Vergo की IdeaBaaz पर उपस्थिति ने भारत में कार्यस्थलों पर लंबे समय तक बैठने और खराब सीटिंग से होने वाले स्वास्थ्य एवं उत्पादकता नुकसान पर ध्यान खींचा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
एर्गोनॉमिक फर्नीचर स्टार्टअप Vergo ने Zee TV के लोकप्रिय रियलिटी शो IdeaBaaz में अपनी मौजूदगी से सभी का ध्यान खींचा है. शो के दौरान कंपनी ने भारत के कार्यस्थलों में लंबे समय तक बैठने और खराब एर्गोनॉमिक्स से जुड़ी एक गंभीर लेकिन अक्सर नजरअंदाज की जाने वाली समस्या को उजागर किया.
बैठने की आदत से करोड़ों का नुकसान
एपिसोड के दौरान Vergo ने बताया कि भारत में 56% से अधिक ऑफिस कर्मचारी रोजाना आठ घंटे से ज्यादा समय तक बैठे रहते हैं. वहीं, लगभग 72% आईटी प्रोफेशनल्स मस्कुलोस्केलेटल डिसऑर्डर (MSDs) से प्रभावित हैं, जिसके कारण गैर-हाजिरी की दर आदर्श एर्गोनॉमिक कार्यस्थलों की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक है. रिसर्च के मुताबिक, खराब सीटिंग के कारण उत्पादकता में आई कमी से भारतीय कंपनियों को हर साल 8,500 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान होता है, जबकि सिर्फ खराब नींद के चलते प्रति कर्मचारी करीब 2.1 लाख रुपये सालाना का नुकसान उठाना पड़ता है. यदि 100 कर्मचारियों के लिए सीटिंग उपयुक्त न हो, तो कुल लागत करीब 28 लाख रुपये तक पहुंच सकती है.
पारंपरिक कुर्सियां बन रही हैं दर्द की वजह
Vergo के फाउंडर ने बताया कि ज्यादातर पारंपरिक ऑफिस कुर्सियां यह मानकर डिजाइन की जाती हैं कि शरीर स्थिर रहता है. इससे रीढ़ की प्राकृतिक गति रुक जाती है और कुछ ही मिनटों में पीठ, गर्दन और कंधों में दर्द शुरू हो जाता है. आंकड़ों के अनुसार, 68% ऑफिस कर्मचारी लोअर बैक पेन, 52% गर्दन दर्द और 45% कंधे दर्द की शिकायत करते हैं, जिसका सीधा संबंध कठोर बैकरेस्ट और फिक्स्ड लंबर सपोर्ट से है.
Vergo का समाधान: शरीर के साथ चलने वाली सीटिंग
Vergo का फोकस ऐसी एडैप्टिव सीटिंग पर है जो यूजर के शरीर, कद और मूवमेंट के अनुसार खुद को ढालती है. रिसर्च बताती है कि डायनामिक पोस्टर को सपोर्ट करने वाली एक्टिव चेयर्स ध्यान से जुड़े कार्यों में गलतियों को 20% तक कम कर सकती हैं, फिर भी भारत के 77% ऑफिस अब भी स्थिर और कठोर कुर्सियों का इस्तेमाल कर रहे हैं. कंपनी ने तीन प्रमुख समाधान बताए, जिनमें एडजस्टेबल चेयर्स, माइक्रो-मूवमेंट को बढ़ावा देने वाले एक्टिव स्टूल और स्प्रिंग या इलास्टोमर तकनीक से लैस डायनामिक चेयर्स शामिल हैं.
Vergo के फाउंडर हर्ष वाधवानी ने कहा, “लोग असुविधा को सामान्य मान लेते हैं क्योंकि नुकसान धीरे-धीरे होता है. लेकिन एक बार जब कोई ऐसी सीटिंग का अनुभव करता है जो शरीर की प्राकृतिक गति को सपोर्ट करती है, तो उसकी उम्मीदें हमेशा के लिए बदल जाती हैं. हमारा लक्ष्य एर्गोनॉमिक्स को इलाज नहीं, बल्कि रोकथाम का जरिया बनाना है. कुर्सियां सिर्फ फर्नीचर नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और उत्पादकता के टूल हैं.”
एर्गोनॉमिक्स में निवेश क्यों जरूरी
शो में यह भी बताया गया कि भारत में एर्गोनॉमिक्स को अब भी लग्जरी समझा जाता है, जबकि 68% कर्मचारी मस्कुलोस्केलेटल दर्द से जूझ रहे हैं. स्टडीज के अनुसार, सही एर्गोनॉमिक निवेश पर खर्च किए गए हर एक रुपये पर कंपनियों को हेल्थकेयर में 289 रुपये और गैर-हाजिरी में 241 रुपये की बचत होती है, जो साफ तौर पर बेहतर रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट दिखाता है.
नई सोच की ओर बढ़ता भारत
Vergo ने यह भी समझाया कि कुर्सियों के डिजाइन में 90 डिग्री के कठोर हिप एंगल की जगह 120 डिग्री का एंटीरियर टिल्ट, स्प्लिट सीट पैन, इलास्टोमर लंबर सपोर्ट और डायनामिक आर्मरेस्ट व फुटरेस्ट अपनाने से ग्लूटियल प्रेशर 30% तक कम हो सकता है और रीढ़ की प्राकृतिक स्थिति बनी रहती है.
IdeaBaaz पर Vergo की प्रस्तुति दर्शकों और प्रोफेशनल्स के बीच काफी प्रभावी रही. यह साफ संकेत है कि युवा भारतीय प्रोफेशनल्स अब एर्गोनॉमिक सीटिंग को लग्जरी नहीं, बल्कि सेहत, आराम और लंबी अवधि की उत्पादकता में निवेश के रूप में देखने लगे हैं.
गोपीनाथ की टिप्पणी ने एक बार फिर इस मांग को मजबूत किया है कि वैश्विक नीति निर्माण और निर्णय लेने वाले मंचों पर अधिक विविधता सुनिश्चित की जाए.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की पूर्व प्रथम उप प्रबंध निदेशक गीता गोपीनाथ ने हाल ही में अमेरिका और चीन के बीच हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में महिलाओं की अनुपस्थिति को लेकर कड़ी प्रतिक्रिया दी है. उनकी टिप्पणी के बाद वैश्विक स्तर पर लैंगिक प्रतिनिधित्व और नेतृत्व में विविधता को लेकर नई बहस शुरू हो गई है.
केवल पुरुष प्रतिनिधियों की मौजूदगी पर जताई आपत्ति
बैठक की तस्वीरों पर प्रतिक्रिया देते हुए गोपीनाथ ने इसे “मेरिटोक्रेसी के अंत की तस्वीर” बताया. उन्होंने कहा कि ऐसे उच्चस्तरीय वैश्विक मंचों पर महिलाओं की अनुपस्थिति निर्णय लेने की प्रक्रिया में विविधता और समावेशिता की कमी को दर्शाती है. उनकी यह टिप्पणी तेजी से नीति विशेषज्ञों, अर्थशास्त्रियों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर चर्चा का विषय बन गई, जहां कई लोगों ने वैश्विक नेतृत्व में महिलाओं की कम भागीदारी पर चिंता जताई.
वैश्विक आर्थिक चुनौतियों पर हुई थी अहम बैठक
यह बैठक दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं अमेरिका और चीन के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच वैश्विक आर्थिक मुद्दों पर चर्चा के लिए आयोजित की गई थी. हालांकि, महिला प्रतिनिधित्व की अनुपस्थिति ने चर्चा का केंद्र बदल दिया और नेतृत्व संरचनाओं में मौजूद असमानताओं पर सवाल खड़े कर दिए.
विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और कॉरपोरेट नेतृत्व में धीरे-धीरे सुधार हुआ है, लेकिन भू-राजनीतिक और उच्चस्तरीय बैठकों में अब भी लैंगिक असंतुलन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है.
वैश्विक मंचों पर विविधता की मांग तेज
गोपीनाथ की टिप्पणी ने एक बार फिर इस मांग को मजबूत किया है कि वैश्विक नीति निर्माण और निर्णय लेने वाले मंचों पर अधिक विविधता सुनिश्चित की जाए. विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक सुधार, व्यापार और जलवायु वित्त जैसे विषयों पर बेहतर परिणाम के लिए समावेशी प्रतिनिधित्व जरूरी है.
‘मेरिट’ और ‘प्रतिनिधित्व’ के बीच बढ़ती बहस
इस घटना ने यह भी चर्चा तेज कर दी है कि क्या केवल मेरिटोक्रेसी पर्याप्त है या फिर समान प्रतिनिधित्व भी उतना ही जरूरी है. कई विश्लेषकों का कहना है कि विविधता न केवल नीतियों की गुणवत्ता बढ़ाती है बल्कि उनकी वैधता को भी मजबूत करती है.
वैश्विक संस्थानों पर बढ़ा दबाव
जैसे-जैसे यह मामला चर्चा में आ रहा है, सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर यह दबाव बढ़ता जा रहा है कि वे नेतृत्व स्तर पर लैंगिक समावेशन को केवल नीति तक सीमित न रखकर वास्तविक प्रतिनिधित्व में भी बदलें.
लगातार दो हफ्तों की गिरावट के बाद विदेशी मुद्रा भंडार में जोरदार वापसी हुई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश के विदेशी मुद्रा भंडार में एक बार फिर मजबूती देखने को मिली है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक, भारत के फॉरेक्स रिजर्व में 6.295 अरब डॉलर यानी करीब 60 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. लगातार दो हफ्तों की गिरावट के बाद आए इस उछाल को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है.
दिलचस्प बात यह है कि हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने, विदेशी यात्राओं को टालने और सोना-चांदी की खरीद में सावधानी बरतने की अपील की थी. माना जा रहा है कि सरकार का फोकस देश के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत बनाए रखने पर है.
696 अरब डॉलर के करीब पहुंचा फॉरेक्स रिजर्व
आरबीआई के अनुसार, 8 मई को समाप्त सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर 696.988 अरब डॉलर हो गया. इससे पहले वाले सप्ताह में इसमें 7.794 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई थी और रिजर्व घटकर 690.693 अरब डॉलर पर पहुंच गया था. इस साल फरवरी के अंत में भारत का फॉरेक्स रिजर्व 728.494 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया था. हालांकि बाद में पश्चिम एशिया संकट और रुपए पर बढ़ते दबाव के कारण इसमें गिरावट देखने को मिली. उस दौरान रुपए को स्थिर रखने के लिए आरबीआई को विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर बेचकर हस्तक्षेप करना पड़ा था.
विदेशी मुद्रा संपत्तियों में भी बढ़ोतरी
आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां यानी फॉरेन करेंसी असेट्स भी बढ़ी हैं. 8 मई को समाप्त सप्ताह में ये 562 मिलियन डॉलर बढ़कर 552.387 अरब डॉलर हो गईं. इन परिसंपत्तियों में यूरो, पाउंड और येन जैसी गैर-अमेरिकी मुद्राओं के मूल्य में बदलाव का असर भी शामिल होता है. डॉलर के मुकाबले इन मुद्राओं में मजबूती आने से विदेशी मुद्रा संपत्तियों का मूल्य बढ़ा है.
गोल्ड रिजर्व ने भी बढ़ाई ताकत
देश के गोल्ड रिजर्व में भी मजबूत इजाफा देखने को मिला है. आरबीआई के मुताबिक, सोने के भंडार का मूल्य 5.637 अरब डॉलर बढ़कर 120.853 अरब डॉलर हो गया. इसके अलावा, विशेष आहरण अधिकार (SDRs) में 84 मिलियन डॉलर की बढ़ोतरी हुई और यह 18.873 अरब डॉलर तक पहुंच गया. वहीं अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के पास भारत की आरक्षित स्थिति भी बढ़कर 4.875 अरब डॉलर हो गई.
अर्थव्यवस्था के लिए क्यों अहम है फॉरेक्स रिजर्व
फॉरेक्स रिजर्व किसी भी देश की आर्थिक मजबूती का बड़ा संकेतक माना जाता है. इससे आयात भुगतान, विदेशी कर्ज और रुपए की स्थिरता बनाए रखने में मदद मिलती है. रिजर्व मजबूत होने से वैश्विक स्तर पर निवेशकों का भरोसा भी बढ़ता है. विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में अगर विदेशी निवेश और निर्यात में सुधार जारी रहता है, तो भारत का विदेशी मुद्रा भंडार फिर से रिकॉर्ड स्तर की ओर बढ़ सकता है.
इस फंडिंग राउंड के जरिए कंपनी किफायती ट्रांसपोर्ट और रोजगार के अवसर बढ़ाने पर फोकस करेगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश की तेजी से बढ़ती राइड-हेलिंग कंपनी रैपिडो (Rapido) ने नए फंडिंग राउंड में 24 करोड़ डॉलर जुटाए हैं. इस निवेश के बाद कंपनी का मूल्यांकन बढ़कर 3 अरब डॉलर तक पहुंच गया है. नई पूंजी के दम पर रैपिडो अब बाजार में अपनी स्थिति और मजबूत करते हुए बड़ी प्रतिस्पर्धी कंपनियों उबर (Uber) और ओला (Ola) को कड़ी चुनौती देने की तैयारी में है.
प्रोसस की अगुआई में हुआ बड़ा निवेश
इस फंडिंग राउंड की अगुआई प्रोसस (Prosus) ने की. इसके अलावा वेस्टब्रिज कैपिटल (WestBridge Capital), एस्सेल (Accel) और अन्य निवेशकों ने भी इसमें भागीदारी की. यह निवेश 73 करोड़ डॉलर की प्राथमिक और द्वितीयक फंडिंग का हिस्सा है. डेटा प्लेटफॉर्म Tracxn के अनुसार, इस फंडिंग से पहले रैपिडो का मूल्यांकन करीब 2.3 अरब डॉलर था. नए निवेश के बाद कंपनी ने भारतीय मोबिलिटी सेक्टर में अपनी पकड़ और मजबूत कर ली है.
मझोले शहरों में बढ़ती मांग पर कंपनी की नजर
रैपिडो का कहना है कि उसका मुख्य उद्देश्य देश में किफायती परिवहन की कमी को दूर करना और लोगों को रोजगार के लचीले अवसर उपलब्ध कराना है. खासतौर पर मझोले शहरों और छोटे बाजारों में तेजी से बढ़ती मांग को देखते हुए कंपनी अपने विस्तार की रणनीति पर काम कर रही है. नई पूंजी का इस्तेमाल तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में परिचालन विस्तार, सप्लाई नेटवर्क मजबूत करने और बड़े महानगरों में अपनी मुख्य सेवाओं को विस्तार देने में किया जाएगा.
‘राइड ही नहीं, रोजगार भी हमारी प्राथमिकता’
रैपिडो के सह-संस्थापक अरविंद सांका ने कहा कि कंपनी हमेशा से परिवहन को केवल राइड तक सीमित नहीं मानती, बल्कि इसे लोगों की आजीविका से भी जोड़कर देखती है. उन्होंने कहा. “हमारा मानना है कि परिवहन का असली पैमाना सिर्फ पूरी हुई राइड नहीं, बल्कि उससे मिलने वाली कमाई और रोजगार के अवसर भी हैं. यह निवेश हमें दोनों क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ने में मदद करेगा.”
सांका ने आगे कहा कि कंपनी उन बाजारों में अपनी मौजूदगी मजबूत करेगी जहां मांग तो अधिक है, लेकिन सप्लाई अभी बिखरी हुई है. इसके साथ ही रैपिडो तकनीक को और बेहतर बनाने तथा अपनी मल्टी-मॉडल सेवाओं को तेज गति से विस्तार देने पर ध्यान देगी.
भारतीय डिजिटल अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा बन रहा परिवहन
आशुतोष शर्मा ने कहा कि परिवहन अब देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था का बुनियादी आधार बनता जा रहा है. उनके मुताबिक, रैपिडो बड़े स्तर पर पहुंच और रोजगार जैसी वास्तविक समस्याओं का समाधान कर रही है और इसी वजह से निवेशकों का कंपनी पर भरोसा लगातार बढ़ रहा है.
उपभोक्ताओं के बीच मजबूत हो रही रैपिडो की पकड़
सुमीर चड्ढा ने कहा कि किफायती सेवाएं, बेहतर दक्षता और ड्राइवरों के सशक्तिकरण पर रैपिडो का जोर उपभोक्ताओं के साथ मजबूत जुड़ाव बना रहा है. उन्होंने कहा कि कंपनी जिस तेजी से अपने प्लेटफॉर्म का विस्तार कर रही है, वह भारतीय मोबिलिटी सेक्टर में नए विकास चरण की शुरुआत का संकेत है.
भू-राजनीतिक तनाव, एयरस्पेस प्रतिबंध और बढ़ती ईंधन लागत ने टाटा समूह के स्वामित्व वाली एयरलाइन एयर इंडिया के पुनर्गठन प्रयासों पर भारी दबाव डाला है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
एयर इंडिया (Air India) ने वित्त वर्ष 2026 (FY26) में लगभग 2.8 अरब अमेरिकी डॉलर का भारी वार्षिक घाटा दर्ज किया है, जो कंपनी के सामने मौजूद परिचालन और वैश्विक चुनौतियों की गंभीरता को दर्शाता है. यह जानकारी सिंगापुर एयरलाइन्स (Singapore Airlines) द्वारा साझा की गई, जिसके पास एयर इंडिया में 25 प्रतिशत हिस्सेदारी है. कंपनी के अनुसार, वित्त वर्ष मार्च 2026 तक एयर इंडिया को 3.56 अरब सिंगापुर डॉलर का नुकसान हुआ. यह घाटा निजीकरण के बाद एयर इंडिया के सबसे बड़े नुकसान में से एक माना जा रहा है और इसके चल रहे बहु-वर्षीय टर्नअराउंड प्लान की जटिलताओं को उजागर करता है.
परिचालन दबाव में तेजी
एयर इंडिया का प्रदर्शन कई उद्योग-स्तरीय समस्याओं से प्रभावित हुआ है, जिनमें सप्लाई चेन बाधाएं, एयरस्पेस प्रतिबंध और जेट ईंधन की ऊंची कीमतें शामिल हैं. भू-राजनीतिक तनाव, खासकर ईरान संघर्ष और पाकिस्तान द्वारा भारतीय विमानन कंपनियों के लिए अपने एयरस्पेस को बंद रखने के कारण एयरलाइंस को लंबे रूट अपनाने पड़े हैं. इससे ईंधन की खपत और परिचालन लागत में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. इन परिस्थितियों के कारण अंतरराष्ट्रीय उड़ानों की क्षमता में भी कटौती करनी पड़ी है, जिससे कई विदेशी रूट्स को सीमित या अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा है.
टर्नअराउंड रणनीति पर असर
बढ़ता घाटा एयर इंडिया के पुनर्गठन रोडमैप के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, जिसमें बेड़े का आधुनिकीकरण, नेटवर्क विस्तार और सेवा सुधार शामिल हैं. ऑडिटर्स ने सिंगापुर एयरलाइन्स के निवेश को लेकर “मूल्यह्रास (impairment)” के संकेत भी बताए हैं और मौजूदा अनिश्चितता व चुनौतीपूर्ण परिचालन परिस्थितियों की ओर इशारा किया है. हालांकि वित्तीय दबाव के बावजूद सिंगापुर एयरलाइंस ने एयर इंडिया के साथ अपनी दीर्घकालिक साझेदारी पर भरोसा दोहराया है और भारत को तेजी से बढ़ते विमानन बाजारों में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक केंद्र बताया है.
प्रतिस्पर्धा में बढ़ोतरी
एयर इंडिया की सीमित क्षमता का फायदा वैश्विक एयरलाइंस जैसे Lufthansa और Cathay Pacific उठा रही हैं. इससे प्रमुख अंतरराष्ट्रीय रूट्स पर प्रतिस्पर्धा और तेज हो गई है. साथ ही, कंपनी को विमान डिलीवरी में देरी, मेंटेनेंस बाधाएं और सप्लाई चेन समस्याओं का भी सामना करना पड़ रहा है, जिससे विस्तार की गति प्रभावित हुई है.
आने वाले समय में उच्च ईंधन लागत और भू-राजनीतिक अनिश्चितता लाभप्रदता पर दबाव बनाए रख सकती है. हालांकि एयर इंडिया ने बेड़े के उन्नयन, ग्राहक अनुभव और परिचालन दक्षता में सुधार किया है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि स्थायी मुनाफे के लिए बाहरी परिस्थितियों का स्थिर होना और टर्नअराउंड योजना का प्रभावी क्रियान्वयन आवश्यक होगा.
एयर इंडिया का अगला वित्तीय प्रदर्शन यह तय करेगा कि क्या वह वैश्विक विमानन क्षेत्र में अपनी खोई हुई बाजार हिस्सेदारी को फिर से हासिल कर पाएगी या नहीं.
रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2017-18 से अब तक केवल 17 भारतीय शहरों ने म्यूनिसिपल बॉन्ड जारी किए हैं और कुल 45.4 अरब रुपये जुटाए हैं. इससे यह संकेत मिलता है कि इस क्षेत्र में अभी काफी संभावनाएं मौजूद हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में तेजी से बढ़ते शहरीकरण और आर्थिक विकास को समर्थन देने के लिए वर्ष 2037 तक शहरी बुनियादी ढांचे में करीब 80 लाख करोड़ रुपये के निवेश की आवश्यकता होगी. यह बात ब्रिकवर्क रेटिंग्स (Brickwork Ratings) की एक नई रिपोर्ट में कही गई है. रिपोर्ट के अनुसार, अगर शहरी वित्तपोषण के लिए नया बाजार आधारित मॉडल अपनाया जाता है, तो अगले पांच वर्षों में करीब 4 लाख करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित किया जा सकता है.
शहरी क्षेत्रों का GDP में बढ़ेगा योगदान
“फ्रॉम ग्रांट्स टू मार्केट्स. हाउ अर्बन चैलेंज फंड (UCF) विल रीशेप अर्बन फाइनेंस इन इंडिया” शीर्षक वाली रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2036 तक भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में शहरी क्षेत्रों की हिस्सेदारी लगभग 70 प्रतिशत तक पहुंच सकती है. ऐसे में टिकाऊ शहरी वित्तपोषण देश की प्राथमिकता बन जाएगा.
Urban Challenge Fund से बदलेगा फंडिंग मॉडल
ब्रिकवर्क रेटिंग्स के अनुसार, केंद्र सरकार समर्थित 1 लाख करोड़ रुपये का अर्बन चैलेंज फंड (UCF) शहरी विकास के पारंपरिक अनुदान आधारित मॉडल से हटकर बाजार से जुड़े वित्तपोषण की दिशा में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है.
इस ढांचे के तहत शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) को किसी भी परियोजना के लिए केंद्र सरकार की सहायता पाने से पहले कम से कम 50 प्रतिशत फंडिंग बाजार स्रोतों से जुटानी होगी. इसमें म्यूनिसिपल बॉन्ड, बैंक लोन और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) जैसे विकल्प शामिल होंगे.
रिपोर्ट के मुताबिक, परियोजना लागत का 25 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार देगी, जबकि बाकी राशि राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों को जुटानी होगी.
म्यूनिसिपल बॉन्ड मार्केट को मिलेगा बढ़ावा
ब्रिकवर्क रेटिंग्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मनु सहगल ने कहा कि UCF भारत के म्यूनिसिपल फाइनेंस इकोसिस्टम को मजबूत कर सकता है और खासतौर पर म्यूनिसिपल बॉन्ड मार्केट में भागीदारी बढ़ाने में मदद करेगा.
रिपोर्ट के अनुसार, यह मॉडल अगले पांच वर्षों में लगभग 4 लाख करोड़ रुपये के शहरी निवेश को बढ़ावा दे सकता है. साथ ही इससे स्थानीय सरकारों में वित्तीय अनुशासन, पारदर्शिता और क्रेडिट योग्यता में सुधार होगा.
छोटे शहरों के सामने बनी रहेंगी चुनौतियां
हालांकि रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि छोटे शहरों में संस्थागत क्षमता की कमी के कारण इस योजना के क्रियान्वयन में चुनौतियां बनी रह सकती हैं. खासतौर पर टियर-2 और टियर-3 शहरों के लिए क्रेडिट रेटिंग की भूमिका बेहद अहम हो जाएगी, क्योंकि उन्हें लंबी अवधि के लिए पूंजी बाजार तक पहुंच बनानी होगी. रिपोर्ट में कहा गया है कि केवल बैंक लोन पर निर्भर रहने से शहर राज्य सरकार की गारंटी पर निर्भर बने रहते हैं और फंडिंग के स्रोतों में विविधता नहीं आ पाती.
अब तक केवल 17 शहरों ने जारी किए म्यूनिसिपल बॉन्ड
रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2017-18 से अब तक केवल 17 भारतीय शहरों ने म्यूनिसिपल बॉन्ड जारी किए हैं और कुल 45.4 अरब रुपये जुटाए हैं. इससे यह संकेत मिलता है कि इस क्षेत्र में अभी काफी संभावनाएं मौजूद हैं.
ब्रिकवर्क रेटिंग्स ने कहा कि हाल के वर्षों में म्यूनिसिपल बॉन्ड में निवेशकों का भरोसा बढ़ा है. RBI की रेपो रेट के मुकाबले यील्ड स्प्रेड घटकर वित्त वर्ष 2026 में करीब 155 बेसिस पॉइंट रह गया है, जबकि वित्त वर्ष 2020 में यह लगभग 480 बेसिस पॉइंट था. इससे जोखिम को लेकर निवेशकों की चिंता में कमी आई है.
छोटे शहरों और पूर्वोत्तर राज्यों में अवसर
रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के 4,223 छोटे शहरी निकायों और पूर्वोत्तर राज्यों के शहरों में बाजार आधारित कर्ज की पहुंच बेहद सीमित है. ऐसे में यहां विकास की बड़ी संभावना मौजूद है. UCF के तहत 5,000 करोड़ रुपये की क्रेडिट रिपेमेंट गारंटी स्कीम निवेशकों का भरोसा बढ़ाने में मदद करेगी. इसके जरिए छोटे स्थानीय निकायों को पहली बार मिलने वाले कर्ज पर गारंटी दी जाएगी, जिससे निवेश योग्य शहरी संस्थाओं की संख्या बढ़ सकती है.
ब्रिकवर्क रेटिंग्स अब तक 105 शहरी स्थानीय निकायों की रेटिंग कर चुकी है, जिनमें सबसे अधिक झारखंड और उत्तर प्रदेश के निकाय शामिल हैं.
शासन व्यवस्था और सुधार सबसे बड़ी चुनौती
रिपोर्ट में कई संरचनात्मक चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिलाया गया है. इनमें कमजोर प्रशासनिक क्षमता, सुधारों को लागू करने में देरी, संपत्ति कर और यूजर चार्ज सुधारों से जुड़ी राजनीतिक संवेदनशीलता तथा वित्तीय रिपोर्टिंग मानकों की कमियां शामिल हैं.
इसके अलावा, परियोजनाओं में देरी होने से केंद्र और राज्यों से मिलने वाली फंडिंग प्रभावित हो सकती है. खराब डेटा गुणवत्ता के कारण नगर निकायों की क्रेडिट रेटिंग प्रक्रिया भी जटिल हो सकती है.
रिपोर्ट के मुताबिक, UCF की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि शहर अपनी प्रशासनिक व्यवस्था को कितना मजबूत बनाते हैं, ऑडिटेड वित्तीय खुलासों में कितना सुधार करते हैं और दीर्घकालिक कर्ज चुकाने के लिए टिकाऊ राजस्व स्रोत विकसित कर पाते हैं.
प्रस्तावित समझौते के तहत गौतम अडानी 6 मिलियन डॉलर का भुगतान करेंगे, जबकि सागर अडानी 12 मिलियन डॉलर का भुगतान करेंगे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
संयुक्त राज्य अमेरिका की सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) ने गौतम अडानी और सागर अडानी के खिलाफ कुल 18 मिलियन डॉलर के सिविल जुर्माने का प्रस्ताव दिया है, जो अडानी ग्रीन एनर्जी के 2021 के बॉन्ड इश्यू से जुड़े कथित भ्रामक खुलासों से संबंधित है. यह प्रस्ताव 14 मई को यूएस डिस्ट्रिक्ट कोर्ट फॉर द ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट ऑफ न्यूयॉर्क में दायर सहमति आदेशों का हिस्सा है और अब अदालत की मंजूरी का इंतजार कर रहा है.
प्रस्तावित समझौते के तहत गौतम अडानी 6 मिलियन डॉलर का भुगतान करेंगे, जबकि सागर अडानी 12 मिलियन डॉलर का भुगतान करेंगे. दोनों ने आरोपों को स्वीकार या अस्वीकार किए बिना जुर्माने पर सहमति दी है. यह समझौता केवल सिविल देनदारी से संबंधित है और किसी भी आपराधिक मामले पर लागू नहीं होता. BW Businessworld ने इस विकास की सबसे पहले रिपोर्ट 06 मई को की थी.
SEC की शिकायत सितंबर 2021 के 750 मिलियन डॉलर के बॉन्ड इश्यू से जुड़ी है, जिसके तहत अमेरिका के निवेशकों से 175 मिलियन डॉलर से अधिक जुटाए गए थे. रेगुलेटर का आरोप है कि इस इश्यू से जुड़े दस्तावेजों में एंटी-ब्राइबरी कंप्लायंस को लेकर दिए गए बयान सटीक नहीं थे.
SEC के अनुसार, कथित योजना में भारतीय सरकारी अधिकारियों को बड़ी रकम देने या देने के वादे शामिल थे. यह ऊर्जा खरीद समझौतों को बाजार से अधिक कीमत पर हासिल करने से जुड़ा था, जिससे कंपनी को फायदा हुआ. रेगुलेटर का दावा है कि यह गतिविधि उस समय भी जारी रही जब बॉन्ड ऑफरिंग के दस्तावेज निवेशकों को दिए जा रहे थे.
इस मामले में Securities Act की धारा 17(a) और Section 10(b) तथा Rule 10b-5 जैसे प्रमुख एंटी-फ्रॉड प्रावधान लागू किए गए हैं. प्रस्तावित आदेश के अनुसार जुर्माने की राशि अमेरिकी ट्रेजरी में जमा की जाएगी. साथ ही अडानी समूह को इन जुर्मानों की प्रतिपूर्ति या टैक्स लाभ लेने से भी रोका जाएगा.
रॉबर्ट जे गिफरा जूनियर इस मामले में गौतम अडानी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जबकि टिमोथी डी सिनी सागर अडानी की ओर से पेश हो रहे हैं.
यूएस डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस नवंबर 2024 में दायर किए गए फ्रॉड आरोपों को वापस लेने पर विचार कर रहा है. अभियोजकों का आरोप था कि गौतम अडानी ने भारत में एक बड़े सोलर पावर प्रोजेक्ट के लिए मंजूरी हासिल करने हेतु लगभग 265 मिलियन डॉलर की रिश्वत देने पर सहमति जताई थी.
यह संभावित कदम गिफरा द्वारा अमेरिकी अधिकारियों को दिए गए तर्कों के बाद आया है. उन्होंने कहा कि इस मामले में अधिकार क्षेत्र और पर्याप्त सबूतों की कमी है. उन्होंने यह भी कहा कि चल रही कानूनी कार्यवाही अमेरिका में अडानी के प्रस्तावित 10 अरब डॉलर के निवेश को प्रभावित कर सकती है, जिसमें रोजगार सृजन की प्रतिबद्धता भी शामिल है.
अभी तक यह आधिकारिक रूप से पुष्टि नहीं हुई है कि आपराधिक मामला वापस लिया जाएगा या नहीं.
अडानी समूह ने सभी आरोपों से इनकार किया है और उन्हें निराधार बताया है. बचाव पक्ष का यह भी तर्क है कि SEC की कार्रवाई क्षेत्राधिकार से बाहर है, क्योंकि कथित गतिविधियां भारत में हुई थीं और बॉन्ड अमेरिका के किसी एक्सचेंज पर ट्रेड नहीं किए गए थे.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
भारत और UAE ने रणनीतिक रक्षा साझेदारी को मजबूत बनाने पर सहमति जताई. दोनों देशों के बीच सुरक्षा और सैन्य सहयोग को नई दिशा देने के लिए व्यापक ढांचा तैयार किया जाएगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संयुक्त अरब अमीरात (UAE) दौरे के दौरान भारत और UAE के बीच रक्षा सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास से जुड़े कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर हुए. इस दौरान UAE ने भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर और वित्तीय संस्थानों में 5 अरब डॉलर निवेश करने की घोषणा भी की. ये समझौते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और UAE के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की मौजूदगी में हुए. पीएम मोदी का यह दौरा उनके पांच देशों के विदेश दौरे का पहला पड़ाव है.
रक्षा और ऊर्जा सुरक्षा पर बढ़ा सहयोग
भारत और UAE ने रणनीतिक रक्षा साझेदारी को मजबूत बनाने पर सहमति जताई. दोनों देशों के बीच सुरक्षा और सैन्य सहयोग को नई दिशा देने के लिए व्यापक ढांचा तैयार किया जाएगा. इसके साथ ही रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व और LPG सप्लाई से जुड़े समझौतों पर भी हस्ताक्षर हुए. माना जा रहा है कि इन समझौतों से भारत की ऊर्जा सुरक्षा को बड़ा सहारा मिलेगा और वैश्विक संकट के समय सप्लाई चेन को स्थिर रखने में मदद मिलेगी.
गुजरात में बनेगा शिप रिपेयर क्लस्टर
समुद्री इंफ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक सहयोग को बढ़ावा देने के लिए गुजरात के वाडिनार में शिप रिपेयर क्लस्टर स्थापित करने पर सहमति बनी. इसके लिए दोनों देशों के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) साइन किया गया. इसके अलावा UAE ने भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर के साथ RBL बैंक और सम्मान कैपिटल में निवेश की घोषणा की.
क्षेत्रीय तनाव पर बोले पीएम मोदी
UAE राष्ट्रपति के साथ द्विपक्षीय बैठक में प्रधानमंत्री मोदी ने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव पर चिंता जताई. उन्होंने कहा कि किसी भी विवाद का समाधान बातचीत और कूटनीति के जरिए ही संभव है. पीएम मोदी ने मुश्किल हालात में UAE नेतृत्व के धैर्य और संतुलन की सराहना भी की.
उन्होंने UAE पर हुए हमलों की निंदा करते हुए कहा कि भारत हर परिस्थिति में UAE के साथ मजबूती से खड़ा है. साथ ही UAE में रह रहे भारतीय समुदाय का परिवार की तरह ध्यान रखने के लिए वहां की सरकार का धन्यवाद भी किया.
होर्मुज जलडमरूमध्य को बताया अहम
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य के महत्व को रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि इस रणनीतिक समुद्री मार्ग का खुला और सुरक्षित रहना बेहद जरूरी है. पीएम मोदी ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों के पालन और समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया.
पांच देशों के दौरे पर हैं पीएम मोदी
15 से 20 मई तक चलने वाले इस विदेश दौरे में प्रधानमंत्री मोदी UAE के अलावा नीदरलैंड, स्वीडन और नॉर्वे सहित कई देशों का दौरा करेंगे. इस दौरान व्यापार, ग्रीन एनर्जी, टेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सप्लाई चेन जैसे अहम वैश्विक मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है.
हाल ही में जारी कई रिपोर्ट्स के अनुसार, भू-राजनीतिक तनाव से तेल और सोने की कीमतें बढ़ रही हैं, जिससे आयात दबाव बढ़ता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत की अर्थव्यवस्था इस समय एक बड़े व्यवहारिक बदलाव के दौर से गुजर रही है. सरकार की नीतिगत अपील, सोने के बढ़ते आयात, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव और बैंकों के सतर्क रुख से संकेत मिल रहे हैं कि देश वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ती आयात निर्भरता के बीच आर्थिक संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है.
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्नेर मोदी ने लोगों से विदेशों में “डेस्टिनेशन वेडिंग” आयोजित करने से बचने और देश के भीतर ही शादी समारोह आयोजित करने की अपील की थी. गुजरात में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि अमीर भारतीयों के बीच विदेशों में छुट्टियां मनाने और शादियां करने का चलन तेजी से बढ़ा है, जिससे विदेशी मुद्रा का बड़ा बहिर्गमन होता है. उन्होंने कहा कि देश के पर्यटन स्थलों को भी ऐसे आयोजनों के लिए चुना जा सकता है.
बढ़ते आयात दबाव के बीच सरकार की चिंता
रुबिक्स डेटा साइसेंज (Rubix Data Sciences) की एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रधानमंत्री की हालिया अपील, ईंधन की बचत, गैर-जरूरी विदेशी यात्रा कम करने, सोने की खरीद सीमित रखने और आयातित वस्तुओं पर निर्भरता घटाने को बाहरी आर्थिक दबावों के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है.
रिपोर्ट के अनुसार कच्चा तेल, सोना, खाद्य तेल और उर्वरकों जैसे जरूरी आयात FY26 में बढ़कर 240 अरब डॉलर से ज्यादा हो गए, जबकि FY25 में यह आंकड़ा 222 अरब डॉलर था. ये भारत के कुल आयात का लगभग 31 प्रतिशत हिस्सा हैं. कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचने और भारत की 88 प्रतिशत तेल आयात निर्भरता के कारण आयात बिल लगातार बढ़ रहा है.
इसी दौरान भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 27 फरवरी के 728 अरब डॉलर से घटकर 1 मई तक 690.7 अरब डॉलर रह गया, यानी करीब दो महीनों में 5 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई.
सोने का आयात बना चिंता का कारण
रिपोर्ट में कहा गया है कि केवल FY26 में ही भारत का गोल्ड इंपोर्ट लगभग 72 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो सालाना आधार पर 24 प्रतिशत ज्यादा है. इससे चालू खाते के घाटे (CAD) पर दबाव बढ़ा है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने 2026 में भारत का CAD लगभग 84.5 अरब डॉलर यानी GDP के करीब 2 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है.
SBI रिपोर्ट: कीमत बढ़ी, लेकिन खरीद मात्रा घटी
भारीतय स्टेट बैंक (State Bank of India) की रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार सोने के आयात में मूल्य और मात्रा के बीच बड़ा अंतर देखने को मिला है. FY25 में जहां गोल्ड इंपोर्ट का मूल्य 57.9 अरब डॉलर था, वहीं FY26 में यह बढ़कर 72.4 अरब डॉलर पहुंच गया. हालांकि आयात की मात्रा लगातार दूसरे साल करीब 5 प्रतिशत घटी है. इससे संकेत मिलता है कि आयात बिल बढ़ने की मुख्य वजह सोने की ऊंची कीमतें हैं, न कि खरीद की मात्रा.
एसबीआई ने यह भी कहा कि भारत में आयातित सोने का करीब 38 प्रतिशत हिस्सा ज्वेलरी के रूप में दोबारा निर्यात कर दिया जाता है, जिससे कुछ हद तक दबाव कम होता है.
गोल्ड ड्यूटी बढ़ाने के असर पर चेतावनी
हाल ही में सरकार ने सोने पर कस्टम ड्यूटी 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दी है. SBI ने चेतावनी दी है कि इतिहास बताता है कि ऐसी बढ़ोतरी से घरेलू और विदेशी बाजारों के दामों में अंतर बढ़ता है, जिससे तस्करी और ग्रे मार्केट इंपोर्ट को बढ़ावा मिल सकता है.
गहनों से निवेश की ओर बढ़ रहा झुकाव
केयरएज (CareEdge Ratings) की रिपोर्ट बताती है कि भारत में सोने की खपत का पैटर्न तेजी से बदल रहा है. पहले जहां कुल गोल्ड डिमांड में ज्वेलरी की हिस्सेदारी करीब 70 प्रतिशत रहती थी, वहीं CY25 में यह घटकर 60 प्रतिशत से नीचे आ गई.
दूसरी ओर ETF, गोल्ड बार और गोल्ड कॉइन जैसे निवेश माध्यमों की मांग बढ़ी है और निवेश श्रेणी की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गई है.
रिपोर्ट के मुताबिक रिकॉर्ड कीमतों के बावजूद भारत में ज्वेलरी खरीद मूल्य के लिहाज से 10 प्रतिशत बढ़कर 4.8 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई, लेकिन खरीद की मात्रा में 15 प्रतिशत गिरावट दर्ज हुई. इससे साफ है कि लोग अब हल्के और कम कैरेट वाले आभूषणों की ओर बढ़ रहे हैं.
गोल्ड लोन और बैंकिंग सेक्टर में भी बदलाव
CareEdge ने कहा कि गोल्ड लोन सिक्योरिटाइजेशन में तेज उछाल आया है. H2FY26 में इसका आकार बढ़कर 18,500 करोड़ रुपये हो गया, जबकि FY25 में यह 5,000 करोड़ रुपये था. इससे संकेत मिलता है कि सोना अब केवल उपभोग की वस्तु नहीं रह गया, बल्कि वित्तीय संपत्ति और कर्ज के लिए गारंटी के रूप में भी इस्तेमाल बढ़ रहा है.
हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि बैंकिंग सिस्टम फिलहाल मजबूत स्थिति में है. दिसंबर 2025 तक बैंकों का ग्रॉस NPA करीब 1.9 प्रतिशत और नेट NPA ऐतिहासिक निचले स्तर 0.41 प्रतिशत पर रहा.
RBI पर बढ़ा मुद्रा स्थिरता का दबाव
रिपोर्ट के अनुसार विदेशी पूंजी प्रवाह कमजोर रहने और वैश्विक तनाव बढ़ने से रुपये पर लगातार दबाव बना हुआ है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को स्पॉट और फॉरवर्ड मार्केट दोनों में सक्रिय हस्तक्षेप करना पड़ा है.
CareEdge का अनुमान है कि अगर कच्चा तेल औसतन 90 डॉलर प्रति बैरल पर बना रहता है तो FY27 में भारत का CAD बढ़कर GDP के 2.1 प्रतिशत तक पहुंच सकता है. हालांकि मजबूत सर्विस एक्सपोर्ट के कारण इसे फिलहाल नियंत्रण में माना जा रहा है.
बदल रहा है भारतीय परिवारों का आर्थिक व्यवहार
तीनों रिपोर्टों को मिलाकर देखें तो एक स्पष्ट तस्वीर सामने आती है, भू-राजनीतिक तनाव से तेल और सोने की कीमतें बढ़ रही हैं, जिससे आयात दबाव बढ़ता है. सरकार लोगों की खर्च और निवेश आदतों को प्रभावित करने की कोशिश कर रही है, जबकि उपभोक्ता गहनों की बजाय निवेश वाले सोने की ओर बढ़ रहे हैं.
इसके साथ ही बैंकिंग सिस्टम और RBI भी वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए सतर्क रुख अपना रहे हैं. यानी भारत में अब घरेलू खर्च, निवेश और सरकारी नीति के बीच गहरा संबंध बनता जा रहा है, जो सीधे देश के बाहरी आर्थिक संतुलन से जुड़ गया है.
तिमाही नतीजों के बाद कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने शेयरधारकों की मंजूरी के अधीन ₹3 प्रति शेयर के अंतिम डिविडेंड की सिफारिश की है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल्स लिमिटेड (TMPV) के मार्च तिमाही नतीजों के बाद कंपनी एक बार फिर बाजार में चर्चा का केंद्र बन गई है. घरेलू बाजार में SUV और इलेक्ट्रिक वाहनों की मजबूत मांग, रिकॉर्ड बिक्री और जैगुआर लैंड रोवर (JLR) कारोबार में सुधार ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है. इसी सकारात्मक धारणा के चलते शुक्रवार को कंपनी का शेयर 5 प्रतिशत से ज्यादा उछलकर 356.60 रुपये तक पहुंच गया.
Q4 FY26 में मजबूत राजस्व वृद्धि और कैश फ्लो में सुधार
Q4 FY26 में TMPVL का कंसोलिडेटेड राजस्व ₹105.4 हजार करोड़ रहा, जो 7.2% की वृद्धि को दर्शाता है. इस दौरान EBIT ₹8.9 हजार करोड़ दर्ज किया गया. कंपनी के प्रदर्शन में सबसे बड़ा योगदान JLR के उत्पादन के सामान्य होने और घरेलू बाजार में रिकॉर्ड वॉल्यूम ग्रोथ से मिला. इसी वजह से तिमाही-दर-तिमाही आधार पर प्रदर्शन में स्पष्ट सुधार देखने को मिला. इसके साथ ही कंपनी ने Q4 में ₹11.4 हजार करोड़ का मजबूत फ्री कैश फ्लो भी दर्ज किया, जो ऑपरेशनल स्थिरता में सुधार का संकेत है.
वैश्विक चुनौतियों के बीच स्थिर वित्तीय प्रदर्शन
पूरे वित्तीय वर्ष FY26 में TMPVL का कुल राजस्व ₹335.6 हजार करोड़ रहा. हालांकि, वर्ष के दौरान EBITDA मार्जिन 6.8% और EBIT मार्जिन 1.1% पर रहा. इस दौरान कंपनी की वैश्विक सहायक कंपनी JLR को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जिनमें साइबर घटना, टैरिफ दबाव, चीन लग्जरी टैक्स, VME दबाव और कमोडिटी लागत में वृद्धि शामिल रही. इन सभी कारकों ने मार्जिन पर दबाव डाला.
डिविडेंट की घोषणा़
तिमाही नतीजों के बाद कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने शेयरधारकों की मंजूरी के अधीन ₹3 प्रति शेयर के अंतिम डिविडेंड की सिफारिश की है.
PLI स्कीम से मिला अतिरिक्त सपोर्ट
सरकार की PLI स्कीम से भी कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन को सहारा मिला है. मार्च तिमाही में टाटा मोटर्स को करीब 4.7 अरब रुपये का PLI इंसेंटिव मिला, जबकि पूरे FY26 में यह आंकड़ा 10.5 अरब रुपये रहा. बिक्री बढ़ने के साथ प्रति यूनिट लागत कम होने से कंपनी को ऑपरेटिंग लीवरेज का फायदा मिला, जिससे लाभप्रदता में सुधार देखने को मिला.
JLR कारोबार में रिकवरी के संकेत
Jaguar Land Rover (JLR) कारोबार में भी धीरे-धीरे सुधार देखने को मिला है. पिछले साल साइबर अटैक से जुड़े व्यवधानों ने प्रदर्शन पर असर डाला था, लेकिन अब स्थिति सामान्य होती दिख रही है. मार्च तिमाही में JLR की आय करीब 6.9 अरब पाउंड रही. हालांकि टैरिफ लागत, करेंसी दबाव और बढ़ते खर्च अभी भी चुनौती बने हुए हैं, लेकिन बेहतर प्रोडक्ट मिक्स, लागत नियंत्रण और नई लॉन्चिंग्स से कारोबार को समर्थन मिल रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर JLR में सुधार का यह रुझान जारी रहता है, तो आने वाले समय में कंपनी की कमाई और मजबूत हो सकती है.
दो हिस्सों में बंटा रहा FY26
TMPVL के चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर धिमान गुप्ता ने कहा कि FY26 दो अलग-अलग चरणों वाला वर्ष रहा. उन्होंने बताया कि घरेलू कारोबार में GST 2.0 के बाद मजबूत मांग देखी गई. जबकि JLR को टैरिफ और साइबर घटना जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा. Q4 में सभी वित्तीय संकेतकों में सुधार JLR के ऑपरेशन सामान्य होने और घरेलू बाजार की मजबूती के कारण हुआ.
उद्योग जगत के आंकड़ों के अनुसार टियर-2 शहरों में ईवी की पैठ करीब 10.7% और टियर-3 शहरों में लगभग 8.7% तक पहुंच चुकी है, जो टियर-1 शहरों के मुकाबले बहुत पीछे नहीं है.
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रितु राणा
पश्चिम एशिया में गहराते भू-राजनीतिक तनाव और ईंधन आपूर्ति को लेकर बढ़ती अनिश्चितताओं के बीच आज देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी ने आम आदमी की चिंता और बढ़ा दी है. इसी के साथ प्रधानमंत्री की ओर से इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) को अपनाने की अपील भी चर्चा में है. महंगे होते ईंधन और ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती के बीच भारत में वैकल्पिक मोबिलिटी की ओर रुझान तेजी से बढ़ रहा है. इसका असर अब साफ दिख रहा है, जहां EV की मांग मेट्रो शहरों से आगे बढ़कर टियर-2 और टियर-3 शहरों तक भी तेजी से फैल रही है. हाल में उत्तर पूर्वी दिल्ली के सांसद मनोज तिवारी ने भी सोशल मीडिया एक वीडियो शेयर करके यह जानकारी दी कि प्रधानमंत्री की अपील पर उन्होंने भी पेट्रोल की गाड़ी से अब इलेक्ट्रिक गाड़ी पर स्विच कर लिया है. साथ ही उन्होंने अन्य लोगों से भी यह अपील करते हुए कहा कि अगर वह भी इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रयोग करें.
EV की ग्रोथ अब मेट्रो से आगे छोटे शहरों में पहुंची
भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की ग्रोथ अब सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं है. टियर-2 और टियर-3 शहर तेजी से ईवी अपनाने के नए केंद्र बनते जा रहे हैं. इसकी मुख्य वजह ई-कॉमर्स, लास्ट-माइल डिलीवरी, इंटरसिटी लॉजिस्टिक्स और स्थानीय कारोबारों की बढ़ती जरूरतें हैं, जहां लागत कम करना और ऑपरेशनल एफिशिएंसी बढ़ाना प्राथमिकता बन गया है.
ड्राइवीएन (Drivn) की को-फाउंडर और सीबीओ अल्पना जैन कहती हैं, टियर-2 और टियर-3 शहर अब सिर्फ कंज्यूमर मार्केट नहीं रहे, बल्कि कमर्शियल मोबिलिटी के असली ग्रोथ इंजन बन चुके हैं. यहां बिजनेस ऐसे समाधान चाहते हैं जो बिना भारी शुरुआती निवेश के स्केलेबिलिटी और एफिशिएंसी दोनों दे सकें. उन्होंने बताया कि ई-कॉमर्स और डिलीवरी इकोसिस्टम ने इन शहरों में EV को एक विकल्प से बढ़ाकर जरूरत बना दिया है. अब यह ट्रेंड नहीं, बल्कि स्ट्रक्चरल शिफ्ट है.
छोटे शहरों में लागत सबसे बड़ा ड्राइवर
विशेषज्ञों का मानना है कि छोटे शहरों में EV अपनाने का सबसे बड़ा कारण लागत है. यहां उपभोक्ता लंबे समय की बचत और कम रनिंग कॉस्ट को प्राथमिकता देते हैं. मैक्सवोल्ट एनर्जी (MaxVolt Energy Industries Ltd) के को-फाउंडर व सीएमओ मुकेश गुप्ता कहते हैं, छोटे शहरों में EV को लेकर सोच बेहद व्यावहारिक है. लोग दिखावे से ज्यादा इस बात पर ध्यान देते हैं कि महीने का खर्च कितना कम हो सकता है. उन्होंने बताया कि इलेक्ट्रिक दोपहिया और कमर्शियल वाहन डिलीवरी और रोजमर्रा के कामकाज में सबसे तेजी से अपनाए जा रहे हैं, क्योंकि ये सीधे जेब पर असर डालते हैं. इसके अलावा सरकारी प्रोत्साहन, फाइनेंसिंग की आसान सुविधा और बढ़ती जागरूकता ने EV को अब एक प्रयोग नहीं बल्कि एक समझदारी भरा आर्थिक फैसला बना दिया है.
EV अपनाने में नीति और इंफ्रास्ट्रक्चर की अहम भूमिका
सरकारी नीतियों, आसान फाइनेंस और चार्जिंग नेटवर्क के धीरे-धीरे विस्तार ने EV सेक्टर में भरोसा बढ़ाया है. साथ ही बैटरी परफॉर्मेंस और पर्यावरण को लेकर जागरूकता भी लगातार बढ़ रही है. न्यूरोन एनर्जी (Neuron Energy) के को-फाउंडर व सीईओ प्रतीक कामदार कहते हैं, भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने की यात्रा अब तेजी से टियर-2 और टियर-3 शहरों द्वारा आकार ले रही है, जहां किफायती और व्यावहारिक मोबिलिटी समाधानों की मांग लगातार बढ़ रही है. शुरुआती वृद्धि दिल्ली, बेंगलुरु और मुंबई जैसे शहरी केंद्रों से शुरू हुई थी, लेकिन अब छोटे शहर प्रमुख विकास केंद्र बनकर उभर रहे हैं, खासकर इलेक्ट्रिक दोपहिया और तिपहिया वाहनों के लिए, जहां किफायत, ईंधन की बचत और रोजमर्रा की उपयोगिता खरीद के निर्णयों को काफी प्रभावित करती है.
वहीं, सरकार की अपील और नीतिगत समर्थन ने भी इंडस्ट्री को स्पष्ट दिशा दी है. स्वच्छ मोबिलिटी को बढ़ावा देने को हाल ही में माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भी प्रोत्साहन मिला है, जब उन्होंने नागरिकों से ईवी अपनाने और पारंपरिक ईंधनों पर निर्भरता कम करने का आग्रह किया, जो देश के व्यापक ऊर्जा संरक्षण प्रयासों का हिस्सा है. इससे उपभोक्ता का भरोसा बढ़ा है और निवेश भी तेज हुआ है. उन्होंने बताया कि अगले कुछ सालों में EV की असली स्केलिंग वहीं से आएगी जहां लोकल जरूरतें और इंफ्रास्ट्रक्चर दोनों साथ विकसित होंगे.
सिलीगुड़ी, कूच बिहार और बरेली जैसे शहरों में ईवी अपनाने का ट्रेंड
EV सेक्टर में ग्रोथ के बावजूद चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की उपलब्धता और भरोसेमंद संचालन अभी भी चुनौती बना हुआ है. कई जगहों पर चार्जिंग स्टेशन मौजूद हैं, लेकिन उनकी निरंतर उपलब्धता और विश्वसनीयता एक बड़ा मुद्दा है. कजैम (Kazam) के को-फाउंडर व सीईओ अक्षय शेखर कहते हैं, ईवी (इलेक्ट्रिक वाहन) को केवल बड़े शहरों तक सीमित मानने की धारणा तेजी से बदल रही है. ईवी चार्जिंग और ऊर्जा प्रबंधन प्लेटफॉर्म कजैम के तौर पर, हम टियर-2 और टियर-3 शहरों में मांग में तेज वृद्धि देख रहे हैं. सिलीगुड़ी, कूच बिहार और बरेली जैसे शहरों में उपभोक्ता अब CNG को छोड़ ईवी अपना रहे हैं.
उद्योग के रुझान भी इसी दिशा की पुष्टि करते हैं. टियर-2 शहरों में ईवी की पैठ करीब 10.7% और टियर-3 शहरों में लगभग 8.7% तक पहुंच चुकी है, जो टियर-1 शहरों के मुकाबले बहुत पीछे नहीं है. ये छोटे शहर अब ईवी बाजार की वृद्धि में अहम भूमिका निभा रहे हैं.
इसी के साथ चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर भी मेट्रो शहरों से आगे बढ़ रहा है. टियर-2 शहरों में 4,600 से अधिक सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन संचालित हो रहे हैं और केंद्र व राज्य सरकारों की ओर से नीतिगत प्रोत्साहन भी लगातार मिल रहा है.
प्रधानमंत्री की अपील से EV सेक्टर को नया बूस्ट
पश्चिम एशिया संकट, ईंधन की बढ़ती कीमतों और ऊर्जा अस्थिरता के बीच प्रधानमंत्री की EV अपनाने की अपील को सेक्टर के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है. इससे न केवल जागरूकता बढ़ी है, बल्कि लोगों में वैकल्पिक ऊर्जा को लेकर भरोसा भी मजबूत हुआ है.
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत की EV कहानी मेट्रो शहरों से नहीं बल्कि टियर-2 और टियर-3 शहरों से लिखी जाएगी. जैसे-जैसे चार्जिंग नेटवर्क, बैटरी तकनीक और स्थानीय इकोसिस्टम मजबूत होगा, वैसे-वैसे इलेक्ट्रिक वाहन भारत की मुख्यधारा मोबिलिटी का हिस्सा बनते जाएंगे.