अगर सरकार और रिजर्व बैंक ने तत्काल ठोस कदम उठाना शुरू नहीं किया तो यह जल्द ही 80 के बेंचमार्क को छू सकता है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
नई दिल्लीः सोमवार को हफ्ते के पहले कारोबारी दिन फॉरेक्स मार्केट में डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल और कमजोर हो गई और यह अब तक इतिहास में सबसे कमजोर होकर खुला है. अगर सरकार और रिजर्व बैंक ने तत्काल ठोस कदम उठाना शुरू नहीं किया तो यह जल्द ही 80 के बेंचमार्क को छू सकता है.
शुरुआती कारोबार में ये रहा हाल
सोमवार 11 जुलाई 2022 को शुरुआती कारोबार में घरेलू शेयर बाजार में सुस्ती और जोखिम से बचने के रुख के चलते रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 7 पैसे टूटकर 79.33 पर आ गया. विदेशी मुद्रा कारोबारियों के अनुसार, हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट ने रुपये की कमजोरी को थामने में मदद की. अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 79.30 पर कमजोर खुला और बाद के कारोबार में 79.33 पर आ गया, जो पिछले बंद भाव के मुकाबले सात पैसे की कमजोरी को दर्शाता है. पिछले सत्र में रुपया 79.26 के स्तर पर बंद हुआ था.
डॉलर इंडेक्स में मजबूती
हालांकि डॉलर इंडेक्स में मजबूती देखने को मिली और यह 0.31 फीसदी बढ़कर 107.34 पर पहुंच गया. डॉलर इंडेक्स में छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले डॉलर दिखाया जाता है. रुपये में कमजोरी का असर भारतीय इकोनॉमी के लिहाज से खराब है. इससे जहां विदेशी मुद्रा भंडार ज्यादा तेजी से घटता है, वहीं सरकार को भी बाहर से इंपोर्ट करने वाली वस्तुएं जिनका पेमेंट डॉलर में किया जाता है, उनके लिए ज्यादा राशि खर्च करनी पड़ती है. फिलहाल सरकार का सबसे ज्यादा खर्चा कच्चा तेल और सोना खरीदने में किया जाता है.
महंगाई बढ़ती है
एक्सपर्ट के मुताबिक रुपये में कमजोरी से महंगाई भी बढ़ती है, क्योंकि सरकार द्वारा जो वस्तुएं बाहर से महंगी कीमतों पर मिलेंगी, उनकी देश में कीमत बढ़ जाती है. गिरते रुपये का यह असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल, सीएनजी और रसोई गैस जैसे ईंधन पर ही नहीं इंपोर्ट की जाने वाली तमाम चीजों पर पड़ता है. इनमें खाने के तेल से लेकर फर्टिलाइजर और स्टील तक हर तरह की चीजें शामिल हैं. इतना ही नहीं, इन इंपोर्टेड चीजों का कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल करके बनने वाली वस्तुओं की लागत भी बढ़ जाती है. जाहिर है, रुपये में गिरावट का एक बड़ा असर महंगाई बढ़ने के रूप में भी देखने को मिलता है.
रिजर्व बैंक के लिए बढ़ी चुनौती
देश में महंगाई दर पहले से ही बरसों पुराने रिकॉर्ड तोड़ रही है. थोक और रिटेल दोनों कीमतों में बढ़ोतरी की रफ्तार लगातार बढ़ रही है, ऐसे में गिरते रुपये का असर उसे और कहां तक ले जाएगा, ये सबके लिए चिंता की बात है. खासतौर पर रिजर्व बैंक के लिए तो कमजोर रुपया एक बहुत बड़ी चुनौती है. क्योंकि इससे एक तरफ तो ब्याज दरें बढ़ाकर कीमतों पर काबू पाने की उसकी कोशिशों को झटका लगता है और दूसरी तरफ करेंसी में गिरावट पर काबू पाने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया खरीदकर अपने पास रखी बेशकीमती फॉरेन करेंसी खर्च करनी पड़ती है.
वित्त वर्ष 2026-27 के पहले चार महीनों (अप्रैल-जुलाई) में सकल GST कलेक्शन 8.43 लाख करोड़ रुपये रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 7.66 लाख करोड़ रुपये की तुलना में 10.1% अधिक है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश की आर्थिक गतिविधियों में मजबूती का संकेत देते हुए जुलाई 2026 में वस्तु एवं सेवा कर (GST) संग्रह 15.4% की सालाना बढ़ोतरी के साथ 2.11 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया. घरेलू कारोबार में तेजी और आयात पर बढ़े टैक्स कलेक्शन के दम पर सरकार की कमाई में यह उछाल दर्ज किया गया. हरियाणा, गुजरात और तेलंगाना जैसे राज्यों ने शानदार प्रदर्शन किया, जबकि कुछ राज्यों में GST संग्रह में गिरावट भी देखने को मिली.
घरेलू कारोबार से GST संग्रह 1.31 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 1.45 लाख करोड़ रुपये हो गया. वहीं, आयात से मिलने वाला GST 28.8% की तेज बढ़ोतरी के साथ 66,511 करोड़ रुपये पहुंच गया. पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद देश में आर्थिक गतिविधियों और उपभोक्ता मांग पर खास असर नहीं पड़ा.
रिफंड में भी दो अंकों की बढ़ोतरी
जुलाई के दौरान कारोबारियों को 29,968 करोड़ रुपये का GST रिफंड जारी किया गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 13.1% अधिक है. वहीं, ICEGATE के जरिए प्रोसेस किए गए निर्यात रिफंड में 22.7% की वृद्धि दर्ज की गई और यह 12,288 करोड़ रुपये तक पहुंच गया.
नेट GST कलेक्शन 1.81 लाख करोड़ रुपये
रिफंड समायोजित करने के बाद सरकार का नेट GST कलेक्शन जुलाई में 1.81 लाख करोड़ रुपये रहा, जो पिछले साल की तुलना में 15.8% अधिक है. इसमें घरेलू कारोबार से मिलने वाला नेट GST 1.27 लाख करोड़ रुपये और आयात से मिलने वाला नेट GST 54,223 करोड़ रुपये रहा, जिसमें 30.3% की वृद्धि दर्ज की गई.
GST 2.0 का असर दिखने लगा
विशेषज्ञों का मानना है कि GST 2.0 लागू होने के बाद टैक्स संग्रह में लगातार सुधार देखने को मिल रहा है. हर महीने 7-8% की स्थिर वृद्धि इस बात का संकेत है कि टैक्स अनुपालन बेहतर हुआ है. हालांकि, आयात से मिलने वाले टैक्स की वृद्धि घरेलू कारोबार की तुलना में अधिक रहने से यह भी संकेत मिलता है कि उपभोक्ता गैर-जरूरी खर्चों को लेकर अभी सतर्क हैं.
अप्रैल-जुलाई में 8.43 लाख करोड़ रुपये का संग्रह
वित्त वर्ष 2026-27 के पहले चार महीनों (अप्रैल-जुलाई) में सकल GST कलेक्शन 8.43 लाख करोड़ रुपये रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 7.66 लाख करोड़ रुपये की तुलना में 10.1% अधिक है. इसी अवधि में नेट GST कलेक्शन 9.2% बढ़कर 7.21 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया.
हरियाणा सबसे आगे, कई राज्यों में शानदार प्रदर्शन
राज्यों की बात करें तो जुलाई में GST संग्रह वृद्धि के मामले में हरियाणा 25% की बढ़ोतरी के साथ शीर्ष पर रहा. इसके बाद गुजरात और तेलंगाना में 19-19%, पंजाब और केरल में 16%, उत्तर प्रदेश में 15%, महाराष्ट्र में 13%, कर्नाटक में 12% और दिल्ली में 8% की वृद्धि दर्ज की गई.
हालांकि, कुछ राज्यों में GST संग्रह कमजोर रहा. हिमाचल प्रदेश में 22%, उत्तराखंड में 18%, पुडुचेरी में 17%, मध्य प्रदेश में 10%, आंध्र प्रदेश में 5% और तमिलनाडु में 1% की गिरावट दर्ज की गई.
10 साल की अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड: 4.70%. लगातार बढ़ती हुई. 30 साल की यील्ड: 5.20%. और फेडरल रिजर्व अभी ब्याज दरों में बदलाव भी नहीं कर रहा था.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
ये आंकड़े वैश्विक वित्त बाजार के लिए खतरे की घंटी की तरह सामने आए. 10 साल की अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड: 4.70%. लगातार बढ़ती हुई. 30 साल की यील्ड: 5.20%. और फेडरल रिजर्व अभी ब्याज दरों में बदलाव भी नहीं कर रहा था.
मुंबई के क्षितिज को निहारते अपने शानदार ऑफिस में बैठे उदय कोटक, एक बैंकिंग साम्राज्य के निर्माता, वह शख्स जिसने हर संकट, हर मोड़ और मौद्रिक नीति के हर उतार-चढ़ाव को संभाला था, अब उसने इसे महसूस किया. वह ठंडी निश्चितता. भूकंप से पहले आने वाली कंपन.
उन्होंने देर नहीं की. उन्होंने ट्वीट किया.
"वैश्विक वित्त के लिए सबसे कमजोर कड़ी अमेरिकी बॉन्ड यील्ड है."
सरल और प्रभावी, लेकिन डरावना.
इसलिए नहीं कि ये आंकड़े उन लोगों के लिए चौंकाने वाले थे जो रोजाना बाजार को देखते हैं. बल्कि इसलिए क्योंकि कोटक, एक स्थापित बैंकर, वह व्यक्ति जिसने यह समझते हुए अपनी संपत्ति बनाई कि केंद्रीय बैंक कैसे सोचते हैं, कैसे कदम उठाते हैं और कैसे दुनिया को सहारा देते हैं, अब खतरे की घंटी बजा रहे थे.
इसका संकेत बिल्कुल साफ था: कुछ टूट चुका है. इक्विटी बाजारों के लिए यह संगीत कभी भी बंद हो सकता है. फेड अब इसे ठीक नहीं कर सकता.
तभी एंट्री होती है केविन वार्श की, नए फेड चेयर की, जिन्हें अब तक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबी व्यक्ति के रूप में देखा जा रहा है. वार्श ऐसे व्यक्ति हैं जो छोटे देशों के आकार जितनी बड़ी बैलेंस शीट में विश्वास नहीं रखते. उनका मानना है कि तरलता (लिक्विडिटी) को कम करना कोई समस्या नहीं बल्कि व्यवस्था का हिस्सा है.
और अचानक 14 साल का दौर 2008 से 2021 तक मुफ्त पैसे, शून्य ब्याज दरों और 24/7 चलने वाली मनी प्रिंटिंग मशीनों का दौर आधिकारिक तौर पर खत्म हो गया.
कोटक का ट्वीट एक बैंकर की प्रार्थना थी. कृपया कोई इस स्थिति को संभाल ले... कम से कम कोशिश तो करे.
रिंग में उतरता स्ट्रीट फाइटर
कोटक के मुंबई ऑफिस से करीब 500 किलोमीटर दूर, अहमदाबाद के शांतिग्राम स्थित एक और शानदार ऑफिस में जुगेशिंदर "रॉबी" सिंह ने इसे पढ़ा... शायद वह हंसे भी होंगे.
रॉबी सिंह विनम्र वित्तीय दुनिया के लिए नहीं बने हैं. उन्होंने अपना पूरा करियर अडानी ग्रुप में बिताया है, भारत के सबसे आक्रामक, महत्वाकांक्षी और विवादित कारोबारी समूहों में से एक को कठिन परिस्थितियों से निकालते हुए.
राजनीतिक तूफान, मीडिया हमले, नियामकीय चुनौतियां. रॉबी ने नियामकों, विश्लेषकों, शॉर्ट सेलर्स और उन आलोचकों का सामना किया जिन्होंने कहा कि उनके बॉस बहुत जोखिम भरे, बहुत बड़े और अछूते हैं.
रॉबी सिर्फ इन लड़ाइयों से बचे नहीं. वह इनसे मजबत हुए. वह एक बात जानते हैं जो ज्यादातर बैंकर नहीं जानते: आराम मजबूती का दुश्मन है.
इसलिए जब उदय कोटक, भारतीय बैंकिंग के सुनहरे सितारे, वह व्यक्ति जिसे 2008 से भारत के केंद्रीय बैंक की उदार नीतियों का फायदा मिला बॉन्ड यील्ड को लेकर चिंता जता रहे थे, तो रॉबी ने इसे अलग नजरिए से देखा.
उन्होंने कमजोरी देखी. उन्होंने निर्भरता देखी. उन्होंने ऐसे मनी मैनेजरों की पूरी पीढ़ी देखी जो भूल चुके थे कि असली पूंजीवाद कैसा महसूस होता है.
उन्होंने अपना X ऐप खोला और बिना किसी हिचक के जवाब दिया.
सड़क से आया संदेश
"4.70% ट्रेजरी यील्ड को लेकर घबराहट पूरी तरह हास्यास्पद है."
ये छह शब्द एक चुनौती थे. कोटक की सोच को सीधी चुनौती.
रॉबी ने शब्दों को नहीं तौला. उन्होंने ऐसे लिखा जैसे कोई व्यक्ति जिसने दो दशक संघर्ष के मैदान में बिताए हों, जिसने बोर्ड में टकराव देखे हों, नियामकों को अपनी कंपनी पर कार्रवाई करते देखा हो और फिर भी मजबूती से खड़ा रहा हो.
उन्होंने सीधे निशाना साधा.
"मनी मैनेजरों की पूरी एक पीढ़ी 2008-2021 की फेड लिक्विडिटी की आदी हो गई. उन्हें लगता है कि शून्य ब्याज दर सामान्य है. ऐसा नहीं है. यह एक कृत्रिम असामान्यता थी जिसने आलसी पूंजी और आलसी बैंकरों को सब्सिडी दी."
हां, इसे दोबारा पढ़िए.
आलसी पूंजी. आलसी बैंकर.
यह सिर्फ आलोचना नहीं थी. यह तंज था. यह एक स्ट्रीट फाइटर की आवाज थी जो स्थापित व्यवस्था से कह रहा था कि उन्होंने एक भ्रम चलाया और अब जब वह खत्म हो रहा है तो वे शिकायत कर रहे हैं.
इसके बाद रॉबी ने आंकड़े पेश किए, एक बड़ा प्रहार:
"1990 से 2008 तक आधुनिक विकास का सबसे स्थिर दौर, 10 साल की यील्ड औसतन 5.68% थी (मीडियन करीब 5.35%). हम संकट में नहीं हैं; हम ऐतिहासिक सामान्य स्थिति में लौट रहे हैं."
मतलब साफ था: उदय कोटक, आप उस चीज को लेकर घबरा रहे हैं जो 18 वर्षों तक सामान्य स्थिति थी. आपकी पीढ़ी मुफ्त पैसे की इतनी आदी हो गई कि आप भूल गए कि वास्तविक बाजार कैसे दिखते हैं.
फिर आया अंतिम वार. वह लाइन जिसने दिग्गजों और पर्यटकों के बीच अंतर कर दिया:
"अगर आपका बिजनेस मॉडल सिर्फ इसलिए चलता है क्योंकि केंद्रीय बैंक आपके लिए लिक्विडिटी में हेरफेर करता रहे, तो आपके पास बिजनेस नहीं है—आप एक चैरिटी केस हैं."
सबटेक्स्ट: भारत के भविष्य को लेकर दो नजरिए
यहां ज्यादातर लोग एक महत्वपूर्ण बात को नजरअंदाज कर गए.
यह सिर्फ बॉन्ड यील्ड को लेकर बहस नहीं थी. यह उस सवाल पर मूलभूत मतभेद था कि उस दुनिया में पूंजीवाद कैसा दिखेगा, जहां केंद्रीय बैंक अब सहारा देने वाली भूमिका में नहीं होंगे.
कोटक का नजरिया: बैंकर की प्रार्थना
उदय कोटक ने अपना साम्राज्य ऐसे दौर में बनाया जब फेड लगातार बाजार को सहारा देता रहा.
वित्तीय संकट आया? फेड ने पैसा छापा.
महामारी आई? फेड ने हस्तक्षेप किया.
उनकी पूरी सोच इस धारणा पर आधारित रही कि केंद्रीय बैंक हमेशा गिरते बाजार को संभालने के लिए मौजूद रहेंगे.
कोटक बैंक की तरह ज्यादातर भारतीय बैंक भी इसी आधारभूत धारणा पर निर्भर हो गए थे. कम ब्याज दरों का मतलब था आसान कर्ज. फेड की लिक्विडिटी का मतलब था कि वैश्विक पूंजी उभरते बाजारों की ओर आती रहे.
पूरा ढांचा वैल्यूएशन, लीवरेज और रिटर्न की उम्मीदें, इस नींव पर खड़ा था कि "केंद्रीय बैंक हमेशा हस्तक्षेप करेंगे."
जब कोटक "एकिलीज हील" की बात कर रहे हैं, तो उनका वास्तविक मतलब है:
"अगर फेड लिक्विडिटी देना बंद कर देता है तो हमारा मॉडल टूट जाएगा."
यह सिर्फ कोटक बैंक की बात नहीं है. यह उन सभी कंपनियों और कारोबारों की बात है चाहे वे भारतीय हों या वैश्विक, जो पूरी तरह कर्ज पर निर्भर हैं, जो कैरी ट्रेड (कम ब्याज पर उधार लेकर कहीं और ज्यादा रिटर्न के लिए निवेश करना) से पैसा कमा रहे हैं और जो लगभग शून्य उधारी लागत और ज्यादा एसेट रिटर्न के अंतर पर टिके हुए हैं.
सिंह का नजरिया: डार्विनियन बदलाव
रॉबी सिंह अलग मिट्टी के बने हैं.
अडानी ग्रुप में उन्होंने देखा है कि जब समूह पर लगातार दबाव बना तो पूंजी महंगी होती गई.
जब आप पोर्ट, पावर प्लांट, एयरपोर्ट और LNG टर्मिनल बना रहे होते हैं, जब आपका पूरा मॉडल 30 साल तक शून्य ब्याज वाले कर्ज पर निर्भर नहीं होता, तो आप वास्तविक रिटर्न और वास्तविक बिजनेस मॉडल पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करते हैं.
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि आप केंद्रीय बैंकों के मूड में बदलाव से प्रभावित नहीं होते.
रॉबी सिंह का संदेश है:
"अच्छा है. अब कमजोर खत्म होंगे. अब गेहूं और भूसे में अंतर होगा. हमने 14 वर्षों तक अक्षमता को सब्सिडी दी है. वह दौर खत्म हो गया है. वास्तविक बिजनेस, जिनके पास असली प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त, वास्तविक कैश फ्लो और मजबूत आर्थिक आधार हैं, ठीक रहेंगे. कमजोर कंपनियां खत्म हो जाएंगी."
यह एक स्ट्रीट फाइटर की मानसिकता है.
बॉक्सिंग मुकाबले में जब आपका प्रतिद्वंद्वी थक चुका हो, जब रेफरी उसका पक्ष लेना बंद कर दे और नियम निष्पक्ष होने वाले हों, तो आप शिकायत नहीं करते. आप मौके का फायदा उठाते हैं.
सिंह कह रहे हैं: "हम इसके लिए तैयार हैं. हमने वास्तविक बाजार में अपनी चोटें खाकर अनुभव हासिल किया है. अब बाकी सभी को भी यही करना होगा."
असली मायने: 4.70% यील्ड वास्तव में क्या संकेत देती है?
आइए स्पष्ट करते हैं कि सतह के नीचे वास्तव में क्या हो रहा है.
क्या फेड खेल से बाहर हो रहा है?
ऐसा लगता है कि नए फेड चेयर केविन वार्श वही नहीं करेंगे जो बर्नांके, येलेन या पॉवेल ने किया.
वह पहली परेशानी पर पैसा नहीं छापेंगे.
वह पहले से ब्याज दरों में कटौती नहीं करेंगे.
वह बाजार को गिरावट से बचाने के लिए तुरंत हस्तक्षेप नहीं करेंगे.
इसका मतलब क्या है?
पूंजी की अब एक कीमत होगी.
अगर आप 100 मिलियन डॉलर उधार लेना चाहते हैं, तो उसकी लागत वास्तविक जोखिम को दर्शाएगी—फेड द्वारा दी गई कृत्रिम राहत को नहीं.
कैरी ट्रेड का दौर खत्म हो सकता है
पूरी व्यवस्था, जिसमें "2% पर डॉलर में उधार लो और 6% रिटर्न देने वाली उभरती बाजार की संपत्तियों में निवेश करो" जैसी रणनीति शामिल थी, अब कमजोर पड़ रही है.
अब आपको वास्तविक प्रतिस्पर्धा के बीच 4% रिटर्न कमाना होगा, सिर्फ फेड की नीति का फायदा उठाकर नहीं.
## कमजोर कंपनियां खत्म होंगी
हर वह बिजनेस मॉडल जो सिर्फ इसलिए चल रहा था क्योंकि ब्याज दरें लगभग शून्य थीं, अब सामने आएगा.
ऐसी लाखों कंपनियां हैं.
वास्तविक पूंजी दुर्लभ और मूल्यवान होगी
जिन कंपनियों के पास वास्तविक कमाई क्षमता, प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त और मजबूत नकदी प्रवाह है, उन्हें महत्व मिलेगा. वहीं, जिन कंपनियों को लगातार केंद्रीय बैंक के सहारे की जरूरत है, वे कमजोर पड़ जाएंगी.
छिपा हुआ सम्मान
इस बहस में लोग एक बात भूल रहे हैं.
रॉबी सिंह ने पूरे भारतीय वित्तीय प्रतिष्ठान को चुनौती दी है.
कोटक की चिंता गलत नहीं है.
उनका बैंक और ज्यादातर भारतीय बैंक एक खास मौद्रिक व्यवस्था के आदी हो चुके हैं.
आसान ब्याज दरें, ज्यादा डिपॉजिट जुटाने की होड़, कम फंडिंग लागत और वर्षों तक बढ़ती संपत्ति कीमतों के बीच कमजोर क्रेडिट फैसलों को छिपाने की क्षमता.
जब 4.70% ट्रेजरी यील्ड उभरते बाजारों से पूंजी बाहर निकालने लगेगी, जब वैश्विक निवेशकों को अचानक महसूस होगा कि वे बिना जोखिम के 5% कमा सकते हैं, तो खेल तेजी से बदल जाएगा.
कोटक एक उचित चेतावनी दे रहे हैं.
लेकिन रॉबी का कहना है:
"हां, खेल बदल रहा है. अच्छा है. खुद को मजबूत बनाओ."
और एक अजीब तरीके से यही सलाह वास्तव में आपको बचा सकती है.
टकराव की भविष्यवाणी
यह वास्तव में दो तरह के बिजनेस लीडर्स के बीच का अंतर है:
बैंकर (कोटक): वह चिंता करते हैं कि बाहरी परिस्थितियां अनुकूल नहीं रहेंगी. उनकी उम्मीद है कि केंद्रीय बैंक उस व्यवस्था को जारी रखेंगे जिसने उन्हें सफल बनाया.
स्ट्रीट फाइटर (रॉबी): वह मानते हैं कि बाहरी परिस्थितियां कभी अनुकूल नहीं होंगी. उनकी उम्मीद है कि उन्होंने इतनी आंतरिक ताकत बनाई है कि वे किसी भी परिस्थिति का सामना कर सकें.
एक की सोच इस उम्मीद पर आधारित है कि व्यवस्था आपकी रक्षा करेगी.
दूसरे की सोच इस विश्वास पर आधारित है कि आप किसी भी परिस्थिति में टिक सकते हैं.
जब 4.70% ट्रेजरी यील्ड आई, तो कोटक ने इसमें कमजोरी देखी.
लेकिन रॉबी ने इसमें अवसर देखा.
यही अंतर, सोच का मूलभूत अंतर और शायद एक पीढ़ीगत अंतर, इस टकराव का असली मतलब है.
पुराना बनाम नया.
आगे क्या होगा
अब बाजार फैसला करेगा.
वे कंपनियां और नेता जिन्होंने पिछले 14 वर्षों में वास्तव में निर्माण किया है मुश्किल फैसले लिए हैं, कठिन प्रतिस्पर्धियों से मुकाबला किया है और वास्तविक प्रतिस्पर्धात्मक ताकत बनाई है , वे आगे बढ़ेंगे.
वहीं वे कंपनियां जो फेड की नीतियों का फायदा उठाकर चल रही थीं, कर्ज पर सवार, कैरी ट्रेड पर निर्भर और शून्य ब्याज दरों वाली उधारी तथा ऊंचे रिटर्न वाली संपत्तियों के अंतर से पैसा बना रही थीं, उन्हें बड़ा झटका लग सकता है.
कोटक की चेतावनी कुछ हद तक सही साबित होगी:
दर्द होगा और बदलाव कठिन हो सकता है.
लेकिन रॉबी की भविष्यवाणी ज्यादा टिकाऊ साबित हो सकती है:
यह स्वस्थ बदलाव है. यही वास्तविक पूंजीवाद का तरीका है और मजबूत बिजनेस मॉडल वाली कंपनियां ही टिकती हैं.
4.70% ट्रेजरी यील्ड कोई "एकिलीज हील" नहीं है.
यह एक रीसेट बटन है.
और भारतीय वित्त जगत के दिग्गजों के लिए सवाल यह नहीं है कि वे इससे बच पाएंगे या नहीं.
सवाल यह है कि क्या वे इसके लिए पहले से तैयारी कर रहे थे?
ऐसा लगता है कि रॉबी सिंह कर रहे थे.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
वैश्विक रेटिंग एजेंसी ने बैंक को Baa2/P-2 रेटिंग दी, मजबूत पूंजी स्थिति और कारोबार में वृद्धि की उम्मीद को बताया आधार
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वैश्विक रेटिंग एजेंसी Moody’s Ratings ने RBL बैंक को पहली बार इन्वेस्टमेंट ग्रेड इश्यूअर रेटिंग प्रदान की है. Moody’s (मूडीज) ने बैंक को Baa2/P-2 रेटिंग दी है और इसका आउटलुक स्थिर (Stable) रखा है. रेटिंग एजेंसी ने यह रेटिंग बैंक की मजबूत फ्रेंचाइजी, बेहतर पूंजी स्थिति और अगले दो से तीन वर्षों में कारोबार में निरंतर वृद्धि की उम्मीदों के आधार पर दी है. Moody’s ने कहा कि यह रेटिंग बैंक की वित्तीय प्रतिबद्धताओं को पूरा करने की पर्याप्त क्षमता और बेहतर होते क्रेडिट प्रोफाइल को दर्शाती है.
मजबूत पूंजी स्थिति बनी रेटिंग का आधार
Moody’s के अनुसार, RBL बैंक की बढ़ती बाजार पहुंच, कारोबार विस्तार की संभावनाएं और मजबूत पूंजीकरण स्तर इस रेटिंग के प्रमुख आधार हैं. स्थिर आउटलुक से संकेत मिलता है कि रेटिंग एजेंसी को उम्मीद है कि RBL बैंक अपनी एसेट क्वालिटी, पूंजी बफर और लाभप्रदता को मजबूत बनाए रखेगा और बैलेंस शीट को और बेहतर करेगा.
रेटिंग में दो पायदान का अतिरिक्त लाभ (Two-notch uplift) बैंक के सबसे बड़े शेयरधारक Emirates NBD Bank से मिलने वाले संभावित रणनीतिक समर्थन को ध्यान में रखते हुए दिया गया है. Moody’s ने कहा कि यह समर्थन बैंक की वित्तीय मजबूती को लेकर अतिरिक्त भरोसा पैदा करता है.
वैश्विक फंडिंग तक पहुंच होगी आसान
RBL बैंक की पहली अंतरराष्ट्रीय इन्वेस्टमेंट ग्रेड रेटिंग से बैंक की वैश्विक फंडिंग बाजारों तक पहुंच मजबूत होने और निवेशकों का भरोसा बढ़ने की उम्मीद है. ऐसी रेटिंग को विदेशी निवेशकों और डेट मार्केट से जुड़े प्रतिभागियों द्वारा बारीकी से देखा जाता है, क्योंकि इसका असर फंडिंग लागत और अंतरराष्ट्रीय पूंजी जुटाने की क्षमता पर पड़ता है.
बैंकिंग सेक्टर में मजबूत हो रही पूंजी स्थिति
यह घोषणा ऐसे समय में हुई है जब भारतीय बैंक लगातार अपनी पूंजी स्थिति को मजबूत कर रहे हैं और स्थिर क्रेडिट ग्रोथ के बीच फंडिंग स्रोतों में विविधता ला रहे हैं. RBL बैंक के लिए यह रेटिंग बाजार में अपनी छवि सुधारने और लंबे समय तक कारोबार विस्तार को समर्थन देने की दिशा में एक अहम उपलब्धि मानी जा रही है.
1 अगस्त से लागू हुई नई कीमतें, लगातार दूसरे महीने कम हुए व्यावसायिक गैस सिलेंडर के दाम; घरेलू LPG की कीमतों में कोई बदलाव नहीं
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
व्यावसायिक उपयोग वाले LPG सिलेंडर की कीमतों में 209 रुपये तक की कटौती की गई है. तेल विपणन कंपनियों (OMCs) ने 1 अगस्त से 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल LPG सिलेंडर के नए दाम लागू कर दिए हैं. इस कटौती से होटल, रेस्टोरेंट, कैटरिंग कंपनियों और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को राहत मिलने की उम्मीद है, जो बड़े पैमाने पर LPG का इस्तेमाल करते हैं.
यह कमर्शियल LPG कीमतों में लगातार दूसरी मासिक कटौती है. हालांकि, घरेलू रसोई गैस सिलेंडर (14.2 किलोग्राम) की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है.
दिल्ली में 202 रुपये और कोलकाता में 209 रुपये की कटौती
तेल विपणन कंपनियों ने 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल LPG सिलेंडर की कीमतों में दिल्ली में 202 रुपये और कोलकाता में 209 रुपये की कमी की है. मुंबई, चेन्नई और अन्य प्रमुख शहरों में भी इसी तरह की कटौती की गई है. यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बावजूद अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा कीमतों में कुछ नरमी देखने को मिली है.
होटल-रेस्टोरेंट और छोटे कारोबारियों को फायदा
कमर्शियल LPG की कीमतों में कमी से उन कारोबारों की परिचालन लागत कम होने की उम्मीद है, जहां ईंधन का इस्तेमाल काफी अधिक होता है. खासतौर पर होटल, रेस्टोरेंट, कैटरर्स और छोटे फूड आउटलेट्स को इसका सीधा लाभ मिलेगा.
इससे पहले जुलाई में भी कमर्शियल LPG सिलेंडर की कीमतों में कटौती की गई थी. साल 2026 की शुरुआत में वैश्विक ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव और आपूर्ति संबंधी बाधाओं के कारण कमर्शियल LPG की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई थी. ऐसे में लगातार दो महीनों में हुई कटौती कारोबारियों के लिए बड़ी राहत मानी जा रही है.
घरेलू LPG सिलेंडर के दाम स्थिर
जहां कमर्शियल LPG उपभोक्ताओं को राहत मिली है, वहीं घरेलू उपयोग वाले 14.2 किलोग्राम LPG सिलेंडर की कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ है. तेल विपणन कंपनियां हर महीने LPG कीमतों की समीक्षा करती हैं. कीमतों में बदलाव मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा कीमतों, आयात लागत और विदेशी मुद्रा दरों के आधार पर किया जाता है.
कारोबारियों को आगे भी राहत की उम्मीद
कमर्शियल LPG कीमतों में कटौती ऐसे समय में हुई है जब कारोबारी बढ़ती इनपुट लागत को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे हैं. कम ईंधन लागत से हॉस्पिटैलिटी और फूड सर्विस सेक्टर को फायदा मिलने की उम्मीद है.
हालांकि, वैश्विक कच्चे तेल और LPG कीमतों पर अभी भी भू-राजनीतिक घटनाओं और आपूर्ति की स्थिति का असर बना हुआ है. अगर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में स्थिरता जारी रहती है तो आने वाले महीनों में कमर्शियल ईंधन कीमतों में और नरमी देखने को मिल सकती है.
US जेनरिक और अफ्रीका कारोबार ने कंपनी की ग्रोथ को दी मजबूती, एडजस्टेड EBITDA बढ़कर 454 करोड़ रुपये हुआ.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अजंता फार्मा (Ajanta Pharma) ने जून 2026 को समाप्त पहली तिमाही में मजबूत वित्तीय प्रदर्शन दर्ज किया है. कंपनी का कंसोलिडेटेड शुद्ध लाभ (PAT) सालाना आधार पर 31% बढ़कर 334 करोड़ रुपये हो गया, जबकि पिछले साल की समान तिमाही में यह 255 करोड़ रुपये था.
कंपनी की परिचालन से आय (Revenue from Operations) 25% बढ़कर 1,626 करोड़ रुपये हो गई, जो पिछले साल की इसी अवधि में 1,303 करोड़ रुपये थी. विदेशी मुद्रा नुकसान को छोड़कर एडजस्टेड EBITDA 21% बढ़कर 454 करोड़ रुपये रहा. इस दौरान EBITDA मार्जिन 28% और PAT मार्जिन 21% रहा.
US जेनरिक और अफ्रीका कारोबार से मिली रफ्तार
अजंता फार्मा के US जेनरिक कारोबार में सबसे अधिक वृद्धि दर्ज की गई. इस सेगमेंट का राजस्व 57% बढ़कर 487 करोड़ रुपये हो गया, जो पिछले साल 310 करोड़ रुपये था.
अफ्रीका इंस्टीट्यूशनल कारोबार का राजस्व 83% बढ़कर 70 करोड़ रुपये पहुंच गया. वहीं भारत, एशिया और अफ्रीका में ब्रांडेड-जेनरिक कारोबार से आय 13% बढ़कर 1,059 करोड़ रुपये रही.
भारत के ब्रांडेड-जेनरिक कारोबार का राजस्व 24% बढ़कर 509 करोड़ रुपये हो गया, जबकि अफ्रीका ब्रांडेड-जेनरिक कारोबार में 30% की वृद्धि के साथ आय 295 करोड़ रुपये रही. हालांकि, एशिया कारोबार का राजस्व 16% घटकर 255 करोड़ रुपये रह गया.
भारत में फार्मा बाजार से बेहतर प्रदर्शन
अजंता फार्मा के भारत ब्रांडेड-जेनरिक पोर्टफोलियो में 15% की वृद्धि हुई, जबकि भारतीय फार्मास्युटिकल बाजार में 11% की ग्रोथ दर्ज की गई.
कंपनी के ऑप्थैल्मोलॉजी (नेत्र चिकित्सा) और पेन मैनेजमेंट (दर्द प्रबंधन) सेगमेंट में 15% की वृद्धि हुई. वहीं डर्मेटोलॉजी कारोबार 14% बढ़ा, जबकि कार्डियोलॉजी सेगमेंट में 9% की ग्रोथ रही.
US बाजार के लिए दो नए प्रोडक्ट लॉन्च
कंपनी को तिमाही के दौरान तीन Abbreviated New Drug Application (ANDA) की मंजूरी मिली और अमेरिका में दो नए उत्पाद लॉन्च किए गए. अजंता फार्मा के कुल कमर्शियलाइज्ड ANDA की संख्या बढ़कर 51 हो गई है. वहीं, 17 आवेदन अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (US FDA) के पास मंजूरी के लिए लंबित हैं, जबकि पांच आवेदनों को टेंटेटिव अप्रूवल मिल चुका है.
R&D खर्च बढ़ा, 400 करोड़ रुपये के अंतरिम डिविडेंड को मंजूरी
कंपनी ने रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) पर खर्च बढ़ाकर 66 करोड़ रुपये कर दिया, जो पिछले साल 56 करोड़ रुपये था. यह कंपनी के कुल राजस्व का करीब 4% है. अजंता फार्मा का रिटर्न ऑन कैपिटल एम्प्लॉयड (ROCE) 37% और रिटर्न ऑन नेट वर्थ (RONW) 28% रहा.
कंपनी के बोर्ड ने 2 रुपये के फेस वैल्यू वाले प्रत्येक शेयर पर 32 रुपये के अंतरिम लाभांश (Interim Dividend) को मंजूरी दी है. इस डिविडेंड पर कंपनी का कुल भुगतान करीब 400 करोड़ रुपये होगा.
इस साझेदारी के तहत कंपनियां यह आकलन करेंगी कि eVTOL विमान 'लास्ट-माइल' आपातकालीन मेडिकल लॉजिस्टिक्स में किस तरह मददगार साबित हो सकते हैं.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में आपातकालीन मेडिकल सप्लाई की डिलीवरी को तेज और अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में एयर इंडिया ने जापान की eVTOL (इलेक्ट्रिक वर्टिकल टेक-ऑफ एंड लैंडिंग) विमान निर्माता स्काईड्राइव (SkyDrive) और सुजुकी मोटर कॉर्पोरेशन (Suzuki Motor Corporation) के साथ समझौता (MoU) किया है. तीनों कंपनियां मिलकर यह अध्ययन करेंगी कि भीड़भाड़ वाले भारतीय शहरों में समय-संवेदनशील चिकित्सा सामग्री की ढुलाई के लिए eVTOL विमानों का इस्तेमाल कितना व्यावहारिक और प्रभावी हो सकता है.
मेडिकल लॉजिस्टिक्स के लिए होगी व्यवहार्यता का अध्ययन
इस साझेदारी के तहत कंपनियां यह आकलन करेंगी कि eVTOL विमान 'लास्ट-माइल' आपातकालीन मेडिकल लॉजिस्टिक्स में किस तरह मददगार साबित हो सकते हैं. इसका उद्देश्य सड़क जाम के कारण होने वाली देरी को कम करना और उच्च मूल्य वाली तथा समय-संवेदनशील मेडिकल सप्लाई को तेजी से अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचाना है.
तीनों कंपनियों की होगी अलग-अलग भूमिका
प्रस्तावित सहयोग के तहत स्काईड्राइव अपनी eVTOL तकनीक उपलब्ध कराएगी. एयर इंडिया विमान संचालन, एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर और एविएशन इकोसिस्टम से जुड़े अपने अनुभव का योगदान देगी. वहीं, सुजुकी भारतीय बाजार की समझ और स्थानीय परिचालन संबंधी विशेषज्ञता के आधार पर सुरक्षित, भरोसेमंद और बड़े पैमाने पर लागू किए जा सकने वाले मॉडल का मूल्यांकन करेगी.
फिलहाल यह पहल व्यवहार्यता अध्ययन (Feasibility Study) के चरण में है और कंपनियों ने इसके व्यावसायिक संचालन की कोई समयसीमा घोषित नहीं की है.
मेडिकल सप्लाई की डिलीवरी होगी तेज
एयर इंडिया के कार्गो प्रमुख रमेश ममिडाला ने कहा कि भारत का विमानन बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है और ऐसे में एडवांस्ड एयर मोबिलिटी देश के परिवहन नेटवर्क का अहम हिस्सा बन सकती है. उनके मुताबिक, मेडिकल एयर लॉजिस्टिक्स में eVTOL विमानों का उपयोग तकनीक और सामाजिक उद्देश्य का प्रभावी मेल है, क्योंकि इससे आपातकालीन चिकित्सा सामग्री की डिलीवरी का समय काफी कम किया जा सकता है.
एयर इंडिया इस अध्ययन के दौरान यह भी आकलन करेगी कि eVTOL संचालन को मौजूदा विमानन ढांचे और एयरपोर्ट नेटवर्क के साथ किस प्रकार जोड़ा जा सकता है.
भारत पर स्काईड्राइव और सुजुकी का फोकस
स्काईड्राइव के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) तोमोहिरो फुकुजावा ने कहा कि भारत जैसे बड़े और भीड़भाड़ वाले बाजार में eVTOL विमान उच्च मूल्य और समय-संवेदनशील मेडिकल सप्लाई की ढुलाई का प्रभावी समाधान बन सकते हैं.
सुजुकी और स्काईड्राइव पहले से ही eVTOL तकनीक पर साथ काम कर रहे हैं. दोनों कंपनियों ने 2022 में इस क्षेत्र में साझेदारी शुरू की थी, जिसके बाद सुजुकी ने स्काईड्राइव में निवेश किया और विनिर्माण सहयोग समझौता भी किया.
भारत को लेकर भी दोनों कंपनियां पहले से सक्रिय हैं. जुलाई 2025 में सुजुकी ने भारत को अपने प्रमुख विदेशी बाजारों में शामिल करने की रणनीति की घोषणा की थी. वहीं, जनवरी 2025 में स्काईड्राइव को भारतीय प्राइवेट जेट ऑपरेटर JetSetGo से 50 SKYDRIVE विमानों का प्री-ऑर्डर भी मिला था.
अगला कदम
अब तीनों कंपनियां संयुक्त रूप से यह अध्ययन करेंगी कि उनकी तकनीकी और परिचालन क्षमताओं को एकीकृत कर भारत के लिए सुरक्षित, व्यावहारिक और व्यावसायिक रूप से सक्षम मेडिकल एयर लॉजिस्टिक्स मॉडल विकसित किया जा सकता है या नहीं.
R&D पर GDP के अनुपात में खर्च के मामले में भारत कई प्रमुख ब्रिक्स देशों से पीछे है. चीन ने 2024 में अपने GDP का 2.69 प्रतिशत, ब्राजील ने 2023 में 1.19 प्रतिशत और रूस ने 2024 में लगभग 0.94 प्रतिशत R&D पर खर्च किया.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में शोध एवं विकास (R&D) पर कुल निवेश पिछले चार वर्षों में 85 प्रतिशत बढ़कर 2.45 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है. हालांकि, सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के अनुपात में R&D पर खर्च अब भी केवल 0.84 प्रतिशत है, जो चीन, ब्राजील और रूस जैसे ब्रिक्स देशों से कम है. वहीं, इस दौरान एक बड़ा बदलाव यह देखने को मिला कि पहली बार R&D निवेश में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी सरकार से अधिक हो गई.
लोकसभा में सरकार की ओर से साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2019-20 में R&D पर कुल खर्च 1.33 लाख करोड़ रुपये था, जो 2023-24 में बढ़कर 2.45 लाख करोड़ रुपये हो गया. इसी अवधि में GDP के मुकाबले R&D खर्च की हिस्सेदारी 0.66 प्रतिशत से बढ़कर 0.84 प्रतिशत हुई. हालांकि, यह 2035 तक R&D पर GDP का 2 प्रतिशत खर्च करने के राष्ट्रीय लक्ष्य से अभी काफी दूर है.
BRICS देशों की तुलना में भारत पीछे
R&D पर GDP के अनुपात में खर्च के मामले में भारत कई प्रमुख ब्रिक्स देशों से पीछे है. चीन ने 2024 में अपने GDP का 2.69 प्रतिशत, ब्राजील ने 2023 में 1.19 प्रतिशत और रूस ने 2024 में लगभग 0.94 प्रतिशत R&D पर खर्च किया. भारत का यह आंकड़ा 0.84 प्रतिशत रहा. हालांकि, दक्षिण अफ्रीका (0.61 प्रतिशत) और वियतनाम (0.41 प्रतिशत) का खर्च भारत से कम दर्ज किया गया.
पहली बार निजी क्षेत्र ने सरकार को पीछे छोड़ा
रिपोर्ट के अनुसार, भारत के R&D निवेश ढांचे में उल्लेखनीय बदलाव आया है. वर्ष 2019-20 में कुल R&D खर्च में सरकार की हिस्सेदारी 66.2 प्रतिशत थी, जो 2023-24 में घटकर 48.2 प्रतिशत रह गई. इसके विपरीत, निजी उद्योग की हिस्सेदारी 33.8 प्रतिशत से बढ़कर 51.8 प्रतिशत हो गई. यह पहला अवसर है जब देश में शोध एवं विकास पर निजी क्षेत्र का निवेश सरकारी हिस्सेदारी से अधिक रहा.
निजी निवेश में ढाई गुना उछाल
निजी क्षेत्र का R&D पर निवेश 2019-20 के 44,754 करोड़ रुपये से बढ़कर 2023-24 में 1.18 लाख करोड़ रुपये हो गया. यानी चार वर्षों में यह करीब ढाई गुना बढ़ा और इसकी चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) 27.52 प्रतिशत रही.
राज्यों की भागीदारी अब भी सीमित
दूसरी ओर, राज्य सरकारों का योगदान अपेक्षाकृत कमजोर बना हुआ है. 2019-20 से 2023-24 के बीच राज्यों के R&D खर्च में केवल 3.4 प्रतिशत की वार्षिक चक्रवृद्धि वृद्धि दर्ज की गई. 2023-24 में देश के कुल R&D खर्च में राज्यों की हिस्सेदारी महज 4 प्रतिशत रही, जो शोध एवं नवाचार के क्षेत्र में उनकी सीमित भूमिका को दर्शाती है.
अप्रैल-जून तिमाही के दौरान 22 राज्यों ने संयुक्त रूप से पूंजीगत व्यय के लिए निर्धारित 10.45 लाख करोड़ रुपये के बजट में से 1.11 लाख करोड़ रुपये खर्च किए.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में राज्यों के पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) की रफ्तार सुस्त रही है. नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) के मासिक खातों के विश्लेषण के अनुसार, 22 राज्यों ने अप्रैल-जून अवधि में अपने पूंजीगत व्यय बजट का औसतन केवल 10.67 प्रतिशत खर्च किया, जो पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि के 10.94 प्रतिशत से कम है. रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे बड़े राज्यों का प्रदर्शन भी अपेक्षा से कमजोर रहा, जबकि केरल ने सबसे बेहतर प्रदर्शन किया.
अप्रैल-जून तिमाही के दौरान 22 राज्यों ने संयुक्त रूप से पूंजीगत व्यय के लिए निर्धारित 10.45 लाख करोड़ रुपये के बजट में से 1.11 लाख करोड़ रुपये खर्च किए. हालांकि, यह पिछले छह वर्षों की पहली तिमाहियों में खर्च की गई सबसे बड़ी वास्तविक राशि है, लेकिन बजट आवंटन के मुकाबले खर्च का अनुपात घटा है.
पिछले वर्षों की तुलना में कैसी रही तस्वीर?
सीएजी के आंकड़ों के अनुसार, पहली तिमाही में कैपेक्स खर्च का अनुपात पिछले कुछ वर्षों से सीमित दायरे में बना हुआ है. वित्त वर्ष 2023 में यह सबसे कम 9.02 प्रतिशत रहा था, जबकि वित्त वर्ष 2024 में यह 13.23 प्रतिशत के उच्च स्तर पर पहुंचा था. मौजूदा वित्त वर्ष में 10.67 प्रतिशत का खर्च वित्त वर्ष 2023 और 2025 से बेहतर जरूर है, लेकिन वित्त वर्ष 2022 और 2026 की पहली तिमाही से कम है.
केरल ने दिखाई सबसे तेज रफ्तार
राज्यों में केरल ने सबसे बेहतर प्रदर्शन करते हुए अपने वार्षिक पूंजीगत व्यय बजट का 36.41 प्रतिशत पहली तिमाही में ही खर्च कर दिया. इसके बाद मध्य प्रदेश (18.21 प्रतिशत), आंध्र प्रदेश (16.61 प्रतिशत), हरियाणा (16.26 प्रतिशत) और हिमाचल प्रदेश (15.90 प्रतिशत) का स्थान रहा.
त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश पीछे
सबसे कमजोर प्रदर्शन त्रिपुरा का रहा, जिसने अपने पूंजीगत व्यय आवंटन का केवल 1.81 प्रतिशत खर्च किया. इसके बाद पश्चिम बंगाल (1.89 प्रतिशत) और मेघालय (3.03 प्रतिशत) रहे. बड़े राज्यों में उत्तर प्रदेश, जिसका कैपेक्स बजट 1.78 लाख करोड़ रुपये के साथ सबसे बड़ा है, उसने जून के अंत तक केवल 6.34 प्रतिशत राशि खर्च की. वहीं ओडिशा (5.19 प्रतिशत), तमिलनाडु (5.53 प्रतिशत) और कर्नाटक (6.83 प्रतिशत) भी पूंजीगत व्यय के मामले में धीमे रहे.
राजस्व व्यय और कर संग्रह की स्थिति
पहली तिमाही में 22 राज्यों ने कुल 9.66 लाख करोड़ रुपये का राजस्व व्यय किया, जो उनके संयुक्त वार्षिक राजस्व व्यय बजट का 18.52 प्रतिशत है. इस मामले में हिमाचल प्रदेश (25.01 प्रतिशत), आंध्र प्रदेश (24.66 प्रतिशत), तेलंगाना (23.38 प्रतिशत) और केरल (22.69 प्रतिशत) सबसे आगे रहे. वहीं झारखंड, बिहार और महाराष्ट्र का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा.
कर राजस्व के मोर्चे पर राज्यों ने अप्रैल-जून तिमाही में 7.73 लाख करोड़ रुपये की वसूली की, जो पूरे वित्त वर्ष 2026-27 के अनुमानित कर राजस्व 40.48 लाख करोड़ रुपये का 19.11 प्रतिशत है.
वैश्विक बाजार में सोने की कीमतों में सुधार का असर आरबीआई के गोल्ड रिजर्व पर भी दिखा. समीक्षा सप्ताह के दौरान सोने के भंडार का मूल्य 1.308 अरब डॉलर बढ़कर 103.058 अरब डॉलर हो गया.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) में मजबूती का सिलसिला लगातार चौथे सप्ताह भी जारी रहा है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 24 जुलाई 2026 को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 6.118 अरब डॉलर बढ़कर 682.354 अरब डॉलर पर पहुंच गया. इस बढ़ोतरी में विदेशी मुद्रा आस्तियों (FCA) के साथ-साथ सोने के भंडार के मूल्य में आई वृद्धि का अहम योगदान रहा.
आरबीआई के साप्ताहिक आंकड़ों के मुताबिक, इससे पहले वाले सप्ताह में भी विदेशी मुद्रा भंडार में 1.08 अरब डॉलर का इजाफा हुआ था. हालांकि, यह अब भी 27 फरवरी 2026 को दर्ज 728.494 अरब डॉलर के रिकॉर्ड उच्च स्तर से नीचे है.
विदेशी मुद्रा आस्तियों में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी
24 जुलाई को समाप्त सप्ताह के दौरान विदेशी मुद्रा आस्तियों (Foreign Currency Assets-FCA) में 4.873 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई, जिससे इनका कुल मूल्य बढ़कर 555.929 अरब डॉलर हो गया. विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा FCA का होता है. इसमें यूरो, पाउंड और येन जैसी प्रमुख वैश्विक मुद्राओं में होने वाले उतार-चढ़ाव का भी प्रभाव शामिल होता है.
सोने के भंडार का मूल्य भी बढ़ा
वैश्विक बाजार में सोने की कीमतों में सुधार का असर आरबीआई के गोल्ड रिजर्व पर भी दिखा. समीक्षा सप्ताह के दौरान सोने के भंडार का मूल्य 1.308 अरब डॉलर बढ़कर 103.058 अरब डॉलर हो गया. मार्च 2026 के अंत तक आरबीआई के पास 880.52 टन सोने का भंडार था, जो देश के कुल विदेशी मुद्रा भंडार का लगभग 16.7 प्रतिशत है.
SDR और IMF रिजर्व में मामूली गिरावट
दूसरी ओर, स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (SDR) में 53 मिलियन डॉलर की कमी दर्ज की गई, जिसके बाद इसका स्तर 18.617 अरब डॉलर रह गया. वहीं, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के पास रखे भारत के रिजर्व में भी 11 मिलियन डॉलर की गिरावट आई और यह 4.750 अरब डॉलर पर पहुंच गया.
कंपनी ने शुक्रवार को बताया कि असाधारण आम बैठक (EGM) में शेयरधारकों ने प्रमोटर समूह की इकाई को वरीयता आधार पर पूर्ण रूप से परिवर्तनीय वारंटजारी करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
कंटेंट और टेक्नोलॉजी कंपनी ZEE एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज (ZEE Entertainment Enterprises) को पूंजी जुटाने और कर्मचारी स्टॉक विकल्प योजना (ESOP) लागू करने के प्रस्तावों पर शेयरधारकों की मंजूरी मिल गई है. इस मंजूरी के तहत कंपनी के प्रमोटर समूह की इकाई 3,143.5 करोड़ रुपये का निवेश करेगी, जिससे प्रमोटर्स की हिस्सेदारी बढ़कर 23.79 प्रतिशत हो जाएगी. कंपनी का कहना है कि यह कदम उसकी वित्तीय स्थिति को मजबूत करने और दीर्घकालिक विकास रणनीति को गति देने में मदद करेगा.
शेयरधारकों ने EGM में दी मंजूरी
कंपनी ने शुक्रवार को बताया कि असाधारण आम बैठक (EGM) में शेयरधारकों ने प्रमोटर समूह की इकाई को वरीयता (Preferential) आधार पर पूर्ण रूप से परिवर्तनीय वारंट (Fully Convertible Warrants) जारी करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. इसके साथ ही ZEE और उसकी सहायक कंपनियों के कर्मचारियों के लिए 'ट्रूली यॉर्स' (Truly Yours) कर्मचारी स्टॉक विकल्प योजना (ESOP) को भी हरी झंडी मिल गई है.
कंपनी के अनुसार, इन प्रस्तावों को मंजूरी मिलने से उसकी वित्तीय नींव और मजबूत होगी, जिससे भविष्य में मूल्य सृजन करने वाले निवेश और विकास के अवसरों का लाभ उठाया जा सकेगा.
प्रमोटर करेंगे 3,143.5 करोड़ रुपये का निवेश
शेयरधारकों की मंजूरी के बाद ZEE, प्रमोटर समूह की इकाई को 126 रुपये प्रति वारंट की कीमत पर 24,94,85,563 पूर्ण रूप से परिवर्तनीय वारंट जारी करेगी. इसके जरिए प्रमोटर समूह कंपनी में 3,143.5 करोड़ रुपये का निवेश करेगा. इस निवेश के बाद कंपनी में प्रमोटर्स की कुल हिस्सेदारी बढ़कर 23.79 प्रतिशत हो जाएगी.
ZEE एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज के चेयरमैन आर. गोपालन ने कहा कि यह मंजूरी कंपनी और उसके प्रबंधन पर शेयरधारकों के भरोसे को दर्शाती है. उन्होंने कहा कि प्रमोटर्स द्वारा किए जा रहे पूंजी निवेश से कंपनी की वित्तीय मजबूती और लचीलापन बढ़ेगा, जिससे ZEE प्रतिस्पर्धा में आगे रहने और सभी हितधारकों के लिए अधिक मूल्य सृजित करने में सक्षम होगी.
'Truly Yours' ESOP योजना लागू होगी
कंपनी 'Truly Yours' ESOP योजना के तहत ZEE और उसकी सहायक कंपनियों के पात्र कर्मचारियों को एक या अधिक चरणों में 3,74,22,835 स्टॉक विकल्प (Stock Options) जारी करेगी. प्रत्येक विकल्प का अंकित मूल्य (Face Value) 1 रुपये होगा.
कंपनी का कहना है कि इस योजना का उद्देश्य कर्मचारियों को कंपनी की विकास यात्रा में वास्तविक भागीदार बनाना है. ESOP ढांचा कर्मचारियों की विकास आकांक्षाओं को कंपनी और उसके शेयरधारकों के दीर्घकालिक लक्ष्यों के साथ जोड़ता है, जिससे सभी हितधारकों के लिए सतत मूल्य सृजन सुनिश्चित किया जा सके.
विकास योजनाओं पर रहेगा फोकस
कंपनी के मुताबिक, अतिरिक्त पूंजी उपलब्ध होने से वह अपने नए रणनीतिक विकास क्षेत्रों में निवेश बढ़ाएगी और मौजूदा कारोबार की क्षमताओं को मजबूत करेगी. इससे कंपनी की दीर्घकालिक विकास रणनीति को गति मिलने की उम्मीद है.