कंपनी का कुल मर्चेंट पेमेंट वॉल्यूम या GMV (ग्रॉस मर्चेंडाइज वैल्यू) 1.47 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर सालाना आधार पर 2.96 लाख करोड़ रुपये हो गया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
नई दिल्लीः फिनटेक ऐप Paytm को नया इंवेस्टमेंट मिला है, जिससे कंपनी की वैल्यूएशन में भारी इजाफा हुआ है. यह नया इंवेस्टमेंट म्यूचुअल फंड्स और फॉरेन पोर्टफोलियो इंवेस्टर्स द्वारा स्टेक बढ़ाने से हुआ है. पेटीएम को संचालित करने वाली कंपनी One 97 Communications ने इस बात की जानकारी एक रेग्यूलेटरी फाइलिंग में दी है. जून तिमाही में पेटीएम का शेयर करीब 18 फीसदी बढ़कर 675.8 रुपये हो गया.
इतनी बढ़ गई FPI की हिस्सेदारी
2022-23 की जून तिमाही में एफपीआई की शेयरहोल्डिंग 54 से बढ़कर 83 फीसदी हो गई है, जिसमें उनके द्वारा रखे गए शेयरों की संख्या 2,86,80,948 से बढ़कर 3,53,72,428 हो गई. इससे कंपनी में एफपीआई की हिस्सेदारी 4.42 फीसदी से बढ़कर 5.45 फीसदी हो गई है. म्यूचुअल फंड के रूप में शेयरधारकों की संख्या भी 3 फीसदी से बढ़कर 19 हो गई, उनके द्वारा रखे गए शेयरों की संख्या 68,19,790 से बढ़कर 74,02,309 हो गई है. जून तिमाही में पेटीएम का शेयर करीब 18 फीसदी बढ़कर 675.8 रुपये हो गया.
GMV में भी बढ़ोतरी
कंपनी का कुल मर्चेंट पेमेंट वॉल्यूम या GMV (ग्रॉस मर्चेंडाइज वैल्यू) 1.47 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर सालाना आधार पर 2.96 लाख करोड़ रुपये हो गया है. तिमाही में पेटीएम के औसत मासिक लेनदेन करने वाले यूजर्स (एमटीयू) जून तिमाही 2021-22 में 5 करोड़ से 49 प्रतिशत बढ़कर 7.48 करोड़ हो गए. जून 2022 तिमाही के दौरान, पेटीएम के जरिए लोन लेने वालों की संख्या 5 गुना बढ़कर 84.78 लाख हो गई, जो सालाना आधार पर 5,554 करोड़ रुपये के मूल्य के मामले में 9 गुना अधिक था.
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R&D पर GDP के अनुपात में खर्च के मामले में भारत कई प्रमुख ब्रिक्स देशों से पीछे है. चीन ने 2024 में अपने GDP का 2.69 प्रतिशत, ब्राजील ने 2023 में 1.19 प्रतिशत और रूस ने 2024 में लगभग 0.94 प्रतिशत R&D पर खर्च किया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में शोध एवं विकास (R&D) पर कुल निवेश पिछले चार वर्षों में 85 प्रतिशत बढ़कर 2.45 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है. हालांकि, सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के अनुपात में R&D पर खर्च अब भी केवल 0.84 प्रतिशत है, जो चीन, ब्राजील और रूस जैसे ब्रिक्स देशों से कम है. वहीं, इस दौरान एक बड़ा बदलाव यह देखने को मिला कि पहली बार R&D निवेश में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी सरकार से अधिक हो गई.
लोकसभा में सरकार की ओर से साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2019-20 में R&D पर कुल खर्च 1.33 लाख करोड़ रुपये था, जो 2023-24 में बढ़कर 2.45 लाख करोड़ रुपये हो गया. इसी अवधि में GDP के मुकाबले R&D खर्च की हिस्सेदारी 0.66 प्रतिशत से बढ़कर 0.84 प्रतिशत हुई. हालांकि, यह 2035 तक R&D पर GDP का 2 प्रतिशत खर्च करने के राष्ट्रीय लक्ष्य से अभी काफी दूर है.
BRICS देशों की तुलना में भारत पीछे
R&D पर GDP के अनुपात में खर्च के मामले में भारत कई प्रमुख ब्रिक्स देशों से पीछे है. चीन ने 2024 में अपने GDP का 2.69 प्रतिशत, ब्राजील ने 2023 में 1.19 प्रतिशत और रूस ने 2024 में लगभग 0.94 प्रतिशत R&D पर खर्च किया. भारत का यह आंकड़ा 0.84 प्रतिशत रहा. हालांकि, दक्षिण अफ्रीका (0.61 प्रतिशत) और वियतनाम (0.41 प्रतिशत) का खर्च भारत से कम दर्ज किया गया.
पहली बार निजी क्षेत्र ने सरकार को पीछे छोड़ा
रिपोर्ट के अनुसार, भारत के R&D निवेश ढांचे में उल्लेखनीय बदलाव आया है. वर्ष 2019-20 में कुल R&D खर्च में सरकार की हिस्सेदारी 66.2 प्रतिशत थी, जो 2023-24 में घटकर 48.2 प्रतिशत रह गई. इसके विपरीत, निजी उद्योग की हिस्सेदारी 33.8 प्रतिशत से बढ़कर 51.8 प्रतिशत हो गई. यह पहला अवसर है जब देश में शोध एवं विकास पर निजी क्षेत्र का निवेश सरकारी हिस्सेदारी से अधिक रहा.
निजी निवेश में ढाई गुना उछाल
निजी क्षेत्र का R&D पर निवेश 2019-20 के 44,754 करोड़ रुपये से बढ़कर 2023-24 में 1.18 लाख करोड़ रुपये हो गया. यानी चार वर्षों में यह करीब ढाई गुना बढ़ा और इसकी चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) 27.52 प्रतिशत रही.
राज्यों की भागीदारी अब भी सीमित
दूसरी ओर, राज्य सरकारों का योगदान अपेक्षाकृत कमजोर बना हुआ है. 2019-20 से 2023-24 के बीच राज्यों के R&D खर्च में केवल 3.4 प्रतिशत की वार्षिक चक्रवृद्धि वृद्धि दर्ज की गई. 2023-24 में देश के कुल R&D खर्च में राज्यों की हिस्सेदारी महज 4 प्रतिशत रही, जो शोध एवं नवाचार के क्षेत्र में उनकी सीमित भूमिका को दर्शाती है.
अप्रैल-जून तिमाही के दौरान 22 राज्यों ने संयुक्त रूप से पूंजीगत व्यय के लिए निर्धारित 10.45 लाख करोड़ रुपये के बजट में से 1.11 लाख करोड़ रुपये खर्च किए.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में राज्यों के पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) की रफ्तार सुस्त रही है. नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) के मासिक खातों के विश्लेषण के अनुसार, 22 राज्यों ने अप्रैल-जून अवधि में अपने पूंजीगत व्यय बजट का औसतन केवल 10.67 प्रतिशत खर्च किया, जो पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि के 10.94 प्रतिशत से कम है. रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे बड़े राज्यों का प्रदर्शन भी अपेक्षा से कमजोर रहा, जबकि केरल ने सबसे बेहतर प्रदर्शन किया.
अप्रैल-जून तिमाही के दौरान 22 राज्यों ने संयुक्त रूप से पूंजीगत व्यय के लिए निर्धारित 10.45 लाख करोड़ रुपये के बजट में से 1.11 लाख करोड़ रुपये खर्च किए. हालांकि, यह पिछले छह वर्षों की पहली तिमाहियों में खर्च की गई सबसे बड़ी वास्तविक राशि है, लेकिन बजट आवंटन के मुकाबले खर्च का अनुपात घटा है.
पिछले वर्षों की तुलना में कैसी रही तस्वीर?
सीएजी के आंकड़ों के अनुसार, पहली तिमाही में कैपेक्स खर्च का अनुपात पिछले कुछ वर्षों से सीमित दायरे में बना हुआ है. वित्त वर्ष 2023 में यह सबसे कम 9.02 प्रतिशत रहा था, जबकि वित्त वर्ष 2024 में यह 13.23 प्रतिशत के उच्च स्तर पर पहुंचा था. मौजूदा वित्त वर्ष में 10.67 प्रतिशत का खर्च वित्त वर्ष 2023 और 2025 से बेहतर जरूर है, लेकिन वित्त वर्ष 2022 और 2026 की पहली तिमाही से कम है.
केरल ने दिखाई सबसे तेज रफ्तार
राज्यों में केरल ने सबसे बेहतर प्रदर्शन करते हुए अपने वार्षिक पूंजीगत व्यय बजट का 36.41 प्रतिशत पहली तिमाही में ही खर्च कर दिया. इसके बाद मध्य प्रदेश (18.21 प्रतिशत), आंध्र प्रदेश (16.61 प्रतिशत), हरियाणा (16.26 प्रतिशत) और हिमाचल प्रदेश (15.90 प्रतिशत) का स्थान रहा.
त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश पीछे
सबसे कमजोर प्रदर्शन त्रिपुरा का रहा, जिसने अपने पूंजीगत व्यय आवंटन का केवल 1.81 प्रतिशत खर्च किया. इसके बाद पश्चिम बंगाल (1.89 प्रतिशत) और मेघालय (3.03 प्रतिशत) रहे. बड़े राज्यों में उत्तर प्रदेश, जिसका कैपेक्स बजट 1.78 लाख करोड़ रुपये के साथ सबसे बड़ा है, उसने जून के अंत तक केवल 6.34 प्रतिशत राशि खर्च की. वहीं ओडिशा (5.19 प्रतिशत), तमिलनाडु (5.53 प्रतिशत) और कर्नाटक (6.83 प्रतिशत) भी पूंजीगत व्यय के मामले में धीमे रहे.
राजस्व व्यय और कर संग्रह की स्थिति
पहली तिमाही में 22 राज्यों ने कुल 9.66 लाख करोड़ रुपये का राजस्व व्यय किया, जो उनके संयुक्त वार्षिक राजस्व व्यय बजट का 18.52 प्रतिशत है. इस मामले में हिमाचल प्रदेश (25.01 प्रतिशत), आंध्र प्रदेश (24.66 प्रतिशत), तेलंगाना (23.38 प्रतिशत) और केरल (22.69 प्रतिशत) सबसे आगे रहे. वहीं झारखंड, बिहार और महाराष्ट्र का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा.
कर राजस्व के मोर्चे पर राज्यों ने अप्रैल-जून तिमाही में 7.73 लाख करोड़ रुपये की वसूली की, जो पूरे वित्त वर्ष 2026-27 के अनुमानित कर राजस्व 40.48 लाख करोड़ रुपये का 19.11 प्रतिशत है.
वैश्विक बाजार में सोने की कीमतों में सुधार का असर आरबीआई के गोल्ड रिजर्व पर भी दिखा. समीक्षा सप्ताह के दौरान सोने के भंडार का मूल्य 1.308 अरब डॉलर बढ़कर 103.058 अरब डॉलर हो गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) में मजबूती का सिलसिला लगातार चौथे सप्ताह भी जारी रहा है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 24 जुलाई 2026 को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 6.118 अरब डॉलर बढ़कर 682.354 अरब डॉलर पर पहुंच गया. इस बढ़ोतरी में विदेशी मुद्रा आस्तियों (FCA) के साथ-साथ सोने के भंडार के मूल्य में आई वृद्धि का अहम योगदान रहा.
आरबीआई के साप्ताहिक आंकड़ों के मुताबिक, इससे पहले वाले सप्ताह में भी विदेशी मुद्रा भंडार में 1.08 अरब डॉलर का इजाफा हुआ था. हालांकि, यह अब भी 27 फरवरी 2026 को दर्ज 728.494 अरब डॉलर के रिकॉर्ड उच्च स्तर से नीचे है.
विदेशी मुद्रा आस्तियों में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी
24 जुलाई को समाप्त सप्ताह के दौरान विदेशी मुद्रा आस्तियों (Foreign Currency Assets-FCA) में 4.873 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई, जिससे इनका कुल मूल्य बढ़कर 555.929 अरब डॉलर हो गया. विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा FCA का होता है. इसमें यूरो, पाउंड और येन जैसी प्रमुख वैश्विक मुद्राओं में होने वाले उतार-चढ़ाव का भी प्रभाव शामिल होता है.
सोने के भंडार का मूल्य भी बढ़ा
वैश्विक बाजार में सोने की कीमतों में सुधार का असर आरबीआई के गोल्ड रिजर्व पर भी दिखा. समीक्षा सप्ताह के दौरान सोने के भंडार का मूल्य 1.308 अरब डॉलर बढ़कर 103.058 अरब डॉलर हो गया. मार्च 2026 के अंत तक आरबीआई के पास 880.52 टन सोने का भंडार था, जो देश के कुल विदेशी मुद्रा भंडार का लगभग 16.7 प्रतिशत है.
SDR और IMF रिजर्व में मामूली गिरावट
दूसरी ओर, स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (SDR) में 53 मिलियन डॉलर की कमी दर्ज की गई, जिसके बाद इसका स्तर 18.617 अरब डॉलर रह गया. वहीं, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के पास रखे भारत के रिजर्व में भी 11 मिलियन डॉलर की गिरावट आई और यह 4.750 अरब डॉलर पर पहुंच गया.
कंपनी ने शुक्रवार को बताया कि असाधारण आम बैठक (EGM) में शेयरधारकों ने प्रमोटर समूह की इकाई को वरीयता आधार पर पूर्ण रूप से परिवर्तनीय वारंटजारी करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
कंटेंट और टेक्नोलॉजी कंपनी ZEE एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज (ZEE Entertainment Enterprises) को पूंजी जुटाने और कर्मचारी स्टॉक विकल्प योजना (ESOP) लागू करने के प्रस्तावों पर शेयरधारकों की मंजूरी मिल गई है. इस मंजूरी के तहत कंपनी के प्रमोटर समूह की इकाई 3,143.5 करोड़ रुपये का निवेश करेगी, जिससे प्रमोटर्स की हिस्सेदारी बढ़कर 23.79 प्रतिशत हो जाएगी. कंपनी का कहना है कि यह कदम उसकी वित्तीय स्थिति को मजबूत करने और दीर्घकालिक विकास रणनीति को गति देने में मदद करेगा.
शेयरधारकों ने EGM में दी मंजूरी
कंपनी ने शुक्रवार को बताया कि असाधारण आम बैठक (EGM) में शेयरधारकों ने प्रमोटर समूह की इकाई को वरीयता (Preferential) आधार पर पूर्ण रूप से परिवर्तनीय वारंट (Fully Convertible Warrants) जारी करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. इसके साथ ही ZEE और उसकी सहायक कंपनियों के कर्मचारियों के लिए 'ट्रूली यॉर्स' (Truly Yours) कर्मचारी स्टॉक विकल्प योजना (ESOP) को भी हरी झंडी मिल गई है.
कंपनी के अनुसार, इन प्रस्तावों को मंजूरी मिलने से उसकी वित्तीय नींव और मजबूत होगी, जिससे भविष्य में मूल्य सृजन करने वाले निवेश और विकास के अवसरों का लाभ उठाया जा सकेगा.
प्रमोटर करेंगे 3,143.5 करोड़ रुपये का निवेश
शेयरधारकों की मंजूरी के बाद ZEE, प्रमोटर समूह की इकाई को 126 रुपये प्रति वारंट की कीमत पर 24,94,85,563 पूर्ण रूप से परिवर्तनीय वारंट जारी करेगी. इसके जरिए प्रमोटर समूह कंपनी में 3,143.5 करोड़ रुपये का निवेश करेगा. इस निवेश के बाद कंपनी में प्रमोटर्स की कुल हिस्सेदारी बढ़कर 23.79 प्रतिशत हो जाएगी.
ZEE एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज के चेयरमैन आर. गोपालन ने कहा कि यह मंजूरी कंपनी और उसके प्रबंधन पर शेयरधारकों के भरोसे को दर्शाती है. उन्होंने कहा कि प्रमोटर्स द्वारा किए जा रहे पूंजी निवेश से कंपनी की वित्तीय मजबूती और लचीलापन बढ़ेगा, जिससे ZEE प्रतिस्पर्धा में आगे रहने और सभी हितधारकों के लिए अधिक मूल्य सृजित करने में सक्षम होगी.
'Truly Yours' ESOP योजना लागू होगी
कंपनी 'Truly Yours' ESOP योजना के तहत ZEE और उसकी सहायक कंपनियों के पात्र कर्मचारियों को एक या अधिक चरणों में 3,74,22,835 स्टॉक विकल्प (Stock Options) जारी करेगी. प्रत्येक विकल्प का अंकित मूल्य (Face Value) 1 रुपये होगा.
कंपनी का कहना है कि इस योजना का उद्देश्य कर्मचारियों को कंपनी की विकास यात्रा में वास्तविक भागीदार बनाना है. ESOP ढांचा कर्मचारियों की विकास आकांक्षाओं को कंपनी और उसके शेयरधारकों के दीर्घकालिक लक्ष्यों के साथ जोड़ता है, जिससे सभी हितधारकों के लिए सतत मूल्य सृजन सुनिश्चित किया जा सके.
विकास योजनाओं पर रहेगा फोकस
कंपनी के मुताबिक, अतिरिक्त पूंजी उपलब्ध होने से वह अपने नए रणनीतिक विकास क्षेत्रों में निवेश बढ़ाएगी और मौजूदा कारोबार की क्षमताओं को मजबूत करेगी. इससे कंपनी की दीर्घकालिक विकास रणनीति को गति मिलने की उम्मीद है.
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत अपतटीय (ऑफशोर) क्षेत्रों में हाइड्रोकार्बन की खोज और उत्पादन को नई गति दी जाएगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ते ऊर्जा सुरक्षा जोखिमों के बीच केंद्र सरकार ने घरेलू तेल और प्राकृतिक गैस उत्पादन बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 84,084 करोड़ रुपये की 'समुद्र मंथन' (नेशनल ऑफशोर एक्सप्लोरेशन स्कीम) को मंजूरी दे दी है. वित्त वर्ष 2030-31 तक लागू होने वाली इस योजना का उद्देश्य समुद्री क्षेत्रों में तेल-गैस की खोज तेज करना, आयात पर निर्भरता कम करना और भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता को मजबूत बनाना है.
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत अपतटीय (ऑफशोर) क्षेत्रों में हाइड्रोकार्बन की खोज और उत्पादन को नई गति दी जाएगी. सरकार का अनुमान है कि इस पहल से देश के तेल भंडार में 600 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक की वृद्धि हो सकती है. साथ ही घरेलू तेल और गैस उत्पादन बढ़ने से ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिलेगी.
क्यों अहम है यह योजना?
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का करीब 90 प्रतिशत आयात करता है. ऐसे समय में जब होर्मुज जलडमरूमध्य, लाल सागर और अन्य प्रमुख समुद्री मार्गों पर भू-राजनीतिक तनाव बना हुआ है, सरकार घरेलू उत्पादन बढ़ाकर आयात पर निर्भरता कम करना चाहती है. इसी रणनीति के तहत 'समुद्र मंथन' योजना को मंजूरी दी गई है.
अमित शाह ने किया पोस्ट
गृह मंत्री अमित शाह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि 84,084 करोड़ रुपये की 'समुद्र मंथन' योजना भारत की अपतटीय ऊर्जा क्षमता का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करेगी. उनके मुताबिक, इससे घरेलू तेल और गैस उत्पादन बढ़ेगा, बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा होंगे और 'विकसित भारत' के लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी.
The Union Cabinet's approval of the ₹84,084 crore 'Samudra Manthan' Scheme gives fresh impetus to our nation's growth.
— Amit Shah (@AmitShah) July 31, 2026
Unlocking India's vast offshore energy potential, the scheme will boost domestic oil and gas production while generating employment at scale, to achieve Modi… pic.twitter.com/XEFvfau9dK
स्वदेशी उद्योग को मिलेगा बढ़ावा
सरकार का मानना है कि इस योजना से 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान को नई मजबूती मिलेगी. ऑफशोर टेक्नोलॉजी, उपकरण निर्माण और सेवाओं से जुड़े उद्योगों में निवेश बढ़ेगा, जिससे वैश्विक स्तर का प्रतिस्पर्धी इकोसिस्टम विकसित होगा. साथ ही एक्सप्लोरेशन और प्रोडक्शन वैल्यू चेन में दीर्घकालिक निवेश और रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे.
'समुद्र मंथन' योजना के प्रमुख फायदे
1. हाइड्रोकार्बन भंडार में 600 मिलियन टन से अधिक की संभावित बढ़ोतरी.
2. वार्षिक तेल उत्पादन में 10-15 मिलियन टन तक वृद्धि, जिसे आगे 20 मिलियन टन तक ले जाने का लक्ष्य.
3. आयात पर निर्भरता घटने से विदेशी मुद्रा की बचत.
4. एक्सप्लोरेशन, मैन्यूफैक्चरिंग और ऊर्जा क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा.
5. जीडीपी वृद्धि और औद्योगिक गतिविधियों को गति.
6. तेल, गैस और ऊर्जा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर.
NSE के मुताबिक, सेबी की ओर से औपचारिक सेटलमेंट आदेश जारी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में लंबित सभी संबंधित मामले वापस ले लिए जाएंगे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के बहुप्रतीक्षित IPO का रास्ता अब लगभग साफ हो गया है. बाजार नियामक सेबी (SEBI) ने एक्सचेंज के खिलाफ लंबित रेगुलेटरी मामलों के निपटारे के लिए 1,491.21 करोड़ रुपये के सेटलमेंट प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है. इस समझौते के साथ को-लोकेशन और डार्क फाइबर जैसे वर्षों पुराने विवाद सुलझने की दिशा में बढ़ गए हैं, जो लंबे समय से NSE के लिस्टिंग प्लान में सबसे बड़ी बाधा बने हुए थे.
सेबी ने सैद्धांतिक मंजूरी दी
NSE ने शेयर बाजार को दी जानकारी में बताया कि 30 जुलाई 2026 को सेबी ने ईमेल के जरिए सेटलमेंट की शर्तों को सैद्धांतिक रूप से स्वीकार कर लिया. कुल 1,491.21 करोड़ रुपये की सेटलमेंट राशि में से 776.47 करोड़ रुपये, जो पहले ही सेबी के पास जमा थे, समायोजित कर दिए जाएंगे. इसके बाद एक्सचेंज को 714.74 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भुगतान करना होगा. कंपनी ने कहा कि इस सेटलमेंट का वित्तीय प्रभाव 31 मार्च 2026 को समाप्त वित्त वर्ष के खातों में पहले ही शामिल किया जा चुका है.
को-लोकेशन और डार्क फाइबर विवाद होंगे खत्म
यह समझौता को-लोकेशन मामले और डार्क फाइबर विवाद सहित सभी प्रमुख लंबित मामलों को कवर करता है. को-लोकेशन केस 2015 से जांच, अपील और विभिन्न न्यायिक मंचों पर सुनवाई के कारण लंबित था. इस मामले में कुछ ब्रोकरेज फर्मों पर ट्रेडिंग सर्वर तक कथित तौर पर विशेष पहुंच मिलने के आरोप लगे थे.
सुप्रीम कोर्ट से वापस लिए जाएंगे मामले
NSE के मुताबिक, सेबी की ओर से औपचारिक सेटलमेंट आदेश जारी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में लंबित सभी संबंधित मामले वापस ले लिए जाएंगे. इससे एक्सचेंज के खिलाफ चल रही वर्षों पुरानी कानूनी प्रक्रिया समाप्त होने का रास्ता खुल जाएगा.
IPO लॉन्च की तैयारी तेज
रेगुलेटरी अड़चनें दूर होने के बाद NSE अब अपने बहुप्रतीक्षित IPO को आगे बढ़ाने की तैयारी में है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक्सचेंज इस सार्वजनिक निर्गम के जरिए 26,000 करोड़ रुपये से अधिक जुटाने की योजना बना रहा है. यदि प्रक्रिया तय समय पर आगे बढ़ती है, तो यह भारत के सबसे बड़े IPO में से एक हो सकता है.
AI, हेल्थटेक, एजुकेशन और सस्टेनेबिलिटी पर आधारित समाधानों के साथ युवा स्टार्टअप आइडिया को मिल रहा बढ़ावा; विजेता टीमों को मिलेगा 2 करोड़ रुपये तक का इनक्यूबेशन सपोर्ट
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में टेक्नोलॉजी आधारित इनोवेशन का दायरा अब बड़े शहरों तक सीमित नहीं रह गया है. छोटे शहरों से भी बड़ी संख्या में युवा नए बिजनेस आइडिया और तकनीकी समाधान के साथ सामने आ रहे हैं. इसका उदाहरण Samsung Solve for Tomorrow 2026 के टॉप 100 चयन में देखने को मिला है, जहां 50 फीसदी से ज्यादा चुनी गई टीमें टियर-2 और टियर-3 शहरों से हैं.
इस प्रोग्राम के पांचवें एडिशन के लिए देशभर से आए आवेदनों में पिछले साल के मुकाबले 85 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि भागीदारी 95 फीसदी बढ़ी है. चयनित टीमें अब मेंटरशिप, प्रोटोटाइप डेवलपमेंट और इनक्यूबेशन सपोर्ट के जरिए अपने आइडिया को बाजार उपयोग के लायक समाधान में बदलने की दिशा में आगे बढ़ेंगी.
छोटे शहरों में बढ़ रहा इनोवेशन इकोसिस्टम
टॉप 100 टीमों में बिहार के बक्सर, असम के कामरूप, हरियाणा के कैथल, तेलंगाना के मेडचल-मलकजगिरी, ओडिशा के सुंदरगढ़ और मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम जैसे शहरों के युवा शामिल हैं. यह ट्रेंड दिखाता है कि देश के छोटे शहरों में भी टेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और उद्यमिता को लेकर रुचि तेजी से बढ़ रही है. पहले जहां स्टार्टअप और इनोवेशन गतिविधियां मुख्य रूप से मेट्रो शहरों तक केंद्रित थीं, वहीं अब छोटे शहरों के युवा भी स्थानीय समस्याओं के लिए तकनीकी समाधान विकसित कर रहे हैं.
AI और हेल्थटेक पर युवाओं का फोकस
चयनित टीमों के आइडिया चार प्रमुख क्षेत्रों पर केंद्रित हैं, जिनमें AI आधारित समाधान, स्वास्थ्य और शिक्षा, खेल तकनीक और पर्यावरणीय स्थिरता शामिल हैं. AI से जुड़े समाधानों में सार्वजनिक सुरक्षा के लिए गुमनाम रिपोर्टिंग प्लेटफॉर्म, वाहन खराबी की पहचान करने वाली तकनीक और एक्सेसिबिलिटी बढ़ाने वाले स्मार्ट डिवाइस शामिल हैं.
हेल्थ और एजुकेशन सेगमेंट में युवाओं ने ऑटिज्म से जुड़े लोगों की जरूरतों को समझने वाली AI तकनीक, बच्चों में सेंसररी समस्याओं की पहचान करने वाले वियरेबल डिवाइस और कम लागत वाले स्मार्ट क्लासरूम समाधान विकसित किए हैं. वहीं, स्पोर्ट्स टेक्नोलॉजी में दृष्टिबाधित खिलाड़ियों के लिए स्मार्ट डिवाइस और AI आधारित कोचिंग प्लेटफॉर्म जैसे आइडिया शामिल हैं.
इनोवेशन को स्टार्टअप में बदलने पर जोर
टॉप 100 टीमों को अब विशेषज्ञों और स्टार्टअप फाउंडर्स से मेंटरशिप मिलेगी, जिससे वे अपने आइडिया को प्रोटोटाइप और संभावित बिजनेस मॉडल में बदल सकेंगी. टॉप 40 टीमें इनोवेशन बूटकैंप में हिस्सा लेंगी, जहां उन्हें प्रोडक्ट डेवलपमेंट, मार्केट रणनीति और तकनीकी सुधार के लिए मार्गदर्शन मिलेगा.
इसके बाद टॉप 20 टीमों को प्रोटोटाइप तैयार करने के लिए वित्तीय सहायता दी जाएगी, जबकि फाइनल में चुनी गई चार विजेता टीमों को कुल 2 करोड़ रुपये तक की इनक्यूबेशन ग्रांट और संस्थागत सपोर्ट मिलेगा.
भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम के लिए बढ़ते अवसर
युवा इनोवेशन प्रोग्राम्स के जरिए कंपनियां अब केवल आइडिया प्रतियोगिता तक सीमित नहीं रह रही हैं, बल्कि शुरुआती स्तर के प्रोडक्ट और संभावित स्टार्टअप्स को पहचानने पर भी ध्यान दे रही हैं.
AI, हेल्थटेक, क्लाइमेट टेक और एजुकेशन टेक जैसे क्षेत्रों में बढ़ती संभावनाओं के बीच ऐसे प्लेटफॉर्म नए उद्यमियों के लिए फंडिंग, मेंटरशिप और बाजार तक पहुंच बनाने का जरिया बन रहे हैं.
टाटा स्टील की कंसोलिडेटेड ऑपरेशंस से आय जून तिमाही में सालाना आधार पर 14.3 फीसदी बढ़कर 60,794 करोड़ रुपये हो गई. हालांकि, पिछली तिमाही की तुलना में इसमें 3.9 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
टाटा स्टील (Tata Steel) ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून 2026) में मजबूत प्रदर्शन दर्ज किया है. कंपनी का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 19 फीसदी बढ़कर 2,385.24 करोड़ रुपये पहुंच गया. पिछले साल की समान तिमाही में कंपनी का मुनाफा 2,008 करोड़ रुपये था. हालांकि, तिमाही आधार पर कंपनी की कमाई में गिरावट आई है, क्योंकि कम बिक्री मात्रा (वॉल्यूम) का असर अधिक स्टील कीमतों से मिले लाभ पर पड़ा. कंपनी ने बढ़ती इनपुट लागत और नीदरलैंड्स में नियामकीय अनिश्चितताओं को भी प्रमुख चुनौतियों के रूप में बताया है.
टाटा स्टील की कंसोलिडेटेड ऑपरेशंस से आय जून तिमाही में सालाना आधार पर 14.3 फीसदी बढ़कर 60,794 करोड़ रुपये हो गई. हालांकि, पिछली तिमाही की तुलना में इसमें 3.9 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.
कंपनी का कंसोलिडेटेड EBITDA एक साल पहले के 7,480 करोड़ रुपये से बढ़कर 9,370 करोड़ रुपये हो गया. EBITDA मार्जिन भी 14.1 फीसदी से सुधरकर 15.4 फीसदी पहुंच गया. बेहतर स्टील कीमतों के कारण प्रति टन EBITDA बढ़कर 12,898 रुपये हो गया, जो पिछले साल की समान तिमाही में 10,503 रुपये था.
प्री-टैक्स मुनाफे में भी बढ़ोतरी
असाधारण मदों से पहले कंपनी का प्रॉफिट बिफोर टैक्स (PBT) बढ़कर 4,183 करोड़ रुपये हो गया, जबकि पिछले साल की समान तिमाही में यह 3,199 करोड़ रुपये था. वित्त लागत मामूली रूप से घटकर 1,771 करोड़ रुपये रही, जो पिछले साल 1,852 करोड़ रुपये थी. कंपनी ने जून तिमाही में कुल कंसोलिडेटेड प्रॉफिट बिफोर टैक्स 3,838 करोड़ रुपये दर्ज किया.
टाटा स्टील ने कहा कि भारत में खासकर सीजनल कमजोरी के कारण बिक्री मात्रा पर दबाव रहा. भारत और नीदरलैंड्स में कोकिंग कोल की ऊंची लागत, इन्वेंट्री बढ़ना, ज्यादा रॉयल्टी भुगतान और पश्चिम एशिया संकट के कारण बिजली व ईंधन खर्च बढ़ने से मुनाफे पर असर पड़ा. हालांकि, बेहतर स्टील कीमतों और लागत में सुधार की पहलों ने इस दबाव को कुछ हद तक कम किया.
भारत कारोबार ने संभाली कंपनी की कमाई
जून तिमाही में भारत टाटा स्टील का सबसे मजबूत बाजार बना रहा. भारत में कच्चे इस्पात का उत्पादन बढ़कर 54.6 लाख टन पहुंच गया, जबकि डिलीवरी सालाना आधार पर 9 फीसदी बढ़कर 51.7 लाख टन रही.
भारत कारोबार से कंपनी की ऑपरेशंस से आय 36,897 करोड़ रुपये रही और EBITDA 9,409 करोड़ रुपये दर्ज किया गया. स्टैंडअलोन नेट प्रॉफिट भी बढ़कर 4,536 करोड़ रुपये हो गया.
कंपनी ने कहा कि मौसमी सुस्ती के बावजूद घरेलू डिलीवरी उत्पादन के अनुरूप बनी रही. ऑटोमोबाइल, कंस्ट्रक्शन, रिटेल और इंजीनियरिंग क्षेत्रों से मांग में मजबूती देखने को मिली.
पूरे ग्रुप स्तर पर कच्चे इस्पात का उत्पादन 76.9 लाख टन रहा, जबकि डिलीवरी 72.7 लाख टन दर्ज की गई. हालांकि, पिछली तिमाही के मुकाबले बिक्री मात्रा में गिरावट आई, लेकिन विभिन्न बाजारों में बेहतर स्टील कीमतों से इसकी भरपाई हुई.
वैल्यू एडेड कारोबार में भी बढ़ोतरी
टाटा स्टील ने अपने वैल्यू एडेड कारोबार में भी लगातार सुधार की जानकारी दी. हाई-एंड स्टील उत्पादों की ऑटो बिक्री में सालाना आधार पर 21 फीसदी की वृद्धि हुई. वहीं, टाटा टिस्कॉन ने पहली तिमाही में अब तक का सबसे अधिक वॉल्यूम दर्ज किया.
यूरोप कारोबार में मिली-जुली तस्वीर
कंपनी के यूरोपीय कारोबार का प्रदर्शन मिश्रित रहा. टाटा स्टील नीदरलैंड्स का EBITDA 39 करोड़ रुपये पॉजिटिव रहा, लेकिन पिछली तिमाही की तुलना में इसमें तेज गिरावट आई. इसकी वजह कम डिलीवरी और कच्चे माल की बढ़ी लागत रही.
वहीं, टाटा स्टील यूके का EBITDA 341 करोड़ रुपये निगेटिव रहा. हालांकि, मार्च तिमाही के 591 करोड़ रुपये के नुकसान की तुलना में इसमें सुधार हुआ, क्योंकि बेहतर स्टील कीमतों से कुछ राहत मिली.
कंपनी ने बताया कि नीदरलैंड्स में IJmuiden कोक और गैस प्लांट के परमिट रद्द करने के प्रस्ताव के बाद नियामकीय अनिश्चितता बनी हुई है. हालांकि, प्रबंधन ने कहा कि बातचीत जारी है और कंपनी अपने वित्तीय विवरणों को कारोबार जारी रखने (Going Concern) के आधार पर तैयार कर रही है.
टाटा स्टील यूके ने भी यूके सरकार से मिले फंडिंग कमिटमेंट और प्रस्तावित इक्विटी निवेश के आधार पर अपने वित्तीय विवरण तैयार किए हैं. कंपनी ने कहा कि सभी कारोबारों में उसकी लिक्विडिटी स्थिति मजबूत बनी हुई है.
कर्ज बढ़ा, लेकिन डेट-इक्विटी अनुपात में सुधार
तिमाही के दौरान टाटा स्टील ने कुछ संपत्तियों, प्लांट और उपकरणों के उपयोगी जीवन का पुनर्मूल्यांकन किया, जिसके चलते 294 करोड़ रुपये का अतिरिक्त डेप्रिसिएशन चार्ज दर्ज किया गया. कंपनी का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में डेप्रिसिएशन करीब 1,178 करोड़ रुपये बढ़ सकता है.
जून तिमाही के अंत में कंपनी की नेटवर्थ 1.01 लाख करोड़ रुपये रही. कंपनी का नेट डेट मार्च के अंत के 80,144 करोड़ रुपये से बढ़कर 84,173 करोड़ रुपये हो गया. वहीं, ग्रॉस डेट बढ़कर 97,985 करोड़ रुपये पहुंच गया.
हालांकि, कर्ज बढ़ने के बावजूद नेट डेट-टू-इक्विटी अनुपात वित्त वर्ष 2025-26 के अंत के 0.82 से सुधरकर 0.80 हो गया.
विलय और अधिग्रहण से जुड़े अपडेट
टाटा स्टील ने बताया कि उसकी पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी नीलाचल इस्पात निगम लिमिटेड (NINL) के कंपनी में विलय का प्रस्ताव नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की मंजूरी का इंतजार कर रहा है.
इसके अलावा, TM इंटरनेशनल लॉजिस्टिक्स में अतिरिक्त 23 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने के प्रस्ताव के लिए भी नियामकीय मंजूरी लंबित है. इस सौदे के बाद कंपनी की संयुक्त उद्यम (JV) में हिस्सेदारी बढ़कर 74 फीसदी हो जाएगी.
भारत में क्लीन मोबिलिटी को बढ़ावा देने के साथ इलेक्ट्रिक कमर्शियल व्हीकल बाजार में तेजी आने की उम्मीद है, जिससे इस क्षेत्र की कंपनियों के लिए नए अवसर पैदा हो रहे हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
महिंद्रा एंड महिंद्रा की इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर सब्सिडियरी महिंद्रा लास्ट माइल मोबिलिटी (MLMML) ने यूनिकॉर्न का दर्जा हासिल कर लिया है. कंपनी ने लाइटरॉक (Lightrock), इंटरनेशनल फाइनेंस कॉरपोरेशन (IFC) और इंडिया-जापान फंड (IJF) से करीब 322 करोड़ रुपये की फंडिंग जुटाई है. इस निवेश के बाद कंपनी का वैल्यूएशन बढ़कर 10,822 करोड़ रुपये हो गया है.
यह फंडिंग राउंड लाइटरॉक के नेतृत्व में पूरा हुआ, जिसमें मौजूदा निवेशकों IFC और IJF ने भी भागीदारी की. यह निवेश महिंद्रा के इलेक्ट्रिक मोबिलिटी कारोबार में बढ़ते भरोसे को दर्शाता है और भारत के इलेक्ट्रिक कमर्शियल व्हीकल सेगमेंट में निवेशकों की बढ़ती दिलचस्पी को उजागर करता है.
इस लेनदेन के तहत MLMML ने निवेशकों के साथ शेयर सब्सक्रिप्शन एग्रीमेंट किया है. प्रस्तावित इक्विटी इश्यू पूरा होने के बाद महिंद्रा एंड महिंद्रा की MLMML में हिस्सेदारी 78.11 फीसदी से घटकर 75.79 फीसदी रह जाएगी. हालांकि, कंपनी महिंद्रा ग्रुप की सब्सिडियरी बनी रहेगी.
इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर सेगमेंट में तेजी से बढ़ रही मांग
MLMML के मुताबिक, भारत में L5 कैटेगरी के इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर्स की पहुंच पिछले दो वर्षों में 12 फीसदी से बढ़कर 40 फीसदी हो गई है. कंपनी की इस सेगमेंट में करीब 40 फीसदी बाजार हिस्सेदारी है.
कंपनी ने पिछले चार वर्षों में इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर बिक्री में छह गुना वृद्धि दर्ज की है. वित्त वर्ष 2025-26 में MLMML ने 1 लाख इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर्स की बिक्री की. वहीं, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में कंपनी के वॉल्यूम में सालाना आधार पर 85 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई.
महिंद्रा ग्रुप के ग्रुप CEO और मैनेजिंग डायरेक्टर अनीश शाह ने कहा कि लाइटरॉक का निवेश कंपनी की लास्ट-माइल मोबिलिटी पहल को मजबूती देगा. इस पहल का लक्ष्य 2031 तक भारतीय सड़कों पर 10 लाख इलेक्ट्रिक वाहनों को उतारना है.
भारत के इलेक्ट्रिक मोबिलिटी बाजार में बढ़ रहा निवेश
यह निवेश भारत के इलेक्ट्रिक मोबिलिटी इकोसिस्टम में बढ़ते निवेशकों के भरोसे को दर्शाता है. इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर्स अब लास्ट-माइल ट्रांसपोर्टेशन के इलेक्ट्रिफिकेशन में अहम भूमिका निभा रहे हैं. ऐसे में इस क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियां रणनीतिक और संस्थागत निवेशकों का ध्यान आकर्षित कर रही हैं.
भारत में क्लीन मोबिलिटी को बढ़ावा देने के साथ इलेक्ट्रिक कमर्शियल व्हीकल बाजार में तेजी आने की उम्मीद है, जिससे इस क्षेत्र की कंपनियों के लिए नए अवसर पैदा हो रहे हैं.
भारत की रोजगार यात्रा ने पिछले कुछ वर्षों में मजबूत सुधार दर्ज किया है. महामारी के बाद बेरोजगारी दर में आई गिरावट इस बात का संकेत है कि अर्थव्यवस्था ने रोजगार सृजन की क्षमता दिखाई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
साढ़े चार वर्षों तक भारत ने दुनिया की सबसे कम चर्चा में रहने वाली आर्थिक पुनर्बहाली में से एक को अंजाम दिया. महामारी के दौरान लगे लॉकडाउन के मलबे से, जब 2020 में बेरोजगारी दर 8.8% तक पहुंच गई थी, देश ने नवंबर 2025 तक इसे घटाकर 4.7% कर दिया, यानी 26 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की. यह एक शांत जीत थी: न सुर्खियां, न जश्न, सिर्फ ग्रामीण और शहरी भारत में लगातार रोजगार सृजन.
फिर भू-राजनीति ने दखल दिया.
मई 2026 में भारत की बेरोजगारी दर बढ़कर 5.5% हो गई, जो लगभग एक वर्ष का उच्चतम स्तर था. इसकी वजह कोई नीतिगत चूक नहीं थी. यह अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक कमजोरी भी नहीं थी. इसका कारण था फारस की खाड़ी में शिपिंग संकट और 1970 के दशक के ऊर्जा संकट के बाद वैश्विक तेल आपूर्ति में सबसे बड़ा व्यवधान. हालांकि, इस समय ने एक असहज सच्चाई उजागर कर दी: भारत की आर्थिक पुनर्बहाली वास्तविक तो है, लेकिन वह अब भी ऐसे बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशील है, जिन पर किसी भी सरकार का प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं होता.
वह वापसी जो वास्तव में सफल रही
आंकड़े वास्तविक कहानी बताते हैं. 2021 से 2025 के बीच भारत की बेरोजगारी दर 6.38% से घटकर 4.70% पर आ गई—यानी 1.68 प्रतिशत अंकों की गिरावट, जो अर्थव्यवस्था में वास्तविक रोजगार सृजन का संकेत देती है.
2021: 6.38% (महामारी के बाद का समायोजन)
2022: 4.82% (तेज होती पुनर्बहाली, -1.56 प्रतिशत अंक)
2023: 4.17% (संकट-पूर्व सामान्य स्थिति के करीब)
2024: 4.20% (स्थिरता बरकरार)
नवंबर 2025: 4.70% (पांच वर्षों का निचला स्तर)
यह सुधार न तो सांख्यिकीय हेरफेर का परिणाम था और न ही अस्थायी अनुबंध आधारित नौकरियों का. भारत ने औपचारिक और अनौपचारिक दोनों क्षेत्रों में लाखों रोजगार के अवसर पैदा किए, जबकि वेतन स्तर भी अपेक्षाकृत स्थिर रहा. ब्याज दरें, श्रम कानून, निवेश प्रोत्साहन और बुनियादी ढांचे पर खर्च जैसी नीतियां लगातार स्थिर और कारोबार-अनुकूल बनी रहीं. कई देशों के विपरीत, जिन्होंने आर्थिक पुनर्बहाली के दौरान राजकोषीय अनुशासन छोड़ दिया, भारत ने एक कठिन संतुलन बनाए रखा, तेजी से बढ़ती महंगाई के बिना रोजगार में निरंतर वृद्धि.
इस सफलता का असर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रूप में दिखा. शहरी रोजगार में मजबूती बनी रही, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में भी स्थिरता रही. इससे संकेत मिलता है कि रोजगार सृजन किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं था, बल्कि व्यापक स्तर पर हुआ. 1.4 अरब की श्रम शक्ति वाले देश के लिए यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं थी.
बाहरी झटका
फिर मई 2026 आ गया.
फारस की खाड़ी में समुद्री मार्गों के बंद होने से वह स्थिति पैदा हुई, जिसे अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने "वैश्विक तेल बाजार के इतिहास में सबसे बड़ा आपूर्ति व्यवधान" बताया. भारत अपनी कच्चे तेल की लगभग 85% जरूरत आयात से पूरी करता है. जब वैश्विक तेल कीमतें बढ़ती हैं, तो भारत का विदेशी मुद्रा भंडार दबाव में आता है. जब तेल आयात बिल बढ़ता है, तो महंगाई बढ़ती है. और जब लोगों की क्रय शक्ति घटती है, तो कंपनियां नई भर्तियां रोक देती हैं.
सबसे पहले रुपया प्रभावित हुआ. वित्त वर्ष 2026 के दौरान इसमें 9% की गिरावट आई, जबकि संघर्ष बढ़ने के बाद इसमें अतिरिक्त 3.1% की कमजोरी दर्ज की गई. आयात लागत तेजी से बढ़ी. घरेलू खपत, जिसने आर्थिक पुनर्बहाली को गति दी थी, कमजोर पड़ गई. कंपनियों ने भर्ती पर रोक लगा दी. सिर्फ एक महीने में, अप्रैल से मई 2026 के बीच बेरोजगारी दर 0.3 प्रतिशत अंक बढ़ गई.
क्षेत्रवार अंतर भी स्पष्ट हो गया.
शहरी बेरोजगारी: मई में 6.4% (हालांकि अप्रैल के 6.6% से कम, जो कुछ मजबूती का संकेत देता है)
ग्रामीण बेरोजगारी: मई में 5.1% (अप्रैल की तुलना में 0.5 प्रतिशत अंक अधिक, जहां कृषि क्षेत्र का दबाव भी जुड़ गया)
### नीतिगत माहौल: अपरिवर्तित, स्थिर और दोषमुक्त
जो नहीं बदला, वह था भारत का नीतिगत ढांचा. ब्याज दरें विकास लक्ष्यों के अनुरूप रहीं. श्रम कानूनों में क्रमिक सुधार जारी रहे. बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की गति बनी रही. कॉरपोरेट टैक्स दरें प्रतिस्पर्धी रहीं. वैश्विक अस्थिरता के बावजूद प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) का प्रवाह मजबूत बना रहा.
मई 2026 में बेरोजगारी दर में आई तेजी किसी नीतिगत विफलता का परिणाम नहीं थी. यह तेल बाजार में 25 वर्षों के सबसे बड़े झटके का असर था, जिसने आयात-निर्भर अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया. यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई धावक दौड़ते समय अचानक ट्रैक पर किसी और द्वारा खड़ी की गई अदृश्य दीवार से टकरा जाए—इसका मतलब यह नहीं कि उसकी तैयारी में कमी थी.
यह अंतर समझना महत्वपूर्ण है. 2020 के 8.8% से नवंबर 2025 के 4.7% तक की बेरोजगारी दर में गिरावट वास्तविक, टिकाऊ और नीतियों से समर्थित थी. वहीं हालिया बढ़ोतरी, जिससे दर 5.5% तक पहुंची, भी वास्तविक है, लेकिन अस्थायी और बाहरी परिस्थितियों से प्रेरित है.
असहज सवाल
5.5% की बेरोजगारी दर हाल के वर्षों के हिसाब से अधिक जरूर है, लेकिन संदर्भ भी उतना ही महत्वपूर्ण है. देश अब भी 2020 की महामारी के दौरान के स्तर की तुलना में 31% बेहतर स्थिति में है. 2021 के बाद से हुआ सुधार निर्विवाद है. जिस नीतिगत ढांचे ने इस पुनर्बहाली को संभव बनाया, वह अब भी कायम है.
आंकड़े यह बताते हैं कि भारत ने रोजगार सृजन की ऐसी व्यवस्था तैयार की, जो काम कर रही थी. वैश्विक अव्यवस्था ने उसे फिलहाल कुछ समय के लिए बाधित कर दिया. वह व्यवस्था अब भी मौजूद है. यह दोबारा कितनी तेजी से गति पकड़ती है, यह इस पर कम निर्भर करेगा कि नीति-निर्माता आगे क्या करते हैं, और इस पर अधिक कि होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री यातायात कब सामान्य होता है और वैश्विक ऊर्जा बाजार कब स्थिर होते हैं.
तब तक 5.5% की बेरोजगारी दर को शासन की विफलता के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक परिस्थितियों के बंधक के रूप में देखना चाहिए. यह याद दिलाती है कि वैश्वीकरण के दौर में अच्छी नीतियां भी किसी देश को बाहरी झटकों से पूरी तरह सुरक्षित नहीं रख सकतीं.
डेटा स्रोत:
ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स: भारत की बेरोजगारी दर (2018-2026)
सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MOSPI), भारत सरकार
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA): 2026 वैश्विक तेल बाजार व्यवधान विश्लेषण
आर्थिक मामलों का विभाग, भारत सरकार: मासिक आर्थिक समीक्षा (मार्च एवं मई 2026)
मैक्रोट्रेंड्स: भारत का ऐतिहासिक बेरोजगारी डेटा (1991-2026)
अगर चाहें, मैं इसे **BW Businessworld हिंदी** की शैली के अनुसार और भी संपादित (भाषा अधिक प्रवाहपूर्ण और प्रकाशन-योग्य) कर सकता हूँ.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)