मिडिल क्लास के मन की बात कह गए राहुल गांधी, बजट पर सरकार को खूब सुनाया

राहुल गांधी लोकसभा में सरकार पर हमलावर नजर आए. उन्होंने बजट से मिडिल क्लास को मिली निराशा पर सरकार को घेरा.

Last Modified:
Monday, 29 July, 2024
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मोदी सरकार (Modi Govt) के बजट ने आम आदमी को निराश किया है. माना जा रहा था कि लोकसभा चुनाव के नतीजों के मद्देनजर वित्त मंत्री बजट में मिडिल क्लास पर ज्यादा फोकस करेंगी, लेकिन नहीं हुआ. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस लीडर राहुल गांधी (Rahul Gandhi) ने मिडिल क्लास के इस दर्द को सदन में बयां करने की कोशिश की है. उन्होंने आज टैक्स और पेपर लीक जैसे मुद्दों पर मोदी सरकार पर जमकर निशाना साधा. कांग्रेस लीडर ने कहा कि 'टैक्स टेररिज्म' को रोकने के लिए सरकार ने बजट में कुछ नहीं दिया. 

मिडिल क्लास को छला
राहुल गांधी लोकसभा में सरकार पर हमलावर नजर आए. उन्होंने बजट से मिडिल क्लास को हुई हताशा का जिक्र करते हुए कहा कि मिडिल क्लास की छाती और पीठ में छुरा घोंपा गया है. मिडिल क्लास शायद इस बजट से पहले प्रधानमंत्री मोदी का समर्थन करता था. जब PM ने कोरोना काल के वक्त थाली बजवाई थी, तो लोगों ने खूब बजाई. उसके बाद पीएम ने मिडिल क्लास से मोबाइल फोन की लाइट जलवाई और अब बजट में उसी मिडिल क्लास की पीठ और छाती में एक-एक छुरा मारा गया. राहुल गांधी ने अपनी बात समझाते हुए कहा कि आपका इंडेक्सेशन कैंसिल करना पीठ में छुरा है और कैपिटल गेन्स टैक्स बढ़ाना, छाती में छुरा है.

बेरोजगारी का चक्रव्यूह
कांग्रेस लीडर ने कहा कि बजट में इंटर्नशिप प्रोग्राम की बात कही गई है. वित्त मंत्री ने कहा है कि इंटर्नशिप प्रोग्राम हिंदुस्तान की पांच सबसे बड़ी कंपनियों में होगा. यानी हमारे देश के 99 फीसदी युवाओं को इस प्रोग्राम से कोई फायदा होने वाला नहीं है. राहुल गांधी ने पेपर लीक पर भी सरकार को घेरा. उन्होंने कहा कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पेपर लीक के बारे में बजट स्पीच के दौरान कुछ नहीं कहा और एजुकेशन सेक्टर के लिए इस बार कम पैसा दिया गया है. युवाओं के लिए पेपर लीक सबसे जरूरी मुद्दा है, लेकिन उन्होंने इसके बारे में एक शब्द नहीं कहा. राहुल ने सरकार को घेरते हुए कहा कि आपने एक तरफ पेपरलीक चक्रव्यूह और दूसरी तरफ बेरोजगारी चक्रव्यूह बना दिया.  

अडानी-अंबानी का जिक्र
राहुल गांधी इतने पर ही नहीं रुके. उन्होंने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि सेना के जवानों को अग्निवीर के चक्रव्यूह में फंसाया गया है. बजट में अग्निवीरों की  पेंशन के लिए एक रुपया तक नहीं है. आप खुद को देशभक्त कहते हैं, लेकिन जवानों की पेंशन के लिए आपने एक रुपया नहीं दिया. इसी तरह आपने किसानों को चक्रव्यूह में फंसाया है. जहां भी आपको मौका मिलता है, चक्रव्यूह बना देते हो और हम उसको तोड़ने का काम करते हैं. आप चाहते हो कि देश छोट-छोटे खांचों में रहे और गरीब सपना नहीं देख पाए. राहुल ने अडानी और अंबानी को लेकर भी सरकार को घेरा. उनके अडानी-अंबानी का नाम लेने पर स्पीकर ने यह कहते हुए ऐतराज जताया कि वो सदन के सदस्य नहीं हैं. इस पर कांग्रेस लीडर ने कहा कि मैं  उनको 3- 4 या A1-A2 बोल देता हूं. इन दोनों का देश के बिजनेस पर होल्ड है, इनके बारे में हमें बोलना होगा.
 


सेबी के नए सेटलमेंट नियम नोटिफाई, ₹10 लाख तक के मामलों का होगा फास्ट-ट्रैक निपटारा

नए नियमों के तहत कंपनी के खातों में गड़बड़ी या फंड के दुरुपयोग जैसे मामलों में भी सेटलमेंट का विकल्प उपलब्ध रहेगा.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 10 October, 2026
Last Modified:
Saturday, 10 October, 2026
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शेयर बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने सेटलमेंट रेगुलेशंस, 2026 को आधिकारिक तौर पर नोटिफाई कर दिया है. नए नियमों का उद्देश्य नियामकीय उल्लंघनों से जुड़े मामलों के निपटारे की प्रक्रिया को तेज, पारदर्शी और आसान बनाना है. इसके तहत 10 लाख रुपये तक की सेटलमेंट राशि वाले मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक व्यवस्था शुरू की गई है. साथ ही, गलत तरीके से कमाए गए पैसे की वसूली और सेटलमेंट राशि की गणना से जुड़े नियमों में भी बदलाव किए गए हैं.

सेटलमेंट राशि तय करने का तरीका बदला

सेबी के नए नियमों के तहत सेटलमेंट राशि निर्धारित करने की प्रक्रिया में बदलाव किया गया है. अब इसमें तीन प्रमुख पहलुओं को ध्यान में रखा जाएगा. इनमें सेटलमेंट अमाउंट, गलत तरीके से कमाए गए पैसे की वापसी और सुधारात्मक व नियामकीय शर्तें शामिल हैं.

पहले कुछ मामलों में गलत तरीके से कमाई गई रकम या निवेशकों को हुए नुकसान को सेटलमेंट राशि की गणना में दो बार शामिल किए जाने की समस्या सामने आती थी. नए फ्रेमवर्क में इस दोहरी गणना यानी डबल काउंटिंग को खत्म करने का प्रावधान किया गया है.

अब सेटलमेंट की शुरुआती राशि तय करते समय गलत कमाई या नुकसान की रकम को शामिल नहीं किया जाएगा. इसकी गणना संबंधित उल्लंघन के लिए कानून के तहत निर्धारित न्यूनतम जुर्माने के आधार पर होगी. इसके बाद मामले की गंभीरता, नियामकीय कार्रवाई किस चरण में है और राहत देने या सख्ती बढ़ाने वाले अन्य कारकों के आधार पर अंतिम राशि निर्धारित की जाएगी. गलत तरीके से कमाई गई रकम या निवेशकों को हुए नुकसान की राशि स्पष्ट होने पर उसकी वसूली अलग से की जाएगी.

₹10 लाख तक के मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक व्यवस्था

छोटे और कम गंभीर मामलों का तेजी से निपटारा करने के लिए सेबी ने फास्ट-ट्रैक व्यवस्था शुरू की है. इसके तहत दो तरह के रास्ते बनाए गए हैं. पहले रास्ते में सेटलमेंट राशि के आधार पर मामलों का निपटारा किया जाएगा. जिन मामलों में सेटलमेंट राशि 10 लाख रुपये तक होगी, उन्हें सीधे इंटरनल कमेटी से पूर्णकालिक सदस्यों के पैनल के पास भेजा जाएगा. इसका उद्देश्य ऐसे मामलों में प्रक्रिया को सरल बनाना और निपटारे में लगने वाला समय कम करना है.

दूसरे रास्ते में उल्लंघन की प्रकृति को आधार बनाया जाएगा. इसके तहत डिस्क्लोजर यानी जरूरी जानकारी के खुलासे से जुड़ी कुछ गलतियों के मामलों में सेबी नोटिस भेजकर निर्धारित राशि का भुगतान करने पर मामला समाप्त करने का अवसर देगा.

गंभीर मामलों में भी सेटलमेंट का विकल्प

नए नियमों के तहत कंपनी के खातों में गड़बड़ी या फंड के दुरुपयोग जैसे मामलों में भी सेटलमेंट का विकल्प उपलब्ध रहेगा. हालांकि, इसके लिए संबंधित कंपनी को जरूरी जानकारी का पूरा खुलासा करना होगा. इसके अलावा, गलत तरीके से दूसरी जगह भेजी गई रकम को वापस लाने की शर्त भी पूरी करनी होगी.

इससे सेबी का उद्देश्य मामलों के निपटारे में तेजी लाने के साथ-साथ उल्लंघन करने वाली कंपनियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना है. गंभीर मामलों में राहत देने से पहले जरूरी शर्तों का पालन भी सुनिश्चित किया जाएगा.

सेबी ने पिछले महीने दी थी मंजूरी

सेबी के बोर्ड ने पिछले महीने हुई बैठक में इन बदलावों को मंजूरी दी थी. अब सेटलमेंट रेगुलेशंस, 2026 को आधिकारिक तौर पर नोटिफाई कर दिया गया है. नए नियमों से नियामकीय उल्लंघनों से जुड़े मामलों में सेटलमेंट की गणना, रकम की वसूली और निपटारे की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाने की उम्मीद है.

 


ग्रामीण इलाकों में बढ़ी रोजगार की मांग, सितंबर में 25.2% का उछाल; 1.56 करोड़ परिवारों ने मांगा काम

यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई है, जब मानसून के बाद कृषि गतिविधियों और रबी फसल की बुवाई के बीच ग्रामीण श्रम बाजार में रोजगार की मांग में बदलाव देखने को मिल रहा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 10 October, 2026
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Saturday, 10 October, 2026
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ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना VB-G RAM-G के तहत सितंबर 2026 में काम की मांग में अगस्त के मुकाबले 25.2% की बढ़ोतरी दर्ज की गई. इस दौरान करीब 1.56 करोड़ परिवारों ने रोजगार की मांग की, जबकि अगस्त में यह आंकड़ा 1.25 करोड़ था. वहीं, रोजगार मांगने वाले लोगों की संख्या भी बढ़कर 1.88 करोड़ हो गई. यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई है, जब मानसून के बाद कृषि गतिविधियों और रबी फसल की बुवाई के बीच ग्रामीण श्रम बाजार में रोजगार की मांग में बदलाव देखने को मिल रहा है.

सितंबर में 1.56 करोड़ परिवारों ने मांगा काम

ग्रामीण विकास मंत्रालय के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, VB-G RAM-G योजना के तहत सितंबर में काम मांगने वाले परिवारों की संख्या बढ़कर 1.56 करोड़ हो गई. अगस्त में यह संख्या 1.25 करोड़ थी. इस तरह एक महीने में रोजगार की मांग में 25.2% की बढ़ोतरी हुई. इससे पहले जुलाई में करीब 1.01 करोड़ परिवारों ने इस योजना के तहत काम की मांग की थी. जुलाई में ही VB-G RAM-G अधिनियम, 2025 के तहत यह योजना शुरू की गई थी.

रोजगार मांगने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ी

योजना के तहत रोजगार की मांग करने वाले लोगों की संख्या में भी इजाफा हुआ है. अगस्त में करीब 1.54 करोड़ लोगों ने काम की मांग की थी, जबकि सितंबर में यह आंकड़ा बढ़कर 1.88 करोड़ हो गया. परिवारों और व्यक्तियों, दोनों स्तरों पर रोजगार की मांग में हुई यह बढ़ोतरी ग्रामीण क्षेत्रों में काम की जरूरत को दर्शाती है. हालांकि, केवल इन आंकड़ों के आधार पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आर्थिक दबाव या बेरोजगारी की स्थिति का निश्चित निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता.

साल में 125 दिन रोजगार की गारंटी

VB-G RAM-G योजना के तहत पात्र ग्रामीण परिवारों के लिए सालाना गारंटीकृत रोजगार की अवधि 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिन किए जाने का प्रावधान है. खबर में दी गई जानकारी के अनुसार, न्यूनतम दैनिक मजदूरी 300 रुपये तय की गई है.

यह योजना ग्रामीण परिवारों को आय का एक वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लाई गई है. कृषि कार्यों के बीच के समय में भी ग्रामीण परिवार इसके तहत रोजगार की मांग कर सकते हैं.

मानसून और रबी सीजन के बीच बढ़ी मांग पर नजर

सितंबर में रोजगार की मांग बढ़ने के पीछे मानसून के बाद कृषि गतिविधियों में बदलाव और रबी फसल की बुवाई से पहले का अंतर संभावित कारण हो सकते हैं. इस अवधि में ग्रामीण श्रमिकों की काम की उपलब्धता अलग-अलग क्षेत्रों में बदल सकती है.

आने वाले महीनों में रबी सीजन की शुरुआत और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों के साथ इस योजना के तहत काम की मांग का रुझान अहम रहेगा. इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि ग्रामीण परिवारों की रोजगार गारंटी योजना पर निर्भरता किस दिशा में बढ़ रही है.

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मध्य प्रदेश के टेलीकॉम मैन्युफैक्चरिंग जोन में ₹6,000 करोड़ के निवेश का प्रस्ताव, 18 हजार से ज्यादा रोजगार की उम्मीद

मध्य प्रदेश में प्रस्तावित टेलीकॉम मैन्युफैक्चरिंग जोन (TMZ) देश में दूरसंचार उपकरणों के घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने की दिशा में अहम कदम साबित हो सकता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 10 October, 2026
Last Modified:
Saturday, 10 October, 2026
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ग्वालियर में प्रस्तावित टेलीकॉम मैन्युफैक्चरिंग जोन में 31 कंपनियों ने करीब ₹5,500-6,000 करोड़ के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है. इस परियोजना के पहले चरण के लिए 170 एकड़ जमीन चिह्नित की गई है, जबकि अतिरिक्त 400 एकड़ जमीन आवंटित करने पर विचार किया जा रहा है. केंद्र सरकार ने टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन सुविधाओं के विकास के लिए भी वित्तीय सहायता का प्रावधान किया है.

केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने शुक्रवार को बताया कि इस परियोजना के लिए एक स्टार्टअप समेत 31 कंपनियों ने करीब ₹5,500-6,000 करोड़ के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है. सरकार अक्टूबर के अंत से पहले परियोजना का भूमिपूजन करने की तैयारी कर रही है.

दूरसंचार विभाग (DoT) के मुताबिक, इस परियोजना से 18,000 से अधिक रोजगार के अवसर पैदा होने की उम्मीद है. प्रस्तावित जोन में कंपनियों को एक ही स्थान पर विनिर्माण, अनुसंधान एवं विकास (R&D), परीक्षण और प्रमाणन जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने की योजना है. इससे कंपनियों को दूरसंचार उपकरणों के उत्पादन और व्यावसायिक इस्तेमाल से पहले उनकी गुणवत्ता जांचने में मदद मिलेगी.

सिंधिया ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि करीब 30 कंपनियों और एक स्टार्टअप ने इस जोन में अपनी विनिर्माण इकाइयां स्थापित करने की प्रतिबद्धता जताई है. उन्होंने स्पष्ट किया कि ये केवल रुचि जताने वाली कंपनियां नहीं हैं, बल्कि यहां अपनी इकाइयां स्थापित करने की योजना बना चुकी हैं.

पहले चरण में 170 एकड़ जमीन, 400 एकड़ अतिरिक्त जमीन पर विचार

परियोजना के पहले चरण के लिए 170 एकड़ जमीन चिह्नित की गई है. इसके अलावा कंपनियों को आवंटित करने के लिए 400 एकड़ अतिरिक्त जमीन पर विचार किया जा रहा है. केंद्र और मध्य प्रदेश सरकार मिलकर इस परियोजना को विकसित कर रही हैं. राज्य सरकार विनिर्माण कंपनियों को आकर्षित करने के लिए प्रोत्साहन भी दे रही है.

इस जोन को प्लग-एंड-प्ले औद्योगिक क्लस्टर के रूप में विकसित करने की योजना है. इसका मतलब है कि कंपनियों को उद्योग स्थापित करने के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा और साझा सुविधाएं एक ही स्थान पर मिल सकेंगी.

परियोजना के लिए केंद्र सरकार ने पहले चरण के बुनियादी ढांचे के विकास हेतु ₹493 करोड़ की वित्तीय सहायता देने की प्रतिबद्धता जताई है. वहीं, सरकार ने परीक्षण और प्रमाणन से जुड़ी साझा प्रयोगशालाओं के विकास के लिए ₹193 करोड़ निर्धारित किए हैं. इन सुविधाओं से कंपनियों को अपने दूरसंचार उपकरणों की जांच और प्रमाणन कराने में मदद मिलेगी.

जुलाई 2026 में दूरसंचार विभाग और मध्य प्रदेश सरकार ने इस जोन के विकास के लिए समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए थे. परियोजना को लागू करने और उसकी निगरानी के लिए दोनों सरकारों ने एक विशेष प्रयोजन इकाई (SPV) भी गठित की है.

मोबाइल फोन उत्पादन में भारत की बड़ी छलांग

सिंधिया ने कहा कि भारत अब केवल दूरसंचार तकनीक का उपभोक्ता बने रहने के बजाय इसके विनिर्माण और निर्यात में भी अपनी क्षमता बढ़ा रहा है. उन्होंने बताया कि पिछले 12 वर्षों में देश में मोबाइल फोन का उत्पादन करीब ₹90,000 करोड़ से बढ़कर ₹6.27 लाख करोड़ तक पहुंच गया है.

मंत्री के मुताबिक, भारत से मोबाइल फोन का निर्यात लगभग 28 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है. इसके साथ ही देश में मोबाइल फोन बनाने वाली कंपनियों की संख्या दो से बढ़कर करीब 300 हो गई है.

सरकार अब इसी विनिर्माण क्षमता को दूरसंचार उपकरणों और इससे जुड़ी दूसरी तकनीकों में भी विकसित करना चाहती है. ग्वालियर में प्रस्तावित जोन इसी रणनीति का हिस्सा है. इसका उद्देश्य राउटर, एंटीना, ऑप्टिकल फाइबर, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और 5G तथा 6G नेटवर्क से जुड़ी तकनीकों के विनिर्माण को बढ़ावा देना है.

इससे घरेलू स्तर पर मूल्यवर्धन बढ़ाने और आयातित उपकरणों पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिल सकती है. हालांकि, इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि निवेश की प्रतिबद्धताएं कितनी जल्दी उत्पादन इकाइयों में बदलती हैं.

PLI योजना से घरेलू विनिर्माण को समर्थन

टेलीकॉम मैन्युफैक्चरिंग जोन ऐसे समय विकसित किया जा रहा है, जब सरकार उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना के जरिए दूरसंचार और नेटवर्किंग उपकरणों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दे रही है.

सरकार के मुताबिक, इस योजना से करीब ₹1.1 लाख करोड़ की अतिरिक्त बिक्री, ₹25,000 करोड़ का अतिरिक्त निर्यात और 30,000 अतिरिक्त रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं. PLI योजना के तहत कंपनियों को भारत में उत्पादन और बिक्री बढ़ाने के आधार पर प्रोत्साहन दिया जाता है.

प्रस्तावित ग्वालियर जोन साझा बुनियादी ढांचे, परीक्षण सुविधाओं और विनिर्माण इकाइयों को एक जगह लाकर इस पहल को आगे बढ़ा सकता है. इससे दूरसंचार उपकरण बनाने वाली कंपनियों को उत्पादन क्षमता बढ़ाने और नए उत्पाद विकसित करने में मदद मिलने की उम्मीद है.

स्वदेशी 4G तकनीक से 6G की तैयारी तक

सिंधिया ने भारत की स्वदेशी 4G तकनीक का भी उल्लेख किया. उनके मुताबिक, देश में विकसित 4G टेक्नोलॉजी स्टैक को करीब 1.10 लाख टावरों पर तैनात किया जा चुका है. स्वदेशी तकनीक का विकास दूरसंचार नेटवर्क में देश की तकनीकी क्षमता मजबूत करने के लिहाज से महत्वपूर्ण है.

भारत अब 5G सेवाओं के विस्तार और 5G स्टैंडअलोन नेटवर्क की तैयारी पर भी जोर दे रहा है. ऐसे नेटवर्क से औद्योगिक और कारोबारी इस्तेमाल के लिए उन्नत डिजिटल सेवाओं को बढ़ावा मिल सकता है. सिंधिया के अनुसार, देश में करीब 55 करोड़ 5G उपयोगकर्ता हैं और 2030 तक इनकी संख्या एक अरब करने का लक्ष्य है.

इसके साथ ही भारत भारत 6G एलायंस के जरिए अगली पीढ़ी की दूरसंचार तकनीक के अंतरराष्ट्रीय मानकों को विकसित करने में अधिक भागीदारी चाहता है. इस पहल में शिक्षण संस्थानों और उद्योग जगत के प्रतिभागियों को शामिल किया गया है.

ग्वालियर का प्रस्तावित टेलीकॉम मैन्युफैक्चरिंग जोन विनिर्माण, अनुसंधान, परीक्षण और नवाचार को एक साझा औद्योगिक व्यवस्था में लाने की दिशा में काम करेगा. हालांकि, परियोजना की दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि निवेश की घोषणाएं कितनी तेजी से वास्तविक उत्पादन, घरेलू तकनीक के विकास और निर्यात में बदलती हैं.
 


चार हफ्तों में 51.1 अरब डॉलर घटा भारत का विदेशी मुद्रा भंडार, रिकॉर्ड स्तर से भारी गिरावट

भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार चौथे सप्ताह गिरावट दर्ज की गई है. 2 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में भंडार 12.752 अरब डॉलर घटकर 734.606 अरब डॉलर रह गया. पिछले चार सप्ताह में इसमें कुल 51.1 अरब डॉलर की कमी आई है. इस दौरान विदेशी मुद्रा आस्तियों और सोने के भंडार के मूल्य में भी गिरावट आई है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 10 October, 2026
Last Modified:
Saturday, 10 October, 2026
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भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) में लगातार गिरावट का सिलसिला जारी है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से शुक्रवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक, 2 अक्टूबर 2026 को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 12.752 अरब डॉलर घट गया. इससे पिछले सप्ताह इसमें 18.343 अरब डॉलर की कमी आई थी. वहीं, 18 सितंबर को समाप्त सप्ताह में 14.881 अरब डॉलर और 11 सितंबर को समाप्त सप्ताह में 4.924 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई थी.

इस तरह पिछले चार सप्ताह में भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में कुल 51.1 अरब डॉलर की कमी आई है. इसके साथ ही भंडार 4 सितंबर 2026 को दर्ज 785.706 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर से घटकर 734.606 अरब डॉलर रह गया है. गौरतलब है कि 4 सितंबर तक लगातार 10 सप्ताह विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही थी. इसके बाद इसमें लगातार चार सप्ताह गिरावट आई है.

विदेशी मुद्रा आस्तियों में 10.66 अरब डॉलर की कमी

विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट की सबसे बड़ी वजह विदेशी मुद्रा आस्तियों (Foreign Currency Assets यानी FCA) में आई कमी रही. RBI के आंकड़ों के अनुसार, 2 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा आस्तियां 10.664 अरब डॉलर घटकर 604.747 अरब डॉलर रह गईं. इससे पिछले सप्ताह भी इनमें 15.570 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई थी.

विदेशी मुद्रा आस्तियां भारत के कुल विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा हैं. इनमें अमेरिकी डॉलर के अलावा यूरो, पाउंड और येन जैसी अन्य विदेशी मुद्राओं में रखी गई संपत्तियां भी शामिल होती हैं. डॉलर में इनका मूल्यांकन किए जाने के कारण दूसरी मुद्राओं की विनिमय दरों में होने वाले बदलाव का असर भी इनके मूल्य पर पड़ता है.

सोने के भंडार का मूल्य भी घटा

विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट के बीच देश के स्वर्ण भंडार (Gold Reserves) के मूल्य में भी कमी आई है. RBI के आंकड़ों के मुताबिक, 2 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में सोने के भंडार का मूल्य 2.288 अरब डॉलर घटकर 106.413 अरब डॉलर रह गया. इससे पिछले सप्ताह भी इसके मूल्य में 2.591 अरब डॉलर की गिरावट आई थी.

मार्च 2026 के अंत तक RBI के पास 880.52 टन सोना था. सोने की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव से इसके भंडार का डॉलर में मूल्य प्रभावित होता है. ऐसे में सोने के मूल्य में गिरावट का असर देश के कुल विदेशी मुद्रा भंडार के आंकड़े पर भी पड़ता है.

SDR में बढ़ोतरी, IMF रिजर्व घटा

RBI के आंकड़ों के अनुसार, 2 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में भारत के विशेष आहरण अधिकार (Special Drawing Rights यानी SDR) में 15 मिलियन डॉलर की बढ़ोतरी हुई. इसके बाद SDR का कुल भंडार बढ़कर 18.656 अरब डॉलर हो गया. इससे पिछले सप्ताह इसमें 97 मिलियन डॉलर की गिरावट आई थी.

वहीं, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के पास रखे गए भारत के रिजर्व में 15 मिलियन डॉलर की कमी आई. इसके बाद यह घटकर 4.789 अरब डॉलर रह गया. इससे पिछले सप्ताह भी IMF रिजर्व में 86 मिलियन डॉलर की गिरावट दर्ज की गई थी.

इस तरह विदेशी मुद्रा आस्तियों और सोने के भंडार के मूल्य में कमी ने कुल विदेशी मुद्रा भंडार को नीचे खींचा है, जबकि SDR में मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई. हालांकि, चार सप्ताह में आई कुल गिरावट के पीछे अलग-अलग कारकों की भूमिका समझने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में RBI के हस्तक्षेप और विदेशी परिसंपत्तियों के मूल्यांकन में हुए बदलावों को भी ध्यान में रखना होगा.
 


अमेरिका में PERM पर रोक से भारतीय IT कंपनियों की बढ़ी चिंता, TCS-Infosys समेत 8 कंपनियां प्रभावित

अमेरिका में ग्रीन कार्ड स्पॉन्सरशिप से जुड़ी PERM प्रक्रिया पर रोक के बाद भारतीय IT कंपनियों के कर्मचारियों की स्थायी निवास प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं. हालांकि, इस कदम से मौजूदा H-1B वीजा अपने आप रद्द नहीं होंगे.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 10 October, 2026
Last Modified:
Saturday, 10 October, 2026
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अमेरिका में आठ टेक्नोलॉजी कंपनियों को परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन (PERM) कार्यक्रम से निलंबित किए जाने के बाद भारतीय IT सेक्टर में ग्रीन कार्ड स्पॉन्सरशिप और कर्मचारियों की नियुक्ति रणनीति को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रभावित कंपनियों में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), इन्फोसिस, विप्रो, HCLTech, कॉग्निजेंट, माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी और कैपजेमिनी शामिल हैं.

अमेरिकी श्रम विभाग (US Department of Labour) ने इन कंपनियों से जुड़े नए PERM आवेदनों को स्वीकार करने और लंबित आवेदनों की प्रक्रिया पर रोक लगा दी है. यह कार्रवाई रोजगार आधारित इमिग्रेशन कार्यक्रमों के कथित दुरुपयोग की जांच के बीच की गई है. PERM प्रक्रिया पर रोक का सीधा असर ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन करने वाले कर्मचारियों पर पड़ सकता है, लेकिन इससे पहले से जारी H-1B वीजा अपने आप रद्द नहीं होते.

इस फैसले ने अस्थायी वर्क वीजा और स्थायी निवास की प्रक्रिया के बीच अंतर को भी चर्चा में ला दिया है. यदि यह प्रतिबंध लंबे समय तक जारी रहता है, तो कंपनियों को कर्मचारियों को बनाए रखने और अमेरिका में अपने कार्यबल की योजना बनाने से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.

PERM पर रोक का IT कंपनियों पर क्या होगा असर?

PERM ग्रीन कार्ड हासिल करने की नियोक्ता प्रायोजित प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण है. इसके तहत अमेरिकी नियोक्ता को यह प्रमाणित करना होता है कि संबंधित पद के लिए योग्य अमेरिकी कर्मचारियों की उपलब्धता और भर्ती से जुड़ी निर्धारित शर्तें पूरी की गई हैं. इसके बाद कर्मचारी ग्रीन कार्ड की आगे की प्रक्रिया में बढ़ सकता है.

वहीं, H-1B वीजा विदेशी पेशेवरों को अमेरिका में अस्थायी रूप से काम करने की अनुमति देता है. ऐसे में PERM प्रक्रिया पर रोक का मतलब यह नहीं है कि अमेरिका में काम कर रहे सभी प्रभावित कर्मचारियों की नौकरी या वीजा तत्काल समाप्त हो जाएगा. इसका मुख्य असर स्थायी निवास के लिए आवेदन की प्रक्रिया पर पड़ता है.

टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) ने कहा है कि उसे इस रोक से अपनी कार्यबल रणनीति या ग्राहकों से जुड़े कामकाज पर किसी बड़े असर की आशंका नहीं है. कंपनी के मुताबिक, पिछले दो वर्षों में उसके PERM आवेदनों की संख्या एकल अंक में रही है. TCS ने अगले पांच वर्षों में अमेरिका में 15,000 अतिरिक्त कर्मचारियों की भर्ती की अपनी योजना को भी दोहराया है. कंपनी स्थानीय भर्ती और कैंपस प्लेसमेंट को अपनी रणनीति का अहम हिस्सा मानती है.

TCS का रुख बताता है कि इस फैसले का असर सभी कंपनियों पर एक जैसा होना जरूरी नहीं है. इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि संबंधित कंपनी PERM प्रक्रिया का कितना इस्तेमाल करती है और अमेरिका में उसके कर्मचारियों की मौजूदा स्थिति क्या है. हालांकि, कंपनियों के स्तर पर आवेदनों और प्रभावित कर्मचारियों का विस्तृत आंकड़ा उपलब्ध नहीं होने के कारण पूरे IT उद्योग पर पड़ने वाले असर का सटीक अनुमान लगाना फिलहाल मुश्किल है.

Nasscom ने क्या कहा?

नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर एंड सर्विस कंपनीज (Nasscom) ने इस मामले में इमिग्रेशन और कुशल कर्मचारियों की अंतरराष्ट्रीय आवाजाही को अलग-अलग मुद्दे बताया है. उद्योग संगठन के मुताबिक, भारतीय टेक्नोलॉजी कंपनियों ने अमेरिका में स्थानीय स्तर पर भर्ती बढ़ाई है और H-1B वीजा पर अपनी निर्भरता कम की है. कंपनियों ने अमेरिकी बाजार में स्थानीय कार्यबल विकसित करने पर भी जोर दिया है.

Nasscom ने यह भी कहा कि H-1B वीजा पर काम करने वाले अपेक्षाकृत कम कर्मचारी PERM प्रक्रिया के जरिए स्थायी निवास हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ते हैं. संगठन के अनुसार, भारतीय टेक्नोलॉजी कंपनियां 80 से अधिक देशों में काम करती हैं और स्थानीय कानूनों व नियामकीय आवश्यकताओं का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

आगे क्या बदलेगी कंपनियों की रणनीति?

PERM प्रक्रिया पर रोक का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रतिबंध कितने समय तक लागू रहता है, कितने आवेदन प्रभावित होते हैं और संबंधित कंपनियां ग्रीन कार्ड स्पॉन्सरशिप पर कितनी निर्भर हैं. फिलहाल, प्रभावित कर्मचारियों की कुल संख्या और कंपनियों पर पड़ने वाले संभावित वित्तीय असर को लेकर स्पष्ट आंकड़े सामने नहीं आए हैं.

भारतीय IT कंपनियों के लिए फिलहाल सबसे अहम सवाल लंबित आवेदनों की स्थिति और स्थायी निवास की प्रक्रिया में लगे कर्मचारियों पर पड़ने वाले प्रभाव का है. TCS, इन्फोसिस और विप्रो जैसी कंपनियों की प्रतिक्रियाओं के साथ अमेरिकी अधिकारियों की ओर से मिलने वाला अतिरिक्त स्पष्टीकरण यह तय करने में अहम होगा कि कंपनियों को अपनी भर्ती, कर्मचारी प्रतिधारण और कार्यबल नियोजन की रणनीति में कोई बदलाव करना पड़ेगा या नहीं.


स्टारलिंक, जियो और वनवेब में मुकाबला, सैटकॉम सेक्टर में किसी कंपनी का एकाधिकार नहीं: सिंधिया

सिंधिया ने इंडिया मोबाइल कांग्रेस के दौरान कहा कि सैटकॉम क्षेत्र में किसी एक कंपनी को प्राथमिकता नहीं दी गई है. इस क्षेत्र में सेवाएं देने की इच्छुक सभी कंपनियों को जरूरी नियमों और शर्तों का पालन करना होगा.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 10 October, 2026
Last Modified:
Saturday, 10 October, 2026
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भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के बाजार में किसी एक कंपनी का दबदबा नहीं होगा. संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि स्टारलिंक, रिलायंस जियो और वनवेब को लाइसेंस दिए जा चुके हैं. वहीं, अमेजन कुइपर को भी सेवाएं शुरू करने के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा. सरकार अब सैटेलाइट स्पेक्ट्रम की कीमत और सुरक्षा संबंधी शर्तों पर काम कर रही है.

संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सैटेलाइट ब्रॉडबैंड सेवाओं के लिए लाइसेंस देने की प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों पर सरकार का रुख स्पष्ट किया है. उन्होंने कहा कि भारत किसी भी क्षेत्र में एकाधिकार की अनुमति नहीं देता है और सैटेलाइट कम्युनिकेशन (सैटकॉम) सेक्टर में भी सभी पात्र कंपनियों को समान अवसर दिए जाएंगे. उनके मुताबिक, रिलायंस जियो, वनवेब और स्टारलिंक को लाइसेंस मिल चुके हैं, जबकि अमेरिकी कंपनी अमेजन कुइपर को निर्धारित प्रक्रिया पूरी करनी होगी.

सिंधिया ने इंडिया मोबाइल कांग्रेस के दौरान कहा कि सैटकॉम क्षेत्र में किसी एक कंपनी को प्राथमिकता नहीं दी गई है. इस क्षेत्र में सेवाएं देने की इच्छुक सभी कंपनियों को जरूरी नियमों और शर्तों का पालन करना होगा. उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उपभोक्ताओं को अलग-अलग सेवाओं के विकल्प मिलें और वे अपनी जरूरत के अनुसार चुनाव कर सकें.

स्पेक्ट्रम की कीमत और सुरक्षा मानकों पर चर्चा

सिंधिया के मुताबिक, सरकार सैटेलाइट स्पेक्ट्रम की कीमत तय करने के लिए भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) के साथ चर्चा कर रही है. कंपनियों को सेवाएं शुरू करने से पहले सुरक्षा से जुड़ी सभी शर्तें पूरी करनी होंगी. इन मानकों के अनुपालन की जांच गृह मंत्रालय कर रहा है और मंजूरी देने का फैसला भी उसी के स्तर पर होगा.

उन्होंने कहा कि राजस्व शुल्क से जुड़ी व्यवस्था तय होने के बाद कंपनियां सुरक्षा संबंधी शर्तों और अन्य जरूरी मानकों को पूरा करके अपनी सेवाएं शुरू कर सकती हैं. प्रत्येक कंपनी को निर्धारित शर्तों का अलग-अलग अनुपालन करना होगा.

स्टारलिंक को लेकर क्यों उठा विवाद?

सरकार का यह बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिकी अरबपति एलन मस्क ने आरोप लगाया था कि कुछ 'ताकतवर कारोबारी' भारत में स्टारलिंक की सेवाओं को शुरू होने से रोक रहे हैं. इसके बाद केंद्र सरकार ने गुरुवार को इन आरोपों को खारिज कर दिया था.

संचार मंत्रालय ने कहा था कि भारत में दूरसंचार और सैटेलाइट सेवाओं के लिए मंजूरी की व्यवस्था निष्पक्ष और भेदभाव रहित है. सभी कंपनियों को देश में कारोबार शुरू करने के लिए निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन करना होता है. मंत्रालय ने चुनिंदा कंपनियों को निशाना बनाने या उनके साथ भेदभाव किए जाने के आरोपों को निराधार बताया था.

भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के विस्तार के साथ इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ने की संभावना है. हालांकि, कंपनियों के लिए सेवाएं शुरू करने का रास्ता स्पेक्ट्रम से जुड़े नियमों, शुल्क व्यवस्था और सुरक्षा मंजूरी पूरी होने के बाद ही साफ होगा.


एयर इंडिया की घरेलू उड़ानों में छात्रों को 10% छूट, जानें कैसे मिलेगा लाभ

इसके अलावा सालभर चलने वाले छात्र कार्यक्रम के तहत 10 किलोग्राम अतिरिक्त सामान ले जाने की सुविधा और एक बार मुफ्त में यात्रा की तारीख बदलने का लाभ भी मिलेगा.

Last Modified:
Friday, 09 October, 2026
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एयर इंडिया ने छात्रों के हवाई सफर को किफायती बनाने के लिए घरेलू उड़ानों के टिकट पर विशेष ऑफर पेश किया है. इसके तहत पात्र बुकिंग पर बेस फेयर यानी मूल किराये में 10 फीसदी की छूट दी जाएगी. इस ऑफर का लाभ लेने के लिए छात्रों को 20 अक्टूबर 2026 तक टिकट बुक करना होगा. यह सुविधा एयर इंडिया के सालभर चलने वाले छात्र कार्यक्रम के अतिरिक्त है, जिसके तहत पात्र घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर भी कई लाभ मिलते हैं.

एयरलाइन के मुताबिक, कॉलेज में दाखिले, इंटर्नशिप, कैंपस प्लेसमेंट या सेमेस्टर की छुट्टियों में घर जाने वाले छात्र इस ऑफर का लाभ उठा सकते हैं. हालांकि, छूट के लिए बुकिंग को निर्धारित किराया शर्तों के अनुरूप होना जरूरी है.

छात्रों को मिलेंगे ये तीन प्रमुख फायदे

एयर इंडिया के सालभर चलने वाले छात्र कार्यक्रम के तहत पात्र यात्रियों को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के किराये पर 10 फीसदी तक की छूट मिल सकती है. इसके अलावा उन्हें 10 किलोग्राम अतिरिक्त सामान ले जाने की सुविधा और एक बार बिना अतिरिक्त शुल्क के यात्रा की तारीख बदलने का विकल्प भी मिलता है.

हालांकि, घरेलू उड़ानों के मूल किराये पर फ्लैट 10 फीसदी छूट का विशेष ऑफर सीमित अवधि के लिए है. इसकी अंतिम तारीख 20 अक्टूबर 2026 है. छात्र कार्यक्रम के अन्य लाभ लागू नियमों और शर्तों के अनुसार पूरे साल उपलब्ध रहेंगे.

वेबसाइट और मोबाइल ऐप से ऐसे करें बुकिंग

छात्र एयर इंडिया की आधिकारिक वेबसाइट airindia.com या मोबाइल ऐप के जरिए टिकट बुक कर सकते हैं. इसके लिए उन्हें कुछ आसान चरणों का पालन करना होगा.

1. सबसे पहले यात्रा का शुरुआती शहर, गंतव्य और यात्रा की तारीख दर्ज करें.

2. बुकिंग के दौरान 'कंसेशन टाइप' के विकल्प में 'स्टूडेंट' चुनें.

3. इसके बाद दिखाई देने वाले पात्र छात्र किरायों में से अपनी यात्रा के लिए विकल्प चुनें.

4. किराये से जुड़ी शर्तों की जांच करें और बुकिंग पूरी कर लें.

विशेष छूट पाने के लिए 20 अक्टूबर 2026 तक बुकिंग करना जरूरी है. यह ऑफर पात्र एकतरफा और आने-जाने, दोनों तरह के टिकटों पर लागू है.

सीधे टिकट बुक करने पर अतिरिक्त बचत का मौका

एयर इंडिया की वेबसाइट या मोबाइल ऐप से टिकट बुक करने वाले यात्रियों को अतिरिक्त बचत का लाभ भी मिल सकता है. लॉग-इन करने वाले ग्राहकों को सुविधा शुल्क में 50 फीसदी की छूट दी जाती है. इसके अलावा, पात्र घरेलू उड़ानों के टिकट का भुगतान यूपीआई से करने पर प्रोमो कोड **UPIPROMO** के जरिए प्रति यात्री 1,000 रुपये तक की अतिरिक्त छूट मिल सकती है. यह लाभ निर्धारित नियमों और शर्तों के अधीन है.

कौन उठा सकता है छात्र ऑफर का लाभ?

घरेलू उड़ानों में छात्र कार्यक्रम का लाभ लेने के लिए यात्रियों को कुछ पात्रता शर्तें पूरी करनी होंगी.

1. उम्र: यात्रा की तारीख पर छात्र की उम्र कम से कम 12 वर्ष होनी चाहिए.

2. पाठ्यक्रम: छात्र किसी ऐसे पूर्णकालिक पाठ्यक्रम में नामांकित होना चाहिए, जिसकी अवधि कम से कम एक शैक्षणिक वर्ष हो.

3. शिक्षण संस्थान: छात्र केंद्र या राज्य सरकार, मान्यता प्राप्त शिक्षा बोर्ड या विश्वविद्यालय से मान्यता प्राप्त, संबद्ध अथवा सहायता प्राप्त संस्थान में पढ़ रहा हो. मान्यता प्राप्त स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों के पात्र विद्यार्थी भी इस सुविधा का लाभ ले सकते हैं.

यात्रा के दौरान चेक-इन के समय सत्यापन के लिए वैध दस्तावेज साथ रखना जरूरी है. इनमें छात्र पहचान पत्र, शिक्षण संस्थान का प्रवेश पत्र या लागू होने की स्थिति में वैध छात्र वीजा शामिल हो सकता है. जरूरी दस्तावेज नहीं दिखाने पर एयरलाइन निर्धारित नियमों के अनुसार अतिरिक्त राशि और लागू कर वसूल सकती है.

सालभर मिलती रहेंगी ये सुविधाएं

सीमित अवधि के विशेष ऑफर के बाद भी एयर इंडिया का छात्र कार्यक्रम जारी रहेगा. इसके तहत पात्र यात्रियों को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के किराये पर 10 फीसदी तक की छूट, 10 किलोग्राम अतिरिक्त सामान ले जाने की सुविधा और एक बार मुफ्त में यात्रा की तारीख बदलने का लाभ मिलता रहेगा.

अतिरिक्त सामान ले जाने की सुविधा उन छात्रों के लिए उपयोगी हो सकती है, जिन्हें कॉलेज और घर के बीच यात्रा करते समय ज्यादा सामान ले जाना पड़ता है. वहीं, तारीख बदलने की सुविधा से यात्रा कार्यक्रम में बदलाव होने पर सहूलियत मिलती है. दोनों लाभ संबंधित नियमों और शर्तों के अधीन हैं.

भारत और विदेश के प्रमुख शिक्षा केंद्रों से कनेक्टिविटी

एयर इंडिया का घरेलू और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क भारत के विभिन्न शहरों के साथ उत्तरी अमेरिका, यूरोप, ब्रिटेन, मध्य पूर्व, एशिया और ऑस्ट्रेलिया के प्रमुख गंतव्यों को जोड़ता है. इससे उच्च शिक्षा के लिए देश और विदेश जाने वाले छात्रों को यात्रा के विकल्प मिलते हैं.

एयरलाइन के मुताबिक, घरेलू उड़ानों के मूल किराये पर सीमित अवधि की 10 फीसदी छूट के लिए 20 अक्टूबर 2026 तक बुकिंग की जा सकती है. छात्र कार्यक्रम के अन्य लाभ इसके बाद भी लागू शर्तों के अनुसार उपलब्ध रहेंगे. अधिक जानकारी और टिकट बुकिंग के लिए छात्र एयर इंडिया की वेबसाइट या मोबाइल ऐप का इस्तेमाल कर सकते हैं.
 


रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब रुपया, RBI ने संभाला मोर्चा; डॉलर और कच्चे तेल का दबाव बरकरार

विदेशी पूंजी की निकासी, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और डॉलर की मजबूत मांग से रुपये पर दबाव बना हुआ है. 9 अक्टूबर को रुपया शुरुआती कारोबार में 96.80 प्रति डॉलर के करीब पहुंचने के बाद संभला और 96.61 प्रति डॉलर पर बंद हुआ.

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Friday, 09 October, 2026
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भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रुपये को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर जाने से रोकने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप किया. मुद्रा बाजार के कारोबारियों के मुताबिक, डॉलर की लगातार मांग, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और वैश्विक अनिश्चितता के कारण रुपये पर दबाव बना हुआ है. केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप से रुपये में और गिरावट को सीमित करने में मदद मिली.

8 अक्टूबर 2026 को रुपया कमजोर होकर 96.78 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था. इसके बाद 9 अक्टूबर को कारोबार के दौरान यह 96.80 प्रति डॉलर के करीब पहुंच गया. हालांकि, बाद में इसमें सुधार आया और यह 96.61 प्रति डॉलर पर बंद हुआ. इस तरह पिछले कारोबारी सत्र के मुकाबले रुपये में करीब 0.2 फीसदी की मजबूती दर्ज की गई. कारोबारियों ने इस सुधार के पीछे RBI के हस्तक्षेप, डॉलर में नरमी और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट को प्रमुख वजह बताया.

विदेशी मुद्रा बाजार में RBI की भूमिका ऐसे समय में महत्वपूर्ण हो गई है, जब बाहरी आर्थिक परिस्थितियां रुपये के अनुकूल नहीं हैं. भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है. ऐसे में तेल की कीमतें बढ़ने से आयात बिल बढ़ता है और भुगतान के लिए डॉलर की मांग में इजाफा होता है. इससे रुपये पर दबाव पड़ता है.

कच्चे तेल की कीमतें और विदेशी निवेशकों की बिकवाली बढ़ा रही दबाव

रुपये की कमजोरी के पीछे घरेलू और वैश्विक, दोनों तरह के कारक काम कर रहे हैं. कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भारत के आयात खर्च को बढ़ाती हैं, जबकि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की निकासी से भी रुपये पर दबाव बढ़ता है. इसके अलावा, भू-राजनीतिक घटनाक्रम और वैश्विक ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता ने भी मुद्रा बाजार की स्थिति को प्रभावित किया है.

RBI के हस्तक्षेप से रुपये की गिरावट की रफ्तार को सीमित करने में मदद मिल सकती है, लेकिन इससे उन बुनियादी कारणों को खत्म नहीं किया जा सकता, जो घरेलू मुद्रा पर दबाव बना रहे हैं. बाजार के प्रतिभागी अब कच्चे तेल की कीमतों, अमेरिकी डॉलर की चाल और विदेशी निवेश के प्रवाह पर नजर रख रहे हैं. इन कारकों से रुपये की आगे की दिशा तय होने की संभावना है.

RBI ने संकेत दिया है कि उसका उद्देश्य विदेशी मुद्रा बाजार में व्यवस्थित कारोबार बनाए रखना है, न कि रुपये को किसी निश्चित विनिमय दर पर बनाए रखना. गवर्नर संजय मल्होत्रा ने रुपये को उसके उचित मूल्य से कम यानी अंडरवैल्यूड बताया है. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा है कि छोटी अवधि में बाजार का व्यवहार तर्कसंगत नहीं रह सकता.

RBI की मौद्रिक नीति का भी रुपये पर असर

रुपये की चाल पर RBI के हालिया मौद्रिक नीति फैसले का असर भी देखा जा रहा है. 7 अक्टूबर को केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी करते हुए इसे 5.50 फीसदी कर दिया था. साथ ही, मौद्रिक नीति के रुख को न्यूट्रल से बदलकर कैलिब्रेटेड टाइटनिंग यानी चरणबद्ध सख्ती की ओर किया था.

हालांकि, इस फैसले के बाद भी रुपये को तत्काल मजबूती नहीं मिली. इसकी वजह बाहरी आर्थिक दबाव और विदेशी पूंजी के प्रवाह को लेकर बनी चिंताएं हैं. इससे संकेत मिलता है कि केवल ब्याज दरों में बदलाव से रुपये की दिशा तय नहीं होती, बल्कि वैश्विक बाजार की परिस्थितियां भी अहम भूमिका निभाती हैं.

रुपये में गिरावट से किन क्षेत्रों पर पड़ेगा असर?

रुपये के कमजोर होने का अलग-अलग क्षेत्रों पर अलग प्रभाव पड़ता है. तेल विपणन कंपनियों, विमानन कंपनियों और उन कारोबारों की लागत बढ़ सकती है, जिन्हें कच्चे तेल, ईंधन, मशीनरी या अन्य वस्तुओं का आयात करना पड़ता है. डॉलर में भुगतान करने वाली कंपनियों के लिए भी आयात महंगा हो सकता है.

दूसरी ओर, सूचना प्रौद्योगिकी (IT) क्षेत्र की उन कंपनियों को फायदा मिल सकता है, जिन्हें विदेशों से डॉलर में कमाई होती है. डॉलर में अर्जित आय को रुपये में बदलने पर उन्हें अधिक राशि मिल सकती है. हालांकि, वास्तविक लाभ कंपनियों के खर्च, विदेशी मुद्रा जोखिम से बचाव की रणनीति और अन्य कारोबारी परिस्थितियों पर निर्भर करेगा.

रुपये में लगातार गिरावट से आयातित महंगाई बढ़ने का जोखिम भी रहता है. यदि कंपनियां आयात की बढ़ी हुई लागत का बोझ उपभोक्ताओं पर डालती हैं, तो ईंधन और अन्य आयातित वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं.

RBI के सामने क्या है चुनौती?

RBI के सामने फिलहाल रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोकने और विदेशी मुद्रा बाजार में स्थिरता बनाए रखने की चुनौती है. केंद्रीय बैंक के लिए किसी एक विनिमय दर का बचाव करने के बजाय बाजार में असामान्य उतार-चढ़ाव को सीमित करना महत्वपूर्ण है.

आने वाले दिनों में रुपये की दिशा काफी हद तक कच्चे तेल की कीमतों, विदेशी निवेशकों के रुख, अमेरिकी डॉलर की मजबूती और RBI के हस्तक्षेप पर निर्भर करेगी. यदि तेल की कीमतों में तेजी और विदेशी पूंजी की निकासी जारी रहती है, तो रुपये पर दबाव बना रह सकता है. वहीं, डॉलर में नरमी और तेल की कीमतों में गिरावट से घरेलू मुद्रा को कुछ राहत मिल सकती है.
 


दिल्ली मेट्रो के 57 स्टेशनों पर एंट्री-एग्जिट बंद, 10 अक्टूबर के विरोध प्रदर्शन से पहले DMRC का फैसला

दिल्ली पुलिस की सुरक्षा संबंधी चिंताओं के बाद DMRC ने 9 अक्टूबर रात 9 बजे से 57 मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश और निकास द्वार बंद कर दिए हैं. अगले आदेश तक जारी रहेंगी पाबंदियां, हालांकि नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन को छोड़कर अन्य प्रभावित स्टेशनों पर इंटरचेंज की सुविधा उपलब्ध रहेगी.

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Friday, 09 October, 2026
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दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (DMRC) ने 10 अक्टूबर को प्रस्तावित विरोध प्रदर्शनों से पहले सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर राजधानी के 57 मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश और निकास द्वार बंद करने का फैसला किया है. ये प्रतिबंध 9 अक्टूबर की रात 9 बजे से लागू हो गए हैं और अगले आदेश तक जारी रहेंगे. DMRC की ओर से जारी सेवा संबंधी सूचना में यह जानकारी दी गई है. यह कदम दिल्ली पुलिस के अनुरोध के बाद उठाया गया है. पुलिस को आशंका है कि प्रस्तावित प्रदर्शनों के दौरान भीड़ नई दिल्ली के संवेदनशील इलाकों की ओर बढ़ सकती है. इसी को देखते हुए दिल्ली पुलिस ने 8 अक्टूबर को DMRC को पत्र लिखकर संबंधित अवधि के दौरान एहतियाती कदम उठाने को कहा था.

दिल्ली के किन-किन मेट्रो स्टेशनों पर लगी पाबंदी?

उत्तर और उत्तर-पश्चिमी दिल्ली: इंद्रलोक, रिठाला, रोहिणी, डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर अस्पताल, कन्हैया नगर, नेताजी सुभाष प्लेस, गुरु तेग बहादुर नगर, आजादपुर, आदर्श नगर, जहांगीरपुरी, हैदरपुर बादली मोड़, विश्वविद्यालय, विधानसभा, सिविल लाइंस, कश्मीरी गेट, मजलिस पार्क और शालीमार बाग.

पूर्वी और उत्तर-पूर्वी दिल्ली: शाहदरा, सीलमपुर, वेलकम, मौजपुर-बाबरपुर, जाफराबाद, यमुना विहार और खजूरी खास.

मध्य दिल्ली: पटेल चौक, केंद्रीय सचिवालय, लोक कल्याण मार्ग, चावड़ी बाजार, राजीव चौक, नई दिल्ली, सेवा तीर्थ, झंडेवालान, सुप्रीम कोर्ट, इंद्रप्रस्थ, मंडी हाउस, बाराखंभा रोड, करोल बाग, राजेंद्र प्लेस, जामा मस्जिद, जनपथ, आईटीओ, दिल्ली गेट और खान मार्केट.

अन्य प्रभावित स्टेशन: दिल्ली हाट-आईएनए, हौज खास, जोर बाग, अर्जनगढ़, रामकृष्ण आश्रम मार्ग, जंगपुरा, लाजपत नगर, आश्रम, सराय काले खां-निजामुद्दीन, कालिंदी कुंज, जसोला विहार शाहीन बाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, ओखला विहार और शिवाजी स्टेडियम.

इंटरचेंज की सुविधा रहेगी जारी

DMRC ने स्पष्ट किया है कि नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन को छोड़कर अन्य प्रभावित स्टेशनों पर इंटरचेंज की सुविधा जारी रहेगी. यानी यात्री इन स्टेशनों पर एक मेट्रो लाइन से दूसरी लाइन में बदल सकेंगे, लेकिन स्टेशन के प्रवेश और निकास द्वार बंद रहने के कारण यात्रा शुरू करने या स्टेशन से बाहर निकलने में परेशानी हो सकती है. यात्रियों को सलाह दी जाती है कि वे अपनी यात्रा की योजना बनाते समय इन प्रतिबंधों को ध्यान में रखें और मेट्रो की ताजा सूचनाओं के आधार पर वैकल्पिक मार्ग चुनें.

रोजाना लाखों यात्रियों की आवाजाही पर असर की आशंका

दिल्ली मेट्रो राजधानी और आसपास के इलाकों में सार्वजनिक परिवहन का एक प्रमुख साधन है. इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 17 सितंबर 2026 को मेट्रो में 82,44,903 यात्री बोर्डिंग दर्ज की गई थी, जो DMRC के मुताबिक अब तक का सबसे बड़ा दैनिक आंकड़ा है.

यह आंकड़ा यात्रियों की कुल बोर्डिंग का है, न कि अलग-अलग यात्रियों की संख्या का. ऐसे में 57 स्टेशनों पर प्रवेश और निकास बंद रहने से यात्रियों को अपनी रोजमर्रा की आवाजाही के दौरान परेशानी का सामना करना पड़ सकता है.
 

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डेट सिक्योरिटीज में जोखिम पहचानना होगा आसान, सेबी ने पेश किया नया क्रेडिट रिस्क-ओ-मीटर

सेबी के नए फ्रेमवर्क में डेट सिक्योरिटीज के क्रेडिट जोखिम को छह श्रेणियों में बांटा जाएगा. इसमें हरे रंग से सबसे कम जोखिम और लाल रंग से सबसे ज्यादा जोखिम का संकेत मिलेगा.

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Friday, 09 October, 2026
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डेट सिक्योरिटीज में निवेश करने वालों के लिए जोखिम को समझना आसान बनाने के उद्देश्य से भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने नया क्रेडिट रिस्क-ओ-मीटर पेश किया है. इसके तहत रंगों के जरिए बताया जाएगा कि किसी डेट सिक्योरिटी में क्रेडिट जोखिम कितना है. यह व्यवस्था निवेशकों को अलग-अलग रेटिंग वाली सिक्योरिटीज के जोखिम को आसानी से समझने में मदद करेगी.

सेबी ने 7 अक्टूबर को जारी सर्कुलर में कंपनियों और ऑनलाइन बॉन्ड प्लेटफॉर्म संचालकों को क्रेडिट रिस्क-ओ-मीटर की जानकारी निवेश से जुड़े दस्तावेजों, प्रॉस्पेक्टस, प्राइवेट प्लेसमेंट दस्तावेजों, मेमोरैंडम और विज्ञापनों में देने का निर्देश दिया है. इसे संबंधित संस्थाओं की वेबसाइट और मोबाइल प्लेटफॉर्म पर भी प्रदर्शित करना होगा. ये नियम सर्कुलर जारी होने के 45 दिन बाद लागू होंगे.

किन डेट सिक्योरिटीज पर लागू होंगे नए नियम?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सेबी का नया फ्रेमवर्क उन सभी डेट सिक्योरिटीज पर लागू होगा, जो शेयर बाजार में सूचीबद्ध हैं या सूचीबद्ध होने वाली हैं. इनमें नॉन-कन्वर्टिबल सिक्योरिटीज (NCS), कमर्शियल पेपर (CP), सिक्योरिटाइज्ड डेट इंस्ट्रूमेंट्स (SDI), सिक्योरिटी रिसीट्स (SR) और स्ट्रक्चर्ड डेट या मार्केट-लिंक्ड डिबेंचर्स (MLD) शामिल हैं. यह व्यवस्था पब्लिक इश्यू और प्राइवेट प्लेसमेंट, दोनों तरह से जारी की जाने वाली संबंधित सिक्योरिटीज पर लागू होगी.

छह श्रेणियों में बंटेगा क्रेडिट जोखिम

नए क्रेडिट रिस्क-ओ-मीटर में मौजूदा क्रेडिट रेटिंग को छह जोखिम श्रेणियों में बांटा गया है. इसमें AAA से लेकर D तक की रेटिंग शामिल हैं. हर श्रेणी के लिए अलग रंग निर्धारित होगा, जिससे निवेशक जोखिम का स्तर आसानी से पहचान सकेंगे.

1. सबसे कम क्रेडिट जोखिम: AAA रेटिंग वाली सिक्योरिटीज को इस श्रेणी में रखा जाएगा. इसे हरे रंग से दर्शाया जाएगा.

2. बहुत कम क्रेडिट जोखिम: AA+, AA और AA- रेटिंग वाली सिक्योरिटीज इस श्रेणी में आएंगी.

3. कम क्रेडिट जोखिम: A+, A और A- रेटिंग वाली सिक्योरिटीज को इसमें रखा जाएगा.

4. मध्यम क्रेडिट जोखिम: BBB+, BBB और BBB- रेटिंग वाली सिक्योरिटीज इस श्रेणी में होंगी.

5. डिफॉल्ट का मध्यम जोखिम: BB+, BB और BB- रेटिंग वाली सिक्योरिटीज को इस श्रेणी में रखा जाएगा.

6. डिफॉल्ट का उच्च से बहुत अधिक जोखिम: B+, B, B-, C+, C, C- और D रेटिंग वाली सिक्योरिटीज इस श्रेणी में आएंगी. सबसे अधिक जोखिम को लाल रंग से दिखाया जाएगा.

7. कम अवधि वाले डेट इंस्ट्रूमेंट्स के लिए भी इसी तरह की व्यवस्था होगी. इसमें A1+, A1 और A2 जैसी शॉर्ट-टर्म रेटिंग को संबंधित जोखिम श्रेणियों से जोड़ा जाएगा.

सबसे कम क्रेडिट रेटिंग के आधार पर तय होगा जोखिम

सेबी के निर्देशों के अनुसार, क्रेडिट रिस्क-ओ-मीटर के साथ क्रेडिट रेटिंग एजेंसी (CRA) का नाम और संबंधित डेट सिक्योरिटी की वास्तविक क्रेडिट रेटिंग भी लिखनी होगी. यदि किसी डेट सिक्योरिटी को एक से अधिक क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने रेटिंग दी है, तो क्रेडिट रिस्क-ओ-मीटर में सबसे कम रेटिंग के आधार पर जोखिम दिखाया जाएगा. हालांकि, अन्य एजेंसियों की रेटिंग की जानकारी भी दी जा सकती है.

बिना गारंटी वाले डेट इंस्ट्रूमेंट्स के लिए ‘अनसिक्योर्ड’ यानी बिना गारंटी वाला शब्द गहरे लाल रंग में मोटे अक्षरों में दिखाना अनिवार्य होगा. इसका उद्देश्य निवेशकों को यह स्पष्ट जानकारी देना है कि संबंधित निवेश के लिए कोई गारंटी उपलब्ध नहीं है.

ऑनलाइन बॉन्ड प्लेटफॉर्म को 24 घंटे में करना होगा अपडेट

सेबी ने ऑनलाइन बॉन्ड प्लेटफॉर्म ऑपरेटर्स (OBPPs) के लिए भी निर्देश जारी किए हैं. अब नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (NSDL) या सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विसेज (इंडिया) लिमिटेड (CDSL) से रेटिंग में बदलाव की सूचना मिलने के 24 घंटे के भीतर प्लेटफॉर्म को क्रेडिट रिस्क-ओ-मीटर अपडेट करना होगा.

ऑनलाइन बॉन्ड प्लेटफॉर्म अपनी ओर से जोखिम की श्रेणी में बदलाव नहीं कर सकेंगे. उन्हें रेटिंग में हुए बदलाव और क्रेडिट रिस्क-ओ-मीटर को अपडेट करने का पूरा रिकॉर्ड भी रखना होगा.

क्या क्रेडिट रिस्क-ओ-मीटर निवेश की गारंटी है?

सेबी ने स्पष्ट किया है कि क्रेडिट रिस्क-ओ-मीटर केवल डेट सिक्योरिटी से जुड़े क्रेडिट जोखिम को दर्शाता है. इसे निवेश की सलाह या किसी सिक्योरिटी को खरीदने की सिफारिश नहीं माना जाना चाहिए. डेट सिक्योरिटीज में निवेश करते समय क्रेडिट जोखिम के अलावा बाजार में उतार-चढ़ाव और जरूरत पड़ने पर निवेश को आसानी से बेच पाने यानी लिक्विडिटी से जुड़े जोखिम भी हो सकते हैं. इसलिए केवल रंग या क्रेडिट रेटिंग देखकर निवेश का फैसला करना पर्याप्त नहीं है. निवेशकों को संबंधित सिक्योरिटी की शर्तों और अन्य जोखिमों को भी समझना चाहिए.