शॉर्ट सेलिंग आसान करने से लेकर मार्जिन घटाने तक पर विचार, 9 महीने में लागू हो सकते हैं प्रस्तावित सुधार
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी के बीच बाजार नियामक सेबी (SEBI) ट्रेडिंग सिस्टम में बड़े बदलाव की तैयारी कर रहा है. प्रस्तावित सुधारों का मकसद विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय बाजार में कारोबार आसान बनाना, लागत और पूंजी की जरूरत घटाना और लंबी अवधि की निवेश रणनीतियों को बढ़ावा देना है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इन बदलावों में नकद बाजार में जमानत की जरूरत कम करना, शॉर्ट सेलिंग को आसान बनाना और लंबी अवधि के डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट को अधिक आकर्षक बनाना शामिल है.
विदेशी निवेशकों की निकासी बनी बड़ी चिंता
ये प्रस्ताव ऐसे समय सामने आए हैं, जब भारतीय शेयरों में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी करीब 17 साल के निचले स्तर पर पहुंच गई है. वहीं, इस साल रुपया करीब 6 फीसदी कमजोर हुआ है. नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर 2024 से जून 2026 के बीच विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से 50 अरब डॉलर से अधिक की निकासी कर चुके हैं.
वैश्विक MSCI Emerging Markets Index में भारत का भार भी सितंबर 2024 के करीब 21 फीसदी के उच्च स्तर से घटकर 12 फीसदी से नीचे आ गया है. माना जा रहा है कि सेबी के प्रस्तावित सुधारों से वैश्विक सूचकांकों में भारत का वजन बढ़ाने में मदद मिल सकती है.
शॉर्ट सेलिंग को आसान बनाने की तैयारी
सेबी सिक्योरिटीज लेंडिंग एंड बॉरोइंग व्यवस्था को मजबूत करने पर भी विचार कर रहा है. इसके तहत उधार लेने और देने के लिए पात्र शेयरों की संख्या करीब दोगुनी की जा सकती है. इससे नकद बाजार में शॉर्ट सेलिंग करना विदेशी और संस्थागत निवेशकों के लिए आसान हो सकता है.
विदेशी निवेशक लंबे समय से भारत के बाजार नियमों को चीन, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे प्रमुख एशियाई बाजारों के अनुरूप बनाने की मांग करते रहे हैं. इन बाजारों में शेयरों की लेंडिंग-बॉरोइंग और क्लोजिंग ऑक्शन जैसी व्यवस्थाएं पहले से विकसित हैं.
15-20 फीसदी तक घट सकती है शुरुआती पूंजी जरूरत
सेबी अत्यधिक लिक्विड शेयरों में कारोबार के लिए जमानत यानी मार्जिन की जरूरत घटाने पर भी विचार कर रहा है. सूत्रों के मुताबिक, इससे निवेशकों की शुरुआती पूंजी आवश्यकता 15 से 20 फीसदी तक कम हो सकती है.
इसके अलावा एक साल से अधिक अवधि वाले डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट के लिए शुरुआती जमानत घटाने का भी प्रस्ताव है. विदेशी एसेट मैनेजरों का मानना है कि मौजूदा व्यवस्था छोटी अवधि, खासकर साप्ताहिक डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट में ज्यादा कारोबार को बढ़ावा देती है. इससे लंबी अवधि की हेजिंग रणनीतियों के लिए भारतीय बाजार अपेक्षाकृत कम आकर्षक बनता है.
संस्थागत निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर
सेबी पिछले दो वर्षों में डेरिवेटिव बाजार में छोटे निवेशकों की सट्टेबाजी सीमित करने के लिए कई कदम उठा चुका है. अब नियामक संस्थागत और पेशेवर निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दे रहा है. NSE के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय बाजार के कारोबार में खुदरा निवेशकों की हिस्सेदारी 35 फीसदी से अधिक है. इसके मुकाबले अमेरिका में यह हिस्सेदारी करीब 20 फीसदी है, जहां संस्थागत और पेशेवर निवेशकों की भूमिका ज्यादा बड़ी है.
विश्लेषकों का मानना है कि कारोबार की लागत और प्रक्रियागत अड़चनें कम होने से भारत विदेशी संस्थागत निवेश और पैसिव इन्वेस्टमेंट के लिए ज्यादा आकर्षक बन सकता है.
9 महीने में लागू हो सकते हैं बदलाव
सूत्रों के अनुसार, सेबी उद्योग से सलाह लेने और बाजार से जुड़े संस्थानों को अपनी मौजूदा प्रणालियों में बदलाव के लिए समय देने के बाद करीब 9 महीने में इन सुधारों को लागू कर सकता है. हालांकि, कुछ बदलावों के शुरुआती चरण में बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ने की आशंका भी है.
हाल ही में डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट वाले शेयरों के क्लोजिंग प्राइस को तय करने के लिए शुरू की गई नई क्लोजिंग ऑक्शन व्यवस्था के शुरुआती दौर में निफ्टी में तेज उतार-चढ़ाव देखा गया था. बाजार निर्माताओं और निवेशकों की इसमें भागीदारी भी सीमित रही.
सिर्फ नियमों में बदलाव से नहीं लौटेंगे विदेशी निवेशक
विशेषज्ञों का कहना है कि बाजार को नई व्यवस्थाओं के अनुरूप ढलने में समय लगेगा. लंबी अवधि में प्रस्तावित सुधारों से कारोबार की लागत और प्रक्रियागत बाधाएं कम हो सकती हैं. हालांकि, सिर्फ ट्रेडिंग नियमों में बदलाव से विदेशी निवेशकों की बड़ी वापसी सुनिश्चित नहीं होगी. विदेशी निवेशक रुपये की चाल, भारतीय कंपनियों के वैल्यूएशन, आर्थिक वृद्धि और वैश्विक बाजार की परिस्थितियों जैसे कई अन्य कारकों को भी ध्यान में रखते हैं.
FSSAI का कहना है कि ऐसे दावे उपभोक्ताओं को भ्रमित कर सकते हैं और इन्हें वैज्ञानिक या तय मानकों के आधार पर साबित करना जरूरी है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) ने खाद्य उत्पादों की पैकेजिंग और विज्ञापनों में किए जाने वाले ‘100%’ दावों को लेकर कंपनियों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है. अथॉरिटी की कार्रवाई के बाद BONN BISCUITS, Zandu Honey, AMWAY INDIA और JUZA FOODS समेत पांच कंपनियों ने अपने प्रोडक्ट्स और प्रचार सामग्री से ‘100% Pure’, ‘100% Natural’ जैसे दावे हटा लिए हैं. FSSAI का कहना है कि ऐसे दावे उपभोक्ताओं को भ्रमित कर सकते हैं और इन्हें वैज्ञानिक या तय मानकों के आधार पर साबित करना जरूरी है.
‘100%’ दावों पर FSSAI की नजर
कंपनियां अपने खाद्य उत्पादों के पैकेट, लेबल, विज्ञापनों और अन्य प्रचार सामग्री में अक्सर ‘100% Pure’ या ‘100% Natural’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करती हैं. FSSAI के मुताबिक, इस तरह के दावे उपभोक्ताओं के मन में उत्पाद की शुद्धता या प्राकृतिक होने को लेकर ऐसी धारणा बना सकते हैं, जिसे हर मामले में प्रमाणित करना आसान नहीं होता.
अथॉरिटी लगातार खाद्य उत्पादों की पैकेजिंग और विज्ञापनों की निगरानी कर रही है. FSSAI का कहना है कि खाद्य पदार्थों से जुड़े दावे स्पष्ट, सटीक और ऐसे होने चाहिए जिन्हें उचित प्रमाण के साथ सत्यापित किया जा सके. ऐसी भाषा से बचना जरूरी है, जिससे ग्राहकों को गलत या बढ़ा-चढ़ाकर जानकारी मिलने की संभावना हो.
पांच कंपनियों ने हटाए दावे
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, FSSAI की कार्रवाई के बाद पांच कंपनियों ने अपने प्रोडक्ट्स और विज्ञापनों से ‘100%’ वाले दावे हटा लिए हैं. इनमें BONN BISCUITS, Zandu Honey, AMWAY INDIA और JUZA FOODS समेत अन्य कंपनी शामिल है. इन कंपनियों के उत्पादों की पैकेजिंग और प्रचार सामग्री में इस्तेमाल किए जा रहे दावों को लेकर FSSAI ने हस्तक्षेप किया था. इसके बाद कंपनियों ने संबंधित दावों को हटाने या उनमें बदलाव करने की प्रक्रिया अपनाई.
Dabur पर भी हुई थी कार्रवाई
‘100%’ दावों को लेकर FSSAI की कार्रवाई का सामना Dabur India भी कर चुकी है. अथॉरिटी ने कंपनी को कुछ खाद्य उत्पादों की बिक्री रोकने का निर्देश दिया था. इनमें शहद, एप्पल साइडर विनेगर, वर्जिन नारियल तेल, तिल का तेल, गाय का घी, नारियल पानी और नारियल दूध जैसे उत्पाद शामिल थे.
इनमें से कुछ उत्पादों पर ‘100% Natural’, ‘100% Pure’, ‘100% Purity Guaranteed’, ‘100% Organic’ और ‘100% Tender Coconut Water’ जैसे दावे किए गए थे. FSSAI की सख्ती के बाद कंपनियों के लिए ऐसे दावों के इस्तेमाल को लेकर नियमों के अनुरूप बदलाव करना जरूरी हो गया है.
ग्राहकों को भ्रमित करने वाले दावों पर सख्ती
FSSAI का रुख साफ है कि खाद्य उत्पादों की पैकेजिंग और विज्ञापनों में इस्तेमाल होने वाली भाषा उपभोक्ताओं को गुमराह करने वाली नहीं होनी चाहिए. खास तौर पर ‘100%’ जैसे पूर्ण दावों के लिए कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनका दावा संबंधित मानकों और प्रमाणों के आधार पर सही साबित किया जा सके.
14 अगस्त 2026 तक LIC के पास HDFC Bank की 4.11 फीसदी हिस्सेदारी थी. RBI की नई मंजूरी के बाद बीमा कंपनी अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर अधिकतम 9.99 फीसदी तक कर सकती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) अब HDFC Bank में अपनी हिस्सेदारी करीब 10 फीसदी तक बढ़ा सकता है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने LIC को बैंक की कुल पेड-अप शेयर कैपिटल या वोटिंग राइट्स में 9.99 फीसदी तक हिस्सेदारी खरीदने की मंजूरी दे दी है. 14 अगस्त 2026 तक LIC के पास HDFC Bank की 4.11 फीसदी हिस्सेदारी थी. ऐसे में नई मंजूरी के बाद LIC के पास बैंक के करीब 5.88 फीसदी अतिरिक्त शेयर खरीदने की गुंजाइश है.
19 अगस्त को RBI ने दी मंजूरी
HDFC Bank ने बुधवार, 19 अगस्त 2026 को शेयर बाजार को दी जानकारी में बताया कि RBI ने उसी दिन एक पत्र के जरिए LIC को हिस्सेदारी बढ़ाने की मंजूरी दी. LIC ने HDFC Bank में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए केंद्रीय बैंक के पास आवेदन किया था. हालांकि, यह मंजूरी कुछ शर्तों के साथ दी गई है. LIC को हिस्सेदारी बढ़ाते समय बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, 1949, RBI के 2025 के शेयरहोल्डिंग नियमों, FEMA, SEBI के नियमों और अन्य लागू कानूनों का पालन करना होगा.
अभी LIC के पास 4.11% हिस्सेदारी
14 अगस्त 2026 तक LIC के पास HDFC Bank की 4.11 फीसदी हिस्सेदारी थी. RBI की नई मंजूरी के बाद बीमा कंपनी अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर अधिकतम 9.99 फीसदी तक कर सकती है. यानी मौजूदा हिस्सेदारी के मुकाबले LIC करीब 5.88 फीसदी अतिरिक्त हिस्सेदारी खरीद सकती है.
HDFC Bank का प्रदर्शन कैसा रहा?
LIC को यह मंजूरी ऐसे समय मिली है जब HDFC Bank ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के नतीजे जारी किए हैं. अप्रैल-जून 2026 तिमाही में बैंक का स्टैंडअलोन नेट प्रॉफिट 19,059.72 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले साल की समान तिमाही के मुकाबले करीब 4.98 फीसदी अधिक है.
इस दौरान बैंक की नेट इंटरेस्ट इनकम (NII) 6.7 फीसदी बढ़कर 33,535.95 करोड़ रुपये हो गई. हालांकि, यह बाजार के 34,353 करोड़ रुपये के अनुमान से कम रही. बैंक का नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) कुल एसेट के आधार पर 3.26 फीसदी और ब्याज कमाने वाले एसेट के आधार पर 3.40 फीसदी रहा.
डिपॉजिट और लोन बुक में भी बढ़ोतरी
HDFC Bank के औसत डिपॉजिट में सालाना आधार पर 10.8 फीसदी की बढ़ोतरी हुई और यह 30,386 अरब रुपये पर पहुंच गया. वहीं, बैंक की कुल लोन बुक यानी एडवांस 13.3 फीसदी बढ़कर 30,115 अरब रुपये हो गई. हालांकि, बैंक की एसेट क्वालिटी में मामूली दबाव देखने को मिला. जून 2026 के अंत में बैंक का ग्रॉस NPA बढ़कर 1.17 फीसदी हो गया, जो मार्च 2026 में 1.15 फीसदी था.
बुधवार को सेंसेक्स 325.78 अंक यानी 0.42 फीसदी गिरकर 76,909.68 अंक पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 76.60 अंक यानी 0.32 फीसदी टूटकर 24,078.30 अंक पर आ गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में बुधवार को भी बिकवाली का दबाव बना रहा. सेंसेक्स लगातार चौथे कारोबारी सत्र में गिरावट के साथ बंद हुआ, जबकि निफ्टी की लगातार सातवें दिन कमजोरी जारी रही. पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के जरिए ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और रुपये की कमजोरी ने निवेशकों की धारणा पर असर डाला. अब गुरुवार को बाजार खुलने से पहले निवेशकों की नजर वैश्विक बाजारों, क्रूड ऑयल और डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल पर रहेगी.
बुधवार को 325 अंक टूटा सेंसेक्स
बुधवार को बीएसई का 30 शेयरों वाला सेंसेक्स 325.78 अंक यानी 0.42 फीसदी गिरकर 76,909.68 अंक पर बंद हुआ. कारोबार की शुरुआत भी कमजोर रही और सेंसेक्स 77,218.05 के स्तर पर खुला था. इससे पिछले कारोबारी सत्र में यह 77,235.46 अंक पर बंद हुआ था.
वहीं, एनएसई का निफ्टी 50 लगातार सातवें कारोबारी सत्र में गिरावट के साथ बंद हुआ. निफ्टी 76.60 अंक यानी 0.32 फीसदी टूटकर 24,078.30 अंक पर आ गया. बुधवार को निफ्टी ने 24,152.05 के स्तर पर कारोबार शुरू किया था, जबकि मंगलवार को यह 24,154.90 अंक पर बंद हुआ था.
आईटी और चुनिंदा शेयरों में खरीदारी
कमजोर बाजार के बीच सेंसेक्स के 30 में से 9 शेयर बढ़त के साथ बंद हुए. एचसीएल टेक में 1.73 फीसदी, इटरनल में 1.33 फीसदी, कोटक महिंद्रा बैंक में 1.23 फीसदी और सन फार्मा में 1.15 फीसदी की तेजी दर्ज की गई. टीसीएस, इंफोसिस और ट्रेंट समेत कुछ अन्य शेयरों में भी खरीदारी देखने को मिली.
पावरग्रिड, एलएंडटी और बजाज फाइनेंस पर बिकवाली
दूसरी ओर, सेंसेक्स के 21 शेयर गिरावट के साथ बंद हुए. पावरग्रिड में करीब 2 फीसदी की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई और शेयर 262.45 रुपये पर बंद हुआ. बजाज फाइनेंस 1.31 फीसदी, लार्सन एंड टूब्रो 1.27 फीसदी और आईटीसी 1.18 फीसदी टूटकर बंद हुए. एशियन पेंट्स और महिंद्रा एंड महिंद्रा के शेयरों में भी बिकवाली का दबाव देखने को मिला.
रुपया भी कमजोर, आज इन संकेतों से तय होगी बाजार की चाल
भारतीय रुपया बुधवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 0.1 फीसदी कमजोर होकर 95.75 के स्तर पर बंद हुआ. इससे पिछले कारोबारी सत्र में रुपया 95.68 के स्तर पर बंद हुआ था. गुरुवार को शेयर बाजार की दिशा तय करने में वैश्विक बाजारों का रुख, पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़ी गतिविधियां, कच्चे तेल की कीमतें और डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल अहम भूमिका निभाएंगी. लगातार कई कारोबारी सत्रों से जारी गिरावट के बाद निवेशकों की नजर इस बात पर भी रहेगी कि निचले स्तरों पर खरीदारी लौटती है या बाजार में बिकवाली का दबाव आगे भी बना रहता है.
इन शेयरों पर रहेगी नजर
गुरुवार के कारोबार में कई कंपनियों के शेयर अहम कॉरपोरेट अपडेट के चलते फोकस में रह सकते हैं. Amazon India ने वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर पर रेल के जरिए सामान की ढुलाई शुरू की है, जबकि Hexaware Technologies ने AI आधारित साइबर सिक्योरिटी समाधान लॉन्च किया है. Marvell Technology और Google ने चिप डेवलपमेंट से जुड़ी अपनी साझेदारी का विस्तार किया है.
HDFC Life को Vibha Padalkar और Niraj Shah की दोबारा नियुक्ति के लिए IRDAI की मंजूरी मिली है. वहीं, Aditya Infotech ने 1,500 करोड़ रुपये तक फंड जुटाने को मंजूरी दी है. Ramco Systems की अमेरिकी इकाई को Pem-Air से नया ऑर्डर मिला है, जबकि Dr Lal PathLabs ने उज्बेकिस्तान में नई कंपनी का गठन किया है.
ऑटो सेक्टर में Hyundai Motor India सितंबर से वाहनों की कीमतों में 1 फीसदी तक बढ़ोतरी कर सकती है. वहीं, Mahindra Lifespaces ने मुंबई के चेंबूर में एक बड़े रिडेवलपमेंट प्रोजेक्ट के लिए समझौता किया है. इसके अलावा Behari Lal Engineering और Shiprocket में बड़े संस्थागत निवेशकों की हिस्सेदारी खरीद से जुड़े घटनाक्रम भी इन शेयरों को चर्चा में रख सकते हैं.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
चार रेलवे मल्टीट्रैकिंग परियोजनाओं पर ₹9,450 करोड़ और बिहार के 83 किलोमीटर फोरलेन हाईवे कॉरिडोर पर ₹3,591 करोड़ खर्च होंगे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने देश में रेल और सड़क कनेक्टिविटी मजबूत करने के लिए कुल ₹13,041 करोड़ की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को मंजूरी दी है. इसमें पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में करीब 410 किलोमीटर लंबी चार रेलवे मल्टीट्रैकिंग परियोजनाएं और बिहार में 83 किलोमीटर लंबे फोरलेन हाईवे कॉरिडोर का विकास शामिल है.
इन परियोजनाओं का मुख्य उद्देश्य व्यस्त रेल मार्गों पर क्षमता की बाधाओं को दूर करना, माल ढुलाई को गति देना और बंदरगाहों, औद्योगिक केंद्रों, खनन क्षेत्रों तथा स्टील उत्पादन वाले इलाकों के बीच कनेक्टिविटी बेहतर करना है.
रेलवे परियोजनाओं पर ₹9,450 करोड़ का निवेश
चारों रेलवे परियोजनाओं पर कुल ₹9,450 करोड़ खर्च किए जाएंगे. इनमें से ज्यादातर परियोजनाएं हावड़ा-चेन्नई हाई डेंसिटी नेटवर्क (HDN) और कटक-पारादीप कॉरिडोर से जुड़ी हैं.
खड़गपुर-रानीताल के बीच बनेगी चौथी रेल लाइन
सबसे बड़ी परियोजना के तहत पश्चिम बंगाल के खड़गपुर से ओडिशा के रानीताल के बीच 173 किलोमीटर लंबी चौथी रेल लाइन बनाई जाएगी. इस पर करीब ₹3,352 करोड़ खर्च होंगे. यह रेलखंड पश्चिम मेदिनीपुर, बालेश्वर और भद्रक से होकर गुजरता है और हावड़ा-चेन्नई हाई डेंसिटी नेटवर्क का हिस्सा है. इस मार्ग पर यात्री और मालगाड़ी दोनों का भारी दबाव रहता है.
परियोजना में दो बड़े पुल समेत 41 प्रमुख और 169 छोटे पुल बनाए जाएंगे. इनमें सुवर्णरेखा नदी पर 564 मीटर लंबा पुल भी शामिल है. नई लाइन से जखापुरा, टाटानगर और दुर्गापुर जैसे स्टील उत्पादक केंद्रों की पारादीप और धामरा बंदरगाहों से कनेक्टिविटी मजबूत होगी.
भद्रक-हरिदासपुर में चौथी लाइन
ओडिशा में भद्रक और हरिदासपुर के बीच 75 किलोमीटर लंबी चौथी रेल लाइन के निर्माण को भी मंजूरी मिली है. इस परियोजना की अनुमानित लागत ₹1,583 करोड़ है. भद्रक और जाजपुर जिलों से गुजरने वाला यह रेलखंड फिलहाल करीब 91 प्रतिशत क्षमता पर चल रहा है. अतिरिक्त लाइन से स्टील उत्पादक केंद्रों और पूर्वी तट के बंदरगाहों के बीच माल ढुलाई को बढ़ावा मिलेगा.
सरकार का अनुमान है कि इससे हर साल करीब 2.9 करोड़ टन अतिरिक्त माल ढुलाई की क्षमता पैदा होगी और लॉजिस्टिक्स लागत में लगभग ₹433 करोड़ सालाना की बचत हो सकती है.
गुम्मिडीपुंडी-गुडूर में तीसरी और चौथी लाइन
तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के बीच 90 किलोमीटर लंबे गुम्मिडीपुंडी-गुडूर रेलखंड पर तीसरी और चौथी लाइन बनाई जाएगी. इस परियोजना पर करीब ₹2,229 करोड़ खर्च होंगे. यह मार्ग दिल्ली-चेन्नई और हावड़ा-चेन्नई दोनों हाई डेंसिटी नेटवर्क का हिस्सा है. यह विशाखापत्तनम-चेन्नई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर और प्रस्तावित ईस्ट कोस्ट इकोनॉमिक कॉरिडोर से भी जुड़ा है.
मौजूदा क्षमता के 131 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है. नई लाइनों से चेन्नई, कामराजार (एन्नोर) और कृष्णापट्टनम बंदरगाहों की कनेक्टिविटी बेहतर होगी और सालाना करीब 2.1 करोड़ टन अतिरिक्त माल ढुलाई क्षमता बढ़ेगी.
रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव के मुताबिक, इस परियोजना से करीब 61 लाख मानव-दिवस का रोजगार पैदा होने की उम्मीद है. अतिरिक्त माल ढुलाई से हर साल करीब 17 करोड़ किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी आ सकती है.
कटक-पारादीप रेलखंड का भी होगा विस्तार
ओडिशा में 72 किलोमीटर लंबे कटक-पारादीप रेलखंड के लिए ₹2,286 करोड़ की परियोजना को मंजूरी दी गई है. इसके तहत तीसरी और चौथी रेल लाइन बनाई जाएगी. इससे पारादीप बंदरगाह को कटक के पास हावड़ा-चेन्नई हाई डेंसिटी नेटवर्क से बेहतर तरीके से जोड़ा जा सकेगा. साथ ही कलिंगानगर स्टील क्लस्टर, क्योंझर की लौह अयस्क खदानों और तालचेर के कोयला क्षेत्रों तक कनेक्टिविटी मजबूत होगी.
मौजूदा रेलखंड करीब 101 प्रतिशत क्षमता पर चल रहा है और औद्योगिक व बंदरगाह गतिविधियों के बढ़ने के साथ इसके 177 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है. परियोजना से सालाना 1.2 करोड़ टन अतिरिक्त माल ढुलाई क्षमता जुड़ने और लॉजिस्टिक्स लागत में करीब ₹173 करोड़ की सालाना बचत होने की उम्मीद है.
बढ़ती परिवहन मांग के बीच रेल क्षमता पर जोर
रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि भारत में परिवहन की मांग हर साल करीब 10 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है. ऐसे में रेलवे, सड़क, हवाई और जल परिवहन सभी क्षेत्रों में क्षमता बढ़ाने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि अतिरिक्त रेल क्षमता का उद्देश्य सिर्फ अधिक ट्रेनों को चलाना नहीं है, बल्कि ट्रेनों की औसत गति और सुरक्षा में भी सुधार करना है. पिछले एक दशक में करीब 81 प्रतिशत रेलवे ट्रैक को अपग्रेड किया गया है, जबकि रेलवे नेटवर्क का 99.6 प्रतिशत विद्युतीकरण हो चुका है.
सड़क के मुकाबले रेल से माल ढुलाई सस्ती
वैष्णव ने परिवहन के अलग-अलग माध्यमों की लागत का भी उल्लेख किया. उनके अनुसार, समुद्री मार्ग से माल ढुलाई की संकेतात्मक लागत करीब 55 पैसे प्रति टन-किलोमीटर है, जबकि रेल से यह करीब ₹1.60 और सड़क से करीब ₹3.60 प्रति टन-किलोमीटर है.
लागत में इस अंतर से औद्योगिक और बंदरगाह आधारित कॉरिडोर में माल ढुलाई को सड़क से रेल की ओर स्थानांतरित करने में मदद मिल सकती है. रेल परिवहन पर्यावरण की दृष्टि से भी सड़क परिवहन की तुलना में बेहतर है.
बिहार में ₹3,591 करोड़ का फोरलेन हाईवे
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बिहार में मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी और सोनबरसा के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग-22 पर 83 किलोमीटर लंबे फोरलेन ब्राउनफील्ड कॉरिडोर के विकास को भी मंजूरी दी है. इस परियोजना पर ₹3,591 करोड़ खर्च किए जाएंगे.
परियोजना को हाइब्रिड एन्युइटी मोड (HAM) के तहत लागू किया जाएगा और इसके निर्माण में करीब 30 महीने लगने की उम्मीद है. इसमें सात बड़े पुल, तीन रोड ओवरब्रिज और छह व्हीकल अंडरपास बनाए जाएंगे. बागमती नदी पर 340 मीटर लंबा पुल भी परियोजना का हिस्सा होगा.
मुजफ्फरपुर-सोनबरसा सफर का समय आधा होने की उम्मीद
फोरलेन कॉरिडोर तैयार होने के बाद मुजफ्फरपुर से सोनबरसा के बीच यात्रा का समय करीब दो घंटे से घटकर एक घंटे रह सकता है. इससे जाम कम करने और वाहनों की परिचालन लागत घटाने में भी मदद मिलेगी. यह कॉरिडोर पांच पीएम गति शक्ति आर्थिक नोड, चार सामाजिक नोड और दो लॉजिस्टिक्स नोड को जोड़ेगा.
चार साल में पूरी होंगी रेलवे परियोजनाएं
₹13,041 करोड़ के कुल निवेश में रेलवे की चार परियोजनाओं पर ₹9,450 करोड़ और बिहार हाईवे परियोजना पर ₹3,591 करोड़ खर्च होंगे. रेलवे परियोजनाओं को चार साल में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है, जबकि बिहार हाईवे कॉरिडोर का निर्माण 30 महीने में पूरा होने की उम्मीद है. इन परियोजनाओं से प्रमुख रेल मार्गों की क्षमता बढ़ाने के साथ बंदरगाहों, खदानों, औद्योगिक क्लस्टरों और अन्य माल उत्पादक केंद्रों के बीच कनेक्टिविटी बेहतर होने की उम्मीद है.
5.625% की फिक्स्ड कूपन दर वाले तीन साल के बॉन्ड 2029 में होंगे मैच्योर, वैश्विक संस्थागत निवेशकों ने लिया हिस्सा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आईडीएफसी फर्स्ट बैंक (IDFC FIRST Bank) ने अंतरराष्ट्रीय डेट कैपिटल मार्केट में अपनी शुरुआत करते हुए 500 मिलियन डॉलर के तीन वर्षीय फिक्स्ड रेट सीनियर नोट्स की सफलतापूर्वक कीमत तय कर आवंटन किया है. ये बॉन्ड 2029 में मैच्योर होंगे और इन पर 5.625% की फिक्स्ड कूपन दर होगी. बॉन्ड को अमेरिका के बाहर के निवेशकों के बीच रेगुलेशन एस (Regulation S) फॉर्मेट में रखा गया.
बैंक ने यह बॉन्ड GIFT City स्थित अपनी IFSC Banking Unit के माध्यम से जारी किए हैं. यह IDFC FIRST Bank का पहला अंतरराष्ट्रीय बॉन्ड इश्यू है और इसके साथ बैंक ने वैश्विक डेट कैपिटल मार्केट में प्रवेश किया है.
S&P की इन्वेस्टमेंट-ग्रेड रेटिंग के बाद पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय इश्यू
यह इश्यू S&P Global Ratings की ओर से 13 अगस्त 2026 को बैंक को दी गई ‘BBB-’ लॉन्ग-टर्म इश्यूअर क्रेडिट रेटिंग और स्टेबल आउटलुक के बाद आया है. बैंक के मुताबिक, इस रेटिंग ने अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के बीच उसके वित्तीय प्रदर्शन और क्रेडिट प्रोफाइल को लेकर भरोसा मजबूत करने में मदद की.
बॉन्ड इश्यू में BlackRock, Capital Group और AllianceBernstein समेत कई प्रमुख वैश्विक संस्थागत निवेशकों ने हिस्सा लिया. बैंक ने कहा कि इन निवेशकों की भागीदारी उसकी वित्तीय मजबूती, बढ़ते कारोबार, सतर्क जोखिम प्रबंधन और लंबी अवधि की संभावनाओं में मजबूत भरोसे को दर्शाती है.
मजबूत हुआ बैंक का बैलेंस शीट
पिछले कुछ वर्षों में IDFC FIRST Bank ने अपने बैलेंस शीट को मजबूत किया है. बैंक ने रिटेल डिपॉजिट का व्यापक आधार तैयार करने के साथ लाभप्रदता में सुधार और एसेट क्वालिटी को मजबूत बनाए रखने पर जोर दिया है. इसके साथ ही बैंक टेक्नोलॉजी, डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क और कस्टमर सर्विस में लगातार निवेश कर रहा है. बैंक के अनुसार, इस बॉन्ड इश्यू से उसकी फंडिंग के स्रोतों में विविधता आएगी और अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजार से धन जुटाने का एक नया माध्यम तैयार होगा.
IDFC FIRST Bank के चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर और हेड-कॉरपोरेट सेंटर सुधांशु जैन ने कहा कि यह बैंक के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है. उन्होंने कहा कि पहली अंतरराष्ट्रीय बॉन्ड बिक्री में दुनिया के प्रमुख संस्थागत निवेशकों की मजबूत भागीदारी बैंक के फ्रेंचाइजी की मजबूती, बैलेंस शीट की मजबूती और पिछले कुछ वर्षों में हुई प्रगति को लेकर बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता को दर्शाती है.
उन्होंने कहा कि बैंक अपने निवेशकों के भरोसे और विश्वास के लिए आभारी है. यह इश्यू बैंक के फंडिंग स्रोतों में विविधता लाने, वैश्विक पूंजी बाजार तक पहुंच बढ़ाने और लंबी अवधि के विकास लक्ष्यों को समर्थन देने में मदद करेगा.
रिटेल से कॉरपोरेट बैंकिंग तक सेवाएं
IDFC FIRST Bank रिटेल, MSME, ग्रामीण बैंकिंग, स्टार्टअप, कॉरपोरेट बैंकिंग, कैश मैनेजमेंट, क्रेडिट कार्ड, वेल्थ मैनेजमेंट, डिपॉजिट, सरकारी बैंकिंग, वर्किंग कैपिटल, ट्रेड फाइनेंस और ट्रेजरी समेत कई तरह की बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध कराता है. बैंक का कहना है कि वह एथिकल, डिजिटल और सोशल गुड बैंकिंग के सिद्धांतों पर आधारित विश्वस्तरीय बैंक बनाने की दिशा में काम कर रहा है. बैंक ने डिजिटल बैंकिंग के लिए क्लाउड-नेटिव, API-आधारित और माइक्रोसर्विस आर्किटेक्चर पर आधारित टेक्नोलॉजी स्टैक तैयार किया है, जिसमें डेटा, एनालिटिक्स और AI का इस्तेमाल किया जाता है.
सामाजिक क्षेत्र में भी निवेश
बैंक के अनुसार, उसकी विभिन्न पहलों से 4 करोड़ से अधिक लोगों के जीवन पर असर पड़ा है, जिनमें 36 लाख महिला उद्यमी शामिल हैं. बैंक ने लैपटॉप, वॉशिंग मशीन और रेफ्रिजरेटर जैसी जीवनशैली सुधारने वाली जरूरतों के लिए 75 लाख से अधिक लोन दिए हैं. इसके अलावा बैंक ने 2.5 लाख इलेक्ट्रिक दोपहिया और तिपहिया वाहनों, 2.7 लाख पानी, स्वच्छता और हाइजीन लोन तथा 20 लाख आजीविका संबंधी लोन को वित्तपोषित किया है. बैंक ने 3 लाख से अधिक MSME को भी वित्तीय सहायता दी है.
छोटे और मध्यम उद्यमों की लिस्टिंग व्यवस्था में ट्रेडिंग, मार्केट मेकिंग और मेन बोर्ड में माइग्रेशन से जुड़े नियमों की होगी समीक्षा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) छोटे और मध्यम उद्यमों (SME) की लिस्टिंग व्यवस्था में व्यापक बदलाव की तैयारी कर रहा है. इसके साथ ही वित्तीय बाजारों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मशीन लर्निंग (ML) के इस्तेमाल को लेकर संस्थाओं की जवाबदेही भी स्पष्ट की जाएगी. सेबी के चेयरमैन तुहिन कांत पांडेय ने कहा कि SME प्लेटफॉर्म से जुड़े कई पहलुओं की समीक्षा की जा रही है और जल्द ही व्यापक सुधारों के लिए कंसल्टेशन पेपर जारी किया जाएगा.
SME प्लेटफॉर्म पर इन नियमों की होगी समीक्षा
मुंबई में फिक्की के सालाना कैपिटल मार्केट्स कॉन्फ्रेंस के दौरान पांडेय ने कहा कि सेबी SME प्लेटफॉर्म पर ट्रेडिंग, मार्केट मेकिंग, अंडरराइटिंग और कंपनियों के मेन बोर्ड में माइग्रेशन से जुड़े मौजूदा नियमों की कमियों की समीक्षा कर रहा है.
सेबी के सामने SME प्लेटफॉर्म पर बनने वाले ‘ऑड लॉट’ भी चिंता का विषय हैं. इससे निवेशकों के लिए शेयरों में कारोबार करना मुश्किल हो सकता है. पांडेय के मुताबिक, रिटेल निवेशकों की भागीदारी को नियंत्रित करने के लिए ट्रेडिंग लॉट और एप्लीकेशन साइज बढ़ाने जैसे कदम अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाए हैं.
मार्केट मेकिंग और अंडरराइटिंग में भी बदलाव की जरूरत
सेबी चेयरमैन ने कहा कि SME प्लेटफॉर्म पर मार्केट मेकिंग की मौजूदा व्यवस्था प्रभावी ढंग से काम नहीं कर रही है. इससे SME कंपनियों की लागत भी बढ़ रही है. अंडरराइटिंग व्यवस्था में बदलाव की जरूरत के साथ-साथ मेन बोर्ड में माइग्रेशन और पेड-अप कैपिटल से जुड़ी आवश्यकताओं की भी समीक्षा की जाएगी. उन्होंने कहा कि सेबी व्यापक सुधारों का प्रस्ताव तैयार करेगा और इस संबंध में कंसल्टेशन पेपर जारी किया जाएगा.
AI-ML के इस्तेमाल पर संस्थाओं की जवाबदेही तय होगी
वित्तीय बाजार में AI और ML के बढ़ते इस्तेमाल को देखते हुए सेबी इनके जिम्मेदार इस्तेमाल के लिए नए दिशानिर्देश तैयार कर रहा है. सेबी के मुताबिक, तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाने के साथ यह स्पष्ट करना जरूरी है कि AI या ML से जुड़े किसी फैसले या सिस्टम की जिम्मेदारी किसकी होगी.
प्रस्तावित व्यवस्था के तहत सेबी के दायरे में आने वाली प्रत्येक संस्था अपने इस्तेमाल किए जाने वाले AI या ML टूल के लिए जिम्मेदार होगी. यह जिम्मेदारी इस बात से प्रभावित नहीं होगी कि टूल संस्था ने खुद विकसित किया है या किसी तीसरी पार्टी से लिया है.
डेटा की सुरक्षा और AI के नतीजों की भी जिम्मेदारी
AI-ML से जुड़े प्रस्तावित नियमों में निवेशकों के डेटा की प्राइवेसी, सुरक्षा और प्रमाणिकता के साथ-साथ AI सिस्टम से मिलने वाले नतीजों की जवाबदेही भी शामिल होगी. सेबी अलग-अलग स्तरों के लिए जिम्मेदारी और निगरानी से जुड़े स्पष्ट नियम बनाने की तैयारी में है. प्रस्तावित व्यवस्था में ‘किल स्विच’ और ‘ह्यूमन इन द लूप’ जैसे सुरक्षा उपायों को भी शामिल किया जा सकता है. इसके अलावा डेटा पर नियंत्रण की व्यवस्था पर भी जोर दिया जाएगा, ताकि तकनीकी नवाचार और निवेशकों की सुरक्षा के बीच संतुलन कायम रहे.
संदिग्ध वित्तीय प्रचार की निगरानी में AI का इस्तेमाल
सेबी संदिग्ध वित्तीय प्रचार और संभावित रूप से भ्रामक विज्ञापनों की पहचान के लिए AI का इस्तेमाल कर रहा है. इसके लिए ‘प्रोजेक्ट सुदर्शन’ और ‘R(AI)DAR’ जैसी पहल का उपयोग किया जा रहा है. इसके अलावा मार्केट इकोसिस्टम में सूचनाओं के आदान-प्रदान और साइबर सुरक्षा को मजबूत करने के लिए सेबी ने साइबर सुरक्षा पोर्टल भी बनाया है.
LODR और डीलिस्टिंग फ्रेमवर्क की भी समीक्षा
SME लिस्टिंग और AI-ML नियमों के अलावा सेबी लिस्टिंग ऑब्लिगेशन्स एंड डिस्क्लोजर रिक्वायरमेंट्स (LODR) और डीलिस्टिंग फ्रेमवर्क की भी समीक्षा कर रहा है. वहीं, रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (REITs) और इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (InvITs) के लिए भी कुछ नियमों में बदलाव पर विचार किया जा रहा है. इनमें निर्धारित सीमाओं के भीतर निर्माणाधीन परियोजनाओं में निवेश की अनुमति को अधिक लचीला बनाने का प्रस्ताव शामिल हो सकता है.
दिल्ली पुलिस की EOW की FIR में Sammaan Capital को कथित लेनदेन का पीड़ित बताया गया, कंपनी ने कहा- पांच समूहों को दिए गए सभी ऋण की राशि वापस मिल चुकी है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सम्मान कैपिटल (Sammaan Capital) से जुड़े कथित लेनदेन के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को जांच के निर्देश दिए हैं. इससे पहले दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) इस मामले में FIR दर्ज कर चुकी है, जिसमें कंपनी के पूर्व प्रमोटर समीर गहलोत समेत कई कारोबारी समूहों के नाम आरोपी के तौर पर शामिल हैं. सम्मान कैपिटल ने कहा है कि कंपनी इस FIR में आरोपी नहीं है और उसे कथित लेनदेन का पीड़ित माना गया है.
सम्मान कैपिटल के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दिल्ली पुलिस की EOW ने 15 दिसंबर 2025 को FIR दर्ज की थी. इस FIR में Indiabulls Housing Finance Ltd. (IHFL) के पूर्व प्रमोटर समीर गहलोत, DLF Group, Vatika Group, Americorp Group, Chordia Group और Reliance ADAG Group को आरोपी बनाया गया था.
सम्मान कैपिटल को कथित लेनदेन का पीड़ित बताया गया
कंपनी ने स्पष्ट किया कि सम्मान कैपिटल इस FIR में आरोपी नहीं है. कंपनी के अनुसार, जांच में उसे संबंधित उधारकर्ता समूहों, समीर गहलोत और उनकी प्रमोटर इकाइयों के बीच कथित ‘क्विड प्रो क्वो’ यानी कथित लेनदेन व्यवस्था का संभावित पीड़ित माना गया है.
कंपनी ने बताया कि 11 अगस्त 2026 को दिल्ली पुलिस की EOW ने इस FIR में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक स्टेटस रिपोर्ट दाखिल की. इस रिपोर्ट में कहा गया कि PIL में जिन पांच समूहों का उल्लेख किया गया था, उन्हें दिए गए ऋण से संबंधित पूरी राशि सम्मान कैपिटल को वापस मिल चुकी है.
इसके बाद मामले को रिकॉर्ड पर लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने CBI को EOW द्वारा दर्ज FIR में लगाए गए आरोपों की जांच करने को कहा. कंपनी ने दोहराया कि इस FIR में भी सम्मान कैपिटल आरोपी नहीं है.
Yes Bank और IHFL के पूर्व प्रमोटरों से जुड़े लेनदेन की भी जांच
सम्मान कैपिटल ने कहा कि CBI अलग से Yes Bank Ltd. के प्रमोटरों की कंपनियों और IHFL के पूर्व प्रमोटर समीर गहलोत की कंपनियों के बीच हुए लेनदेन की जांच कर रही है. कंपनी के मुताबिक, इस जांच में भी सम्मान कैपिटल के खिलाफ कोई जांच नहीं चल रही है. कंपनी ने कहा कि CBI की ओर से दायर आवेदन केवल समीर गहलोत, उनकी प्रमोटर कंपनियों और राणा कपूर से जुड़े आरोपों की जांच तक सीमित है.
सात वर्षों में किसी एजेंसी को नहीं मिला कोई उल्लंघन
सम्मान कैपिटल ने दावा किया कि पिछले सात वर्षों के दौरान PIL में लगाए गए आरोपों से जुड़े मामलों में उसे किसी भी तरह की गड़बड़ी से मुक्त पाया गया है. कंपनी के अनुसार, मामले की जांच करने वाली विभिन्न वैधानिक एजेंसियों को PIL में लगाए गए आरोपों के अनुरूप कोई उल्लंघन नहीं मिला.
कंपनी के मुताबिक, इस मामले को देखने वाली एजेंसियों में कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय (MCA), नेशनल हाउसिंग बैंक (NHB), भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI), भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) शामिल हैं. सम्मान कैपिटल ने कहा कि PIL में लगाए गए आरोपों से उत्पन्न किसी भी जांच में उसे किसी एजेंसी द्वारा आरोपी नहीं बनाया गया है.
2023 से समीर गहलोत से कोई संबंध नहीं
कंपनी ने यह भी कहा कि समीर गहलोत द्वारा 2023 में कंपनी के प्रमोटर पद से हटने और अपनी पूरी हिस्सेदारी बेचने के बाद से सम्मान कैपिटल का उनसे कोई संबंध नहीं है. कंपनी ने बताया कि अब उसका संचालन एक नए प्रमोटर, अबू धाबी स्थित International Holding Company PJSC (IHC), के तहत हो रहा है. कंपनी के अनुसार, IHC ने सम्मान कैपिटल में 1 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है. इसे भारतीय NBFC क्षेत्र के सबसे बड़े प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) सौदों में से एक बताया गया है. कंपनी ने कहा कि IHC अब उसके बोर्ड पर नियंत्रण रखता है.
एसबीआई रिसर्च का अनुमान, FY27 में भारत का बैलेंस ऑफ पेमेंट्स 50 अरब डॉलर के सरप्लस में रह सकता है; मजबूत विदेशी पूंजी प्रवाह से बाहरी मोर्चे पर अर्थव्यवस्था को मिलेगा सहारा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी खबर है. एसबीआई रिसर्च के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) में भारत का बैलेंस ऑफ पेमेंट्स (BoP) करीब 50 अरब डॉलर के सरप्लस में रह सकता है. इसका मतलब है कि देश में बाहर जाने वाली विदेशी मुद्रा के मुकाबले आने वाली विदेशी मुद्रा अधिक रहेगी. रिपोर्ट के मुताबिक, इससे चालू खाता घाटा (CAD) जीडीपी के करीब 1 फीसदी तक सीमित रह सकता है और भारत की बाहरी वित्तीय स्थिति मजबूत बनी रहेगी.
विदेशी मुद्रा का बढ़ता प्रवाह
एसबीआई रिसर्च के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए किए गए उपायों से देश में विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़ा है. FCNR(B) डिपॉजिट से जुड़े उपायों के तहत अब तक करीब 57 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा जुटाई जा चुकी है.
रिपोर्ट का अनुमान है कि अगस्त के बाकी दिनों में 25 से 30 अरब डॉलर का अतिरिक्त प्रवाह हो सकता है. ऐसे में कुल राशि करीब 85 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है. RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) भी भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) के मजबूत प्रवाह का उल्लेख कर चुकी है. इससे देश की बाहरी वित्तीय स्थिति को मजबूती मिली है.
विदेशी मुद्रा जुटाने की लागत कितनी?
विदेशी मुद्रा जुटाने के साथ उसकी हेजिंग और प्रबंधन की लागत भी जुड़ी होती है. इसको लेकर बाजार में चिंता जताई जा रही थी, लेकिन एसबीआई रिसर्च के मुताबिक यह लागत भारत के लिए बड़ी चिंता नहीं है. रिपोर्ट के अनुसार, पांच साल की कुल हेजिंग लागत करीब 10.5 अरब डॉलर हो सकती है. यह भारत के करीब 700 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार का लगभग 1.45 फीसदी है. यानी विदेशी मुद्रा भंडार के मुकाबले यह लागत सीमित है.
रुपये को मिल सकता है सहारा
विदेशी मुद्रा के मजबूत प्रवाह का असर रुपये की स्थिति पर भी पड़ सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक, FCNR(B) से जुड़े उपायों के बाद रुपये में करीब 0.1 फीसदी की मजबूती आई है. एसबीआई रिसर्च का अनुमान है कि अगस्त के अंत तक रुपया 95 से 95.5 रुपये प्रति डॉलर के दायरे में रह सकता है. रुपये में स्थिरता से आयात लागत को नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है. खासकर कच्चे तेल और अन्य जरूरी आयात महंगे होने की स्थिति में मजबूत रुपया अर्थव्यवस्था पर दबाव कम करने में मददगार हो सकता है.
कच्चे तेल की कीमत बनी चुनौती
हालांकि, वैश्विक स्तर पर कई जोखिम अभी भी बने हुए हैं. अमेरिका में 30 साल की ट्रेजरी यील्ड करीब 5.3 फीसदी तक पहुंच गई है. वहीं, होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का जोखिम बना हुआ है. ब्रेंट क्रूड के 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने की आशंका भी जताई जा रही है. भारत अपनी जरूरत के बड़े हिस्से के लिए कच्चे तेल का आयात करता है. ऐसे में तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी से देश के आयात बिल और चालू खाते पर दबाव बढ़ सकता है.
विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की बढ़ी हिस्सेदारी
वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय रिजर्व बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता पर भी जोर दे रहा है. इसी रणनीति के तहत विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़ी है. वित्त वर्ष 2025-26 में विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी 16.7 फीसदी के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई थी. 7 अगस्त तक यह करीब 15.38 फीसदी रही. सोने का बढ़ता भंडार वैश्विक आर्थिक और वित्तीय संकट की स्थिति में भारत के लिए सुरक्षा कवच का काम कर सकता है.
कुल मिलाकर, मजबूत विदेशी पूंजी प्रवाह, बढ़ता विदेशी मुद्रा भंडार और बैलेंस ऑफ पेमेंट्स में संभावित सरप्लस भारत की बाहरी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर सकते हैं. हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक वित्तीय बाजारों में उतार-चढ़ाव जैसे जोखिमों पर भी नजर बनाए
अमेजन सेलर सर्विसेज ने पहली बार दर्ज किया 172 करोड़ रुपये का सकारात्मक PBIT, टैक्स के बाद घाटा भी घटा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अमेजन के भारत में मार्केटप्लेस कारोबार ने वित्त वर्ष 2025-26 (FY26) में अहम उपलब्धि हासिल की है. अमेजन सेलर सर्विसेज ने इस दौरान पहली बार ब्याज और टैक्स से पहले मुनाफा (PBIT) दर्ज किया है. कंपनी का PBIT 172 करोड़ रुपये रहा. वहीं, कंपनी की कुल आय सालाना आधार पर 15.5 फीसदी बढ़कर 35,574 करोड़ रुपये हो गई, जो पिछले वित्त वर्ष में 30,805 करोड़ रुपये थी.
यह प्रदर्शन भारत में अमेजन के मुख्य मार्केटप्लेस कारोबार में लगातार हो रही वृद्धि को दर्शाता है. कंपनी ने FY25 में पहली बार सकारात्मक EBITDA दर्ज किया था और अब FY26 में सकारात्मक PBIT हासिल किया है.
टैक्स के बाद घाटा भी हुआ कम
अमेजन सेलर सर्विसेज ने FY26 में टैक्स के बाद अपने घाटे को भी कम किया है. कंपनी का घाटा घटकर 389.9 करोड़ रुपये रह गया, जबकि FY25 में यह 408.2 करोड़ रुपये था. खास बात यह है कि कंपनी ने यह सुधार ऐसे समय में दर्ज किया है, जब अमेजन भारत में ई-कॉमर्स के साथ-साथ क्विक कॉमर्स, क्लाउड और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निवेश कर रही है.
PBIT में मुनाफे और टैक्स के बाद घाटे में कमी से संकेत मिलता है कि भारत में अमेजन के मार्केटप्लेस कारोबार की परिचालन स्थिति में सुधार हो रहा है. हालांकि, कंपनी अभी भी विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च को प्राथमिकता दे रही है.
भारत में 48 अरब डॉलर निवेश की योजना
अमेजन ने 2026 से 2030 के बीच भारत में 48 अरब डॉलर के निवेश की योजना बनाई है. इसके साथ ही 2010 से भारत में कंपनी का कुल निवेश दशक के अंत तक 88 अरब डॉलर से अधिक पहुंचने की उम्मीद है. यह निवेश मुख्य रूप से अमेजन के ई-कॉमर्स और क्विक-कॉमर्स फुलफिलमेंट नेटवर्क के विस्तार के साथ-साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर की क्षमता बढ़ाने में किया जाएगा.
क्विक कॉमर्स पर बढ़ा फोकस
अमेजन भारत के तेजी से बढ़ते क्विक-कॉमर्स बाजार में भी अपनी मौजूदगी मजबूत कर रही है. कंपनी ‘अमेजन नाउ’ के जरिए इस क्षेत्र में विस्तार कर रही है. कंपनी के मुताबिक, अमेजन नाउ भारत में उसका सबसे तेजी से बढ़ने वाला ई-कॉमर्स बिजनेस यूनिट है और लॉन्च के बाद से इसके ऑर्डर हर तिमाही दोगुने हो रहे हैं. कंपनी इस सेवा का विस्तार 300 से अधिक शहरों में कर रही है.
इसके जरिए अमेजन किराना और रोजमर्रा की जरूरत के सामान के बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रही है, जहां उसे पहले से मौजूद क्विक-कॉमर्स कंपनियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा मिल रही है.
सेलर्स के लिए कम की फीस
अमेजन अपने प्लेटफॉर्म पर विक्रेताओं की लागत कम करने पर भी ध्यान दे रही है. मार्च में कंपनी ने 1,000 रुपये से कम कीमत वाले 12.5 करोड़ से अधिक उत्पादों पर जीरो रेफरल फीस का दायरा बढ़ाया था. यह सुविधा 1,800 से अधिक कैटेगरी में लागू की गई.
इसके अलावा 300 रुपये से कम कीमत वाले उत्पादों के लिए ईजी शिप फीस में 20 फीसदी से अधिक की कटौती की गई. अमेजन के अनुसार, इन बदलावों से विक्रेताओं को फीस में 70 फीसदी तक की बचत हो सकती है.
एआई से सेलर्स को मिलेगी मदद
कंपनी ने भारत में एआई आधारित सेलर असिस्टेंट भी पेश किया है. यह टूल विक्रेताओं को प्रोडक्ट लिस्टिंग, इन्वेंट्री मैनेजमेंट, बिजनेस इनसाइट्स और ग्लोबल एक्सपेंशन जैसे कामों में मदद करता है. यह टूल अंग्रेजी और हिंग्लिश में उपलब्ध है और अमेजन के एआई इंफ्रास्ट्रक्चर पर आधारित है.
FY26 के नतीजे अमेजन के भारत में मार्केटप्लेस कारोबार के लिए महत्वपूर्ण मील का पत्थर हैं. आय में मजबूत वृद्धि, पहली बार सकारात्मक PBIT और लगातार बढ़ते निवेश से संकेत मिलता है कि कंपनी भारत में ई-कॉमर्स, क्विक कॉमर्स और टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम को और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रही है.
DRDO ने मिसाइल और बम वेपन सिस्टम के लिए निजी कंपनियों से मांगे आवेदन, ‘डेवलपमेंट-कम-प्रोडक्शन पार्टनर’ मॉडल के तहत होगा चयन
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है. रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने पहली बार रणनीतिक हथियारों और मिसाइल प्रणालियों के निर्माण में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने की पहल की है. इसके तहत निजी कंपनियों से मिसाइल और बम वेपन सिस्टम विकसित करने और उत्पादन के लिए आवेदन मांगे गए हैं. इस कदम से आधुनिक हथियारों का विकास और बड़े पैमाने पर उत्पादन तेजी से करने में मदद मिलने की उम्मीद है.
निजी कंपनियों को मिलेगा रणनीतिक हथियारों के विकास का मौका
DRDO के मिसाइल एवं रणनीतिक सिस्टम विभाग ने भविष्य की महत्वपूर्ण रक्षा परियोजनाओं के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) जारी किया है. इसके तहत अग्नि सीरीज जैसी मिसाइलों से लेकर पनडुब्बी से लॉन्च होने वाली परमाणु हथियार प्रणालियों के नए वैरिएंट विकसित किए जाने की योजना है.
अब तक इन संवेदनशील हथियार प्रणालियों के निर्माण में सरकारी कंपनियों की प्रमुख भूमिका रही है. भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम इनके उत्पादन से जुड़े रहे हैं. नई व्यवस्था में निजी क्षेत्र को भी इन परियोजनाओं में भागीदार बनाया जाएगा. टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (TASL) और सोलर एयरोस्पेस एंड डिफेंस जैसी कंपनियों की इस तरह की परियोजनाओं में भागीदारी की संभावना है.
कंपनियों के लिए तय किए गए सख्त मानक
रणनीतिक हथियारों के निर्माण से जुड़ी इन परियोजनाओं में भाग लेना निजी कंपनियों के लिए आसान नहीं होगा. DRDO ने कंपनियों के लिए तकनीकी और वित्तीय योग्यता से जुड़े कड़े मानक तय किए हैं. आवेदक कंपनियों के पास रक्षा निर्माण से संबंधित इंडस्ट्रियल लाइसेंस होना जरूरी होगा. इसके साथ ही विस्फोटकों के सुरक्षित रखरखाव और संचालन के लिए पेट्रोलियम एंड एक्सप्लोसिव्स सेफ्टी ऑर्गनाइजेशन (PESO) का लाइसेंस भी अनिवार्य होगा.
कंपनी के लिए न्यूनतम टर्नओवर और नेटवर्थ से जुड़ी शर्तें भी निर्धारित की गई हैं. कंपनी की नेटवर्थ परियोजना की अनुमानित लागत के 5 फीसदी से अधिक होनी चाहिए. इसके अलावा बड़े और जटिल प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक पूरा करने का अनुभव रखने वाली कंपनियों को प्राथमिकता दी जाएगी.
हर प्रोजेक्ट में कम से कम दो कंपनियां होंगी
नई व्यवस्था को ‘डेवलपमेंट-कम-प्रोडक्शन पार्टनर’ मॉडल के तहत लागू किया जाएगा. प्रत्येक परियोजना के लिए कम से कम दो कंपनियों का चयन किया जाएगा. चयनित कंपनियां DRDO के साथ मिलकर हथियार प्रणालियों के प्रोटोटाइप तैयार करेंगी.
इन प्रोटोटाइप का परीक्षण और मूल्यांकन किया जाएगा. सफल परीक्षण के बाद रणनीतिक बलों की जरूरत और मांग के आधार पर इन्हीं कंपनियों को बड़े पैमाने पर उत्पादन की जिम्मेदारी दी जा सकेगी.
उत्पादन क्षमता की भी होगी कड़ी जांच
हथियारों की गुणवत्ता और उत्पादन क्षमता से कोई समझौता न हो, इसके लिए कंपनियों के इंफ्रास्ट्रक्चर और तकनीकी क्षमताओं का विस्तृत आकलन किया जाएगा. DRDO यह भी जांच करेगा कि कंपनियां 50 से 100 या उससे अधिक हथियारों का थोक उत्पादन करने में सक्षम हैं या नहीं.
इसके लिए विशेषज्ञों की एक उच्चस्तरीय समिति कंपनियों की उत्पादन इकाइयों का निरीक्षण करेगी. टीम यह देखेगी कि संबंधित कंपनी के पास जरूरी मशीनरी, तकनीकी विशेषज्ञता, उत्पादन क्षमता और अन्य आवश्यक बुनियादी ढांचा मौजूद है या नहीं.
निजी क्षेत्र की भागीदारी से बढ़ेगी रक्षा उत्पादन क्षमता
रणनीतिक हथियारों के विकास और उत्पादन में निजी कंपनियों को शामिल करने की यह पहल भारत के रक्षा क्षेत्र में सरकारी और निजी क्षेत्र के बीच सहयोग को मजबूत कर सकती है. इससे स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ हथियार प्रणालियों के विकास और उत्पादन में लगने वाला समय कम करने में मदद मिल सकती है. साथ ही, यह कदम ‘आत्मनिर्भर भारत’ और रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा देने की दिशा में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.