विक्रम-1 की सफल लॉन्चिंग भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए मील का पत्थर मानी जा रही है. अब तक देश में सैटेलाइट लॉन्चिंग की जिम्मेदारी मुख्य रूप से ISRO निभाता था, लेकिन निजी कंपनियों की सक्रिय भागीदारी से इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा और क्षमता दोनों बढ़ेंगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
भारत ने अंतरिक्ष क्षेत्र में एक और ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है. हैदराबाद की निजी कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace) का पहला ऑर्बिटल रॉकेट 'विक्रम-1' सफलतापूर्वक लॉन्च हो गया है. इस उपलब्धि के साथ भारत के निजी स्पेस सेक्टर ने एक नए दौर में प्रवेश कर लिया है. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे सैटेलाइट लॉन्चिंग, निवेश, स्टार्टअप्स, रोजगार और वैश्विक स्पेस मार्केट में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने में बड़ी मदद मिलेगी.
मिशन आगमन
हैदराबाद स्थित स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा विकसित इस रॉकेट को दोपहर 12 बजे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के श्रीहरिकोटा स्थित लॉन्च सेंटर से लॉन्च किया गया. इस मिशन को 'मिशन आगमन' नाम दिया गया है. इस मिशन के तहत विक्रम-1 टेक्नोलॉजी और कला से जुड़े विभिन्न पेलोड अंतरिक्ष में लेकर गया है. मिशन की कुल लागत लगभग 20 से 30 लाख डॉलर (करीब 19 से 28 करोड़ रुपये) बताई जा रही है. इससे पहले कंपनी ने वर्ष 2022 में 'विक्रम-एस' नाम के सब-ऑर्बिटल रॉकेट का सफल परीक्षण किया था, जिसके बाद यह अगला बड़ा कदम माना जा रहा है.
ISRO के पूर्व वैज्ञानिकों ने रखी कंपनी की नींव
स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना वर्ष 2018 में ISRO के दो पूर्व वैज्ञानिकों पवन कुमार चंदना और नागा भरत डाका ने की थी. दोनों ने सरकारी नौकरी छोड़कर भारत की पहली निजी रॉकेट लॉन्च कंपनी बनाने का सपना देखा था.
पवन कुमार चंदना कंपनी के सह-संस्थापक (Co-founder) और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) हैं, जबकि नागा भरत डाका सह-संस्थापक और मुख्य परिचालन अधिकारी (COO) हैं. दोनों ISRO में रॉकेट और लॉन्च सिस्टम से जुड़े महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स पर काम कर चुके हैं. पवन कुमार चंदना का नाम फोर्ब्स की '30 अंडर 30 एशिया' सूची में भी शामिल हो चुका है. उन्होंने IIT खड़गपुर से पढ़ाई की है. वर्तमान में स्काईरूट एयरोस्पेस का मूल्यांकन करीब 10,500 करोड़ रुपये है.
भारतीय स्पेस सेक्टर को क्या होगा फायदा?
विक्रम-1 की सफल लॉन्चिंग भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए मील का पत्थर मानी जा रही है. अब तक देश में सैटेलाइट लॉन्चिंग की जिम्मेदारी मुख्य रूप से ISRO निभाता था, लेकिन निजी कंपनियों की सक्रिय भागीदारी से इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा और क्षमता दोनों बढ़ेंगी.
कम लागत पर सैटेलाइट लॉन्च करने की क्षमता विकसित होने से दुनिया भर की कंपनियां अपने उपग्रह लॉन्च कराने के लिए भारत का रुख कर सकती हैं. इससे भारत वैश्विक कमर्शियल स्पेस मार्केट में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकेगा.
स्टार्टअप्स, निवेश और रोजगार को मिलेगा बढ़ावा
निजी कंपनियों की बढ़ती भागीदारी से स्पेस टेक्नोलॉजी से जुड़े स्टार्टअप्स के लिए नए अवसर पैदा होंगे. साथ ही घरेलू और विदेशी निवेश में बढ़ोतरी होने की संभावना है. इससे उच्च तकनीक आधारित रोजगार भी बढ़ेंगे और भारत का अंतरिक्ष उद्योग नई ऊंचाइयों तक पहुंच सकेगा.
नई स्पेस पॉलिसी से मिला बढ़ावा
केंद्र सरकार ने वर्ष 2023 में भारतीय अंतरिक्ष नीति (Indian Space Policy) लागू की थी, जिसके बाद निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स के लिए अंतरिक्ष क्षेत्र में काम करने के नए अवसर खुले. सरकार ने 2024 से अंतरिक्ष क्षेत्र में 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की भी अनुमति दे दी है. इससे विदेशी कंपनियों के लिए भारत के स्पेस सेक्टर में निवेश करना और आसान हो गया है.
तेजी से बढ़ रहा भारतीय स्पेस इकोसिस्टम
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले 12 वर्षों में देश में 400 से अधिक स्पेस स्टार्टअप्स शुरू हो चुके हैं. इंडियन नेशनल स्पेस प्रमोशन एंड ऑथराइजेशन सेंटर (IN-SPACe) के मुताबिक, 30 सितंबर 2025 तक 376 स्टार्टअप्स ने पंजीकरण के लिए आवेदन किया था.
वहीं, 2015 से 2024 के बीच ISRO ने 393 विदेशी और 3 भारतीय वाणिज्यिक उपग्रह लॉन्च किए, जिससे भारत को करीब 439 मिलियन डॉलर (लगभग 4,227 करोड़ रुपये) की आय हुई.
2040 तक 100 अरब डॉलर की स्पेस इकोनॉमी का लक्ष्य
वर्ष 2021 में वैश्विक स्पेस इंडस्ट्री में भारत की हिस्सेदारी करीब 2 फीसदी (8.4 अरब डॉलर) थी. सरकार का अनुमान है कि 2030 तक भारत की स्पेस इकोनॉमी 40-45 अरब डॉलर और 2040 तक 100 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है. वहीं, स्पेस एक्सपोर्ट 11 अरब डॉलर तक पहुंचने की संभावना है. विक्रम-1 की सफल लॉन्चिंग को इसी लक्ष्य की दिशा में भारत का एक बड़ा और निर्णायक कदम माना जा रहा है.
अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव लगातार बढ़ता जा रहा है. इस घटनाक्रम ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों की चिंता बढ़ा दी है. दक्षिणी ईरान में अमेरिकी हमलों में आठ लोगों की मौत की खबरों के बाद आशंका बढ़ गई है कि संघर्ष आगे बढ़ने पर दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य से कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है. इसका असर तेल कीमतों, महंगाई और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है.
बढ़ते हमले और जवाबी कार्रवाई से क्षेत्र में व्यापारिक जहाजों और ऊर्जा ढांचे पर खतरा बढ़ रहा है. बाजारों को डर है कि यदि संघर्ष और तेज हुआ तो होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले समुद्री यातायात पर असर पड़ सकता है, जिससे वैश्विक कच्चे तेल की आपूर्ति, व्यापार और वित्तीय बाजारों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है.
होर्मुज जलडमरूमध्य बना ऊर्जा बाजार का केंद्र
वैश्विक ऊर्जा बाजारों के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक मार्गों में से एक है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, वर्ष 2025 में इस जलमार्ग से प्रतिदिन औसतन करीब 2 करोड़ बैरल कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की आवाजाही हुई, जो दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का लगभग 25 फीसदी हिस्सा है. इस मार्ग से जाने वाली बड़ी मात्रा में तेल की आपूर्ति एशियाई देशों, जिसमें भारत, चीन और जापान जैसे प्रमुख उपभोक्ता शामिल हैं, तक पहुंचती है.
यदि इस मार्ग से तेल परिवहन लंबे समय तक बाधित होता है तो कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है. हालांकि कुछ तेल को वैकल्पिक पाइपलाइनों के जरिए भेजा जा सकता है, लेकिन IEA के मुताबिक उनकी क्षमता होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाली कुल मात्रा की तुलना में काफी सीमित है.
कच्चे तेल और शिपिंग लागत पर नजर
निवेशक अब पश्चिम एशिया की स्थिति पर करीबी नजर बनाए हुए हैं. भू-राजनीतिक जोखिम बढ़ने से ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता बढ़ रही है. यदि तेल आपूर्ति प्रभावित होती है तो ब्रेंट क्रूड की कीमतों में तेजी आ सकती है. लंबे समय तक संघर्ष जारी रहने की स्थिति में क्षेत्र में काम करने वाले जहाजों के लिए माल ढुलाई लागत और युद्ध जोखिम बीमा (War Risk Insurance) का प्रीमियम भी बढ़ सकता है.
इसका असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा. कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से विमानन, रसायन, उर्वरक, लॉजिस्टिक्स और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों की लागत बढ़ सकती है. वहीं, बढ़ती शिपिंग लागत वैश्विक महंगाई पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है.
केंद्रीय बैंकों के लिए बढ़ेगी चुनौती
अगर ऊर्जा कीमतों में लंबे समय तक तेजी बनी रहती है तो दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों के लिए मौद्रिक नीति को लेकर नई चुनौती पैदा हो सकती है. महंगाई को नियंत्रित करने और आर्थिक विकास को गति देने के बीच संतुलन बनाना उनके लिए मुश्किल हो सकता है.
भारत पर भी पड़ सकता है असर
भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक देश है, इसलिए लंबे समय तक तेल कीमतों में बढ़ोतरी का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है. महंगा कच्चा तेल भारत के आयात बिल को बढ़ा सकता है, जिससे चालू खाते के घाटे पर दबाव बढ़ सकता है. इसके अलावा रुपये पर दबाव, कंपनियों की लागत में वृद्धि और परिवहन खर्च में तेजी देखने को मिल सकती है.
यदि तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी होती है तो सरकार के वित्तीय प्रबंधन और ईंधन कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है.
बाजारों में जारी रह सकती है अस्थिरता
विशेषज्ञों का कहना है कि बाजार पर संघर्ष का दीर्घकालिक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या इससे तेल आपूर्ति और होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए जहाजों की आवाजाही वास्तव में लंबे समय तक प्रभावित होती है.
अगर व्यावसायिक जहाजों की आवाजाही सामान्य बनी रहती है तो कच्चे तेल की कीमतों में शुरुआती जोखिम प्रीमियम धीरे-धीरे कम हो सकता है. लेकिन यदि टैंकरों पर हमले होते हैं या होर्मुज मार्ग से यातायात में बड़ी गिरावट आती है तो वैश्विक ऊर्जा संकट की स्थिति बन सकती है.
मध्य पूर्व में जारी संकट के कारण पहले ही तेल आपूर्ति प्रभावित हुई है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, संघर्ष शुरू होने के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल शिपमेंट में तेज गिरावट दर्ज की गई है.
राजनयिक प्रयासों से अभी तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है. ऐसे में वैश्विक बाजारों की नजर पश्चिम एशिया के घटनाक्रमों पर बनी रहेगी, खासकर ऊर्जा ढांचे और समुद्री व्यापार मार्गों पर होने वाली किसी भी नई कार्रवाई पर.
ऑटो उद्योग का मानना है कि SUV और यूटिलिटी व्हीकल की बढ़ती मांग, बेहतर मॉडल लॉन्च और ग्राहकों की बदलती प्राथमिकताओं के चलते यात्री वाहन बाजार में आगे भी तेजी बनी रह सकती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत का यात्री वाहन उद्योग 2026 में रिकॉर्ड प्रदर्शन की ओर बढ़ रहा है. वाहन निर्माताओं से डीलरों तक गाड़ियों की आपूर्ति यानी थोक बिक्री में पहली छमाही के दौरान जबरदस्त तेजी देखने को मिली है. जनवरी से जून के बीच वाहनों की थोक बिक्री छह में से पांच महीनों में 4 लाख यूनिट के पार रही. यूटिलिटी व्हीकल (UV) की मजबूत मांग और ग्राहकों की बदलती पसंद के चलते ऑटो सेक्टर अब तक के सबसे बेहतर साल की ओर बढ़ता नजर आ रहा है.
वाहन उद्योग संगठन सियाम (SIAM) के आंकड़ों के अनुसार, जून 2026 में यात्री वाहनों की थोक बिक्री 3.88 लाख यूनिट रही. हालांकि यह सालाना आधार पर 24.1 फीसदी अधिक थी, लेकिन साल की शुरुआत में दर्ज किए गए रिकॉर्ड स्तरों की तुलना में इसमें गिरावट आई.
जनवरी में सबसे ज्यादा बिक्री
पहली छमाही में जनवरी सबसे मजबूत महीना रहा, जब यात्री वाहनों की थोक बिक्री 4.50 लाख यूनिट तक पहुंच गई. इसके बाद मार्च में 4.42 लाख और मई में 4.39 लाख वाहनों की बिक्री दर्ज की गई.
अप्रैल में भी यात्री वाहन बाजार ने शानदार प्रदर्शन किया. इस महीने बिक्री 4.37 लाख यूनिट रही, जो पिछले साल के इसी महीने के मुकाबले 25.4 फीसदी अधिक थी. ऑटो उद्योग में इस बढ़ोतरी का सबसे बड़ा कारण यूटिलिटी व्हीकल सेगमेंट की मजबूत मांग रही.
SUV और UV की मांग ने बढ़ाई रफ्तार
यात्री वाहन बाजार में यूटिलिटी व्हीकल (UV) सेगमेंट लगातार ग्रोथ का प्रमुख आधार बना हुआ है. कैलेंडर वर्ष 2026 की पहली तिमाही यानी जनवरी से मार्च के दौरान UV बिक्री सालाना आधार पर 20.1 फीसदी बढ़कर 8,99,255 यूनिट हो गई. इस दौरान UV की बिक्री ने पैसेंजर कारों को पीछे छोड़ दिया. पहली तिमाही में पैसेंजर कारों की बिक्री 0.3 फीसदी घटकर 3,75,659 यूनिट रही.
दूसरी तिमाही में भी जारी रही तेजी
अप्रैल से जून 2026 की दूसरी तिमाही में भी UV सेगमेंट का प्रदर्शन मजबूत बना रहा. इस दौरान UV बिक्री 28.6 फीसदी बढ़कर 8,61,918 यूनिट पहुंच गई. वहीं, पैसेंजर कारों की बिक्री में भी सुधार देखने को मिला और इसमें सालाना आधार पर 21.3 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई. हालांकि, ग्रोथ के मामले में UV सेगमेंट सबसे आगे रहा.
ऑटो उद्योग का मानना है कि SUV और यूटिलिटी व्हीकल की बढ़ती मांग, बेहतर मॉडल लॉन्च और ग्राहकों की बदलती प्राथमिकताओं के चलते यात्री वाहन बाजार में आगे भी तेजी बनी रह सकती है.
नीति आयोग का कहना है कि राज्यों में निवेश के लिए बेहतर माहौल तैयार होने से घरेलू और विदेशी निवेश में बढ़ोतरी होगी. इससे औद्योगिकीकरण को गति मिलेगी, नवाचार को बढ़ावा मिलेगा और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश में निवेश को बढ़ावा देने और राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धी एवं सहकारी संघवाद को मजबूत करने की दिशा में नीति आयोग (NITI Aayog) ने पहली बार 'इन्वेस्टमेंट फ्रेंडलीनेस इंडेक्स' (Investment Friendliness Index-IFI) जारी किया है. इस रैंकिंग में गुजरात निवेश के लिए सबसे अनुकूल राज्य बनकर उभरा है. महाराष्ट्र दूसरे और तमिलनाडु तीसरे स्थान पर रहे, जबकि गोवा और ओडिशा भी शीर्ष प्रदर्शन करने वाले राज्यों में शामिल हैं. सरकार का मानना है कि यह इंडेक्स राज्यों में निवेश से जुड़े सुधारों को गति देगा और भारत को वैश्विक निवेश के प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित करने में मदद करेगा.
28 राज्य और 8 केंद्रशासित प्रदेशों का हुआ मूल्यांकन
इस इंडेक्स में देश के सभी 28 राज्यों और 8 केंद्रशासित प्रदेशों का मूल्यांकन किया गया है. इसके लिए आठ प्रमुख स्तंभों और 84 संकेतकों (Indicators) को आधार बनाया गया. इनमें बुनियादी ढांचा, कारोबारी माहौल, संसाधनों की उपलब्धता, सरकारी नीतियां, नियामकीय सुगमता, संस्थागत व्यवस्था, वित्तीय स्थिति और पर्यावरणीय मजबूती जैसे पहलुओं का आकलन किया गया. रिपोर्ट तैयार करने के लिए सरकारी आंकड़ों के साथ निवेशकों से प्राप्त फीडबैक और सर्वेक्षण को भी शामिल किया गया है.
चार श्रेणियों में बांटे गए राज्य
कुल स्कोर के आधार पर राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है. 50 से अधिक अंक हासिल करने वाले राज्यों को टॉप परफॉर्मर्स की श्रेणी में रखा गया है. 45 से 50 अंक प्राप्त करने वाले राज्यों को फ्रंटरनर्स, 40 से 45 अंक के बीच रहने वाले राज्यों को इमर्जिंग परफॉर्मर्स, जबकि 40 से कम अंक पाने वाले राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को एस्पायरिंग स्टेट्स की श्रेणी में रखा गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, 15 राज्य फ्रंटरनर्स श्रेणी में शामिल हुए हैं, जबकि 8-8 राज्य और केंद्रशासित प्रदेश इमर्जिंग परफॉर्मर्स तथा एस्पायरिंग स्टेट्स श्रेणी में हैं.
बड़े राज्यों में गुजरात नंबर-1
बेहतर तुलना के लिए नीति आयोग ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को तीन अलग-अलग समूहों में भी बांटा है. बड़े राज्यों की श्रेणी में गुजरात ने पहला स्थान हासिल किया, जबकि महाराष्ट्र दूसरे और तमिलनाडु तीसरे स्थान पर रहे. पहाड़ी और पूर्वोत्तर राज्यों में उत्तराखंड शीर्ष पर रहा. इसके बाद असम और हिमाचल प्रदेश का स्थान रहा. वहीं, केंद्रशासित प्रदेश और सिटी स्टेट्स की श्रेणी में गोवा पहले, दिल्ली दूसरे और चंडीगढ़ तीसरे स्थान पर रहा.
राज्यों की भूमिका सबसे अहम
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के निवेश माहौल को मजबूत बनाने में राज्य सरकारों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. राष्ट्रीय स्तर पर बनाई गई आर्थिक नीतियां निवेश का व्यापक ढांचा तैयार करती हैं, लेकिन औद्योगिक भूमि की उपलब्धता, भौतिक और डिजिटल बुनियादी ढांचा, नियामकीय दक्षता, संस्थागत क्षमता और नीतियों की स्थिरता जैसे कारक निवेशकों के फैसलों को सीधे प्रभावित करते हैं.
नीति आयोग का कहना है कि राज्यों में निवेश के लिए बेहतर माहौल तैयार होने से घरेलू और विदेशी निवेश में बढ़ोतरी होगी. इससे औद्योगिकीकरण को गति मिलेगी, नवाचार को बढ़ावा मिलेगा और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे. यह 'विकसित भारत @2047' के लक्ष्य को हासिल करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.
सिर्फ रैंकिंग नहीं, सुधार का रोडमैप
नीति आयोग के मुताबिक, यह इंडेक्स केवल राज्यों की रैंकिंग करने का माध्यम नहीं है, बल्कि इसे सुधारों को आगे बढ़ाने वाले एक रणनीतिक उपकरण के रूप में तैयार किया गया है. इसका उद्देश्य राज्यों की ताकत और कमजोरियों की पहचान करना, एक-दूसरे से सीखने की प्रक्रिया को बढ़ावा देना और बेहतर नीतियों व प्रक्रियाओं को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना है.
रिपोर्ट में प्रत्येक राज्य और केंद्रशासित प्रदेश की विस्तृत प्रोफाइल भी शामिल की गई है. इसमें समान भौगोलिक और प्रशासनिक परिस्थितियों वाले राज्यों के साथ तुलना करते हुए उनकी उपलब्धियों, निवेशकों की प्रतिक्रिया और सुधार की जरूरत वाले क्षेत्रों का विश्लेषण किया गया है.
निवेश माहौल को और मजबूत करने की तैयारी
नीति आयोग ने कहा कि इन्वेस्टमेंट फ्रेंडलीनेस इंडेक्स को एक सतत सुधारात्मक ढांचे के रूप में विकसित किया जाएगा, जिससे केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, उद्योग जगत और अन्य हितधारकों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित हो सके. इसका अंतिम उद्देश्य भारत में अधिक पारदर्शी, स्थिर और निवेश-अनुकूल माहौल तैयार करना, देश को वैश्विक निवेश का पसंदीदा गंतव्य बनाना और समावेशी एवं टिकाऊ आर्थिक विकास को गति देना है.
कंपनी की भारतीय इकाई MMT India ने IPO के लिए भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) के पास गोपनीय आधार पर ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) दाखिल किया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश की अग्रणी ऑनलाइन ट्रैवल कंपनी MakeMyTrip ने भारतीय शेयर बाजार में लिस्टिंग की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. Nasdaq में सूचीबद्ध कंपनी की पूर्ण स्वामित्व वाली भारतीय इकाई MMT India ने IPO के लिए SEBI के पास गोपनीय आधार पर ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) दाखिल किया है. प्रस्तावित आईपीओ के बाद कंपनी के शेयर BSE और NSE दोनों एक्सचेंजों पर सूचीबद्ध होंगे. कंपनी इस आईपीओ के जरिए करीब 1 अरब डॉलर (लगभग 8,300 करोड़ रुपये) जुटाने की तैयारी में है. MakeMyTrip वर्ष 2010 से अमेरिकी शेयर बाजार Nasdaq में सूचीबद्ध है और भारत के सबसे बड़े ऑनलाइन ट्रैवल एग्रीगेटर प्लेटफॉर्म्स में शामिल है.
IPO में कौन बेचेगा शेयर?
अमेरिकी प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग (SEC) को दी गई जानकारी के अनुसार, इस आईपीओ में MakeMyTrip और उसकी सिंगापुर स्थित पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी Ibibo Group Holdings अपने इक्विटी शेयरों की बिक्री करेंगी. हालांकि, लिस्टिंग के बाद भी MMT India, MakeMyTrip की सहायक कंपनी बनी रहेगी और उसके वित्तीय नतीजे समूह के समेकित वित्तीय विवरणों का हिस्सा रहेंगे.
भारत में लिस्टिंग से क्या होगा फायदा?
कंपनी का मानना है कि भारत में सूचीबद्ध होने से उसकी ब्रांड पहचान और बाजार में विश्वसनीयता और मजबूत होगी. साथ ही, देश में बढ़ती टेक टैलेंट की प्रतिस्पर्धा के बीच बेहतर पेशेवरों को आकर्षित करने और उन्हें प्रोत्साहन देने में भी मदद मिलेगी. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आईपीओ से मिलने वाली राशि का उपयोग कंपनी अपनी नकदी स्थिति मजबूत करने, दीर्घकालिक कारोबारी विस्तार, रणनीतिक अधिग्रहण (इनऑर्गेनिक ग्रोथ) और कन्वर्टिबल सिक्योरिटीज समेत अन्य प्रतिभूतियों के पुनर्खरीद (रीपर्चेज) जैसे उद्देश्यों के लिए करेगी.
दोहरी लिस्टिंग की भी तैयारी
नियामकीय मंजूरियों के बाद कंपनी मध्यम अवधि में ऐसी व्यवस्था विकसित करने पर भी विचार कर रही है, जिससे निवेशक भारत और अमेरिका दोनों बाजारों में एक ही सिक्योरिटी के जरिए कारोबार कर सकें. बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की दोहरी लिस्टिंग से शेयरों की लिक्विडिटी बढ़ेगी, वैश्विक निवेशकों की पहुंच आसान होगी और कंपनी की वैल्यूएशन को भी फायदा मिल सकता है.
भारत का रुख क्यों कर रही है कंपनी?
जून 2026 में MakeMyTrip के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) राजेश मागो ने संकेत दिए थे कि कंपनी भारतीय बाजार में लिस्टिंग पर विचार कर रही है. उनके मुताबिक, भारत का ट्रैवल बाजार अब परिपक्व हो चुका है, संस्थागत निवेश बढ़ रहा है और लोगों का यात्रा पर खर्च लगातार बढ़ रहा है.
उन्होंने यह भी कहा था कि अमेरिका में निवेशकों का फोकस फिलहाल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) कंपनियों पर अधिक है. ऐसे में MakeMyTrip जैसी कंपनियों को अपेक्षित वैल्यूएशन और निवेशकों का ध्यान नहीं मिल पा रहा है. इसके विपरीत, भारत में इंटरनेट और टेक कंपनियों के IPO को निवेशकों का मजबूत समर्थन मिल रहा है, जिससे यहां बेहतर वैल्यूएशन मिलने की संभावना है.
कंपनी की वित्तीय स्थिति
मार्च 2026 को समाप्त वित्त वर्ष में MakeMyTrip का राजस्व 1 अरब डॉलर रहा. हालांकि, Tracxn के आंकड़ों के अनुसार, मई 2025 में कंपनी का मार्केट कैप 12.6 अरब डॉलर था, जो अप्रैल 2026 तक घटकर 3.88 अरब डॉलर रह गया.
इसके बावजूद कंपनी के पास मजबूत नकदी भंडार है और वह अधिग्रहण के जरिए अपने कारोबार का विस्तार कर रही है. हाल ही में कंपनी ने रीजनल ग्रुप हॉलिडे पैकेज क्षेत्र में काम करने वाली फ्लेमिंगो ट्रांसवर्ल्ड में बहुमत हिस्सेदारी खरीदी है. साथ ही, परिचालन दक्षता बढ़ाने के लिए कंपनी अपने विभिन्न कारोबारों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग भी तेजी से बढ़ा रही है.
ऑयल-टू-केमिकल्स (O2C), डिजिटल सेवाओं और टेलीकॉम कारोबार के बेहतर प्रदर्शन ने आय को मजबूती दी, जबकि बढ़ती लागत, ब्याज और मूल्यह्रास के खर्च का असर मुनाफे पर देखने को मिला.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
रिलायंस इंडस्ट्रीज ने चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में बाजार की उम्मीदों से बेहतर प्रदर्शन किया. कंपनी का समेकित शुद्ध मुनाफा सालाना आधार पर 22.4 फीसदी घटकर 20,946 करोड़ रुपये रहा. पिछले वर्ष की समान तिमाही में कंपनी ने 26,994 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किया था. हालांकि, यह आंकड़ा ब्रोकरेज फर्मों के 18,570 करोड़ रुपये के अनुमान से बेहतर रहा.
अगर एकमुश्त अन्य आय को अलग कर देखें तो कंपनी का कर-पूर्व परिचालन मुनाफा (EBIT) सालाना आधार पर 9.3 फीसदी बढ़कर 24,080 करोड़ रुपये हो गया. वहीं, पिछली तिमाही की तुलना में शुद्ध मुनाफे में 5.9 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई. गौरतलब है कि पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही में कंपनी को 8,924 करोड़ रुपये की परिसंपत्तियों की बिक्री से एकमुश्त लाभ मिला था.
रेवेन्यू में 27 फीसदी की बढ़ोतरी
पहली तिमाही में रिलायंस का कुल राजस्व 27 फीसदी बढ़कर करीब 3.09 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया. पिछले वर्ष की समान तिमाही में यह 2.44 लाख करोड़ रुपये था, जबकि पिछली तिमाही में कंपनी का राजस्व 2.94 लाख करोड़ रुपये रहा था.
EBITDA घटा, लेकिन मुख्य परिचालन मुनाफा बढ़ा
कंपनी का समेकित EBITDA सालाना आधार पर 6.8 फीसदी घटकर 54,067 करोड़ रुपये रह गया, जो पिछले वर्ष की समान तिमाही में 58,024 करोड़ रुपये था. हालांकि, तिमाही आधार पर इसमें 11.3 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई.
वहीं, मुख्य परिचालन EBITDA 10.7 फीसदी बढ़कर 47,517 करोड़ रुपये हो गया, जो एक साल पहले 42,905 करोड़ रुपये था. इसके बावजूद EBITDA मार्जिन घटकर 15.25 फीसदी रह गया, जबकि पिछले वर्ष यह 17.61 फीसदी था. हालांकि, पिछली तिमाही के 15.01 फीसदी की तुलना में इसमें हल्का सुधार हुआ.
बढ़ती लागत ने डाला दबाव
तिमाही के दौरान कंपनी के कुल परिचालन खर्च में 30.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. इसकी प्रमुख वजह कच्चे माल और तैयार उत्पादों की खरीद पर बढ़ा खर्च रहा. अमेरिका-ईरान तनाव के चलते कच्चे तेल और अन्य औद्योगिक वस्तुओं की कीमतों में तेजी आई, जिससे रिलायंस के ऑयल-टू-केमिकल्स (O2C) और रिटेल कारोबार की लागत बढ़ गई.
ब्याज और मूल्यह्रास का खर्च भी बढ़ा
रिलायंस का ब्याज खर्च सालाना आधार पर 18.5 फीसदी बढ़कर 8,337 करोड़ रुपये हो गया, जो पिछले वर्ष की समान तिमाही में 7,036 करोड़ रुपये था. वहीं, मूल्यह्रास (Depreciation) का खर्च भी 9.1 फीसदी बढ़कर 15,100 करोड़ रुपये पहुंच गया. इसका एक बड़ा कारण रिलायंस जियो के 5G नेटवर्क से जुड़ी परिसंपत्तियों पर बढ़ा मूल्यह्रास रहा.
O2C और ऑयल-गैस कारोबार ने दिखाया दम
कंपनी के ऑयल-टू-केमिकल्स (O2C) कारोबार का परिचालन मुनाफा सालाना आधार पर 13.2 फीसदी बढ़कर 14,170 करोड़ रुपये हो गया, जबकि पिछले वर्ष यह 12,521 करोड़ रुपये था.
वहीं, ऑयल एवं गैस कारोबार का परिचालन मुनाफा 9.6 फीसदी बढ़कर 3,888 करोड़ रुपये रहा. इस दौरान इस कारोबार की आय भी 3.2 फीसदी बढ़कर 6,298 करोड़ रुपये हो गई.
जियो प्लेटफॉर्म्स के IPO की तैयारी
रिलायंस की डिजिटल इकाई जियो प्लेटफॉर्म्स ने हाल ही में अपने प्रस्तावित आईपीओ के लिए आवश्यक दस्तावेज नियामक के पास जमा किए हैं. बाजार की नजर अब कंपनी की इस बहुप्रतीक्षित लिस्टिंग पर भी बनी हुई है.
रिपोर्ट के मुताबिक, टेक्सटाइल कचरे की रिसाइक्लिंग के जरिए करीब 9.4 अरब डॉलर का अतिरिक्त आर्थिक मूल्य भी सृजित किया जा सकता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत को वैश्विक टेक्सटाइल और परिधान (Apparel) विनिर्माण का अग्रणी केंद्र बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. केंद्रीय कपड़ा मंत्री गिरिराज सिंह ने शुक्रवार को 'इंडिया टेक्सटाइल्स एंड अपैरल CXO ब्लूप्रिंट 2030' जारी किया. क्लोदिंग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CMAI) और ग्लोबल अलायंस फॉर टेक्सटाइल सस्टेनेबिलिटी (GATS) द्वारा तैयार इस रिपोर्ट में 2030 तक 100 अरब डॉलर के टेक्सटाइल एवं अपैरल निर्यात के लक्ष्य को हासिल करने के लिए जरूरी रणनीतियां और प्राथमिकताएं तय की गई हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, टेक्सटाइल कचरे की रिसाइक्लिंग के जरिए करीब 9.4 अरब डॉलर का अतिरिक्त आर्थिक मूल्य भी सृजित किया जा सकता है.
भारत टेक्स 2026 में जारी हुई रिपोर्ट
नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित 'भारत टेक्स 2026' के दौरान कपड़ा मंत्री गिरिराज सिंह ने इस रिपोर्ट का विमोचन किया. उन्होंने कहा कि वैश्विक खरीदारों की मौजूदगी में इस ब्लूप्रिंट का जारी होना सही समय पर हुआ है. उनके मुताबिक, रिपोर्ट में दिए गए सुझाव भारतीय टेक्सटाइल उद्योग के लिए भविष्य की दिशा तय करेंगे और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में देश की स्थिति को मजबूत बनाएंगे. उन्होंने उद्योग से जुड़े सभी हितधारकों से रिपोर्ट में सुझाए गए व्यावहारिक उपायों को अपनाने और नए अवसरों का लाभ उठाने की अपील की.
100 अरब डॉलर के निर्यात का लक्ष्य
रिपोर्ट के अनुसार, भारत का टेक्सटाइल एवं अपैरल निर्यात पिछले छह वर्षों से लगभग 40 अरब डॉलर के आसपास स्थिर बना हुआ है, जबकि वैश्विक व्यापार लगातार बढ़ा है. भारत फिलहाल दुनिया का छठा सबसे बड़ा टेक्सटाइल एवं अपैरल निर्यातक है और वैश्विक व्यापार में उसकी हिस्सेदारी करीब 4.1% है.
रिपोर्ट में 2030 तक 100 अरब डॉलर के निर्यात और 250 अरब डॉलर के घरेलू बाजार का लक्ष्य रखा गया है. इसके लिए केवल कम लागत पर उत्पादन करने के बजाय क्षमता, नवाचार और गुणवत्ता आधारित प्रतिस्पर्धा पर जोर देने की जरूरत बताई गई है.
वैश्विक बाजार में बढ़ रहे अवसर
रिपोर्ट के मुताबिक, यूरोपीय संघ (EU), ब्रिटेन, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), ओमान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों के साथ व्यापार समझौतों और बदलती वैश्विक सोर्सिंग रणनीतियों के कारण भारत के लिए नए अवसर पैदा हो रहे हैं. हालांकि, इन अवसरों का लाभ तभी मिलेगा जब भारतीय कंपनियां ट्रेसेबिलिटी, दस्तावेजीकरण, सस्टेनेबिलिटी और आधुनिक उत्पादन क्षमताओं के साथ खुद को तैयार करेंगी.
पांच प्रमुख रणनीतिक प्राथमिकताएं
'इंडिया टेक्सटाइल्स एंड अपैरल CXO ब्लूप्रिंट 2030' में आने वाले वर्षों के लिए पांच प्रमुख प्राथमिकताएं तय की गई हैं.
1. सर्कुलैरिटी (Circular Economy)
2. एंड-टू-एंड ट्रेसेबिलिटी
3. संसाधन-कुशल विनिर्माण
4. उत्पाद विविधीकरण
5. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ऑटोमेशन और डिजिटल तकनीकों का व्यापक उपयोग
रिपोर्ट में कहा गया है कि इन प्राथमिकताओं को अलग-अलग पहल के रूप में नहीं, बल्कि उद्योग की मुख्य कारोबारी रणनीति का हिस्सा बनाया जाना चाहिए.
रिसाइक्लिंग से 9.4 अरब डॉलर का अवसर
रिपोर्ट के अनुसार, टेक्सटाइल कचरे को रिसाइक्लिंग के जरिए दोबारा उपयोग में लाकर भारत करीब 9.4 अरब डॉलर का अतिरिक्त आर्थिक मूल्य पैदा कर सकता है. साथ ही इससे सस्टेनेबल और सर्कुलर टेक्सटाइल इकोसिस्टम विकसित होगा, जो वैश्विक बाजार की नई जरूरतों के अनुरूप होगा.
रिपोर्ट यह भी बताती है कि भारत के कुल टेक्सटाइल एवं अपैरल निर्यात का लगभग 50% हिस्सा अमेरिका और यूरोपीय संघ को जाता है. ऐसे में इन बाजारों में लागू हो रहे सस्टेनेबिलिटी मानकों का पालन करना भारतीय कंपनियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा.
भारत की ताकत और चुनौतियां
रिपोर्ट के अनुसार, भारत के टेक्सटाइल एवं कपड़ा निर्यात में घरेलू वैल्यू एडिशन 83.2% है, जो दुनिया की सबसे मजबूत एकीकृत सप्लाई चेन में से एक है.
भारत वैश्विक कपास निर्यात में 12.3% और कालीन निर्यात में 10.5% हिस्सेदारी रखता है. हालांकि, देश के 52% से अधिक टेक्सटाइल निर्यात केवल 134 उत्पाद श्रेणियों पर निर्भर हैं, जिससे उच्च विकास वाले नए उत्पाद क्षेत्रों में विस्तार की जरूरत बताई गई है.
ANAROCK के अनुसार, H1 2026 में देश के सात प्रमुख शहरों में कुल 4.26 करोड़ वर्ग फुट (42.6 मिलियन वर्ग फुट) ग्रॉस ऑफिस लीजिंग दर्ज की गई. इसमें से करीब 1.92 करोड़ वर्ग फुट स्पेस GCCs ने लीज पर लिया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के ग्रेड-ए (Grade A) ऑफिस बाजार में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) की मांग लगातार बढ़ रही है. प्रॉपर्टी कंसल्टेंसी ANAROCK की रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 की पहली छमाही (H1 2026) में देश के सात प्रमुख शहरों में हुई कुल ऑफिस लीजिंग का 45% हिस्सा अकेले GCCs ने लिया. इस दौरान GCCs ने करीब 1.92 करोड़ वर्ग फुट (19.2 मिलियन वर्ग फुट) ऑफिस स्पेस लीज पर लिया, जबकि H1 2025 में उनका हिस्सा 41% था.
42.6 मिलियन वर्ग फुट ऑफिस स्पेस की हुई लीजिंग
ANAROCK के अनुसार, H1 2026 में देश के सात प्रमुख शहरों में कुल 4.26 करोड़ वर्ग फुट (42.6 मिलियन वर्ग फुट) ग्रॉस ऑफिस लीजिंग दर्ज की गई. इसमें से करीब 1.92 करोड़ वर्ग फुट स्पेस GCCs ने लीज पर लिया. पिछले साल की समान अवधि में कुल 3.82 करोड़ वर्ग फुट लीजिंग हुई थी, जिसमें GCCs की हिस्सेदारी 1.58 करोड़ वर्ग फुट थी.
दक्षिण भारत बना GCCs का सबसे बड़ा केंद्र
रिपोर्ट के मुताबिक, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद GCCs के सबसे पसंदीदा बाजार बने हुए हैं.
- बेंगलुरु में H1 2026 के दौरान 1.08 करोड़ वर्ग फुट ऑफिस स्पेस की ग्रॉस लीजिंग हुई, जिसमें GCCs की हिस्सेदारी 70% यानी करीब 75.5 लाख वर्ग फुट रही.
- चेन्नई में कुल 32 लाख वर्ग फुट लीजिंग में GCCs का हिस्सा 55% (करीब 17.5 लाख वर्ग फुट) रहा.
- हैदराबाद में 64 लाख वर्ग फुट ऑफिस स्पेस की लीजिंग हुई, जिसमें GCCs ने 48% यानी करीब 30.5 लाख वर्ग फुट स्पेस लिया.
भारत अब वैश्विक कंपनियों का पसंदीदा GCC हब
ANAROCK ग्रुप के चेयरमैन अनुज पुरी ने कहा कि यह केवल अल्पकालिक मांग नहीं, बल्कि भारत के ऑफिस बाजार में एक संरचनात्मक बदलाव का संकेत है. बहुराष्ट्रीय कंपनियां अब इंजीनियरिंग, रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D), आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), फाइनेंस, साइबर सिक्योरिटी और डिजिटल ऑपरेशंस जैसे प्रमुख कार्यों के लिए भारत स्थित GCCs का तेजी से विस्तार कर रही हैं. उन्होंने कहा कि भारत का बड़ा टैलेंट पूल, बेहतर परिचालन क्षमता और विकसित ऑफिस इंफ्रास्ट्रक्चर आने वाले वर्षों में भी GCCs की मांग को मजबूत बनाए रखेगा.
नेट ऑफिस लीजिंग में 2% की बढ़ोतरी
रिपोर्ट के अनुसार, H1 2026 में ग्रेड-ए नेट ऑफिस एब्जॉर्प्शन (Net Absorption) बढ़कर 2.74 करोड़ वर्ग फुट (27.44 मिलियन वर्ग फुट) हो गया, जो H1 2025 के 2.68 करोड़ वर्ग फुट की तुलना में 2% अधिक है. इस दौरान बेंगलुरु और हैदराबाद ने मिलकर कुल नेट लीजिंग का 49% हिस्सा हासिल किया. बेंगलुरु में नेट लीजिंग 26% बढ़कर 82.7 लाख वर्ग फुट रही और हैदराबाद में यह 24% बढ़कर 52 लाख वर्ग फुट पहुंच गई. वहीं, मुंबई महानगर क्षेत्र (MMR) में नेट लीजिंग 4% और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में 15% घट गई.
नए ऑफिस स्पेस की सप्लाई घटी
H1 2026 के दौरान नए ऑफिस स्पेस की सप्लाई में कमी दर्ज की गई. इस अवधि में करीब 2.21 करोड़ वर्ग फुट (22.15 मिलियन वर्ग फुट) नए ऑफिस स्पेस का निर्माण पूरा हुआ, जबकि H1 2025 में यह आंकड़ा 2.45 करोड़ वर्ग फुट था. यानी नए ऑफिस स्पेस की सप्लाई में सालाना आधार पर 10% की गिरावट आई. ANAROCK का कहना है कि डेवलपर्स अब मांग के अनुरूप ही नई परियोजनाएं बाजार में ला रहे हैं, जिससे सप्लाई और डिमांड के बीच बेहतर संतुलन बना हुआ है.
खाली ऑफिस स्पेस घटा, किराए बढ़े
मजबूत मांग के कारण देश के सात प्रमुख शहरों में ग्रेड-ए ऑफिस स्पेस की औसत वैकेंसी घटकर 15% रह गई, जो H1 2025 में 16.3% थी. बेंगलुरु में वैकेंसी 12.4% से घटकर 10.8% और हैदराबाद में 26.6% से घटकर 23.5% पर आ गई. हालांकि, हैदराबाद में अभी भी सात प्रमुख शहरों में सबसे अधिक वैकेंसी दर्ज की गई.
ऑफिस किराए में 9% का इजाफा
ANAROCK की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रीमियम ग्रेड-ए ऑफिस स्पेस की मजबूत मांग के चलते सात प्रमुख शहरों में औसत मासिक ऑफिस किराया सालाना आधार पर 9% बढ़कर 88 रुपये प्रति वर्ग फुट से 96 रुपये प्रति वर्ग फुट हो गया. बेंगलुरु, NCR और हैदराबाद में ऑफिस किराए में 10% की सालाना बढ़ोतरी दर्ज की गई.
IT के अलावा अन्य सेक्टरों से भी बढ़ी मांग
रिपोर्ट के अनुसार, IT और ITeS सेक्टर के अलावा बैंकिंग एवं वित्तीय सेवाएं (BFSI), मैन्युफैक्चरिंग, इंडस्ट्रियल कंपनियां और को-वर्किंग ऑपरेटर्स ने भी ऑफिस स्पेस की मांग बढ़ाई है. H1 2026 में IT/ITeS सेक्टर की ऑफिस लीजिंग में हिस्सेदारी 26% रही, जबकि फ्लेक्सिबल वर्कस्पेस ऑपरेटर्स की हिस्सेदारी 25% तक पहुंच गई. इससे साफ है कि भारत के ऑफिस बाजार में मांग अब पहले की तुलना में अधिक विविध (Diversified) हो चुकी है, हालांकि GCCs अभी भी इस ग्रोथ के सबसे बड़े चालक बने हुए हैं.
जून 2026 तिमाही में कंपनी का समेकित परिचालन राजस्व बढ़कर 15,712 करोड़ रुपये हो गया, जो एक साल पहले की समान अवधि के 13,351 करोड़ रुपये के मुकाबले 17.7% अधिक है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आईटी सेवा क्षेत्र की दिग्गज कंपनी Tech Mahindra ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में मजबूत वित्तीय प्रदर्शन दर्ज किया है. कंपनी का राजस्व, मुनाफा, ऑपरेटिंग मार्जिन और बड़े डील्स (Deal Wins) सभी में सालाना और तिमाही आधार पर बढ़ोतरी हुई है. हालांकि, कंपनी ने अपनी परंपरा के अनुरूप पहली तिमाही के लिए अंतरिम डिविडेंड (Interim Dividend) का ऐलान नहीं किया. वहीं, कर्मचारियों की संख्या में लगातार गिरावट का सिलसिला भी जारी रहा, हालांकि एट्रिशन रेट में और कमी आई है.
लगातार तीसरी तिमाही में 1 अरब डॉलर से ज्यादा के डील्स मिले
Tech Mahindra के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) और प्रबंध निदेशक (MD) मोहित जोशी ने कहा कि कंपनी ने स्थिर मुद्रा (Constant Currency) के आधार पर 6.1% की सालाना वृद्धि दर्ज की है. साथ ही लगातार तीसरी तिमाही में 1 अरब डॉलर से अधिक के नए डील्स हासिल किए हैं. उन्होंने कहा कि 5 करोड़ डॉलर (50 Million Dollar) से अधिक कारोबार करने वाले ग्राहकों की संख्या में सात की बढ़ोतरी हुई है और सभी प्रमुख बिजनेस वर्टिकल्स ने सालाना आधार पर वृद्धि दर्ज की है.
राजस्व और मुनाफे में मजबूत बढ़ोतरी
जून 2026 तिमाही में कंपनी का समेकित परिचालन राजस्व बढ़कर 15,712 करोड़ रुपये हो गया, जो एक साल पहले की समान अवधि के 13,351 करोड़ रुपये के मुकाबले 17.7% अधिक है. वहीं, पिछली तिमाही के 15,076 करोड़ रुपये की तुलना में इसमें 4.2% की बढ़ोतरी हुई. कंपनी का समेकित शुद्ध लाभ (PAT) बढ़कर 1,465 करोड़ रुपये पहुंच गया. यह पूरा मुनाफा कंपनी के इक्विटी शेयरधारकों के हिस्से में आया.
ऑपरेटिंग मार्जिन में जबरदस्त सुधार
तिमाही के दौरान कंपनी का EBIT बढ़कर 2,264 करोड़ रुपये हो गया, जो सालाना आधार पर 53.3% और तिमाही आधार पर 8.6% अधिक है. EBIT मार्जिन बढ़कर 14.4% पहुंच गया, जो पिछले साल की तुलना में 330 बेसिस प्वाइंट और पिछली तिमाही के मुकाबले करीब 60 बेसिस प्वाइंट अधिक है. वहीं, कर-पूर्व लाभ (PBT) बढ़कर 2,042 करोड़ रुपये रहा, जो एक साल पहले 1,618 करोड़ रुपये था.
1 अरब डॉलर से ज्यादा के नए डील्स
Tech Mahindra की ऑर्डर बुक भी मजबूत हुई है. कंपनी ने जून तिमाही में 1.078 अरब डॉलर (USD 1.078 Billion) के नए डील्स हासिल किए, जो पिछले साल की तुलना में 33.3% अधिक हैं. पिछले 12 महीनों में कंपनी के कुल डील्स का मूल्य (TCV) बढ़कर 4.063 अरब डॉलर पहुंच गया, जिसमें 37.5% की सालाना वृद्धि दर्ज की गई. यह आने वाले समय में कंपनी के राजस्व के लिए बेहतर संभावनाओं का संकेत माना जा रहा है.
दोनों प्रमुख कारोबार से मिला ग्रोथ का सहारा
कंपनी के सबसे बड़े कारोबार IT Services से राजस्व बढ़कर 13,245 करोड़ रुपये हो गया, जबकि एक साल पहले यह 11,264 करोड़ रुपये था. वहीं, बिजनेस प्रोसेस सर्विसेज (BPS) से आय भी बढ़कर 2,467 करोड़ रुपये पहुंच गई, जो पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में 2,088 करोड़ रुपये थी. दोनों सेगमेंट में वृद्धि ने कंपनी के कुल राजस्व को मजबूती दी.
कैश फ्लो मजबूत, बैलेंस शीट भी बेहतर
Tech Mahindra ने तिमाही के दौरान 167 मिलियन डॉलर का फ्री कैश फ्लो दर्ज किया, जो पिछले साल की तुलना में 94% अधिक है. कंपनी के पास जून 2026 के अंत तक 9,695 करोड़ रुपये की नकदी और नकदी समकक्ष मौजूद थे. वर्किंग कैपिटल का प्रमुख संकेतक DSO 84 दिनों पर स्थिर रहा.
कर्मचारियों की संख्या घटी, एट्रिशन में आई कमी
जून तिमाही के अंत तक कंपनी में कुल 1,46,760 कर्मचारी थे, जो पिछली तिमाही की तुलना में 863 कम हैं. हालांकि, कर्मचारियों के नौकरी छोड़ने की दर (IT Attrition) घटकर 11.8% रह गई, जबकि मार्च तिमाही में यह 12.1% और एक साल पहले 12.6% थी. इसके साथ ही IT बिजनेस में उपयोग बढ़कर 87% हो गया.
पहली तिमाही में नहीं दिया डिविडेंड
Tech Mahindra ने इस तिमाही में अंतरिम डिविडेंड का ऐलान नहीं किया. कंपनी ने पिछले वर्षों की तरह इस बार भी पहली तिमाही में डिविडेंड नहीं देने की परंपरा को बरकरार रखा. कुल मिलाकर, जून तिमाही में Tech Mahindra ने राजस्व, मुनाफा, ऑपरेटिंग मार्जिन, कैश फ्लो और डील बुकिंग के मोर्चे पर मजबूत प्रदर्शन किया. हालांकि, लागत नियंत्रण के तहत कर्मचारियों की संख्या में कटौती का सिलसिला जारी रहा, जबकि एट्रिशन रेट में कमी और बेहतर उपयोग दर कंपनी के परिचालन प्रदर्शन को और मजबूत बनाती है.
Crisil का मानना है कि सिक्योरिटाइजेशन और म्युनिसिपल बॉन्ड बाजार को विकसित करने से पूंजी का बेहतर पुनर्चक्रण होगा. इससे शहरी बुनियादी ढांचे के लिए फंडिंग बढ़ेगी और सरकार पर वित्तीय बोझ भी कम होगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत को 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए निजी क्षेत्र से बड़े पैमाने पर वित्तपोषण की जरूरत होगी. इसी वजह से देश का गैर-सरकारी (Non-Sovereign) कर्ज मौजूदा करीब 84% GDP से बढ़कर 2047 तक लगभग 150% GDP तक पहुंच सकता है. रेटिंग एजेंसी Crisil की एक रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए बैंकों के साथ-साथ डेट कैपिटल मार्केट की भूमिका भी काफी अहम होगी.
विकसित देशों के बराबर पहुंच सकता है कर्ज का स्तर
Crisil का कहना है कि यदि भारत की अर्थव्यवस्था तेज रफ्तार से बढ़ती है, तो गैर-सरकारी कर्ज का स्तर उन विकसित अर्थव्यवस्थाओं के समान हो सकता है, जहां आर्थिक विस्तार के दौर में कर्ज का अनुपात काफी अधिक रहा था. इनमें अमेरिका, ब्रिटेन, यूरो क्षेत्र और जापान जैसे देश शामिल हैं.
अकेले बैंक पूरी नहीं कर पाएंगे फंडिंग की जरूरत
रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले वर्षों में भारत की बढ़ती कर्ज जरूरतों को केवल बैंकिंग सिस्टम पूरा नहीं कर पाएगा. हाल के वर्षों में जमा की वृद्धि अपेक्षाकृत धीमी रही है, जबकि मार्च 2026 तक बैंकों का क्रेडिट-डिपॉजिट अनुपात 82% से अधिक पहुंच चुका है. इससे बैंकों की कर्ज देने की क्षमता पर दबाव बढ़ा है. ऐसे में कॉरपोरेट बॉन्ड, सिक्योरिटाइज्ड इंस्ट्रूमेंट्स, म्युनिसिपल बॉन्ड और मनी मार्केट इंस्ट्रूमेंट्स जैसे डेट कैपिटल मार्केट के विभिन्न माध्यमों की भूमिका भविष्य में और महत्वपूर्ण होगी.
भारत का डेट मार्केट अभी काफी छोटा
Crisil की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 के अंत तक भारत का डेट कैपिटल मार्केट GDP के केवल 22% के बराबर था, जबकि सकल बैंक ऋण GDP के 62% तक पहुंच चुका था. इससे साफ है कि भारत में डेट मार्केट की गहराई अभी विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में काफी कम है.
चुनिंदा कंपनियों तक सीमित है कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार अभी कुछ चुनिंदा कंपनियों तक सीमित है. AAA और AA रेटिंग वाले बॉन्ड कुल बकाया कॉरपोरेट बॉन्ड का 80% से अधिक हिस्सा रखते हैं. वहीं, वित्त वर्ष 2022-23 के बाद से सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों और वित्तीय संस्थानों का वार्षिक बॉन्ड जारी करने में 80% से ज्यादा योगदान रहा है. इसके अलावा, रिटेल और विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी कुल बकाया कॉरपोरेट बॉन्ड में 10% से भी कम है, जो इस बाजार में व्यापक भागीदारी की कमी को दर्शाता है.
क्या हैं Crisil के सुझाव?
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत को अपने कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार का विस्तार करने के लिए बीमा कंपनियों, पेंशन फंड और अन्य दीर्घकालिक संस्थागत निवेशकों की भागीदारी बढ़ानी होगी. साथ ही नियामकीय सुधारों के जरिए A और BBB रेटिंग वाले बॉन्ड में भी निवेश को प्रोत्साहित करना होगा.
Crisil का मानना है कि सिक्योरिटाइजेशन और म्युनिसिपल बॉन्ड बाजार को विकसित करने से पूंजी का बेहतर पुनर्चक्रण होगा. इससे शहरी बुनियादी ढांचे के लिए फंडिंग बढ़ेगी और सरकार पर वित्तीय बोझ भी कम होगा.
इस अधिग्रहण के जरिए कंपनी यूरोप, एशिया, मध्य पूर्व, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में Delivery Hero के कारोबार को अपने Uber Eats प्लेटफॉर्म के साथ जोड़ना चाहती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ऑनलाइन फूड डिलीवरी बाजार में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए अमेरिकी कंपनी Uber Technologies ने जर्मनी की फूड डिलीवरी कंपनी Delivery Hero के अधिग्रहण के लिए 14.8 अरब डॉलर (करीब 1.27 लाख करोड़ रुपये) की सार्वजनिक बोली (Public Takeover Bid) पेश की है. यह सौदा पूरा होने पर चीन के बाहर दुनिया का सबसे बड़ा फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म बन जाएगा. Delivery Hero के प्रबंधन और सुपरवाइजरी बोर्ड ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया है.
प्रति शेयर 47.57 डॉलर की पेशकश
Uber ने Delivery Hero के लिए 47.57 डॉलर प्रति शेयर की पेशकश की है. इस अधिग्रहण के जरिए कंपनी यूरोप, एशिया, मध्य पूर्व, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में Delivery Hero के कारोबार को अपने Uber Eats प्लेटफॉर्म के साथ जोड़ना चाहती है.
अगर यह सौदा पूरा हो जाता है, तो संयुक्त कंपनी 99 देशों में कारोबार करेगी. इसका अनुमानित ग्रॉस मर्चेंडाइज वैल्यू (GMV) 236 अरब डॉलर होगा, जिससे यह चीन की दिग्गज फूड डिलीवरी कंपनी Meituan के सबसे बड़े वैश्विक प्रतिद्वंद्वियों में शामिल हो जाएगी.
नियामकीय मंजूरी पर टिकी है डील
इस अधिग्रहण के लिए Uber को Delivery Hero के 50% से अधिक शेयर हासिल करने होंगे. इसके अलावा विभिन्न देशों के नियामकीय संस्थानों से मंजूरी भी लेनी होगी. प्रतिस्पर्धा (Antitrust) से जुड़ी संभावित चिंताओं को दूर करने के लिए Delivery Hero ने अपनी 14 देशों में मौजूद परिचालन इकाइयों को निवेश फर्म SSW Partners को 1.6 अरब डॉलर में बेचने पर सहमति जताई है. यह प्रक्रिया मुख्य सौदा पूरा होने से पहले की जाएगी.
जर्मनी में निवेश और कर्मचारियों को लेकर बड़ा वादा
Uber ने भरोसा दिया है कि वह कम से कम 2029 तक Delivery Hero के बर्लिन मुख्यालय और कर्मचारियों को बनाए रखेगी. इसके अलावा कंपनी 2031 तक जर्मनी में 2.29 अरब डॉलर का निवेश भी करेगी. कंपनी को उम्मीद है कि शेयरधारकों और नियामकीय मंजूरी मिलने के बाद यह सौदा 2027 की दूसरी छमाही तक पूरा हो जाएगा.
फूड डिलीवरी सेक्टर में तेज हो रहा है एकीकरण
वैश्विक फूड डिलीवरी इंडस्ट्री में पिछले कुछ समय से बड़े पैमाने पर विलय और अधिग्रहण (M&A) का दौर चल रहा है. कंपनियां मुनाफा बढ़ाने और प्रतिस्पर्धा में बढ़त हासिल करने के लिए अपने कारोबार का विस्तार कर रही हैं.
हाल के महीनों में DoorDash द्वारा Deliveroo के अधिग्रहण और Prosus द्वारा Just Eat Takeaway.com की खरीद जैसे बड़े सौदों ने इस क्षेत्र में एकीकरण की रफ्तार तेज कर दी है. ऐसे में यदि Uber और Delivery Hero का यह सौदा मंजूर हो जाता है, तो यह फूड डिलीवरी उद्योग के इतिहास के सबसे बड़े अधिग्रहणों में से एक होगा.