मालदीव में बड़ा हादसा: स्पीडबोट पलटने से उद्योगपति गौतम सिंघानिया घायल, मुंबई में इलाज जारी

यह हादसा एक बड़ा झटका जरूर है, लेकिन राहत की बात यह है कि गौतम सिंघानिया सुरक्षित हैं और तेजी से रिकवरी कर रहे हैं. वहीं, लापता लोगों की तलाश अभी भी जारी है, जिस पर सभी की नजर बनी हुई है.

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Saturday, 21 March, 2026
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देश के प्रमुख उद्योगपति और रेमंड ग्रुप के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर गौतम सिंघानिया मालदीव में एक स्पीडबोट हादसे में घायल हो गए. राहत की बात यह है कि उनकी हालत स्थिर बताई जा रही है और उन्हें तुरंत एयरलिफ्ट कर मुंबई लाकर अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनका इलाज जारी है.

मालदीव के फेलिधू इलाके में यह हादसा उस समय हुआ जब स्पीडबोट अचानक पलट गई. नाव में कुल सात लोग सवार थे, जिनमें पांच भारतीय, एक रूसी महिला और एक ब्रिटेन की महिला शामिल थीं. हादसे के बाद कुछ लोग समुद्र में बह गए, जिससे स्थिति गंभीर हो गई.

रेस्क्यू ऑपरेशन और एयरलिफ्ट

हादसे के तुरंत बाद राहत एवं बचाव अभियान चलाया गया. गौतम सिंघानिया को सुरक्षित बाहर निकालकर तुरंत भारत लाया गया. उन्हें मुंबई के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां डॉक्टरों की निगरानी में उनका इलाज चल रहा है.

दो भारतीय अब भी लापता

इस दुर्घटना में दो भारतीय नागरिक अब भी लापता बताए जा रहे हैं. उनकी तलाश के लिए लगातार सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है. लापता लोगों में प्रसिद्ध रैली ड्राइवर हरि सिंह का नाम भी शामिल बताया जा रहा है. स्थानीय प्रशासन और बचाव दल समुद्र में उनकी खोज में जुटे हुए हैं.

सिंघानिया की हालत कैसी है

सूत्रों के मुताबिक गौतम सिंघानिया को मामूली चोटें आई हैं, जैसे खरोंच और हल्की चोट. डॉक्टरों ने उन्हें खतरे से बाहर बताया है. कंपनी के प्रवक्ता ने भी पुष्टि की है कि यह एक दुर्भाग्यपूर्ण हादसा था, लेकिन उनकी स्थिति स्थिर है.

एडवेंचर के शौकीन उद्योगपति

गौतम सिंघानिया अपने एडवेंचर स्पोर्ट्स और तेज रफ्तार के शौक के लिए जाने जाते हैं. वे अक्सर मोटरस्पोर्ट्स और हाई-स्पीड गतिविधियों में हिस्सा लेते रहे हैं, जो उनके व्यक्तित्व का खास हिस्सा माना जाता है.

रेमंड ग्रुप का कारोबार और नेटवर्थ

रेमंड ग्रुप देश के प्रमुख औद्योगिक समूहों में शामिल है, जिसका कारोबार कपड़ा, रियल एस्टेट, इंजीनियरिंग और कंज्यूमर केयर जैसे कई क्षेत्रों में फैला हुआ है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार गौतम सिंघानिया की कुल संपत्ति 11,000 करोड़ रुपये से अधिक आंकी जाती है.

 

 


हैदराबाद में माइक्रोसॉफ्ट का नया AI-ready डेटासेंटर रीजन शुरू, एशिया और ग्लोबल साउथ पर नजर

माइक्रोसॉफ्ट के मुताबिक, हैदराबाद का नया डेटासेंटर रीजन भारत में कंपनी की 20.5 अरब डॉलर की निवेश प्रतिबद्धता का अहम हिस्सा है. अडानी ग्रुप, बजाज फिनसर्व, एचडीएफसी बैंक और पीबी पे जैसी कंपनियां इस नए रीजन के लिए साइन अप कर चुकी हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Monday, 21 September, 2026
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Monday, 21 September, 2026
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माइक्रोसॉफ्ट ने हैदराबाद में अपने नए इंडिया साउथ सेंट्रल डेटासेंटर रीजन को लाइव कर दिया है. कंपनी के मुताबिक, यह भारत में उसका चौथा क्लाउड रीजन है, जिसे एडवांस्ड एआई वर्कलोड्स के लिए तैयार किया गया है. तीन-जोन आर्किटेक्चर वाले इस रीजन में समय के साथ एज़्योर और एआई सर्विसेज की क्षमता बढ़ाई जाएगी. माइक्रोसॉफ्ट इसे भारत के साथ-साथ एशिया और ग्लोबल साउथ के लिए एक स्ट्रैटेजिक हब के रूप में विकसित करना चाहता है.

भारत में माइक्रोसॉफ्ट का 20.5 अरब डॉलर का निवेश

माइक्रोसॉफ्ट के मुताबिक, हैदराबाद का नया डेटासेंटर रीजन भारत में कंपनी की 20.5 अरब डॉलर की निवेश प्रतिबद्धता का अहम हिस्सा है. अडानी ग्रुप, बजाज फिनसर्व, एचडीएफसी बैंक और पीबी पे जैसी कंपनियां इस नए रीजन के लिए साइन अप कर चुकी हैं.

कंपनी ने कहा कि भारत में उसके डेटासेंटर रीजन अब एआई-रेडी हैं. इनमें एआई-कैपेबल हार्डवेयर, हाई-एफिशिएंसी कूलिंग सिस्टम और एडवांस्ड एआई वर्कलोड्स को चलाने के लिए जरूरी प्लेटफॉर्म फाउंडेशन शामिल हैं.

तीन-जोन आर्किटेक्चर से बढ़ेगी क्षमता

इंडिया साउथ सेंट्रल रीजन को रेजिलिएंट थ्री-जोन आर्किटेक्चर के साथ तैयार किया गया है. कंपनी के मुताबिक, इसे भविष्य में क्षमता बढ़ाने के लिए डिजाइन किया गया है. इसमें फिलहाल एज़्योर सर्विसेज का व्यापक पोर्टफोलियो उपलब्ध है और आने वाले महीनों में अतिरिक्त एज़्योर और एआई सर्विसेज जोड़ी जाएंगी.

माइक्रोसॉफ्ट के अनुसार, सपोर्टेड सर्विसेज के उपलब्ध होने के साथ भारतीय संगठन अपनी पात्र संवेदनशील वर्कलोड्स को स्थानीय स्तर पर ऐसे कंट्रोल्स के साथ डिप्लॉय कर सकेंगे, जो सुरक्षा, कंप्लायंस और डेटा सॉवरेन्टी से जुड़ी जरूरतों को पूरा करने में मदद करेंगे.

डेटा प्रोटेक्शन और सॉवरेन्टी पर फोकस

कंपनी ने कहा कि उसके भारत स्थित क्लाउड रीजन MeitY की गाइडलाइंस के अनुरूप क्षमताएं उपलब्ध कराते हैं. इनमें डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) फ्रेमवर्क के साथ-साथ RBI और CERT-In जैसी संस्थाओं की सेक्टर-स्पेसिफिक जरूरतों को पूरा करने में मदद करने वाली क्षमताएं शामिल हैं.

माइक्रोसॉफ्ट के मुताबिक, अलग-अलग एआई और क्लाउड वर्कलोड्स के लिए डेटा लोकेशन, एन्क्रिप्शन, ऑपरेशनल एक्सेस और गवर्नेंस के अलग-अलग स्तर के कंट्रोल की जरूरत हो सकती है. इंडिया साउथ सेंट्रल में सपोर्टेड सर्विसेज के विस्तार के साथ Azure Confidential Computing, Customer Lockbox और Azure Key Vault जैसी क्षमताएं उपलब्ध कराई जाएंगी.

कूलिंग में पानी का इस्तेमाल प्रभावी रूप से शून्य

माइक्रोसॉफ्ट के अनुसार, इंडिया साउथ सेंट्रल रीजन में हाई-एफिशिएंसी मैकेनिकल कूलिंग का इस्तेमाल किया गया है और कूलिंग के लिए पानी का इस्तेमाल प्रभावी रूप से शून्य रहता है. कंपनी ने इसे अपने 2030 तक कार्बन नेगेटिव, वाटर पॉजिटिव और जीरो वेस्ट बनने के वैश्विक लक्ष्यों से जोड़ा है.

हैदराबाद में कंपनी स्थानीय साझेदारों के साथ ग्राउंडवॉटर रिचार्ज, रेनवॉटर हार्वेस्टिंग और वाटरशेड रेजिलिएंस पर भी काम कर रही है. कंपनी के मुताबिक, एलिकट्टा ग्राउंडवॉटर रिचार्ज प्रोग्राम ने जून 2026 तक करीब 50 लाख लीटर की रिचार्ज क्षमता जोड़ी है.

1 करोड़ से ज्यादा भारतीयों को AI स्किल्स

माइक्रोसॉफ्ट ने भारत में एआई स्किलिंग को लेकर भी नया आंकड़ा साझा किया है. कंपनी के मुताबिक, 2030 तक 2 करोड़ लोगों को एआई स्किल्स देने की प्रतिबद्धता के तहत अब तक 1 करोड़ से अधिक भारतीयों को एआई स्किल्स प्रदान की जा चुकी हैं. कंपनी के अनुसार, करीब 25 फीसदी लर्नर्स फाउंडेशनल एआई कोर्स से आगे बढ़कर अतिरिक्त लर्निंग पाथवे के लिए क्रेडेंशियल हासिल कर चुके हैं.

इसके अलावा, माइक्रोसॉफ्ट का डेटा सेंटर अकैडमी प्रोग्राम तेलंगाना सरकार और यंग इंडिया स्किल्स यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर चलाया जा रहा है. इसके तहत 600 घंटे का इंडस्ट्री-अलाइन्ड स्किलिंग प्रोग्राम है, जिसमें छात्रों को डेटासेंटर ऑपरेशंस और इंफ्रास्ट्रक्चर मैनेजमेंट की ट्रेनिंग दी जाती है.

3,600 किलोमीटर की सबमरीन केबल परियोजना में भी भागीदारी

माइक्रोसॉफ्ट भारत की डिजिटल कनेक्टिविटी से जुड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में भी निवेश कर रहा है. कंपनी इंडिया-साउथईस्ट एशिया (I-2SEA) सबमरीन केबल सिस्टम में कंसोर्टियम पार्टनर है.

करीब 3,600 किलोमीटर लंबा यह सबसी केबल कॉरिडोर भारत, मलेशिया और सिंगापुर को जोड़ेगा. भारत में मछलीपट्टनम और साउथ चेन्नई में इसके दो लैंडिंग पॉइंट होंगे. कंपनी के मुताबिक, इस सिस्टम का लक्ष्य 2029 तक सर्विस के लिए तैयार होना है.

माइक्रोसॉफ्ट ने क्या कहा?

माइक्रोसॉफ्ट इंडिया एंड साउथ एशिया के प्रेसिडेंट पुनीत चंडोक ने कहा कि इंडिया साउथ सेंट्रल कंपनी का भारत में चौथा क्लाउड रीजन है, जिसे एडवांस्ड एआई वर्कलोड्स के लिए तैयार किया गया है. उन्होंने कहा कि भारत में एआई के लिए केवल कंप्यूट क्षमता ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि सुरक्षित, सॉवरेन और टिकाऊ इंफ्रास्ट्रक्चर भी जरूरी है.

वाणिज्य एवं उद्योग तथा इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने कहा कि इंडिया साउथ सेंट्रल डेटासेंटर रीजन भारत की एआई महत्वाकांक्षा के लिए जरूरी डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करता है. उनके मुताबिक, ऐसे निवेश देश में एआई क्षमता बढ़ाने, इनोवेशन को गति देने और डेवलपर्स, कंपनियों तथा सार्वजनिक संस्थानों को एआई के इस्तेमाल में सक्षम बनाने में मदद कर सकते हैं.

भारत में बढ़ रहा डेटासेंटर निवेश

माइक्रोसॉफ्ट ने Boston Consulting Group (BCG) की एक स्टडी का हवाला देते हुए कहा कि भारत में डेटासेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार से 2030 तक 140-200 अरब डॉलर का आर्थिक आउटपुट पैदा हो सकता है. कंपनी के मुताबिक, भारत में बढ़ती क्लाउड और एआई मांग के बीच डेटासेंटर, कनेक्टिविटी और एआई स्किलिंग में निवेश देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार में योगदान दे रहा है.


 


टाटा ग्रुप में LIC की हिस्सेदारी ₹1 लाख करोड़ के पार, चंद्रशेखरन के दूसरे कार्यकाल में इन शेयरों में बढ़ा निवेश

प्राइम डेटाबेस के आंकड़ों के मुताबिक, जून 2022 के बाद टाटा ग्रुप की 14 लिस्टेड कंपनियों में से 10 में LIC की हिस्सेदारी बढ़ी है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Monday, 21 September, 2026
Last Modified:
Monday, 21 September, 2026
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टाटा सन्स के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन के दूसरे कार्यकाल के दौरान टाटा ग्रुप (Tata Group) की कई लिस्टेड कंपनियों में भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की हिस्सेदारी बढ़ी है. प्राइम डेटाबेस के आंकड़ों के मुताबिक, जून 2022 के बाद टाटा ग्रुप की 14 लिस्टेड कंपनियों में से 10 में LIC की हिस्सेदारी बढ़ी है. इसके साथ ही टाटा ग्रुप की लिस्टेड कंपनियों में LIC के निवेश का कुल मूल्य ₹1 लाख करोड़ के पार पहुंच गया है. यह आंकड़ा ऐसे समय सामने आया है जब चंद्रशेखरन के दोबारा पांच साल के कार्यकाल को लेकर टाटा ग्रुप में मतभेद की खबरें हैं.

TCS में LIC की सबसे बड़ी हिस्सेदारी

टाटा ग्रुप की कंपनियों में LIC की सबसे बड़ी हिस्सेदारी TCS में है. कंपनी में LIC की हिस्सेदारी करीब 5.22% है, जिसकी मौजूदा वैल्यू करीब ₹41,960 करोड़ बताई गई है. टाटा ग्रुप में LIC के कुल निवेश का करीब 40% हिस्सा अकेले TCS में है. इसके बाद टाटा स्टील में LIC की करीब 6.3% हिस्सेदारी है, जिसकी वैल्यू ₹14,000 करोड़ से अधिक है.

Tata Elxsi में सबसे तेज बढ़ी हिस्सेदारी

जून 2022 के बाद LIC की हिस्सेदारी सबसे तेजी से Tata Elxsi में बढ़ी है. जून 2022 में कंपनी में LIC की हिस्सेदारी 1.04% थी, जो अब बढ़कर 6.59% हो गई है. हालांकि, इसी अवधि में Tata Elxsi के शेयर में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला. अप्रैल 2020 से अगस्त 2022 के बीच शेयर करीब 10 गुना से ज्यादा चढ़ा था. जून 2022 के बाद इसमें गिरावट भी आई. अगस्त 2022 में शेयर करीब ₹10,238 के स्तर तक पहुंचा था, जबकि 18 सितंबर को यह करीब ₹3,333 पर था.

Trent में जीरो से 3% से ज्यादा हिस्सेदारी

LIC ने टाटा ग्रुप की रिटेल कंपनी Trent में भी अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई है. जून 2022 में कंपनी में LIC की हिस्सेदारी शून्य थी, जो अब बढ़कर 3% से कुछ अधिक हो गई है. Trent के शेयर में भी पिछले कुछ वर्षों में बड़ी तेजी और उसके बाद गिरावट देखने को मिली. शेयर अगस्त 2020 से अक्टूबर 2024 के बीच तेजी से बढ़ा और करीब ₹5,200 के रिकॉर्ड हाई तक पहुंचा था. इसके बाद इसमें गिरावट आई और 18 सितंबर तक यह करीब ₹2,806 पर आ गया.

Tata Consumer और Tata Chemicals में भी बढ़ी हिस्सेदारी

Tata Consumer Products में LIC की हिस्सेदारी जून 2022 के मुकाबले 3 प्रतिशत अंक बढ़कर अब 8.23% हो गई है. वहीं, Tata Chemicals में LIC की हिस्सेदारी जून 2022 के 6.79% से बढ़कर 9.24% हो गई है. एक संस्थागत निवेशक के तौर पर LIC किसी कंपनी में अधिकतम 10% हिस्सेदारी रख सकती है. ऐसे में Tata Chemicals में LIC की हिस्सेदारी इस सीमा के काफी करीब पहुंच चुकी है.

इन टाटा कंपनियों में घटी LIC की हिस्सेदारी

हालांकि, सभी टाटा कंपनियों में LIC की हिस्सेदारी नहीं बढ़ी है. Tata Communications में LIC की हिस्सेदारी जून 2022 के 3.37% से घटकर 1% से भी कम रह गई है. Titan में भी LIC की हिस्सेदारी 1.09 प्रतिशत अंक घटकर 2.17% रह गई है. Tata Motors और Tata Motors Passenger Vehicles में भी हिस्सेदारी में बदलाव हुआ है. हालांकि, जून 2022 में ये दोनों कंपनियां एक ही इकाई थीं और 2025 में हुए डीमर्जर के बाद अलग हुईं.

चंद्रशेखरन के री-अपॉइंटमेंट को लेकर मतभेद

LIC की टाटा ग्रुप की कंपनियों में बढ़ती हिस्सेदारी की चर्चा ऐसे समय हो रही है जब Tata Sons के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन के दोबारा नियुक्ति को लेकर मतभेद सामने आए हैं. Tata Sons के बोर्ड ने चंद्रशेखरन को पांच साल का एक और कार्यकाल देने का समर्थन किया है. हालांकि, Tata Trusts के चेयरमैन नोएल टाटा ने इसका विरोध किया है. Tata Trusts के पास Tata Sons में करीब 66% हिस्सेदारी है, इसलिए चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति के लिए Tata Trusts का रुख महत्वपूर्ण माना जा रहा है. LIC की टाटा ग्रुप की लिस्टेड कंपनियों में बढ़ती हिस्सेदारी ऐसे समय में सामने आई है जब Tata Sons की संभावित लिस्टिंग और उसके कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़े मुद्दे भी चर्चा में हैं.

 


मझगांव डॉक बनाएगी आंध्र प्रदेश में नया ग्रीनफील्ड शिपयार्ड, ₹15,000 करोड़ निवेश की तैयारी

दुगराजपट्टनम में प्रस्तावित शिपयार्ड की सालाना क्षमता 1.2 मिलियन ग्रॉस टनेज होगी. कंपनी अगले 5 से 7 वर्षों में इस परियोजना पर करीब ₹15,000 करोड़ खर्च करेगी, जिससे करीब 45,000 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होने की उम्मीद है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Monday, 21 September, 2026
Last Modified:
Monday, 21 September, 2026
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डिफेंस सेक्टर की सरकारी कंपनी मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) ने आंध्र प्रदेश में अपने विस्तार की बड़ी योजना का ऐलान किया है. कंपनी ने नेशनल शिपबिल्डिंग एंड हेवी इंडस्ट्रीज पार्क एपी (NSHIP AP) के साथ समझौता ज्ञापन (MoU) किया है. इसके तहत आंध्र प्रदेश के दुगराजपट्टनम में आधुनिक ग्रीनफील्ड शिपयार्ड विकसित किया जाएगा.

5 से 7 साल में ₹15,000 करोड़ का निवेश

MoU के मुताबिक, मझगांव डॉक इस परियोजना पर अगले 5 से 7 वर्षों में करीब ₹15,000 करोड़ का निवेश करेगी. कंपनी के अनुसार, इस परियोजना से करीब 45,000 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं.

प्रस्तावित शिपयार्ड को आधुनिक सुविधाओं के साथ विकसित किया जाएगा और इसकी डिजाइन क्षमता सालाना 1.2 मिलियन ग्रॉस टनेज रखी गई है. भविष्य में बाजार की जरूरत के अनुसार इसकी क्षमता बढ़ाने की भी गुंजाइश होगी.

दुगराजपट्टनम में एंकर शिपयार्ड के रूप में काम करेगी MDL

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने कहा कि राज्य 2047 तक भारत को दुनिया के शीर्ष पांच जहाज निर्माण देशों में शामिल करने के लक्ष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए प्रतिबद्ध है. इसके लिए राज्य अपनी लंबी तटरेखा, रणनीतिक स्थिति और औद्योगिक इकोसिस्टम का इस्तेमाल समुद्री क्षेत्र के विकास को गति देने में करेगा. उन्होंने कहा कि दुगराजपट्टनम शिपबिल्डिंग क्लस्टर में मझगांव डॉक एंकर शिपयार्ड के रूप में काम करेगी.

घरेलू और विदेशी बाजार पर नजर

मझगांव डॉक के CMD कैप्टन जगमोहन के मुताबिक, दुगराजपट्टनम में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी शिपयार्ड विकसित करने के लिए जरूरी पैमाना और समुद्री क्षमता मौजूद है. कंपनी का लक्ष्य ऐसी आधुनिक सुविधा तैयार करना है, जो घरेलू के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार की जरूरतों को भी पूरा कर सके.

खबर के बाद शेयर में तेजी

शिपयार्ड परियोजना की खबर के बीच मझगांव डॉक के शेयर में शुक्रवार को तेजी देखने को मिली. BSE पर शेयर करीब 1.5 फीसदी की बढ़त के साथ ₹2,250 के पार पहुंच गया. हालांकि, पिछले एक महीने में कंपनी के शेयर में करीब 13 फीसदी की गिरावट आई है. पिछले पांच कारोबारी सत्रों में भी शेयर करीब 3 फीसदी कमजोर हुआ है. मझगांव डॉक के शेयर का 52-सप्ताह का उच्च स्तर ₹3,061 और निचला स्तर ₹2,057.40 है. कंपनी का कुल बाजार पूंजीकरण करीब ₹90,732 करोड़ है.


NSE IPO: आज आखिरी दिन, 1.46 गुना सब्सक्राइब हुआ इश्यू; GMP से लिस्टिंग के संकेत

आईपीओ के शेयर ग्रे मार्केट में अपर प्राइस बैंड से करीब 48 रुपये ऊपर यानी लगभग 3 फीसदी के प्रीमियम पर कारोबार कर रहे हैं. इस हिसाब से अनुमानित लिस्टिंग कीमत करीब 1,833 रुपये बैठती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Monday, 21 September, 2026
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Monday, 21 September, 2026
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नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के 22,569 करोड़ रुपये के आईपीओ में निवेश के लिए आज यानी 21 सितंबर को आखिरी मौका है. इश्यू के तीसरे दिन सुबह 10:30 बजे तक इसे कुल 1.46 गुना सब्सक्रिप्शन मिल चुका था. रिटेल निवेशकों की हिस्सेदारी अभी पूरी तरह नहीं भरी है, जबकि नॉन-इंस्टीट्यूशनल और क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल निवेशकों की ओर से मजबूत मांग देखने को मिली है. वहीं, ग्रे मार्केट में करीब 3 फीसदी का प्रीमियम आईपीओ की संभावित लिस्टिंग को लेकर संकेत दे रहा है.

तीसरे दिन तक 1.46 गुना सब्सक्रिप्शन

NSE IPO के तहत कुल 8.86 करोड़ शेयर ऑफर किए गए हैं. तीसरे दिन सुबह 10:30 बजे तक इश्यू को 1.46 गुना सब्सक्रिप्शन मिल चुका था. रिटेल निवेशकों के लिए 4.41 करोड़ शेयर रिजर्व रखे गए हैं, जिनमें से करीब 87 फीसदी के लिए बोलियां मिली हैं. नॉन-इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (NII) का हिस्सा 2.31 गुना और क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल बायर्स (QIB) का कोटा 1.83 गुना सब्सक्राइब हुआ है. कंपनी ने आईपीओ के लिए 1,700-1,785 रुपये प्रति शेयर का प्राइस बैंड तय किया है. एक लॉट में 8 शेयर हैं. अपर प्राइस बैंड के हिसाब से एक लॉट के लिए 14,280 रुपये लगाने होंगे.

GMP से क्या संकेत मिल रहे हैं?

आईपीओ के शेयर ग्रे मार्केट में अपर प्राइस बैंड से करीब 48 रुपये ऊपर यानी लगभग 3 फीसदी के प्रीमियम पर कारोबार कर रहे हैं. इस हिसाब से अनुमानित लिस्टिंग कीमत करीब 1,833 रुपये बैठती है. हालांकि, ग्रे मार्केट प्रीमियम आधिकारिक लिस्टिंग प्राइस की गारंटी नहीं देता और इसमें लिस्टिंग तक बदलाव हो सकता है. NSE के शेयर 24 सितंबर को BSE पर लिस्ट होने की उम्मीद है, जबकि शेयर अलॉटमेंट 22 सितंबर को होने की संभावना है.

पूरी तरह OFS है इश्यू

NSE का यह आईपीओ पूरी तरह ऑफर फॉर सेल (OFS) है. यानी आईपीओ से जुटाई गई रकम कंपनी के पास नहीं जाएगी, बल्कि मौजूदा शेयरधारकों को उनके शेयर बेचने से प्राप्त होगी. कई ब्रोकरेज फर्मों ने NSE IPO को लेकर सकारात्मक राय दी है और लंबी अवधि के नजरिए से सब्सक्रिप्शन की बात कही है. रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ ब्रोकरेज ने NSE के वैल्यूएशन की तुलना उसके प्रतिद्वंद्वी BSE से करते हुए इसे अपेक्षाकृत कम वैल्यूएशन पर उपलब्ध बताया है. NSE की कैश मार्केट में करीब 93 फीसदी हिस्सेदारी है. कंपनी के कारोबार की एक प्रमुख विशेषता इसका मजबूत मार्जिन और कर्ज-मुक्त स्थिति है.

कमाई और कारोबार से जुड़े जोखिम

निवेशकों के लिए कंपनी के कारोबार से जुड़े जोखिमों को समझना भी जरूरी है. वित्त वर्ष 2026 में NSE का रेवेन्यू 3.1 फीसदी घटकर 16,601 करोड़ रुपये रहा. इसी अवधि में कंपनी का मुनाफा 12,188 करोड़ रुपये से घटकर 10,302 करोड़ रुपये रह गया.

कंपनी की कमाई में ट्रांजैक्शन चार्ज की बड़ी हिस्सेदारी है. कुल आय का करीब 78.7 फीसदी हिस्सा ट्रांजैक्शन चार्ज से आता है और इसमें ऑप्शंस ट्रेडिंग का बड़ा योगदान है. ऐसे में शेयर बाजार के नियमों में बदलाव का NSE की आय पर असर पड़ सकता है. इसके अलावा, ऑप्शंस मार्केट में कंपनी की हिस्सेदारी में भी कुछ कमी दर्ज की गई है.

NSE IPO के प्रमुख आंकड़े

 इश्यू साइज: 22,569 करोड़ रुपये
 प्राइस बैंड: 1,700-1,785 रुपये प्रति शेयर
 लॉट साइज: 8 शेयर
 न्यूनतम निवेश: 14,280 रुपये
 तीसरे दिन तक कुल सब्सक्रिप्शन: 1.46 गुना
 रिटेल हिस्सा: 87 फीसदी सब्सक्राइब
 NII हिस्सा: 2.31 गुना
 QIB हिस्सा: 1.83 गुना
 GMP: करीब 3 फीसदी
 अलॉटमेंट की संभावित तारीख: 22 सितंबर
 लिस्टिंग की संभावित तारीख: 24 सितंबर


SEBI के ‘पसंदीदा रिटायरी’! पूर्व WTM संतोष मोहंती की नई भूमिकाओं पर उठे सवाल

हर कोई योग्य है, हर कोई नियमों का पालन करता है, तो आखिर समस्या क्या हो सकती है? बाजार की अखंडता इससे ज्यादा सुरक्षित कभी महसूस नहीं हुई.

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Published - Monday, 21 September, 2026
Last Modified:
Monday, 21 September, 2026
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पलक शाह

एक बेहद व्यस्त रिटायरमेंट 

जब MCX ने इस साल 28 मई को संतोष कुमार मोहंती को पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर के रूप में शामिल किया, तो उन्हें किसी कोने में नहीं बैठाया गया. वह सीधे ऑडिट कमेटी में चले गए, जो वित्तीय रिपोर्टिंग और वैधानिक अनुपालन की निगरानी करती है. वह एक्सचेंज की पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर्स कमेटी में भी हैं, जो सिर्फ PID सदस्यों वाली संस्था है और जिसका उद्देश्य बाजार की अखंडता और निवेशक संरक्षण की निगरानी करना है. इसके अलावा, वह एक्सचेंज की रिस्क मैनेजमेंट कमेटी, स्टैंडिंग कमेटी ऑन टेक्नोलॉजी, इन्वेस्टमेंट कमेटी और मेंबर कमेटी में भी हैं. पहले ही दिन से इमारत की सभी सबसे संवेदनशील जिम्मेदारियां.

याद कीजिए कि SEBI ने हाल में MCX से क्या कहा है.

मई 2025 में नियामक ने 63 Moons के साथ ट्रेडिंग सॉफ्टवेयर अनुबंध पर खुलासे में कमी और गलत जानकारी देने के लिए एक्सचेंज पर 25 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था, तीन तिमाहियों में 222 करोड़ रुपये का भुगतान, जबकि पिछले वर्ष का मुनाफा 118 करोड़ रुपये था, और इसका खुलासा देरी से किया गया था. इस आदेश में SEBI ने कई अन्य आरोपों को खारिज कर दिया और केवल खुलासा संबंधी उल्लंघन पाए. 2023 में SEBI ने MCX पर 6 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था, जब पाया गया कि सात ब्रोकरों ने 50 ग्राहकों को सिक्किम के निवासी के रूप में कोड किया था, जबकि KYC रिकॉर्ड में ऐसा नहीं था. एक ग्राहक सिक्किम से जुड़े कारोबार का 95% हिस्सा था. SEBI ने पाया कि MCX इसे पकड़ने में विफल रहा था. इसके बाद ट्रेडिंग रुकने की घटनाएं, तकनीकी गड़बड़ियों के लिए वित्तीय हतोत्साहन और पिछले अक्टूबर में चार घंटे का आउटेज आया, जिसके कारण ट्रेडिंग को डिजास्टर रिकवरी साइट पर ले जाना पड़ा.

खुलासे की पर्याप्तता, कमेटी की प्रक्रिया, अनुपालन, ठीक वही विषय, जिनसे जुड़ी कमेटियों में अब श्री मोहंती बैठे हैं.

उनकी योग्यता बेजोड़ है, क्योंकि जून 2023 तक वह दूसरी तरफ बैठे थे. वह 2015 में फॉरवर्ड मार्केट्स कमीशन से SEBI आए थे, जहां विलय के बाद बनाए गए कमोडिटी डेरिवेटिव्स विभाग को चलाने की जिम्मेदारी संभाली. इसके बाद उन्होंने पांच साल तक होल टाइम मेंबर के रूप में बाजार नियमन, कमोडिटी डेरिवेटिव्स और अंतरराष्ट्रीय मामलों का जिम्मा संभाला. वह फाइल, प्रारूप, अधिकारियों और SEBI के भीतर उस प्रक्रिया को जानते हैं, जब किसी जवाब को अपर्याप्त पाया जाता है. बोर्ड केवल नाम की पट्टिका के लिए भुगतान नहीं करते.

अब वह हिस्सा, जिसे दोनों संस्थानों में कोई स्पष्ट रूप से सामने नहीं रखना चाहता.

उन्होंने वास्तव में SEBI की तरफ की मेज छोड़ी नहीं है. SEBI की अपनी वेबसाइट पर सेटलमेंट ऑर्डर और अपराधों के कंपाउंडिंग से जुड़ी हाई पावर्ड एडवाइजरी कमेटी की सूची है: जस्टिस (रिटायर्ड) जय नारायण पटेल इसके अध्यक्ष हैं, जबकि एन. वेंकटराम, एस.के. मोहंती और सरित जाफा सदस्य हैं. यह कमेटी उस प्रस्ताव की जांच करती है, जो कथित उल्लंघनकर्ता ने दिया है और SEBI के होल टाइम मेंबर्स को अपनी सिफारिश भेजती है. अंतिम अधिकार SEBI की निर्णय लेने वाली व्यवस्था के पास रहता है, जिसमें संबंधित प्रक्रिया में होल टाइम मेंबर्स का पैनल शामिल है. लेकिन सिफारिश का अपना महत्व होता है.

तो स्थिति पर विचार कीजिए.

एक तरफ वह कमेटी है जो SEBI के निर्णयकर्ताओं के लिए सेटलमेंट की शर्तों की जांच और सिफारिश करती है, और दूसरी तरफ वह एक्सचेंज की ऑडिट और अन्य कमेटियों में भी बैठते हैं, जिसकी निगरानी SEBI करता है. वह SEBI द्वारा विनियमित क्षेत्रों में काम करने वाली संस्थाओं के बोर्ड में भी हैं, जिनमें Acuite Ratings & Research, Computer Age Management Services, Bajaj Finserv Asset Management और SBI CDMDF Trustee शामिल हैं. इससे किसी विशेष मामले में हितों का टकराव स्थापित नहीं होता. हालांकि, यह संस्थागत ओवरलैप का सवाल जरूर पैदा करता है: वही पूर्व SEBI WTM सेटलमेंट मामलों पर नियामक को सलाह दे रहा है, जबकि उन संस्थाओं में गवर्नेंस की भूमिकाएं निभा रहा है, जो नियामक के व्यापक निगरानी दायरे में आती हैं.

इस टकराव के परिणाम काल्पनिक नहीं हैं. यह संरचनात्मक है और तीन दिशाओं में चलता है.

नीचे की ओर, एक एक्सचेंज अपने सदस्यों का प्रथम स्तर का नियामक होता है. PID कमेटी के जरिए, SEBI को सेटलमेंट मामलों पर सलाह देने वाला व्यक्ति ब्रोकरों के खिलाफ नियामकीय कार्रवाई तय करने में भी मदद करता है, इनमें से कुछ बाद में SEBI से सेटलमेंट की मांग कर सकते हैं. MCX एक मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर संस्था है, जिसके नियामकीय कार्यों में अपने सदस्यों की निगरानी शामिल है. मोहंती अब इसकी पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर्स कमेटी में हैं, जबकि अलग से SEBI की सेटलमेंट एडवाइजरी कमेटी में भी सेवा दे रहे हैं.

ऊपर की ओर, MCX में कार्यकारी नियुक्तियों के लिए SEBI की मंजूरी जरूरी है; एक्सचेंज ने 27 मई को कार्यकारी निदेशकों के लिए मंजूरी की घोषणा की, उसी दिन SEBI ने उन्हें मंजूरी दी थी. वह उस कमेटी में बैठते हैं जो इन कार्यकारियों का चयन करती है और उस कमेटी में भी जो उस नियामक को सलाह देती है, जिसे इन नियुक्तियों को मंजूरी देनी होती है. मोहंती की नियुक्ति के लिए SEBI की मंजूरी 27 मई की थी; MCX की घोषणा में उनकी नियुक्ति 28 मई से दर्ज है. एक्सचेंज ने 27 मई को कार्यकारी निदेशक पदों पर नियुक्तियों के लिए SEBI की मंजूरी की भी घोषणा की थी.

क्षैतिज दिशा में, जब इनमें से किसी संस्था का मामला HPAC के सामने आता है, तो उन्हें खुद को उस मामले से अलग करना यानी रिक्यूज करना होगा. SEBI के सेटलमेंट नियमों में तीन सदस्यों का कोरम जरूरी है, जैसा कि नियामक ने 2017 में देखा था, जब NSE को-लोकेशन सहमति मामले में दो सदस्यों ने खुद को अलग कर लिया था और पैनल को फिर से गठित करना पड़ा था. पांच विनियमित जिम्मेदारियों वाले सदस्य के लिए रिक्यूजल एक ऐसी समस्या हो सकती है, जिसका समय आना बाकी है? नियम पहले से ही रिक्यूजल की व्यवस्था करते हैं. सवाल यह है कि जब सेटलमेंट कमेटी का कोई सदस्य ऐसी कई संस्थाओं में पद भी संभालता हो, जो SEBI के नियामकीय दायरे में आती हैं, तो ऐसे रिक्यूजल कितनी बार सामने आ सकते हैं.

वर्तमान नियम इस तरह की भूमिकाओं के संयोजन पर कोई व्यापक प्रतिबंध नहीं लगाते दिखते हैं.

1992 के सेवा नियम किसी सेवानिवृत्त होल टाइम मेंबर को एक साल तक नौकरी करने से रोकते हैं, हालांकि केंद्र की मंजूरी से इसमें छूट दी जा सकती है. जून 2026 में अपनाई गई नई संहिता पूर्व WTMs को दो साल तक SEBI के समक्ष या उसके खिलाफ पेश होने से रोकती है, यह प्रावधान SEBI के समक्ष या उसके खिलाफ पेश होने को संबोधित करता है; पहली नजर में यह SEBI के नियामकीय दायरे में आने वाली संस्थाओं के बोर्ड में नियुक्तियों पर सामान्य दो साल का प्रतिबंध नहीं लगाता. संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति ने एक साल की अवधि को बढ़ाकर दो साल करने की मांग की है.

मोहंती इस मामले में अकेले नहीं हैं. जी. महालिंगम ने सेवानिवृत्ति के बाद SEBI की सेकेंडरी मार्केट एडवाइजरी कमेटी के अध्यक्ष के रूप में वापसी की. SEBI के पूर्व होल टाइम मेंबर एम.एस. साहू 2022 में इसकी मार्केट डेटा एडवाइजरी कमेटी की अध्यक्षता करने के लिए लौटे. एस. रविंद्रन को इंटरमीडियरी एडवाइजरी कमेटी मिली, जो एक्सचेंजों पर सलाह देती है, जबकि वह NSE के बोर्ड में भी थे. अनंत बरुआ ने 2023 में एक लॉ फर्म में सलाहकार की भूमिका और IFSCA की फंड मैनेजमेंट कमेटी के लिए पद छोड़ा.

नियामक एक ऐसे बाजार को नियंत्रित करता है, जिसके बोर्डरूम में उसी ने लोगों को नियुक्त किया है. हर कोई योग्य है. हर कोई नियमों का पालन करता है. और जब अगला कारण बताओ नोटिस Exchange Square पहुंचता है, तो इसमें शामिल हर व्यक्ति पहले से ही एक-दूसरे को नाम से जानता होगा.

मुद्दा यह नहीं है कि ये पूर्व नियामक योग्य हैं या नहीं. वे स्पष्ट रूप से योग्य हो सकते हैं. न ही मुद्दा यह है कि किसी पूर्व SEBI अधिकारी को कभी भी किसी विनियमित संस्था के बोर्ड में सेवा देनी चाहिए या नहीं. नियम सार्वजनिक नियामकीय विशेषज्ञता और निजी क्षेत्र के गवर्नेंस के बीच काफी हद तक आवाजाही की अनुमति देते हैं. अधिक कठिन सवाल यह है कि जब वही पूर्व नियामक नियामकीय दायरे के दोनों तरफ बैठता है, SEBI को सेटलमेंट मामलों पर सलाह देते हुए उन संस्थाओं में गवर्नेंस की भूमिकाएं निभाते हुए, जो उसके नियामकीय दायरे में काम करती हैं, तब सुरक्षा उपाय पर्याप्त हैं या नहीं.

इस व्यवस्था पर रोक लगाने वाला कोई नियम हो सकता है या नहीं भी हो सकता है. लेकिन ठीक इसी वजह से इस सवाल को सार्वजनिक रूप से उठाया जाना चाहिए.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


ब्रिक्स के चार प्रमुख देशों को भारत का निर्यात 34% बढ़ा, चीन को भेजे जाने वाले सामान में 39% उछाल

भारत के निर्यात में ब्रिक्स के प्रमुख देशों की बढ़ती हिस्सेदारी ऐसे समय में सामने आई है, जब देश नए बाजारों में निर्यात बढ़ाने और वैश्विक व्यापार में अपनी हिस्सेदारी मजबूत करने पर जोर दे रहा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Monday, 21 September, 2026
Last Modified:
Monday, 21 September, 2026
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चालू वित्त वर्ष 2026-27 के पहले पांच महीनों यानी अप्रैल-अगस्त के दौरान चीन, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और रूस को भारत का निर्यात 34 प्रतिशत बढ़कर 19.9 अरब डॉलर पहुंच गया है. वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, इस अवधि में इन चारों देशों की भारत के कुल निर्यात में हिस्सेदारी भी बढ़कर 9.2 प्रतिशत हो गई, जो एक साल पहले इसी अवधि में 8.1 प्रतिशत थी.

चीन बना सबसे बड़ा बाजार

ब्रिक्स के इन चार प्रमुख देशों में चीन भारत के निर्यात का सबसे बड़ा बाजार बनकर उभरा है. अप्रैल-अगस्त 2026-27 के दौरान चीन को भारत का निर्यात 39 प्रतिशत बढ़कर 9.6 अरब डॉलर हो गया. वहीं, दक्षिण अफ्रीका को निर्यात में सबसे तेज 58 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. इस दौरान ब्राजील और रूस को भारत के निर्यात में भी क्रमशः 13 प्रतिशत और 11 प्रतिशत की वृद्धि हुई. आंकड़ों से संकेत मिलता है कि ब्रिक्स के प्रमुख सदस्य देशों के साथ भारत का व्यापारिक जुड़ाव लगातार बढ़ रहा है.

जापान, इटली और दक्षिण कोरिया को भी निर्यात बढ़ा

ब्रिक्स देशों के अलावा अन्य प्रमुख बाजारों में भी भारत के निर्यात में अच्छी वृद्धि दर्ज की गई. अप्रैल-अगस्त 2026-27 के दौरान जापान को भारत का निर्यात 43 प्रतिशत बढ़कर 3.43 अरब डॉलर हो गया. इसी तरह, इटली को निर्यात 30 प्रतिशत बढ़कर 3.92 अरब डॉलर रहा, जबकि दक्षिण कोरिया को भारत का निर्यात 22 प्रतिशत बढ़कर 3.21 अरब डॉलर पहुंच गया.

ब्रिक्स का हुआ विस्तार

ब्रिक्स की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के साथ हुई थी. 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब इसके सदस्य बने, जबकि इंडोनेशिया 2025 में समूह में शामिल हुआ. इसके अलावा बेलारूस, बोलीविया, कजाकिस्तान, क्यूबा, मलेशिया, नाइजीरिया, थाइलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम ब्रिक्स के भागीदार देश बने हैं.

भारत के निर्यात में ब्रिक्स के प्रमुख देशों की बढ़ती हिस्सेदारी ऐसे समय में सामने आई है, जब देश नए बाजारों में निर्यात बढ़ाने और वैश्विक व्यापार में अपनी हिस्सेदारी मजबूत करने पर जोर दे रहा है.


चिप से सिस्टम तक भारत की तैयारी, 2035 तक 200 अरब डॉलर हो सकता है सेमीकंडक्टर बाजार

सेमीकॉन इंडिया में 52 देशों की भागीदारी और 600 से ज्यादा एग्जीबिटर्स की मौजूदगी, चिप डिजाइन से लेकर एडवांस्ड पैकेजिंग और तैयार इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम तक पूरी वैल्यू चेन विकसित करने पर भारत का जोर

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Monday, 21 September, 2026
Last Modified:
Monday, 21 September, 2026
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भारत सेमीकंडक्टर क्षेत्र में अपनी भूमिका को विस्तार देने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है. सेमीकॉन इंडिया में दुनिया के 52 देशों से प्रतिनिधियों की भागीदारी और 600 से ज्यादा एग्जीबिटर्स की मौजूदगी इस क्षेत्र में बढ़ती वैश्विक दिलचस्पी को दिखाती है. EY और ISBA की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का सेमीकंडक्टर बाजार 2026 में करीब 64 अरब डॉलर से बढ़कर 2035 तक 200 अरब डॉलर तक पहुंचने का अवसर रखता है. ऐसे में भारत का फोकस सिर्फ चिप के आयात पर निर्भरता कम करने तक सीमित नहीं है, बल्कि डिजाइन से लेकर मैन्युफैक्चरिंग और तैयार इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम तक पूरी सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन विकसित करने पर है.

सेमीकॉन इंडिया में करीब 51,666 रजिस्ट्रेशन हुए और लगभग 40 हजार लोगों ने इसमें हिस्सा लिया. सम्मेलन में करीब 300 अंतरराष्ट्रीय कंपनियों समेत 600 से अधिक एग्जीबिटर्स ने सेमीकंडक्टर उद्योग से जुड़ी तकनीक और संभावनाओं को प्रदर्शित किया. जापान, दक्षिण कोरिया, मलेशिया, नीदरलैंड, सिंगापुर और स्वीडन समेत छह देशों के पवेलियन के साथ 12 राज्यों के पवेलियन भी सम्मेलन में शामिल रहे.

चिप डिजाइन से सिस्टम तक वैल्यू चेन पर जोर

सेमीकॉन इंडिया के दौरान 56 एमओयू और रणनीतिक पहलों की घोषणा की गई. इनमें चिप डिजाइन, फैब्रिकेशन, एडवांस्ड पैकेजिंग, मशीनरी, कच्चे माल, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रिसर्च, स्टार्टअप और स्किल डेवलपमेंट जैसे क्षेत्र शामिल हैं. इससे संकेत मिलता है कि भारत सेमीकंडक्टर क्षेत्र में केवल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाने के बजाय डिजाइन से लेकर तैयार इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम तक पूरी वैल्यू चेन विकसित करने पर जोर दे रहा है.

सेमीकॉन 2.0 पर फोकस

इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के मुताबिक, सरकार का फोकस सेमीकॉन 2.0 पर है, जिसका कुल बजट 1.27 लाख करोड़ रुपये है. इस पहल में सेमीकंडक्टर क्षेत्र की क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ रिसर्च, स्किलिंग और उद्योग से जुड़ी ट्रेनिंग पर भी जोर दिया जा रहा है.

सेक्टर के विस्तार के साथ रोजगार के अवसर बढ़ने की भी उम्मीद है. सम्मेलन के दौरान स्किलिंग, इंटर्नशिप, हैकाथॉन और इंडस्ट्री-आधारित प्रशिक्षण पर विशेष जोर दिया गया. डिजिटल इंडिया RISC-V ग्रैंड चैलेंज में 1,236 टीमों के 5,045 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया.

भारत की सेमीकंडक्टर रणनीति ऐसे समय में आगे बढ़ रही है जब अमेरिका और चीन समेत कई देश वैश्विक चिप वैल्यू चेन में अपनी हिस्सेदारी मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में भारत के लिए घरेलू क्षमता विकसित करने के साथ वैश्विक कंपनियों, तकनीक और निवेश को आकर्षित करना भी इस क्षेत्र की रणनीति का अहम हिस्सा बन रहा है.
 


शेयर बाजार में आज सतर्क शुरुआत के संकेत, शुक्रवार को सेंसेक्स गिरा तो निफ्टी चढ़ा; इन शेयरों पर रहेगी नजर

शुक्रवार को निफ्टी 75.80 अंक चढ़कर 23,346.40 पर बंद हुआ था, जबकि सेंसेक्स 19.63 अंक की मामूली गिरावट के साथ 74,294.96 पर रहा.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Monday, 21 September, 2026
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Monday, 21 September, 2026
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भारतीय शेयर बाजार के लिए सोमवार को कारोबार की शुरुआत सतर्क रह सकती है. बाजार खुलने से पहले गिफ्ट निफ्टी हल्की गिरावट में कारोबार कर रहा है, जबकि एशियाई बाजारों से मिले-जुले संकेत मिल रहे हैं. हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में नरमी घरेलू बाजार के लिए राहत का संकेत दे रही है. इसके अलावा अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, विदेशी निवेशकों की गतिविधि और रुपये की चाल पर भी निवेशकों की नजर रहेगी.

इससे पहले शुक्रवार, 18 सितंबर को घरेलू शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव भरा कारोबार रहा था. कारोबार की शुरुआत में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स में 300 अंकों से अधिक की तेजी देखी गई, लेकिन बाद में यह बढ़त काफी हद तक खत्म हो गई. कारोबारी सत्र के अंत में 30 शेयरों वाला सेंसेक्स 19.63 अंक यानी 0.03 फीसदी की गिरावट के साथ 74,294.96 पर बंद हुआ. वहीं, 50 शेयरों वाला नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी 75.80 अंक यानी 0.33 फीसदी की बढ़त के साथ 23,346.40 पर पहुंच गया.

शुक्रवार को इन शेयरों में दिखी सबसे ज्यादा हलचल

सेंसेक्स के शेयरों में अडानी पोर्ट्स 4.93 फीसदी की बढ़त के साथ टॉप गेनर रहा. इसके अलावा अडानी एंटरप्राइजेज में 3.31 फीसदी, भारती एयरटेल में 3.12 फीसदी, एचडीएफसी बैंक में 2.52 फीसदी और बजाज फाइनेंस में 2.49 फीसदी की तेजी रही. दूसरी ओर, टीसीएस में 4.33 फीसदी की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई. टाइटन 2.11 फीसदी, एसबीआई लाइफ 2.03 फीसदी, एशियन पेंट्स 2 फीसदी और मारुति करीब 1.98 फीसदी नीचे रहे.

शुक्रवार के कारोबार से आज के बाजार को क्या संकेत?

शुक्रवार को वैश्विक बाजारों से मिले सकारात्मक संकेतों और घरेलू शेयरों में निचले स्तर पर खरीदारी से भारतीय बाजार को कुछ सहारा मिला. कच्चे तेल की कीमतों में ऊंचे स्तर से आई नरमी भी बाजार के लिए राहत लेकर आई. हालांकि, विदेशी निवेशकों की बिकवाली, डॉलर की मजबूती और वैश्विक स्तर पर ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता अब भी बाजार के लिए अहम कारक हैं.

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक बाजारों से मिले सकारात्मक संकेत और घरेलू शेयरों में निचले स्तर पर हुई खरीदारी से शुक्रवार को भारतीय बेंचमार्क इंडेक्स को पिछले नुकसान की भरपाई में मदद मिली. उन्होंने यह भी कहा कि कच्चे तेल की कीमतों में नरमी से राहत मिली है, लेकिन एफआईआई की निकासी और डॉलर का ऊंचा स्तर निगरानी योग्य कारक बने हुए हैं.

सोमवार को गिफ्ट निफ्टी से क्या संकेत?

सोमवार सुबह गिफ्ट निफ्टी करीब 23 अंक यानी 0.10 फीसदी की गिरावट के साथ 23,400 के नीचे कारोबार कर रहा था. इससे घरेलू बाजार में शुरुआती कारोबार के दौरान सतर्कता के संकेत मिल रहे हैं. हालांकि, बाजार खुलने तक गिफ्ट निफ्टी की दिशा बदल सकती है.

एशियाई बाजारों का मिला-जुला रुख

सोमवार को एशियाई बाजारों में मिला-जुला कारोबार देखने को मिल रहा है. दक्षिण कोरिया का कोस्पी करीब 0.85 फीसदी ऊपर था, जबकि कोस्डैक में 0.43 फीसदी की बढ़त थी. दूसरी ओर, ऑस्ट्रेलिया का एसएंडपी/एएसएक्स 200 करीब 0.49 फीसदी नीचे कारोबार कर रहा था. जापान का शेयर बाजार सोमवार को अवकाश के कारण बंद है.

शुक्रवार को एशियाई बाजारों में भी तेजी रही थी. निक्केई 225 में 1.41 फीसदी, हैंग सेंग में 0.53 फीसदी, कोस्पी में 2.59 फीसदी और ताइवान के सूचकांक में 1.89 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई थी.

अमेरिकी बाजार से कैसे संकेत?

शुक्रवार को अमेरिकी शेयर बाजार में भी मिला-जुला कारोबार रहा. डाउ जोंस 95.40 अंक यानी 0.18 फीसदी गिरकर 51,682.64 पर बंद हुआ. वहीं एसएंडपी 500 में 0.17 फीसदी और नैस्डैक में 0.39 फीसदी की बढ़त रही.

सोमवार सुबह अमेरिकी शेयर बाजार के वायदा सौदों में हालांकि मजबूती दिखाई दे रही थी. एसएंडपी 500 वायदा करीब 0.23 फीसदी, नैस्डैक-100 वायदा 0.27 फीसदी और डाउ वायदा करीब 0.25 फीसदी ऊपर था.

कच्चे तेल में नरमी से बाजार को राहत

भारतीय बाजार के लिए कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट फिलहाल राहत का संकेत है. सोमवार सुबह ब्रेंट क्रूड करीब 2.10 फीसदी गिरकर 101.69 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था. अमेरिकी क्रूड भी करीब 1.93 फीसदी की गिरावट के साथ 98.36 डॉलर प्रति बैरल पर था.

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है. ऐसे में तेल की कीमतों में नरमी से आयात बिल और महंगाई के दबाव को कुछ राहत मिल सकती है. हालांकि, पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बाजार के लिए अहम जोखिम बना हुआ है.

एफआईआई और डीआईआई की खरीदारी

18 सितंबर को विदेशी और घरेलू संस्थागत निवेशक दोनों खरीदार रहे. एफआईआई ने नकद बाजार में 599.54 करोड़ रुपये की खरीदारी की, जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों यानी डीआईआई ने 1,019.69 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे. हालांकि, सितंबर में अब तक एफपीआई का रुख अलग रहा है. महीने में अब तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारतीय शेयर बाजार से 20,974 करोड़ रुपये निकाल चुके हैं. ऊंची अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, महंगा कच्चा तेल और रुपये में कमजोरी जैसे कारक विदेशी निवेश के लिए महत्वपूर्ण बने हुए हैं.

अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और रुपये पर भी नजर

अमेरिका की 10 साल की सरकारी बॉन्ड यील्ड 5 फीसदी के आसपास बनी हुई है. ऊंची अमेरिकी यील्ड से उभरते बाजारों में विदेशी पूंजी के प्रवाह पर असर पड़ सकता है. ऐसे में भारतीय बाजार में एफआईआई की गतिविधि पर नजर रहेगी. वहीं, शुक्रवार को रुपया शुरुआती बढ़त गंवाकर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95.89 के स्तर पर बंद हुआ था. सोमवार सुबह डॉलर इंडेक्स करीब 100.24 के आसपास था. रुपये की चाल भी बाजार के लिए एक अहम संकेतक रहेगी.

आज किन शेयरों पर रहेगी नजर?

शेयर बाजार में आज यानी 21 सितंबर को कई कंपनियों के शेयर कारोबारी अपडेट और कॉरपोरेट खबरों के कारण फोकस में रह सकते हैं. रेल विकास निगम लिमिटेड (RVNL) को ईस्ट कोस्ट रेलवे से 404.88 करोड़ रुपये का ऑर्डर मिला है, जबकि मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स ने आंध्र प्रदेश में शिपबिल्डिंग क्लस्टर विकसित करने के लिए अगले 5 से 7 साल में करीब 15,000 करोड़ रुपये निवेश की योजना बनाई है. एफएमसीजी कंपनी इमामी के बोर्ड ने करीब 282 करोड़ रुपये के शेयर बायबैक को मंजूरी दी है. वेलस्पन एंटरप्राइजेज की इकाई को अहमदाबाद नगर निगम से कुल 351.24 करोड़ रुपये के दो प्रोजेक्ट मिले हैं, वहीं रेफेक्स इंडस्ट्रीज को 160 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट और नॉलेज मरीन एंड इंजीनियरिंग वर्क्स को 279.33 करोड़ रुपये का 15 साल का ग्रीन टग कॉन्ट्रैक्ट मिला है. अपोलो पाइप्स Mazzini Tiles के अधिग्रहण के जरिए सिरेमिक टाइल कारोबार में उतरने की तैयारी में है. इसके अलावा कल्याण ज्वेलर्स ने अपनी पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी Candere Lifestyle Jewellery में राइट्स इश्यू के जरिए 350 करोड़ रुपये का निवेश किया है, जबकि कोफोर्ज ने कंपनियों के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस खर्च से मिलने वाले कारोबारी नतीजों को मापने के लिए नया ढांचा पेश किया है.

कुल मिलाकर, शुक्रवार की मजबूत निफ्टी क्लोजिंग के बाद सोमवार को घरेलू बाजार के लिए कच्चे तेल में नरमी सकारात्मक संकेत दे रही है, जबकि गिफ्ट निफ्टी की कमजोरी, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और विदेशी निवेशकों का रुख बाजार की चाल के लिए महत्वपूर्ण रहेगा.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)


सेबी का कमोडिटी सौदा: विदेशी लाते हैं पैसा, भारतीय ब्रोकर उठाते हैं जोखिम

सेबी भारत के फिजिकली सेटल्ड कमोडिटी कॉन्ट्रैक्ट्स में विदेशी फंड्स चाहता है. वे डिलीवरी नहीं ले सकते. इसलिए अगर कोई फंड समय रहते बाहर निकलने में विफल रहता है, तो उसकी पोजीशन बाजार बंद होने के बाद अपने आप एक भारतीय ब्रोकर की खुद की बुक्स में चली जाती है. फंड "किसी भी आगे के अधिकार, टाइटल, दायित्व या एक्सपोजर" से मुक्त हो जाता है. ब्रोकर यह सब अपने ऊपर ले लेता है. SEBI इसे एक सुरक्षा उपाय कहता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 19 September, 2026
Last Modified:
Saturday, 19 September, 2026
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पलक शाह 

भारतीय ब्रोकर्स सावधान. Risk Hain to Ishq Hain, यहां महंगा सौदा हो सकता है, एक विदेशी फंड भारत में सोने का कारोबार करना चाहता है.

वह कॉन्ट्रैक्ट खरीद सकता है. वह कॉन्ट्रैक्ट बेच सकता है. वह पैसा कमा सकता है और पैसा गंवा भी सकता है. लेकिन SEBI की योजना के तहत एक काम वह नहीं कर सकता: डिलीवरी लेना.

SEBI का समाधान अपने तरीके से काफी चतुर है. फंड को वैसे भी कारोबार करने दें. और अगर डिलीवरी करीब आने पर भी उसके पास कॉन्ट्रैक्ट है, तो SEBI की व्यवस्था बाजार बंद होने के बाद उस पोजीशन को एक भारतीय ब्रोकर के अपने खाते में ले जाने का रास्ता उपलब्ध कराती है.

SEBI के ड्राफ्ट सर्कुलर के मुताबिक, उस समय फंड उस पोजीशन के संबंध में "किसी भी आगे के अधिकार, टाइटल, दायित्व या एक्सपोजर" का हकदार नहीं रहेगा. ड्राफ्ट में कहा गया है कि बाकी सब कुछ "इसके बाद पूरी तरह नामित TM/TCM (Trading Clearing Member) में निहित हो जाएगा", यानी भारतीय ब्रोकर में.

ब्रोकर ट्रेड, दायित्व और जोखिम अपने ऊपर लेता है. फंड बाहर हो जाता है.

यह SEBI के 11 अगस्त के उस प्रस्ताव का मूल है, जिसके तहत Foreign Portfolio Investors (FPIs) को फिजिकली सेटल्ड कमोडिटी कॉन्ट्रैक्ट्स में प्रवेश की अनुमति देने की बात है. यह इस सवाल से भी बड़ा सवाल उठाता है कि भारत अपने कमोडिटी बाजारों में विदेशी पैसा चाहता है या नहीं:

क्या कोई रेगुलेटर सर्कुलर के जरिए ऐसी व्यवस्था बना सकता है, जिसमें एक पक्ष की कॉन्ट्रैक्ट पोजीशन दूसरे पक्ष की बुक्स में चली जाए और फिर उन नियमों में ढील दी जाए, जो आम तौर पर दूसरे पक्ष के बहुत बड़ा हो जाने पर उसे दंडित करते हैं?

ऐसी ट्रेन का टिकट जिसे आप पकड़ नहीं सकते

फिजिकली सेटल्ड फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट एक ट्रेन के टिकट की तरह काम करता है. आप इसे जितनी बार चाहें खरीद और बेच सकते हैं. लेकिन अगर ट्रेन छूटने के समय भी टिकट आपके पास है, तो आपको यात्रा करनी होगी. सोने के मामले में इसका मतलब वास्तव में धातु सौंपना, या उसकी कीमत चुकाकर उसे अपने घर ले जाना है.

SEBI के अपने दस्तावेज के मुताबिक, किसी FPI को "डिलीवरी लेने या देने की अनुमति नहीं दी जा सकती", क्योंकि भारत में उसका कोई स्थायी प्रतिष्ठान नहीं है और भारत में वस्तुओं का कारोबार करने के लिए उसे किसी भी स्थिति में GST रजिस्ट्रेशन की जरूरत होगी. इसलिए ड्राफ्ट विदेशी फंड्स को केवल "टेंडर/स्टैगर्ड डिलीवरी अवधि शुरू होने तक" कारोबार करने की अनुमति देता है.

विदेशी फंड इस ट्रेन में सवार नहीं हो सकते. SEBI फंड को टिकट बेचता है और अगर फंड समय पर नहीं उतरता है तो उसकी सीट पर किसी और के बैठने की व्यवस्था करता है.

भारतीय ब्रोकर की एंट्री

फंड से उम्मीद की जाती है कि वह डिलीवरी शुरू होने से पहले अपनी पोजीशन बेच देगा या उसे रोल ओवर कर देगा. SEBI मानता है कि केवल यह उम्मीद पर्याप्त नहीं है, क्योंकि स्वैच्छिक निकासी "पूरी तरह FPI की समय पर स्वैच्छिक कार्रवाई पर निर्भर करती है."

इसलिए एक बैकस्टॉप की व्यवस्था है. आखिरी ट्रेडिंग डे से एक शाम पहले, ब्रोकर को बताया जाता है कि उसके पास क्या आ सकता है. आखिरी ट्रेडिंग डे पर फंड अपनी पोजीशन नहीं बढ़ा सकता. उस शाम बाजार बंद होने के बाद फंड के पास जो भी बचा है, उसे एक्सचेंज की क्लोजिंग कीमत पर ब्रोकर को ट्रांसफर कर दिया जाता है.

दस्तावेज इसे ब्रोकर द्वारा फंड को "सर्विस फीस" के बदले दी जाने वाली "वैल्यू-एडेड सर्विस" बताता है. ब्रोकर वैल्यू देता है और फंड को सर्विस मिलती है.

ड्राफ्ट एक "Proprietary Risk Absorption Charge" की भी अनुमति देता है, ताकि ब्रोकर को जोखिम के लिए मुआवजा दिया जा सके. लेकिन इसमें कहा गया है कि समझौते में इसे शामिल किया "जा सकता है", इसलिए यह चार्ज वैकल्पिक है. इसकी राशि फंड और उस फंड के कारोबार के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे ब्रोकर के बीच तय होती है.

मान लीजिए, उदाहरण के तौर पर, कोई फंड 100 करोड़ रुपए के सोने के कॉन्ट्रैक्ट पीछे छोड़ देता है. ब्रोकर उस शाम की कीमत पर उन्हें अपने खाते में ले लेता है. अगर अगली सुबह सोना 3% नीचे खुलता है, तो ब्रोकर एक भी ऑर्डर दिए बिना 3 करोड़ रुपए नीचे है. फंड का खाता पिछली रात ही सेटल हो चुका था.

बहुत बड़ा? SEBI ने इसका भी इंतजाम किया है

हर ब्रोकर की एक पोजीशन लिमिट होती है, एक सीमा जो SEBI तय करता है ताकि किसी एक कॉन्ट्रैक्ट में कोई एक खिलाड़ी बहुत बड़ा न हो जाए. SEBI के दस्तावेज में माना गया है कि यह ट्रांसफर "नामित TM के Proprietary खाते के लागू पोजीशन लिमिट से अधिक होने का कारण बन सकता है."

SEBI का जवाब है कि ब्रोकर को अपनी पोजीशन कम करने के लिए दो ट्रेडिंग दिनों तक का समय दिया जाए. ड्राफ्ट में कहा गया है कि उस अवधि के दौरान अतिरिक्त पोजीशन को "केवल ऐसे ट्रांसफर के कारण, दंडात्मक कार्रवाई को आकर्षित करने वाले उल्लंघन" के रूप में नहीं माना जाएगा.

इसलिए SEBI की अपनी व्यवस्था ब्रोकर को उसकी लिमिट से ऊपर धकेल सकती है और फिर SEBI कहता है कि अनुमति प्राप्त कमी अवधि के दौरान अतिरिक्त पोजीशन को केवल ट्रांसफर के कारण दंडात्मक कार्रवाई वाले उल्लंघन के रूप में नहीं माना जाएगा.

शुक्रवार की शाम

यह इस तरह हो सकता है. पूरी तरह काल्पनिक उदाहरण के तौर पर मान लीजिए कि तीन विदेशी फंड्स ने एक ही मुंबई ब्रोकर को अपने बैकस्टॉप के रूप में चुना है. प्रस्तावित ढांचे में ऐसा कुछ दिखाई नहीं देता जो कई विदेशी फंड्स को एक ही TM/TCM चुनने से रोकता हो. ड्राफ्ट किसी फंड को "सभी एक्सचेंजों और कमोडिटीज में" एक ब्रोकर चुनने की अनुमति देता है.

शुक्रवार की शाम है और डिलीवरी विंडो सोमवार को खुलती है. अचानक हुई वैश्विक घटना ने सोने की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव पैदा कर दिया है और बाजार में लिक्विडिटी कम हो गई है. तीनों में से किसी भी फंड ने अपनी पोजीशन नहीं निकाली है. इसे बहुत दूर की संभावना मानकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि SEBI खुद इसे लेकर चिंतित है. दस्तावेज कहता है कि रिस्क चार्ज का उद्देश्य फंड्स को बैकस्टॉप को "स्वैच्छिक स्क्वेयर-ऑफ या रोलओवर के विकल्प" के रूप में इस्तेमाल करने से हतोत्साहित करना है.

क्लोजिंग बेल के बाद सिस्टम तीनों पोजीशन को ब्रोकर के खाते में ट्रांसफर कर देता है. ब्रोकर को केवल पिछली शाम चेतावनी दी गई थी. ट्रेडिंग बंद होने तक यह पोजीशन फंड्स की नहीं रही. यह ब्रोकर की हो गई.

अगली सुबह तक उसके पास अपनी बनाई गई पोजीशन से काफी बड़ी पोजीशन हो सकती है और वह अपनी लिमिट से ऊपर है.

अब उसके पास बेचने के लिए अधिकतम दो ट्रेडिंग दिन हैं और अगर ड्राफ्ट सर्कुलर की भाषा कायम रहती है, तो शायद केवल एक. दूसरे ट्रेडर्स, जो यह अंदाजा लगा सकते हैं कि किसी को बेचना ही है, उनके पास अच्छी कीमत देने की बहुत कम वजह है.

इस ट्रेड के दूसरी तरफ कौन है और किस कीमत पर? और अगर ब्रोकर मार्जिन कॉल पूरा नहीं कर पाता तो क्या होगा?

कंसल्टेशन पेपर यह नहीं बताता कि एक ब्रोकर को कुल कितना एक्सपोजर अपने ऊपर लेना पड़ सकता है और न ही यह दिखाने के लिए कोई स्ट्रेस टेस्ट प्रकाशित करता है कि अगर कई FPIs एक साथ बाहर निकलने में विफल रहे तो यह व्यवस्था कैसे काम करेगी. बाजार इससे निपट सकता है या नहीं, इस पर इसका पूरा निष्कर्ष सिर्फ एक वाक्य है: मौजूदा रिस्क फ्रेमवर्क "FPI की अनुमानित भागीदारी का ध्यान रखने के लिए पर्याप्त है."

SEBI का सर्कुलर कितनी दूर तक जा सकता है?

ड्राफ्ट में कहा गया है कि इसे SEBI Act की धारा 11(1) और स्टॉक एक्सचेंज तथा क्लियरिंग कॉरपोरेशन रेगुलेशंस के Regulation 51 के तहत जारी किया गया है.

देखिए यह वास्तव में क्या करता है. यह केवल किसी विदेशी निवेशक को एक्सपायरी से पहले बाहर निकलने के लिए नहीं कहता. यह ऐसी व्यवस्था बनाता है, जिसके तहत एक प्रतिभागी की पोजीशन, अधिकार और दायित्व खत्म हो जाते हैं और पोजीशन दूसरे प्रतिभागी के Proprietary खाते में चली जाती है. इसमें कहा गया है कि ट्रांसफर को "OTC derivatives नहीं माना जाएगा", बल्कि इसे "Trade माना जाएगा", भले ही दस्तावेज खुद इसे "बिक्री के समान" बताता है. और यह रिसीव करने वाले ब्रोकर को एक ऐसी अवधि देता है, जिसमें उसकी अतिरिक्त पोजीशन को दंडात्मक उल्लंघन नहीं माना जाता.

यह केवल एग्जिट की समयसीमा तय करने से आगे जाता है. यह ऐसी व्यवस्था बनाता है, जिसमें एक प्रतिभागी की कॉन्ट्रैक्चुअल पोजीशन और दायित्व खत्म होकर दूसरे प्रतिभागी के Proprietary खाते में ट्रांसफर हो जाते हैं.

SEBI के पास इसका बचाव है. ब्रोकर ट्रेडिंग शुरू होने से पहले समझौते पर हस्ताक्षर करता है, इसलिए किसी को इसके लिए मजबूर नहीं किया जाता. ब्रोकर को भुगतान किया जाता है और उसे आखिरी ट्रेडिंग डे से एक शाम पहले चेतावनी दी जाती है. ट्रांसफर के क्षण तक हर लाभ और नुकसान फंड वहन करता है. यह सब सही है.

लेकिन हस्ताक्षर करना प्रवेश शुल्क है. जो ब्रोकर इस बैकस्टॉप के रूप में काम करने से इनकार करता है, उसे इन कॉन्ट्रैक्ट्स में कोई विदेशी क्लाइंट नहीं मिलता, इसलिए उसका समझौता जितना दिखता है, उतना स्वैच्छिक नहीं है. और खुले जोखिम को स्वीकार करना उतना ही सुरक्षित है, जितनी उस पर लगी सीमा है, जिसे SEBI ने तय नहीं किया है.

SEBI जो एकमात्र सुरक्षा स्पष्ट रूप से बताता है, वह भी स्पष्ट नहीं है. कंसल्टेशन पेपर कहता है कि दो दिन "टेंडर अवधि की शुरुआत से" चलेंगे. ड्राफ्ट सर्कुलर, जो वास्तव में बाध्यकारी बनेगा, कहता है कि यह "ट्रांसफर की तारीख से" होगा, जो एक दिन पहले है. ब्रोकर को ठीक-ठीक पता होना चाहिए कि दंड से उसकी सुरक्षा कब खत्म होगी.

SEBI के पास कानूनी जवाब हो सकता है. धारा 11(1) और Regulation 51 का नाम लेने के अलावा, पेपर उस ट्रांसफर के कानूनी ढांचे को विस्तार से नहीं समझाता. अधिक कठिन सवाल ज्यादा सीमित है: क्या यह नियामक शक्ति सर्कुलर के जरिए ऐसी व्यवस्था बनाने तक जाती है, जिसमें एक प्रतिभागी की कॉन्ट्रैक्चुअल पोजीशन और दायित्व खत्म होकर दूसरे प्रतिभागी के Proprietary खाते में ट्रांसफर हो जाएं, जबकि उस ट्रांसफर से पैदा होने वाले पोजीशन-लिमिट के प्रभावों में अस्थायी रूप से ढील दी जाए?

विदेशी उदाहरण दूसरी ओर इशारा करते हैं

SEBI ने अमेरिका, यूरोप, जापान और चीन को उदाहरण के तौर पर पेश किया है. इन बाजारों के बारे में उसका अपना विवरण उसके खिलाफ जाता है.

CME और ICE में, पेपर के मुताबिक, ब्रोकरों को यह जांचना होता है कि कोई क्लाइंट डिलीवरी संभाल सकता है या नहीं और अगर उन्हें यकीन नहीं है, तो "यह सुनिश्चित करना होता है कि एक्सपायरी से पहले पोजीशन को लिक्विडेट कर दिया जाए." इन बाजारों में ब्रोकर क्लाइंट को बाजार के जरिए बाहर निकालता है. SEBI की योजना के तहत ब्रोकर क्लाइंट की पोजीशन को अपनी बुक्स में लेता है.

पेपर के मुताबिक, चीन और जापान "कड़े पोजीशन लिमिट" पर निर्भर करते हैं. SEBI की योजना ब्रोकर को ठीक उस समय अपनी लिमिट से अस्थायी राहत देती है, जब उसकी पोजीशन सबसे बड़ी होती है.

बड़े बैंक इसे नहीं ले सकते

ऐसा करने में सक्षम ब्रोकर्स का समूह जितना दिखाई देता है, उससे छोटा हो सकता है. 5paisa की रिपोर्ट में दी गई इंडस्ट्री प्रतिक्रिया के मुताबिक, कमोडिटीज में क्लियरिंग और ब्रोकिंग क्षमता का बड़ा हिस्सा बैंकों और उनकी सहायक कंपनियों के पास है, जिन पर RBI की Proprietary commodity-derivatives positions को लेकर पाबंदियां हैं. बाजार प्रतिभागियों को आशंका है कि इससे छोटे गैर-बैंक ब्रोकर उन पोजीशन्स को संभालने के लिए मजबूर हो सकते हैं, जिन्हें बड़ी और बेहतर पूंजी वाली संस्थाएं नहीं ले सकतीं.

उद्योग बाजार खोलने का समर्थन करता है, लेकिन इसके इस हिस्से का नहीं. उसने इस बात की मांग की है कि एक नामित ब्रोकर कितना जोखिम अपने ऊपर ले सकता है, इसकी कमोडिटी-वार सीमा तय की जाए और यह बताया है कि एक ही ब्रोकर के पास कितना जोखिम जमा हो सकता है, इस पर कोई सीमा नहीं है.

भारत इससे पहले भी यहां आ चुका है. 2018 से वास्तविक भारतीय कमोडिटीज में एक्सपोजर रखने वाली विदेशी संस्थाओं को भारतीय एक्सचेंजों पर हेजिंग की अनुमति दी गई थी. Business Standard के मुताबिक, तीन साल से अधिक समय में किसी ने भी इस रास्ते का इस्तेमाल नहीं किया और सितंबर 2022 में इसे खत्म कर दिया गया, जब मौजूदा FPI रूट पेश किया गया था.

ज्वैलर और वायर निर्माता

इन एक्सचेंजों पर हेजिंग करने वाले ज्वैलर्स और कॉपर यूजर्स को ज्यादा लिक्विडिटी से फायदा हो सकता है. उन्हें डिलीवरी से ठीक पहले के दिनों में जबरन बिक्री से नुकसान भी हो सकता है, जब वे अपने कॉन्ट्रैक्ट्स का सेटलमेंट करते हैं. SEBI पहले पहलू पर जोर देता है और दूसरे की जांच नहीं करता.

भुगतान कौन करेगा?

कंसल्टेशन 1 सितंबर को बंद हो गया. SEBI से फीडबैक की समीक्षा के बाद अंतिम सर्कुलर जारी करने की उम्मीद है. अगर SEBI इन मानदंडों के साथ आगे बढ़ता है, तो यह भारतीय ब्रोकर्स के लिए नुकसानदेह हो सकता है.

विदेशी फंड्स को बाजार तक पहुंच मिलती है और उन्हें डिलीवरी से पहले बाहर निकलने का रास्ता भी मिलता है. भारतीय ब्रोकर उस जोखिम के साथ रह जाते हैं जो बचा हुआ है. और SEBI इस व्यवस्था को सुरक्षा उपाय कहता है.

SEBI ने विदेशी फंड के एग्जिट रूट को आखिरी ट्रेडिंग डे तक लिख दिया है. उसने भारतीय ब्रोकर के जोखिम की कोई सीमा नहीं लिखी है. और उसने सबसे सरल सवाल का जवाब नहीं दिया है: अगर ब्रोकर भुगतान नहीं कर सकता, तो कौन करेगा?

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


20 वर्षों में भारत की GDP 38 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है: अजीत डोभाल

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने कहा कि अगले दो दशकों में भारत का आर्थिक विस्तार नई पीढ़ी के स्नातकों के लिए अवसर पैदा कर सकता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 19 September, 2026
Last Modified:
Saturday, 19 September, 2026
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राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने शनिवार को कहा कि भारत का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) मौजूदा करीब 4.015 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर अगले 20 वर्षों में 38 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है. डोभाल ने यह अनुमान भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) रुड़की के दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए जताया. उन्होंने मौजूदा दौर को महत्वपूर्ण बदलाव और अवसरों का समय बताया.

डोभाल ने कहा कि स्नातक हो रहे छात्र ऐसे दौर में प्रवेश कर रहे हैं, जो तेज तकनीकी और आर्थिक बदलावों से चिह्नित है. उन्होंने कहा कि इस पीढ़ी के सामने ऐसे अवसर हैं, जो पिछली पीढ़ियों के लिए उपलब्ध नहीं थे. उन्होंने छात्रों से इस दौर का सामना साहस और चुनौतियों को स्वीकार करने की इच्छा के साथ करने का आग्रह किया.

डोभाल ने भारत में हो रहे व्यापक बदलाव से दीर्घकालिक आर्थिक परिदृश्य को जोड़ा. सरकार के 2047 के विजन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि देश बड़े आर्थिक विस्तार के दौर की ओर बढ़ रहा है.

38 ट्रिलियन डॉलर का आंकड़ा डोभाल द्वारा बताए गए 4.015 ट्रिलियन डॉलर के GDP आंकड़े से करीब नौ गुना अधिक है. उनकी यह टिप्पणी दीर्घकालिक अनुमान है, न कि सरकार की ओर से जारी कोई औपचारिक GDP पूर्वानुमान.

तकनीक भविष्य को आकार देगी

IIT रुड़की के स्नातकों को संबोधित करते हुए डोभाल ने नए अवसर पैदा करने में तकनीकी बदलाव की भूमिका पर भी जोर दिया. डोभाल ने स्नातक होने वाले छात्रों को सबसे भाग्यशाली पीढ़ियों में से एक बताया, क्योंकि तकनीक में प्रगति और बदलती वैश्विक परिस्थितियों से उनके लिए नए अवसर पैदा हुए हैं.