टाटा ग्रुप समर्थित Nelco 2027 के अंत तक करेगी D2D सेवा का ट्रायल, रेगुलेटरी मंजूरी और स्पेक्ट्रम उपलब्धता के आधार पर होगा कमर्शियल लॉन्च
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
टाटा ग्रुप (Tata Group) समर्थित नेल्को (Nelco) भारत के उभरते डायरेक्ट टू डिवाइस (D2D) सैटेलाइट कम्युनिकेशन बाजार में उतरने की तैयारी कर रही है. कंपनी की योजना 2028 की शुरुआत तक भारत और दक्षिण एशिया के चुनिंदा बाजारों में D2D सैटेलाइट कनेक्टिविटी सेवाएं शुरू करने की है. हालांकि, इसका कमर्शियल लॉन्च रेगुलेटरी मंजूरी और स्पेक्ट्रम की उपलब्धता पर निर्भर करेगा. कंपनी 2027 के अंत तक इन सेवाओं का ट्रायल शुरू करने की तैयारी कर रही है.
भारत के साथ बांग्लादेश और श्रीलंका पर नजर
Nelco के D2D ऑफरिंग के शुरुआती बाजारों में भारत के साथ बांग्लादेश और श्रीलंका भी शामिल हो सकते हैं. D2D तकनीक के जरिए मोबाइल फोन और अन्य डिवाइस सीधे सैटेलाइट नेटवर्क से कनेक्ट हो सकेंगे. कंपनी का मानना है कि आने वाले 7 से 10 वर्षों में यह सैटेलाइट कम्युनिकेशन बाजार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है.
कंपनी की रणनीति को उसके Lunar Holdco Inc में किए गए 2 करोड़ डॉलर के निवेश से भी मजबूती मिली है. Lunar Holdco एक सैटेलाइट मोबाइल कनेक्टिविटी कंपनी है, जो Elveo Mobile ब्रांड के तहत काम करती है. Nelco के MD और CEO पीजे नाथ के मुताबिक, इस निवेश का उद्देश्य कंपनी को केवल सैटेलाइट सेवाओं के वितरक के बजाय D2D इकोसिस्टम में एक रणनीतिक भागीदार के रूप में स्थापित करना है.
खुद का सैटेलाइट कंस्टीलेशन बनाने की योजना नहीं
कंपनी अरबों डॉलर खर्च करके अपना खुद का सैटेलाइट कंस्टीलेशन बनाने के बजाय पार्टनरशिप के जरिए इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है. Nelco का फोकस व्यापक सैटेलाइट कनेक्टिविटी इकोसिस्टम में योगदान देने पर है. कंपनी D2D के इस्तेमाल के लिए IoT, स्मार्ट एग्रीकल्चर, एसेट मॉनिटरिंग, कनेक्टेड व्हीकल और समुद्री संचार जैसे क्षेत्रों की संभावनाएं तलाश रही है. शुरुआती स्तर पर Nelco का कारोबार मुख्य रूप से B2B और B2G मॉडल पर केंद्रित रहेगा. इसके तहत कंपनी सीधे ग्राहकों को सेवाएं देने के बजाय टेलीकॉम ऑपरेटरों के साथ मिलकर काम करेगी.
रेगुलेशन और स्पेक्ट्रम से तय होगी लॉन्च की टाइमलाइन
भारत में D2D सेवाओं की शुरुआत काफी हद तक सैटेलाइट कम्युनिकेशन के लिए तैयार किए जा रहे रेगुलेटरी और स्पेक्ट्रम फ्रेमवर्क पर निर्भर करेगी. भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI) सैटेलाइट कम्युनिकेशन नेटवर्क के प्रस्तावित ऑथराइजेशन फ्रेमवर्क के तहत D2D सेवाओं पर इंडस्ट्री से सुझाव मांग रहा है.
D2D सेवाओं के लिए मोबाइल सैटेलाइट सर्विस स्पेक्ट्रम या टेरेस्ट्रियल मोबाइल स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल किया जा सकता है. अगर टेरेस्ट्रियल स्पेक्ट्रम का उपयोग होता है, तो मौजूदा टेलीकॉम ऑपरेटरों के साथ सहयोग जरूरी होगा.
Nelco के मुताबिक, सैटेलाइट कनेक्टिविटी को टेरेस्ट्रियल नेटवर्क के विकल्प के बजाय उसके विस्तार के रूप में देखा जा सकता है. खासकर दूरदराज के इलाकों, पहाड़ी क्षेत्रों और प्राकृतिक आपदा से प्रभावित जगहों पर इसका इस्तेमाल महत्वपूर्ण हो सकता है, जहां पारंपरिक नेटवर्क स्थापित करना मुश्किल या महंगा होता है.
GEO, LEO और MEO के साथ मल्टी-ऑर्बिट रणनीति
D2D Nelco की व्यापक सैटेलाइट रणनीति का सिर्फ एक हिस्सा है. कंपनी ऑर्बिट-एग्नोस्टिक रणनीति पर काम कर रही है, जिसमें ग्राहकों की जरूरत के मुताबिक GEO, LEO और MEO सैटेलाइट के साथ D2D और टेरेस्ट्रियल नेटवर्क को जोड़ा जाएगा.
पीजे नाथ ने कहा कि LEO ब्रॉडबैंड सेवाओं के लॉन्च में देरी से भारतीय सैटेलाइट कम्युनिकेशन बाजार में नए अवसरों की रफ्तार प्रभावित हुई है. हालांकि, Nelco कई LEO ऑपरेटरों के साथ बातचीत जारी रखे हुए है और रेगुलेशन तथा बाजार की परिस्थितियों को देखते हुए संभावित साझेदारियों का आकलन कर रही है.
Reliance Jio समेत बढ़ती प्रतिस्पर्धा को सकारात्मक मानती है कंपनी
सैटेलाइट कम्युनिकेशन क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा को Nelco सकारात्मक रूप में देखती है. Reliance Jio समेत कई कंपनियां इस क्षेत्र में उतरने की तैयारी कर रही हैं. Nelco का मानना है कि भारत जैसे बड़े बाजार में कई सैटेलाइट कनेक्टिविटी प्रदाताओं के लिए पर्याप्त अवसर मौजूद हैं.
कंपनी के अनुसार, सैटेलाइट कम्युनिकेशन का अगला चरण टेरेस्ट्रियल नेटवर्क को खत्म करने के बजाय अलग-अलग तकनीकों को एक साथ जोड़कर कनेक्टिविटी का विस्तार करने का होगा. ऐसे में रेगुलेटरी स्पष्टता के साथ D2D आने वाले वर्षों में भारत और दक्षिण एशिया के कम्युनिकेशन बाजार में एक अहम ग्रोथ सेगमेंट बन सकता है.
नए आधार वर्ष वाली सीरीज में बुनियादी उद्योगों की वृद्धि जून के 6% से घटकर 5.4% पर आई, रिफाइनरी, कोयला और सीमेंट ने संभाली रफ्तार
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश के नौ प्रमुख बुनियादी उद्योगों की वृद्धि दर जुलाई 2026 में घटकर 5.4 फीसदी रह गई, जबकि जून में संशोधित आंकड़ों के अनुसार यह 6 फीसदी थी. वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई में बिजली और लौह अयस्क उत्पादन की रफ्तार में कमी का असर कोर सेक्टर की कुल वृद्धि पर पड़ा. हालांकि, रिफाइनरी उत्पादों के उत्पादन में सुधार के साथ कोयला और सीमेंट क्षेत्र की बेहतर ग्रोथ ने गिरावट को कुछ हद तक सीमित किया.
नई सीरीज का दूसरा आंकड़ा
जुलाई का आंकड़ा नए आधार वर्ष 2022-23 पर आधारित संशोधित बुनियादी उद्योग सूचकांक (ICI) का दूसरा आंकड़ा है. नई सीरीज ने 2011-12 आधार वर्ष वाली पुरानी सीरीज की जगह ली है. इसमें लौह अयस्क को शामिल किए जाने के बाद प्रमुख बुनियादी उद्योगों की संख्या आठ से बढ़कर नौ हो गई है. जुलाई में इन नौ उद्योगों का समग्र सूचकांक बढ़कर 121.2 हो गया, जो जून में 120.7 था.
बिजली और लौह अयस्क की ग्रोथ में गिरावट
कोर सेक्टर इंडेक्स में 30.9 फीसदी की सबसे अधिक हिस्सेदारी रखने वाले बिजली क्षेत्र की वृद्धि दर जुलाई में घटकर 9 फीसदी रह गई, जबकि जून में यह 11.4 फीसदी थी. वहीं, 4.9 फीसदी भारांश वाले लौह अयस्क क्षेत्र की वृद्धि दर जून के 44.5 फीसदी से घटकर जुलाई में 29.5 फीसदी रह गई. लौह अयस्क उत्पादन की रफ्तार में आई इस बड़ी कमी का कुल कोर सेक्टर ग्रोथ पर खासा असर पड़ा.
रिफाइनरी उत्पादन में लौटी तेजी
जुलाई में नौ में से छह प्रमुख उद्योगों में सकारात्मक वृद्धि दर्ज की गई. इनमें लौह अयस्क, बिजली, सीमेंट, इस्पात, रिफाइनरी उत्पाद और कोयला शामिल हैं. दूसरी ओर, प्राकृतिक गैस, कच्चे तेल और उर्वरक उत्पादन में गिरावट रही.
रिफाइनरी उत्पादों का प्रदर्शन खास तौर पर बेहतर रहा. लगातार तीन महीनों की गिरावट के बाद जुलाई में रिफाइनरी उत्पादन 2.7 फीसदी बढ़ा. जून में इसमें 4 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी. वहीं, कोयला और सीमेंट उत्पादन में तेजी ने भी कोर सेक्टर की कुल वृद्धि को सहारा दिया.
अप्रैल-जुलाई में 4.3% बढ़ा कोर सेक्टर
अप्रैल-जुलाई 2026 के दौरान नौ प्रमुख बुनियादी उद्योगों का संचयी सूचकांक 4.3 फीसदी बढ़ा. पिछले साल की समान अवधि में इसमें 1.5 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई थी. इससे संकेत मिलता है कि चालू वित्त वर्ष के शुरुआती महीनों में बुनियादी उद्योगों का प्रदर्शन पिछले साल की तुलना में बेहतर रहा है, हालांकि जुलाई में वृद्धि की रफ्तार कुछ धीमी पड़ी है.
16 साल के उच्च स्तर पर पहुंची चीनी की कीमतों के बीच सरकार ने लिया फैसला, 31 अक्टूबर 2026 तक किया जा सकेगा आयात
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
घरेलू बाजार में चीनी की लगातार बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. सरकार ने 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दे दी है. यह फैसला ऐसे समय आया है जब घरेलू बाजार में चीनी की कीमतें 16 साल के उच्च स्तर पर पहुंच गई हैं और आगामी त्योहारी सीजन में मांग बढ़ने की संभावना है. सरकार की ओर से जारी अधिसूचना के मुताबिक, कच्ची चीनी का आयात 31 अक्टूबर 2026 तक किया जा सकेगा. फिलहाल भारत कच्ची चीनी के आयात पर 100 फीसदी शुल्क लगाता है.
16 साल के हाई पर चीनी की कीमत
चीनी की कीमतों में हाल के दिनों में तेज उछाल देखने को मिला है. NCDEX के आंकड़ों के मुताबिक, 19 अगस्त 2026 को देश के प्रमुख बाजारों में हाजिर चीनी की कीमत बढ़कर 5,530 रुपये प्रति क्विंटल हो गई, जो करीब 16 साल का उच्च स्तर है. वहीं, एक उद्योग संगठन के अनुसार 18 अगस्त को देशभर में चीनी की औसत एक्स-मिल कीमत 5,400-5,500 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई, जबकि एक साल पहले यह करीब 3,900 रुपये प्रति क्विंटल थी. उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 18 अगस्त तक खुदरा चीनी की कीमत सालाना आधार पर करीब 13 फीसदी बढ़कर 52.30 रुपये प्रति किलो हो गई.
त्योहारी सीजन से पहले बढ़ी चिंता
अगस्त से नवंबर के बीच चीनी की मांग आमतौर पर बढ़ जाती है. इस अवधि में गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे प्रमुख त्योहार आते हैं. ऐसे में सरकार के सामने घरेलू बाजार में पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखने और कीमतों को नियंत्रित करने की चुनौती है. शुल्क-मुक्त आयात के फैसले से बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाने और कीमतों पर दबाव कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है.
जमाखोरी रोकने के लिए भी सख्ती
चीनी की कीमतों पर नियंत्रण के लिए सरकार ने इससे पहले थोक खरीदारों के स्टॉक पर भी सीमा तय की है. खाद्य मंत्रालय के आदेश के मुताबिक, हर महीने 10 टन से ज्यादा चीनी की खपत करने वाले थोक उपभोक्ता 15 दिनों की खपत से अधिक स्टॉक नहीं रख सकेंगे. यह आदेश 1 सितंबर से लागू होगा और 30 नवंबर 2026 तक प्रभावी रहेगा. इसके दायरे में कन्फेक्शनरी कंपनियां, सॉफ्ट ड्रिंक निर्माता, फूड प्रोसेसिंग यूनिट, मिठाई विक्रेता और अन्य संस्थागत खरीदार शामिल हैं.
चीनी की कमी की आशंका क्यों बढ़ी?
घरेलू बाजार में चीनी की कीमतों में तेजी के पीछे सीमित उपलब्धता की आशंका भी एक प्रमुख कारण है. भारत ने नवंबर 2025 में 15 लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति दी थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 20 लाख टन कर दिया गया. उद्योग के अनुमान के मुताबिक, इसमें से करीब 8 लाख टन चीनी का निर्यात हो चुका है. ऐसे में घरेलू खपत और निर्यात दोनों को देखते हुए सीजन के अंत में बचने वाले स्टॉक को लेकर चिंता बढ़ी है.
अनुमानों के मुताबिक, 2025-26 सीजन की शुरुआत में करीब 47 लाख टन का शुरुआती स्टॉक था, जबकि एथेनॉल के लिए इस्तेमाल की गई चीनी को घटाने के बाद वास्तविक शुद्ध उत्पादन करीब 2.79 करोड़ टन रहा. घरेलू खपत करीब 2.8 करोड़ टन रहने का अनुमान है. निर्यात को भी शामिल करने पर सीजन के अंत में बचने वाला स्टॉक घटकर करीब 35-39 लाख टन रह सकता है.
चीनी मिलों के लिए क्या होगा असर?
सरकार के इस फैसले से घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ने की उम्मीद है, जिससे कीमतों में नरमी आ सकती है. हालांकि, कीमतों में गिरावट के बावजूद चीनी मिलों के लिए मार्जिन पूरी तरह खत्म होने की संभावना नहीं है. विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर कीमतों में करीब 500 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट भी आती है, तो भी कीमतें उत्पादन लागत से ऊपर रह सकती हैं. इससे मिलों को गन्ना किसानों का बकाया चुकाने में मदद मिल सकती है.
साथ ही, शुल्क-मुक्त आयात से चीनी मिलों और कारोबारियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार से कच्ची चीनी मंगाने का अवसर भी मिलेगा. इससे घरेलू आपूर्ति में कमी की आशंका को कम करने और त्योहारी सीजन में कीमतों को नियंत्रित रखने में सरकार को मदद मिल सकती है.
गुरुवार को सेंसेक्स चार कारोबारी सत्रों की गिरावट के बाद 628.04 अंक चढ़कर 77,537.72 के स्तर पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 153.55 अंक की तेजी के साथ 24,231.85 पर पहुंच गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
लगातार कई दिनों की गिरावट के बाद घरेलू शेयर बाजार में गुरुवार को जोरदार वापसी देखने को मिली. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स चार कारोबारी सत्रों की गिरावट के बाद 628.04 अंक यानी 0.82 फीसदी चढ़कर 77,537.72 के स्तर पर बंद हुआ. वहीं, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी 153.55 अंक यानी 0.64 फीसदी की तेजी के साथ 24,231.85 पर पहुंच गया और लगातार सात सत्रों से जारी गिरावट का सिलसिला भी थम गया.
अब आज बाजार खुलने के साथ निवेशकों की नजर इस बात पर रहेगी कि गुरुवार की मजबूत रिकवरी आगे भी जारी रहती है या फिर ऊपरी स्तरों पर मुनाफावसूली बाजार पर दबाव बनाएगी. अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में नरमी और शॉर्ट कवरिंग ने पिछले सत्र में घरेलू बाजार के सेंटीमेंट को सहारा दिया था. इसके अलावा कई कंपनियों से जुड़े बड़े ऑर्डर, ब्लॉक डील, मैनेजमेंट बदलाव और रेगुलेटरी अपडेट भी आज शेयरों की चाल तय कर सकते हैं.
इटरनल समेत इन शेयरों में रही जोरदार तेजी
गुरुवार के कारोबारी सत्र में सेंसेक्स के 30 में से 26 शेयर बढ़त के साथ बंद हुए. सबसे ज्यादा तेजी इटरनल के शेयर में रही, जो 2.31 फीसदी चढ़कर 327.60 रुपये पर बंद हुआ. इसके अलावा कोटक महिंद्रा बैंक में 1.65 फीसदी, आईटीसी में 1.63 फीसदी, बजाज फाइनेंस में 1.53 फीसदी, एक्सिस बैंक में 1.46 फीसदी, इन्फोसिस में 1.18 फीसदी, पावरग्रिड में 1.07 फीसदी और भारती एयरटेल में 0.96 फीसदी की तेजी दर्ज की गई. वहीं, टाटा स्टील, इंडिगो, एचसीएल टेक और टाइटन गिरावट के साथ बंद हुए. टाटा स्टील में 0.41 फीसदी, इंडिगो में 0.24 फीसदी, एचसीएल टेक में 0.19 फीसदी और टाइटन में 0.04 फीसदी की कमजोरी रही.
इन वजहों से बाजार में लौटी तेजी
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, गुरुवार को घरेलू शेयर बाजार में तेजी के पीछे कई अहम कारण रहे. पिछले कई सत्रों की लगातार गिरावट के बाद निवेशकों ने निचले स्तरों पर खरीदारी की, जबकि शॉर्ट कवरिंग ने भी बाजार को मजबूत सहारा दिया. इसके अलावा अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में नरमी से निवेशकों का सेंटीमेंट बेहतर हुआ. बैंकिंग, फाइनेंशियल और चुनिंदा आईटी शेयरों में खरीदारी ने सेंसेक्स और निफ्टी की तेजी को और मजबूती दी. लगातार गिरावट के बाद बाजार में आई इस रिकवरी ने निवेशकों को राहत दी, हालांकि अब नजर इस बात पर रहेगी कि यह तेजी आज के कारोबार में भी कायम रह पाती है या नहीं.
आज इन शेयरों पर रहेगी खास नजर
आज Saatvik Green Energy के शेयर फोकस में रह सकते हैं. कंपनी की सब्सिडियरी Saatvik Solar Industries को करीब 190 करोड़ रुपये का सोलर फोटोवोल्टिक मॉड्यूल सप्लाई ऑर्डर मिला है. वहीं, RailTel को Western Coalfields से 164.78 करोड़ रुपये का वर्क ऑर्डर मिला है.
Torrent Power में भी अहम मैनेजमेंट बदलाव हुआ है. कंपनी के CFO सौरभ मशरूवाला ने पद से इस्तीफा दे दिया है और विकास पोद्दार को नया CFO नियुक्त किया गया है. दूसरी ओर, Lemon Tree Hotels ने गुजरात के भरूच में 85 कमरों वाला नया होटल शुरू किया है.
KFin Technologies में बड़ी ब्लॉक डील के बाद शेयर पर निवेशकों की नजर रहेगी. General Atlantic Singapore Fund ने कंपनी के करीब 1.51 करोड़ शेयर यानी 8.75 फीसदी हिस्सेदारी लगभग 1,400 करोड़ रुपये में बेची है. वहीं, Niva Bupa Health Insurance को EoM लिमिट के उल्लंघन पर IRDAI की चेतावनी मिली है और कंपनी को छह महीने तक नए बिजनेस स्थान खोलने से रोक दिया गया है.
Tata Motors Passenger Vehicles ने गुजरात के साणंद प्लांट में सामान्य परिचालन फिर शुरू होने की जानकारी दी है. भारी बारिश और बाढ़ के कारण यहां अस्थायी रूप से काम प्रभावित हुआ था. वहीं, Quant Mutual Fund ने Pfizer में करीब 131.25 करोड़ रुपये के अतिरिक्त शेयर खरीदे हैं, जिससे कंपनी के शेयर पर भी नजर बनी रहेगी.
इसके अलावा IndiGo ने जुलाई में घरेलू विमानन बाजार में 67.4 फीसदी हिस्सेदारी बनाए रखी. ऐसे में बाजार की समग्र दिशा के साथ-साथ इन कंपनियों से जुड़े ताजा अपडेट आज कारोबार के दौरान उनके शेयरों में हलचल बढ़ा सकते हैं.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
80 वर्ष के होने पर इंफोसिस के सह-संस्थापक की स्थायी विरासत भारतीय प्रतिभा, पारदर्शी शासन और पेशेवर प्रबंधन को वैश्विक स्तर पर विश्वसनीय बनाने में निहित है.
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डॉ. अनुराग बत्रा
एन आर नारायण मूर्ति आज यानी 20 अगस्त, 2026 को 80 वर्ष के हो गए हैं. 80वां जन्मदिन व्यक्तिगत उपलब्धि का एक पड़ाव है, लेकिन उनके मामले में यह भारत के आर्थिक इतिहास के एक निर्णायक अध्याय पर विचार करने का अवसर भी है. मूर्ति ने अकेले भारतीय आईटी का निर्माण नहीं किया. इस स्तर के किसी भी उद्योग का निर्माण कभी किसी एक व्यक्ति का काम नहीं होता. फिर भी, इसमें कोई संदेह नहीं कि वह उस विश्वसनीयता के प्रमुख वास्तुकारों में से एक थे, जो भारतीय प्रौद्योगिकी सेवाओं ने दुनिया भर में अर्जित की.
जब मूर्ति ने 1981 में Patni Computer Systems में काम करने के बाद छह साथी इंजीनियरों के साथ इंफोसिस (Infosys) की सह-स्थापना की, तब भारत का प्रौद्योगिकी क्षेत्र नया और सीमित था. TCS पहले से ही काम कर रही थी और अन्य अग्रदूत इसकी नींव रख रहे थे, लेकिन यह विचार कि कोई भारतीय कंपनी सॉफ्टवेयर प्रतिभा, प्रबंधन अनुशासन और डिलीवरी की गुणवत्ता के दम पर वैश्विक ग्राहकों को जीत सकती है, अभी बड़े पैमाने पर साबित होना बाकी था.
Infosys ने इसे साबित करने में मदद की.
सिर्फ एक कंपनी से कहीं अधिक
मूर्ति का योगदान केवल उस कंपनी के आकार में नहीं है, जिसे बनाने में उन्होंने मदद की, बल्कि उस उद्यम के मॉडल में भी है, जिसे उन्होंने बढ़ावा दिया. Infosys द्वारा शुरू किए गए ग्लोबल डिलीवरी मॉडल ने क्लाइंट लोकेशन और भारत में डेवलपमेंट सेंटर के बीच काम को बांटा, जिससे भारतीय कौशल और टाइम जोन प्रतिस्पर्धात्मक लाभ में बदल गए. इसने वैश्विक ग्राहकों को दिखाया कि भारतीय इंजीनियर जटिल असाइनमेंट को लगातार और बड़े पैमाने पर संभाल सकते हैं.
मूर्ति के नेतृत्व में Infosys कॉरपोरेट गवर्नेंस, वित्तीय खुलासे और पूर्वानुमानित निष्पादन के लिए भी एक मानक बन गई. 1999 में Nasdaq पर इसकी लिस्टिंग, जो किसी भारतीय आईटी कंपनी की पहली लिस्टिंग थी, ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों को एक महत्वपूर्ण संकेत दिया. इसके कर्मचारी स्टॉक ऑप्शन कार्यक्रम ने प्रमोटर समूह से आगे संपत्ति का बंटवारा किया और भारत के कुछ शुरुआती वेतनभोगी करोड़पतियों को बनाने में मदद की.
ये केवल कॉरपोरेट उपलब्धियां नहीं थीं. उन्होंने इस बात की अपेक्षाएं बढ़ाईं कि एक भारतीय उद्यम क्या बन सकता है.
यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रतिष्ठा एक आर्थिक संपत्ति है. हजारों मील दूर बैठे ग्राहक केवल कोड नहीं खरीद रहे थे. वे एक भारतीय कंपनी के लोगों, प्रक्रियाओं और वादों पर भरोसा कर रहे थे. मूर्ति ने शुरुआत में ही समझ लिया था कि इस भरोसे को बार-बार अर्जित करना होगा. उन्होंने केवल मूल्यवान कंपनी नहीं, बल्कि सम्मानित कंपनी बनाने की बात की. यह अंतर Infosys का केंद्रीय हिस्सा बन गया और भारतीय आईटी को संस्थागत विश्वसनीयता हासिल करने में मदद मिली.
संस्था निर्माण का अनुशासन
मूर्ति की व्यक्तिगत सादगी की अक्सर चर्चा होती है. इससे भी अधिक महत्वपूर्ण उनकी स्पष्टता थी. उन्होंने कठिन समस्याओं को अनुशासन, माप और क्रियान्वयन के माध्यम से हल करने का तरीका अपनाया और अपने आसपास के लोगों से भी उच्च मानकों की अपेक्षा की. उनके लिए पेशेवर उत्कृष्टता केवल एक आकांक्षा नहीं थी. यह एक अनुशासन था.
उनका नेतृत्व इस विश्वास को दर्शाता था कि उत्कृष्टता कोई कभी-कभार किया जाने वाला काम नहीं है. यह उन प्रणालियों से उभरती है, जो प्रदर्शन को दोहराने योग्य बनाती हैं और जवाबदेही को अनिवार्य बनाती हैं.
उस समय जब कई भारतीय कंपनियों की पहचान प्रमोटर परिवारों के साथ गहराई से जुड़ी हुई थी, Infosys ने पेशेवर प्रबंधन, मेरिटोक्रेसी, प्रक्रिया, पारदर्शिता, उत्तराधिकार और साझा स्वामित्व पर आधारित एक वैकल्पिक मॉडल को आगे बढ़ाया.
यही वजह है कि Infosys एक सफल कंपनी से कहीं अधिक बन गई. इसे एक संस्था के रूप में अध्ययन किया जाने लगा. इसने उद्यमियों की एक पीढ़ी को यह प्रमाण दिया कि भारत में जन्मी कंपनी महत्वाकांक्षी हो सकती है, बिना गवर्नेंस को छोड़े; अनुशासन से समझौता किए बिना बड़े पैमाने पर विस्तार कर सकती है और अपनी जड़ों को छिपाए बिना वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकती है.
Infosys से बड़ी विरासत
जैसे-जैसे भारतीय आईटी का विस्तार हुआ, मूर्ति भारतीय उद्यम के लिए एक सार्वजनिक आवाज भी बने. उन्होंने बेहतर शिक्षा, मजबूत संस्थानों, सक्षम नीतियों, बेहतर बुनियादी ढांचे और ऐसे सुधारों की वकालत की, जो भारतीय उद्यमियों को निर्माण और प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बनाएं.
उनके हस्तक्षेप अक्सर स्पष्ट और बेबाक रहे हैं. इस स्पष्टवादिता का यह भी मतलब रहा है कि उनके द्वारा व्यक्त हर विचार से सभी सहमत नहीं रहे हैं. खास तौर पर कार्य संस्कृति पर उनकी टिप्पणियों ने महत्वाकांक्षा, उत्पादकता और कर्मचारियों के कल्याण को लेकर बहस छेड़ी है. हर सुझाव को स्वीकार करना जरूरी नहीं है, लेकिन भारत के भविष्य के साथ जिस गंभीरता से वह लगातार जुड़े हुए हैं, उसे पहचानना जरूरी है.
इसलिए उनका योगदान कॉरपोरेट और संस्थागत, दोनों रहा है. उन्होंने यह साबित करने में मदद की कि भारतीय कंपनियां क्या हासिल कर सकती हैं और उस उपलब्धि से मिली विश्वसनीयता का इस्तेमाल अधिक सक्षम, नैतिक और प्रतिस्पर्धी भारत की वकालत करने के लिए किया.
आज भारतीय प्रौद्योगिकी कंपनियां महाद्वीपों में काम कर रही हैं, भारतीय इंजीनियर दुनिया भर में नेतृत्व के पदों पर हैं और आईटी सेवाएं भारत के सबसे महत्वपूर्ण निर्यात और कुशल रोजगार स्रोतों में बनी हुई हैं.
इस बदलाव के कई रचनाकार हैं. पूरे उद्योग के उदय का श्रेय एक व्यक्ति को देना गलत होगा. लेकिन इसके मानकों, महत्वाकांक्षा और आत्मविश्वास को आकार देने में मूर्ति की भूमिका को कम करके आंकना भी उतना ही गलत होगा.
80 वर्ष की उम्र में नारायण मूर्ति केवल एक सफल प्रौद्योगिकी कंपनी के सह-संस्थापक से कहीं अधिक हैं. वह एक संस्था निर्माता और भारतीय कॉरपोरेट जगत के लिए एक स्थायी संदर्भ बिंदु हैं.
उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि केवल Infosys का आकार या वैश्विक पहुंच नहीं है. यह वह आत्मविश्वास है, जिसे उन्होंने बनाने में मदद की: कि भारत में बनी, भारतीय इंजीनियरों द्वारा संचालित और वैश्विक मानकों के अनुसार संचालित कोई कंपनी दुनिया का भरोसा जीत सकती है.
वह आत्मविश्वास एक उद्योग बन गया. और उस उद्योग ने भारत को बदलने में मदद की.
डॉ. अन्नुराग बत्रा, BW रिपोर्टर्स
(लेखक BW Businessworld Group के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ तथा exchange4media Group के संस्थापक और एडिटर-इन-चीफ हैं.)
SBI रिसर्च के मुताबिक अगस्त में खुदरा महंगाई बढ़कर 4.7% हो सकती है. बेहतर मानसून और खरीफ फसलों की मजबूत बुवाई से साल के अंत में खाद्य महंगाई पर दबाव कम होने की उम्मीद
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में खुदरा महंगाई आने वाले महीनों में फिर बढ़ सकती है और अक्टूबर-नवंबर में यह 6 फीसदी के स्तर को पार कर सकती है. हालांकि, इसके बाद महंगाई में नरमी आने की उम्मीद है और वित्त वर्ष 2026-27 की चौथी तिमाही में यह करीब 5 फीसदी रह सकती है. भारतीय स्टेट बैंक की शोध रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई में 4.45 फीसदी रही उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई अगस्त में बढ़कर 4.7 फीसदी हो सकती है.
अक्टूबर-नवंबर में महंगाई बढ़ने का अनुमान
रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले महीनों में खुदरा महंगाई पर खाद्य कीमतों का दबाव बढ़ सकता है. इसके चलते अक्टूबर और नवंबर में महंगाई 6 फीसदी के पार जा सकती है. हालांकि, साल के आगे बढ़ने के साथ खाद्य आपूर्ति बेहतर होने से कीमतों पर दबाव कम होने की संभावना है. एसबीआई रिसर्च ने कहा कि मानसून की स्थिति में सुधार और खरीफ फसलों की मजबूत बुवाई आने वाले महीनों में खाद्य महंगाई को नियंत्रित करने में मदद कर सकती है.
बारिश में हुआ सुधार
जून में बारिश की कमी करीब 40 फीसदी थी, जो अब घटकर लगभग 13 फीसदी रह गई है. जुलाई में बारिश सामान्य से अधिक रही, जबकि अगस्त में अब तक मानसून सामान्य रहा है. खरीफ फसलों के तहत बोया गया क्षेत्र पिछले मौसम की तुलना में करीब 2 फीसदी कम है. इसके बावजूद कुछ प्रमुख खाद्यान्न उत्पादक राज्यों में सामान्य से कम बारिश के बीच भी बुवाई में अपेक्षाकृत मजबूती बनी हुई है. रिपोर्ट के मुताबिक, यह राज्यों में सिंचाई सुविधाओं में सुधार का संकेत देता है.
ऐतिहासिक रुझानों से भी संकेत मिलता है कि वित्त वर्ष 2026-27 की चौथी तिमाही में महंगाई मौजूदा अनुमानों से कम रह सकती है. साल आगे बढ़ने के साथ खाद्य आपूर्ति मजबूत होने से उपभोक्ता कीमतों पर बढ़ता दबाव कम होने की उम्मीद है.
महंगाई पर आरबीआई की नजर
महंगाई का रुख भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति के लिए भी महत्वपूर्ण रहेगा. आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने संकेत दिया है कि नीतिगत दरों में बदलाव को लेकर कोई नया फैसला लेने से पहले महंगाई की दिशा को लेकर अधिक स्पष्टता जरूरी होगी.
हाल की मौद्रिक नीति समिति की बैठक के विवरण के मुताबिक, मल्होत्रा ने कहा कि पहले की नरम महंगाई दरों के बाद अब कीमतों में सामान्य स्थिति लौटने के संकेत दिखाई दे रहे हैं. ऐसे में मौद्रिक नीति की आगे की दिशा तय करने से पहले और आंकड़ों का इंतजार करना उचित होगा. एसबीआई रिसर्च ने केंद्रीय बैंक के संचार को लेकर भी चिंता जताई है. रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले समय में मौद्रिक नीति के वास्तविक कदम आगे के संकेतों की तुलना में बाजार के लिए अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं. इनमें परिवर्तनीय दर वाली रिवर्स रेपो परिचालन और विदेशी मुद्रा अनिवासी जमा जुटाने की व्यवस्था जैसे कदम शामिल हैं.
वैश्विक बाजारों से भी जोखिम
रिपोर्ट में अमेरिकी ट्रेजरी बाजार में हो रहे बदलावों को भी वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है. अमेरिकी सरकार की ओर से लंबी अवधि के सरकारी कर्ज की पुनर्खरीद बढ़ाने जैसे कदमों से अमेरिकी ट्रेजरी की लंबी अवधि की प्रतिफल दरों को स्थिर रखने में मदद मिल सकती है और इसका असर वैश्विक बाजारों पर भी पड़ सकता है.
बेंचमार्क 10 वर्षीय अमेरिकी सरकारी बॉन्ड सहित लंबी अवधि की प्रतिफल दरों में गिरावट आई है. यह गिरावट अमेरिकी सरकार की छोटी और लंबी अवधि की परिपक्वता वाले कर्ज की आपूर्ति में संभावित बदलाव की उम्मीदों के बीच आई है.
मानसून और खाद्य आपूर्ति रहेगी अहम
भारत में आने वाले महीनों में महंगाई का रुख मुख्य रूप से खाद्य आपूर्ति और मानसून की स्थिति पर निर्भर करेगा. बेहतर बारिश और खरीफ उत्पादन में मजबूती से खाद्य कीमतों पर दबाव कम हो सकता है. वहीं, आरबीआई की मौद्रिक नीति की दिशा भी इस बात पर निर्भर करेगी कि आने वाले महीनों में महंगाई किस तरह आगे बढ़ती है. इसलिए अक्टूबर-नवंबर के दौरान महंगाई में संभावित उछाल के बाद चौथी तिमाही में इसमें आने वाली नरमी बाजार और केंद्रीय बैंक दोनों के लिए महत्वपूर्ण होगी.
विनिर्माण और थर्ड पार्टी लॉजिस्टिक्स की बढ़ती मांग से बाजार को मिला सहारा, मुंबई सबसे बड़ा बाजार बनकर उभरा; दूसरी छमाही में भी मजबूत मांग की उम्मीद
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के औद्योगिक और वेयरहाउसिंग क्षेत्र में मांग लगातार मजबूत बनी हुई है. नाइट फ्रैंक इंडिया की ‘इंडिया वेयरहाउसिंग मार्केट रिपोर्ट-एच1 2026’ के मुताबिक, 2026 की पहली छमाही में देश के आठ प्रमुख बाजारों में औद्योगिक और वेयरहाउसिंग लीजिंग सालाना आधार पर 15 फीसदी बढ़कर 36.8 मिलियन वर्गफुट हो गई. वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, ऊंची माल ढुलाई लागत, मुद्रा में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बावजूद इस क्षेत्र ने बेहतर प्रदर्शन किया है.
विनिर्माण से सबसे ज्यादा मांग
विनिर्माण क्षेत्र औद्योगिक और वेयरहाउसिंग परिसंपत्तियों की मांग का सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है. कुल लीजिंग में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी 46 फीसदी रही और इसने 17 मिलियन वर्गफुट क्षेत्र दर्ज किया. यह पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 17 फीसदी अधिक है.
इसके बाद थर्ड पार्टी लॉजिस्टिक्स यानी 3पीएल क्षेत्र का स्थान रहा. इस क्षेत्र ने 11.1 मिलियन वर्गफुट की लीजिंग की, जो कुल लेनदेन का 30 फीसदी है. 3पीएल क्षेत्र में सालाना आधार पर 27 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई.
मुंबई सबसे आगे
मुंबई 10.7 मिलियन वर्गफुट के साथ औद्योगिक और वेयरहाउसिंग लीजिंग का सबसे बड़ा बाजार रहा. यह शहर के लिए अब तक की सबसे अधिक छमाही लीजिंग है और पिछले साल की समान अवधि से 44 फीसदी अधिक है. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में 5.9 मिलियन वर्गफुट लीजिंग हुई, जो 17 फीसदी अधिक है. वहीं बेंगलूरु में 4 मिलियन वर्गफुट लीजिंग दर्ज की गई, जिसमें 36 फीसदी की बढ़ोतरी हुई.
कोलकाता ने प्रमुख बाजारों में सबसे तेज वृद्धि दर्ज की. यहां लीजिंग 69 फीसदी बढ़कर 2.4 मिलियन वर्गफुट हो गई. अहमदाबाद में यह 15 फीसदी बढ़कर 4.1 मिलियन वर्गफुट रही. इसके विपरीत पुणे, चेन्नई और हैदराबाद में लीजिंग गतिविधियों में क्रमशः 12 फीसदी, 27 फीसदी और 10 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.
समर्पित माल ढुलाई गलियारे से मिला फायदा
पश्चिमी समर्पित माल ढुलाई गलियारे के पूरा होने से भी इस क्षेत्र को फायदा मिला है. इससे विनिर्माण केंद्रों, बंदरगाहों और उपभोक्ता केंद्रों के बीच माल की आवाजाही बेहतर हुई है. नाइट फ्रैंक के मुताबिक, बेहतर संपर्क व्यवस्था ने विनिर्माताओं और लॉजिस्टिक्स कंपनियों को अपनी आपूर्ति श्रृंखला को अधिक प्रभावी ढंग से संचालित करने में मदद की है. इससे भारत उत्पादन और वितरण केंद्र के रूप में और मजबूत हुआ है.
नाइट फ्रैंक इंडिया के अंतरराष्ट्रीय साझेदार, अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक शिशिर बैजल ने कहा कि चुनौतीपूर्ण वैश्विक माहौल के बावजूद औद्योगिक और वेयरहाउसिंग बाजार मजबूत बना हुआ है. विनिर्माण गतिविधियों, बेहतर बुनियादी ढांचे और मजबूत घरेलू मांग से कंपनियों का भरोसा कायम है.
सभी प्रमुख बाजारों में किराये बढ़े
रिपोर्ट के मुताबिक, आठों प्रमुख बाजारों में औद्योगिक और वेयरहाउसिंग परिसंपत्तियों के किराये में बढ़ोतरी हुई. चेन्नई में किराये में सबसे ज्यादा 7 फीसदी की सालाना वृद्धि दर्ज की गई और औसत किराया 25.7 रुपये प्रति वर्गफुट प्रति माह पहुंच गया. पुणे 28.7 रुपये प्रति वर्गफुट प्रति माह के औसत किराये के साथ देश का सबसे महंगा वेयरहाउसिंग बाजार रहा.
मुंबई और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में किराये में 5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. वहीं बेंगलूरु और अहमदाबाद में किराये 6 फीसदी बढ़े. नाइट फ्रैंक ने इसका कारण मजबूत मांग के साथ जमीन खरीद, निर्माण और वित्तपोषण की लागत में लगातार वृद्धि को बताया.
कुल वेयरहाउसिंग स्टॉक 584.9 मिलियन वर्गफुट
2026 की पहली छमाही में भारत का औद्योगिक और वेयरहाउसिंग स्टॉक सालाना आधार पर 14 फीसदी बढ़कर 584.9 मिलियन वर्गफुट हो गया. वहीं रिक्तता दर पिछले साल की समान अवधि के 12.1 फीसदी से घटकर 11.4 फीसदी रह गई. इससे संकेत मिलता है कि नई आपूर्ति के साथ मांग भी मजबूत बनी हुई है.
देश के कुल औद्योगिक और वेयरहाउसिंग स्टॉक में उच्च गुणवत्ता वाली ‘ग्रेड ए’ सुविधाओं की हिस्सेदारी 47 फीसदी रही. यह बेहतर बुनियादी ढांचे वाली परिसंपत्तियों के प्रति कंपनियों की बढ़ती प्राथमिकता को दर्शाता है. कुल राष्ट्रीय स्टॉक में मुंबई की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा 33 फीसदी रही, जबकि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र 20 फीसदी हिस्सेदारी के साथ दूसरे स्थान पर रहा.
दूसरी छमाही में भी मजबूत मांग की उम्मीद
रिपोर्ट के अनुसार, 2026 की दूसरी छमाही में भी औद्योगिक और वेयरहाउसिंग क्षेत्र में मांग मजबूत रहने की उम्मीद है. विनिर्माण क्षमता के विस्तार, लॉजिस्टिक्स सेवाओं की बढ़ती आउटसोर्सिंग, नीतिगत समर्थन और बेहतर बहु-माध्यम परिवहन बुनियादी ढांचे से बाजार को सहारा मिलने की संभावना है. हालांकि, नई और उच्च गुणवत्ता वाली आपूर्ति तैयार करने के सामने जमीन की उपलब्धता, बिखरे हुए भू-स्वामित्व, नियामकीय जटिलताएं और परियोजनाओं की मंजूरी में लगने वाला लंबा समय बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं.
अमेरिकी मुद्रा के मई के बाद के सबसे निचले स्तर पर आने और घरेलू शेयर बाजार में मजबूती से रुपये को मिला सहारा, अमेरिकी मौद्रिक नीति और ट्रेजरी के नए कदमों पर बाजार की नजर
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अमेरिकी डॉलर में कमजोरी और घरेलू शेयर बाजार में तेजी के बीच भारतीय रुपया गुरुवार को शुरुआती कारोबार में 17 पैसे मजबूत होकर 95.56 रुपये प्रति डॉलर पर पहुंच गया. डॉलर मई के बाद के अपने सबसे निचले स्तर पर आ गया है, जिससे भारतीय मुद्रा को मजबूती मिली. इसके अलावा अमेरिकी ट्रेजरी के लंबी अवधि के सरकारी बॉन्ड की पुनर्खरीद बढ़ाने के फैसले ने भी डॉलर पर दबाव बनाया.
95.57 पर खुला रुपया
अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया 95.57 प्रति डॉलर पर खुला और कारोबार के दौरान 95.56 के स्तर तक पहुंच गया. यह पिछले बंद भाव के मुकाबले 17 पैसे की बढ़त है. बुधवार को रुपया मामूली रूप से मजबूत हुआ था और एक पैसे की बढ़त के साथ 95.73 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था. हाल के कारोबारी सत्रों में रुपये पर दबाव बना हुआ था और इसकी विनिमय दर 95 रुपये प्रति डॉलर के आसपास बनी हुई थी.
डॉलर में गिरावट से रुपये को फायदा
गुरुवार को रुपये की मजबूती की प्रमुख वजह अमेरिकी डॉलर में आई गिरावट रही. अमेरिकी ट्रेजरी ने लंबी अवधि के सरकारी बॉन्ड की पुनर्खरीद बढ़ाने का फैसला किया है. इससे डॉलर पर दबाव बढ़ा है. इसके साथ ही निवेशक अमेरिकी मौद्रिक नीति के अगले कदमों का भी आकलन कर रहे हैं. फेडरल रिजर्व की ओर से आगे ब्याज दरों में बढ़ोतरी की उम्मीद कम होने से भी डॉलर कमजोर हुआ है.
हालांकि, फेडरल रिजर्व की जुलाई में हुई बैठक के विवरण से पता चला है कि नीति निर्माता अभी भी महंगाई को लेकर चिंतित हैं. ऐसे में आने वाले समय में ब्याज दरों को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुई है.
घरेलू शेयर बाजार से भी मिला सहारा
भारतीय शेयर बाजार में शुरुआती कारोबार में आई तेजी ने भी रुपये को समर्थन दिया. घरेलू शेयर बाजार में मजबूती से भारतीय परिसंपत्तियों के प्रति निवेशकों का भरोसा बढ़ सकता है और स्थानीय मुद्रा की मांग को सहारा मिल सकता है. आने वाले कारोबार में रुपये की दिशा पर वैश्विक स्तर पर डॉलर की चाल, अमेरिकी मौद्रिक नीति को लेकर उम्मीदें और घरेलू वित्तीय बाजारों की स्थिति का असर रहेगा.
वॉल स्ट्रीट की एक दिग्गज कंपनी उस मॉरीशस इकाई की मालिक है, जिस पर सेबी ने हाल ही में सेंसेक्स की क्लोजिंग में कथित हेरफेर करने के आरोप में प्रतिबंध लगाया है. यह भारत में दो खाते संचालित करती है, एक बैंक के अपने पैसे के लिए और दूसरा छिपे हुए ग्राहकों के लिए, क्योंकि सार्वजनिक रिकॉर्ड में वास्तविक नाम कभी सामने नहीं आते.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
एक ही नाम के तहत दो खाते. सेबी के 46 पन्नों के आदेश में यह नहीं बताया गया है कि इनमें से किस खाते ने सेंसेक्स को प्रभावित किया.
13 अगस्त को कारोबार के आखिरी दस मिनट में किसी ने सेंसेक्स को करीब 240 अंक ऊपर धकेल दिया. यह सभी 30 सेंसेक्स कंपनियों में खरीद आदेशों के जरिए किया गया, जिनकी कीमत नियमों के तहत अनुमत अधिकतम स्तर पर थी और इन आदेशों का एक बड़ा हिस्सा बाद में रद्द कर दिया गया. सेबी के आदेश में ऐसे लेनदेन के खिलाफ नियम का हवाला दिया गया है, जिनमें लेनदेन को पूरा करने का कोई इरादा नहीं था, ऑर्डर स्पूफिंग. यह डेरिवेटिव्स एक्सपायरी का दिन था, इसलिए इंडेक्स और शेयरों की क्लोजिंग कीमत ने यह तय किया कि हजारों ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट्स पर किसे भुगतान मिलेगा. छह दिन बाद सेबी ने ₹3.68 करोड़ फ्रीज कर दिए और दो कंपनियों को बाजार से बाहर कर दिया.
यह सब रिपोर्ट किया जा चुका है. यहां बड़ी कहानी है. क्या किसी ने पूछा है कि कॉप्थॉल मॉरीशस वास्तव में कौन है?
कॉप्थॉल ही जेपी मॉर्गन है
Copthall Mauritius Investment Limited मॉरीशस में सिर्फ एक पोस्टबॉक्स वाला कोई स्वतंत्र फंड नहीं है. इसका पूर्ण स्वामित्व *JPMorgan Chase & Co, अमेरिका के सबसे प्रभावशाली वित्तीय संस्थान* के पास है.
यह किसी कंपनी डेटाबेस से निकाला गया अनुमान नहीं है. JPMorgan अमेरिकी सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन के पास अपनी सहायक कंपनियों की सूची दाखिल करता है. इसमें Copthall Mauritius Investment Limited का नाम है, जिसका अधिकार क्षेत्र मॉरीशस और स्वामित्व 100 प्रतिशत है. कंपनी के Legal Entity Identifier रिकॉर्ड में भी, जिसे इस साल फरवरी में अपडेट किया गया था, यही अंतिम मूल कंपनी दर्ज है.
सेबी के आदेश के 46 पन्नों में कहीं भी JPMorgan का उल्लेख नहीं है. फिलहाल सेबी ने एकपक्षीय आदेश के जरिए Copthall पर रोक लगाई है,यह एक आपात निर्देश है, जिसे संबंधित पक्षों की सुनवाई से पहले बाजार की अखंडता की रक्षा के लिए जारी किया जाता है.
दोहरा खेल
Copthall भी एक नहीं, बल्कि दो खाते हैं. भारतीय शेयरहोल्डिंग डिस्क्लोजर और बल्क-डील रिकॉर्ड्स में Copthall दो अलग-अलग नामों के तहत दिखाई देता है:
Copthall Mauritius Investment Limited – ODI Account
Copthall Mauritius Investment Limited – NON ODI Account
ये सिर्फ क्लेरिकल वैरिएंट नहीं हैं. ये अलग-अलग काम करने वाले अलग-अलग खाते हैं और इनके बीच का अंतर ही पूरी कहानी है.
ODI अकाउंट क्या होता है, आसान भाषा में
मान लीजिए लंदन का कोई हेज फंड भारतीय शेयरों पर दांव लगाना चाहता है. वह सेबी के साथ रजिस्टर कर सकता है, अपने मालिकों का खुलासा कर सकता है, भारतीय नियमों का पालन कर सकता है और अपना खाता खोल सकता है. इसमें महीनों लगते हैं और इसका स्थायी रिकॉर्ड बन जाता है कि वह कौन है.
या फिर वह यह सब छोड़ सकता है. वह ऐसे बैंक को कॉल करता है, जिसके पास पहले से ही भारत में खाता है. वह उस बैंक से एक कॉन्ट्रैक्ट खरीदता है, एक पार्टिसिपेटरी नोट. बैंक अपने नाम से भारतीय शेयर खरीदने जाता है. अगर शेयर बढ़ते हैं, तो बैंक फंड को मुनाफे का भुगतान करता है. अगर वे गिरते हैं, तो नुकसान फंड उठाता है. भारत के सार्वजनिक रिकॉर्ड में बैंक दिखाई देता है. फंड कभी दिखाई नहीं देता.
यह कॉन्ट्रैक्ट एक ऑफशोर डेरिवेटिव इंस्ट्रूमेंट है. ज्यादातर लोग इसे अभी भी इसके पुराने नाम से जानते हैं: *P-note (Participatory Notes).*
हॉट मनी को लेकर वर्षों के विवाद के बावजूद भारत ने इन्हें कानूनी बनाए रखा है. इनकी रिपोर्टिंग होती है, इन्हें कुछ हद तक रेगुलेट किया जाता है. लेकिन ये एक खास काम करते हैं और इससे बचने का कोई रास्ता नहीं है. ये उस इकाई के बीच दूरी पैदा करते हैं, जिसका नाम ट्रेड पर दिखाई देता है और उस व्यक्ति के बीच, जिसका पैसा वास्तव में जोखिम में है. Copthall इसी उद्देश्य के लिए बनाए गए एक खाते का संचालन करता है.
सेबी के आदेश में किसी भी खाते का नाम नहीं
आदेश में इकाई की पहचान "Copthall Mauritius Investment Limited", PAN AAACC4303M के रूप में की गई है. कोई प्रत्यय नहीं. कोई खाता विवरण नहीं. इसमें यह नहीं बताया गया है कि सेंसेक्स को प्रभावित करने वाले ऑर्डर उस खाते से आए थे, जिसमें JPMorgan का अपना पैसा था, या उस खाते से जिसमें ऐसे ग्राहकों का पैसा था, जिनके नाम भारत के सार्वजनिक रिकॉर्ड में कहीं दिखाई नहीं देते.
46 पन्ने और यह अंतर एक बार भी सामने नहीं आता, लेकिन सार्वजनिक शेयरहोल्डिंग डिस्क्लोजर रिकॉर्ड में Copthall दो अलग-अलग नामों के तहत दिखाई देता है: इनमें से एक खुद को ODI अकाउंट के रूप में बताता है.
क्लोजिंग पर वास्तव में क्या दांव पर था
सेबी के आदेश में उस दोपहर सेंसेक्स ऑप्शंस में Copthall की होल्डिंग का विवरण दिया गया है. तीन स्तरों, 7,500, 78,000 और 78,500 पर उसने कॉल ऑप्शंस खरीदे और समान मात्रा में पुट ऑप्शंस बेचे.
एक ही स्तर पर समान आकार में कॉल खरीदना और पुट बेचना इस बात पर दांव लगाने का एक सामान्य तरीका है कि इंडेक्स ऊपर जाएगा. यह इंडेक्स को एक-के-बदले-एक ट्रैक करता है, चाहे इंडेक्स जहां भी समाप्त हो. तीनों को जोड़ने पर सेंसेक्स की हर एक अंक की चाल पर पोजीशन को ₹1,23,400 का फायदा या नुकसान होता था. करीब 78,000 के इंडेक्स स्तर पर यह लगभग ₹960 करोड़ की नॉशनल एक्सपोजर है, यह उस इंडेक्स की फेस वैल्यू है जिसे पोजीशन ट्रैक कर रही थी, न कि वह पैसा जो Copthall ने लगाया था.
सेबी यह संख्या प्रिंट नहीं करता. यह सीधे आदेश की अपनी तालिकाओं में दिए गए आंकड़ों से निकलती है.
इसका सबसे बड़ा हिस्सा 84,200 यूनिट, करीब ₹657 करोड़, सेबी की तालिका में "position built during the day" के रूप में दर्ज है. Copthall ने इसे एक्सपायरी की सुबह 78,000 के स्तर पर बनाया. सेंसेक्स 78,080 पर बंद हुआ, यानी उससे 80 अंक ऊपर.
सेबी के आदेश में इन छह कॉन्ट्रैक्ट्स को दोपहर 3:20 बजे Copthall के बकाया एक्सपायरी-डे सेंसेक्स ऑप्शंस के रूप में सूचीबद्ध किया गया है. इसमें यह नहीं बताया गया है कि Copthall के पास कहीं और ऑफसेटिंग पोजीशन थीं या नहीं. इंडेक्स के हर अंक की चाल उस पोजीशन के मालिक के लिए ₹1,23,400 के बराबर थी. सेबी का आकलन है कि इंडेक्स 240 अंक अधिक ऊपर बंद हुआ. 240 को ₹1,23,400 से गुणा करने पर ₹2,96,16,000 मिलते हैं, यही वह सटीक राशि है, रुपये तक, जिसे सेबी ने अब फ्रीज किया है.
इंडेक्स को ऊपर ले जाने में अधिक कीमत वाले शेयरों पर ₹57 लाख खर्च हुए. सेबी का अपना आदेश इस खर्च को नुकसान नहीं, बल्कि "expenditure" यानी व्यय कहता है.
57 लाख खर्च करें. 2.96 करोड़ हासिल करें. सेबी के आदेश में जिस सवाल का जवाब नहीं दिया गया है, वह यह है कि यह पैसा किसे मिला.
खाता जुर्माने से ज्यादा महत्वपूर्ण क्यों है
अगर पोजीशन प्रोपराइटरी अकाउंट में थी, तो यह बैंक का अपना ट्रेडिंग डेस्क है और JPMorgan इस गतिविधि का मालिक है. अगर यह ODI अकाउंट में थी, तो ₹2.96 करोड़ वास्तव में Copthall के थे ही नहीं. यह उस व्यक्ति का पैसा था, जिसने कॉन्ट्रैक्ट खरीदा था, कोई ऐसा व्यक्ति, जिसका नाम सेबी ने अभी तक नहीं बताया है.
इश्यूअर्स सेबी के पास सब्सक्राइबर की जानकारी जरूर दाखिल करते हैं और यह रिपोर्टिंग सार्वजनिक नहीं होती. लेकिन 46 पन्नों में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि रेगुलेटर ने यह पूछा कि इस पोजीशन के पीछे कोई था तो कौन था. सेबी ने शायद मॉरीशस में ऐसा पैसा फ्रीज कर दिया हो, जो मूल लाभार्थी का था ही नहीं.
इसके महत्व का एक और कारण है, जिसे किसी ने नहीं उठाया
दिसंबर 2024 में सेबी ने इन इंस्ट्रूमेंट्स से जुड़े अपने नियमों को दोबारा लिखा था. दो प्रावधान सीधे तौर पर प्रासंगिक हैं. बैंक अब ऐसे ऑफशोर डेरिवेटिव इंस्ट्रूमेंट जारी नहीं कर सकते, जिनका संदर्भ डेरिवेटिव्स से हो. वे भारतीय एक्सचेंजों पर ट्रेड होने वाले डेरिवेटिव्स का इस्तेमाल करके ऐसे इंस्ट्रूमेंट्स को हेज भी नहीं कर सकते, हेज वास्तविक शेयरों में एक-के-बदले-एक होना चाहिए.
सेंसेक्स ऑप्शंस से बनी पोजीशन एक डेरिवेटिव्स पोजीशन है. अगर इसे किसी ऑफशोर कॉन्ट्रैक्ट के खिलाफ रखा गया था, तो यह कोई फुटनोट नहीं है. यह एक दूसरा उल्लंघन होगा, उस नियम का जिसे ठीक 20 महीने पहले इस रास्ते को बंद करने के लिए लिखा गया था. सेबी के आदेश में इसका जिक्र नहीं है.
जो बात अभी बाकी है
रेगुलेटर ने छह दिनों में कार्रवाई की, जो वास्तव में तेज है और इसके लिए उसे श्रेय दिया जाना चाहिए. उसने ट्रेड्स की पहचान की, सेकंड-दर-सेकंड ऑक्शन को दोबारा तैयार किया और अगली एक्सपायरी से पहले पैसा फ्रीज कर दिया.
लेकिन उसने मॉरीशस में एक ऐसे अकाउंट होल्डर का नाम लिया है, जिसका पूर्ण स्वामित्व एक अमेरिकी बैंक के पास है, ऐसा बैंक जो वहां एक अकाउंट अपने पैसे के लिए और दूसरा ऐसे लोगों के पैसे के लिए संचालित करता है, जो भारत के रिकॉर्ड में दिखाई नहीं देते. उसके आदेश में दोनों के बीच अंतर नहीं किया गया है.
भारत में इसी ढांचे के जरिए ट्रेडिंग करने वाली अमेरिकी स्वामित्व वाली इकाइयों में Copthall अकेली नहीं है. यह अगली कहानी है.
खुलासे
19 अगस्त, 2026 के सेबी के एकपक्षीय अंतरिम आदेश में केवल प्रथम दृष्टया निष्कर्ष दिए गए हैं. Copthall Mauritius Investment Limited के पास जवाब देने के लिए 21 दिन हैं और वह व्यक्तिगत सुनवाई की मांग कर सकती है. आदेश में JPMorgan Chase & Co का नाम नहीं है.
हम ₹960 करोड़ तक कैसे पहुंचे
यह आंकड़ा सेबी के अपने आदेश में छपे पोजीशन साइज से हमारी गणना है. सेबी ने इसे नहीं बताया है. आदेश की तालिका 22 में 13 अगस्त को दोपहर 3:20 बजे Copthall की बकाया सेंसेक्स ऑप्शन पोजीशन सूचीबद्ध है: 77,500 कॉल के 26,560 यूनिट लॉन्ग और 77,500 पुट के 26,560 यूनिट शॉर्ट; 78,000 कॉल के 84,200 यूनिट लॉन्ग और 78,000 पुट के 84,200 यूनिट शॉर्ट; 78,500 कॉल के 12,640 यूनिट लॉन्ग और 78,500 पुट के 12,640 यूनिट शॉर्ट.
यूनिट्स इंडेक्स पॉइंट के हिसाब से रुपये हैं. सेबी खुद इसे पैराग्राफ 81 में स्थापित करता है, जहां वह 77,500 कॉल के पेऑफ को "340*26560 = ₹90,30,400" लिखता है.
एक ही स्ट्राइक और समान मात्रा में लॉन्ग कॉल और शॉर्ट पुट, इंडेक्स जिस स्तर पर भी हो, इंडेक्स स्तर माइनस स्ट्राइक के हिसाब से सेटल होते हैं. इसलिए पोजीशन सेंसेक्स के साथ एक-के-बदले-एक चलती है. तीनों जोड़ियों को मिलाने पर 26,560 प्लस 84,200 प्लस 12,640 प्रति इंडेक्स पॉइंट 1,23,400 रुपये होते हैं. इसे इंडेक्स से गुणा करने पर 13 अगस्त के 3:15 के संदर्भ मूल्य 77,829.60 पर ₹960.4 करोड़ और क्लोजिंग 78,080 पर ₹963.5 करोड़ होते हैं. हमने निचले स्तर का इस्तेमाल किया है.
एक जांच के तौर पर: सेबी के अपने गलत लाभ के आंकड़े ₹2,96,16,000 को उस 240 अंकों की विकृति से विभाजित करने पर, जिसे सेबी हेरफेर के लिए जिम्मेदार ठहराता है, 1,23,400 मिलता है, यही संख्या. हमने सेबी की सभी छह लाइन आइटम्स को स्वतंत्र रूप से दोबारा तैयार किया और रुपये तक ₹2,96,16,000 पर पहुंचे.
₹960 करोड़ नॉशनल एक्सपोजर है: यह उस इंडेक्स की फेस वैल्यू है जिसे पोजीशन ट्रैक कर रही थी. यह लगाया गया पूंजीगत धन नहीं है, सेबी ने कैश-मार्केट की लागत ₹57 लाख बताई है, न ही जोखिम में लगा पैसा है और न ही लाभ. लेकिन इसका यह भी मतलब है कि जांच का बड़ा हिस्सा कहीं बड़ी तस्वीर तय करेगा.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
नई दिल्ली में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी की बैठक में समुद्री सुरक्षा, नौसैनिक सहयोग और युद्धपोतों के डिजाइन व निर्माण में साझेदारी बढ़ाने पर सहमति बनी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत और जापान ने रक्षा और समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में अपनी रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. दोनों देशों ने नौसेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाने के साथ-साथ युद्धपोतों के डिजाइन, निर्माण और रखरखाव के क्षेत्र में संयुक्त सहयोग की संभावनाओं पर सहमति जताई है. यह फैसला रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी के बीच हुई बैठक में लिया गया.
राजनाथ सिंह से इस समझौते को लेकर अपने एक्स हैंडल पर एक पोस्ट भी शेयर करते हुए लिखा, हिंद-प्रशांत क्षेत्र की स्थिरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव! नई दिल्ली में जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी सान के साथ बेहद सार्थक और सकारात्मक बैठक हुई. हमारी बातचीत का मुख्य फोकस समुद्री सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने, ‘मेक इन इंडिया’ के तहत रक्षा तकनीक को बढ़ावा देने और रणनीतिक विश्वास को और गहरा करने पर रहा.
समुद्री सुरक्षा सहयोग के लिए नया समझौता
बैठक के दौरान दोनों देशों ने समुद्री सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए. इसके तहत भारतीय नौसेना और जापान की समुद्री आत्मरक्षा सेना के बीच सहयोग का एक व्यापक ढांचा तैयार किया जाएगा. इस साझेदारी के तहत समुद्री गतिविधियों की निगरानी, खोज एवं बचाव अभियान और मानवीय सहायता व आपदा राहत कार्यों में दोनों देश मिलकर काम करेंगे. समुद्री संचार मार्गों की सुरक्षा के लिए भी आपसी तालमेल बढ़ाया जाएगा.
युद्धपोत निर्माण में साथ आएंगे भारत और जापान
भारत और जापान ने समुद्र में बिछाई गई बारूदी सुरंगों का पता लगाने और उन्हें निष्क्रिय करने की क्षमता विकसित करने में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति जताई. इसके अलावा जापान की तकनीकी विशेषज्ञता और भारत की विनिर्माण क्षमता को मिलाकर नौसेना के जहाजों के डिजाइन और निर्माण में संयुक्त विकास की संभावनाओं पर विचार किया जाएगा. दोनों देश भारत की ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत जहाज निर्माण क्षेत्र में साझेदारी बढ़ाने के विकल्प तलाशेंगे. जहाजों की मरम्मत और रखरखाव सुविधाओं तक एक-दूसरे की पहुंच बढ़ाने की दिशा में भी काम किया जाएगा.
सैन्य अभ्यासों को मिलेगा नया विस्तार
बैठक में दोनों देशों ने संयुक्त सैन्य अभ्यासों के विस्तार का स्वागत किया. थलसेना के ‘धर्म गार्जियन’ और समुद्री अभ्यास ‘जैमेक्स’ के अलावा इस वर्ष के अंत में होने वाले वायुसेना अभ्यास ‘वीर गार्जियन 26’ की तैयारियों पर भी चर्चा हुई. इस अभ्यास में पहली बार जापान की वायु आत्मरक्षा सेना के लड़ाकू विमान भारत पहुंचेंगे. दोनों देश भविष्य में अपने सैन्य अभ्यासों को और जटिल बनाने, बिना चालक वाले प्रणालियों को शामिल करने और जरूरत पड़ने पर कम समय की सूचना पर संयुक्त अभ्यास आयोजित करने की दिशा में भी काम करेंगे.
रक्षा तकनीक और उपकरणों पर भी जोर
भारत और जापान ने रक्षा तकनीक के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई. दोनों देशों ने जहाजों पर लगाए जाने वाले ‘यूनिकॉर्न’ एकीकृत संचार एंटीना प्रणाली परियोजना को अपनी बढ़ती रक्षा साझेदारी का महत्वपूर्ण उदाहरण बताया. यह भारत और जापान के बीच रक्षा उपकरण हस्तांतरण से जुड़ी पहली परियोजना है. दोनों पक्षों ने इसे जल्द लागू करने की दिशा में काम करने पर सहमति जताई. इसके साथ ही भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन और जापान की अधिग्रहण, प्रौद्योगिकी एवं रसद एजेंसी के बीच रक्षा अनुसंधान और विकास सहयोग को भी मजबूत किया जाएगा.
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ेगा रणनीतिक तालमेल
भारत और जापान ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्वतंत्र और सुरक्षित समुद्री मार्गों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई. दोनों देशों ने क्षेत्र में बल प्रयोग या दबाव के जरिए मौजूदा स्थिति बदलने की किसी भी कोशिश का विरोध किया. दोनों पक्षों ने परिचालन, खुफिया जानकारी, रक्षा उपकरण, प्रौद्योगिकी और रक्षा उद्योग के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए एक संयुक्त कार्य समूह बनाने पर भी सहमति जताई. यह समूह दोनों देशों के बीच तय रक्षा सहयोग परियोजनाओं के क्रियान्वयन और उनकी प्रगति की निगरानी करेगा.
भारत-जापान के बीच बढ़ती यह रक्षा साझेदारी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दोनों देशों के रणनीतिक हितों को मजबूती देगी. खासतौर पर समुद्री सुरक्षा, युद्धपोत निर्माण, रक्षा तकनीक और संयुक्त सैन्य अभ्यासों में बढ़ता सहयोग क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है.
दूसरी पीढ़ी के उपग्रह नेटवर्क के लिए दोबारा आवेदन, नई तकनीक से दूरदराज इलाकों तक सीधे मोबाइल कनेक्टिविटी पहुंचाने की तैयारी
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स की सैटेलाइट इंटरनेट सेवा स्टारलिंक (Starlink) ने भारत में अपने दूसरी पीढ़ी के उपग्रह नेटवर्क के लिए एक बार फिर मंजूरी मांगी है. कंपनी ने करीब 30 हजार उपग्रह तैनात करने का प्रस्ताव दिया है. खास बात यह है कि नए आवेदन में ऐसी तकनीक भी शामिल है, जिसके जरिए भविष्य में मोबाइल फोन और अन्य उपकरण सीधे उपग्रह नेटवर्क से जुड़ सकेंगे.
दूसरी पीढ़ी के नेटवर्क के लिए फिर किया आवेदन
स्टारलिंक ने भारत में अपने पहले और दूसरे चरण के उपग्रह नेटवर्क के लिए पहले भी आवेदन किया था. भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र यानी इन-स्पेस ने कंपनी के पहली पीढ़ी के नेटवर्क को मंजूरी दी थी.
इस नेटवर्क में 4,408 निम्न पृथ्वी कक्षा वाले उपग्रह शामिल हैं. इनके जरिए स्टारलिंक भारत में उपग्रह आधारित ब्रॉडबैंड सेवा शुरू करने की तैयारी कर रही है. हालांकि, दूसरी पीढ़ी के नेटवर्क के लिए पहले किया गया आवेदन मंजूर नहीं हो पाया था. अब कंपनी नए आवेदन के जरिए दूसरी पीढ़ी के उपग्रह नेटवर्क को भारत में मंजूरी दिलाने की एक और कोशिश कर रही है.
सीधे मोबाइल से जुड़ सकेगा उपग्रह नेटवर्क
नए प्रस्ताव की सबसे खास बात सीधे उपकरण से जुड़ने वाली कनेक्टिविटी है. इस तकनीक के जरिए विशेष रूप से तैयार मोबाइल फोन और अन्य उपकरण सीधे उपग्रह से जुड़ सकेंगे. इससे हर बार अलग उपग्रह डिश या टर्मिनल की जरूरत नहीं पड़ेगी. खासकर पहाड़ी, दूरदराज और उन इलाकों में यह तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है, जहां मोबाइल नेटवर्क कमजोर है या मोबाइल टावर पहुंचाना मुश्किल है.
नियमों का इंतजार
भारत में मोबाइल को सीधे उपग्रह से जोड़ने वाली सेवाओं के लिए नियामकीय ढांचा अभी पूरी तरह तय नहीं हुआ है. दूरसंचार नियामक प्राधिकरण इस मुद्दे पर विचार कर रहा है और सरकार को स्पेक्ट्रम बैंड तथा अन्य जरूरी नियमों पर फैसला करना है.
पारंपरिक दूरसंचार कंपनियों ने भी ऐसी उपग्रह सेवाओं को लेकर चिंता जताई है. उनका कहना है कि अगर उपग्रह कंपनियां सीधे मोबाइल उपभोक्ताओं को कनेक्टिविटी उपलब्ध कराती हैं, तो उन पर भी दूरसंचार कंपनियों के समान नियम लागू होने चाहिए.
लंबे समय में 42 हजार उपग्रहों की योजना
स्पेसएक्स की योजना दूसरी पीढ़ी के नेटवर्क के तहत लंबे समय में करीब 42 हजार उपग्रह तैनात करने की है. भारत में फिलहाल कंपनी ने करीब 30 हजार उपग्रहों के लिए मंजूरी मांगी है. जरूरत के आधार पर भविष्य में अतिरिक्त उपग्रहों के लिए भी आवेदन किया जा सकता है.
भारत के उपग्रह इंटरनेट बाजार में बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा
भारत में उपग्रह आधारित इंटरनेट बाजार को लेकर प्रतिस्पर्धा लगातार तेज हो रही है. रिलायंस जियो, भारती समर्थित यूटेलसैट वनवेब और अमेजन जैसी कंपनियां भी इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की तैयारी कर रही हैं. स्टारलिंक को पहली पीढ़ी के नेटवर्क के लिए पहले ही इन-स्पेस से मंजूरी मिल चुकी है. हालांकि, व्यावसायिक सेवाएं शुरू करने से पहले कंपनी को स्पेक्ट्रम, सुरक्षा मंजूरी और अन्य नियामकीय प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी.
ब्रॉडबैंड के साथ मोबाइल कनेक्टिविटी पर भी नजर
अगर स्टारलिंक के दूसरी पीढ़ी के नेटवर्क और सीधे मोबाइल से जुड़ने वाली सेवा को भारत में मंजूरी मिलती है, तो कंपनी का दायरा केवल उपग्रह आधारित ब्रॉडबैंड तक सीमित नहीं रहेगा. वह सीधे मोबाइल उपकरणों तक कनेक्टिविटी पहुंचाने वाले क्षेत्र में भी कदम रख सकेगी.
भारत के दूरदराज और कमजोर नेटवर्क वाले इलाकों को देखते हुए यह तकनीक स्टारलिंक के लिए बड़ा अवसर बन सकती है. हालांकि, इसकी शुरुआत और विस्तार सरकार के नियमों, स्पेक्ट्रम आवंटन और जरूरी मंजूरियों पर निर्भर करेगा.