नौवीं अनुसूची पर उठे सवाल: "कानूनी है, लेकिन जवाबदेह नहीं", 75 साल बाद पहले संविधान संशोधन की समीक्षा

पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश, एएसजी समेत पैनल के सदस्यों ने बेंगलुरु में आयोजित गोलमेज चर्चा में 1951 के उस संशोधन पर विचार किया, जिसने कानूनों को न्यायिक समीक्षा से सुरक्षा प्रदान की थी.

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Tuesday, 21 July, 2026
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भारत के संविधान में पहला संशोधन किए जाने के 75 साल बाद, शनिवार को कर्नाटक के कुछ प्रमुख कानूनी विशेषज्ञ यहां एक असहज सवाल पर विचार करने के लिए एकत्र हुए: क्या संविधान में किए गए पहले ही बदलाव ने ऐसे कानूनों के लिए रास्ता खोल दिया, जिनका जवाब किसी अदालत के प्रति नहीं है?

संविधान (प्रथम संशोधन) अधिनियम, 1951 के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित गोलमेज चर्चा का आयोजन जैन पीयू कॉलेज, वी.वी. पुरम में किया गया. इसमें सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति संतोष हेगड़े, कर्नाटक हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए.वी. चंद्रशेखर, भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अरविंद कामथ और वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीधर पोताराजू, के.जी. राघवन, उदय होला, जयना कोठारी और ए.पी.एस. अहलूवालिया समेत कई अन्य न्यायविद शामिल हुए.

ज्योत और गीतार्थ गंगा द्वारा जैन (डीम्ड-टू-बी यूनिवर्सिटी) तथा एडवोकेट्स एसोसिएशन ऑफ बैंगलोर के सहयोग से आयोजित यह चर्चा ‘वसुधैव कुटुम्बकम की ओर 5.0 कॉन्क्लेव सीरीज’ के पहले लीगल प्रीकर्सर सत्र के रूप में आयोजित की गई.

संविधान लागू होने के 16 महीने के भीतर लागू किए गए पहले संशोधन के जरिए अनुच्छेद 31A और 31B जोड़े गए और नौवीं अनुसूची बनाई गई, एक ऐसा संवैधानिक सुरक्षा कवच, जिसमें ऐसे कानून रखे जा सकते थे, जिन्हें न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर रखा जा सके. पैनल के सदस्यों ने कहा कि यही व्यवस्था इस संशोधन की सबसे अधिक विवादित विरासत बनी हुई है.

वरिष्ठ अधिवक्ता उदय होला ने कहा, "एक बार जब आप किसी कानून को नौवीं अनुसूची में डाल देते हैं, तो अदालतें उसे छू नहीं सकतीं, भले ही वह अमान्य हो. यह पूरी तरह असंवैधानिक है. यही कारण है कि आई.आर. कोएल्हो मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि कोई प्रावधान मूल संरचना का उल्लंघन करता है, तो अदालतों के पास अब भी उसकी समीक्षा करने का अधिकार है और मुझे लगता है कि यही सही दृष्टिकोण है."

कामथ ने इस समस्या को कानून और न्याय के बीच टूटन के रूप में पेश किया. उन्होंने कहा, "कोई व्यवस्था पूरी तरह कानूनी हो सकती है, लेकिन वह न्यायसंगत होने में विफल हो सकती है. नौवीं अनुसूची ने ऐसा स्थान बनाया, जिसमें यदि कोई कानून डाल दिया जाए तो उसे खुद को समझाने की जरूरत नहीं होती. यह कानूनी है, लेकिन जवाबदेह नहीं है." संस्कृत व्याकरणाचार्य पाणिनि के सूत्र ध्रुवमपाये अपादानम् का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा, "किसी गतिशील वस्तु का वर्णन करने के लिए आपको ऐसी चीज की जरूरत होती है जो गतिहीन हो. किसी चीज के गति करने को निर्धारित करने के लिए एक स्थिर बिंदु आवश्यक होता है."

यह सत्र जैनाचार्य युगभूषणसूरी जी महाराज, जो तीर्थंकर श्री महावीर स्वामी के 79वें उत्तराधिकारी हैं, के मार्गदर्शन में आयोजित किया गया. उन्होंने 1951 की बहसों को व्यापक सभ्यतागत न्यायशास्त्र के संदर्भ में रखा. उन्होंने कहा, "शासन का उद्देश्य न्याय और सुरक्षा प्रदान करना है. इसलिए शासकीय प्राधिकरण को यह जिम्मेदारी निभाने के लिए शक्ति दी जाती है. पूर्ण शक्ति इस सिद्धांत का मूल रूप से विरोध करती है; यह अनैतिकता और अन्याय को बढ़ावा देती है."

चर्चाओं के साथ-साथ संविधान, प्रथम संशोधन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर आधारित एक इंटरैक्टिव प्रदर्शनी भी लगाई गई, जिसमें "व्हाट इफ एआई वेयर द कॉन्स्टिट्यूशन" शीर्षक वाला प्रदर्शन भी शामिल था. इस प्रदर्शनी ने छात्रों और कानूनी पेशेवरों का काफी ध्यान आकर्षित किया.

यह श्रृंखला जनवरी 2027 में आयोजित होने वाले ‘वसुधैव कुटुम्बकम की ओर 5.0 मेन कॉन्क्लेव, ध्रुव तत्वम्, टाइमलेस प्रिंसिपल्स’ की ओर अग्रसर है. अगला प्रीकर्सर सत्र आर्थिक क्षेत्र पर केंद्रित होगा, जो 8–9 अगस्त 2026 को आयोजित किया जाएगा. इसमें एस. गुरुमूर्ति, शौर्य डोभाल और सचिन चतुर्वेदी समेत अन्य विशेषज्ञ शामिल होंगे.
 


NPCIL और ECIL की साझेदारी, भारत में विकसित होंगी स्वदेशी परमाणु तकनीकें

परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को मजबूती देने के लिए दोनों कंपनियों ने किया MoU पर हस्ताक्षर, कंट्रोल एंड इंस्ट्रूमेंटेशन सिस्टम से लेकर साइबर सिक्योरिटी समाधान तक विकसित किए जाएंगे.

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Tuesday, 21 July, 2026
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भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) और इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ECIL) ने दीर्घकालिक तकनीकी साझेदारी के लिए समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं. इस साझेदारी के तहत दोनों कंपनियां मौजूदा और आगामी परमाणु रिएक्टरों के लिए स्वदेशी तकनीकों का संयुक्त रूप से विकास करेंगी.

दोनों संस्थान परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) के अंतर्गत आते हैं. इस सहयोग का उद्देश्य भारत की परमाणु ऊर्जा क्षमता के विस्तार के साथ-साथ महत्वपूर्ण तकनीकों में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना है.

स्वदेशी परमाणु तकनीकों के विकास पर जोर

इस साझेदारी के तहत परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के लिए स्वदेशी कंट्रोल एंड इंस्ट्रूमेंटेशन (C&I) सिस्टम, कंप्यूटर आधारित सिस्टम, न्यूक्लियर इंस्ट्रूमेंटेशन, ट्रेनिंग सिमुलेटर, साइबर सिक्योरिटी समाधान और अन्य उन्नत तकनीकों को विकसित किया जाएगा.

इसके अलावा, यह सहयोग मौजूदा परमाणु रिएक्टरों के लिए लंबे समय तक लाइफसाइकिल सपोर्ट उपलब्ध कराने, पुरानी हो रही तकनीकों के समाधान और परमाणु बेड़े में महत्वपूर्ण प्रणालियों के मानकीकरण में भी मदद करेगा.

आयात पर निर्भरता कम करने की पहल

NPCIL और ECIL की यह साझेदारी भारत के परमाणु बुनियादी ढांचे में इस्तेमाल होने वाली महत्वपूर्ण प्रणालियों के लिए विदेशी तकनीकों पर निर्भरता कम करने में अहम भूमिका निभाएगी.

स्वदेशी तकनीकों के विकास और उन्हें वर्तमान व भविष्य की परमाणु परियोजनाओं में लागू करने से भारत का घरेलू परमाणु तकनीकी इकोसिस्टम मजबूत होगा. यह पहल देश की परमाणु ऊर्जा क्षमता बढ़ाने और एक मजबूत व सुरक्षित ऊर्जा व्यवस्था तैयार करने के व्यापक लक्ष्य के अनुरूप है.


अब बिना इंटरनेट भी होगा UPI पेमेंट, NPCI ला रहा NFC आधारित 'Tap-to-Pay' फीचर

रिपोर्ट के अनुसार, ऑफलाइन UPI भुगतान स्वीकार करने के लिए POS टर्मिनल बनाने वाली कंपनियों को NPCI से सर्टिफिकेशन लेना होगा.

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Tuesday, 21 July, 2026
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भारत का डिजिटल पेमेंट सिस्टम एक और बड़ा कदम उठाने जा रहा है. दरअसल, नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ऐसी UPI सुविधा विकसित कर रहा है, जिससे इंटरनेट उपलब्ध न होने पर भी भुगतान किया जा सकेगा. नई व्यवस्था के तहत NFC (Near Field Communication) तकनीक की मदद से यूजर्स ऑफलाइन पॉइंट ऑफ सेल (POS) टर्मिनल पर फोन टैप कर ₹2,000 तक का भुगतान कर सकेंगे.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, NPCI इस साल प्रमुख POS टर्मिनल निर्माता कंपनियों के डिवाइस का सर्टिफिकेशन शुरू कर सकता है. इसके बाद व्यापारी ऑफलाइन UPI भुगतान स्वीकार कर सकेंगे. यह सुविधा खासतौर पर हवाई जहाज, भूमिगत मेट्रो और कमजोर नेटवर्क वाले क्षेत्रों में उपयोगी होगी, जहां इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध नहीं होती.

कैसे करेगा काम?

इस सुविधा का इस्तेमाल करने के लिए ग्राहकों को पहले इंटरनेट उपलब्ध होने पर अपने UPI Lite वॉलेट में रकम लोड करनी होगी. इसके बाद NFC-इनेबल्ड स्मार्टफोन को POS मशीन पर टैप करते ही भुगतान हो जाएगा. ऑफलाइन ट्रांजैक्शन के लिए UPI PIN दर्ज करने की भी जरूरत नहीं होगी. POS टर्मिनल भुगतान की जानकारी अपने सिस्टम में सुरक्षित रखेगा और जैसे ही नेटवर्क उपलब्ध होगा, ट्रांजैक्शन को वेरिफिकेशन के लिए सर्वर पर भेज देगा.

POS कंपनियों को लेना होगा NPCI का सर्टिफिकेशन

रिपोर्ट के अनुसार, ऑफलाइन UPI भुगतान स्वीकार करने के लिए POS टर्मिनल बनाने वाली कंपनियों को NPCI से सर्टिफिकेशन लेना होगा. सर्टिफिकेशन मिलने के बाद कंपनियां अपने डिवाइस में इस फीचर को सक्षम कर सकेंगी. वहीं, बैंक और थर्ड-पार्टी UPI ऐप प्रदाता भी अपने ऐप में इस सुविधा को जोड़ने पर काम कर रहे हैं.

UPI Lite X का होगा विस्तार

NPCI ने सितंबर 2023 में UPI Lite X लॉन्च किया था, जिससे दो NFC-सक्षम स्मार्टफोन के बीच ऑफलाइन भुगतान संभव हुआ था. अब नए फीचर के जरिए इसी तकनीक को पहली बार POS टर्मिनलों तक विस्तारित किया जा रहा है. इससे व्यापारी भी बिना इंटरनेट के UPI भुगतान स्वीकार कर सकेंगे.

कार्ड पेमेंट का मजबूत विकल्प बनेगा UPI

विशेषज्ञों का मानना है कि यह सुविधा कार्ड आधारित 'टैप-टू-पे' और UPI के बीच मौजूद अंतर को काफी हद तक खत्म कर देगी. एयरलाइंस और अन्य ऑफलाइन वातावरण में जहां कार्ड पेमेंट का इस्तेमाल होता है, वहां अब UPI भी एक मजबूत विकल्प बनकर उभरेगा.

जून में रिकॉर्ड UPI ट्रांजैक्शन

NPCI के आंकड़ों के अनुसार, जून 2026 में UPI के जरिए 22.72 अरब ट्रांजैक्शन हुए, जिनका कुल मूल्य 28.92 लाख करोड़ रुपये रहा. ऐसे में ऑफलाइन UPI पेमेंट की शुरुआत डिजिटल भुगतान को और अधिक व्यापक बनाने की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है.
 


CDSL की साइबर सुरक्षा में बड़ी चूक, SEBI ने ठोका ₹1 करोड़ का जुर्माना

जांच में पता चला कि सुरक्षा व्यवस्था में लापरवाही के कारण हमलावर करीब एक साल तक सिस्टम में मौजूद रहे और इससे शेयर बाजार की अहम सेवाएं कई घंटों तक प्रभावित हुईं.

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Tuesday, 21 July, 2026
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सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) ने साइबर सुरक्षा में गंभीर लापरवाही बरतने के मामले में सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विसेज (CDSL) पर ₹1 करोड़ का जुर्माना लगाया है. यह कार्रवाई नवंबर 2022 में हुए मालवेयर हमले की जांच के बाद की गई है. SEBI के मुताबिक, CDSL की साइबर सुरक्षा व्यवस्था में कई अहम कमियां थीं, जिनकी वजह से यह हमला इतना व्यापक असर डाल सका.

SEBI के आदेश के अनुसार, मालवेयर हमले के कारण CDSL की कई महत्वपूर्ण सेवाएं लंबे समय तक बाधित रहीं. सेटलमेंट प्रक्रिया करीब 46 घंटे तक प्रभावित रही, जबकि इंटर-डिपॉजिटरी ट्रांसफर सिस्टम लगभग 54.5 घंटे तक ठप रहा. रेगुलेटर ने कहा कि इस घटना का असर केवल CDSL तक सीमित नहीं था, बल्कि इससे पूरे सिक्योरिटीज बाजार के संचालन पर असर पड़ा.

एक साल तक सिस्टम में मौजूद रहे हमलावर

जांच में सामने आया कि साइबर हमला अचानक नहीं हुआ था. SEBI के अनुसार, नवंबर 2021 में ही हमलावर CDSL के सर्वर तक पहुंच बनाने में सफल हो गए थे, लेकिन इस घुसपैठ का पता नवंबर 2022 में चला. यानी करीब एक साल तक सिस्टम में सेंध लगी रही और इसकी जानकारी तक नहीं हो सकी. रेगुलेटर ने यह भी कहा कि समय-समय पर साइबर सुरक्षा नियमों में दी गई छूट, लागू न किए गए नियामकीय निर्देश और जरूरी सुरक्षा उपायों की अनदेखी ने इस हमले की जमीन तैयार की.

जांच में सामने आईं कई गंभीर खामियां

SEBI की जांच में यह भी पाया गया कि CDSL ने 2021 में एक एडमिन अकाउंट बनाया था, जिसका पासवर्ड कभी एक्सपायर न होने के लिए सेट किया गया था. इसके अलावा, लगातार तीन बार गलत पासवर्ड दर्ज होने पर अकाउंट लॉक करने जैसी बुनियादी सुरक्षा व्यवस्था भी लागू नहीं की गई थी.

रेगुलेटर के मुताबिक, इन कमियों को मालवेयर हमले के बाद जाकर दूर किया गया. SEBI ने अपने आदेश में कहा कि डिपॉजिटरी सिस्टम एक-दूसरे से जुड़े होते हैं, इसलिए किसी एक संस्थान की साइबर सुरक्षा में कमजोरी पूरे शेयर बाजार के लिए बड़ा जोखिम पैदा कर सकती है. इसी को देखते हुए CDSL पर ₹1 करोड़ का जुर्माना लगाया गया है.
 


पश्चिम एशिया तनाव से बढ़ा दबाव, आज इन बड़े ट्रिगर्स पर रहेगी बाजार की नजर

सोमवार को BSE सेंसेक्स 442.93 अंक (0.57%) की गिरावट के साथ 77,708.52 पर बंद हुआ. वहीं, NSE निफ्टी 95.80 अंक (0.39%) फिसलकर 24,238.50 के स्तर पर आ गया.

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Tuesday, 21 July, 2026
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भारतीय शेयर बाजार की शुरुआत आज कई अहम घरेलू और वैश्विक संकेतों के बीच होने जा रही है. सोमवार को पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के दबाव में सेंसेक्स और निफ्टी गिरावट के साथ बंद हुए थे. ऐसे में आज निवेशकों की नजर वैश्विक बाजारों के रुख, कच्चे तेल की चाल, विदेशी निवेशकों की गतिविधियों, कॉर्पोरेट घोषणाओं और वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के नतीजों पर रहेगी, जो पूरे दिन बाजार की दिशा तय कर सकते हैं.

घरेलू शेयर बाजार पर दिखा भू-राजनीतिक तनाव का असर

सोमवार को पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर घरेलू शेयर बाजार पर साफ दिखाई दिया. कारोबार के दौरान बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स 600 अंक से ज्यादा टूट गया था, जबकि अंत में 442.93 अंक (0.57%) की गिरावट के साथ 77,708.52 पर बंद हुआ. वहीं, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी 95.80 अंक (0.39%) फिसलकर 24,238.50 के स्तर पर आ गया. डॉलर के मुकाबले रुपया भी 14 पैसे कमजोर होकर 96.44 पर बंद हुआ.

बैंकिंग शेयरों ने बढ़ाया दबाव

सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 11 गिरावट के साथ बंद हुए. सबसे ज्यादा दबाव बैंकिंग शेयरों में देखने को मिला. Axis Bank और HDFC Bank के शेयर 5 फीसदी से ज्यादा टूट गए. इसके अलावा Maruti Suzuki, Kotak Mahindra Bank, Infosys और TCS में भी गिरावट दर्ज की गई.

वहीं दूसरी ओर Trent, Power Grid, NTPC, Bharti Airtel, SBI, UltraTech Cement, ICICI Bank, HCLTech, Sun Pharma और ITC जैसे शेयरों में खरीदारी देखने को मिली.

ब्रॉडर मार्केट ने दिखाया दम

मुख्य सूचकांकों में गिरावट के बावजूद व्यापक बाजार अपेक्षाकृत मजबूत रहा. निफ्टी मिडकैप 0.60 फीसदी और निफ्टी स्मॉलकैप 0.16 फीसदी की बढ़त के साथ बंद हुए. सेक्टोरल इंडेक्स में निफ्टी प्राइवेट बैंक और निफ्टी फाइनेंशियल सर्विसेज सबसे ज्यादा दबाव में रहे, जबकि निफ्टी फार्मा और निफ्टी PSU बैंक में अच्छी तेजी दर्ज की गई.

आज इन शेयरों पर रहेगी खास नजर

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आज के कारोबार में InterGlobe Aviation (IndiGo), Redington, Ashiana Housing, Wanbury, Sammaan Capital, Gandhar Oil Refinery, Horizon Reclaim, Sterling Holiday Resorts और Shapoorji Pallonji Group से जुड़े कॉर्पोरेट अपडेट निवेशकों का ध्यान आकर्षित कर सकते हैं.

इसके अलावा Bajaj Auto, Bandhan Bank, JSW Infrastructure, Mahindra & Mahindra Financial Services, Adani Energy Solutions, Adani Total Gas, Indian Hotels, CRISIL, TVS Motor और कई अन्य कंपनियां आज पहली तिमाही (Q1 FY27) के नतीजे जारी करेंगी, जिनका असर संबंधित शेयरों के साथ-साथ पूरे बाजार के रुख पर भी देखने को मिल सकता है.

कच्चे तेल और वैश्विक संकेतों पर नजर

पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच ब्रेंट क्रूड 88 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है. यदि कच्चे तेल में तेजी और भू-राजनीतिक तनाव बरकरार रहता है, तो इसका असर आज भी भारतीय शेयर बाजार की चाल पर पड़ सकता है. ऐसे में निवेशकों की नजर वैश्विक बाजारों, कच्चे तेल की कीमतों और विदेशी निवेशकों की गतिविधियों पर भी रहेगी.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)


LTCG Tax पर सरकार का बड़ा अपडेट, शेयर निवेशकों को नहीं मिलेगी राहत; टैक्स हटाने का कोई प्रस्ताव नहीं

सरकार को इक्विटी ट्रांजैक्शन पर LTCG टैक्स से बड़ी आय हुई है. वित्त वर्ष 2023-24 से जुड़े असेसमेंट ईयर 2024-25 में LTCG कलेक्शन 72,249 करोड़ रुपये रहा था.

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Monday, 20 July, 2026
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शेयर बाजार में लॉन्ग टर्म निवेश करने वाले निवेशकों को फिलहाल लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) टैक्स से राहत मिलने की उम्मीद नहीं है. सरकार ने साफ कर दिया है कि इक्विटी ट्रांजैक्शन पर लगाए जाने वाले LTCG टैक्स को खत्म करने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है. वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने सोमवार को लोकसभा में इसकी जानकारी दी.

LTCG टैक्स खत्म करने की कोई योजना नहीं

सरकार से पूछा गया था कि क्या रिटेल और घरेलू निवेशकों के लिए LTCG टैक्स को खत्म करने की कोई योजना है, ताकि शेयर बाजार का सेंटीमेंट बेहतर हो सके और घरेलू निवेशकों को राहत मिल सके. इसके जवाब में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने कहा कि ऐसा कोई प्रस्ताव सरकार के पास विचाराधीन नहीं है. उन्होंने बताया कि कैपिटल गेन्स टैक्स समेत टैक्स नीतियों की समय-समय पर समीक्षा की जाती है. यह प्रक्रिया बजट और कानूनी बदलावों के तहत मैक्रो इकोनॉमिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए की जाती है.

दो साल में LTCG से सरकार ने जुटाए 2 लाख करोड़ रुपये

सरकार को इक्विटी ट्रांजैक्शन पर LTCG टैक्स से बड़ी आय हुई है. वित्त वर्ष 2023-24 से जुड़े असेसमेंट ईयर 2024-25 में LTCG कलेक्शन 72,249 करोड़ रुपये रहा था. वहीं, वित्त वर्ष 2024-25 से जुड़े असेसमेंट ईयर 2025-26 में यह बढ़कर 1,29,158 करोड़ रुपये पहुंच गया. यानी इन दो वर्षों में सरकार ने LTCG टैक्स के जरिए करीब 2.01 लाख करोड़ रुपये जुटाए.

इक्विटी निवेश पर 12.5% LTCG टैक्स

लिस्टेड इक्विटी शेयरों और इक्विटी म्यूचुअल फंड पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स की दर फिलहाल 12.5 फीसदी है. यह टैक्स हर वित्त वर्ष में 1.25 लाख रुपये से ज्यादा के लॉन्ग टर्म मुनाफे पर लागू होता है. अगर किसी एसेट को 12 महीने से ज्यादा समय तक रखा जाता है तो उसे लॉन्ग टर्म कैपिटल एसेट माना जाता है.

घरेलू और विदेशी निवेशकों के लिए टैक्स दर समान

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs), घरेलू निवेशकों और रिटेल निवेशकों के लिए इक्विटी निवेश पर LTCG टैक्स की दर समान है. पंकज चौधरी ने कहा कि इक्विटी में निवेश करने वाले FPIs पर भी 12.5 फीसदी LTCG टैक्स लागू है. हालांकि, इनकम टैक्स संशोधन अध्यादेश, 2026 के जरिए केवल सरकारी प्रतिभूतियों (G-Secs) में FPIs के निवेश से जुड़े टैक्स नियमों को तर्कसंगत बनाया गया है. उन्होंने बताया कि ऐसे निवेशों से मिलने वाले ब्याज और कैपिटल गेन को इनकम टैक्स से छूट दी गई है.

निवेशकों ने की थी LTCG और STCG में बदलाव की मांग

शेयर बाजार से जुड़े निवेशक और इंडस्ट्री लंबे समय से LTCG और शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन्स (STCG) टैक्स की समीक्षा की मांग कर रहे हैं. मई में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि सरकार स्टॉक मार्केट निवेशकों की टैक्स से जुड़ी चिंताओं को सुनने के लिए तैयार है. उन्होंने कहा था कि LTCG और STCG टैक्स समेत सभी मुद्दों पर मिले सुझावों पर सरकार विचार करेगी. हालांकि, फिलहाल सरकार ने LTCG टैक्स खत्म करने की किसी भी संभावना से इनकार कर दिया है.
 


भारत के कंज्यूमर सेक्टर में डील गतिविधियां धीमी, लेकिन निवेश मूल्य में बनी मजबूती: रिपोर्ट

रिपोर्ट के अनुसार, सार्वजनिक बाजारों में गतिविधियां भी सीमित रहीं. तिमाही के दौरान केवल एक IPO के जरिए 47 मिलियन डॉलर और एक QIP के जरिए 16 मिलियन डॉलर जुटाए गए.

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Monday, 20 July, 2026
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भारत के कंज्यूमर सेक्टर में अप्रैल-जून 2026 तिमाही के दौरान डील गतिविधियों में गिरावट दर्ज की गई, लेकिन निवेश का कुल मूल्य अब भी मजबूत बना हुआ है. ग्रांट थॉर्नटन भारत की ताजा Consumer Dealtracker रिपोर्ट के अनुसार, इस दौरान सेक्टर में 981 मिलियन डॉलर मूल्य की 97 डील हुईं. पिछली तिमाही की तुलना में डील की संख्या में 34 फीसदी और कुल डील वैल्यू में 33 फीसदी की कमी आई है.

रिपोर्ट के मुताबिक, यह गिरावट निवेशकों के अधिक सतर्क और चयनात्मक रुख को दर्शाती है. हालांकि, रणनीतिक अधिग्रहण और ग्रोथ स्टेज कंपनियों में निवेश जैसे सौदे उन क्षेत्रों में जारी रहे, जहां निवेशकों को मजबूत संभावनाएं नजर आ रही हैं.

कंज्यूमर सेक्टर में बदला निवेश का रुख

आईपीओ और क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट (QIP) को छोड़ दें तो इस सेक्टर में 95 मर्जर एंड एक्विजिशन (M&A) और प्राइवेट इक्विटी/वेंचर कैपिटल (PE/VC) सौदे हुए, जिनकी कुल वैल्यू 918 मिलियन डॉलर रही. यह आंकड़ा 2025 की दूसरी तिमाही के मुकाबले अभी भी बेहतर रहा.

ग्रांट थॉर्नटन भारत के पार्टनर और कंज्यूमर इंडस्ट्री लीडर नवीन मलपानी ने कहा कि भारत के कंज्यूमर सेक्टर में संरचनात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है. अब निवेश पारंपरिक उपभोक्ता श्रेणियों के बजाय विशेष और तेजी से बढ़ने वाले क्षेत्रों की ओर जा रहा है.

उन्होंने कहा कि वेलनेस, प्रीमियम पर्सनल केयर, न्यूट्रिशन और डिजिटल-फर्स्ट कंज्यूमर ब्रांड्स में निवेशकों की दिलचस्पी तेजी से बढ़ रही है, क्योंकि बदलती उपभोक्ता पसंद नए अवसर पैदा कर रही है.

FMCG, टेक्सटाइल और ई-कॉमर्स में सबसे ज्यादा डील

रिपोर्ट के अनुसार, फास्ट मूविंग कंज्यूमर फूड्स (FMCG), टेक्सटाइल एवं अपैरल और ई-कॉमर्स सेक्टर ने मिलकर PE/VC डील की कुल संख्या में 44 फीसदी योगदान दिया.

इसके अलावा फूड प्रोसेसिंग सेक्टर में 172 मिलियन डॉलर का निवेश हुआ, जिसने तिमाही के दौरान डील गतिविधियों में अहम योगदान दिया.

निवेशकों का फोकस चुनिंदा मजबूत अवसरों पर रहा. शीर्ष पांच M&A डील्स ने कुल M&A वैल्यू में 64 फीसदी योगदान दिया, जबकि टॉप पांच PE/VC निवेशों की हिस्सेदारी कुल PE/VC वैल्यू में 54 फीसदी रही.

M&A गतिविधियों में आई गिरावट

रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल-जून तिमाही में M&A गतिविधियों में कमी आई. इस दौरान 184 मिलियन डॉलर मूल्य की 20 डील हुईं. पिछली तिमाही की तुलना में डील संख्या और वैल्यू दोनों में करीब आधी गिरावट दर्ज की गई.

इसकी मुख्य वजह बड़ी रणनीतिक अधिग्रहण डील्स की अनुपस्थिति रही. घरेलू सौदों का दबदबा कायम रहा. कुल M&A डील्स में घरेलू लेनदेन की हिस्सेदारी 65 फीसदी रही, जबकि कुल डील वैल्यू में इनका योगदान 58 फीसदी रहा.

वहीं, विदेशी कंपनियों की ओर से भारत में किए जाने वाले इनबाउंड M&A सौदों में तेजी आई. इनकी संख्या दोगुनी हुई, जबकि डील वैल्यू में करीब पांच गुना बढ़ोतरी दर्ज की गई.

Emami ने IncNut Digital में खरीदी 60% हिस्सेदारी

रिपोर्ट के अनुसार, रणनीतिक अधिग्रहणों का फोकस बाजार हिस्सेदारी मजबूत करने, प्रोडक्ट पोर्टफोलियो बढ़ाने और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क को बेहतर बनाने पर रहा. तिमाही की सबसे बड़ी M&A डील Emami द्वारा की गई, जिसमें कंपनी ने IncNut Digital (Vedix और Skinkraft ब्रांड्स) में 60 फीसदी हिस्सेदारी 34 मिलियन डॉलर में खरीदी.

PE/VC निवेश रहा डील गतिविधियों का मुख्य आधार

कंज्यूमर सेक्टर में PE/VC निवेश गतिविधियां सबसे बड़ा आधार बनी रहीं. तिमाही के दौरान 734 मिलियन डॉलर मूल्य की 75 PE/VC डील हुईं, जिनका योगदान कुल डील संख्या और वैल्यू दोनों में करीब 80 फीसदी रहा. हालांकि पिछली तिमाही की तुलना में फंडिंग गतिविधियों में कमी आई, लेकिन निवेश मूल्य 2025 की दूसरी तिमाही के स्तर से ऊपर बना रहा.

इस तिमाही की सबसे बड़ी PE डील Advent International का Iscon Balaji Foods में 150 मिलियन डॉलर का निवेश रहा.

IPO और QIP गतिविधियां रहीं कमजोर

रिपोर्ट के अनुसार, सार्वजनिक बाजारों में गतिविधियां भी सीमित रहीं. तिमाही के दौरान केवल एक IPO के जरिए 47 मिलियन डॉलर और एक QIP के जरिए 16 मिलियन डॉलर जुटाए गए. कुल मिलाकर, रिपोर्ट बताती है कि भारतीय कंज्यूमर सेक्टर में निवेश की रफ्तार भले ही धीमी हुई है, लेकिन निवेशकों का भरोसा अब भी मजबूत है. खासतौर पर प्रीमियम, डिजिटल और विशेष उपभोक्ता श्रेणियों में पूंजी का प्रवाह जारी रहने की उम्मीद है.
 


बैंकों का क्रेडिट बूम जारी, लेकिन डिपॉजिट ग्रोथ धीमी; SBI रिपोर्ट में सामने आए बड़े कारण

SBI Research की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2023 से ही बैंकों का कर्ज जमा की तुलना में तेज गति से बढ़ रहा है. इससे बैंकों पर फंड जुटाने का दबाव बढ़ा है.

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Monday, 20 July, 2026
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कोविड के बाद भारतीय बैंकों में कर्ज की मांग तेजी से बढ़ी है, लेकिन जमा की रफ्तार इसके मुकाबले धीमी बनी हुई है. SBI Research की रिपोर्ट के मुताबिक जून 2026 तक बैंक क्रेडिट ग्रोथ 18.6 फीसदी रही, जबकि डिपॉजिट ग्रोथ 13.3 फीसदी दर्ज की गई, यानी कर्ज और जमा की वृद्धि दर के बीच अंतर बढ़कर 5.3 फीसदी हो गया है. रिपोर्ट में इसके पीछे बदलती बचत आदतों, निवेश के नए विकल्पों और बढ़ती कारोबारी जरूरतों को प्रमुख कारण बताया गया है.

FY23 से लगातार बढ़ रहा है कर्ज और जमा का अंतर

SBI Research की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2023 से ही बैंकों का कर्ज जमा की तुलना में तेज गति से बढ़ रहा है. इससे बैंकों पर फंड जुटाने का दबाव बढ़ा है. अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए बैंक अब पारंपरिक जमा के अलावा अन्य स्रोतों से भी धन जुटा रहे हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, यह स्थिति केवल ब्याज दरों में बदलाव का नतीजा नहीं है, बल्कि पश्चिम एशिया में तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध, सप्लाई चेन में व्यवधान और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव जैसे वैश्विक कारक भी इसमें अहम भूमिका निभा रहे हैं.

बैंक जमा में आए तीन बड़े बदलाव

SBI Research ने कोविड के बाद बैंक जमा के व्यवहार में तीन बड़े बदलावों की पहचान की है.

1. ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों से बढ़ रही जमा: रिपोर्ट के अनुसार, अब बड़े शहरों की तुलना में ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों से बैंक जमा में ज्यादा योगदान आ रहा है. इसके पीछे महिलाओं पर केंद्रित सरकारी योजनाएं, ग्रामीण आय में सुधार और गांवों तक बैंकिंग सेवाओं की बेहतर पहुंच को वजह बताया गया है. वहीं, शहरी क्षेत्रों में लोग पारंपरिक बैंक जमा के बजाय म्यूचुअल फंड और शेयर बाजार जैसे निवेश विकल्पों को ज्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं.

2. बदल रही है लोगों की बचत की आदत: रिपोर्ट में कहा गया है कि घरेलू बचत का एक हिस्सा अब बैंक खातों से निकलकर म्यूचुअल फंड और अन्य निवेश साधनों में जा रहा है. दूसरी ओर, कंपनियों और वित्तीय संस्थानों की बैंक जमा में हिस्सेदारी बढ़ रही है.

3. सेविंग अकाउंट की जगह FD को प्राथमिकता: लोग अब बचत खातों की तुलना में फिक्स्ड डिपॉजिट में ज्यादा पैसा जमा कर रहे हैं. खासकर एक से तीन साल की अवधि वाली एफडी में तेजी देखी गई है, क्योंकि इस अवधि में बैंकों ने आकर्षक ब्याज दरों की पेशकश की है.

कर्ज बढ़ने की तीन प्रमुख वजहें

SBI Research के मुताबिक, कर्ज वृद्धि के पीछे भी तीन बड़े कारण हैं.

1. उद्योग और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में बढ़ी मांग: पहले व्यक्तिगत कर्ज तेजी से बढ़ रहे थे, लेकिन RBI की सख्ती के बाद अब उद्योग, इंफ्रास्ट्रक्चर और कारोबार से जुड़े कर्ज में तेजी आई है.

2. कंपनियों की बढ़ी वर्किंग कैपिटल जरूरत: कंपनियां अब नकदी जरूरतों को पूरा करने के लिए ज्यादा वर्किंग कैपिटल लोन ले रही हैं. कैश क्रेडिट, ओवरड्राफ्ट और एक्सपोर्ट क्रेडिट जैसी सुविधाओं की मांग बढ़ी है. रिपोर्ट के अनुसार, इसकी वजह सप्लाई चेन की चुनौतियां और बढ़ती लागत भी हैं.

3. गोल्ड लोन और क्रेडिट कार्ड की बढ़ती हिस्सेदारी: व्यक्तिगत कर्ज में गोल्ड लोन और क्रेडिट कार्ड की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है. वहीं होम लोन की हिस्सेदारी पहले के मुकाबले कम हुई है. रिपोर्ट के अनुसार, नए टैक्स सिस्टम के चलते कुछ लोग होम लोन जल्दी चुका रहे हैं और कुछ ग्राहक NBFC की ओर भी रुख कर रहे हैं.

इन सेक्टरों में सबसे ज्यादा बढ़ा बैंक कर्ज

सेक्टर                कर्ज में हिस्सेदारी 
इंफ्रास्ट्रक्चर                     24.1%               
केमिकल                        20.8%               
वाहन एवं ऑटो पार्ट्स      13.3%               
इंजीनियरिंग                   11.6%               
फूड प्रोसेसिंग                  8.1%                
बेसिक मेटल                   6.9%                
सीमेंट                            5.7%                

अप्रैल और मई 2026 के दौरान उद्योग और व्यक्तिगत कर्ज ने कुल नई क्रेडिट ग्रोथ में करीब 75 फीसदी योगदान दिया. उद्योगों में सबसे ज्यादा कर्ज इंफ्रास्ट्रक्चर, केमिकल, वाहन एवं ऑटो पार्ट्स और इंजीनियरिंग सेक्टर को मिला. वहीं व्यक्तिगत कर्ज में गोल्ड लोन का योगदान सबसे अधिक रहा.

आगे भी मजबूत रह सकती है क्रेडिट ग्रोथ

SBI Research का अनुमान है कि अगर वैश्विक अनिश्चितताएं और बाहरी झटके जारी रहते हैं तो कर्ज और जमा वृद्धि के बीच अंतर कुछ समय तक बना रह सकता है. हालांकि, FCNR(B) जमा में बढ़ोतरी से डिपॉजिट ग्रोथ को समर्थन मिलने की उम्मीद है. रिपोर्ट के अनुसार, मजबूत पूंजी आधार, कम NPA और बेहतर बैलेंस शीट के चलते भारतीय बैंक फिलहाल मजबूत स्थिति में हैं और वित्त वर्ष 2027 में भी क्रेडिट ग्रोथ के बेहतर बने रहने की संभावना है.
 


जब इंटरनेट हो जाए बंद, तब भारत के हमेशा ऑनलाइन रहने वाले ब्रांड्स पर क्या असर पड़ता है?

केंद्रीय दिल्ली के कुछ हिस्सों में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बाधित होने की रिपोर्टों ने मार्केटर्स के सामने एक बार फिर एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है. अगर उपभोक्ता अचानक ऑफलाइन हो जाएं, तो हमेशा ऑनलाइन रहने वाली डिजिटल अर्थव्यवस्था का क्या होता है?

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Monday, 20 July, 2026
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भारत की आधुनिक उपभोक्ता अर्थव्यवस्था लगातार इंटरनेट कनेक्टिविटी पर आधारित है. विज्ञापन, डिजिटल भुगतान, फूड डिलीवरी, मोबिलिटी, ई-कॉमर्स, क्विक कॉमर्स और ग्राहक सेवाएं, ये सभी इस धारणा पर निर्भर हैं कि उपभोक्ता और व्यवसाय लगातार ऑनलाइन बने रहेंगे.

इस धारणा की एक बार फिर 20 जुलाई को परीक्षा हुई, जब "चलो संसद" विरोध मार्च के दौरान केंद्रीय दिल्ली के कुछ हिस्सों में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बाधित होने की खबरें सामने आईं. इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन ने सोशल मीडिया पोस्ट में मोबाइल इंटरनेट सेवाओं के निलंबन की निंदा की और कहा कि उसके बयान जारी करने तक कोई आधिकारिक निलंबन आदेश सार्वजनिक नहीं किया गया था. प्रदर्शन के आयोजकों ने भी कनेक्टिविटी बाधित होने का आरोप लगाया, जबकि केंद्रीय दिल्ली के कुछ इलाकों में सुरक्षा बढ़ाने, यातायात प्रतिबंध और कुछ मेट्रो स्टेशनों के अस्थायी रूप से बंद किए जाने की भी खबरें आईं.

हालांकि, मार्केटर्स के लिए बड़ा सवाल तत्काल राजनीतिक घटनाक्रम से कहीं आगे का है. इंटरनेट अब केवल एक और मीडिया चैनल नहीं रह गया है. यह अब वह बुनियादी ढांचा बन चुका है जो उपभोक्ता तक पहुंच, विज्ञापन, लेनदेन, डिलीवरी और ग्राहक जुड़ाव को आपस में जोड़ता है.

ऐसे में किसी एक भौगोलिक क्षेत्र में इंटरनेट कनेक्टिविटी बाधित होने का असर केवल विज्ञापन देखने वालों की संख्या तक सीमित नहीं रहता.

जब कनेक्टिविटी बन जाती है कारोबारी जोखिम

परफॉर्मेंस मार्केटिंग अभियान अचानक अपने लक्षित उपभोक्ताओं तक पहुंचने में विफल हो सकते हैं. उपभोक्ता ऑफर्स का जवाब नहीं दे पाते, विज्ञापनों पर क्लिक नहीं कर पाते और खरीदारी पूरी नहीं कर पाते. लोकेशन-आधारित विज्ञापनों की उपयोगिता कम हो सकती है. डिजिटल-फर्स्ट कंपनियों की वेबसाइट या ऐप पर ट्रैफिक अचानक घट सकता है, जबकि इसकी वजह उपभोक्ता मांग में कमी नहीं बल्कि इंटरनेट ढांचे में आई बाधा होती है. इससे प्रदर्शन के आकलन की चुनौती भी पैदा होती है.

आज अधिकांश मार्केटिंग टीमें रियल-टाइम में अपने अभियानों के प्रदर्शन की निगरानी करती हैं. लेकिन यदि किसी बाजार में अस्थायी रूप से इंटरनेट सेवाएं बंद हो जाएं, तो घटती ग्राहक सहभागिता को गलत तरीके से उपभोक्ता व्यवहार में बदलाव मान लिया जा सकता है, जब तक कि प्लेटफॉर्म और मार्केटर्स वास्तविक कारण की पहचान न कर लें.

इसका असर ई-कॉमर्स और डिजिटल कारोबार पर और भी सीधे तौर पर पड़ता है.

इंटरनेट कनेक्टिविटी न होने पर उपभोक्ता न तो ऑर्डर कर सकता है और न ही डिजिटल भुगतान कर सकता है. डिलीवरी पार्टनर और मोबिलिटी सेवाओं से जुड़े कर्मचारी बुकिंग या नेविगेशन निर्देश प्राप्त करने में कठिनाई का सामना कर सकते हैं. डिजिटल भुगतान पर निर्भर व्यापारी अपने ग्राहकों तक पहुंच खो सकते हैं.

भारत में इंटरनेट शटडाउन का व्यापक अनुभव इस चिंता को केवल एक काल्पनिक स्थिति नहीं रहने देता. Access Now के अनुसार, वर्ष 2023 में भारत में कम-से-कम 116 इंटरनेट शटडाउन दर्ज किए गए, जिनमें अधिकांश मामलों में केवल मोबाइल नेटवर्क को निशाना बनाया गया. संगठन लगातार यह तर्क देता रहा है कि ऐसे शटडाउन केवल संचार को ही नहीं, बल्कि लोगों की आजीविका और व्यावसायिक गतिविधियों को भी प्रभावित करते हैं.

इसका एक ब्रांड सेफ्टी से जुड़ा पहलू भी है.

ब्रांड सेफ्टी और बिजनेस कंटिन्यूटी का नया सवाल

इंटरनेट शटडाउन अक्सर विरोध-प्रदर्शनों, सुरक्षा संबंधी घटनाओं या सार्वजनिक तनाव के दौर में होते हैं. लेकिन आज अधिकांश ब्रांड कम्युनिकेशन स्वचालित (ऑटोमेटेड) हो चुके हैं. ऐसे में प्रमोशनल पोस्ट, पुश नोटिफिकेशन और लोकेशन-आधारित अभियान बिना मौजूदा परिस्थितियों को समझे जारी रह सकते हैं.

इससे ब्रांड्स के सामने बिजनेस कंटिन्यूटी से जुड़ा एक नया सवाल खड़ा होता है. क्या अब संकट प्रबंधन (क्राइसिस प्रोटोकॉल) में इंटरनेट कनेक्टिविटी बाधित होने की पहचान करने और स्वचालित संचार को रोकने या दूसरी दिशा में मोड़ने की क्षमता भी शामिल होनी चाहिए?

केंद्रीय दिल्ली में इंटरनेट सेवाओं के बाधित होने की रिपोर्ट वाला घटनाक्रम अभी भी विकसित हो रहा है और किसी भी संभावित निलंबन की वास्तविक सीमा तथा उसके आधिकारिक आधार की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है. लेकिन मार्केटिंग जगत के लिए इससे जुड़ा बड़ा सवाल बिल्कुल स्पष्ट है.

भारत दुनिया की सबसे बड़ी डिजिटल रूप से जुड़ी उपभोक्ता अर्थव्यवस्थाओं में से एक का निर्माण कर रहा है. जैसे-जैसे यह निर्भरता बढ़ेगी, इंटरनेट शटडाउन केवल संचार सेवाओं में बाधा नहीं रहेगा, बल्कि पूरे उपभोक्ता सफर (कंज्यूमर जर्नी) में अस्थायी व्यवधान का कारण बन सकता है.

मार्केटिंग उद्योग के लिए चुनौती अब केवल इंटरनेट से जुड़े उपभोक्ता तक पहुंचने की नहीं रह गई है. चुनौती अब उस स्थिति के लिए भी तैयार रहने की है, जब यह इंटरनेट कनेक्शन अचानक खत्म हो जाए.
 


L&T को मिले ₹10,000 करोड़ से ज्यादा के मेगा ऑर्डर, माइनिंग और स्टील सेक्टर के बड़े प्रोजेक्ट्स से शेयर में आई तेजी

इस परियोजना के तहत L&T डिजाइन और इंजीनियरिंग, उपकरणों की खरीद, डाउनहिल कन्वेयर सिस्टम, स्क्रीनिंग प्लांट, स्टॉकपाइल, यार्ड उपकरण, रैपिड वैगन लोडिंग सिस्टम समेत अन्य संबंधित सुविधाओं की स्थापना और कमीशनिंग का काम करेगी.

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Monday, 20 July, 2026
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इंफ्रास्ट्रक्चर और इंजीनियरिंग क्षेत्र की दिग्गज कंपनी लार्सन एंड टुब्रो (L&T) को मेटल्स और माइनिंग सेक्टर में ₹10,000 करोड़ से ₹15,000 करोड़ के दायरे वाले कई मेगा EPC (इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट और कंस्ट्रक्शन) ऑर्डर मिले हैं. सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की कंपनियों से मिले इन प्रोजेक्ट्स के बाद कंपनी के शेयरों में भी तेजी देखने को मिली और सोमवार के कारोबार में यह करीब 1% तक चढ़ गया.

देश की सबसे बड़ी आयरन ओर कंपनी से मिला बड़ा प्रोजेक्ट

L&T ने शेयर बाजार को दी जानकारी में बताया कि उसे पहला ऑर्डर देश की सबसे बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की आयरन ओर उत्पादक कंपनी से मिला है. कंपनी वर्ष 2030 तक अपनी आयरन ओर उत्पादन क्षमता 10 करोड़ टन सालाना (MTPA) तक बढ़ाने की योजना पर काम कर रही है. इसी विस्तार कार्यक्रम के तहत छत्तीसगढ़ में 18 MTPA क्षमता वाले आयरन ओर हैंडलिंग प्लांट के पैकेज BE-01C का ठेका L&T को दिया गया है.

इस परियोजना के तहत L&T डिजाइन और इंजीनियरिंग, उपकरणों की खरीद, डाउनहिल कन्वेयर सिस्टम, स्क्रीनिंग प्लांट, स्टॉकपाइल, यार्ड उपकरण, रैपिड वैगन लोडिंग सिस्टम (RWLS) समेत अन्य संबंधित सुविधाओं की स्थापना और कमीशनिंग का काम करेगी.

स्टील प्लांट विस्तार का भी मिला ठेका

कंपनी को दूसरा बड़ा ऑर्डर एक नवरत्न सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी से मिला है, जो पश्चिम बंगाल स्थित अपने स्टील प्लांट की क्षमता 2.5 MTPA से बढ़ाकर 7.1 MTPA कर रही है. इस विस्तार परियोजना के लिए L&T को डिजाइन एंड बिल्ड और बैलेंस ऑफ प्लांट से जुड़े कई पैकेज सौंपे गए हैं.

जिंक प्रोसेसिंग प्लांट के लिए भी मिला EPC ऑर्डर

इसके अलावा L&T को निजी क्षेत्र की एक प्रमुख मेटल कंपनी से जिंक प्रोसेसिंग प्लांट के लिए EPC कॉन्ट्रैक्ट भी मिला है. इस प्रोजेक्ट में डिजाइन, इंजीनियरिंग, उपकरणों की खरीद, स्थापना, कमीशनिंग और साइट से जुड़ी अन्य सेवाएं शामिल हैं. कंपनी का कहना है कि इससे नॉन-फेरस मेटल प्रोजेक्ट्स में उसकी विशेषज्ञता और मजबूत होगी.

EPC कारोबार में मजबूत स्थिति का प्रमाण

L&T के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक एस. एन. सुब्रह्मण्यन ने कहा कि ये नए ऑर्डर मेटल्स और मिनरल्स EPC क्षेत्र में कंपनी की मजबूत स्थिति को दर्शाते हैं. उन्होंने कहा कि इससे यह भी साबित होता है कि ग्राहक बड़े और जटिल औद्योगिक प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा करने की L&T की क्षमता पर भरोसा करते हैं.

उन्होंने कहा कि भारत में मेटल और माइनिंग सेक्टर में बढ़ते निवेश के बीच L&T विश्वस्तरीय औद्योगिक ढांचा तैयार करने के लिए देश की प्रमुख कंपनियों के साथ मिलकर काम करने के लिए प्रतिबद्ध है.

शेयर में दिखी तेजी

मेगा ऑर्डर की घोषणा का असर कंपनी के शेयर पर भी देखने को मिला. सोमवार को L&T का शेयर 3,825 रुपये पर खुला, जबकि पिछले कारोबारी सत्र में यह 3,815 रुपये पर बंद हुआ था. कारोबार के दौरान शेयर करीब 1% चढ़कर 3,850 रुपये के इंट्राडे हाई तक पहुंच गया. कंपनी का बाजार पूंजीकरण (मार्केट कैप) 5.28 लाख करोड़ रुपये से अधिक है.
 


वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की GDP 6.5-6.8% रह सकती है, दूसरी छमाही में तेज होगी रफ्तार: डेलॉयट

रिपोर्ट में कहा गया है कि मध्य पूर्व के हालिया घटनाक्रम और RBI की नीतिगत पहल कुछ जोखिमों को कम कर सकती हैं, लेकिन एल नीनो का असर, कृषि उत्पादन और खाद्य कीमतों पर मौसम से जुड़ी अनिश्चितताएं अब भी अर्थव्यवस्था के लिए प्रमुख जोखिम हैं.

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Monday, 20 July, 2026
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वैश्विक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनावों के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था मौजूदा वित्त वर्ष 2026-27 में 6.5% से 6.8% की दर से बढ़ सकती है. वैश्विक प्रोफेशनल सर्विसेज फर्म डेलॉयट इंडिया ने अपनी ताजा 'इकोनॉमिक आउटलुक' रिपोर्ट में यह अनुमान जताया है. रिपोर्ट के मुताबिक, त्योहारी मांग, ब्याज दरों में कमी और वैश्विक हालात में सुधार के चलते वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में आर्थिक गतिविधियों में तेजी आने की उम्मीद है.

दूसरी छमाही में रफ्तार पकड़ सकती है अर्थव्यवस्था

रविवार को जारी रिपोर्ट में डेलॉयट ने कहा कि भारत ने वर्ष 2026 की शुरुआत अपेक्षाकृत मजबूत व्यापक आर्थिक (मैक्रोइकोनॉमिक) आधार के साथ की थी. हालांकि, मध्य पूर्व में बढ़े भू-राजनीतिक तनाव ने प्रमुख समुद्री व्यापार मार्गों को प्रभावित किया, जिससे कमोडिटी कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ा और निवेशकों का भरोसा कमजोर पड़ा.

रिपोर्ट के अनुसार, इन परिस्थितियों के कारण भारत का व्यापार घाटा बढ़ा, विदेशी पूंजी का बहिर्वाह जारी रहा और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में तेज गिरावट देखने को मिली.

RBI के अनुमान के करीब है डेलॉयट का आकलन

डेलॉयट का अनुमान भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के संशोधित GDP अनुमान के करीब है. RBI ने पिछले महीने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए विकास दर का अनुमान 6.9% से घटाकर 6.6% कर दिया था. इससे पहले वित्त वर्ष 2025-26 में भारतीय अर्थव्यवस्था ने 7.7% की वृद्धि दर्ज की थी.

पहली छमाही में रहेगी सुस्ती, बाद में आएगी तेजी

डेलॉयट इंडिया की मुख्य अर्थशास्त्री रुमकी मजूमदार ने कहा कि मौजूदा वैश्विक माहौल पहले की तुलना में काफी अधिक अनिश्चित हो गया है. उन्होंने कहा कि वित्त वर्ष की पहली छमाही में आर्थिक वृद्धि अपेक्षाकृत धीमी रह सकती है, लेकिन त्योहारी सीजन में बढ़ते उपभोक्ता खर्च, मौद्रिक नीति में नरमी और वैश्विक परिस्थितियों के धीरे-धीरे स्थिर होने से दूसरी छमाही में विकास दर मजबूत हो सकती है.

एल नीनो और महंगाई बने हुए हैं बड़े जोखिम

रिपोर्ट में कहा गया है कि मध्य पूर्व के हालिया घटनाक्रम और RBI की नीतिगत पहल कुछ जोखिमों को कम कर सकती हैं, लेकिन एल नीनो का असर, कृषि उत्पादन और खाद्य कीमतों पर मौसम से जुड़ी अनिश्चितताएं अब भी अर्थव्यवस्था के लिए प्रमुख जोखिम हैं.

डेलॉयट ने महंगाई को भी आर्थिक वृद्धि के लिए बड़ी चुनौती बताया है. रिपोर्ट के अनुसार, कच्चे तेल, उर्वरक, महत्वपूर्ण खनिजों और खाद्य तेलों की बढ़ती कीमतें तथा रुपये की कमजोरी घरेलू महंगाई को बढ़ा सकती है.

कमजोर मानसून बढ़ा सकता है महंगाई का दबाव

रिपोर्ट के मुताबिक, जून में भारत की खुदरा महंगाई बढ़कर 18 महीने के उच्चतम स्तर 4.38% पर पहुंच गई, जिसका मुख्य कारण खाद्य और ईंधन की बढ़ती कीमतें रहीं.

डेलॉयट ने चेतावनी दी कि यदि मानसून कमजोर रहता है तो खाद्य महंगाई और बढ़ सकती है. चूंकि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में खाद्य वस्तुओं की हिस्सेदारी करीब 46% है, इसलिए खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी व्यापक महंगाई और वेतन वृद्धि की मांग को भी प्रभावित कर सकती है.

मुक्त व्यापार समझौतों से मिलेगी मजबूती

रिपोर्ट में भारत की मध्यम अवधि की आर्थिक संभावनाओं को लेकर सकारात्मक रुख अपनाया गया है. डेलॉयट का मानना है कि प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) को तेजी से अंतिम रूप देने की भारत की रणनीति विकास को नई गति दे सकती है.

हालांकि, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि केवल FTA ही पर्याप्त नहीं होंगे. दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए मजबूत औद्योगिक नीतियां, घरेलू सप्लाई चेन को सशक्त करना, विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचे का विकास, नियमों को सरल बनाना और नवाचार व कौशल विकास में निरंतर निवेश भी जरूरी होगा.