SEC की ताजा कार्रवाई ने अडानी ग्रुप एक बार फिर वैश्विक नियामकीय जांच के दायरे में ला खड़ा किया है. बाजार ने इस घटनाक्रम पर तत्काल और तीखी प्रतिक्रिया दी है, जिसका असर शेयर कीमतों और कुल बाजार पूंजीकरण में भारी गिरावट के रूप में सामने आया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
अमेरिकी बाजार नियामक की हालिया कार्रवाई ने अडानी ग्रुप के लिए एक बार फिर मुश्किलें खड़ी कर दी हैं. शुक्रवार को समूह की कंपनियों के शेयरों में भारी बिकवाली देखने को मिली, जिससे अदाणी ग्रुप का कुल बाजार पूंजीकरण करीब 12.5 अरब डॉलर घट गया. यह गिरावट अमेरिकी प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग (SEC) की ओर से दायर एक याचिका के बाद आई है.
SEC ने अदालत से मांगी समन जारी करने की अनुमति
गुरुवार को भारतीय शेयर बाजार बंद होने के बाद सामने आई SEC की फाइलिंग में बताया गया कि नियामक ने अदालत से अदाणी समूह के संस्थापक गौतम अडानी और समूह के वरिष्ठ कार्यकारी सागर अडानी को व्यक्तिगत रूप से समन जारी करने की अनुमति मांगी है. यह अनुरोध कथित धोखाधड़ी और 26.5 करोड़ डॉलर की रिश्वत योजना से जुड़े मामले में किया गया है.
शेयर बाजार में दिखा सीधा असर
SEC की सूचना का असर शुक्रवार के कारोबार में साफ नजर आया.
- अडानी एंटरप्राइजेज निफ्टी 50 की सबसे ज्यादा गिरने वाली कंपनी रही.
- कंपनी का शेयर 10.65% टूटकर 1,864.20 रुपये पर बंद हुआ.
- निफ्टी 50 इंडेक्स में कुल मिलाकर 0.95% की गिरावट दर्ज की गई.
- समूह की अन्य कंपनियों के शेयरों में 3.4% से लेकर 14.54% तक की गिरावट देखी गई.
नवंबर 2024 के अभियोग से जुड़ा मामला
नवंबर 2024 में दाखिल अमेरिकी अभियोग में आरोप लगाया गया था कि अडानी ग्रुप के कुछ अधिकारियों ने अडानी ग्रीन एनर्जी द्वारा उत्पादित बिजली की खरीद सुनिश्चित करने के लिए भारतीय अधिकारियों को रिश्वत देने की योजना में भूमिका निभाई थी.
अमेरिकी कानून क्या कहता है
अमेरिकी कानून विदेशी कंपनियों को, जो वहां के निवेशकों से पूंजी जुटाती हैं, कारोबार हासिल करने के लिए विदेशों में रिश्वत देने से रोकता है. इसके अलावा, निवेश जुटाने के दौरान झूठे या भ्रामक बयान देने पर भी सख्त कार्रवाई का प्रावधान है. दस्तावेजों के मुताबिक, भारत पहले ही दो बार ऐसे समन तामील करने के अनुरोधों को खारिज कर चुका है, जिन्हें SEC पिछले साल से भेजने की कोशिश कर रहा है.
उधर, अडानी ग्रुप ने सभी आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए कहा है कि वह अपने बचाव के लिए हरसंभव कानूनी कदम उठाएगा.
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि निवेशकों को लग रहा था कि अदाणी समूह से जुड़े सभी मामले सुलझ चुके हैं और समूह को क्लीन चिट मिल गई है. ऐसे में SEC की यह फाइलिंग बाजार के लिए अप्रत्याशित रही. उनका मानना है कि अगले कदमों की कोई स्पष्ट समयसीमा न होने के कारण यह मुद्दा कम से कम दो सप्ताह तक बाजार की धारणा को प्रभावित कर सकता है, खासकर तब जब समग्र बाजार सेंटिमेंट पहले से ही कमजोर बना हुआ है.
वित्त मंत्रालय के बजट विभाग की ओर से जारी कार्यक्रम के अनुसार, प्री-बजट बैठकें 12 अक्टूबर से शुरू होकर 13 नवंबर तक चलेंगी. इन बैठकों में विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के साथ उनके खर्च और आगामी वित्त वर्ष के लिए आवश्यक बजट आवंटन पर चर्चा की जाएगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वित्त मंत्रालय ने केंद्रीय बजट 2027-28 की तैयारियों की प्रक्रिया शुरू कर दी है. इसके तहत 12 अक्टूबर से 13 नवंबर 2026 तक विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के साथ बजट-पूर्व बैठकें होंगी. इन बैठकों में वित्त वर्ष 2026-27 के संशोधित अनुमान (RE) और वित्त वर्ष 2027-28 के बजट अनुमान (BE) पर चर्चा कर उन्हें अंतिम रूप देने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी.
मंत्रालय ने 23 सितंबर को जारी नोटिस में सभी केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों को बैठकों से संबंधित जरूरी वित्तीय आंकड़े और खर्च के प्रस्ताव 6 अक्टूबर 2026 तक जमा करने को कहा है. बजट-पूर्व चर्चा व्यय सचिव की अध्यक्षता में होगी और इसमें संबंधित मंत्रालयों की वित्तीय जरूरतों, मौजूदा खर्च और अगले वित्त वर्ष की प्राथमिकताओं पर विचार किया जाएगा.
12 अक्टूबर से शुरू होंगी प्री-बजट बैठकें
वित्त मंत्रालय के बजट विभाग की ओर से जारी कार्यक्रम के अनुसार, प्री-बजट बैठकें 12 अक्टूबर से शुरू होकर 13 नवंबर तक चलेंगी. इन बैठकों में विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के साथ उनके खर्च और आगामी वित्त वर्ष के लिए आवश्यक बजट आवंटन पर चर्चा की जाएगी.
इन बैठकों का एक प्रमुख उद्देश्य वित्त वर्ष 2026-27 के संशोधित अनुमानों को अंतिम रूप देना है. इसके साथ ही 2027-28 के लिए बजट आवंटन और खर्च से जुड़े प्रस्तावों पर भी विचार किया जाएगा. मंत्रालयों को बैठक से पहले जरूरी जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं.
मंत्रालयों को 6 अक्टूबर तक देनी होगी जानकारी
वित्त मंत्रालय ने सभी संबंधित मंत्रालयों और विभागों से आवश्यक वित्तीय विवरण और प्रस्ताव 6 अक्टूबर तक जमा करने को कहा है. इन आंकड़ों के आधार पर व्यय विभाग संबंधित मंत्रालयों की मांगों और प्रस्तावों की समीक्षा करेगा.
प्री-बजट बैठकों के दौरान मंत्रालयों की ओर से विभिन्न योजनाओं, कार्यक्रमों और अन्य खर्चों के लिए अतिरिक्त बजट की जरूरत भी बताई जा सकती है. इसके बाद वित्त वर्ष 2027-28 के बजट अनुमानों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी.
1 फरवरी 2027 को पेश हो सकता है बजट
केंद्रीय बजट 2027-28 को 1 फरवरी 2027 को संसद में पेश किए जाने की संभावना है. यह नरेंद्र मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल का चौथा पूर्ण बजट होगा. वहीं, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण लगातार 10वीं बार केंद्रीय बजट पेश करेंगी.
आगामी बजट में आर्थिक वृद्धि को गति देने, रोजगार के अवसर बढ़ाने और घरेलू मांग को मजबूत करने से जुड़े उपायों पर सरकार का ध्यान रहने की उम्मीद है. इसके अलावा राजकोषीय अनुशासन बनाए रखने और सरकारी खर्च को प्राथमिकताओं के अनुरूप रखने पर भी जोर रह सकता है.
हालांकि, बजट में किन क्षेत्रों के लिए कितना आवंटन किया जाएगा और सरकार की प्रमुख प्राथमिकताएं क्या होंगी, इसका स्पष्ट पता बजट दस्तावेज और संसद में पेश किए जाने वाले प्रस्तावों से ही चलेगा. फिलहाल प्री-बजट बैठकें इसी प्रक्रिया की शुरुआती कड़ी हैं.
बैठक में राइट्स इश्यू के आकार, शर्तों और इससे जुड़े अन्य पहलुओं पर चर्चा की जा सकती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहन कंपनी ओला इलेक्ट्रिक मोबिलिटी एक बार फिर पूंजी जुटाने की तैयारी कर रही है. कंपनी ने बताया है कि राइट्स इश्यू के जरिए फंड जुटाने के प्रस्ताव पर विचार करने के लिए 28 सितंबर को बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की बैठक होगी. बैठक में राइट्स इश्यू के आकार, शर्तों और इससे जुड़े अन्य पहलुओं पर चर्चा की जा सकती है.
बोर्ड बैठक में राइट्स इश्यू पर विचार
ओला इलेक्ट्रिक ने एक्सचेंज फाइलिंग में बताया है कि उसके बोर्ड की 28 सितंबर को बैठक प्रस्तावित है. इसमें पात्र शेयरधारकों को इक्विटी शेयर जारी कर पूंजी जुटाने के प्रस्ताव पर विचार किया जाएगा. हालांकि, राइट्स इश्यू की अंतिम राशि, शेयरों की संख्या, इश्यू प्राइस और अन्य शर्तों की जानकारी बोर्ड की मंजूरी के बाद ही स्पष्ट होगी. राइट्स इश्यू में कंपनी नए शेयर अपने मौजूदा पात्र शेयरधारकों को खरीदने का अधिकार देती है. शेयरधारक तय अनुपात और निर्धारित कीमत पर इन शेयरों के लिए आवेदन कर सकते हैं. इस प्रक्रिया में मौजूदा शेयरधारकों के साथ प्रमोटर समूह की भागीदारी भी अहम होती है.
पहले QIP के जरिए जुटा चुकी है 780 करोड़ रुपये
ओला इलेक्ट्रिक इससे पहले भी पूंजी जुटा चुकी है. कंपनी को कुल 1,500 करोड़ रुपये तक जुटाने की मंजूरी मिली थी. इसमें से करीब 780 करोड़ रुपये कंपनी ने जून 2026 में क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट यानी QIP के जरिए जुटाए थे.
अब राइट्स इश्यू के प्रस्ताव के जरिए कंपनी की ओर से पूंजी जुटाने की अगली प्रक्रिया पर विचार किया जा रहा है. इस फंड का इस्तेमाल कंपनी की कारोबारी जरूरतों, विस्तार और अन्य कॉरपोरेट उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है. हालांकि, प्रस्तावित राशि और फंड के इस्तेमाल की विस्तृत जानकारी बोर्ड के फैसले के बाद सामने आएगी.
राइट्स इश्यू की खबर से शेयर में तेजी
राइट्स इश्यू के प्रस्ताव की खबर के बीच बुधवार को ओला इलेक्ट्रिक के शेयर में तेजी देखने को मिली. NSE पर कंपनी का शेयर 10.83 फीसदी बढ़कर 41.87 रुपये पर बंद हुआ. कारोबार के दौरान शेयर 42.49 रुपये के उच्च स्तर और 38.25 रुपये के निचले स्तर तक गया. NSE पर करीब 3.90 करोड़ शेयरों में कारोबार हुआ.
पिछले छह महीनों में शेयर में करीब 77 फीसदी की तेजी दर्ज की गई है. हालांकि, शेयर बाजार में किसी कंपनी के फंड जुटाने के फैसले का असर अलग-अलग समय में अलग हो सकता है और सिर्फ शेयर में तेजी को कंपनी की वित्तीय स्थिति में सुधार का संकेत नहीं माना जा सकता.
प्रमोटर समूह की करीब 33 फीसदी हिस्सेदारी
ओला इलेक्ट्रिक में प्रमोटर समूह की हिस्सेदारी करीब 32.97 फीसदी बताई गई है. कंपनी के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर भाविश अग्रवाल प्रमोटर समूह का नेतृत्व करते हैं. राइट्स इश्यू में प्रमोटर और मौजूदा शेयरधारकों की भागीदारी से कंपनी को नई पूंजी जुटाने में मदद मिल सकती है.
अब 28 सितंबर की बोर्ड बैठक महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी बैठक में राइट्स इश्यू के प्रस्ताव को आगे बढ़ाने से जुड़े प्रमुख फैसले लिए जा सकते हैं. इश्यू का आकार, कीमत, रिकॉर्ड डेट और शेयरधारकों के लिए पात्रता जैसे अहम विवरण बोर्ड की मंजूरी और बाद की नियामकीय प्रक्रिया के बाद स्पष्ट होंगे.
बुधवार को सेंसेक्स 299.17 अंक यानी 0.40 फीसदी बढ़कर 74,828.25 पर बंद हुआ. निफ्टी भी 117.80 अंक यानी 0.50 फीसदी की बढ़त के साथ 23,446.80 पर बंद हुआ.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार ने बुधवार को पिछले सत्र की गिरावट से वापसी करते हुए मजबूती के साथ कारोबार खत्म किया. सेंसेक्स 299 अंक चढ़ा, जबकि निफ्टी में करीब 118 अंकों की तेजी रही. टाटा स्टील, बजाज फाइनेंस और आईटीसी जैसे शेयरों में खरीदारी से बाजार को सहारा मिला. हालांकि, गुरुवार को ग्लोबल संकेत कमजोर नजर आ रहे हैं. GIFT Nifty में करीब 190 अंकों की गिरावट, अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड के 5.11 फीसदी तक पहुंचने और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से भारतीय बाजार में कमजोर शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं. इसके साथ ही आज NSE के शेयरों की BSE पर लिस्टिंग भी बाजार के लिए अहम घटनाक्रम रहेगी.
आज बाजार पर क्यों है दबाव?
24 सितंबर को भारतीय शेयर बाजार की शुरुआत पर ग्लोबल संकेतों का असर देखने को मिल सकता है. GIFT Nifty में करीब 190 अंकों की गिरावट दर्ज की गई है, जो घरेलू बाजार में कमजोर शुरुआत का संकेत दे रही है.
अमेरिकी बॉन्ड बाजार से भी दबाव के संकेत मिले हैं. अमेरिका की 10 साल की ट्रेजरी यील्ड 15 बेसिस पॉइंट बढ़कर 5.11 फीसदी पर पहुंच गई है. एक दिन में यह बढ़ोतरी अप्रैल 2025 के बाद सबसे बड़ी बताई जा रही है. वहीं, 5 साल की अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड भी 5 फीसदी के पार पहुंच गई है.
बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी से वैश्विक बाजारों में निवेशकों की धारणा प्रभावित हो सकती है. इसके अलावा कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भी भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि लंबे समय तक ऊंची कीमतों से आयात बिल और कंपनियों की लागत पर दबाव बढ़ सकता है.
कल बाजार ने की थी मजबूत वापसी
इन कमजोर संकेतों से पहले बुधवार को घरेलू बाजार ने मजबूत वापसी की थी. 23 सितंबर को सेंसेक्स 299.17 अंक यानी 0.40 फीसदी बढ़कर 74,828.25 पर बंद हुआ. कारोबार के दौरान सेंसेक्स 74,973.74 के उच्च स्तर और 74,599.88 के निचले स्तर तक गया. निफ्टी भी 117.80 अंक यानी 0.50 फीसदी की बढ़त के साथ 23,446.80 पर बंद हुआ. दिन के कारोबार में निफ्टी 23,466.90 के उच्च स्तर और 23,349.55 के निचले स्तर तक गया. सेंसेक्स के 30 शेयरों में 21 बढ़त के साथ बंद हुए, जबकि 9 शेयरों में गिरावट रही. मेटल और वित्तीय शेयरों में खरीदारी ने बाजार को सहारा दिया.
टाटा स्टील समेत इन शेयरों में रही तेजी
बुधवार को सेंसेक्स में टाटा स्टील सबसे ज्यादा 3.28 फीसदी चढ़ा. बजाज फाइनेंस में 3.07 फीसदी, आईटीसी में 1.77 फीसदी, अल्ट्राटेक सीमेंट में 1.73 फीसदी और पावरग्रिड में 1.65 फीसदी की तेजी रही.
निफ्टी में बजाज फाइनेंस 3.41 फीसदी की बढ़त के साथ टॉप गेनर रहा. हिंडाल्को 3.17 फीसदी, टाटा स्टील 3.16 फीसदी, अपोलो हॉस्पिटल्स 2.64 फीसदी और JSW स्टील 2.43 फीसदी चढ़े. हालांकि, आईटी शेयरों में दबाव देखने को मिला. सेंसेक्स में एचसीएल टेक 1.10 फीसदी, इन्फोसिस 1.03 फीसदी और टीसीएस 0.95 फीसदी गिरकर बंद हुए. टाइटन और महिंद्रा एंड महिंद्रा में भी गिरावट रही.
मंगलवार की गिरावट के बाद आई थी तेजी
बुधवार की तेजी से पहले मंगलवार को बाजार में गिरावट दर्ज की गई थी. 22 सितंबर को सेंसेक्स 329.91 अंक यानी 0.44 फीसदी गिरकर 74,529.08 पर बंद हुआ था. निफ्टी भी 85.30 अंक यानी 0.36 फीसदी की गिरावट के साथ 23,329 पर बंद हुआ.
मंगलवार को सेंसेक्स के 30 में से सिर्फ 7 शेयर बढ़त में रहे थे, जबकि 23 शेयर गिरावट के साथ बंद हुए. निफ्टी के 50 शेयरों में 15 में तेजी और 35 में गिरावट रही थी. ऐसे में बुधवार की तेजी ने पिछले सत्र की कमजोरी को कुछ हद तक संभाला.
आज NSE की लिस्टिंग पर भी नजर
गुरुवार को बाजार के लिए एक बड़ा कॉरपोरेट इवेंट NSE की लिस्टिंग है. नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के शेयर आज प्रतिद्वंद्वी BSE पर लिस्ट होंगे. करीब एक दशक के इंतजार के बाद NSE का IPO आया था और इसे कुल 5.7 गुना सब्सक्रिप्शन मिला था.
ऐसे में NSE की लिस्टिंग और शुरुआती कारोबार बाजार की नजर में रहेगा. इसके अलावा दिनभर ग्लोबल मार्केट के संकेत, कच्चे तेल की कीमतें और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बाजार की दिशा को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक रहेंगे.
इन शेयरों पर रखें नजर
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आज Bharti Airtel, NTPC, NLC India, Ola Electric Mobility, PhysicsWallah, Rainbow Children’s Medicare, Meesho, Bharat Dynamics, Oswal Pumps, Jindal Stainless, Exide Industries, SBI Card, Welspun Living और Concord Biotech समेत कई शेयर कॉरपोरेट अपडेट के कारण फोकस में रहेंगे. Bharti Airtel की सहयोगी Airtel Money ने लंदन स्टॉक एक्सचेंज पर संभावित IPO की योजना की घोषणा की है. NTPC ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए ₹3,393.83 करोड़ के अंतिम लाभांश का भुगतान किया है, जबकि NLC India ने ₹500 करोड़ का कमर्शियल पेपर जारी कर फंड जुटाया है. Ola Electric ने प्रस्तावित राइट्स इश्यू के लिए बोर्ड की मंजूरी की प्रक्रिया शुरू की है. Meesho में RPS Ventures ने करीब 1 फीसदी हिस्सेदारी लगभग ₹900 करोड़ की ब्लॉक डील के जरिए बेची है. Bharat Dynamics को रक्षा मंत्रालय से ₹810.79 करोड़ का कॉन्ट्रैक्ट मिला है, जबकि Oswal Pumps को तेलंगाना में ₹273 करोड़ का सोलर रूफटॉप प्रोजेक्ट मिला है. Exide Energy Solutions ने बेंगलुरु के देवनहल्ली में अपनी 6 GWh क्षमता वाली लिथियम-आयन सेल मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी के Phase-I की कमीशनिंग पूरी कर ली है. Welspun Living में 2.59 फीसदी हिस्सेदारी ₹525.88 करोड़ में बेची गई है, जबकि Concord Biotech के बोर्ड ने 1:1 बोनस शेयर जारी करने को मंजूरी दी है.
बाजार की आज की दिशा किन संकेतों से तय होगी?
बुधवार की तेजी के बाद गुरुवार को बाजार के सामने घरेलू मजबूती और कमजोर ग्लोबल संकेतों के बीच संतुलन की स्थिति है. शुरुआती कारोबार में GIFT Nifty, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और कच्चे तेल की चाल महत्वपूर्ण रहेगी. इसके अलावा NSE की लिस्टिंग और कंपनियों से जुड़े कॉरपोरेट अपडेट भी खास शेयरों में हलचल बढ़ा सकते हैं.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
निप्पॉन इंडिया MF को करीब ₹92.46 करोड़ का भुगतान करना होगा. कंपनी के सीईओ सुंदीप सिक्का और फंड मैनेजर अमित त्रिपाठी को 2.1-2.1 करोड़ रुपये देने होंगे. सूत्रों के मुताबिक, इस मामले में कुल भुगतान करीब ₹97 करोड़ होगा. सेबी का आदेश जल्द जारी होने की उम्मीद है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
भारतीय प्रतिभूति एवं विनियम बोर्ड (SEBI) ने निप्पॉन इंडिया म्यूचुअल फंड (Nippon India Mutual Fund) और उसके तीन शीर्ष अधिकारियों के साथ सहमति के आधार पर निपटान को मंजूरी दे दी है. यह मामला यस बैंक के Additional Tier-1 (AT1) बॉन्ड में फंड हाउस के निवेश से जुड़ा है. मामले से परिचित लोगों के अनुसार, इससे करीब दो साल पहले नियामक की ओर से जारी किया गया कारण बताओ नोटिस बंद हो जाएगा.
सूत्रों ने कहा कि कारण बताओ नोटिस दो साल पहले जारी किया गया था, लेकिन इस पूरे समय में न तो फंड हाउस और न ही उसके अधिकारियों ने कोई जवाब दाखिल किया और सेबी ने भी उनसे ऐसा करने के लिए दबाव नहीं डाला. दो साल, कोई जवाब नहीं. क्या किसी छोटे खिलाड़ी को भी इतनी ही गुंजाइश दी जाती? यह एक ऐसा सवाल है जो उद्योग के बाकी हिस्से में उठ सकता है.
निपटान के तहत निप्पॉन लाइफ इंडिया एस्सेट मैनेजमेंट करीब ₹92.46 करोड़ का भुगतान करेगी, सूत्रों ने कहा. फंड हाउस के सीईओ और वर्तमान में एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया (AMFI) के चेयरमैन सुंदीप सिक्का ₹2.1 करोड़ का भुगतान करेंगे. हेड फंड मैनेजर अमित त्रिपाठी भी ₹2.1 करोड़ का भुगतान करेंगे और पूर्व चीफ रिस्क ऑफिसर मिलिंद नेसारिकर ₹25.83 लाख का भुगतान करेंगे. कुल मिलाकर राशि करीब ₹97 करोड़ है. सूत्रों के अनुसार कुल आंकड़ा ₹97-100 करोड़ के बीच है.
सेबी की सेटलमेंट प्रोसीडिंग्स रेगुलेशन्स के तहत सभी सहमति-आधारित निपटारों की तरह, आवेदक आरोपों को स्वीकार या अस्वीकार किए बिना निपटान राशि का भुगतान करते हैं. आदेश पारित होने के बाद सेबी की ओर से उनके खिलाफ कार्यवाही समाप्त हो जाती है. यह बाजार नियामक का यह कहने का तरीका है कि "आइए, इस बारे में बात करना बंद करने पर सहमत होते हैं."
वह फाइल जिसने डेस्क बदले
निपटान आदेशों पर सेबी के पूर्णकालिक सदस्य हस्ताक्षर करते हैं. सूत्रों के अनुसार, इस मामले ने वहां पहुंचने के लिए थोड़ा लंबा रास्ता तय किया. सूत्रों के अनुसार, फाइल सबसे पहले पूर्णकालिक सदस्य वर्षनी के पास गई. उन्होंने खुद को इस मामले से अलग कर लिया क्योंकि उस समय उनके कार्यकाल में कुछ ही दिन बचे थे और बाद में उन्हें कार्यकाल में विस्तार मिला. इसके बाद फाइल KVR मूर्ति के पास गई, जिन्होंने अपने साथी पूर्णकालिक सदस्य संदीप प्रधान के साथ मिलकर इस पर हस्ताक्षर किए, सूत्रों ने कहा.
सेबी के नियम किसी फाइल को नए हस्ताक्षरकर्ता तक पहुंचने से नहीं रोकते. लेकिन इतने संवेदनशील मामले में यह एक ऐसा विवरण है जिस पर बाजार पर नजर रखने वाले ध्यान दे सकते हैं.
इस बीच, सीबीआई
यह निपटान ऐसे आपराधिक मामले के साथ असहज रूप से जुड़ा हुआ है, जिसमें निपटारे के कोई संकेत नहीं हैं. सीबीआई पहले ही इस मामले में आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है. यह मामला कथित ₹2,797 करोड़ के quid pro quo arrangement से जुड़ा है, जिसमें उस समय रिलायंस निप्पॉन MF के नाम से जाने जाने वाले फंड हाउस और यस बैंक के बीच संबंध था. एजेंसी ने यस बैंक के पूर्व प्रमुख राणा कपूर और उद्योगपति अनिल अंबानी के खिलाफ आरोप लगाए हैं. सूत्रों ने कहा कि एजेंसी EPFO फंड के कथित दुरुपयोग की भी जांच कर रही है और एक और आरोपपत्र दाखिल किए जाने की उम्मीद है.
सेबी का निपटान, सेबी की अपनी कार्यवाही को समाप्त करता है. यह सीबीआई पर बाध्यकारी नहीं है और न ही इसका आपराधिक अभियोजन पर कोई असर पड़ता है. इसलिए नियामक ने अपना मामला बंद कर दिया है, जबकि जांच एजेंसी अपनी जांच को आगे बढ़ा रही है.
कई कानूनी विशेषज्ञों ने कहा कि घटनाक्रम का यह क्रम असहज मिसाल कायम कर सकता है. यदि किसी नियामक द्वारा उसी तथ्यों पर चल रही आपराधिक जांच के दौरान मामला निपटाया जाता है, तो इससे मिले-जुले संकेत जाने का जोखिम रहता है. आखिरकार, इसका असर मायने रख सकता है.
दो आवेदक अंदर, दो बाहर
सूत्रों ने कहा कि इसी मामले में सेबी ने अनिल अंबानी और राणा कपूर के निपटान आवेदनों को खारिज कर दिया.
सिक्योरिटीज वकीलों ने कहा कि इस विभाजित नतीजे को चुनौती दिए जाने की संभावना है. दोनों व्यक्ति अदालतों (Securities Appellate Tribunal) के सामने यह तर्क दे सकते हैं कि एक ही लेनदेन में शामिल आवेदकों के साथ अलग-अलग व्यवहार किया गया. एक वकील ने कहा कि सेबी जैसी अनुभवी नियामक संस्था इस संभावना से अच्छी तरह वाकिफ होगी. अधिक दिलचस्प सवाल यह है कि वह इस अंतर का बचाव किस तरह करेगी.
इन आवेदनों की समीक्षा सेबी की हाई पॉवर्ड एडवाइजरी कमेटी (HPAC) ने की, जो निपटान आदेशों और अपराधों के समझौते से जुड़े मामलों पर विचार करती है. समिति की अध्यक्षता कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जय नारायण पटेल करते हैं. इसके अन्य सदस्यों में पूर्व कानून सचिव पी.के. मल्होत्रा, एस.के मोहंती, IRS (सेवानिवृत्त) और सेबी के पूर्व पूर्णकालिक सदस्य, तथा डेलॉइट इंडिया के पूर्व मैनेजिंग पार्टनर और सीईओ एन. वेंकटराम शामिल हैं. समिति निपटान की शर्तों की सिफारिश करती है और अंतिम फैसला पूर्णकालिक सदस्य करते हैं.
सयोनारा, कारण बताओ नोटिस
सूत्रों के मुताबिक, समय का यह मेल शायद ही इससे अधिक सौहार्दपूर्ण हो सकता था. भारत-जापान संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं. 22 जुलाई को मुंबई में जापान की कॉन्सुल-जनरल सातो हितोमी ने सेबी के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे से शिष्टाचार मुलाकात की. जापानी कॉन्सुलेट के अनुसार, दोनों पक्षों ने वित्तीय क्षेत्र की गतिविधियों और दोनों देशों के बीच सहयोग पर चर्चा की.
सूत्रों ने कहा कि फंड हाउस की जापानी पैरेंट कंपनी निप्पॉन लाइफ भी भारत और जापान के बीच एक क्रिकेट मैच आयोजित कर रही है. सेबी के चेयरमैन ने हाल ही में उत्तर भारत के एक राज्य में निप्पॉन इंडिया की एक शाखा का दौरा किया. सेबी के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने सितंबर 2026 में लेह, जम्मू-कश्मीर/लद्दाख क्षेत्र का दौरा किया था, जहां उन्होंने सेना के जवानों के लिए AMFI की ओर से आयोजित इन्वेस्टर्स अवेयरनेस प्रोग्राम को संबोधित किया.
मामले से परिचित एक व्यक्ति ने कहा कि जापान के सबसे बड़े वित्तीय समूहों में से एक के साथ निपटान द्विपक्षीय संबंधों के लिए "काफी मददगार साबित हो सकता है." बेशक, कोई भी इन घटनाक्रमों के बीच किसी संबंध का सुझाव नहीं दे रहा है. ये महज संयोग हैं.
सिक्का के लिए यह निपटान ऐसे समय में नियामकीय दबाव को हटा देता है, जब उनका प्रोफाइल पहले कभी इतना ऊंचा नहीं रहा. AMFI के चेयरमैन के तौर पर वह ऐसे उद्योग का सार्वजनिक चेहरा हैं, जो ₹75 लाख करोड़ से अधिक की परिसंपत्तियों का प्रबंधन करता है.
अगली कतार में: Quant
निप्पॉन का आदेश इस सीजन का एकमात्र बड़ा निपटान नहीं हो सकता. सूत्रों के अनुसार, सेबी से क्वांट म्यूचुअल फंड (Quant Mutual Fund) के फ्रंट रनिंग मामले में निपटान आवेदन पर भी फैसला आने की उम्मीद है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
सर्वे के अनुसार, सितंबर में भारत के निजी क्षेत्र में नए कारोबार में तेजी आई. मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों क्षेत्रों में मांग में सुधार हुआ, हालांकि मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में नए ऑर्डर की वृद्धि अधिक मजबूत रही.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सितंबर में भारत के निजी क्षेत्र की कारोबारी गतिविधियों में सुधार देखने को मिला है. HSBC के फ्लैश परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) के मुताबिक, मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों क्षेत्रों में आउटपुट और नए ऑर्डर बढ़ने से निजी क्षेत्र की गतिविधियां तीन महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गईं. सितंबर में कंपोजिट फ्लैश PMI अगस्त के 54.3 से बढ़कर 56.5 हो गया.
62 महीने से 50 के स्तर से ऊपर PMI
S&P Global की ओर से तैयार HSBC फ्लैश PMI लगातार 62वें महीने 50 के महत्वपूर्ण स्तर से ऊपर रहा. PMI में 50 से ऊपर का आंकड़ा निजी क्षेत्र की गतिविधियों में विस्तार और 50 से नीचे का स्तर गिरावट को दर्शाता है.
सर्वे के अनुसार, सितंबर में भारत के निजी क्षेत्र में नए कारोबार में तेजी आई. मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों क्षेत्रों में मांग में सुधार हुआ, हालांकि मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में नए ऑर्डर की वृद्धि अधिक मजबूत रही. कुल नए कारोबार में वृद्धि सात महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गई.
मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों में सुधार
HSBC इंडिया मैन्युफैक्चरिंग PMI अगस्त के 52.8 से बढ़कर सितंबर में 55.7 हो गया. वहीं, फ्लैश इंडिया सर्विसेज PMI बिजनेस एक्टिविटी इंडेक्स 54.1 से बढ़कर 55.8 पर पहुंच गया.
सर्विस सेक्टर में मार्केटिंग गतिविधियों के साथ नए ऑर्डर बढ़े. प्रॉपर्टी, ट्रांसपोर्ट, ट्रैवल, सॉफ्टवेयर और डिजिटल सॉल्यूशंस जैसी सेवाओं की मांग में सुधार दर्ज किया गया. मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में एल्युमीनियम, इलेक्ट्रॉनिक्स, खाद्य उत्पादों, दवाओं और नए प्रोडक्ट मॉडल की मांग बढ़ी. इससे फैक्ट्रियों में उत्पादन और नए ऑर्डर दोनों को समर्थन मिला.
HSBC की चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट प्रांजुल भंडारी के मुताबिक, मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में तेज सुधार ने निजी क्षेत्र की गतिविधियों को गति दी. उन्होंने कहा कि आउटपुट और घरेलू नए ऑर्डर में तेजी रही, हालांकि मिडिल ईस्ट में बढ़े तनाव के बीच कंपनियां अनिश्चितताओं से निपटने के लिए सुरक्षा उपाय भी कर रही हैं.
एक्सपोर्ट ऑर्डर बढ़े, लेकिन रफ्तार धीमी
सितंबर में नए एक्सपोर्ट ऑर्डर में भी बढ़ोतरी जारी रही. हालांकि, इन ऑर्डर की वृद्धि दर पिछले तीन वर्षों में सबसे धीमी रही. इसके बावजूद घरेलू मांग में सुधार ने कंपनियों की कुल ऑर्डर बुक को मजबूती दी.
नए ऑर्डर और उत्पादन बढ़ने के साथ सितंबर में रोजगार में भी बढ़ोतरी हुई. मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों क्षेत्रों में कंपनियों ने नई नियुक्तियां कीं और दोनों क्षेत्रों में रोजगार बढ़ने की रफ्तार लगभग समान रही.
इनपुट लागत का दबाव घटा
सर्वे के मुताबिक, निजी क्षेत्र में इनपुट लागत बढ़ने की रफ्तार जनवरी के बाद सबसे निचले स्तर पर आ गई. सर्विस कंपनियों पर लागत का दबाव कम होने से मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में बढ़ी लागत का असर काफी हद तक संतुलित हुआ. हालांकि, कुछ कंपनियों ने इलेक्ट्रिकल कंपोनेंट्स, खाद्य उत्पादों, ईंधन, धातुओं, दवाओं और टेक्नोलॉजी संसाधनों की लागत बढ़ने की जानकारी दी.
सितंबर में कंपनियों ने बिक्री कीमतों में भी बढ़ोतरी की. मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में फैक्ट्री-गेट कीमतों में बढ़ोतरी की रफ्तार तेज हुई, जबकि सर्विस कंपनियों की ओर से ली जाने वाली कीमतों में वृद्धि की गति कुछ धीमी रही.
तैयार माल का स्टॉक साढ़े 11 साल के उच्च स्तर पर
भंडारी के मुताबिक, इनपुट की खरीदारी में तेजी आई है और तैयार माल के स्टॉक का इंडेक्स करीब साढ़े 11 साल के उच्च स्तर पर पहुंच गया है. मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों पर लागत का दबाव बढ़ने के कारण आउटपुट कीमतों में भी बढ़ोतरी हुई है. यह कंपनियों की मार्जिन को बनाए रखने की कोशिश को दर्शाता है.
फ्लैश PMI पूरे महीने के PMI के शुरुआती संकेत देता है. यह महीने के दौरान मिले करीब 90 फीसदी सर्वे जवाबों पर आधारित होता है. मैन्युफैक्चरिंग PMI का अंतिम आंकड़ा 1 अक्टूबर और सर्विस PMI का अंतिम आंकड़ा 6 अक्टूबर को जारी किया जाएगा.
FY26 में रक्षा उत्पादन 15.6% बढ़ा, निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी भी बढ़कर 24% हुई; भारत 80 से अधिक देशों को रक्षा उत्पादों का निर्यात कर रहा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत का रक्षा विनिर्माण क्षेत्र तेजी से विस्तार कर रहा है. वित्त वर्ष 2025-26 में देश का रक्षा उत्पादन बढ़कर रिकॉर्ड ₹1.78 लाख करोड़ पहुंच गया, जो पिछले वित्त वर्ष के ₹1.54 लाख करोड़ से 15.6% अधिक है. इसी अवधि में रक्षा निर्यात भी 62.66% बढ़कर ₹38,424 करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया. भारत अब 80 से अधिक देशों को रक्षा उत्पाद निर्यात कर रहा है.
रक्षा क्षेत्र में घरेलू उत्पादन बढ़ने के साथ निजी कंपनियों की भूमिका भी लगातार बढ़ रही है. FY26 में रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़कर 24% हो गई, जो FY25 में 22% थी. निजी क्षेत्र का उत्पादन करीब ₹42,000 करोड़ रहा.
80 से ज्यादा देशों तक पहुंचा भारतीय रक्षा निर्यात
भारत के रक्षा उत्पाद अब 80 से अधिक देशों तक पहुंच रहे हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, FY14 में जहां रक्षा निर्यात महज ₹686 करोड़ था, वहीं FY26 में यह बढ़कर ₹38,424 करोड़ हो गया. यानी करीब 12 वर्षों में इसमें 56 गुना से ज्यादा की वृद्धि हुई है.
सरकार ने FY29 तक सालाना रक्षा उत्पादन को ₹3 लाख करोड़ और रक्षा निर्यात को ₹50,000 करोड़ तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है. इससे आने वाले वर्षों में घरेलू रक्षा विनिर्माण और निर्यात बाजार के विस्तार की दिशा स्पष्ट होती है.
स्वदेशीकरण पर जोर, हजारों उपकरणों का घरेलू उत्पादन
रक्षा क्षेत्र में आयात पर निर्भरता घटाने के लिए सरकार स्वदेशीकरण पर भी जोर दे रही है. मई 2026 तक पांच Positive Indigenisation Lists में 5,012 वस्तुओं को शामिल किया गया था. इसके अलावा पिछले पांच वर्षों में 15,700 से अधिक रक्षा वस्तुओं का स्वदेशीकरण किया गया है. Srijan Defence Equipment Empowerment Platform के जरिए घरेलू कंपनियों, MSME और स्टार्टअप को रक्षा क्षेत्र की सप्लाई चेन से जोड़ने की कोशिश की जा रही है.
रक्षा उत्पादन में निजी कंपनियों की बढ़ती हिस्सेदारी
रक्षा उत्पादन में सरकारी कंपनियों का योगदान अभी भी बड़ा है, लेकिन निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है. FY26 में कुल रक्षा उत्पादन में सरकारी क्षेत्र का हिस्सा करीब 76% और निजी क्षेत्र का 24% रहा.
रक्षा निर्यात में भी निजी कंपनियों की महत्वपूर्ण भूमिका है. FY26 के कुल रक्षा निर्यात में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी 45.16% रही, जबकि रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों यानी DPSU की हिस्सेदारी 54.84% रही.
रक्षा खरीद से घरेलू कंपनियों को मिल रहा बाजार
घरेलू रक्षा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए सरकारी खरीद में भी घरेलू कंपनियों को प्राथमिकता दी जा रही है. FY27 के आधुनिकीकरण बजट का 75% घरेलू उद्योग के लिए निर्धारित किए जाने से भारतीय कंपनियों के लिए रक्षा ऑर्डर का दायरा बढ़ा है.
वित्त वर्ष 2026 के दौरान रक्षा अधिग्रहण परिषद ने करीब ₹6.8 लाख करोड़ के 55 प्रस्तावों को आवश्यकता की स्वीकृति दी, जबकि करीब ₹2.3 लाख करोड़ के 503 पूंजीगत खरीद प्रस्तावों के अनुबंध किए गए. ये आंकड़े रक्षा कंपनियों के लिए संभावित ऑर्डर पाइपलाइन के बड़े आकार को दिखाते हैं.
वायुसेना, सेना और नौसेना की बड़ी खरीद योजनाएं
रक्षा आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में तीनों सेनाओं के लिए कई बड़े कार्यक्रम शामिल हैं. भारतीय वायुसेना के लिए मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट, LCA Tejas Mk-II, Su-30 MKI अपग्रेड, अतिरिक्त S-400 सिस्टम और अन्य प्लेटफॉर्म से जुड़े कार्यक्रम महत्वपूर्ण हैं.
वहीं, सेना के लिए Future Infantry Combat Vehicles, Future Ready Combat Vehicles, K9 Vajra-T, QRSAM, Akash-NG, loitering munitions और अगली पीढ़ी के Pinaka सिस्टम जैसे कार्यक्रमों पर काम हो रहा है. नौसेना की योजनाओं में Project 75I, अतिरिक्त स्कॉर्पीन पनडुब्बियां, नई पीढ़ी के फ्रिगेट और मानव रहित प्रणालियां शामिल हैं.
रक्षा R&D और स्टार्टअप इकोसिस्टम पर भी जोर
रक्षा क्षेत्र में उत्पादन क्षमता के साथ रिसर्च और टेक्नोलॉजी विकास पर भी जोर बढ़ा है. सरकार iDEX और ADITI जैसी योजनाओं के जरिए स्टार्टअप और नई रक्षा तकनीकों को बढ़ावा दे रही है. रक्षा R&D के लिए आवंटन भी बढ़ा है और उद्योग, स्टार्टअप तथा अकादमिक संस्थानों की भागीदारी को बढ़ाने की कोशिश की जा रही है.
उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु के रक्षा औद्योगिक गलियारे भी इस विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. इनसे रक्षा विनिर्माण, सप्लाई चेन और स्थानीय स्तर पर तकनीकी क्षमता विकसित करने के अवसर बढ़ रहे हैं.
आगे क्या है?
रिकॉर्ड उत्पादन और निर्यात के बावजूद भारतीय रक्षा उद्योग के सामने तकनीकी क्षमता, वैश्विक बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाने और जटिल रक्षा प्रणालियों में घरेलू तकनीक विकसित करने जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं. ऐसे में आने वाले वर्षों में उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ उच्च तकनीक वाले रक्षा उत्पादों के निर्यात और वैश्विक सप्लाई चेन में भारतीय कंपनियों की हिस्सेदारी बढ़ाना क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण रहेगा.
जून तिमाही में 7.8% की मजबूत GDP ग्रोथ के बाद रेटिंग एजेंसी ने बढ़ाया FY27 का अनुमान; मजबूत खपत, औद्योगिक गतिविधियों, निर्यात और सरकारी निवेश से अर्थव्यवस्था को मिला सहारा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत की मजबूत आर्थिक रफ्तार ने वैश्विक रेटिंग एजेंसी S&P Global Ratings को चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए देश की GDP ग्रोथ का अनुमान बढ़ाने के लिए प्रेरित किया है. एजेंसी ने भारत की आर्थिक वृद्धि का अनुमान 6.6% से बढ़ाकर 7% कर दिया है. S&P का कहना है कि मजबूत औद्योगिक गतिविधियां, घरेलू खपत, वस्तुओं के निर्यात में मजबूती और सरकारी निवेश अर्थव्यवस्था की रफ्तार को सहारा दे रहे हैं.
भारत की अर्थव्यवस्था ने अप्रैल-जून तिमाही में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन करते हुए 7.8% की GDP ग्रोथ दर्ज की. इस मजबूत प्रदर्शन के बाद S&P ने पूरे वित्त वर्ष के अनुमान में बढ़ोतरी की है.
दूसरी छमाही में धीमी हो सकती है ग्रोथ
S&P के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में आर्थिक वृद्धि की रफ्तार कुछ धीमी पड़ सकती है. रेटिंग एजेंसी का मानना है कि GST में किए गए बदलाव और इनकम टैक्स में कटौती से अर्थव्यवस्था को मिलने वाला शुरुआती फायदा धीरे-धीरे कम हो सकता है.
इसके अलावा मौसम से जुड़े जोखिम भी अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं. 9 सितंबर 2026 तक देश में कुल बारिश सामान्य से करीब 15% कम रही थी. ऐसे में कृषि उत्पादन और खाद्य महंगाई पर मौसम का असर आने वाले महीनों में महत्वपूर्ण रहेगा.
महंगाई के दबाव पर भी S&P की नजर
S&P ने वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की औसत खुदरा महंगाई 5.1% रहने का अनुमान लगाया है. मजबूत आर्थिक गतिविधियों के साथ महंगाई का दबाव बढ़ने की स्थिति में मौद्रिक नीति पर भी असर पड़ सकता है.
रेटिंग एजेंसी के अनुसार, मजबूत ग्रोथ, महंगाई का दबाव, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और मौसम से जुड़े जोखिमों के बीच RBI चालू वित्त वर्ष में रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट यानी 0.25% की बढ़ोतरी कर सकता है.
जून तिमाही में किन क्षेत्रों ने दिया ग्रोथ को सहारा?
अप्रैल-जून तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था की ग्रोथ को मुख्य रूप से मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज सेक्टर से समर्थन मिला. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इस दौरान मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 9.2% और सर्विसेज में करीब 10% की वृद्धि दर्ज की गई.
इसके अलावा घरेलू मांग, निवेश और निर्यात में मजबूती ने भी आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पहली तिमाही में निवेश 11.9%, घरेलू खपत 7.1% और निर्यात 12% बढ़ा.
Moody's ने भी बढ़ाया था भारत की ग्रोथ का अनुमान
S&P से पहले Moody's ने भी वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान बढ़ाकर 7% किया था. एजेंसी ने अप्रैल-जून तिमाही में 7.8% की मजबूत वृद्धि को भारत की आर्थिक मजबूती का संकेत बताया था, हालांकि उसने पश्चिम एशिया के तनाव, ऊर्जा कीमतों और खाद्य महंगाई को जोखिम के तौर पर रेखांकित किया था.
इस बीच, भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान अलग-अलग एजेंसियों में अलग है. ऐसे में आगे आर्थिक वृद्धि की रफ्तार पर घरेलू मांग, महंगाई, ऊर्जा कीमतों, मानसून और वैश्विक परिस्थितियों का असर महत्वपूर्ण रहेगा.
UAE के सेंट्रल बैंक ने रिटेल पेमेंट सर्विसेज और कार्ड स्कीम्स तथा स्टोर्ड वैल्यू फैसिलिटीज के लिए दी इन-प्रिंसिपल अप्रूवल; कारोबार शुरू करने से पहले लेनी होगी अंतिम मंजूरी
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
डिजिटल पेमेंट कंपनी फोनपे (PhonePe) को संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के सेंट्रल बैंक (CBUAE) से दो पेमेंट लाइसेंस के लिए सैद्धांतिक मंजूरी मिल गई है. यह मंजूरी कंपनी को UAE में अपना स्थानीय रूप से विनियमित अंतरराष्ट्रीय कारोबार शुरू करने के करीब ले जाती है. हालांकि, वाणिज्यिक परिचालन शुरू करने से पहले PhonePe को नियामक की अंतिम मंजूरी हासिल करनी होगी.
CBUAE की ओर से मिली मंजूरी में रिटेल पेमेंट सर्विसेज और कार्ड स्कीम्स (RPSCS) तथा स्टोर्ड वैल्यू फैसिलिटीज (SVF) शामिल हैं. यह मंजूरी शुरुआती नियामकीय जांच और ड्यू डिलिजेंस प्रक्रिया पूरी होने के बाद मिली है.
UAE में स्थानीय साझेदारों के साथ काम करेगी कंपनी
अंतिम मंजूरी मिलने के बाद PhonePe UAE के पेमेंट इकोसिस्टम में अपनी मौजूदगी मजबूत करने के लिए क्षेत्रीय बैंकों, लाइसेंस प्राप्त पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स और स्थानीय टेक्नोलॉजी कंपनियों के साथ काम करने की योजना बना रही है.
कंपनी का फोकस UAE में उपभोक्ताओं और कारोबारों के लिए डिजिटल पेमेंट सेवाओं को सपोर्ट करने पर होगा. इसके लिए PhonePe अपनी टेक्नोलॉजी और पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को UAE की मौजूदा वित्तीय व्यवस्था के साथ जोड़ने की दिशा में काम करेगी.
UAE के Aani और Jaywan से जुड़ने की योजना
PhonePe ने UAE के इंस्टेंट पेमेंट प्लेटफॉर्म Aani और घरेलू कार्ड स्कीम Jaywan के लिए भी अपनी टेक्नोलॉजी के जरिए संभावनाएं तलाशने की बात कही है. कंपनी के मुताबिक, भारत में उसका पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर 70 करोड़ से अधिक रजिस्टर्ड यूजर्स और करीब 5 करोड़ कारोबारियों को सेवाएं देता है. UAE में प्रस्तावित कारोबार के जरिए कंपनी डिजिटल पेमेंट के क्षेत्र में उपभोक्ताओं और कारोबारियों को सेवाएं देने के साथ स्थानीय वित्तीय इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ मिलकर काम करेगी.
PhonePe का यह विस्तार UAE के फाइनेंशियल इंफ्रास्ट्रक्चर ट्रांसफॉर्मेशन प्रोग्राम (Financial Infrastructure Transformation Programme) और डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने की सरकार की व्यापक रणनीति के अनुरूप है.
भारत से UAE जाने वाले यात्रियों के लिए पहले से मौजूद है सेवा
PhonePe की UAE में पूरी तरह नई एंट्री नहीं होगी. कंपनी पहले से NPCI इंटरनेशनल पेमेंट्स लिमिटेड (NIPL) के साथ क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट व्यवस्था के जरिए UAE में मौजूद है.
भारत से UAE जाने वाले यात्री PhonePe के जरिए स्थानीय QR कोड स्कैन करके भुगतान कर सकते हैं. इसके लिए UAE में NEOPAY और Network International के टर्मिनलों का इस्तेमाल किया जाता है. हालांकि, नए लाइसेंस मिलने के बाद PhonePe की भूमिका केवल विदेश यात्रा करने वाले भारतीयों को पेमेंट सुविधा देने तक सीमित नहीं रहेगी. अंतिम मंजूरी के बाद कंपनी UAE में एक विनियमित पेमेंट कारोबार संचालित कर सकेगी.
UAE बन सकता है PhonePe का पहला अंतरराष्ट्रीय बाजार
PhonePe अपनी टेक्नोलॉजी और स्थानीय साझेदारियों के जरिए UAE, भारत और अन्य वैश्विक बाजारों के बीच पेमेंट गतिविधियों को सपोर्ट करने की योजना बना रही है. अंतिम नियामकीय मंजूरी मिलने और वाणिज्यिक परिचालन शुरू होने के बाद UAE, PhonePe का पहला अंतरराष्ट्रीय बाजार बन सकता है. यह कदम कंपनी की भारत से बाहर विस्तार करने की रणनीति में अहम माना जा रहा है.
30 दिन तक की वैधता वाले वॉइस और SMS-ओनली प्लान लाना होगा, कम डेटा इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों और दूसरी सिम रखने वालों को मिल सकता है फायदा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
टेलीकॉम ग्राहकों के लिए रिचार्ज को लेकर राहत की खबर है. भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) ने टेलीकॉम कंपनियों को ऐसे स्पेशल टैरिफ वाउचर (STV) उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है, जिनमें सिर्फ वॉइस कॉल और SMS की सुविधा होगी. इन प्लान में डेटा शामिल नहीं होगा और इनकी वैधता अधिकतम 30 दिन तक रखी जा सकेगी. इसका फायदा खासतौर पर उन ग्राहकों को मिल सकता है, जिन्हें मोबाइल डेटा की जरूरत कम या बिल्कुल नहीं है.
TRAI ने यह बदलाव दूरसंचार उपभोक्ता संरक्षण विनियम, 2024 में संशोधन के जरिए किया है. नियामक के मुताबिक, मौजूदा समय में केवल वॉइस और SMS की सुविधा वाले प्लान सीमित हैं, जबकि लंबी वैधता वाले प्लान ज्यादा उपलब्ध हैं. ऐसे में कम आय वाले और कम अवधि के लिए रिचार्ज करने वाले ग्राहकों के पास सस्ते विकल्प सीमित हैं.
ग्राहकों को अपनी जरूरत के हिसाब से रिचार्ज का विकल्प
TRAI का कहना है कि नए नियमों से ग्राहकों को अपनी जरूरत और आर्थिक क्षमता के हिसाब से मोबाइल प्लान चुनने की ज्यादा स्वतंत्रता मिलेगी. जिन लोगों को इंटरनेट डेटा की जरूरत नहीं है, उन्हें ऐसे प्लान के लिए भुगतान नहीं करना पड़ेगा जिसमें डेटा भी शामिल हो.
इसका फायदा बुजुर्ग ग्राहकों, फीचर फोन इस्तेमाल करने वालों, कम डेटा इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों और दूसरी सिम को एक्टिव रखने वाले लोगों को मिल सकता है. ऐसे ग्राहक अब सिर्फ कॉल और SMS की जरूरत के मुताबिक कम कीमत वाला रिचार्ज चुन सकेंगे.
टेलीकॉम कंपनियों की कमाई पर क्या होगा असर?
नए नियम से ग्राहकों को विकल्प तो बढ़ेंगे, लेकिन टेलीकॉम कंपनियों के औसत प्रति ग्राहक राजस्व (ARPU) पर दबाव पड़ने की संभावना जताई जा रही है. खासतौर पर ऐसे ग्राहक, जो अभी डेटा वाले पैक लेते हैं लेकिन उसका बहुत कम इस्तेमाल करते हैं, वे वॉइस-ओनली प्लान का रुख कर सकते हैं. इससे प्रति ग्राहक मिलने वाला औसत राजस्व घट सकता है.
डेलॉयट साउथ एशिया के पार्टनर और TMT इंडस्ट्री लीडर रोहन लोबो के मुताबिक, करीब 90 फीसदी मोबाइल कनेक्शन प्रीपेड हैं. ऐसे में कंपनियों के लिए केवल एक रिचार्ज से मिलने वाली रकम ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि ग्राहक कितनी नियमितता से रिचार्ज करता है, यह भी अहम है.
उनके अनुसार, कुछ ग्राहक सस्ते वॉइस-ओनली प्लान पर जा सकते हैं, जिससे ARPU पर दबाव आ सकता है. हालांकि, ऐसे प्लान कीमत के प्रति संवेदनशील ग्राहकों को बनाए रखने और दूसरी सिम को एक्टिव रखने में मदद कर सकते हैं. कुल राजस्व पर असर इस बात पर निर्भर करेगा कि रिचार्ज की नियमितता बढ़ने से कम कीमत वाले प्लान से होने वाली कमाई की कितनी भरपाई हो पाती है.
कम डेटा इस्तेमाल करने वालों पर ज्यादा असर
PwC India में टेलीकॉम प्रैक्टिस के लीडर विनिश बावा के मुताबिक, नए नियम से ARPU में कुछ कमी आ सकती है, लेकिन इसका असर बहुत ज्यादा होने की उम्मीद नहीं है. इसका प्रभाव खासतौर पर कम डेटा इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों, बुजुर्गों और दूसरी सिम रखने वाले लोगों पर पड़ सकता है.
वॉइस-ओनली प्लान उपलब्ध होने से कंपनियों के लिए मौजूदा प्रीपेड प्लान में डेटा जोड़कर रिचार्ज की कीमत बढ़ाने की गुंजाइश कुछ कम हो सकती है. हालांकि, ज्यादा डेटा इस्तेमाल करने वाले स्मार्टफोन यूजर्स की जरूरत पहले की तरह डेटा प्लान से पूरी होती रहेगी.
कंपनियों के सामने ग्राहकों को बनाए रखने की चुनौती
नए नियमों के बाद टेलीकॉम कंपनियों को अलग-अलग तरह के ग्राहकों के लिए प्लान तैयार करने पर ज्यादा ध्यान देना होगा. ज्यादा डेटा, तेज इंटरनेट स्पीड, बेहतर नेटवर्क और अतिरिक्त सेवाओं के लिए अधिक भुगतान करने वाले ग्राहकों के लिए कंपनियां प्रीमियम प्लान पेश कर सकती हैं.
वहीं, कम खर्च करने वाले ग्राहकों को बनाए रखने के लिए वॉइस और SMS-ओनली प्लान महत्वपूर्ण हो सकते हैं. इससे ऐसी दूसरी सिम को भी एक्टिव रखने में मदद मिल सकती है, जिसका इस्तेमाल मुख्य रूप से कॉल या SMS के लिए किया जाता है.
इस तरह TRAI का यह बदलाव एक तरफ कम डेटा इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों के लिए रिचार्ज के विकल्प बढ़ाता है, वहीं दूसरी ओर टेलीकॉम कंपनियों के लिए ग्राहकों के खर्च और ARPU को बनाए रखने की चुनौती भी बढ़ा सकता है.
ICICI सिक्योरिटीज की रिपोर्ट के मुताबिक, डिपॉजिट जुटाने की लागत अब बैंकों के लिए बड़ा अंतर पैदा करने वाला कारक बन रही है. कम फंडिंग कॉस्ट से बैंकों को मार्जिन बनाए रखने और कर्ज कारोबार बढ़ाने में मदद मिलती है
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय बैंकों के लिए डिपॉजिट और अन्य देनदारियों पर आने वाली लागत यानी कॉस्ट ऑफ फंड्स (CoF) अब मुनाफे और ग्रोथ को प्रभावित करने वाला अहम कारक बन गई है. ICICI सिक्योरिटीज की 22 सितंबर को जारी सेक्टर रिपोर्ट के मुताबिक, फंडिंग की लागत का असर बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM), क्रेडिट कॉस्ट, लोन ग्रोथ और यहां तक कि निवेशकों के वैल्यूएशन पर भी पड़ रहा है. रिपोर्ट में एचडीएफसी बैंक (HDFC) की फंडिंग स्थिति में सुधार के बावजूद CASA हिस्सेदारी में एक्सिस बैंक (Axis) से अंतर को एक महत्वपूर्ण चुनौती बताया गया है.
कम फंडिंग कॉस्ट से मार्जिन को सहारा
रिपोर्ट के मुताबिक, जिन बैंकों की फंडिंग कॉस्ट कम होती है, उनके पास अपने मार्जिन को बनाए रखने और बिना ज्यादा जोखिम लिए लोन बुक बढ़ाने की गुंजाइश अधिक रहती है. परंपरागत रूप से CASA यानी करंट अकाउंट और सेविंग्स अकाउंट में जमा को बैंक की सस्ती फंडिंग का अहम संकेतक माना जाता है. हालांकि, बैंक की कुल फंडिंग लागत केवल CASA पर निर्भर नहीं करती. इसमें सेविंग्स अकाउंट पर दी जाने वाली ब्याज दर, टर्म डिपॉजिट, उधारी और बैंक की नेटवर्थ भी भूमिका निभाते हैं.
महंगे फंड से NIM पर दबाव
रिपोर्ट के अनुसार, कर्ज बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और बड़ी संख्या में लोन के बाहरी बेंचमार्क से जुड़े होने के कारण बैंकों के लिए फंडिंग लागत बढ़ने का पूरा बोझ ग्राहकों पर डालना आसान नहीं है. ऐसे में डिपॉजिट की लागत बढ़ने पर बैंकों के NIM पर दबाव आ सकता है. ICICI सिक्योरिटीज ने फंडिंग कॉस्ट और मध्यम अवधि की क्रेडिट कॉस्ट के बीच भी संबंध का उल्लेख किया है. ज्यादा फंडिंग लागत वाले बैंकों को समान रिटर्न हासिल करने के लिए अधिक जोखिम वाले कर्ज की ओर जाने का दबाव हो सकता है. वहीं, कम फंडिंग कॉस्ट बैंकों को जोखिम बढ़ाए बिना बेहतर रिटर्न बनाए रखने में मदद कर सकती है.
एचडीएफसी बैंक की फंडिंग स्थिति में सुधार
रिपोर्ट के मुताबिक, विलय के बाद एचडीएफसी बैंक ने अपनी फंडिंग प्रोफाइल में सुधार किया है. बैंक की कुल फंडिंग में उधारी की हिस्सेदारी घटकर करीब 13 फीसदी रह गई है, जो विलय के बाद के 25 फीसदी के उच्च स्तर से काफी कम है. हालांकि, बैंक की CASA हिस्सेदारी अभी भी एक्सिस बैंक से करीब 600 बेसिस पॉइंट कम है. यह अंतर एचडीएफसी बैंक की फंडिंग कॉस्ट पर दबाव बनाए रखने वाला एक कारक है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि किसी बैंक की फंडिंग लागत में दूसरे बैंकों की तुलना में बदलाव उसके वैल्यूएशन को भी प्रभावित कर सकता है. उदाहरण के लिए, कोटक महिंद्रा बैंक की FY17-19 के दौरान फंडिंग कॉस्ट में सुधार को उसके री-रेटिंग के पीछे एक कारण बताया गया है. वहीं, विलय के बाद एचडीएफसी बैंक की फंडिंग स्थिति में आई कमजोरी को उसके बाद हुए डी-रेटिंग के कारणों में शामिल किया गया है.
इन बैंकों पर भी रिपोर्ट की नजर
ICICI सिक्योरिटीज ने फेडरल बैंक, आरबीएल बैंक, करुर व्यस्य बैंक, इंडियन बैंक और बैंक ऑफ महाराष्ट्र का भी फंडिंग कॉस्ट और ग्रोथ के संदर्भ में विश्लेषण किया है. रिपोर्ट के मुताबिक, फेडरल बैंक के हालिया री-रेटिंग में बेहतर फंडिंग कॉस्ट और CASA प्रदर्शन की भूमिका रही है. वहीं, आरबीएल बैंक के लिए FCNR(B) डिपॉजिट लंबे समय की जमा बढ़ाने का एक अवसर हो सकता है.
CASA और टर्म डिपॉजिट का असर
रिपोर्ट में कहा गया है कि आमतौर पर CASA का हिस्सा बढ़ने पर डिपॉजिट की लागत कम होने की संभावना रहती है. हालांकि, ज्यादा सेविंग अकाउंट ब्याज देने वाले बैंक इस सामान्य प्रवृत्ति से अलग हो सकते हैं.
Q1FY27 के विश्लेषण में यह भी सामने आया कि जो बैंक अपेक्षाकृत महंगे टर्म डिपॉजिट पर ज्यादा निर्भर हैं, उन्हें तेज ग्रोथ के दौरान फंडिंग कॉस्ट को नियंत्रित करने में अधिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है.
बैंकों के सामने संतुलन की चुनौती
बैंकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती डिपॉजिट जुटाने और उसकी लागत को नियंत्रित रखने के बीच संतुलन बनाने की है. डिपॉजिट पर ब्याज दर कम करने से फंडिंग कॉस्ट घट सकती है, लेकिन इससे नई जमा जुटाने और ग्रोथ पर असर पड़ सकता है. दूसरी ओर, ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए ज्यादा ब्याज देने से डिपॉजिट बढ़ सकता है, लेकिन इससे मार्जिन पर दबाव आ सकता है.
ICICI सिक्योरिटीज के मुताबिक, FCNR(B) डिपॉजिट कोटक महिंद्रा बैंक और आरबीएल जैसे बैंकों के लिए लंबी अवधि की जमा बढ़ाने का एक विकल्प हो सकता है. ऐसे में आने वाले समय में डिपॉजिट की संरचना, CASA हिस्सेदारी और फंडिंग कॉस्ट बैंकिंग सेक्टर के प्रदर्शन के अहम संकेतक बने रह सकते हैं.