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अडानी ग्रुप के शेयर्स में गिरावट की वजह है विदेशों में हुई शॉर्ट सेलिंग?
सरकारी एजेंसिस द्वारा की जा रही एक जांच में बहुत से ऐसे कारण सामने आये हैं जो अडानी ग्रुप ऑफ कम्पनीज के शेयर्स में गिरावट की वजह हो सकते हैं?
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago
क्या अडानी ग्रुप के शेयर्स में 100 बिलियन डॉलर्स की गिरावट के लिए इंडिया के बाहर होने वाली शोर्ट सेलिंग जिम्मेदार है? सरकारी एजेंसिस के द्वारा शुरू की गयी एक जांच से पता चला है कि अडानी ग्रुप को बियर कार्टेल के द्वारा टारगेट किया गया था. बियर कार्टेल ने SPD (स्ट्रक्चर्ड प्रोडक्ट डेरिवेटिव्स) के इस्तेमाल से अडानी ग्रुप को अपना निशाना बनाया था. ये SPD कई तरीके से विवादित होती हैं और जबतक खुद रेगुलेटर क्लाइंट के नाम से पर्दा न हटाये तब तक असली क्लाइंट का पता नहीं चल पाता है.
पहले समझते हैं कि शॉर्ट सेलिंग क्या होती है? ब्रोकर्स किसी एक कंपनी के शेयर्स के गिरने का इंतज़ार करते हैं ताकि वे उस कंपनी के शेयर्स को ज्यादा से ज्यादा बड़ी मात्र में खरीद सकें. और क्योंकि शेयर की कीमत पहले से कम हुई है तो अब कम पैसों या उतने ही पैसों में आप ज्यादा शेयर्स खरीद सकते हैं. उसके बाद जब कंपनी के शेयर्स फिर से ऊपर बढ़ने लगते हैं तो ब्रोकर्स धीरे धीरे उस कंपनी के शेयर्स को ज्यादा कीमत पर बेचकर प्रॉफिट कमाते हैं. इसी प्रक्रिया को शॉर्ट सेलिंग कहा जाता है.
क्या होती हैं SPDs?
स्टॉक्स की शॉर्ट सेलिंग के लिए बहुत से ऑप्शंस का उपयोग किया जाता है. इन विकल्पों में स्टॉक की शॉर्ट सेलिंग के लिए डेरीवेटिव का इस्तेमाल सबसे ताकतवर माना जाता है और SPD इस ऑप्शन को सबसे अच्छे तरीके से हैंडल कर पाती है. अगर एक ट्रेडर किसी एक स्टॉक या मार्किट में लगातार गिर रहा हो तो वह किसी विदेशी ब्रोकर के पास जाता है और ये ब्रोकर उस ट्रेडर को डील में निहित खतरे को भापने के बाद थोड़ी ज्यादा ब्रोकरेज कमीशन लेकर एक कंपनी के बुनियादी एसेट के ऑप्शंस बताता है. SPD के अन्दर शॉर्ट सेलिंग के लिये डेब्ट, इक्विटी, और कमोडिटी में से कुछ भी शामिल हो सकता है जिसे आने वाले 1 से 3 महीनों तक बेचा जाता है. टोटल रिटर्न स्वैप, कंसिस्टिंग पुट, और सेलिंग कॉल्स कुछ मशहूर तरीके हैं. अब जब इस बुनियादी एसेट की कीमत गिरती है तो उस ट्रेडर को बगैर डायरेक्ट पोजीशन के भी फायदा होता है. उस ट्रेडर की जगह वह ब्रोकर डायरेक्ट पोजीशन लेता है जिसने ट्रेडर को SPD बेचीं होती है.
पहले ही शुरू हो गयी थी शॉर्ट सेलिंग
जांच से यह भी पता चला है कि अडानी ग्रुप के शेयर्स और इंडियन मार्केट्स की शॉर्ट सेलिंग का ऑपरेशन हिंडनबर्ग की रिपोर्ट आने से कई हफ्तों पहले ही शरू हो चुका था. हिंडनबर्ग की रिपोर्ट 24 जनवरी को प्रकाशित हुई थी. इंडिया में डेरीवेटिव मार्किट का महीना बस एक साल पहले ही खत्म हुआ था और बजट भी बस कुछ ही दिन दूर था. साथ ही, इस वक्त मार्किट में बहुत अस्थिरता भी होती है. इस वक्त पर रिलीज की गयी रिपोर्ट मार्किट में स्थित भावनाओं को खराब कर सकती हैं. लेकिन जिस तरह अडानी ग्रुप के शेयर्स गिरे उसके लिए काफी बड़ी पोजीशंस की जरुरत थी. जब कोई ब्रोकरेज किसी ट्रेडर को भारतीय कंपनी के लिए SPD बेचता है तो, उसके एसोसिएट्स इंडियन एक्सचेंज में FPI (फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स) की तरह खुद को रजिस्टर करते हैं. जिन FPI की बदौलत अडानी ग्रुप के शेयर्स की शॉर्ट सेलिंग हुई, इन्हीं की वजह से लगातार इंडियन मार्केट को गिराने की कोशिश भी होने लगी.
जांच से ये भी पता चलता है कि न्यूयॉर्क आधारित हिंडनबर्ग किसी मार्केट रेगुलेटर के साथ रजिस्टर्ड नहीं है. हिंडनबर्ग ने कहा है कि अडानी ग्रुप के स्टॉक्स के बारे में उसे जो जानकारी मिली वह उसे SEBI की रिपोर्टों से मिली थी. लेकिन SEBI कभी भी RTI में अपनी रिपोर्ट्स साझा नही करता है. इन्वेस्टिगेशन करने पर पता चलता है कि हिंडनबर्ग की रिपोर्ट उन्हीं फाइनेंशियल तरीकों का इस्तेमाल करती है जो एक लीडिंग इंडियन मार्किट रिसर्चर द्वारा इस्तेमाल किये गए थे.
जांचकर्ताओं को शक है कि हिंडनबर्ग ने डील करने के लिए अडानी के नॉन इंडिया ट्रेडेड डेरिवेटिव्स का इस्तेमाल किया था. विदेशों में हुई इस शोर्ट सेलिंग का सारा भार इंडियन मार्केट्स में अडानी ग्रुप पर पड़ा. इतनी बुरी तरह गिरने के बाद भी अब अडानी ग्रुप ऑफ कम्पनीज के शेयर्स धीरे धीरे स्टेबल हो रहे हैं. आसान शब्दों में कहें तो अडानी ग्रुप ने ऐतिहासिक गिरावट के खिलाफ एक ऐतिहासिक जीत हासिल की है.
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