IPL इतिहास की सबसे महंगी डील, सैम करन की जगह दसुन शनाका को मौका मिला.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) की टीम राजस्थान रॉयल्स से जुड़ी एक बड़ी खबर सामने आई है. फ्रेंचाइजी की मालिकाना हक की दौड़ अब खत्म हो चुकी है, जिसमें अमेरिका के उद्यमी कल सोमानी के नेतृत्व वाले एक कंसोर्टियम ने राजस्थान रॉयल्स को 1.63 अरब डॉलर (लगभग ₹15,286 करोड़) में खरीद लिया है. यह IPL इतिहास की अब तक की सबसे महंगी फ्रेंचाइजी डील मानी जा रही है.
मालिकाना हक में बड़ा बदलाव
IntraEdge, Academian और Truyo.AI के संस्थापक कल सोमानी को इस डील में कई बड़े निवेशकों का समर्थन मिला है. इनमें Walmart परिवार के रॉब वॉल्टन और NFL टीम डेट्रॉइट लायंस के मालिक हैम्प परिवार शामिल हैं. इसके अलावा Ford Motor Company के सह-मालिक परिवार से जुड़ी शीला फोर्ड हैम्प भी इस समूह का हिस्सा हैं. हालांकि, राजस्थान रॉयल्स के स्वामित्व में यह बदलाव IPL 2026 सीजन के बाद प्रभावी होगा.
टीम में बड़ा बदलाव
इस बीच, टीम ने IPL 2026 के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव की घोषणा भी की है. इंग्लैंड के ऑलराउंडर सैम करन, जो चोट के कारण पूरे सीजन से बाहर हो गए हैं, उनकी जगह श्रीलंका के T20 कप्तान दसुन शनाका को टीम में शामिल किया गया है. शनाका को ₹2 करोड़ में टीम से जोड़ा गया है.
शनाका का अंतरराष्ट्रीय करियर
दसुन शनाका का अंतरराष्ट्रीय करियर शानदार रहा है. उन्होंने श्रीलंका के लिए 6 टेस्ट, 71 वनडे और 131 टी20 मैच खेले हैं, जिसमें उन्होंने 3,350 से अधिक रन बनाए हैं और 86 विकेट भी लिए हैं.
राजस्थान रॉयल्स के क्रिकेट निदेशक और मुख्य कोच कुमार संगकारा ने इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि टीम को सैम करन जैसे खिलाड़ी के बाहर होने का अफसोस है, लेकिन उन्हें विश्वास है कि शनाका एक फिनिशर और ऑलराउंडर के रूप में टीम को संतुलन प्रदान करेंगे.
IPL 2026 से पहले टीम में कई बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं, जिसमें खिलाड़ियों की अदला-बदली और रणनीतिक फेरबदल शामिल हैं.
भारत और UAE ने रणनीतिक रक्षा साझेदारी को मजबूत बनाने पर सहमति जताई. दोनों देशों के बीच सुरक्षा और सैन्य सहयोग को नई दिशा देने के लिए व्यापक ढांचा तैयार किया जाएगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संयुक्त अरब अमीरात (UAE) दौरे के दौरान भारत और UAE के बीच रक्षा सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास से जुड़े कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर हुए. इस दौरान UAE ने भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर और वित्तीय संस्थानों में 5 अरब डॉलर निवेश करने की घोषणा भी की. ये समझौते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और UAE के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की मौजूदगी में हुए. पीएम मोदी का यह दौरा उनके पांच देशों के विदेश दौरे का पहला पड़ाव है.
रक्षा और ऊर्जा सुरक्षा पर बढ़ा सहयोग
भारत और UAE ने रणनीतिक रक्षा साझेदारी को मजबूत बनाने पर सहमति जताई. दोनों देशों के बीच सुरक्षा और सैन्य सहयोग को नई दिशा देने के लिए व्यापक ढांचा तैयार किया जाएगा. इसके साथ ही रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व और LPG सप्लाई से जुड़े समझौतों पर भी हस्ताक्षर हुए. माना जा रहा है कि इन समझौतों से भारत की ऊर्जा सुरक्षा को बड़ा सहारा मिलेगा और वैश्विक संकट के समय सप्लाई चेन को स्थिर रखने में मदद मिलेगी.
गुजरात में बनेगा शिप रिपेयर क्लस्टर
समुद्री इंफ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक सहयोग को बढ़ावा देने के लिए गुजरात के वाडिनार में शिप रिपेयर क्लस्टर स्थापित करने पर सहमति बनी. इसके लिए दोनों देशों के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) साइन किया गया. इसके अलावा UAE ने भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर के साथ RBL बैंक और सम्मान कैपिटल में निवेश की घोषणा की.
क्षेत्रीय तनाव पर बोले पीएम मोदी
UAE राष्ट्रपति के साथ द्विपक्षीय बैठक में प्रधानमंत्री मोदी ने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव पर चिंता जताई. उन्होंने कहा कि किसी भी विवाद का समाधान बातचीत और कूटनीति के जरिए ही संभव है. पीएम मोदी ने मुश्किल हालात में UAE नेतृत्व के धैर्य और संतुलन की सराहना भी की.
उन्होंने UAE पर हुए हमलों की निंदा करते हुए कहा कि भारत हर परिस्थिति में UAE के साथ मजबूती से खड़ा है. साथ ही UAE में रह रहे भारतीय समुदाय का परिवार की तरह ध्यान रखने के लिए वहां की सरकार का धन्यवाद भी किया.
होर्मुज जलडमरूमध्य को बताया अहम
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य के महत्व को रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि इस रणनीतिक समुद्री मार्ग का खुला और सुरक्षित रहना बेहद जरूरी है. पीएम मोदी ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों के पालन और समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया.
पांच देशों के दौरे पर हैं पीएम मोदी
15 से 20 मई तक चलने वाले इस विदेश दौरे में प्रधानमंत्री मोदी UAE के अलावा नीदरलैंड, स्वीडन और नॉर्वे सहित कई देशों का दौरा करेंगे. इस दौरान व्यापार, ग्रीन एनर्जी, टेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सप्लाई चेन जैसे अहम वैश्विक मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है.
हाल ही में जारी कई रिपोर्ट्स के अनुसार, भू-राजनीतिक तनाव से तेल और सोने की कीमतें बढ़ रही हैं, जिससे आयात दबाव बढ़ता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत की अर्थव्यवस्था इस समय एक बड़े व्यवहारिक बदलाव के दौर से गुजर रही है. सरकार की नीतिगत अपील, सोने के बढ़ते आयात, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव और बैंकों के सतर्क रुख से संकेत मिल रहे हैं कि देश वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ती आयात निर्भरता के बीच आर्थिक संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है.
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्नेर मोदी ने लोगों से विदेशों में “डेस्टिनेशन वेडिंग” आयोजित करने से बचने और देश के भीतर ही शादी समारोह आयोजित करने की अपील की थी. गुजरात में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि अमीर भारतीयों के बीच विदेशों में छुट्टियां मनाने और शादियां करने का चलन तेजी से बढ़ा है, जिससे विदेशी मुद्रा का बड़ा बहिर्गमन होता है. उन्होंने कहा कि देश के पर्यटन स्थलों को भी ऐसे आयोजनों के लिए चुना जा सकता है.
बढ़ते आयात दबाव के बीच सरकार की चिंता
रुबिक्स डेटा साइसेंज (Rubix Data Sciences) की एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रधानमंत्री की हालिया अपील, ईंधन की बचत, गैर-जरूरी विदेशी यात्रा कम करने, सोने की खरीद सीमित रखने और आयातित वस्तुओं पर निर्भरता घटाने को बाहरी आर्थिक दबावों के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है.
रिपोर्ट के अनुसार कच्चा तेल, सोना, खाद्य तेल और उर्वरकों जैसे जरूरी आयात FY26 में बढ़कर 240 अरब डॉलर से ज्यादा हो गए, जबकि FY25 में यह आंकड़ा 222 अरब डॉलर था. ये भारत के कुल आयात का लगभग 31 प्रतिशत हिस्सा हैं. कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचने और भारत की 88 प्रतिशत तेल आयात निर्भरता के कारण आयात बिल लगातार बढ़ रहा है.
इसी दौरान भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 27 फरवरी के 728 अरब डॉलर से घटकर 1 मई तक 690.7 अरब डॉलर रह गया, यानी करीब दो महीनों में 5 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई.
सोने का आयात बना चिंता का कारण
रिपोर्ट में कहा गया है कि केवल FY26 में ही भारत का गोल्ड इंपोर्ट लगभग 72 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो सालाना आधार पर 24 प्रतिशत ज्यादा है. इससे चालू खाते के घाटे (CAD) पर दबाव बढ़ा है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने 2026 में भारत का CAD लगभग 84.5 अरब डॉलर यानी GDP के करीब 2 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है.
SBI रिपोर्ट: कीमत बढ़ी, लेकिन खरीद मात्रा घटी
भारीतय स्टेट बैंक (State Bank of India) की रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार सोने के आयात में मूल्य और मात्रा के बीच बड़ा अंतर देखने को मिला है. FY25 में जहां गोल्ड इंपोर्ट का मूल्य 57.9 अरब डॉलर था, वहीं FY26 में यह बढ़कर 72.4 अरब डॉलर पहुंच गया. हालांकि आयात की मात्रा लगातार दूसरे साल करीब 5 प्रतिशत घटी है. इससे संकेत मिलता है कि आयात बिल बढ़ने की मुख्य वजह सोने की ऊंची कीमतें हैं, न कि खरीद की मात्रा.
एसबीआई ने यह भी कहा कि भारत में आयातित सोने का करीब 38 प्रतिशत हिस्सा ज्वेलरी के रूप में दोबारा निर्यात कर दिया जाता है, जिससे कुछ हद तक दबाव कम होता है.
गोल्ड ड्यूटी बढ़ाने के असर पर चेतावनी
हाल ही में सरकार ने सोने पर कस्टम ड्यूटी 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दी है. SBI ने चेतावनी दी है कि इतिहास बताता है कि ऐसी बढ़ोतरी से घरेलू और विदेशी बाजारों के दामों में अंतर बढ़ता है, जिससे तस्करी और ग्रे मार्केट इंपोर्ट को बढ़ावा मिल सकता है.
गहनों से निवेश की ओर बढ़ रहा झुकाव
केयरएज (CareEdge Ratings) की रिपोर्ट बताती है कि भारत में सोने की खपत का पैटर्न तेजी से बदल रहा है. पहले जहां कुल गोल्ड डिमांड में ज्वेलरी की हिस्सेदारी करीब 70 प्रतिशत रहती थी, वहीं CY25 में यह घटकर 60 प्रतिशत से नीचे आ गई.
दूसरी ओर ETF, गोल्ड बार और गोल्ड कॉइन जैसे निवेश माध्यमों की मांग बढ़ी है और निवेश श्रेणी की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गई है.
रिपोर्ट के मुताबिक रिकॉर्ड कीमतों के बावजूद भारत में ज्वेलरी खरीद मूल्य के लिहाज से 10 प्रतिशत बढ़कर 4.8 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई, लेकिन खरीद की मात्रा में 15 प्रतिशत गिरावट दर्ज हुई. इससे साफ है कि लोग अब हल्के और कम कैरेट वाले आभूषणों की ओर बढ़ रहे हैं.
गोल्ड लोन और बैंकिंग सेक्टर में भी बदलाव
CareEdge ने कहा कि गोल्ड लोन सिक्योरिटाइजेशन में तेज उछाल आया है. H2FY26 में इसका आकार बढ़कर 18,500 करोड़ रुपये हो गया, जबकि FY25 में यह 5,000 करोड़ रुपये था. इससे संकेत मिलता है कि सोना अब केवल उपभोग की वस्तु नहीं रह गया, बल्कि वित्तीय संपत्ति और कर्ज के लिए गारंटी के रूप में भी इस्तेमाल बढ़ रहा है.
हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि बैंकिंग सिस्टम फिलहाल मजबूत स्थिति में है. दिसंबर 2025 तक बैंकों का ग्रॉस NPA करीब 1.9 प्रतिशत और नेट NPA ऐतिहासिक निचले स्तर 0.41 प्रतिशत पर रहा.
RBI पर बढ़ा मुद्रा स्थिरता का दबाव
रिपोर्ट के अनुसार विदेशी पूंजी प्रवाह कमजोर रहने और वैश्विक तनाव बढ़ने से रुपये पर लगातार दबाव बना हुआ है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को स्पॉट और फॉरवर्ड मार्केट दोनों में सक्रिय हस्तक्षेप करना पड़ा है.
CareEdge का अनुमान है कि अगर कच्चा तेल औसतन 90 डॉलर प्रति बैरल पर बना रहता है तो FY27 में भारत का CAD बढ़कर GDP के 2.1 प्रतिशत तक पहुंच सकता है. हालांकि मजबूत सर्विस एक्सपोर्ट के कारण इसे फिलहाल नियंत्रण में माना जा रहा है.
बदल रहा है भारतीय परिवारों का आर्थिक व्यवहार
तीनों रिपोर्टों को मिलाकर देखें तो एक स्पष्ट तस्वीर सामने आती है, भू-राजनीतिक तनाव से तेल और सोने की कीमतें बढ़ रही हैं, जिससे आयात दबाव बढ़ता है. सरकार लोगों की खर्च और निवेश आदतों को प्रभावित करने की कोशिश कर रही है, जबकि उपभोक्ता गहनों की बजाय निवेश वाले सोने की ओर बढ़ रहे हैं.
इसके साथ ही बैंकिंग सिस्टम और RBI भी वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए सतर्क रुख अपना रहे हैं. यानी भारत में अब घरेलू खर्च, निवेश और सरकारी नीति के बीच गहरा संबंध बनता जा रहा है, जो सीधे देश के बाहरी आर्थिक संतुलन से जुड़ गया है.
तिमाही नतीजों के बाद कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने शेयरधारकों की मंजूरी के अधीन ₹3 प्रति शेयर के अंतिम डिविडेंड की सिफारिश की है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल्स लिमिटेड (TMPV) के मार्च तिमाही नतीजों के बाद कंपनी एक बार फिर बाजार में चर्चा का केंद्र बन गई है. घरेलू बाजार में SUV और इलेक्ट्रिक वाहनों की मजबूत मांग, रिकॉर्ड बिक्री और जैगुआर लैंड रोवर (JLR) कारोबार में सुधार ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है. इसी सकारात्मक धारणा के चलते शुक्रवार को कंपनी का शेयर 5 प्रतिशत से ज्यादा उछलकर 356.60 रुपये तक पहुंच गया.
Q4 FY26 में मजबूत राजस्व वृद्धि और कैश फ्लो में सुधार
Q4 FY26 में TMPVL का कंसोलिडेटेड राजस्व ₹105.4 हजार करोड़ रहा, जो 7.2% की वृद्धि को दर्शाता है. इस दौरान EBIT ₹8.9 हजार करोड़ दर्ज किया गया. कंपनी के प्रदर्शन में सबसे बड़ा योगदान JLR के उत्पादन के सामान्य होने और घरेलू बाजार में रिकॉर्ड वॉल्यूम ग्रोथ से मिला. इसी वजह से तिमाही-दर-तिमाही आधार पर प्रदर्शन में स्पष्ट सुधार देखने को मिला. इसके साथ ही कंपनी ने Q4 में ₹11.4 हजार करोड़ का मजबूत फ्री कैश फ्लो भी दर्ज किया, जो ऑपरेशनल स्थिरता में सुधार का संकेत है.
वैश्विक चुनौतियों के बीच स्थिर वित्तीय प्रदर्शन
पूरे वित्तीय वर्ष FY26 में TMPVL का कुल राजस्व ₹335.6 हजार करोड़ रहा. हालांकि, वर्ष के दौरान EBITDA मार्जिन 6.8% और EBIT मार्जिन 1.1% पर रहा. इस दौरान कंपनी की वैश्विक सहायक कंपनी JLR को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जिनमें साइबर घटना, टैरिफ दबाव, चीन लग्जरी टैक्स, VME दबाव और कमोडिटी लागत में वृद्धि शामिल रही. इन सभी कारकों ने मार्जिन पर दबाव डाला.
डिविडेंट की घोषणा़
तिमाही नतीजों के बाद कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने शेयरधारकों की मंजूरी के अधीन ₹3 प्रति शेयर के अंतिम डिविडेंड की सिफारिश की है.
PLI स्कीम से मिला अतिरिक्त सपोर्ट
सरकार की PLI स्कीम से भी कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन को सहारा मिला है. मार्च तिमाही में टाटा मोटर्स को करीब 4.7 अरब रुपये का PLI इंसेंटिव मिला, जबकि पूरे FY26 में यह आंकड़ा 10.5 अरब रुपये रहा. बिक्री बढ़ने के साथ प्रति यूनिट लागत कम होने से कंपनी को ऑपरेटिंग लीवरेज का फायदा मिला, जिससे लाभप्रदता में सुधार देखने को मिला.
JLR कारोबार में रिकवरी के संकेत
Jaguar Land Rover (JLR) कारोबार में भी धीरे-धीरे सुधार देखने को मिला है. पिछले साल साइबर अटैक से जुड़े व्यवधानों ने प्रदर्शन पर असर डाला था, लेकिन अब स्थिति सामान्य होती दिख रही है. मार्च तिमाही में JLR की आय करीब 6.9 अरब पाउंड रही. हालांकि टैरिफ लागत, करेंसी दबाव और बढ़ते खर्च अभी भी चुनौती बने हुए हैं, लेकिन बेहतर प्रोडक्ट मिक्स, लागत नियंत्रण और नई लॉन्चिंग्स से कारोबार को समर्थन मिल रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर JLR में सुधार का यह रुझान जारी रहता है, तो आने वाले समय में कंपनी की कमाई और मजबूत हो सकती है.
दो हिस्सों में बंटा रहा FY26
TMPVL के चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर धिमान गुप्ता ने कहा कि FY26 दो अलग-अलग चरणों वाला वर्ष रहा. उन्होंने बताया कि घरेलू कारोबार में GST 2.0 के बाद मजबूत मांग देखी गई. जबकि JLR को टैरिफ और साइबर घटना जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा. Q4 में सभी वित्तीय संकेतकों में सुधार JLR के ऑपरेशन सामान्य होने और घरेलू बाजार की मजबूती के कारण हुआ.
उद्योग जगत के आंकड़ों के अनुसार टियर-2 शहरों में ईवी की पैठ करीब 10.7% और टियर-3 शहरों में लगभग 8.7% तक पहुंच चुकी है, जो टियर-1 शहरों के मुकाबले बहुत पीछे नहीं है.
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रितु राणा
पश्चिम एशिया में गहराते भू-राजनीतिक तनाव और ईंधन आपूर्ति को लेकर बढ़ती अनिश्चितताओं के बीच आज देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी ने आम आदमी की चिंता और बढ़ा दी है. इसी के साथ प्रधानमंत्री की ओर से इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) को अपनाने की अपील भी चर्चा में है. महंगे होते ईंधन और ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती के बीच भारत में वैकल्पिक मोबिलिटी की ओर रुझान तेजी से बढ़ रहा है. इसका असर अब साफ दिख रहा है, जहां EV की मांग मेट्रो शहरों से आगे बढ़कर टियर-2 और टियर-3 शहरों तक भी तेजी से फैल रही है. हाल में उत्तर पूर्वी दिल्ली के सांसद मनोज तिवारी ने भी सोशल मीडिया एक वीडियो शेयर करके यह जानकारी दी कि प्रधानमंत्री की अपील पर उन्होंने भी पेट्रोल की गाड़ी से अब इलेक्ट्रिक गाड़ी पर स्विच कर लिया है. साथ ही उन्होंने अन्य लोगों से भी यह अपील करते हुए कहा कि अगर वह भी इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रयोग करें.
EV की ग्रोथ अब मेट्रो से आगे छोटे शहरों में पहुंची
भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की ग्रोथ अब सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं है. टियर-2 और टियर-3 शहर तेजी से ईवी अपनाने के नए केंद्र बनते जा रहे हैं. इसकी मुख्य वजह ई-कॉमर्स, लास्ट-माइल डिलीवरी, इंटरसिटी लॉजिस्टिक्स और स्थानीय कारोबारों की बढ़ती जरूरतें हैं, जहां लागत कम करना और ऑपरेशनल एफिशिएंसी बढ़ाना प्राथमिकता बन गया है.
ड्राइवीएन (Drivn) की को-फाउंडर और सीबीओ अल्पना जैन कहती हैं, टियर-2 और टियर-3 शहर अब सिर्फ कंज्यूमर मार्केट नहीं रहे, बल्कि कमर्शियल मोबिलिटी के असली ग्रोथ इंजन बन चुके हैं. यहां बिजनेस ऐसे समाधान चाहते हैं जो बिना भारी शुरुआती निवेश के स्केलेबिलिटी और एफिशिएंसी दोनों दे सकें. उन्होंने बताया कि ई-कॉमर्स और डिलीवरी इकोसिस्टम ने इन शहरों में EV को एक विकल्प से बढ़ाकर जरूरत बना दिया है. अब यह ट्रेंड नहीं, बल्कि स्ट्रक्चरल शिफ्ट है.
छोटे शहरों में लागत सबसे बड़ा ड्राइवर
विशेषज्ञों का मानना है कि छोटे शहरों में EV अपनाने का सबसे बड़ा कारण लागत है. यहां उपभोक्ता लंबे समय की बचत और कम रनिंग कॉस्ट को प्राथमिकता देते हैं. मैक्सवोल्ट एनर्जी (MaxVolt Energy Industries Ltd) के को-फाउंडर व सीएमओ मुकेश गुप्ता कहते हैं, छोटे शहरों में EV को लेकर सोच बेहद व्यावहारिक है. लोग दिखावे से ज्यादा इस बात पर ध्यान देते हैं कि महीने का खर्च कितना कम हो सकता है. उन्होंने बताया कि इलेक्ट्रिक दोपहिया और कमर्शियल वाहन डिलीवरी और रोजमर्रा के कामकाज में सबसे तेजी से अपनाए जा रहे हैं, क्योंकि ये सीधे जेब पर असर डालते हैं. इसके अलावा सरकारी प्रोत्साहन, फाइनेंसिंग की आसान सुविधा और बढ़ती जागरूकता ने EV को अब एक प्रयोग नहीं बल्कि एक समझदारी भरा आर्थिक फैसला बना दिया है.
EV अपनाने में नीति और इंफ्रास्ट्रक्चर की अहम भूमिका
सरकारी नीतियों, आसान फाइनेंस और चार्जिंग नेटवर्क के धीरे-धीरे विस्तार ने EV सेक्टर में भरोसा बढ़ाया है. साथ ही बैटरी परफॉर्मेंस और पर्यावरण को लेकर जागरूकता भी लगातार बढ़ रही है. न्यूरोन एनर्जी (Neuron Energy) के को-फाउंडर व सीईओ प्रतीक कामदार कहते हैं, भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने की यात्रा अब तेजी से टियर-2 और टियर-3 शहरों द्वारा आकार ले रही है, जहां किफायती और व्यावहारिक मोबिलिटी समाधानों की मांग लगातार बढ़ रही है. शुरुआती वृद्धि दिल्ली, बेंगलुरु और मुंबई जैसे शहरी केंद्रों से शुरू हुई थी, लेकिन अब छोटे शहर प्रमुख विकास केंद्र बनकर उभर रहे हैं, खासकर इलेक्ट्रिक दोपहिया और तिपहिया वाहनों के लिए, जहां किफायत, ईंधन की बचत और रोजमर्रा की उपयोगिता खरीद के निर्णयों को काफी प्रभावित करती है.
वहीं, सरकार की अपील और नीतिगत समर्थन ने भी इंडस्ट्री को स्पष्ट दिशा दी है. स्वच्छ मोबिलिटी को बढ़ावा देने को हाल ही में माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भी प्रोत्साहन मिला है, जब उन्होंने नागरिकों से ईवी अपनाने और पारंपरिक ईंधनों पर निर्भरता कम करने का आग्रह किया, जो देश के व्यापक ऊर्जा संरक्षण प्रयासों का हिस्सा है. इससे उपभोक्ता का भरोसा बढ़ा है और निवेश भी तेज हुआ है. उन्होंने बताया कि अगले कुछ सालों में EV की असली स्केलिंग वहीं से आएगी जहां लोकल जरूरतें और इंफ्रास्ट्रक्चर दोनों साथ विकसित होंगे.
सिलीगुड़ी, कूच बिहार और बरेली जैसे शहरों में ईवी अपनाने का ट्रेंड
EV सेक्टर में ग्रोथ के बावजूद चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की उपलब्धता और भरोसेमंद संचालन अभी भी चुनौती बना हुआ है. कई जगहों पर चार्जिंग स्टेशन मौजूद हैं, लेकिन उनकी निरंतर उपलब्धता और विश्वसनीयता एक बड़ा मुद्दा है. कजैम (Kazam) के को-फाउंडर व सीईओ अक्षय शेखर कहते हैं, ईवी (इलेक्ट्रिक वाहन) को केवल बड़े शहरों तक सीमित मानने की धारणा तेजी से बदल रही है. ईवी चार्जिंग और ऊर्जा प्रबंधन प्लेटफॉर्म कजैम के तौर पर, हम टियर-2 और टियर-3 शहरों में मांग में तेज वृद्धि देख रहे हैं. सिलीगुड़ी, कूच बिहार और बरेली जैसे शहरों में उपभोक्ता अब CNG को छोड़ ईवी अपना रहे हैं.
उद्योग के रुझान भी इसी दिशा की पुष्टि करते हैं. टियर-2 शहरों में ईवी की पैठ करीब 10.7% और टियर-3 शहरों में लगभग 8.7% तक पहुंच चुकी है, जो टियर-1 शहरों के मुकाबले बहुत पीछे नहीं है. ये छोटे शहर अब ईवी बाजार की वृद्धि में अहम भूमिका निभा रहे हैं.
इसी के साथ चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर भी मेट्रो शहरों से आगे बढ़ रहा है. टियर-2 शहरों में 4,600 से अधिक सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन संचालित हो रहे हैं और केंद्र व राज्य सरकारों की ओर से नीतिगत प्रोत्साहन भी लगातार मिल रहा है.
प्रधानमंत्री की अपील से EV सेक्टर को नया बूस्ट
पश्चिम एशिया संकट, ईंधन की बढ़ती कीमतों और ऊर्जा अस्थिरता के बीच प्रधानमंत्री की EV अपनाने की अपील को सेक्टर के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है. इससे न केवल जागरूकता बढ़ी है, बल्कि लोगों में वैकल्पिक ऊर्जा को लेकर भरोसा भी मजबूत हुआ है.
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत की EV कहानी मेट्रो शहरों से नहीं बल्कि टियर-2 और टियर-3 शहरों से लिखी जाएगी. जैसे-जैसे चार्जिंग नेटवर्क, बैटरी तकनीक और स्थानीय इकोसिस्टम मजबूत होगा, वैसे-वैसे इलेक्ट्रिक वाहन भारत की मुख्यधारा मोबिलिटी का हिस्सा बनते जाएंगे.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, चार बड़े ग्लोबल निवेशकों का एक समूह अडानी ग्रुप के एयरपोर्ट कारोबार में निवेश को लेकर बातचीत कर रहा है. इस निवेश की कुल वैल्यू करीब 1.3 बिलियन डॉलर यानी 12 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा बताई जा रही है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अडानी ग्रुप का एयरपोर्ट कारोबार एक बार फिर वैश्विक निवेशकों के रडार पर आ गया है. सिंगापुर की निवेश कंपनी टेमासेक और अल्फा वेव ग्लोबल समेत कई विदेशी निवेशक अडानी एयरपोर्ट होल्डिंग्स लिमिटेड (AAHL) में 12 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश करने की तैयारी में हैं. अगर यह डील पूरी होती है, तो अडानी ग्रुप के एयरपोर्ट बिजनेस का वैल्यूएशन करीब 18 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है. तेजी से बढ़ते हवाई यात्री ट्रैफिक और भारत के एविएशन सेक्टर की संभावनाओं ने विदेशी निवेशकों का भरोसा मजबूत किया है.
एयरपोर्ट बिजनेस में बड़ी हिस्सेदारी चाहते हैं विदेशी निवेशक
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, चार बड़े ग्लोबल निवेशकों का एक समूह अडानी ग्रुप के एयरपोर्ट कारोबार में निवेश को लेकर बातचीत कर रहा है. इस निवेश की कुल वैल्यू करीब 1.3 बिलियन डॉलर यानी 12 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा बताई जा रही है.
इन निवेशकों का मानना है कि भारत में आने वाले वर्षों में एयर ट्रैफिक तेजी से बढ़ेगा और निजी एयरपोर्ट ऑपरेटर्स को इसका बड़ा फायदा मिलेगा. अडानी ग्रुप फिलहाल देश का सबसे बड़ा प्राइवेट एयरपोर्ट ऑपरेटर बन चुका है और यही वजह है कि विदेशी फंड्स इस सेक्टर में बड़ी हिस्सेदारी चाहते हैं.
18 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है वैल्यूएशन
प्रस्तावित निवेश के बाद अडानी एयरपोर्ट होल्डिंग्स लिमिटेड का वैल्यूएशन करीब 18 बिलियन डॉलर यानी लगभग 1.51 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है. यह वैल्यूएशन भारत के एविएशन इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में अडानी ग्रुप की मजबूत स्थिति को दर्शाता है.
तुलना करें तो GMR Airports का मार्केट वैल्यूएशन हाल ही में करीब 1.02 लाख करोड़ रुपये रहा था. ऐसे में अडानी ग्रुप का एयरपोर्ट बिजनेस निवेशकों के लिए तेजी से उभरता हुआ बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर प्लेटफॉर्म माना जा रहा है.
प्रीमियम वैल्यूएशन पर अटकी है बातचीत
हालांकि अभी यह डील शुरुआती बातचीत के दौर में है और इसके सफल होने की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है. रिपोर्ट्स के अनुसार अडानी ग्रुप अपने एयरपोर्ट बिजनेस के लिए प्रीमियम वैल्यूएशन चाहता है, जिसे लेकर कुछ निवेशक सावधानी बरत रहे हैं.
बताया जा रहा है कि कुछ विदेशी निवेशकों ने निश्चित रिटर्न वाले स्ट्रक्चर्ड निवेश का प्रस्ताव रखा था, लेकिन ग्रुप ने उसे स्वीकार नहीं किया. यही वजह है कि डील को अंतिम रूप देने में अभी समय लग सकता है.
एयरपोर्ट विस्तार पर अडानी ग्रुप का बड़ा फोकस
अडानी ग्रुप आने वाले वर्षों में अपने एयरपोर्ट कारोबार पर बड़ा दांव लगाने की तैयारी में है. कंपनी ने FY27 के लिए करीब 40 हजार करोड़ रुपये के कैपेक्स प्लान की घोषणा की है, जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा एयरपोर्ट बिजनेस के लिए रखा गया है.
ग्रुप मुंबई, नवी मुंबई, अहमदाबाद, लखनऊ और जयपुर एयरपोर्ट्स पर बड़े स्तर पर ‘सिटी-साइड डेवलपमेंट’ प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है. इसके अलावा 2030 कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले अहमदाबाद एयरपोर्ट पर नया टर्मिनल बनाने की तैयारी भी चल रही है.
नवी मुंबई एयरपोर्ट पर तेजी से चल रहा विकास कार्य
अडानी ग्रुप नवी मुंबई एयरपोर्ट के दूसरे फेज के विकास कार्य को भी तेजी से आगे बढ़ा रहा है. कंपनी का अनुमान है that मौजूदा क्षमता अगले 12 से 18 महीनों में पूरी तरह भर सकती है, क्योंकि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है.
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में एविएशन सेक्टर की ग्रोथ आने वाले वर्षों में दुनिया में सबसे तेज रहने वाली है, जिसका सीधा फायदा एयरपोर्ट ऑपरेटर्स को मिलेगा.
वित्तीय प्रदर्शन में भी दिखी मजबूती
कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन में भी सुधार देखने को मिला है. FY26 में ऑपरेशन्स से होने वाला रेवेन्यू पिछले साल के मुकाबले 34.4 फीसदी बढ़ा है. वहीं टैक्स के बाद मुनाफा दोगुने से ज्यादा बढ़कर 1,731 करोड़ रुपये तक पहुंच गया.
हालांकि कंपनी की कुल देनदारियां भी बढ़ी हैं. 31 मार्च तक कुल कर्ज करीब 65,976 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले साल के मुकाबले 37.7 फीसदी ज्यादा है. इसके बावजूद निवेशकों का भरोसा कंपनी की लंबी अवधि की ग्रोथ संभावनाओं पर बना हुआ है.
भारत के एविएशन सेक्टर पर बढ़ा वैश्विक भरोसा
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते एविएशन मार्केट्स में शामिल हो चुका है. बढ़ती आय, तेजी से बढ़ता मिडिल क्लास और घरेलू उड़ानों की मांग ने एयरपोर्ट सेक्टर को निवेशकों के लिए आकर्षक बना दिया है.
इसी वजह से टेमासेक और अल्फा वेव ग्लोबल जैसे बड़े विदेशी निवेशक अब भारत के एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में लंबी अवधि का दांव लगाने की तैयारी कर रहे हैं.
बैठक का सबसे बड़ा नतीजा यह रहा कि दोनों देशों ने अपने संबंधों को “रणनीतिक स्थिरता” के दायरे में बनाए रखने पर सहमति जताई. इसका मतलब है कि अब अमेरिका और चीन सीधे टकराव बढ़ाने के बजाय बातचीत और नियंत्रित प्रतिस्पर्धा की नीति अपनाएंगे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
बीजिंग में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच गुरुवार को हुई अहम बैठक को वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा घटनाक्रम माना जा रहा है. लंबे समय से व्यापार, ताइवान और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर तनाव झेल रहे दोनों देशों ने अब रिश्तों को स्थिर बनाने और संवाद बढ़ाने पर जोर दिया है. हालांकि कई संवेदनशील मुद्दों पर मतभेद अब भी कायम हैं, लेकिन इस बैठक से दुनिया को यह संकेत जरूर मिला है कि दोनों महाशक्तियां टकराव कम करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहती हैं.
अमेरिका-चीन रिश्तों में ‘रणनीतिक स्थिरता’ पर जोर
बैठक का सबसे बड़ा नतीजा यह रहा कि दोनों देशों ने अपने संबंधों को “रणनीतिक स्थिरता” के दायरे में बनाए रखने पर सहमति जताई. इसका मतलब है कि अब अमेरिका और चीन सीधे टकराव बढ़ाने के बजाय बातचीत और नियंत्रित प्रतिस्पर्धा की नीति अपनाएंगे. दोनों देशों ने यह भी माना कि मौजूदा विवादों को तुरंत खत्म करना संभव नहीं है, लेकिन उन्हें बेहतर तरीके से संभालने और संवाद जारी रखने की जरूरत है.
व्यापार वार्ता में दिखे सकारात्मक संकेत
बैठक से पहले दोनों देशों के आर्थिक अधिकारियों के बीच हुई बातचीत को सकारात्मक बताया गया. अमेरिका की ओर से स्कॉट बेसेंट और चीन की तरफ से ही लीफेंग ने व्यापार वार्ता में हिस्सा लिया. चीन ने संकेत दिया कि वह अपने बाजार को विदेशी कंपनियों के लिए और ज्यादा खोल सकता है. वहीं अमेरिका ने भी दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंध मजबूत करने पर जोर दिया. इससे वैश्विक बाजारों में सकारात्मक माहौल देखने को मिला.
कृषि, पर्यटन और निवेश पर भी बनी सहमति
इस शिखर सम्मेलन में सिर्फ व्यापार ही नहीं, बल्कि कृषि, पर्यटन और निवेश जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भी चर्चा हुई. अमेरिका ने चीन से कृषि उत्पादों की खरीद बढ़ाने की मांग की, जबकि दोनों देशों ने निवेश और बाजार पहुंच को आसान बनाने पर भी बातचीत की.
इसके अलावा अमेरिका ने चीन से फेंटानिल बनाने में इस्तेमाल होने वाले रसायनों की सप्लाई रोकने में सहयोग मांगा. यह मुद्दा लंबे समय से अमेरिका के लिए चिंता का कारण बना हुआ है.
ऊर्जा सुरक्षा और होर्मुज स्ट्रेट पर अहम चर्चा
बैठक में वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा भी बड़ा मुद्दा रही. दोनों देशों ने माना कि होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया की तेल सप्लाई के लिए बेहद अहम है और इसे खुला रहना चाहिए. चीन ने इस क्षेत्र के सैन्यीकरण का विरोध किया और संकेत दिया कि वह ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए अमेरिका से तेल आयात बढ़ा सकता है. साथ ही दोनों देशों ने इस बात पर भी सहमति जताई कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देना चाहिए.
ताइवान मुद्दे पर अब भी कायम है तनाव
रिश्तों में सुधार की कोशिशों के बावजूद ताइवान का मुद्दा दोनों देशों के बीच सबसे संवेदनशील बना हुआ है. शी जिनपिंग ने साफ कहा कि अगर इस मुद्दे को गलत तरीके से संभाला गया तो दोनों देशों के बीच गंभीर टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है.
चीन ताइवान को अपनी संप्रभुता का हिस्सा मानता है, जबकि अमेरिका इस मुद्दे पर संतुलित लेकिन सतर्क रुख अपनाता है. यही वजह है कि भविष्य में भी यह मुद्दा अमेरिका-चीन संबंधों में सबसे बड़ी चुनौती बना रह सकता है.
दुनिया की नजर अब अगले कदम पर
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप और शी जिनपिंग की यह बैठक फिलहाल तनाव कम करने की दिशा में सकारात्मक शुरुआत है. हालांकि व्यापार, तकनीक, सुरक्षा और ताइवान जैसे मुद्दों पर असली परीक्षा आने वाले महीनों में होगी.
फिलहाल वैश्विक बाजार और निवेशक इस बात पर नजर बनाए हुए हैं कि दोनों देशों के बीच हुई सहमति कितनी तेजी से जमीन पर उतरती है और इसका दुनिया की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ता है.
ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का असर अब महंगाई के आंकड़ों में भी दिखने लगा है. अप्रैल महीने में पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और नेचुरल गैस की कीमतों में तेजी के कारण थोक महंगाई कई साल के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव का असर अब सीधे भारतीय आम आदमी की जेब पर दिखाई देने लगा है. कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर के बाद अब पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भी बड़ी बढ़ोतरी कर दी गई है. सरकारी तेल कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल के दामों में 3.29 रुपये प्रति लीटर तक का इजाफा किया है. बढ़ती तेल कीमतों से न सिर्फ लोगों का यात्रा खर्च बढ़ेगा, बल्कि आने वाले दिनों में खाने-पीने और रोजमर्रा की चीजें भी महंगी हो सकती हैं.
दिल्ली से मुंबई तक बढ़े पेट्रोल के दाम
नई कीमतों के बाद राजधानी दिल्ली में पेट्रोल 94.77 रुपये से बढ़कर 97.77 रुपये प्रति लीटर हो गया है. वहीं डीजल की कीमत 87.67 रुपये से बढ़कर 90.67 रुपये प्रति लीटर पहुंच गई है. इसके अलावा दिल्ली में सीएनजी भी 2 रुपये महंगी होकर 79.09 रुपये प्रति किलो हो गई है.
कोलकाता में पेट्रोल की कीमत में सबसे ज्यादा 3.29 रुपये की बढ़ोतरी हुई है, जिसके बाद वहां पेट्रोल 108.74 रुपये प्रति लीटर हो गया है. मुंबई में पेट्रोल 3.14 रुपये महंगा होकर 106.68 रुपये प्रति लीटर पहुंच गया, जबकि चेन्नई में 2.83 रुपये की बढ़ोतरी के बाद कीमत 103.67 रुपये प्रति लीटर हो गई है.
डीजल की कीमतों में भी बड़ा इजाफा
डीजल की कीमतों में भी 3 रुपये से ज्यादा की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. कोलकाता में डीजल 3.11 रुपये महंगा होकर 95.13 रुपये प्रति लीटर पहुंच गया है. मुंबई में भी डीजल की कीमत 93.14 रुपये प्रति लीटर हो गई है. वहीं चेन्नई में डीजल 2.86 रुपये बढ़कर 95.25 रुपये प्रति लीटर पहुंच गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि ईंधन महंगा होने से ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ेगी, जिसका असर सब्जी, दूध, राशन और अन्य जरूरी सामानों की कीमतों पर भी देखने को मिलेगा.
क्यों बढ़ रहे हैं पेट्रोल-डीजल के दाम?
तेल कंपनियों के मुताबिक कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी आने से उनका मार्जिन बुरी तरह प्रभावित हुआ है. कंपनियों का दावा है कि उन्हें हर महीने करीब 30,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा था, जिसके बाद कीमतें बढ़ाने का फैसला लिया गया. दरअसल ईरान युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल करीब 50 फीसदी तक महंगा हो चुका है. भारत अपनी जरूरत का लगभग 90 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है, जिसमें खाड़ी देशों की बड़ी हिस्सेदारी है.
होर्मुज स्ट्रेट संकट से बढ़ी मुश्किलें
विशेषज्ञों के अनुसार होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से दुनिया की करीब 20 फीसदी तेल सप्लाई प्रभावित हुई है. यही वजह है कि ब्रेंट क्रूड की कीमतें लगातार चढ़ रही हैं. फिलहाल ब्रेंट क्रूड 1.35 फीसदी की तेजी के साथ 107.2 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है.
जानकारों का कहना है कि अगर ईरान युद्ध जल्द खत्म भी हो जाए, तब भी सप्लाई चेन सामान्य होने में लंबा समय लग सकता है. ऐसे में आने वाले दिनों में ईंधन की कीमतों पर दबाव बना रह सकता है.
महंगाई के मोर्चे पर बढ़ सकती है चिंता
ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का असर अब महंगाई के आंकड़ों में भी दिखने लगा है. अप्रैल महीने में पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और नेचुरल गैस की कीमतों में तेजी के कारण थोक महंगाई कई साल के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई.
ताजा आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल में पेट्रोल महंगाई दर 32.4 फीसदी तक पहुंच गई, जो एक महीने पहले सिर्फ 2.50 फीसदी थी. वहीं हाई-स्पीड डीजल की महंगाई 3.62 फीसदी से बढ़कर 25.19 फीसदी हो गई है. इससे साफ है कि आने वाले समय में आम आदमी पर महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है.
गुरुवार को सेंसेक्स 789.74 अंक की बढ़त के साथ 75,398.72 पर बंद हुआ था, जबकि निफ्टी 277 अंक चढ़कर 23,689.60 के स्तर पर पहुंच गया था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
14 मई को घरेलू शेयर बाजार में शानदार तेजी देखने को मिली थी. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स करीब 790 अंक उछला, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी ने भी मजबूत बढ़त दर्ज की थी. वैश्विक संकेतों और अमेरिका-चीन संबंधों में सुधार की उम्मीद से बाजार में खरीदारी का माहौल बना रहा. हालांकि रुपये का ऑल टाइम लो पर पहुंचना चिंता का विषय रहा. अब 15 मई के कारोबारी सत्र में निवेशकों की नजर तिमाही नतीजों, वैश्विक बाजारों, कच्चे तेल की कीमतों और अडानी, एयरटेल, जियो फाइनेंशियल जैसे बड़े शेयरों पर रहने वाली है.
कल बाजार में क्यों आई थी तेजी?
गुरुवार को बीएसई सेंसेक्स 789.74 अंक की बढ़त के साथ 75,398.72 पर बंद हुआ था, जबकि एनएसई निफ्टी 277 अंक चढ़कर 23,689.60 के स्तर पर पहुंच गया था. बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि बाजार में तेजी की सबसे बड़ी वजह अमेरिका और चीन के बीच बेहतर रिश्तों की उम्मीद रही. निवेशकों को डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की संभावित बातचीत से सकारात्मक संकेत मिलने की उम्मीद है.
इसके अलावा फार्मा, हेल्थकेयर और मेटल सेक्टर में जोरदार खरीदारी देखने को मिली थी. भारती एयरटेल, एचडीएफसी बैंक, अडानी पोर्ट्स और बजाज फाइनेंस जैसे दिग्गज शेयरों में मजबूत तेजी दर्ज की गई थी.
रुपये की कमजोरी आज भी बढ़ा सकती है चिंता
शेयर बाजार में तेजी के बावजूद रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया था. कारोबार के दौरान रुपया 95.86 प्रति डॉलर तक फिसल गया था. विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और विदेशी निवेशकों की बिकवाली आज भी बाजार की चाल को प्रभावित कर सकती हैं.
आज इन शेयरों में रह सकती है सबसे ज्यादा हलचल
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार आज के कारोबार में Adani Enterprises, Bharti Airtel, Jio Financial Services, HCL Technologies और Kirloskar Oil Engines जैसे शेयर फोकस में रह सकते हैं. Adani Enterprises में बड़ी ब्लॉक डील हुई है, जबकि HCL Technologies ने Red Hat के साथ AI सेक्टर में रणनीतिक साझेदारी की घोषणा की है. वहीं, Bharti Airtel के ARPU में गिरावट और Jio Financial Services में Morgan Stanley की हिस्सेदारी खरीद भी निवेशकों का ध्यान खींच सकती है. इसके अलावा Signature Global, Zaggle Prepaid Ocean Services और Davangere Sugar से जुड़ी खबरों का असर भी शेयरों पर देखने को मिल सकता है.
आज आएंगे कई बड़ी कंपनियों के तिमाही नतीजे
15 मई को Tata Steel, Power Grid, NHPC, Hindustan Copper, ITC Hotels, Symphony और Gland Pharma समेत कई बड़ी कंपनियां अपने चौथी तिमाही के नतीजे जारी करेंगी. इन कंपनियों के रिजल्ट्स के आधार पर आज बाजार में सेक्टरवार हलचल बढ़ सकती है और निवेशकों की रणनीति भी बदल सकती है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
भारत का डायरेक्ट सेलिंग उद्योग लगातार विस्तार की ओर है. बढ़ता कारोबार, महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और मजबूत क्षेत्रीय नेटवर्क इस सेक्टर की मजबूती को दर्शाते हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत का डायरेक्ट सेलिंग उद्योग लगातार मजबूत रफ्तार से आगे बढ़ रहा है. वित्त वर्ष 2024-25 में इस सेक्टर का कारोबार ₹23,021 करोड़ तक पहुंच गया है, जो पिछले वर्ष के ₹22,142 करोड़ की तुलना में लगभग 4% की वृद्धि दर्शाता है. आज नई दिल्ली में इंडियन डायरेक्ट सेलिंग एसोसिएशन (IDSA) की ‘डायरेक्ट सेलिंग इंडस्ट्री आउटलुक 2025’ की रिपोर्ट लॉन्च हुई, जिसमें बताया गया है कि यह उद्योग न केवल आर्थिक रूप से मजबूत हो रहा है, बल्कि रोजगार और उद्यमिता के नए अवसर भी पैदा कर रहा है.
पिछले छह वर्षों में स्थिर वृद्धि
रिपोर्ट के अनुसार, डायरेक्ट सेलिंग उद्योग ने पिछले छह वर्षों में 6.5% की स्थिर वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) दर्ज की है. वित्त वर्ष 2019-20 में जहां इस उद्योग का आकार लगभग ₹16,800 करोड़ था, वहीं 2024-25 तक यह बढ़कर ₹23,021 करोड़ हो गया. यह वृद्धि बढ़ते उपभोक्ता भरोसे और विस्तारित सेल्स नेटवर्क को दर्शाती है.
महिलाओं की भागीदारी में लगातार बढ़ोतरी
इस उद्योग में महिलाओं की भागीदारी भी तेजी से बढ़ रही है. महिला डायरेक्ट सेलर्स की हिस्सेदारी 44% से बढ़कर 48% तक पहुंच गई है, जो इस क्षेत्र में बढ़ते महिला सशक्तिकरण का संकेत है. यह बदलाव बताता है कि डायरेक्ट सेलिंग अब महिलाओं के लिए आय और उद्यमिता का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनता जा रहा है.
क्षेत्रवार बिक्री में उत्तर भारत सबसे आगे
क्षेत्रवार आंकड़ों के अनुसार, कुल बिक्री में उत्तर भारत 27.6% हिस्सेदारी के साथ पहले स्थान पर है. इसके बाद पश्चिमी क्षेत्र 25.47% हिस्सेदारी के साथ दूसरे स्थान पर रहा. पूर्वी क्षेत्र की हिस्सेदारी 22.47%, दक्षिणी क्षेत्र की 17.81% और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र की 6.67% रही.
किन उत्पादों की सबसे ज्यादा बिक्री
डायरेक्ट सेलिंग उद्योग में वेलनेस उत्पाद सबसे प्रमुख श्रेणी बने हुए हैं. इसके बाद कॉस्मेटिक्स और पर्सनल केयर उत्पाद दूसरे सबसे बड़े सेगमेंट के रूप में उभरे हैं. यह दर्शाता है कि स्वास्थ्य और व्यक्तिगत देखभाल से जुड़े उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है.
राज्यों में महाराष्ट्र सबसे आगे
राज्यवार प्रदर्शन में महाराष्ट्र ने शीर्ष स्थान हासिल किया है. राज्य की कुल बिक्री में हिस्सेदारी 15.3% रही, जो देश में सबसे अधिक है. यह राज्य डायरेक्ट सेलिंग नेटवर्क और उपभोक्ता आधार दोनों में मजबूत स्थिति बनाए हुए है.
उद्योग को लेकर विशेषज्ञ और नीति-निर्माताओं की राय
रिपोर्ट लॉन्च कार्यक्रम में सांसद और CAIT महासचिव प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि भारत आर्थिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है और ऐसे उद्योग ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे. उन्होंने डायरेक्ट सेलिंग को स्वरोजगार, उद्यमिता और आर्थिक भागीदारी बढ़ाने वाला मजबूत माध्यम बताया.
उन्होंने यह भी कहा कि यह उद्योग आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को मजबूती दे रहा है और लाखों लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध करा रहा है. साथ ही उन्होंने उद्योग से नैतिक व्यापार, उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद और मजबूत उपभोक्ता सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने पर जोर दिया.
भारत का डायरेक्ट सेलिंग उद्योग लगातार विस्तार की ओर है. बढ़ता कारोबार, महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और मजबूत क्षेत्रीय नेटवर्क इस सेक्टर की मजबूती को दर्शाते हैं. आने वाले वर्षों में यह उद्योग रोजगार सृजन और आर्थिक विकास में और बड़ी भूमिका निभा सकता है.
अप्रैल में WPI में मासिक आधार पर भी तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो मार्च की तुलना में 3.86% अधिक रही. इसके मुकाबले मार्च में यह वृद्धि सिर्फ 1.52% थी, जिससे यह साफ होता है कि थोक बाजार में कीमतों का दबाव तेजी से बढ़ रहा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश में थोक महंगाई ने अप्रैल 2026 में अचानक तेज रफ्तार पकड़ ली है. वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, थोक मूल्य सूचकांक (WPI) आधारित महंगाई बढ़कर 8.3% पर पहुंच गई है, जबकि मार्च में यह सिर्फ 3.88% थी. करीब साढ़े तीन साल बाद यह स्तर सबसे ऊंचा माना जा रहा है. इस बढ़ोतरी के पीछे सबसे बड़ा कारण ईंधन, ऊर्जा, कच्चे तेल और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में आई तेज महंगाई है, जिसका सीधा असर उत्पादन लागत और बाजार कीमतों पर दिख रहा है.
ईंधन और ऊर्जा की कीमतों ने बढ़ाया सबसे ज्यादा दबाव
अप्रैल में महंगाई बढ़ने में सबसे बड़ी भूमिका फ्यूल एंड पावर सेक्टर की रही. इस श्रेणी की महंगाई मार्च के 1.05% से उछलकर अप्रैल में 24.71% तक पहुंच गई. इसी दौरान ऊर्जा से जुड़े इंडेक्स में भी तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो 153.7 से बढ़कर 181.7 हो गया. यह स्पष्ट संकेत है कि ऊर्जा लागत में लगातार बढ़ोतरी हो रही है.
कच्चे तेल से लेकर पेट्रोल-डीजल तक महंगा हुआ ईंधन
ईंधन क्षेत्र में सबसे तेज उछाल कच्चे तेल और गैस की कीमतों में देखा गया. क्रूड पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस की महंगाई दर 67.18% तक पहुंच गई, जबकि कच्चे तेल की महंगाई 88.06% दर्ज की गई. इसी अवधि में पेट्रोल की महंगाई 32.40% और डीजल (HSD) की 25.19% रही. एलपीजी की कीमतों में भी बढ़ोतरी देखी गई, जिसकी महंगाई दर 10.92% दर्ज हुई.
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भी बढ़ा लागत दबाव
अप्रैल में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की महंगाई बढ़कर 4.62% हो गई, जो मार्च में 3.39% थी. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 22 में से 21 मैन्युफैक्चरिंग समूहों में कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिससे यह साफ होता है कि उद्योगों में उत्पादन लागत लगातार बढ़ रही है.
किन सेक्टरों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा
टेक्सटाइल सेक्टर में महंगाई बढ़कर 7.30% तक पहुंच गई, जबकि केमिकल्स और केमिकल प्रोडक्ट्स में यह 5.09% रही. बेसिक मेटल्स में महंगाई 7% दर्ज की गई. इसके अलावा फूड प्रोडक्ट्स और मशीनरी जैसे सेक्टरों में भी कीमतों में बढ़ोतरी देखी गई, जिससे औद्योगिक लागत और तैयार उत्पादों की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है.
खाद्य महंगाई में हल्की बढ़ोतरी, लेकिन स्थिति नियंत्रण में
खाद्य वस्तुओं की कीमतों में अप्रैल के दौरान हल्की बढ़ोतरी देखी गई, लेकिन कुल मिलाकर स्थिति अभी भी नियंत्रण में बनी हुई है. WPI फूड इंडेक्स मार्च के 1.85% से बढ़कर अप्रैल में 2.31% पर पहुंच गया, जबकि खाद्य वस्तुओं की कुल महंगाई 1.98% दर्ज की गई. इस दौरान फल, दूध, अंडा, मांस, मछली और सब्जियों जैसी वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी देखी गई, जिससे घरेलू बजट पर हल्का असर पड़ा है.
कुछ जरूरी चीजें अभी भी सस्ती
कुछ प्रमुख खाद्य वस्तुओं की कीमतों में गिरावट भी दर्ज की गई है, जिससे महंगाई का दबाव कुछ हद तक संतुलित रहा है. प्याज की कीमतों में भारी गिरावट देखी गई, जिसकी महंगाई दर -26.45% रही. आलू की कीमतें भी काफी कम हुईं और इसकी महंगाई दर -30.04% दर्ज की गई. दालों की कीमतों में भी कमी देखी गई, जहां महंगाई दर -4.03% रही.
महीने-दर-महीने भी तेज बढ़ोतरी
अप्रैल में WPI में मासिक आधार पर भी तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो मार्च की तुलना में 3.86% अधिक रही. इसके मुकाबले मार्च में यह वृद्धि सिर्फ 1.52% थी, जिससे यह साफ होता है कि थोक बाजार में कीमतों का दबाव तेजी से बढ़ रहा है.
विशेषज्ञों के अनुसार, अप्रैल में WPI का यह उछाल उम्मीदों से काफी ज्यादा रहा है. अनुमानित 5.50% के मुकाबले यह 8.30% तक पहुंच गया, जो अर्थव्यवस्था में बढ़ते लागत दबाव का संकेत है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस वृद्धि के पीछे कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी, ईंधन और बिजली की लागत में इजाफा, आयातित महंगाई और वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव प्रमुख कारण रहे हैं.
अप्रैल 2026 की WPI महंगाई यह दिखाती है कि थोक स्तर पर कीमतों का दबाव तेजी से बढ़ रहा है. ईंधन और ऊर्जा इसकी सबसे बड़ी वजह बने हुए हैं, जबकि मैन्युफैक्चरिंग और कच्चे माल की लागत भी लगातार महंगाई को बढ़ा रही है. अगर यही रुझान जारी रहता है, तो आने वाले महीनों में इसका असर खुदरा महंगाई और आम उपभोक्ताओं की जेब पर और अधिक देखने को मिल सकता है.