रक्षाबंधन के अवसर पर टाटा दे रहा iPhone 15 जीतने का मौका! ऐसे करें आवेदन

इस त्यौहारी सीजन में Tata अपने ग्राहकों के लिए एक नया ऑफर लाया है. इसमें कुछ लकी विनर्स को iPhone 15 जीतने का मौक मिलेगा. 

Last Modified:
Saturday, 17 August, 2024
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अगर आप कोई नया ब्रॉडबैंड कनेक्शन लेने का विचार कर रहे हैं, तो ये खबर आपके लिए बहुत काम की है. दरअसल, टाटा प्ले फाइबर (Tata Play Fiber) आपके लिए एक नया ऑफर लेकर आया है, जिसके तहत टाटा प्ले की FTTH (फाइबर-टू-द-होम) आर्म ने 'Everybody Wins' ऑफर की घोषणा की है. यह एक लिमिटेड पीरियड ऑफर है, जिसमें नए सब्सक्राइबर्स को कंपनी की तरफ से iPhone 15 (128GB) सहित कई शानदार गिफ्ट में दिए जाएंगे, जिन्हें पाकर आपक दिल खुश हो जाएगा. तो आइए जानते हैं आप इस ऑफर का लाभ कैसे और कब तक उठा सकते हैं?

23 अगस्त तक मिल रहा है ये ऑफर
अगर आप टाटा प्ले फाइबर के यूजर हैं, तो आप इस ऑफर का लाभ ले सकते हैं. ये ऑफर 14 अगस्त से लेकर 23 अगस्त तक मिल रहा है. इसमें आपको आईफोन (iPhone 15- 128GB) के अलावा अमेरिकन टूरिस्टर के बैकपैक, स्विगी वाउचर या मूवी टिकट भी दिए जा रहे हैं. इस ऑफर के तहत नए ग्राहकों को कंपनी की ओर से एक सुनिश्चित गिफ्ट दिया जाएगा. 

इन्हें मिलेगा ऑफर का लाभ
यह ऑफर 50Mbps से लेकर 1Gbps तक की स्पीड वाले प्लान लेने वाले यूजर्स के लिए लागू होगा. नया कनेक्शन खरीदने पर यूजर को व्हील स्पिन करने का मौका मिलेगा और उस व्हील पर चार गिफ्ट - आईफोन 15 (128GB), अमेरिकन टूरिस्टर बैकपैक, मूवी कपल टिकट और स्विगी वाउचर हैं. इन चारों में से आपको कुछ भी मिल सकता है. लेकिन ध्यान रहे कि यह ऑफर टाटा ग्रुप के कर्मचारियों, वेंडर्स या एंटरप्राइज क्लाइंट के लिए उपलब्ध नहीं है.

फ्री गिफ्ट के लिए करना होगा ये काम
अगर आप भी इस ऑफर का लाभ हासिल करना चाहते हैं तो आपको ऑनलाइन अप्लाई करना होगा. सक्सेसफुल रजिस्ट्रेशन के बाद ही ग्राहकों को गिफ्ट रिडेम्पशन पोर्टल पर जाकर व्हील स्पिन करने का मौका मिलेगा.
1. यूजर्स को इस ऑफर का लाभ हासिल करने के लिए Tata Play Fiber ऐप पर जाना होगा.
2. यहां पर आपको मोर सेक्शन और माय रिवॉर्ड सेक्शन में जाना होगा. 
3. ग्राहकों को एक्टिवेशन की तारीख से 48 घंटों के भीतर कूपन कोड के साथ रजिस्टर करने के लिए एक लिंक दिया जाएगा.
4. यूजर्स द्वारा जीता गया कोई भी फिजिकल गिफ्ट (जैसे कि आईफोन या फिर बैग पैक) 7 से 10 दिनों के अंदर डिलीवर किया जाएगा.
5. वाउचर और मूवी टिकट रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर या फिर ईमेल आईडी पर 48 घंटों के अंदर मिल जाएगा.

6. कंपनी के अनुसार लिंक और कूपन कोड मिलने की तारीख से 7 दिनों के अंदर कूपन कोड को रिडीम करना होगा, ताकि आप इस लाभ को प्राप्त करने से न चूकें. इसकी वैधता 30 दिनों की है.

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चार हफ्तों में 51.1 अरब डॉलर घटा भारत का विदेशी मुद्रा भंडार, रिकॉर्ड स्तर से भारी गिरावट

भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार चौथे सप्ताह गिरावट दर्ज की गई है. 2 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में भंडार 12.752 अरब डॉलर घटकर 734.606 अरब डॉलर रह गया. पिछले चार सप्ताह में इसमें कुल 51.1 अरब डॉलर की कमी आई है. इस दौरान विदेशी मुद्रा आस्तियों और सोने के भंडार के मूल्य में भी गिरावट आई है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 10 October, 2026
Last Modified:
Saturday, 10 October, 2026
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भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) में लगातार गिरावट का सिलसिला जारी है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से शुक्रवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक, 2 अक्टूबर 2026 को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 12.752 अरब डॉलर घट गया. इससे पिछले सप्ताह इसमें 18.343 अरब डॉलर की कमी आई थी. वहीं, 18 सितंबर को समाप्त सप्ताह में 14.881 अरब डॉलर और 11 सितंबर को समाप्त सप्ताह में 4.924 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई थी.

इस तरह पिछले चार सप्ताह में भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में कुल 51.1 अरब डॉलर की कमी आई है. इसके साथ ही भंडार 4 सितंबर 2026 को दर्ज 785.706 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर से घटकर 734.606 अरब डॉलर रह गया है. गौरतलब है कि 4 सितंबर तक लगातार 10 सप्ताह विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही थी. इसके बाद इसमें लगातार चार सप्ताह गिरावट आई है.

विदेशी मुद्रा आस्तियों में 10.66 अरब डॉलर की कमी

विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट की सबसे बड़ी वजह विदेशी मुद्रा आस्तियों (Foreign Currency Assets यानी FCA) में आई कमी रही. RBI के आंकड़ों के अनुसार, 2 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा आस्तियां 10.664 अरब डॉलर घटकर 604.747 अरब डॉलर रह गईं. इससे पिछले सप्ताह भी इनमें 15.570 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई थी.

विदेशी मुद्रा आस्तियां भारत के कुल विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा हैं. इनमें अमेरिकी डॉलर के अलावा यूरो, पाउंड और येन जैसी अन्य विदेशी मुद्राओं में रखी गई संपत्तियां भी शामिल होती हैं. डॉलर में इनका मूल्यांकन किए जाने के कारण दूसरी मुद्राओं की विनिमय दरों में होने वाले बदलाव का असर भी इनके मूल्य पर पड़ता है.

सोने के भंडार का मूल्य भी घटा

विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट के बीच देश के स्वर्ण भंडार (Gold Reserves) के मूल्य में भी कमी आई है. RBI के आंकड़ों के मुताबिक, 2 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में सोने के भंडार का मूल्य 2.288 अरब डॉलर घटकर 106.413 अरब डॉलर रह गया. इससे पिछले सप्ताह भी इसके मूल्य में 2.591 अरब डॉलर की गिरावट आई थी.

मार्च 2026 के अंत तक RBI के पास 880.52 टन सोना था. सोने की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव से इसके भंडार का डॉलर में मूल्य प्रभावित होता है. ऐसे में सोने के मूल्य में गिरावट का असर देश के कुल विदेशी मुद्रा भंडार के आंकड़े पर भी पड़ता है.

SDR में बढ़ोतरी, IMF रिजर्व घटा

RBI के आंकड़ों के अनुसार, 2 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में भारत के विशेष आहरण अधिकार (Special Drawing Rights यानी SDR) में 15 मिलियन डॉलर की बढ़ोतरी हुई. इसके बाद SDR का कुल भंडार बढ़कर 18.656 अरब डॉलर हो गया. इससे पिछले सप्ताह इसमें 97 मिलियन डॉलर की गिरावट आई थी.

वहीं, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के पास रखे गए भारत के रिजर्व में 15 मिलियन डॉलर की कमी आई. इसके बाद यह घटकर 4.789 अरब डॉलर रह गया. इससे पिछले सप्ताह भी IMF रिजर्व में 86 मिलियन डॉलर की गिरावट दर्ज की गई थी.

इस तरह विदेशी मुद्रा आस्तियों और सोने के भंडार के मूल्य में कमी ने कुल विदेशी मुद्रा भंडार को नीचे खींचा है, जबकि SDR में मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई. हालांकि, चार सप्ताह में आई कुल गिरावट के पीछे अलग-अलग कारकों की भूमिका समझने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में RBI के हस्तक्षेप और विदेशी परिसंपत्तियों के मूल्यांकन में हुए बदलावों को भी ध्यान में रखना होगा.
 


अमेरिका में PERM पर रोक से भारतीय IT कंपनियों की बढ़ी चिंता, TCS-Infosys समेत 8 कंपनियां प्रभावित

अमेरिका में ग्रीन कार्ड स्पॉन्सरशिप से जुड़ी PERM प्रक्रिया पर रोक के बाद भारतीय IT कंपनियों के कर्मचारियों की स्थायी निवास प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं. हालांकि, इस कदम से मौजूदा H-1B वीजा अपने आप रद्द नहीं होंगे.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 10 October, 2026
Last Modified:
Saturday, 10 October, 2026
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अमेरिका में आठ टेक्नोलॉजी कंपनियों को परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन (PERM) कार्यक्रम से निलंबित किए जाने के बाद भारतीय IT सेक्टर में ग्रीन कार्ड स्पॉन्सरशिप और कर्मचारियों की नियुक्ति रणनीति को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रभावित कंपनियों में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), इन्फोसिस, विप्रो, HCLTech, कॉग्निजेंट, माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी और कैपजेमिनी शामिल हैं.

अमेरिकी श्रम विभाग (US Department of Labour) ने इन कंपनियों से जुड़े नए PERM आवेदनों को स्वीकार करने और लंबित आवेदनों की प्रक्रिया पर रोक लगा दी है. यह कार्रवाई रोजगार आधारित इमिग्रेशन कार्यक्रमों के कथित दुरुपयोग की जांच के बीच की गई है. PERM प्रक्रिया पर रोक का सीधा असर ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन करने वाले कर्मचारियों पर पड़ सकता है, लेकिन इससे पहले से जारी H-1B वीजा अपने आप रद्द नहीं होते.

इस फैसले ने अस्थायी वर्क वीजा और स्थायी निवास की प्रक्रिया के बीच अंतर को भी चर्चा में ला दिया है. यदि यह प्रतिबंध लंबे समय तक जारी रहता है, तो कंपनियों को कर्मचारियों को बनाए रखने और अमेरिका में अपने कार्यबल की योजना बनाने से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.

PERM पर रोक का IT कंपनियों पर क्या होगा असर?

PERM ग्रीन कार्ड हासिल करने की नियोक्ता प्रायोजित प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण है. इसके तहत अमेरिकी नियोक्ता को यह प्रमाणित करना होता है कि संबंधित पद के लिए योग्य अमेरिकी कर्मचारियों की उपलब्धता और भर्ती से जुड़ी निर्धारित शर्तें पूरी की गई हैं. इसके बाद कर्मचारी ग्रीन कार्ड की आगे की प्रक्रिया में बढ़ सकता है.

वहीं, H-1B वीजा विदेशी पेशेवरों को अमेरिका में अस्थायी रूप से काम करने की अनुमति देता है. ऐसे में PERM प्रक्रिया पर रोक का मतलब यह नहीं है कि अमेरिका में काम कर रहे सभी प्रभावित कर्मचारियों की नौकरी या वीजा तत्काल समाप्त हो जाएगा. इसका मुख्य असर स्थायी निवास के लिए आवेदन की प्रक्रिया पर पड़ता है.

टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) ने कहा है कि उसे इस रोक से अपनी कार्यबल रणनीति या ग्राहकों से जुड़े कामकाज पर किसी बड़े असर की आशंका नहीं है. कंपनी के मुताबिक, पिछले दो वर्षों में उसके PERM आवेदनों की संख्या एकल अंक में रही है. TCS ने अगले पांच वर्षों में अमेरिका में 15,000 अतिरिक्त कर्मचारियों की भर्ती की अपनी योजना को भी दोहराया है. कंपनी स्थानीय भर्ती और कैंपस प्लेसमेंट को अपनी रणनीति का अहम हिस्सा मानती है.

TCS का रुख बताता है कि इस फैसले का असर सभी कंपनियों पर एक जैसा होना जरूरी नहीं है. इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि संबंधित कंपनी PERM प्रक्रिया का कितना इस्तेमाल करती है और अमेरिका में उसके कर्मचारियों की मौजूदा स्थिति क्या है. हालांकि, कंपनियों के स्तर पर आवेदनों और प्रभावित कर्मचारियों का विस्तृत आंकड़ा उपलब्ध नहीं होने के कारण पूरे IT उद्योग पर पड़ने वाले असर का सटीक अनुमान लगाना फिलहाल मुश्किल है.

Nasscom ने क्या कहा?

नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर एंड सर्विस कंपनीज (Nasscom) ने इस मामले में इमिग्रेशन और कुशल कर्मचारियों की अंतरराष्ट्रीय आवाजाही को अलग-अलग मुद्दे बताया है. उद्योग संगठन के मुताबिक, भारतीय टेक्नोलॉजी कंपनियों ने अमेरिका में स्थानीय स्तर पर भर्ती बढ़ाई है और H-1B वीजा पर अपनी निर्भरता कम की है. कंपनियों ने अमेरिकी बाजार में स्थानीय कार्यबल विकसित करने पर भी जोर दिया है.

Nasscom ने यह भी कहा कि H-1B वीजा पर काम करने वाले अपेक्षाकृत कम कर्मचारी PERM प्रक्रिया के जरिए स्थायी निवास हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ते हैं. संगठन के अनुसार, भारतीय टेक्नोलॉजी कंपनियां 80 से अधिक देशों में काम करती हैं और स्थानीय कानूनों व नियामकीय आवश्यकताओं का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

आगे क्या बदलेगी कंपनियों की रणनीति?

PERM प्रक्रिया पर रोक का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रतिबंध कितने समय तक लागू रहता है, कितने आवेदन प्रभावित होते हैं और संबंधित कंपनियां ग्रीन कार्ड स्पॉन्सरशिप पर कितनी निर्भर हैं. फिलहाल, प्रभावित कर्मचारियों की कुल संख्या और कंपनियों पर पड़ने वाले संभावित वित्तीय असर को लेकर स्पष्ट आंकड़े सामने नहीं आए हैं.

भारतीय IT कंपनियों के लिए फिलहाल सबसे अहम सवाल लंबित आवेदनों की स्थिति और स्थायी निवास की प्रक्रिया में लगे कर्मचारियों पर पड़ने वाले प्रभाव का है. TCS, इन्फोसिस और विप्रो जैसी कंपनियों की प्रतिक्रियाओं के साथ अमेरिकी अधिकारियों की ओर से मिलने वाला अतिरिक्त स्पष्टीकरण यह तय करने में अहम होगा कि कंपनियों को अपनी भर्ती, कर्मचारी प्रतिधारण और कार्यबल नियोजन की रणनीति में कोई बदलाव करना पड़ेगा या नहीं.


स्टारलिंक, जियो और वनवेब में मुकाबला, सैटकॉम सेक्टर में किसी कंपनी का एकाधिकार नहीं: सिंधिया

सिंधिया ने इंडिया मोबाइल कांग्रेस के दौरान कहा कि सैटकॉम क्षेत्र में किसी एक कंपनी को प्राथमिकता नहीं दी गई है. इस क्षेत्र में सेवाएं देने की इच्छुक सभी कंपनियों को जरूरी नियमों और शर्तों का पालन करना होगा.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 10 October, 2026
Last Modified:
Saturday, 10 October, 2026
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भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के बाजार में किसी एक कंपनी का दबदबा नहीं होगा. संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि स्टारलिंक, रिलायंस जियो और वनवेब को लाइसेंस दिए जा चुके हैं. वहीं, अमेजन कुइपर को भी सेवाएं शुरू करने के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा. सरकार अब सैटेलाइट स्पेक्ट्रम की कीमत और सुरक्षा संबंधी शर्तों पर काम कर रही है.

संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सैटेलाइट ब्रॉडबैंड सेवाओं के लिए लाइसेंस देने की प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों पर सरकार का रुख स्पष्ट किया है. उन्होंने कहा कि भारत किसी भी क्षेत्र में एकाधिकार की अनुमति नहीं देता है और सैटेलाइट कम्युनिकेशन (सैटकॉम) सेक्टर में भी सभी पात्र कंपनियों को समान अवसर दिए जाएंगे. उनके मुताबिक, रिलायंस जियो, वनवेब और स्टारलिंक को लाइसेंस मिल चुके हैं, जबकि अमेरिकी कंपनी अमेजन कुइपर को निर्धारित प्रक्रिया पूरी करनी होगी.

सिंधिया ने इंडिया मोबाइल कांग्रेस के दौरान कहा कि सैटकॉम क्षेत्र में किसी एक कंपनी को प्राथमिकता नहीं दी गई है. इस क्षेत्र में सेवाएं देने की इच्छुक सभी कंपनियों को जरूरी नियमों और शर्तों का पालन करना होगा. उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उपभोक्ताओं को अलग-अलग सेवाओं के विकल्प मिलें और वे अपनी जरूरत के अनुसार चुनाव कर सकें.

स्पेक्ट्रम की कीमत और सुरक्षा मानकों पर चर्चा

सिंधिया के मुताबिक, सरकार सैटेलाइट स्पेक्ट्रम की कीमत तय करने के लिए भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) के साथ चर्चा कर रही है. कंपनियों को सेवाएं शुरू करने से पहले सुरक्षा से जुड़ी सभी शर्तें पूरी करनी होंगी. इन मानकों के अनुपालन की जांच गृह मंत्रालय कर रहा है और मंजूरी देने का फैसला भी उसी के स्तर पर होगा.

उन्होंने कहा कि राजस्व शुल्क से जुड़ी व्यवस्था तय होने के बाद कंपनियां सुरक्षा संबंधी शर्तों और अन्य जरूरी मानकों को पूरा करके अपनी सेवाएं शुरू कर सकती हैं. प्रत्येक कंपनी को निर्धारित शर्तों का अलग-अलग अनुपालन करना होगा.

स्टारलिंक को लेकर क्यों उठा विवाद?

सरकार का यह बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिकी अरबपति एलन मस्क ने आरोप लगाया था कि कुछ 'ताकतवर कारोबारी' भारत में स्टारलिंक की सेवाओं को शुरू होने से रोक रहे हैं. इसके बाद केंद्र सरकार ने गुरुवार को इन आरोपों को खारिज कर दिया था.

संचार मंत्रालय ने कहा था कि भारत में दूरसंचार और सैटेलाइट सेवाओं के लिए मंजूरी की व्यवस्था निष्पक्ष और भेदभाव रहित है. सभी कंपनियों को देश में कारोबार शुरू करने के लिए निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन करना होता है. मंत्रालय ने चुनिंदा कंपनियों को निशाना बनाने या उनके साथ भेदभाव किए जाने के आरोपों को निराधार बताया था.

भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के विस्तार के साथ इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ने की संभावना है. हालांकि, कंपनियों के लिए सेवाएं शुरू करने का रास्ता स्पेक्ट्रम से जुड़े नियमों, शुल्क व्यवस्था और सुरक्षा मंजूरी पूरी होने के बाद ही साफ होगा.


एयर इंडिया की घरेलू उड़ानों में छात्रों को 10% छूट, जानें कैसे मिलेगा लाभ

इसके अलावा सालभर चलने वाले छात्र कार्यक्रम के तहत 10 किलोग्राम अतिरिक्त सामान ले जाने की सुविधा और एक बार मुफ्त में यात्रा की तारीख बदलने का लाभ भी मिलेगा.

Last Modified:
Friday, 09 October, 2026
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एयर इंडिया ने छात्रों के हवाई सफर को किफायती बनाने के लिए घरेलू उड़ानों के टिकट पर विशेष ऑफर पेश किया है. इसके तहत पात्र बुकिंग पर बेस फेयर यानी मूल किराये में 10 फीसदी की छूट दी जाएगी. इस ऑफर का लाभ लेने के लिए छात्रों को 20 अक्टूबर 2026 तक टिकट बुक करना होगा. यह सुविधा एयर इंडिया के सालभर चलने वाले छात्र कार्यक्रम के अतिरिक्त है, जिसके तहत पात्र घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर भी कई लाभ मिलते हैं.

एयरलाइन के मुताबिक, कॉलेज में दाखिले, इंटर्नशिप, कैंपस प्लेसमेंट या सेमेस्टर की छुट्टियों में घर जाने वाले छात्र इस ऑफर का लाभ उठा सकते हैं. हालांकि, छूट के लिए बुकिंग को निर्धारित किराया शर्तों के अनुरूप होना जरूरी है.

छात्रों को मिलेंगे ये तीन प्रमुख फायदे

एयर इंडिया के सालभर चलने वाले छात्र कार्यक्रम के तहत पात्र यात्रियों को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के किराये पर 10 फीसदी तक की छूट मिल सकती है. इसके अलावा उन्हें 10 किलोग्राम अतिरिक्त सामान ले जाने की सुविधा और एक बार बिना अतिरिक्त शुल्क के यात्रा की तारीख बदलने का विकल्प भी मिलता है.

हालांकि, घरेलू उड़ानों के मूल किराये पर फ्लैट 10 फीसदी छूट का विशेष ऑफर सीमित अवधि के लिए है. इसकी अंतिम तारीख 20 अक्टूबर 2026 है. छात्र कार्यक्रम के अन्य लाभ लागू नियमों और शर्तों के अनुसार पूरे साल उपलब्ध रहेंगे.

वेबसाइट और मोबाइल ऐप से ऐसे करें बुकिंग

छात्र एयर इंडिया की आधिकारिक वेबसाइट airindia.com या मोबाइल ऐप के जरिए टिकट बुक कर सकते हैं. इसके लिए उन्हें कुछ आसान चरणों का पालन करना होगा.

1. सबसे पहले यात्रा का शुरुआती शहर, गंतव्य और यात्रा की तारीख दर्ज करें.

2. बुकिंग के दौरान 'कंसेशन टाइप' के विकल्प में 'स्टूडेंट' चुनें.

3. इसके बाद दिखाई देने वाले पात्र छात्र किरायों में से अपनी यात्रा के लिए विकल्प चुनें.

4. किराये से जुड़ी शर्तों की जांच करें और बुकिंग पूरी कर लें.

विशेष छूट पाने के लिए 20 अक्टूबर 2026 तक बुकिंग करना जरूरी है. यह ऑफर पात्र एकतरफा और आने-जाने, दोनों तरह के टिकटों पर लागू है.

सीधे टिकट बुक करने पर अतिरिक्त बचत का मौका

एयर इंडिया की वेबसाइट या मोबाइल ऐप से टिकट बुक करने वाले यात्रियों को अतिरिक्त बचत का लाभ भी मिल सकता है. लॉग-इन करने वाले ग्राहकों को सुविधा शुल्क में 50 फीसदी की छूट दी जाती है. इसके अलावा, पात्र घरेलू उड़ानों के टिकट का भुगतान यूपीआई से करने पर प्रोमो कोड **UPIPROMO** के जरिए प्रति यात्री 1,000 रुपये तक की अतिरिक्त छूट मिल सकती है. यह लाभ निर्धारित नियमों और शर्तों के अधीन है.

कौन उठा सकता है छात्र ऑफर का लाभ?

घरेलू उड़ानों में छात्र कार्यक्रम का लाभ लेने के लिए यात्रियों को कुछ पात्रता शर्तें पूरी करनी होंगी.

1. उम्र: यात्रा की तारीख पर छात्र की उम्र कम से कम 12 वर्ष होनी चाहिए.

2. पाठ्यक्रम: छात्र किसी ऐसे पूर्णकालिक पाठ्यक्रम में नामांकित होना चाहिए, जिसकी अवधि कम से कम एक शैक्षणिक वर्ष हो.

3. शिक्षण संस्थान: छात्र केंद्र या राज्य सरकार, मान्यता प्राप्त शिक्षा बोर्ड या विश्वविद्यालय से मान्यता प्राप्त, संबद्ध अथवा सहायता प्राप्त संस्थान में पढ़ रहा हो. मान्यता प्राप्त स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों के पात्र विद्यार्थी भी इस सुविधा का लाभ ले सकते हैं.

यात्रा के दौरान चेक-इन के समय सत्यापन के लिए वैध दस्तावेज साथ रखना जरूरी है. इनमें छात्र पहचान पत्र, शिक्षण संस्थान का प्रवेश पत्र या लागू होने की स्थिति में वैध छात्र वीजा शामिल हो सकता है. जरूरी दस्तावेज नहीं दिखाने पर एयरलाइन निर्धारित नियमों के अनुसार अतिरिक्त राशि और लागू कर वसूल सकती है.

सालभर मिलती रहेंगी ये सुविधाएं

सीमित अवधि के विशेष ऑफर के बाद भी एयर इंडिया का छात्र कार्यक्रम जारी रहेगा. इसके तहत पात्र यात्रियों को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के किराये पर 10 फीसदी तक की छूट, 10 किलोग्राम अतिरिक्त सामान ले जाने की सुविधा और एक बार मुफ्त में यात्रा की तारीख बदलने का लाभ मिलता रहेगा.

अतिरिक्त सामान ले जाने की सुविधा उन छात्रों के लिए उपयोगी हो सकती है, जिन्हें कॉलेज और घर के बीच यात्रा करते समय ज्यादा सामान ले जाना पड़ता है. वहीं, तारीख बदलने की सुविधा से यात्रा कार्यक्रम में बदलाव होने पर सहूलियत मिलती है. दोनों लाभ संबंधित नियमों और शर्तों के अधीन हैं.

भारत और विदेश के प्रमुख शिक्षा केंद्रों से कनेक्टिविटी

एयर इंडिया का घरेलू और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क भारत के विभिन्न शहरों के साथ उत्तरी अमेरिका, यूरोप, ब्रिटेन, मध्य पूर्व, एशिया और ऑस्ट्रेलिया के प्रमुख गंतव्यों को जोड़ता है. इससे उच्च शिक्षा के लिए देश और विदेश जाने वाले छात्रों को यात्रा के विकल्प मिलते हैं.

एयरलाइन के मुताबिक, घरेलू उड़ानों के मूल किराये पर सीमित अवधि की 10 फीसदी छूट के लिए 20 अक्टूबर 2026 तक बुकिंग की जा सकती है. छात्र कार्यक्रम के अन्य लाभ इसके बाद भी लागू शर्तों के अनुसार उपलब्ध रहेंगे. अधिक जानकारी और टिकट बुकिंग के लिए छात्र एयर इंडिया की वेबसाइट या मोबाइल ऐप का इस्तेमाल कर सकते हैं.
 


रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब रुपया, RBI ने संभाला मोर्चा; डॉलर और कच्चे तेल का दबाव बरकरार

विदेशी पूंजी की निकासी, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और डॉलर की मजबूत मांग से रुपये पर दबाव बना हुआ है. 9 अक्टूबर को रुपया शुरुआती कारोबार में 96.80 प्रति डॉलर के करीब पहुंचने के बाद संभला और 96.61 प्रति डॉलर पर बंद हुआ.

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Friday, 09 October, 2026
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भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रुपये को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर जाने से रोकने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप किया. मुद्रा बाजार के कारोबारियों के मुताबिक, डॉलर की लगातार मांग, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और वैश्विक अनिश्चितता के कारण रुपये पर दबाव बना हुआ है. केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप से रुपये में और गिरावट को सीमित करने में मदद मिली.

8 अक्टूबर 2026 को रुपया कमजोर होकर 96.78 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था. इसके बाद 9 अक्टूबर को कारोबार के दौरान यह 96.80 प्रति डॉलर के करीब पहुंच गया. हालांकि, बाद में इसमें सुधार आया और यह 96.61 प्रति डॉलर पर बंद हुआ. इस तरह पिछले कारोबारी सत्र के मुकाबले रुपये में करीब 0.2 फीसदी की मजबूती दर्ज की गई. कारोबारियों ने इस सुधार के पीछे RBI के हस्तक्षेप, डॉलर में नरमी और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट को प्रमुख वजह बताया.

विदेशी मुद्रा बाजार में RBI की भूमिका ऐसे समय में महत्वपूर्ण हो गई है, जब बाहरी आर्थिक परिस्थितियां रुपये के अनुकूल नहीं हैं. भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है. ऐसे में तेल की कीमतें बढ़ने से आयात बिल बढ़ता है और भुगतान के लिए डॉलर की मांग में इजाफा होता है. इससे रुपये पर दबाव पड़ता है.

कच्चे तेल की कीमतें और विदेशी निवेशकों की बिकवाली बढ़ा रही दबाव

रुपये की कमजोरी के पीछे घरेलू और वैश्विक, दोनों तरह के कारक काम कर रहे हैं. कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भारत के आयात खर्च को बढ़ाती हैं, जबकि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की निकासी से भी रुपये पर दबाव बढ़ता है. इसके अलावा, भू-राजनीतिक घटनाक्रम और वैश्विक ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता ने भी मुद्रा बाजार की स्थिति को प्रभावित किया है.

RBI के हस्तक्षेप से रुपये की गिरावट की रफ्तार को सीमित करने में मदद मिल सकती है, लेकिन इससे उन बुनियादी कारणों को खत्म नहीं किया जा सकता, जो घरेलू मुद्रा पर दबाव बना रहे हैं. बाजार के प्रतिभागी अब कच्चे तेल की कीमतों, अमेरिकी डॉलर की चाल और विदेशी निवेश के प्रवाह पर नजर रख रहे हैं. इन कारकों से रुपये की आगे की दिशा तय होने की संभावना है.

RBI ने संकेत दिया है कि उसका उद्देश्य विदेशी मुद्रा बाजार में व्यवस्थित कारोबार बनाए रखना है, न कि रुपये को किसी निश्चित विनिमय दर पर बनाए रखना. गवर्नर संजय मल्होत्रा ने रुपये को उसके उचित मूल्य से कम यानी अंडरवैल्यूड बताया है. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा है कि छोटी अवधि में बाजार का व्यवहार तर्कसंगत नहीं रह सकता.

RBI की मौद्रिक नीति का भी रुपये पर असर

रुपये की चाल पर RBI के हालिया मौद्रिक नीति फैसले का असर भी देखा जा रहा है. 7 अक्टूबर को केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी करते हुए इसे 5.50 फीसदी कर दिया था. साथ ही, मौद्रिक नीति के रुख को न्यूट्रल से बदलकर कैलिब्रेटेड टाइटनिंग यानी चरणबद्ध सख्ती की ओर किया था.

हालांकि, इस फैसले के बाद भी रुपये को तत्काल मजबूती नहीं मिली. इसकी वजह बाहरी आर्थिक दबाव और विदेशी पूंजी के प्रवाह को लेकर बनी चिंताएं हैं. इससे संकेत मिलता है कि केवल ब्याज दरों में बदलाव से रुपये की दिशा तय नहीं होती, बल्कि वैश्विक बाजार की परिस्थितियां भी अहम भूमिका निभाती हैं.

रुपये में गिरावट से किन क्षेत्रों पर पड़ेगा असर?

रुपये के कमजोर होने का अलग-अलग क्षेत्रों पर अलग प्रभाव पड़ता है. तेल विपणन कंपनियों, विमानन कंपनियों और उन कारोबारों की लागत बढ़ सकती है, जिन्हें कच्चे तेल, ईंधन, मशीनरी या अन्य वस्तुओं का आयात करना पड़ता है. डॉलर में भुगतान करने वाली कंपनियों के लिए भी आयात महंगा हो सकता है.

दूसरी ओर, सूचना प्रौद्योगिकी (IT) क्षेत्र की उन कंपनियों को फायदा मिल सकता है, जिन्हें विदेशों से डॉलर में कमाई होती है. डॉलर में अर्जित आय को रुपये में बदलने पर उन्हें अधिक राशि मिल सकती है. हालांकि, वास्तविक लाभ कंपनियों के खर्च, विदेशी मुद्रा जोखिम से बचाव की रणनीति और अन्य कारोबारी परिस्थितियों पर निर्भर करेगा.

रुपये में लगातार गिरावट से आयातित महंगाई बढ़ने का जोखिम भी रहता है. यदि कंपनियां आयात की बढ़ी हुई लागत का बोझ उपभोक्ताओं पर डालती हैं, तो ईंधन और अन्य आयातित वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं.

RBI के सामने क्या है चुनौती?

RBI के सामने फिलहाल रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोकने और विदेशी मुद्रा बाजार में स्थिरता बनाए रखने की चुनौती है. केंद्रीय बैंक के लिए किसी एक विनिमय दर का बचाव करने के बजाय बाजार में असामान्य उतार-चढ़ाव को सीमित करना महत्वपूर्ण है.

आने वाले दिनों में रुपये की दिशा काफी हद तक कच्चे तेल की कीमतों, विदेशी निवेशकों के रुख, अमेरिकी डॉलर की मजबूती और RBI के हस्तक्षेप पर निर्भर करेगी. यदि तेल की कीमतों में तेजी और विदेशी पूंजी की निकासी जारी रहती है, तो रुपये पर दबाव बना रह सकता है. वहीं, डॉलर में नरमी और तेल की कीमतों में गिरावट से घरेलू मुद्रा को कुछ राहत मिल सकती है.
 


दिल्ली मेट्रो के 57 स्टेशनों पर एंट्री-एग्जिट बंद, 10 अक्टूबर के विरोध प्रदर्शन से पहले DMRC का फैसला

दिल्ली पुलिस की सुरक्षा संबंधी चिंताओं के बाद DMRC ने 9 अक्टूबर रात 9 बजे से 57 मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश और निकास द्वार बंद कर दिए हैं. अगले आदेश तक जारी रहेंगी पाबंदियां, हालांकि नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन को छोड़कर अन्य प्रभावित स्टेशनों पर इंटरचेंज की सुविधा उपलब्ध रहेगी.

Last Modified:
Friday, 09 October, 2026
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दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (DMRC) ने 10 अक्टूबर को प्रस्तावित विरोध प्रदर्शनों से पहले सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर राजधानी के 57 मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश और निकास द्वार बंद करने का फैसला किया है. ये प्रतिबंध 9 अक्टूबर की रात 9 बजे से लागू हो गए हैं और अगले आदेश तक जारी रहेंगे. DMRC की ओर से जारी सेवा संबंधी सूचना में यह जानकारी दी गई है. यह कदम दिल्ली पुलिस के अनुरोध के बाद उठाया गया है. पुलिस को आशंका है कि प्रस्तावित प्रदर्शनों के दौरान भीड़ नई दिल्ली के संवेदनशील इलाकों की ओर बढ़ सकती है. इसी को देखते हुए दिल्ली पुलिस ने 8 अक्टूबर को DMRC को पत्र लिखकर संबंधित अवधि के दौरान एहतियाती कदम उठाने को कहा था.

दिल्ली के किन-किन मेट्रो स्टेशनों पर लगी पाबंदी?

उत्तर और उत्तर-पश्चिमी दिल्ली: इंद्रलोक, रिठाला, रोहिणी, डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर अस्पताल, कन्हैया नगर, नेताजी सुभाष प्लेस, गुरु तेग बहादुर नगर, आजादपुर, आदर्श नगर, जहांगीरपुरी, हैदरपुर बादली मोड़, विश्वविद्यालय, विधानसभा, सिविल लाइंस, कश्मीरी गेट, मजलिस पार्क और शालीमार बाग.

पूर्वी और उत्तर-पूर्वी दिल्ली: शाहदरा, सीलमपुर, वेलकम, मौजपुर-बाबरपुर, जाफराबाद, यमुना विहार और खजूरी खास.

मध्य दिल्ली: पटेल चौक, केंद्रीय सचिवालय, लोक कल्याण मार्ग, चावड़ी बाजार, राजीव चौक, नई दिल्ली, सेवा तीर्थ, झंडेवालान, सुप्रीम कोर्ट, इंद्रप्रस्थ, मंडी हाउस, बाराखंभा रोड, करोल बाग, राजेंद्र प्लेस, जामा मस्जिद, जनपथ, आईटीओ, दिल्ली गेट और खान मार्केट.

अन्य प्रभावित स्टेशन: दिल्ली हाट-आईएनए, हौज खास, जोर बाग, अर्जनगढ़, रामकृष्ण आश्रम मार्ग, जंगपुरा, लाजपत नगर, आश्रम, सराय काले खां-निजामुद्दीन, कालिंदी कुंज, जसोला विहार शाहीन बाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, ओखला विहार और शिवाजी स्टेडियम.

इंटरचेंज की सुविधा रहेगी जारी

DMRC ने स्पष्ट किया है कि नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन को छोड़कर अन्य प्रभावित स्टेशनों पर इंटरचेंज की सुविधा जारी रहेगी. यानी यात्री इन स्टेशनों पर एक मेट्रो लाइन से दूसरी लाइन में बदल सकेंगे, लेकिन स्टेशन के प्रवेश और निकास द्वार बंद रहने के कारण यात्रा शुरू करने या स्टेशन से बाहर निकलने में परेशानी हो सकती है. यात्रियों को सलाह दी जाती है कि वे अपनी यात्रा की योजना बनाते समय इन प्रतिबंधों को ध्यान में रखें और मेट्रो की ताजा सूचनाओं के आधार पर वैकल्पिक मार्ग चुनें.

रोजाना लाखों यात्रियों की आवाजाही पर असर की आशंका

दिल्ली मेट्रो राजधानी और आसपास के इलाकों में सार्वजनिक परिवहन का एक प्रमुख साधन है. इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 17 सितंबर 2026 को मेट्रो में 82,44,903 यात्री बोर्डिंग दर्ज की गई थी, जो DMRC के मुताबिक अब तक का सबसे बड़ा दैनिक आंकड़ा है.

यह आंकड़ा यात्रियों की कुल बोर्डिंग का है, न कि अलग-अलग यात्रियों की संख्या का. ऐसे में 57 स्टेशनों पर प्रवेश और निकास बंद रहने से यात्रियों को अपनी रोजमर्रा की आवाजाही के दौरान परेशानी का सामना करना पड़ सकता है.
 

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डेट सिक्योरिटीज में जोखिम पहचानना होगा आसान, सेबी ने पेश किया नया क्रेडिट रिस्क-ओ-मीटर

सेबी के नए फ्रेमवर्क में डेट सिक्योरिटीज के क्रेडिट जोखिम को छह श्रेणियों में बांटा जाएगा. इसमें हरे रंग से सबसे कम जोखिम और लाल रंग से सबसे ज्यादा जोखिम का संकेत मिलेगा.

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Friday, 09 October, 2026
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डेट सिक्योरिटीज में निवेश करने वालों के लिए जोखिम को समझना आसान बनाने के उद्देश्य से भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने नया क्रेडिट रिस्क-ओ-मीटर पेश किया है. इसके तहत रंगों के जरिए बताया जाएगा कि किसी डेट सिक्योरिटी में क्रेडिट जोखिम कितना है. यह व्यवस्था निवेशकों को अलग-अलग रेटिंग वाली सिक्योरिटीज के जोखिम को आसानी से समझने में मदद करेगी.

सेबी ने 7 अक्टूबर को जारी सर्कुलर में कंपनियों और ऑनलाइन बॉन्ड प्लेटफॉर्म संचालकों को क्रेडिट रिस्क-ओ-मीटर की जानकारी निवेश से जुड़े दस्तावेजों, प्रॉस्पेक्टस, प्राइवेट प्लेसमेंट दस्तावेजों, मेमोरैंडम और विज्ञापनों में देने का निर्देश दिया है. इसे संबंधित संस्थाओं की वेबसाइट और मोबाइल प्लेटफॉर्म पर भी प्रदर्शित करना होगा. ये नियम सर्कुलर जारी होने के 45 दिन बाद लागू होंगे.

किन डेट सिक्योरिटीज पर लागू होंगे नए नियम?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सेबी का नया फ्रेमवर्क उन सभी डेट सिक्योरिटीज पर लागू होगा, जो शेयर बाजार में सूचीबद्ध हैं या सूचीबद्ध होने वाली हैं. इनमें नॉन-कन्वर्टिबल सिक्योरिटीज (NCS), कमर्शियल पेपर (CP), सिक्योरिटाइज्ड डेट इंस्ट्रूमेंट्स (SDI), सिक्योरिटी रिसीट्स (SR) और स्ट्रक्चर्ड डेट या मार्केट-लिंक्ड डिबेंचर्स (MLD) शामिल हैं. यह व्यवस्था पब्लिक इश्यू और प्राइवेट प्लेसमेंट, दोनों तरह से जारी की जाने वाली संबंधित सिक्योरिटीज पर लागू होगी.

छह श्रेणियों में बंटेगा क्रेडिट जोखिम

नए क्रेडिट रिस्क-ओ-मीटर में मौजूदा क्रेडिट रेटिंग को छह जोखिम श्रेणियों में बांटा गया है. इसमें AAA से लेकर D तक की रेटिंग शामिल हैं. हर श्रेणी के लिए अलग रंग निर्धारित होगा, जिससे निवेशक जोखिम का स्तर आसानी से पहचान सकेंगे.

1. सबसे कम क्रेडिट जोखिम: AAA रेटिंग वाली सिक्योरिटीज को इस श्रेणी में रखा जाएगा. इसे हरे रंग से दर्शाया जाएगा.

2. बहुत कम क्रेडिट जोखिम: AA+, AA और AA- रेटिंग वाली सिक्योरिटीज इस श्रेणी में आएंगी.

3. कम क्रेडिट जोखिम: A+, A और A- रेटिंग वाली सिक्योरिटीज को इसमें रखा जाएगा.

4. मध्यम क्रेडिट जोखिम: BBB+, BBB और BBB- रेटिंग वाली सिक्योरिटीज इस श्रेणी में होंगी.

5. डिफॉल्ट का मध्यम जोखिम: BB+, BB और BB- रेटिंग वाली सिक्योरिटीज को इस श्रेणी में रखा जाएगा.

6. डिफॉल्ट का उच्च से बहुत अधिक जोखिम: B+, B, B-, C+, C, C- और D रेटिंग वाली सिक्योरिटीज इस श्रेणी में आएंगी. सबसे अधिक जोखिम को लाल रंग से दिखाया जाएगा.

7. कम अवधि वाले डेट इंस्ट्रूमेंट्स के लिए भी इसी तरह की व्यवस्था होगी. इसमें A1+, A1 और A2 जैसी शॉर्ट-टर्म रेटिंग को संबंधित जोखिम श्रेणियों से जोड़ा जाएगा.

सबसे कम क्रेडिट रेटिंग के आधार पर तय होगा जोखिम

सेबी के निर्देशों के अनुसार, क्रेडिट रिस्क-ओ-मीटर के साथ क्रेडिट रेटिंग एजेंसी (CRA) का नाम और संबंधित डेट सिक्योरिटी की वास्तविक क्रेडिट रेटिंग भी लिखनी होगी. यदि किसी डेट सिक्योरिटी को एक से अधिक क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने रेटिंग दी है, तो क्रेडिट रिस्क-ओ-मीटर में सबसे कम रेटिंग के आधार पर जोखिम दिखाया जाएगा. हालांकि, अन्य एजेंसियों की रेटिंग की जानकारी भी दी जा सकती है.

बिना गारंटी वाले डेट इंस्ट्रूमेंट्स के लिए ‘अनसिक्योर्ड’ यानी बिना गारंटी वाला शब्द गहरे लाल रंग में मोटे अक्षरों में दिखाना अनिवार्य होगा. इसका उद्देश्य निवेशकों को यह स्पष्ट जानकारी देना है कि संबंधित निवेश के लिए कोई गारंटी उपलब्ध नहीं है.

ऑनलाइन बॉन्ड प्लेटफॉर्म को 24 घंटे में करना होगा अपडेट

सेबी ने ऑनलाइन बॉन्ड प्लेटफॉर्म ऑपरेटर्स (OBPPs) के लिए भी निर्देश जारी किए हैं. अब नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (NSDL) या सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विसेज (इंडिया) लिमिटेड (CDSL) से रेटिंग में बदलाव की सूचना मिलने के 24 घंटे के भीतर प्लेटफॉर्म को क्रेडिट रिस्क-ओ-मीटर अपडेट करना होगा.

ऑनलाइन बॉन्ड प्लेटफॉर्म अपनी ओर से जोखिम की श्रेणी में बदलाव नहीं कर सकेंगे. उन्हें रेटिंग में हुए बदलाव और क्रेडिट रिस्क-ओ-मीटर को अपडेट करने का पूरा रिकॉर्ड भी रखना होगा.

क्या क्रेडिट रिस्क-ओ-मीटर निवेश की गारंटी है?

सेबी ने स्पष्ट किया है कि क्रेडिट रिस्क-ओ-मीटर केवल डेट सिक्योरिटी से जुड़े क्रेडिट जोखिम को दर्शाता है. इसे निवेश की सलाह या किसी सिक्योरिटी को खरीदने की सिफारिश नहीं माना जाना चाहिए. डेट सिक्योरिटीज में निवेश करते समय क्रेडिट जोखिम के अलावा बाजार में उतार-चढ़ाव और जरूरत पड़ने पर निवेश को आसानी से बेच पाने यानी लिक्विडिटी से जुड़े जोखिम भी हो सकते हैं. इसलिए केवल रंग या क्रेडिट रेटिंग देखकर निवेश का फैसला करना पर्याप्त नहीं है. निवेशकों को संबंधित सिक्योरिटी की शर्तों और अन्य जोखिमों को भी समझना चाहिए.
 


सोना, चांदी और प्लैटिनम के आयात पर बैंकों को मिलने वाली टैक्स छूट खत्म, अब लगेगा 3% IGST

अब सोना, चांदी और प्लैटिनम के आयात पर बैंकों को 3% इंटीग्रेटेड गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (IGST) देना होगा, जिससे उन्हें बुलियन एक्सचेंज के जरिए आयात करने वाले अन्य कारोबारियों के समान कर व्यवस्था के दायरे में लाया जा सकेगा.

Last Modified:
Friday, 09 October, 2026
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भारत सरकार ने बैंकों को सोना, चांदी और प्लैटिनम के आयात पर मिलने वाली टैक्स छूट खत्म कर दी है. राजस्व सचिव अरविंद श्रीवास्तव के मुताबिक, बैंक 1 अप्रैल 2026 से ही इन आयातों पर 3% इंटीग्रेटेड गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (IGST) का भुगतान कर रहे हैं. इस फैसले का उद्देश्य बैंकों और बुलियन एक्सचेंज के माध्यम से कीमती धातुओं का आयात करने वाले अन्य प्रतिभागियों के बीच कर व्यवस्था में समानता लाना है. सरकार ने 8 अक्टूबर को हुई वस्तु एवं सेवा कर (GST) परिषद की बैठक में इस बदलाव की जानकारी दी.

2017 में शुरू हुई थी टैक्स छूट

सरकार ने 2017 में बैंकों और नामित एजेंसियों को कीमती धातुओं के आयात पर IGST से छूट दी थी. उस समय इन संस्थाओं को बिना IGST चुकाए सोना, चांदी और प्लैटिनम आयात करने की अनुमति थी. हालांकि, इसके बाद भारत के बुलियन बाजार में कई बदलाव हुए. गुजरात के गिफ्ट सिटी में इंडिया इंटरनेशनल बुलियन एक्सचेंज (IIBX) की स्थापना भी इसी विकास का हिस्सा है.

बुलियन एक्सचेंज के जरिए कीमती धातुओं का आयात करने वाले कारोबारियों को सीमा शुल्क के साथ 3% IGST का भुगतान भी करना पड़ता है. वहीं, टैक्स छूट के कारण बैंकों को अलग व्यवस्था का लाभ मिलता था. सरकार का कहना है कि नई व्यवस्था से आयात के अलग-अलग माध्यमों के लिए कर नियमों में समानता सुनिश्चित होगी.

बैंकों को इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ मिलेगा

IGST का भुगतान करने से बैंकों पर जरूरी तौर पर अतिरिक्त टैक्स लागत बढ़ने की उम्मीद नहीं है. घरेलू ज्वैलर्स या ट्रेडिंग इकाइयों को कीमती धातुओं की आपूर्ति करते समय बैंक लागू GST नियमों के तहत इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) का दावा कर सकते हैं.

इनपुट टैक्स क्रेडिट के तहत कारोबारियों को खरीद के समय चुकाए गए पात्र टैक्स को आगे की बिक्री या आपूर्ति पर देय टैक्स के साथ समायोजित करने की सुविधा मिलती है.

इस तरह, बदलाव का मुख्य असर आयात के समय टैक्स भुगतान की प्रक्रिया पर पड़ेगा. पात्र बैंक बाद में होने वाली आपूर्ति पर लागू नियमों के अनुसार इस टैक्स का समायोजन कर सकेंगे.

GST व्यवस्था में बदलाव के बीच फैसला

यह फैसला GST प्रशासन को सरल बनाने और अनुपालन प्रक्रिया में ऑटोमेशन बढ़ाने के लिए किए जा रहे व्यापक बदलावों के बीच आया है. GST परिषद ने हाल ही में कर व्यवस्था को अधिक सुगम बनाने के उद्देश्य से कई उपायों को मंजूरी दी है.

इसके अलावा, सरकार की नजर कीमती धातुओं के आयात पर भी रहती है, क्योंकि इनका आयात देश से विदेशी मुद्रा के बाहर जाने को प्रभावित करता है. बैंकों के लिए टैक्स छूट खत्म करने से कीमती धातुओं के आयात पर लागू कर व्यवस्था को अधिक समान बनाने की दिशा में कदम उठाया गया है.
 


प्याज, तेल और चावल की महंगाई से बिगड़ा रसोई का बजट, वेज थाली 10% महंगी: रिपोर्ट

क्रिसिल की रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर में शाकाहारी थाली की लागत सालाना आधार पर 10% बढ़कर ₹30.8 हो गई, जबकि मांसाहारी थाली 6% महंगी होकर ₹59.5 पर पहुंच गई.

Last Modified:
Friday, 09 October, 2026
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त्योहारी सीजन के बीच आम लोगों की रसोई का खर्च बढ़ गया है. सितंबर में घर पर खाना बनाना पिछले साल के मुकाबले महंगा रहा. रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की ताजा ‘रोटी राइस रेट’ रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर में शाकाहारी थाली की लागत सालाना आधार पर 10% बढ़ी, जबकि मांसाहारी थाली तैयार करने का खर्च 6% बढ़ गया. सब्जियों और जरूरी खाद्य पदार्थों की कीमतों में तेजी का असर घरेलू बजट पर दिखाई दे रहा है.

पिछले साल सितंबर में एक शाकाहारी थाली तैयार करने की लागत ₹28.1 थी, जो इस साल बढ़कर ₹30.8 हो गई. इसी तरह मांसाहारी थाली की लागत ₹56 से बढ़कर ₹59.5 पहुंच गई. मासिक आधार पर भी महंगाई का दबाव बढ़ा है. अगस्त के मुकाबले सितंबर में शाकाहारी थाली 4% और मांसाहारी थाली 3% महंगी हुई.

प्याज की कीमतों में 89% का उछाल

रसोई का खर्च बढ़ने की सबसे बड़ी वजह प्याज की कीमतों में आई तेजी है. क्रिसिल की रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर में प्याज के दाम सालाना आधार पर 89% बढ़ गए. पिछले साल सितंबर में प्याज करीब ₹28 प्रति किलो मिल रहा था, जबकि इस साल इसकी कीमत बढ़कर ₹53 प्रति किलो हो गई.

इस तेजी के पीछे उत्पादन और आपूर्ति से जुड़ी कई वजहें हैं. रबी सीजन में प्याज का उत्पादन 5-6% घटने से पुराने स्टॉक में कमी आई. इसके अलावा, इस साल जून में सामान्य से 40% कम बारिश हुई. कम बारिश के कारण खरीफ प्याज की बुआई में देरी हुई और मंडियों में नई फसल की आवक प्रभावित हुई. रिपोर्ट के मुताबिक, केवल एक महीने में प्याज की कीमतों में 34% की बढ़ोतरी दर्ज की गई.

खाद्य तेल, चावल और एलपीजी ने भी बढ़ाया खर्च

रसोई के बजट पर दबाव केवल प्याज तक सीमित नहीं है. खाद्य तेल, चावल और घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में बढ़ोतरी ने भी लोगों का खर्च बढ़ाया है. रिपोर्ट के अनुसार, खाद्य तेल की कीमतें सालाना आधार पर 12% बढ़ीं. केंद्र सरकार की ओर से पाम ऑयल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी घटाए जाने के बावजूद कीमतों में राहत नहीं मिली. वैश्विक तनाव और अल नीनो के प्रभाव से अंतरराष्ट्रीय बाजार में उत्पादन प्रभावित होने के कारण घरेलू कीमतों पर दबाव बना रहा.

वहीं, घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में सालाना आधार पर 10% की बढ़ोतरी हुई. वैश्विक आपूर्ति में आई बाधाओं का असर भी इसकी कीमतों पर पड़ा. चावल के दाम भी एक साल में 8% बढ़ गए. रिपोर्ट के मुताबिक, धान की बुआई के रकबे में कमी और पैदावार कमजोर रहने की आशंका के कारण चावल उत्पादन में 5-6% गिरावट का अनुमान है. इससे कीमतों में तेजी बनी हुई है.

नॉन-वेज थाली की महंगाई कम क्यों रही?

शाकाहारी थाली के मुकाबले मांसाहारी थाली की लागत में कम बढ़ोतरी हुई. इसकी प्रमुख वजह ब्रॉयलर चिकन की कीमतों में सीमित वृद्धि है. मांसाहारी थाली की कुल लागत में ब्रॉयलर चिकन की हिस्सेदारी करीब 50% होती है.

क्रिसिल की रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर में ब्रॉयलर चिकन की कीमतें सालाना और मासिक, दोनों आधार पर 2% बढ़ीं. हालांकि, चूजों की कम उपलब्धता, बारिश के कारण आपूर्ति में रुकावट और चारे के लिए मक्के की ऊंची कीमतों ने पोल्ट्री कारोबार की लागत बढ़ाई. इसके बावजूद चिकन की कीमतों में सीमित तेजी रहने से मांसाहारी थाली की महंगाई 6% तक रही, जबकि शाकाहारी थाली की लागत 10% बढ़ गई.

अक्टूबर में प्याज की कीमतों से कब मिलेगी राहत?

त्योहारों के दौरान प्याज की मांग बढ़ने से कीमतों पर दबाव बने रहने की आशंका है. क्रिसिल की रिपोर्ट के मुताबिक, अक्टूबर के पहले 15 दिनों में प्याज के दाम सालाना आधार पर और तेजी से बढ़ सकते हैं. त्योहारों के दौरान मांग बढ़ने और आपूर्ति सीमित रहने से कीमतें ऊंची रह सकती हैं.

हालांकि, अक्टूबर के अंत तक खरीफ प्याज की नई फसल की आवक बढ़ने की उम्मीद है. इससे बाजार में आपूर्ति बेहतर हो सकती है और प्याज की कीमतों में धीरे-धीरे राहत मिलने की संभावना है. तब तक आम परिवारों को रसोई के बढ़ते खर्च का सामना करना पड़ सकता है.


2026 में वैश्विक व्यापार की वृद्धि दर 3.9% रहने का अनुमान, AI में निवेश से मिलेगी रफ्तार: WTO

एशिया निर्यात वृद्धि में सबसे आगे रह सकता है, जबकि भू-राजनीतिक तनावों के कारण दुनिया की प्रमुख व्यापारिक अर्थव्यवस्थाओं में कारोबार की संभावनाएं असमान रहने का अनुमान है.

Last Modified:
Friday, 09 October, 2026
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विश्व व्यापार संगठन (WTO) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2026 में वैश्विक वस्तु व्यापार की मात्रा में 3.9% की वृद्धि होने का अनुमान है. यह मार्च में लगाए गए 1.9% के अनुमान से दोगुने से भी अधिक है. अनुमान में इस बढ़ोतरी की वजह साल की पहली छमाही में उम्मीद से बेहतर व्यापारिक गतिविधियां रही हैं.

WTO की रिपोर्ट में कहा गया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़े बुनियादी ढांचे में निवेश ने भी AI को सक्षम बनाने वाले उत्पादों की मांग बढ़ाई है. इससे वैश्विक वस्तु व्यापार को मजबूती मिली है. हालांकि, रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के कारण ऊर्जा की कीमतें बढ़ सकती हैं और परिवहन मार्गों में बाधा आ सकती है, जिससे वैश्विक व्यापार प्रभावित होने का जोखिम है.

रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर वैश्विक खर्च में कम से कम 30% की वृद्धि होने का अनुमान है. WTO का मानना है कि 2027 तक AI से जुड़ा निवेश वस्तु व्यापार को गति देने वाला प्रमुख कारक बना रहेगा. खास तौर पर AI की आपूर्ति श्रृंखला में इस्तेमाल होने वाले उत्पादों की मांग को इससे समर्थन मिलेगा.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं ने ऊर्जा और उर्वरक बाजारों में आई बाधाओं के अनुरूप खुद को ढाल लिया है. इस बदलाव और AI इंफ्रास्ट्रक्चर में मजबूत निवेश ने वैश्विक वस्तु व्यापार के प्रदर्शन को पहले के अनुमानों से बेहतर बनाने में मदद की है.

निर्यात वृद्धि में एशिया सबसे आगे

WTO की रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 में एशिया में वस्तुओं के निर्यात में सबसे तेज वृद्धि होने का अनुमान है. इस क्षेत्र का निर्यात 9.9% बढ़ सकता है. वहीं, उत्तरी अमेरिका के निर्यात में 5.7%, अफ्रीका में 5.6% और दक्षिण अमेरिका में 3.4% की वृद्धि का अनुमान है.

इसके विपरीत, यूरोप के लिए तस्वीर कमजोर रहने की आशंका है. यहां वस्तुओं का निर्यात 0.1% घट सकता है. स्वतंत्र राज्यों के राष्ट्रमंडल (CIS) से निर्यात में 3.9% की गिरावट का अनुमान है, जबकि मध्य पूर्व में निर्यात में 17.2% की बड़ी कमी आ सकती है.

WTO ने मध्य पूर्व में जारी संघर्ष को 2026 में वैश्विक व्यापार के लिए एक प्रमुख नकारात्मक जोखिम बताया है. ऊर्जा की ऊंची कीमतें और परिवहन मार्गों में रुकावट कारोबार की लागत बढ़ा सकती हैं और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में वस्तुओं की आवाजाही को प्रभावित कर सकती हैं.

इसका असर सेवा व्यापार पर भी पड़ने की आशंका है, खासकर परिवहन और अंतरराष्ट्रीय यात्रा के क्षेत्र में. WTO के अनुमान के मुताबिक, 2026 में मध्य पूर्व के वस्तु आयात में 15.4% और निर्यात में 17.2% की गिरावट हो सकती है.

भारत के निर्यात को मिल सकता है समर्थन

वैश्विक वस्तु व्यापार के बेहतर परिदृश्य से भारत को वित्त वर्ष 2026-27 में वस्तुओं और सेवाओं के निर्यात को 1,000 अरब डॉलर तक पहुंचाने के लक्ष्य में मदद मिल सकती है. वैश्विक मांग में मजबूती और टेक्नोलॉजी से जुड़े बुनियादी ढांचे में लगातार निवेश से भारतीय निर्यातकों के लिए नए अवसर पैदा हो सकते हैं.

हालांकि, WTO की रिपोर्ट में बताए गए जोखिम भारत को भी प्रभावित कर सकते हैं. ऊर्जा और माल ढुलाई की लागत बढ़ने से भारतीय कारोबारियों पर दबाव पड़ सकता है. इसका वास्तविक असर काफी हद तक मध्य पूर्व में संघर्ष की अवधि और वैश्विक शिपिंग मार्गों तथा कमोडिटी की कीमतों पर उसके प्रभाव पर निर्भर करेगा.

सेवा व्यापार की वृद्धि दर धीमी रहने का अनुमान

WTO के मुताबिक, 2026 में वैश्विक सेवा व्यापार की मात्रा में 3.3% की वृद्धि होने का अनुमान है. यह मार्च में लगाए गए 4.8% के अनुमान से कम है. हालांकि, संगठन का अनुमान है कि मौजूदा दबाव कम होने के साथ 2027 में सेवा व्यापार की वृद्धि दर बढ़कर 6.4% हो सकती है.

रिपोर्ट में 2027 के लिए वैश्विक वस्तु व्यापार में 4.1% की वृद्धि का अनुमान लगाया गया है. वहीं, वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 2026 में 2.6% और 2027 में 2.9% की वृद्धि होने की संभावना है.

वैश्विक व्यापार का परिदृश्य पहले के अनुमानों से बेहतर हुआ है, लेकिन भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा की कीमतों में उतार-चढ़ाव और परिवहन मार्गों में संभावित बाधाएं अब भी इसके लिए प्रमुख जोखिम बने हुए हैं.