ONGC और टाटा पावर रिन्यूएबल एनर्जी के बीच हुआ MoU, इस क्षेत्र में मिलकर करेंगे काम

ONGC और टाटा पावर रिन्यूएबल एनर्जी लिमिटेड ने बैटरी ऊर्जा भंडारण समाधान पर सहयोग के लिए समझौता किया.

Last Modified:
Thursday, 13 February, 2025
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भारत की ऊर्जा महारत्न कंपनी ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन लिमिटेड (ONGC) ने टाटा पावर रिन्यूएबल एनर्जी लिमिटेड (TPREL) के साथ को एक गैर-बाध्यकारी समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए. यह समझौता बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) के क्षेत्र में सहयोग के नए अवसरों को तलाशने के लिए किया गया है. यह समझौता इंडिया एनर्जी वीक 2025 के दौरान हुआ, जिसमें TPREL के सीईओ और एमडी दीपेश नंदा और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे. 

यह साझेदारी भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने की दिशा मेंONGC की प्रतिबद्धता को दर्शाती है. इस सहयोग के तहत BESS के विभिन्न क्षेत्रों में काम किया जाएगा, जैसे:  

•    बड़े पैमाने पर ऊर्जा भंडारण प्रणाली (Utility-scale energy storage)  
•    ग्रिड को स्थिर बनाना और सहायक सेवाएं (Grid stabilization)  
•    नवीकरणीय ऊर्जा को ग्रिड में जोड़ना और हाइब्रिड समाधान (Renewable energy integration)  
•    उद्योगों और व्यवसायों के लिए ऊर्जा भंडारण (Industrial and commercial energy storage)  
•    माइक्रोग्रिड और बैकअप पावर समाधान (Microgrid and backup power)  
•    इलेक्ट्रिक वाहन (EV) चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर  

इस मौके पर ONGC के चेयरमैन और CEO, अरुण कुमार सिंह ने कहा कि "भारत स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा की ओर बढ़ रहा है, और ONGC स्वच्छ ऊर्जा पहल को आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है. टाटा पावर रिन्यूएबल एनर्जी लिमिटेड के साथ यह सहयोग ऊर्जा भंडारण क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. यह ग्रिड की स्थिरता और रिन्यूएबल एनर्जी को अपनाने के लिए जरूरी है. हम अपनी संयुक्त विशेषज्ञता का उपयोग करके भारत के ऊर्जा बदलाव और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा में योगदान देना चाहते हैं."  

TPREL के CEO और मैनेजिंग डायरेक्टर, दीपेश नंदा ने कहा कि "ONGC के साथ यह साझेदारी भारत के ऊर्जा बदलाव में एक बड़ा कदम है। बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (BESS) ग्रिड को मजबूत बनाएगी, नवीकरणीय ऊर्जा को बेहतर तरीके से जोड़ने में मदद करेगी और भारत के स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों को पूरा करने में सहायक होगी। ONGC के साथ मिलकर, हम ऐसे उन्नत भंडारण समाधान विकसित करना चाहते हैं, जो भविष्य में टिकाऊ और मजबूत ऊर्जा प्रणाली बनाने में मदद करेंगे."  

यह सहयोग भारत के 2030 तक 500 गीगावॉट (GW) गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता के लक्ष्य को पूरा करने के लिए काम करेगा और दोनों कंपनियों की स्थिरता के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है. TPREL ने पहले ही भारत की सबसे बड़ी सौर और बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (BESS) स्थापित की है—100 मेगावॉट सौर संयंत्र और 120 मेगावॉट घंटा (MWh) यूटिलिटी-स्केल BESS राजनांदगांव, छत्तीसगढ़ में. यह उन्नत ऊर्जा भंडारण तकनीकों को लागू करने में कंपनी की विशेषज्ञता को दर्शाता है. ONGC और TPREL की यह साझेदारी तकनीकी नवाचार, ऊर्जा दक्षता और स्थिरता को बढ़ावा देने का एक महत्वपूर्ण कदम है. इससे देश में एक मजबूत और विश्वसनीय ऊर्जा संरचना विकसित करने में मदद मिलेगी.
 


कोचिन शिपयार्ड में 5.04% तक हिस्सेदारी बेचेगी सरकार, बाजार भाव से 7% कम कीमत पर मिलेंगे शेयर

सरकार ने OFS का फ्लोर प्राइस 1,400 रुपये प्रति शेयर तय किया है. संस्थागत निवेशक 7 जुलाई और खुदरा निवेशक 8 जुलाई को इस पेशकश में हिस्सा ले सकेंगे.

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Tuesday, 07 July, 2026
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सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी कोचिन शिपयार्ड (Cochin Shipyard) में अपनी हिस्सेदारी बेचने का फैसला किया है. इसके लिए ऑफर फॉर सेल (OFS) लाया गया है, जिसके तहत निवेशकों को बाजार कीमत से कम दाम पर शेयर खरीदने का मौका मिलेगा. सरकार ने OFS का फ्लोर प्राइस 1,400 रुपये प्रति शेयर तय किया है, जो सोमवार के बंद भाव से करीब 7% कम है. संस्थागत निवेशक 7 जुलाई और खुदरा निवेशक 8 जुलाई को इस पेशकश में हिस्सा ले सकेंगे.

5.04% तक हिस्सेदारी बेच सकती है सरकार

सरकार पहले चरण में कोचिन शिपयार्ड की 2.52% हिस्सेदारी बेचेगी. यदि निवेशकों की ओर से अच्छी मांग मिलती है, तो अतिरिक्त 2.52% हिस्सेदारी भी बिक्री के लिए लाई जाएगी. इस तरह कुल 5.04% हिस्सेदारी OFS के जरिए बेची जा सकती है.

बाजार भाव से कम रखा गया फ्लोर प्राइस

सरकार ने OFS के लिए 1,400 रुपये प्रति शेयर का फ्लोर प्राइस तय किया है. सोमवार को कोचिन शिपयार्ड का शेयर 1,504.75 रुपये पर बंद हुआ था. इस तरह निवेशकों को बाजार मूल्य की तुलना में करीब 7% कम कीमत पर शेयर खरीदने का अवसर मिलेगा.

कब मिलेगा निवेश का मौका?

OFS के तहत आज यानी 7 जुलाई को संस्थागत निवेशक (Non-Retail Investors) बोली लगा सकेंगे. वहीं 8 जुलाई को खुदरा निवेशकों (Retail Investors) के लिए इश्यू खुलेगा.

क्या होता है OFS?

ऑफर फॉर सेल (OFS) एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके जरिए सरकार या किसी सूचीबद्ध कंपनी का बड़ा शेयरधारक अपनी मौजूदा हिस्सेदारी निवेशकों को बेचता है. इसमें कंपनी नए शेयर जारी नहीं करती, बल्कि पहले से जारी शेयरों की बिक्री की जाती है.

सरकार के पास कितनी हिस्सेदारी?

31 मार्च 2026 तक कोचिन शिपयार्ड में केंद्र सरकार की 67.92% हिस्सेदारी थी. OFS के बाद यह हिस्सेदारी कुछ कम हो जाएगी. यह बिक्री सरकार की विनिवेश रणनीति का हिस्सा है. केंद्रीय बजट 2026-27 में सरकार ने विनिवेश और परिसंपत्ति मुद्रीकरण (Asset Monetisation) के जरिए 80,000 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा है.

शेयर पर दिखा दबाव

OFS की घोषणा के बाद सोमवार को कोचिन शिपयार्ड का शेयर 1.25% की गिरावट के साथ 1,504.75 रुपये पर बंद हुआ. इससे पिछले कारोबारी सत्र में यह 1,523.75 रुपये पर बंद हुआ था. निवेशकों की नजर अब OFS को मिलने वाली प्रतिक्रिया और शेयर की आगे की चाल पर रहेगी.
 


सहकारिता क्षेत्र को मिलेगा नया विस्तार, जल्द बनेगी सहकारी जीवन बीमा कंपनी: अमित शाह

सहकारिता मंत्रालय के पांचवें स्थापना दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में अमित शाह ने कहा कि सरकार जल्द ही 'भारत टैक्सी' की तर्ज पर सहकारी यूटिलिटी एग्रीगेटर शुरू करेगी.

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Tuesday, 07 July, 2026
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केंद्र सरकार सहकारिता क्षेत्र को वित्तीय सेवाओं में मजबूत बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रही है. केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने घोषणा की कि सरकार जल्द ही इफ्को-टोक्यो की तर्ज पर एक सहकारी जीवन बीमा कंपनी स्थापित करेगी. इसके साथ ही 'भारत टैक्सी' मॉडल पर आधारित एक सहकारी यूटिलिटी एग्रीगेटर भी शुरू किया जाएगा. सरकार का मानना है कि इन पहलों से ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बीमा सेवाओं की पहुंच बढ़ेगी और सहकारी समितियों की भूमिका और मजबूत होगी.

सहकारिता क्षेत्र में बीमा सेवाओं का होगा विस्तार

सहकारिता मंत्रालय के पांचवें स्थापना दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में अमित शाह ने कहा कि सरकार जल्द ही 'भारत टैक्सी' की तर्ज पर सहकारी यूटिलिटी एग्रीगेटर शुरू करेगी. उन्होंने कहा कि सामान्य बीमा क्षेत्र में इफ्को-टोक्यो की सफलता से प्रेरणा लेते हुए अब सहकारी जीवन बीमा कंपनी बनाई जाएगी, जिससे बीमा क्षेत्र में सहकारी संस्थाओं की भागीदारी बढ़ेगी.

इफ्को-टोक्यो मॉडल से मिलेगी प्रेरणा

इफ्को-टोक्यो जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की स्थापना वर्ष 2000 में इफ्को और जापान के टोक्यो मरीन ग्रुप के संयुक्त उद्यम के रूप में हुई थी. कंपनी में इफ्को की 51% और टोक्यो मरीन ग्रुप की 49% हिस्सेदारी है. सरकार अब इसी मॉडल को आधार बनाकर सहकारी जीवन बीमा कंपनी विकसित करने की तैयारी कर रही है.

'भारत टैक्सी' का होगा विस्तार

अमित शाह ने कहा कि सहकारी मॉडल के तहत शुरू की गई 'भारत टैक्सी' योजना को अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है. सरकार अगले दो वर्षों में इसका विस्तार देश के 500 शहरों तक करने की योजना बना रही है.

वित्तीय समावेशन को मिलेगा बढ़ावा

ग्रांट थॉर्नटन भारत के पार्टनर एवं फाइनेंशियल सर्विसेज रिस्क लीडर विवेक अय्यर ने कहा कि यह पहल सहकारिता मंत्रालय के वित्तीय समावेशन के व्यापक लक्ष्य का हिस्सा है. उनके अनुसार, सहकारी संस्थाएं पहले से ही सहकारी बैंकों के माध्यम से ऋण और इफ्को-टोक्यो के जरिए सामान्य बीमा क्षेत्र में सक्रिय हैं. अब यह मॉडल जीवन बीमा क्षेत्र तक विस्तारित किया जा सकता है.

उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में सहकारी संस्थाओं की मजबूत पकड़ और लोगों के साथ उनके भरोसेमंद संबंध बीमा की पहुंच बढ़ाने और ग्राहकों तक कम लागत में सेवाएं पहुंचाने में मदद करेंगे. हालांकि, किसी भी सहकारी बीमा कंपनी की सफलता के लिए मजबूत नियामकीय निगरानी और स्पष्ट संचालन व्यवस्था जरूरी होगी.

शुरुआती चरण में है योजना

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सहकारी जीवन बीमा कंपनी की योजना फिलहाल प्रारंभिक चरण में है. शुरुआती चर्चा के मुताबिक, कंपनी के प्रवर्तक देश की प्रमुख सहकारी संस्थाएं होंगी और बाद में अन्य भागीदारों को भी शामिल किया जा सकता है. एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि कंपनी का ढांचा उन बहु-राज्य सहकारी समितियों की तरह हो सकता है, जिन्हें बीज, जैविक खेती और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए अमूल, राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी), इफ्को, कृभको और राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) ने मिलकर स्थापित किया है.

देश में पहले से हैं 26 जीवन बीमा कंपनियां

वर्तमान में भारत में 26 जीवन बीमा कंपनियां संचालित हो रही हैं. प्रस्तावित सहकारी जीवन बीमा कंपनी के शुरू होने से सहकारी क्षेत्र की भागीदारी इस उद्योग में और मजबूत होगी, साथ ही ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बीमा सेवाओं की पहुंच बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है.
 


सेंसेक्स-निफ्टी की तेजी क्या रहेगी बरकरार? आज इन शेयरों पर रखें नजर

सोमवार को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स 521.16 अंक चढ़कर 78,285.07 और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी 50 159.50 अंक की बढ़त के साथ 24,430.35 पर बंद हुआ था.

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Tuesday, 07 July, 2026
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घरेलू शेयर बाजार ने सोमवार को लगातार चौथे कारोबारी सत्र में मजबूती के साथ कारोबार समाप्त किया था. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स 521.16 अंक चढ़कर 78,285.07 और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी 50 159.50 अंक की बढ़त के साथ 24,430.35 पर बंद हुआ था. मजबूत मॉनसून की उम्मीद, विदेशी निवेशकों की खरीदारी और बैंकिंग शेयरों में तेजी ने बाजार को सहारा दिया. आज बाजार खुलने से पहले निवेशकों की नजर इस बात पर रहेगी कि क्या यह तेजी बरकरार रहती है. खासतौर पर HDFC Bank, महिंद्रा एंड महिंद्रा, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स (BEL), रिलायंस इंडस्ट्रीज और आईसीआईसीआई बैंक जैसे शेयर फोकस में रह सकते हैं. 

HDFC Bank समेत इन शेयरों ने दिखाई मजबूती

सोमवार को सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 13 बढ़त के साथ बंद हुए. HDFC Bank में सबसे अधिक 3.59% की तेजी दर्ज की गई. इसके अलावा महिंद्रा एंड महिंद्रा, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स (BEL), रिलायंस इंडस्ट्रीज, आईसीआईसीआई बैंक, मारुति सुजुकी, भारती एयरटेल, इटरनल, सन फार्मा, एशियन पेंट्स, टाटा स्टील, टाइटन और लार्सन एंड टुब्रो के शेयर भी बढ़त के साथ बंद हुए. वहीं दूसरी ओर कोटक महिंद्रा बैंक में सबसे अधिक 3.93% की गिरावट रही. इसके अलावा TCS, बजाज फिनसर्व, पावर ग्रिड, HCL Tech, अल्ट्राटेक सीमेंट, इंडिगो, इंफोसिस, ITC, बजाज फाइनेंस, टेक महिंद्रा, एक्सिस बैंक, भारतीय स्टेट बैंक (SBI), ट्रेंट, हिंदुस्तान यूनिलीवर और NTPC के शेयरों में गिरावट दर्ज की गई.

ब्रॉडर मार्केट में भी रही खरीदारी

ब्रॉडर मार्केट में भी निवेशकों का रुझान सकारात्मक रहा. निफ्टी मिडकैप इंडेक्स 0.45% और निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स 0.75% की बढ़त के साथ बंद हुए. सेक्टरवार प्रदर्शन की बात करें तो निफ्टी रियल्टी इंडेक्स छह महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गया, जबकि निफ्टी ऑटो इंडेक्स एक महीने के उच्च स्तर पर बंद हुआ. निफ्टी ऑयल एंड गैस और निफ्टी कंज्यूमर ड्यूरेबल्स इंडेक्स में भी अच्छी खरीदारी देखने को मिली.

आज इन शेयरों पर रहेगी निवेशकों की नजर

आज के कारोबार में कई शेयर निवेशकों के रडार पर रह सकते हैं. राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) ने टोरेंट फार्मास्यूटिकल्स और जेबी केमिकल्स एंड फार्मास्युटिकल्स के विलय को मंजूरी दे दी है. वरुण बेवरेजेज की केन्या इकाई ने करीब 305 करोड़ रुपये में देवयानी फूड इंडस्ट्रीज केन्या के डेयरी बेवरेज, जूस और पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर कारोबार के अधिग्रहण का समझौता किया है. हेक्सावेयर टेक्नोलॉजीज ने अमेरिकी कंपनी स्मार्टरेंट के साथ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित समाधान विकसित करने के लिए रणनीतिक साझेदारी की है. एम्बेसी डेवलपमेंट्स 1,170 करोड़ रुपये तक के डिबेंचर जारी कर अतिरिक्त पूंजी जुटाएगी. RITES को दक्षिण अफ्रीका से 35.82 मिलियन डॉलर का लोकोमोटिव आपूर्ति ऑर्डर मिला है. प्रिमो केमिकल्स ने फ्लो टेक केमिकल्स में शेष 51% हिस्सेदारी खरीदने को मंजूरी दी है. कॉनकॉर्ड एनवायरो सिस्टम्स के मुख्य वित्तीय अधिकारी अनीश गोयल ने इस्तीफा दे दिया है. सेजवन के ग्रोथ ओई फंड ने कर्णिका इंडस्ट्रीज में 3.2% हिस्सेदारी खरीदी है. एवेन्यू सुपरमार्ट्स (डीमार्ट) ने 300 करोड़ रुपये के कमर्शियल पेपर्स जारी किए हैं, जबकि ब्लू जेट हेल्थकेयर ने अपना क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट (QIP) शुरू कर 531.70 रुपये प्रति शेयर का फ्लोर प्राइस तय किया है. इसके अलावा जून तिमाही के कारोबारी अपडेट भी निवेशकों के फोकस में रहेंगे. ट्रेंट का स्टैंडअलोन राजस्व 19% बढ़कर 5,666 करोड़ रुपये, जुबिलेंट फूडवर्क्स का समेकित राजस्व 14.1% बढ़कर 2,569.3 करोड़ रुपये और टाइटन कंपनी का घरेलू कारोबार 37% तथा अंतरराष्ट्रीय कारोबार 128% बढ़ा है. इन सभी घटनाक्रमों के चलते आज इन शेयरों में अच्छी-खासी हलचल देखने को मिल सकती है.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
 


अभिनेता कुणाल कपूर ने लॉन्च किया MetaGO, मोटापा और मेटाबॉलिक बीमारियों के इलाज के लिए नया हेल्थ प्लेटफॉर्म

मेटागो को क्राउडफंडिंग मंच केट्टो (Ketto) के संस्थापकों ने तैयार किया है. कंपनी का कहना है कि भारत में तेजी से बढ़ रही मोटापा और उपापचय संबंधी बीमारियों की चुनौती से निपटने के लिए यह एक समग्र स्वास्थ्य सेवा मॉडल लेकर आई है.

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Monday, 06 July, 2026
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अभिनेता और उद्यमी कुणाल कपूर ने सोमवार को 'मेटागो' (MetaGO) नामक एक डॉक्टर-आधारित उपापचय स्वास्थ्य मंच (मेटाबॉलिक हेल्थ प्लेटफॉर्म) लॉन्च करने की घोषणा की. यह मंच मोटापा और उससे जुड़ी उपापचय संबंधी बीमारियों से जूझ रहे लोगों को संगठित चिकित्सा देखभाल, जांच सुविधाएं और दीर्घकालिक चिकित्सकीय सहयोग उपलब्ध कराने के उद्देश्य से विकसित किया गया है.

मेटागो को क्राउडफंडिंग मंच केट्टो (Ketto) के संस्थापकों ने तैयार किया है. कंपनी का कहना है कि भारत में तेजी से बढ़ रही मोटापा और उपापचय संबंधी बीमारियों की चुनौती से निपटने के लिए यह एक समग्र स्वास्थ्य सेवा मॉडल लेकर आई है.

केट्टो के अनुभव से जन्मा मेटागो का विचार

मेटागो के संस्थापक कुणाल कपूर, वरुण शेट और जहीर अडेनवाला को इस मंच का विचार केट्टो के साथ एक दशक से अधिक समय तक काम करने के दौरान मिला. इस दौरान उन्होंने हजारों ऐसे परिवारों के साथ काम किया, जो गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए आर्थिक सहायता जुटा रहे थे.

संस्थापकों ने देखा कि टाइप-2 डायबिटीज (Type 2 Diabetes), हृदय रोग, मोटापा और अन्य उपापचय संबंधी बीमारियां न केवल मरीजों बल्कि उनके परिवारों पर भी भारी आर्थिक और मानसिक बोझ डालती हैं. उनका मानना है कि इन बीमारियों की शुरुआत कई वर्ष पहले ही हो जाती है, लेकिन उपचार तब शुरू होता है, जब स्थिति गंभीर हो चुकी होती है.

डॉक्टरों की निगरानी में मिलेगा व्यक्तिगत उपचार

मेटागो का उद्देश्य केवल वजन कम कराना नहीं, बल्कि लोगों के उपापचय स्वास्थ्य में दीर्घकालिक सुधार लाना है. यह मंच डॉक्टरों की सलाह, उपापचय आकलन, व्यक्तिगत उपचार योजना, चिकित्सकीय रूप से उपयुक्त जीएलपी-1 उपचार, पोषण संबंधी मार्गदर्शन, व्यायाम प्रशिक्षण और नियमित स्वास्थ्य निगरानी जैसी सेवाओं को एक साथ उपलब्ध कराता है.

इस मॉडल में वजन प्रबंधन को अल्पकालिक उपाय के बजाय एक निरंतर स्वास्थ्य यात्रा के रूप में देखा गया है, जिससे लोग समय के साथ स्वस्थ जीवनशैली अपना सकें.

'हम वजन घटाने वाली कंपनी नहीं बना रहे' : कुणाल कपूर

मेटागो के सह-संस्थापक कुणाल कपूर ने कहा, "केट्टो के साथ 14 वर्षों तक काम करने के दौरान हमने हजारों परिवारों को गंभीर स्वास्थ्य संकट का सामना करते देखा. इससे यह स्पष्ट हुआ कि मधुमेह, मोटापा और अन्य उपापचय संबंधी बीमारियां वर्षों पहले ही विकसित होना शुरू हो जाती हैं.

यही सोच मेटागो की शुरुआत का कारण बनी. हम कोई वजन घटाने वाली कंपनी नहीं बना रहे हैं. हमारा ध्यान उस समय पर है, जब सही हस्तक्षेप शल्य चिकित्सा नहीं बल्कि डॉक्टर की सलाह हो सकती है."

उन्होंने कहा कि जीएलपी-1 उपचार ने मोटापे के इलाज में नई संभावनाएं पैदा की हैं, लेकिन केवल दवा पर्याप्त नहीं है. स्थायी परिणाम तभी मिलते हैं, जब दवा के साथ डॉक्टरों की निगरानी, संतुलित पोषण, व्यवहार में बदलाव और निरंतर सहयोग भी मिले.

विशेषज्ञ चिकित्सा सेवाएं घर-घर तक पहुंचाने का लक्ष्य

मेटागो के सह-संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी वरुण शेट ने कहा कि भारत ने स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन अब आवश्यकता ऐसी व्यवस्था की है, जो उपापचय संबंधी देखभाल को निरंतर और अधिक समन्वित बनाए.

उन्होंने कहा कि मेटागो शुरुआत से ही डॉक्टर-आधारित मॉडल पर काम करेगा और सेवाएं लोगों के घर तक पहुंचाएगा. कंपनी का लक्ष्य उन उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाओं को हर भारतीय तक पहुंचाना है, जो अब तक सीमित वर्ग के लोगों के लिए उपलब्ध थीं.

चिकित्सकीय निगरानी में अधिक प्रभावी है जीएलपी-1 उपचार

मेटागो की चिकित्सा सलाहकार समिति के सदस्य और हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. कौशल पटेल  ने कहा कि जीएलपी-1 उपचार ने मोटापे के इलाज के विकल्पों का विस्तार किया है, लेकिन इसका अधिकतम लाभ तभी मिलता है, जब इसे चिकित्सकीय निगरानी, नियमित उपापचय परीक्षण और स्वस्थ जीवनशैली के साथ जोड़ा जाए.

35 से अधिक जैव संकेतकों की होगी जांच

मेटागो से जुड़ने वाले प्रत्येक सदस्य का 35 से अधिक जैव संकेतकों (बायोमार्कर्स) के आधार पर विस्तृत उपापचय परीक्षण किया जाएगा. इसके साथ विस्तृत चिकित्सकीय मूल्यांकन भी होगा. रिपोर्ट के आधार पर अंतःस्रावी रोग विशेषज्ञ, मधुमेह विशेषज्ञ, हृदय रोग विशेषज्ञ या आंतरिक चिकित्सा विशेषज्ञ व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति और लक्ष्यों के अनुरूप व्यक्तिगत उपचार योजना तैयार करेंगे.

जहां चिकित्सकीय रूप से आवश्यक होगा, वहां जीएलपी-1 उपचार भी योजना का हिस्सा होगा. इसके साथ डॉक्टरों की नियमित निगरानी, पोषण विशेषज्ञों की सलाह, व्यायाम प्रशिक्षण और समय-समय पर स्वास्थ्य समीक्षा जारी रहेगी.

मुंबई पुलिस के लिए लगाया निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर

समुदाय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के तहत मेटागो ने हाल ही में मुंबई पुलिस (Mumbai Police) के लिए एक निःशुल्क उपापचय स्वास्थ्य शिविर आयोजित किया, जिसमें रक्त जांच और मौके पर चिकित्सकों से परामर्श की सुविधा उपलब्ध कराई गई.

कंपनी ने बताया कि आने वाले महीनों में विभिन्न पेशेवर समूहों के लिए भी ऐसे सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, ताकि उपापचय स्वास्थ्य के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाई जा सके.
 


जिस गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम का सभी को इंतजार था, वह दरअसल एक MCX सर्कुलर निकला

सरकार जिस योजना को तीसरी बार नए रूप में लॉन्च करने के संकेत दे रही है, जिसने एक दशक में केवल 38 टन सोना जुटाया था, उसी काम को दो पन्नों के एक एक्सचेंज सर्कुलर ने चुपचाप कर दिखाया है, जो बैंक नहीं कर सके: एक ऐसी व्यवस्था तैयार कर दी है, जो घरेलू सोने को रिफाइनरी की भट्ठी से सीधे फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट तक पहुंचाती है, न बैंक, न डिपॉजिट सर्टिफिकेट, न कोई योजना.

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Monday, 06 July, 2026
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पलक शाह

पिछले दो सप्ताह से सोने का बाजार सांस रोके हुए है. सूत्रों के हवाले से आई रिपोर्टों में कहा गया है कि केंद्र सरकार जल्द ही गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम का नया संस्करण घोषित करने वाली है, ज्वैलर्स को "कलेक्शन पार्टनर" बनाया जाएगा, 1,000 टन से अधिक सोना जुटाने का लक्ष्य होगा और घोषणा "अगले दो सप्ताह के भीतर" की जाएगी. इसकी वजह, कथित तौर पर, प्रधानमंत्री की नागरिकों से एक वर्ष तक सोने की खरीद टालने की अपील को बताया जा रहा है. उद्योग संगठनों ने भी उत्साहपूर्वक अपने अनुमान पेश किए हैं: यदि भारत के घरों में मौजूद 25,000 टन सोने का केवल 5% भी मोनेटाइज कर लिया जाए, तो 90 अरब डॉलर की तरलता उपलब्ध हो सकती है.

हालांकि, सरकार की सोच से परिचित लोगों का कहना है कि ऐसी कोई योजना आने वाली नहीं है. और यहां वह असहज करने वाला तथ्य है, जिसे पहले से प्रेस विज्ञप्तियां तैयार कर रहे लोगों को समझना चाहिए: ऐसी किसी योजना की आवश्यकता भी नहीं है. भारतीय परिवारों के सोने का मोनेटाइजेशन पहले ही शुरू हो चुका है, किसी मंत्रालय के जरिए नहीं, बल्कि 1 जुलाई को जारी और 13 जुलाई से प्रभावी MCX सर्कुलर संख्या MCX/PMT/375/2026 के माध्यम से, जिसे बुलियन कारोबार से बाहर शायद ही किसी ने पढ़ने की जहमत उठाई हो.

सर्कुलर वास्तव में क्या करता है

यह सर्कुलर, BIS मानक वाले सोने के लिए मई में MCX द्वारा किए गए गुड डिलीवरी नॉर्म्स संशोधन की निरंतरता में जारी किया गया है. इसके तहत तीन घरेलू रिफाइनरों M. D. Overseas, Kundan Refinery और Zaveri and Company को पैनल में शामिल किया गया है. साथ ही पहले से सूचीबद्ध चार रिफाइनरों, Titan (Tanishq), Augmont, Parker Precious Metals और Sovereign Metals की गुड डिलीवरी सूची का विस्तार MCX के सभी गोल्ड फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट्स तक किया गया है, जिसमें विशेष रूप से बेंचमार्क 1 किलोग्राम गोल्ड कॉन्ट्रैक्ट भी शामिल है. अब सात भारतीय रिफाइनर LBMA सप्लायर्स के साथ मिलकर भारत के सबसे अधिक तरल गोल्ड कॉन्ट्रैक्ट के निपटान के लिए क्रमांकित, 995 शुद्धता वाले गोल्ड बार डिलीवर कर सकते हैं.

यदि परिशिष्टों से आगे पढ़ा जाए, तो इसका महत्व समझना कठिन नहीं है. ये रिफाइनर सोना खनन नहीं करते. उनका कच्चा माल मुख्य रूप से पुनर्चक्रित (रीसाइकल्ड) सोना होता है,  पुराने आभूषण, सिक्के और स्क्रैप, जिन्हें वे परिवारों, ज्वैलर्स और एग्रीगेटर्स से खुले बाजार में खरीदते हैं. अब तक इस रीसाइक्लिंग प्रक्रिया का उत्पाद अपारदर्शी भौतिक बाजार तक ही सीमित रहता था.

13 जुलाई से यह प्रक्रिया एक अनिवार्य डिलीवरी वाले फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट पर समाप्त होगी, जिसमें पारदर्शी एक्सचेंज-आधारित मूल्य निर्धारण, चरणबद्ध टेंडर, रैंडम आवंटन और क्लियरिंग कॉरपोरेशन द्वारा गारंटीकृत सेटलमेंट होगा. अब रुद्रपुर या रामपुरा में किसी घर के लॉकर में रखा एक ग्राम सोना भी औपचारिक वित्तीय प्रणाली तक पहुंचने का एक पूर्ण और ऑडिट योग्य मार्ग रखता है: रिफाइनर उसे खरीदेगा, BIS मानक वाले बार में पिघलाएगा और अहमदाबाद, मुंबई या नई दिल्ली में GOLD फ्यूचर्स शॉर्ट के विरुद्ध उसकी डिलीवरी करेगा. न बैंक शाखा. न डिपॉजिट रसीद. न ब्याज दर पर मोलभाव. न कोई योजना.

अर्थशास्त्र भी पहले ही इसके पक्ष में खड़ा हो चुका है. आयात शुल्क के कारण विदेशी सोने की लैंडेड लागत बढ़ गई है, जिससे पुनर्चक्रित घरेलू सोना किसी भी रिफाइनर के लिए सबसे सस्ता कच्चा माल बन गया है. वहीं प्रधानमंत्री की खरीद टालने की अपील के बाद ज्वैलर्स का कहना है कि उनके कारोबार का 40–60% हिस्सा पुराने सोने की रीसाइक्लिंग और एक्सचेंज की ओर स्थानांतरित हो गया है. यानी आपूर्ति स्वयं बाजार तक पहुंच रही है. MCX का यह सर्कुलर उसे संस्थागत रूप से आगे बढ़ने का रास्ता देता है.

जो योजना दो बार विफल हुई, उसे तीसरी बार फिर बेचा जा रहा है

इसकी तुलना उस व्यवस्था के रिकॉर्ड से कीजिए, जिसे सरकार बार-बार पुनर्जीवित करने का वादा करती रही है. गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम (GMS) को 2015 में ठीक उसी उद्देश्य के साथ शुरू किया गया था, जिसकी आज फिर चर्चा हो रही है: सोने के आयात को कम करना, चालू खाते के घाटे को नियंत्रित करना और घरों में निष्क्रिय पड़े सोने को आर्थिक गतिविधि में लाना. एक दशक बाद, वित्त मंत्रालय के अपने आंकड़े बताते हैं कि इस योजना के तहत लगभग 38 टन सोना ही जुटाया जा सका, जबकि भारतीय परिवारों के पास लगभग 25,000 टन सोना होने का अनुमान है. यानी सफलता की दर लगभग 0.15% रही. मार्च 2025 में सरकार ने चुपचाप इस योजना की मध्यम अवधि और दीर्घकालिक जमा योजनाओं को, नवीनीकरण सहित, समाप्त कर दिया और केवल अल्पकालिक बैंक जमा को किसी तरह जारी रखा.

और "ज्वैलर्स को शामिल करने" का विचार भी नया नहीं है. यह वही पुराना विचार है, जिसे सोने से भी कम सावधानी से दोबारा प्रस्तुत किया जा रहा है. अप्रैल 2021 में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा GMS में किए गए संशोधनों में यही व्यवस्था पहले ही लागू की जा चुकी थी, ज्वैलर्स और रिफाइनर Collection and Purity Testing Centres (CPTCs) तथा Gold Mobilisation Collection Testing Agents बन सकते थे, और बैंक उन्हें हैंडलिंग इंसेंटिव के रूप में 1.5% तक भुगतान कर सकते थे. पूरी संरचना पहले से मौजूद थी. संक्षिप्त नाम (Acronyms) भी मौजूद थे. केवल सोना नहीं आया, क्योंकि इस योजना का मूल प्रस्ताव भारतीय परिवारों के व्यवहार के सामने कभी टिक नहीं पाया: अपने आभूषण बैंक को पिघलाने के लिए सौंप दीजिए, बदले में 2.25–2.5% ब्याज और एक टैक्स ट्रेल प्राप्त कीजिए, और अंत में अपने कंगन नहीं, बल्कि एक सोने की बार वापस लीजिए. भारतीय परिवारों ने लगातार दस वर्षों तक इसे तर्कसंगत रूप से अस्वीकार किया. CPTCs का नाम बदलकर "कलेक्शन पार्टनर" कर देने से उत्तर नहीं बदलता, केवल प्रेस विज्ञप्ति बदलती है.

1,000 टन सोना जुटाने का अनुमान विशेष रूप से आलोचना का पात्र है. जनता से यह अपेक्षा की जा रही है कि वह विश्वास करे कि जो ढांचा दस वर्षों में केवल 38 टन सोना जुटा सका, वही अब उससे 26 गुना अधिक सोना जुटा लेगा, केवल इसलिए क्योंकि जिन ज्वैलर्स को 2021 में पहले ही शामिल किया जा चुका था, उन्हें इस बार "एजेंट" के बजाय "पार्टनर" कहा जाएगा. अब तक सामने आई किसी भी व्यवस्था में यह नहीं बताया गया है कि यह अतिरिक्त शून्य आखिर आएगा कहां से.

बाजार ने दिल्ली का इंतजार नहीं किया

असल कहानी यह है कि समस्या का समाधान किसने किया. गोल्ड मोनेटाइजेशन हमेशा एक ऐसी तकनीकी व्यवस्था (Plumbing Problem) थी, जिसे नीति (Policy) का रूप दे दिया गया था: घरेलू सोने के लिए एक विश्वसनीय मूल्यांकनकर्ता (Assayer), एक मानकीकृत उत्पाद, पारदर्शी मूल्य और एक सुनिश्चित खरीदार की आवश्यकता थी. GMS ने यह चारों काम बैंकों से कराने की कोशिश की. लेकिन जिन बैंकों का मंगलसूत्र पिघलाने के कारोबार से स्वाभाविक रूप से कोई संबंध नहीं था, वे इनमें से कोई भी काम प्रभावी ढंग से नहीं कर पाए. इसके विपरीत, रिफाइनर-से-एक्सचेंज की व्यवस्था अपने ढांचे में ही ये चारों सुविधाएं उपलब्ध कराती है, BIS मानक की शुद्धता, क्रमांकित बार, स्पॉट मार्केट से जुड़े सेटलमेंट मूल्य और क्लियरिंग कॉरपोरेशन को प्रतिपक्ष (Counterparty) के रूप में. परिवार को जमा पर 2.5% ब्याज नहीं मिलता, बल्कि उसे उस सोने का पूरा, तत्काल और एक्सचेंज-आधारित मूल्य मिल जाता है, जिसे वह वैसे भी कभी बैंक में जमा नहीं कराने वाला था. यह मोनेटाइजेशन का कोई कमतर रूप नहीं है. वास्तव में यही वह एकमात्र तरीका है, जिसने दुनिया में कहीं भी बड़े पैमाने पर सफलता हासिल की है: रीसाइक्लिंग के माध्यम से एक तरल बाजार में प्रवेश.

बिना कोई बदलाव किए, केवल हिंदी अनुवाद

यहां एक विडंबना है, जिसका आनंद लिया जाना चाहिए. वही नीति-तंत्र, जो अब GMS का तीसरा संस्करण तैयार कर रहा है, उसने इसी महीने पूंजी बाजारों में बैंकों की भागीदारी को सीमित करने के कदम उठाए हैं, RBI के नए कोलेटरल संबंधी निर्देशों ने 1 जुलाई से एक्सचेंजों में कारोबार की मात्रा को बुरी तरह प्रभावित किया है. एक ओर नियामक बैंकों को बाजार की इस संरचना (Market Plumbing) से बाहर निकाल रहा है, वहीं दूसरी ओर सरकार बैंकों (और अब बैंकों को रिपोर्ट करने वाले ज्वैलर्स) को फिर उसी सोना संग्रह (Gold Collection) के कारोबार में धकेलना चाहती है, जिसमें वे दो बार विफल हो चुके हैं. इस बीच, एक्सचेंज इकोसिस्टम ने स्वयं पहल करते हुए और 2019 से लागू मौजूदा SEBI विनियमों के तहत, बिना किसी प्रोत्साहन राशि, कर छूट या लॉन्च कार्यक्रम की मांग किए, पूरी प्रक्रिया को सफलतापूर्वक जोड़ दिया है.

यदि सरकार वास्तव में मदद करना चाहती है, तो उसके लिए ईमानदार कार्यसूची छोटी और साधारण है: रीसाइक्लिंग के लिए बेचे जाने वाले सोने पर पूंजीगत लाभ (Capital Gains) के कर प्रावधानों को तर्कसंगत बनाया जाए, BIS Assaying प्रणाली की विश्वसनीयता बनाए रखी जाए और पैनल में शामिल रिफाइनरों की सूची का विस्तार होने दिया जाए. बाजार को जिस चीज़ की आवश्यकता नहीं है, वह है उस योजना का चौथा संस्करण, जिसका पूरे एक दशक का परिणाम एक मध्यम आकार के बैंक के एक ही वॉल्ट में समा सकता है और जिसकी घोषणा, एक बार फिर, "अगले दो सप्ताह में" किए जाने की बात कही जा रही है.

सोना पहले ही चलना शुरू हो चुका है. वह चंगोदर, मानेसर, होसुर और नरोदा से होकर गुजर रहा है, 995 शुद्धता वाले गोल्ड बार में परिवर्तित हो रहा है और MCX तक पहुंच रहा है. गोल्ड मोनेटाइजेशन पर समाचार मीडिया में आ रही रिपोर्टों के सूत्रों को शायद कोई यह बात बता दे.

MCX सर्कुलर संख्या MCX/PMT/375/2026 दिनांक 1 जुलाई 2026, 13 जुलाई 2026 से प्रभावी, 17 मई 2026 के सर्कुलर MCX/PMT/292/2026 की निरंतरता में जारी किया गया. GMS के तहत जुटाए गए सोने के आंकड़े मार्च 2025 तक के वित्त मंत्रालय के डेटा पर आधारित हैं. पुनर्गठित (Revamped) योजना की कोई घोषणा नहीं होने का दावा इस विषय से परिचित लोगों पर आधारित है.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


RBI की बैंक गारंटी सख्ती से सुरक्षित नहीं रहा MCX, मार्जिन बुक ने खोली असली तस्वीर

RBI के नए बैंक गारंटी नियमों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी एक्सचेंज पर असर केवल उसके प्रोडक्ट पोर्टफोलियो से नहीं, बल्कि उसकी मार्जिन संरचना और फंडिंग व्यवस्था से भी तय होता है.

Last Modified:
Monday, 06 July, 2026
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पलक शाह

कमोडिटी एक्सचेंज MCX की क्लियरिंग कॉरपोरेशन में जमा कुल मार्जिन का लगभग 60% हिस्सा फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) और बैंक गारंटी के रूप में है. इसके मुकाबले BSE की क्लियरिंग इकाई में यह हिस्सा लगभग 30% और NSE की क्लियरिंग इकाई में करीब 34% है. प्रीमियम वॉल्यूम में लगातार तीन कारोबारी सत्रों से आ रही गिरावट यह संकेत देती है कि बाजार को अब इस वास्तविकता का एहसास हुआ है.

जब भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नए बैंक गारंटी नियम आखिरकार 1 जुलाई से लागू हुए और ब्रोकरों तथा प्रोप ट्रेडिंग डेस्क्स को लगातार दूसरी तिमाही में भी कोई राहत नहीं मिली, तब आम धारणा यह थी कि MCX इस बदलाव से सबसे कम प्रभावित रहने वाला एक्सचेंज होगा. तर्क यह दिया जा रहा था कि कमोडिटी डेरिवेटिव्स में फ्यूचर्स का दबदबा है. विश्लेषकों के अनुसार, विकल्प (ऑप्शंस) से जुड़ी इन्वेंट्री और मार्जिन की समस्या, जिसे नए नियमों का सबसे बड़ा असर माना जा रहा था, कच्चे तेल और सोने के फ्यूचर्स पर लागू नहीं होती. साथ ही, यह भी माना जा रहा था कि वर्षों से नियामकीय और कर संबंधी बदलावों के कारण इस सेगमेंट में पहले ही लीवरेज काफी कम हो चुका है. इस प्रकाशन ने भी पिछले सप्ताह इसी तरह का एक तर्क प्रस्तुत किया था.

लेकिन जुलाई के पहले तीन कारोबारी सत्रों ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया. बुधवार को MCX का ऑप्शंस प्रीमियम कारोबार घटा, गुरुवार को इसमें और गिरावट आई तथा शुक्रवार को भी यह लगातार कम हुआ. बाजार सहभागियों का मानना है कि इसका सीधा कारण RBI के नए कोलेटरल नियम हैं, जिनका असर अनुमान से कहीं अधिक बड़ा साबित हो रहा है.

इक्विरस (Equirus) ने नए नियम लागू होने के बाद शुरुआती कारोबारी सत्रों की समीक्षा करते हुए कहा कि ऑप्शंस प्रीमियम कारोबार में गिरावट केवल BSE तक सीमित नहीं रही, जहां एक्सपायरी डे के वॉल्यूम जून की शुरुआत के स्तर से 24% से 37% तक कम रहे, बल्कि MCX में भी हाल के सत्रों में इसी तरह की गिरावट देखने को मिली. दिलचस्प बात यह है कि जुलाई की शुरुआत से पहले MCX का ऑप्शंस कारोबार मजबूत गति में था. जून में जहां फ्यूचर्स कारोबार घटा, वहीं ऑप्शंस का औसत दैनिक कारोबार (Average Daily Turnover) महीने-दर-महीने 8% बढ़ा था.

वह आंकड़ा जिस पर किसी की नजर नहीं गई: 60%

MCX पर असर अनुमान से अधिक क्यों पड़ा, इसका जवाब उसके प्रोडक्ट मिक्स में नहीं बल्कि उसकी क्लियरिंग व्यवस्था के आंकड़ों में छिपा है. RBI का नया नियम फ्यूचर्स और ऑप्शंस के बीच अंतर नहीं करता, बल्कि यह देखता है कि एक्सचेंज के सदस्य अपने मार्जिन की व्यवस्था किस तरह करते हैं. और इस पैमाने पर देखा जाए तो भारत में सबसे अधिक जोखिम MCX पर है, सबसे कम नहीं.

क्लियरिंग कॉरपोरेशनों ICCL, NCL और MCXCCL के आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2025 तक इक्विटी और कमोडिटी बाजारों में कुल मार्जिन 9,750 अरब रुपये (करीब 9.75 लाख करोड़ रुपये) था, जो एक वर्ष पहले के 8,209 अरब रुपये की तुलना में लगभग 19% अधिक है.

इस कुल मार्जिन पूल में MCXCCL की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत छोटी है. इसके पास 546.5 अरब रुपये का मार्जिन है, जो पूरे उद्योग के कुल मार्जिन का लगभग 6% है. इसके मुकाबले BSE की ICCL की हिस्सेदारी लगभग 9% और NSE की NCL की हिस्सेदारी करीब 86% है.

हालांकि, अब सबसे महत्वपूर्ण बात आकार नहीं बल्कि मार्जिन की संरचना (Composition) है. MCXCCL के 546.5 अरब रुपये के मार्जिन में से 324.2 अरब रुपये यानी 59.3% हिस्सा फिक्स्ड डिपॉजिट और बैंक गारंटी के रूप में है. यही वे दो बैंक-आधारित साधन हैं, जिन पर RBI के नए नियमों का सबसे अधिक प्रभाव पड़ रहा है.

BSE में यही अनुपात लगभग 30% (850.4 अरब रुपये में से 256.6 अरब रुपये) है, जबकि NSE की क्लियरिंग कॉरपोरेशन में यह लगभग 34% (8,353 अरब रुपये में से 2,838 अरब रुपये) है. यानी MCX की क्लियरिंग प्रणाली बैंक-आधारित कोलेटरल पर अपने दोनों प्रमुख प्रतिस्पर्धियों की तुलना में लगभग दोगुनी निर्भर है.

कमोडिटी ट्रेडिंग डेस्क बैंक गारंटी पर सबसे अधिक निर्भर क्यों थीं

MCX की मार्जिन बुक का बाकी हिस्सा भी बहुत अधिक राहत नहीं देता. ब्रोकरों से प्राप्त नकद मार्जिन केवल 56.9 अरब रुपये है, जो कुल मार्जिन का लगभग 10% है. सरकारी प्रतिभूतियां, जिन पर नए नियमों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता कुल मार्जिन का 10% से भी कम हिस्सा हैं.

कोलेटरल के रूप में गिरवी रखे गए इक्विटी शेयरों (72.9 अरब रुपये, लगभग 13%) पर अब RBI के नए नियमों के तहत न्यूनतम 40% हेयरकट लागू होगा. इसी तरह, म्यूचुअल फंड यूनिट्स (27.8 अरब रुपये) पर भी समान नियम लागू होंगे.

यदि इन सभी आंकड़ों को जोड़कर देखा जाए, तो MCXCCL के कुल मार्जिन पूल का केवल लगभग एक-चौथाई हिस्सा, जिसमें नकद, सरकारी प्रतिभूतियां और गैर-नकद सोने (Non-Cash Gold) का 10.9 अरब रुपये का छोटा पोर्टफोलियो शामिल है, ऐसे साधनों में है, जिन पर नए नियमों का असर नहीं पड़ेगा. यानी कुल मार्जिन का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा या तो सीधे नए प्रतिबंधों से प्रभावित होगा या उस पर अतिरिक्त हेयरकट लागू होगा.

कमोडिटी डेरिवेटिव्स में भारतीय बाजार के सबसे ऊंचे मार्जिन रेट्स में से कुछ लागू होते हैं. कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के कॉन्ट्रैक्ट्स में शुरुआती मार्जिन सामान्य तौर पर दो अंकों में होता है और बाजार में अस्थिरता बढ़ने पर यह और अधिक हो सकता है.

ऐसे में कमोडिटी बाजार में कारोबार करने वाली मध्यम आकार की प्रोप ट्रेडिंग फर्मों और ब्रोकरेज कंपनियों के लिए इतनी बड़ी राशि नकद मार्जिन के रूप में रखना आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं था.

बैंक गारंटी, जो अक्सर किसी फिक्स्ड डिपॉजिट के आधार पर जारी की जाती थी, उन्हें कम पूंजी लगाकर अधिक मार्जिन उपलब्ध कराने का माध्यम बनती थी. उदाहरण के तौर पर, यदि किसी सदस्य के पास 50 रुपये की अपनी पूंजी होती, तो बैंक गारंटी के जरिए वह MCXCCL के पास 100 रुपये का कोलेटरल दिखा सकता था.

लेकिन अब Commercial Banks – Credit Facilities Amendment Directions, 2026 के तहत प्रत्येक बैंक गारंटी को 100% कोलेटरल से समर्थित होना अनिवार्य कर दिया गया है, जिसमें कम से कम आधा हिस्सा नकद होना चाहिए. इसका अर्थ है कि सस्ती लीवरेज की व्यवस्था समाप्त हो गई है, और इसका सबसे अधिक असर उसी बाजार पर पड़ा है जहां इसका सबसे अधिक उपयोग किया जाता था.

यही वह व्यवस्था है, जिसे ब्लूमबर्ग ने घरेलू प्रोप ट्रेडिंग उद्योग के लिए "बड़ा झटका" बताया था. कर्णा स्टॉक ब्रोकिंग के कार्तिक पी. के अनुसार, बैंक गारंटी पर निर्भर कंपनियों की प्रभावी ट्रेडिंग क्षमता लगभग आधी रह जाएगी. पहले जहां वे अपनी पूंजी का लगभग 1.7 गुना कारोबार कर सकती थीं, वहीं अब यह क्षमता घटकर लगभग 0.85 गुना रह जाएगी.

हालांकि, शुरुआती आकलनों में एक बड़ी चूक हुई. 1 जुलाई से पहले अधिकांश अनुमान इक्विटी इंडेक्स ऑप्शंस पर केंद्रित थे, जहां प्रोप ट्रेडिंग डेस्क का योगदान लगभग 40% माना जाता है. MCX को अपेक्षाकृत कम प्रभावित होने वाला एक्सचेंज माना गया था.

लेकिन क्लियरिंग आंकड़े इसके बिल्कुल विपरीत तस्वीर पेश करते हैं. अपने कुल मार्जिन पूल के अनुपात में देखा जाए तो किसी भी अन्य भारतीय एक्सचेंज की तुलना में MCX के सदस्यों की फंडिंग सबसे अधिक बैंक-आधारित है.

दोहरी चुनौती से जूझ रहा है MCX

MCX के सामने एक और बड़ी चुनौती यह है कि उसके पास वे "शॉक एब्जॉर्बर" नहीं हैं, जिनका लाभ इक्विटी बाजारों के बड़े एक्सचेंज उठा सकते हैं.

उदाहरण के लिए, NSE के ऑप्शंस बाजार में प्रतिभागियों का आधार काफी व्यापक और विविध है. इसमें विदेशी हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग (HFT) फर्म, FPI और GIFT City के माध्यम से आने वाले विदेशी निवेशक, संस्थागत निवेशक और बड़ी संख्या में खुदरा निवेशक शामिल हैं. यदि घरेलू प्रोप ट्रेडिंग डेस्क का कारोबार कम भी हो जाए, तो इन अन्य प्रतिभागियों के जरिए बाजार में लिक्विडिटी बनी रह सकती है.

BSE की स्थिति भी कुछ हद तक ऐसी ही है. भले ही उसका कारोबार मुख्य रूप से थोक निवेशकों पर आधारित हो, लेकिन उसे सेंसेक्स से जुड़े खुदरा निवेशकों का भी समर्थन प्राप्त है.

इसके विपरीत, MCX का कारोबार काफी हद तक उन्हीं घरेलू प्रोप ट्रेडिंग फर्मों और जॉबर्स पर निर्भर है, जो अब RBI के नए कोलेटरल नियमों से सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं.

स्थिति को और कठिन यह तथ्य बनाता है कि विदेशी मार्केट मेकर्स आसानी से उनकी जगह नहीं ले सकते. बैंक, बीमा कंपनियां और अधिकांश विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की कमोडिटी डेरिवेटिव्स में भागीदारी अब भी सीमित है. भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के अध्यक्ष भी पहले स्पष्ट कर चुके हैं कि RBI और IRDAI इस विषय पर अभी भी प्रतिबंधात्मक रुख बनाए हुए हैं.

इस प्रकार, एक ओर नए नियम MCX के प्रमुख लिक्विडिटी प्रदाताओं पर दबाव डाल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर नियामकीय प्रतिबंध संभावित वैकल्पिक प्रतिभागियों को बाजार में आने से रोक रहे हैं. यही कारण है कि जिस एक्सचेंज को सबसे सुरक्षित माना जा रहा था, वहीं जुलाई के पहले तीन कारोबारी सत्रों में लगातार ऑप्शंस प्रीमियम वॉल्यूम में गिरावट दर्ज की गई.

आधिकारिक आंकड़ों में अभी नहीं दिखेगा पूरा असर

फिलहाल इन बदलावों का पूरा प्रभाव आधिकारिक आंकड़ों में दिखाई नहीं देगा. MCX जुलाई महीने के कारोबार के आंकड़े अपनी मासिक रिपोर्ट में जारी करेगा, जबकि क्लियरिंग कॉरपोरेशनों की अगली रिपोर्ट से यह स्पष्ट होगा कि नए नियम लागू होने के बाद मार्जिन के स्वरूप  में कितना बदलाव आया है.

फिर भी, बाजार में कारोबार के रुझानों से दिशा स्पष्ट दिखाई देने लगी है और दिसंबर 2025 की मार्जिन बुक यह समझने के लिए पर्याप्त संकेत देती है कि इसका असर किस तरह पड़ रहा है.

जून महीने में बाजार इस बात पर चर्चा कर रहा था कि RBI के नए नियमों से किस एक्सचेंज के ऑप्शंस कारोबार पर सबसे अधिक असर पड़ेगा. लेकिन संभव है कि यह सवाल ही गलत था.

असल मुद्दा कभी ऑप्शंस बनाम फ्यूचर्स नहीं था. वास्तविक सवाल यह था कि कौन-से बाजार प्रतिभागी अपनी बैलेंस शीट के लिए सबसे अधिक बैंक गारंटी और बैंक-आधारित कोलेटरल पर निर्भर थे. और इस पैमाने पर देखा जाए, तो MCX शुरुआत से ही सबसे आगे था.

दिसंबर 2025 तक के मार्जिन आंकड़ों का स्रोत: ICCL, NCL और MCXCCL.
BSE के नकद मार्जिन का अनुमान कुल मार्जिन के 2% के आधार पर लगाया गया है, क्योंकि ICCL नकद, फिक्स्ड डिपॉजिट और बैंक गारंटी को एक साथ दर्शाता है.
NSE के आंकड़े उद्योग के कुल आंकड़ों में से BSE और MCX के आंकड़े घटाकर निकाले गए हैं.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 

 


डायमंड पावर के शेयर में जोरदार उछाल, ₹435 करोड़ का ऑर्डर मिलते ही लगा अपर सर्किट

डायमंड पावर इन्फ्रास्ट्रक्चर ने शेयर बाजार को दी जानकारी में बताया कि उसे 435.71 करोड़ रुपये का नया कॉन्ट्रैक्ट मिला है. यह ऑर्डर हैदराबाद में विकसित हो रहे 310 मेगावाट क्षमता वाले डेटा सेंटर प्रोजेक्ट से जुड़ा है.

Last Modified:
Monday, 06 July, 2026
BWHindia

भारतीय शेयर बाजार में तेजी के बीच मल्टीबैगर स्टॉक डायमंड पावर इन्फ्रास्ट्रक्चर एक बार फिर निवेशकों के रडार पर आ गया है. कंपनी को 435.71 करोड़ रुपये का नया ऑर्डर मिलने के बाद सोमवार को इसके शेयर में 10 फीसदी का अपर सर्किट लग गया. पिछले पांच वर्षों में यह स्टॉक निवेशकों को 2.57 लाख फीसदी (257,276%) से अधिक का रिटर्न दे चुका है और नए ऑर्डर के बाद इसमें एक बार फिर खरीदारी का माहौल देखने को मिला.

435 करोड़ रुपये का मिला बड़ा ऑर्डर

डायमंड पावर इन्फ्रास्ट्रक्चर ने शेयर बाजार को दी जानकारी में बताया कि उसे 435.71 करोड़ रुपये का नया कॉन्ट्रैक्ट मिला है. यह ऑर्डर हैदराबाद में विकसित हो रहे 310 मेगावाट क्षमता वाले डेटा सेंटर प्रोजेक्ट से जुड़ा है. इस परियोजना के तहत कंपनी लार्सन एंड टुब्रो (L&T) और ब्लू स्टार जैसी प्रमुख कंपनियों को हाई और लो टेंशन पावर केबल्स की आपूर्ति करेगी. बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इस बड़े ऑर्डर से कंपनी की ऑर्डर बुक और राजस्व दोनों को मजबूती मिलेगी.

ऑर्डर की खबर से शेयर में लगा अपर सर्किट

नए प्रोजेक्ट की घोषणा के बाद निवेशकों ने कंपनी के शेयरों में जोरदार खरीदारी की. कारोबार के दौरान शेयर में 10 फीसदी का अपर सर्किट लगा और इसका भाव करीब 218.77 रुपये तक पहुंच गया. विश्लेषकों के अनुसार, मजबूत ऑर्डर बुक और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में कंपनी की बढ़ती हिस्सेदारी निवेशकों का भरोसा बढ़ा रही है.

5 साल में दिया 2.57 लाख फीसदी से ज्यादा रिटर्न

डायमंड पावर इन्फ्रास्ट्रक्चर उन चुनिंदा शेयरों में शामिल है, जिन्होंने लंबी अवधि के निवेशकों को असाधारण रिटर्न दिया है. पिछले पांच वर्षों में इस शेयर ने 257,276.47 फीसदी का रिटर्न दिया है, जो भारतीय शेयर बाजार के सबसे चर्चित मल्टीबैगर रिटर्न में से एक माना जाता है. इसी शानदार प्रदर्शन की वजह से यह स्टॉक एक बार फिर निवेशकों और बाजार विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय बन गया है.

निवेशकों की नजर आगे की ग्रोथ पर

बाजार जानकारों का मानना है कि यदि कंपनी को इसी तरह बड़े ऑर्डर मिलते रहे और परियोजनाओं का समय पर निष्पादन होता रहा, तो आने वाले समय में भी इसके प्रदर्शन पर निवेशकों की नजर बनी रह सकती है. हालांकि, किसी भी शेयर में निवेश करने से पहले कंपनी की वित्तीय स्थिति, मूल्यांकन और जोखिमों का आकलन करना जरूरी है.
 


5,000 करोड़ रुपये के IPO की तैयारी में Cube Highways Trust, इस महीने हो सकता है लॉन्च

पूरी तरह ऑफर फॉर सेल (OFS) होगा इश्यू. 27 हाईवे प्रोजेक्ट्स और 36,842 करोड़ रुपये की AUM के साथ निवेशकों का दायरा बढ़ाने और लिक्विडिटी मजबूत करने पर कंपनी का फोकस.

Last Modified:
Monday, 06 July, 2026
BWHindia

हाईवे इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में निवेश करने वाले निवेशकों के लिए जल्द ही एक बड़ा अवसर आने वाला है. क्यूब हाईवेज ट्रस्ट (Cube InvIT) इस महीने करीब 5,000 करोड़ रुपये का आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (IPO) लॉन्च कर सकता है. यह इश्यू पूरी तरह ऑफर फॉर सेल (OFS) होगा, जिसमें मौजूदा निवेशक अपनी हिस्सेदारी बेचेंगे. कंपनी का उद्देश्य निवेशकों की संख्या बढ़ाना, यूनिट्स की लिक्विडिटी में सुधार करना और भविष्य के विस्तार को गति देना है.

पूरी तरह OFS होगा IPO

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, क्यूब हाईवेज ट्रस्ट का प्रस्तावित IPO पूरी तरह ऑफर फॉर सेल होगा. यानी इस इश्यू के तहत कंपनी कोई नई यूनिट या शेयर जारी नहीं करेगी. इसके बजाय मौजूदा निवेशक अपनी हिस्सेदारी बेचेंगे. ऐसे में IPO से मिलने वाली राशि कंपनी के पास नहीं जाएगी, बल्कि शेयर बेचने वाले निवेशकों को मिलेगी.

देशभर में फैला है हाईवे पोर्टफोलियो

31 मार्च 2026 तक क्यूब हाईवेज ट्रस्ट के पास 12 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में फैले 27 परिचालन हाईवे प्रोजेक्ट्स हैं. इनकी कुल लंबाई 8,754 लेन किलोमीटर है, जबकि इन परियोजनाओं की औसत शेष कंसेशन अवधि करीब 18 वर्ष है.

टोल और एन्युटी एसेट्स का संतुलित पोर्टफोलियो

कंपनी के पोर्टफोलियो का लगभग 85 फीसदी हिस्सा टोल रोड परियोजनाओं का है, जिससे ट्रैफिक बढ़ने और टोल दरों में समय-समय पर होने वाले संशोधन का लाभ मिलता है. वहीं, शेष 15 फीसदी हिस्सा एन्युटी एसेट्स का है, जिनसे भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) की निर्धारित भुगतान व्यवस्था के तहत नियमित और स्थिर आय प्राप्त होती है.

कंपनी की रणनीति क्या है?

क्यूब हाईवेज ट्रस्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) विनय सी. सेकर ने वार्षिक रिपोर्ट में कहा कि कंपनी की रणनीति अनुशासित अधिग्रहण, नियमित निवेशक वितरण, वित्तीय अनुशासन और परिचालन दक्षता पर आधारित रहेगी. उन्होंने कहा कि ट्रस्ट भविष्य में भी उच्च गुणवत्ता वाली सड़क परियोजनाओं का अधिग्रहण कर अपने पोर्टफोलियो का विस्तार करता रहेगा.

निवेशकों को मिला मजबूत वितरण

वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान क्यूब हाईवेज ट्रस्ट ने प्रति यूनिट 13.77 रुपये का वितरण घोषित किया. पूरे वित्त वर्ष में ट्रस्ट ने अपने यूनिटधारकों को 1,851 करोड़ रुपये का कुल वितरण किया.

वित्तीय स्थिति रही मजबूत

मार्च 2026 के अंत तक ट्रस्ट की एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) बढ़कर 36,842 करोड़ रुपये हो गई. इस वृद्धि में वित्त वर्ष के दौरान किए गए 9 नए अधिग्रहणों का महत्वपूर्ण योगदान रहा. हालांकि, इसी अवधि में ट्रस्ट का शुद्ध कर्ज (Net Debt) बढ़कर 17,768 करोड़ रुपये रहा, जबकि नेट डेट-टू-एंटरप्राइज वैल्यू अनुपात 46.82 फीसदी दर्ज किया गया.

आगे और विस्तार की तैयारी

क्यूब हाईवेज ट्रस्ट ने करीब 7,300 करोड़ रुपये के संयुक्त एंटरप्राइज वैल्यू वाले चार नए हाईवे प्रोजेक्ट्स के लिए कमिटमेंट लेटर पर हस्ताक्षर किए हैं. इनके जुड़ने के बाद ट्रस्ट का पोर्टफोलियो बढ़कर 13 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में 31 हाईवे एसेट्स तक पहुंच जाएगा.

इसके अलावा, ट्रस्ट ने अपने स्पॉन्सर की तीन अन्य सड़क परियोजनाओं पर राइट ऑफ फर्स्ट ऑफर (ROFO) भी हासिल किया है, जिससे भविष्य में विस्तार की संभावनाएं और मजबूत होंगी.
 


2036 तक भारत की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा ग्रोथ इंजन बनेगा मिडिल क्लास: निर्मला सीतारमण

वित्त मंत्री के अनुसार, वर्तमान में भारत की करीब 31 फीसदी आबादी मिडिल क्लास में शामिल है. वर्ष 1995 से इस वर्ग की आबादी में औसतन 6.3 फीसदी सालाना वृद्धि दर्ज की गई है.

Last Modified:
Monday, 06 July, 2026
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केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भारत की आर्थिक विकास यात्रा को लेकर बड़ा अनुमान जताया है. उन्होंने कहा कि वर्ष 2036 तक देश के कुल उपभोक्ता खर्च का 93 फीसदी हिस्सा मिडिल क्लास और एस्पिरेशनल कंज्यूमर्स से आएगा, जिससे यह वर्ग भारत की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा ग्रोथ इंजन बन जाएगा. उन्होंने कहा कि आर्थिक विकास अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि टियर-2 और टियर-3 शहर भी देश की विकास कहानी के प्रमुख केंद्र बनेंगे.

2036 तक मिडिल क्लास बनेगा अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत

फ्रांस में आयोजित 'Rencontres Economiques d'Aix-en-Provence' सम्मेलन में बोलते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि भारत का मध्यम वर्ग अब केवल आर्थिक विकास का लाभार्थी नहीं, बल्कि उसका सबसे बड़ा चालक (Growth Engine) बनने जा रहा है. उनके मुताबिक, 2036 तक देश में होने वाले कुल उपभोक्ता खर्च का 93 फीसदी हिस्सा मिडिल क्लास और बेहतर जीवन की आकांक्षा रखने वाले उपभोक्ताओं से आएगा.

500 शहर बनेंगे नए आर्थिक केंद्र

निर्मला सीतारमण ने कहा कि भारत की आर्थिक गतिविधियां अब केवल मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे महानगरों तक सीमित नहीं रहेंगी. आने वाले वर्षों में करीब 500 शहर नए आर्थिक केंद्र बनकर उभरेंगे. उन्होंने कहा कि भारत का मिडिल क्लास तेजी से टियर-2 और टियर-3 शहरों में विस्तार कर रहा है. इससे संपत्ति, निवेश और कारोबार का दायरा बड़े शहरों से निकलकर छोटे शहरों तक पहुंचेगा, जिससे संतुलित आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा.

तेजी से बढ़ रहा है भारत का मिडिल क्लास

वित्त मंत्री के अनुसार, वर्तमान में भारत की करीब 31 फीसदी आबादी मिडिल क्लास में शामिल है. वर्ष 1995 से इस वर्ग की आबादी में औसतन 6.3 फीसदी सालाना वृद्धि दर्ज की गई है. उन्होंने OECD के अनुमान का हवाला देते हुए कहा कि 2030 से 2035 के बीच मिडिल क्लास आबादी के मामले में भारत चीन को भी पीछे छोड़ सकता है.

जनधन से लेकर डिजिटल इंडिया तक, सरकार की रणनीति

निर्मला सीतारमण ने कहा कि सरकार ने कम आय वाले लोगों को मिडिल क्लास में शामिल करने के लिए कई बड़े कदम उठाए हैं. वर्ष 2014 में शुरू की गई प्रधानमंत्री जनधन योजना के जरिए करोड़ों लोगों को पहली बार औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ा गया. विश्व बैंक और IMF के आंकड़ों के अनुसार, 24.8 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर निकले हैं, जिनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो पहली बार बैंकिंग सिस्टम से जुड़े.

आसान लोन और डिजिटल सुविधाओं से बढ़ा कारोबार

वित्त मंत्री ने बताया कि सरकार ने बिना गारंटी वाले आसान ऋण उपलब्ध कराकर छोटे कारोबार शुरू करने को बढ़ावा दिया. इसके साथ ही डिजिटल भुगतान और बैंकिंग सेवाओं को स्मार्टफोन के अलावा फीचर फोन और क्षेत्रीय भाषाओं में भी उपलब्ध कराया गया, जिससे छोटे व्यवसायों की वित्तीय पहुंच और क्रेडिट क्षमता मजबूत हुई.

टैक्स राहत से बढ़ी लोगों की खर्च करने की क्षमता

सीतारमण ने कहा कि सरकार ने आयकर में राहत देकर मध्यम वर्ग को बड़ी सुविधा दी है. इनकम टैक्स छूट की सीमा 2.5 लाख रुपये से बढ़ाकर 12 लाख रुपये किए जाने से लोगों के हाथ में अधिक डिस्पोजेबल इनकम आई है.

इसके अलावा कई वस्तुओं पर GST दरों में कटौती, हर परिवार के लिए 5 लाख रुपये तक का कैशलेस स्वास्थ्य बीमा और जन औषधि केंद्रों पर 80 फीसदी तक सस्ती जेनेरिक दवाओं जैसी योजनाओं ने भी परिवारों का आर्थिक बोझ कम किया है.

युवाओं के स्किल डेवलपमेंट पर सरकार का फोकस

वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार भविष्य की अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखते हुए युवाओं के कौशल विकास पर विशेष जोर दे रही है. इसके तहत प्रत्येक जिले में STEM शिक्षा के लिए छात्रावासों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है और देश में पांच यूनिवर्सिटी टाउनशिप विकसित की जा रही हैं.

साथ ही युवाओं को AVGC (Animation, Visual Effects, Gaming and Comics) जैसे उभरते क्षेत्रों में प्रशिक्षित किया जा रहा है, ताकि वे फिल्म, OTT और वैश्विक एक्सपोर्ट इंडस्ट्री की मांग को पूरा कर सकें.

मिडिल क्लास ही भारत की विकास यात्रा का इंजन

निर्मला सीतारमण ने कहा कि सरकार के आर्थिक सुधारों और कल्याणकारी योजनाओं का उद्देश्य मिडिल क्लास को मजबूत बनाना है. उनका मानना है कि जब लोगों की आय और खर्च करने की क्षमता बढ़ती है, तो इसका सीधा असर निवेश, कारोबार, रोजगार और आर्थिक विकास पर पड़ता है.

उन्होंने कहा कि आने वाले दशक में भारत का मध्यम वर्ग ही देश की आर्थिक प्रगति का सबसे बड़ा आधार बनेगा और भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था की अग्रणी ताकतों में शामिल करने में अहम भूमिका निभाएगा.
 


मीडिया और एक्सपीरिएंशियल इकोनॉमी में योगदान के लिए डॉ. अनुराग बत्रा को मिला विशेष सम्मान

नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में केंद्रीय पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने BW Businessworld और exchange4media Group के संस्थापक डॉ. अनुराग बत्रा को मीडिया, उद्योग और प्रोफेशनल कम्युनिटी निर्माण में उल्लेखनीय योगदान के लिए विशेष सम्मान दिया.

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Monday, 06 July, 2026
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मीडिया, विज्ञापन और एक्सपीरिएंशियल इकोनॉमी के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले BW Businessworld के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ और exchange4media Group** के संस्थापक डॉ. अनुराग बत्रा को विशेष सम्मान से सम्मानित किया गया है. यह सम्मान केंद्रीय पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में प्रदान किया. यह सम्मान मीडिया, उद्योग और नॉलेज कम्युनिटी को मजबूत बनाने में उनके ढाई दशक से अधिक के योगदान की पहचान है.

मीडिया और उद्योग जगत में योगदान को मिली पहचान

डॉ. अनुराग बत्रा को यह सम्मान मीडिया, विज्ञापन, मार्केटिंग, इवेंट्स, टेक्नोलॉजी और बिजनेस से जुड़े क्षेत्रों में मजबूत संस्थानों, प्रोफेशनल मंचों और उद्योग समुदायों के निर्माण के लिए दिया गया. पिछले 26 वर्षों में उन्होंने ऐसे कई प्लेटफॉर्म विकसित किए, जिन्होंने उद्योग जगत में संवाद, नवाचार और नेतृत्व को नई दिशा दी.

सम्मान मिलने पर क्या बोले डॉ. अनुराग बत्रा

सम्मान प्राप्त करने के बाद डॉ. अनुराग बत्रा ने कहा कि यह सम्मान उनके लिए गर्व का विषय है. उन्होंने कहा कि भारत की एक्सपीरिएंशियल इकोनॉमी आज कारोबार, संस्कृति और नवाचार का मजबूत आधार बन चुकी है और इस क्षेत्र के विकास में योगदान देने का अवसर मिलना उनके लिए सौभाग्य की बात है. उन्होंने कहा कि यह सम्मान उन्हें ऐसे मंच और समुदाय विकसित करने के लिए और अधिक प्रेरित करेगा, जो समाज और उद्योग पर दीर्घकालिक सकारात्मक प्रभाव छोड़ें.

26 वर्षों में बनाया देश का अग्रणी मीडिया नेटवर्क

डॉ. अनुराग बत्रा ने 26 वर्ष पहले exchange4media Group की स्थापना की थी. आज यह समूह मीडिया, विज्ञापन और मार्केटिंग उद्योग के सबसे प्रभावशाली नेटवर्क में शामिल है. इसके अंतर्गत exchange4media.com, samachar4media.com, IMPACT और Pitch जैसे प्रतिष्ठित ब्रांड संचालित किए जा रहे हैं. समूह ने अब तक 50 से अधिक प्रमुख इंडस्ट्री प्लेटफॉर्म, अवॉर्ड्स और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टीज विकसित की हैं, जिन्होंने विज्ञापन, डिजिटल मीडिया, ब्रॉडकास्टिंग, पब्लिक रिलेशंस, टेक्नोलॉजी और क्रिएटर इकोनॉमी से जुड़े हजारों पेशेवरों को एक मंच पर जोड़ा है.

BW Businessworld को दिया नया स्वरूप

वर्ष 2013 में डॉ. बत्रा ने BW Businessworld का अधिग्रहण किया. इसके बाद उन्होंने इस पारंपरिक बिजनेस मैगजीन को प्रिंट, डिजिटल, वीडियो, रिसर्च, इवेंट्स और प्रोफेशनल कम्युनिटी आधारित 360 डिग्री मीडिया संगठन के रूप में विकसित किया. आज यह प्लेटफॉर्म मार्केटिंग, हेल्थकेयर, शिक्षा, हॉस्पिटैलिटी, टेक्नोलॉजी, सस्टेनेबिलिटी, गवर्नेंस और लीगल जैसे कई क्षेत्रों में विशेष प्रकाशनों और कार्यक्रमों के माध्यम से अपनी मजबूत पहचान बना चुका है.

वैश्विक स्तर पर भी बनाई पहचान

डॉ. अनुराग बत्रा की पहचान केवल भारत तक सीमित नहीं है. वर्ष 2024 में उन्हें इंटरेनशनल एकेडमी ऑफ टेलीविजन आर्ट्स एंड साइंसेज (International Academy of Television Arts & Sciences) का सदस्य चुना गया, जो International Emmy Awards से जुड़ी प्रतिष्ठित वैश्विक संस्था है. उन्होंने वर्ष 2024 और 2025 में नई दिल्ली में International Emmy Awards की सेमीफाइनल जजिंग की मेजबानी भी की, जिससे भारतीय मीडिया उद्योग और वैश्विक संस्थाओं के बीच सहयोग को नई मजबूती मिली.

शिक्षा और स्टार्टअप इकोसिस्टम में भी सक्रिय भूमिका

मीडिया उद्यमिता के अलावा डॉ. बत्रा ने प्रबंधन शिक्षा और संस्थागत विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है. वे मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट (MDI) के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के सदस्य रह चुके हैं और संस्थान के प्रमुख PGPM कार्यक्रम के पहले पूर्व छात्र थे, जिन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी गई. इसके अलावा उन्होंने मीडिया, टेक्नोलॉजी और उपभोक्ता क्षेत्र के कई स्टार्टअप्स में निवेश और मार्गदर्शन देकर युवा उद्यमियों को आगे बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाई है.

'Content, Connect and Context' रही सफलता की आधारशिला

डॉ. अनुराग बत्रा ने अपने पूरे करियर में "Content, Connect and Context" के सिद्धांत को आगे बढ़ाया है. उनका मानना है कि विश्वसनीय कंटेंट, मजबूत नेटवर्क और उद्योग की गहरी समझ का समन्वय ही किसी संस्थान को दीर्घकालिक सफलता दिलाता है.

भारत की एक्सपीरिएंशियल इकोनॉमी को दी नई दिशा

डॉ. अनुराग बत्रा के नेतृत्व में आयोजित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, समिट, अवॉर्ड्स और नेतृत्व मंचों ने हजारों उद्योग विशेषज्ञों, उद्यमियों, नीति-निर्माताओं और प्रोफेशनल्स को एक साथ जोड़ने का काम किया है. मीडिया और एक्सपीरिएंशियल इकोनॉमी को मजबूत बनाने में उनके बहुआयामी योगदान को देखते हुए केंद्रीय पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत द्वारा दिया गया यह विशेष सम्मान उनकी उपलब्धियों की महत्वपूर्ण पहचान माना जा रहा है.