सेबी तेजी से मंजूरी के लिए कंपनियों द्वारा दाखिल किए जा रहे आईपीओ दस्तावेजों की जांच के लिए एक AI टूल विकसित कर रहा है. यह टूल दिसंबर तक उपलब्ध हो जाना चाहिए.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
कैपिटल मार्केट रेगुलेटर सेबी (SEBI), IPO मंजूरी में तेजी लाने के लिए एक मैकेनिज्म पर काम कर रहा है. इसके अलावा कंपनियों की ओर से दाखिल किए जा रहे IPO डॉक्युमेंट्स की जांच के लिए एक आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस टूल भी विकसित कर रहा है. यह दिसंबर तक उपलब्ध हो जाना चाहिए. यह बात सेबी की चेयरपर्सन माधबी पुरी बुच ने फिक्की के 'कैपम' कार्यक्रम (FICCI 21st Annual Capital Market Conference) में कही. उन्होंने कहा कि IPO प्रोसेस के इर्द-गिर्द एक जटिलता कायम है, जैसे कि एक जटिल 'ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस' दाखिल करना.
माधुरी पुरी बुच ने दी जानकारी
अब इस प्रक्रिया को आसान बनाने का प्रयास किया जा रहा है. विस्तार से बताते हुए चेयरपर्सन माधबी पुरी बुच कहा कि सेबी एक ऐसी प्रक्रिया पर काम कर रहा है, जिसमें एक टेम्पलेट होगा, जिसमें कंपनियां IPO डॉक्युमेंट तैयार करने के लिए खाली जगह भर सकेंगी. किसी भी जटिलता को स्पष्ट करने और किसी विशेष पहलू पर वेरिएशंस को समझाने के लिए एक अलग कॉलम होगा. उन्होंने कहा कि यह डॉक्युमेंट सटीक और अर्थपूर्ण होगा. इसमें किसी भी प्रकार के वेरिएशन को अलग से समझाया जाएगा.
कब तक होगा लागू
योजना के कार्यान्वयन के लिए कोई समय-सीमा या इसके लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया के बारे में कोई जानकारी नहीं दी है. इसी कार्यक्रम में एनएसई के मुख्य कार्यकारी एवं प्रबंध निदेशक आशीष कुमार चौहान ने छोटे निवेशकों से ‘डेरिवेटिव’ में कारोबार करने से दूर रहने का आग्रह किया. चौहान ने कहा कि सुबह खरीदना और शाम को बेचने को ‘‘निवेश’’ समझने की भूल न करें. साथ ही सही नियमन और अनुपालन की वकालत भी की.
एक नई प्रक्रिया पर भी हो रहा काम
इसके अलावा सेबी, लिस्टेड कंपनियों के लिए पैसे जुटाने की एक नई प्रक्रिया पर भी काम कर रहा है, जो राइट्स इश्यू और प्रिफरेंशियल अलॉटमेंट का कॉम्बिनेशन होगा. बुच ने कहा कि प्रिफरेंशियल इश्यू के लिए मंजूरी पाने के लिए एंड टू एंड प्रोसेस की कुल अवधि वर्तमान में 42 दिन है. नई प्रक्रिया के आने से यह लगभग आधी होकर 23 दिन रह जाएगी. इस इनोवेशन के तहत सेबी, खुद से मंजूरी लेने की जरूरत को खत्म कर रहा है और मर्चेंट बैंकरों की जरूरत को भी खत्म कर देगा क्योंकि पैसे जुटाने का डॉक्युमेंट दो-पेज का एक सरल डॉक्युमेंट होगा. इसमें निवेशकों के लिए जरूरी डिटेल्स सटीक रूप से मौजूद रहेंगी.
भारतीय रिजर्व बैंक ने रुपये को सहारा देने और विदेशी मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव कम करने के लिए कई नियामकीय बदलाव किए हैं. इनका उद्देश्य डॉलर की मांग को व्यवस्थित करना, करेंसी डेरिवेटिव कारोबार में जोखिम सीमित करना और बाजार में नियमों का पालन सुनिश्चित करना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
रुपये में लगातार गिरावट और विदेशी मुद्रा बाजार में बढ़ते दबाव के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने कई अहम कदम उठाए हैं. इसके तहत तीन सरकारी तेल कंपनियों को रोजाना उनकी जरूरत के मुताबिक डॉलर उपलब्ध कराने के लिए विशेष व्यवस्था की गई है. साथ ही, विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव कारोबार में बिना वास्तविक जोखिम के सौदे करने की सीमा 100 मिलियन डॉलर से घटाकर 5 मिलियन डॉलर कर दी गई है.
तीन सरकारी तेल कंपनियों को विशेष व्यवस्था के तहत मिलेगा डॉलर
RBI ने इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC), हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (HPCL) और भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (BPCL) की डॉलर संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए विशेष व्यवस्था की है. इसके तहत केंद्रीय बैंक चुनिंदा बैंकों के माध्यम से इन कंपनियों को रोजाना उनकी जरूरत के मुताबिक डॉलर उपलब्ध कराएगा.
यह सुविधा 12 अक्टूबर 2026 से लागू होगी और अगले आदेश तक जारी रहेगी. इस व्यवस्था से इन सरकारी तेल कंपनियों की डॉलर की मांग को पूरा करने में मदद मिलेगी. तेल कंपनियों को कच्चे तेल के आयात के लिए बड़े पैमाने पर डॉलर की जरूरत होती है.
फॉरेक्स मार्केट में ट्रेडिंग के नियम सख्त
रुपये में उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने और विदेशी मुद्रा बाजार में जोखिम सीमित करने के लिए RBI ने फॉरेक्स डेरिवेटिव से जुड़े नियमों में भी बदलाव किया है. नए नियमों के तहत अधिकृत डीलर अब ग्राहकों को रद्द किए जा चुके विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट दोबारा बुक करने की अनुमति नहीं देंगे. हालांकि, कॉन्ट्रैक्ट की मैच्योरिटी पूरी होने पर उसे आगे बढ़ाने यानी रोलओवर की सुविधा जारी रहेगी.
इसके अलावा, बिना किसी वास्तविक लेन-देन या अंतर्निहित जोखिम के विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव में कारोबार करने की सीमा घटा दी गई है. पहले यह सीमा 100 मिलियन डॉलर थी, जिसे अब घटाकर 5 मिलियन डॉलर कर दिया गया है.
यह बदलाव मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंजों पर रुपये से जुड़े करेंसी डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट पर भी लागू होगा. यहां भी बिना वास्तविक लेन-देन या जोखिम के पोजीशन लेने की सीमा 100 मिलियन डॉलर से घटाकर 5 मिलियन डॉलर कर दी गई है.
विदेशी मुद्रा डीलरों के लिए नया रिजर्व नियम
RBI ने विदेशी मुद्रा डीलरों के लिए 'फॉरेन एक्सचेंज रिस्क रिजर्व' (FERR) नाम से एक नई व्यवस्था शुरू की है. इसके तहत डीलरों को रुपये से जुड़े प्रत्येक पात्र डेरिवेटिव सौदे की कुल रकम का 20 फीसदी हिस्सा रिजर्व के तौर पर रखना होगा.
यह नियम उन पात्र सौदों पर लागू होगा, जो चालू खाते से जुड़े जोखिम को कम करने के लिए किए जाते हैं और जिनमें ग्राहक रुपये देकर विदेशी मुद्रा खरीदता है. इस व्यवस्था का उद्देश्य विदेशी मुद्रा कारोबार से जुड़े जोखिमों के प्रबंधन को मजबूत करना है.
वैश्विक कारणों से रुपये पर दबाव
पिछले कुछ महीनों से पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और अन्य वैश्विक घटनाक्रमों के कारण रुपये पर दबाव बना हुआ है. पिछले एक साल में भारतीय मुद्रा करीब 8 फीसदी कमजोर हुई है. ऐसे में RBI विदेशी मुद्रा बाजार में स्थिरता बनाए रखने और रुपये में तेज उतार-चढ़ाव को सीमित करने के लिए लगातार कदम उठा रहा है.
हालांकि, देश का विदेशी मुद्रा भंडार सितंबर की शुरुआत में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के बाद घटा है. RBI के आंकड़ों के मुताबिक, 4 सितंबर 2026 को विदेशी मुद्रा भंडार 785.7 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर था. इसके बाद 2 अक्टूबर को समाप्त चार सप्ताह की अवधि में इसमें करीब 51.1 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई. रिजर्व बैंक के इन नए कदमों से विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग के प्रबंधन और डेरिवेटिव कारोबार में जोखिम सीमित करने में मदद मिलने की उम्मीद है.
नई रणनीति में स्वदेशी तकनीकों को व्यावसायिक स्तर पर इस्तेमाल के योग्य बनाने, बौद्धिक संपदा विकसित करने, डिजिटल तकनीकों को एकीकृत करने और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने वाले उत्पाद तैयार करने पर ध्यान दिया जाएगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत सरकार देश में 3D प्रिंटिंग तकनीक और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए नेशनल स्ट्रैटेजी फॉर एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग (NSAM) के दूसरे चरण NSAM 2.0 की रूपरेखा तैयार कर रही है. इसके तहत स्वदेशी तकनीकों के व्यावसायीकरण, उपकरणों और कच्चे माल की उपलब्धता बेहतर बनाने और विभिन्न उद्योगों में इस तकनीक के इस्तेमाल का विस्तार करने पर जोर दिया जाएगा. फरवरी 2022 में शुरू की गई पहली रणनीति के तहत अब तक 1.54 लाख से अधिक लोगों को प्रशिक्षण दिया गया है, 56 स्टार्टअप को समर्थन मिला है और 65 स्वदेशी तकनीकों के विकास में मदद की गई है.
NSAM 2.0 में स्वदेशी तकनीकों के व्यावसायीकरण पर जोर
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) NSAM 2.0 की रूपरेखा तैयार कर रहा है. इसका उद्देश्य नवाचार को बढ़ावा देना, उद्योगों में 3D प्रिंटिंग को अपनाने की गति तेज करना और वैश्विक एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग बाजार में भारत की स्थिति मजबूत करना है.
नई रणनीति में स्वदेशी तकनीकों को व्यावसायिक स्तर पर इस्तेमाल के योग्य बनाने, बौद्धिक संपदा विकसित करने, डिजिटल तकनीकों को एकीकृत करने और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने वाले उत्पाद तैयार करने पर ध्यान दिया जाएगा. इसके अलावा, क्लस्टर विकसित करके मशीनों और कच्चे माल की लागत कम करने की योजना भी प्रस्तावित है.
NSAM 2.0 अभी अवधारणा तैयार करने के चरण में है. इसमें स्टार्टअप इकोसिस्टम का विस्तार, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण की आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना, रक्षा क्षेत्र में 3D प्रिंटिंग के इस्तेमाल को बढ़ावा देना और सतत विकास लक्ष्यों से जुड़े पायलट प्रोजेक्ट शुरू करना भी शामिल है.
पहली रणनीति के तहत 1.54 लाख से अधिक लोगों को प्रशिक्षण
भारत की पहली नेशनल स्ट्रैटेजी फॉर एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग फरवरी 2022 में शुरू की गई थी. इसके तहत वैश्विक एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग बाजार में 5% हिस्सेदारी हासिल करने और भारत की जीडीपी में करीब 1 अरब डॉलर का योगदान देने का लक्ष्य रखा गया था.
रणनीति के अन्य लक्ष्यों में भारत की जरूरतों के अनुरूप 50 तकनीकों का विकास, 100 स्टार्टअप को समर्थन, 500 नए उत्पाद तैयार करना, एक लाख कुशल कामगारों को प्रशिक्षण देना और 10 विनिर्माण क्षेत्रों में क्षमताएं विकसित करना शामिल है.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अब तक 1.54 लाख से अधिक लोगों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है, जो शुरुआती लक्ष्य से ज्यादा है. इसके अलावा, 56 स्टार्टअप को समर्थन मिला है और सामग्री, मशीनों, डिजाइन प्रक्रियाओं तथा तैयार उत्पादों से जुड़ी 65 स्वदेशी तकनीकों के विकास में मदद की गई है. सरकार ने अनुसंधान, तकनीक विकास, उद्योगों के साथ सहयोग और कौशल प्रशिक्षण को बढ़ावा देने के लिए सात विशेष विकास एवं तैनाती केंद्र भी स्थापित किए हैं.
क्या है 3D प्रिंटिंग तकनीक?
एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग को आम तौर पर 3D प्रिंटिंग कहा जाता है. इसमें डिजिटल डिजाइन के आधार पर सामग्री की परत-दर-परत जमावट करके किसी वस्तु का निर्माण किया जाता है. इस प्रक्रिया में कंप्यूटर आधारित डिजाइन, इलेक्ट्रॉनिक्स और मटेरियल साइंस का इस्तेमाल होता है.
इस तकनीक के जरिए पॉलिमर, धातु, सिरेमिक, कंपोजिट और जैविक सामग्री से विभिन्न उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं. पारंपरिक विनिर्माण प्रक्रियाओं के मुकाबले यह जटिल डिजाइन वाले पुर्जे बनाने और जरूरत के अनुसार कस्टमाइज्ड उत्पाद तैयार करने में उपयोगी हो सकती है. 3D प्रिंटिंग का इस्तेमाल एयरोस्पेस, रक्षा, स्वास्थ्य सेवा, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऊर्जा, खाद्य प्रसंस्करण और फोटोनिक्स जैसे क्षेत्रों में बढ़ रहा है.
अंतरिक्ष और रक्षा क्षेत्र में बढ़ रहा इस्तेमाल
अंतरिक्ष क्षेत्र में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मद्रास से जुड़े स्टार्टअप अग्निकुल कॉसमॉस ने मई 2024 में अपने अग्निबाण SOrTeD मिशन के तहत एक ही हिस्से में 3D प्रिंट किया गया सेमी-क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन इस्तेमाल किया था. इस मिशन ने स्वदेशी अंतरिक्ष उपकरणों के विकास में एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग की क्षमता को प्रदर्शित किया.
रक्षा क्षेत्र में भी इस तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है. भारतीय सेना ने अहमदाबाद में 12 सप्ताह में दो मंजिला आवासीय इकाई का निर्माण किया. इसके अलावा, लद्दाख जैसे परिचालन क्षेत्रों में रक्षा बुनियादी ढांचे के निर्माण में भी 3D प्रिंटिंग का उपयोग बढ़ाया गया है.
सशस्त्र बल रखरखाव, मरम्मत और ओवरहॉल यानी MRO गतिविधियों में भी इस तकनीक के इस्तेमाल की संभावनाएं तलाश रहे हैं. इससे जरूरत के अनुसार पुर्जे तैयार करने और कुछ मामलों में आपूर्ति संबंधी चुनौतियों को कम करने में मदद मिल सकती है.
स्वास्थ्य और इलेक्ट्रॉनिक्स में भी नई संभावनाएं
स्वास्थ्य क्षेत्र में स्वदेशी चिकित्सा उपकरणों और मरीजों की जरूरत के अनुरूप इम्प्लांट विकसित करने के लिए 3D प्रिंटिंग का इस्तेमाल किया जा रहा है. MeitY ने प्राकृतिक रेशम आधारित इम्प्लांट के विकास से जुड़े काम को समर्थन दिया है. वहीं, टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट बोर्ड स्वदेशी बायोसिरेमिक सामग्री से 3D प्रिंटेड बोन ग्राफ्ट विकसित करने की परियोजना को सहयोग दे रहा है.
इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में भी इस तकनीक के जरिए बैटरी, एंटीना, कैपेसिटर और वेरिस्टर जैसे कंपोनेंट तैयार करने के प्रदर्शन किए गए हैं. भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) ने एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग के जरिए फोटोनिक इंटीग्रेटेड सर्किट के ब्लॉक तैयार करने की क्षमता भी प्रदर्शित की है.
इन क्षेत्रों में तकनीक का विस्तार होने से स्वदेशी उत्पादों के विकास और आयात पर निर्भरता कम करने की संभावनाएं बन सकती हैं. हालांकि, इसका वास्तविक असर उत्पादन लागत, गुणवत्ता, बड़े पैमाने पर विनिर्माण और व्यावसायिक इस्तेमाल पर निर्भर करेगा.
निर्माण क्षेत्र में लागत और उत्सर्जन घटाने की संभावना
निर्माण क्षेत्र में भी 3D प्रिंटिंग को घरों और अन्य संरचनाओं के निर्माण के वैकल्पिक तरीके के रूप में देखा जा रहा है. केल्विन 6K प्रो नामक ऑन-साइट निर्माण प्रिंटर ने कम कार्बन वाले जियोपॉलिमर पदार्थों का इस्तेमाल करके 2,500 वर्ग फुट के घर को 30 दिनों से कम समय में बनाने की क्षमता प्रदर्शित की है.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, शुरुआती अनुप्रयोगों में पारंपरिक सीमेंट आधारित निर्माण की तुलना में सामग्री और लॉजिस्टिक्स लागत में 30% तक तथा उत्सर्जन में 90% तक की कमी की संभावना जताई गई है. हालांकि, ये संभावित लाभ हैं. वास्तविक बचत परियोजना की प्रकृति, इस्तेमाल की गई सामग्री और निर्माण प्रक्रिया पर निर्भर करेगी.
सरकार और उद्योगों के बीच सहयोग बढ़ाने की तैयारी
MeitY ने मार्च 2026 में दूसरे नेशनल एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग सिम्पोजियम का आयोजन किया था. इसमें NSAM 2.0, रक्षा क्षेत्र में तकनीक के इस्तेमाल, उद्योगों में इसे अपनाने और अनुसंधान एवं विकास से जुड़ी पहलों पर चर्चा हुई.
सरकार स्कूल स्तर पर भी उभरती तकनीकों से परिचित कराने की कोशिश कर रही है. इसके लिए अटल टिंकरिंग लैब्स के माध्यम से कक्षा छह से 12वीं तक के विद्यार्थियों को 3D प्रिंटर, रोबोटिक्स किट और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) जैसी तकनीकों तक पहुंच दी जा रही है.
2035 तक 149 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है वैश्विक बाजार
सरकार की ओर से उद्धृत अनुमानों के मुताबिक, वैश्विक एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग मशीनों का बाजार 2035 तक 149 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है. वहीं, एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी इलेक्ट्रॉनिक्स आपूर्ति श्रृंखला का आकार 18 अरब डॉलर से बढ़कर 112 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. ये भविष्य से जुड़े बाजार अनुमान हैं, मौजूदा बाजार का आकार नहीं. भारत के लिए NSAM 2.0 इस बढ़ते बाजार में अपनी हिस्सेदारी मजबूत करने का अवसर बन सकता है.
कुल मिलाकर, नई रणनीति के जरिए सरकार स्वदेशी तकनीकों के व्यावसायीकरण, स्टार्टअप को समर्थन, उपकरणों की किफायती उपलब्धता और उद्योगों में 3D प्रिंटिंग के व्यापक इस्तेमाल को बढ़ावा देना चाहती है. हालांकि, इसके परिणाम इस बात पर निर्भर करेंगे कि प्रस्तावित योजनाओं को किस तरह लागू किया जाता है और उद्योग इन्हें कितनी तेजी से अपनाते हैं.
नए नियमों के तहत कंपनी के खातों में गड़बड़ी या फंड के दुरुपयोग जैसे मामलों में भी सेटलमेंट का विकल्प उपलब्ध रहेगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
शेयर बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने सेटलमेंट रेगुलेशंस, 2026 को आधिकारिक तौर पर नोटिफाई कर दिया है. नए नियमों का उद्देश्य नियामकीय उल्लंघनों से जुड़े मामलों के निपटारे की प्रक्रिया को तेज, पारदर्शी और आसान बनाना है. इसके तहत 10 लाख रुपये तक की सेटलमेंट राशि वाले मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक व्यवस्था शुरू की गई है. साथ ही, गलत तरीके से कमाए गए पैसे की वसूली और सेटलमेंट राशि की गणना से जुड़े नियमों में भी बदलाव किए गए हैं.
सेटलमेंट राशि तय करने का तरीका बदला
सेबी के नए नियमों के तहत सेटलमेंट राशि निर्धारित करने की प्रक्रिया में बदलाव किया गया है. अब इसमें तीन प्रमुख पहलुओं को ध्यान में रखा जाएगा. इनमें सेटलमेंट अमाउंट, गलत तरीके से कमाए गए पैसे की वापसी और सुधारात्मक व नियामकीय शर्तें शामिल हैं.
पहले कुछ मामलों में गलत तरीके से कमाई गई रकम या निवेशकों को हुए नुकसान को सेटलमेंट राशि की गणना में दो बार शामिल किए जाने की समस्या सामने आती थी. नए फ्रेमवर्क में इस दोहरी गणना यानी डबल काउंटिंग को खत्म करने का प्रावधान किया गया है.
अब सेटलमेंट की शुरुआती राशि तय करते समय गलत कमाई या नुकसान की रकम को शामिल नहीं किया जाएगा. इसकी गणना संबंधित उल्लंघन के लिए कानून के तहत निर्धारित न्यूनतम जुर्माने के आधार पर होगी. इसके बाद मामले की गंभीरता, नियामकीय कार्रवाई किस चरण में है और राहत देने या सख्ती बढ़ाने वाले अन्य कारकों के आधार पर अंतिम राशि निर्धारित की जाएगी. गलत तरीके से कमाई गई रकम या निवेशकों को हुए नुकसान की राशि स्पष्ट होने पर उसकी वसूली अलग से की जाएगी.
₹10 लाख तक के मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक व्यवस्था
छोटे और कम गंभीर मामलों का तेजी से निपटारा करने के लिए सेबी ने फास्ट-ट्रैक व्यवस्था शुरू की है. इसके तहत दो तरह के रास्ते बनाए गए हैं. पहले रास्ते में सेटलमेंट राशि के आधार पर मामलों का निपटारा किया जाएगा. जिन मामलों में सेटलमेंट राशि 10 लाख रुपये तक होगी, उन्हें सीधे इंटरनल कमेटी से पूर्णकालिक सदस्यों के पैनल के पास भेजा जाएगा. इसका उद्देश्य ऐसे मामलों में प्रक्रिया को सरल बनाना और निपटारे में लगने वाला समय कम करना है.
दूसरे रास्ते में उल्लंघन की प्रकृति को आधार बनाया जाएगा. इसके तहत डिस्क्लोजर यानी जरूरी जानकारी के खुलासे से जुड़ी कुछ गलतियों के मामलों में सेबी नोटिस भेजकर निर्धारित राशि का भुगतान करने पर मामला समाप्त करने का अवसर देगा.
गंभीर मामलों में भी सेटलमेंट का विकल्प
नए नियमों के तहत कंपनी के खातों में गड़बड़ी या फंड के दुरुपयोग जैसे मामलों में भी सेटलमेंट का विकल्प उपलब्ध रहेगा. हालांकि, इसके लिए संबंधित कंपनी को जरूरी जानकारी का पूरा खुलासा करना होगा. इसके अलावा, गलत तरीके से दूसरी जगह भेजी गई रकम को वापस लाने की शर्त भी पूरी करनी होगी.
इससे सेबी का उद्देश्य मामलों के निपटारे में तेजी लाने के साथ-साथ उल्लंघन करने वाली कंपनियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना है. गंभीर मामलों में राहत देने से पहले जरूरी शर्तों का पालन भी सुनिश्चित किया जाएगा.
सेबी ने पिछले महीने दी थी मंजूरी
सेबी के बोर्ड ने पिछले महीने हुई बैठक में इन बदलावों को मंजूरी दी थी. अब सेटलमेंट रेगुलेशंस, 2026 को आधिकारिक तौर पर नोटिफाई कर दिया गया है. नए नियमों से नियामकीय उल्लंघनों से जुड़े मामलों में सेटलमेंट की गणना, रकम की वसूली और निपटारे की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाने की उम्मीद है.
यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई है, जब मानसून के बाद कृषि गतिविधियों और रबी फसल की बुवाई के बीच ग्रामीण श्रम बाजार में रोजगार की मांग में बदलाव देखने को मिल रहा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना VB-G RAM-G के तहत सितंबर 2026 में काम की मांग में अगस्त के मुकाबले 25.2% की बढ़ोतरी दर्ज की गई. इस दौरान करीब 1.56 करोड़ परिवारों ने रोजगार की मांग की, जबकि अगस्त में यह आंकड़ा 1.25 करोड़ था. वहीं, रोजगार मांगने वाले लोगों की संख्या भी बढ़कर 1.88 करोड़ हो गई. यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई है, जब मानसून के बाद कृषि गतिविधियों और रबी फसल की बुवाई के बीच ग्रामीण श्रम बाजार में रोजगार की मांग में बदलाव देखने को मिल रहा है.
सितंबर में 1.56 करोड़ परिवारों ने मांगा काम
ग्रामीण विकास मंत्रालय के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, VB-G RAM-G योजना के तहत सितंबर में काम मांगने वाले परिवारों की संख्या बढ़कर 1.56 करोड़ हो गई. अगस्त में यह संख्या 1.25 करोड़ थी. इस तरह एक महीने में रोजगार की मांग में 25.2% की बढ़ोतरी हुई. इससे पहले जुलाई में करीब 1.01 करोड़ परिवारों ने इस योजना के तहत काम की मांग की थी. जुलाई में ही VB-G RAM-G अधिनियम, 2025 के तहत यह योजना शुरू की गई थी.
रोजगार मांगने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ी
योजना के तहत रोजगार की मांग करने वाले लोगों की संख्या में भी इजाफा हुआ है. अगस्त में करीब 1.54 करोड़ लोगों ने काम की मांग की थी, जबकि सितंबर में यह आंकड़ा बढ़कर 1.88 करोड़ हो गया. परिवारों और व्यक्तियों, दोनों स्तरों पर रोजगार की मांग में हुई यह बढ़ोतरी ग्रामीण क्षेत्रों में काम की जरूरत को दर्शाती है. हालांकि, केवल इन आंकड़ों के आधार पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आर्थिक दबाव या बेरोजगारी की स्थिति का निश्चित निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता.
साल में 125 दिन रोजगार की गारंटी
VB-G RAM-G योजना के तहत पात्र ग्रामीण परिवारों के लिए सालाना गारंटीकृत रोजगार की अवधि 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिन किए जाने का प्रावधान है. खबर में दी गई जानकारी के अनुसार, न्यूनतम दैनिक मजदूरी 300 रुपये तय की गई है.
यह योजना ग्रामीण परिवारों को आय का एक वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लाई गई है. कृषि कार्यों के बीच के समय में भी ग्रामीण परिवार इसके तहत रोजगार की मांग कर सकते हैं.
मानसून और रबी सीजन के बीच बढ़ी मांग पर नजर
सितंबर में रोजगार की मांग बढ़ने के पीछे मानसून के बाद कृषि गतिविधियों में बदलाव और रबी फसल की बुवाई से पहले का अंतर संभावित कारण हो सकते हैं. इस अवधि में ग्रामीण श्रमिकों की काम की उपलब्धता अलग-अलग क्षेत्रों में बदल सकती है.
आने वाले महीनों में रबी सीजन की शुरुआत और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों के साथ इस योजना के तहत काम की मांग का रुझान अहम रहेगा. इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि ग्रामीण परिवारों की रोजगार गारंटी योजना पर निर्भरता किस दिशा में बढ़ रही है.
मध्य प्रदेश में प्रस्तावित टेलीकॉम मैन्युफैक्चरिंग जोन (TMZ) देश में दूरसंचार उपकरणों के घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने की दिशा में अहम कदम साबित हो सकता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ग्वालियर में प्रस्तावित टेलीकॉम मैन्युफैक्चरिंग जोन में 31 कंपनियों ने करीब ₹5,500-6,000 करोड़ के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है. इस परियोजना के पहले चरण के लिए 170 एकड़ जमीन चिह्नित की गई है, जबकि अतिरिक्त 400 एकड़ जमीन आवंटित करने पर विचार किया जा रहा है. केंद्र सरकार ने टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन सुविधाओं के विकास के लिए भी वित्तीय सहायता का प्रावधान किया है.
केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने शुक्रवार को बताया कि इस परियोजना के लिए एक स्टार्टअप समेत 31 कंपनियों ने करीब ₹5,500-6,000 करोड़ के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है. सरकार अक्टूबर के अंत से पहले परियोजना का भूमिपूजन करने की तैयारी कर रही है.
दूरसंचार विभाग (DoT) के मुताबिक, इस परियोजना से 18,000 से अधिक रोजगार के अवसर पैदा होने की उम्मीद है. प्रस्तावित जोन में कंपनियों को एक ही स्थान पर विनिर्माण, अनुसंधान एवं विकास (R&D), परीक्षण और प्रमाणन जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने की योजना है. इससे कंपनियों को दूरसंचार उपकरणों के उत्पादन और व्यावसायिक इस्तेमाल से पहले उनकी गुणवत्ता जांचने में मदद मिलेगी.
सिंधिया ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि करीब 30 कंपनियों और एक स्टार्टअप ने इस जोन में अपनी विनिर्माण इकाइयां स्थापित करने की प्रतिबद्धता जताई है. उन्होंने स्पष्ट किया कि ये केवल रुचि जताने वाली कंपनियां नहीं हैं, बल्कि यहां अपनी इकाइयां स्थापित करने की योजना बना चुकी हैं.
पहले चरण में 170 एकड़ जमीन, 400 एकड़ अतिरिक्त जमीन पर विचार
परियोजना के पहले चरण के लिए 170 एकड़ जमीन चिह्नित की गई है. इसके अलावा कंपनियों को आवंटित करने के लिए 400 एकड़ अतिरिक्त जमीन पर विचार किया जा रहा है. केंद्र और मध्य प्रदेश सरकार मिलकर इस परियोजना को विकसित कर रही हैं. राज्य सरकार विनिर्माण कंपनियों को आकर्षित करने के लिए प्रोत्साहन भी दे रही है.
इस जोन को प्लग-एंड-प्ले औद्योगिक क्लस्टर के रूप में विकसित करने की योजना है. इसका मतलब है कि कंपनियों को उद्योग स्थापित करने के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा और साझा सुविधाएं एक ही स्थान पर मिल सकेंगी.
परियोजना के लिए केंद्र सरकार ने पहले चरण के बुनियादी ढांचे के विकास हेतु ₹493 करोड़ की वित्तीय सहायता देने की प्रतिबद्धता जताई है. वहीं, सरकार ने परीक्षण और प्रमाणन से जुड़ी साझा प्रयोगशालाओं के विकास के लिए ₹193 करोड़ निर्धारित किए हैं. इन सुविधाओं से कंपनियों को अपने दूरसंचार उपकरणों की जांच और प्रमाणन कराने में मदद मिलेगी.
जुलाई 2026 में दूरसंचार विभाग और मध्य प्रदेश सरकार ने इस जोन के विकास के लिए समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए थे. परियोजना को लागू करने और उसकी निगरानी के लिए दोनों सरकारों ने एक विशेष प्रयोजन इकाई (SPV) भी गठित की है.
मोबाइल फोन उत्पादन में भारत की बड़ी छलांग
सिंधिया ने कहा कि भारत अब केवल दूरसंचार तकनीक का उपभोक्ता बने रहने के बजाय इसके विनिर्माण और निर्यात में भी अपनी क्षमता बढ़ा रहा है. उन्होंने बताया कि पिछले 12 वर्षों में देश में मोबाइल फोन का उत्पादन करीब ₹90,000 करोड़ से बढ़कर ₹6.27 लाख करोड़ तक पहुंच गया है.
मंत्री के मुताबिक, भारत से मोबाइल फोन का निर्यात लगभग 28 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है. इसके साथ ही देश में मोबाइल फोन बनाने वाली कंपनियों की संख्या दो से बढ़कर करीब 300 हो गई है.
सरकार अब इसी विनिर्माण क्षमता को दूरसंचार उपकरणों और इससे जुड़ी दूसरी तकनीकों में भी विकसित करना चाहती है. ग्वालियर में प्रस्तावित जोन इसी रणनीति का हिस्सा है. इसका उद्देश्य राउटर, एंटीना, ऑप्टिकल फाइबर, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और 5G तथा 6G नेटवर्क से जुड़ी तकनीकों के विनिर्माण को बढ़ावा देना है.
इससे घरेलू स्तर पर मूल्यवर्धन बढ़ाने और आयातित उपकरणों पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिल सकती है. हालांकि, इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि निवेश की प्रतिबद्धताएं कितनी जल्दी उत्पादन इकाइयों में बदलती हैं.
PLI योजना से घरेलू विनिर्माण को समर्थन
टेलीकॉम मैन्युफैक्चरिंग जोन ऐसे समय विकसित किया जा रहा है, जब सरकार उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना के जरिए दूरसंचार और नेटवर्किंग उपकरणों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दे रही है.
सरकार के मुताबिक, इस योजना से करीब ₹1.1 लाख करोड़ की अतिरिक्त बिक्री, ₹25,000 करोड़ का अतिरिक्त निर्यात और 30,000 अतिरिक्त रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं. PLI योजना के तहत कंपनियों को भारत में उत्पादन और बिक्री बढ़ाने के आधार पर प्रोत्साहन दिया जाता है.
प्रस्तावित ग्वालियर जोन साझा बुनियादी ढांचे, परीक्षण सुविधाओं और विनिर्माण इकाइयों को एक जगह लाकर इस पहल को आगे बढ़ा सकता है. इससे दूरसंचार उपकरण बनाने वाली कंपनियों को उत्पादन क्षमता बढ़ाने और नए उत्पाद विकसित करने में मदद मिलने की उम्मीद है.
स्वदेशी 4G तकनीक से 6G की तैयारी तक
सिंधिया ने भारत की स्वदेशी 4G तकनीक का भी उल्लेख किया. उनके मुताबिक, देश में विकसित 4G टेक्नोलॉजी स्टैक को करीब 1.10 लाख टावरों पर तैनात किया जा चुका है. स्वदेशी तकनीक का विकास दूरसंचार नेटवर्क में देश की तकनीकी क्षमता मजबूत करने के लिहाज से महत्वपूर्ण है.
भारत अब 5G सेवाओं के विस्तार और 5G स्टैंडअलोन नेटवर्क की तैयारी पर भी जोर दे रहा है. ऐसे नेटवर्क से औद्योगिक और कारोबारी इस्तेमाल के लिए उन्नत डिजिटल सेवाओं को बढ़ावा मिल सकता है. सिंधिया के अनुसार, देश में करीब 55 करोड़ 5G उपयोगकर्ता हैं और 2030 तक इनकी संख्या एक अरब करने का लक्ष्य है.
इसके साथ ही भारत भारत 6G एलायंस के जरिए अगली पीढ़ी की दूरसंचार तकनीक के अंतरराष्ट्रीय मानकों को विकसित करने में अधिक भागीदारी चाहता है. इस पहल में शिक्षण संस्थानों और उद्योग जगत के प्रतिभागियों को शामिल किया गया है.
ग्वालियर का प्रस्तावित टेलीकॉम मैन्युफैक्चरिंग जोन विनिर्माण, अनुसंधान, परीक्षण और नवाचार को एक साझा औद्योगिक व्यवस्था में लाने की दिशा में काम करेगा. हालांकि, परियोजना की दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि निवेश की घोषणाएं कितनी तेजी से वास्तविक उत्पादन, घरेलू तकनीक के विकास और निर्यात में बदलती हैं.
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार चौथे सप्ताह गिरावट दर्ज की गई है. 2 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में भंडार 12.752 अरब डॉलर घटकर 734.606 अरब डॉलर रह गया. पिछले चार सप्ताह में इसमें कुल 51.1 अरब डॉलर की कमी आई है. इस दौरान विदेशी मुद्रा आस्तियों और सोने के भंडार के मूल्य में भी गिरावट आई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) में लगातार गिरावट का सिलसिला जारी है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से शुक्रवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक, 2 अक्टूबर 2026 को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 12.752 अरब डॉलर घट गया. इससे पिछले सप्ताह इसमें 18.343 अरब डॉलर की कमी आई थी. वहीं, 18 सितंबर को समाप्त सप्ताह में 14.881 अरब डॉलर और 11 सितंबर को समाप्त सप्ताह में 4.924 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई थी.
इस तरह पिछले चार सप्ताह में भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में कुल 51.1 अरब डॉलर की कमी आई है. इसके साथ ही भंडार 4 सितंबर 2026 को दर्ज 785.706 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर से घटकर 734.606 अरब डॉलर रह गया है. गौरतलब है कि 4 सितंबर तक लगातार 10 सप्ताह विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही थी. इसके बाद इसमें लगातार चार सप्ताह गिरावट आई है.
विदेशी मुद्रा आस्तियों में 10.66 अरब डॉलर की कमी
विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट की सबसे बड़ी वजह विदेशी मुद्रा आस्तियों (Foreign Currency Assets यानी FCA) में आई कमी रही. RBI के आंकड़ों के अनुसार, 2 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा आस्तियां 10.664 अरब डॉलर घटकर 604.747 अरब डॉलर रह गईं. इससे पिछले सप्ताह भी इनमें 15.570 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई थी.
विदेशी मुद्रा आस्तियां भारत के कुल विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा हैं. इनमें अमेरिकी डॉलर के अलावा यूरो, पाउंड और येन जैसी अन्य विदेशी मुद्राओं में रखी गई संपत्तियां भी शामिल होती हैं. डॉलर में इनका मूल्यांकन किए जाने के कारण दूसरी मुद्राओं की विनिमय दरों में होने वाले बदलाव का असर भी इनके मूल्य पर पड़ता है.
सोने के भंडार का मूल्य भी घटा
विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट के बीच देश के स्वर्ण भंडार (Gold Reserves) के मूल्य में भी कमी आई है. RBI के आंकड़ों के मुताबिक, 2 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में सोने के भंडार का मूल्य 2.288 अरब डॉलर घटकर 106.413 अरब डॉलर रह गया. इससे पिछले सप्ताह भी इसके मूल्य में 2.591 अरब डॉलर की गिरावट आई थी.
मार्च 2026 के अंत तक RBI के पास 880.52 टन सोना था. सोने की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव से इसके भंडार का डॉलर में मूल्य प्रभावित होता है. ऐसे में सोने के मूल्य में गिरावट का असर देश के कुल विदेशी मुद्रा भंडार के आंकड़े पर भी पड़ता है.
SDR में बढ़ोतरी, IMF रिजर्व घटा
RBI के आंकड़ों के अनुसार, 2 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में भारत के विशेष आहरण अधिकार (Special Drawing Rights यानी SDR) में 15 मिलियन डॉलर की बढ़ोतरी हुई. इसके बाद SDR का कुल भंडार बढ़कर 18.656 अरब डॉलर हो गया. इससे पिछले सप्ताह इसमें 97 मिलियन डॉलर की गिरावट आई थी.
वहीं, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के पास रखे गए भारत के रिजर्व में 15 मिलियन डॉलर की कमी आई. इसके बाद यह घटकर 4.789 अरब डॉलर रह गया. इससे पिछले सप्ताह भी IMF रिजर्व में 86 मिलियन डॉलर की गिरावट दर्ज की गई थी.
इस तरह विदेशी मुद्रा आस्तियों और सोने के भंडार के मूल्य में कमी ने कुल विदेशी मुद्रा भंडार को नीचे खींचा है, जबकि SDR में मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई. हालांकि, चार सप्ताह में आई कुल गिरावट के पीछे अलग-अलग कारकों की भूमिका समझने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में RBI के हस्तक्षेप और विदेशी परिसंपत्तियों के मूल्यांकन में हुए बदलावों को भी ध्यान में रखना होगा.
अमेरिका में ग्रीन कार्ड स्पॉन्सरशिप से जुड़ी PERM प्रक्रिया पर रोक के बाद भारतीय IT कंपनियों के कर्मचारियों की स्थायी निवास प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं. हालांकि, इस कदम से मौजूदा H-1B वीजा अपने आप रद्द नहीं होंगे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अमेरिका में आठ टेक्नोलॉजी कंपनियों को परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन (PERM) कार्यक्रम से निलंबित किए जाने के बाद भारतीय IT सेक्टर में ग्रीन कार्ड स्पॉन्सरशिप और कर्मचारियों की नियुक्ति रणनीति को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रभावित कंपनियों में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), इन्फोसिस, विप्रो, HCLTech, कॉग्निजेंट, माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी और कैपजेमिनी शामिल हैं.
अमेरिकी श्रम विभाग (US Department of Labour) ने इन कंपनियों से जुड़े नए PERM आवेदनों को स्वीकार करने और लंबित आवेदनों की प्रक्रिया पर रोक लगा दी है. यह कार्रवाई रोजगार आधारित इमिग्रेशन कार्यक्रमों के कथित दुरुपयोग की जांच के बीच की गई है. PERM प्रक्रिया पर रोक का सीधा असर ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन करने वाले कर्मचारियों पर पड़ सकता है, लेकिन इससे पहले से जारी H-1B वीजा अपने आप रद्द नहीं होते.
इस फैसले ने अस्थायी वर्क वीजा और स्थायी निवास की प्रक्रिया के बीच अंतर को भी चर्चा में ला दिया है. यदि यह प्रतिबंध लंबे समय तक जारी रहता है, तो कंपनियों को कर्मचारियों को बनाए रखने और अमेरिका में अपने कार्यबल की योजना बनाने से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.
PERM पर रोक का IT कंपनियों पर क्या होगा असर?
PERM ग्रीन कार्ड हासिल करने की नियोक्ता प्रायोजित प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण है. इसके तहत अमेरिकी नियोक्ता को यह प्रमाणित करना होता है कि संबंधित पद के लिए योग्य अमेरिकी कर्मचारियों की उपलब्धता और भर्ती से जुड़ी निर्धारित शर्तें पूरी की गई हैं. इसके बाद कर्मचारी ग्रीन कार्ड की आगे की प्रक्रिया में बढ़ सकता है.
वहीं, H-1B वीजा विदेशी पेशेवरों को अमेरिका में अस्थायी रूप से काम करने की अनुमति देता है. ऐसे में PERM प्रक्रिया पर रोक का मतलब यह नहीं है कि अमेरिका में काम कर रहे सभी प्रभावित कर्मचारियों की नौकरी या वीजा तत्काल समाप्त हो जाएगा. इसका मुख्य असर स्थायी निवास के लिए आवेदन की प्रक्रिया पर पड़ता है.
टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) ने कहा है कि उसे इस रोक से अपनी कार्यबल रणनीति या ग्राहकों से जुड़े कामकाज पर किसी बड़े असर की आशंका नहीं है. कंपनी के मुताबिक, पिछले दो वर्षों में उसके PERM आवेदनों की संख्या एकल अंक में रही है. TCS ने अगले पांच वर्षों में अमेरिका में 15,000 अतिरिक्त कर्मचारियों की भर्ती की अपनी योजना को भी दोहराया है. कंपनी स्थानीय भर्ती और कैंपस प्लेसमेंट को अपनी रणनीति का अहम हिस्सा मानती है.
TCS का रुख बताता है कि इस फैसले का असर सभी कंपनियों पर एक जैसा होना जरूरी नहीं है. इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि संबंधित कंपनी PERM प्रक्रिया का कितना इस्तेमाल करती है और अमेरिका में उसके कर्मचारियों की मौजूदा स्थिति क्या है. हालांकि, कंपनियों के स्तर पर आवेदनों और प्रभावित कर्मचारियों का विस्तृत आंकड़ा उपलब्ध नहीं होने के कारण पूरे IT उद्योग पर पड़ने वाले असर का सटीक अनुमान लगाना फिलहाल मुश्किल है.
Nasscom ने क्या कहा?
नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर एंड सर्विस कंपनीज (Nasscom) ने इस मामले में इमिग्रेशन और कुशल कर्मचारियों की अंतरराष्ट्रीय आवाजाही को अलग-अलग मुद्दे बताया है. उद्योग संगठन के मुताबिक, भारतीय टेक्नोलॉजी कंपनियों ने अमेरिका में स्थानीय स्तर पर भर्ती बढ़ाई है और H-1B वीजा पर अपनी निर्भरता कम की है. कंपनियों ने अमेरिकी बाजार में स्थानीय कार्यबल विकसित करने पर भी जोर दिया है.
Nasscom ने यह भी कहा कि H-1B वीजा पर काम करने वाले अपेक्षाकृत कम कर्मचारी PERM प्रक्रिया के जरिए स्थायी निवास हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ते हैं. संगठन के अनुसार, भारतीय टेक्नोलॉजी कंपनियां 80 से अधिक देशों में काम करती हैं और स्थानीय कानूनों व नियामकीय आवश्यकताओं का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.
आगे क्या बदलेगी कंपनियों की रणनीति?
PERM प्रक्रिया पर रोक का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रतिबंध कितने समय तक लागू रहता है, कितने आवेदन प्रभावित होते हैं और संबंधित कंपनियां ग्रीन कार्ड स्पॉन्सरशिप पर कितनी निर्भर हैं. फिलहाल, प्रभावित कर्मचारियों की कुल संख्या और कंपनियों पर पड़ने वाले संभावित वित्तीय असर को लेकर स्पष्ट आंकड़े सामने नहीं आए हैं.
भारतीय IT कंपनियों के लिए फिलहाल सबसे अहम सवाल लंबित आवेदनों की स्थिति और स्थायी निवास की प्रक्रिया में लगे कर्मचारियों पर पड़ने वाले प्रभाव का है. TCS, इन्फोसिस और विप्रो जैसी कंपनियों की प्रतिक्रियाओं के साथ अमेरिकी अधिकारियों की ओर से मिलने वाला अतिरिक्त स्पष्टीकरण यह तय करने में अहम होगा कि कंपनियों को अपनी भर्ती, कर्मचारी प्रतिधारण और कार्यबल नियोजन की रणनीति में कोई बदलाव करना पड़ेगा या नहीं.
सिंधिया ने इंडिया मोबाइल कांग्रेस के दौरान कहा कि सैटकॉम क्षेत्र में किसी एक कंपनी को प्राथमिकता नहीं दी गई है. इस क्षेत्र में सेवाएं देने की इच्छुक सभी कंपनियों को जरूरी नियमों और शर्तों का पालन करना होगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के बाजार में किसी एक कंपनी का दबदबा नहीं होगा. संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि स्टारलिंक, रिलायंस जियो और वनवेब को लाइसेंस दिए जा चुके हैं. वहीं, अमेजन कुइपर को भी सेवाएं शुरू करने के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा. सरकार अब सैटेलाइट स्पेक्ट्रम की कीमत और सुरक्षा संबंधी शर्तों पर काम कर रही है.
संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सैटेलाइट ब्रॉडबैंड सेवाओं के लिए लाइसेंस देने की प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों पर सरकार का रुख स्पष्ट किया है. उन्होंने कहा कि भारत किसी भी क्षेत्र में एकाधिकार की अनुमति नहीं देता है और सैटेलाइट कम्युनिकेशन (सैटकॉम) सेक्टर में भी सभी पात्र कंपनियों को समान अवसर दिए जाएंगे. उनके मुताबिक, रिलायंस जियो, वनवेब और स्टारलिंक को लाइसेंस मिल चुके हैं, जबकि अमेरिकी कंपनी अमेजन कुइपर को निर्धारित प्रक्रिया पूरी करनी होगी.
सिंधिया ने इंडिया मोबाइल कांग्रेस के दौरान कहा कि सैटकॉम क्षेत्र में किसी एक कंपनी को प्राथमिकता नहीं दी गई है. इस क्षेत्र में सेवाएं देने की इच्छुक सभी कंपनियों को जरूरी नियमों और शर्तों का पालन करना होगा. उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उपभोक्ताओं को अलग-अलग सेवाओं के विकल्प मिलें और वे अपनी जरूरत के अनुसार चुनाव कर सकें.
स्पेक्ट्रम की कीमत और सुरक्षा मानकों पर चर्चा
सिंधिया के मुताबिक, सरकार सैटेलाइट स्पेक्ट्रम की कीमत तय करने के लिए भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) के साथ चर्चा कर रही है. कंपनियों को सेवाएं शुरू करने से पहले सुरक्षा से जुड़ी सभी शर्तें पूरी करनी होंगी. इन मानकों के अनुपालन की जांच गृह मंत्रालय कर रहा है और मंजूरी देने का फैसला भी उसी के स्तर पर होगा.
उन्होंने कहा कि राजस्व शुल्क से जुड़ी व्यवस्था तय होने के बाद कंपनियां सुरक्षा संबंधी शर्तों और अन्य जरूरी मानकों को पूरा करके अपनी सेवाएं शुरू कर सकती हैं. प्रत्येक कंपनी को निर्धारित शर्तों का अलग-अलग अनुपालन करना होगा.
स्टारलिंक को लेकर क्यों उठा विवाद?
सरकार का यह बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिकी अरबपति एलन मस्क ने आरोप लगाया था कि कुछ 'ताकतवर कारोबारी' भारत में स्टारलिंक की सेवाओं को शुरू होने से रोक रहे हैं. इसके बाद केंद्र सरकार ने गुरुवार को इन आरोपों को खारिज कर दिया था.
संचार मंत्रालय ने कहा था कि भारत में दूरसंचार और सैटेलाइट सेवाओं के लिए मंजूरी की व्यवस्था निष्पक्ष और भेदभाव रहित है. सभी कंपनियों को देश में कारोबार शुरू करने के लिए निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन करना होता है. मंत्रालय ने चुनिंदा कंपनियों को निशाना बनाने या उनके साथ भेदभाव किए जाने के आरोपों को निराधार बताया था.
भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के विस्तार के साथ इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ने की संभावना है. हालांकि, कंपनियों के लिए सेवाएं शुरू करने का रास्ता स्पेक्ट्रम से जुड़े नियमों, शुल्क व्यवस्था और सुरक्षा मंजूरी पूरी होने के बाद ही साफ होगा.
इसके अलावा सालभर चलने वाले छात्र कार्यक्रम के तहत 10 किलोग्राम अतिरिक्त सामान ले जाने की सुविधा और एक बार मुफ्त में यात्रा की तारीख बदलने का लाभ भी मिलेगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
एयर इंडिया ने छात्रों के हवाई सफर को किफायती बनाने के लिए घरेलू उड़ानों के टिकट पर विशेष ऑफर पेश किया है. इसके तहत पात्र बुकिंग पर बेस फेयर यानी मूल किराये में 10 फीसदी की छूट दी जाएगी. इस ऑफर का लाभ लेने के लिए छात्रों को 20 अक्टूबर 2026 तक टिकट बुक करना होगा. यह सुविधा एयर इंडिया के सालभर चलने वाले छात्र कार्यक्रम के अतिरिक्त है, जिसके तहत पात्र घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर भी कई लाभ मिलते हैं.
एयरलाइन के मुताबिक, कॉलेज में दाखिले, इंटर्नशिप, कैंपस प्लेसमेंट या सेमेस्टर की छुट्टियों में घर जाने वाले छात्र इस ऑफर का लाभ उठा सकते हैं. हालांकि, छूट के लिए बुकिंग को निर्धारित किराया शर्तों के अनुरूप होना जरूरी है.
छात्रों को मिलेंगे ये तीन प्रमुख फायदे
एयर इंडिया के सालभर चलने वाले छात्र कार्यक्रम के तहत पात्र यात्रियों को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के किराये पर 10 फीसदी तक की छूट मिल सकती है. इसके अलावा उन्हें 10 किलोग्राम अतिरिक्त सामान ले जाने की सुविधा और एक बार बिना अतिरिक्त शुल्क के यात्रा की तारीख बदलने का विकल्प भी मिलता है.
हालांकि, घरेलू उड़ानों के मूल किराये पर फ्लैट 10 फीसदी छूट का विशेष ऑफर सीमित अवधि के लिए है. इसकी अंतिम तारीख 20 अक्टूबर 2026 है. छात्र कार्यक्रम के अन्य लाभ लागू नियमों और शर्तों के अनुसार पूरे साल उपलब्ध रहेंगे.
वेबसाइट और मोबाइल ऐप से ऐसे करें बुकिंग
छात्र एयर इंडिया की आधिकारिक वेबसाइट airindia.com या मोबाइल ऐप के जरिए टिकट बुक कर सकते हैं. इसके लिए उन्हें कुछ आसान चरणों का पालन करना होगा.
1. सबसे पहले यात्रा का शुरुआती शहर, गंतव्य और यात्रा की तारीख दर्ज करें.
2. बुकिंग के दौरान 'कंसेशन टाइप' के विकल्प में 'स्टूडेंट' चुनें.
3. इसके बाद दिखाई देने वाले पात्र छात्र किरायों में से अपनी यात्रा के लिए विकल्प चुनें.
4. किराये से जुड़ी शर्तों की जांच करें और बुकिंग पूरी कर लें.
विशेष छूट पाने के लिए 20 अक्टूबर 2026 तक बुकिंग करना जरूरी है. यह ऑफर पात्र एकतरफा और आने-जाने, दोनों तरह के टिकटों पर लागू है.
सीधे टिकट बुक करने पर अतिरिक्त बचत का मौका
एयर इंडिया की वेबसाइट या मोबाइल ऐप से टिकट बुक करने वाले यात्रियों को अतिरिक्त बचत का लाभ भी मिल सकता है. लॉग-इन करने वाले ग्राहकों को सुविधा शुल्क में 50 फीसदी की छूट दी जाती है. इसके अलावा, पात्र घरेलू उड़ानों के टिकट का भुगतान यूपीआई से करने पर प्रोमो कोड **UPIPROMO** के जरिए प्रति यात्री 1,000 रुपये तक की अतिरिक्त छूट मिल सकती है. यह लाभ निर्धारित नियमों और शर्तों के अधीन है.
कौन उठा सकता है छात्र ऑफर का लाभ?
घरेलू उड़ानों में छात्र कार्यक्रम का लाभ लेने के लिए यात्रियों को कुछ पात्रता शर्तें पूरी करनी होंगी.
1. उम्र: यात्रा की तारीख पर छात्र की उम्र कम से कम 12 वर्ष होनी चाहिए.
2. पाठ्यक्रम: छात्र किसी ऐसे पूर्णकालिक पाठ्यक्रम में नामांकित होना चाहिए, जिसकी अवधि कम से कम एक शैक्षणिक वर्ष हो.
3. शिक्षण संस्थान: छात्र केंद्र या राज्य सरकार, मान्यता प्राप्त शिक्षा बोर्ड या विश्वविद्यालय से मान्यता प्राप्त, संबद्ध अथवा सहायता प्राप्त संस्थान में पढ़ रहा हो. मान्यता प्राप्त स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों के पात्र विद्यार्थी भी इस सुविधा का लाभ ले सकते हैं.
यात्रा के दौरान चेक-इन के समय सत्यापन के लिए वैध दस्तावेज साथ रखना जरूरी है. इनमें छात्र पहचान पत्र, शिक्षण संस्थान का प्रवेश पत्र या लागू होने की स्थिति में वैध छात्र वीजा शामिल हो सकता है. जरूरी दस्तावेज नहीं दिखाने पर एयरलाइन निर्धारित नियमों के अनुसार अतिरिक्त राशि और लागू कर वसूल सकती है.
सालभर मिलती रहेंगी ये सुविधाएं
सीमित अवधि के विशेष ऑफर के बाद भी एयर इंडिया का छात्र कार्यक्रम जारी रहेगा. इसके तहत पात्र यात्रियों को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के किराये पर 10 फीसदी तक की छूट, 10 किलोग्राम अतिरिक्त सामान ले जाने की सुविधा और एक बार मुफ्त में यात्रा की तारीख बदलने का लाभ मिलता रहेगा.
अतिरिक्त सामान ले जाने की सुविधा उन छात्रों के लिए उपयोगी हो सकती है, जिन्हें कॉलेज और घर के बीच यात्रा करते समय ज्यादा सामान ले जाना पड़ता है. वहीं, तारीख बदलने की सुविधा से यात्रा कार्यक्रम में बदलाव होने पर सहूलियत मिलती है. दोनों लाभ संबंधित नियमों और शर्तों के अधीन हैं.
भारत और विदेश के प्रमुख शिक्षा केंद्रों से कनेक्टिविटी
एयर इंडिया का घरेलू और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क भारत के विभिन्न शहरों के साथ उत्तरी अमेरिका, यूरोप, ब्रिटेन, मध्य पूर्व, एशिया और ऑस्ट्रेलिया के प्रमुख गंतव्यों को जोड़ता है. इससे उच्च शिक्षा के लिए देश और विदेश जाने वाले छात्रों को यात्रा के विकल्प मिलते हैं.
एयरलाइन के मुताबिक, घरेलू उड़ानों के मूल किराये पर सीमित अवधि की 10 फीसदी छूट के लिए 20 अक्टूबर 2026 तक बुकिंग की जा सकती है. छात्र कार्यक्रम के अन्य लाभ इसके बाद भी लागू शर्तों के अनुसार उपलब्ध रहेंगे. अधिक जानकारी और टिकट बुकिंग के लिए छात्र एयर इंडिया की वेबसाइट या मोबाइल ऐप का इस्तेमाल कर सकते हैं.
विदेशी पूंजी की निकासी, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और डॉलर की मजबूत मांग से रुपये पर दबाव बना हुआ है. 9 अक्टूबर को रुपया शुरुआती कारोबार में 96.80 प्रति डॉलर के करीब पहुंचने के बाद संभला और 96.61 प्रति डॉलर पर बंद हुआ.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रुपये को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर जाने से रोकने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप किया. मुद्रा बाजार के कारोबारियों के मुताबिक, डॉलर की लगातार मांग, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और वैश्विक अनिश्चितता के कारण रुपये पर दबाव बना हुआ है. केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप से रुपये में और गिरावट को सीमित करने में मदद मिली.
8 अक्टूबर 2026 को रुपया कमजोर होकर 96.78 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था. इसके बाद 9 अक्टूबर को कारोबार के दौरान यह 96.80 प्रति डॉलर के करीब पहुंच गया. हालांकि, बाद में इसमें सुधार आया और यह 96.61 प्रति डॉलर पर बंद हुआ. इस तरह पिछले कारोबारी सत्र के मुकाबले रुपये में करीब 0.2 फीसदी की मजबूती दर्ज की गई. कारोबारियों ने इस सुधार के पीछे RBI के हस्तक्षेप, डॉलर में नरमी और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट को प्रमुख वजह बताया.
विदेशी मुद्रा बाजार में RBI की भूमिका ऐसे समय में महत्वपूर्ण हो गई है, जब बाहरी आर्थिक परिस्थितियां रुपये के अनुकूल नहीं हैं. भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है. ऐसे में तेल की कीमतें बढ़ने से आयात बिल बढ़ता है और भुगतान के लिए डॉलर की मांग में इजाफा होता है. इससे रुपये पर दबाव पड़ता है.
कच्चे तेल की कीमतें और विदेशी निवेशकों की बिकवाली बढ़ा रही दबाव
रुपये की कमजोरी के पीछे घरेलू और वैश्विक, दोनों तरह के कारक काम कर रहे हैं. कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भारत के आयात खर्च को बढ़ाती हैं, जबकि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की निकासी से भी रुपये पर दबाव बढ़ता है. इसके अलावा, भू-राजनीतिक घटनाक्रम और वैश्विक ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता ने भी मुद्रा बाजार की स्थिति को प्रभावित किया है.
RBI के हस्तक्षेप से रुपये की गिरावट की रफ्तार को सीमित करने में मदद मिल सकती है, लेकिन इससे उन बुनियादी कारणों को खत्म नहीं किया जा सकता, जो घरेलू मुद्रा पर दबाव बना रहे हैं. बाजार के प्रतिभागी अब कच्चे तेल की कीमतों, अमेरिकी डॉलर की चाल और विदेशी निवेश के प्रवाह पर नजर रख रहे हैं. इन कारकों से रुपये की आगे की दिशा तय होने की संभावना है.
RBI ने संकेत दिया है कि उसका उद्देश्य विदेशी मुद्रा बाजार में व्यवस्थित कारोबार बनाए रखना है, न कि रुपये को किसी निश्चित विनिमय दर पर बनाए रखना. गवर्नर संजय मल्होत्रा ने रुपये को उसके उचित मूल्य से कम यानी अंडरवैल्यूड बताया है. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा है कि छोटी अवधि में बाजार का व्यवहार तर्कसंगत नहीं रह सकता.
RBI की मौद्रिक नीति का भी रुपये पर असर
रुपये की चाल पर RBI के हालिया मौद्रिक नीति फैसले का असर भी देखा जा रहा है. 7 अक्टूबर को केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी करते हुए इसे 5.50 फीसदी कर दिया था. साथ ही, मौद्रिक नीति के रुख को न्यूट्रल से बदलकर कैलिब्रेटेड टाइटनिंग यानी चरणबद्ध सख्ती की ओर किया था.
हालांकि, इस फैसले के बाद भी रुपये को तत्काल मजबूती नहीं मिली. इसकी वजह बाहरी आर्थिक दबाव और विदेशी पूंजी के प्रवाह को लेकर बनी चिंताएं हैं. इससे संकेत मिलता है कि केवल ब्याज दरों में बदलाव से रुपये की दिशा तय नहीं होती, बल्कि वैश्विक बाजार की परिस्थितियां भी अहम भूमिका निभाती हैं.
रुपये में गिरावट से किन क्षेत्रों पर पड़ेगा असर?
रुपये के कमजोर होने का अलग-अलग क्षेत्रों पर अलग प्रभाव पड़ता है. तेल विपणन कंपनियों, विमानन कंपनियों और उन कारोबारों की लागत बढ़ सकती है, जिन्हें कच्चे तेल, ईंधन, मशीनरी या अन्य वस्तुओं का आयात करना पड़ता है. डॉलर में भुगतान करने वाली कंपनियों के लिए भी आयात महंगा हो सकता है.
दूसरी ओर, सूचना प्रौद्योगिकी (IT) क्षेत्र की उन कंपनियों को फायदा मिल सकता है, जिन्हें विदेशों से डॉलर में कमाई होती है. डॉलर में अर्जित आय को रुपये में बदलने पर उन्हें अधिक राशि मिल सकती है. हालांकि, वास्तविक लाभ कंपनियों के खर्च, विदेशी मुद्रा जोखिम से बचाव की रणनीति और अन्य कारोबारी परिस्थितियों पर निर्भर करेगा.
रुपये में लगातार गिरावट से आयातित महंगाई बढ़ने का जोखिम भी रहता है. यदि कंपनियां आयात की बढ़ी हुई लागत का बोझ उपभोक्ताओं पर डालती हैं, तो ईंधन और अन्य आयातित वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं.
RBI के सामने क्या है चुनौती?
RBI के सामने फिलहाल रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोकने और विदेशी मुद्रा बाजार में स्थिरता बनाए रखने की चुनौती है. केंद्रीय बैंक के लिए किसी एक विनिमय दर का बचाव करने के बजाय बाजार में असामान्य उतार-चढ़ाव को सीमित करना महत्वपूर्ण है.
आने वाले दिनों में रुपये की दिशा काफी हद तक कच्चे तेल की कीमतों, विदेशी निवेशकों के रुख, अमेरिकी डॉलर की मजबूती और RBI के हस्तक्षेप पर निर्भर करेगी. यदि तेल की कीमतों में तेजी और विदेशी पूंजी की निकासी जारी रहती है, तो रुपये पर दबाव बना रह सकता है. वहीं, डॉलर में नरमी और तेल की कीमतों में गिरावट से घरेलू मुद्रा को कुछ राहत मिल सकती है.