पेट्रोलियम मंत्रालय ने संसद में दी जानकारी, घरेलू स्तर पर मौजूद अतिरिक्त इथेनॉल क्षमता के इस्तेमाल का भी मिलेगा मौका; पेट्रोल में 20% ब्लेंडिंग की सीमा फिलहाल बरकरार
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
भारत सरकार खाना पकाने के ईंधन के तौर पर इथेनॉल के इस्तेमाल की संभावनाओं पर विचार कर रही है. इसका मकसद घरेलू रसोई में एलपीजी की जगह वैकल्पिक और अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देना और आयातित एलपीजी पर देश की निर्भरता कम करना है. पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय (MoPNG) ने संसद को यह जानकारी दी है.
मंत्रालय के मुताबिक, इस पहल से देश में मौजूद अतिरिक्त इथेनॉल उत्पादन क्षमता के लिए भी नया इस्तेमाल तैयार हो सकता है. सरकार का उद्देश्य घरेलू खाना पकाने के लिए वैकल्पिक ईंधनों की उपलब्धता बढ़ाने के साथ पारंपरिक जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना है.
इथेनॉल आधारित कुकिंग सॉल्यूशन विकसित करने में जुटी एजेंसियां
इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन और भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन की संयुक्त पहल LPG Equipment Research Centre (LERC) सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों (OMCs) के साथ मिलकर इथेनॉल आधारित खाना पकाने के समाधान विकसित करने पर काम कर रहा है. यह पहल घरेलू खाना पकाने के लिए वैकल्पिक ईंधनों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की सरकार की व्यापक रणनीति का हिस्सा है.
पेट्रोल में 20% से ज्यादा इथेनॉल ब्लेंडिंग पर अभी फैसला नहीं
सरकार ने स्पष्ट किया है कि पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग की मौजूदा 20 फीसदी सीमा बढ़ाने को लेकर अभी कोई फैसला नहीं लिया गया है. पेट्रोलियम मंत्रालय ने यह भी कहा कि डीजल में इथेनॉल मिलाने का प्रयोग व्यावहारिक साबित नहीं हुआ है. परीक्षणों के दौरान इथेनॉल मिश्रित डीजल निर्धारित फ्लैश प्वाइंट की शर्तों को पूरा नहीं कर सका. इथेनॉल की मौजूदगी के कारण डीजल का फ्लैश प्वाइंट काफी कम हो गया था.
अमेरिका से इथेनॉल आयात की खबरों को सरकार ने बताया गलत
इथेनॉल नीति को लेकर सरकार का यह स्पष्टीकरण ऐसे समय आया है जब भारत में घरेलू इथेनॉल की उपलब्धता और आयातित जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने में इसकी भूमिका को लेकर चर्चा जारी है.
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने उन रिपोर्टों को भी खारिज किया है जिनमें दावा किया गया था कि भारत ने पेट्रोल में ब्लेंडिंग के लिए अमेरिका से बड़ी मात्रा में इथेनॉल आयात करने पर सहमति जताई है.
मंत्रालय ने इन रिपोर्टों को “बेबुनियाद और तथ्यात्मक रूप से गलत” बताया. सरकार के मुताबिक, Ethanol Blended with Petrol Programme (EBP) के लिए जरूरी इथेनॉल पूरी तरह घरेलू उत्पादकों से खरीदा जाता है और पेट्रोल ब्लेंडिंग में अमेरिका से आयातित इथेनॉल का इस्तेमाल नहीं हो रहा है.
मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता के दौरान ईंधन ब्लेंडिंग के लिए इथेनॉल आयात को लेकर भारत ने कोई रियायत या प्रतिबद्धता नहीं दी है. देश में इथेनॉल की खरीद और ब्लेंडिंग नीति घरेलू जरूरतों के आधार पर तय की जाती है.
E20 पेट्रोल की गुणवत्ता पर OMCs ने दी सफाई
इस बीच, सरकारी तेल कंपनियों ने E20 पेट्रोल की गुणवत्ता को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की है. E20 पेट्रोल में 20 फीसदी इथेनॉल और बाकी पेट्रोल होता है. इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल में ज्यादा नमी और क्लोराइड संदूषण होने की मीडिया रिपोर्ट्स के बाद देशभर में E20 की व्यापक जांच की गई. इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन ने कहा कि जांच में ईंधन सप्लाई चेन के अलग-अलग चरणों को शामिल किया गया और गुणवत्ता निर्धारित मानकों के भीतर पाई गई.
तेल कंपनियों के मुताबिक, उपभोक्ता E20 पेट्रोल का इस्तेमाल भरोसे के साथ जारी रख सकते हैं. OMC नेटवर्क के जरिए उपलब्ध कराया जा रहा ईंधन निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुरूप है और पूरी सप्लाई चेन में गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए निगरानी और जांच की मजबूत व्यवस्था मौजूद है.
परिवहन से आगे बढ़ सकता है इथेनॉल का इस्तेमाल
सरकार का खाना पकाने के ईंधन के तौर पर इथेनॉल के इस्तेमाल की संभावनाएं तलाशना इस जैव ईंधन की भूमिका को परिवहन क्षेत्र से आगे बढ़ाने की दिशा में कदम है. फिलहाल पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग की सीमा 20 फीसदी पर बरकरार है और इसके लिए घरेलू स्तर पर उत्पादित इथेनॉल पर ही निर्भरता जारी है.
सब्सक्रिप्शन रेवेन्यू में 16% की मजबूत ग्रोथ, लेकिन विज्ञापन से कमाई 11.5% घटी; खर्च बढ़ने का भी पड़ा असर
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
जी एंटरटेन्मेंट (Zee Entertainment Enterprises) ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में परिचालन आय में 5 फीसदी की सालाना बढ़ोतरी दर्ज की है. हालांकि, इस दौरान कंपनी के मुनाफे में करीब 48 फीसदी की बड़ी गिरावट आई है. 30 जून 2026 को समाप्त तिमाही में कंपनी का कंसोलिडेटेड ऑपरेटिंग रेवेन्यू बढ़कर ₹1,907.3 करोड़ हो गया, जो पिछले साल की समान तिमाही में ₹1,821 करोड़ था.
कंपनी का कंसोलिडेटेड प्रॉफिट आफ्टर टैक्स (PAT) घटकर ₹743 करोड़ रह गया, जबकि एक साल पहले इसी तिमाही में यह ₹1,437 करोड़ था. वहीं, कंपनी की कुल आय ₹1,993.5 करोड़ रही, जो पिछले साल की जून तिमाही में ₹1,849.8 करोड़ थी.
सब्सक्रिप्शन रेवेन्यू में 16% की बढ़ोतरी
जी की कमाई में इस तिमाही के दौरान सब्सक्रिप्शन कारोबार ने बेहतर प्रदर्शन किया. कंपनी का सब्सक्रिप्शन रेवेन्यू करीब 16 फीसदी बढ़कर ₹1,136.9 करोड़ हो गया. पिछले साल की समान तिमाही में यह ₹980.6 करोड़ था. इसके विपरीत, विज्ञापन से होने वाली कमाई पर दबाव देखने को मिला. कंपनी का एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू करीब 11.5 फीसदी घटकर ₹671.4 करोड़ रह गया, जो पिछले साल की समान अवधि में ₹758.5 करोड़ था. अन्य बिक्री और सेवाओं से होने वाली आय भी बढ़कर ₹99 करोड़ हो गई, जबकि एक साल पहले यह ₹84.6 करोड़ थी.
बढ़े कंपनी के कुल खर्च
तिमाही के दौरान Zee का कुल खर्च बढ़कर ₹1,864.4 करोड़ हो गया, जबकि पिछले साल की समान तिमाही में यह ₹1,652.7 करोड़ था. ऑपरेशनल कॉस्ट ₹971 करोड़ से बढ़कर ₹1,031.7 करोड़ हो गई. वहीं, विज्ञापन और पब्लिसिटी पर कंपनी का खर्च भी काफी बढ़ा. यह पिछले साल के ₹275.3 करोड़ से बढ़कर ₹446.8 करोड़ हो गया. हालांकि, कर्मचारी लाभ पर खर्च ₹220.1 करोड़ से घटकर ₹213.6 करोड़ रहा. कंपनी का एक्सेप्शनल आइटम और टैक्स से पहले का मुनाफा ₹741 करोड़ रहा, जबकि जून 2025 तिमाही में यह ₹1,972 करोड़ था.
कंटेंट और निवेश के ढांचे में बदलाव
तिमाही के दौरान जी ने अपने कंटेंट और निवेश ढांचे में भी कई बदलाव किए. कंपनी ने Phantom Digital Effects की ओर से जारी कंपल्सरी कन्वर्टिबल डिबेंचर्स में ₹115.7 करोड़ का निवेश किया. इन डिबेंचर्स पर सालाना 0.1 फीसदी कूपन है और इन्हें निवेश वाली कंपनी के इक्विटी शेयरों में बदला जा सकता है. इसके अलावा जी ने Culture of Real Experiences में कंपल्सरी कन्वर्टिबल प्रेफरेंस शेयरों के जरिए ₹10 करोड़ का निवेश किया और कंपनी में 33.33 फीसदी फुली डायल्यूटेड हिस्सेदारी हासिल की.
कंटेंट सिंडिकेशन कारोबार सब्सिडियरी को ट्रांसफर
जी ने 1 अप्रैल 2026 से अपने कंटेंट की सिंडिकेशन और लाइसेंसिंग से जुड़े कारोबार को अपनी पूर्ण स्वामित्व वाली सब्सिडियरी ZI-IPL Enterprises को ट्रांसफर कर दिया है. इसके साथ संबंधित एसेट्स, देनदारियां और कमर्शियल राइट्स भी ट्रांसफर किए गए हैं.
यह ट्रांसफर स्लंप सेल के जरिए किया गया और ट्रांसफर किए गए नेट एसेट्स का मूल्य ₹490.2 करोड़ आंका गया है. इसके बराबर की रिसीवेबल राशि Zee की किताबों में दर्ज की गई है.
पिछले वित्त वर्ष में भी हुआ था इन्वेंट्री एडजस्टमेंट
यह पुनर्गठन ऐसे समय में हुआ है जब कंपनी ने पिछले वित्त वर्ष में कंटेंट इन्वेंट्री से जुड़े अनुमान में बदलाव किया था. जी ने प्रीमियर फिल्मों की इन्वेंट्री के इस्तेमाल से जुड़े अपने अनुमानों को संशोधित किया था. इसके चलते मार्च 2026 तिमाही और पूरे वित्त वर्ष में ₹39.2 करोड़ का अतिरिक्त ऑपरेशनल कॉस्ट चार्ज दर्ज किया गया था.
TRAI ने वॉयस कॉल के जरिए होने वाली धोखाधड़ी और फर्जी पहचान के मामलों पर लगाम लगाने के लिए 1601 नंबर सीरीज शुरू की है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
मोबाइल पर आने वाली अनजान और फर्जी कॉल से परेशान लोगों के लिए राहत की खबर है. दरअसल, भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI) ने 1601 नंबर सीरीज की नई व्यवस्था लागू कर दी है. इसके तहत बिजली, पानी, गैस, कूरियर और पार्सल डिलीवरी जैसी सेवाओं से जुड़ी संस्थाएं खास 1601 सीरीज के नंबरों से ग्राहकों को कॉल करेंगी. इससे लोगों के लिए असली सेवा प्रदाता और संभावित ठगों के बीच अंतर करना आसान होगा.
क्या है TRAI की नई 1601 नंबर सीरीज?
TRAI ने वॉयस कॉल के जरिए होने वाली धोखाधड़ी और फर्जी पहचान के मामलों पर लगाम लगाने के लिए 1601 नंबर सीरीज शुरू की है. इसके पहले चरण में यूटिलिटी और लॉजिस्टिक्स सेक्टर को शामिल किया गया है. यानी बिजली वितरण कंपनियां, जल सेवा प्रदाता, सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियां और एलपीजी वितरण संस्थाएं इस सीरीज का इस्तेमाल कर सकेंगी. इसके अलावा कूरियर, एक्सप्रेस लॉजिस्टिक्स और पार्सल डिलीवरी कंपनियां भी 1601 नंबर से ग्राहकों को कॉल कर सकेंगी.
बैंक और सरकारी कॉल के लिए 1600 सीरीज
बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं, बीमा और सरकारी संस्थाओं से जुड़ी जरूरी कॉल के लिए 1600 नंबर सीरीज की व्यवस्था पहले की तरह जारी रहेगी. इससे अलग-अलग तरह की महत्वपूर्ण सेवाओं से आने वाली कॉल की पहचान करना उपभोक्ताओं के लिए आसान होगा.
टेलीकॉम कंपनियों को मिला 90 दिन का समय
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, TRAI ने टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर्स (TSPs) को नई व्यवस्था लागू करने के लिए 90 दिनों का समय दिया है. पात्र संस्थाओं का माइग्रेशन और ऑनबोर्डिंग इसी अवधि के भीतर पूरा करना होगा. 1601 सीरीज के नंबर उचित सत्यापन के बाद सीधे पात्र संस्थाओं को आवंटित किए जाएंगे. नंबर आवंटन की प्रक्रिया में बिचौलियों और एग्रीगेटरों को शामिल नहीं किया जाएगा.
1601 नंबर से नहीं होगी प्रचार वाली कॉल
TRAI ने साफ किया है कि 1601 सीरीज का इस्तेमाल केवल जरूरी सेवा और ट्रांजैक्शन से जुड़ी वॉयस कॉल के लिए किया जाएगा. इन नंबरों से किसी तरह की प्रमोशनल या प्रचारात्मक कॉल करने की अनुमति नहीं होगी. नंबर जारी करने से पहले संबंधित संस्थाओं से इस संबंध में वचन-पत्र भी लिया जाएगा.
ग्राहकों को क्या फायदा होगा?
अक्सर साइबर ठग बिजली बिल, गैस कनेक्शन, कूरियर डिलीवरी या अन्य सेवाओं के नाम पर आम 10 अंकों वाले मोबाइल नंबरों से लोगों को कॉल करते हैं. नई व्यवस्था लागू होने के बाद वैध सेवा प्रदाताओं की कॉल के लिए एक अलग नंबर सीरीज होने से ग्राहकों को कॉल की पहचान करने में मदद मिलेगी. हालांकि, किसी भी कॉल पर बैंकिंग डिटेल, ओटीपी, यूपीआई पिन या अन्य संवेदनशील जानकारी साझा करने से पहले हमेशा सावधानी बरतना जरूरी होगा.
संसद ने टैक्सेशन एंड अदर लॉज (अमेंडमेंट) बिल, 2026 को मंजूरी दे दी है. बिल के तहत सरकार को इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट के ऐसे माध्यम और ट्रांजैक्शन तय करने का अधिकार मिलेगा, जिन पर कोई शुल्क नहीं लगाया जा सकेगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
संसद ने सोमवार को कराधान और अन्य विधियां (संशोधन) विधेयक, 2026 (Taxation and Other Laws (Amendment) को मंजूरी दे दी. राज्यसभा ने संक्षिप्त चर्चा और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के जवाब के बाद इसे ध्वनिमत से पारित किया. लोकसभा पहले ही पिछले सप्ताह इस बिल को मंजूरी दे चुकी है. बिल का उद्देश्य डिजिटल भुगतान से जुड़े नियमों को कानूनी आधार देना और सरकार को यह तय करने की शक्ति देना है कि कौन से इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट मोड और ट्रांजैक्शन शुल्क-मुक्त रहेंगे.
UPI पर नहीं लगेगा कोई चार्ज
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने साफ किया कि इस कानून का मतलब यह नहीं है कि UPI यूजर्स से ट्रांजैक्शन चार्ज लिया जाएगा. उन्होंने कहा कि UPI की शुरुआत से ही ग्राहकों के लिए यह सुविधा मुफ्त रही है और आगे भी लोग बिना किसी ट्रांजैक्शन शुल्क के इसका इस्तेमाल कर सकेंगे. उन्होंने कहा कि ग्राहक को UPI ट्रांजैक्शन के लिए कोई चार्ज नहीं देना होगा. यानी आम लोगों के लिए UPI के जरिए तत्काल डिजिटल भुगतान पहले की तरह मुफ्त बना रहेगा.
सरकार को मिलेगी इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट मोड तय करने की शक्ति
नए कानून के तहत केंद्र सरकार को नोटिफिकेशन के जरिए ऐसे इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट मोड या ट्रांजैक्शन निर्धारित करने का अधिकार मिलेगा, जिन्हें शुल्क-मुक्त रखना जरूरी होगा. यह बदलाव Payment and Settlement Systems Act को इनकम टैक्स एक्ट से अलग करने के लिए किया गया है. मौजूदा व्यवस्था के तहत बैंक और पेमेंट सिस्टम प्रोवाइडर UPI और RuPay डेबिट कार्ड के जरिए किए गए ट्रांजैक्शन पर सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से यूजर्स से शुल्क नहीं ले सकते. हालांकि, नया कानून UPI यूजर्स पर कोई नया ट्रांजैक्शन चार्ज लागू नहीं करता. इसके बजाय यह एक वैधानिक व्यवस्था तैयार करता है, जिसके तहत सरकार यह अधिसूचित कर सकेगी कि किन इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट माध्यमों और ट्रांजैक्शन को शुल्क-मुक्त रखना है.
MDR को लेकर बहस के बीच आया बदलाव
यह प्रावधान Merchant Discount Rate यानी MDR को लेकर चल रही व्यापक बहस के बीच आया है. MDR डिजिटल पेमेंट की प्रोसेसिंग लागत को पेमेंट सिस्टम से जुड़े अलग-अलग पक्षों के बीच बांटने से संबंधित है. बिल के प्रावधानों से सरकार को मौजूदा जीरो-MDR व्यवस्था को लेकर ज्यादा लचीलापन मिलेगा. हालांकि, वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया है कि इससे ग्राहकों के लिए UPI भुगतान पर कोई शुल्क लागू नहीं होगा.
विदेशी निवेश को बढ़ावा देने की भी कोशिश
टैक्स बिल में डिजिटल पेमेंट के अलावा विदेशी निवेश आकर्षित करने और घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने से जुड़े प्रावधान भी शामिल हैं. साथ ही विदेशी क्लाउड सर्विस प्रोवाइडर्स को भारतीय डेटा सेंटर का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित करने का भी प्रावधान है.
बिल 5 जून को जारी किए गए उस अध्यादेश की जगह लेता है, जिसके तहत सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों यानी FPIs को मिलने वाली ब्याज आय और कैपिटल गेन पर इनकम टैक्स छूट दी गई थी.
भारत में फंड मैनेजरों को लाने की कोशिश
इस कानून में निवेश फंड्स से जुड़ी कुछ शर्तों को भी आसान बनाने का प्रावधान है. इसका उद्देश्य फंड मैनेजरों को भारत में स्थानांतरित होने के लिए प्रोत्साहित करना है, ताकि कुछ परिस्थितियों में उनके वैश्विक आय पर भारत में टैक्स लगाने का जोखिम कम हो.
दोनों सदनों से बिल पारित होने के बाद अब केंद्र सरकार के पास इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट के उन माध्यमों और ट्रांजैक्शन को अधिसूचित करने का कानूनी ढांचा है, जिन्हें शुल्क-मुक्त रखना होगा. हालांकि, UPI को लेकर वित्त मंत्री ने स्पष्ट कर दिया है कि आम ग्राहकों से कोई ट्रांजैक्शन चार्ज नहीं लिया जाएगा.
अमेरिकी अदालत के फैसले के बाद गौतम अडानी और समूह के वरिष्ठ अधिकारियों को बड़ी कानूनी राहत मिली है. मामले में आरोप हटाए जाने के बाद अडानी ने कहा कि मुश्किल दौर में भी उनका सच्चाई, निष्पक्षता और कानून के शासन में भरोसा अटूट रहा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अडानी ग्रुप (Adani Group) के चेयरमैन गौतम अडानी को अमेरिका से बड़ी कानूनी राहत मिली है. अमेरिकी अदालत ने उनके और समूह के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ चल रहे आपराधिक मामले में आरोप हटा दिए हैं. यह मामला कथित रिश्वतखोरी और धोखाधड़ी से जुड़ा था और सोलर पावर कॉन्ट्रैक्ट्स हासिल करने के दौरान अमेरिकी निवेशकों को कथित तौर पर गुमराह करने के आरोप लगाए गए थे. फैसले के बाद गौतम अडानी ने न्यायिक प्रक्रिया में अपना भरोसा दोहराते हुए इसे सच्चाई और कानून के शासन में विश्वास की जीत बताया है.
गौतम अडानी ने क्या कहा?
अमेरिकी अदालत के फैसले के बाद गौतम अडानी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपना बयान साझा किया. उन्होंने कहा कि वह अदालत के फैसले का विनम्रता और न्यायिक प्रक्रिया के प्रति गहरे सम्मान के साथ स्वागत करते हैं. अडानी ने कहा कि मुश्किल दौर में भी सच्चाई, निष्पक्षता और कानून के शासन में उनका भरोसा अटूट रहा. उन्होंने उन लोगों का भी आभार जताया, जिन्होंने इस पूरे मामले के दौरान अडानी समूह, कानूनी प्रक्रिया और भारत की न्याय व्यवस्था पर अपना विश्वास बनाए रखा.
I welcome the US court’s decision with humility and deep respect for the judicial process.
— Gautam Adani (@gautam_adani) August 10, 2026
Throughout this challenging period, our faith in truth, fairness and the rule of law remained unwavering.
My deepest gratitude to those who never lost faith in us, in the system and in…
क्या था अडानी के खिलाफ मामला?
गौतम अडानी और अडानी ग्रीन एनर्जी से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों पर अमेरिका में सोलर पावर कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने के लिए कथित रिश्वतखोरी और अमेरिकी निवेशकों को कथित तौर पर गुमराह करने के आरोप लगाए गए थे. अडानी समूह ने शुरुआत से ही इन आरोपों को खारिज किया था और कहा था कि समूह ने सभी लागू कानूनों और नियामकीय मानकों का पालन किया है. अब अमेरिकी जिला अदालत के फैसले के बाद इस आपराधिक मामले में अडानी और संबंधित अधिकारियों को बड़ी राहत मिली है.
Adani Group के शेयरों पर भी नजर
अमेरिका में कानूनी मामले से जुड़ी यह राहत अडानी समूह की कंपनियों के लिए अहम मानी जा रही है. फैसले से निवेशकों के बीच सेंटीमेंट मजबूत होने की उम्मीद है और अडानी समूह की सूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों में हलचल देखने को मिल सकती है. हालांकि, शेयरों की वास्तविक चाल बाजार के व्यापक रुख और अन्य कारोबारी संकेतकों पर भी निर्भर करेगी.
ग्लोबल बिजनेस के लिए क्यों अहम है फैसला?
अडानी समूह के लिए यह फैसला सिर्फ कानूनी राहत तक सीमित नहीं है. अमेरिकी मामले का निपटारा समूह के लिए वैश्विक निवेशकों और कारोबारी साझेदारों के बीच भरोसे के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. इससे समूह की अंतरराष्ट्रीय विस्तार योजनाओं, संभावित निवेश और फंडिंग गतिविधियों को लेकर धारणा में सुधार आ सकता है.
सोमवार को सेंसेक्स 43.27 अंक यानी 0.06 फीसदी की बढ़त के साथ 78,542.44 अंक पर बंद हुआ. वहीं निफ्टी50 13.15 अंक यानी 0.05 फीसदी बढ़कर 24,583.80 अंक पर पहुंच गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार के लिए मंगलवार, 11 अगस्त का कारोबारी सत्र सतर्कता भरा रह सकता है. GIFT Nifty में कमजोरी के संकेत मिल रहे हैं और यह करीब 43 अंक गिरकर 24,617.50 के स्तर पर कारोबार कर रहा था. अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते की उम्मीद कमजोर पड़ने से निवेशकों की चिंता बढ़ी है. वहीं कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भी बाजार के लिए दबाव का कारण बन सकती है. ऐसे में निवेशकों की नजर आज बाजार की शुरुआती चाल के साथ-साथ कई कंपनियों से जुड़े अहम कॉरपोरेट अपडेट्स पर रहेगी.
सोमवार को मामूली बढ़त के साथ बंद हुआ था बाजार
सोमवार को घरेलू शेयर बाजार में पूरे कारोबारी सत्र के दौरान उतार-चढ़ाव देखने को मिला. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और पश्चिम एशिया में तनाव के कारण निवेशकों का सेंटीमेंट प्रभावित रहा. हालांकि, आखिरी घंटे में खरीदारी लौटने से बाजार मामूली बढ़त के साथ बंद हुआ. बीएसई सेंसेक्स 43.27 अंक यानी 0.06 फीसदी की बढ़त के साथ 78,542.44 अंक पर बंद हुआ. वहीं एनएसई का निफ्टी50 13.15 अंक यानी 0.05 फीसदी बढ़कर 24,583.80 अंक पर पहुंच गया.
सेंसेक्स की 30 कंपनियों में से 19 शेयर बढ़त के साथ बंद हुए. टाइटन का शेयर सबसे ज्यादा 3.14 फीसदी चढ़ा. बजाज फाइनेंस में 1.93 फीसदी, बजाज फिनसर्व में 1.15 फीसदी, टाटा स्टील में 1.09 फीसदी और एशियन पेंट्स में 1.07 फीसदी की तेजी रही. दूसरी ओर बैंकिंग शेयरों पर दबाव देखने को मिला. SBI का शेयर 2.19 फीसदी टूटकर सेंसेक्स का सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाला शेयर रहा. इटरनल, NTPC, ITC, TCS, टेक महिंद्रा, भारती एयरटेल और रिलायंस इंडस्ट्रीज भी गिरावट में बंद हुए. सेक्टरों में निफ्टी PSU बैंक इंडेक्स करीब 2 फीसदी गिरकर सबसे कमजोर रहा, जबकि निफ्टी रियल्टी इंडेक्स ने बेहतर प्रदर्शन किया.
एशियाई बाजारों में तेजी, अमेरिकी बाजार कमजोर
मंगलवार को एशियाई बाजारों में मिलाजुला रुख देखने को मिला. हांगकांग का Hang Seng करीब 0.42 फीसदी ऊपर था, जबकि दक्षिण कोरिया का Kospi 0.32 फीसदी की बढ़त के साथ कारोबार कर रहा था. निवेशकों की नजर पश्चिम एशिया की स्थिति और अमेरिकी बाजारों के प्रदर्शन पर बनी हुई है. अमेरिकी बाजारों में सोमवार को हल्की गिरावट रही. Dow Jones Industrial Average 0.11 फीसदी, S&P 500 0.06 फीसदी और Nasdaq Composite 0.32 फीसदी गिरकर बंद हुआ.
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से बढ़ी चिंता
अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में गतिरोध की आशंका के बीच कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है. अमेरिकी पेट्रोलियम भंडार 300 मिलियन बैरल से नीचे पहुंच गया है, जिसे 1983 के बाद का सबसे निचला स्तर बताया जा रहा है. इससे आने वाले समय में तेल की सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ी है. इंटरकॉन्टिनेंटल एक्सचेंज पर अगस्त वायदा 0.09 फीसदी बढ़कर 87.80 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. इसके अलावा सोने और चांदी के वायदा भाव में भी तेजी रही. सोना 1.51 फीसदी और चांदी 2.02 फीसदी चढ़ी.
इन शेयरों पर रहेगी नजर
मंगलवार को कई कंपनियों से जुड़े बड़े कॉरपोरेट अपडेट्स सामने आए हैं, जिनका असर शेयरों पर देखने को मिल सकता है. Bharat Electronics (BEL) को 31 जुलाई के बाद से अब तक करीब 541 करोड़ रुपये के अतिरिक्त ऑर्डर मिले हैं. वहीं RailTel को डाक विभाग से करीब 119 करोड़ रुपये का ऑर्डर मिला है. Prestige Estates की हॉस्पिटैलिटी यूनिट में CPPIB 3,000 करोड़ रुपये तक निवेश कर सकता है और कंपनी में 28 फीसदी तक हिस्सेदारी हासिल कर सकता है. TVS Motor ने प्राइवेट प्लेसमेंट के जरिए 1,000 करोड़ रुपये के नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर जारी किए हैं. PC Jeweller के बोर्ड ने QIP के जरिए 1,000 करोड़ रुपये तक जुटाने की मंजूरी दी है. Adani Enterprises, Adani Energy Solutions, Adani Green Energy, Adani Ports, Adani Power, Adani Total Gas, Ambuja Cements और ACC के शेयर भी फोकस में रहेंगे. वहीं Bharat Forge ने अपनी सहयोगी कंपनी Kalyani Strategic Systems में 241 करोड़ रुपये अतिरिक्त निवेश को मंजूरी दी है.
BSE के शेयरों पर भी नजर रहेगी. NSE Nifty 50 इंडेक्स में BSE, Wipro की जगह शामिल होगा और यह बदलाव 30 सितंबर 2026 से प्रभावी होगा. इसके अलावा JSW Energy ने अप्रैल 2026 से अब तक 1,166 MW नई रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता जोड़ी है. Maruti Clean Coal and Power के अधिग्रहण के बाद कंपनी की कुल स्थापित क्षमता 14,920 MW हो गई है. फार्मा कंपनी Lupin को अमेरिकी FDA से Sodium Zirconium Cyclosilicate ओरल सस्पेंशन के लिए मंजूरी मिली है. इस दवा का इस्तेमाल वयस्कों में हाइपरकलेमिया यानी शरीर में पोटैशियम का स्तर बढ़ने के इलाज में किया जाता है. इसके चलते Lupin का शेयर भी निवेशकों के रडार पर रहेगा.
आज कई कंपनियां जारी करेंगी Q1 नतीजे
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, मंगलवार को कई कंपनियां वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के नतीजे जारी करेंगी. इनमें Arkade Developers, Ashiana Housing, Ashoka Buildcon, Balrampur Chini Mills, Bata India, Borana Weaves, AvenuesAI, DAM Capital Advisors, Delta Corp, EPL, Finolex Cables, Gokaldas Exports, IFCI, Manappuram Finance, MRF, NBCC India, PI Industries, Rail Vikas Nigam, Senco Gold, Siemens, SKF India, TARC, TD Power Systems, Unichem Laboratories, Venky’s India और Zydus Lifesciences समेत कई कंपनियां शामिल हैं.
आज बाजार की दिशा तय करने में GIFT Nifty, कच्चे तेल की कीमतें, पश्चिम एशिया में तनाव, अमेरिकी बाजारों का रुख और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां अहम रहेंगी. इसके अलावा Q1 नतीजों और कंपनियों के ऑर्डर, फंड जुटाने और कारोबार विस्तार से जुड़े अपडेट्स के कारण चुनिंदा शेयरों में तेज हलचल देखने को मिल सकती है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
भारत के बाजार नियामक ने 2025-26 में उल्लंघनों को लगातार पकड़ा, लेकिन 42% कम प्रवर्तन कार्यवाही शुरू की, 76% कम चेतावनियां जारी कीं और चुपचाप यह बदल दिया कि वह किन चीजों को गिनता और सार्वजनिक करता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
SEBI की नजरें अब भी हैं. लेकिन ऐसा लगता है कि उसने अपनी मुट्ठी का इस्तेमाल करने की इच्छाशक्ति और कागजी कार्रवाई खो दी है.
31 मार्च 2026 को समाप्त वर्ष में भारत का बाजार नियामक लगातार गड़बड़ी करने वालों को पकड़ता रहा. उसने 402 जांच शुरू कीं. 14 शहरों में 46 स्थानों पर 48 संस्थाओं की तलाशी ली. बाजार में हेरफेर की जांच बढ़ी. फ्रंट-रनिंग के मामले बढ़े. निगरानी प्रणालियां लगातार अलर्ट देती रहीं. निरीक्षक रिपोर्ट दाखिल करते रहे. भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) सो नहीं रहा था.
तो फिर क्या बदला? उसके बाद जो कुछ होता था, वह सब.
2024-25 में SEBI ने 342 औपचारिक प्रवर्तन कार्यवाही शुरू की थी धारा 11 के निर्देश, मध्यस्थों से जुड़ी जांच और अधिनिर्णयन मामले, जो किसी निष्कर्ष को उसके परिणाम में बदलते हैं. 2025-26 में, तुहिन कांता पांडे के पहले पूर्ण वर्ष के दौरान, यह संख्या घटकर 198 रह गई. यानी 12 महीनों में 42% की गिरावट.
प्रशासनिक चेतावनियां 1,678 से गिरकर 397 रह गईं. रिकवरी सर्टिफिकेट वह साधन जो वास्तव में डिफॉल्टरों से पैसा निकलवाता है 942 से घटकर 376 रह गए. SEBI के अधिनिर्णयन अधिकारियों द्वारा लगाए गए जुर्माने 29% घट गए. तलाशी लगभग आधी रह गई. एक्सचेंजों द्वारा ब्रोकरों के निरीक्षण में एक-तिहाई से अधिक की गिरावट आई. अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड (AIF) के निरीक्षण 69% गिर गए.
इनमें से किसी भी आंकड़े पर विवाद नहीं है. ये सभी SEBI की अपनी वार्षिक रिपोर्ट में हैं, जो वह संसद के समक्ष रखता है और जिनमें दो वर्षों के आंकड़े साथ-साथ दिए जाते हैं, ताकि तुलना की जा सके. 342 और 198 इन तीन तालिकाओं की समान आधार पर की गई तुलना का परिणाम हैं.
प्रवर्तन को चार चरणों वाली मशीन मानिए. निगरानी. पकड़ना. आरोप लगाना. सजा देना.
बाजार के पुलिसकर्मी के तौर पर SEBI नरम पड़ा
संस्थाओं की तलाशी में 46% की गिरावट आई. एक्सचेंजों द्वारा ब्रोकरों के निरीक्षण में 36% की गिरावट आई. SEBI के अपने ब्रोकर निरीक्षण 45% घट गए. डिपॉजिटरी पार्टिसिपेंट और AIF निरीक्षण, दोनों में 69% की गिरावट आई.
पकड़ने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत बेहतर बनी रही. शुरू की गई जांच में केवल 12% की गिरावट आई. हेरफेर और फ्रंट-रनिंग की जांच वास्तव में बढ़ी. पूरी की गई जांच में मामूली 5% की गिरावट आई.
इससे क्या पता चलता है? SEBI ने उल्लंघनों को पकड़ना बंद नहीं किया. उसने उन निष्कर्षों में से कम मामलों को प्रवर्तन में बदलना बंद कर दिया यानी कम आरोप लगाए और फिर बाकी बचे प्रवर्तन को रिपोर्ट करने का तरीका बदल दिया.
मशीन रुक गई
धारा 11 के तहत शुरू की गई कार्यवाही में 55% की गिरावट आई. मध्यस्थों से जुड़ी जांच आधी रह गई. शुरू किए गए अधिनिर्णयन मामलों में एक-तिहाई की गिरावट आई. कुल औपचारिक कार्यवाही 42% घट गई. रिकवरी सर्टिफिकेट 60% घट गए. वसूले गए सेटलमेंट शुल्क 86% गिर गए. चेतावनियां तीन-चौथाई, यानी 75% घट गईं.
सबसे साफ माप आसान है. शुरू की गई कार्यवाही बनाम पूरी की गई जांच. दो साल पहले यह अनुपात 1.68 था. पिछले साल यह 0.55 रह गया. SEBI जांच पूरी करता रहा. उसने जो कुछ पाया, उसके खिलाफ औपचारिक मामले बहुत कम खोले. निश्चित रूप से मामलों में देरी होती है. मार्च में बंद हुई जांच बाद में कार्यवाही में बदल सकती है. लेकिन तीन वर्षों के आंकड़ों में दिशा फिर भी स्पष्ट है, और यह उस दिशा के बिल्कुल विपरीत है जो अधिक दक्षता का दावा करने वाला नियामक दिखाता.
एक आंकड़ा लगभग असंभव है जिसे समझाकर टाला जा सके. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के लिए प्रशासनिक चेतावनियां 2023-24 में 1,314 थीं, अगले वर्ष 956 और 2025-26 में 68 — यानी एक ही साल में 93% की गिरावट. यह वह वर्ष था जब FPI ने भारतीय बाजारों से रिकॉर्ड ₹1.52 लाख करोड़ निकाले, जो SEBI द्वारा दर्ज अब तक का सबसे बड़ा वार्षिक बहिर्वाह था. अचानक नियामक ने उन्हीं निवेशकों को 103 “सलाहकारी” पत्र जारी किए, जबकि पिछले दो वर्षों में यह श्रेणी शून्य थी. भाषा नरम थी, डिफॉल्ट का कोई रिकॉर्ड नहीं था और आगे कार्रवाई की कोई आसान राह नहीं थी.
यही पैटर्न AIF के मामले में भी दिखाई देता है, जो देश में निजी पूंजी का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ स्रोत है.
चेतावनियां: 377 से 44 और फिर 14. दो वर्षों में 96% की गिरावट, जबकि AIF प्रतिबद्धताएं बढ़कर ₹16.94 लाख करोड़ हो गईं और फंड-ऑफ-फंड लेयरिंग दोगुनी हो गई. AIF के निरीक्षण घटकर पांच रह गए. ज्यादा पैसा, कम निरीक्षण, लगभग कोई चेतावनी नहीं. डिबेंचर ट्रस्टी, रजिस्ट्रार, पोर्टफोलियो मैनेजर, मर्चेंट बैंकर, सूची यही दोहराती है. यहां तक कि एक्सचेंज, क्लियरिंग कॉरपोरेशन और डिपॉजिटरी भी 27 चेतावनियों से घटकर सात पर आ गए. यह उस बाजार का प्रोफाइल नहीं हो सकता जो अचानक नियमों का पालन करने लगा हो.
SEBI के पास इसका तैयार जवाब है और उसका एक हिस्सा सही भी है. अधिनिर्णयन मामलों का बैकलॉग खत्म कर दिया गया है. लंबित मामले तेजी से घटे हैं. दो साल से पुराने मामलों में और भी ज्यादा कमी आई है. वास्तविक काम हुआ है. चेयरमैन “ऑप्टिमम रेगुलेशन” की बात करते हैं, जहां निवेशक सुरक्षा के लिए जरूरी हो वहां सख्ती और जहां सुरक्षा कमजोर किए बिना बाधाओं को हटाया जा सकता है वहां नरम रुख. ब्रोकरों पर लगाए जाने वाले जुर्माने को तर्कसंगत बनाना उपलब्धि के रूप में सूचीबद्ध है. विश्व बैंक सहित गंभीर संस्थान, जिसका आकलन उसी वार्षिक रिपोर्ट में प्रकाशित है, लंबे समय से तर्क देते रहे हैं कि भारतीय प्रतिभूति नियमन जरूरत से ज्यादा जटिल हो गया था.
लेकिन बैकलॉग खत्म करने से मामलों के निपटारे में गिरावट समझ आती है. यह मामलों के शुरू होने में 55% की गिरावट, जारी किए गए रिकवरी सर्टिफिकेट में 60% की गिरावट, तलाशी ली गई संस्थाओं में 46% की गिरावट या एक हजार से ज्यादा चेतावनी पत्र जारी न किए जाने को नहीं समझाता. और एक आंकड़ा दक्षता की कहानी को चुपचाप नुकसान पहुंचाता है. दो साल से अधिक समय से लंबित धारा 11 के मामले 25 से बढ़कर 37 और फिर 54 हो गए. आसान मामले निपटाए जा रहे हैं. कठिन और पुराने मामले और पुराने हो रहे हैं. यह दक्षता से ज्यादा छंटाई जैसा लगता है.
एक दूसरा रास्ता भी है जिसे SEBI अपना सकता है. सेटलमेंट में गिरावट के बारे में कहा जा सकता है कि यह 2024-25 में चलने वाली एक बार की Illiquid Stock Options योजना का परिणाम थी. ऐसा नहीं है. SEBI की अपनी रिपोर्ट बताती है कि उस योजना से उस वर्ष वसूले गए ₹798.9 करोड़ में केवल ₹10.8 करोड़ आए. उसने संस्थाओं की संख्या बढ़ाई. पैसे पर उसका असर नहीं पड़ा.
233 बनाम 2
पहली नजर में एक आंकड़ा इसके विपरीत जाता दिखाई देता है. आपराधिक अभियोजन बढ़कर 65 हो गए, जो पहले 42 थे. कार्रवाई? आम व्यक्ति को यह प्रभावशाली लग सकता है. लेकिन फिर आप देखते हैं कि ये किस लिए थे.
65 में से 51 उन लोगों के खिलाफ थे जिन्हें SEBI पहले ही दंडित कर चुका था और जिन्होंने भुगतान नहीं किया था — यानी मूल रूप से पहले से लगाए गए मौद्रिक दंड की वसूली के लिए आपराधिक अदालतों का इस्तेमाल. धोखाधड़ी और अनुचित व्यापार व्यवहार (PFUTP), बाजार में हेरफेर को दंडित करने के लिए बनाई गई वही धारा, के तहत केवल दो आपराधिक अभियोजन हुए, बेहद कम.
फिर भी उसी वार्षिक रिपोर्ट में कहीं और SEBI कहता है कि PFUTP के लिए 233 संस्थाओं को दंडित किया गया. 233 नियामकीय दंड. दो आपराधिक अभियोजन. क्या इससे सवाल नहीं उठते?
अधिनिर्णयन और अभियोजन अलग-अलग वैधानिक प्रक्रियाएं हैं और इनमें सबूत के अलग-अलग मानक होते हैं. SEBI के लिए एक को दूसरे में बदलना अनिवार्य नहीं है. लेकिन तुलना फिर भी एक सवाल खड़ा करती है जिसका नियामक ने कभी जवाब नहीं दिया: SEBI के अनुसार अब बाजार में हेरफेर का किस स्तर का मामला आपराधिक अदालत के योग्य है? तीन वर्षों में इसका जवाब तीन मामले प्रतीत होता है.
यह मुख्य अभियोजन आंकड़े की चाल को भी उजागर करता है. एक नियामक आपराधिक अभियोजन में 55% की वृद्धि की घोषणा कर सकता है, जबकि उनमें से पांच में से चार मामले उन लोगों से जुड़े हों जिन्होंने पहले से लगाए गए जुर्माने का भुगतान नहीं किया. आंकड़ा कार्रवाई जैसा सुनाई देता है. लेकिन इसकी संरचना एक अलग कहानी बताती है.
तीन वर्षों में SEBI ने 149 आपराधिक अभियोजन दाखिल किए. इनमें से तीन बाजार धोखाधड़ी के लिए थे. इनके पीछे एक कब्रिस्तान है: अदालतों में 1,049 मामले लंबित हैं, जिनमें से 90% दो साल से ज्यादा पुराने हैं. 1992 से अब तक दो हजार से अधिक अभियोजनों में SEBI को 295 मामलों में दोषसिद्धि मिली है. दोषसिद्धि की तुलना में अधिक मामलों में पैसे के लिए समझौता हुआ है.
SAT में कहानी
इस बीच SEBI Securities Appellate Tribunal (SAT) में ज्यादा बार हार रहा है. उसकी पूरी तरह जीत की दर पिछले वर्ष के 73% से घटकर 41.8% रह गई. प्रतिकूल या आंशिक रूप से प्रतिकूल परिणाम तय किए गए कुल मामलों के आधे से अधिक हो गए. फाइलिंग में गिरावट के बावजूद ट्रिब्यूनल में लंबित मामलों की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई. मामले का स्वरूप मायने रखता है और एक खराब वर्ष गिरावट साबित नहीं करता. लेकिन बाकी सभी आंकड़ों के साथ इतनी बड़ी गिरावट के लिए अभी भी ऐसे स्पष्टीकरण की जरूरत है जो नहीं दिया गया है.
फिर खिड़कियां बंद हुईं, पारदर्शिता भी घटी
2024-25 की रिपोर्ट में संसद को एक स्पष्ट वाक्य में बताया गया था कि SEBI ने धारा 11 की प्रवर्तन कार्यवाही के जरिए ₹813.83 करोड़ का जुर्माना लगाया था. इसके साथ एक तालिका भी थी जिसमें 463 संस्थाओं और उनके खिलाफ की गई कार्रवाई का विवरण था.
2025-26 की रिपोर्ट में ऐसा कोई तुलनीय आंकड़ा नहीं दिया गया. इसमें प्रकाशित एकमात्र जुर्माने का आंकड़ा ₹35.5 करोड़ है, जो उसके अधिनिर्णयन अधिकारियों द्वारा लगाया गया यह एक संकीर्ण माप है, जिसे SEBI ने एक साल पहले भी बताया था, जब यह ₹50.31 करोड़ था. इसलिए दोनों रिपोर्टों में मौजूद एकमात्र जुर्माना माप पर कुल राशि 29% घटी. बड़े माप पर अब SEBI के बाहर कोई यह नहीं बता सकता, क्योंकि नियामक ने इसे प्रकाशित करना बंद कर दिया है. अचानक.
SEBI यह तर्क दे सकता है कि ₹813.83 करोड़ एक-दो असाधारण आदेशों की वजह से बढ़ा हुआ था. उसने ऐसा कभी नहीं कहा. उसने बिना विवरण के कुल राशि प्रकाशित की, यह बताने से इनकार किया कि उसमें क्या शामिल था और अब उस कुल राशि को प्रकाशित करना ही बंद कर दिया है. अगर यह आंकड़ा विकृत था, तो नियामक के पास यह बताने की पूरी स्वतंत्रता थी, किसी भी वर्ष में.
यह भी गायब हो गया: कितनी संस्थाओं को प्रतिबंधित किया गया. 2024-25 में SEBI ने बताया था कि 202 संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाया गया, 89 पर प्रतिबंध के साथ-साथ राशि लौटाने का आदेश दिया गया और 15 को केवल राशि लौटाने का आदेश दिया गया. 2025-26 के लिए इसका कोई समकक्ष आंकड़ा नहीं है.
यह भी गायब: कितने रजिस्ट्रेशन रद्द या निलंबित किए गए. “Type of Enforcement Actions Taken” शीर्षक वाली एक तालिका में 560 संस्थाओं के खिलाफ निषेधात्मक निर्देश, 28 रद्दीकरण और नौ निलंबन दर्ज थे. पूरी तालिका हटा दी गई है.
यह भी गायब: क्या SEBI सुप्रीम कोर्ट में जीतता है. पिछले साल की रिपोर्ट में कहा गया था कि 72 मामले, यानी 90%, SEBI के पक्ष में निपटाए गए और आठ उसके खिलाफ. इस साल उसने निपटाए गए मामलों की संख्या 54 तो दी है, लेकिन इसके अलावा कुछ नहीं बताया.
यह भी गायब: SEBI की अपनी निगरानी प्रणालियों से कितने प्रवर्तन आदेश शुरू हुए. एक छोटी सी तालिका, जिसे उस वर्ष चुपचाप हटा दिया गया जब नियामक ने अपने नए AI निगरानी प्लेटफॉर्म का जश्न मनाने के लिए एक पूरा अध्याय समर्पित किया.
और बाजार पर बकाया कर्ज का मुख्य आंकड़ा भी हटा दिया गया है. एक साल पहले SEBI ने लंबित रिकवरी सर्टिफिकेट पर कुल बकाया राशि ₹1,04,583 करोड़ बताई थी. नई रिपोर्ट अब कुल राशि नहीं देती. वह अलग-अलग हिस्से प्रकाशित करती है, सक्रिय प्रमाणपत्र, वसूल न की जा सकने वाली राशि, अदालत में फंसी रकम — जो मिलकर लगभग ₹1.2 लाख करोड़ बैठती है. कर्ज बढ़ गया. मुख्य आंकड़ा गायब हो गया.
SEBI नरम पड़ा और उसी समय खुद को मापना कठिन बना दिया.
बदलता हुआ मापदंड
SEBI ने जांच की गिनती का तरीका भी बदल दिया. पिछली रिपोर्ट में कॉरपोरेशन-फाइनेंस जांच को मुख्य जांच संख्या से बाहर रखा गया था. नई रिपोर्ट में उन्हें शामिल किया गया है. दोनों मुख्य आंकड़ों को लगातार पढ़ने पर प्रवर्तन की तस्वीर काफी हद तक स्थिर यहां तक कि बेहतर दिखाई देती है. लेकिन दोनों वर्षों को समान आधार पर रखें तो शुरू की गई जांच 459 से घटकर 402 और पूरी की गई जांच 356 से घटकर 338 रह गईं. नियामक ने केवल संख्या नहीं बदली. उसने यह भी बदल दिया कि संख्या का मतलब क्या था. बिना स्पष्ट सूचना के परिभाषा में ऐसा बदलाव जो मौजूदा वर्ष को बेहतर दिखाता है. दिलचस्प.
दोनों दस्तावेजों के बीच एक स्पष्ट विरोधाभास भी है: 2024-25 में मर्चेंट बैंकरों को दी गई प्रशासनिक चेतावनियां एक रिपोर्ट में 55 और दूसरी में 85 दिखाई गई हैं. एक ही वर्ष, एक ही माप, 30 पत्रों का अंतर.
वह हाथी जिसे छोड़ दिया गया
यह कोई शांत वर्ष नहीं था. 3 जुलाई 2025 को SEBI ने इंडेक्स में कथित हेरफेर के मामले में Jane Street Group से ₹4,843.57 करोड़ जब्त किए — यह नियामक के तीन दशक से अधिक के इतिहास में अपनी तरह का सबसे बड़ा आदेश था. पैसा एस्क्रो में चला गया. एक सप्ताह बाद फर्म ने कारोबार फिर शुरू कर दिया. यह मामला भारतीय बाजारों में सबसे ज्यादा निगरानी वाला मामला बना हुआ है.
उस वर्ष को कवर करने वाली वार्षिक रिपोर्ट में “Jane Street” शब्द नहीं है.
इसमें 63,176 निवेशक जागरूकता कार्यक्रम, एक AI धोखाधड़ी-पहचान प्लेटफॉर्म, Google Play के साथ साझेदारी, क्वांटम क्रिप्टोग्राफी की तैयारी और “Vibe Coding” नाम की किसी चीज में कर्मचारियों का प्रशिक्षण शामिल है. इसमें अदालत के फैसलों के सारांश के लिए 12 पेज हैं, जिनमें वे मामले भी शामिल हैं जिन्हें SEBI हार गया और एक मामला जिसमें उसे लागत चुकाने का आदेश दिया गया. लेकिन यह संसद को यह नहीं बताता कि अपनी प्रवर्तन कार्यवाही के जरिए लगाया गया कुल जुर्माना कितना था, कितनी संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाया गया, कितने रजिस्ट्रेशन रद्द किए गए या बाजार पर निवेशकों का कितना पैसा अब भी बकाया है.
एक नियामक को अपनी कार्यप्रणाली बदलने का अधिकार है. पांडे ने खुले तौर पर कहा है कि वह कम बाधाओं और अधिक अनुपातिकता के पक्ष में हैं. इतनी महत्वपूर्ण नीति का ऐलान, बचाव और मापन किया जाना चाहिए. इसे तालिकाओं में लागू किया गया और टेक्स्ट से बाहर छोड़ दिया गया. SEBI ने कहीं यह नहीं बताया कि प्रवर्तन कार्यवाही में 42% की गिरावट क्यों आई, विदेशी निवेशकों को दी जाने वाली चेतावनियां 93% क्यों घट गईं या अब वह आधी संस्थाओं की तलाशी क्यों लेता है. जब आंकड़े इतनी तेजी से गिरते हैं और उसी दस्तावेज में उन आंकड़ों के माप भी गायब हो जाते हैं, तो स्पष्टीकरण का दायित्व कम नहीं, बल्कि और बढ़ जाता है.
ये आंकड़े किसी गलत आचरण को साबित नहीं कर सकते और किसी को ऐसा दावा नहीं करना चाहिए. वे जो स्थापित करते हैं, वह यह है कि भारत का बाजार नियामक किस तरह जांच करता है, आरोप लगाता है, दंड देता है और प्रवर्तन की रिपोर्ट करता है, उसमें नाटकीय और अस्पष्ट बदलाव आया है. SEBI अपनी कार्यप्रणाली बदल सकता है. वह सजा के बजाय अनुपातिकता को चुन सकता है. वह अपनी प्रवर्तन व्यवस्था को दोबारा डिजाइन कर सकता है. लेकिन वह जनता से यह उम्मीद नहीं कर सकता कि वह इस बदलाव का आकलन उस समय करे, जब वह खुद इस बदलाव को मापने का तरीका बदल रहा हो.
इसलिए सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि SEBI नरम पड़ गया है.
बल्कि, फायदा किसे हुआ?
स्रोत: सभी आंकड़े संसद के समक्ष रखे गए दो वैधानिक दस्तावेजों से लिए गए हैं: SEBI (Annual Report) Rules, 2021 के तहत SEBI Annual Report 2024-25 (12 अगस्त 2025 को प्रकाशित) और SEBI Annual Report 2025-26 (6 अगस्त 2026 को प्रकाशित). तीन वर्षों के जांच आंकड़े सभी स्ट्रीम के समान आधार पर दिए गए हैं और इसलिए प्रत्येक रिपोर्ट में प्रकाशित मुख्य आंकड़ों से अलग हैं. 342 और 198 औपचारिक कार्यवाहियों का आंकड़ा धारा 11 के निर्देशों, मध्यस्थों से जुड़ी जांच और शुरू किए गए अधिनिर्णयन मामलों को दोनों वर्षों में समान आधार पर जोड़कर तैयार किया गया है. Jane Street के आदेश से जुड़े विवरण SEBI की जुलाई 2025 की अपनी प्रेस रिलीज से लिए गए हैं, वार्षिक रिपोर्ट से नहीं.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
पीयूष गोयल ने कहा, डिजिटल खरीद प्रक्रिया के जरिए प्लेटफॉर्म ने प्रतिस्पर्धा बढ़ाने, कीमतों की बेहतर खोज, खरीद प्रक्रिया में लगने वाले समय को कम करने और जवाबदेही मजबूत करने में मदद की है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सरकारी खरीद के लिए बनाए गवर्मेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM) ने पिछले एक दशक में तेजी से विस्तार किया है. वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के अनुसार, GeM का सकल व्यापारिक मूल्य (GMV) एक दशक पहले के ₹422 करोड़ से बढ़कर अब ₹1.55 लाख करोड़ से ज्यादा हो गया है. उन्होंने कहा कि GeM ने सरकारी खरीद प्रक्रिया को देशभर में एंड-टू-एंड डिजिटल मार्केटप्लेस की दिशा में आगे बढ़ाया है.
10 साल में सरकारी खरीद का बदला तरीका
पीयूष गोयल ने कहा कि पिछले 10 वर्षों में GeM ने सार्वजनिक खरीद की व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया है. डिजिटल खरीद प्रक्रिया के जरिए प्लेटफॉर्म ने प्रतिस्पर्धा बढ़ाने, कीमतों की बेहतर खोज, खरीद प्रक्रिया में लगने वाले समय को कम करने और जवाबदेही मजबूत करने में मदद की है. 7 अगस्त 2026 तक GeM पर शुरुआत से अब तक कुल GMV ₹20 लाख करोड़ को पार कर चुका था. इस दौरान प्लेटफॉर्म पर 3.78 करोड़ से अधिक ऑर्डर दर्ज किए गए हैं.
12.28 लाख से ज्यादा MSEs GeM पर रजिस्टर्ड
GeM पर इस समय 12.28 लाख से अधिक माइक्रो और स्मॉल एंटरप्राइजेज (MSEs) रजिस्टर्ड हैं. इनमें 2.25 लाख से ज्यादा महिला नेतृत्व वाले MSEs शामिल हैं. MSEs ने प्लेटफॉर्म पर ₹9 लाख करोड़ से अधिक के ऑर्डर पूरे किए हैं. यह GeM के कुल संचयी GMV का करीब 45.6 फीसदी है. इसके अलावा, 69,000 से अधिक SC/ST स्वामित्व वाले MSEs ने ₹23,000 करोड़ से ज्यादा मूल्य के ऑर्डर पूरे किए हैं.
महिला उद्यमियों और स्टार्टअप्स की भी बढ़ी भागीदारी
GeM पर महिला नेतृत्व वाले MSEs ने 50 लाख से ज्यादा ऑर्डर पूरे किए हैं, जिनकी कुल कीमत ₹99,800 करोड़ से अधिक है. वहीं, GeM पर रजिस्टर्ड 42,000 से ज्यादा स्टार्टअप्स ने ₹65,900 करोड़ से अधिक के संयुक्त GMV वाले ऑर्डर पूरे किए हैं. GeM का ‘स्टार्टअप रनवे’ फीचर उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) से मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स के उत्पादों को 13 अलग-अलग प्रोडक्ट कैटेगरी में प्रदर्शित करता है. इसके अलावा, ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ (ODOP) के तहत GeM ने 600 से ज्यादा प्रोडक्ट कैटेगरी वाला GeM बाजार भी तैयार किया है.
MSEs, स्टार्टअप्स और कारीगरों के लिए बढ़ी बाजार तक पहुंच
गोयल ने कहा कि GeM ने MSEs, स्टार्टअप्स, महिला उद्यमियों, स्वयं सहायता समूहों (SHGs), कारीगरों और बुनकरों के लिए सरकारी बाजार तक पहुंच आसान बनाई है. उन्होंने इन प्रयासों को सरकार के ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान से भी जोड़ा.
GeM Sahay से 25,000 से ज्यादा यूजर्स जुड़े
MSEs को सरकारी ऑर्डर के आधार पर कार्यशील पूंजी उपलब्ध कराने के लिए शुरू की गई GeM Sahay पहल से 25,000 से ज्यादा यूजर्स जुड़ चुके हैं. इसके तहत MSEs को सक्रिय सरकारी खरीद ऑर्डर के आधार पर बिना किसी कोलेटरल के वर्किंग कैपिटल फाइनेंस की सुविधा उपलब्ध कराने का लक्ष्य है.
गोयल ने कहा कि GeM आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के साथ विकसित भारत की नींव मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. उनके मुताबिक, पिछले एक दशक में प्लेटफॉर्म के विस्तार ने डिजिटल प्रक्रियाओं के जरिए सार्वजनिक खरीद के तौर-तरीकों को बदल दिया है.
सोमवार की तेज गिरावट के बावजूद रेमंड रियल्टी के शेयर ने पिछले छह महीनों में करीब 30 फीसदी का रिटर्न दिया है. कंपनी का मार्केट कैप ₹4,100 करोड़ से ज्यादा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
रेमंड रियल्टी (Raymond Realty) के जून तिमाही के नतीजे बाजार की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे. कंपनी का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 19 फीसदी घटकर ₹13.43 करोड़ रह गया. नतीजों के बाद सोमवार को निवेशकों ने शेयर में जमकर बिकवाली की, जिससे बीएसई पर रेमंड रियल्टी का शेयर करीब 10.5 फीसदी टूटकर ₹617.10 के निचले स्तर पर पहुंच गया. हालांकि, कंपनी की सेल्स बुकिंग और EBITDA में मजबूत बढ़ोतरी दर्ज की गई है.
कमाई बढ़ी, फिर भी मुनाफा क्यों घटा?
रेमंड रियल्टी ने अप्रैल-जून 2026 तिमाही के नतीजे 7 अगस्त को जारी किए थे. कंपनी का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट पिछले साल की समान तिमाही के ₹16.50 करोड़ से घटकर ₹13.43 करोड़ रह गया. यानी मुनाफे में करीब 19 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई. हालांकि, कंपनी की कुल आय में अच्छी बढ़ोतरी हुई है. जून 2026 तिमाही में कुल इनकम बढ़कर ₹535.71 करोड़ हो गई, जबकि एक साल पहले इसी अवधि में यह ₹391.86 करोड़ थी. इसके बावजूद मुनाफे पर दबाव रहा. इसकी प्रमुख वजह कंपनी के खर्च में हुई तेज बढ़ोतरी रही.
जून तिमाही में कंपनी का कुल खर्च बढ़कर ₹520.54 करोड़ हो गया, जो पिछले साल की समान तिमाही में ₹370.41 करोड़ था. यानी आय बढ़ने के साथ खर्च भी काफी तेजी से बढ़ा, जिसका सीधा असर कंपनी के मुनाफे पर पड़ा.
सेल्स बुकिंग दोगुने से ज्यादा बढ़ी
मुनाफे में गिरावट के बावजूद रेमंड रियल्टी के ऑपरेशनल प्रदर्शन में मजबूती देखने को मिली है. जून तिमाही में कंपनी की सेल्स बुकिंग ₹700 करोड़ रही, जो पिछले साल की समान तिमाही के ₹306 करोड़ से दोगुने से भी ज्यादा है. कंपनी के EBITDA में भी मजबूत बढ़ोतरी हुई है. EBITDA पिछले साल के ₹29.8 करोड़ से बढ़कर ₹61.2 करोड़ हो गया. वहीं, EBITDA मार्जिन 7.8 फीसदी से बढ़कर 11.6 फीसदी हो गया.
एक साल पहले ही शेयर बाजार में हुई थी लिस्टिंग
रेमंड रियल्टी का शेयर बाजार में सफर अभी ज्यादा पुराना नहीं है. यह रेमंड लिमिटिड से डीमर्ज होकर एक स्वतंत्र रियल्टी कारोबार के रूप में सामने आया. कंपनी के शेयर 1 जुलाई 2025 को शेयर बाजार में लिस्ट हुए थे. डीमर्जर के तहत 14 मई 2025 तक रेमंड लिमिटिड के शेयर रखने वाले निवेशकों को प्रत्येक एक शेयर के बदले रेमंड रियल्टी का एक शेयर मिला था. इससे पहले रेमंड ग्रुप ने अपने लाइफस्टाइल फैशन कारोबार को भी अलग कर रेमंड लाइफस्टाइल लिमिटिड के नाम से एक अलग लिस्टेड कंपनी बनाई थी.
6 महीने में करीब 30% का रिटर्न
सोमवार की तेज गिरावट के बावजूद रेमंड रियल्टी के शेयर ने पिछले छह महीनों में करीब 30 फीसदी का रिटर्न दिया है. कंपनी का मार्केट कैप ₹4,100 करोड़ से ज्यादा है. जून 2026 के अंत तक प्रमोटर्स के पास कंपनी की 50.93 फीसदी हिस्सेदारी थी. यानी ताजा गिरावट के बावजूद शेयर का हालिया प्रदर्शन पूरी तरह कमजोर नहीं रहा है. हालांकि, तिमाही मुनाफे में गिरावट और बढ़ते खर्च पर बाजार की नजर बनी रहेगी.
31 जुलाई तक देश की गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता 300.50 GW पहुंची, कुल स्थापित बिजली क्षमता में 54% से ज्यादा हिस्सेदारी; सौर ऊर्जा सबसे आगे
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत ने स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में एक और बड़ा मुकाम हासिल किया है. देश की गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 300 GW के पार पहुंच गई है. सरकार के मुताबिक, 31 जुलाई 2026 तक यह क्षमता बढ़कर 300.50 GW हो गई. इसके साथ ही भारत ने 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म बिजली क्षमता स्थापित करने के लक्ष्य का 60 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा हासिल कर लिया है.
कुल बिजली क्षमता में 54% से ज्यादा हिस्सेदारी
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोत अब भारत की कुल करीब 552 GW की स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता में 54 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सेदारी रखते हैं. इसमें सौर, पवन, जलविद्युत, बायो-पावर और परमाणु ऊर्जा शामिल हैं.
गैर-जीवाश्म क्षमता में सबसे बड़ा योगदान सौर ऊर्जा का है. देश में सौर ऊर्जा की स्थापित क्षमता 164.59 GW हो गई है. इसके बाद पवन ऊर्जा की क्षमता 58.14 GW और बड़ी एवं छोटी जलविद्युत परियोजनाओं की संयुक्त क्षमता 57.24 GW है. वहीं, बायो-पावर की क्षमता 11.75 GW और परमाणु ऊर्जा की क्षमता 8.78 GW है.
10 साल में सौर क्षमता करीब 165 GW पहुंची
भारत ने पिछले एक दशक में सौर ऊर्जा क्षमता में तेज विस्तार किया है. वर्ष 2014 में देश की सौर क्षमता महज 2.8 GW थी, जो अब बढ़कर करीब 165 GW हो गई है. इसी अवधि में पवन ऊर्जा की स्थापित क्षमता भी 21 GW से बढ़कर 58 GW से अधिक हो गई है.
एक साल में जुड़ी 55.29 GW गैर-जीवाश्म क्षमता
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने गैर-जीवाश्म बिजली उत्पादन क्षमता में रिकॉर्ड 55.29 GW की बढ़ोतरी की. इसमें अकेले 44.6 GW सौर ऊर्जा और 6 GW पवन ऊर्जा क्षमता शामिल थी. स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. सरकार के मुताबिक, वर्ष 2025-26 में नवीकरणीय बिजली उत्पादन बढ़कर 477.79 अरब यूनिट हो गया, जबकि वित्त वर्ष 2014-15 में यह 190.96 अरब यूनिट था. यानी करीब एक दशक में नवीकरणीय बिजली उत्पादन दोगुने से भी अधिक हो गया है.
घरेलू सोलर मैन्युफैक्चरिंग को मिल रहा बढ़ावा
सरकार ने देश में स्वच्छ ऊर्जा के घरेलू सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए कई नीतिगत कदम उठाए हैं. सरकार की मॉडल और निर्माताओं की स्वीकृत सूची (ALMM) के तहत शामिल सोलर फोटोवोल्टिक मॉड्यूल की विनिर्माण क्षमता 200 GW के पार पहुंच गई है. 2014 में यह क्षमता महज 2.3 GW थी. घरेलू स्तर पर उच्च दक्षता वाले सोलर मॉड्यूल के उत्पादन को बढ़ावा देने और आयातित उपकरणों पर निर्भरता कम करने के लिए सरकार ने उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना (PLI) योजना समेत कई प्रोत्साहन दिए हैं.
2030 तक 500 GW क्षमता का लक्ष्य
भारत ने 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादन क्षमता स्थापित करने का लक्ष्य तय किया है. यह देश की व्यापक जलवायु रणनीति का अहम हिस्सा है. 300.50 GW की क्षमता हासिल होने के साथ भारत इस लक्ष्य के 60 प्रतिशत से अधिक हिस्से को पहले ही पूरा कर चुका है.
Reliance Infrastructure समेत कई कंपनियों और पूर्व अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई, शेल कंपनियों के जरिए फंड डायवर्जन और लेयरिंग का आरोप
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अनिल अंबानी के रिलायंस ग्रुप (Reliance Group) से जुड़ी कंपनियों और पूर्व अधिकारियों के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के दो अलग-अलग मामलों में चार्जशीट दाखिल की है. एजेंसी ने फंड के डायवर्जन और शेल कंपनियों के जरिए पैसों की लेयरिंग का आरोप लगाया है. इनमें एक मामला रिलायंस इंफ्रा (Reliance Infrastructure Ltd) और दूसरा रिलायंस कम्यूनिकेशंस (RCOM), रिलायंस टेलीकॉम (RTL) और रिलायंस इंफ्राटेल (Reliance Infratel Ltd) से जुड़ा है.
रिलायंस इंफ्रा मामले में चार्जशीट दाखिल
ईडी ने शनिवार को द्वारका स्थित विशेष धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) अदालत में रिलायंस इंफ्रा, रिलायंस ग्रुप के पूर्व अधिकारी सतीश सेठ और अन्य के खिलाफ अभियोजन शिकायत यानी चार्जशीट दाखिल की. यह मामला मुंबई पुलिस की इकोनॉमिक ऑफेंसिस विंग (EOW) की जांच के बाद सामने आया. पुलिस की जांच में आरोप लगाया गया था कि फर्जी दस्तावेजों और बैंक खातों के जरिए शेल कंपनियां बनाई गईं. इन कंपनियों का इस्तेमाल कथित तौर पर फंड ट्रांसफर करने और विदेशों में पैसे भेजने के लिए किया गया. एजेंसी के मुताबिक, यह रकम बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए गए डायमंड एक्सपोर्ट से जुड़े फर्जी इनवॉइस के जरिए भेजी गई.
NHAI की चार सड़क परियोजनाओं से फंड डायवर्जन का आरोप
ईडी ने कहा कि उसकी जांच में NHAI की ओर से आवंटित चार टोल रोड परियोजनाओं से फंड डायवर्ट करने की एक संगठित योजना का पता चला है. इनमें Trichy-Karur, Trichy-Dindigul, Salem-Ulundurpet और Jaipur-Reengus परियोजनाएं शामिल हैं. एजेंसी के मुताबिक, इन परियोजनाओं को NHAI के अनुदान के साथ-साथ बैंकों और वित्तीय संस्थानों से मिले कर्ज के जरिए वित्तपोषित किया गया था.
शेल कंपनियों के जरिए पैसों की लेयरिंग का आरोप
ईडी के अनुसार, रिलायंस इंफ्रा, परियोजना-विशिष्ट स्पेशल पर्पज व्हीकल्स (SPV) या इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट एंड कंस्ट्रक्शन (EPC) ठेकेदारों से रकम निर्माण ठेकेदारों तक पहुंचाई गई. इसके बाद कथित तौर पर यह पैसा ऐसी शेल कंपनियों को ट्रांसफर किया गया, जिनका सड़क निर्माण से कोई संबंध नहीं था. एजेंसी का आरोप है कि बाद में इन लेनदेन को वास्तविक परियोजना खर्च दिखाने के लिए दस्तावेज तैयार किए गए. इसके बाद शेल कंपनियों और डायमंड कारोबारियों के जरिए रकम की लेयरिंग की गई.
सतीश सेठ न्यायिक हिरासत में
ईडी ने सतीश सेठ को जून में गिरफ्तार किया था और वह फिलहाल न्यायिक हिरासत में हैं. सेठ ने 2025 में रिलायंस ग्रुप छोड़ दिया था. एजेंसी ने बताया कि उसने रिलायंस इंफ्रा के पास मौजूद रिलायंस पावर के इक्विटी शेयरों और अचल संपत्तियों के साथ Ksheeraabd Constructions की जमीन भी अटैच की है. इन संपत्तियों की कुल कीमत करीब 187 करोड़ रुपये बताई गई है. ईडी ने कहा कि मामले में अन्य लोगों की भूमिका की जांच अभी जारी है.
RCOM और अन्य कंपनियों से जुड़े मामले में भी सप्लीमेंट्री चार्जशीट
एक अलग मामले में ईडी ने शनिवार को नई दिल्ली के राउज एवेन्यू स्थित विशेष अदालत में रिलायंस कॉम (RCOM), रिलायंस टेलीकॉम (RTL) और रिलायंस इंफ्राटेल (Reliance Infratel) से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की. यह कार्रवाई मार्च में दाखिल की गई ईडी की मुख्य चार्जशीट के बाद हुई है. यह मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के कई मामलों से जुड़ा है, जिनमें तीनों कंपनियों पर फंड आधारित और गैर-फंड आधारित क्रेडिट सुविधाओं के कथित डायवर्जन के आरोप हैं.
अमित दोषी और सतीश सेठ भी गिरफ्तार
ईडी के मुताबिक, RCOM मामले में रिलायंस ग्रुप के पूर्व अधिकारी अमित दोषी को जून में गिरफ्तार किया गया था, जबकि सतीश सेठ को जुलाई में गिरफ्तार किया गया. दोनों फिलहाल न्यायिक हिरासत में हैं. अमित दोषी ने 2020 में रिलायंस ग्रुप छोड़ दिया था. मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े इन मामलों में ईडी की जांच आगे भी जारी है और एजेंसी अन्य आरोपियों तथा कथित वित्तीय लेनदेन में शामिल लोगों की भूमिका की जांच कर रही है.