SEBI के टॉप मैनेजमेंट की प्रेस रिलीज के खिलाफ कर्मचारियों का विरोध प्रदर्शन. प्रेस रिलीज वापस लेने और SEBI चेयरपर्सन के इस्तीफे की मांग.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
बाजार नियामक सेबी के भीतर चल रहे हंगामे और सेबी प्रमुख, माधाबी पुरी बुच पर लगे कई आरोपों के बीच, लगभग 400 कर्मचारियों ने विरोध प्रदर्शन किया और ऑफिस के बाहर अपना विरोध जताया. प्रदर्शन तब शुरू हुआ जब सेबी ने "टॉक्सिक वर्क कल्चर", अपमान और अन्य समस्याओं के आरोपों को खारिज कर दिया. सेबी का कहना है कि कर्मचारियों को शायद बाहरी तत्वों द्वारा गुमराह किया गया है ताकि सेबी और इसके नेतृत्व की साख पर सवाल उठे.
झूठे आरोपों को वापस लें सेबी
प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि झूठे दावों पर आधारित प्रेस विज्ञप्ति को वापस लिया जाए और सेबी प्रमुख इस्तीफा दें. रिपोर्ट के अनुसार, सेबी अधिकारियों ने पिछले महीने वित्त मंत्रालय को शिकायत की थी कि नियामक के नेतृत्व ने 'टॉक्सिक वर्क कल्चर' को बढ़ावा दिया है. सेबी ने कहा कि हम नहीं कहना चाहेंगे कि ये बाहरी तत्व कौन हो सकते हैं या उनके इरादे क्या हैं. सेबी ने यह भी कहा कि वह अपने सभी कर्मचारियों की क्षमता को बढ़ाने और उन्हें अपनी पूरी क्षमता तक पहुँचने का मौका देने के लिए प्रतिबद्ध है.
कर्मचारियों ने सिस्टम पर उठाया सवाल
सेबी ने बुधवार को कहा कि हाल ही में, कई अन्य लाभों के साथ-साथ, कर्मचारियों ने 2023 में निर्धारित हाउस रेंट अलाउंस (HRA) में 55% वृद्धि की मांग की. इसके अलावा, कर्मचारियों ने सेबी के ऑटोमेटेड मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम पर भी सवाल उठाया, जिसे अधिक पारदर्शिता, निष्पक्षता, और जवाबदेही लाने के लिए डिज़ाइन किया गया था. इसके बाद, सात दिन के भीतर, रिपोर्ट के अनुसार, एक दूसरा पत्र प्रस्तुत किया गया जिसमें 16 मांगों की लंबी सूची थी, जिसमें HRA में वृद्धि समेत कई मौद्रिक और गैर-मौद्रिक लाभ शामिल थे. इसके अतिरिक्त, कम प्रदर्शन रेटिंग पर बिना इंटरव्यू के स्वचालित पदोन्नति की भी मांग की गई.
बाहर से मिसगाइड हो रहे कर्मचारी- सेबी
सेबी ने कहा था कि सेबी के अधिकारी पहले से ही अच्छी तनख्वाह प्राप्त करते हैं, और ग्रेड A के एंट्री-लेवल अधिकारियों के लिए कंपनी की लागत लगभग 34 लाख रुपये प्रति वर्ष है, जो कॉर्पोरेट सेक्टर के मुकाबले बहुत अच्छी है. उनके द्वारा की गई नई मांगों से लगभग 6 लाख रुपये प्रति वर्ष अतिरिक्त लागत आएगी. सेबी ने कहा कि वह बाजार के पारिस्थितिकी तंत्र और इसके सभी प्रतिभागियों के प्रति प्रतिक्रियाशील रहने के लिए प्रतिबद्ध है, चाहे वह मंजूरी की गति हो या व्यवसाय करने में आसानी, और समय पर जांच और गलत काम के खिलाफ कार्रवाई करने में भी. यह अफसोसजनक है कि कुछ तत्वों ने सेबी के कर्मचारियों की महत्वपूर्ण क्षमताओं को कम करने की कोशिश की है, यह कहते हुए कि 'नियामक के कर्मचारी' के रूप में उन्हें इतनी उच्च प्रदर्शन और जिम्मेदारी की अपेक्षाएँ नहीं करनी चाहिए.
एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस की नई दरें 9 अक्टूबर 2026 से लागू होंगी, जबकि आकासा एयर ने भी अपने ईंधन शुल्क में बढ़ोतरी की है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
त्योहारों के सीजन से पहले हवाई यात्रा करने वालों की जेब पर बोझ बढ़ने वाला है. विमान ईंधन (ATF) की कीमतों में बढ़ोतरी के बीच एयर इंडिया, एयर इंडिया एक्सप्रेस और आकासा एयर ने फ्यूल सरचार्ज बढ़ाने का फैसला किया है. एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस की नई दरें 9 अक्टूबर 2026 से लागू होंगी, जबकि आकासा एयर ने भी अपने ईंधन शुल्क में बढ़ोतरी की है. इससे घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मार्गों पर हवाई टिकट की कुल कीमत बढ़ सकती है. इससे पहले इंडिगो भी फ्यूल चार्ज बढ़ा चुकी है.
9 अक्टूबर से लागू होंगी नई दरें
एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस ने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए फ्यूल सरचार्ज में बदलाव किया है. एयरलाइंस के मुताबिक, हाल के महीनों में भू-राजनीतिक घटनाक्रम और वैश्विक ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव के कारण विमान ईंधन की कीमतों पर दबाव बना हुआ है. इससे परिचालन लागत बढ़ी है, जिसमें ईंधन का बड़ा हिस्सा होता है.
एयर इंडिया एक्सप्रेस के लिए नया फ्यूल सरचार्ज 9 अक्टूबर को रात 12 बजे (IST) से की गई नई बुकिंग पर लागू होगा. वहीं, एयर इंडिया के लिए नई दरें 9 अक्टूबर को सुबह 11 बजे से की गई बुकिंग पर लागू होंगी. शुल्क की राशि उड़ान की दूरी और रूट की श्रेणी के आधार पर अलग-अलग होगी.
एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस में कितना बढ़ा चार्ज?
दोनों एयरलाइंस ने एकतरफा घरेलू उड़ानों के लिए दूरी के आधार पर फ्यूल सरचार्ज तय किया है. इसके तहत शुल्क 400 रुपये से 1,200 रुपये के बीच होगा. 1,001 से 1,500 किलोमीटर की दूरी वाली उड़ानों के लिए 850 रुपये का सरचार्ज देना होगा. वहीं, 1,501 से 2,000 किलोमीटर और 2,000 किलोमीटर से अधिक दूरी वाले मार्गों पर यह शुल्क 1,200 रुपये होगा. एयरलाइंस का कहना है कि संशोधित फ्यूल सरचार्ज से ईंधन की बढ़ी हुई लागत की कुछ हद तक भरपाई करने और अपने नेटवर्क पर परिचालन जारी रखने में मदद मिलेगी.
आकासा एयर ने भी बढ़ाया फ्यूल चार्ज
आकासा एयर ने भी विमान ईंधन की बढ़ती लागत के मद्देनजर फ्यूल चार्ज में बढ़ोतरी की है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एयरलाइन ने इसे 375 रुपये से बढ़ाकर 2,500 रुपये तक किया है. हालांकि, अलग-अलग उड़ानों और मार्गों पर लागू शुल्क की सटीक राशि संबंधित बुकिंग की शर्तों पर निर्भर करेगी.
इंडिगो पहले ही बढ़ा चुकी है शुल्क
इससे पहले इंडिगो ने भी विमान ईंधन की कीमतों में तेज बढ़ोतरी का हवाला देते हुए 6 अक्टूबर 2026 को रात 12:01 बजे से की गई नई बुकिंग पर फ्यूल चार्ज में बदलाव किया था. एयरलाइन के अनुसार, पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक घटनाक्रम और ईंधन की बढ़ती लागत के कारण एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की कीमतें पिछले दशक के ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं. कंपनी ने बताया कि हालिया मासिक बढ़ोतरी 14 फीसदी से अधिक रही है.
संशोधित शुल्क के तहत घरेलू उड़ानों में 500 किलोमीटर तक की यात्रा के लिए 375 रुपये, 501 से 1,000 किलोमीटर की दूरी के लिए 600 रुपये और 1,001 से 1,500 किलोमीटर की दूरी के लिए 900 रुपये का फ्यूल चार्ज निर्धारित किया गया है.
यात्रियों की जेब पर बढ़ेगा बोझ
फ्यूल सरचार्ज में बढ़ोतरी का सीधा असर हवाई टिकट की कुल कीमत पर पड़ सकता है. फेस्टिव सीजन के दौरान यात्रा की मांग बढ़ने के बीच यात्रियों को टिकट बुक करते समय मूल किराए के साथ ईंधन शुल्क और अन्य लागू शुल्कों को भी ध्यान में रखना होगा. हालांकि, अंतिम कीमत एयरलाइन, यात्रा की दूरी, रूट और टिकट बुकिंग के समय के आधार पर अलग-अलग हो सकती है.
मुंबई के एक निवेश बैंक के अपने ही समूह के फंड उन सौदों में बार-बार दिखाई देते हैं, जिन्हें वह बाजार में बेचता है. इन सौदों में निवेश करने वाले निवेशकों का प्रदर्शन खराब रहा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
मुंबई का निवेश बैंक पैंटोमैथ अपने ही समूह के साथ बार-बार सौदे करता है. समूह द्वारा संचालित फंड कंपनियों में निवेश करते हैं, इसके बाद उसका बैंक उन्हीं कंपनियों के शेयर जनता को बेचता है. एक मामले में पैंटोमैथ के एक फंड ने ऐसे प्लेसमेंट में निवेश किया, जिसे उसका अपना बैंक बेच रहा था. हाल के तीन सौदों में ऑफर प्राइस पर निवेश करने वाले निवेशकों को 42% से 65% तक का नुकसान हुआ है. यह सब कानूनी है. यही वजह है कि भारत के बाजार नियामक को इस पर ध्यान देना चाहिए.
अगला सौदा पहले से ही सेबी की मेज पर है. दिल्ली की पाइप निर्माता कंपनी हाई-टेक फ्लो सॉल्यूशंस ने पिछले महीने आईपीओ के लिए आवेदन किया था, जिसमें पैंटोमैथ उसके दो बैंकरों में से एक है. पैंटोमैथ समूह के एक फंड के पास कंपनी की 14.67% हिस्सेदारी है, जिसे उसने 19.74 रुपये प्रति शेयर की दर से खरीदा था. अब वह ऑफर में अपने सभी 2.03 करोड़ शेयर बेच रहा है.
पैंटोमैथ पहले भी इस परिवार के साथ कारोबार कर चुका है. अक्टूबर 2024 में वह हाई-टेक पाइप्स का एकमात्र बैंकर था. यह सूचीबद्ध कंपनी उसी बंसल परिवार के नियंत्रण में है. कंपनी ने 185.50 रुपये प्रति शेयर की दर से 500 करोड़ रुपये (6 करोड़ डॉलर) जुटाए थे. खरीदारों में पैंटोमैथ का एक फंड भी शामिल था. पैंटोमैथ ने पुष्टि की है कि उसके फंड ने इस प्लेसमेंट में 27 लाख शेयर खरीदे थे, जिनकी कीमत करीब 50 करोड़ रुपये थी. 21 सितंबर को शेयर 75 रुपये पर बंद हुए, यानी 60% की गिरावट. यह खरीद किसके हित में थी: अपने बुक को भरने वाले बैंक के या फंड के निवेशकों के?
भारत अपने इतिहास में शेयरों की बिक्री की सबसे बड़ी लहर के बीच है. पिछले महीने नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ने भी अपने शेयर जनता को बेचे. 123 आईपीओ का प्रबंधन कर चुका पैंटोमैथ भी इसके बैंकरों में शामिल था. इसके संस्थापक महावीर और मधु लुनावत ने एक मर्चेंट बैंक, आईपीओ से पहले निवेश करने वाले फंडों का समूह, सूचीबद्ध ब्रोकिंग समूह में 37% हिस्सेदारी और जुलाई 2025 से करीब 2,000 करोड़ रुपये की खुदरा बचत वाला म्यूचुअल फंड खड़ा किया है. कोटक और मोतीलाल ओसवाल जैसे बड़े समूह भी इसी तरह के कारोबार चलाते हैं. पैंटोमैथ को अलग बनाने वाली बात यह है कि उसके अलग-अलग कारोबार एक ही सौदे में कितनी बार एक साथ आते हैं और किस तरह के सौदों में आते हैं: छोटी कंपनियां, कम कारोबार वाले शेयर और बड़ी संख्या में खुदरा निवेशक.
भारतीय नियम इस तरह के आपसी जुड़ाव पर ध्यान देते हैं. चूंकि समूह के फंड के पास हाई-टेक फ्लो की 10% से अधिक हिस्सेदारी है, इसलिए पैंटोमैथ को जारीकर्ता कंपनी का एक "सहयोगी" माना जाता है और वह आईपीओ का केवल विपणन कर सकता है, उसका प्रबंधन नहीं. फिर भी सेबी उससे उचित जांच-पड़ताल का प्रमाणपत्र हस्ताक्षरित करने की मांग करता है. यह प्रमाणपत्र इस बात की पुष्टि है कि प्रॉस्पेक्टस सही है. नियम बैंक से ऑफर की विश्वसनीयता की पुष्टि कराते हैं. लेकिन वे बैंक के सहयोगी फंड को आईपीओ में अपनी पूरी हिस्सेदारी बेचने से नहीं रोकते.
फंड इस तरीके के बारे में खुलकर बताते हैं. एक फंड वितरक द्वारा प्रकाशित एक फंड की बिक्री सामग्री में आईपीओ या बिक्री के जरिए "करीब 3.5 साल के भीतर" निवेश से बाहर निकलने का वादा किया गया है. इसमें औसतन 2.5 गुना रिटर्न का दावा है. सामग्री में यह भी कहा गया है कि समूह के "स्वतंत्र निवेश बैंकिंग नेटवर्क" का लाभ उठाकर सूचीबद्ध प्रतिस्पर्धी कंपनियों की तुलना में 30-40% कम कीमत पर निवेश किया जाता है.
संक्षेप में: बैंक के जरिए सस्ते में निवेश करें, उसी बैंक के जरिए कंपनी को शेयर बाजार में लाएं और फिर बाजार के जरिए बाहर निकल जाएं.
विक्रान इंजीनियरिंग दिखाती है कि किसी सौदे के दोनों सिरों पर बैंक कैसे मौजूद हो सकता है.
जनवरी 2024 में पैंटोमैथ के एक फंड ने बिजली क्षेत्र में ठेके लेने वाली कंपनी विक्रान इंजीनियरिंग में निवेश किया. इस निवेश दौर में कंपनी का मूल्यांकन करीब 740 करोड़ रुपये आंका गया था. उस समय की घोषणा के अनुसार, पैंटोमैथ कैपिटल इस सौदे का एकमात्र बैंकर था. इसके 19 महीने बाद पैंटोमैथ ने विक्रान के आईपीओ का सह-नेतृत्व किया, जिसमें नई पूंजी जुटाने से पहले कंपनी का मूल्यांकन 1,781 करोड़ रुपये था. खुदरा निवेशकों ने 97 रुपये प्रति शेयर की दर से निवेश किया.
दो महीने बाद विक्रान ने 1,642 करोड़ रुपये के सौर ऊर्जा ऑर्डर की घोषणा की और उसके शेयरों में उछाल आया. फरवरी तक यह ऑर्डर रद्द हो गया और कंपनी के आंतरिक ऑडिटरों ने इस्तीफा दे दिया. सितंबर 2025 से जून 2026 के बीच घरेलू संस्थागत निवेशकों की विक्रान में हिस्सेदारी 12.6% से घटकर 5.7% रह गई. आम जनता की हिस्सेदारी 28.8% से बढ़कर 36.7% हो गई और करीब 17,000 नए शेयरधारक जुड़ गए. शेयरधारिता के आंकड़ों से संकेत मिलता है कि फंड ने अपनी हिस्सेदारी करीब 6% घटाई है. हालांकि, पैंटोमैथ का कहना है कि उसने अपने शुरुआती निवेश का 5% से भी कम बेचा है.
टेलीकॉम टावर कंपनी एसएआर टेलीवेंचर ने इससे भी अधिक उतार-चढ़ाव वाला सफर देखा. पैंटोमैथ 2023 में इसे शेयर बाजार में लाया और कंपनी ने 25 करोड़ रुपये से कम जुटाए. आठ महीने बाद पैंटोमैथ ने कंपनी के लिए 450 करोड़ रुपये और जुटाए: 210 रुपये प्रति शेयर की दर से फॉलो-ऑन ऑफर में 150 करोड़ रुपये और 200 रुपये प्रति शेयर की दर से राइट्स इश्यू में 300 करोड़ रुपये. बाजार निर्माता की भूमिका असित सी मेहता के ब्रोकिंग कारोबार ने निभाई, जिसमें पैंटोमैथ की एक कंपनी की आंशिक हिस्सेदारी है. छह सप्ताह बाद एसएआर के शेयर 414 रुपये के शिखर पर पहुंच गए. अब इनका कारोबार 73 रुपये पर हो रहा है. पैंटोमैथ का कहना है कि उसके फंड के पास अब भी अपनी पूरी हिस्सेदारी है.
क्या यह महज संयोग है या एक पैटर्न?
आईपीओ डेटा कंपनी आईपीओ प्लेटफॉर्म के अनुसार, पैंटोमैथ के 123 आईपीओ में से 10 में से नौ शेयर बाजार में प्रीमियम पर सूचीबद्ध हुए. लेकिन अब इनमें से आधे से अधिक अपने ऑफर प्राइस से नीचे कारोबार कर रहे हैं. मुख्य बोर्ड पर उसकी पिछली आठ लिस्टिंग में से पांच में निवेशकों को नुकसान हो रहा है. छोटी कंपनियों के आईपीओ हर बैंकर के लिए जोखिम भरे होते हैं और हमने पैंटोमैथ के रिकॉर्ड की उसके प्रतिस्पर्धियों से तुलना नहीं की है. लेकिन उसके ग्राहकों के निवेशकों के लिए हालात स्पष्ट रूप से मुश्किल रहे हैं.
समूह का पुराना इतिहास भी है.
2016 से 2020 के बीच पैंटोमैथ स्टॉक ब्रोकर्स नाम के एक ब्रोकर ने छोटी कंपनियों के 63 आईपीओ में बाजार निर्माता की भूमिका निभाई. लुनावत इस ब्रोकर के बोर्ड में शामिल थे. इन सभी 63 आईपीओ का प्रबंधन पैंटोमैथ कैपिटल ने किया था. 2022 में सेबी ने पाया कि ब्रोकर ने उसके निरीक्षकों द्वारा जांचे गए 37 में से 35 दिनों में ग्राहकों के 24 करोड़ रुपये तक के धन का दुरुपयोग किया था. नियामक ने इन उल्लंघनों को "बेहद गंभीर" बताया.
सेबी ने पाया कि ब्रोकर ने ग्राहकों के शेयरों को उनकी देनदारी से अधिक गिरवी रखा था और अपने कारोबार में हुए नुकसान की भरपाई के लिए उनके धन का इस्तेमाल किया था. ब्रोकर ने कहा था कि वह "एसएमई बाजार में मार्केट मेकिंग" के लिए 32 करोड़ रुपये के शेयर रख रहा था. सेबी ने उस पर 20 लाख रुपये का जुर्माना लगाया. उसने इसके लिए लुनावत को नहीं, बल्कि ब्रोकर का रोजमर्रा का कामकाज संभालने वाले तोशनिवाल परिवार को जिम्मेदार ठहराया. लुनावत का कहना है कि वे 2019 तक ब्रोकर से "अलग हो चुके थे".
इसके बावजूद पैंटोमैथ ने 2021 और 2022 में दो अन्य आईपीओ के लिए उसी ब्रोकर को बाजार निर्माता बनाया. उसी साल लुनावत की एक नई कंपनी ने असित सी मेहता में हिस्सेदारी खरीदी. यही ब्रोकर बाद में एसएआर के शेयरों के लिए बाजार निर्माता बना. पुराने ब्रोकर ने जुलाई 2025 में अपना एक्सचेंज लाइसेंस छोड़ दिया, समूह के म्यूचुअल फंड को लाइसेंस मिलने के एक सप्ताह बाद. पैंटोमैथ इसे "महज संयोग" बताता है.
2023 में पैंटोमैथ कैपिटल के एक अलग निरीक्षण में सेबी ने पाया कि उसके उचित जांच-पड़ताल संबंधी दो प्रमाणपत्रों पर किए गए हस्ताक्षर न तो एक-दूसरे से मेल खाते थे और न ही हस्ताक्षरकर्ता के पहचान पत्र से. 2024 में हस्ताक्षरों पर कोई फैसला दिए बिना यह आरोप हटा दिया गया.
इसके बाद म्यूचुअल फंड का मामला है. इसे पैंटोमैथ कैपिटल प्रायोजित करता है, मधु लुनावत इसका संचालन करती हैं और पैंटोमैथ ट्रस्टी नाम की ट्रस्ट कंपनी इसकी निगरानी करती है. ये सभी समूह के अंधेरी स्थित मुख्य कार्यालय से काम करते हैं. पैंटोमैथ ने हमें बताया कि उसे "पैंटोमैथ द्वारा प्रबंधित आईपीओ सहित किसी भी आईपीओ में निवेश करने की अनुमति है". अब तक ऐसा होता हुआ दिखाई नहीं देता. हमने उसकी सात योजनाओं की जांच की और उनमें पैंटोमैथ से जुड़ा कोई शेयर नहीं पाया. हालांकि, नियम उसे ऐसा करने से नहीं रोकेंगे.
पैंटोमैथ का पक्ष
पैंटोमैथ ने हमारे सवालों के जवाब लिखित में दिए और 8 अक्टूबर को आगे पूछे गए सवालों का भी जवाब दिया. उसका कहना है कि प्रत्येक कारोबार सेबी में पंजीकृत एक अलग कंपनी है, जिसका अपना बोर्ड है. उसने यह भी कहा कि न्यूयॉर्क और लंदन में एकीकृत कारोबारी समूह आम हैं. समूह के किसी फंड का ऐसी कंपनी में हिस्सेदारी रखना, जिसे बैंक शेयर बाजार में ला रहा है, "अपने आप में हितों के नियामकीय टकराव का मामला नहीं है". उसके अनुसार, सभी हिस्सेदारियां निर्धारित सीमाओं के भीतर थीं और उनका खुलासा किया गया था. सेबी बैंकरों से उनकी भूमिका चाहे जो हो, उचित जांच-पड़ताल के प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर करने की मांग करता है.
उसके कुछ जवाब उपलब्ध रिकॉर्ड से मेल नहीं खाते. पैंटोमैथ ने पहले कहा कि उसका भारत वैल्यू फंड "लॉन्ग-ओनली" है और लंबी अवधि के लिए निवेश करता है. जब उससे बिक्री सामग्री में "करीब 3.5 साल के भीतर" निवेश से बाहर निकलने के वादे के बारे में पूछा गया, तो उसने कहा कि लॉन्ग-ओनली का मतलब है कि फंड बिना ट्रेडिंग या शॉर्ट सेलिंग के शेयर खरीदता है और अपने पास रखता है.
ब्रोकर के मामले में उसने कहा कि लुनावत ने "सेबी सहित संबंधित अधिकारियों के समक्ष मामला उठाया था". हालांकि, सेबी ने अपने निरीक्षण के जरिए ब्रोकर के उल्लंघनों का पता लगाया था और यह दलील खारिज कर दी थी कि इसके लिए पिछला प्रबंधन जिम्मेदार था. नियामक ने इस दलील को "निराधार" बताया था.
पैंटोमैथ ने यह नहीं बताया कि उसके किन अन्य आईपीओ में समूह के फंड का पैसा लगा था. हाई-टेक फ्लो के आईपीओ से उसे कितनी कमाई होगी, इस सवाल पर उसने ऑफर दस्तावेजों का हवाला दिया. यह पूछे जाने पर कि क्या उसके म्यूचुअल फंड ने पैंटोमैथ द्वारा प्रबंधित किसी आईपीओ में निवेश किया है, उसने सिर्फ इतना कहा कि फंड को ऐसा करने की अनुमति है.
अमेरिका में यदि किसी बैंक से जुड़ी कंपनियों के पास जारीकर्ता कंपनी की 10% या उससे अधिक हिस्सेदारी है, तो इस हितों के टकराव का प्रमुखता से खुलासा करना जरूरी होता है. अक्सर कीमत की पुष्टि के लिए स्वतंत्र अंडरराइटर की भी जरूरत होती है. दिसंबर में सेबी ने बैंकरों को उन आईपीओ का नेतृत्व करने से रोक दिया था, जिनमें उनके अपने निदेशकों या कर्मचारियों की हिस्सेदारी महज 0.1% तक भी हो. लेकिन समूह का सहयोगी फंड 14.67% हिस्सेदारी रख सकता है और पूरी हिस्सेदारी बेच सकता है.
हो सकता है कि पैंटोमैथ ने किसी नियम का उल्लंघन न किया हो. असली मुद्दा यही है. नियम हर लाइसेंस को अलग-अलग देखते हैं, जबकि निवेशक शेयर खरीदते हैं. जब पैंटोमैथ का फंड हाई-टेक फ्लो से अपनी पूरी हिस्सेदारी बेचकर बाहर निकलेगा, तो प्रॉस्पेक्टस पर पैंटोमैथ का नाम होगा. निवेशकों को पता होना चाहिए कि वे किससे शेयर खरीद रहे हैं.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
गुरुवार को बीएसई सेंसेक्स 1,045.46 अंक यानी 1.44 फीसदी गिरकर 71,593.24 पर आ गया. वहीं, एनएसई निफ्टी 371.25 अंक यानी 1.64 फीसदी टूटकर 22,231.80 पर बंद हुआ.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
घरेलू शेयर बाजार में गुरुवार को लगातार दूसरे कारोबारी सत्र में भारी बिकवाली देखने को मिली. सेंसेक्स 1,045 अंक टूटकर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 371 अंक फिसल गया. इस गिरावट से बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण करीब 11 लाख करोड़ रुपये घट गया. हालांकि, शुक्रवार सुबह गिफ्ट निफ्टी में करीब 80 अंकों की बढ़त और ब्रेंट क्रूड की कीमतों में नरमी से बाजार में शुरुआती रिकवरी के संकेत मिल रहे हैं. दूसरी ओर, एशियाई बाजारों में कमजोरी और अमेरिकी ग्रीन कार्ड कार्यक्रम से जुड़ी खबर के चलते आईटी शेयरों पर दबाव रह सकता है. ऐसे में निवेशकों की नजर इन्फोसिस, विप्रो, एचसीएल टेक, टीसीएस, रिलायंस इंडस्ट्रीज और आईटीसी समेत कई शेयरों पर रहेगी.
गुरुवार को बाजार में क्यों आई भारी गिरावट?
गुरुवार को घरेलू शेयर बाजार में चौतरफा बिकवाली के चलते प्रमुख सूचकांक गिरावट के साथ बंद हुए. बीएसई सेंसेक्स 1,045.46 अंक यानी 1.44 फीसदी गिरकर 71,593.24 पर आ गया. वहीं, एनएसई निफ्टी 371.25 अंक यानी 1.64 फीसदी टूटकर 22,231.80 पर बंद हुआ. कारोबार के दौरान निफ्टी 22,179 के स्तर तक फिसल गया, जो उसका 52 सप्ताह का निचला स्तर था.
बाजार में गिरावट के कारण बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण करीब 11 लाख करोड़ रुपये घटकर लगभग 460 लाख करोड़ रुपये रह गया. सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 27 गिरावट के साथ बंद हुए. आईटीसी, अडानी पोर्ट्स, इंडिगो, पावर ग्रिड और रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयरों में भी कमजोरी रही.
बाजार पर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से रेपो रेट में बढ़ोतरी और मौद्रिक नीति के रुख में सख्ती, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की लगातार बिकवाली, वैश्विक बॉन्ड यील्ड में उछाल और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का दबाव रहा. इसके अलावा, कमजोर वैश्विक संकेतों ने भी निवेशकों की धारणा प्रभावित की.
गिफ्ट निफ्टी से रिकवरी के संकेत, लेकिन वैश्विक बाजार कमजोर
शुक्रवार सुबह गिफ्ट निफ्टी करीब 80 अंकों की बढ़त के साथ 22,370 के ऊपर कारोबार करता दिखा. इससे घरेलू बाजार में शुरुआती कारोबार के दौरान सुधार की उम्मीद जगी है. हालांकि, एशियाई बाजारों में कमजोरी के कारण तेजी पर दबाव रह सकता है.
एनरिच मनी के सीईओ पोनमुडी आर के मुताबिक, पिछले कारोबारी सत्र में लगभग सभी सेक्टरों में बिकवाली हुई थी. मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में ज्यादा कमजोरी रही. वैश्विक संकेतों और घरेलू आर्थिक दबावों के बीच निवेशक सतर्क रुख अपना सकते हैं.
शुक्रवार सुबह एशियाई बाजारों में जापान का निक्केई एक फीसदी से अधिक गिर गया, जबकि दक्षिण कोरिया का कोस्पी करीब 2.6 फीसदी नीचे कारोबार कर रहा था. हांगकांग का हैंगसेंग इंडेक्स भी कमजोर रहा. इससे पहले गुरुवार को अमेरिकी बाजारों में डॉव जोन्स मामूली बढ़त के साथ बंद हुआ, जबकि नैस्डैक और S&P 500 में करीब 1.4 फीसदी तक गिरावट दर्ज की गई.
कच्चे तेल में नरमी से बाजार को राहत
गुरुवार को तेजी के बाद शुक्रवार सुबह ब्रेंट क्रूड की कीमतों में नरमी देखने को मिली. अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड वायदा आधे फीसदी से अधिक गिरकर 104 डॉलर प्रति बैरल के नीचे कारोबार कर रहा था. भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट राहत दे सकती है, क्योंकि इससे आयात बिल और महंगाई पर दबाव कम होने की संभावना रहती है.
हालांकि, मध्य पूर्व में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास तेल आपूर्ति को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं. ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बाजार की दिशा के लिए अहम रहेगा.
IT शेयरों पर क्यों रहेगी नजर?
शुक्रवार को आईटी सेक्टर के शेयरों में खास हलचल देखने को मिल सकती है. अमेरिकी स्थायी श्रम प्रमाणन कार्यक्रम (PERM) से माइक्रोसॉफ्ट, इन्फोसिस, टाटा, विप्रो, एचसीएल और कॉग्निजेंट सहित प्रमुख टेक और आईटी कंपनियों को निलंबित किए जाने की खबर सामने आई है. PERM विदेशी कर्मचारियों के लिए रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण है.
इस खबर के बाद इन्फोसिस और विप्रो समेत कुछ भारतीय आईटी कंपनियों के अमेरिकी डिपॉजिटरी रिसीट्स (ADR) में गिरावट दर्ज की गई. ऐसे में घरेलू बाजार में इन्फोसिस, विप्रो और एचसीएल टेक के शेयरों पर निवेशकों की खास नजर रहेगी. टीसीएस का शेयर भी आईटी सेक्टर के रुख के लिहाज से महत्वपूर्ण रहेगा.
आज इन शेयरों पर भी रखें नजर
आईटी शेयरों के अलावा आईटीसी, रिलायंस इंडस्ट्रीज, अडानी पोर्ट्स और इंडिगो भी निवेशकों के रडार पर रहेंगे. गुरुवार की गिरावट के बाद इन शेयरों में होने वाली गतिविधियां बाजार की चाल को प्रभावित कर सकती हैं. वहीं, जेएसडब्ल्यू स्टील के सितंबर तिमाही के उत्पादन में बढ़ोतरी से इस शेयर पर नजर रहेगी. डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज से जुड़ी अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) की नियामकीय खबर भी महत्वपूर्ण होगी. इसके अलावा, एनसीसी को मिले करीब 1,286 करोड़ रुपये के सड़क निर्माण ऑर्डर के चलते शेयर में हलचल देखने को मिल सकती है. पावर ग्रिड, टाटा पावर, कोचीन शिपयार्ड, वेदांता और पेटीएम के शेयर भी चर्चा में रह सकते हैं.
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
शुक्रवार के कारोबार में निवेशकों को गिफ्ट निफ्टी, कच्चे तेल की कीमतों, एशियाई बाजारों के रुख और विदेशी निवेशकों की गतिविधियों पर नजर रखनी चाहिए. आईटी कंपनियों से जुड़ी अमेरिकी नीति की खबरें भी शेयरों की चाल को प्रभावित कर सकती हैं. गुरुवार की भारी गिरावट के बाद गिफ्ट निफ्टी की बढ़त शुरुआती राहत का संकेत जरूर देती है, लेकिन वैश्विक बाजारों की कमजोरी और ब्याज दरों को लेकर चिंताओं के बीच उतार-चढ़ाव बना रह सकता है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
राजीव जैन के GQG ने ITC में अपनी हिस्सेदारी बेच दी. डीलिंग रूम में चर्चा है कि कुछ ऑफशोर खिलाड़ियों को इसका पहले से अंदाजा था और उन्होंने पहले ही फंड की प्रमुख होल्डिंग्स में शॉर्ट पोजीशन बना ली थी. एलन मस्क की X पोस्ट ने रिलायंस इंडस्ट्रीज में बिकवाली को और बढ़ा दिया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
जिस दिन सेंसेक्स 1,000 अंक से ज्यादा गिरा, उस दिन स्क्रीन पर इंडेक्स सबसे कम दिलचस्प चीज थी. असली कहानी अडानी के शेयरों में थी और इसे समझने के लिए आपको फ्लोरिडा की एक फंड हाउस और उस सौदे से शुरुआत करनी होगी, जो मुंबई के ज्यादातर लोगों के सुबह की चाय खत्म करने से पहले ही हो चुका था.
वह फंड हाउस GQG Partners है. और गुरुवार को उसने फैसला किया कि अब वह ITC के साथ नहीं रहना चाहता.
शुरुआती कारोबार
प्री-ओपन ब्लॉक विंडो में करीब 36.66 करोड़ ITC शेयर, यानी कंपनी के लगभग 2.9 फीसदी शेयर, औसतन ₹257 प्रति शेयर की कीमत पर हाथ बदले. इस सौदे की कीमत करीब ₹9,437 करोड़ थी. रिपोर्टों में GQG को संभावित विक्रेता बताया गया और एक बैंकर ने इसे "क्लीन-आउट ट्रेड" कहा, जिसका सीधा मतलब है कि विक्रेता पूरी तरह बाहर निकलना चाहता था, न कि सिर्फ अपनी हिस्सेदारी का कुछ हिस्सा कम करना.
खरीदारों की कोई कमी नहीं थी. एक विदेशी लॉन्ग-ओनली फंड ने कथित तौर पर ब्लॉक का करीब एक-तिहाई हिस्सा खरीदा. घरेलू म्यूचुअल फंड, निप्पॉन इंडिया, ICICI प्रूडेंशियल, SBI, कोटक और आदित्य बिड़ला ने बाकी हिस्सेदारी खरीद ली. इसके बावजूद ITC 5 फीसदी गिरकर 52 हफ्तों के निचले स्तर पर पहुंच गया. 2026 में अब तक शेयर करीब 30 फीसदी गिर चुका है.
यह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था. इस सप्ताह की शुरुआत में GQG ने बताया था कि उसने मई 2025 से 5 अक्टूबर 2026 के बीच खुले बाजार में पहले ही ITC के 3.97 करोड़ शेयर बेच दिए थे, जिससे उसकी संयुक्त हिस्सेदारी 3.48 फीसदी से घटकर 3.17 फीसदी रह गई थी. गुरुवार का ब्लॉक वह क्षण था जब धीमी निकासी जोरदार बिकवाली में बदल गई.
GQG को क्यों बेचना पड़ रहा है
इसका जवाब GQG की अपनी किताबों में है. 2026 की पहली छमाही में ग्राहकों ने फर्म से शुद्ध रूप से 15.1 अरब डॉलर निकाल लिए. यह लगातार छठा महीना था जब फर्म में आने वाले पैसे की तुलना में बाहर जाने वाला पैसा ज्यादा रहा. विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि पांच साल का कमजोर प्रदर्शन रिसर्च हाउस की रेटिंग में गिरावट और निवेशकों के और तेजी से बाहर निकलने की स्थिति पैदा कर सकता है.
रिडेम्पशन का सामना कर रहे फंड मैनेजर के पास यह चुनने का विकल्प नहीं होता कि उसे बेचना है या नहीं. उसके पास सिर्फ यह चुनने का विकल्प होता है कि क्या बेचना है. और भारत में GQG के दो सबसे बड़े दांव हर स्ट्रीट ट्रेडर को पता हैं: ITC और अडानी समूह.
यही कारण है कि गुरुवार का ब्लॉक ITC से कहीं ज्यादा मायने रखता है.
डीलिंग रूम में फुसफुसाहट
यहां बाजार की चर्चा सार्वजनिक रिकॉर्ड से आगे निकल जाती है.
कई बाजार प्रतिभागियों का आरोप है कि GQG के ट्रेड संभालने वाले कुछ संस्थानों को ITC ब्लॉक के बारे में पहले से जानकारी थी. उनके मुताबिक, विदेशी संस्थागत निवेशकों से जुड़े सिंगापुर स्थित कुछ हेज फंड उन शेयरों में शॉर्ट पोजीशन बनाने लगे, जिनमें GQG की बड़ी हिस्सेदारी है. अडानी मुख्य निशाना था.
ट्रेडरों के मुताबिक इसका तर्क जितना सरल है, उतना ही निर्मम भी. अगर GQG रिडेम्पशन पूरा करने के लिए ITC बेच रहा है, तो बाजार जल्द ही यह पूछेगा कि अगली बिक्री किसमें होगी. अडानी के शेयर इसका स्पष्ट जवाब हैं. उस डर के फैलने से पहले उन्हें शॉर्ट कर दो और फिर डर को बाकी काम करने दो.
एक वरिष्ठ फंड मैनेजर ने इस संवाददाता को बताया कि गोल्डमैन सैक्स पार्टिसिपेटरी नोट्स के जरिए बिकवाली गुरुवार को भारी रही. ये ऐसे ऑफशोर इंस्ट्रूमेंट हैं जो विदेशी खिलाड़ियों को भारत में रजिस्टर हुए बिना भारतीय शेयरों में पोजीशन लेने की सुविधा देते हैं.
इनमें से किसी भी दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की जा सकी. किसी नियामक ने कोई टिप्पणी नहीं की है और इसमें शामिल फंडों के नाम भी सामने नहीं आए हैं. लेकिन अगर किसी ने किसी ब्लॉक डील की पहले से मिली जानकारी के आधार पर कारोबार किया है, तो यह मामला सीधे SEBI के अधिकार क्षेत्र में आता है.
स्क्रीन पर क्या दिखा
कारण चाहे जो भी हो, कीमतों में हुई हलचल उस पैटर्न से मेल खाती है जिसका ट्रेडर वर्णन कर रहे हैं.
समूह की प्रमुख कंपनी अडानी एंटरप्राइजेज 7 फीसदी गिरकर ₹2,566 पर आ गया, जबकि यह ₹2,744 पर था. यह 14 मई के बाद अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया और अब छह कारोबारी सत्रों में 13 फीसदी गिर चुका है. अडानी ग्रीन एनर्जी दोपहर 2:39 बजे तक 6.71 फीसदी गिरकर ₹1,251.40 पर था. अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस 6 फीसदी गिरकर ₹1,241.30 पर आ गया और अडानी पावर 5.6 फीसदी गिरकर ₹185.60 पर पहुंच गया.
एक बार इन हाई-बीटा शेयरों ने अहम तकनीकी स्तरों को तोड़ा, तो बिकवाली खुद ही बढ़ने लगी. स्टॉप-लॉस ट्रिगर हुए, मार्जिन कॉल आए और लीवरेज वाले ट्रेडरों को गिरते बाजार में ही बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा. बाहर से देखने पर सफल शॉर्ट रेड इसी तरह दिखाई देता है. वास्तव में ऐसा हुआ या नहीं, यही वह सवाल है जिसका जवाब नियामकों को देना पड़ सकता है.
यहां एक विडंबना है, जिसे बाजार नजरअंदाज नहीं कर पाया. 2023 में जब हिंडनबर्ग की रिपोर्ट ने अडानी के शेयरों को गिरावट में धकेल दिया था, तब राजीव जैन ही थे जो अरबों डॉलर लेकर आगे आए और गिरावट को रोकने में मदद की. गुरुवार को ट्रेडर यह दांव लगा रहे थे कि वही निवेशक अब विक्रेता बन सकता है.
एलन मस्क की एंट्री
जैसे इस दिन को एक और मोड़ की जरूरत थी, दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति भी इसमें शामिल हो गए.
रातोंरात एलन मस्क ने X पर अज्ञात "कुलीन कारोबारियों" पर आरोप लगाया कि वे भारत के इंटरनेट बाजार पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए स्टारलिंक को भारत से बाहर रख रहे हैं. उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया और कोई सबूत भी पेश नहीं किया. इसकी जरूरत भी नहीं पड़ी. भारत का टेलीकॉम बाजार मुकेश अंबानी की Jio और सुनील मित्तल की Airtel के पास है और इस पोस्ट को दोनों पर निशाना साधने के तौर पर व्यापक रूप से देखा गया.
नई दिल्ली ने इस दावे को निराधार बताया और कहा कि उसकी सैटेलाइट लाइसेंसिंग व्यवस्था निष्पक्ष और गैर-भेदभावपूर्ण है. लेकिन बाजार बयानों पर नहीं, भावनाओं पर कारोबार करते हैं. निफ्टी का सबसे भारी शेयर रिलायंस 2.5 फीसदी गिर गया, ऐसे दिन जब इंडेक्स के पास किसी और भारी-भरकम शेयर की गिरावट को सहने की गुंजाइश नहीं थी.
पृष्ठभूमि
इनमें से कुछ भी शांत बाजार में नहीं हुआ. एक दिन पहले RBI ने रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी कर इसे 5.5 फीसदी कर दिया था. यह करीब चार साल में पहली बढ़ोतरी थी. ब्रेंट क्रूड 104 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया. विदेशी निवेशक लगातार नौ सत्रों से बिकवाली कर रहे हैं और करीब ₹57,000 करोड़ निकाल चुके हैं.
तो हां, गुरुवार की गिरावट की आधिकारिक वजह कच्चा तेल, RBI और विदेशी बिकवाली है. तीनों वास्तविक हैं. लेकिन ये बताते हैं कि बाजार कमजोर क्यों था. ये यह नहीं बताते कि अडानी को बाकी शेयरों की तुलना में इतना ज्यादा नुकसान क्यों हुआ.
निचोड़
इसके एक ब्लॉक डील के साथ खत्म होने की संभावना कम है. GQG के पास अभी भी ITC में 3.17 फीसदी हिस्सेदारी और अडानी समूह की कई कंपनियों में बड़ी हिस्सेदारी है और जब तक रिडेम्पशन जारी रहेगा, बाजार यह पूछता रहेगा कि वह अगली बिक्री किसमें करेगा. शॉर्ट सेलर्स इस जवाब के लिए अपनी पोजीशन बनाते रहेंगे. विदेशी फंड अब भी बाहर निकल रहे हैं और बाहर जाने वाला हर रुपया करेंसी पर दबाव बढ़ा रहा है.
एक सकारात्मक पहलू जरूर रहा. BofA Securities ने करीब दो साल की सतर्कता के बाद भारतीय इक्विटी पर सकारात्मक रुख अपनाया है और निफ्टी के लिए 26,200 का लक्ष्य देखा है. गुरुवार शाम को, जब स्क्रीन अब भी लाल थीं, यह संख्या काफी दूर नजर आ रही थी.
पलक शाह
(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.
19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)
रिपोर्ट में प्रमुख बागवानी उत्पादन केंद्रों के आसपास बहु-वस्तु और अलग-अलग तापमान पर काम करने वाली सुविधाएं विकसित करने की जरूरत बताई गई है. इसके साथ भरोसेमंद रेफ्रिजरेटेड परिवहन नेटवर्क को मजबूत करने पर भी जोर दिया गया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत ने 2037-38 तक जरूरी कोल्ड स्टोरेज क्षमता का 84 फीसदी हिस्सा हासिल कर लिया है, लेकिन खेत से बाजार तक तापमान-संवेदनशील उत्पादों की सप्लाई चेन अभी भी कई अहम मोर्चों पर कमजोर है. फिक्की और ग्रांट थॉर्नटन भारत की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 8,815 सुविधाओं में कुल 4.022 करोड़ टन कोल्ड स्टोरेज क्षमता मौजूद है, जबकि 2037-38 तक करीब 4.8 करोड़ टन क्षमता की जरूरत होगी.
उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में केंद्रित क्षमता
रिपोर्ट India’s Cold Chain: From Storage to a Chain के अनुसार, मौजूदा कोल्ड स्टोरेज नेटवर्क भारत की कोल्ड चेन के विस्तार के लिए मजबूत आधार देता है, लेकिन इसकी क्षमता कुछ चुनिंदा वस्तुओं और क्षेत्रों में ज्यादा केंद्रित है. करीब तीन-चौथाई कोल्ड स्टोरेज क्षमता का इस्तेमाल आलू के लिए होता है. वहीं, आधे से अधिक कोल्ड स्टोरेज उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में केंद्रित हैं.
रिपोर्ट में प्रमुख बागवानी उत्पादन केंद्रों के आसपास बहु-वस्तु और अलग-अलग तापमान पर काम करने वाली सुविधाएं विकसित करने की जरूरत बताई गई है. इसके साथ भरोसेमंद रेफ्रिजरेटेड परिवहन नेटवर्क को मजबूत करने पर भी जोर दिया गया है.
फिक्की लॉजिस्टिक्स कमेटी के चेयरमैन और डीपी वर्ल्ड के सबकॉन्टिनेंट, सेंट्रल एशिया, लेवेंट और मिस्र के सीईओ एवं मैनेजिंग डायरेक्टर रिजवान सूमार ने कहा कि कोल्ड चेन को केवल कोल्ड स्टोरेज तक सीमित नहीं रखा जा सकता. इसमें खेत और शुरुआती परिवहन से लेकर स्टोरेज, ट्रांसपोर्टेशन, डिस्ट्रीब्यूशन और अंतिम उपभोक्ता तक तापमान-संवेदनशील उत्पादों की पूरी आवाजाही शामिल होनी चाहिए. इसमें बंदरगाह और निर्यात बाजार भी महत्वपूर्ण हैं.
पैक-हाउस और रेफ्रिजरेटेड वाहनों की बड़ी कमी
रिपोर्ट के मुताबिक, जहां कोल्ड स्टोरेज क्षमता दीर्घकालिक जरूरत की 84 फीसदी तक पहुंच गई है, वहीं कोल्ड चेन के दूसरे हिस्सों में काफी बड़ा अंतर बना हुआ है. पैक-हाउस की क्षमता तय लक्ष्य की सिर्फ करीब 0.4 फीसदी है. वहीं रेफ्रिजरेटेड यानी रीफर वाहनों की उपलब्धता करीब 3.8 फीसदी और फल पकाने वाले चैंबर यानी राइपनिंग चैंबर की क्षमता करीब 7.1 फीसदी है.
पैक-हाउस खेतों के पास उत्पाद से खेत की गर्मी निकालने, उसकी ग्रेडिंग और पैकेजिंग के लिए जरूरी होते हैं. वहीं रीफर वाहन परिवहन के दौरान उत्पाद का तापमान बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान के तहत पैक-हाउस, रीफर वाहनों और राइपनिंग चैंबर की जरूरत पूरी करने के लिए 2037-38 तक करीब 1.75 लाख करोड़ रुपये के निवेश की जरूरत पड़ सकती है. यानी हर साल औसतन करीब 8,800 करोड़ रुपये का निवेश करना होगा.
हर साल 4.7 करोड़ टन तक खाद्य नुकसान
रिपोर्ट में भारत में खाद्य पदार्थों के बाद-कटाई नुकसान को भी बड़ी चुनौती बताया गया है. इसके मुताबिक, बागवानी, डेयरी, मांस, पोल्ट्री और मछली समेत विभिन्न क्षेत्रों में हर साल करीब 1.7 करोड़ से 4.7 करोड़ टन खाद्य पदार्थों का नुकसान होता है.
54 फसलों में बाद-कटाई नुकसान का अनुमानित मूल्य करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये सालाना है. रिपोर्ट के मुताबिक, इसकी प्रमुख वजहों में उत्पाद की हैंडलिंग, स्टोरेज और परिवहन से जुड़ी कमियां शामिल हैं.
रिपोर्ट में खेत के स्तर पर प्री-कूलिंग सुविधाओं, फीडर पैक-हाउस और साझा रेफ्रिजरेटेड परिवहन के लिए पूंजीगत सहायता देने की सिफारिश की गई है.
हर खेप के तापमान का डिजिटल रिकॉर्ड रखने का सुझाव
रिपोर्ट में एक एकीकृत राष्ट्रीय कोल्ड चेन मानक बनाने का सुझाव भी दिया गया है. इसके तहत उत्पाद की हर खेप के पूरे सफर के दौरान तापमान का मशीन से पढ़े जा सकने वाला रिकॉर्ड रखा जा सकता है.
इससे कंपनियों को यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि सप्लाई चेन के किस चरण में तापमान तय सीमा से बाहर गया. साथ ही खरीदारों, नियामकों और कर्जदाताओं को सप्लाई चेन के प्रदर्शन से जुड़ी सत्यापन योग्य जानकारी मिल सकेगी.
रिपोर्ट में बहु-वस्तु कोल्ड स्टोरेज के ज्यादा इस्तेमाल, पूरे साल उपयोग के अनुबंध और प्रोसेसर, रिटेलर तथा निर्यातकों के साथ सुनिश्चित खरीद व्यवस्था को बढ़ावा देने की भी बात कही गई है. इससे मौजूदा बुनियादी ढांचे का बेहतर इस्तेमाल हो सकता है.
अब सिर्फ कोल्ड स्टोरेज बढ़ाना काफी नहीं
ग्रांट थॉर्नटन भारत के पार्टनर करण शर्मा ने कहा कि भारत की चुनौती अब सिर्फ अतिरिक्त कोल्ड स्टोरेज क्षमता तैयार करने तक सीमित नहीं है. उनके मुताबिक, देश को एकीकृत कोल्ड चेन और उसे जोड़ने वाली लॉजिस्टिक्स की जरूरत है.
उन्होंने कहा कि देश की करीब तीन-चौथाई कोल्ड स्टोरेज क्षमता आलू के लिए इस्तेमाल होती है, जबकि हर साल बड़ी मात्रा में फल और सब्जियां बर्बाद हो जाती हैं. इनमें काफी नुकसान उत्पाद के पहले कोल्ड प्वाइंट तक पहुंचने से पहले और परिवहन के दौरान होता है.
रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा कोल्ड स्टोरेज को खेत से जुड़ी शुरुआती सुविधाओं, रेफ्रिजरेटेड परिवहन और डिजिटल ट्रेसबिलिटी से जोड़ने पर खाद्य नुकसान कम किया जा सकता है. इससे किसानों को बेहतर कीमत मिलने के साथ भारत के खाद्य, फार्मास्यूटिकल और कृषि निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता भी बढ़ सकती है.
सितंबर में डीजल निर्यात में आई तेजी ऐसे समय में हुई है जब यूरोप और अमेरिका समेत कई बाजारों में डीजल की कीमतें ऊंचे स्तर पर हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वैश्विक स्तर पर डीजल की कीमतों में तेजी के बीच भारत से डीजल का निर्यात सितंबर में एक साल के उच्च स्तर पर पहुंच गया. कमोडिटी एनालिटिक्स फर्म केप्लर के आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में भारत ने रोजाना करीब 6.2 लाख बैरल डीजल का निर्यात किया. इसमें करीब आधा हिस्सा यूरोप भेजा गया. बेहतर निर्यात मार्जिन ने भारतीय रिफाइनरों को घरेलू बाजार के बजाय विदेशी बाजारों में डीजल बेचने के लिए प्रोत्साहित किया.
भारत अपनी जरूरत का करीब 90 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है, लेकिन देश में बड़ी मात्रा में पेट्रोलियम उत्पादों का उत्पादन होता है और उनका निर्यात भी किया जाता है. सितंबर में डीजल निर्यात में आई तेजी ऐसे समय में हुई है जब यूरोप और अमेरिका समेत कई बाजारों में डीजल की कीमतें ऊंचे स्तर पर हैं.
यूरोप को सबसे ज्यादा डीजल भेजा गया
केप्लर के आंकड़ों के अनुसार, सितंबर में भारत से रोजाना करीब 2.8 लाख बैरल डीजल यूरोप भेजा गया. यह अगस्त के मुकाबले करीब 80 फीसदी अधिक है. अफ्रीका के ग्राहकों को रोजाना करीब 2 लाख बैरल, एशिया को 50,000 बैरल और अमेरिका को करीब 40,000 बैरल डीजल भेजा गया. करीब 50,000 बैरल की खेप ऐसे गंतव्यों को गई, जिनकी जानकारी उपलब्ध नहीं है. केप्लर के अनुसार, सितंबर में रूस को भारत से डीजल की कोई खेप नहीं भेजी गई.
बढ़े मार्जिन ने दिया एक्सपोर्ट का प्रोत्साहन
ईटी की रिपोर्ट के मुताबिक, डीजल की बढ़ती कीमतों और बेहतर मार्जिन का असर भारत के निर्यात पर पड़ा है. केप्लर में रिफाइनिंग के लीड एनालिस्ट निखिल दुबे ने बताया कि सितंबर में दुबई के मुकाबले सिंगापुर डीजल क्रैक 60 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर था. डीजल क्रैक रिफाइनर के लिए कच्चे तेल को डीजल में बदलने से मिलने वाले अनुमानित मार्जिन को दर्शाता है. ऊंचे मार्जिन ने रिफाइनरों के लिए डीजल उत्पादन और उसके निर्यात को बढ़ाने का मजबूत प्रोत्साहन दिया.
सप्लाई में रुकावट से बढ़ीं कीमतें
सितंबर में बेंचमार्क डीजल की कीमतें एक साल पहले की तुलना में करीब दोगुनी थीं. पश्चिम एशिया और रूस में रिफाइनरियों तथा शिपिंग से जुड़ी रुकावटों के कारण वैश्विक बाजार में डीजल की आपूर्ति प्रभावित हुई. कम आपूर्ति और ऊंची कीमतों के बीच चीन ने भी डीजल के निर्यात पर रोक लगाई है. यूरोप डीजल के आयात पर काफी निर्भर है, इसलिए वैश्विक आपूर्ति में बदलाव का असर वहां की मांग और कीमतों पर ज्यादा पड़ता है.
रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी को फायदा
भारत के डीजल निर्यात में रिलायंस इंडस्ट्रीज की जामनगर रिफाइनरी की अहम भूमिका है. सितंबर में डीजल के निर्यात पर लागू विंडफॉल टैक्स करीब 37 डॉलर प्रति बैरल था, जिससे निर्यातकों के मार्जिन पर दबाव पड़ा. हालांकि, यह टैक्स रिलायंस इंडस्ट्रीज की जामनगर स्थित केवल निर्यात के लिए संचालित होने वाली रिफाइनरी पर लागू नहीं होता. ऐसे में वैश्विक स्तर पर डीजल के ऊंचे मार्जिन का फायदा इस रिफाइनरी को अपेक्षाकृत ज्यादा मिल सकता है.
बैंक का लाइसेंस इसी साल अप्रैल में नियमों का पालन नहीं करने के चलते रद्द किया गया था. इससे पहले आरबीआई ने बैंक के खिलाफ कई कारोबारी पाबंदियां भी लगाई थीं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने पेटीएम पेमेंट्स बैंक लिमिटेड (PPBL) के खिलाफ एक और नियामकीय कार्रवाई की है. केंद्रीय बैंक ने बैंकिंग लाइसेंस रद्द होने के बाद पेटीएम पेमेंट्स बैंक को आरबीआई अधिनियम, 1934 की दूसरी अनुसूची में शामिल शेड्यूल बैंकों की सूची से हटा दिया है. बैंक का लाइसेंस इसी साल अप्रैल में नियमों का पालन नहीं करने के चलते रद्द किया गया था. इससे पहले आरबीआई ने बैंक के खिलाफ कई कारोबारी पाबंदियां भी लगाई थीं.
आरबीआई ने बुधवार को जारी बयान में कहा कि पेटीएम पेमेंट्स बैंक लिमिटेड को भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की दूसरी अनुसूची से बाहर कर दिया गया है. इस संबंध में अधिसूचना 31 जुलाई को जारी की गई थी, जबकि सितंबर में इसे भारत के राजपत्र में प्रकाशित किया गया.
क्या होता है शेड्यूल बैंक?
आरबीआई अधिनियम की दूसरी अनुसूची में शामिल बैंकों को शेड्यूल बैंक कहा जाता है. ऐसे बैंक केंद्रीय बैंक द्वारा तय वित्तीय मानकों को पूरा करते हैं और उन्हें कुछ विशेष बैंकिंग एवं परिचालन सुविधाएं मिलती हैं. पेटीएम पेमेंट्स बैंक का नाम इस सूची से हटाया जाना उसके बैंकिंग लाइसेंस रद्द किए जाने के बाद की नियामकीय प्रक्रिया का हिस्सा है.
पहले भी लग चुकी हैं कई पाबंदियां
पेटीएम से जुड़ा पेटीएम पेमेंट्स बैंक इससे पहले भी आरबीआई की कार्रवाई के दायरे में रहा है. मार्च 2022 में केंद्रीय बैंक ने पीपीबीएल को नए ग्राहक जोड़ने से रोक दिया था. साथ ही बैंक को अपनी सूचना प्रौद्योगिकी प्रणाली का व्यापक ऑडिट कराने के लिए एक आईटी ऑडिट फर्म नियुक्त करने का निर्देश दिया गया था.
इसके बाद 31 जनवरी 2024 और 16 फरवरी 2024 को आरबीआई ने बैंक पर अतिरिक्त कारोबारी पाबंदियां लगाईं. इनमें मौजूदा ग्राहकों के खातों, प्रीपेड माध्यमों और वॉलेट में नई जमा, क्रेडिट या टॉप-अप स्वीकार करने पर रोक शामिल थी.
इसके बाद आरबीआई ने अप्रैल 2026 में नियमों का पालन नहीं करने का हवाला देते हुए पेटीएम पेमेंट्स बैंक का बैंकिंग लाइसेंस रद्द कर दिया था. केंद्रीय बैंक ने उस समय कहा था कि बैंक का संचालन नुकसानदायक तरीके से किया जा रहा था. इसके बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने भी पीपीबीएल को बंद करने का आदेश दिया था.
*हॉर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते समुद्री तनाव के बीच शारजाह भारतीय कंपनियों को निवेश का बड़ा अवसर दे रहा है. अमीरात को 2026 और 2027 के दौरान भारत से कुल 3 अरब डॉलर निवेश मिलने की उम्मीद है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) का शारजाह भारतीय कंपनियों के लिए खाड़ी क्षेत्र में कारोबार विस्तार का नया केंद्र बनने की तैयारी कर रहा है. अमीरात की निवेश एजेंसी ‘इन्वेस्ट इन शारजाह’ को उम्मीद है कि 2026 और 2027 के दौरान भारत से करीब 3 अरब डॉलर का निवेश आएगा. इसमें दोनों वर्षों में लगभग 1.5-1.5 अरब डॉलर निवेश का अनुमान है. यह निवेश मुख्य रूप से मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्टेशन जैसे क्षेत्रों में आने की उम्मीद है.
भारतीय कंपनियों के लिए खाड़ी बाजार तक आसान पहुंच
शारजाह का फोकस भारतीय कंपनियों को यूएई के साथ-साथ सऊदी अरब, कुवैत और इराक जैसे बड़े खाड़ी बाजारों तक पहुंच उपलब्ध कराने पर है. इसके लिए कंपनियों को खोरफक्कन पोर्ट के आसपास उत्पादन इकाइयां, वेयरहाउस और अन्य कारोबारी सुविधाएं स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है.
‘इन्वेस्ट इन शारजाह’ के सीईओ मोहम्मद जुमा अल मुशर्रख के मुताबिक, भारतीय कंपनियां यूएई में अपनी मौजूदगी बढ़ा रही हैं और खोरफक्कन पोर्ट के करीब जगह तलाश रही हैं. इससे उन्हें निर्यात के लिए बेहतर लॉजिस्टिक्स कनेक्टिविटी मिल सकती है.
हॉर्मुज संकट के बीच खोरफक्कन की बढ़ी अहमियत
इस पूरी रणनीति में खोरफक्कन कमर्शियल टर्मिनल की अहम भूमिका है. यह ओमान की खाड़ी पर स्थित है और हॉर्मुज जलडमरूमध्य के सीधे प्रभाव वाले क्षेत्र से बाहर है. मौजूदा क्षेत्रीय तनाव और समुद्री मार्गों में आ रही रुकावटों के बीच इसकी रणनीतिक स्थिति कारोबारियों के लिए आकर्षण बढ़ा रही है.
शारजाह का कहना है कि खोरफक्कन पोर्ट प्रमुख अंतरराष्ट्रीय पूर्व-पश्चिम समुद्री व्यापार मार्गों से जुड़ा हुआ है. ऐसे में भारतीय कंपनियां इसे खाड़ी देशों में अपने माल की आपूर्ति के लिए एक महत्वपूर्ण गेटवे के रूप में इस्तेमाल कर सकती हैं.
दुबई और अबू धाबी से शारजाह की ओर बढ़ा रुख
शिपिंग से जुड़ी अनिश्चितता का असर कंपनियों के निवेश और विस्तार के फैसलों पर भी दिखाई दे रहा है. शारजाह के मुताबिक, मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्टेशन क्षेत्र की कंपनियों की ओर से पूछताछ बढ़ी है. इनमें सबसे ज्यादा दिलचस्पी खोरफक्कन पोर्ट के आसपास औद्योगिक जमीन में देखी जा रही है.
कई कंपनियां दुबई और अबू धाबी से अपना कारोबार समेटने के बजाय शारजाह में अतिरिक्त सुविधाएं विकसित करने पर विचार कर रही हैं. पोर्ट के नजदीक फैक्ट्री और वेयरहाउस स्थापित करने से कंपनियों को माल की आवाजाही और निर्यात में संभावित व्यवधान कम करने में मदद मिल सकती है.
2 अरब डॉलर से बढ़ेगी पोर्ट की क्षमता
बढ़ती कारोबारी मांग को देखते हुए खोरफक्कन पोर्ट के विस्तार पर करीब 2 अरब डॉलर खर्च किए जा रहे हैं. पोर्ट ऑपरेटर गल्फटेनर चरणबद्ध तरीके से इसकी क्षमता बढ़ा रहा है.
फिलहाल खोरफक्कन पोर्ट की सालाना कंटेनर हैंडलिंग क्षमता करीब 35 लाख टीईयू है. इसे बढ़ाकर 50 लाख टीईयू किया जा रहा है. लंबी अवधि में क्षमता को 1 करोड़ टीईयू से ज्यादा करने का लक्ष्य है. टीईयू 20 फीट लंबे मानक शिपिंग कंटेनर की क्षमता को दर्शाता है.
पोर्ट की क्षमता बढ़ने से शारजाह की लॉजिस्टिक्स क्षमता मजबूत होगी और भारतीय कंपनियों को यूएई के जरिए खाड़ी क्षेत्र के बड़े बाजारों तक पहुंच बनाने के लिए एक अतिरिक्त कारोबारी विकल्प मिल सकता है.
बैठक में 40 लाख रुपये तक सालाना कारोबार वाले व्यवसायों को MDR से छूट देने के प्रस्ताव पर भी चर्चा हुई. इसका उद्देश्य छोटे दुकानदारों और कारोबारियों पर डिजिटल भुगतान की लागत का बोझ कम रखना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने की तारीख 15 अक्टूबर से आगे बढ़ सकती है. अब इसे 1 जनवरी 2027 से लागू किए जाने की संभावना है. इसका मतलब है कि क्रिसमस तक चलने वाले त्योहारी सीजन में UPI से भुगतान पहले की तरह मुफ्त रह सकते हैं. इसके अलावा, सालाना 40 लाख रुपये तक कारोबार करने वाले छोटे कारोबारियों को MDR से छूट देने पर भी विचार किया जा रहा है.
भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) के नेतृत्व वाली UPI और सर्विसेज संचालन समिति की बैठक में बुधवार को MDR लागू करने की तारीख समेत इससे जुड़े कई मुद्दों पर चर्चा हुई. बैठक में छोटे कारोबारियों को प्रस्तावित MDR से राहत देने के विकल्प पर भी विचार किया गया.
15 अक्टूबर से लागू होने की थी योजना
UPI लेनदेन पर MDR लागू करने की चर्चा के बीच पहले इसे 15 अक्टूबर 2026 से लागू किए जाने की संभावना जताई जा रही थी. हालांकि, अब इसकी समयसीमा बढ़ाकर नए साल से लागू करने पर विचार किया जा रहा है. अगर यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है तो त्योहारी और साल के अंत के दौरान डिजिटल भुगतान करने वाले ग्राहकों और कारोबारियों पर तत्काल कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं आएगा.
छोटे कारोबारियों को मिल सकती है छूट
बैठक में 40 लाख रुपये तक सालाना कारोबार वाले व्यवसायों को MDR से छूट देने के प्रस्ताव पर भी चर्चा हुई. इसका उद्देश्य छोटे दुकानदारों और कारोबारियों पर डिजिटल भुगतान की लागत का बोझ कम रखना है.
हालांकि, MDR की नई तारीख और छोटे कारोबारियों के लिए छूट को लेकर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है. इस संबंध में भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) को जानकारी के लिए ईमेल भेजा गया था, लेकिन खबर लिखे जाने तक उसकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला था.
क्या है MDR?
मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR वह शुल्क है जो डिजिटल भुगतान स्वीकार करने वाले कारोबारी से भुगतान के बदले लिया जाता है. यह शुल्क भुगतान की प्रक्रिया में शामिल बैंक और अन्य पक्षों के बीच बंटता है. फिलहाल UPI के जरिए सामान्य बैंक खाते से किए जाने वाले भुगतान पर ग्राहकों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता और छोटे कारोबारियों के लिए भी लागत को लेकर अलग व्यवस्था रही है.
UPI देश में डिजिटल भुगतान का प्रमुख माध्यम बन चुका है. ऐसे में MDR लागू होने की तारीख और इससे छोटे कारोबारियों को मिलने वाली संभावित छूट का असर डिजिटल भुगतान स्वीकार करने वाले लाखों व्यापारियों पर पड़ सकता है.
ऊपरी प्राइस बैंड ₹271 प्रति शेयर के हिसाब से HD Fire Protect का IPO करीब ₹712.13 करोड़ का होगा. यह पूरा इश्यू ऑफर फॉर सेल (OFS) है, जिसमें प्रमोटर शेयरधारक हरिश नरशी धरमशी और कुसुम धरमशी कुल 2.62 करोड़ शेयर बेचेंगे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
मुंबई स्थित फायर प्रोटेक्शन उपकरण बनाने वाली कंपनी HD Fire Protect ने अपने IPO के लिए ₹258 से ₹271 प्रति शेयर का प्राइस बैंड तय किया है. कंपनी का वैल्यूएशन ऊपरी प्राइस बैंड पर करीब ₹4,749 करोड़ बैठता है. कंपनी का IPO 13 अक्टूबर को सब्सक्रिप्शन के लिए खुलेगा और 15 अक्टूबर को बंद होगा. एंकर निवेशक 12 अक्टूबर को बोली लगा सकेंगे.
₹712 करोड़ का होगा IPO
ऊपरी प्राइस बैंड ₹271 प्रति शेयर के हिसाब से HD Fire Protect का IPO करीब ₹712.13 करोड़ का होगा. यह पूरा इश्यू ऑफर फॉर सेल (OFS) है, जिसमें प्रमोटर शेयरधारक हरिश नरशी धरमशी और कुसुम धरमशी कुल 2.62 करोड़ शेयर बेचेंगे. चूंकि IPO में कोई फ्रेश इश्यू शामिल नहीं है, इसलिए इससे मिलने वाली पूरी रकम कंपनी के पास नहीं जाएगी. इश्यू से प्राप्त राशि शेयर बेचने वाले प्रमोटर शेयरधारकों को मिलेगी.
55 शेयरों का होगा लॉट
निवेशक कम से कम 55 शेयरों के लिए बोली लगा सकेंगे. इसके बाद 55 शेयरों के गुणक में बोली लगाई जा सकेगी. इश्यू का 50 फीसदी हिस्सा क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल बायर्स (QIB) के लिए, 15 फीसदी हिस्सा नॉन-इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (NII) के लिए और शेष 35 फीसदी हिस्सा रिटेल निवेशकों के लिए आरक्षित है. कंपनी 16 अक्टूबर को शेयरों के अलॉटमेंट का आधार तय करने की उम्मीद है, जबकि इसके शेयरों की BSE और NSE पर लिस्टिंग 21 अक्टूबर को प्रस्तावित है.
सितंबर 2025 में दाखिल किया था DRHP
HD Fire Protect ने सितंबर 2025 में भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के पास अपना ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) दाखिल किया था. कंपनी को जनवरी 2026 में IPO लाने की मंजूरी मिली थी.
क्या कारोबार करती है कंपनी?
HD Fire Protect फायर प्रोटेक्शन उपकरण और सिस्टम बनाती है. कंपनी पानी, फोम और गैस आधारित फायर सप्रेशन तकनीक से जुड़े उत्पाद तैयार करती है. महाराष्ट्र में कंपनी की दो मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी हैं और यह भारत के साथ-साथ विदेशी बाजारों में भी अपने उत्पाद बेचती है. वित्त वर्ष 2026 में कंपनी ने 2,066 ग्राहकों को सेवाएं दीं. उसके कुल कारोबार में घरेलू बाजार की हिस्सेदारी 65 फीसदी रही, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजारों से 35 फीसदी कारोबार आया.
FY26 में 13 फीसदी बढ़ा राजस्व
वित्त वर्ष 2026 में HD Fire Protect का राजस्व 13 फीसदी बढ़कर ₹489.3 करोड़ हो गया, जो पिछले वित्त वर्ष में ₹433.1 करोड़ था. इस दौरान कंपनी का मुनाफा 6.4 फीसदी बढ़कर ₹116.8 करोड़ रहा. जून 2026 को समाप्त तिमाही में कंपनी ने ₹109 करोड़ का राजस्व दर्ज किया, जबकि उसका मुनाफा ₹23.8 करोड़ रहा. IPO के लिए अंबित, आनंद राठी एडवाइजर और आईआईएफएल कैपिटल सर्विसेज मर्चेंट बैंकर के तौर पर काम कर रहे हैं.