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क्यों अंबानी के हाथ से फिसल गई Boots, क्या होता डील का फायदा?

रिलायंस इंडस्ट्री के चेयरमैन मुकेश अंबानी हेल्थ सेक्टर में बड़ा दांव खेलने की तैयारी में थे, लेकिन आखिरी वक्त पर बाजी उनके हाथ से निकल गई.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

रिलायंस इंडस्ट्री के चेयरमैन मुकेश अंबानी हेल्थ सेक्टर में बड़ा दांव खेलने की तैयारी में थे, लेकिन आखिरी वक्त पर बाजी उनके हाथ से निकल गई. दरअसल, अंबानी ने ब्रिटेन की दिग्गज फार्मा कंपनी Boots को खरीदने के लिए अमेरिकी कंपनी अपोलो ग्लोबल मैनेजमेंट के साथ मिलकर करीब 6.1 अरब डॉलर से अधिक की संयुक्त बोली लगाई थी. Boots दुनिया की सबसे बड़ी ड्रग रिटेलर कंपनियों में से एक है और यदि अंबानी अपने इस दांव में कामयाब हो जाते तो यह रिलायंस की विदेश में सबसे बड़ी डील होती.

क्यों नहीं बनी बात?
अंबानी और अपोलो ने जो ऑफर दिया था, वो बूट्स की पैरेंट कंपनी Walgreens को पसंद नहीं आया. कंपनी ने अपने बयान में कहा है कि बाजार की अस्थिरता के कारण वित्तीय उपलब्धता पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है. कोई भी पक्ष ऐसा प्रस्ताव नहीं दे पाया, जो Boots के हाई वैल्यू को पर्याप्त रूप से दर्शाता हो. इसका सीधा सा मतलब है कि Walgreens बूट्स को लेकर जितनी बड़ी राशि की उम्मीद लगाए बैठी थी, वो ऑफर नहीं की गई. यानी कंपनी को ढंग का खरीदार नहीं मिल सका. हालांकि, कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया है कि Boots का हालिया मजबूत प्रदर्शन भी उसे न बेचने के निर्णय में अहम है. 

और कौन था दौड़ में?
Boots को खरीदने की दौड़ में ब्रिटेन के अरबपति इस्सा बंधु भी शामिल थे. बता दें कि दोनों भाई मूलरूप से गुजरात के हैं. इन भाइयों ने Euro Garages कंपनी के माध्यम से इस डील के लिए बोली लगाई थी. हालांकि, बाद में उन्होंने अपना नाम वापस ले लिए. इसके बाद Walgreens के पास केवल रिलायंस और अपोलो के कंसोर्टियम का ही ऑफर बचा है. लेकिन उसने इस ऑफर में दिलचस्पी नहीं दिखाई.

क्या करती है बूट्स?
बूट्स हेल्थ सेक्टर से जुड़ी कंपनी है. अमेरिका की दूसरी सबसे बड़ी फार्मेसी चेन Walgreens ब्रिटेन में अपना कारोबार बूट्स के नाम से चलाती है. Boots के ब्रिटेन में 2,200 स्टोर हैं. Walgreens ने जनवरी में रणनीतिक समीक्षा की घोषणा के बाद बूट्स को बेचने और अपने घरेलू बिजनेस पर फोकस करने का फैसला किया था. इसके बाद बूट्स को खरीदने की दौड़ शुरू हो गई थी.

क्या है बूट्स की कमाई?
कोरोना महामारी के दौरान बूट्स की ज़रूरत बड़े पैमाने पर महसूस हुई. एक रिपोर्ट के अनुसार, लॉकडाउन में ब्रिटेन के दूसरे स्टोर भले ही बंद रहे, लेकिन बूट्स के स्टोर खुले रहे. कंपनी की सालाना आमदनी करीब 6 अरब पाउंड है और इसका लगभग 46% हिस्सा उसे ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस में प्रिस्क्रिप्शन और वैक्सिनेशन जैसी सेवाओं के जरिए मिलता है.

रिलायंस को क्या मिलता?
कोरोना महामारी के बाद से हेल्थ सेक्टर में बड़े बदलाव आए हैं. इस दौरान, फार्मेसी कंपनियों की आर्थिक सेहत में काफी सुधार देखने को मिला. इसी वजह से मुकेश अंबानी अपने प्रोटफोलियो में बूट्स को शामिल करना चाहते थे. बूट्स पहले से ही ब्रिटेन में स्थापित है, इससे रिलायंस को ब्रिटेन का बाजार मिलता. इसके अलावा, वो बूट्स के जरिये दक्षिण-पूर्व एशिया और पश्चिमी एशिया में भी कारोबार का विस्तार कर सकती थी. इस डील से मुकेश अंबानी को न केवल एक बड़ा बाजार मिलता, बल्कि वो यहां गौतम अडानी को चुनौती पेश कर सकते थे. क्योंकि अडानी ग्रुप पहले से ही हेल्थ सेक्टर में एंट्री ले चुका है. 
 


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