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RBI ने सह-ऋण व्यवस्था के निर्देशों में संशोधन किया, पारदर्शिता बढ़ेगी

RBI के संशोधित सह-ऋण निर्देश भारतीय वित्तीय क्षेत्र में पारदर्शिता और नियंत्रण को मजबूत करेंगे. साथ ही, ये छोटे और मध्यम NBFCs के लिए संसाधन जुटाने के नए अवसर भी पैदा करेंगे, जिससे भारत की वित्तीय समावेशन प्रक्रिया को गति मिलेगी.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 6 अगस्त 2025 को सह-ऋण (Co-lending) व्यवस्था के लिए अपने दिशानिर्देशों में संशोधन जारी किए हैं. इन नए निर्देशों का उद्देश्य सह-ऋण प्रणाली में नियामक नियंत्रण को व्यापक बनाना और पारदर्शिता बढ़ाना है. पहले जहां ये निर्देश केवल बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) के बीच लागू होते थे, अब ये सभी नियामित संस्थाओं (REs) के बीच सह-ऋण समझौतों पर लागू होंगे. साथ ही, अब यह व्यवस्था केवल प्राथमिक क्षेत्र के ऋणों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि सभी प्रकार के ऋणों पर लागू होगी.

सह-ऋण: बैंक और NBFC के लिए फायदेमंद

सह-ऋण मॉडल को NBFCs और बैंकों दोनों के लिए लाभकारी माना जाता है क्योंकि यह ऋण जोखिम और लाभ दोनों को साझा करने का मौका देता है. NBFCs के लिए, यह बैंकिंग फंडिंग तक पहुंच बढ़ाता है और संसाधन जुटाने के रास्ते विविध बनाता है. वहीं, बैंकों को अधिक कठिन ग्राहकों और क्षेत्रों तक पहुंचने में मदद मिलती है. मार्च 2025 तक NBFCs के सह-ऋण एसेट्स का प्रबंधन ₹1.1 लाख करोड़ से अधिक हो चुका है.

विशेषज्ञों की राय

Crisil रेटिंग्स की डायरेक्टर मालविका भोतिका के अनुसार, "ये नए निर्देश NBFCs के लिए दीर्घकालिक विकास के अवसर बढ़ाएंगे क्योंकि अब ये सभी प्रकार के ऋणों और सभी नियामित संस्थाओं के लिए लागू होंगे. साथ ही, प्रत्येक संस्थान को अब ऋण का न्यूनतम 10% हिस्सा अपने खातों में रखना होगा, जो कि पहले NBFCs के लिए 20% था. यह मध्यम और छोटे NBFCs के लिए विशेष रूप से फायदेमंद होगा. इसके अलावा, त्रैमासिक और वार्षिक आधार पर सह-ऋण साझेदारों की सूची, ब्याज दर, फीस और डिफॉल्ट लॉस गारंटी (DLG) जैसे विवरणों की बेहतर रिपोर्टिंग पारदर्शिता बढ़ाएगी."

डिफॉल्ट लॉस गारंटी में बदलाव

पूर्व में केवल डिजिटल लेंडिंग के लिए लागू डिफॉल्ट लॉस गारंटी अब सभी प्रकार के ऋणों पर लागू होगी, जिसमें लेंडर्स के बीच जोखिम और लाभ साझा करना और अधिक व्यापक होगा.

सह-ऋण मॉडल 1 और मॉडल 2 के बीच अंतर

वर्तमान में दो सह-ऋण मॉडल प्रचलित हैं: CLM-1 और CLM-2. CLM-1 में दोनों ऋणदाता संयुक्त रूप से ऋण का हिस्सा देते हैं, जबकि CLM-2 में बैंक अपने हिस्से के ऋणों का पुनर्भुगतान NBFC को लोन के बाद करता है. संशोधित निर्देश CLM-2 मॉडल के लिए परिचालन संबंधी चुनौतियां पैदा कर सकते हैं क्योंकि अब ऋण स्वीकृति के समय पार्टनर संस्थान को पहचानना आवश्यक होगा और पार्टनर को 15 दिनों के भीतर अपनी हिस्सेदारी लेना होगी. इससे तकनीकी एकीकरण और नीतियों में सामंजस्य की आवश्यकता बढ़ेगी.

प्रभाव और कार्यान्वयन

नए निर्देश 1 जनवरी 2026 से लागू होंगे, हालांकि नियामित संस्थाएं अपनी आंतरिक नीतियों के अनुसार इसे पहले भी लागू कर सकती हैं. प्रारंभिक चरण में, पार्टनर संस्थान अपनी प्रणालियों और प्रक्रियाओं को नए नियमों के अनुसार ढालने के कारण डायरेक्ट असाइनमेंट वॉल्यूम में वृद्धि देख सकते हैं.

Crisil रेटिंग्स के एसोसिएट डायरेक्टर रौनक अग्रवाल कहते हैं, "CLM-1 मॉडल में कोई बड़ी समस्या नहीं होगी, लेकिन CLM-2 मॉडल में परिचालन संबंधी जटिलताएं हो सकती हैं, जो कुछ समय के लिए सह-ऋण वॉल्यूम को प्रभावित कर सकती हैं."

 


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