इस प्रस्ताव में सभी पायलटों को 2 दिन का अनिवार्य आराम देने और एक अवकाश से दूसरे अवकाश के बीच 168 घंटे का समय तय किया गया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
DGCA (Directorate General of Civil Aviation) ने पायलटों को आराम देने के लिए के लिए कई तरह के सुझाव एविएशन कंपनियों को दिए हैं. DGCA की सलाह के अनुसार, सभी पायलटों को हफ्ते में दो दिन का ऑफ देना जरूरी किया गया है. DGCA ने ये कदम हाल ही में सामने आए पायलटों की थकान के मामले के बाद उठाया है, जिसमें इंडिगो के एक पॉयलट की नागपुर एयरपोर्ट पर हुई मौत के बाद उठाया है. इस प्रस्ताव में अनिवार्य रूप से 48 घंटे का आराम देने की सलाह दी गई है.
क्या कह रही हैं DGCA की गाइडलाइन?
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, DGCA की गाइडलाइन के अनुसार, सभी शेड्यूल एयरलाइनों के प्रमुखों को पिछली तिमाही के दौरान सामने आई थकान रिपोर्ट और उन पर कंपनी के द्वारा उठाए गए एक्शन की रिपोर्ट भी पेश करने को कहा है. DGCA ने अपने इस सुझाव में ये भी कहा है कि एक ऑपरेटर ये तय करेगा कि पायलट को 48 घंटे का सुझाव दिया गया है, जिसमें 2 लोकल रातों का भी स्टे देना होगा. साथ ही ये भी कहा गया है कि साप्ताहिक आराम के अंत और अगले की शुरुआत के बीच में 168 घंटे से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए.
क्या बोले इंडिगो के CEO?
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले पर इंडिगो के सीईओ पीटर एल्बर्स ने कहा है कि इस मुद्दे पर बहुत विचार करने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि सुरक्षा में सुधार करने का सबसे बेहतर तरीका ये है कि आप पारदर्शी तरीके से काम करें. उन्होंने कहा हम पायलटों से फीडबैक ले रहे हैं. इसके लिए हम अंतराष्ट्रीय मानकों को भी विशेष रूप से देख रहे हैं. उन्होंने ये भी कहा हम ये भी देख रहे हैं कि अमेरिका और यूरोपीय यूनियन में इस पर कैसे काम किया जाता है हम ये भी देख रहे हैं.
आने वाले सालों में और ग्रो करेगी ये इंडस्ट्री
नागरिक उड्डयन आवश्यकता में ड्यूटी अवधि, उड़ान ड्यूटी अवधि, उड़ान समय सीमाएं, और निर्धारित आराम अवधि, को लेकर सुझाव मांगे गए हैं. इस ड्राफ्ट पर सभी स्टेक होल्डर से 4 दिसंबर पर टिप्पडि़यां मांगी गई हैं. भारत सबसे तेजी से बढ़ते सिविल एविएशन मार्केट में से एक है. इसमें आने वाले समय में पायलटों की और जरूरत बढ़ेगी, क्योंकि लगभग सभी एविएशन कंपनियां अपने बेड़े में विस्तार कर रही हैं और सुरक्षा सबसे अहम विषय है.
केंद्रीय बैंक ने फिलहाल कोई नया लिक्विडिटी बूस्टर नहीं दिया, लेकिन गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भरोसा दिलाया कि जरूरत के मुताबिक बैंकिंग सिस्टम में पर्याप्त नकदी उपलब्ध कराई जाती रहेगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अगस्त 2026 की मौद्रिक नीति समीक्षा में रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखा है. हालांकि इस बार बाजार की नजर सिर्फ ब्याज दरों पर नहीं, बल्कि बैंकिंग सिस्टम में नकदी (लिक्विडिटी) को लेकर RBI के रुख पर भी थी. केंद्रीय बैंक ने फिलहाल कोई नया लिक्विडिटी बूस्टर नहीं दिया, लेकिन गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भरोसा दिलाया कि जरूरत के मुताबिक बैंकिंग सिस्टम में पर्याप्त नकदी उपलब्ध कराई जाती रहेगी.
रेपो रेट के साथ सभी प्रमुख दरें यथावत
मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक में लगातार दूसरी बार रेपो रेट को 5.25% पर बरकरार रखा गया. इसके साथ ही RBI ने मौद्रिक नीति का 'न्यूट्रल' रुख भी कायम रखा. स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी (SDF) रेट 5%, जबकि मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (MSF) रेट और बैंक रेट 5.5% पर यथावत रखे गए हैं. समिति का मानना है कि मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों में फिलहाल ब्याज दरों में बदलाव की जरूरत नहीं है.
लिक्विडिटी पर क्या बोला RBI?
प्रेस कॉन्फ्रेंस में गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि RBI यह सुनिश्चित करेगा कि बैंकिंग सिस्टम में पर्याप्त लिक्विडिटी बनी रहे. इसका उद्देश्य यह है कि बैंकों के पास कर्ज देने और रोजमर्रा की वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध रहें. हालांकि केंद्रीय बैंक ने इस बैठक में नकदी बढ़ाने के लिए किसी नए कदम का ऐलान नहीं किया.
फिलहाल नहीं मिला कोई बड़ा लिक्विडिटी बूस्टर
बाजार को उम्मीद थी कि RBI कैश रिजर्व रेशियो (CRR) में कटौती, ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) या किसी अन्य विशेष लिक्विडिटी उपाय की घोषणा कर सकता है. लेकिन केंद्रीय बैंक ने फिलहाल ऐसा कोई फैसला नहीं लिया. RBI ने संकेत दिया कि मौजूदा समय में सिस्टम में पर्याप्त नकदी उपलब्ध है और जरूरत पड़ने पर वह उचित कदम उठाने के लिए तैयार है.
बैंकिंग सेक्टर की स्थिति मजबूत
गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि विभिन्न सेक्टरों में कर्ज की मांग मजबूत बनी हुई है और बैंकों की क्रेडिट ग्रोथ व्यापक आधार पर जारी है. हालांकि पिछले वर्ष की तुलना में बैंकों का नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) कुछ कम हुआ है, लेकिन बैंकिंग प्रणाली मजबूत स्थिति में है. उन्होंने भरोसा दिलाया कि पर्याप्त लिक्विडिटी बनाए रखी जाएगी, जिससे कर्ज वितरण की रफ्तार प्रभावित नहीं होगी.
बॉन्ड और मनी मार्केट में दिखी नरमी
RBI के मुताबिक जुलाई के दौरान शॉर्ट टर्म मनी मार्केट की ब्याज दरों में नरमी देखने को मिली है. इसके अलावा जून और जुलाई में विभिन्न अवधि वाले सरकारी बॉन्ड (G-Sec) की यील्ड भी घटी है. इससे संकेत मिलता है कि वित्तीय बाजारों में फंडिंग की स्थिति पहले के मुकाबले अधिक सहज हुई है और फिलहाल नकदी का कोई बड़ा दबाव नहीं है.
सहकारी बैंकों के लिए दो बड़े ऐलान
केंद्रीय बैंक ने सहकारी बैंकिंग क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए दो अहम घोषणाएं भी की हैं. RBI जल्द ही शहरी सहकारी बैंकों (Urban Cooperative Banks) की लाइसेंसिंग दोबारा शुरू करने के लिए ड्राफ्ट गाइडलाइंस जारी करेगा. इसके अलावा ग्रामीण सहकारी बैंकों (Rural Cooperative Banks) के लिए भी नए ड्राफ्ट दिशा-निर्देश लाए जाएंगे. RBI का मानना है कि इन कदमों से सहकारी बैंकिंग व्यवस्था मजबूत होगी और ग्रामीण तथा छोटे शहरों में बैंकिंग सेवाओं की पहुंच बेहतर बनेगी.
महंगाई और वैश्विक जोखिमों पर बनी हुई है नजर
गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि महंगाई अभी भी RBI के लक्ष्य से ऊपर है और खाद्य व ईंधन की कीमतों का दबाव बना हुआ है. इसके अलावा पश्चिम एशिया में जारी तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, अल नीनो और वैश्विक व्यापार से जुड़ी अनिश्चितताएं भी जोखिम पैदा कर रही हैं. ऐसे में केंद्रीय बैंक फिलहाल कोई आक्रामक कदम उठाने के बजाय आर्थिक परिस्थितियों पर नजर बनाए रखना चाहता है.
फिलहाल 'वेट एंड वॉच' मोड में RBI
पूरी मौद्रिक नीति समीक्षा का सबसे बड़ा संदेश यही रहा कि RBI फिलहाल 'वेट एंड वॉच' की रणनीति पर काम कर रहा है. एक ओर भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर उम्मीद से बेहतर बनी हुई है, बैंकिंग सेक्टर मजबूत है और वित्तीय बाजारों में पर्याप्त नकदी उपलब्ध है. वहीं दूसरी ओर वैश्विक अनिश्चितताएं और महंगाई से जुड़े जोखिम अभी भी बने हुए हैं. ऐसे में केंद्रीय बैंक आने वाले महीनों के आर्थिक आंकड़ों और महंगाई के रुख का आकलन करने के बाद ही किसी बड़े नीतिगत बदलाव पर फैसला करेगा.
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि घरेलू मांग और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की मजबूती से अर्थव्यवस्था को समर्थन मिल रहा है, हालांकि वैश्विक जोखिमों को देखते हुए सतर्कता अभी भी जरूरी है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अगस्त मौद्रिक नीति समीक्षा में लगातार दूसरी बार रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखा है. इसके साथ ही केंद्रीय बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए GDP ग्रोथ का अनुमान 6.6% से बढ़ाकर 6.7% कर दिया, जबकि खुदरा महंगाई (CPI) का अनुमान घटाकर 5% कर दिया है. RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि घरेलू मांग और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की मजबूती से अर्थव्यवस्था को समर्थन मिल रहा है, हालांकि वैश्विक जोखिमों को देखते हुए सतर्कता अभी भी जरूरी है.
रेपो रेट और पॉलिसी रुख में कोई बदलाव नहीं
तीन से पांच अगस्त तक चली मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक में छहों सदस्यों ने सर्वसम्मति से रेपो रेट को 5.25% पर बरकरार रखने का फैसला किया. समिति ने मौद्रिक नीति का 'न्यूट्रल' रुख भी कायम रखा. इसके अलावा स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी (SDF) रेट 5%, जबकि मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (MSF) रेट और बैंक रेट 5.5% पर यथावत रखे गए हैं.
GDP ग्रोथ के अनुमान में बढ़ोतरी
RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए GDP ग्रोथ का अनुमान 6.6% से बढ़ाकर 6.7% कर दिया है. केंद्रीय बैंक के अनुसार पहली तिमाही में अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन उम्मीद से बेहतर रहा, जिसके चलते पूरे साल के विकास अनुमान में संशोधन किया गया. RBI का अनुमान है कि पहली तिमाही में GDP ग्रोथ 7%, दूसरी तिमाही में 6.4%, तीसरी तिमाही में 6.5% और चौथी तिमाही में 6.8% रहेगी.
घरेलू मांग और मैन्युफैक्चरिंग बनी ताकत
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के शुरुआती नतीजे उत्साहजनक रहे हैं. निजी खपत मजबूत बनी हुई है और विवेकाधीन खर्च में भी बढ़ोतरी देखने को मिली है. घरेलू मांग के दम पर सेवा क्षेत्र में भी अच्छी वृद्धि की संभावना बनी हुई है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है.
महंगाई के मोर्चे पर राहत
केंद्रीय बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए खुदरा महंगाई (CPI) का अनुमान घटाकर 5% कर दिया है. गवर्नर ने बताया कि पहली तिमाही में वास्तविक महंगाई RBI के अनुमान से थोड़ी कम रही, क्योंकि लागत बढ़ने का असर उपभोक्ताओं तक सीमित रहा. उन्होंने कहा कि खाद्य और ईंधन की कीमतों के कारण हेडलाइन महंगाई पर दबाव बना हुआ है, लेकिन कोर महंगाई अब भी नियंत्रण में है. RBI का अनुमान है कि दूसरी तिमाही में महंगाई 4.7%, तीसरी तिमाही में 5.9% और चौथी तिमाही में 5.5% रह सकती है. तीसरी तिमाही के बाद महंगाई में धीरे-धीरे नरमी आने की उम्मीद है.
वैश्विक जोखिमों पर RBI की नजर
RBI ने कहा कि अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत है, लेकिन वैश्विक अनिश्चितताएं अभी भी चिंता का विषय हैं. पश्चिम एशिया में जारी तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, वैश्विक व्यापार नीतियों में अनिश्चितता और मौसम संबंधी जोखिम आगे महंगाई और आर्थिक वृद्धि को प्रभावित कर सकते हैं. गवर्नर ने कहा कि केंद्रीय बैंक किसी भी बड़े नीतिगत बदलाव से पहले महंगाई के रुख और आर्थिक आंकड़ों में अधिक स्पष्टता का इंतजार करेगा. इसलिए फिलहाल ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है.
इस साझेदारी का उद्देश्य भारत का पहला पूरी तरह एकीकृत निजी क्षेत्र का रेलव्हील मैन्युफैक्चरिंग प्लेटफॉर्म विकसित करना है. कंपनियों के अनुसार, यह प्लेटफॉर्म भारतीय रेलवे और निजी ग्राहकों की बढ़ती मांग को पूरा करेगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में रेलवे विनिर्माण को नई रफ्तार देने के लिए जुपिटर वैगन्स (Jupiter Wagons) ने इटली की Lucchini RS Holding S.p.A. और इटली सरकार समर्थित वित्तीय संस्था SIMEST S.p.A. के साथ रणनीतिक साझेदारी की है. इस समझौते के तहत भारत में रेलवे व्हील, एक्सल और व्हीलसेट के लिए एकीकृत मैन्युफैक्चरिंग प्लेटफॉर्म स्थापित किया जाएगा, जिससे घरेलू उत्पादन बढ़ेगा और भारत की वैश्विक रेलवे सप्लाई चेन में हिस्सेदारी मजबूत होगी.
जुपिटर वैगन्स (JWL) ने मंगलवार को बताया कि इस बाध्यकारी समझौते (Binding Agreement) के तहत Lucchini RS, Jupiter Tatravagonka Railwheel Factory Private Limited (JTRWF) में 15 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदेगी, जबकि SIMEST अतिरिक्त 10 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल करेगी. दोनों का संयुक्त 25 प्रतिशत निवेश लगभग 2.8 करोड़ यूरो (28 मिलियन यूरो) का होगा.
देश का पहला एकीकृत निजी रेलव्हील मैन्युफैक्चरिंग प्लेटफॉर्म
इस साझेदारी का उद्देश्य भारत का पहला पूरी तरह एकीकृत निजी क्षेत्र का रेलव्हील मैन्युफैक्चरिंग प्लेटफॉर्म विकसित करना है. यहां रेलवे व्हील, एक्सल और व्हीलसेट का निर्माण कच्चे माल की प्रोसेसिंग, फोर्जिंग, मशीनिंग से लेकर अंतिम असेंबली तक एक ही प्लेटफॉर्म पर किया जाएगा. इससे पूरे उत्पादन चक्र का संचालन भारत में ही संभव होगा.
ओडिशा में बनेगा नया प्लांट
वर्तमान में JTRWF की छत्रपति संभाजीनगर स्थित यूनिट मशीनिंग और व्हीलसेट असेंबली का काम करती है. इसे ओडिशा में विकसित किए जा रहे ग्रीनफील्ड मैन्युफैक्चरिंग कॉम्प्लेक्स से जोड़ा जाएगा. ओडिशा प्लांट में फोर्जिंग, मेटलर्जी और रेलव्हील निर्माण जैसी क्षमताएं विकसित की जाएंगी, जिससे पूरी उत्पादन श्रृंखला एक ही प्लेटफॉर्म पर पूरी हो सकेगी.
घरेलू जरूरतों के साथ निर्यात पर भी रहेगा फोकस
कंपनियों के अनुसार, यह प्लेटफॉर्म भारतीय रेलवे और निजी ग्राहकों की बढ़ती मांग को पूरा करेगा. साथ ही, इसका लक्ष्य वैश्विक बाजारों में भी रेल उत्पादों का निर्यात बढ़ाना है, जिससे भारत अंतरराष्ट्रीय रेलवे सप्लाई चेन में अपनी मौजूदगी और मजबूत कर सके.
इटली की कंपनी देगी तकनीकी सहयोग
Lucchini RS इस परियोजना के विकास और कमीशनिंग के दौरान अत्याधुनिक तकनीक, इंजीनियरिंग विशेषज्ञता और औद्योगिक सहयोग उपलब्ध कराएगी. इसके अलावा, सभी साझेदार मिलकर नए उत्पादों के विकास और घरेलू व अंतरराष्ट्रीय रेलवे बाजारों में अपनी पहुंच बढ़ाने पर भी काम करेंगे.
जुपिटर वैगन्स का कहना है कि उसके मौजूदा वैगन निर्माण कारोबार से व्हीलसेट की लगातार मांग बनी रहेगी, जिससे इस संयुक्त उद्यम की व्यावसायिक व्यवहार्यता मजबूत होगी. साथ ही, इससे तकनीक हस्तांतरण में तेजी आएगी और भारत की रेलवे विनिर्माण क्षमता को भी मजबूती मिलेगी.
इटली सरकार का भी मिला समर्थन
इस निवेश को इटली सरकार ने Sistema Italia फ्रेमवर्क के तहत समर्थन दिया है. SIMEST की इक्विटी भागीदारी के अलावा इटली की डेवलपमेंट फाइनेंस संस्था CDP, Lucchini RS को वित्तीय और सलाहकार सहयोग प्रदान करेगी. भारत में इटली के दूतावास ने भी इस पहल का समर्थन किया है.
क्या बोले कंपनी के अधिकारी?
जुपिटर वैगन्स के प्रबंध निदेशक विवेक लोहिया ने कहा कि यह साझेदारी कंपनी की विनिर्माण क्षमता और Lucchini RS की तकनीक व इंजीनियरिंग विशेषज्ञता को एक साथ लाएगी. इससे भारत में एकीकृत रेलव्हील मैन्युफैक्चरिंग प्लेटफॉर्म विकसित होगा, देश की आत्मनिर्भरता मजबूत होगी और भारत वैश्विक रेलवे विनिर्माण हब बनने की दिशा में आगे बढ़ेगा.
वहीं, Lucchini RS के चेयरमैन ग्यूसेप्पे लुकीनी ने कहा कि यह निवेश कंपनी की अंतरराष्ट्रीय विस्तार रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है. इससे कंपनी को भारत जैसे बड़े बाजार में एक मजबूत स्थानीय साझेदार के साथ दीर्घकालिक अवसर मिलेंगे और भारतीय तथा वैश्विक रेलवे क्षेत्र में विकास की नई संभावनाएं खुलेंगी.
इस प्रोजेक्ट के तहत इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट, कंस्ट्रक्शन, इंस्टॉलेशन और कमीशनिंग (EPCIC) के साथ मौजूदा ऑफशोर सुविधाओं के अपग्रेडेशन का काम भी किया जाएगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत की इंजीनियरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र की दिग्गज कंपनी लार्सन एंड टुब्रो (L&T) को पश्चिम एशिया से एक बड़ी कामयाबी मिली है. कंपनी को संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की राष्ट्रीय तेल कंपनी ADNOC Offshore से 15,000 करोड़ रुपये से अधिक का अल्ट्रा-मेगा ऑफशोर कॉन्ट्रैक्ट मिला है. इस डील से L&T की अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर बुक और हाइड्रोकार्बन कारोबार को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है.
L&T ने मंगलवार को बताया कि यह कॉन्ट्रैक्ट उसकी ऑफशोर हाइड्रोकार्बन इकाई L&T Energy Hydrocarbon Offshore (LTEH Offshore) को मिला है. कंपनी की आंतरिक ऑर्डर वर्गीकरण प्रणाली के अनुसार, 15,000 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य वाले प्रोजेक्ट्स को "अल्ट्रा-मेगा" श्रेणी में रखा जाता है.
क्या है प्रोजेक्ट का दायरा?
इस प्रोजेक्ट के तहत इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट, कंस्ट्रक्शन, इंस्टॉलेशन और कमीशनिंग (EPCIC) के साथ मौजूदा ऑफशोर सुविधाओं के अपग्रेडेशन का काम भी किया जाएगा. हालांकि, L&T ने कॉन्ट्रैक्ट की सटीक राशि और इसे पूरा करने की समयसीमा का खुलासा नहीं किया है.
यह परियोजना एक कंसोर्टियम के माध्यम से पूरी की जाएगी, जिसमें LTEH Offshore प्रमुख भागीदार होगा और अधिकांश कार्य की जिम्मेदारी संभालेगा. कंपनी लंबे समय से वैश्विक स्तर पर ऑफशोर हाइड्रोकार्बन इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है और मध्य पूर्व के कई बड़े ऑयल एंड गैस प्रोजेक्ट्स का हिस्सा रह चुकी है.
अंतरराष्ट्रीय कारोबार को मिलेगा बढ़ावा
यह नया ऑर्डर L&T के हाइड्रोकार्बन पोर्टफोलियो में एक और बड़ा अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट जोड़ता है. साथ ही, यह इस बात का भी संकेत है कि मध्य पूर्व की राष्ट्रीय तेल कंपनियां ऑफशोर ऊर्जा अवसंरचना के विस्तार पर लगातार निवेश बढ़ा रही हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि इस कॉन्ट्रैक्ट से L&T की अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर पाइपलाइन और मजबूत होगी, खासकर ऊर्जा कारोबार में कंपनी की वैश्विक मौजूदगी को और विस्तार मिलेगा. 15,000 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य का यह ऑर्डर L&T के लिए आने वाले वर्षों में राजस्व और वैश्विक परियोजनाओं के लिहाज से महत्वपूर्ण साबित हो सकता है.
इस विधेयक के जरिए विदेशी निवेशकों, फंड मैनेजरों, क्लाउड कंपनियों और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी कंपनियों के लिए टैक्स नियमों को आसान बनाया जाएगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्र सरकार ने विदेशी निवेश आकर्षित करने और कारोबार सुगम बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मंगलवार को लोकसभा में कराधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 (Tax Amendment Bill 2026) पेश किया. इस विधेयक के जरिए विदेशी निवेशकों, फंड मैनेजरों, क्लाउड कंपनियों और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी कंपनियों के लिए टैक्स नियमों को आसान बनाया जाएगा. सरकार का मानना है कि इससे भारत वैश्विक पूंजी, विनिर्माण और व्यापार के लिए अधिक आकर्षक निवेश गंतव्य बनेगा.
आयकर संशोधन अध्यादेश की जगह लेगा नया विधेयक
यह विधेयक जून 2026 में लागू किए गए आयकर (संशोधन) अध्यादेश की जगह लेगा. वित्त मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, विदेशी कंपनियों को भारत में निवेश के दौरान टैक्स नियमों की जटिलता और अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है. नया कानून अधिक पारदर्शी और पूर्वानुमानित टैक्स व्यवस्था सुनिश्चित करेगा, जिससे निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा.
विदेशी निवेश फंडों के लिए नियम हुए आसान
सरकार ने पात्र विदेशी निवेश फंडों के लिए लागू शर्तों की संख्या 13 से घटाकर सिर्फ 5 कर दी है. इसका उद्देश्य विदेशी फंड मैनेजरों को भारत में संचालन के लिए प्रोत्साहित करना है, ताकि उनके फंड को भारत में 'बिजनेस कनेक्शन' वाला न माना जाए. यह प्रावधान अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र (IFSC) समेत पूरे देश में लागू होगा.
क्लाउड कंपनियों को भी मिली बड़ी राहत
भारतीय डेटा सेंटर का उपयोग करने वाली विदेशी क्लाउड कंपनियों के लिए भी नियम सरल किए गए हैं. अब विदेशी कंपनी और डेटा सेंटर के लिए अलग से सरकारी अधिसूचना की आवश्यकता नहीं होगी. साथ ही भारतीय कंपनियां डेटा सेंटर का संचालन स्वामित्व या लीज, दोनों मॉडल के तहत कर सकेंगी. सरकार का कहना है कि इससे कारोबार करना और आसान होगा.
इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग को मिलेगा बढ़ावा
विधेयक में इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए विदेशी कंपनियों को दी जा रही टैक्स छूट को 10 साल और बढ़ाकर वित्त वर्ष 2040-41 तक कर दिया गया है. यह छूट उन विदेशी कंपनियों पर लागू होगी, जो भारतीय कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरर्स को पूंजीगत सामान, उपकरण और कलपुर्जे उपलब्ध कराती हैं.
पहली बार तय हुई 'स्पेसिफाइड इलेक्ट्रॉनिक गुड्स' की परिभाषा
सरकार ने पहली बार 'स्पेसिफाइड इलेक्ट्रॉनिक गुड्स' को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया है. इसमें मोबाइल फोन, लैपटॉप, टैबलेट, सर्वर, सब-असेंबली, हियरेबल, वियरेबल डिवाइस और उनसे जुड़े एक्सेसरीज को शामिल किया गया है.
इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट सप्लाई पर 15 साल की टैक्स छूट
भारत के कस्टम बॉन्डेड वेयरहाउस में इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट स्टोर कर भारतीय कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरर्स को सप्लाई करने वाली विदेशी कंपनियों को मार्च 2041 तक 15 वर्षों के लिए पूरी टैक्स छूट देने का प्रस्ताव रखा गया है. इससे भारत को इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई चेन का बड़ा केंद्र बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है.
डायमंड ट्रेड को भी मिलेगा प्रोत्साहन
विधेयक में मुंबई और सूरत के अधिसूचित विशेष क्षेत्रों में कच्चे हीरों के कारोबार को बढ़ावा देने का भी प्रावधान किया गया है. इसके तहत विदेशी खनन कंपनियों, साइट-होल्डर्स, ब्रोकरों, एग्रीगेटर्स और नीलामी संस्थाओं को कच्चे हीरों की बिक्री से होने वाली आय पर 15 साल की टैक्स छूट मिलेगी. सरकार का लक्ष्य वैश्विक रफ डायमंड ट्रेड का बड़ा हिस्सा भारत की ओर आकर्षित करना है.
कंपनी ने बताया कि आने वाले महीनों में वह कई प्रमुख डिजिटल प्लेटफॉर्म के साथ सेलर-फाइनेंसिंग साझेदारियों की घोषणा करेगी, जिससे MSME को और अधिक तेज, आसान और डिजिटल फाइनेंसिंग सुविधाएं मिल सकेंगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
मुंबई की B2B फिनटेक कंपनी GetVantage ने अपने Series A1 फंडिंग राउंड में 63 करोड़ रुपये (इक्विटी और डेट) जुटाने का ऐलान किया है. इस नई पूंजी के साथ कंपनी की कुल कमिटेड फंडिंग क्षमता 700 करोड़ रुपये से अधिक हो जाएगी. कंपनी इस राशि का इस्तेमाल अपने AI-आधारित कैपिटल गेटवे प्लेटफॉर्म का विस्तार करने और देशभर के MSME (सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम) को आसान व तेज वित्तपोषण उपलब्ध कराने में करेगी.
कंपनी ने इस फंडिंग राउंड को "Scale Capital Round" नाम दिया है. यह निवेश GetVantage के रेवेन्यू-बेस्ड फाइनेंसिंग मॉडल से आगे बढ़कर एक व्यापक एम्बेडेड कैश-फ्लो फाइनेंसिंग प्लेटफॉर्म बनने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है.
700 करोड़ रुपये से अधिक होगी फंडिंग क्षमता
कंपनी का कहना है कि नई पूंजी से उसके वित्तीय संस्थान साझेदारों के माध्यम से परिचालन ऋण पूंजी (Operational Debt Capital) के रूप में सैकड़ों करोड़ रुपये की अतिरिक्त फंडिंग उपलब्ध होगी. इस पूंजी का उपयोग GetVantage के कैपिटल गेटवे को विस्तार देने में किया जाएगा. कैपिटल गेटवे एक प्लग-एंड-प्ले API इकोसिस्टम है, जिसकी मदद से B2B ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, मार्केटप्लेस और लॉजिस्टिक्स कंपनियां अपने मर्चेंट नेटवर्क में सीधे फाइनेंसिंग विकल्प जोड़ सकती हैं. यह उसी तरह काम करता है, जैसे पेमेंट गेटवे किसी व्यवसाय को डिजिटल भुगतान स्वीकार करने की सुविधा देता है.
इस फंडिंग राउंड का नेतृत्व बैंकिंग क्षेत्र के 30 वर्षों के अनुभवी और RBL Bank के पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर राजीव आहूजा ने किया. उनके साथ ऑपरेटर-नेतृत्व वाली निवेश कंपनी SanRaj Group ने भी निवेश किया. इसके अलावा Chiratae Ventures, Varanium Fintech Fund और VCMint जैसे मौजूदा संस्थागत निवेशकों ने भी कंपनी पर भरोसा बनाए रखा.
क्या बोले संस्थापक भाविक वासा
GetVantage के संस्थापक भाविक वासा ने कहा कि कंपनी ने भारत में कैश-फ्लो आधारित फाइनेंसिंग की शुरुआत की थी, लेकिन उसका लक्ष्य इससे कहीं बड़ा था. उन्होंने कहा, "हमारा उद्देश्य भारत का कैपिटल गेटवे बनना है. जिस तरह पेमेंट गेटवे छोटे कारोबारियों को डिजिटल भुगतान स्वीकार करने में मदद करता है, उसी तरह कैपिटल गेटवे उन्हें तुरंत और आसान तरीके से वर्किंग कैपिटल उपलब्ध कराता है. राजीव आहूजा, राजदीप गुप्ता और Chiratae Ventures जैसे अनुभवी निवेशकों का साथ हमारी इस यात्रा को गति देगा."
पारंपरिक बैंकिंग मॉडल से अलग
GetVantage का फाइनेंसिंग मॉडल पारंपरिक बैंकिंग से अलग है. जहां बैंक आमतौर पर संपार्श्विक (Collateral) और पुराने वित्तीय रिकॉर्ड के आधार पर लोन देते हैं, वहीं GetVantage वैकल्पिक डेटा (Alternate Data) और प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स का उपयोग कर कंपनियों की वास्तविक कैश-फ्लो क्षमता का आकलन करता है. इससे MSME और स्टार्टअप्स के लिए पूंजी जुटाने की प्रक्रिया आसान और तेज हो जाती है.
MSME के 30 लाख करोड़ रुपये के क्रेडिट गैप को भरने पर फोकस
कंपनी फिलहाल कैश-फ्लो आधारित फाइनेंसिंग, टर्म लोन, बिजनेस लोन और मर्चेंट कैश एडवांस जैसी कई सेवाएं उपलब्ध करा रही है. GetVantage का दावा है कि उसका डेटा-आधारित मॉडल भारत के लगभग 30 लाख करोड़ रुपये के MSME क्रेडिट गैप को कम करने में मदद करेगा और 'विकसित भारत' के लक्ष्य को गति देगा.
सरकारी नीति के अनुरूप रणनीति
कंपनी ने कहा कि उसका कैपिटल गेटवे हाल के सरकारी प्रयासों और वित्त मंत्री द्वारा दिए गए उस संदेश के अनुरूप है, जिसमें कहा गया था कि "एक जैसे वित्तीय उत्पाद अलग-अलग तरह के व्यवसायों की जरूरतें पूरी नहीं कर सकते." सरकार कैश-फ्लो आधारित अंडरराइटिंग, को-लेंडिंग और डिजिटल फाइनेंसिंग को बढ़ावा दे रही है, ऐसे में GetVantage का प्लेटफॉर्म संस्थागत पूंजी को MSME तक पहुंचाने के लिए डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध कराएगा.
आगे क्या है योजना
SanRaj Group के राजदीप गुप्ता ने कहा कि छोटे कारोबारों के लिए लचीली पूंजी तक पहुंच आज भी बड़ी चुनौती है और GetVantage का API-आधारित कैपिटल गेटवे इस समस्या का समाधान करने की क्षमता रखता है. कंपनी ने बताया कि आने वाले महीनों में वह कई प्रमुख डिजिटल प्लेटफॉर्म के साथ सेलर-फाइनेंसिंग साझेदारियों की घोषणा करेगी, जिससे MSME को और अधिक तेज, आसान और डिजिटल फाइनेंसिंग सुविधाएं मिल सकेंगी.
मंगलवार को सेंसेक्स 210.08 अंक यानी 0.27 फीसदी की गिरावट के साथ 78,428.95 पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 50 इंडेक्स 159.40 अंक यानी 0.64 फीसदी गिरकर 24,614.90 पर बंद हुआ.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
घरेलू शेयर बाजार में लगातार चार कारोबारी सत्रों की तेजी मंगलवार को थम गई और सेंसेक्स-निफ्टी गिरावट के साथ बंद हुए. RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक से पहले निवेशकों ने सतर्क रुख अपनाया, जिससे बाजार में मुनाफावसूली देखने को मिली. अब आज के कारोबार में LIC के OFS, Paytm और Meesho में हिस्सेदारी बिक्री, HFCL के निवेश, Vedanta की जांच और DLF समेत कई बड़े कॉर्पोरेट अपडेट्स के चलते चुनिंदा शेयरों में अच्छी-खासी हलचल देखने को मिल सकती है.
कल क्या था बाजार का हाल
घरेलू शेयर बाजार में चार कारोबारी सत्रों से जारी तेजी मंगलवार को थम गई. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स 210.08 अंक यानी 0.27 फीसदी की गिरावट के साथ 78,428.95 पर बंद हुआ. कारोबार के दौरान यह 78,211.87 तक फिसल गया था. वहीं, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी 50 इंडेक्स 159.40 अंक यानी 0.64 फीसदी गिरकर 24,614.90 पर बंद हुआ. दूसरी ओर, डॉलर के मुकाबले रुपया लगभग स्थिर रहा और 95.3775 के स्तर पर बंद हुआ.
इन दिग्गज शेयरों में रही बिकवाली
सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 14 गिरावट के साथ बंद हुए. सबसे अधिक दबाव हिंदुस्तान यूनिलीवर पर रहा, जिसका शेयर करीब 1.7 फीसदी टूटा. इसके अलावा एनटीपीसी, एचडीएफसी बैंक, रिलायंस इंडस्ट्रीज, इंडिगो, टेक महिंद्रा, पावर ग्रिड, एचसीएल टेक और इंफोसिस के शेयरों में भी गिरावट दर्ज की गई.
इन शेयरों में दिखी मजबूती
कमजोर बाजार के बावजूद ट्रेंट, बजाज फाइनेंस, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स (BEL), टाटा स्टील, महिंद्रा एंड महिंद्रा, बजाज फिनसर्व, टाइटन और सन फार्मा के शेयर बढ़त के साथ बंद हुए, जिससे चुनिंदा सेक्टरों में खरीदारी बनी रही.
ब्रॉडर मार्केट का मिला-जुला रुख
ब्रॉडर मार्केट में निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स 0.29 फीसदी गिरा, जबकि निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स 0.23 फीसदी की बढ़त के साथ बंद हुआ. सेक्टोरल इंडेक्स में निफ्टी रियल्टी 2 फीसदी से अधिक टूटा. इसके अलावा एफएमसीजी, प्राइवेट बैंक और बैंकिंग इंडेक्स में भी कमजोरी देखने को मिली.
आज इन शेयरों पर रखें नजर
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आज के कारोबार में कई कंपनियों से जुड़े अहम घटनाक्रमों के चलते उनके शेयर फोकस में रहेंगे. सरकार ने LIC के OFS का आकार बढ़ाकर 4 फीसदी अतिरिक्त हिस्सेदारी बिक्री का फैसला किया है. वहीं, Meesho में Elevation Capital और Peak XV Partners ने करीब 1,949 करोड़ रुपये की 2.27 फीसदी हिस्सेदारी बेची है, जबकि Paytm की पैरेंट कंपनी One97 Communications में Elevation Capital और SAIF से जुड़ी संस्थाओं ने लगभग 2,038 करोड़ रुपये के शेयर ऑफलोड किए हैं. Apollo Pipes के प्रमोटर ने ओपन मार्केट से 23.5 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे हैं. Vedanta की झारसुगुड़ा यूनिट में कथित अवैध भूजल दोहन की जांच के आदेश दिए गए हैं. HFCL ने ऑप्टिकल फाइबर और केबल निर्माण क्षमता बढ़ाने के लिए 400 करोड़ रुपये के निवेश को मंजूरी दी है. DLF ने वित्त वर्ष 2027 के लिए 20,000 करोड़ रुपये के प्री-सेल्स लक्ष्य पर भरोसा जताया है, जबकि Aditya Birla Health Insurance ने युवाओं के लिए नया हेल्थ इंश्योरेंस प्लान 'Activ Yuva' लॉन्च किया है. इन सभी अपडेट्स के चलते आज इन शेयरों में हलचल देखने को मिल सकती है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
सेबी ने यह भी स्पष्ट किया कि यह राहत केवल ओपन ऑफर नियमों तक सीमित है. अधिग्रहण करने वाले पक्षों को अन्य सभी लागू नियामकीय प्रावधानों का पालन करना होगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने मुथूट फिनकॉर्प (Muthoot Fincorp) के प्रस्तावित आईपीओ (IPO) से पहले मुथूट परिवार के छह ट्रस्टों को बड़ी राहत दी है. नियामक ने इन ट्रस्टों को मुथूट माइक्रोफिन (Muthoot Microfin) में अप्रत्यक्ष हिस्सेदारी अधिग्रहण के लिए अनिवार्य ओपन ऑफर (Open Offer) नियम से छूट दे दी है. यह फैसला प्रमोटर समूह के आंतरिक पुनर्गठन (Internal Promoter Restructuring) को आसान बनाएगा.
छह मुथूट फैमिली ट्रस्टों को मिली छूट
सेबी ने जिन ट्रस्टों को ओपन ऑफर नियम से छूट दी है, उनमें Thomas John Muthoot (MF) Trust, Thomas George Muthoot (MF) Trust, Thomas Muthoot (MF) Trust, Preethi John Muthoot (MF) Trust, Nina George (MF) Trust और Remmy Thomas (MF) Trust शामिल हैं. पुनर्गठन के तहत ये ट्रस्ट कई चरणों में शेयर हासिल करेंगे. इसमें अनिवार्य रूप से परिवर्तनीय प्रेफरेंस शेयर (Compulsorily Convertible Preference Shares-CCPS) का इक्विटी में रूपांतरण और प्रमोटरों की पत्नियों से शेयर ट्रांसफर भी शामिल है.
पुनर्गठन के बाद 63.35% हिस्सेदारी होगी
प्रस्तावित लेनदेन पूरा होने के बाद ये छह ट्रस्ट मिलकर मुथूट फिनकॉर्प में 63.35 फीसदी हिस्सेदारी और नियंत्रण अपने पास रखेंगे. मुथूट फिनकॉर्प के पास मुथूट माइक्रोफिन में 50.21 फीसदी हिस्सेदारी है. ऐसे में सामान्य परिस्थितियों में यह अप्रत्यक्ष अधिग्रहण सेबी के शेयर अधिग्रहण एवं टेकओवर नियम, 2011 के तहत अनिवार्य ओपन ऑफर की शर्त को लागू कर देता. हालांकि, सेबी ने इस मामले में विशेष छूट प्रदान की है.
IPO की तैयारी के तहत हुआ पुनर्गठन
सेबी ने कहा कि उसने मई 2026 में भी इसी तरह के पुनर्गठन प्रस्ताव को मंजूरी दी थी. हालांकि, इसके तुरंत बाद मुथूट फिनकॉर्प के निदेशक मंडल ने IPO लाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी. इसके चलते कंपनी को सेबी के 'इश्यू ऑफ कैपिटल एंड डिस्क्लोजर रिक्वायरमेंट्स' (ICDR) नियमों के तहत न्यूनतम प्रमोटर योगदान (Minimum Promoters' Contribution-MPC) की शर्तों का पालन करने के लिए पुनर्गठन की संरचना में बदलाव करना पड़ा. साथ ही CCPS को इक्विटी में बदलने की योजना के कारण नई छूट के लिए आवेदन करना पड़ा.
प्रमोटरों के पास बनी रहेगी आवश्यक हिस्सेदारी
पुनर्गठन के बाद Thomas John Muthoot, Thomas George Muthoot और Thomas Muthoot संयुक्त रूप से मुथूट फिनकॉर्प में 28.23 फीसदी हिस्सेदारी अपने पास बनाए रखेंगे. यह हिस्सेदारी IPO के लिए आवश्यक न्यूनतम प्रमोटर योगदान की शर्त पूरी करने के लिए रखी जाएगी.
सार्वजनिक निवेशकों के हितों पर नहीं पड़ेगा असर
सेबी ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि यह पुनर्गठन परिवार की आंतरिक उत्तराधिकार (Family Succession) योजना का हिस्सा है. इससे मुथूट माइक्रोफिन के नियंत्रण या प्रबंधन में कोई बदलाव नहीं होगा और न ही सार्वजनिक शेयरधारकों के हित प्रभावित होंगे.
नियामक ने कहा कि यह छूट आदेश जारी होने की तारीख से एक वर्ष तक प्रभावी रहेगी. इस अवधि के भीतर अधिग्रहण पूरा करना होगा और लेनदेन के 21 दिनों के भीतर अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) भी जमा करनी होगी. SEBI ने यह भी स्पष्ट किया कि यह राहत केवल ओपन ऑफर नियमों तक सीमित है. अधिग्रहण करने वाले पक्षों को अन्य सभी लागू नियामकीय प्रावधानों का पालन करना होगा.
अडानी ग्रीन एनर्जी भारत के नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र की प्रमुख कंपनियों में बनी हुई है और स्वच्छ ऊर्जा की बढ़ती मांग तथा ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश के बीच कंपनी लगातार अपनी उत्पादन क्षमता का विस्तार कर रही है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अडानी समूह की प्रमोटर इकाई अडानी इंफ्रा (इंडिया) ने अडानी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड (AGEL) में 1.03 फीसदी हिस्सेदारी 2,380 करोड़ रुपये में खरीद ली है. यह सौदा नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) पर ब्लॉक डील के जरिए हुआ. हालांकि, यह लेनदेन प्रमोटर समूह के भीतर हुआ है, इसलिए कंपनी की कुल प्रमोटर हिस्सेदारी में कोई बदलाव नहीं आया है.
अडानी इंफ्रा ने खरीदे 1.7 करोड़ शेयर
अडानी इंफ्रा (इंडिया) ने ब्लॉक डील के जरिए अडानी ग्रीन एनर्जी के 1.7 करोड़ इक्विटी शेयर खरीदे. यह खरीदारी औसतन 1,400 रुपये प्रति शेयर की कीमत पर की गई, जिसकी कुल वैल्यू करीब 2,380 करोड़ रुपये रही.
ये शेयर अडानी ग्रीन एनर्जी की ही एक अन्य प्रमोटर समूह इकाई Ardour Investment Holding Ltd से खरीदे गए. चूंकि यह सौदा प्रमोटर समूह के भीतर हुआ है, इसलिए इसे इंटर-प्रमोटर ट्रांसफर माना गया है.
कुल प्रमोटर हिस्सेदारी में नहीं हुआ कोई बदलाव
इस सौदे के बाद अडानी इंफ्रा की अडानी ग्रीन एनर्जी में हिस्सेदारी बढ़ गई है, जबकि Ardour Investment Holding Ltd की हिस्सेदारी समान अनुपात में घट गई है. हालांकि, चूंकि शेयर प्रमोटर समूह के भीतर ही ट्रांसफर हुए हैं, इसलिए कंपनी की कुल प्रमोटर हिस्सेदारी में कोई बदलाव नहीं हुआ है.
दो महीने में दूसरी बड़ी खरीद
यह सौदा ऐसे समय हुआ है, जब जून 2026 में भी अडानी इंफ्रा ने इसी प्रमोटर इकाई से बाजार के जरिए अडानी ग्रीन एनर्जी में 1.31 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी थी. उस समय यह सौदा 3,246 करोड़ रुपये का था.
नवीकरणीय ऊर्जा कारोबार में भरोसा बरकरार
ताजा हिस्सेदारी खरीद को अडानी ग्रीन एनर्जी के कारोबार में प्रमोटर समूह के मजबूत भरोसे के रूप में देखा जा रहा है. अडानी ग्रीन एनर्जी देश की सबसे बड़ी नवीकरणीय ऊर्जा कंपनियों में शामिल है और अडानी समूह की स्वच्छ ऊर्जा (Clean Energy) रणनीति में इसकी अहम भूमिका है. कंपनी लगातार सौर, पवन और हाइब्रिड ऊर्जा परियोजनाओं का विस्तार कर रही है, ताकि भारत के ऊर्जा परिवर्तन (Energy Transition) लक्ष्यों को समर्थन मिल सके.
निवेशकों के लिए सकारात्मक संकेत
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह ब्लॉक डील कंपनी के परिचालन या कॉर्पोरेट गवर्नेंस पर कोई खास असर नहीं डालेगी, क्योंकि यह प्रमोटर समूह के भीतर हुआ लेनदेन है. हालांकि, इस तरह की हिस्सेदारी खरीद को आमतौर पर निवेशकों के लिए सकारात्मक संकेत माना जाता है, क्योंकि इससे कंपनी के दीर्घकालिक विकास को लेकर प्रमोटरों का भरोसा झलकता है.
अडानी ग्रीन एनर्जी भारत के नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र की प्रमुख कंपनियों में बनी हुई है और स्वच्छ ऊर्जा की बढ़ती मांग तथा ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश के बीच कंपनी लगातार अपनी उत्पादन क्षमता का विस्तार कर रही है.
बेहतर रिफाइनिंग मार्जिन और वैश्विक बाजार में सप्लाई गैप का फायदा उठाते हुए भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी पकड़ और मजबूत कर ली.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव, रूस की ओर से डीजल निर्यात पर रोक और यूरोप में ईंधन की बढ़ती मांग ने भारत के पेट्रोलियम निर्यात को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है. जुलाई 2026 में देश का रिफाइंड फ्यूल एक्सपोर्ट 12 महीनों के सबसे ऊंचे स्तर पर दर्ज किया गया. बेहतर रिफाइनिंग मार्जिन और वैश्विक बाजार में सप्लाई गैप का फायदा उठाते हुए भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी पकड़ और मजबूत कर ली.
मिडिल ईस्ट संकट के बीच भारत का फ्यूल एक्सपोर्ट रिकॉर्ड स्तर पर
वैश्विक ऊर्जा बाजार में जारी उथल-पुथल के बीच भारत ने पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात में नया रिकॉर्ड बनाया है. जुलाई 2026 में देश का रिफाइंड फ्यूल एक्सपोर्ट बढ़कर 1.53 मिलियन बैरल प्रतिदिन (BPD) पहुंच गया, जो पिछले 12 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है. शिपिंग एनालिटिक्स फर्म Kpler के आंकड़ों के मुताबिक यह मात्रा पिछले एक साल के औसत से 27 फीसदी अधिक रही. 2017 में रिकॉर्ड शुरू होने के बाद किसी भी जुलाई महीने में यह सबसे ज्यादा निर्यात है.
इन वजहों से बढ़ा निर्यात
विशेषज्ञों के मुताबिक, रूस द्वारा डीजल निर्यात पर रोक, मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और यूरोप में डीजल की कमी ने भारतीय रिफाइनरियों के लिए बड़ा अवसर पैदा किया. कुछ समय के लिए ईरान-अमेरिका के बीच तनाव कम होने से कच्चे तेल की आपूर्ति भी बेहतर हुई, जिससे भारतीय रिफाइनरियां अधिक क्षमता के साथ काम कर सकीं.
Kpler के रिफाइनिंग विश्लेषक निखिल दुबे के अनुसार, डीजल पर बेहतर मार्जिन मिलने के कारण भारतीय कंपनियों ने उन बाजारों में तेजी से आपूर्ति बढ़ाई, जहां पहले रूस और पश्चिम एशिया से फ्यूल पहुंचता था.
यूरोप और तुर्की ने बढ़ाई खरीद
रूस और पश्चिम एशिया से सप्लाई प्रभावित होने के बाद यूरोप और तुर्की जैसे देशों ने भारतीय डीजल की खरीद बढ़ा दी. यूरोप में डीजल का स्टॉक कम होने और पश्चिम एशिया से सीमित आपूर्ति के कारण भारत वहां का प्रमुख सप्लायर बनकर उभरा. जुलाई के दौरान यूरोप को करीब 40 से 50 लाख बैरल और ब्राजील को लगभग 28 लाख बैरल डीजल निर्यात किया गया.
रिलायंस और नायरा ने निभाई अहम भूमिका
भारत के कुल रिफाइंड फ्यूल निर्यात में सबसे बड़ी हिस्सेदारी रिलायंस इंडस्ट्रीज़ की रही, जिसका योगदान करीब 75 फीसदी बताया गया है. वहीं, नायरा एनर्जी ने भी मेंटेनेंस कार्य पूरा होने के बाद उत्पादन बढ़ाया और अंतरराष्ट्रीय बाजार में निर्यात तेज किया. रिपोर्ट के अनुसार, नायरा ने जुलाई में रूस को भी फ्यूल की खेप भेजी.
भारत बना भरोसेमंद सप्लायर
वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत ने एक बार फिर खुद को दुनिया के भरोसेमंद फ्यूल सप्लायर के रूप में स्थापित किया है. वैश्विक बाजार में सप्लाई की कमी और बेहतर रिफाइनिंग मार्जिन का फायदा भारतीय कंपनियों को मिला, जिससे देश का पेट्रोलियम निर्यात एक साल के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गया.