयरोस्पेस क्षमताओं को मजबूत करने में मदद मिलेगी.
सुहास तेजस्कंदा ने यह भी कहा कि FWD Supreme Lite विमान टैक्सी ट्रायल यानी जमीन पर अपने इंजन और नियंत्रण प्रणालियों के परीक्षण के चरण को पार कर चुका है और अपनी पहली उड़ान के लिए तैयार हो रहा है.
'मेक इन इंडिया' और आत्मनिर्भरता पर जोर
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और रक्षा खरीद महानिदेशक ए. अनबरासु ने विमान के अनावरण पर बधाई देते हुए कहा कि भारतीय रक्षा क्षेत्र तेजी से आगे बढ़ रहा है. उन्होंने रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व में जारी संघर्ष का उल्लेख करते हुए कहा कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में रक्षा तैयारियों का महत्व बढ़ गया है. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने 'JAI' का मंत्र दिया है, जिसका अर्थ जॉइंटनेस, आत्मनिर्भरता और नवाचार है. यह भारतीय रक्षा क्षेत्र की प्रगति का आधार होना चाहिए. उन्होंने कहा कि सभी संबंधित पक्षों को मिलकर काम करना होगा और नवाचार से प्रेरित 'मेक इन इंडिया' तथा 'मेड इन इंडिया' की दिशा में आगे बढ़ना होगा.
अनबरासु ने जोधपुर में आयोजित तरंग शक्ति अभ्यास का उल्लेख करते हुए कहा कि आज युद्ध के लिए तैयारी केवल उपलब्ध रक्षा प्लेटफॉर्म की संख्या पर निर्भर नहीं करती. यह इस बात पर भी निर्भर करती है कि कोई देश कितनी प्रभावी ढंग से जानकारी जुटाता है, उसे समझता है, तकनीक विकसित करता है और विभिन्न क्षमताओं को एकीकृत करता है.
उन्होंने कहा कि जो देश इन सभी क्षमताओं को एक साथ जोड़ सकते हैं, उन्हें अधिक संख्या में प्लेटफॉर्म रखने वाले देशों के मुकाबले भी रणनीतिक बढ़त मिल सकती है. उनके मुताबिक, FWD Supreme जैसे कार्यक्रम भारत में ही उन्नत रक्षा प्रणालियों के विकास और निर्माण की दिशा में सरकार की नीति के अनुरूप हैं.
AI आधारित विमानों के समूह से लड़ाई की रणनीति बदलने का लक्ष्य
FWD Supreme कार्यक्रम के केंद्र में FWDA की 'मोबिंग डॉक्ट्रिन' है. यह हवाई युद्ध की ऐसी अवधारणा है, जिसमें AI-पायलटेड विमान एक समन्वित समूह के रूप में काम करेंगे. पारंपरिक मॉडल में सीमित संख्या में महंगे और उच्च क्षमता वाले विमानों पर निर्भरता रहती है. इसके विपरीत, इस अवधारणा में कई स्वायत्त विमान एक समूह या झुंड की तरह काम करते हुए जानकारी साझा करेंगे और वास्तविक समय में समन्वित निर्णय लेंगे.
कंपनी का लक्ष्य बड़ी संख्या में नेटवर्क से जुड़े सक्षम विमानों को तैनात करके हवाई युद्ध की लागत और उसके आर्थिक समीकरण को बदलना है. इस रणनीति के तहत मिशन को जारी रखते हुए कुछ विमानों के नुकसान को सहन करने और संख्या, स्वायत्तता तथा समन्वय के जरिए परिचालन बढ़त हासिल करने की परिकल्पना की गई है.
FWD Supreme की प्रमुख तकनीकी विशेषताएं
कंपनी की ओर से जारी शुरुआती तकनीकी विवरण के मुताबिक, FWD Supreme कार्यक्रम के पहले चरण में 1,500 किलोग्राम से अधिक वजन श्रेणी के AI आधारित स्वायत्त लड़ाकू विमान विकसित करने की योजना है. इसके प्रमुख तकनीकी विवरण इस प्रकार हैं:
-विमान का प्रकार: AI आधारित स्वायत्त लड़ाकू विमान.
-वजन श्रेणी: 1,500 किलोग्राम से अधिक.
-पेलोड क्षमता: लगभग 350 किलोग्राम.
-प्रोपल्शन: 5 किलो न्यूटन (kN).
-अधिकतम गति: उच्च सबसोनिक गति, लगभग मैक 0.8 से 0.85.
-क्रूज गति: लगभग 500 से 600 किलोमीटर प्रति घंटा.
- रेंज: 1,500 किलोमीटर से अधिक.
- उड़ान की अवधि: दो घंटे से अधिक.
-संचार प्रणाली: सैटेलाइट कम्युनिकेशन (SATCOM).
-डिजाइन: फ्लाइंग-विंग कॉन्फिगरेशन और आंतरिक वेपन बे.
-अनुमानित आकार: लगभग 10×10 मीटर.
आगे तकनीक विकास और परीक्षण पर रहेगा फोकस
कंपनी के मुताबिक, FWD Supreme कार्यक्रम का अगला चरण तकनीक विकास, परीक्षण और विभिन्न प्रणालियों के एकीकरण पर केंद्रित होगा. इसके साथ ही Supreme श्रेणी के अन्य विमानों को विकसित करने की दिशा में भी काम किया जाएगा.
FWDA ने 'ऑपरेशन ट्रिपल सेवन' के तहत अंतरराष्ट्रीय एयरोस्पेस और विनिर्माण साझेदारियां विकसित करने की योजना बनाई है. इसका उद्देश्य उन्नत लड़ाकू विमानन के लिए भारत के नेतृत्व में एक ऐसा इकोसिस्टम तैयार करना है, जिसमें डिजाइन, तकनीकी विकास और विनिर्माण की क्षमताएं देश में विकसित हों.
हालांकि, कार्यक्रम के तहत विमान की पहली उड़ान, परीक्षण और परिचालन तैनाती की विस्तृत समयसीमा अभी घोषित नहीं की गई है. ऐसे में FWD Supreme की वास्तविक परिचालन क्षमताओं और रक्षा क्षेत्र में इसके संभावित योगदान का आकलन आगे होने वाले परीक्षणों और तकनीकी विकास के आधार पर किया जा सकेगा.
Flying Wedge Defence के फाउंडर और CEO सुहास तेजस्कंदा ने बिजनेसवर्ल्ड से बातचीत में बताया कि 3-5 मिलियन डॉलर की लागत वाले AI-पावर्ड एयरक्राफ्ट से हवाई युद्ध की लागत घटाने में मदद मिल सकती है. कंपनी की योजना मानवरहित विमानों को एक समूह के रूप में संचालित करने की तकनीक विकसित करने की है.
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रितु राणा
भारत की रक्षा और एयरोस्पेस इंडस्ट्री में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित लड़ाकू विमानों की दिशा में एक नई पहल सामने आई है. Flying Wedge Defence & Aerospace (FWDA) ने 13 अक्टूबर को नई दिल्ली में अपने AI-पायलटेड फाइटर एयरक्राफ्ट प्रोग्राम FWD Supreme का पूर्ण आकार का स्थिर प्रोटोटाइप पेश किया. कंपनी का दावा है कि इस तरह के स्वायत्त विमान भविष्य में हवाई युद्ध की रणनीति के साथ-साथ रक्षा अभियानों की लागत को भी बदल सकते हैं.
बिजनेसवर्ल्ड से बातचीत में Flying Wedge के फाउंडर और CEO सुहास तेजस्कंदा ने कहा कि मौजूदा रक्षा बाजार में महंगे लड़ाकू विमानों और छोटे, किफायती ड्रोन के बीच एक बड़ा अंतर है. कंपनी अपने AI-पावर्ड विमानों के जरिए इसी अंतर को भरने की कोशिश कर रही है. उनके मुताबिक, जहां पारंपरिक फाइटर जेट की कीमत करीब 100 मिलियन डॉलर तक हो सकती है, वहीं कंपनी 3-4 मिलियन डॉलर की लागत वाले प्लेटफॉर्म विकसित करने पर काम कर रही है.
महंगे फाइटर जेट और छोटे ड्रोन के बीच की खाई भरने का लक्ष्य
सुहास तेजस्कंदा ने कहा कि भारत में बड़ी संख्या में ड्रोन निर्माता अच्छा काम कर रहे हैं और इस इंडस्ट्री में नए प्लेयर्स भी आ रहे हैं. हालांकि, बड़े रक्षा प्लेटफॉर्म की बात करें तो करीब 100 मिलियन डॉलर की कीमत वाले फाइटर जेट खरीदे जा रहे हैं. ऐसे में महंगे लड़ाकू विमानों और छोटे, किफायती प्लेटफॉर्म के बीच एक बड़ा अंतर मौजूद है.
उन्होंने कहा कि टैक्टिकल फाइटर एयरक्राफ्ट इस अंतर को भर सकते हैं. युद्ध के दौरान किसी महंगे लड़ाकू विमान का नुकसान किसी भी देश के लिए काफी महंगा साबित हो सकता है. पश्चिम एशिया में हुए संघर्षों का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि महंगे सैन्य विमान और ड्रोन फोर्स मल्टीप्लायर के रूप में काम कर सकते हैं. भविष्य में इन्हें कोलैबोरेटिव कॉम्बैट एयरक्राफ्ट के तौर पर भी इस्तेमाल किया जा सकता है.
कंपनी का लक्ष्य ऐसे प्लेटफॉर्म विकसित करना है, जिन्हें अपेक्षाकृत कम लागत पर तैयार किया जा सके और जरूरत के मुताबिक बड़ी संख्या में तैनात किया जा सके. इससे महंगे विमानों पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग क्षमताओं वाले विमानों का एक समन्वित बेड़ा तैयार करने का विकल्प मिल सकता है.
पायलट के बिना काम करने के लिए AI तकनीक
सुहास तेजस्कंदा के मुताबिक, इस AI-पावर्ड विमान की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इसे उड़ाने के लिए विमान में पायलट की जरूरत नहीं होती. इसके अलावा, इसे ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन से कोई व्यक्ति लगातार नियंत्रित करे, इसकी भी आवश्यकता नहीं होती. विमान में मौजूद कंप्यूटर सिस्टम परिस्थितियों का आकलन करके स्वायत्त रूप से निर्णय लेने के लिए विकसित किया जा रहा है.
इस तकनीक का उद्देश्य विमान को बदलती परिस्थितियों को समझने और उनके अनुसार काम करने में सक्षम बनाना है. इससे सैन्य अभियानों में मानवीय जोखिम कम करने और ऑपरेशन की लागत घटाने में मदद मिल सकती है. हालांकि, ऐसे स्वायत्त विमानों की वास्तविक परिचालन क्षमता, निर्णय लेने की सीमाएं और सुरक्षा संबंधी आवश्यकताएं परीक्षण तथा तकनीकी सत्यापन के बाद ही स्पष्ट होंगी.
'मोबिंग डॉक्ट्रिन' से एक साथ काम करेंगे कई मानवरहित विमान
Flying Wedge ने अपने विमानों के संचालन के लिए 'मोबिंग डॉक्ट्रिन' की अवधारणा विकसित की है. इसके तहत कई मानवरहित एयरक्राफ्ट एक मानव-संचालित विमान के साथ मिलकर काम कर सकते हैं. सुहास तेजस्कंदा के मुताबिक, 15 से 20 मानवरहित एयरक्राफ्ट एक मानव-संचालित विमान को रणनीतिक सहयोग और सुरक्षा देने के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं.
इस अवधारणा में विमान अलग-अलग काम करने के बजाय एक समन्वित समूह के रूप में काम करेंगे. वे मिशन की जरूरत के मुताबिक जानकारी साझा कर सकते हैं और अलग-अलग भूमिकाएं निभा सकते हैं. इससे कम लागत वाले कई विमानों को एक साथ तैनात करके सैन्य अभियानों की क्षमता बढ़ाने की संभावना बनती है.
कंपनी की ओर से पेश की गई इस अवधारणा का उद्देश्य केवल एक विमान की क्षमता बढ़ाना नहीं, बल्कि कई विमानों को एक साथ काम करने वाले नेटवर्क के रूप में विकसित करना है.
पारंपरिक फाइटर जेट से 20-30 गुना कम हो सकती है लागत
रक्षा खर्च पर संभावित असर के बारे में बात करते हुए सुहास तेजस्कंदा ने कहा कि करीब 100 मिलियन डॉलर के पारंपरिक फाइटर जेट की तुलना में 3 मिलियन डॉलर की लागत वाला विमान काफी किफायती हो सकता है.
उन्होंने कहा कि यदि ऐसे विमान में महंगे हथियार और अत्याधुनिक सेंसर भी शामिल किए जाएं, तब भी इसकी लागत 5 मिलियन डॉलर से अधिक नहीं होनी चाहिए. इस अनुमान के आधार पर ऐसे प्लेटफॉर्म की लागत पारंपरिक महंगे लड़ाकू विमान की तुलना में लगभग 20 से 30 गुना तक कम हो सकती है.
कंपनी के इस अनुमान के मुताबिक, कम लागत वाले विमानों को बड़ी संख्या में तैनात करने से भारत को सीमित रक्षा बजट में अपनी हवाई युद्ध क्षमता बढ़ाने का विकल्प मिल सकता है. हालांकि, वास्तविक लागत का आकलन विमान के अंतिम डिजाइन, हथियारों, सेंसर, रखरखाव और उत्पादन की संख्या के आधार पर करना होगा.
लाइट वेरिएंट में 90% तक स्वदेशी सामग्री
मेक इन इंडिया और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के बारे में सुहास तेजस्कंदा ने कहा कि स्वदेशी तकनीक विकसित करना और देश में ही निर्माण करना इस क्षेत्र के लिए बेहद अहम है.
उन्होंने बताया कि कंपनी के लाइट वेरिएंट में करीब 90% स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया जा रहा है. वहीं, 1.5 टन क्षमता वाले हेवी वेरिएंट में फिलहाल लगभग 65% स्वदेशी सामग्री है. उनके मुताबिक, इसमें स्वदेशी इंजन शामिल किए जाने के बाद घरेलू सामग्री की हिस्सेदारी बढ़कर करीब 85% तक पहुंच सकती है.
इससे भारत की रक्षा विनिर्माण क्षमता को मजबूत करने और विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है. हालांकि, स्वदेशी सामग्री की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए इंजन, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य महत्वपूर्ण प्रणालियों का घरेलू स्तर पर विकास अहम होगा.
FWD Supreme के अगले चरण में परीक्षण और तकनीकी विकास
FWD Supreme के अनावरण के दौरान कंपनी ने बताया कि कार्यक्रम के अगले चरण में तकनीक के विकास, परीक्षण और विभिन्न प्रणालियों के एकीकरण पर ध्यान दिया जाएगा. इसके साथ ही Supreme परिवार के अन्य विमानों को विकसित करने की योजना भी है.
कंपनी के मुताबिक, FWD Supreme Heavy एक टन श्रेणी का विमान है, जिसे स्वायत्त लड़ाकू अभियानों के लिए विकसित किया जा रहा है. इसे खुफिया जानकारी जुटाने, निगरानी और टोही (ISR), हमले तथा अन्य विमानों के साथ मिलकर काम करने वाले अभियानों के लिए कॉन्फिगर करने की योजना है.
FWDA के CEO सुहास तेजस्कंदा ने कहा कि FWD Supreme भारतीय डिजाइन, इंजीनियरिंग और विनिर्माण के माध्यम से उन्नत रक्षा क्षमताएं विकसित करने की कंपनी की प्रतिबद्धता को दर्शाता है. उन्होंने यह भी बताया कि FWD Supreme Lite टैक्सी ट्रायल पूरा कर चुका है और अपनी पहली उड़ान की तैयारी कर रहा है.
कंपनी 'ऑपरेशन ट्रिपल सेवन' के तहत अंतरराष्ट्रीय एयरोस्पेस और विनिर्माण साझेदारियां विकसित करने की भी योजना बना रही है. इसका उद्देश्य भारत के नेतृत्व में उन्नत लड़ाकू विमानन के विकास और निर्माण का इकोसिस्टम तैयार करना है.
कुल मिलाकर, FWD Supreme कार्यक्रम का फोकस AI आधारित स्वायत्त विमान, कम लागत वाले रक्षा प्लेटफॉर्म और एक साथ काम करने वाले मानवरहित विमानों की अवधारणा पर है. इसकी व्यावहारिक सफलता आने वाले समय में परीक्षण, तकनीकी प्रदर्शन, उत्पादन लागत और रक्षा अभियानों में इसके वास्तविक उपयोग पर निर्भर करेगी.
रिपोर्ट के अनुसार, Nestle India, PepsiCo और Dabur India जैसी कंपनियों के साथ JW Marriott जैसे होटल संचालकों को भी नियमों के उल्लंघन से जुड़े मामलों में जवाब देना पड़ा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
10 मिनट में घर तक सामान पहुंचाने वाली क्विक कॉमर्स कंपनियों Blinkit, Swiggy Instamart और Amazon Now के लिए आने वाले दिनों में खाद्य सुरक्षा से जुड़े नियम सख्त हो सकते हैं. भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बिकने वाले खाद्य पदार्थों की जानकारी, उनकी स्टोरेज व्यवस्था और उत्पादों से जुड़े दावों की निगरानी बढ़ाने पर विचार कर रहा है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रस्तावित बदलावों का उद्देश्य उपभोक्ताओं को खाद्य उत्पादों के बारे में सही जानकारी उपलब्ध कराना और सुरक्षा मानकों के उल्लंघन पर रोक लगाना है.
FSSAI के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) राजित पुनहानी के मुताबिक, नियामक इन कंपनियों के लिए नियमों को सख्त बनाने और उनकी जवाबदेही तय करने की दिशा में काम कर रहा है. हालांकि, प्रस्तावित बदलावों को लेकर अंतिम नियमों की स्थिति स्पष्ट होना अभी बाकी है.
ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर दिखानी पड़ सकती है पूरी जानकारी
प्रस्तावित नियमों के तहत क्विक कॉमर्स और ऑनलाइन ग्रॉसरी प्लेटफॉर्म पर खाद्य उत्पादों की लिस्टिंग में मैन्युफैक्चरिंग डेट, एक्सपायरी डेट और बैच नंबर जैसी जानकारियां दिखाना जरूरी हो सकता है. इससे ग्राहकों को खरीदारी से पहले उत्पाद की गुणवत्ता और उसकी उपयोग अवधि के बारे में जानकारी मिल सकेगी.
इसके अलावा, अगर किसी उत्पाद को लेकर भ्रामक दावा किया जाता है, तो ऐसे मामलों में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी भी तय की जा सकती है. इससे कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध खाद्य उत्पादों की जानकारी और उनसे जुड़े दावों की निगरानी अधिक सावधानी से करनी पड़ सकती है.
डार्क स्टोर और डार्क किचन की बढ़ सकती है जांच
FSSAI खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए डार्क स्टोर की जांच बढ़ाने पर भी विचार कर रहा है. क्विक कॉमर्स कंपनियां इन स्टोर का इस्तेमाल सामान को नजदीकी इलाकों में रखने और कम समय में ग्राहकों तक पहुंचाने के लिए करती हैं.
जांच के दौरान यह देखा जा सकता है कि खाद्य पदार्थों को निर्धारित तापमान और सुरक्षित परिस्थितियों में रखा जा रहा है या नहीं. इसमें फ्रोजन फूड यानी जमे हुए खाद्य पदार्थों के भंडारण पर भी ध्यान दिया जा सकता है. वहीं, डार्क किचन की तस्वीर और पता उपलब्ध कराना अनिवार्य करने के प्रस्ताव पर भी विचार हो रहा है. डार्क किचन ऐसे स्थान होते हैं, जहां डिलीवरी के लिए खाना तैयार किया जाता है, लेकिन ग्राहकों के बैठकर खाने की व्यवस्था नहीं होती. इस कदम से खाद्य पदार्थ तैयार करने वाली जगहों की पहचान और उनकी निगरानी आसान हो सकती है.
Blinkit, Instamart और Amazon पर पहले भी हुई कार्रवाई
खाद्य सुरक्षा नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए FSSAI ने पिछले कुछ महीनों में जांच और नियामकीय कार्रवाई तेज की है. रिपोर्ट के मुताबिक, Blinkit, Swiggy Instamart, Flipkart और Amazon के भारतीय कारोबार को अलग-अलग मामलों में कार्रवाई का सामना करना पड़ा है. इन मामलों में उत्पादों की गलत ब्रांडिंग, प्रतिबंधित वस्तुओं की बिक्री और वैध लाइसेंस से संबंधित गड़बड़ियां शामिल हैं.
जुलाई में FSSAI की जांच के बाद Swiggy Instamart ने कहा था कि वह नियामक की ओर से चिह्नित उत्पादों की लिस्टिंग की समीक्षा कर रहा है और मामले को सुलझाने के लिए अधिकारियों के संपर्क में है. वहीं, Amazon ने कहा कि उसका प्लेटफॉर्म एक ऑनलाइन मार्केटप्लेस है, जहां स्वतंत्र विक्रेता अपने उत्पाद बेचते हैं. कंपनी के प्रवक्ता के मुताबिक, नियमों का पालन नहीं करने वाले उत्पादों को हटाया जाता है और संबंधित उत्पाद को प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया था.
खाद्य कंपनियां, होटल और रेस्टोरेंट भी निगरानी के दायरे में
FSSAI की सख्ती केवल क्विक कॉमर्स कंपनियों तक सीमित नहीं है. खाद्य उत्पाद बनाने वाली कंपनियों, होटलों और रेस्टोरेंट की गतिविधियां भी नियामक की निगरानी में हैं. उत्पादों की लेबलिंग, विज्ञापनों में किए जाने वाले दावों, बच्चों के लिए बनाए जाने वाले उत्पादों की मार्केटिंग और खाद्य पदार्थों के भंडारण जैसे पहलुओं की जांच की जा रही है.
रिपोर्ट के अनुसार, Nestle India, PepsiCo और Dabur India जैसी कंपनियों के साथ JW Marriott जैसे होटल संचालकों को भी नियमों के उल्लंघन से जुड़े मामलों में जवाब देना पड़ा है.
कुल मिलाकर, FSSAI के प्रस्तावित कदम ऑनलाइन खाद्य कारोबार में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ा सकते हैं. यदि नए नियम लागू होते हैं, तो क्विक कॉमर्स कंपनियों को उत्पादों की जानकारी, खाद्य पदार्थों के भंडारण और सुरक्षा मानकों के अनुपालन पर अधिक ध्यान देना होगा. इससे ग्राहकों को खरीदारी के समय बेहतर जानकारी मिलने और खाद्य सुरक्षा से जुड़े जोखिमों को कम करने में मदद मिल सकती है.
नेट इंटरेस्ट इनकम में 37% की बढ़ोतरी, एडवांस 42% और जमा राशि 34% बढ़ी; एसेट क्वालिटी में भी सुधार
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आरबीएल (RBL) बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में शानदार प्रदर्शन किया है. बैंक का शुद्ध मुनाफा (Net Profit) सालाना आधार पर 170% बढ़कर ₹482 करोड़ पर पहुंच गया. पिछले साल की समान तिमाही में बैंक का मुनाफा इससे काफी कम था. बैंक ने 12 अक्टूबर 2026 को अपने वित्तीय नतीजों की घोषणा की. मुनाफे में इस बढ़ोतरी के पीछे ब्याज आय में वृद्धि, कर्ज वितरण में तेजी और परिचालन लाभ में सुधार प्रमुख कारण रहे.
नेट इंटरेस्ट इनकम में 37% की बढ़ोतरी
बैंक की शुद्ध ब्याज आय (Net Interest Income) सालाना आधार पर 37% बढ़कर ₹2,131 करोड़ हो गई. वहीं, शुद्ध ब्याज मार्जिन (Net Interest Margin) बढ़कर 4.61% पर पहुंच गया, जो पिछले साल की समान तिमाही में 4.51% था.
बैंक का परिचालन मुनाफा (Operating Profit) 92% बढ़कर ₹1,396 करोड़ हो गया. इस दौरान कुल शुद्ध आय (Net Total Income) 29% बढ़कर ₹3,208 करोड़ रही. अन्य आय में 16% की वृद्धि हुई और यह ₹1,077 करोड़ पर पहुंच गई. इसमें मुख्य शुल्क आय (Core Fee Income) का योगदान रहा, जो 12% बढ़कर ₹1,040 करोड़ हो गई.
बैंक का परिचालन खर्च 3% बढ़कर ₹1,812 करोड़ रहा. हालांकि, आय के मुकाबले खर्च के अनुपात यानी कॉस्ट-टू-इनकम रेशियो में सुधार हुआ. यह वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही के 70.67% से घटकर 56.48% पर आ गया.
कर्ज वितरण और जमा राशि में तेजी
30 सितंबर 2026 तक RBL बैंक का शुद्ध एडवांस यानी वितरित कर्ज सालाना आधार पर 42% बढ़कर ₹1.42 लाख करोड़ हो गया. वहीं, कुल जमा राशि 34% की बढ़ोतरी के साथ ₹1.56 लाख करोड़ पर पहुंच गई.
रिटेल एडवांस 32% बढ़कर ₹79,465 करोड़ रहा. इसमें सुरक्षित रिटेल कर्ज (Secured Retail Advances) 52% बढ़कर ₹51,933 करोड़ हो गया. दूसरी ओर, असुरक्षित रिटेल कर्ज (Unsecured Retail Advances) में 6% की वृद्धि हुई और यह ₹27,532 करोड़ पर पहुंच गया. थोक कर्ज (Wholesale Advances) 56% बढ़कर ₹62,849 करोड़ रहा, जबकि कमर्शियल बैंकिंग एडवांस में 47% की बढ़ोतरी दर्ज की गई.
जमा राशि में मजबूत वृद्धि के बावजूद बैंक का करंट अकाउंट और सेविंग अकाउंट (CASA) अनुपात घटकर 27.2% रह गया. हालांकि, CASA जमा सालाना आधार पर 14% बढ़कर ₹42,526 करोड़ हो गई. ₹3 करोड़ से कम की जमा राशि वाली श्रेणी में जमा 16% बढ़कर ₹68,877 करोड़ रही. इसका कुल जमा राशि में हिस्सा 44% था.
RBL बैंक के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी आर. सुब्रमण्यकुमार ने कहा कि तिमाही के दौरान बैंक की परिसंपत्तियों और देनदारियों, दोनों में वृद्धि दर्ज की गई. उन्होंने बताया कि विदेशी मुद्रा में गैर-निवासी जमा (FCNR Deposits) जुटाने से बैंक की फंडिंग स्थिति मजबूत हुई है. इससे भविष्य में कारोबार बढ़ाने के लिए बैंक को अतिरिक्त लचीलापन मिला है.
एसेट क्वालिटी में सुधार, NPA घटा
RBL बैंक की एसेट क्वालिटी में भी सुधार हुआ है. वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में बैंक का ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (GNPA) अनुपात घटकर 1.02% रह गया, जबकि एक साल पहले इसी अवधि में यह 2.32% था.
इसी तरह, नेट नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NNPA) अनुपात भी 0.57% से घटकर 0.29% पर आ गया. तकनीकी राइट-ऑफ सहित प्रोविजन कवरेज रेशियो 95.31% रहा.
हालांकि, इस दौरान क्रेडिट कॉस्ट में बढ़ोतरी हुई. यह पिछले साल की समान तिमाही के ₹503 करोड़ से बढ़कर ₹771 करोड़ हो गई. क्रेडिट कॉस्ट रेशियो भी 0.54% से बढ़कर 0.63% पर पहुंच गया.
कैपिटल एडिक्वेसी रेशियो में गिरावट
सितंबर 2026 के अंत में बैंक का कुल कैपिटल एडिक्वेसी रेशियो 30.1% रहा, जो जून 2026 के अंत में 33.3% था. इसी अवधि में कॉमन इक्विटी टियर-1 (CET1) अनुपात भी 32.2% से घटकर 29% पर आ गया. वहीं, तिमाही के दौरान बैंक का औसत लिक्विडिटी कवरेज रेशियो 148% रहा.
कुल मिलाकर, RBL बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में मुनाफे, ब्याज आय और कर्ज वितरण के मोर्चे पर मजबूत वृद्धि दर्ज की. साथ ही, बैंक के खराब कर्ज के अनुपात में कमी आई है. हालांकि, क्रेडिट कॉस्ट में बढ़ोतरी और कैपिटल एडिक्वेसी रेशियो में गिरावट पर भी नजर रहेगी.