शुक्रवार को BSE का 30 शेयरों वाला सेंसेक्स 961.42 अंक गिरकर 81,287.19 के स्तर पर बंद हुआ. वहीं, NSE निफ्टी 317.90 अंक गिरावट के साथ 25,178.65 पर बंद हुआ.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
घरेलू शेयर बाजार में शुक्रवार को आई भारी गिरावट ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी. कमजोर वैश्विक संकेत, पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव और विदेशी निवेशकों की बिकवाली के दबाव में बाजार टूटकर बंद हुआ. वहीं, एशियाई बाजारों में गिरावट के बीच भारतीय शेयर बाजार हफ्ते के पहले ट्रेडिंग सेशन सोमवार यानी 2 मार्च को गिरावट में खुल सकते हैं. गिफ्ट निफ्टी फ्यूचर्स सुबह 8:10 बजे 124 अंक की गिरावट लेकर 25,161 पर था. यह बेंचमार्क इंडेक्स निफ्टी-50 के गिरावट में खुलने का संकेत देता है. हालांकि, तकनीकी संकेतकों के आधार पर कुछ शेयरों में मजबूत खरीदारी के संकेत मिल रहे हैं, जिन पर आज निवेशकों की नजर रह सकती है. तो आइए इनके बारे में जानते हैं.
सेंसेक्स और निफ्टी में जोरदार गिरावट
शुक्रवार को बॉम्बे शेयर बाजार (BSE) का 30 शेयरों वाला सेंसेक्स 961.42 अंक यानी 1.17 फीसदी गिरकर 81,287.19 के स्तर पर बंद हुआ. कारोबार के दौरान यह एक समय 1,089 अंक से ज्यादा टूट गया था. वहीं, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का निफ्टी 317.90 अंक यानी 1.25 फीसदी की गिरावट के साथ 25,178.65 पर बंद हुआ. निफ्टी 25,200 के अहम स्तर के नीचे फिसल गया, जो बाजार की कमजोरी को दर्शाता है.
किन दिग्गज शेयरों में रही सबसे ज्यादा कमजोरी
सेंसेक्स की प्रमुख कंपनियों में Sun Pharma, Bharti Airtel, Bajaj Finserv, InterGlobe Aviation, Mahindra & Mahindra और Maruti Suzuki के शेयरों में प्रमुख गिरावट दर्ज की गई. हालांकि, आईटी सेक्टर में कुछ राहत देखने को मिली. HCL Technologies और Infosys समेत कुछ शेयर बढ़त के साथ बंद हुए.
आज इन शेयरों में दिख रही मजबूत खरीदारी
तकनीकी विश्लेषण के अनुसार कुछ मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में तेजी का रुझान बना हुआ है. इनमें Tejas Networks और Foseco India प्रमुख हैं. इसके अलावा Xtglobal Infotech, Sarda Energy & Minerals, VL E-Governance & IT Solutions और Avadh Sugar & Energy जैसे शेयरों ने अपना 52 हफ्तों का उच्च स्तर पार किया है. यह इन काउंटरों में निवेशकों की मजबूत रुचि का संकेत माना जा रहा है.
इन स्टॉक्स में मंदी के संकेत
तकनीकी संकेतक एमएसीडी के आधार पर कुछ शेयरों में कमजोरी के संकेत मिले हैं. Adani Enterprises, Maruti Suzuki और Bharti Airtel समेत कई शेयरों में मंदी का ट्रेंड बनता दिख रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि इन शेयरों में फिलहाल सतर्कता बरतने की जरूरत है, क्योंकि निकट अवधि में दबाव बना रह सकता है.
विश्लेषकों के अनुसार बाजार में उतार-चढ़ाव का दौर जारी रह सकता है. ऐसे में निवेशकों को गुणवत्ता वाले शेयरों में चरणबद्ध तरीके से निवेश की रणनीति अपनानी चाहिए. वैश्विक घटनाक्रम और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां निकट भविष्य में बाजार की दिशा तय करेंगी.
इन पर भी रखें नजर
आज के ट्रेडिंग सत्र में कई प्रमुख शेयरों पर निवेशकों की खास नजर रहेगी. GAIL India में 1 मार्च से नेतृत्व परिवर्तन हुआ है, जहां दीपक गुप्ता ने चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर का पद संभाला है, जिससे कंपनी की भविष्य की रणनीति को लेकर चर्चा तेज है. वहीं Bharti Airtel ने भारत में सुरक्षित और उन्नत मैसेजिंग अनुभव देने के लिए गूगल के साथ साझेदारी की है, जिसके तहत रिच कम्युनिकेशन सर्विसेज (RCS) और स्पैम फिल्टरिंग तकनीक का उपयोग किया जाएगा, जिससे ग्राहकों को बेहतर सेवा और डिजिटल फ्रॉड से सुरक्षा मिलेगी. Bharat Electronics ने वित्त वर्ष 2026 के लिए प्रति शेयर 1.95 रुपये का अंतरिम लाभांश घोषित किया है, जो निवेशकों के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है. इसके अलावा Eleganz Interiors को 122.02 करोड़ रुपये का बड़ा ऑर्डर मिला है, जिसके तहत कंपनी इंटीरियर फिट-आउट कार्यों की सप्लाई, इंस्टॉलेशन और हैंडओवर करेगी, जिससे उसके राजस्व और कारोबार में वृद्धि की संभावना है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
जून तिमाही में 7.8% की मजबूत GDP ग्रोथ के बाद रेटिंग एजेंसी ने बढ़ाया FY27 का अनुमान; मजबूत खपत, औद्योगिक गतिविधियों, निर्यात और सरकारी निवेश से अर्थव्यवस्था को मिला सहारा
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत की मजबूत आर्थिक रफ्तार ने वैश्विक रेटिंग एजेंसी S&P Global Ratings को चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए देश की GDP ग्रोथ का अनुमान बढ़ाने के लिए प्रेरित किया है. एजेंसी ने भारत की आर्थिक वृद्धि का अनुमान 6.6% से बढ़ाकर 7% कर दिया है. S&P का कहना है कि मजबूत औद्योगिक गतिविधियां, घरेलू खपत, वस्तुओं के निर्यात में मजबूती और सरकारी निवेश अर्थव्यवस्था की रफ्तार को सहारा दे रहे हैं.
भारत की अर्थव्यवस्था ने अप्रैल-जून तिमाही में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन करते हुए 7.8% की GDP ग्रोथ दर्ज की. इस मजबूत प्रदर्शन के बाद S&P ने पूरे वित्त वर्ष के अनुमान में बढ़ोतरी की है.
दूसरी छमाही में धीमी हो सकती है ग्रोथ
S&P के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में आर्थिक वृद्धि की रफ्तार कुछ धीमी पड़ सकती है. रेटिंग एजेंसी का मानना है कि GST में किए गए बदलाव और इनकम टैक्स में कटौती से अर्थव्यवस्था को मिलने वाला शुरुआती फायदा धीरे-धीरे कम हो सकता है.
इसके अलावा मौसम से जुड़े जोखिम भी अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं. 9 सितंबर 2026 तक देश में कुल बारिश सामान्य से करीब 15% कम रही थी. ऐसे में कृषि उत्पादन और खाद्य महंगाई पर मौसम का असर आने वाले महीनों में महत्वपूर्ण रहेगा.
महंगाई के दबाव पर भी S&P की नजर
S&P ने वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की औसत खुदरा महंगाई 5.1% रहने का अनुमान लगाया है. मजबूत आर्थिक गतिविधियों के साथ महंगाई का दबाव बढ़ने की स्थिति में मौद्रिक नीति पर भी असर पड़ सकता है.
रेटिंग एजेंसी के अनुसार, मजबूत ग्रोथ, महंगाई का दबाव, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और मौसम से जुड़े जोखिमों के बीच RBI चालू वित्त वर्ष में रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट यानी 0.25% की बढ़ोतरी कर सकता है.
जून तिमाही में किन क्षेत्रों ने दिया ग्रोथ को सहारा?
अप्रैल-जून तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था की ग्रोथ को मुख्य रूप से मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज सेक्टर से समर्थन मिला. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इस दौरान मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 9.2% और सर्विसेज में करीब 10% की वृद्धि दर्ज की गई.
इसके अलावा घरेलू मांग, निवेश और निर्यात में मजबूती ने भी आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पहली तिमाही में निवेश 11.9%, घरेलू खपत 7.1% और निर्यात 12% बढ़ा.
Moody's ने भी बढ़ाया था भारत की ग्रोथ का अनुमान
S&P से पहले Moody's ने भी वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान बढ़ाकर 7% किया था. एजेंसी ने अप्रैल-जून तिमाही में 7.8% की मजबूत वृद्धि को भारत की आर्थिक मजबूती का संकेत बताया था, हालांकि उसने पश्चिम एशिया के तनाव, ऊर्जा कीमतों और खाद्य महंगाई को जोखिम के तौर पर रेखांकित किया था.
इस बीच, भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान अलग-अलग एजेंसियों में अलग है. ऐसे में आगे आर्थिक वृद्धि की रफ्तार पर घरेलू मांग, महंगाई, ऊर्जा कीमतों, मानसून और वैश्विक परिस्थितियों का असर महत्वपूर्ण रहेगा.
UAE के सेंट्रल बैंक ने रिटेल पेमेंट सर्विसेज और कार्ड स्कीम्स तथा स्टोर्ड वैल्यू फैसिलिटीज के लिए दी इन-प्रिंसिपल अप्रूवल; कारोबार शुरू करने से पहले लेनी होगी अंतिम मंजूरी
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
डिजिटल पेमेंट कंपनी फोनपे (PhonePe) को संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के सेंट्रल बैंक (CBUAE) से दो पेमेंट लाइसेंस के लिए सैद्धांतिक मंजूरी मिल गई है. यह मंजूरी कंपनी को UAE में अपना स्थानीय रूप से विनियमित अंतरराष्ट्रीय कारोबार शुरू करने के करीब ले जाती है. हालांकि, वाणिज्यिक परिचालन शुरू करने से पहले PhonePe को नियामक की अंतिम मंजूरी हासिल करनी होगी.
CBUAE की ओर से मिली मंजूरी में रिटेल पेमेंट सर्विसेज और कार्ड स्कीम्स (RPSCS) तथा स्टोर्ड वैल्यू फैसिलिटीज (SVF) शामिल हैं. यह मंजूरी शुरुआती नियामकीय जांच और ड्यू डिलिजेंस प्रक्रिया पूरी होने के बाद मिली है.
UAE में स्थानीय साझेदारों के साथ काम करेगी कंपनी
अंतिम मंजूरी मिलने के बाद PhonePe UAE के पेमेंट इकोसिस्टम में अपनी मौजूदगी मजबूत करने के लिए क्षेत्रीय बैंकों, लाइसेंस प्राप्त पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स और स्थानीय टेक्नोलॉजी कंपनियों के साथ काम करने की योजना बना रही है.
कंपनी का फोकस UAE में उपभोक्ताओं और कारोबारों के लिए डिजिटल पेमेंट सेवाओं को सपोर्ट करने पर होगा. इसके लिए PhonePe अपनी टेक्नोलॉजी और पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को UAE की मौजूदा वित्तीय व्यवस्था के साथ जोड़ने की दिशा में काम करेगी.
UAE के Aani और Jaywan से जुड़ने की योजना
PhonePe ने UAE के इंस्टेंट पेमेंट प्लेटफॉर्म Aani और घरेलू कार्ड स्कीम Jaywan के लिए भी अपनी टेक्नोलॉजी के जरिए संभावनाएं तलाशने की बात कही है. कंपनी के मुताबिक, भारत में उसका पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर 70 करोड़ से अधिक रजिस्टर्ड यूजर्स और करीब 5 करोड़ कारोबारियों को सेवाएं देता है. UAE में प्रस्तावित कारोबार के जरिए कंपनी डिजिटल पेमेंट के क्षेत्र में उपभोक्ताओं और कारोबारियों को सेवाएं देने के साथ स्थानीय वित्तीय इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ मिलकर काम करेगी.
PhonePe का यह विस्तार UAE के फाइनेंशियल इंफ्रास्ट्रक्चर ट्रांसफॉर्मेशन प्रोग्राम (Financial Infrastructure Transformation Programme) और डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने की सरकार की व्यापक रणनीति के अनुरूप है.
भारत से UAE जाने वाले यात्रियों के लिए पहले से मौजूद है सेवा
PhonePe की UAE में पूरी तरह नई एंट्री नहीं होगी. कंपनी पहले से NPCI इंटरनेशनल पेमेंट्स लिमिटेड (NIPL) के साथ क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट व्यवस्था के जरिए UAE में मौजूद है.
भारत से UAE जाने वाले यात्री PhonePe के जरिए स्थानीय QR कोड स्कैन करके भुगतान कर सकते हैं. इसके लिए UAE में NEOPAY और Network International के टर्मिनलों का इस्तेमाल किया जाता है. हालांकि, नए लाइसेंस मिलने के बाद PhonePe की भूमिका केवल विदेश यात्रा करने वाले भारतीयों को पेमेंट सुविधा देने तक सीमित नहीं रहेगी. अंतिम मंजूरी के बाद कंपनी UAE में एक विनियमित पेमेंट कारोबार संचालित कर सकेगी.
UAE बन सकता है PhonePe का पहला अंतरराष्ट्रीय बाजार
PhonePe अपनी टेक्नोलॉजी और स्थानीय साझेदारियों के जरिए UAE, भारत और अन्य वैश्विक बाजारों के बीच पेमेंट गतिविधियों को सपोर्ट करने की योजना बना रही है. अंतिम नियामकीय मंजूरी मिलने और वाणिज्यिक परिचालन शुरू होने के बाद UAE, PhonePe का पहला अंतरराष्ट्रीय बाजार बन सकता है. यह कदम कंपनी की भारत से बाहर विस्तार करने की रणनीति में अहम माना जा रहा है.
30 दिन तक की वैधता वाले वॉइस और SMS-ओनली प्लान लाना होगा, कम डेटा इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों और दूसरी सिम रखने वालों को मिल सकता है फायदा
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
टेलीकॉम ग्राहकों के लिए रिचार्ज को लेकर राहत की खबर है. भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) ने टेलीकॉम कंपनियों को ऐसे स्पेशल टैरिफ वाउचर (STV) उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है, जिनमें सिर्फ वॉइस कॉल और SMS की सुविधा होगी. इन प्लान में डेटा शामिल नहीं होगा और इनकी वैधता अधिकतम 30 दिन तक रखी जा सकेगी. इसका फायदा खासतौर पर उन ग्राहकों को मिल सकता है, जिन्हें मोबाइल डेटा की जरूरत कम या बिल्कुल नहीं है.
TRAI ने यह बदलाव दूरसंचार उपभोक्ता संरक्षण विनियम, 2024 में संशोधन के जरिए किया है. नियामक के मुताबिक, मौजूदा समय में केवल वॉइस और SMS की सुविधा वाले प्लान सीमित हैं, जबकि लंबी वैधता वाले प्लान ज्यादा उपलब्ध हैं. ऐसे में कम आय वाले और कम अवधि के लिए रिचार्ज करने वाले ग्राहकों के पास सस्ते विकल्प सीमित हैं.
ग्राहकों को अपनी जरूरत के हिसाब से रिचार्ज का विकल्प
TRAI का कहना है कि नए नियमों से ग्राहकों को अपनी जरूरत और आर्थिक क्षमता के हिसाब से मोबाइल प्लान चुनने की ज्यादा स्वतंत्रता मिलेगी. जिन लोगों को इंटरनेट डेटा की जरूरत नहीं है, उन्हें ऐसे प्लान के लिए भुगतान नहीं करना पड़ेगा जिसमें डेटा भी शामिल हो.
इसका फायदा बुजुर्ग ग्राहकों, फीचर फोन इस्तेमाल करने वालों, कम डेटा इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों और दूसरी सिम को एक्टिव रखने वाले लोगों को मिल सकता है. ऐसे ग्राहक अब सिर्फ कॉल और SMS की जरूरत के मुताबिक कम कीमत वाला रिचार्ज चुन सकेंगे.
टेलीकॉम कंपनियों की कमाई पर क्या होगा असर?
नए नियम से ग्राहकों को विकल्प तो बढ़ेंगे, लेकिन टेलीकॉम कंपनियों के औसत प्रति ग्राहक राजस्व (ARPU) पर दबाव पड़ने की संभावना जताई जा रही है. खासतौर पर ऐसे ग्राहक, जो अभी डेटा वाले पैक लेते हैं लेकिन उसका बहुत कम इस्तेमाल करते हैं, वे वॉइस-ओनली प्लान का रुख कर सकते हैं. इससे प्रति ग्राहक मिलने वाला औसत राजस्व घट सकता है.
डेलॉयट साउथ एशिया के पार्टनर और TMT इंडस्ट्री लीडर रोहन लोबो के मुताबिक, करीब 90 फीसदी मोबाइल कनेक्शन प्रीपेड हैं. ऐसे में कंपनियों के लिए केवल एक रिचार्ज से मिलने वाली रकम ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि ग्राहक कितनी नियमितता से रिचार्ज करता है, यह भी अहम है.
उनके अनुसार, कुछ ग्राहक सस्ते वॉइस-ओनली प्लान पर जा सकते हैं, जिससे ARPU पर दबाव आ सकता है. हालांकि, ऐसे प्लान कीमत के प्रति संवेदनशील ग्राहकों को बनाए रखने और दूसरी सिम को एक्टिव रखने में मदद कर सकते हैं. कुल राजस्व पर असर इस बात पर निर्भर करेगा कि रिचार्ज की नियमितता बढ़ने से कम कीमत वाले प्लान से होने वाली कमाई की कितनी भरपाई हो पाती है.
कम डेटा इस्तेमाल करने वालों पर ज्यादा असर
PwC India में टेलीकॉम प्रैक्टिस के लीडर विनिश बावा के मुताबिक, नए नियम से ARPU में कुछ कमी आ सकती है, लेकिन इसका असर बहुत ज्यादा होने की उम्मीद नहीं है. इसका प्रभाव खासतौर पर कम डेटा इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों, बुजुर्गों और दूसरी सिम रखने वाले लोगों पर पड़ सकता है.
वॉइस-ओनली प्लान उपलब्ध होने से कंपनियों के लिए मौजूदा प्रीपेड प्लान में डेटा जोड़कर रिचार्ज की कीमत बढ़ाने की गुंजाइश कुछ कम हो सकती है. हालांकि, ज्यादा डेटा इस्तेमाल करने वाले स्मार्टफोन यूजर्स की जरूरत पहले की तरह डेटा प्लान से पूरी होती रहेगी.
कंपनियों के सामने ग्राहकों को बनाए रखने की चुनौती
नए नियमों के बाद टेलीकॉम कंपनियों को अलग-अलग तरह के ग्राहकों के लिए प्लान तैयार करने पर ज्यादा ध्यान देना होगा. ज्यादा डेटा, तेज इंटरनेट स्पीड, बेहतर नेटवर्क और अतिरिक्त सेवाओं के लिए अधिक भुगतान करने वाले ग्राहकों के लिए कंपनियां प्रीमियम प्लान पेश कर सकती हैं.
वहीं, कम खर्च करने वाले ग्राहकों को बनाए रखने के लिए वॉइस और SMS-ओनली प्लान महत्वपूर्ण हो सकते हैं. इससे ऐसी दूसरी सिम को भी एक्टिव रखने में मदद मिल सकती है, जिसका इस्तेमाल मुख्य रूप से कॉल या SMS के लिए किया जाता है.
इस तरह TRAI का यह बदलाव एक तरफ कम डेटा इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों के लिए रिचार्ज के विकल्प बढ़ाता है, वहीं दूसरी ओर टेलीकॉम कंपनियों के लिए ग्राहकों के खर्च और ARPU को बनाए रखने की चुनौती भी बढ़ा सकता है.
ICICI सिक्योरिटीज की रिपोर्ट के मुताबिक, डिपॉजिट जुटाने की लागत अब बैंकों के लिए बड़ा अंतर पैदा करने वाला कारक बन रही है. कम फंडिंग कॉस्ट से बैंकों को मार्जिन बनाए रखने और कर्ज कारोबार बढ़ाने में मदद मिलती है
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय बैंकों के लिए डिपॉजिट और अन्य देनदारियों पर आने वाली लागत यानी कॉस्ट ऑफ फंड्स (CoF) अब मुनाफे और ग्रोथ को प्रभावित करने वाला अहम कारक बन गई है. ICICI सिक्योरिटीज की 22 सितंबर को जारी सेक्टर रिपोर्ट के मुताबिक, फंडिंग की लागत का असर बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM), क्रेडिट कॉस्ट, लोन ग्रोथ और यहां तक कि निवेशकों के वैल्यूएशन पर भी पड़ रहा है. रिपोर्ट में एचडीएफसी बैंक (HDFC) की फंडिंग स्थिति में सुधार के बावजूद CASA हिस्सेदारी में एक्सिस बैंक (Axis) से अंतर को एक महत्वपूर्ण चुनौती बताया गया है.
कम फंडिंग कॉस्ट से मार्जिन को सहारा
रिपोर्ट के मुताबिक, जिन बैंकों की फंडिंग कॉस्ट कम होती है, उनके पास अपने मार्जिन को बनाए रखने और बिना ज्यादा जोखिम लिए लोन बुक बढ़ाने की गुंजाइश अधिक रहती है. परंपरागत रूप से CASA यानी करंट अकाउंट और सेविंग्स अकाउंट में जमा को बैंक की सस्ती फंडिंग का अहम संकेतक माना जाता है. हालांकि, बैंक की कुल फंडिंग लागत केवल CASA पर निर्भर नहीं करती. इसमें सेविंग्स अकाउंट पर दी जाने वाली ब्याज दर, टर्म डिपॉजिट, उधारी और बैंक की नेटवर्थ भी भूमिका निभाते हैं.
महंगे फंड से NIM पर दबाव
रिपोर्ट के अनुसार, कर्ज बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और बड़ी संख्या में लोन के बाहरी बेंचमार्क से जुड़े होने के कारण बैंकों के लिए फंडिंग लागत बढ़ने का पूरा बोझ ग्राहकों पर डालना आसान नहीं है. ऐसे में डिपॉजिट की लागत बढ़ने पर बैंकों के NIM पर दबाव आ सकता है. ICICI सिक्योरिटीज ने फंडिंग कॉस्ट और मध्यम अवधि की क्रेडिट कॉस्ट के बीच भी संबंध का उल्लेख किया है. ज्यादा फंडिंग लागत वाले बैंकों को समान रिटर्न हासिल करने के लिए अधिक जोखिम वाले कर्ज की ओर जाने का दबाव हो सकता है. वहीं, कम फंडिंग कॉस्ट बैंकों को जोखिम बढ़ाए बिना बेहतर रिटर्न बनाए रखने में मदद कर सकती है.
एचडीएफसी बैंक की फंडिंग स्थिति में सुधार
रिपोर्ट के मुताबिक, विलय के बाद एचडीएफसी बैंक ने अपनी फंडिंग प्रोफाइल में सुधार किया है. बैंक की कुल फंडिंग में उधारी की हिस्सेदारी घटकर करीब 13 फीसदी रह गई है, जो विलय के बाद के 25 फीसदी के उच्च स्तर से काफी कम है. हालांकि, बैंक की CASA हिस्सेदारी अभी भी एक्सिस बैंक से करीब 600 बेसिस पॉइंट कम है. यह अंतर एचडीएफसी बैंक की फंडिंग कॉस्ट पर दबाव बनाए रखने वाला एक कारक है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि किसी बैंक की फंडिंग लागत में दूसरे बैंकों की तुलना में बदलाव उसके वैल्यूएशन को भी प्रभावित कर सकता है. उदाहरण के लिए, कोटक महिंद्रा बैंक की FY17-19 के दौरान फंडिंग कॉस्ट में सुधार को उसके री-रेटिंग के पीछे एक कारण बताया गया है. वहीं, विलय के बाद एचडीएफसी बैंक की फंडिंग स्थिति में आई कमजोरी को उसके बाद हुए डी-रेटिंग के कारणों में शामिल किया गया है.
इन बैंकों पर भी रिपोर्ट की नजर
ICICI सिक्योरिटीज ने फेडरल बैंक, आरबीएल बैंक, करुर व्यस्य बैंक, इंडियन बैंक और बैंक ऑफ महाराष्ट्र का भी फंडिंग कॉस्ट और ग्रोथ के संदर्भ में विश्लेषण किया है. रिपोर्ट के मुताबिक, फेडरल बैंक के हालिया री-रेटिंग में बेहतर फंडिंग कॉस्ट और CASA प्रदर्शन की भूमिका रही है. वहीं, आरबीएल बैंक के लिए FCNR(B) डिपॉजिट लंबे समय की जमा बढ़ाने का एक अवसर हो सकता है.
CASA और टर्म डिपॉजिट का असर
रिपोर्ट में कहा गया है कि आमतौर पर CASA का हिस्सा बढ़ने पर डिपॉजिट की लागत कम होने की संभावना रहती है. हालांकि, ज्यादा सेविंग अकाउंट ब्याज देने वाले बैंक इस सामान्य प्रवृत्ति से अलग हो सकते हैं.
Q1FY27 के विश्लेषण में यह भी सामने आया कि जो बैंक अपेक्षाकृत महंगे टर्म डिपॉजिट पर ज्यादा निर्भर हैं, उन्हें तेज ग्रोथ के दौरान फंडिंग कॉस्ट को नियंत्रित करने में अधिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है.
बैंकों के सामने संतुलन की चुनौती
बैंकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती डिपॉजिट जुटाने और उसकी लागत को नियंत्रित रखने के बीच संतुलन बनाने की है. डिपॉजिट पर ब्याज दर कम करने से फंडिंग कॉस्ट घट सकती है, लेकिन इससे नई जमा जुटाने और ग्रोथ पर असर पड़ सकता है. दूसरी ओर, ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए ज्यादा ब्याज देने से डिपॉजिट बढ़ सकता है, लेकिन इससे मार्जिन पर दबाव आ सकता है.
ICICI सिक्योरिटीज के मुताबिक, FCNR(B) डिपॉजिट कोटक महिंद्रा बैंक और आरबीएल जैसे बैंकों के लिए लंबी अवधि की जमा बढ़ाने का एक विकल्प हो सकता है. ऐसे में आने वाले समय में डिपॉजिट की संरचना, CASA हिस्सेदारी और फंडिंग कॉस्ट बैंकिंग सेक्टर के प्रदर्शन के अहम संकेतक बने रह सकते हैं.
सेबी के मौजूदा निपटान आदेश में जिन मामलों का निपटारा किया गया है, वे संबंधित पक्ष लेनदेन के खुलासे और ऑडिट रिपोर्ट से जुड़े कथित अनुपालन उल्लंघनों पर केंद्रित हैं.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने अडानी ग्रुप की पांच कंपनियों के खिलाफ नियमों के कथित उल्लंघन से जुड़े मामलों का निपटारा कर दिया है. यह कार्रवाई जनवरी 2023 में हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट सामने आने के बाद अडानी ग्रुप से जुड़े मामलों की सेबी की जांच के तहत हुई. निपटान की शर्तों के तहत इन पांच कंपनियों ने कुल करीब 1.5 करोड़ रुपये का भुगतान किया है.
इन कंपनियों के खिलाफ था मामला
सेबी के निपटान आदेश के मुताबिक, मामले में अडानी ग्रुप की फ्लैगशिप कंपनी अडानी एंटरप्राइजेज, अडानी टोटल गैस, एब्ल्यूएल एग्री बिजनेस (पूर्व में अडानी विल्मर), अडानी ग्रीन एनर्जी और अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस (पूर्व में अडानी ट्रांसमिशन) शामिल हैं. मामला कुछ संबंधित पक्षों के लेनदेन यानी Related Party Transactions का आवश्यक खुलासा नहीं करने और ऐसी ऑडिट फर्मों से ऑडिट या सीमित समीक्षा रिपोर्ट पर हस्ताक्षर कराए जाने से जुड़ा था, जिनके पास वैध पीयर रिव्यू प्रमाणपत्र नहीं था.
कंपनियों ने कितना भुगतान किया?
निपटान के तहत अडानी एंटरप्राइजेज ने 76.05 लाख रुपये और अडानी ग्रीन एनर्जी ने 45.50 लाख रुपये का भुगतान किया. वहीं, अडानी टोटल गैस, एब्ल्यूएल एग्री बिजनेस और अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस ने 9.75-9.75 लाख रुपये का भुगतान किया. इस तरह पांचों कंपनियों की ओर से कुल करीब 1.5 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया.
हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद शुरू हुई थी जांच
सेबी की यह पड़ताल अडानी ग्रुप के खिलाफ हिंडनबर्ग रिसर्च की जनवरी 2023 की रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों और कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़े मुद्दों की जांच के व्यापक दायरे का हिस्सा थी. नियामक ने सूचीबद्धता से जुड़े नियमों और उस समय लागू लिस्टिंग एग्रीमेंट के संभावित उल्लंघनों की भी जांच की थी.
जनवरी 2023 में हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट जारी होने के बाद अडानी ग्रुप की कंपनियों के शेयरों में तेज गिरावट देखी गई थी. रिपोर्ट में ग्रुप पर कई गंभीर आरोप लगाए गए थे, जिन्हें अडानी ग्रुप ने खारिज किया था. सेबी के मौजूदा निपटान आदेश में जिन मामलों का निपटारा किया गया है, वे संबंधित पक्ष लेनदेन के खुलासे और ऑडिट रिपोर्ट से जुड़े कथित अनुपालन उल्लंघनों पर केंद्रित हैं.
WEF के अनुसार, सर्वे में शामिल 98 फीसदी अर्थशास्त्रियों को अगले एक साल में भारत में औसत या उससे बेहतर आर्थिक वृद्धि की उम्मीद है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास संभावनाओं को लेकर वैश्विक अर्थशास्त्रियों का भरोसा बढ़ा है. वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के सितंबर 2026 के ‘चीफ इकोनॉमिस्ट्स आउटलुक’ के मुताबिक, सर्वे में शामिल 74 फीसदी मुख्य अर्थशास्त्रियों को अगले 12 महीनों में भारत में मजबूत या बहुत मजबूत आर्थिक वृद्धि की उम्मीद है. मई में यह आंकड़ा 52 फीसदी था. इस तरह कुछ ही महीनों में भारत के ग्रोथ आउटलुक को लेकर धारणा में उल्लेखनीय सुधार हुआ है.
WEF के अनुसार, सर्वे में शामिल 98 फीसदी अर्थशास्त्रियों को अगले एक साल में भारत में औसत या उससे बेहतर आर्थिक वृद्धि की उम्मीद है. संगठन ने भारत को सर्वे में शामिल क्षेत्रों में सबसे मजबूत ग्रोथ आउटलुक वाला क्षेत्र बताया है. मजबूत घरेलू मांग को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए प्रमुख सहारा माना गया है.
चीन और यूरोप के लिए तस्वीर अलग
भारत के मुकाबले चीन और यूरोप की आर्थिक संभावनाओं को लेकर अर्थशास्त्रियों की राय कमजोर बनी हुई है. चीन में करीब एक-तिहाई मुख्य अर्थशास्त्रियों को अगले 12 महीनों में कमजोर आर्थिक वृद्धि की आशंका है. वहीं, यूरोप सर्वे में सबसे कमजोर क्षेत्र बना हुआ है. 61 फीसदी अर्थशास्त्रियों को यूरोप में कमजोर या बहुत कमजोर ग्रोथ की उम्मीद है.
WEF के आकलन के अनुसार, अमेरिका, दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य एशिया के लिए भी आर्थिक वृद्धि का आउटलुक मजबूत बना हुआ है. हालांकि, इन क्षेत्रों के मुकाबले भारत का समग्र ग्रोथ आउटलुक सबसे मजबूत रहा.
भारत की ग्रोथ उम्मीद 74 फीसदी तक पहुंची
भारत को लेकर अर्थशास्त्रियों की धारणा में बदलाव मई के सर्वे की तुलना में साफ दिखाई देता है. मई 2026 में केवल 52 फीसदी अर्थशास्त्रियों को अगले 12 महीनों में भारत में मजबूत या बहुत मजबूत ग्रोथ की उम्मीद थी. सितंबर में यह आंकड़ा बढ़कर 74 फीसदी हो गया.
WEF ने अगस्त में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान भी बढ़ाकर 6.7 फीसदी किया था. हालांकि, संगठन ने ऊर्जा की ऊंची कीमतों और भू-राजनीतिक जोखिमों को भारत के आर्थिक आउटलुक के लिए प्रमुख चुनौतियों में शामिल किया है.
घरेलू मांग बनी अर्थव्यवस्था का सहारा
भारत की मजबूत घरेलू मांग को आर्थिक वृद्धि की प्रमुख वजहों में माना जा रहा है. WEF के आकलन के अनुसार, आंतरिक मांग इतनी मजबूत बनी हुई है कि बाहरी जोखिमों के बावजूद अर्थव्यवस्था की वृद्धि को सहारा मिल सकता है.
यह आकलन भारत के हालिया आधिकारिक GDP आंकड़ों से पहले किया गया था. अप्रैल-जून तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 7.8 फीसदी रही थी. उम्मीद से बेहतर आर्थिक प्रदर्शन के बाद कई संस्थानों ने भारत की विकास दर के अनुमान में बदलाव किया है.
वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर भी बढ़ा भरोसा
WEF के सर्वे में वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर भी अर्थशास्त्रियों की धारणा में सुधार देखने को मिला है. अब 56 फीसदी मुख्य अर्थशास्त्रियों को उम्मीद है कि अगले 12 महीनों में वैश्विक आर्थिक स्थिति स्थिर रहेगी या उसमें सुधार होगा. मई में केवल 11 फीसदी अर्थशास्त्रियों ने ऐसा अनुमान जताया था. हालांकि, वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने जोखिम अभी भी बने हुए हैं. करीब 97 फीसदी अर्थशास्त्रियों ने भू-राजनीतिक टकरावों को अगले एक साल में अनिश्चितता का संभावित कारण बताया. वहीं, 58 फीसदी अर्थशास्त्रियों को एसेट कीमतों में करेक्शन की आशंका है.
ऊर्जा कीमतें भारत के लिए चुनौती
भारत के मजबूत ग्रोथ आउटलुक के बावजूद ऊर्जा की ऊंची कीमतें चिंता का विषय बनी हुई हैं. भारत अपनी तेल जरूरतों के बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है. ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी का असर आयात बिल, महंगाई और चालू खाते पर पड़ सकता है.
WEF ने भी ऊर्जा की ऊंची कीमतों को भारत की आर्थिक संभावनाओं पर असर डालने वाला प्रमुख जोखिम बताया है. इसके अलावा, पश्चिम एशिया समेत विभिन्न क्षेत्रों में भू-राजनीतिक तनाव वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए अनिश्चितता बढ़ा सकते हैं.
ग्रोथ आउटलुक मजबूत, लेकिन कारोबारी माहौल पर सवाल
भारत के आर्थिक विकास को लेकर भरोसा बढ़ने के बावजूद, मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए कारोबारी माहौल को लेकर तस्वीर उतनी मजबूत नहीं है. मई के सर्वे में भारत को अनुकूल कारोबारी माहौल वाले शीर्ष तीन स्थानों में शामिल करने वाले अर्थशास्त्रियों की हिस्सेदारी 56 फीसदी थी, जो सितंबर में घटकर 40 फीसदी रह गई, यानी, भारत को लेकर वैश्विक अर्थशास्त्रियों का भरोसा मुख्य रूप से उसकी आर्थिक वृद्धि और घरेलू मांग को लेकर मजबूत हुआ है, जबकि निवेश और कारोबारी माहौल से जुड़े कुछ संकेतकों में अभी सुधार की गुंजाइश बनी हुई है.
मंगलवार को बीएसई सेंसेक्स 329.91 अंक यानी 0.44 फीसदी गिरकर 74,529.08 पर बंद हुआ. वहीं, एनएसई निफ्टी 85.30 अंक यानी 0.36 फीसदी की गिरावट के साथ 23,329.00 पर रहा.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में बुधवार, 23 सितंबर को कारोबार की शुरुआत कमजोर रह सकती है. गिफ्ट निफ्टी के सुस्त संकेतों और एशियाई बाजारों में मिले-जुले कारोबार के बीच घरेलू बाजार पर दबाव बना रहने की आशंका है. हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में लगातार जारी नरमी बाजार के लिए कुछ राहत दे सकती है. निवेशकों की नजर पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक तनाव, विदेशी निवेशकों की बिकवाली, रुपये की चाल और वैश्विक बाजारों के रुख पर रहेगी. इससे पहले मंगलवार को शुरुआती बढ़त के बावजूद सेंसेक्स और निफ्टी गिरावट के साथ बंद हुए थे.
मंगलवार को 30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स 329.91 अंक यानी 0.44 फीसदी गिरकर 74,529.08 पर बंद हुआ. वहीं, एनएसई का निफ्टी 85.30 अंक यानी 0.36 फीसदी की गिरावट के साथ 23,329.00 पर रहा. सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 23 गिरावट में रहे, जबकि निफ्टी के 50 शेयरों में 35 शेयर लाल निशान में बंद हुए.
गिफ्ट निफ्टी और ग्लोबल संकेतों पर नजर
बुधवार के कारोबार से पहले गिफ्ट निफ्टी के संकेत घरेलू बाजार में कमजोर शुरुआत की ओर इशारा कर रहे हैं. एशियाई बाजारों में भी मिला-जुला कारोबार देखने को मिल रहा है. ऐसे में निवेशकों की नजर अमेरिकी और एशियाई बाजारों के रुझान के साथ डॉलर-रुपये की चाल पर रहेगी. पश्चिम एशिया में जारी तनाव भी बाजार की धारणा को प्रभावित कर सकता है.
क्रूड में नरमी से बाजार को राहत
कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट भारतीय शेयर बाजार के लिए राहत देने वाला संकेत है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 99 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गया है, जबकि अमेरिकी WTI 90 डॉलर प्रति बैरल के नीचे कारोबार कर रहा है. बुधवार सुबह नवंबर डिलीवरी वाला ब्रेंट क्रूड 0.48 फीसदी गिरकर 98.77 डॉलर प्रति बैरल पर था. वहीं, नवंबर डिलीवरी वाला WTI 0.85 फीसदी की गिरावट के साथ 89.75 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया. पिछले छह कारोबारी सत्रों में ब्रेंट क्रूड की कीमत 9 फीसदी से ज्यादा गिर चुकी है.
शुरुआती बढ़त के बाद मंगलवार को फिसला बाजार
मंगलवार को घरेलू बाजार की शुरुआत बढ़त के साथ हुई थी. सेंसेक्स 74,901.50 पर, जबकि निफ्टी 23,454.05 पर खुला था. हालांकि, कारोबार बढ़ने के साथ शुरुआती तेजी कमजोर पड़ गई और दोनों प्रमुख सूचकांक लाल निशान में बंद हुए.
सेंसेक्स 329.91 अंक टूटकर 74,529.08 पर बंद हुआ. वहीं निफ्टी 85.30 अंक गिरकर 23,329.00 पर रहा. सेंसेक्स के 30 शेयरों में केवल 7 शेयर बढ़त में रहे, जबकि 23 शेयरों में गिरावट दर्ज की गई. निफ्टी में भी 35 शेयर नुकसान में बंद हुए.
FII की बिकवाली बनी चुनौती
विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी घरेलू बाजार के लिए दबाव का एक प्रमुख कारण बनी हुई है. 21 सितंबर को विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने भारतीय शेयर बाजार में 576 करोड़ रुपये की शुद्ध बिकवाली की थी. इसके मुकाबले घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) ने 2,797 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी की.
घरेलू संस्थागत निवेशकों की खरीदारी से बाजार को कुछ सहारा मिला है, लेकिन विदेशी पूंजी के प्रवाह और वैश्विक बाजारों की दिशा पर निवेशकों की नजर बनी हुई है.
मंगलवार को इन शेयरों में रही हलचल
सेंसेक्स में इटरनल 1.94 फीसदी की बढ़त के साथ प्रमुख गेनर रहा. इंडिगो 1.58 फीसदी, टाइटन 0.72 फीसदी, टाटा स्टील 0.60 फीसदी और एनटीपीसी 0.15 फीसदी चढ़े. दूसरी ओर, बजाज फिनसर्व 1.62 फीसदी, ट्रेंट 1.47 फीसदी, बजाज फाइनेंस 1.46 फीसदी, सन फार्मा 1.28 फीसदी और टीसीएस 1.13 फीसदी की गिरावट के साथ प्रमुख लूजर रहे.
निफ्टी में कोल इंडिया 3.21 फीसदी की तेजी के साथ सबसे ज्यादा चढ़ा. इटरनल, इंडिगो, टाइटन और डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज में भी बढ़त रही. वहीं, टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स, नेस्ले इंडिया, बजाज फिनसर्व, बजाज फाइनेंस और सन फार्मा दबाव में रहे.
इन शेयरों पर रहेगी नजर
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आज IRB Infrastructure Developers, Pine Labs, Lemon Tree Hotels, Veegaland Developers, LG Electronics India, Allcargo Terminals, Swastika Infra और NATCO Pharma के शेयर अहम कॉरपोरेट अपडेट्स के चलते फोकस में रहेंगे. IRB Infrastructure Developers के बोर्ड ने पुणे और मुंबई स्थित गैर-प्रमुख संपत्तियों को चरणबद्ध तरीके से मोनेटाइज करने की सैद्धांतिक मंजूरी दी है. Mastercard ने Pine Labs में अपनी पूरी 4.31 फीसदी हिस्सेदारी करीब 933.57 करोड़ रुपये में बेच दी है. Lemon Tree Hotels ने महाराष्ट्र के नासिक में अपना पहला होटल Keys Prima by Lemon Tree Hotels शुरू किया है. Veegaland Developers के प्रमोटर और संस्थापक Chittilappilly Thomas Kochuouseph ने कंपनी के 2.69 लाख अतिरिक्त शेयर खरीदे हैं, जो 0.55 फीसदी हिस्सेदारी के बराबर है. LG Electronics India को त्योहारी सीजन में बिक्री में दोहरे अंक की वृद्धि की उम्मीद है और कंपनी एक्सपोर्ट कारोबार का विस्तार करने की योजना बना रही है. Allcargo Terminals का अगस्त 2026 में कंटेनर वॉल्यूम सालाना आधार पर 6 फीसदी बढ़कर 65,600 TEUs रहा. वहीं, NATCO Pharma का बोर्ड 25 सितंबर को करीब 1,300 करोड़ रुपये तक के राइट्स इश्यू पर विचार करेगा.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
भारत, यूरोपीय संघ, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्राजील, बारबाडोस और केन्या ने न्यूयॉर्क में शुरू की ‘बहुपक्षवाद के लिए साझेदार’ पहल; अंतरराष्ट्रीय कानून, शांति और समावेशी विकास के लिए सहयोग बढ़ाने का लक्ष्य
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत, यूरोपीय संघ (EU), ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्राजील, बारबाडोस और केन्या ने संयुक्त राष्ट्र में सुधार और बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत करने के लिए ‘बहुपक्षवाद के लिए साझेदार’ (Partners for Multilateralism- P4M ),पहल शुरू की है. यह पहल 81वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान 21 सितंबर को न्यूयॉर्क में शुरू की गई. सातों शुरुआती सह-प्रायोजक देशों ने P4M समिट की घोषणा को अपनाया.
P4M का उद्देश्य अलग-अलग क्षेत्रों के देशों को अंतरराष्ट्रीय कानून, शांति, समावेशी विकास और साझा समृद्धि जैसे साझा सिद्धांतों के आधार पर एक साथ लाना है. पहल ऐसे समय शुरू हुई है जब दुनिया में भू-राजनीतिक तनाव, संघर्ष, ध्रुवीकरण और संरक्षणवाद बढ़ने के बीच बहुपक्षीय सहयोग को लेकर चिंताएं सामने आ रही हैं.
संयुक्त राष्ट्र में व्यापक सुधार पर जोर
P4M घोषणा में बहुपक्षीय व्यवस्था में सुधार को प्रमुख प्राथमिकता दी गई है. इसमें खास तौर पर संयुक्त राष्ट्र को अधिक प्रभावी, प्रतिनिधित्वपूर्ण, समावेशी और मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप बनाने पर जोर दिया गया है.
सदस्य देशों ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर पर आधारित बहुपक्षीय व्यवस्था आज भी जरूरी है, लेकिन दुनिया के तेजी से बदलते स्वरूप को देखते हुए इसमें सुधार की जरूरत है. देशों के मुताबिक मौजूदा वैश्विक व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक आपस में जुड़ी हुई, जटिल और बहुध्रुवीय हो गई है.
घोषणा में UN80 जैसी पहलों के जरिए बहुपक्षीय संस्थानों को मजबूत और अधिक प्रभावी बनाने की प्रतिबद्धता जताई गई है. इसका उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र की संघर्षों को रोकने, संकटों से निपटने, सतत विकास को बढ़ावा देने, मानवाधिकारों की रक्षा करने और नई वैश्विक चुनौतियों से निपटने की क्षमता को मजबूत करना है.
भारत ने पहले भी उठाया है वैश्विक संस्थाओं में सुधार का मुद्दा
P4M पहल भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में नई दिल्ली में हुए 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में वैश्विक शासन व्यवस्था में व्यापक सुधार की जरूरत पर जोर दिया था. उन्होंने वैश्विक नियमों को तय करने में ग्लोबल साउथ की अधिक भूमिका की बात कही थी.
मोदी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में बदलाव की जरूरत भी बताई थी. ऐसे में P4M के जरिए बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार और उन्हें अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने का मुद्दा भारत की प्राथमिकताओं से भी जुड़ता है.
अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभु समानता पर जोर
P4M घोषणा में अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन, देशों की संप्रभु समानता, क्षेत्रीय अखंडता और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के सिद्धांतों को दोहराया गया है. इसमें बल प्रयोग या बल प्रयोग की धमकी पर रोक के सिद्धांत का भी समर्थन किया गया है.
सदस्य देशों ने कहा कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में अंतरराष्ट्रीय नियमों और सहयोग की भूमिका को मजबूत करना जरूरी है. जलवायु परिवर्तन, नई तकनीकों और अन्य वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है.
व्यापार, तकनीक और जलवायु पर भी सहयोग
P4M का एजेंडा केवल राजनीतिक और सुरक्षा मामलों तक सीमित नहीं है. घोषणा में वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को अधिक मजबूत और लचीला बनाने, बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था में सुधार और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय ढांचे को बेहतर बनाने की बात कही गई है.
इसके अलावा डिजिटल बदलाव, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है. इसका उद्देश्य अलग-अलग क्षेत्रों के देशों के बीच व्यावहारिक सहयोग को बढ़ावा देना है.
अन्य देशों के लिए भी खुला रहेगा मंच
P4M को किसी नए औपचारिक गठबंधन के तौर पर पेश नहीं किया गया है. इसका उद्देश्य अलग-अलग भू-राजनीतिक परिस्थितियों वाले देशों को बहुपक्षीय सहयोग के साझा एजेंडे पर साथ लाना है. यह पहल भविष्य में अन्य क्षेत्रों और देशों की भागीदारी के लिए भी खुली रहेगी.
यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंतोनियो कोस्टा ने P4M को संवाद, गठबंधन निर्माण और व्यावहारिक सहयोग के लिए एक मंच बताया है. उन्होंने कहा कि यह अलग-अलग क्षेत्रों के बीच पुल बनाने और बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार तथा आधुनिकीकरण में योगदान दे सकता है.
न्यूयॉर्क में हुई P4M बैठक
P4M शिखर बैठक 21 सितंबर को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के उच्चस्तरीय सप्ताह के दौरान हुई. इसमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज, बारबाडोस की प्रधानमंत्री मिया मोटली, ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी और केन्या के राष्ट्रपति विलियम रूटो शामिल हुए.
सातों शुरुआती साझेदार देशों ने कहा है कि वे दुनिया के अन्य देशों के साथ नियमित संवाद और समन्वय जारी रखेंगे, ताकि बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत किया जा सके और वैश्विक संस्थाओं में सुधार के लिए व्यावहारिक कदम आगे बढ़ाए जा सकें.
सागरमाला फाइनेंस कॉरपोरेशन अगले सप्ताह कर सकता है देश के पहले ब्लू बॉन्ड का इश्यू, पोर्ट कनेक्टिविटी, जहाज निर्माण और तटीय बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं को मिल सकता है वित्त
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत सस्टेनेबल फाइनेंस के एक नए क्षेत्र में कदम रखने जा रहा है. सागरमाला फाइनेंस कॉरपोरेशन अगले सप्ताह देश का पहला ब्लू बॉन्ड जारी कर सकता है. इसके जरिए करीब ₹1,000 करोड़ तक जुटाने की योजना है. इस रकम का इस्तेमाल समुद्री क्षेत्र, तटीय बुनियादी ढांचे और जल से जुड़ी परियोजनाओं के वित्तपोषण में किया जा सकता है. सागरमाला फाइनेंस कॉरपोरेशन बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्रालय के तहत काम करने वाली सरकारी स्वामित्व वाली वित्तीय संस्था है. प्रस्तावित ब्लू बॉन्ड के जरिए भारत ग्रीन बॉन्ड से आगे बढ़कर सस्टेनेबल डेट मार्केट के एक नए हिस्से में प्रवेश करेगा.
क्या होता है ब्लू बॉन्ड?
ब्लू बॉन्ड ऐसे डेट इंस्ट्रूमेंट होते हैं, जिनसे जुटाई गई रकम का इस्तेमाल समुद्र, महासागर, तटीय क्षेत्रों, नदियों और अन्य जल आधारित पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ी परियोजनाओं के लिए किया जाता है. दुनियाभर में इनका इस्तेमाल समुद्री संरक्षण, टिकाऊ मत्स्य पालन और जल बुनियादी ढांचे जैसी परियोजनाओं के लिए किया जाता रहा है. भारत में प्रस्तावित इश्यू से समुद्री और जल क्षेत्र की लंबी अवधि वाली परियोजनाओं के लिए पूंजी जुटाने का एक नया माध्यम तैयार हो सकता है.
₹1,000 करोड़ तक जुटाने की योजना
सागरमाला फाइनेंस कॉरपोरेशन पहले ही अपने पहले ब्लू बॉन्ड के जरिए ₹1,000 करोड़ तक जुटाने की योजना का संकेत दे चुका है. प्रस्तावित फंड का इस्तेमाल पोर्ट कनेक्टिविटी, जहाज निर्माण, अंतर्देशीय जलमार्ग और तटीय बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं में किया जा सकता है.
इस बॉन्ड इश्यू से कंपनी के लिए कर्ज जुटाने के स्रोतों में भी विविधता आएगी. साथ ही, लंबी अवधि की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के अनुरूप लंबी अवधि का वित्त जुटाने में मदद मिल सकती है. यह इश्यू भारत में ब्लू फाइनेंस के लिए निवेशकों की रुचि को भी परख सकता है. अभी भारत के सस्टेनेबल डेट मार्केट में ग्रीन बॉन्ड का हिस्सा अधिक रहा है.
भारत के सस्टेनेबल फाइनेंस मार्केट को मिलेगा नया विकल्प
भारत का पहला ब्लू बॉन्ड ऐसे समय में आ रहा है जब दुनियाभर में समुद्र और जल से जुड़ी परियोजनाओं के लिए वित्त जुटाने में रुचि बढ़ रही है. सेशेल्स ने 2018 में दुनिया का पहला सॉवरेन ब्लू बॉन्ड जारी किया था.
भारत में सागरमाला फाइनेंस के अलावा वडोदरा नगर निगम भी ब्लू बॉन्ड जारी करने की संभावनाओं पर काम कर रहा है. वडोदरा करीब ₹200 करोड़ का ब्लू बॉन्ड जारी करने पर विचार कर रहा है. इससे पंप हाउस, जल शोधन संयंत्र और साफ पानी के जलाशय जैसी जल संबंधी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को वित्त दिया जा सकता है.
आगे के लिए बन सकता है मॉडल
सागरमाला फाइनेंस का प्रस्तावित इश्यू भारत के डेट मार्केट में एक नए सेगमेंट की शुरुआत कर सकता है. इससे समुद्री, तटीय और जल आधारित बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए भविष्य में इस तरह के बॉन्ड के जरिए फंड जुटाने का रास्ता खुल सकता है. हालांकि, बॉन्ड का अंतिम आकार, जारी करने की तारीख और शर्तें नियामकीय मंजूरियों और उस समय की बाजार परिस्थितियों पर निर्भर करेंगी. इसके बावजूद, प्रस्तावित इश्यू भारत में ब्लू फाइनेंस के विकास की दिशा में एक नया कदम होगा.
जून 2026 तक AIF में कुल निवेश ₹7.1 लाख करोड़ पहुंचा, सालाना आधार पर निवेश प्रतिबद्धता 23.6% बढ़ी; रियल एस्टेट में पहली बार गिरावट
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ऑल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड (AIF) में निवेश का आंकड़ा पहली बार 7 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है. भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) के आंकड़ों के मुताबिक, जून 2026 तक AIF में कुल निवेश बढ़कर 7.1 लाख करोड़ रुपये हो गया. वहीं, इस श्रेणी के फंड्स के लिए कुल निवेश प्रतिबद्धता बढ़कर 17.53 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गई, जो मार्च 2026 के अंत में 16.94 लाख करोड़ रुपये थी. यानी तीन महीने में प्रतिबद्धता में करीब 3.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई.
सालाना आधार पर देखें तो जून 2025 की तुलना में AIF में निवेश प्रतिबद्धता करीब 23.6 फीसदी बढ़ी है. इस दौरान AIF के जरिए जुटाया गया कुल फंड भी बढ़कर 7.58 लाख करोड़ रुपये हो गया. आंकड़े बताते हैं कि वैकल्पिक निवेश का यह सेगमेंट लगातार विस्तार कर रहा है.
क्या होता है AIF
AIF ऐसे निवेश फंड होते हैं जो आमतौर पर पारंपरिक म्यूचुअल फंड या बैंक FD से अलग तरह की संपत्तियों और कंपनियों में निवेश करते हैं. इनमें बड़े निवेशक अपना पैसा लगाते हैं और पेशेवर फंड मैनेजर उस पैसे को अलग-अलग अवसरों में निवेश करते हैं. AIF के जरिए स्टार्टअप और अनलिस्टेड कंपनियां, प्राइवेट इक्विटी, रियल एस्टेट और इंफ्रास्ट्रक्चर, कर्ज/डेट इंस्ट्रूमेंट में निवेश किया जाता है. वहीं, कुछ मामलों में शेयर और अन्य वैकल्पिक जगह भी निवेश होता है.
चार साल में तीन गुना से ज्यादा हुई प्रतिबद्धता
AIF में निवेश प्रतिबद्धता पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है. जून 2021 में यह 4.87 लाख करोड़ रुपये थी, जो जून 2022 में बढ़कर 6.94 लाख करोड़ रुपये हो गई. जून 2023 में यह आंकड़ा 8.45 लाख करोड़ रुपये और जून 2024 में 11.78 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया.
इसके बाद भी बढ़ोतरी का सिलसिला जारी रहा. मार्च 2026 तक AIF में निवेश प्रतिबद्धता 16.94 लाख करोड़ रुपये थी, जो जून 2026 तक बढ़कर 17.53 लाख करोड़ रुपये हो गई.
इस तरह चार साल की अवधि में AIF में निवेश के लिए की गई प्रतिबद्धता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. यह ऐसे समय में हो रहा है जब वैकल्पिक निवेश उत्पादों के प्रति बड़े और संस्थागत निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ी है.
रियल एस्टेट में पहली बार निवेश घटा
AIF के आंकड़ों में एक अहम बदलाव रियल एस्टेट क्षेत्र में देखने को मिला है. जून 2026 तक रियल एस्टेट में कुल निवेश 87,969 करोड़ रुपये रहा, जबकि मार्च 2026 में यह करीब 1.29 लाख करोड़ रुपये था. यानी इस क्षेत्र में तिमाही आधार पर निवेश में गिरावट दर्ज की गई.
हालांकि, निवेश के मामले में रियल एस्टेट अब भी AIF के प्रमुख क्षेत्रों में शामिल है. वहीं वित्तीय सेवाओं, सूचना प्रौद्योगिकी (IT), नॉन-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC), बैंकों, फार्मा और हेल्थकेयर जैसे क्षेत्रों में निवेश लगातार बढ़ रहा है. इन सेक्टरों में बढ़ता निवेश AIF के पोर्टफोलियो के धीरे-धीरे ज्यादा विविध होने का संकेत देता है.
प्रतिबद्धता और निवेश में क्या अंतर है?
AIF के आंकड़ों को समझने के लिए ‘कमिटमेंट’ और ‘इन्वेस्टमेंट’ के बीच अंतर समझना जरूरी है. निवेशक जब किसी AIF में पैसा लगाने की प्रतिबद्धता जताते हैं, तो पूरी रकम आमतौर पर एक साथ फंड में नहीं आती. फंड मैनेजर जरूरत और निवेश के अवसर के अनुसार इसे अलग-अलग किस्तों में बुलाते हैं.
यही वजह है कि कुल निवेश प्रतिबद्धता का आंकड़ा जुटाए गए फंड और वास्तविक निवेश से काफी अधिक रहता है. जैसे-जैसे फंड मैनेजर निवेश के लिए प्रतिबद्ध रकम का इस्तेमाल करते हैं, उसका असर जुटाए गए फंड और वास्तविक निवेश के आंकड़ों में दिखाई देता है.
SEBI के सुधारों से भी मिला सहारा
पिछले कुछ वर्षों में बाजार नियामक SEBI ने AIF के लिए फंड जुटाने और उनके संचालन को आसान बनाने के लिए कई बदलाव किए हैं. नियामक का फोकस इस सेगमेंट के कामकाज को अधिक व्यवस्थित बनाने और निवेश प्रक्रिया को आसान करने पर रहा है.
SEBI निवेशकों को AIF जैसे वैकल्पिक निवेश उत्पादों से जोड़ने के लिए एक्रिडिटेड इन्वेस्टर फ्रेमवर्क की भी समीक्षा करने पर विचार कर रहा है. ऐसे नियामकीय बदलावों से इस सेगमेंट में निवेशकों की भागीदारी और फंड मैनेजरों के लिए पूंजी जुटाने की प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है.
कुल मिलाकर, जून 2026 तक के आंकड़े AIF बाजार के लगातार विस्तार की तस्वीर दिखाते हैं. ₹7.1 लाख करोड़ का वास्तविक निवेश पहली बार ₹7 लाख करोड़ के पार पहुंचना और ₹17.53 लाख करोड़ की निवेश प्रतिबद्धता यह बताती है कि वैकल्पिक निवेश फंड भारतीय निवेश बाजार में लगातार बड़ा स्थान बना रहे हैं.