अब एक ही स्टेटमेंट में दिखेगी आपकी पूरी कमाई, बैंक से निवेश तक सब कुछ एक जगहो

एक ही स्टेटमेंट में पूरी फाइनेंशियल लाइफ का हिसाब मिलना न सिर्फ सुविधा बढ़ाएगा, बल्कि लोगों को अपनी आर्थिक सेहत पर बेहतर नियंत्रण भी देगा.

Last Modified:
Monday, 19 January, 2026
BWHindi

अगर आप भी हर महीने बैंक बैलेंस, पीएफ, म्यूचुअल फंड और शेयर बाजार के निवेश का हिसाब अलग-अलग ऐप और स्टेटमेंट में खोजते रहते हैं, तो अब यह झंझट जल्द खत्म होने वाला है. दरअसल, देश के वित्तीय नियामक एक ऐसी व्यवस्था लाने की तैयारी में हैं, जिसके तहत आम लोगों को उनकी पूरी फाइनेंशियल स्थिति का ब्यौरा एक ही ‘सिंगल मंथली स्टेटमेंट’ में मिल जाएगा. तो आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं.

महीने के आखिर की टेंशन होगी खत्म

फिलहाल बैंक बैलेंस, म्यूचुअल फंड निवेश, इंश्योरेंस पॉलिसी और पीएफ की जानकारी के लिए लोगों को अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर लॉग-इन करना पड़ता है. इससे न सिर्फ समय बर्बाद होता है बल्कि पूरी वित्तीय तस्वीर एक नजर में समझना भी मुश्किल हो जाता है. नई व्यवस्था लागू होने के बाद लोगों को हर महीने एक ऐसा स्टेटमेंट मिलेगा, जिसमें उनकी सेविंग्स और निवेश की पूरी तस्वीर साफ-साफ दिखाई देगी.

एक स्टेटमेंट में मिलेगा पूरा फाइनेंशियल स्नैपशॉट

प्रस्ताव यह है कि अलग-अलग स्टेटमेंट को जोड़ने की बजाय एक ‘सिंगल मंथली स्नैपशॉट’ जारी किया जाए. इसमें आपकी पूरी जमा-पूंजी, निवेश और बीमा से जुड़ी जानकारी एक ही जगह दिखाई देगी. इससे आम आदमी अपनी फाइनेंशियल हेल्थ को आसानी से समझ और ट्रैक कर सकेगा.

SEBI, RBI और IRDAI के बीच मंथन तेज

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस योजना को जमीन पर उतारने के लिए बाजार नियामक सेबी ने पहल शुरू कर दी है. सेबी इस मुद्दे पर बैंकिंग रेगुलेटर RBI, बीमा रेगुलेटर IRDAI और पेंशन फंड रेगुलेटर PFRDA के साथ बातचीत कर रहा है. सेबी चाहता है कि मौजूदा ‘कंसोलिडेटेड अकाउंट स्टेटमेंट’ यानी CAS के दायरे को और बड़ा किया जाए, ताकि इसमें सिर्फ शेयर और म्यूचुअल फंड ही नहीं बल्कि बाकी बचत और निवेश उत्पाद भी शामिल किए जा सकें.

अभी क्या मिलता है निवेशकों को

फिलहाल निवेशकों को हर महीने जो CAS मिलता है, उसमें सिर्फ डीमैट अकाउंट और म्यूचुअल फंड की जानकारी होती है. लेकिन नए प्रस्ताव के लागू होने के बाद इसमें कई और चीजें जोड़ी जा सकती हैं.

नए स्टेटमेंट में क्या-क्या हो सकता है शामिल

नए सिस्टम के तहत स्टेटमेंट में इन जानकारियों को शामिल करने पर विचार किया जा रहा है.

1. आपके सभी बैंक खातों का बैलेंस.
2. प्रोविडेंट फंड (PF) की बचत.
3. इंश्योरेंस पॉलिसियों का विवरण.
4. बॉन्ड और अन्य निवेश.
5. छोटी बचत योजनाएं.
6. नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) की जानकारी.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, PFRDA को भी इस सिस्टम में जोड़ा जा चुका है, जिससे पेंशन से जुड़ी जानकारी भी उसी स्टेटमेंट में दिखाई दे सके.

आम आदमी को क्या होगा फायदा

इस पहल का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि लोगों को अपनी पूरी फाइनेंशियल स्थिति समझने के लिए कई जगह भटकना नहीं पड़ेगा. एक ही स्टेटमेंट में उन्हें अपनी बचत, निवेश और बीमा की पूरी तस्वीर मिल जाएगी, जिससे बेहतर फाइनेंशियल प्लानिंग करना आसान हो जाएगा.


बॉम्बे रेयॉन: SBI के बार-बार किए गए कर्ज बचाव की जांच जरूरी

भारत के सबसे बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ने प्रशांत अग्रवाल परिवार को बार-बार एक और मौका क्यों दिया? ₹4,000 करोड़ का CDR. ₹934 करोड़ का डेट-फॉर-शेयर्स स्वैप. फिर ₹5,600 करोड़ का S4A, जिसमें ₹2,249.74 करोड़ को "असस्टेनेबल" घोषित कर शेयरों और डिबेंचर्स में बदल दिया गया. पांच साल बाद दिवालिया प्रक्रिया.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 24 September, 2026
Last Modified:
Thursday, 24 September, 2026
BWHindia

पलक शाह

सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस (SFIO) ने बॉम्बे रेयॉन फैशन्स लिमिटेड (BRFL) की जांच शुरू कर दी है. मुंबई स्थित यह टेक्सटाइल समूह कभी खुद को भारत का सबसे बड़ा शर्ट निर्माता बताता था और अब परिसमापन में है. कंपनी पर स्वीकार की गई देनदारियां ₹7,358 करोड़ हैं, जिसमें वित्तीय लेनदारों का ₹6,690 करोड़ शामिल है.

BW द्वारा देखे गए 5 अगस्त 2026 के समन के अनुसार, केंद्र सरकार ने कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 212(1)(c) के तहत 30 अक्टूबर 2025 को SFIO को BRFL के मामलों की जांच करने का आदेश दिया था. SFIO के निदेशक ने एक जांच अधिकारी और दो निरीक्षकों की नियुक्ति की है और जांचकर्ता कंपनी से जुड़े लोगों को नई दिल्ली में पूछताछ के लिए बुला रहे हैं.

हालांकि, कुछ ऐसे सूत्र, जिनके पास आपत्तिजनक दस्तावेज हैं, मानते हैं कि SFIO को बॉम्बे रेयॉन और उसके प्रमोटरों, प्रशांत और जनार्दन अग्रवाल परिवार, को SBI की ओर से बार-बार दिए गए बचाव और जीवनदान की भी पूरी तरह जांच करनी चाहिए. सूत्रों के अनुसार, फंड के डायवर्जन का भी मामला है और अग्रवाल परिवार की कंपनियों के व्यापक नेटवर्क, "यार्न सप्लायर बिलों", कॉरपोरेट कनेक्शनों और सहायक कंपनियों के बीच धन के हस्तांतरण की जांच की जानी चाहिए. SFIO को अग्रवाल परिवार के सदस्यों, करीबी रिश्तेदारों और उनके नेटवर्क की संपत्तियों की भी जांच करनी चाहिए और जांच की शुरुआत SBI की मुंबई शाखा के उन अधिकारियों से होनी चाहिए, जिन पर सूत्रों ने बार-बार पुनर्गठन में मदद करने का आरोप लगाया है.

SFIO के आदेश में कंपनी का नाम है. लेकिन BRFL अकेले नहीं गिरी और न ही यह तेजी से गिरी. इसे बार-बार बचाया गया, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के एक कंसोर्टियम ने, जिसकी अगुवाई स्टेट बैंक ऑफ इंडिया कर रहा था.

SBI सिर्फ एक पर्यवेक्षक नहीं था

BW द्वारा देखे गए पुनर्गठन दस्तावेजों के अनुसार, पहले पुनर्गठन के तहत यह लीड बैंक और मॉनिटरिंग संस्था था, यानी यह देखने के लिए जिम्मेदार बैंक कि कंपनी अपने वादे पूरे कर रही है या नहीं. तीसरे बचाव में उसे इक्विटी का सबसे बड़ा हिस्सा मिला. और अगस्त 2018 में, S4A के बमुश्किल 15 महीने बाद, SBI ने अपने ₹2,260.79 करोड़ के लोन एक्सपोजर को बिक्री के लिए रख दिया. JM Financial ARC ने अंततः इसे ₹900 करोड़ में खरीदा. यह अंतर ₹1,361 करोड़ था, SBI द्वारा पहले से किए गए प्रावधानों को शामिल किए बिना. सार्वजनिक धन का इतना प्रत्यक्ष नुकसान हुआ.

बचाव की कोशिशें रिकवरी पर खत्म नहीं हुईं. वे दिवालिया प्रक्रिया पर खत्म हुईं. आगे वह रिकॉर्ड है कि हर चरण में बैंक क्या देख सकता था और फिर भी उसने क्या किया.

रेड फ्लैग नंबर एक: मुनाफा कमाने वाली कंपनी जो भुगतान नहीं कर सकी

कागजों पर BRFL अब भी मुनाफा दर्ज कर रही थी. मार्च 2013 को समाप्त तिमाही में शुद्ध मुनाफा 16.6% बढ़कर ₹48.36 करोड़ हो गया था और शुद्ध बिक्री 12.5% बढ़कर ₹895.55 करोड़ हो गई थी. इसके बावजूद कुछ ही हफ्तों के भीतर कंपनी ने अपने ऋणदाताओं से पुनर्गठन के लिए संपर्क किया. विरोधाभास साफ था: एक तरफ लेखांकन मुनाफा और दूसरी तरफ ₹4,000 करोड़ की कर्ज समस्या.

19 जुलाई 2013 को बाजार बंद होने के बाद कंपनी ने जानकारी दी कि उसके बोर्ड ने कॉरपोरेट डेट रिस्ट्रक्चरिंग प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. शेयर करीब 8% गिरकर ₹203.25 पर आ गया. मई 2008 में यह एक समय ₹418 तक कारोबार कर चुका था.

बढ़ता मुनाफा दिखाने वाली लेकिन अपने कर्ज का भुगतान करने में असमर्थ कंपनी के सामने ऋणदाताओं के पास दो संभावनाएं होती हैं: या तो उसका मुनाफा नकदी में नहीं बदल रहा था, या उसने कारोबार की क्षमता से कहीं अधिक कर्ज ले लिया था. दोनों ही स्थितियों में इस बात की कड़ी जांच होनी चाहिए थी कि पैसा कहां जा रहा था. इसके बजाय उसे SBI की निगरानी में बचाव मिला. पहला पुनर्गठन कर्ज की समस्या हल करने के लिए था. ऐसा नहीं हुआ.

लेकिन कंपनी की ओर से संकट की अपनी व्याख्या में एक और बात दर्ज थी: "सहायक कंपनियों को दिए गए अग्रिम". BRFL ने इसे बड़े पैमाने पर विस्तार, कमर्शियल पेपर के भुगतान, सरकारी सब्सिडी में देरी और बढ़ती कर्ज लागत के साथ उन कारणों में शामिल किया था, जिन्होंने उसके कैश फ्लो को प्रभावित किया और उसे ₹4,000 करोड़ के CDR की ओर धकेला.

यह सवाल कंपनी के केवल जरूरत से ज्यादा कर्ज लेने से कहीं बड़ा है. ₹4,000 करोड़ के बैंक बचाव की ओर बढ़ रही कंपनी अपनी सहायक कंपनियों को पैसा क्यों दे रही थी? किन कंपनियों को यह पैसा मिला? कितना मिला? किन शर्तों पर मिला? उन कंपनियों का नियंत्रण किसके पास था? और उस पैसे में से कितना वापस आया?

अग्रवाल परिवार का कंपनियों का नेटवर्क

यह नेटवर्क व्यापक था और सीमाओं के पार तक फैला था. कंपनी की फाइलिंग के अनुसार, BRFL की सहायक कंपनियों में Bombay Rayon Holdings Ltd, STI India Ltd, ब्रिटेन की DPJ Clothing Ltd, BRFL Bangladesh Pvt Ltd और दो इतालवी संस्थाएं BRFL Italia S.r.l तथा BRFL Italia Licensee S.r.l शामिल थीं, जिनके पास "GURU" गारमेंट ब्रांड था. प्रमोटर समूह में एक विदेशी कंपनी AAA United B.V. भी शामिल थी, जिसके पास BRFL की 13.83% हिस्सेदारी थी और कंपनी की अपनी फाइलिंग में इसे विदेशी प्रमोटर कंपनी के रूप में वर्गीकृत किया गया था.

अंत तक कंपनी इनमें से कई के बारे में हिसाब तक नहीं दे सकी. उसके ऑडिटरों और सेक्रेटेरियल ऑडिटरों ने दर्ज किया कि BRFL Textiles, BRFL Italia Licensee, STI India और DPJ Clothing के वित्तीय विवरण "उपलब्ध नहीं थे", BRFL Italia का कारोबार बंद हो चुका था और BRFL Bangladesh में कोई परिचालन नहीं था. जिस समूह की अपनी सहायक कंपनियों के खातों तक पहुंच नहीं थी, वह बैंक से हजारों करोड़ रुपये मांगते हुए उन्हें पैसा दे रहा था.

इसके जवाब संबंधित पक्षों के खुलासों और सहायक कंपनियों की किताबों में छिपे हैं. और यहीं से कहानी सिर्फ मंदी में फंसी एक टेक्सटाइल कंपनी की नहीं रह जाती, बल्कि अग्रवाल परिवार के व्यापक कॉरपोरेट नेटवर्क की ओर बढ़ती है.

रेड फ्लैग नंबर दो: बकाया ब्याज को शेयरों में बदलना

2015 के अंत तक ऋणदाता फिर सामने आए. 4 नवंबर 2015 की जॉइंट लेंडर्स फोरम की सिफारिश पर BRFL के बोर्ड ने ₹712.67 करोड़ के वर्किंग कैपिटल टर्म लोन और ₹221.58 करोड़ के फंडेड इंटरेस्ट टर्म लोन, यानी कुल ₹934.26 करोड़, को ऋणदाताओं के लिए इक्विटी में बदलने की मंजूरी दी.

जिस ब्याज का कंपनी भुगतान नहीं कर सकी, उसे पहले नए कर्ज में बदल दिया गया. अब उस कर्ज को शेयरों में बदल दिया गया. बैंक ऐसे कर्जदार के आंशिक मालिक बन गए थे, जो उन्हें भुगतान नहीं कर पा रहा था.

रेड फ्लैग नंबर तीन: कर्मचारियों का पैसा

अप्रैल 2016 में चेतावनी को नजरअंदाज करना मुश्किल हो गया.

बोइसर MIDC पुलिस ने BRFL के तीन निदेशकों, प्रशांत अग्रवाल, जनार्दन अग्रवाल और अमन अग्रवाल के खिलाफ मामला दर्ज किया. उन पर अक्टूबर 2014 से दिसंबर 2015 के बीच कंपनी के तारापुर संयंत्र में करीब 1,400 कर्मचारियों से काटे गए ₹1.90 करोड़ के प्रोविडेंट फंड योगदान के गबन का आरोप लगाया गया. उस समय मुंबई मिरर की एक रिपोर्ट के अनुसार, आरोप था कि यह पैसा सरकार के पास जमा करने के बजाय निदेशकों के बीच बांट दिया गया, जबकि जमा SBI की अपनी बोइसर शाखा में किया जाना था. प्रोविडेंट फंड निरीक्षक की शिकायत पर भारतीय दंड संहिता की धारा 406 के तहत आपराधिक विश्वासघात का मामला दर्ज किया गया था.

जिस समय ऋणदाता दूसरे बचाव पर बातचीत कर रहे थे, उन्हीं महीनों में कथित तौर पर कर्मचारियों का पैसा गायब हुआ. जॉइंट लेंडर्स फोरम की बैठक भी इसी अवधि में हुई थी. शेयरधारकों द्वारा इस बदलाव पर मतदान करने से कुछ सप्ताह पहले यह मामला सार्वजनिक हुआ. तब तक शेयर गिरकर ₹133.60 पर आ चुका था, जो पहले बचाव के समय के स्तर से एक तिहाई कम था.

आरोप किसी कारोबारी गलत फैसले का नहीं था. यह कर्मचारियों के वेतन से उनकी सेवानिवृत्ति के लिए काटे गए पैसे से जुड़ा था. हजारों करोड़ रुपये का और कर्ज देने पर विचार कर रहे किसी ऋणदाता के लिए इससे ज्यादा स्पष्ट संकेत की कल्पना करना मुश्किल है.

और यह यहीं नहीं रुका. छह साल बाद कंपनी की अपनी वार्षिक रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि 31 मार्च 2022 तक छह महीने से अधिक समय से बकाया प्रोविडेंट फंड देनदारी ₹18.60 करोड़ थी, कर्मचारी राज्य बीमा की देनदारी ₹4.46 करोड़ थी और PF, ESIC तथा TDS पर ब्याज और जुर्माना ₹15.02 करोड़ था. 2016 में आपराधिक मामला शुरू कराने वाले ₹1.90 करोड़ के मुकाबले 2022 तक कर्मचारियों की बकाया देनदारी लगभग दस गुना हो चुकी थी.

निदेशक पूरे समय पद पर बने रहे. 27 सितंबर 2019 की वार्षिक आम बैठक में शेयरधारकों ने पुलिस मामले के तीन साल बाद भी प्रशांत अग्रवाल को दो और वर्षों के लिए प्रबंध निदेशक के रूप में फिर नियुक्त किया. 2021-22 की वार्षिक रिपोर्ट में भी अमन अग्रवाल और प्रशांत अग्रवाल का कार्यकाल रोटेशन के आधार पर समाप्त हो रहा था और दोनों ने फिर नियुक्ति की पेशकश की थी.

रेड फ्लैग नंबर चार: घाटा और सिकुड़ता कारोबार

आंकड़े भी गलत दिशा में जा रहे थे. सितंबर 2016 को समाप्त तिमाही में BRFL ने ₹53.56 करोड़ का शुद्ध घाटा दर्ज किया.

यह वही कंपनी थी जिसके सामने बैठकर ऋणदाताओं ने अगले बचाव की योजना तैयार की.

तीसरा बचाव: S4A

अप्रैल 2017 में, PF मामले के एक साल बाद, बैंकों ने RBI की स्ट्रेस्ड एसेट्स की सस्टेनेबल स्ट्रक्चरिंग योजना यानी S4A के तहत अब तक का सबसे व्यापक बचाव मंजूर किया. यह RBI की S4A योजनाओं के तहत सबसे बड़े कर्ज पुनर्गठनों में से एक था.

S4A दस्तावेजों के अनुसार, इस पैकेज में करीब ₹5,600 करोड़ का कर्ज शामिल था. इसमें से ₹2,249.74 करोड़ को असस्टेनेबल घोषित किया गया और इक्विटी तथा डिबेंचर्स में बदल दिया गया. BRFL के बोर्ड ने 25 अप्रैल 2017 की बैठक में S4A योजना के तहत ऋणदाताओं को तरजीही आधार पर अधिकतम 126,655,304 शेयर जारी करने को मंजूरी दी. ये विस्तारित शेयर पूंजी का 39.89% थे. इसके अलावा ₹1,000 अंकित मूल्य वाले वैकल्पिक रूप से परिवर्तनीय डिबेंचर्स भी जारी किए जाने थे, जिनकी कुल राशि ₹410 करोड़ से अधिक नहीं होनी थी. इसे मंजूरी देने के लिए 20 मई 2017 को असाधारण आम बैठक बुलाई गई.

योजना को एक और मंजूरी भी मिली

1 जून 2017 को CNBC-TV18 ने बताया कि बॉम्बे रेयॉन को बैंकों की ओवरसाइट कमेटी से S4A की मंजूरी मिल गई है. यह RBI द्वारा अनिवार्य संस्था थी, जिसका उद्देश्य ऐसे पैकेजों की स्वतंत्र समीक्षा करना था. उस समिति में कौन था, उसे कौन-सी सामग्री दिखाई गई और उसने क्या जांचा, ये सभी सवाल अब इसी जांच की कड़ी का हिस्सा हैं. इसकी जांच होनी चाहिए और इससे पूरी तस्वीर सामने आ सकती है.

SBI को सबसे बड़ा हिस्सा मिला. दस्तावेजों के अनुसार, S4A के तहत उसे 43.74 मिलियन शेयर और डिबेंचर्स आवंटित किए गए और बाद में 19.31 मिलियन अतिरिक्त शेयर तथा 106,732 डिबेंचर्स भी दिए गए.

आम शेयरधारकों के लिए यह भारी हिस्सेदारी कमी थी. जनवरी 2018 तक BRFL की इक्विटी पूंजी 2013 के ₹134.60 करोड़ से बढ़कर ₹317.48 करोड़ हो गई थी. शेयरों की संख्या दोगुने से अधिक हो गई थी और नए शेयर मुख्य रूप से नए पैसे लाने वाले निवेशकों को नहीं, बल्कि खराब कर्ज के बदले शेयर लेने वाले ऋणदाताओं को दिए गए थे. नतीजा यह हुआ कि मार्च 2022 तक वित्तीय संस्थानों और बैंकों के पास बॉम्बे रेयॉन फैशन्स की 51.88% हिस्सेदारी थी. ऋणदाता कंपनी के मालिक बन चुके थे.

S4A उन दबावग्रस्त कर्जदारों के लिए था जिनके कारोबार को कम से कम आधे कर्ज की सर्विसिंग करने में सक्षम माना जाता था. BRFL के मामले में ऋणदाताओं ने ₹5,600 करोड़ के पैकेज में से ₹3,390 करोड़, यानी करीब 60%, को सस्टेनेबल माना.

उन्होंने यह आकलन उस कंपनी के लिए किया था जो एक CDR में विफल रही थी, जिसे डेट-फॉर-शेयर्स स्वैप की जरूरत पड़ी थी, जो तिमाही घाटा दर्ज कर रही थी और जिसके निदेशकों पर कर्मचारियों के पैसे से जुड़े आपराधिक मामले में आरोप थे.

कंपनी के अपने नतीजों ने जल्द ही दिखा दिया कि ये कैश फ्लो वास्तव में क्या थे. सितंबर 2017 को समाप्त तिमाही में BRFL को ₹14.56 करोड़ का घाटा हुआ और उसकी शुद्ध बिक्री 31.2% घटकर ₹675.05 करोड़ रह गई.

शेयर कीमत में उछाल और फिर गिरावट

इसके बाद शेयर में ऐसी तेजी आई जिसे बुनियादी कारोबारी प्रदर्शन से समझाना मुश्किल था.

17 अक्टूबर 2017 को ₹111 के निचले स्तर से BRFL के शेयर लगभग दो महीने में दोगुने हो गए और 18 दिसंबर को ₹232.50 तक पहुंच गए. कारोबार में कोई सुधार नहीं हुआ था; कंपनी अब भी घाटे में थी और उसका कारोबार सिकुड़ रहा था.

फिर शेयर की कीमत गिरने लगी. 15 दिसंबर 2017 को ₹224.75 के बंद भाव से शेयर 11 कारोबारी सत्रों में 49.96% गिरकर 2 जनवरी 2018 को ₹112.45 पर आ गया. उस दिन शेयर निचले सर्किट पर बंद हुआ.

यह तेजी S4A की कीमत तय होने के महीनों बाद आई थी, इसलिए इसका कन्वर्जन पर असर नहीं पड़ा. लेकिन एक घाटे में चल रही कंपनी का शेयर कुछ ही हफ्तों में दोगुना और फिर आधा हो जाना, खासकर तब जब देश का सबसे बड़ा बैंक उसका एक बड़ा शेयरधारक बन चुका था, ऐसे सवाल खड़े करता है जिनका जवाब SEBI के ट्रेडिंग रिकॉर्ड से मिल सकता है: तेजी के दौरान किसने खरीदा और गिरावट के दौरान किसने बेचा?

बाहर निकलने की कोशिश जो पूरी नहीं हुई

2018 के मध्य तक SBI के पास BRFL की 29.28% हिस्सेदारी थी, जो किसी भी अन्य संस्थान से अधिक थी. Axis Bank के पास 8.04% और छह अन्य ऋणदाताओं के पास 1.61% से 3.35% के बीच हिस्सेदारी थी.

अगस्त 2018 में, S4A को मंजूरी दिए जाने के बमुश्किल 15 महीने बाद, SBI ने अपना खाता एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियों, बैंकों और NBFCs को बिक्री के लिए रखा. इसमें ₹2,260.79 करोड़ की देनदारी दिखाई गई थी, जिसमें उसकी इक्विटी शामिल नहीं थी. JM Financial ARC ने यह कर्ज खरीदा. Capitalmind के विश्लेषण के अनुसार, उसने SBI के ₹2,261 करोड़ के एक्सपोजर के लिए ₹900 करोड़ का भुगतान किया. इसमें करीब 60% की हेयरकट थी, जिसमें ₹840 करोड़ नकद और बाकी सिक्योरिटी रिसीट्स के रूप में थे.

मई 2017 में ऋणदाताओं ने इस कंपनी के ₹3,390 करोड़ कर्ज को सस्टेनेबल प्रमाणित किया था. 15 महीने बाद SBI इसे एक रुपये के 40 पैसे के बराबर कीमत पर बेच रहा था, लेकिन बैंक पूरी तरह बाहर नहीं निकला.

लोन बेचने के काफी समय बाद भी SBI BRFL का सबसे बड़ा एकल शेयरधारक बना रहा. कंपनी की 2021-22 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 31 मार्च 2022 को State Bank of India के पास 91,352,087 शेयर यानी 28.77% हिस्सेदारी थी, जबकि Axis Bank के पास 25,520,484 शेयर यानी 8.04% हिस्सेदारी थी. तब तक इन शेयरों की कीमत उस कर्ज की तुलना में बहुत कम रह गई थी, जिसे उन्होंने बदला था.

अन्य ऋणदाता बाहर निकलने की कोशिश में लगे रहे. Punjab National Bank ने अक्टूबर 2021 से फरवरी 2022 के बीच कई सौदों में अपनी करीब 75.8 लाख शेयरों की पूरी हिस्सेदारी बेच दी और अंत में उसके पास कोई हिस्सेदारी नहीं बची. प्रमोटर शेयर भी बेचे जा रहे थे. प्रमोटर इकाई Ashwell Holding Company Pvt Ltd ने 2021-22 के दौरान अपनी हिस्सेदारी 7.92% से घटाकर 1.39% कर दी. प्रशांत अग्रवाल की अपनी हिस्सेदारी भी उस समय घट गई, जब कंपनी ने इसे ऋणदाता द्वारा गिरवी रखे शेयरों के आह्वान के रूप में बताया.

₹888 करोड़ जो राइट-ऑफ में गायब हो गए

इसके बाद अकाउंटिंग का हिसाब सामने आया और यह सीधे सूत्रों की ओर से लगाए गए सप्लायर बिलों तथा कंपनी से बाहर धन जाने के आरोपों की ओर इशारा करता है.

2021-22 में BRFL का घाटा ₹299.95 करोड़ से बढ़कर ₹1,147.20 करोड़ हो गया. कंपनी की निदेशकों की रिपोर्ट में इसका कारण बताया गया: घाटा "मुख्य रूप से कंपनी द्वारा अप्रचलित और गैर-गतिशील इन्वेंट्री में हुए नुकसान तथा वसूल न किए जा सकने वाले कर्ज को राइट ऑफ करने" के कारण हुआ. अकेले असाधारण मद ₹888.07 करोड़ की थी.

एक ही साल में करीब ₹900 करोड़ की इन्वेंट्री और रिसीवेबल्स को राइट ऑफ किया गया. इन गैर-वसूली योग्य देनदारियों का भुगतान किसे करना था? कौन-सी इन्वेंट्री बेकार हो गई और उसे कब खरीदा गया? यही वे सवाल हैं जो SFIO और CBI के जांचकर्ता कंपनी के ऑडिटरों से पूछ सकते हैं और यही वे लेजर हैं जिन्हें सूत्रों के अनुसार यार्न सप्लायर बिलों के साथ जांचा जाना चाहिए.

इस राइट-ऑफ के साथ दो तथ्य भी जुड़े हैं.

पहला, उसी साल की निदेशकों की रिपोर्ट में कहा गया है कि कंपनी के वैधानिक ऑडिटरों ने कंपनी अधिनियम की धारा 143(12) के तहत धोखाधड़ी की कोई घटना रिपोर्ट नहीं की थी. दूसरा, ₹1,147 करोड़ के घाटे और ₹18.60 करोड़ के बकाया प्रोविडेंट फंड के उसी साल में चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर अमन अग्रवाल ने वेतन और भत्तों के रूप में ₹2.35 करोड़ लिए.

वह संपत्ति जो बाहर चली गई

जब मूल कंपनी डूब रही थी, उसी समय उसका सबसे अच्छा कारोबार एक नई इकाई में स्थानांतरित कर दिया गया.

BRFL Textiles Private Limited को 20 अगस्त 2020 को शामिल किया गया और 30 सितंबर 2020 की वार्षिक आम बैठक में शेयरधारकों ने तारापुर कारोबार को स्लंप सेल के जरिए एक चालू कारोबार के रूप में BRFL Textiles को हस्तांतरित करने की मंजूरी दी.

इसका असर आंकड़ों में दिखता है. 2021-22 में BRFL ने खुद केवल ₹83.08 करोड़ का राजस्व अर्जित किया, क्योंकि "तैयार कपड़े के निर्माण का प्रमुख कारोबार वित्त वर्ष 2020-21 के दौरान कंपनी से अलग कर दिया गया था." नई कंपनी, जिसमें BRFL की 70% हिस्सेदारी थी, ने ₹731.67 करोड़ का टर्नओवर, ₹1,101.61 करोड़ की कुल संपत्ति और ₹218.36 करोड़ का घाटा दर्ज किया, ये आंकड़े अस्थायी थे और ऑडिटेड नहीं थे, क्योंकि इसके वित्तीय विवरण खुद इसकी मूल कंपनी को उपलब्ध नहीं थे.

जिस सूचीबद्ध कंपनी से यह कारोबार निकला था, उसकी तुलना में नौ गुना राजस्व, ऐसी इकाई में था जिसके खाते सूचीबद्ध मूल कंपनी हासिल नहीं कर सकी, और यह सब उस मूल कंपनी के दिवालिया प्रक्रिया में जाने से दो साल पहले हुआ.

पतन

कंपनी ने बाद में स्वीकार किया कि बचाव की कोशिशें विफल हो चुकी थीं. 2020 के एक बयान में उसने कहा कि उसके कर्ज को RBI की योजनाओं के तहत दो बार पुनर्गठित किया गया, लेकिन इनसे उसे जरूरी कार्यशील पूंजी नहीं मिली, इसलिए उसकी फैक्ट्रियां कभी पूरी क्षमता से इस्तेमाल नहीं हो सकीं.

सितंबर 2020 तक BRFL पर करीब ₹5,110 करोड़ का कर्ज था और एक साल में उसका राजस्व 61% गिरकर ₹251 करोड़ रह गया था. कंपनी को ब्याज और कर से पहले भी घाटा हो रहा था. उसकी अपनी वार्षिक रिटर्न के अनुसार 1 अप्रैल 2021 तक कुल देनदारी ₹4,704.74 करोड़ थी, जिसमें ₹4,692.29 करोड़ ब्याज था, जिसका भुगतान नहीं किया गया था.

अगस्त 2021 में मैनेजिंग डायरेक्टर प्रशांत अग्रवाल को मुंबई इकाई के डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ GST इंटेलिजेंस ने कथित ₹55.8 करोड़ के इनपुट टैक्स क्रेडिट फ्रॉड के मामले में गिरफ्तार किया. उन पर CGST Act के तहत मामला दर्ज किया गया और उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजा गया.

मई 2022 तक कंपनी एक कामकाजी सूचीबद्ध इकाई भी नहीं रह गई थी. SEBI के लिस्टिंग नियमों के अनुपालन और जुर्माने तथा लिस्टिंग फीस का भुगतान न करने के कारण शेयर बाजारों ने 23 मई 2022 से उसके सिक्योरिटीज में कारोबार निलंबित कर दिया.

अंत एक यार्न कारोबारी की ओर से आया, जिसे ₹1.61 करोड़ का भुगतान किया जाना था. 7 जून 2022 को NCLT ने चिरंजीलाल यार्न ट्रेडर्स के एकमात्र मालिक विकास परासरम्पुरिया की याचिका पर BRFL को दिवालिया प्रक्रिया में भेज दिया. प्रशांत अग्रवाल की अपील को NCLAT ने 15 जुलाई 2022 को खारिज कर दिया. JM Financial के ₹6,080 करोड़ के स्वीकृत दावे ने उसे क्रेडिटर्स कमेटी में 90.80% वोट दिए, जबकि Axis Bank के ₹610.86 करोड़ के स्वीकृत दावे से बाकी हिस्सा था. Donear, Welspun और Arvind ने रुचि दिखाई थी, लेकिन ऋणदाताओं ने हर योजना को खारिज कर दिया और 9 नवंबर 2023 को ट्रिब्यूनल ने परिसमापन का आदेश दिया.

जो शेयर कभी ₹418 पर कारोबार करता था, वह 5 दिसंबर 2022 को ₹1.58 के सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुंच गया. उस समय पूरी कंपनी का मूल्य करीब ₹58 करोड़ था.

SFIO और CBI को बैंक के भीतर भी जांच क्यों करनी चाहिए

चेतावनी संकेतों को एक साथ रखिए: बढ़ते मुनाफे के आधार पर पुनर्गठन का अनुरोध; ऐसी सहायक कंपनियों को पैसा देना जिनके खातों तक मूल कंपनी की पहुंच नहीं थी; ब्याज को कैपिटलाइज कर शेयरों में बदलना; कर्मचारियों के रिटायरमेंट के पैसे लेने के आरोप में निदेशकों के खिलाफ आपराधिक शिकायत; तिमाही घाटा; शेयर की लगातार गिरती कीमत. इनमें से हर संकेत SBI और उसके साझेदारों द्वारा S4A को मंजूरी देने से पहले मौजूद था. बैंक को बाद की जानकारी की जरूरत नहीं थी. उसे केवल अपनी फाइलें पढ़ने की जरूरत थी.

तो SBI लगातार हां क्यों कहता रहा?

हो सकता है बैंक अधिकारियों को सबूतों के विपरीत यह भरोसा रहा हो कि एक और बचाव काम करेगा. हो सकता है पुनर्गठित खराब कर्ज को अभी खराब कर्ज के रूप में दर्ज न करना किसी की बैलेंस शीट या करियर के लिए बेहतर हो. या फिर कुछ और हो सकता है. यह निर्णय की विफलता थी, जांच-पड़ताल की विफलता थी या कुछ और गंभीर, यह जांच से ही तय होना चाहिए और यही वह सवाल है जिसका जवाब अभी किसी से नहीं मांगा गया है.

SFIO कंपनियों की जांच करता है और उसके आदेश में BRFL का नाम है. लेकिन कंपनी अधिनियम उसके निरीक्षकों को कंपनी के मामलों से जुड़े रिकॉर्ड और लोगों की जांच करने के व्यापक अधिकार देता है. और BRFL के मामलों से उसके लीड बैंक की लोन फाइलों से ज्यादा जुड़े रिकॉर्ड कोई नहीं हैं: प्रत्येक बचाव के लिए आंतरिक मंजूरी नोट, जॉइंट लेंडर्स फोरम की बैठक के मिनट्स, CDR Empowered Group के दस्तावेज, S4A का viability assessment और techno-economic viability report, RBI द्वारा अनिवार्य Oversight Committee के सामने रखे गए दस्तावेज, "सस्टेनेबल" कर्ज के आंकड़े के पीछे के कैश-फ्लो अनुमान और प्रमोटरों से बैंकों द्वारा मांगी गई या न मांगी गई पूंजी.

अगर ये फाइलें बैंकों के भीतर किसी चूक की ओर इशारा करती हैं, तो CBI, RBI और SBI की अपनी विजिलेंस विंग को इसकी जांच आगे बढ़ानी होगी.

सवाल सरल हैं और इनका जवाब शपथ के तहत मिलना चाहिए

SBI में किसने प्रत्येक बचाव की सिफारिश और मंजूरी दी?

क्या उन्होंने S4A को मंजूरी देने से पहले 2016 की पुलिस शिकायत पढ़ी थी? अगर हां, तो उन्होंने उन्हीं निदेशकों को पद पर क्यों बने रहने दिया?

किस कैश-फ्लो आंकड़ों के आधार पर घाटे में चल रही और सिकुड़ती कंपनी के कर्ज को "60% सस्टेनेबल" माना गया और Oversight Committee के सामने क्या रखा गया था?

क्या किसी ऋणदाता ने सहायक कंपनियों को दिए गए अग्रिमों या एक ही साल में राइट ऑफ किए गए ₹888.07 करोड़ के इन्वेंट्री और रिसीवेबल्स की जांच की?

क्या किसी ने 2017 में उस शेयर की तेजी और गिरावट की जांच की, जिसका बैंक कुछ ही समय पहले बड़ा शेयरधारक बना था?

और एक खाते पर ₹1,300 करोड़ से अधिक गंवाने के बाद भी, जब वह ₹58 करोड़ मूल्य वाली कंपनी में 28.77% हिस्सेदारी रखता था, क्या भारत के सबसे बड़े बैंक ने किसी एक अधिकारी से इसका स्पष्टीकरण मांगा?

BW ने SBI को विस्तृत सवाल भेजे, लेकिन उसे कोई जवाब नहीं मिला है. SBI की ओर से जवाब मिलने पर उसे शामिल किया जाएगा.

अगली कड़ी: आज बॉम्बे रेयॉन की सबसे मूल्यवान संपत्ति को कौन नियंत्रित करता है.

बॉम्बे रेयॉन ने ₹4,000 करोड़ के बैंक बचाव को एक ऐसे कॉरपोरेट खेल में बदल दिया, जिसमें कंपनी की असली संपत्ति और नियंत्रण की तस्वीर लगातार बदलती रही.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 

 


बजट 2027-28 की तैयारियां शुरू, 12 अक्टूबर से मंत्रालयों के साथ प्री-बजट बैठकें; 6 अक्टूबर तक मांगे प्रस्ताव

वित्त मंत्रालय के बजट विभाग की ओर से जारी कार्यक्रम के अनुसार, प्री-बजट बैठकें 12 अक्टूबर से शुरू होकर 13 नवंबर तक चलेंगी. इन बैठकों में विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के साथ उनके खर्च और आगामी वित्त वर्ष के लिए आवश्यक बजट आवंटन पर चर्चा की जाएगी.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 24 September, 2026
Last Modified:
Thursday, 24 September, 2026
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वित्त मंत्रालय ने केंद्रीय बजट 2027-28 की तैयारियों की प्रक्रिया शुरू कर दी है. इसके तहत 12 अक्टूबर से 13 नवंबर 2026 तक विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के साथ बजट-पूर्व बैठकें होंगी. इन बैठकों में वित्त वर्ष 2026-27 के संशोधित अनुमान (RE) और वित्त वर्ष 2027-28 के बजट अनुमान (BE) पर चर्चा कर उन्हें अंतिम रूप देने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी.

मंत्रालय ने 23 सितंबर को जारी नोटिस में सभी केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों को बैठकों से संबंधित जरूरी वित्तीय आंकड़े और खर्च के प्रस्ताव 6 अक्टूबर 2026 तक जमा करने को कहा है. बजट-पूर्व चर्चा व्यय सचिव की अध्यक्षता में होगी और इसमें संबंधित मंत्रालयों की वित्तीय जरूरतों, मौजूदा खर्च और अगले वित्त वर्ष की प्राथमिकताओं पर विचार किया जाएगा.

12 अक्टूबर से शुरू होंगी प्री-बजट बैठकें

वित्त मंत्रालय के बजट विभाग की ओर से जारी कार्यक्रम के अनुसार, प्री-बजट बैठकें 12 अक्टूबर से शुरू होकर 13 नवंबर तक चलेंगी. इन बैठकों में विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के साथ उनके खर्च और आगामी वित्त वर्ष के लिए आवश्यक बजट आवंटन पर चर्चा की जाएगी.

इन बैठकों का एक प्रमुख उद्देश्य वित्त वर्ष 2026-27 के संशोधित अनुमानों को अंतिम रूप देना है. इसके साथ ही 2027-28 के लिए बजट आवंटन और खर्च से जुड़े प्रस्तावों पर भी विचार किया जाएगा. मंत्रालयों को बैठक से पहले जरूरी जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं.

मंत्रालयों को 6 अक्टूबर तक देनी होगी जानकारी

वित्त मंत्रालय ने सभी संबंधित मंत्रालयों और विभागों से आवश्यक वित्तीय विवरण और प्रस्ताव 6 अक्टूबर तक जमा करने को कहा है. इन आंकड़ों के आधार पर व्यय विभाग संबंधित मंत्रालयों की मांगों और प्रस्तावों की समीक्षा करेगा.

प्री-बजट बैठकों के दौरान मंत्रालयों की ओर से विभिन्न योजनाओं, कार्यक्रमों और अन्य खर्चों के लिए अतिरिक्त बजट की जरूरत भी बताई जा सकती है. इसके बाद वित्त वर्ष 2027-28 के बजट अनुमानों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी.

1 फरवरी 2027 को पेश हो सकता है बजट

केंद्रीय बजट 2027-28 को 1 फरवरी 2027 को संसद में पेश किए जाने की संभावना है. यह नरेंद्र मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल का चौथा पूर्ण बजट होगा. वहीं, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण लगातार 10वीं बार केंद्रीय बजट पेश करेंगी.

आगामी बजट में आर्थिक वृद्धि को गति देने, रोजगार के अवसर बढ़ाने और घरेलू मांग को मजबूत करने से जुड़े उपायों पर सरकार का ध्यान रहने की उम्मीद है. इसके अलावा राजकोषीय अनुशासन बनाए रखने और सरकारी खर्च को प्राथमिकताओं के अनुरूप रखने पर भी जोर रह सकता है.

हालांकि, बजट में किन क्षेत्रों के लिए कितना आवंटन किया जाएगा और सरकार की प्रमुख प्राथमिकताएं क्या होंगी, इसका स्पष्ट पता बजट दस्तावेज और संसद में पेश किए जाने वाले प्रस्तावों से ही चलेगा. फिलहाल प्री-बजट बैठकें इसी प्रक्रिया की शुरुआती कड़ी हैं.

 


ओला इलेक्ट्रिक का बड़ा फंड जुटाने का प्लान, 28 सितंबर को राइट्स इश्यू पर बोर्ड की बैठक

बैठक में राइट्स इश्यू के आकार, शर्तों और इससे जुड़े अन्य पहलुओं पर चर्चा की जा सकती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 24 September, 2026
Last Modified:
Thursday, 24 September, 2026
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इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहन कंपनी ओला इलेक्ट्रिक मोबिलिटी एक बार फिर पूंजी जुटाने की तैयारी कर रही है. कंपनी ने बताया है कि राइट्स इश्यू के जरिए फंड जुटाने के प्रस्ताव पर विचार करने के लिए 28 सितंबर को बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की बैठक होगी. बैठक में राइट्स इश्यू के आकार, शर्तों और इससे जुड़े अन्य पहलुओं पर चर्चा की जा सकती है.

बोर्ड बैठक में राइट्स इश्यू पर विचार

ओला इलेक्ट्रिक ने एक्सचेंज फाइलिंग में बताया है कि उसके बोर्ड की 28 सितंबर को बैठक प्रस्तावित है. इसमें पात्र शेयरधारकों को इक्विटी शेयर जारी कर पूंजी जुटाने के प्रस्ताव पर विचार किया जाएगा. हालांकि, राइट्स इश्यू की अंतिम राशि, शेयरों की संख्या, इश्यू प्राइस और अन्य शर्तों की जानकारी बोर्ड की मंजूरी के बाद ही स्पष्ट होगी. राइट्स इश्यू में कंपनी नए शेयर अपने मौजूदा पात्र शेयरधारकों को खरीदने का अधिकार देती है. शेयरधारक तय अनुपात और निर्धारित कीमत पर इन शेयरों के लिए आवेदन कर सकते हैं. इस प्रक्रिया में मौजूदा शेयरधारकों के साथ प्रमोटर समूह की भागीदारी भी अहम होती है.

पहले QIP के जरिए जुटा चुकी है 780 करोड़ रुपये

ओला इलेक्ट्रिक इससे पहले भी पूंजी जुटा चुकी है. कंपनी को कुल 1,500 करोड़ रुपये तक जुटाने की मंजूरी मिली थी. इसमें से करीब 780 करोड़ रुपये कंपनी ने जून 2026 में क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट यानी QIP के जरिए जुटाए थे.

अब राइट्स इश्यू के प्रस्ताव के जरिए कंपनी की ओर से पूंजी जुटाने की अगली प्रक्रिया पर विचार किया जा रहा है. इस फंड का इस्तेमाल कंपनी की कारोबारी जरूरतों, विस्तार और अन्य कॉरपोरेट उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है. हालांकि, प्रस्तावित राशि और फंड के इस्तेमाल की विस्तृत जानकारी बोर्ड के फैसले के बाद सामने आएगी.

राइट्स इश्यू की खबर से शेयर में तेजी

राइट्स इश्यू के प्रस्ताव की खबर के बीच बुधवार को ओला इलेक्ट्रिक के शेयर में तेजी देखने को मिली. NSE पर कंपनी का शेयर 10.83 फीसदी बढ़कर 41.87 रुपये पर बंद हुआ. कारोबार के दौरान शेयर 42.49 रुपये के उच्च स्तर और 38.25 रुपये के निचले स्तर तक गया. NSE पर करीब 3.90 करोड़ शेयरों में कारोबार हुआ.

पिछले छह महीनों में शेयर में करीब 77 फीसदी की तेजी दर्ज की गई है. हालांकि, शेयर बाजार में किसी कंपनी के फंड जुटाने के फैसले का असर अलग-अलग समय में अलग हो सकता है और सिर्फ शेयर में तेजी को कंपनी की वित्तीय स्थिति में सुधार का संकेत नहीं माना जा सकता.

प्रमोटर समूह की करीब 33 फीसदी हिस्सेदारी

ओला इलेक्ट्रिक में प्रमोटर समूह की हिस्सेदारी करीब 32.97 फीसदी बताई गई है. कंपनी के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर भाविश अग्रवाल प्रमोटर समूह का नेतृत्व करते हैं. राइट्स इश्यू में प्रमोटर और मौजूदा शेयरधारकों की भागीदारी से कंपनी को नई पूंजी जुटाने में मदद मिल सकती है.

अब 28 सितंबर की बोर्ड बैठक महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी बैठक में राइट्स इश्यू के प्रस्ताव को आगे बढ़ाने से जुड़े प्रमुख फैसले लिए जा सकते हैं. इश्यू का आकार, कीमत, रिकॉर्ड डेट और शेयरधारकों के लिए पात्रता जैसे अहम विवरण बोर्ड की मंजूरी और बाद की नियामकीय प्रक्रिया के बाद स्पष्ट होंगे.


कल 300 अंक चढ़ा सेंसेक्स, आज बाजार पर दबाव के संकेत; कच्चा तेल, US यील्ड और NSE लिस्टिंग पर नजर

बुधवार को सेंसेक्स 299.17 अंक यानी 0.40 फीसदी बढ़कर 74,828.25 पर बंद हुआ. निफ्टी भी 117.80 अंक यानी 0.50 फीसदी की बढ़त के साथ 23,446.80 पर बंद हुआ.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 24 September, 2026
Last Modified:
Thursday, 24 September, 2026
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भारतीय शेयर बाजार ने बुधवार को पिछले सत्र की गिरावट से वापसी करते हुए मजबूती के साथ कारोबार खत्म किया. सेंसेक्स 299 अंक चढ़ा, जबकि निफ्टी में करीब 118 अंकों की तेजी रही. टाटा स्टील, बजाज फाइनेंस और आईटीसी जैसे शेयरों में खरीदारी से बाजार को सहारा मिला. हालांकि, गुरुवार को ग्लोबल संकेत कमजोर नजर आ रहे हैं. GIFT Nifty में करीब 190 अंकों की गिरावट, अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड के 5.11 फीसदी तक पहुंचने और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से भारतीय बाजार में कमजोर शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं. इसके साथ ही आज NSE के शेयरों की BSE पर लिस्टिंग भी बाजार के लिए अहम घटनाक्रम रहेगी.

आज बाजार पर क्यों है दबाव?

24 सितंबर को भारतीय शेयर बाजार की शुरुआत पर ग्लोबल संकेतों का असर देखने को मिल सकता है. GIFT Nifty में करीब 190 अंकों की गिरावट दर्ज की गई है, जो घरेलू बाजार में कमजोर शुरुआत का संकेत दे रही है.

अमेरिकी बॉन्ड बाजार से भी दबाव के संकेत मिले हैं. अमेरिका की 10 साल की ट्रेजरी यील्ड 15 बेसिस पॉइंट बढ़कर 5.11 फीसदी पर पहुंच गई है. एक दिन में यह बढ़ोतरी अप्रैल 2025 के बाद सबसे बड़ी बताई जा रही है. वहीं, 5 साल की अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड भी 5 फीसदी के पार पहुंच गई है.

बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी से वैश्विक बाजारों में निवेशकों की धारणा प्रभावित हो सकती है. इसके अलावा कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भी भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि लंबे समय तक ऊंची कीमतों से आयात बिल और कंपनियों की लागत पर दबाव बढ़ सकता है.

कल बाजार ने की थी मजबूत वापसी

इन कमजोर संकेतों से पहले बुधवार को घरेलू बाजार ने मजबूत वापसी की थी. 23 सितंबर को सेंसेक्स 299.17 अंक यानी 0.40 फीसदी बढ़कर 74,828.25 पर बंद हुआ. कारोबार के दौरान सेंसेक्स 74,973.74 के उच्च स्तर और 74,599.88 के निचले स्तर तक गया. निफ्टी भी 117.80 अंक यानी 0.50 फीसदी की बढ़त के साथ 23,446.80 पर बंद हुआ. दिन के कारोबार में निफ्टी 23,466.90 के उच्च स्तर और 23,349.55 के निचले स्तर तक गया. सेंसेक्स के 30 शेयरों में 21 बढ़त के साथ बंद हुए, जबकि 9 शेयरों में गिरावट रही. मेटल और वित्तीय शेयरों में खरीदारी ने बाजार को सहारा दिया.

टाटा स्टील समेत इन शेयरों में रही तेजी

बुधवार को सेंसेक्स में टाटा स्टील सबसे ज्यादा 3.28 फीसदी चढ़ा. बजाज फाइनेंस में 3.07 फीसदी, आईटीसी में 1.77 फीसदी, अल्ट्राटेक सीमेंट में 1.73 फीसदी और पावरग्रिड में 1.65 फीसदी की तेजी रही.

निफ्टी में बजाज फाइनेंस 3.41 फीसदी की बढ़त के साथ टॉप गेनर रहा. हिंडाल्को 3.17 फीसदी, टाटा स्टील 3.16 फीसदी, अपोलो हॉस्पिटल्स 2.64 फीसदी और JSW स्टील 2.43 फीसदी चढ़े. हालांकि, आईटी शेयरों में दबाव देखने को मिला. सेंसेक्स में एचसीएल टेक 1.10 फीसदी, इन्फोसिस 1.03 फीसदी और टीसीएस 0.95 फीसदी गिरकर बंद हुए. टाइटन और महिंद्रा एंड महिंद्रा में भी गिरावट रही.

मंगलवार की गिरावट के बाद आई थी तेजी

बुधवार की तेजी से पहले मंगलवार को बाजार में गिरावट दर्ज की गई थी. 22 सितंबर को सेंसेक्स 329.91 अंक यानी 0.44 फीसदी गिरकर 74,529.08 पर बंद हुआ था. निफ्टी भी 85.30 अंक यानी 0.36 फीसदी की गिरावट के साथ 23,329 पर बंद हुआ.

मंगलवार को सेंसेक्स के 30 में से सिर्फ 7 शेयर बढ़त में रहे थे, जबकि 23 शेयर गिरावट के साथ बंद हुए. निफ्टी के 50 शेयरों में 15 में तेजी और 35 में गिरावट रही थी. ऐसे में बुधवार की तेजी ने पिछले सत्र की कमजोरी को कुछ हद तक संभाला.

आज NSE की लिस्टिंग पर भी नजर

गुरुवार को बाजार के लिए एक बड़ा कॉरपोरेट इवेंट NSE की लिस्टिंग है. नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के शेयर आज प्रतिद्वंद्वी BSE पर लिस्ट होंगे. करीब एक दशक के इंतजार के बाद NSE का IPO आया था और इसे कुल 5.7 गुना सब्सक्रिप्शन मिला था.

ऐसे में NSE की लिस्टिंग और शुरुआती कारोबार बाजार की नजर में रहेगा. इसके अलावा दिनभर ग्लोबल मार्केट के संकेत, कच्चे तेल की कीमतें और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बाजार की दिशा को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक रहेंगे.

इन शेयरों पर रखें नजर

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आज Bharti Airtel, NTPC, NLC India, Ola Electric Mobility, PhysicsWallah, Rainbow Children’s Medicare, Meesho, Bharat Dynamics, Oswal Pumps, Jindal Stainless, Exide Industries, SBI Card, Welspun Living और Concord Biotech समेत कई शेयर कॉरपोरेट अपडेट के कारण फोकस में रहेंगे. Bharti Airtel की सहयोगी Airtel Money ने लंदन स्टॉक एक्सचेंज पर संभावित IPO की योजना की घोषणा की है. NTPC ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए ₹3,393.83 करोड़ के अंतिम लाभांश का भुगतान किया है, जबकि NLC India ने ₹500 करोड़ का कमर्शियल पेपर जारी कर फंड जुटाया है. Ola Electric ने प्रस्तावित राइट्स इश्यू के लिए बोर्ड की मंजूरी की प्रक्रिया शुरू की है. Meesho में RPS Ventures ने करीब 1 फीसदी हिस्सेदारी लगभग ₹900 करोड़ की ब्लॉक डील के जरिए बेची है. Bharat Dynamics को रक्षा मंत्रालय से ₹810.79 करोड़ का कॉन्ट्रैक्ट मिला है, जबकि Oswal Pumps को तेलंगाना में ₹273 करोड़ का सोलर रूफटॉप प्रोजेक्ट मिला है. Exide Energy Solutions ने बेंगलुरु के देवनहल्ली में अपनी 6 GWh क्षमता वाली लिथियम-आयन सेल मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी के Phase-I की कमीशनिंग पूरी कर ली है. Welspun Living में 2.59 फीसदी हिस्सेदारी ₹525.88 करोड़ में बेची गई है, जबकि Concord Biotech के बोर्ड ने 1:1 बोनस शेयर जारी करने को मंजूरी दी है.

बाजार की आज की दिशा किन संकेतों से तय होगी?

बुधवार की तेजी के बाद गुरुवार को बाजार के सामने घरेलू मजबूती और कमजोर ग्लोबल संकेतों के बीच संतुलन की स्थिति है. शुरुआती कारोबार में GIFT Nifty, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और कच्चे तेल की चाल महत्वपूर्ण रहेगी. इसके अलावा NSE की लिस्टिंग और कंपनियों से जुड़े कॉरपोरेट अपडेट भी खास शेयरों में हलचल बढ़ा सकते हैं.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)


सेबी का निप्पॉन-यस बैंक मामले को सयोनारा, सीबीआई अभी भी कह रहा है, इतनी जल्दी नहीं

निप्पॉन इंडिया MF को करीब ₹92.46 करोड़ का भुगतान करना होगा. कंपनी के सीईओ सुंदीप सिक्का और फंड मैनेजर अमित त्रिपाठी को 2.1-2.1 करोड़ रुपये देने होंगे. सूत्रों के मुताबिक, इस मामले में कुल भुगतान करीब ₹97 करोड़ होगा. सेबी का आदेश जल्द जारी होने की उम्मीद है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 23 September, 2026
Last Modified:
Wednesday, 23 September, 2026
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पलक शाह

भारतीय प्रतिभूति एवं विनियम बोर्ड (SEBI) ने निप्पॉन इंडिया म्यूचुअल फंड (Nippon India Mutual Fund) और उसके तीन शीर्ष अधिकारियों के साथ सहमति के आधार पर निपटान को मंजूरी दे दी है. यह मामला यस बैंक के Additional Tier-1 (AT1) बॉन्ड में फंड हाउस के निवेश से जुड़ा है. मामले से परिचित लोगों के अनुसार, इससे करीब दो साल पहले नियामक की ओर से जारी किया गया कारण बताओ नोटिस बंद हो जाएगा.

सूत्रों ने कहा कि कारण बताओ नोटिस दो साल पहले जारी किया गया था, लेकिन इस पूरे समय में न तो फंड हाउस और न ही उसके अधिकारियों ने कोई जवाब दाखिल किया और सेबी ने भी उनसे ऐसा करने के लिए दबाव नहीं डाला. दो साल, कोई जवाब नहीं. क्या किसी छोटे खिलाड़ी को भी इतनी ही गुंजाइश दी जाती? यह एक ऐसा सवाल है जो उद्योग के बाकी हिस्से में उठ सकता है.

निपटान के तहत निप्पॉन लाइफ इंडिया एस्सेट मैनेजमेंट करीब ₹92.46 करोड़ का भुगतान करेगी, सूत्रों ने कहा. फंड हाउस के सीईओ और वर्तमान में एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया (AMFI) के चेयरमैन सुंदीप सिक्का ₹2.1 करोड़ का भुगतान करेंगे. हेड फंड मैनेजर अमित त्रिपाठी भी ₹2.1 करोड़ का भुगतान करेंगे और पूर्व चीफ रिस्क ऑफिसर मिलिंद नेसारिकर ₹25.83 लाख का भुगतान करेंगे. कुल मिलाकर राशि करीब ₹97 करोड़ है. सूत्रों के अनुसार कुल आंकड़ा ₹97-100 करोड़ के बीच है.

सेबी की सेटलमेंट प्रोसीडिंग्स रेगुलेशन्स के तहत सभी सहमति-आधारित निपटारों की तरह, आवेदक आरोपों को स्वीकार या अस्वीकार किए बिना निपटान राशि का भुगतान करते हैं. आदेश पारित होने के बाद सेबी की ओर से उनके खिलाफ कार्यवाही समाप्त हो जाती है. यह बाजार नियामक का यह कहने का तरीका है कि "आइए, इस बारे में बात करना बंद करने पर सहमत होते हैं."

वह फाइल जिसने डेस्क बदले

निपटान आदेशों पर सेबी के पूर्णकालिक सदस्य हस्ताक्षर करते हैं. सूत्रों के अनुसार, इस मामले ने वहां पहुंचने के लिए थोड़ा लंबा रास्ता तय किया. सूत्रों के अनुसार, फाइल सबसे पहले पूर्णकालिक सदस्य वर्षनी के पास गई. उन्होंने खुद को इस मामले से अलग कर लिया क्योंकि उस समय उनके कार्यकाल में कुछ ही दिन बचे थे और बाद में उन्हें कार्यकाल में विस्तार मिला. इसके बाद फाइल KVR मूर्ति के पास गई, जिन्होंने अपने साथी पूर्णकालिक सदस्य संदीप प्रधान के साथ मिलकर इस पर हस्ताक्षर किए, सूत्रों ने कहा.

सेबी के नियम किसी फाइल को नए हस्ताक्षरकर्ता तक पहुंचने से नहीं रोकते. लेकिन इतने संवेदनशील मामले में यह एक ऐसा विवरण है जिस पर बाजार पर नजर रखने वाले ध्यान दे सकते हैं.

इस बीच, सीबीआई

यह निपटान ऐसे आपराधिक मामले के साथ असहज रूप से जुड़ा हुआ है, जिसमें निपटारे के कोई संकेत नहीं हैं. सीबीआई पहले ही इस मामले में आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है. यह मामला कथित ₹2,797 करोड़ के quid pro quo arrangement से जुड़ा है, जिसमें उस समय रिलायंस निप्पॉन MF के नाम से जाने जाने वाले फंड हाउस और यस बैंक के बीच संबंध था. एजेंसी ने यस बैंक के पूर्व प्रमुख राणा कपूर और उद्योगपति अनिल अंबानी के खिलाफ आरोप लगाए हैं. सूत्रों ने कहा कि एजेंसी EPFO फंड के कथित दुरुपयोग की भी जांच कर रही है और एक और आरोपपत्र दाखिल किए जाने की उम्मीद है.

सेबी का निपटान, सेबी की अपनी कार्यवाही को समाप्त करता है. यह सीबीआई पर बाध्यकारी नहीं है और न ही इसका आपराधिक अभियोजन पर कोई असर पड़ता है. इसलिए नियामक ने अपना मामला बंद कर दिया है, जबकि जांच एजेंसी अपनी जांच को आगे बढ़ा रही है.

कई कानूनी विशेषज्ञों ने कहा कि घटनाक्रम का यह क्रम असहज मिसाल कायम कर सकता है. यदि किसी नियामक द्वारा उसी तथ्यों पर चल रही आपराधिक जांच के दौरान मामला निपटाया जाता है, तो इससे मिले-जुले संकेत जाने का जोखिम रहता है. आखिरकार, इसका असर मायने रख सकता है.

दो आवेदक अंदर, दो बाहर

सूत्रों ने कहा कि इसी मामले में सेबी ने अनिल अंबानी और राणा कपूर के निपटान आवेदनों को खारिज कर दिया.

सिक्योरिटीज वकीलों ने कहा कि इस विभाजित नतीजे को चुनौती दिए जाने की संभावना है. दोनों व्यक्ति अदालतों (Securities Appellate Tribunal) के सामने यह तर्क दे सकते हैं कि एक ही लेनदेन में शामिल आवेदकों के साथ अलग-अलग व्यवहार किया गया. एक वकील ने कहा कि सेबी जैसी अनुभवी नियामक संस्था इस संभावना से अच्छी तरह वाकिफ होगी. अधिक दिलचस्प सवाल यह है कि वह इस अंतर का बचाव किस तरह करेगी.

इन आवेदनों की समीक्षा सेबी की हाई पॉवर्ड एडवाइजरी कमेटी (HPAC) ने की, जो निपटान आदेशों और अपराधों के समझौते से जुड़े मामलों पर विचार करती है. समिति की अध्यक्षता कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जय नारायण पटेल करते हैं. इसके अन्य सदस्यों में पूर्व कानून सचिव पी.के. मल्होत्रा, एस.के मोहंती, IRS (सेवानिवृत्त) और सेबी के पूर्व पूर्णकालिक सदस्य, तथा डेलॉइट इंडिया के पूर्व मैनेजिंग पार्टनर और सीईओ एन. वेंकटराम शामिल हैं. समिति निपटान की शर्तों की सिफारिश करती है और अंतिम फैसला पूर्णकालिक सदस्य करते हैं.

सयोनारा, कारण बताओ नोटिस

सूत्रों के मुताबिक, समय का यह मेल शायद ही इससे अधिक सौहार्दपूर्ण हो सकता था. भारत-जापान संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं. 22 जुलाई को मुंबई में जापान की कॉन्सुल-जनरल सातो हितोमी ने सेबी के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे से शिष्टाचार मुलाकात की. जापानी कॉन्सुलेट के अनुसार, दोनों पक्षों ने वित्तीय क्षेत्र की गतिविधियों और दोनों देशों के बीच सहयोग पर चर्चा की.

सूत्रों ने कहा कि फंड हाउस की जापानी पैरेंट कंपनी निप्पॉन लाइफ भी भारत और जापान के बीच एक क्रिकेट मैच आयोजित कर रही है. सेबी के चेयरमैन ने हाल ही में उत्तर भारत के एक राज्य में निप्पॉन इंडिया की एक शाखा का दौरा किया. सेबी के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने सितंबर 2026 में लेह, जम्मू-कश्मीर/लद्दाख क्षेत्र का दौरा किया था, जहां उन्होंने सेना के जवानों के लिए AMFI की ओर से आयोजित इन्वेस्टर्स अवेयरनेस प्रोग्राम को संबोधित किया.

मामले से परिचित एक व्यक्ति ने कहा कि जापान के सबसे बड़े वित्तीय समूहों में से एक के साथ निपटान द्विपक्षीय संबंधों के लिए "काफी मददगार साबित हो सकता है." बेशक, कोई भी इन घटनाक्रमों के बीच किसी संबंध का सुझाव नहीं दे रहा है. ये महज संयोग हैं.

सिक्का के लिए यह निपटान ऐसे समय में नियामकीय दबाव को हटा देता है, जब उनका प्रोफाइल पहले कभी इतना ऊंचा नहीं रहा. AMFI के चेयरमैन के तौर पर वह ऐसे उद्योग का सार्वजनिक चेहरा हैं, जो ₹75 लाख करोड़ से अधिक की परिसंपत्तियों का प्रबंधन करता है.

अगली कतार में: Quant

निप्पॉन का आदेश इस सीजन का एकमात्र बड़ा निपटान नहीं हो सकता. सूत्रों के अनुसार, सेबी से क्वांट म्यूचुअल फंड (Quant Mutual Fund) के फ्रंट रनिंग मामले में निपटान आवेदन पर भी फैसला आने की उम्मीद है.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


सितंबर में भारत की कारोबारी गतिविधियों ने पकड़ी रफ्तार, फ्लैश PMI 56.5 पर पहुंचा

सर्वे के अनुसार, सितंबर में भारत के निजी क्षेत्र में नए कारोबार में तेजी आई. मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों क्षेत्रों में मांग में सुधार हुआ, हालांकि मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में नए ऑर्डर की वृद्धि अधिक मजबूत रही.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 23 September, 2026
Last Modified:
Wednesday, 23 September, 2026
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सितंबर में भारत के निजी क्षेत्र की कारोबारी गतिविधियों में सुधार देखने को मिला है. HSBC के फ्लैश परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) के मुताबिक, मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों क्षेत्रों में आउटपुट और नए ऑर्डर बढ़ने से निजी क्षेत्र की गतिविधियां तीन महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गईं. सितंबर में कंपोजिट फ्लैश PMI अगस्त के 54.3 से बढ़कर 56.5 हो गया.

62 महीने से 50 के स्तर से ऊपर PMI

S&P Global की ओर से तैयार HSBC फ्लैश PMI लगातार 62वें महीने 50 के महत्वपूर्ण स्तर से ऊपर रहा. PMI में 50 से ऊपर का आंकड़ा निजी क्षेत्र की गतिविधियों में विस्तार और 50 से नीचे का स्तर गिरावट को दर्शाता है.

सर्वे के अनुसार, सितंबर में भारत के निजी क्षेत्र में नए कारोबार में तेजी आई. मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों क्षेत्रों में मांग में सुधार हुआ, हालांकि मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में नए ऑर्डर की वृद्धि अधिक मजबूत रही. कुल नए कारोबार में वृद्धि सात महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गई.

मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों में सुधार

HSBC इंडिया मैन्युफैक्चरिंग PMI अगस्त के 52.8 से बढ़कर सितंबर में 55.7 हो गया. वहीं, फ्लैश इंडिया सर्विसेज PMI बिजनेस एक्टिविटी इंडेक्स 54.1 से बढ़कर 55.8 पर पहुंच गया.

सर्विस सेक्टर में मार्केटिंग गतिविधियों के साथ नए ऑर्डर बढ़े. प्रॉपर्टी, ट्रांसपोर्ट, ट्रैवल, सॉफ्टवेयर और डिजिटल सॉल्यूशंस जैसी सेवाओं की मांग में सुधार दर्ज किया गया. मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में एल्युमीनियम, इलेक्ट्रॉनिक्स, खाद्य उत्पादों, दवाओं और नए प्रोडक्ट मॉडल की मांग बढ़ी. इससे फैक्ट्रियों में उत्पादन और नए ऑर्डर दोनों को समर्थन मिला.

HSBC की चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट प्रांजुल भंडारी के मुताबिक, मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में तेज सुधार ने निजी क्षेत्र की गतिविधियों को गति दी. उन्होंने कहा कि आउटपुट और घरेलू नए ऑर्डर में तेजी रही, हालांकि मिडिल ईस्ट में बढ़े तनाव के बीच कंपनियां अनिश्चितताओं से निपटने के लिए सुरक्षा उपाय भी कर रही हैं.

एक्सपोर्ट ऑर्डर बढ़े, लेकिन रफ्तार धीमी

सितंबर में नए एक्सपोर्ट ऑर्डर में भी बढ़ोतरी जारी रही. हालांकि, इन ऑर्डर की वृद्धि दर पिछले तीन वर्षों में सबसे धीमी रही. इसके बावजूद घरेलू मांग में सुधार ने कंपनियों की कुल ऑर्डर बुक को मजबूती दी.

नए ऑर्डर और उत्पादन बढ़ने के साथ सितंबर में रोजगार में भी बढ़ोतरी हुई. मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों क्षेत्रों में कंपनियों ने नई नियुक्तियां कीं और दोनों क्षेत्रों में रोजगार बढ़ने की रफ्तार लगभग समान रही.

इनपुट लागत का दबाव घटा

सर्वे के मुताबिक, निजी क्षेत्र में इनपुट लागत बढ़ने की रफ्तार जनवरी के बाद सबसे निचले स्तर पर आ गई. सर्विस कंपनियों पर लागत का दबाव कम होने से मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में बढ़ी लागत का असर काफी हद तक संतुलित हुआ. हालांकि, कुछ कंपनियों ने इलेक्ट्रिकल कंपोनेंट्स, खाद्य उत्पादों, ईंधन, धातुओं, दवाओं और टेक्नोलॉजी संसाधनों की लागत बढ़ने की जानकारी दी.

सितंबर में कंपनियों ने बिक्री कीमतों में भी बढ़ोतरी की. मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में फैक्ट्री-गेट कीमतों में बढ़ोतरी की रफ्तार तेज हुई, जबकि सर्विस कंपनियों की ओर से ली जाने वाली कीमतों में वृद्धि की गति कुछ धीमी रही.

तैयार माल का स्टॉक साढ़े 11 साल के उच्च स्तर पर

भंडारी के मुताबिक, इनपुट की खरीदारी में तेजी आई है और तैयार माल के स्टॉक का इंडेक्स करीब साढ़े 11 साल के उच्च स्तर पर पहुंच गया है. मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों पर लागत का दबाव बढ़ने के कारण आउटपुट कीमतों में भी बढ़ोतरी हुई है. यह कंपनियों की मार्जिन को बनाए रखने की कोशिश को दर्शाता है.

फ्लैश PMI पूरे महीने के PMI के शुरुआती संकेत देता है. यह महीने के दौरान मिले करीब 90 फीसदी सर्वे जवाबों पर आधारित होता है. मैन्युफैक्चरिंग PMI का अंतिम आंकड़ा 1 अक्टूबर और सर्विस PMI का अंतिम आंकड़ा 6 अक्टूबर को जारी किया जाएगा.
 


रक्षा उत्पादन ₹1.78 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर, निर्यात 63% बढ़कर ₹38,424 करोड़

FY26 में रक्षा उत्पादन 15.6% बढ़ा, निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी भी बढ़कर 24% हुई; भारत 80 से अधिक देशों को रक्षा उत्पादों का निर्यात कर रहा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 23 September, 2026
Last Modified:
Wednesday, 23 September, 2026
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भारत का रक्षा विनिर्माण क्षेत्र तेजी से विस्तार कर रहा है. वित्त वर्ष 2025-26 में देश का रक्षा उत्पादन बढ़कर रिकॉर्ड ₹1.78 लाख करोड़ पहुंच गया, जो पिछले वित्त वर्ष के ₹1.54 लाख करोड़ से 15.6% अधिक है. इसी अवधि में रक्षा निर्यात भी 62.66% बढ़कर ₹38,424 करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया. भारत अब 80 से अधिक देशों को रक्षा उत्पाद निर्यात कर रहा है.

रक्षा क्षेत्र में घरेलू उत्पादन बढ़ने के साथ निजी कंपनियों की भूमिका भी लगातार बढ़ रही है. FY26 में रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़कर 24% हो गई, जो FY25 में 22% थी. निजी क्षेत्र का उत्पादन करीब ₹42,000 करोड़ रहा.

80 से ज्यादा देशों तक पहुंचा भारतीय रक्षा निर्यात

भारत के रक्षा उत्पाद अब 80 से अधिक देशों तक पहुंच रहे हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, FY14 में जहां रक्षा निर्यात महज ₹686 करोड़ था, वहीं FY26 में यह बढ़कर ₹38,424 करोड़ हो गया. यानी करीब 12 वर्षों में इसमें 56 गुना से ज्यादा की वृद्धि हुई है.

सरकार ने FY29 तक सालाना रक्षा उत्पादन को ₹3 लाख करोड़ और रक्षा निर्यात को ₹50,000 करोड़ तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है. इससे आने वाले वर्षों में घरेलू रक्षा विनिर्माण और निर्यात बाजार के विस्तार की दिशा स्पष्ट होती है.

स्वदेशीकरण पर जोर, हजारों उपकरणों का घरेलू उत्पादन

रक्षा क्षेत्र में आयात पर निर्भरता घटाने के लिए सरकार स्वदेशीकरण पर भी जोर दे रही है. मई 2026 तक पांच Positive Indigenisation Lists में 5,012 वस्तुओं को शामिल किया गया था. इसके अलावा पिछले पांच वर्षों में 15,700 से अधिक रक्षा वस्तुओं का स्वदेशीकरण किया गया है. Srijan Defence Equipment Empowerment Platform के जरिए घरेलू कंपनियों, MSME और स्टार्टअप को रक्षा क्षेत्र की सप्लाई चेन से जोड़ने की कोशिश की जा रही है.

रक्षा उत्पादन में निजी कंपनियों की बढ़ती हिस्सेदारी

रक्षा उत्पादन में सरकारी कंपनियों का योगदान अभी भी बड़ा है, लेकिन निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है. FY26 में कुल रक्षा उत्पादन में सरकारी क्षेत्र का हिस्सा करीब 76% और निजी क्षेत्र का 24% रहा.

रक्षा निर्यात में भी निजी कंपनियों की महत्वपूर्ण भूमिका है. FY26 के कुल रक्षा निर्यात में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी 45.16% रही, जबकि रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों यानी DPSU की हिस्सेदारी 54.84% रही.

रक्षा खरीद से घरेलू कंपनियों को मिल रहा बाजार

घरेलू रक्षा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए सरकारी खरीद में भी घरेलू कंपनियों को प्राथमिकता दी जा रही है. FY27 के आधुनिकीकरण बजट का 75% घरेलू उद्योग के लिए निर्धारित किए जाने से भारतीय कंपनियों के लिए रक्षा ऑर्डर का दायरा बढ़ा है.

वित्त वर्ष 2026 के दौरान रक्षा अधिग्रहण परिषद ने करीब ₹6.8 लाख करोड़ के 55 प्रस्तावों को आवश्यकता की स्वीकृति दी, जबकि करीब ₹2.3 लाख करोड़ के 503 पूंजीगत खरीद प्रस्तावों के अनुबंध किए गए. ये आंकड़े रक्षा कंपनियों के लिए संभावित ऑर्डर पाइपलाइन के बड़े आकार को दिखाते हैं.

वायुसेना, सेना और नौसेना की बड़ी खरीद योजनाएं

रक्षा आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में तीनों सेनाओं के लिए कई बड़े कार्यक्रम शामिल हैं. भारतीय वायुसेना के लिए मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट, LCA Tejas Mk-II, Su-30 MKI अपग्रेड, अतिरिक्त S-400 सिस्टम और अन्य प्लेटफॉर्म से जुड़े कार्यक्रम महत्वपूर्ण हैं.

वहीं, सेना के लिए Future Infantry Combat Vehicles, Future Ready Combat Vehicles, K9 Vajra-T, QRSAM, Akash-NG, loitering munitions और अगली पीढ़ी के Pinaka सिस्टम जैसे कार्यक्रमों पर काम हो रहा है. नौसेना की योजनाओं में Project 75I, अतिरिक्त स्कॉर्पीन पनडुब्बियां, नई पीढ़ी के फ्रिगेट और मानव रहित प्रणालियां शामिल हैं.

रक्षा R&D और स्टार्टअप इकोसिस्टम पर भी जोर

रक्षा क्षेत्र में उत्पादन क्षमता के साथ रिसर्च और टेक्नोलॉजी विकास पर भी जोर बढ़ा है. सरकार iDEX और ADITI जैसी योजनाओं के जरिए स्टार्टअप और नई रक्षा तकनीकों को बढ़ावा दे रही है. रक्षा R&D के लिए आवंटन भी बढ़ा है और उद्योग, स्टार्टअप तथा अकादमिक संस्थानों की भागीदारी को बढ़ाने की कोशिश की जा रही है.

उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु के रक्षा औद्योगिक गलियारे भी इस विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. इनसे रक्षा विनिर्माण, सप्लाई चेन और स्थानीय स्तर पर तकनीकी क्षमता विकसित करने के अवसर बढ़ रहे हैं.

आगे क्या है?

रिकॉर्ड उत्पादन और निर्यात के बावजूद भारतीय रक्षा उद्योग के सामने तकनीकी क्षमता, वैश्विक बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाने और जटिल रक्षा प्रणालियों में घरेलू तकनीक विकसित करने जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं. ऐसे में आने वाले वर्षों में उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ उच्च तकनीक वाले रक्षा उत्पादों के निर्यात और वैश्विक सप्लाई चेन में भारतीय कंपनियों की हिस्सेदारी बढ़ाना क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण रहेगा.
 


S&P ने भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान बढ़ाकर 7% किया, महंगाई बढ़ी तो RBI बढ़ा सकता है रेपो रेट

जून तिमाही में 7.8% की मजबूत GDP ग्रोथ के बाद रेटिंग एजेंसी ने बढ़ाया FY27 का अनुमान; मजबूत खपत, औद्योगिक गतिविधियों, निर्यात और सरकारी निवेश से अर्थव्यवस्था को मिला सहारा

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 23 September, 2026
Last Modified:
Wednesday, 23 September, 2026
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भारत की मजबूत आर्थिक रफ्तार ने वैश्विक रेटिंग एजेंसी S&P Global Ratings को चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए देश की GDP ग्रोथ का अनुमान बढ़ाने के लिए प्रेरित किया है. एजेंसी ने भारत की आर्थिक वृद्धि का अनुमान 6.6% से बढ़ाकर 7% कर दिया है. S&P का कहना है कि मजबूत औद्योगिक गतिविधियां, घरेलू खपत, वस्तुओं के निर्यात में मजबूती और सरकारी निवेश अर्थव्यवस्था की रफ्तार को सहारा दे रहे हैं.

भारत की अर्थव्यवस्था ने अप्रैल-जून तिमाही में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन करते हुए 7.8% की GDP ग्रोथ दर्ज की. इस मजबूत प्रदर्शन के बाद S&P ने पूरे वित्त वर्ष के अनुमान में बढ़ोतरी की है. 

दूसरी छमाही में धीमी हो सकती है ग्रोथ

S&P के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में आर्थिक वृद्धि की रफ्तार कुछ धीमी पड़ सकती है. रेटिंग एजेंसी का मानना है कि GST में किए गए बदलाव और इनकम टैक्स में कटौती से अर्थव्यवस्था को मिलने वाला शुरुआती फायदा धीरे-धीरे कम हो सकता है.

इसके अलावा मौसम से जुड़े जोखिम भी अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं. 9 सितंबर 2026 तक देश में कुल बारिश सामान्य से करीब 15% कम रही थी. ऐसे में कृषि उत्पादन और खाद्य महंगाई पर मौसम का असर आने वाले महीनों में महत्वपूर्ण रहेगा.

महंगाई के दबाव पर भी S&P की नजर

S&P ने वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की औसत खुदरा महंगाई 5.1% रहने का अनुमान लगाया है. मजबूत आर्थिक गतिविधियों के साथ महंगाई का दबाव बढ़ने की स्थिति में मौद्रिक नीति पर भी असर पड़ सकता है.

रेटिंग एजेंसी के अनुसार, मजबूत ग्रोथ, महंगाई का दबाव, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और मौसम से जुड़े जोखिमों के बीच RBI चालू वित्त वर्ष में रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट यानी 0.25% की बढ़ोतरी कर सकता है.

जून तिमाही में किन क्षेत्रों ने दिया ग्रोथ को सहारा?

अप्रैल-जून तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था की ग्रोथ को मुख्य रूप से मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज सेक्टर से समर्थन मिला. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इस दौरान मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 9.2% और सर्विसेज में करीब 10% की वृद्धि दर्ज की गई. 

इसके अलावा घरेलू मांग, निवेश और निर्यात में मजबूती ने भी आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पहली तिमाही में निवेश 11.9%, घरेलू खपत 7.1% और निर्यात 12% बढ़ा. 

Moody's ने भी बढ़ाया था भारत की ग्रोथ का अनुमान

S&P से पहले Moody's ने भी वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान बढ़ाकर 7% किया था. एजेंसी ने अप्रैल-जून तिमाही में 7.8% की मजबूत वृद्धि को भारत की आर्थिक मजबूती का संकेत बताया था, हालांकि उसने पश्चिम एशिया के तनाव, ऊर्जा कीमतों और खाद्य महंगाई को जोखिम के तौर पर रेखांकित किया था. 

इस बीच, भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान अलग-अलग एजेंसियों में अलग है. ऐसे में आगे आर्थिक वृद्धि की रफ्तार पर घरेलू मांग, महंगाई, ऊर्जा कीमतों, मानसून और वैश्विक परिस्थितियों का असर महत्वपूर्ण रहेगा.

 


PhonePe को UAE में दो पेमेंट लाइसेंस के लिए सैद्धांतिक मंजूरी, अंतरराष्ट्रीय विस्तार की ओर बढ़ी कंपनी

UAE के सेंट्रल बैंक ने रिटेल पेमेंट सर्विसेज और कार्ड स्कीम्स तथा स्टोर्ड वैल्यू फैसिलिटीज के लिए दी इन-प्रिंसिपल अप्रूवल; कारोबार शुरू करने से पहले लेनी होगी अंतिम मंजूरी

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 23 September, 2026
Last Modified:
Wednesday, 23 September, 2026
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डिजिटल पेमेंट कंपनी फोनपे (PhonePe) को संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के सेंट्रल बैंक (CBUAE) से दो पेमेंट लाइसेंस के लिए सैद्धांतिक मंजूरी मिल गई है. यह मंजूरी कंपनी को UAE में अपना स्थानीय रूप से विनियमित अंतरराष्ट्रीय कारोबार शुरू करने के करीब ले जाती है. हालांकि, वाणिज्यिक परिचालन शुरू करने से पहले PhonePe को नियामक की अंतिम मंजूरी हासिल करनी होगी.

CBUAE की ओर से मिली मंजूरी में रिटेल पेमेंट सर्विसेज और कार्ड स्कीम्स (RPSCS) तथा स्टोर्ड वैल्यू फैसिलिटीज (SVF) शामिल हैं. यह मंजूरी शुरुआती नियामकीय जांच और ड्यू डिलिजेंस प्रक्रिया पूरी होने के बाद मिली है.

UAE में स्थानीय साझेदारों के साथ काम करेगी कंपनी

अंतिम मंजूरी मिलने के बाद PhonePe UAE के पेमेंट इकोसिस्टम में अपनी मौजूदगी मजबूत करने के लिए क्षेत्रीय बैंकों, लाइसेंस प्राप्त पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स और स्थानीय टेक्नोलॉजी कंपनियों के साथ काम करने की योजना बना रही है.

कंपनी का फोकस UAE में उपभोक्ताओं और कारोबारों के लिए डिजिटल पेमेंट सेवाओं को सपोर्ट करने पर होगा. इसके लिए PhonePe अपनी टेक्नोलॉजी और पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को UAE की मौजूदा वित्तीय व्यवस्था के साथ जोड़ने की दिशा में काम करेगी.

UAE के Aani और Jaywan से जुड़ने की योजना

PhonePe ने UAE के इंस्टेंट पेमेंट प्लेटफॉर्म Aani और घरेलू कार्ड स्कीम Jaywan के लिए भी अपनी टेक्नोलॉजी के जरिए संभावनाएं तलाशने की बात कही है. कंपनी के मुताबिक, भारत में उसका पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर 70 करोड़ से अधिक रजिस्टर्ड यूजर्स और करीब 5 करोड़ कारोबारियों को सेवाएं देता है. UAE में प्रस्तावित कारोबार के जरिए कंपनी डिजिटल पेमेंट के क्षेत्र में उपभोक्ताओं और कारोबारियों को सेवाएं देने के साथ स्थानीय वित्तीय इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ मिलकर काम करेगी.

PhonePe का यह विस्तार UAE के फाइनेंशियल इंफ्रास्ट्रक्चर ट्रांसफॉर्मेशन प्रोग्राम (Financial Infrastructure Transformation Programme) और डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने की सरकार की व्यापक रणनीति के अनुरूप है.

भारत से UAE जाने वाले यात्रियों के लिए पहले से मौजूद है सेवा

PhonePe की UAE में पूरी तरह नई एंट्री नहीं होगी. कंपनी पहले से NPCI इंटरनेशनल पेमेंट्स लिमिटेड (NIPL) के साथ क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट व्यवस्था के जरिए UAE में मौजूद है.

भारत से UAE जाने वाले यात्री PhonePe के जरिए स्थानीय QR कोड स्कैन करके भुगतान कर सकते हैं. इसके लिए UAE में NEOPAY और Network International के टर्मिनलों का इस्तेमाल किया जाता है. हालांकि, नए लाइसेंस मिलने के बाद PhonePe की भूमिका केवल विदेश यात्रा करने वाले भारतीयों को पेमेंट सुविधा देने तक सीमित नहीं रहेगी. अंतिम मंजूरी के बाद कंपनी UAE में एक विनियमित पेमेंट कारोबार संचालित कर सकेगी.

UAE बन सकता है PhonePe का पहला अंतरराष्ट्रीय बाजार

PhonePe अपनी टेक्नोलॉजी और स्थानीय साझेदारियों के जरिए UAE, भारत और अन्य वैश्विक बाजारों के बीच पेमेंट गतिविधियों को सपोर्ट करने की योजना बना रही है. अंतिम नियामकीय मंजूरी मिलने और वाणिज्यिक परिचालन शुरू होने के बाद UAE, PhonePe का पहला अंतरराष्ट्रीय बाजार बन सकता है. यह कदम कंपनी की भारत से बाहर विस्तार करने की रणनीति में अहम माना जा रहा है.


सिर्फ कॉल-SMS चाहिए तो नहीं देना होगा डेटा का पैसा, TRAI ने टेलीकॉम कंपनियों को दिया नया निर्देश

30 दिन तक की वैधता वाले वॉइस और SMS-ओनली प्लान लाना होगा, कम डेटा इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों और दूसरी सिम रखने वालों को मिल सकता है फायदा

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 23 September, 2026
Last Modified:
Wednesday, 23 September, 2026
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टेलीकॉम ग्राहकों के लिए रिचार्ज को लेकर राहत की खबर है. भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) ने टेलीकॉम कंपनियों को ऐसे स्पेशल टैरिफ वाउचर (STV) उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है, जिनमें सिर्फ वॉइस कॉल और SMS की सुविधा होगी. इन प्लान में डेटा शामिल नहीं होगा और इनकी वैधता अधिकतम 30 दिन तक रखी जा सकेगी. इसका फायदा खासतौर पर उन ग्राहकों को मिल सकता है, जिन्हें मोबाइल डेटा की जरूरत कम या बिल्कुल नहीं है.

TRAI ने यह बदलाव दूरसंचार उपभोक्ता संरक्षण विनियम, 2024 में संशोधन के जरिए किया है. नियामक के मुताबिक, मौजूदा समय में केवल वॉइस और SMS की सुविधा वाले प्लान सीमित हैं, जबकि लंबी वैधता वाले प्लान ज्यादा उपलब्ध हैं. ऐसे में कम आय वाले और कम अवधि के लिए रिचार्ज करने वाले ग्राहकों के पास सस्ते विकल्प सीमित हैं.

ग्राहकों को अपनी जरूरत के हिसाब से रिचार्ज का विकल्प

TRAI का कहना है कि नए नियमों से ग्राहकों को अपनी जरूरत और आर्थिक क्षमता के हिसाब से मोबाइल प्लान चुनने की ज्यादा स्वतंत्रता मिलेगी. जिन लोगों को इंटरनेट डेटा की जरूरत नहीं है, उन्हें ऐसे प्लान के लिए भुगतान नहीं करना पड़ेगा जिसमें डेटा भी शामिल हो.

इसका फायदा बुजुर्ग ग्राहकों, फीचर फोन इस्तेमाल करने वालों, कम डेटा इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों और दूसरी सिम को एक्टिव रखने वाले लोगों को मिल सकता है. ऐसे ग्राहक अब सिर्फ कॉल और SMS की जरूरत के मुताबिक कम कीमत वाला रिचार्ज चुन सकेंगे.

टेलीकॉम कंपनियों की कमाई पर क्या होगा असर?

नए नियम से ग्राहकों को विकल्प तो बढ़ेंगे, लेकिन टेलीकॉम कंपनियों के औसत प्रति ग्राहक राजस्व (ARPU) पर दबाव पड़ने की संभावना जताई जा रही है. खासतौर पर ऐसे ग्राहक, जो अभी डेटा वाले पैक लेते हैं लेकिन उसका बहुत कम इस्तेमाल करते हैं, वे वॉइस-ओनली प्लान का रुख कर सकते हैं. इससे प्रति ग्राहक मिलने वाला औसत राजस्व घट सकता है.

डेलॉयट साउथ एशिया के पार्टनर और TMT इंडस्ट्री लीडर रोहन लोबो के मुताबिक, करीब 90 फीसदी मोबाइल कनेक्शन प्रीपेड हैं. ऐसे में कंपनियों के लिए केवल एक रिचार्ज से मिलने वाली रकम ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि ग्राहक कितनी नियमितता से रिचार्ज करता है, यह भी अहम है.

उनके अनुसार, कुछ ग्राहक सस्ते वॉइस-ओनली प्लान पर जा सकते हैं, जिससे ARPU पर दबाव आ सकता है. हालांकि, ऐसे प्लान कीमत के प्रति संवेदनशील ग्राहकों को बनाए रखने और दूसरी सिम को एक्टिव रखने में मदद कर सकते हैं. कुल राजस्व पर असर इस बात पर निर्भर करेगा कि रिचार्ज की नियमितता बढ़ने से कम कीमत वाले प्लान से होने वाली कमाई की कितनी भरपाई हो पाती है.

कम डेटा इस्तेमाल करने वालों पर ज्यादा असर

PwC India में टेलीकॉम प्रैक्टिस के लीडर विनिश बावा के मुताबिक, नए नियम से ARPU में कुछ कमी आ सकती है, लेकिन इसका असर बहुत ज्यादा होने की उम्मीद नहीं है. इसका प्रभाव खासतौर पर कम डेटा इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों, बुजुर्गों और दूसरी सिम रखने वाले लोगों पर पड़ सकता है.

वॉइस-ओनली प्लान उपलब्ध होने से कंपनियों के लिए मौजूदा प्रीपेड प्लान में डेटा जोड़कर रिचार्ज की कीमत बढ़ाने की गुंजाइश कुछ कम हो सकती है. हालांकि, ज्यादा डेटा इस्तेमाल करने वाले स्मार्टफोन यूजर्स की जरूरत पहले की तरह डेटा प्लान से पूरी होती रहेगी.

कंपनियों के सामने ग्राहकों को बनाए रखने की चुनौती

नए नियमों के बाद टेलीकॉम कंपनियों को अलग-अलग तरह के ग्राहकों के लिए प्लान तैयार करने पर ज्यादा ध्यान देना होगा. ज्यादा डेटा, तेज इंटरनेट स्पीड, बेहतर नेटवर्क और अतिरिक्त सेवाओं के लिए अधिक भुगतान करने वाले ग्राहकों के लिए कंपनियां प्रीमियम प्लान पेश कर सकती हैं.

वहीं, कम खर्च करने वाले ग्राहकों को बनाए रखने के लिए वॉइस और SMS-ओनली प्लान महत्वपूर्ण हो सकते हैं. इससे ऐसी दूसरी सिम को भी एक्टिव रखने में मदद मिल सकती है, जिसका इस्तेमाल मुख्य रूप से कॉल या SMS के लिए किया जाता है.

इस तरह TRAI का यह बदलाव एक तरफ कम डेटा इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों के लिए रिचार्ज के विकल्प बढ़ाता है, वहीं दूसरी ओर टेलीकॉम कंपनियों के लिए ग्राहकों के खर्च और ARPU को बनाए रखने की चुनौती भी बढ़ा सकता है.