Mukesh Ambani ने Youtube से मिलाया हाथ, यूजर्स को 2 साल तक फ्री मिलेगी ये सर्विस

मुकेश अंबानी की टेलीकॉम कंपनी Reliance Jio अपने यूजर्स को YouTube Premium का सब्सक्रिप्शन फ्री में ऑफर कर रही है. ये सब्सक्रिप्शन दो साल के लिए दिया जाएगा.

Last Modified:
Saturday, 11 January, 2025
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अगर आपके पास Jio AirFiber या फिर JioFiber कनेक्शन है, तो आपके लिए एक अच्छी खबर है. दरअसल, मुकेश अंबानी की टेलीकॉम कंपनी रिलायंस जियो (Reliance Jio) अपने यूजर्स के लिए एक शानदार ऑफर लेकर आई है. कंपनी अपने ब्रॉडबैंड यूजर्स को कुछ चुनिंदा प्लान्स के साथ यूट्यूब सब्सक्रिप्शन (YouTube Premium) का सब्सक्रिप्शन सर्विस दे रही है. तो आइए जानते हैं इस ऑफर का फायदा आप कैसे उठा सकते हैं?  

इन प्लांस के साथ मिलेगा ऑफर का लाभ

बता दें. इस ऑफर का फायदा केवल जियो ब्रॉडबैंड प्लान्स के साथ ही मिलेगा. इस ऑफर को चुनिंदा JioFiber और Jio AirFiber प्लान्स के साथ दिया जा रहा है. कंपनी के अनुसार जियोफाइबर और एयरफाइबर यूजर्स को 888 रुपये, 1199 रुपये, 1499 रुपये, 2499 रुपये और 3499 रुपये वाले प्लान के साथ ही ऑफर का फायदा मिलेगा. इन प्लान्स के अलावा अगर आप बाकी किसी भी प्लान से रिचार्ज करते हैं तो आपको यूट्यूब प्रीमियम का बेनिफिट नहीं मिलेगा. यूट्यूब की प्रीमियम सर्विस के साथ एड-फ्री व्यूइंग एक्सपीरियंस, ऑफलाइन वीडियो डाउनलोड, बैकग्राउंड प्ले और यूट्यूब म्यूजिक प्रीमियम का फ्री एक्सेस यूजर्स को दिया जाएगा.

ऑफर का लाभ लेने के लिए करना होगा ये काम
ऑफर का फायदा उठाने के लिए सबसे पहले आपको ऊपर बताए गए किसी भी एक प्लान को चुनना होगा. प्लान खरीदने के बाद माय जियो अकाउंट में लॉग-इन करें. इसके बाद ऐप या फिर वेबसाइट पर यूट्यूब प्रीमियम बैनर पर क्लिक करें. इसके बाद अपने यूट्यूब अकाउंट में साइन-इन करें और अगर आपके पास अकाउंट नहीं है तो सबसे पहले यूट्यूब अकाउंट क्रिएट करें. इसके बाद आप दो सालों तक फ्री यूट्यूब प्रीमियम प्लान का लुत्फ उठा पाएंगे.

इतनी है YouTube Premium सब्सक्रिप्शन 
यूट्यूब प्रीमियम के मंथली प्लान की कीमत 159 रुपये और एनुअल प्लान की कीमत 1490 रुपये है. इस हिसाब से देखा जाए तो कंपनी आप लोगों को 2980 रुपये का फायदा फ्री में दे रही है.


लौह अयस्क होगा महंगा, स्क्रैप बनेगा स्टील इंडस्ट्री का सबसे बड़ा कच्चा माल: डॉ. अशोक पांडा

सेल के सीएमडी डॉ. अशोक कुमार पांडा ने कहा कि स्टील किसी भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. इसका प्रत्यक्ष योगदान भले ही 7-8 प्रतिशत के आसपास हो, लेकिन यह पूरे औद्योगिक विकास को गति देता है.

रितु राणा by
Published - Wednesday, 08 July, 2026
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Wednesday, 08 July, 2026
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भारत का स्टील उद्योग अब केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उसका भविष्य स्क्रैप आधारित स्टील निर्माण, सर्कुलर इकोनॉमी, ग्रीन टेक्नोलॉजी और डीकार्बोनाइजेशन पर निर्भर करेगा. आने वाले वर्षों में आयरन ओर महंगा हो सकता है, जबकि स्क्रैप सबसे महत्वपूर्ण कच्चे माल के रूप में उभरेगा. साथ ही इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस (EAF) तकनीक, नवीकरणीय ऊर्जा और आधुनिक तकनीकें भारतीय स्टील उद्योग की दिशा तय करेंगी. यह बात एम-जंक्शन (mjunction) द्वारा आयोजित 13वें भारतीय स्टील मार्केट (Steelathon) सम्मेलन में स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक (CMD) डॉ. अशोक कुमार पांडा ने अपने संबोधन में कही.

उन्होंने कहा कि हमारी जिम्मेदारी केवल स्टील का उत्पादन करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि स्टील का हर टन उत्पादक से उपभोक्ता, उपभोक्ता से रिसाइक्लर और फिर नए स्टील के रूप में उत्पादन चक्र में वापस लौटे. यही वास्तविक सर्कुलर इकोनॉमी का मॉडल है और इसी दिशा में उद्योग को आगे बढ़ना होगा.

स्टील सेक्टर 'सनशाइन' नहीं, 'सनराइज' इंडस्ट्री

SAIL CMD ने कहा कि कई लोग स्टील उद्योग को 'सनशाइन इंडस्ट्री' कहते हैं क्योंकि इसमें प्रतिस्पर्धा तीव्र है, लागत का दबाव रहता है और मुनाफा सीमित होता है. लेकिन उनके अनुसार यह वास्तव में 'सनराइज इंडस्ट्री' है, क्योंकि इसमें विकास की अपार संभावनाएं हैं और आने वाले वर्षों में यह भारत की आर्थिक प्रगति का प्रमुख आधार बनने वाला है.

उन्होंने कहा कि स्टील किसी भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. इसका प्रत्यक्ष योगदान भले ही 7-8 प्रतिशत के आसपास हो, लेकिन यह पूरे औद्योगिक विकास को गति देता है. कोविड-19 महामारी के दौरान जब अर्थव्यवस्था ठहर गई थी, तब स्टील उद्योग ने उत्पादन के साथ-साथ मेडिकल ऑक्सीजन उपलब्ध कराकर भी देश की जरूरतों को पूरा किया. 

उन्होंने कहा कि सरकार की पूरी विकास योजना में स्टील एक प्रमुख घटक है. इसलिए स्टील उत्पादन बढ़ाने के साथ रेलवे, जलमार्ग, सड़क और लॉजिस्टिक्स को भी समान गति से विकसित करना होगा.

भारत में स्टील की मांग दुनिया से तेज बढ़ रही

उन्होंने कहा कि विकसित देशों में स्टील की मांग स्थिर या घट रही है, जबकि भारत में यह करीब 7-8 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है. प्रति व्यक्ति स्टील खपत अभी भी विकसित देशों की तुलना में कम है, इसलिए आने वाले वर्षों में मांग में तेज वृद्धि की संभावना है.

उन्होंने बताया कि भारत की स्टील उत्पादन क्षमता करीब 180-190 मिलियन टन तक पहुंच चुकी है और उद्योग 300 मिलियन टन क्षमता के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है. हालांकि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा. रेलवे, सड़क, जलमार्ग, बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन जैसे बुनियादी ढांचे को भी समान गति से विकसित करना होगा.

लौह अयस्क पर निर्भरता घटानी होगी

उन्होंने कहा कि फिलहाल भारत में अधिकांश स्टील उत्पादन ब्लास्ट फर्नेस-बेसिक ऑक्सीजन फर्नेस (BF-BOF) तकनीक से होता है, जहां मुख्य कच्चा माल लौह अयस्क (Iron Ore)  है. अभी तक लौह अयस्क अपेक्षाकृत सस्ता रहा है, लेकिन भविष्य में टैक्स, रॉयल्टी और अन्य शुल्कों के कारण इसकी लागत बढ़ सकती है. ऐसे में स्टील उद्योग को वैकल्पिक कच्चे माल की ओर बढ़ना होगा.

स्क्रैप बनेगा भविष्य का सबसे अहम कच्चा माल

SAIL CMD ने कहा कि जिस स्क्रैप को कभी बेकार समझा जाता था, वही अब स्टील उद्योग का सबसे मूल्यवान संसाधन बनने जा रहा है. भविष्य में स्क्रैप केवल कबाड़ नहीं रहेगा, बल्कि स्टील उत्पादन का प्रमुख कच्चा माल होगा. उन्होंने कहा कि ऑटोमोबाइल स्क्रैपिंग जैसी नीतियां घरेलू स्तर पर स्क्रैप की उपलब्धता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएंगी.

उन्होंने यह भी कहा कि स्क्रैप का महत्व केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है. पूरी दुनिया में आयरन ओर का तेजी से खनन हो रहा है और भविष्य में प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा. ऐसे में स्क्रैप रिसाइक्लिंग संसाधनों की सुरक्षा और दीर्घकालिक स्टील उत्पादन के लिए भी जरूरी होगी.

ग्रीन स्टील के लिए EAF तकनीक होगी अहम

उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस (EAF) आधारित स्टील उत्पादन भविष्य में तेजी से बढ़ेगा क्योंकि इससे कार्बन उत्सर्जन काफी कम होता है. हालांकि फिलहाल इसकी लागत अधिक है, लेकिन सस्ती बिजली, नवीकरणीय ऊर्जा और नई तकनीकों के विस्तार से यह उत्पादन पद्धति अधिक प्रतिस्पर्धी बन जाएगी.

उन्होंने कहा कि EAF तकनीक की सबसे बड़ी लागत बिजली है. यदि उद्योग को सस्ती और विश्वसनीय बिजली उपलब्ध होती है तो ग्रीन स्टील का उत्पादन तेजी से बढ़ सकेगा.

कार्बन उत्सर्जन कम करना सबसे बड़ी चुनौती

उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर डीकार्बोनाइजेशन अब स्टील उद्योग की सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है. यूरोप सहित कई देशों में कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) जैसे नियम लागू किए जा रहे हैं. ऐसे में भारतीय स्टील उद्योग को उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ कार्बन फुटप्रिंट भी कम करना होगा.

उन्होंने कहा कि बेहतर परिचालन, नई तकनीक, ईंधन की खपत कम करना, स्वच्छ कच्चे माल का उपयोग और रिसाइक्लिंग इस लक्ष्य को हासिल करने के प्रमुख साधन होंगे.

SAIL CMD ने कहा कि तकनीक के विकास के साथ उद्योग में 'वेस्ट' की परिभाषा बदल रही है. पहले कम ग्रेड वाले आयरन ओर और स्टील स्लैग को बेकार माना जाता था, लेकिन आज नई तकनीकों की मदद से यही संसाधन उपयोगी कच्चे माल में बदल चुके हैं. उन्होंने कहा कि ब्लास्ट फर्नेस स्लैग का उपयोग सीमेंट उद्योग में, जबकि स्टील स्लैग का उपयोग सड़क निर्माण और अन्य औद्योगिक कार्यों में हो रहा है. भविष्य में लगभग हर औद्योगिक उप-उत्पाद का दोबारा उपयोग संभव होगा.

AI और सप्लाई चेन तय करेंगे उद्योग का भविष्य

उन्होंने कहा कि भविष्य का स्टील उद्योग केवल उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगा. इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), फाइनेंस, ट्रेडिंग, स्टील एवं स्क्रैप ट्रेड, स्लैग ट्रेड, वैल्यू अनलॉकिंग, सप्लाई चेन मैनेजमेंट और पारदर्शी बाजार व्यवस्था जैसी पूरी वैल्यू चेन महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी.

उन्होंने कहा कि स्टीलाथॉन सम्मेलन का उद्देश्य इसी पूरे इकोसिस्टम पर चर्चा करना है ताकि स्टील, स्क्रैप और स्लैग की निर्बाध सप्लाई चेन विकसित की जा सके और भारत वैश्विक स्टील उद्योग में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त को और मजबूत कर सके. यह पॉइंट आर्टिकल में नहीं आया था.

मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को भी मजबूती मिलेगी: विनय वर्मा

एम-जंक्शन के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी विनय वर्मा ने स्वागत भाषण में कहा, "अब स्क्रैप को कचरा नहीं माना जाता, बल्कि यह भविष्य का स्टील है."

उन्होंने कहा, "भारत में स्टील की मांग लगातार बढ़ रही है. ऐसे में स्क्रैप केवल एक उप-उत्पाद नहीं रहेगा, बल्कि रणनीतिक कच्चे माल के रूप में उभरेगा. जितना अधिक स्टील स्क्रैप हम वापस हासिल करेंगे, उतनी ही हमारी आयरन ओर और आयातित स्क्रैप पर निर्भरता कम होगी. इससे भारत के मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को भी मजबूती मिलेगी."

उन्होंने कहा, एम-जंक्शन का उद्देश्य डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से स्क्रैप उत्पन्न करने वालों और स्टील निर्माताओं को जोड़ना है, ताकि पारदर्शिता बढ़े, बेहतर मूल्य खोज हो और पूरी वैल्यू चेन अधिक मजबूत बन सके."

 


35 अरब डॉलर के माइक्रोफाइनेंस पोर्टफोलियो पर संकट, कमजोर मानसून बढ़ा सकता है डिफॉल्ट

ग्रामीण आय पर दबाव से माइक्रोफाइनेंस कंपनियों की रिकवरी को झटका लगने की आशंका

Last Modified:
Wednesday, 08 July, 2026
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कमजोर मानसून और बढ़ती महंगाई ने भारत के माइक्रोफाइनेंस सेक्टर की चिंताएं फिर बढ़ा दी हैं. ग्रामीण आय पर दबाव बढ़ने से करीब 35 अरब डॉलर (लगभग 3 लाख करोड़ रुपये) के माइक्रोफाइनेंस लोन पोर्टफोलियो पर डिफॉल्ट का जोखिम गहराने लगा है. रेटिंग एजेंसी S&P Global Ratings का कहना है कि यदि बारिश सामान्य से कम रहती है, तो कर्ज चुकाने की क्षमता कमजोर होगी और माइक्रोफाइनेंस कंपनियों की लोन ग्रोथ भी प्रभावित हो सकती है.

कमजोर मानसून से लोन ग्रोथ पर असर

रिपोर्ट्स के अनुसार, कमजोर मानसून की स्थिति में माइक्रोफाइनेंस कंपनियां अंडरराइटिंग मानकों को और सख्त कर सकती हैं. वहीं, ग्रामीण आय घटने से कर्जदारों की पुनर्भुगतान क्षमता भी कमजोर होगी. उन्होंने बताया कि लगभग 20 फीसदी माइक्रोफाइनेंस उधारकर्ताओं ने दो या उससे अधिक संस्थानों से कर्ज लिया हुआ है. ऐसे कर्जदारों में डिफॉल्ट की दर अपेक्षाकृत अधिक देखी जा रही है.

दो वर्षों से दबाव में रहा सेक्टर

पिछले दो वर्षों में तेज कर्ज वितरण के कारण कई उधारकर्ता अत्यधिक कर्ज के बोझ तले दब गए थे, जिससे डिफॉल्ट बढ़ा और माइक्रोफाइनेंस कंपनियों को जोखिम प्रबंधन के लिए कड़े कदम उठाने पड़े. हालांकि, उद्योग संगठनों के दिशानिर्देशों के बाद कंपनियों ने कर्ज वितरण में सावधानी बरतनी शुरू की, जिससे हाल के महीनों में स्थिति कुछ स्थिर होती दिखाई दी थी. लेकिन कमजोर मानसून ने इस सुधार की रफ्तार पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं.

इन कंपनियों का सबसे अधिक एक्सपोजर

माइक्रोफाइनेंस क्षेत्र में प्रमुख संस्थानों में बंधन बैंक, CreditAccess Grameen, Satin Creditcare Network और Muthoot Microfin शामिल हैं. मार्च 2026 के अंत तक बंधन बैंक की कुल लोन बुक का लगभग 23 फीसदी हिस्सा माइक्रोफाइनेंस और माइक्रो-लेंडिंग से जुड़ा था.

मानसून और महंगाई दोनों बने चुनौती

सेंट्रल बैंक की जून रिपोर्ट के मुताबिक, लगातार सात तिमाहियों की गिरावट के बाद जनवरी-मार्च तिमाही में माइक्रोफाइनेंस क्रेडिट में सुधार दर्ज किया गया था. इससे सेक्टर की रिकवरी की उम्मीद बढ़ी थी. हालांकि, 12 वर्षों के सबसे सूखे जून के बाद जुलाई में भी सामान्य से कम बारिश की आशंका जताई जा रही है. कमजोर मानसून से फसल उत्पादन और कृषि आय प्रभावित हो सकती है, जिससे ग्रामीण परिवारों की खर्च करने और कर्ज चुकाने की क्षमता कमजोर पड़ सकती है.

इसके अलावा, पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में जारी तनाव के कारण ईंधन, उर्वरक और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी का जोखिम भी बना हुआ है, जिससे महंगाई और बढ़ सकती है.

ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सबसे अधिक निर्भर माइक्रोफाइनेंस

गीता चुघ के अनुसार, माइक्रोफाइनेंस कंपनियों का करीब 80 फीसदी एक्सपोजर ग्रामीण क्षेत्रों में है. इसमें लगभग 35 फीसदी कर्ज सीधे कृषि क्षेत्र, 9 फीसदी कृषि-आधारित उद्यमों और 20 फीसदी पशुपालन से संबंधित गतिविधियों में दिया गया है.

सेंट्रल बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, अन्य क्षेत्रों में क्रेडिट क्वालिटी में सुधार देखने को मिला है, लेकिन कृषि क्षेत्र में सुधार अपेक्षाकृत धीमा रहा है और इसी क्षेत्र में सबसे अधिक नॉन-परफॉर्मिंग लोन (NPL) दर्ज किए गए हैं.

आगे क्या है जोखिम?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कमजोर मानसून और ऊंची महंगाई दोनों स्थितियां लंबे समय तक बनी रहती हैं, तो ग्रामीण आय पर दबाव और बढ़ेगा. इसका सीधा असर माइक्रोफाइनेंस कंपनियों की रिकवरी, लोन ग्रोथ और एसेट क्वालिटी पर पड़ सकता है. ऐसे में आने वाली तिमाहियों में इस सेक्टर पर निवेशकों और नियामकों की नजर बनी रहेगी.

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सेबी का बड़ा फैसला: अब रुपये में होगी FPI फीस की पेमेंट, MF को भी मिली इंट्रा-डे उधारी की छूट

विदेशी निवेशकों के लिए शुल्क भुगतान की प्रक्रिया होगी आसान, म्युचुअल फंड सेटलमेंट में बढ़ेगी लिक्विडिटी

Last Modified:
Wednesday, 08 July, 2026
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भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) और म्युचुअल फंड से जुड़े नियमों में अहम बदलाव किए हैं. नए नियमों के तहत अब FPI और विदेशी वेंचर कैपिटल निवेशकों (FVCI) को सेबी की फीस अमेरिकी डॉलर के बजाय भारतीय रुपये में जमा करनी होगी. इसके अलावा, म्युचुअल फंड को सेटलमेंट से जुड़ी जरूरतों के लिए इंट्रा-डे उधार लेने की अनुमति भी दी गई है. सेबी का मानना है कि इन बदलावों से शुल्क भुगतान की प्रक्रिया सरल होगी, परिचालन संबंधी चुनौतियां कम होंगी और म्युचुअल फंड उद्योग की कार्यकुशलता बढ़ेगी.

अब डॉलर नहीं, रुपये में जमा होगी FPI की फीस

सेबी की 3 जुलाई की अधिसूचना के मुताबिक, FPI नियमों में संशोधन करते हुए शुल्क भुगतान की व्यवस्था को अमेरिकी डॉलर से भारतीय रुपये में बदल दिया गया है. यह नया नियम विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) और विदेशी वेंचर कैपिटल निवेशकों (FVCI) दोनों पर लागू होगा. हालांकि, इसे लागू होने में छह महीने का समय दिया गया है ताकि विदेशी निवेशक नई व्यवस्था के अनुरूप अपनी प्रक्रियाएं अपडेट कर सकें.

रजिस्ट्रेशन और अन्य शुल्क में भी बदलाव

संशोधित नियमों के तहत रेगुलेशन 43B(2) में पहले निर्धारित 1,000 अमेरिकी डॉलर की जगह अब 90,000 रुपये (या समतुल्य विदेशी मुद्रा) शुल्क तय किया गया है. वहीं, कैटेगरी-I FPI और FVCI के रजिस्ट्रेशन शुल्क को 2,500 डॉलर से बदलकर 2.3 लाख रुपये कर दिया गया है. इसके अलावा लेट फीस और कंटिन्यूएंस फीस की संरचना में भी संशोधन किया गया है.

DDP को पांच दिन में जमा करनी होगी फीस

भारत में FPI के लेनदेन संभालने वाले डिजिग्नेटेड डिपॉजिटरी पार्टिसिपेंट्स (DDPs) को रजिस्ट्रेशन मिलने के पांच कार्य दिवस के भीतर सेबी के पास यह शुल्क जमा कराना होगा. इससे शुल्क संग्रह की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित और समयबद्ध होगी.

आवेदन प्रक्रिया होगी पहले से आसान

कम्प्लायंस और परिचालन प्रक्रियाओं को सरल बनाने के लिए सेबी ने FPI रजिस्ट्रेशन के कॉमन एप्लिकेशन फॉर्म में भी बदलाव किए हैं. अब इसमें आवेदक की जन्म तिथि या कंपनी के गठन की तिथि शामिल की जाएगी. यह बदलाव केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) की PAN आवेदन प्रक्रिया से जुड़ी नई व्यवस्था के अनुरूप किया गया है, जिससे निवेशकों के लिए आवेदन प्रक्रिया आसान होगी.

सेबी को FY26 में मिले 1,300 करोड़ रुपये के बराबर शुल्क

सेबी के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में FPI और FVCI से रजिस्ट्रेशन, कंटिन्यूएंस और अन्य शुल्क के रूप में 1.298 करोड़ अमेरिकी डॉलर (करीब 12.98 मिलियन डॉलर) प्राप्त हुए. इस राशि में GST भी शामिल है. सेबी ने बताया कि डॉलर में शुल्क लेने के कारण मैनुअल अकाउंटिंग, इनवॉइसिंग और रियल-टाइम अकाउंटिंग में दिक्कतें आती थीं, जिससे वित्तीय रिपोर्टिंग में भी देरी होती थी. रुपये में भुगतान की व्यवस्था से इन चुनौतियों को काफी हद तक दूर किया जा सकेगा.

कस्टोडियन के शुल्क भुगतान का तरीका भी बदला

सेबी ने कस्टोडियन द्वारा जमा किए जाने वाले शुल्क की व्यवस्था में भी संशोधन किया है. अब उन्हें सालाना 10 लाख रुपये की एकमुश्त फीस देने के बजाय हर महीने 85,000 रुपये शुल्क जमा करना होगा. इससे भुगतान अधिक व्यवस्थित और नियमित हो सकेगा.

म्युचुअल फंड को मिली इंट्रा-डे उधारी की अनुमति

सेबी ने म्युचुअल फंड नियमों में भी महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए इंट्रा-डे उधारी (Intraday Borrowing) की अनुमति दे दी है. नए नियमों के तहत म्युचुअल फंड अब पे-इन और पे-आउट सेटलमेंट के बीच समय के अंतर, एक ही एसेट क्लास के भीतर लेनदेन, विदेशी मुद्रा सेटलमेंट और अन्य परिचालन जरूरतों को पूरा करने के लिए दिनभर के लिए उधार ले सकेंगे.

दिन खत्म होने से पहले चुकानी होगी उधारी

सेबी ने स्पष्ट किया है कि एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMC) को यह इंट्रा-डे उधार उसी कारोबारी दिन समाप्त होने से पहले चुकाना होगा. यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो इसे म्युचुअल फंड नियमों के तहत ओवरनाइट उधारी माना जाएगा. यह नई सुविधा पहले से मौजूद उस व्यवस्था के अतिरिक्त होगी, जिसके तहत म्युचुअल फंड योजनाएं निवेशकों के रिडेम्प्शन भुगतान जैसी जरूरतों के लिए अपनी नेट एसेट्स के 20% तक उधार ले सकती हैं.


भारत के ऑटो कंपोनेंट उद्योग ने भरी रफ्तार, FY26 में कारोबार 12.7% बढ़कर 7.6 लाख करोड़ रुपये पहुंचा

एसोसिएशन का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में भी उद्योग 8% से 10% की दर से बढ़ सकता है. इसके पीछे घरेलू बाजार में मजबूत मांग और निर्यात में बढ़ोतरी को प्रमुख कारण बताया गया है.

Last Modified:
Wednesday, 08 July, 2026
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घरेलू वाहन उत्पादन, मजबूत मांग और निर्यात में बढ़ोतरी के दम पर भारत का ऑटो कंपोनेंट उद्योग वित्त वर्ष 2025-26 में नई ऊंचाई पर पहुंच गया. ऑटोमोटिव कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ACMA) की रिपोर्ट के मुताबिक, उद्योग का कुल कारोबार 12.7% बढ़कर 7.60 लाख करोड़ रुपये (85.9 अरब डॉलर) हो गया. हालांकि, वैश्विक सप्लाई चेन चुनौतियों के बीच लोकलाइजेशन और उन्नत तकनीक में निवेश को आगे की वृद्धि के लिए अहम बताया गया है.

एक साल में 12.7% बढ़ा कारोबार

ACMA की ओर से मंगलवार को जारी 'इंडस्ट्री परफॉर्मेंस रिव्यू FY2025-26' के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में भारतीय ऑटो कंपोनेंट उद्योग का कारोबार 7.60 लाख करोड़ रुपये रहा, जबकि एक साल पहले यह 6.74 लाख करोड़ रुपये था. घरेलू मांग में मजबूती, वाहन उत्पादन में वृद्धि और विनिर्माण क्षमता के विस्तार में निवेश ने इस बढ़ोतरी को गति दी.

चालू वित्त वर्ष में 8-10% वृद्धि का अनुमान

एसोसिएशन का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में भी उद्योग 8% से 10% की दर से बढ़ सकता है. इसके पीछे घरेलू बाजार में मजबूत मांग और निर्यात में बढ़ोतरी को प्रमुख कारण बताया गया है, हालांकि भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं इस वृद्धि पर असर डाल सकती हैं.

पांच साल में दोगुना हुआ उद्योग

रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में भारतीय ऑटो कंपोनेंट उद्योग का आकार दोगुने से अधिक हो गया है. इस दौरान उद्योग ने 17% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) दर्ज की है, जो वैश्विक ऑटोमोबाइल सप्लाई चेन में भारत की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है.

भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धा होगी मजबूत

ACMA के अध्यक्ष और जेके फेनर (इंडिया) के वाइस चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक विक्रमपति सिंघानिया ने कहा कि भारतीय ऑटो कंपोनेंट उद्योग का मध्यम और दीर्घकालिक परिदृश्य सकारात्मक बना हुआ है. उन्होंने कहा कि घरेलू मांग, इंफ्रास्ट्रक्चर आधारित आर्थिक विकास, विनिर्माण निवेश, मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) के जरिए वैश्विक बाजारों से जुड़ाव और भारत से बढ़ती ग्लोबल सोर्सिंग उद्योग की वृद्धि को गति देंगे.

उन्होंने कहा कि उद्योग उन्नत विनिर्माण, लोकलाइजेशन, डिजिटलीकरण और टिकाऊ मोबिलिटी समाधानों में निवेश जारी रखेगा, जिससे भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता और मजबूत होगी.

लोकलाइजेशन बढ़ाना होगा सबसे बड़ा फोकस

ACMA के महानिदेशक विन्नी मेहता ने कहा कि वैश्विक सप्लाई चेन के विविधीकरण से भारत के लिए ऑटोमोबाइल विनिर्माण और सोर्सिंग हब बनने का बड़ा अवसर पैदा हुआ है. हालांकि, वित्त वर्ष 2025-26 में उन्नत तकनीक वाले उत्पादों और विशेष कंपोनेंट्स के आयात में बढ़ोतरी यह संकेत देती है कि देश को लोकलाइजेशन और तकनीकी विकास की रफ्तार तेज करनी होगी.

इन चुनौतियों से भी निपटना होगा

रिपोर्ट के अनुसार, उद्योग के सामने भू-राजनीतिक तनाव, सप्लाई चेन में व्यवधान, रेयर अर्थ मैग्नेट जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की उपलब्धता, लॉजिस्टिक्स लागत और कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं. ACMA का मानना है कि लंबे समय में भारत की प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त नवाचार, बेहतर उत्पाद गुणवत्ता, टिकाऊ उत्पादन और मजबूत सप्लाई चेन पर निर्भर करेगी.
 

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भारत में स्टील की मांग ने पकड़ी रफ्तार, Q1 में 8.3% बढ़ी खपत; आयात में 49% का उछाल

बुनियादी ढांचा और ऑटो सेक्टर की मजबूत मांग से बढ़ी स्टील की खपत, चीन समेत तीन देशों से आयात पर एंटी-डंपिंग जांच शुरू

Last Modified:
Wednesday, 08 July, 2026
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वित्त वर्ष 2025-26 (Q1 FY26) की पहली तिमाही में भारत के स्टील उद्योग ने उत्पादन और खपत दोनों मोर्चों पर मजबूत प्रदर्शन किया. केंद्रीय इस्पात मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल-जून 2026 के दौरान तैयार (फिनिश्ड) स्टील की खपत सालाना आधार पर 8.3% बढ़कर 4.16 करोड़ टन (41.6 मिलियन टन) पहुंच गई. यह वृद्धि उत्पादन की तुलना में अधिक रही, जबकि इसी दौरान तैयार स्टील के आयात में 49.2% की बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई.

कच्चे और तैयार स्टील का उत्पादन बढ़ा

मंत्रालय के अनुसार, अप्रैल-जून 2026 के दौरान कच्चे स्टील (क्रूड स्टील) का उत्पादन 3% बढ़कर 4.21 करोड़ टन रहा, जो पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में 4.08 करोड़ टन था. वहीं, तैयार स्टील का उत्पादन 5.9% बढ़कर 4.10 करोड़ टन हो गया. हॉट मेटल का उत्पादन भी 1.4% बढ़कर 2.35 करोड़ टन रहा. केवल जून 2026 में कच्चे स्टील का उत्पादन 1.41 करोड़ टन रहा, जो पिछले साल के मुकाबले 3.9% अधिक है. वहीं, जून में तैयार स्टील का उत्पादन 6% बढ़कर 1.38 करोड़ टन दर्ज किया गया.

8.3% बढ़ी स्टील की खपत

पहली तिमाही के दौरान तैयार स्टील की खपत 8.3% बढ़कर 4.16 करोड़ टन रही, जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह 3.84 करोड़ टन थी. जून 2026 में अकेले स्टील की खपत 1.42 करोड़ टन रही, जो सालाना आधार पर 7.2% अधिक है. मंत्रालय के अनुसार, इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं, आवास निर्माण, रेलवे, ऑटोमोबाइल और कैपिटल गुड्स सेक्टर में मजबूत मांग ने खपत को बढ़ावा दिया.

आयात में 49% की तेज बढ़ोतरी

घरेलू उत्पादन मजबूत रहने के बावजूद भारत पहली तिमाही में तैयार स्टील का शुद्ध आयातक बना रहा. अप्रैल-जून 2026 के दौरान तैयार स्टील का आयात 49.2% बढ़कर 20.6 लाख टन (2.06 मिलियन टन) हो गया, जिसकी कुल कीमत 20,214.5 करोड़ रुपये रही. वहीं, निर्यात भी 31.4% बढ़कर 15.9 लाख टन (1.59 मिलियन टन) पहुंच गया, जिसका मूल्य 12,475.2 करोड़ रुपये रहा. घरेलू उद्योग की शिकायतों के बाद वाणिज्य मंत्रालय के अधीन व्यापार उपचार महानिदेशालय (DGTR) ने चीन, जापान और रूस से आयात होने वाले हॉट-रोल्ड फ्लैट स्टील पर एंटी-डंपिंग जांच शुरू कर दी है.

जून में स्टील की कीमतों में नरमी

जून के दौरान स्टील की कीमतों में कुछ नरमी देखने को मिली.

1. 10 मिमी TMT बार की कीमत महीने-दर-महीने 4.7% घटकर 60,068 रुपये प्रति टन रही.
2. हॉट-रोल्ड कॉइल (HRC) की कीमत 0.5% घटकर 70,108 रुपये प्रति टन रही.

हालांकि, सालाना आधार पर कीमतें अब भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं. गैल्वेनाइज्ड शीट्स की कीमतों में एक वर्ष के दौरान 15.8% की बढ़ोतरी दर्ज की गई. दूसरी ओर, लौह अयस्क (Iron Ore) की कीमतों में बढ़ोतरी हुई. एनएमडीसी (NMDC) ने लंप ओर की कीमत 3.6% बढ़ाकर 5,700 रुपये प्रति टन और फाइंस की कीमत 3.2% बढ़ाकर 4,850 रुपये प्रति टन कर दी.

2030 तक 30 करोड़ टन क्षमता का लक्ष्य

पहली तिमाही के दौरान भारत की कुल स्टील उत्पादन क्षमता 22.19 करोड़ टन प्रतिवर्ष (221.9 मिलियन टन प्रति वर्ष) रही. राष्ट्रीय इस्पात नीति के तहत सरकार ने वर्ष 2030 तक इसे बढ़ाकर 30 करोड़ टन प्रतिवर्ष (300 मिलियन टन) करने का लक्ष्य रखा है.

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Sun Pharma ने 11.75 अरब डॉलर में खरीदी Organon, SBI सहित 11 बैंकों ने जुटाई फंडिंग

ऑर्गनन के अधिग्रहण के बाद सन फार्मा दुनिया की शीर्ष 25 फार्मास्युटिकल कंपनियों में शामिल हो गई है. इसके साथ ही कंपनी बायोसिमिलर दवाओं के क्षेत्र में दुनिया की सातवीं सबसे बड़ी कंपनी बन गई है.

Last Modified:
Wednesday, 08 July, 2026
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भारत की सबसे बड़ी दवा कंपनी सन फार्मास्युटिकल्स ने अमेरिकी दवा कंपनी ऑर्गनन एंड कंपनी के 11.75 अरब डॉलर के अधिग्रहण के लिए वित्तीय व्यवस्था पूरी कर ली है. इस ऐतिहासिक सौदे के लिए भारतीय स्टेट बैंक (SBI) समेत 11 वैश्विक बैंकों ने 10 अरब डॉलर से अधिक का सिंडिकेटेड लोन उपलब्ध कराया है. यह हाल के वर्षों में किसी भारतीय कंपनी द्वारा किए गए सबसे बड़े विदेशी अधिग्रहणों में शामिल है और इससे वैश्विक फार्मा बाजार में सन फार्मा की स्थिति और मजबूत होगी.

11 बैंकों ने मिलकर उपलब्ध कराया फंड

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस अधिग्रहण के लिए भारतीय स्टेट बैंक, एचएसबीसी, स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक, आईएनजी बैंक, डीबीएस बैंक, क्रेडिट एग्रीकोल कॉरपोरेट एंड इन्वेस्टमेंट बैंक, सुमितोमो मित्सुई बैंकिंग कॉरपोरेशन (SMBC) समेत 11 बैंकों ने मिलकर 10 अरब डॉलर से अधिक का ऋण उपलब्ध कराया है. इस सिंडिकेटेड लोन में सिटी, जेपी मॉर्गन और एमयूएफजी बैंक ने भी अहम भूमिका निभाई. प्रत्येक बैंक ने करीब 1 अरब डॉलर तक की वित्तीय प्रतिबद्धता दी.

अप्रैल में हुआ था सौदा, 30 जून को पूरी हुई फंडिंग

सन फार्मा ने अप्रैल 2026 में अमेरिकी कंपनी ऑर्गनन एंड कंपनी का 11.75 अरब डॉलर में पूरी तरह नकद अधिग्रहण करने का समझौता किया था. इस सौदे की फंडिंग प्रक्रिया 30 जून को पूरी हुई. अधिग्रहण के लिए आवश्यक शेष राशि कंपनी ने अपने आंतरिक संसाधनों से जुटाई. एक सूत्र के अनुसार, शुरुआत में जेपी मॉर्गन, सिटी और एमयूएफजी ने फाइनेंसिंग की जिम्मेदारी ली थी. बाद में निर्धारित योजना के तहत आठ अन्य बैंकों को शामिल कर सिंडिकेट पूरा किया गया.

SBI इकलौता भारतीय बैंक

इस पूरे ऋण सिंडिकेट में भारतीय स्टेट बैंक (SBI) एकमात्र भारतीय बैंक है. सिंडिकेटेड लोन व्यवस्था में कई बैंक मिलकर किसी बड़े सौदे के लिए ऋण उपलब्ध कराते हैं, जिससे जोखिम एक ही बैंक पर केंद्रित नहीं रहता.

वैश्विक फार्मा बाजार में और मजबूत होगी सन फार्मा

ऑर्गनन के अधिग्रहण के बाद सन फार्मा दुनिया की शीर्ष 25 फार्मास्युटिकल कंपनियों में शामिल हो गई है. इसके साथ ही कंपनी बायोसिमिलर दवाओं के क्षेत्र में दुनिया की सातवीं सबसे बड़ी कंपनी बन गई है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह सौदा सन फार्मा की वैश्विक मौजूदगी को मजबूत करेगा और चीन समेत कई अंतरराष्ट्रीय बाजारों में विस्तार की रणनीति को गति देगा.

रैनबैक्सी के बाद सबसे बड़ा रणनीतिक कदम

सन फार्मा इससे पहले 2014 में करीब 4 अरब डॉलर में रैनबैक्सी लैबोरेटरीज का अधिग्रहण कर चुकी है, जिसे कंपनी के इतिहास का सबसे बड़ा परिवर्तनकारी सौदा माना जाता है. अब ऑर्गनन का अधिग्रहण उससे भी बड़ा कदम साबित हो सकता है.

विदेशी अधिग्रहणों में लौट रही तेजी

हाल के महीनों में भारतीय कंपनियां एक बार फिर बड़े विदेशी अधिग्रहणों की ओर बढ़ रही हैं. विश्लेषकों के अनुसार, सन फार्मा का यह सौदा न केवल भारतीय फार्मा उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर भारतीय कंपनियों की बढ़ती वित्तीय क्षमता और विस्तार रणनीति का भी संकेत देता है.
 


भारत बना दुनिया का 11वां सबसे बड़ा FDI डेस्टिनेशन, 44% बढ़ा विदेशी निवेश: रिपोर्ट

UNCTAD की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में भारत में एफडीआई प्रवाह बढ़कर 38.89 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जो 2024 में 27.09 अरब डॉलर था.

Last Modified:
Wednesday, 08 July, 2026
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संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन (UNCTAD) की वर्ल्ड इन्वेस्टमेंट रिपोर्ट 2026 में भारत के लिए बड़ी उपलब्धि सामने आई है. वर्ष 2025 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में 44% की मजबूत बढ़ोतरी के साथ भारत दुनिया का 11वां सबसे बड़ा एफडीआई गंतव्य बन गया है. सप्लाई चेन विविधीकरण, मैन्युफैक्चरिंग, डिजिटल इकोनॉमी और नीतिगत सुधारों का फायदा भारत को मिला है, जबकि चीन और अमेरिका जैसे बड़े बाजारों में विदेशी निवेश घटा है.

दो पायदान की छलांग, 11वें स्थान पर पहुंचा भारत

UNCTAD की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में भारत में एफडीआई प्रवाह बढ़कर 38.89 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जो 2024 में 27.09 अरब डॉलर था. इसके साथ ही भारत वैश्विक एफडीआई रैंकिंग में 13वें से 11वें स्थान पर पहुंच गया. रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ने सक्रिय नीतियों, सेवाओं से आगे बढ़कर एडवांस मैन्युफैक्चरिंग पर फोकस और सप्लाई चेन को मजबूत करने के प्रयासों के दम पर खुद को वैश्विक निवेशकों के लिए प्रमुख निवेश केंद्र के रूप में स्थापित किया है.

चीन और अमेरिका में विदेशी निवेश घटा

रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में चीन में एफडीआई घटकर 104.66 अरब डॉलर रह गया, जबकि एक साल पहले यह 116.24 अरब डॉलर था. हालांकि, चीन अभी भी एफडीआई प्राप्त करने वाले देशों में चौथे स्थान पर बना हुआ है. दुनिया के सबसे बड़े एफडीआई गंतव्य अमेरिका में भी विदेशी निवेश 2% घटकर 277 अरब डॉलर रह गया. इसके उलट भारत ने मजबूत वृद्धि दर्ज कर वैश्विक निवेशकों का भरोसा और मजबूत किया.

दक्षिण एशिया में भी भारत की अहम भूमिका

भारत में बढ़ते निवेश का असर पूरे दक्षिण एशिया पर भी दिखाई दिया. 2025 में दक्षिण एशिया में कुल एफडीआई बढ़कर 46 अरब डॉलर पहुंच गया, जबकि 2024 में यह 34 अरब डॉलर था. रिपोर्ट के मुताबिक, जहां विकासशील देशों में एफडीआई केवल 2% और एशिया के विकासशील देशों में 3% बढ़ा, वहीं भारत ने इससे कहीं बेहतर प्रदर्शन किया.

निवेश के बावजूद नई परियोजनाओं में आई सुस्ती

हालांकि कुल एफडीआई प्रवाह बढ़ा है, लेकिन रिपोर्ट नई परियोजनाओं को लेकर कुछ सतर्क संकेत भी देती है. 2025 में भारत में घोषित ग्रीनफील्ड परियोजनाओं का मूल्य घटकर 74.12 अरब डॉलर रह गया, जो 2024 में 111.14 अरब डॉलर था.

UNCTAD का कहना है कि वैश्विक व्यापार में शुल्क संबंधी अनिश्चितता, सप्लाई चेन में बदलाव और कमजोर वैश्विक निवेश माहौल के कारण नई मैन्युफैक्चरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की गति प्रभावित हुई है.

गूगल के डेटा सेंटर समेत कई बड़े निवेश

रिपोर्ट के अनुसार, भारत को 2025 में सबसे अधिक नई एफडीआई परियोजनाएं भी प्राप्त हुईं. इनमें सबसे प्रमुख निवेश अमेरिकी कंपनी Alphabet Inc. की ओर से भारत में 14.5 अरब डॉलर के डेटा सेंटर प्रोजेक्ट की घोषणा रही, जो वर्ष की सबसे बड़ी ग्रीनफील्ड परियोजनाओं में शामिल है. रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का विशाल बाजार, तेजी से बढ़ती डिजिटल मांग, तकनीकी प्रतिभा और क्लाउड सेवाओं का विस्तार उसे वैश्विक निवेशकों के लिए आकर्षक बना रहा है.

भारत से विदेशों में निवेश भी बढ़ा

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत केवल विदेशी निवेश आकर्षित ही नहीं कर रहा, बल्कि विदेशों में निवेश भी तेजी से बढ़ा रहा है. 2025 में भारत का आउटवर्ड एफडीआई 47% बढ़कर 35.66 अरब डॉलर पहुंच गया, जिससे भारत शीर्ष निवेश स्रोत देशों की सूची में दो पायदान चढ़कर 18वें स्थान पर पहुंच गया.

भारतीय कंपनियों द्वारा घोषित विदेशी ग्रीनफील्ड परियोजनाओं का मूल्य भी 41% बढ़कर 25.29 अरब डॉलर हो गया. इनमें राणा ग्रुप की संयुक्त अरब अमीरात में ऑटोमोटिव कंपोनेंट निर्माण के लिए 10 अरब डॉलर की निवेश योजना वर्ष की पांच सबसे बड़ी ग्रीनफील्ड परियोजनाओं में शामिल रही.

आगे भी मजबूत रह सकता है भारत का प्रदर्शन

UNCTAD का मानना है कि वैश्विक कंपनियां अब पूंजी निवेश के मामले में अधिक चयनात्मक हो गई हैं और वे उन देशों को प्राथमिकता दे रही हैं, जहां नीतिगत स्थिरता, मजबूत सप्लाई चेन और भरोसेमंद कारोबारी माहौल उपलब्ध है.

रिपोर्ट के अनुसार, चीन+1 रणनीति और सप्लाई चेन विविधीकरण का लाभ भारत को लगातार मिल रहा है. हालांकि, आने वाले वर्षों में इस रफ्तार को बनाए रखने के लिए वैश्विक निवेश माहौल और भू-राजनीतिक परिस्थितियां अहम भूमिका निभाएंगी.
 


चार दिन की तेजी के बाद बाजार ने लिया ब्रेक, अब आज इन शेयरों पर रहेगी निवेशकों की नजर

मंगलवार को बीएसई सेंसेक्स 104.35 अंक यानी 0.13% गिरकर 78,180.72 अंक पर बंद हुआ, जबकि एनएसई निफ्टी 50 भी 31.65 अंक यानी 0.13% की गिरावट के साथ 24,398.70 अंक पर आ गया.

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Wednesday, 08 July, 2026
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लगातार चार कारोबारी सत्रों की तेजी के बाद मंगलवार को शेयर बाजार में मुनाफावसूली हावी रही और सेंसेक्स-निफ्टी गिरावट के साथ बंद हुए. ट्रेंट के शेयरों में बड़ी गिरावट देखने को मिली, जबकि आईटी शेयरों ने बाजार को सहारा दिया. अब बुधवार के कारोबार में निवेशकों की नजर कई प्रमुख शेयरों पर रहेगी. एचसीएल टेक, अडानी एंटरप्राइजेज, एक्सिस बैंक, सन फार्मा, रेस्टोरेंट ब्रांड्स एशिया और आइडियाफोर्ज टेक्नोलॉजी समेत कई कंपनियों से जुड़े अहम घटनाक्रम आज इन शेयरों में उतार-चढ़ाव की वजह बन सकते हैं.

चार दिन की तेजी के बाद फिसला बाजार

मंगलवार को घरेलू शेयर बाजार की शुरुआत मजबूती के साथ हुई, लेकिन कारोबार के अंतिम घंटे में मुनाफावसूली और रियल्टी व मेटल शेयरों में बिकवाली बढ़ने से बाजार लाल निशान में बंद हुआ. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स 104.35 अंक यानी 0.13% गिरकर 78,180.72 अंक पर बंद हुआ, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी 50 भी 31.65 अंक यानी 0.13% की गिरावट के साथ 24,398.70 अंक पर आ गया.

ट्रेंट में सबसे बड़ी गिरावट, आईटी शेयर बने सहारा

सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 19 गिरावट के साथ बंद हुए. टाटा समूह की रिटेल कंपनी ट्रेंट के शेयरों में सबसे बड़ी 12.42% की गिरावट दर्ज की गई. इसके अलावा भारत इलेक्ट्रॉनिक्स (बीईएल), अडानी पोर्ट्स, लार्सन एंड टुब्रो, रिलायंस इंडस्ट्रीज, आईसीआईसीआई बैंक और एनटीपीसी के शेयरों में भी कमजोरी देखने को मिली. वहीं, आईटी सेक्टर में खरीदारी बनी रही. एचसीएल टेक 3.08% की बढ़त के साथ सेंसेक्स का शीर्ष गेनर रहा. इसके अलावा टेक महिंद्रा, इंफोसिस, टीसीएस, टाइटन, इटरनल, बजाज फाइनेंस, बजाज फिनसर्व, मारुति सुजुकी, कोटक महिंद्रा बैंक और हिंदुस्तान यूनिलीवर के शेयर भी बढ़त के साथ बंद हुए.

ब्रॉडर मार्केट में बनी रही मजबूती

मुख्य सूचकांकों में गिरावट के बावजूद ब्रॉडर मार्केट का प्रदर्शन बेहतर रहा. निफ्टी मिडकैप सूचकांक 0.30% और निफ्टी स्मॉलकैप 0.55% की बढ़त के साथ बंद हुए. सेक्टोरल इंडेक्स में निफ्टी आईटी सबसे मजबूत रहा. इसके अलावा कंज्यूमर ड्यूरेबल्स और एफएमसीजी शेयरों में भी खरीदारी देखने को मिली, जबकि मेटल और रियल्टी सेक्टर दबाव में रहे.

आज इन शेयरों पर रखें नजर

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आज के कारोबार में कई शेयर निवेशकों के रडार पर रह सकते हैं. एचसीएल टेक्नोलॉजीज की सॉफ्टवेयर इकाई एचसीएलसॉफ्टवेयर ने जैस्परसॉफ्ट के अधिग्रहण के बाद अपने डेटा एवं एआई पोर्टफोलियो को मजबूत किया है. एक्सिस बैंक को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से एन. एस. विश्वनाथन की गैर-कार्यकारी (पार्ट-टाइम) चेयरमैन के रूप में दोबारा नियुक्ति की मंजूरी मिल गई है.

अडानी एंटरप्राइजेज ने अपने क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट (QIP) के जरिए 15,000 करोड़ रुपये जुटाए हैं. वहीं, गणेश इन्फ्रावर्ल्ड की सहायक कंपनी टाइकून माइंस जीके को करीब 100 करोड़ रुपये का सब-कॉन्ट्रैक्ट ऑर्डर मिला है.

सन फार्मा के 11.75 अरब डॉलर के ऑर्गेनॉन एंड कंपनी अधिग्रहण को भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) समेत 11 वैश्विक बैंकों का वित्तीय समर्थन मिला है. दूसरी ओर, इंस्पिरा ग्लोबल की इकाई लेनेक्सिस फूडवर्क्स ने करीब 2,235 करोड़ रुपये के सौदे के बाद रेस्टोरेंट ब्रांड्स एशिया का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया है.

इसके अलावा, पोलुनिन इमर्जिंग मार्केट्स स्मॉल कैप फंड ने आईओएल केमिकल्स एंड फार्मास्युटिकल्स में 1.5% हिस्सेदारी खरीदी है, जबकि लिप्टस पंच-कार्ड फंड ने कैपिटल स्मॉल फाइनेंस बैंक में 1.83% हिस्सेदारी का अधिग्रहण किया है. वहीं, आइडियाफोर्ज टेक्नोलॉजी ने अपना क्यूआईपी लॉन्च करते हुए 835.86 रुपये प्रति शेयर का फ्लोर प्राइस तय किया है. इन सभी घटनाक्रमों के चलते आज इन शेयरों में अच्छी-खासी हलचल देखने को मिल सकती है. 

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)

 


Cult.fit IPO: फिटनेस कंपनी का शेयर बाजार में उतरने का प्लान, ₹950 करोड़ का फ्रेश इश्यू लाएगी कंपनी

कंपनी 950 करोड़ रुपये के फ्रेश इश्यू के जरिए पूंजी जुटाएगी, जबकि मौजूदा निवेशक भी ऑफर फॉर सेल (OFS) के माध्यम से अपनी हिस्सेदारी बेचेंगे.

Last Modified:
Tuesday, 07 July, 2026
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देश की प्रमुख फिटनेस और वेलनेस कंपनी Cult.fit ने प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम (IPO) की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया है. कंपनी ने भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के पास ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) दाखिल कर दिया है. कंपनी 950 करोड़ रुपये के फ्रेश इश्यू के जरिए पूंजी जुटाएगी, जबकि मौजूदा निवेशक भी ऑफर फॉर सेल (OFS) के माध्यम से अपनी हिस्सेदारी बेचेंगे. जुटाई गई राशि का इस्तेमाल नए फिटनेस सेंटर खोलने, ब्रांड विस्तार और कारोबार के विस्तार में किया जाएगा.

950 करोड़ रुपये का होगा फ्रेश इश्यू

ड्राफ्ट दस्तावेज के अनुसार, Cult.fit 950 करोड़ रुपये के नए इक्विटी शेयर जारी करेगी. इसके अलावा, टेमासेक, श्रोडर्स कैपिटल और जर्मनी की फिटनेस कंपनी लाइफफिट ग्रुप समेत मौजूदा निवेशक 17.86 करोड़ इक्विटी शेयरों तक की बिक्री ऑफर फॉर सेल (OFS) के जरिए करेंगे. हालांकि कंपनी ने अभी आईपीओ के कुल आकार का खुलासा नहीं किया है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इसका कुल आकार 3,500 करोड़ से 4,000 करोड़ रुपये के बीच हो सकता है.

देशभर में 708 फिटनेस सेंटर, करीब 10 लाख पेड सदस्य

31 मार्च 2026 तक Cult.fit के देशभर में 708 फिटनेस सेंटर संचालित हो रहे थे. कंपनी के करीब 9.87 लाख पेड सदस्य हैं. सदस्यता की बिक्री कंपनी अपनी वेबसाइट, मोबाइल ऐप, कॉर्पोरेट साझेदारियों और फिटनेस सेंटरों के माध्यम से करती है.

विस्तार और ब्रांडिंग पर खर्च होगी जुटाई गई पूंजी

कंपनी ने बताया कि आईपीओ से जुटाई गई राशि का उपयोग नए फिटनेस सेंटर खोलने, ब्रांडिंग और मार्केटिंग गतिविधियों को मजबूत करने तथा कारोबार के विस्तार में किया जाएगा. कंपनी ऐसे समय में बाजार में उतर रही है, जब देश में फिटनेस और प्रिवेंटिव हेल्थकेयर को लेकर लोगों की जागरूकता तेजी से बढ़ रही है. बढ़ती आय और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने की प्रवृत्ति से इस क्षेत्र में विकास की संभावनाएं मजबूत बनी हुई हैं.

IPO बाजार में बनी हुई है रौनक

भारतीय आईपीओ बाजार में इस समय काफी हलचल है. आने वाले महीनों में जियो प्लेटफॉर्म्स, एनएसई समेत कई बड़ी कंपनियां भी शेयर बाजार में उतरने की तैयारी कर रही हैं. ऐसे में Cult.fit का आईपीओ भी निवेशकों के लिए प्रमुख आकर्षण बन सकता है.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
 


चीन+1 रणनीति का भारत को बड़ा फायदा, मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ 4.15% पर पहुंची: रिपोर्ट

ASSOCHAM की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, सरकार के नीतिगत सुधारों, बुनियादी ढांचे में निवेश, पीएलआई योजना और 'चीन+1' रणनीति के चलते भारत दुनिया के प्रमुख विनिर्माण केंद्रों में तेजी से उभर रहा है.

Last Modified:
Tuesday, 07 July, 2026
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वैश्विक कंपनियों के चीन पर निर्भरता कम करने और सप्लाई चेन में विविधता लाने की रणनीति का भारत को बड़ा फायदा मिल रहा है. उद्योग मंडल एसोचैम (ASSOCHAM) की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, कोविड-19 महामारी के बाद भारत की विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) वृद्धि वैश्विक औसत से बेहतर रही है. सरकार के नीतिगत सुधारों, बुनियादी ढांचे में निवेश, पीएलआई योजना और 'चीन+1' रणनीति के चलते भारत दुनिया के प्रमुख विनिर्माण केंद्रों में तेजी से उभर रहा है.

महामारी के बाद तेज हुई भारत की मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ

एसोचैम की रिपोर्ट 'ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग अंडरगोइंग स्ट्रैटेजिक रिअलाइनमेंट: इंडिया इमर्जेज ऐज अ की बेनिफिशियरी ऑफ सप्लाई चेन डाइवर्सिफिकेशन' के अनुसार, वर्ष 2022-25 के दौरान भारत की औसत मैन्युफैक्चरिंग वृद्धि दर बढ़कर 4.15% हो गई, जबकि 2016-19 के दौरान यह 3.44% थी. इसके विपरीत, महामारी के बाद वैश्विक औसत मैन्युफैक्चरिंग वृद्धि दर घटकर 2.19% रह गई, जो महामारी से पहले 4.39% थी.

दुनिया के शीर्ष विनिर्माण देशों में मजबूत हुई भारत की स्थिति

रिपोर्ट में दुनिया की 10 सबसे बड़ी विनिर्माण अर्थव्यवस्थाओं का विश्लेषण किया गया है, जिनका वैश्विक विनिर्माण उत्पादन में लगभग 65% योगदान है. अध्ययन के अनुसार, भारत अब 'उभरते हुए विनिर्माण नेताओं' (Emerging Manufacturing Leaders) में शामिल हो गया है और वैश्विक औसत की तुलना में उसका प्रदर्शन लगातार बेहतर हुआ है.

वैश्विक औसत से ऊपर पहुंचा भारत

रिपोर्ट के मुताबिक, 2016-19 के दौरान भारत की मैन्युफैक्चरिंग वृद्धि वैश्विक औसत से 0.95 प्रतिशत अंक कम थी. हालांकि, 2022-25 में भारत वैश्विक औसत से 1.96 प्रतिशत अंक ऊपर पहुंच गया. वहीं, दुनिया की सबसे बड़ी विनिर्माण अर्थव्यवस्था चीन का प्रदर्शन इस दौरान कमजोर हुआ है. महामारी से पहले चीन की वृद्धि वैश्विक औसत से 2.40 प्रतिशत अंक अधिक थी, लेकिन अब यह वैश्विक औसत से 2.26 प्रतिशत अंक नीचे आ गई है.

चीन+1 रणनीति से मिला भारत को फायदा

रिपोर्ट में कहा गया है कि कोविड-19 महामारी के बाद कंपनियां अपनी उत्पादन इकाइयों को केवल चीन तक सीमित रखने के बजाय 'चीन+1', 'नियरशोरिंग' और 'फ्रेंडशोरिंग' जैसी रणनीतियां अपना रही हैं. इसका उद्देश्य सप्लाई चेन को अधिक मजबूत और विविध बनाना है. इस बदलाव से भारत निवेशकों के लिए एक आकर्षक विनिर्माण केंद्र बनकर उभरा है.

नीतिगत सुधारों ने बढ़ाया निवेशकों का भरोसा

एसोचैम के अध्यक्ष निर्मल के. मिंडा ने कहा कि वैश्विक विनिर्माण परिदृश्य में धीरे-धीरे लेकिन महत्वपूर्ण बदलाव हो रहा है. कंपनियां अब केवल लागत और दक्षता पर नहीं, बल्कि सप्लाई चेन की मजबूती और विविधता पर भी ध्यान दे रही हैं. उन्होंने कहा कि भारत के बेहतर प्रदर्शन के पीछे लगातार किए गए आर्थिक सुधार और निवेशकों का बढ़ता विश्वास प्रमुख कारण हैं.

इन सरकारी पहलों का मिला फायदा

रिपोर्ट के अनुसार, भारत की विनिर्माण क्षमता मजबूत होने के पीछे कई प्रमुख कारण हैं. इनमें घरेलू मांग में वृद्धि, बुनियादी ढांचे का विकास, लॉजिस्टिक्स में सुधार, 'चीन+1' रणनीति के तहत बढ़ा विदेशी निवेश, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना, पीएम गति शक्ति कार्यक्रम और औद्योगिक गलियारों का विकास शामिल हैं.

आगे किन क्षेत्रों पर देना होगा जोर?

एसोचैम का मानना है कि भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में अपनी स्थिति और मजबूत करने के लिए लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक बुनियादी ढांचे में तेजी से निवेश करना होगा. इसके साथ ही घरेलू सप्लायर नेटवर्क को मजबूत करने, कारोबार सुगमता (Ease of Doing Business) में सुधार, इंडस्ट्री 4.0 तकनीकों को बढ़ावा देने और मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) का बेहतर उपयोग करने की जरूरत होगी.

निर्मल के. मिंडा ने कहा कि अब अगले चरण में सरकार और उद्योग को मिलकर ऐसे वैश्विक स्तर के विनिर्माण इकोसिस्टम तैयार करने पर ध्यान देना चाहिए, जो भारत को वैश्विक वैल्यू चेन में और अधिक मजबूत स्थिति दिला सकें.