रिलायंस रिटेल को उम्मीद है कि वह वॉल्यूम के हिसाब से अगले 2 साल में दुनिया की सबसे बड़ी गारमेंट सेलर बन सकती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
हिंडनबर्ग की रिपोर्ट के सताए गौतम अडानी (Gautam Adani) जहां निवेशकों का विश्वास पुन: हासिल करने के लिए कर्ज चुकाने पर माथापच्ची कर रहे हैं. वहीं, रिलायंस इंडस्ट्री के चेयरमैन मुकेश अंबानी (Mukesh Ambani) गारमेंट सेक्टर पर अपनी पकड़ मजबूत बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं. अंबानी अगले 2 सालों में दुनिया का सबसे बड़ा गारमेंट सेलर बनना चाहते हैं. दुनिया कोरोना संकट से काफी हद तक बाहर आ चुकी है और गारमेंट की मांग में तेजी आई है. इसी को ध्यान में रखते हुए अंबानी नंबर वन बनने की रणनीतियों पर काम कर रहे हैं.
मंदी के नहीं कोई संकेत
रिलायंस रिटेल को उम्मीद है कि वह वॉल्यूम के हिसाब से अगले 2 साल में दुनिया की सबसे बड़ी गारमेंट सेलर बन सकती है. कंपनी का मानना है कि गारमेंट सेक्टर में मंदी के कोई संकेत नहीं हैं, ऐसे में उसके लिए अपने लक्ष्य को हासिल करना मुश्किल नहीं होगा. एक रिपोर्ट में रिलायंस फैशन और लाइफस्टाइल के चीफ एग्जीक्यूटिव अखिलेश प्रसाद के हवाले से बताया गया है कि ग्राहकों का खर्च सेंटीमेंट पर आधारित है और भारत की ग्रोथ स्टोरी में कहीं कोई शक नहीं है. बाजार में में इस समय फील गुड फैक्टर काम कर रहा है, जिसके बूते रिलायंस रिटेल अपने कारोबारी साम्राज्य को तेजी से बढ़ाने जा रही है.
4000 से से ज्यादा स्टोर
रिलायंस रिटेल के 4000 से अधिक फैशन और अपैरल स्टोर हैं. उसके पोर्टफोलियो में ट्रेंड्स, सेंट्रो, आउट और फैशन कैटेगरी जैसे ब्रैंड शामिल हैं. रिलायंस ने कई इंटरनेशनल ब्रैंड्स के साथ एक्सक्लूसिव पार्टनरशिप की हुई है. इसमें Giorgio Armani, GAP, Hugo Boss, Armani Exchange, Emporio Armani, Jimmy Choo और Burberry शामिल हैं. साथ ही कंपनी ने पिछले साल Balenciaga के साथ भी डील की थी, ताकि हाई एंड फैशन ब्रैंड को भारतीय ग्राहकों तक पहुंचा सके. रिलायंस रिटेल ने साल 2022 में 45 करोड़ कीमत का गारमेंट बेचा था, जो अमेरिका और कनाडा की कुल आबादी के बराबर है.
मुनाफे में सबसे बड़ी हिस्सेदारी
रिलायंस रिटेल इस समय गारमेंट बेचने वाली देश की सबसे बड़ी कंपनी है और अगले एक-दो सालों में उसकी योजना दुनिया की सबसे बड़ी गारमेंट कंपनी बनने की है. कंपनी भारत की ग्रोथ और गारमेंट की डिमांड बढ़ने को लेकर आशांवित है. बता दें कि रिलायंस रिटेल ने पिछले दशक में 17 प्रतिशत सालाना की दर से अपने कारोबार का विस्तार किया है. खासतौर पर कंपनी का कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स बिजनेस सबसे तेजी से बढ़ रहा है. वहीं, पिछले 5 सालों में फैशन और लाइफस्टाइल सेगमेंट ने करीब 43% की वृद्धि देखी है. मुनाफे के लिहाज से देखें, तो रिलायंस के कारोबार में गारमेंट की मुनाफे में सबसे बड़ी हिस्सेदारी है. रिलायंस रिटेल गारमेंट कारोबार से 24% का मुनाफा कमाती है.
ऐसा है टेक्सटाइल वर्टिकल
रिलायंस इंडस्ट्री के टेक्सटाइल वर्टिकल में Georgia Gullini, Armor, Nice, Only Vimal, D-creased, Marco Mancini और H. Lewis जैसे ब्रैंड शामिल हैं. मुकेश अंबानी की कंपनी ने इस सेक्टर में पिछले कुछ समय से काफी विस्तार किया है. रिलायंस ने 2019 में अलोक इंडस्ट्री पर दांव लगाया था. उस समय कंपनी की Silvassa, Vapi, Navi Mumbai और Bhiwandi में फैक्ट्री थीं. जिनकी कैपेसिटी सालाना 68,000 टन Cotton Yarn और 1.7 लाख टन Polyester के उत्पादन की थी. इसके बाद रिलायंस ने Sintex Industries और पॉलिएस्टर चिप एवं धागा बनाने वाली कंपनी शुभलक्ष्मी पॉलिएस्टर्स लिमिटेड का अधिग्रहण किया था. शुभलक्ष्मी के साथ डील 1,592 करोड़ रुपए की थी.
छोटी कंपनियों पर नजर
दुनिया का सबसे बड़ा गारमेंट सेलर बनने की अपनी रणनीति के तहत रिलायंस इंडस्ट्री की नजर छोटी और आर्थिक रूप से कमजोर कंपनियों पर है. ऐसी कंपनियों के अधिग्रहण से रिलायंस को अपने विस्तार में मदद मिलेगी. वैसे, मुकेश अंबानी और अडानी पिछले कुछ समय से यही कर रहे थे. अडानी समूह की विस्तार की योजनाओं पर हिंडनबर्ग की रिपोर्ट ने ब्रेक लगा दिया है. फिलहाल, उनका फोकस कर्ज चुकाने पर है, ताकि निवेशकों का भरोसा पुन: हासिल किया जा सके. ऐसे में अंबानी के लिए यह दौड़ में आगे निकलने का बेहतरीन मौका है.
संशोधित भारतनेट कार्यक्रम के तहत तमिलनाडु के 4,767 गांवों तक मांग के आधार पर ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी पहुंचाई जाएगी. केंद्र की वित्तीय सहायता से ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट नेटवर्क का विस्तार और डिजिटल सेवाओं तक पहुंच आसान होगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्र सरकार ने संशोधित भारतनेट कार्यक्रम (Amended BharatNet Programme) के तहत तमिलनाडु में 5 लाख से अधिक ग्रामीण घरों को फाइबर ब्रॉडबैंड कनेक्शन उपलब्ध कराने के लिए वित्तीय सब्सिडी को मंजूरी दी है. इस पहल का उद्देश्य राज्य के ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी का विस्तार करना और डिजिटल बुनियादी ढांचे को मजबूत करना है.
इस संबंध में शुक्रवार को नई दिल्ली स्थित संचार भवन में डिजिटल भारत निधि (DBN), तमिलनाडु सरकार और तमिलनाडु फाइबरनेट कॉरपोरेशन (TANFINET) के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए. इस समझौते के तहत भारतनेट नेटवर्क का इस्तेमाल ग्रामीण क्षेत्रों में ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने के लिए किया जाएगा.
समझौते में तमिलनाडु के 4,767 गांवों तक मांग के आधार पर ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी पहुंचाने का भी प्रावधान है. केंद्र की वित्तीय सहायता से नेटवर्क के अंतिम छोर तक विस्तार में तेजी आने और ग्रामीण एवं दूरदराज के इलाकों में डिजिटल सेवाओं की पहुंच बेहतर होने की उम्मीद है.
समझौता हस्ताक्षर समारोह में डिजिटल भारत निधि के प्रशासक श्यामल मिश्रा मौजूद रहे. तमिलनाडु के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सूचना प्रौद्योगिकी एवं डिजिटल सेवा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव अतुल आनंद वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए शामिल हुए. इस दौरान भारत संचार निगम लिमिटेड (BSNL), TANFINET, दूरसंचार विभाग (DoT) और डिजिटल भारत निधि के वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित रहे.
5 लाख से अधिक ग्रामीण परिवारों को होगा फायदा
इस पहल से तमिलनाडु के 5 लाख से अधिक ग्रामीण परिवारों को फाइबर ब्रॉडबैंड कनेक्शन उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी. इससे ग्रामीण परिवारों को हाई-स्पीड इंटरनेट सेवाओं का लाभ मिल सकेगा.
विस्तारित नेटवर्क के जरिए ई-गवर्नेंस, ऑनलाइन शिक्षा, टेलीमेडिसिन, डिजिटल भुगतान और नागरिकों से जुड़ी अन्य डिजिटल सेवाओं की उपलब्धता बेहतर होने की उम्मीद है. इसके अलावा, 4,767 गांवों में मांग के आधार पर कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने की व्यवस्था से उन क्षेत्रों तक भी ब्रॉडबैंड सेवाएं पहुंचाने में मदद मिलेगी, जहां अभी डिजिटल नेटवर्क की पहुंच सीमित है.
क्या है संशोधित भारतनेट कार्यक्रम?
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 4 अगस्त 2023 को संशोधित भारतनेट कार्यक्रम को मंजूरी दी थी. इसका उद्देश्य मौजूदा भारतनेट नेटवर्क का उन्नयन, एकीकरण और विस्तार करना है. इस कार्यक्रम के तहत सभी ग्राम पंचायतों तक मजबूत और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी सुनिश्चित करने के साथ-साथ मांग के आधार पर गांवों तक भी इंटरनेट सेवाएं पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है.
तमिलनाडु के साथ हुआ यह समझौता राज्य के नेतृत्व वाले मॉडल के जरिए कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में मदद करेगा. इसके तहत भारतनेट के बुनियादी ढांचे के इस्तेमाल के लिए केंद्र सरकार वित्तीय सब्सिडी उपलब्ध कराएगी.
ग्रामीण टेलीकॉम विस्तार में डिजिटल भारत निधि की भूमिका
डिजिटल भारत निधि (Digital Bharat Nidhi) को पहले यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन फंड (USOF) के नाम से जाना जाता था. यह संचार मंत्रालय के दूरसंचार विभाग के अंतर्गत काम करती है.
इसकी स्थापना भारतीय टेलीग्राफ (संशोधन) अधिनियम, 2003 के तहत 1 अप्रैल 2002 से प्रभावी हुई थी. दूरसंचार अधिनियम, 2023 के तहत इसका नाम बदलकर डिजिटल भारत निधि कर दिया गया.
इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण, दूरदराज और ऐसे शहरी क्षेत्रों में दूरसंचार सेवाओं की सार्वभौमिक पहुंच को बढ़ावा देना है, जहां इन सेवाओं की उपलब्धता सीमित है.
भारतनेट के अलावा डिजिटल भारत निधि 4G सैचुरेशन प्रोजेक्ट जैसी कई कनेक्टिविटी योजनाओं को भी समर्थन देती है. इसमें आकांक्षी जिलों के ऐसे इलाके जहां मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं है, वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र, हिमालयी और सीमावर्ती इलाके, द्वीप समूह तथा पूर्वोत्तर राज्यों में मोबाइल सेवाओं का विस्तार शामिल है.
तमिलनाडु के साथ हुआ यह समझौता डिजिटल रूप से सशक्त समाज और ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था विकसित करने के सरकार के लक्ष्य को आगे बढ़ाने की दिशा में एक कदम माना जा रहा है.
सरकार का लक्ष्य डिजिटल खरीदारी को बढ़ावा देने, सप्लाई चेन मजबूत करने और छोटे खुदरा कारोबारियों को कर्ज की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए उद्योग जगत के साथ मिलकर काम करना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने FMCG कंपनियों और उद्योग जगत के अन्य हितधारकों से देश की 1.4 करोड़ किराना दुकानों को डिजिटल बनाने के प्रयासों में सहयोग करने की अपील की है. सरकार ONDC की DigiDukaan पहल के माध्यम से देश के पारंपरिक खुदरा कारोबार को मजबूत करने और उसे डिजिटल इकोसिस्टम से जोड़ने की दिशा में प्रयास तेज कर रही है.
इस सिलसिले में पीयूष गोयल ने नई दिल्ली के वाणिज्य भवन में आयोजित उच्चस्तरीय CEO राउंडटेबल बैठक 'भारत कॉमर्स चिंतन शिविर' की अध्यक्षता की. इस बैठक का आयोजन उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) और ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ONDC) ने किया था. इसमें प्रमुख FMCG कंपनियों के 40 से अधिक वरिष्ठ अधिकारियों ने हिस्सा लिया. बैठक में किराना दुकानों की खरीद प्रक्रिया को डिजिटल बनाने और उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाने के लिए साझा रोडमैप तैयार करने पर चर्चा हुई.
बैठक में FMCG कंपनियों, वितरकों और अन्य हितधारकों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया गया. इसका उद्देश्य डिजिटल खरीदारी को प्रोत्साहित करना, सप्लाई चेन को अधिक प्रभावी बनाना और छोटे खुदरा कारोबारियों की सेवाओं तक पहुंच बेहतर करना है.
DigiDukaan के जरिए खरीद प्रक्रिया होगी डिजिटल
किराना दुकानों को डिजिटल बनाने वाली पारंपरिक पहलों से अलग ONDC की DigiDukaan पहल दुकानदारों को खरीदार के रूप में डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ने पर केंद्रित है. इसके तहत पड़ोस की किराना दुकानें एक ही डिजिटल इंटरफेस के जरिए अलग-अलग ब्रांड, वितरकों और थोक विक्रेताओं से उत्पादों की जानकारी हासिल कर सकेंगी और ऑर्डर दे सकेंगी.
इस प्लेटफॉर्म के जरिए दुकानदारों को कीमतों, व्यापारिक योजनाओं और उत्पादों की उपलब्धता के बारे में अधिक पारदर्शिता मिलेगी. खास बात यह है कि वे अपने मौजूदा वितरण नेटवर्क के साथ काम करना जारी रख सकेंगे.
इस पहल का उद्देश्य साझा डिजिटल बुनियादी ढांचा तैयार करना भी है, जिसके माध्यम से भविष्य में किराना दुकानों को साझा लॉजिस्टिक्स, माइक्रो-वेयरहाउसिंग और औपचारिक कर्ज सुविधाओं से जोड़ा जा सके.
बैठक में हिंदुस्तान यूनिलीवर, कोका-कोला इंडिया, ITC, P&G, मैरिको, कैविनकेयर, पिडिलाइट, ब्रिटानिया, अडानी विल्मर, LT फूड्स, अनमोल इंडस्ट्रीज, हल्दीराम, इमामी, वीबा और निलॉन्स सहित कई कंपनियों के वरिष्ठ प्रतिनिधि शामिल हुए. इनके अलावा लॉजिस्टिक्स प्रदाताओं, टेक्नोलॉजी पार्टनर्स और ONDC नेटवर्क से जुड़े प्रतिभागियों ने भी हिस्सा लिया.
डिजिटल पहचान, लॉजिस्टिक्स और कर्ज पर जोर
बैठक में देश के पारंपरिक खुदरा कारोबार को मजबूत बनाने के लिए पांच प्रमुख प्राथमिकताओं की पहचान की गई. इनमें किराना दुकानों के लिए एक साझा डिजिटल पहचान विकसित करना शामिल है, ताकि वे अलग-अलग ब्रांड और सेवा प्रदाताओं से आसानी से जुड़ सकें. इसके अलावा साझा लॉजिस्टिक्स और माइक्रो-वेयरहाउसिंग नेटवर्क तैयार करने पर जोर दिया गया, जिससे वितरकों की पहुंच बढ़े और दुकानों तक अगले दिन उत्पादों की आपूर्ति सुनिश्चित हो सके.
छोटे खुदरा कारोबारियों के लिए औपचारिक कर्ज की उपलब्धता बढ़ाना भी प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है. इसके लिए डिजिटल खरीदारी और लेनदेन के रिकॉर्ड से जुड़ी वित्तपोषण सुविधाएं विकसित करने पर चर्चा हुई.
इसके साथ ही प्लग-एंड-प्ले डिस्ट्रीब्यूटर मैनेजमेंट सिस्टम (DMS) कनेक्टर्स, मानकीकृत उत्पाद कैटलॉग और साझा डिजिटल इंटरफेस के जरिए टेक्नोलॉजी को जोड़ने की प्रक्रिया आसान बनाने की जरूरत बताई गई.
FMCG कंपनियों की सेल्स टीमों, वितरकों और चैनल पार्टनर्स के व्यावसायिक प्रोत्साहनों में बदलाव पर भी चर्चा हुई, ताकि डिजिटल ऑर्डरिंग, अधिक खुदरा दुकानों तक पहुंच और प्लेटफॉर्म के लगातार इस्तेमाल को बढ़ावा मिल सके.
21 हजार से अधिक दुकानदार 450 ब्रांड से जुड़े
सितंबर 2026 तक DigiDukaan के जरिए हैदराबाद, जयपुर और मुंबई में 21 हजार से अधिक खुदरा दुकानदारों को 450 से ज्यादा ब्रांड से जोड़ा जा चुका है. पिछली तिमाही में यह संख्या 12 हजार से अधिक थी.
इस पहल के तहत हैदराबाद में 16 हजार से अधिक दुकानदार पंजीकृत हो चुके हैं. यहां हर महीने दोबारा ऑर्डर देने वाले दुकानदारों की दर 73 से 78 फीसदी के बीच है.
ONDC के शुरुआती अध्ययन में यह भी सामने आया कि सर्वे में शामिल 40 फीसदी दुकानदारों ने DigiDukaan के जरिए खरीदे गए उत्पादों के लिए अपने स्टॉक में कमी दर्ज की. इससे कारोबार में लगने वाली पूंजी यानी वर्किंग कैपिटल के अधिक प्रभावी इस्तेमाल की संभावना दिखाई देती है.
पीयूष गोयल ने कहा कि छोटे खुदरा कारोबारियों की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया ओपन डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर इस पहल को तेजी से आगे बढ़ा सकता है.
उन्होंने कहा, "खरीद प्रक्रिया को आसान और अधिक पारदर्शी बनाकर तथा अपने वितरकों को मजबूत करके हम किराना दुकानों को उनकी कार्यशील पूंजी बचाने और कारोबार बढ़ाने में मदद कर सकते हैं."
उन्होंने FMCG उद्योग से इस पहल को देशभर में विस्तार देने के लिए मिलकर काम करने की अपील की. साथ ही कहा कि DigiDukaan को ऐसा उदाहरण बनाया जाना चाहिए, जिससे दुनिया भारत के डिजिटल कॉमर्स मॉडल से सीख सके.
DPIIT के सचिव अमरदीप सिंह भाटिया ने कहा कि भारत के खुदरा कारोबार, खासकर किराना दुकानों के व्यापक नेटवर्क को डिजिटल बनाने में ओपन डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की महत्वपूर्ण भूमिका है. उनके मुताबिक, DigiDukaan दिखाता है कि एक ओपन और इंटरऑपरेबल नेटवर्क किस तरह छोटे खुदरा कारोबारियों को डिजिटल खरीद के अवसर उपलब्ध करा सकता है.
FMCG कंपनियों और टेक्नोलॉजी पार्टनर्स की बढ़ रही भागीदारी
ONDC के प्रबंध निदेशक एवं CEO विभोर जैन ने कहा कि वितरकों ने बिलिंग, प्रिंटिंग और ऑर्डर देने के लिए डिजिटल टूल्स को तेजी से अपनाया है, लेकिन कई छोटे खुदरा दुकानदार अब भी मैनुअल प्रक्रियाओं पर निर्भर हैं.
उन्होंने कहा कि DigiDukaan का उद्देश्य किराना दुकानों को खरीदार के रूप में डिजिटल बनाना है, न कि मौजूदा वितरण नेटवर्क को बदलना. इसके जरिए दुकानदारों को कई ब्रांडों तक पहुंच, पारदर्शी व्यापारिक योजनाएं, तेजी से उत्पादों की आपूर्ति और भविष्य में औपचारिक कर्ज की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए साझा डिजिटल आधार तैयार किया जा रहा है.
FMCG कंपनियों में HUL, मैरिको, कोलगेट-पामोलिव, इमामी और अमूल अपने वितरण नेटवर्क के जरिए इस पहल में शामिल हैं. वहीं ITC, टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स और ब्रिटानिया विभिन्न स्तरों पर इंटीग्रेशन या बातचीत की प्रक्रिया में हैं.
टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में Paytm for Business, Qwipo और Mulltiply.ai इस नेटवर्क पर सक्रिय हैं, जबकि Bizom, Botree, QuIDPe और ENS इसके साथ जुड़ने की दिशा में काम कर रहे हैं. लॉजिस्टिक्स और वेयरहाउसिंग पार्टनर्स में ElasticRun, Shiprocket, India Post और Moeving भी इस नेटवर्क का हिस्सा हैं.
नेशनल ट्रेडर्स वेलफेयर बोर्ड के अध्यक्ष सुनील जे. सिंघी का बोर्ड भी ONDC के साथ मिलकर किराना कारोबारियों के बीच इस पहल को बढ़ावा देने के लिए काम कर रहा है. इसके तहत स्थानीय व्यापार संघों को सक्रिय कर खुदरा दुकानदारों की भागीदारी बढ़ाने पर ध्यान दिया जा रहा है.
ONDC की अगली योजना मुंबई, खासकर उत्तर मुंबई में ब्रांड और वितरकों की भागीदारी बढ़ाने के साथ मौजूदा बाजारों में परिचालन को और मजबूत करने की है.
पूर्व नीति आयोग प्रमुख, RBI के डिप्टी गवर्नर, SEBI बोर्ड के सदस्य, रक्षा सचिव और LIC के चेयरमैन जैसे सार्वजनिक पदों पर रह चुके लोगों को Fairfax की भारतीय कंपनियों ने अपने साथ जोड़ा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
Fairfax का नेटवर्क
Fairfax समूह का बोर्ड सरकारी अधिकारियों के पुनर्मिलन जैसा दिखा
19 दिसंबर 2025 को गुरुमूर्ति महालिंगम Fairfax Financial Holdings के नियंत्रण वाली कंपनी थॉमस कुक इंडिया के बोर्ड में शामिल हुए.
उन्होंने अपनी एक दूसरी जिम्मेदारी भी बरकरार रखी. वह अब भी भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) के स्वतंत्र निदेशक थे.
LIC IDBI बैंक को बेच रही थी. Fairfax उसे खरीदने की कोशिश कर रही थी. महालिंगम दोनों पक्षों के बोर्ड में शामिल थे.
LIC के पास IDBI में 30.24 फीसदी हिस्सेदारी थी, जो बिक्री के लिए पेश की गई नियंत्रक हिस्सेदारी का आधा हिस्सा था. महालिंगम LIC के बोर्ड के साथ-साथ उसकी निवेश समिति (Investment Committee) में भी शामिल थे, जो बीमा कंपनी के निवेश की निगरानी करती है.
थॉमस कुक में उनके शामिल होने के 20 दिन बाद सरकार ने IDBI के लिए अंतिम बोलियां आमंत्रित कीं. अगले सात महीनों के दौरान पहली बोलियां विफल हुईं, आरक्षित मूल्य को खारिज कर दिया गया और Fairfax ने संशोधित प्रस्ताव जमा किया. इसके बाद उस प्रस्ताव को खोला गया. इस पूरी प्रक्रिया के दौरान महालिंगम दोनों पदों पर बने रहे. एक उस कंपनी में जो बैंक को बेच रही थी और दूसरा उस कंपनी में जो खरीदार के नियंत्रण में थी.
LIC में उनका कार्यकाल 28 जुलाई 2026 को समाप्त हुआ. इसके 11 सप्ताह बाद कैबिनेट ने Fairfax को 81 रुपये प्रति शेयर के भाव पर IDBI की बिक्री को मंजूरी दी.
ऐसा कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड नहीं है, जिससे पता चलता हो कि महालिंगम ने IDBI से जुड़े LIC के किसी फैसले में हिस्सा लिया था. LIC ने यह भी नहीं बताया है कि उन्होंने थॉमस कुक में अपनी भूमिका का खुलासा किया था या बिक्री से जुड़ी चर्चाओं से खुद को अलग कर लिया था. यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बिक्री की प्रक्रिया किस तरह आगे बढ़ाई गई थी. इसी सप्ताह की शुरुआत में Businessworld ने वित्त मंत्रालय के एक आंतरिक नोट के बारे में रिपोर्ट की थी. इसमें बताया गया था कि अधिकारियों ने Fairfax की बोली खोली, अपने ही आरक्षित मूल्य को अलग रखा और उसके बाद नए मूल्यांकन का आदेश दिया, जो बोली से कम आए. सरकार का कहना है कि उसने उचित प्रक्रिया का पालन किया.
महालिंगम अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं हैं.
Businessworld की एक जांच में सरकार, RBI, SEBI, LIC और सरकारी वित्तीय संस्थानों के 17 पूर्व अधिकारियों की पहचान की गई है, जिन्होंने Fairfax और उसकी भारतीय कंपनियों के साथ काम किया है. इनमें से 10 लोगों ने 7 अक्टूबर 2022 के बाद अपनी भूमिकाएं संभालीं. इसी दिन IDBI की बिक्री की प्रक्रिया शुरू हुई थी.
7 अक्टूबर 2022 को सरकार ने औपचारिक रूप से IDBI बैंक के निजीकरण के लिए रुचि पत्र (Expressions of Interest) आमंत्रित किए थे.
अगले चार वर्षों के दौरान, जब सरकार देश के सबसे बड़े वित्तीय संस्थानों में से एक का नियंत्रण बेचने की दिशा में काम कर रही थी, उसी दौरान Fairfax समूह के भीतर भी कुछ और हो रहा था.
उसकी भारतीय कंपनियां अपने बोर्ड में पूर्व सरकारी अधिकारियों, नियामकों और सरकारी वित्तीय संस्थानों के प्रमुखों को शामिल कर रही थीं. RBI के एक पूर्व डिप्टी गवर्नर IIFL Finance से जुड़े. RBI के एक अन्य पूर्व कार्यकारी CSB बैंक के चेयरमैन बने. रक्षा मंत्रालय के एक पूर्व सचिव Go Digit से जुड़े. SEBI के एक पूर्व पूर्णकालिक सदस्य थॉमस कुक इंडिया में शामिल हुए.
और नीति आयोग के पूर्व CEO Fairfax Financial के सलाहकार बन गए.
ये कोई सामान्य नियुक्तियां नहीं थीं. इनमें ऐसे लोग शामिल थे, जो भारत की वित्तीय नियामक और प्रशासनिक व्यवस्था में वरिष्ठ पदों पर रह चुके थे.
Businessworld ने Fairfax Financial, Fairfax India और उनकी भारतीय कंपनियों से जुड़े 17 पूर्व सार्वजनिक अधिकारियों की सूची तैयार की है. इनमें आठ पूर्व सिविल सेवक या नियामक हैं, आठ सरकारी वित्तीय संस्थानों के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी हैं और एक पूर्व विदेशी सरकार का प्रमुख है.
ये नियुक्तियां अलग-अलग वर्षों में हुईं. इनमें से कई IDBI की बिक्री प्रक्रिया शुरू होने के बाद की गईं. कुछ नियुक्तियां वित्तीय बोली और मूल्यांकन प्रक्रिया के दौरान भी हुईं.
इनमें से किसी भी व्यक्ति पर IDBI की बिक्री को प्रभावित करने का आरोप नहीं है. न ही ऐसा कोई सार्वजनिक सबूत है. लेकिन नियुक्तियों की तारीखें, उनसे जुड़े संस्थान और Fairfax की भारतीय कंपनियों में पूर्व सार्वजनिक अधिकारियों की मौजूदगी का स्तर इस बात पर सवाल खड़े करता है कि IDBI का नियंत्रण हासिल करने की कोशिश के दौरान समूह का संस्थागत नेटवर्क कितना व्यापक था.
नियुक्तियां: तारीखों के क्रम में
IDBI की बिक्री प्रक्रिया के दौरान नियुक्तियां (7 अक्टूबर 2022 से)
तारीख व्यक्ति पूर्व सार्वजनिक पद Fairfax से जुड़ी भूमिका
7 अक्टूबर 2022 | — | — | सरकार ने IDBI बैंक के लिए बोलियां आमंत्रित कीं: बिक्री प्रक्रिया शुरू
11 मई 2023 | जेसन केनी | अल्बर्टा के प्रीमियर; कनाडा की पूर्व संघीय सरकार में मंत्री | Fairfax India के स्वतंत्र निदेशक
14 दिसंबर 2023 | रेनू कोहली | अर्थशास्त्री; RBI और IMF के साथ काम किया | CSB बैंक की स्वतंत्र निदेशक
15 मार्च 2024 | बी. के. दिवाकरा | सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के कार्यकारी निदेशक | CSB बैंक के कार्यकारी निदेशक
12 जून 2024 | दीपक माहेश्वरी | SBI में वरिष्ठ पदों पर रहे | CSB बैंक के स्वतंत्र निदेशक
13 दिसंबर 2024 | डी. एन. नरसिम्हा राजू | IAS; कर्नाटक के अतिरिक्त मुख्य सचिव | CSB बैंक के स्वतंत्र निदेशक; बेंगलुरु इंटरनेशनल एयरपोर्ट से भी जुड़े |
16 अप्रैल 2025 | बिस्वमोहन महापात्रा | RBI के कार्यकारी निदेशक | CSB बैंक के निदेशक
9 मई 2025 | बिस्वमोहन महापात्रा | पूर्व पद समान | CSB बैंक के अंशकालिक चेयरमैन
16 जून 2025 | बी. पी. कानूनगो | RBI के डिप्टी गवर्नर (2017-21) | IIFL Finance के स्वतंत्र निदेशक
26 जून 2025 | अमिताभ कांत | नीति आयोग के CEO (2016-22); G20 शेरपा | Fairfax Financial Holdings के वरिष्ठ सलाहकार |
1 नवंबर 2025 | गिरिधर अरमाने | रक्षा सचिव (2022-24); IRDAI के कार्यकारी निदेशक | Go Digit General Insurance के स्वतंत्र निदेशक |
19 दिसंबर 2025 | जी. महालिंगम | RBI के कार्यकारी निदेशक; SEBI के पूर्णकालिक सदस्य; LIC के कार्यरत निदेशक | थॉमस कुक इंडिया के स्वतंत्र निदेशक |
19 दिसंबर 2025 | बी. पी. कानूनगो | पूर्व पद समान | IIFL Finance के चेयरपर्सन
8 जनवरी 2026 | — | — | वित्तीय बोलियां आमंत्रित की गईं
28 जुलाई 2026 | जी. महालिंगम | — | LIC में निदेशक का कार्यकाल समाप्त
14 अक्टूबर 2026 | — | — | कैबिनेट ने 81 रुपये प्रति शेयर के भाव पर Fairfax को बिक्री की मंजूरी दी
बिक्री प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही पदों पर मौजूद थे (पृष्ठभूमि)
व्यक्ति | पूर्व सार्वजनिक पद | Fairfax से जुड़ी भूमिका
एस. बी. माथुर | LIC के चेयरमैन (2002-04) | थॉमस कुक इंडिया के स्वतंत्र निदेशक, 2015-दिसंबर 2025
महेंद्र कुमार गर्ग | यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस के CMD | Go Digit के स्वतंत्र निदेशक; Quess और थॉमस कुक से भी जुड़े
प्रतीप चौधरी | SBI के चेयरमैन | Quess Corp के स्वतंत्र निदेशक, 2015-20 (बिक्री प्रक्रिया से पहले कार्यकाल समाप्त)
RBI से जुड़ाव
RBI के पूर्व डिप्टी गवर्नर बी. पी. कानूनगो 16 जून 2025 को IIFL Finance के स्वतंत्र निदेशक बने. 19 दिसंबर 2025 को वह इसके चेयरपर्सन बन गए.
RBI के पूर्व कार्यकारी निदेशक बिस्वमोहन महापात्रा 16 अप्रैल 2025 को CSB बैंक के बोर्ड में शामिल हुए और 9 मई 2025 को इसके अंशकालिक चेयरमैन बन गए.
इन दोनों नियुक्तियों के जरिए RBI के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी उन वित्तीय संस्थानों के बोर्ड या नेतृत्व में पहुंचे, जिनमें Fairfax की बड़ी हिस्सेदारी थी.
SEBI से जुड़ाव
RBI के पूर्व कार्यकारी निदेशक और SEBI के पूर्णकालिक सदस्य गुरुमूर्ति महालिंगम 19 दिसंबर 2025 को थॉमस कुक इंडिया के स्वतंत्र निदेशक बने.
उसी समय वह LIC के स्वतंत्र निदेशक भी बने हुए थे, जो IDBI बैंक के दो विक्रेताओं में से एक थी. वह LIC की निवेश समिति के सदस्य भी थे.
LIC में उनका कार्यकाल 28 जुलाई 2026 को समाप्त हुआ. थॉमस कुक में उनकी नियुक्ति पांच वर्षों के लिए थी.
यह दोहरी भूमिका IDBI की बोली प्रक्रिया के पहले दौर, मूल आरक्षित मूल्य के विफल होने, Fairfax की संशोधित बोली और उस बोली को खोले जाने की पूरी अवधि तक रही.
रक्षा और बीमा क्षेत्र से जुड़ाव
भारत के पूर्व रक्षा सचिव और IRDAI के पूर्व कार्यकारी निदेशक गिरिधर अरमाने 1 नवंबर 2025 को Go Digit General Insurance के स्वतंत्र निदेशक बने.
Go Digit Fairfax के प्रमुख भारतीय निवेशों में से एक है. यह उन कंपनियों में भी शामिल है, जिन्हें अधिग्रहण के बाद IDBI में शामिल करने का प्रस्ताव Fairfax ने दिया है.
सरकार के पूर्व शीर्ष अधिकारी
26 जून 2025 को Fairfax ने अमिताभ कांत को अपना वरिष्ठ सलाहकार नियुक्त करने की घोषणा की.
कांत 2016 से 2022 तक नीति आयोग के CEO रहे थे और इसके बाद उन्होंने भारत के G20 शेरपा के रूप में काम किया.
Fairfax की घोषणा में विशेष रूप से भारत में कंपनी के लिए मौजूद अवसरों का उल्लेख किया गया था. साथ ही उसके पोर्टफोलियो में Go Digit और केम्पेगौड़ा इंटरनेशनल एयरपोर्ट में किए गए निवेश का भी जिक्र किया गया था.
यह नियुक्ति उस समय हुई जब IDBI की बिक्री प्रक्रिया चल रही थी. ऐसा कोई सार्वजनिक सबूत नहीं है कि सरकारी सेवा के दौरान कांत की IDBI लेनदेन में कोई भूमिका थी या Fairfax के सलाहकार के रूप में उनकी जिम्मेदारी में IDBI शामिल था.
LIC से जुड़ाव
महालिंगम का मामला सबसे उल्लेखनीय दोहरी भूमिका का उदाहरण है.
सात महीने तक उन्होंने LIC और Fairfax के नियंत्रण वाली थॉमस कुक इंडिया, दोनों के बोर्ड में पद संभाले. LIC IDBI में अपनी 30.24 फीसदी हिस्सेदारी बेच रही थी.
LIC में उनकी समिति की सदस्यताओं में निवेश, कार्यकारी, ऑडिट और जोखिम प्रबंधन समितियां शामिल थीं.
DIPAM के नोट में यह भी दर्ज है कि LIC के प्रबंध निदेशक उन समितियों में शामिल थे, जिन्हें IDBI की सीलबंद बोलियां प्राप्त करने और खोलने की जिम्मेदारी दी गई थी.
ऐसा कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड नहीं है, जिससे यह साबित हो कि महालिंगम ने IDBI से जुड़े किसी फैसले में हिस्सा लिया था या यह लेनदेन उनके किसी समिति के सामने आया था, जिसके वह सदस्य थे. क्या उन्होंने थॉमस कुक में अपनी नियुक्ति की जानकारी LIC को दी थी और क्या उन्होंने इससे संबंधित किसी चर्चा से खुद को अलग रखा था, ये सवाल अब भी LIC से जुड़े हुए हैं.
पूरे वित्तीय तंत्र में फैला नेटवर्क
ये नियुक्तियां केवल इन पांच लोगों तक सीमित नहीं हैं.
Businessworld के रिकॉर्ड में LIC के पूर्व चेयरमैन एस. बी. माथुर, SBI के पूर्व चेयरमैन प्रतीप चौधरी, यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस के पूर्व CMD महेंद्र कुमार गर्ग, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व कार्यकारी निदेशक बी. के. दिवाकरा और अन्य सरकारी वित्तीय संस्थानों के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं.
कुछ लोग IDBI की बिक्री से कई साल पहले Fairfax से जुड़ी कंपनियों में शामिल हुए थे. अन्य ने बिक्री प्रक्रिया के दौरान अपनी भूमिकाएं संभालीं. इन नियुक्तियों और उनके कार्यकाल को एक ही समय में हुई नियुक्तियों की लहर मानने के बजाय घटनाक्रम के क्रम में समझने की जरूरत है.
ये हैं अहम सवाल
- IDBI की बिक्री प्रक्रिया के दौरान Fairfax और उसकी भारतीय सहयोगी कंपनियों ने सरकार और नियामक संस्थानों के किन पूर्व अधिकारियों को अपने साथ जोड़ा?
- क्या इनमें से कोई व्यक्ति सरकारी या सार्वजनिक संस्थानों में सेवा के दौरान IDBI लेनदेन में शामिल था?
- क्या संभावित हितों के टकराव का खुलासा संबंधित बोर्ड और नियामकों के सामने किया गया था?
- क्या सरकार ने लेनदेन का आकलन करते समय Fairfax के मौजूदा नेटवर्क की जांच की थी?
- भारत में Fairfax का सलाहकार और संस्थागत नेटवर्क कैसा है और क्या वह IDBI की बिक्री के दौरान नियुक्त सभी सलाहकारों और परामर्शदाताओं का खुलासा करेगी?
ये नियुक्तियां सार्वजनिक हैं. इनकी तारीखें भी सार्वजनिक हैं. सवाल यह है कि क्या सरकार और बिक्री में शामिल संस्थानों ने इन दोहरी भूमिकाओं और आपसी जुड़ाव की जांच की थी.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और द मार्केट माफिया: क्रॉनिकल ऑफ इंडियाज हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कैबल दैट वेंट स्कॉट-फ्री के लेखक हैं. यह पुस्तक भारत के वित्तीय बाजारों के अंधेरे पहलुओं को उजागर करते हैं. मुंबई में करीब दो दशक तक जमीनी स्तर पर रिपोर्टिंग करने वाले पलक ने धन, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की पड़ताल की है. उनके लेख भारत के प्रमुख वित्तीय समाचार पत्रों, जिनमें द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं. 19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुए पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक में मुंबई की गैंगवार की जगह संगठित अपराध के अधिक परिष्कृत रूप ने ले ली है. इसमें कॉरपोरेट इमारतों के भीतर चलने वाली सफेदपोश वित्तीय धोखाधड़ी शामिल है. इसी अनुभव ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया, जहां उन्होंने भारत की 'सफेद धन' अर्थव्यवस्था की जटिल कार्यप्रणाली को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम वित्तीय दुनिया की चमकदार सतह के पीछे काम करने वाले समूहों को उजागर करता है. सच सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे लोग नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें भारतीय पत्रकारिता में एक ऐसी प्रभावशाली आवाज बनाती है जो यथास्थिति को चुनौती देने और खुद को कानून से ऊपर समझने वालों को बेनकाब करने से नहीं हिचकती.)
गोल्ड रिजर्व की वैल्यू में 2.6 अरब डॉलर की कमी, विदेशी मुद्रा संपत्ति और SDR में दर्ज हुई बढ़ोतरी; सितंबर में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के बाद से Forex Reserve में जारी है गिरावट
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserve) में लगातार दूसरे सप्ताह गिरावट दर्ज की गई है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से शुक्रवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक, 24 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 1.2 अरब डॉलर घटकर 719.74 अरब डॉलर रह गया. इससे पिछले सप्ताह भी इसमें करीब 5 अरब डॉलर की गिरावट आई थी और यह घटकर 721.02 अरब डॉलर पर आ गया था.
गौरतलब है कि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 4 सितंबर को समाप्त सप्ताह में 785.706 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था. इसके बाद से इसमें गिरावट का सिलसिला जारी है. विदेशी मुद्रा भंडार में ताजा कमी के दौरान सोने के भंडार की वैल्यू में भी बड़ी गिरावट दर्ज की गई है. हालांकि, विदेशी मुद्रा संपत्ति में बढ़ोतरी हुई है.
रुपये को संभालने के लिए डॉलर बेच रहा RBI
विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट की प्रमुख वजहों में बैंकों की ओर से विदेशी मुद्रा अनिवासी (बैंक) यानी FCNR(B) जमा के जरिए जुटाई गई रकम का इस्तेमाल और रुपये को संभालने के लिए RBI का विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप शामिल है.
जब डॉलर के मुकाबले रुपये पर दबाव बढ़ता है, तो केंद्रीय बैंक रुपये की गिरावट को नियंत्रित करने के लिए बाजार में डॉलर बेचता है. इससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आ सकती है. बाजार के जानकारों के मुताबिक, हालिया गिरावट के पीछे भी ये दोनों कारक अहम हैं.
विदेशी मुद्रा संपत्ति बढ़ी, गोल्ड रिजर्व में 2.6 अरब डॉलर की कमी
RBI के आंकड़ों के मुताबिक, 24 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा संपत्ति (Foreign Currency Assets) 1.3 अरब डॉलर बढ़कर 593.20 अरब डॉलर हो गई. विदेशी मुद्रा भंडार में इसकी सबसे बड़ी हिस्सेदारी है. इसमें डॉलर के अलावा यूरो, पाउंड और येन जैसी अन्य मुद्राओं के मूल्य में होने वाले उतार-चढ़ाव का असर भी शामिल होता है.
दूसरी ओर, इसी सप्ताह देश के सोने के भंडार (Gold Reserves) की वैल्यू में 2.6 अरब डॉलर की गिरावट आई और यह घटकर 103.15 अरब डॉलर रह गई. इस तरह विदेशी मुद्रा संपत्ति में बढ़ोतरी के बावजूद सोने के भंडार के मूल्य में आई कमी का असर कुल विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ा.
SDR में बढ़ोतरी, IMF में रिजर्व पोजीशन घटी
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के विशेष आहरण अधिकार (SDR) में 24 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह के दौरान 27 मिलियन डॉलर की बढ़ोतरी दर्ज की गई. इसके बाद यह बढ़कर 18.605 अरब डॉलर हो गया.
वहीं, IMF में भारत की रिजर्व पोजीशन 4 मिलियन डॉलर घटकर 4.787 अरब डॉलर रह गई. इस तरह समीक्षाधीन सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार के अलग-अलग घटकों में मिला-जुला रुख देखने को मिला. विदेशी मुद्रा संपत्ति और SDR में बढ़ोतरी हुई, जबकि गोल्ड रिजर्व और IMF में रिजर्व पोजीशन में गिरावट दर्ज की गई.
ऑयल-टू-केमिकल्स और डिजिटल कारोबार के दम पर कंपनी ने दर्ज की मजबूत ग्रोथ, रिटेल कारोबार के एबिटा में आई गिरावट; ₹15,000 करोड़ जुटाने के लिए एनसीडी जारी करने को बोर्ड की मंजूरी
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
मुकेश अंबानी की अगुवाई वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में मजबूत वित्तीय प्रदर्शन दर्ज किया है. जुलाई-सितंबर तिमाही में कंपनी का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 40.6 फीसदी बढ़कर 25,548 करोड़ रुपये हो गया, जबकि पिछले साल की समान तिमाही में यह 18,165 करोड़ रुपये था. इस दौरान कंपनी के ऑपरेशंस से रेवेन्यू में भी 28.6 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई और यह बढ़कर 3,32,861 करोड़ रुपये पहुंच गया.
कंपनी ने शुक्रवार, 30 अक्टूबर को शेयर बाजार को दी गई जानकारी में सितंबर तिमाही के नतीजे घोषित किए. कंपनी के मुताबिक, तेल और केमिकल कारोबार में मजबूत प्रदर्शन के साथ डिजिटल सर्विसेज की ग्रोथ ने नतीजों को मजबूती दी है. हालांकि, रिटेल कारोबार के एबिटा में गिरावट देखने को मिली.
पिछली तिमाही के मुकाबले भी बढ़ा मुनाफा
रिलायंस इंडस्ट्रीज का प्रदर्शन पिछली तिमाही के मुकाबले भी बेहतर रहा. वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में कंपनी का नेट प्रॉफिट 20,946 करोड़ रुपये था, जो सितंबर तिमाही में बढ़कर 25,548 करोड़ रुपये हो गया. इस तरह तिमाही आधार पर मुनाफे में करीब 22 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. वहीं, कंपनी का रेवेन्यू जून तिमाही के 3,11,850 करोड़ रुपये से बढ़कर सितंबर तिमाही में 3,32,861 करोड़ रुपये पहुंच गया.
सितंबर तिमाही में कंपनी का टैक्स से पहले मुनाफा 38,613 करोड़ रुपये रहा, जबकि पिछले साल की समान अवधि में यह 29,124 करोड़ रुपये था.
ऑयल-टू-केमिकल्स कारोबार का रेवेन्यू 44% बढ़ा
रिलायंस के ऑयल-टू-केमिकल्स (O2C) कारोबार ने सितंबर तिमाही में शानदार प्रदर्शन किया. इस सेगमेंट का रेवेन्यू सालाना आधार पर करीब 44.2 फीसदी बढ़कर 2,31,601 करोड़ रुपये हो गया, जो पिछले साल की समान तिमाही में 1,60,558 करोड़ रुपये था.
इस कारोबार का एबिटा भी करीब 68 फीसदी बढ़कर 25,203 करोड़ रुपये पहुंच गया. पिछले साल सितंबर तिमाही में यह 15,008 करोड़ रुपये था. कंपनी के कुल प्रदर्शन में इस कारोबार की अहम भूमिका रही.
डिजिटल कारोबार की कमाई में 11% की बढ़ोतरी
कंपनी के डिजिटल सर्विसेज कारोबार ने भी ग्रोथ दर्ज की. सितंबर तिमाही में इस सेगमेंट का रेवेन्यू 11.2 फीसदी बढ़कर 48,486 करोड़ रुपये रहा, जबकि पिछले साल की समान अवधि में यह 43,617 करोड़ रुपये था. डिजिटल कारोबार का एबिटा भी करीब 17.7 फीसदी बढ़कर 22,223 करोड़ रुपये पहुंच गया.
रिटेल कारोबार के एबिटा में गिरावट
दूसरी ओर, रिलायंस के रिटेल कारोबार का प्रदर्शन मिला-जुला रहा. सितंबर तिमाही में इस सेगमेंट का रेवेन्यू मामूली बढ़कर 91,717 करोड़ रुपये रहा. हालांकि, इसका एबिटा घटकर 6,120 करोड़ रुपये रह गया, जबकि पिछले साल की समान तिमाही में यह 6,817 करोड़ रुपये था.
वहीं, तेल और गैस कारोबार का रेवेन्यू लगभग स्थिर रहा. सितंबर तिमाही में यह 6,020 करोड़ रुपये दर्ज किया गया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में 6,058 करोड़ रुपये था. इस कारोबार का एबिटा भी घटकर 4,901 करोड़ रुपये रह गया.
एनसीडी के जरिए 15,000 करोड़ रुपये जुटाएगी कंपनी
तिमाही नतीजों के साथ रिलायंस इंडस्ट्रीज के बोर्ड ने 15,000 करोड़ रुपये तक जुटाने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी है. कंपनी नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर (NCD) जारी करके यह रकम जुटा सकती है. इसके लिए एक या कई चरणों में प्राइवेट प्लेसमेंट का रास्ता अपनाया जाएगा.
एनसीडी ऐसे कर्ज आधारित वित्तीय साधन होते हैं, जिन्हें जारी करने वाली कंपनी निवेशकों को तय शर्तों के मुताबिक ब्याज देती है, लेकिन इन्हें शेयरों में परिवर्तित नहीं किया जा सकता. बोर्ड की मंजूरी के बाद कंपनी के पास इस माध्यम से पूंजी जुटाने का विकल्प होगा.
रिलायंस इंडस्ट्रीज का मुनाफा 40.6% बढ़कर ₹25,548 करोड़ पहुंचा, रेवेन्यू में 28.6% का उछाल
नोएडा में 83 वर्षीय आर. के. सिन्हा ने ली अंतिम सांस, SIS ग्रुप की स्थापना कर भारत में निजी सुरक्षा उद्योग को नई पहचान दी; जनसंघ के दौर से भाजपा से जुड़े रहे
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वरिष्ठ भाजपा नेता, पूर्व राज्यसभा सांसद और सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस सर्विसेज (SIS) ग्रुप के संस्थापक एवं चेयरमैन रविंद्र किशोर सिन्हा (आर. के. सिन्हा) का शुक्रवार को निधन हो गया. उन्होंने नोएडा स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली. उनके निधन की खबर से राजनीतिक, सामाजिक और कारोबारी जगत में शोक की लहर दौड़ गई है. विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं और उद्योग जगत की हस्तियों ने उनके निधन पर दुख व्यक्त करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी है.
पत्रकारिता से अपने करियर की शुरुआत करने वाले आर. के. सिन्हा ने राजनीति और कारोबार के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय पहचान बनाई. वह न केवल भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में शामिल थे, बल्कि उन्होंने भारत में निजी सुरक्षा उद्योग की नींव रखने और उसे वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में भी अहम भूमिका निभाई.
पत्रकारिता का सफर
राजनीति विज्ञान और कानून की पढ़ाई करने वाले आर. के. सिन्हा ने अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत पत्रकारिता से की थी. उन्होंने अपराध और राजनीतिक रिपोर्टिंग के क्षेत्र में काम किया. वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उन्होंने युद्ध संवाददाता के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई. इस दौरान उनके साहसिक काम की काफी सराहना हुई. इसी दौर में उन्होंने 'जन आंदोलन' नामक पुस्तक लिखी. इसे 1970 से 1975 के बीच जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले छात्र आंदोलन पर शुरुआती प्रामाणिक शोध कार्यों में गिना जाता है.
दो लोगों से शुरू किया SIS ग्रुप का कारोबार
वर्ष 1971 के युद्ध के बाद पूर्व सैनिकों को रोजगार और पुनर्वास के अवसर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से आर. के. सिन्हा ने 1974 में सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस सर्विसेज (इंडिया) लिमिटेड (SIS) की स्थापना की.
पूर्वी भारत में दो लोगों की टीम और एक छोटे से किराये के कार्यालय से शुरू हुआ यह कारोबार आगे चलकर एशिया-पैसिफिक क्षेत्र की प्रमुख सुरक्षा सेवा कंपनियों में शामिल हो गया. आज SIS ग्रुप के पास 36,000 से अधिक स्थायी कर्मचारी और 3,000 से ज्यादा कॉर्पोरेट ग्राहक हैं. कंपनी का कारोबार 350 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक बताया जाता है.
निजी सुरक्षा उद्योग में उनके योगदान के कारण उन्हें इस क्षेत्र का अग्रणी उद्यमी माना जाता था. सुरक्षा क्षेत्र से जुड़े लोग उन्हें सम्मानपूर्वक 'आर. के.' कहकर संबोधित करते थे. उन्होंने निजी सुरक्षा उद्योग से जुड़े कानूनों और नियामकीय मुद्दों पर विभिन्न सरकारी निकायों के समक्ष भी इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया.
वह 1999 से 2004 तक भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय में सलाहकार रहे. वर्ष 2006 में सिंगापुर की सुरक्षा एसोसिएशन ने उन्हें 'लॉस प्रिवेंशन प्रमोटर अवार्ड' से सम्मानित किया था.
जनसंघ के समय से भाजपा से जुड़े थे आर. के. सिन्हा
आर. के. सिन्हा का भाजपा से जुड़ाव जनसंघ के दौर से रहा. वह पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल थे और उन्होंने संगठन में राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर पर कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं.
बिहार में भाजपा के चुनावी अभियानों में भी उनकी अहम भूमिका रही. उन्होंने बिहार चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष के रूप में काम किया. वर्ष 2014 में भाजपा ने उन्हें बिहार से राज्यसभा के लिए नामित किया था.
संसद में अपने कार्यकाल के दौरान वह गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय की स्थायी समितियों, श्रम एवं रोजगार संबंधी सलाहकार समिति और राज्यसभा की याचिकाओं से जुड़ी समिति सहित कई महत्वपूर्ण संसदीय निकायों के सदस्य रहे.
नेताओं ने जताया दुख, पटना ले जाया जाएगा पार्थिव शरीर
आर. के. सिन्हा के निधन पर बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने गहरा दुख व्यक्त किया. उन्होंने इसे हृदयविदारक बताते हुए कहा कि पत्रकारिता, समाज सेवा और सांगठनिक कार्यों में आर. के. सिन्हा का योगदान हमेशा याद रखा जाएगा. उनका निधन राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र के लिए अपूरणीय क्षति है.
जनता दल (यूनाइटेड) और बिहार भाजपा ने भी उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है. नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उनका जाना पार्टी और समाज के लिए बड़ी क्षति है.
पारिवारिक सदस्यों के अनुसार, आर. के. सिन्हा का पार्थिव शरीर दिल्ली से पटना ले जाया जाएगा. अंतिम दर्शन के लिए उनके पार्थिव शरीर को पाटलिपुत्र स्थित 'अन्नपूर्णा भवन' में रखा जाएगा, जहां समर्थक, पार्टी कार्यकर्ता और आम लोग उन्हें श्रद्धांजलि दे सकेंगे.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से सितंबर 2026 के दौरान राजकोषीय घाटा पूरे वित्त वर्ष के लिए तय लक्ष्य का 42.1 प्रतिशत रहा. पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह आंकड़ा 5.7 लाख करोड़ रुपये था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वित्त वर्ष 2026-27 के शुरुआती छह महीनों में केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा सालाना आधार पर 25.4 प्रतिशत बढ़कर 7.15 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया है. शुक्रवार को जारी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से सितंबर 2026 के दौरान राजकोषीय घाटा पूरे वित्त वर्ष के लिए तय लक्ष्य का 42.1 प्रतिशत रहा. पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह आंकड़ा 5.7 लाख करोड़ रुपये था.
राजकोषीय घाटा सरकार के कुल खर्च और उधारी को छोड़कर कुल प्राप्तियों के बीच का अंतर होता है. जब सरकार की आय उसके खर्च से कम होती है, तो इस अंतर को पूरा करने के लिए उसे उधार लेना पड़ता है. ऐसे में राजकोषीय घाटा सरकार की वित्तीय स्थिति और उधारी की जरूरत को दर्शाने वाला एक अहम संकेतक है.
पिछले साल के मुकाबले बढ़ा राजकोषीय घाटा
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में राजकोषीय घाटा पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 25.4 प्रतिशत अधिक रहा. अप्रैल-सितंबर के दौरान यह 7.15 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जबकि वित्त वर्ष 2025-26 की इसी अवधि में 5.7 लाख करोड़ रुपये था.
पूरे वित्त वर्ष के लिए निर्धारित लक्ष्य का 42.1 प्रतिशत घाटा पहली छमाही में ही दर्ज किया जा चुका है. ऐसे में वित्त वर्ष के बाकी छह महीनों में सरकार के राजस्व संग्रह और खर्च का प्रबंधन महत्वपूर्ण रहेगा.
सालाना लक्ष्य हासिल करना होगा अहम
वित्त वर्ष 2026-27 के शेष महीनों में सरकार का वित्तीय प्रदर्शन यह तय करने में अहम भूमिका निभाएगा कि राजकोषीय घाटे को पूरे साल के निर्धारित लक्ष्य के भीतर रखा जा सकेगा या नहीं. सरकार के राजस्व संग्रह और व्यय के बीच संतुलन बनाए रखना इस लिहाज से महत्वपूर्ण होगा.
अक्टूबर 2026 की मासिक आर्थिक समीक्षा के अनुसार, पहली तिमाही में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रही थी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास रफ्तार बरकरार रहने का अनुमान है. वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में देश की वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि दर 7.35 प्रतिशत रह सकती है. औद्योगिक उत्पादन, निर्यात, जीएसटी संग्रह और बैंक कर्ज में बढ़ोतरी से आर्थिक गतिविधियों को मजबूती मिल रही है. हालांकि, इस दौरान खुदरा और खाद्य महंगाई में वृद्धि ने चिंता बढ़ाई है. सितंबर में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 5.54 प्रतिशत और खाद्य महंगाई 7.74 प्रतिशत पर पहुंच गई.
अक्टूबर 2026 की मासिक आर्थिक समीक्षा के अनुसार, पहली तिमाही में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रही थी. इसके मुकाबले दूसरी तिमाही में विकास दर थोड़ी कम रहने का अनुमान है, लेकिन इसके बावजूद अर्थव्यवस्था की वृद्धि रफ्तार मजबूत बनी हुई है.
IMF ने बढ़ाया भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने पूरे वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि का अनुमान बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दिया है. वहीं, विश्व बैंक, आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने देश की आर्थिक वृद्धि दर 7.1 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है.
औद्योगिक उत्पादन में 8% की बढ़ोतरी
देश के औद्योगिक क्षेत्र से भी सकारात्मक संकेत मिले हैं. अगस्त 2026 में औद्योगिक उत्पादन में सालाना आधार पर 8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. इस दौरान विनिर्माण क्षेत्र का उत्पादन 9 प्रतिशत बढ़ा. वहीं, सितंबर में आठ प्रमुख उद्योगों के उत्पादन में 7.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई.
वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में सकल वस्तु एवं सेवा कर (GST) संग्रह में करीब 15 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. इसके अलावा बैंक कर्ज की वृद्धि दर 21.6 प्रतिशत रही. इससे कारोबार और आर्थिक गतिविधियों में कर्ज की मांग बढ़ने के संकेत मिलते हैं.
महंगाई का बढ़ता दबाव, खुदरा दर 5.54% पर पहुंची
आर्थिक विकास के बीच महंगाई का दबाव भी बढ़ा है. सितंबर 2026 में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 5.54 प्रतिशत हो गई, जबकि अगस्त में यह 4.83 प्रतिशत थी. खाद्य महंगाई भी बढ़कर 7.74 प्रतिशत पर पहुंच गई. प्याज, चीनी, खाद्य तेल और चावल की कीमतों में बढ़ोतरी को इसकी प्रमुख वजह बताया गया है.
महंगाई के दबाव को देखते हुए RBI ने रेपो दर में 25 आधार अंक की बढ़ोतरी की और मौद्रिक नीति के रुख को तटस्थ से धीरे-धीरे सख्ती की ओर बदला. रेपो दर में वृद्धि का असर कर्ज की ब्याज दरों पर भी पड़ सकता है.
निर्यात में 11% की वृद्धि, 721 अरब डॉलर हुआ विदेशी मुद्रा भंडार
वैश्विक बाजार में अनिश्चितता के बावजूद भारत के निर्यात में अच्छी बढ़ोतरी दर्ज की गई. सितंबर 2026 में वस्तुओं और सेवाओं का कुल निर्यात सालाना आधार पर 11 प्रतिशत बढ़ा. इसमें वस्तुओं के निर्यात में 23.1 प्रतिशत की वृद्धि की अहम भूमिका रही.
वहीं, 16 अक्टूबर 2026 तक देश का विदेशी मुद्रा भंडार 721 अरब डॉलर पर पहुंच गया. यह राशि भारत की करीब 10.3 महीने की आयात जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है. मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार से अंतरराष्ट्रीय भुगतान और बाहरी आर्थिक चुनौतियों से निपटने में मदद मिलती है.
कम बारिश से कृषि क्षेत्र पर दबाव
कम बारिश का असर कृषि क्षेत्र पर पड़ने की आशंका है. 2 अक्टूबर 2026 तक खरीफ फसलों की कुल बुवाई का क्षेत्र 1,115.31 लाख हेक्टेयर रहा, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 1,127.12 लाख हेक्टेयर था.
जून से सितंबर के बीच देश में सामान्य औसत के मुकाबले 13 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई. इससे फसल उत्पादन प्रभावित होने और खाद्य पदार्थों की कीमतों पर दबाव बढ़ने का खतरा है.
मैन्युफैक्चरिंग में निवेश और रोजगार बढ़ा
वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण 2024-25 के मुताबिक, विनिर्माण क्षेत्र के सकल मूल्यवर्धन (GVA) में 9.59 प्रतिशत की वृद्धि हुई. इस दौरान स्थिर पूंजी में 10.54 प्रतिशत और रोजगार पाने वाले लोगों की संख्या में 7.19 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई.
इसके अलावा, अगस्त 2026 में उद्योगों को दिए गए बैंक कर्ज में सालाना आधार पर 18.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई. ये आंकड़े विनिर्माण क्षेत्र में निवेश, रोजगार और कारोबारी गतिविधियों में बढ़ोतरी के संकेत देते हैं.
राहुल गांधी ने सार्वजनिक बैंक को फेयरफैक्स को बेचने के फैसले पर उठाए सवाल, सीतारमण ने UPA सरकार पर लगाए राजनीतिक दबाव में कर्ज बांटने के आरोप; कहा- 25,000 करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी डालकर IDBI को संकट से निकाला
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
IDBI बैंक के विनिवेश को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कनाडा की कंपनी फेयरफैक्स फाइनेंशियल को IDBI बैंक की बहुलांश हिस्सेदारी बेचने के सरकार के फैसले पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने सार्वजनिक बैंकों को देश के निर्माण का माध्यम बताते हुए कहा कि इन्हें बेचने के बजाय मजबूत किया जाना चाहिए. वहीं, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने राहुल गांधी के आरोपों पर पलटवार करते हुए कांग्रेस और पूर्ववर्ती UPA सरकार पर बैंकिंग व्यवस्था का राजनीतिक इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस के शासनकाल में प्रभावशाली लोगों के लिए 'फोनबुक' और आम नागरिकों के लिए 'रूल बुक' थी.
We all know how @INCIndia has used Banks and financial institutions as personal entities and pressured bank employees to extend loans at their whim, bypassing prudent lending norms. Let me list a few instances. - In 1957, Haridas Mundra got money from LIC due to influence by the Congress leaders. - In 1976, Indira Gandhi's government removed SBI Chairman R.K. Talwar after he refused political pressure to relax lending conditions for a company linked to Sanjay Gandhi's circle. - Sanjay Gandhi pressured the Central Bank of India over loans to Maruti. - B. Janardhana Poojary, MoS Finance under Indira Gandhi and Rajiv Gandhi — pressured bank employees to issue loans in the 1980s. - Pawan Kumar Bansal, as a minister in the UPA, pressured Canara Bank to give loans to his family-linked businesses. The IDBI Bank was handed over to us in poor shape, as IDBI itself was forced to lend to large business groups with close connections to @INCIndia leaders such as Videocon, Winsome, ABG Shipyard, Kingfisher, etc. These turned into bad loans, causing huge losses for IDBI Bank, which we recognised. The NDA govt led by Hon'ble PM Shri @narendramodi revived the IDBI bank through professionalism, prudence and recapitalisation of more than Rs 25,000 crores. The IDBI Bank is now poised for its next phase of growth. All due process has been followed in the IDBI Bank strategic restructuring, and we have already clarified this yesterday. Check this: https://t.co/EjAOziADyf Many more instances of blatant scams and economic mismanagement have been covered in the White Paper on the Indian Economy released in February 2024. It remains relevant even now. Read here: https://t.co/MojSe36Zb2 Your lies with respect to Rafale had failed and were exposed. You had to apologise. The same will happen here. Congress-era banking had a phonebook for the powerful and a rulebook for the common citizens. The era of 'connection and setting banking' is over. Common people now have easy access to loans, and employees are not under pressure to extend loans over the phone calls.
— Nirmala Sitharaman (@nsitharaman) October 30, 2026
राहुल गांधी ने IDBI बैंक की बिक्री पर क्या कहा?
राहुल गांधी ने IDBI बैंक के कर्मचारियों के समर्थन में एक पत्र जारी कर सरकार के विनिवेश फैसले पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि सार्वजनिक बैंक बेचने की संपत्ति नहीं, बल्कि देश के निर्माण के साधन हैं. इन संस्थानों का निर्माण जनता के पैसे से हुआ है और इनका उद्देश्य देश के उद्योग और अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है.
उन्होंने कहा कि पिछले साल मार्च में IDBI बैंक के कर्मचारियों के एक समूह ने संसद भवन में उनसे मुलाकात की थी. कर्मचारियों ने सवाल उठाया था कि जिस बैंक को उन्होंने मेहनत से मुनाफे में पहुंचाया, सरकार उसे क्यों बेच रही है.
राहुल गांधी ने यह भी कहा कि कांग्रेस के समय बैंक बनाए जाते थे, जबकि मौजूदा सरकार के कार्यकाल में उन्हें बेचा जा रहा है. उन्होंने बैंक के कर्मचारियों और जमाकर्ताओं के हितों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई.
सीतारमण ने कांग्रेस पर लगाए गंभीर आरोप
राहुल गांधी की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कांग्रेस पर बैंकों और वित्तीय संस्थानों को अपनी निजी संपत्ति की तरह इस्तेमाल करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि UPA सरकार के दौरान बैंक कर्मचारियों पर राजनीतिक दबाव डालकर बड़े कारोबारी समूहों को कर्ज दिए जाते थे. इन कर्जों के डूबने से बैंकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा.
सीतारमण ने कहा कि मौजूदा सरकार को IDBI बैंक बेहद खराब वित्तीय स्थिति में मिला था. उनके मुताबिक, वीडियोकॉन, विनसम, एबीजी शिपयार्ड और किंगफिशर जैसे कारोबारी समूहों को दिए गए कर्ज बाद में एनपीए में बदल गए, जिससे बैंक को भारी नुकसान हुआ.
वित्त मंत्री ने दावा किया कि केंद्र सरकार ने 25,000 करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी डालकर और पेशेवर प्रबंधन के जरिए बैंक को फिर से खड़ा किया है. अब IDBI बैंक विकास के अगले चरण के लिए तैयार है.
'कांग्रेस के दौर में फोनबुक बैंकिंग होती थी'
सीतारमण ने कांग्रेस के शासनकाल की बैंकिंग व्यवस्था पर निशाना साधते हुए 'फोनबुक बैंकिंग' का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि उस दौर में प्रभावशाली लोगों के लिए फोन पर कर्ज मंजूर कराने की व्यवस्था थी, जबकि आम नागरिकों को नियमों का पालन करना पड़ता था.
उन्होंने 1976 की एक घटना का भी उल्लेख किया. सीतारमण के मुताबिक, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के चेयरमैन आरके तलवार को पद से हटा दिया गया था, क्योंकि उन्होंने संजय गांधी से जुड़े एक समूह को कर्ज देने के राजनीतिक दबाव को मानने से इनकार कर दिया था.
वित्त मंत्री ने कहा कि अब 'कनेक्शन और सेटिंग' वाली बैंकिंग का दौर खत्म हो चुका है. उनके मुताबिक, मौजूदा व्यवस्था में आम लोगों को आसानी से कर्ज उपलब्ध हो रहा है और बैंक कर्मचारियों पर फोन के जरिए कर्ज मंजूर करने का दबाव नहीं है.
सीतारमण ने राहुल गांधी पर राफेल सौदे को लेकर लगाए गए आरोपों का भी जिक्र किया और कहा कि उनके दावे पहले भी गलत साबित हुए थे. उन्होंने IDBI बैंक के मामले में भी राहुल गांधी के आरोपों को निराधार बताया.
क्या है IDBI बैंक की बिक्री का पूरा गणित?
सरकार ने 14 अक्टूबर को IDBI बैंक की कुल 60.72 फीसदी हिस्सेदारी फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स की इकाई को बेचने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी. इस सौदे का कुल मूल्य करीब 52,878 करोड़ रुपये है.
इसमें केंद्र सरकार अपनी 30.48 फीसदी हिस्सेदारी और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) अपनी 30.24 फीसदी हिस्सेदारी बेचेगा. सौदे के बाद भी केंद्र सरकार के पास बैंक की 15 फीसदी और LIC के पास 19 फीसदी हिस्सेदारी बनी रहेगी.
इस रणनीतिक सौदे को पूरा करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की नियामकीय मंजूरी जरूरी है. सरकार को उम्मीद है कि सभी आवश्यक मंजूरियां मिलने के बाद चालू वित्त वर्ष के अंत तक यह प्रक्रिया पूरी हो जाएगी.
DIPAM की देर रात आई सफाई में घटनाओं के क्रम, निजी बैंकों को तुलनात्मक सूची से हटाने या फेयरफैक्स की अंतिम चेतावनी को खारिज नहीं किया गया. इसके बजाय सरकार ने एक नया आंकड़ा 627 करोड़ रुपये सामने रखा और पुष्टि की कि सौदे के अपने सलाहकार ने ही बैंक का मूल्यांकन किया था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
DIPAM का कहना है कि पुस्तिका दिशानिर्देश है, नियम नहीं.
वित्त मंत्रालय ने IDBI बैंक को फेयरफैक्स फाइनेंशियल को बेचे जाने के तरीके पर बिजनेसवर्ल्ड की रिपोर्ट का जवाब दिया है. यह रिपोर्ट निवेश एवं लोक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग (DIPAM) के 13 अगस्त के एक आंतरिक नोट पर आधारित थी.
DIPAM की सफाई हमें 29 अक्टूबर को रात 9:45 बजे मिली, यानी खबर प्रकाशित होने के करीब 10 घंटे बाद.
सफाई में यह नहीं कहा गया कि नोट फर्जी, अधूरा या गलत तरीके से उद्धृत किया गया है. इसमें उसी नोट के प्रावधानों का हवाला देते हुए उसके भीतर से ही तर्क दिए गए हैं. साथ ही, इसमें तीन ऐसी बातें भी जोड़ी गई हैं, जिनके बारे में सरकार ने पहले कुछ नहीं कहा था.
सरकार ने किन बातों का खंडन नहीं किया
सफाई में नोट के निम्नलिखित किसी भी बिंदु का खंडन नहीं किया गया है:
घटनाओं का क्रम
पहले दौर की बोलियां मार्च में खोली गई थीं. फेयरफैक्स की संशोधित बोली 13 जुलाई को खोली गई. उसी दिन पुरानी रिजर्व प्राइस को 'गलत' घोषित कर दिया गया और उसे 'खारिज कर दिया गया तथा उस पर विचार नहीं किया गया.'
निजी बैंकों को क्यों हटाया गया
नोट में कहा गया था कि निजी बैंकों को शामिल करने से 'रिजर्व प्राइस का जरूरत से ज्यादा आकलन हो जाता है.' सफाई में इस पंक्ति पर कोई जवाब नहीं दिया गया है.
शेयर की कीमत का दो तरह से इस्तेमाल
नोट में शेयर की कीमत को 'मूल्यांकन के उद्देश्य से अनुपयोगी' बताया गया था. इसके बाद बोली स्वीकार करने के पक्ष में यह तर्क दिया गया कि शेयर बाजार में शेयर की कीमत बोली से कम पर कारोबार कर रही थी.
फेयरफैक्स की अंतिम चेतावनी
उसके पत्र में 81 रुपये प्रति शेयर की बोली को 'अंतिम प्रस्ताव' बताया गया था और कहा गया था कि अगर बोली बढ़ाने के लिए कहा गया तो वह इसे वापस ले लेगी.
पैसों का दबाव
नोट में 'असाधारण राजकोषीय दबाव', विदेशी मुद्रा भंडार में कमी और रुपये की कमजोरी का हवाला दिया गया था.
कबाड़ बिक्री की मिसाल
नोट में कबाड़ की नीलामी के लिए रेलवे स्टोर्स कोड के नियमों का सहारा लिया गया था.
सुरक्षा संबंधी चिंता
गृह मंत्रालय ने एक बोलीदाता के बारे में 'अतिरिक्त जानकारी' दी थी.
सरकार ने किन बातों की पुष्टि की
सौदे के अपने सलाहकार ने दो मूल्यांकनों में से एक किया था
हमारी रिपोर्ट में बताया गया था कि बिक्री प्रक्रिया संचालित करने के लिए नियुक्त ट्रांजैक्शन एडवाइजर KPMG ने एक मूल्यांकन तैयार किया था. DIPAM ने इसकी पुष्टि की है. विभाग के अनुसार, प्रोटोकॉल के तहत कारोबारी मूल्यांकन 'हमेशा ट्रांजैक्शन एडवाइजर के माध्यम से किया जाता है.' विभाग ने यह भी कहा कि KPMG ने इस काम के लिए 'आगे पेशेवर विशेषज्ञों की नियुक्ति की थी.' हालांकि, उनके नाम नहीं बताए गए हैं.
कैबिनेट के फैसले के बाद चावला ने दोनों मूल्यांकनकर्ताओं को स्वतंत्र बताया था. अब DIPAM का कहना है कि वे 'एक-दूसरे से स्वतंत्र' थे. विभाग ने यह नहीं कहा कि वे सौदे से भी स्वतंत्र थे.
बोली में बढ़ोतरी का आकार
हमारी रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि फेयरफैक्स की बढ़ी हुई बोली से करीब 3,900 करोड़ रुपये अतिरिक्त मिले. DIPAM ने यह आंकड़ा 3,917 करोड़ रुपये बताया है.
टैक्स कवर कैसे काम करता है
DIPAM का कहना है कि 'केवल अतिरिक्त कर मांग, यदि उसका भुगतान किया जाता है, तो ही प्रतिपूर्ति के लिए पात्र होगी.' दूसरे शब्दों में, अगर टैक्स विभाग IDBI के खिलाफ कोई मामला जीतता है, तो सरकार नए मालिक को वह पैसा वापस करेगी. हमारी रिपोर्ट में भी यही बताया गया था.
सरकार को कहां आपत्ति है और उसका अपना नोट क्या कहता है
1. 'दिशानिर्देश हैं, नियम नहीं'
DIPAM का कहना है: उसकी प्रक्रियाएं 'संकेतात्मक दिशानिर्देशों की प्रकृति की हैं, न कि कठोर नियमों या विनियमों की.' वर्ष 2017 के कैबिनेट फैसले के तहत विनिवेश पर सचिवों का कोर ग्रुप (CGD) 'आवश्यकतानुसार बदलावों पर विचार कर सकता है.'
नोट में कहा गया है: यही बात नोट में भी कही गई है. इसमें यह भी कहा गया है कि अधिकारियों को बोलियों की जानकारी दिए बिना रिजर्व प्राइस तय की जाती है और स्वीकार किया गया है कि 'शुरुआत में इस प्रक्रिया को अपनाया गया था, लेकिन बोलियां रिजर्व प्राइस से कम थीं.'
इसे नियम कहा जाए या दिशानिर्देश, नोट स्वीकार करता है कि प्रक्रिया अपनाई गई, बोलियां असफल रहीं और फिर उस प्रक्रिया को छोड़ दिया गया.
2. 'रिजर्व प्राइस न घटाई गई और न बढ़ाई गई'
DIPAM का कहना है: पहली प्रक्रिया 'फंक्टस ऑफिसियो' हो गई थी. इसका मतलब है कि बोलियां मंजूर नहीं होने के बाद वह प्रक्रिया अपने आप समाप्त हो गई.
नोट में कहा गया है: CGD ने फैसला किया था कि 'वह रिजर्व प्राइस जिसे CGD ने गलत घोषित किया था', उसका दोबारा इस्तेमाल 'नहीं किया जा सकता और उसे खारिज कर दिया जाना चाहिए तथा उस पर विचार नहीं किया जाना चाहिए.'
सरकार के अपने प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार, पुरानी रिजर्व प्राइस 94.42 रुपये प्रति शेयर थी, जबकि नया बेंचमार्क 75.99 रुपये था.
3. 'डबल ब्लाइंड' प्रक्रिया
DIPAM का कहना है: 'सर्वश्रेष्ठ प्रस्ताव के लिए बोलियां आमंत्रित करने से पहले अप्रैल 2026 में CGD ने मूल्यांकन पद्धति की समीक्षा की थी.' मूल्यांकनकर्ताओं ने 'मई 2026 में ही संशोधित मूल्यांकन पर काम शुरू कर दिया था.' प्रक्रिया 'डबल ब्लाइंड' बनी रही, क्योंकि बोलीदाता को मूल्यांकन की जानकारी नहीं थी और मूल्यांकनकर्ताओं ने बोलियां नहीं देखी थीं. केवल CGD को ही पूरी तस्वीर देखने का मौका मिला.
नोट में कहा गया है: पहले दौर की बोलियां 12 मार्च को खोली गई थीं, यानी अप्रैल में हुई समीक्षा से पहले. फेयरफैक्स की संशोधित बोली 13 जुलाई को खोली गई और रैंकिंग का नतीजा CGD के सामने रखा गया. उसी दिन हुई दूसरी बैठक में CGD ने निर्देश दिया कि बाजार मूल्यांकन का 'इस्तेमाल नहीं किया जा सकता' और तुलनात्मक मूल्यांकन के लिए केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को शामिल किया जाए. इसके बाद ये निर्देश मूल्यांकनकर्ताओं को भेज दिए गए.
हो सकता है कि मूल्यांकनकर्ताओं ने बोलियां नहीं देखी हों, लेकिन उन्हें निर्देश देने वाले अधिकारियों ने बोलियां देखी थीं.
4. केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ही क्यों?
DIPAM का कहना है: किसी बैंक की तुलनीय बिक्री उपलब्ध नहीं थी, इसलिए सभी सूचीबद्ध सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को तुलना के लिए इस्तेमाल किया गया. IDBI को 'केवल नियामकीय उद्देश्यों' के लिए निजी बैंक माना जाता है और निवेशक 'इसे सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई के रूप में ही मूल्यांकित करते रहे.'
नोट में कहा गया है: 'तुलनात्मक बैंकों की सूची में निजी क्षेत्र के बैंकों को शामिल करने से रिजर्व प्राइस का जरूरत से ज्यादा आकलन हो जाता है.'
627 करोड़ रुपये का सवाल
DIPAM ने पहली बार खरीदार को दिए गए टैक्स कवर की राशि बताई है:
'इस मद में संभावित देनदारी केवल 627 करोड़ रुपये हो सकती थी, जबकि बोली से प्राप्त कीमत में 3,917 करोड़ रुपये की वृद्धि हुई.'
पहली नजर में देखें तो सरकार ने 627 करोड़ रुपये का जोखिम अपने ऊपर लिया और बदले में 3,917 करोड़ रुपये अधिक प्राप्त किए.
लेकिन 627 करोड़ रुपये विवादित कुल टैक्स राशि नहीं हो सकती.
13 अगस्त के नोट में कहा गया है कि यह अनुमान IDBI के टैक्स सलाहकार डेलॉयट के जोखिम आकलन के आधार पर तैयार किया गया था. इसमें कहा गया है कि यह अनुमान हाईकोर्ट में टैक्स अपीलों की 12.07 फीसदी सफलता दर के साथ 'अच्छी तरह मेल खाता है.' इससे संकेत मिलता है कि यह जोखिम के आधार पर निकाली गई राशि है, यानी संभावित नुकसान, न कि वह पूरी राशि जिसकी भरपाई करने पर सरकार सहमत हुई है.
यह टैक्स कवर सभी विवादित आयकर मांगों पर लागू होता है, 'चाहे उन्हें IDBI के खातों में आकस्मिक देनदारियों के रूप में दर्ज किया गया हो या नहीं.' DIPAM ने अभी तक यह नहीं बताया है कि कुल कितनी टैक्स राशि विवादित है.
अभी भी अनुत्तरित सवाल
सरकार ने कुल कितने विवादित टैक्स की भरपाई करने पर सहमति दी है?
मूल्यांकन के लिए KPMG ने किन 'पेशेवर विशेषज्ञों' को नियुक्त किया था?
निजी बैंकों को हटाने के लिए नोट में एक वजह और सफाई में दूसरी वजह क्यों दी गई है?
क्या KPMG और BDO की मूल्यांकन रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएंगी?
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और द मार्केट माफिया: क्रॉनिकल ऑफ इंडियाज हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कैबल दैट वेंट स्कॉट-फ्री के लेखक हैं. यह पुस्तक भारत के वित्तीय बाजारों के अंधेरे पहलुओं को उजागर करते हैं. मुंबई में करीब दो दशक तक जमीनी स्तर पर रिपोर्टिंग करने वाले पलक ने धन, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की पड़ताल की है. उनके लेख भारत के प्रमुख वित्तीय समाचार पत्रों, जिनमें द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं. 19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुए पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक में मुंबई की गैंगवार की जगह संगठित अपराध के अधिक परिष्कृत रूप ने ले ली है. इसमें कॉरपोरेट इमारतों के भीतर चलने वाली सफेदपोश वित्तीय धोखाधड़ी शामिल है. इसी अनुभव ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया, जहां उन्होंने भारत की 'सफेद धन' अर्थव्यवस्था की जटिल कार्यप्रणाली को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम वित्तीय दुनिया की चमकदार सतह के पीछे काम करने वाले समूहों को उजागर करता है. सच सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे लोग नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें भारतीय पत्रकारिता में एक ऐसी प्रभावशाली आवाज बनाती है जो यथास्थिति को चुनौती देने और खुद को कानून से ऊपर समझने वालों को बेनकाब करने से नहीं हिचकती.)