बाजार खुलने से पहले ही जान लें, आज कहां बन सकती है कमाई की गुंजाइश!

शेयर बाजार के लिए पिछला हफ्ता अच्छा नहीं रहा. दरअसल, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और कुछ कंपनियों के उम्मीद मुताबिक तिमाही परिणाम न आने से बाजार में कमजोरी आई.

Last Modified:
Monday, 18 November, 2024
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पिछले हफ्ते शेयर बाजार में एक दिन कम ट्रेडिंग हुई. दरअसल, गुरु नानक जयंती के उपलक्ष्य में मार्केट शुक्रवार को बंद रहा. इससे पहले गुरुवार को हुए सेशन में गिरावट देखने को मिली.  इस दौरान, बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) का 30 शेयरों वाला सेंसेक्स 110.64 अंक लुढ़ककर 77,580.31 और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का निफ्टी 26.35 अंक गिरकर 23,532.70 पर बंद हुआ था. हमारे शेयर बाजार में गिरावट की एक बड़ी वजह विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) का बिकवाल बने रहना है. 

MACD के ये हैं संकेत
चलिए जानते हैं कि मोमेंटम इंडिकेटर MACD ने आज के लिए क्या संकेत दिए हैं. मूविंग एवरेज कन्वर्जेंस डिवर्जेंस (MACD) की माने तो आज Policy Bazaar, Network18 Media & Investments,  Godrej Agrovet, United Spirits, Astral और Aegis Logistics में तेजी देखने को मिल सकती है. इसका मतलब है कि इन शेयरों के भाव चढ़ सकते हैं. ऐसे में यदि आप दांव लगाते हैं तो मुनाफा कमाने की गुंजाइश भी बन सकती है. हालांकि, BW हिंदी आपको सलाह देता है कि शेयर बाजार में निवेश से पहले किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से परामर्श ज़रूर कर लें, अन्यथा आपको नुकसान भी उठाना पड़ सकता है. इसी तरह, MACD ने Kaynes Technology, Deepak Fertilisers, TVS Supply Chain Solutions,  Chambal Fertilisers & Chemicals, Varroc Engineering और Poonawalla Fincorp में मंदी का रुख दर्शाया है. यानी इनमें गिरावट देखने को मिल सकती है.

इन पर भी रखें नजर
अब उन शेयरों के बारे में भी जान लेते हैं, जिनमें मजबूत खरीदारी और बिकवाली का दबाव नज़र आ रहा है. मजबूत खरीदारी वाले शेयरों में आज केवल एक ही नाम है - HCL Technologies. दरअसल, इस शेयर ने अपना 52 वीक का हाई लेवल पार कर लिया है, जो तेजी का संकेत देता है. जबकि बिकवाली के दबाव वाले शेयरों में Westlife Foodworld,  Akums Drugs, Chennai Petroleum Corporation, IndusInd Bank, Happiest Minds, CreditAccess Grameen और Nestle India का नाम शामिल है. लिहाजा इन शेयरों में निवेश को लेकर सावधानी बरतें.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है).


भारत में पहला डेटा सेंटर बनाएगा Uber, अडानी ग्रुप के साथ हुई बड़ी साझेदारी

भारत से दुनिया के लिए टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट पर फोकस, साल के अंत तक तैयार हो सकता है नया सेंटर

Last Modified:
Wednesday, 13 May, 2026
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उबर (Uber) ने भारत में अपना पहला डेटा सेंटर स्थापित करने की घोषणा की है. कंपनी यह डेटा सेंटर अडानी ग्रुप (Adani Group) के साथ साझेदारी में बनाएगी. उबर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी दारा खोसरोशाही ने बुधवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इसकी जानकारी दी.

गौतम अडानी से मुलाकात के बाद हुआ ऐलान

दारा खोसरोशाही ने गौतम अडानी से मुलाकात के बाद इस नई साझेदारी का ऐलान किया. उन्होंने बताया कि यह डेटा सेंटर उबर की टेक्नोलॉजी के परीक्षण और तैनाती के लिए इस्तेमाल किया जाएगा. कंपनी का लक्ष्य इस साल के अंत तक इसे तैयार करना है. खोसरोशाही ने अपने पोस्ट में लिखा, भारत तेजी से उबर के लिए एक बड़े इनोवेशन हब के रूप में उभर रहा है. इसी को देखते हुए हम अडानी ग्रुप के साथ मिलकर देश में अपना पहला डेटा सेंटर स्थापित कर रहे हैं, जहां उबर की टेक्नोलॉजी का परीक्षण और तैनाती की जाएगी. इस साल के अंत तक तैयार होने वाला यह निवेश हमें बड़े स्तर पर काम करने में मदद करेगा, भारत से, दुनिया के लिए.

भारत में टेक और ऑपरेशन विस्तार पर Uber का जोर

यह घोषणा ऐसे समय में हुई है जब उबर भारत में अपने टेक्नोलॉजी और ऑपरेशनल नेटवर्क का विस्तार करने की दिशा में तेजी से काम कर रही है. भारत दौरे के दौरान उबर सीईओ ने कई वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों से मुलाकात की है. सूत्रों के मुताबिक, मंगलवार को दारा खोसरोशाही ने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहम नायडू से भी मुलाकात की.

मुंबई और बेंगलुरु दौरे का भी कार्यक्रम

भारत यात्रा के दौरान उबर सीईओ मुंबई में राज्य सरकार के अधिकारियों से भी मुलाकात करेंगे. इसके बाद वह बेंगलुरु स्थित उबर के टेक्नोलॉजी सेंटर का दौरा करेंगे, जो कंपनी के इंजीनियरिंग और प्रोडक्ट डेवलपमेंट का बड़ा केंद्र माना जाता है.

Uber के लिए क्यों अहम है भारत?

भारत उबर के लिए सिर्फ बड़ा राइड-हेलिंग बाजार ही नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग टैलेंट का भी महत्वपूर्ण केंद्र है. देश में बड़ी संख्या में ड्राइवर पार्टनर्स और यूजर्स होने के साथ-साथ Uber यहां अपने टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट नेटवर्क को भी मजबूत कर रही है.

विशेषज्ञों का मानना है कि अडानी ग्रुप के साथ डेटा सेंटर साझेदारी Uber की भारत में लंबी अवधि की रणनीति का हिस्सा है और इससे देश में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर तथा टेक निवेश को भी बढ़ावा मिल सकता है.


RBI से रिकॉर्ड डिविडेंड की उम्मीद, पश्चिम एशिया संकट के बीच सरकार को मिलेगा बड़ा आर्थिक सहारा

बजट दस्तावेजों के अनुसार, केंद्र सरकार को वित्त वर्ष 2026-27 में RBI, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों से डिविडेंड और अधिशेष के रूप में करीब 3.16 लाख करोड़ रुपये मिलने का अनुमान है.

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Wednesday, 13 May, 2026
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केंद्र सरकार को चालू वित्त वर्ष में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से अब तक का सबसे बड़ा डिविडेंड मिलने की संभावना है. मजबूत बैंकिंग प्रदर्शन, रिकॉर्ड मुनाफे और बढ़ते गैर-कर राजस्व के बीच यह राशि सरकार के लिए ऐसे समय में राहत बन सकती है, जब पश्चिम एशिया संकट और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं का दबाव बढ़ रहा है. माना जा रहा है कि RBI का यह अधिशेष ट्रांसफर सरकार की वित्तीय स्थिति को मजबूत करने के साथ-साथ विकास योजनाओं और राजकोषीय प्रबंधन में भी अहम भूमिका निभाएगा.

रिकॉर्ड डिविडेंड देने की तैयारी में RBI

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आरबीआईI इस महीने होने वाली अपनी केंद्रीय बोर्ड बैठक में सरकार को दिए जाने वाले डिविडेंड की अंतिम राशि पर फैसला कर सकता है. पिछले वित्त वर्ष 2024-25 में आरबीआई ने केंद्र सरकार को रिकॉर्ड 2.69 लाख करोड़ रुपये का डिविडेंड दिया था. यह उससे पिछले वर्ष दिए गए 2.11 लाख करोड़ रुपये की तुलना में करीब 27 प्रतिशत अधिक था. अब उम्मीद जताई जा रही है कि वित्त वर्ष 2026-27 में यह राशि और अधिक हो सकती है, जिससे सरकार को अतिरिक्त वित्तीय मजबूती मिलेगी.

इकोनॉमिक कैपिटल फ्रेमवर्क के तहत तय होता है अधिशेष

आरबीआई द्वारा सरकार को दिया जाने वाला अधिशेष केंद्रीय बैंक के संशोधित इकोनॉमिक कैपिटल फ्रेमवर्क (ECF) के आधार पर तय किया जाता है. इस ढांचे के तहत आकस्मिक जोखिम बफर (CRB) को आरबीआई की बैलेंस शीट के 4.5 प्रतिशत से 7.5 प्रतिशत के दायरे में बनाए रखना अनिवार्य है. इसी व्यवस्था के अनुसार केंद्रीय बैंक अपनी आय, निवेश और जोखिम प्रबंधन का आकलन करने के बाद सरकार को अधिशेष राशि ट्रांसफर करता है.

सरकार को ₹3.16 लाख करोड़ मिलने का अनुमान

बजट दस्तावेजों के अनुसार, केंद्र सरकार को वित्त वर्ष 2026-27 में RBI, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों से डिविडेंड और अधिशेष के रूप में करीब 3.16 लाख करोड़ रुपये मिलने का अनुमान है. यह मौजूदा वित्त वर्ष की तुलना में लगभग 3.75 प्रतिशत अधिक है. हालांकि सूत्रों का कहना है कि यह अनुमान सतर्कता के साथ लगाया गया है और वास्तविक राशि बजट अनुमान से ज्यादा हो सकती है.

PSU बैंकों ने दर्ज किया रिकॉर्ड मुनाफा

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) के शानदार वित्तीय प्रदर्शन ने सरकार की उम्मीदों को और मजबूत किया है. बेहतर एसेट क्वालिटी, तेज क्रेडिट ग्रोथ और ब्याज आय में बढ़ोतरी के चलते FY26 में सरकारी बैंकों की प्रॉफिटेबिलिटी में बड़ा सुधार देखने को मिला.

सरकारी बैंकों का कुल ऑपरेटिंग प्रॉफिट बढ़कर 3.21 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया, जबकि शुद्ध लाभ 11.1 प्रतिशत बढ़कर रिकॉर्ड 1.98 लाख करोड़ रुपये हो गया. लगातार चौथे वर्ष PSBs ने सामूहिक रूप से मुनाफा दर्ज किया है.

गैर-कर राजस्व पर सरकार की नजर

सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और अन्य निवेशों से भी वित्त वर्ष 2026-27 में लगभग 75,000 करोड़ रुपये के डिविडेंड की उम्मीद है. चालू वित्त वर्ष में यह आंकड़ा 71,000 करोड़ रुपये रहा था. आरबीआई का अधिशेष ट्रांसफर और विभिन्न संस्थानों से मिलने वाला डिविडेंड सरकार के गैर-कर राजस्व का अहम हिस्सा होता है. अगले वित्त वर्ष में सरकार को कुल गैर-कर राजस्व के रूप में 6.66 लाख करोड़ रुपये मिलने का अनुमान है.

वहीं, टैक्स रेवेन्यू 28.66 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान लगाया गया है, जो पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 7.18 प्रतिशत अधिक है.

पश्चिम एशिया संकट के बीच बढ़ेगी राहत

विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक आर्थिक दबावों के बीच RBI से मिलने वाला बड़ा डिविडेंड सरकार के लिए वित्तीय सुरक्षा कवच साबित हो सकता है. इससे सरकार को राजकोषीय घाटा नियंत्रित रखने और विकास खर्च जारी रखने में मदद मिलेगी.


1 जून से लागू हो सकता है भारत-ओमान व्यापार समझौता, निर्यात को मिलेगी रफ्तार

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने जानकारी दी कि ओमान की टीम के साथ हुई हालिया बैठक काफी सकारात्मक रही है और संभावना है कि भारत-ओमान मुक्त व्यापार समझौता जून की शुरुआत से प्रभावी हो जाएगा.

Last Modified:
Wednesday, 13 May, 2026
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भारत और ओमान के बीच व्यापारिक रिश्ते जल्द ही एक नए चरण में प्रवेश कर सकते हैं. केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री Piyush Goyal ने संकेत दिए हैं कि दोनों देशों के बीच व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता यानी CEPA 1 जून 2026 से लागू हो सकता है. इस समझौते के लागू होने से भारतीय निर्यातकों को ओमान के बाजार में बड़ी राहत मिलेगी, जबकि दोनों देशों के बीच निवेश और व्यापार गतिविधियों में भी तेजी आने की उम्मीद है.

1 जून से लागू हो सकता है भारत-ओमान समझौता

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने जानकारी दी कि ओमान की टीम के साथ हुई हालिया बैठक काफी सकारात्मक रही है और संभावना है कि भारत-ओमान मुक्त व्यापार समझौता जून की शुरुआत से प्रभावी हो जाएगा. यह समझौता दिसंबर 2025 में हस्ताक्षरित किया गया था और अब इसके क्रियान्वयन की तैयारियां अंतिम चरण में हैं.

गोयल के अनुसार, ओमान का प्रतिनिधिमंडल इस समय भारत दौरे पर है, जहां दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश को और मजबूत करने के विकल्पों पर चर्चा की जा रही है.

भारतीय निर्यातकों को मिलेगा बड़ा फायदा

इस CEPA समझौते के तहत भारत के लगभग 98 प्रतिशत निर्यात को ओमान में शुल्क मुक्त पहुंच मिलने की संभावना है. इसमें वस्त्र, कृषि उत्पाद, चमड़ा और कई अन्य प्रमुख सेक्टर शामिल हैं. इससे भारतीय कंपनियों को ओमान के बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिलेगी और निर्यात लागत में कमी आएगी.

वहीं दूसरी ओर भारत भी ओमान से आने वाले कुछ उत्पादों पर आयात शुल्क कम करेगा. इनमें खजूर, संगमरमर और पेट्रोकेमिकल उत्पाद प्रमुख रूप से शामिल हैं.

व्यापार के साथ निवेश को भी मिलेगा बढ़ावा

विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दोनों देशों के बीच निवेश के नए अवसर भी पैदा करेगा. भारत और ओमान के बीच लॉजिस्टिक्स, ऊर्जा, खाद्य प्रसंस्करण और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में साझेदारी मजबूत हो सकती है. इसके अलावा पश्चिम एशिया में भारत की आर्थिक मौजूदगी को भी इससे नई मजबूती मिलने की उम्मीद जताई जा रही है.

चिली के साथ भी आगे बढ़ रही बातचीत

पीयूष गोयल ने चिली के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर भी महत्वपूर्ण जानकारी दी. उन्होंने कहा कि भारत और चिली के बीच आर्थिक आकार और अवसरों में अंतर होने के कारण कुछ चुनौतियां जरूर हैं, लेकिन दोनों देश नए और व्यावहारिक समाधान तलाशने की कोशिश कर रहे हैं.

गोयल ने संकेत दिए कि यदि महत्वपूर्ण खनिजों और खनन रियायतों को लेकर सकारात्मक सहमति बनती है, तो चिली के साथ भी व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते को अंतिम रूप दिया जा सकता है.

भारत के लिए क्यों अहम है चिली समझौता

भारत और चिली पहले से ही 2006 से एक तरजीही व्यापार समझौते के तहत जुड़े हुए हैं. अब दोनों देश इसे विस्तार देकर व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते में बदलने की दिशा में काम कर रहे हैं.

इस प्रस्तावित समझौते में डिजिटल सेवाएं, निवेश सहयोग, MSME सेक्टर और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे क्षेत्रों को शामिल किया जा सकता है. चिली दुनिया के सबसे बड़े लिथियम भंडार वाले देशों में गिना जाता है और तांबे का प्रमुख उत्पादक भी है. ऐसे में यह समझौता भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक वाहन और सौर ऊर्जा सेक्टर के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

भारत की वैश्विक व्यापार रणनीति को मिलेगी मजबूती

विशेषज्ञों का कहना है कि ओमान और चिली जैसे देशों के साथ व्यापार समझौते भारत की वैश्विक आर्थिक रणनीति का अहम हिस्सा बनते जा रहे हैं. इन समझौतों के जरिए भारत नए बाजारों तक पहुंच बढ़ाने, सप्लाई चेन मजबूत करने और निर्यात आधारित विकास को गति देने की दिशा में आगे बढ़ रहा है.


भारत-ओमान CEPA से खुलेगा कारोबार का नया दौर, 1 जून से लागू हो सकता है व्यापार समझौता

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने जानकारी दी कि ओमान की टीम के साथ हुई हालिया बैठक काफी सकारात्मक रही है और संभावना है कि भारत-ओमान मुक्त व्यापार समझौता जून की शुरुआत से प्रभावी हो जाएगा.

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Wednesday, 13 May, 2026
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भारत और ओमान के बीच व्यापारिक रिश्ते जल्द ही एक नए चरण में प्रवेश कर सकते हैं. केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री Piyush Goyal ने संकेत दिए हैं कि दोनों देशों के बीच व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता यानी CEPA 1 जून 2026 से लागू हो सकता है. इस समझौते के लागू होने से भारतीय निर्यातकों को ओमान के बाजार में बड़ी राहत मिलेगी, जबकि दोनों देशों के बीच निवेश और व्यापार गतिविधियों में भी तेजी आने की उम्मीद है.

1 जून से लागू हो सकता है भारत-ओमान समझौता

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने जानकारी दी कि ओमान की टीम के साथ हुई हालिया बैठक काफी सकारात्मक रही है और संभावना है कि भारत-ओमान मुक्त व्यापार समझौता जून की शुरुआत से प्रभावी हो जाएगा. यह समझौता दिसंबर 2025 में हस्ताक्षरित किया गया था और अब इसके क्रियान्वयन की तैयारियां अंतिम चरण में हैं.

गोयल के अनुसार, ओमान का प्रतिनिधिमंडल इस समय भारत दौरे पर है, जहां दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश को और मजबूत करने के विकल्पों पर चर्चा की जा रही है.

भारतीय निर्यातकों को मिलेगा बड़ा फायदा

इस CEPA समझौते के तहत भारत के लगभग 98 प्रतिशत निर्यात को ओमान में शुल्क मुक्त पहुंच मिलने की संभावना है. इसमें वस्त्र, कृषि उत्पाद, चमड़ा और कई अन्य प्रमुख सेक्टर शामिल हैं. इससे भारतीय कंपनियों को ओमान के बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिलेगी और निर्यात लागत में कमी आएगी.

वहीं दूसरी ओर भारत भी ओमान से आने वाले कुछ उत्पादों पर आयात शुल्क कम करेगा. इनमें खजूर, संगमरमर और पेट्रोकेमिकल उत्पाद प्रमुख रूप से शामिल हैं.

व्यापार के साथ निवेश को भी मिलेगा बढ़ावा

विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दोनों देशों के बीच निवेश के नए अवसर भी पैदा करेगा. भारत और ओमान के बीच लॉजिस्टिक्स, ऊर्जा, खाद्य प्रसंस्करण और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में साझेदारी मजबूत हो सकती है. इसके अलावा पश्चिम एशिया में भारत की आर्थिक मौजूदगी को भी इससे नई मजबूती मिलने की उम्मीद जताई जा रही है.

चिली के साथ भी आगे बढ़ रही बातचीत

पीयूष गोयल ने चिली के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर भी महत्वपूर्ण जानकारी दी. उन्होंने कहा कि भारत और चिली के बीच आर्थिक आकार और अवसरों में अंतर होने के कारण कुछ चुनौतियां जरूर हैं, लेकिन दोनों देश नए और व्यावहारिक समाधान तलाशने की कोशिश कर रहे हैं.

गोयल ने संकेत दिए कि यदि महत्वपूर्ण खनिजों और खनन रियायतों को लेकर सकारात्मक सहमति बनती है, तो चिली के साथ भी व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते को अंतिम रूप दिया जा सकता है.

भारत के लिए क्यों अहम है चिली समझौता

भारत और चिली पहले से ही 2006 से एक तरजीही व्यापार समझौते के तहत जुड़े हुए हैं. अब दोनों देश इसे विस्तार देकर व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते में बदलने की दिशा में काम कर रहे हैं.

इस प्रस्तावित समझौते में डिजिटल सेवाएं, निवेश सहयोग, MSME सेक्टर और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे क्षेत्रों को शामिल किया जा सकता है. चिली दुनिया के सबसे बड़े लिथियम भंडार वाले देशों में गिना जाता है और तांबे का प्रमुख उत्पादक भी है. ऐसे में यह समझौता भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक वाहन और सौर ऊर्जा सेक्टर के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

भारत की वैश्विक व्यापार रणनीति को मिलेगी मजबूती

विशेषज्ञों का कहना है कि ओमान और चिली जैसे देशों के साथ व्यापार समझौते भारत की वैश्विक आर्थिक रणनीति का अहम हिस्सा बनते जा रहे हैं. इन समझौतों के जरिए भारत नए बाजारों तक पहुंच बढ़ाने, सप्लाई चेन मजबूत करने और निर्यात आधारित विकास को गति देने की दिशा में आगे बढ़ रहा है.


पश्चिम एशिया संकट और ईंधन महंगा होने से भारत में बढ़ी महंगाई: रिपोर्ट

रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल आया है. एविएशन टरबाइन फ्यूल यानी एटीएफ की कीमतों में करीब 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिसका असर हवाई किराए पर भी पड़ने लगा है.

Last Modified:
Wednesday, 13 May, 2026
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भारत में अप्रैल 2026 के दौरान खुदरा महंगाई दर मामूली बढ़कर 3.48 प्रतिशत पर पहुंच गई है. यह लगातार चौथा महीना है जब मुद्रास्फीति में बढ़ोतरी दर्ज की गई है. Elara Securities की रिपोर्ट के अनुसार खाद्य पदार्थों, शिक्षा और सेवाओं की बढ़ती लागत के कारण महंगाई पर दबाव बढ़ने लगा है.

मार्च के मुकाबले अप्रैल में बढ़ी महंगाई

मार्च 2026 में खुदरा मुद्रास्फीति दर 3.4 प्रतिशत थी, जो अप्रैल में बढ़कर 3.48 प्रतिशत हो गई. रिपोर्ट में कहा गया है कि वाणिज्यिक एलपीजी कीमतों में वृद्धि का असर रेस्तरां और होटल सेवाओं पर दिखाई देने लगा है. हालांकि कोर इंफ्लेशन अप्रैल में 3.4 प्रतिशत पर स्थिर रहा, जिससे संकेत मिलता है कि मांग आधारित दबाव फिलहाल नियंत्रित हैं.

खाद्य मुद्रास्फीति में फिर तेजी

अप्रैल में खाद्य मुद्रास्फीति बढ़कर 4 प्रतिशत हो गई, जबकि मार्च में यह 3.7 प्रतिशत थी. खाद्य तेल, फल, मछली और प्रोसेस्ड फूड की कीमतों में बढ़ोतरी इसका मुख्य कारण रही. दूसरी ओर सब्जियों, दालों और कंद वाली फसलों की कीमतों में मासिक आधार पर गिरावट दर्ज की गई. विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ते तापमान और मौसमी कारणों से आने वाले महीनों में खाद्य कीमतों पर दबाव बना रह सकता है.

पश्चिम एशिया संकट से बढ़ा ऊर्जा संकट

रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल आया है. एविएशन टरबाइन फ्यूल यानी एटीएफ की कीमतों में करीब 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिसका असर हवाई किराए पर भी पड़ने लगा है.

इसी के साथ रेस्तरां की कीमतों में अप्रैल में 4.2 प्रतिशत की सालाना वृद्धि दर्ज की गई, जबकि मार्च में यह 2.88 प्रतिशत थी. इसका कारण एलपीजी की ऊंची कीमतें और फूड डिलीवरी कंपनियों द्वारा बढ़ाए गए प्लेटफॉर्म शुल्क बताए गए हैं.

पेट्रोल-डीजल महंगे होने का खतरा

Elara Securities ने चेतावनी दी है कि यदि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में और बढ़ोतरी होती है तो महंगाई पर बड़ा असर पड़ सकता है. रिपोर्ट के अनुसार ईंधन कीमतों में 10 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि से हेडलाइन इंफ्लेशन में लगभग 47 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी हो सकती है. सप्लाई चेन और सेवाओं पर इसके दूसरे चरण के प्रभाव भी देखने को मिल सकते हैं.

एल नीनो का भी मंडरा रहा खतरा

रिपोर्ट में संभावित एल नीनो मौसम पैटर्न को भी बड़ा जोखिम बताया गया है. इससे कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है और खाद्य कीमतों में तेजी आ सकती है. सप्लाई चेन बाधाओं और बढ़ती उत्पादन लागत के साथ मिलकर यह स्थिति आने वाली तिमाहियों में महंगाई के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है.

आरबीआई फिलहाल रख सकता है सतर्क रुख

रिपोर्ट के अनुसार भारतीय रिजर्व बैंक फिलहाल ब्याज दरों पर सतर्क रुख बनाए रख सकता है. केंद्रीय बैंक ऊर्जा लागत, रुपये की कमजोरी और बढ़ती इनपुट लागत के असर पर करीबी नजर रखेगा. विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक महंगाई लगातार 6 प्रतिशत से ऊपर नहीं रहती, तब तक ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना कम है.

वित्त वर्ष 2027 में बढ़ सकते हैं जोखिम

रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2027 के लिए मुद्रास्फीति अनुमान 4.8 से 4.9 प्रतिशत के बीच बरकरार रखा गया है. हालांकि अगर कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं, तो वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में महंगाई जोखिम और बढ़ सकते हैं.

रिपोर्ट के निष्कर्ष के अनुसार फिलहाल महंगाई नियंत्रण में दिखाई दे रही है, लेकिन भू-राजनीतिक तनाव और जलवायु संबंधी जोखिम आने वाले महीनों में मूल्य स्थिरता और नीतिगत लचीलेपन की बड़ी परीक्षा ले सकते हैं.


AI से बदलेगा मौसम पूर्वानुमान का भविष्य, IMD ने लॉन्च किया स्मार्ट मॉनसून मॉडल

IMD के अनुसार नया AI मॉडल हर बुधवार को मॉनसून की प्रगति और सक्रियता का अनुमान जारी करेगा. यह मॉडल मौजूदा संख्यात्मक मौसम मॉडल और AI तकनीक को जोड़कर तैयार किया गया है.

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Wednesday, 13 May, 2026
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देश में बदलते मौसम और जलवायु संकट के बीच अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI मौसम पूर्वानुमान को और सटीक बनाने में अहम भूमिका निभाने जा रहा है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने देश का पहला AI आधारित मॉनसून अग्रिम पूर्वानुमान मॉडल लॉन्च किया है. इस नई तकनीक के जरिए अब ब्लॉक स्तर तक चार सप्ताह पहले मॉनसून की गतिविधियों का अनुमान लगाया जा सकेगा. इससे खास तौर पर किसानों को फसल योजना बनाने और मौसम जोखिम कम करने में मदद मिलेगी.

हर बुधवार जारी होगा मॉनसून अपडेट

IMD के अनुसार नया AI मॉडल हर बुधवार को मॉनसून की प्रगति और सक्रियता का अनुमान जारी करेगा. यह मॉडल मौजूदा संख्यात्मक मौसम मॉडल और AI तकनीक को जोड़कर तैयार किया गया है. मौसम विभाग का कहना है कि पूर्वानुमान में लगभग चार दिनों तक का विचलन संभव रहेगा, लेकिन इसके बावजूद यह पारंपरिक मॉडलों की तुलना में अधिक उपयोगी और प्रभावी साबित हो सकता है.

उत्तर प्रदेश के लिए शुरू हुआ हाई-रिजॉल्यूशन रेनफॉल मॉडल

मौसम विभाग ने इसके साथ ही राष्ट्रीय मध्यम श्रेणी मौसम पूर्वानुमान केंद्र (NCMRWF) द्वारा विकसित एक पायलट प्रोजेक्ट भी लॉन्च किया है. यह परियोजना AI आधारित उन्नत प्रणाली के जरिए उत्तर प्रदेश में एक किलोमीटर ग्रिड तक अत्यधिक सटीक वर्षा पूर्वानुमान देने में सक्षम होगी. इससे छोटी से छोटी भौगोलिक इकाई तक बारिश के पैटर्न को समझना आसान होगा.

जलवायु परिवर्तन के दौर में अहम पहल

विशेषज्ञों के मुताबिक जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का अनुमान लगाना लगातार चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है. ऐसे में AI आधारित यह पहल मौसम पूर्वानुमान प्रणाली को आधुनिक और अधिक भरोसेमंद बनाने की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है. खासकर सूखा, बाढ़ और अनियमित बारिश जैसी स्थितियों से निपटने में यह तकनीक मददगार हो सकती है.

कृषि मंत्रालय के साथ मिलकर तैयार हुआ सिस्टम

IMD ने स्पष्ट किया कि इन दोनों AI मॉडल को कृषि मंत्रालय के मार्गदर्शन में विकसित किया गया है. किसानों तक जानकारी पहुंचाने के लिए इन्हें कृषि मंत्रालय के API और एग्रीस्टैक प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाएगा. इसका उद्देश्य देशभर में प्रभाव आधारित और अति-स्थानीय मौसम सेवाएं उपलब्ध कराना है.

15 राज्यों के 3196 ब्लॉकों तक पहुंचेगी सुविधा

पृथ्वी विज्ञान मंत्री Jitendra Singh ने बताया कि यह ब्लॉक स्तर पूर्वानुमान प्रणाली फिलहाल 15 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के 3196 ब्लॉकों तक पहुंचेगी. इनमें अधिकांश क्षेत्र वर्षा आधारित कृषि वाले हैं, जहां समय पर मौसम जानकारी किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है.

सामान्य से कमजोर रह सकता है 2026 का मॉनसून

इन मॉडलों की शुरुआत ऐसे समय में हुई है जब 2026 के दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से कम रहने का अनुमान जताया गया है. हालांकि IMD ने साफ किया है कि नए AI मॉडल और इस अनुमान के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है.


सोना-चांदी खरीदना अब और महंगा! सरकार ने इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाकर 15% की

सरकार ने बुधवार को 10 प्रतिशत बेसिक कस्टम ड्यूटी के साथ 5 प्रतिशत  कृषि अवसंरचना और विकास उपकर (Agriculture Infrastructure and Development Cess-AIDC) लगाया है.

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Wednesday, 13 May, 2026
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पश्चिम एशिया में जारी तनाव, विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ते दबाव और लगातार कमजोर होते रुपये के बीच केंद्र सरकार ने सोना और चांदी के आयात को लेकर बड़ा फैसला लिया है. सरकार ने बुधवार को गोल्ड और सिल्वर पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दी है, जो पहले 6 प्रतिशत थी. सरकार ने 10 प्रतिशत बेसिक कस्टम ड्यूटी के साथ 5 प्रतिशत  कृषि अवसंरचना और विकास उपकर (Agriculture Infrastructure and Development Cess-AIDC) लगाया है. माना जा रहा है कि इस फैसले का सीधा असर सोने और चांदी की कीमतों पर पड़ेगा, जिससे आने वाले दिनों में ज्वेलरी खरीदना और महंगा हो सकता है.

रुपये पर दबाव और बढ़ते आयात बिल के बीच सरकार की सख्ती

सरकार का कहना है कि इस कदम का मकसद सोना-चांदी के आयात को कम करना, व्यापार घाटा नियंत्रित करना और रुपये को मजबूती देना है. हाल के दिनों में भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर 95.75 तक पहुंच गया था. ऐसे में सरकार विदेशी मुद्रा की बचत को लेकर लगातार कदम उठा रही है.

पीएम मोदी की अपील के बाद आया बड़ा फैसला

यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस अपील के कुछ दिनों बाद आया है, जिसमें उन्होंने लोगों से एक साल तक सोना खरीदने से बचने की सलाह दी थी. प्रधानमंत्री ने कहा था कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में देश को विदेशी मुद्रा बचाने की जरूरत है. हालांकि, कुछ दिन पहले तक सरकार की ओर से यह संकेत दिए जा रहे थे कि इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाने की फिलहाल कोई योजना नहीं है, लेकिन अब अचानक लिया गया यह फैसला बाजार के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है.

भारत पर सबसे ज्यादा असर क्यों?

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना आयातक देश है, जबकि चांदी की खपत में दुनिया में शीर्ष स्थानों पर आता है. देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है. ऐसे में ड्यूटी बढ़ने से सोना और चांदी की मांग पर असर पड़ सकता है, खासकर तब जब दोनों धातुओं की कीमतें पहले से ही रिकॉर्ड ऊंचाई पर बनी हुई हैं.

गोल्ड ETF में रिकॉर्ड निवेश

शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव और सोने की लगातार बढ़ती कीमतों के बीच निवेशकों का रुझान तेजी से गोल्ड निवेश की ओर बढ़ा है. वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक, मार्च तिमाही में भारत के गोल्ड ETF में निवेश 186 प्रतिशत बढ़कर रिकॉर्ड 20 मीट्रिक टन तक पहुंच गया. इससे साफ है कि निवेशक सुरक्षित निवेश विकल्प के तौर पर सोने को प्राथमिकता दे रहे हैं.

पहले भी आयात पर सख्ती कर चुकी है सरकार

सरकार हाल के हफ्तों में सोने के आयात को नियंत्रित करने के लिए लगातार कदम उठा रही थी. इससे पहले सोना और चांदी के आयात पर 3 प्रतिशत IGST लगाए जाने के बाद कई बैंकों ने करीब एक महीने तक आयात रोक दिया था. इसका असर यह हुआ कि अप्रैल में सोने का आयात लगभग 30 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया.

ज्वेलरी बाजार और ग्राहकों पर क्या होगा असर?

विशेषज्ञों का मानना है कि इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ने से घरेलू बाजार में सोने और चांदी की कीमतों में और तेजी आ सकती है. इससे शादी-ब्याह के सीजन और ज्वेलरी कारोबार पर असर पड़ सकता है. साथ ही निवेशकों के लिए गोल्ड ETF और डिजिटल गोल्ड जैसे विकल्पों की मांग भी बढ़ सकती है.
 


बाजार में भूचाल के बाद आज कैसी रहेगी चाल? निवेशकों की नजर ग्लोबल संकेतों और बड़े शेयरों पर

मंगलवार को BSE सेंसेक्स 1,456.04 अंक गिरकर 74,559.24 अंक पर बंद हुआ. वहीं, BSE  का निफ्टी 436.30 अंक टूटकर 23,379.55 अंक पर आ गया.

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Wednesday, 13 May, 2026
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पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और रुपये में रिकॉर्ड गिरावट के चलते मंगलवार को भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट देखने को मिली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मौजूदा हालात को कोरोना महामारी के बाद सबसे बड़ा वैश्विक संकट बताए जाने के बाद बाजार का सेंटिमेंट और कमजोर पड़ गया. सेंसेक्स और निफ्टी लगातार दूसरे दिन बड़ी गिरावट के साथ बंद हुए, जिससे निवेशकों के करीब 10 लाख करोड़ रुपये डूब गए. अब आज यानी बुधवार के कारोबार में निवेशकों की नजर ग्लोबल मार्केट संकेतों, कच्चे तेल की कीमतों, रुपये की चाल और उन शेयरों पर रहेगी जिनमें तिमाही नतीजों, बड़े ऑर्डर और ब्लॉक डील के चलते बड़ा एक्शन देखने को मिल सकता है.

मार्केट कैप में 10 लाख करोड़ रुपये की गिरावट

शेयर बाजार में आई इस बड़ी गिरावट से निवेशकों की संपत्ति को भी जबरदस्त नुकसान हुआ. मंगलवार को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स 1,456.04 अंक यानी 1.92 प्रतिशत गिरकर 74,559.24 अंक पर बंद हुआ. वहीं, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (BSE)  का निफ्टी 436.30 अंक यानी 1.83 प्रतिशत टूटकर 23,379.55 अंक पर आ गया. पिछले दो कारोबारी सत्रों में सेंसेक्स कुल 2,700 अंक से अधिक लुढ़क चुका है.

बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल मार्केट कैप करीब 10 लाख करोड़ रुपये घटकर 458 लाख करोड़ रुपये रह गया. इसी दौरान भारतीय रुपया भी दबाव में दिखाई दिया. डॉलर के मुकाबले रुपया 95.62 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ. विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और वैश्विक तनाव के कारण रुपये पर दबाव बढ़ता जा रहा है.

आईटी और फाइनेंशियल शेयरों में सबसे ज्यादा दबाव

सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 27 गिरावट के साथ बंद हुए. सबसे ज्यादा गिरावट Tech Mahindra में दर्ज की गई, जिसके शेयर 4.40 प्रतिशत टूट गए. इसके अलावा Adani Ports, HCLTech, Tata Consultancy Services, Titan Company, Infosys, Bharat Electronics Limited, Trent, Bajaj Finance, Bajaj Finserv और UltraTech Cement के शेयरों में 2 से 4 प्रतिशत तक की गिरावट देखने को मिली. हालांकि, कुछ चुनिंदा शेयरों ने बाजार को थोड़ी राहत दी. NTPC, State Bank of India और Bharti Airtel के शेयर मामूली बढ़त के साथ बंद हुए.

मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी भारी बिकवाली

ब्रॉडर मार्केट में भी कमजोरी साफ दिखाई दी. निफ्टी मिडकैप इंडेक्स 2.54 प्रतिशत और निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स 3.17 प्रतिशत तक टूट गए. सेक्टरवार प्रदर्शन की बात करें तो आईटी और रियल्टी सेक्टर में सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई. कंज्यूमर ड्यूरेबल्स और मीडिया सेक्टर में भी दबाव बना रहा. दूसरी ओर मेटल और ऑयल एंड गैस सेक्टर ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया.

विदेशी निवेशकों की बिकवाली से बढ़ा दबाव

शेयर बाजार के आंकड़ों के अनुसार विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) लगातार भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे हैं. सोमवार को एफआईआई ने 8,437 करोड़ रुपये के शेयर बेचे थे. विशेषज्ञों के मुताबिक, ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से 20 अरब डॉलर से अधिक की निकासी कर चुके हैं. इसका सीधा असर रुपये और घरेलू बाजार दोनों पर दिखाई दे रहा है. इस साल अब तक भारतीय रुपया करीब 6.5 प्रतिशत कमजोर हो चुका है और एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल हो गया है.

आज इन शेयरों पर रखें नजर

विशेषज्ञों के अनुसार, बुधवार 13 मई को तिमाही नतीजों, बड़े ऑर्डर, ब्लॉक डील, फंड जुटाने और डिविडेंड जैसे अहम अपडेट्स के चलते कई बड़ी कंपनियों के शेयरों में जोरदार हलचल देखने को मिल सकती है. इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग कंपनी Dixon Technologies ने उम्मीद से बेहतर तिमाही नतीजे पेश किए हैं, जबकि Vodafone Idea का बोर्ड 16 मई को फंड जुटाने के प्रस्ताव पर विचार करेगा. वहीं Tata Power का चौथी तिमाही मुनाफा घटा है, लेकिन कंपनी ने 2.50 रुपये प्रति शेयर डिविडेंड की सिफारिश की है. रेलवे सेक्टर की Texmaco Rail and Engineering को साउथ अफ्रीका से 4045 करोड़ रुपये से अधिक का बड़ा अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर मिला है, जबकि Rail Vikas Nigam Limited को South East Central Railway से 221 करोड़ रुपये का EPC कॉन्ट्रैक्ट मिला है. फार्मा सेक्टर में Pfizer, Neuland Laboratories और Dr. Reddy's Laboratories के नतीजे चर्चा में हैं. इसके अलावा Berger Paints India, Nazara Technologies, Kalpataru Projects International और Torrent Power के शेयर भी नतीजों और कारोबार अपडेट्स के चलते निवेशकों की नजर में रहेंगे. वहीं Groww की पैरेंट कंपनी Billionbrains Garage Ventures में 5326 करोड़ रुपये की बड़ी ब्लॉक डील ने भी बाजार का ध्यान खींचा है.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)


जनवरी–मार्च तिमाही में शहरी बेरोजगारी में मामूली राहत, ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ी चिंता

देश में कुल श्रम बल भागीदारी दर भी थोड़ी कमजोर हुई है और यह घटकर 55.5 प्रतिशत पर आ गई, जो पिछली तिमाही में 55.8 प्रतिशत थी.

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Tuesday, 12 May, 2026
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सरकारी आंकड़ों के अनुसार जनवरी–मार्च 2026 तिमाही में भारत के शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी दर में हल्की गिरावट दर्ज की गई है, जबकि ग्रामीण इलाकों में स्थिति थोड़ी बिगड़ी है. शहरों में रोजगार बाजार में सुधार के संकेत मिले हैं, लेकिन ग्रामीण स्तर पर बेरोजगारी में बढ़ोतरी ने चिंता बढ़ा दी है. यह आंकड़े देश की लेबर मार्केट की मिश्रित तस्वीर पेश करते हैं.

शहरों में बेरोजगारी घटी, ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ोतरी

15 वर्ष और उससे अधिक आयु वर्ग के लिए शहरी बेरोजगारी दर जनवरी–मार्च 2026 में घटकर 6.6 प्रतिशत पर आ गई, जो पिछले अक्टूबर–दिसंबर 2025 में 6.7 प्रतिशत थी. इसके विपरीत ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी दर बढ़कर 4.3 प्रतिशत हो गई, जो पिछली तिमाही में 4.0 प्रतिशत थी.

श्रम भागीदारी दर में भी हल्की गिरावट

देश में कुल श्रम बल भागीदारी दर भी थोड़ी कमजोर हुई है और यह घटकर 55.5 प्रतिशत पर आ गई, जो पिछली तिमाही में 55.8 प्रतिशत थी. शहरी भागीदारी दर 50.2 प्रतिशत रही, जो पहले 50.4 प्रतिशत थी, जबकि ग्रामीण भागीदारी 58.2 प्रतिशत रही, जो पहले 58.4 प्रतिशत थी.

महिला श्रम भागीदारी लगभग स्थिर

महिलाओं की श्रम भागीदारी में कोई बड़ा बदलाव नहीं देखा गया. कुल महिला श्रम भागीदारी दर 34.7 प्रतिशत रही, जो पहले 34.9 प्रतिशत थी. ग्रामीण क्षेत्रों में यह 39.2 प्रतिशत रही, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह लगभग स्थिर रहकर 25.4 प्रतिशत पर पहुंची.

वर्कर पॉपुलेशन रेशियो में मामूली गिरावट

रोजगार की स्थिति को दर्शाने वाला वर्कर पॉपुलेशन रेशियो घटकर 52.8 प्रतिशत रह गया, जो पहले 53.1 प्रतिशत था. शहरी क्षेत्रों में यह लगभग स्थिर 46.9 प्रतिशत पर रहा, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह घटकर 55.7 प्रतिशत पर आ गया, जो पहले 56.1 प्रतिशत था.

ग्रामीण रोजगार की गुणवत्ता में सुधार के संकेत

ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की गुणवत्ता में सुधार देखा गया है. नियमित वेतन और मजदूरी वाले रोजगार की हिस्सेदारी बढ़कर 15.5 प्रतिशत हो गई, जो पहले 14.8 प्रतिशत थी. वहीं स्वरोजगार की हिस्सेदारी घटकर 62.5 प्रतिशत रह गई, जो पहले 63.2 प्रतिशत थी.

कृषि से अन्य क्षेत्रों की ओर बढ़ता रोजगार

ग्रामीण रोजगार में संरचनात्मक बदलाव भी देखने को मिला है. कृषि क्षेत्र में रोजगार की हिस्सेदारी घटकर 55.8 प्रतिशत रह गई, जो पहले 58.5 प्रतिशत थी. इसके विपरीत सेकेंडरी सेक्टर में यह बढ़कर 22.6 प्रतिशत हो गई, जबकि टर्शियरी सेक्टर की हिस्सेदारी भी बढ़कर 21.7 प्रतिशत पर पहुंच गई.

देश में 57 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार

सर्वे के अनुसार जनवरी–मार्च 2026 तिमाही में देशभर में औसतन 57.4 करोड़ लोग रोजगार में थे, जिनमें 40.2 करोड़ पुरुष और 17.2 करोड़ महिलाएं शामिल हैं. कुल मिलाकर आंकड़े बताते हैं कि शहरी रोजगार बाजार में हल्का सुधार हुआ है, लेकिन ग्रामीण बेरोजगारी में बढ़ोतरी और श्रम भागीदारी में गिरावट चिंता का संकेत है. रोजगार संरचना में बदलाव जरूर दिख रहा है, लेकिन संतुलित और स्थिर वृद्धि अभी भी एक चुनौती बनी हुई है.
 


ईरान युद्ध का बढ़ता असर, मूडीज ने घटाया भारत का ग्रोथ अनुमान, अगले 6 महीने रहेंगे चुनौतीपूर्ण

मूडीज के मुताबिक आने वाले छह महीनों में वैश्विक ऊर्जा संकट का असर अलग-अलग देशों पर उनकी आयात निर्भरता और आर्थिक क्षमता के आधार पर पड़ेगा.

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Tuesday, 12 May, 2026
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पश्चिम एशिया में जारी ईरान युद्ध अब केवल भू-राजनीतिक संकट नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर भी साफ दिखने लगा है. भारत में भी इसके संकेत मिलने शुरू हो गए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ईंधन बचाने और गैर-जरूरी खर्च कम करने की अपील के बीच अब ग्लोबल रेटिंग एजेंसी मूडीज ने भारत की आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान घटा दिया है. एजेंसी का कहना है कि महंगे कच्चे तेल, बढ़ती ऊर्जा लागत और कमजोर पड़ती औद्योगिक गतिविधियों का असर अगले छह महीनों में भारतीय अर्थव्यवस्था पर और ज्यादा दिखाई दे सकता है.

मूडीज ने घटाया भारत का ग्रोथ अनुमान

ग्लोबल क्रेडिट रेटिंग एजेंसी Moody's Ratings ने 2026 के लिए भारत की जीडीपी ग्रोथ का अनुमान 0.8 प्रतिशत अंक घटाकर 6 प्रतिशत कर दिया है. एजेंसी ने अपनी ‘ग्लोबल मैक्रो आउटलुक’ रिपोर्ट में कहा कि बढ़ती ऊर्जा कीमतें, कमजोर निजी खपत और औद्योगिक सुस्ती भारत की आर्थिक रफ्तार को प्रभावित कर सकती हैं. इसके साथ ही मूडीज ने 2027 के लिए भी भारत की आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान घटाकर 6 प्रतिशत कर दिया है. पहले एजेंसी इससे अधिक ग्रोथ की उम्मीद जता रही थी.

छह महीने में दिख सकता है बड़ा असर

मूडीज के मुताबिक आने वाले छह महीनों में वैश्विक ऊर्जा संकट का असर अलग-अलग देशों पर उनकी आयात निर्भरता और आर्थिक क्षमता के आधार पर पड़ेगा. भारत जैसे देशों पर दबाव ज्यादा हो सकता है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है. एजेंसी ने कहा कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो ईंधन और उर्वरकों की लागत बढ़ सकती है, जिसका असर महंगाई और उत्पादन लागत पर पड़ेगा.

पीएम मोदी ने भी जताई चिंता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में ईरान युद्ध को कोरोना महामारी के बाद दुनिया का सबसे बड़ा संकट बताया था. उन्होंने लोगों से पेट्रोल-डीजल की बचत करने, सार्वजनिक परिवहन अपनाने और गैर-जरूरी विदेशी यात्राओं से बचने की अपील की थी.

प्रधानमंत्री की इस अपील के बाद देश में ऊर्जा संकट और महंगाई को लेकर चर्चाएं तेज हो गई थीं. सरकार का मानना है कि वैश्विक हालात तेजी से बदल रहे हैं और ऊर्जा संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है.

भारत पर ज्यादा क्यों है खतरा?

भारत अपनी कुल ऊर्जा जरूरतों का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. विशेषज्ञों के अनुसार अगर ब्रेंट क्रूड लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना रहता है, तो इससे भारत का आयात बिल बढ़ सकता है. साथ ही रुपये पर दबाव, महंगाई में तेजी और चालू खाते के घाटे में बढ़ोतरी जैसी चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं.

कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी

ईरान युद्ध और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल बना हुआ है. ब्रेंट क्रूड हाल ही में 105 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया था. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि होर्मुज स्ट्रेट जैसे अहम समुद्री मार्गों पर संकट और गहराता है, तो वैश्विक सप्लाई चेन पर बड़ा असर पड़ सकता है. इसका असर केवल तेल बाजार ही नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दिखाई देगा.

निवेश और उद्योग पर भी बढ़ सकता है दबाव

ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी का असर केवल आम लोगों तक सीमित नहीं रहेगा. इससे मैन्युफैक्चरिंग, ट्रांसपोर्ट, एविएशन और केमिकल सेक्टर की लागत भी बढ़ सकती है. निजी कंपनियों के मुनाफे पर दबाव बढ़ने और निवेश गतिविधियों में सुस्ती आने की आशंका भी जताई जा रही है. हालांकि मूडीज का कहना है कि जैसे-जैसे ऊर्जा सप्लाई सामान्य होगी और शिपिंग नेटवर्क स्थिर होंगे, आर्थिक गतिविधियों में धीरे-धीरे सुधार देखने को मिल सकता है.