इस परियोजना के तहत L&T डिजाइन और इंजीनियरिंग, उपकरणों की खरीद, डाउनहिल कन्वेयर सिस्टम, स्क्रीनिंग प्लांट, स्टॉकपाइल, यार्ड उपकरण, रैपिड वैगन लोडिंग सिस्टम समेत अन्य संबंधित सुविधाओं की स्थापना और कमीशनिंग का काम करेगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
इंफ्रास्ट्रक्चर और इंजीनियरिंग क्षेत्र की दिग्गज कंपनी लार्सन एंड टुब्रो (L&T) को मेटल्स और माइनिंग सेक्टर में ₹10,000 करोड़ से ₹15,000 करोड़ के दायरे वाले कई मेगा EPC (इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट और कंस्ट्रक्शन) ऑर्डर मिले हैं. सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की कंपनियों से मिले इन प्रोजेक्ट्स के बाद कंपनी के शेयरों में भी तेजी देखने को मिली और सोमवार के कारोबार में यह करीब 1% तक चढ़ गया.
देश की सबसे बड़ी आयरन ओर कंपनी से मिला बड़ा प्रोजेक्ट
L&T ने शेयर बाजार को दी जानकारी में बताया कि उसे पहला ऑर्डर देश की सबसे बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की आयरन ओर उत्पादक कंपनी से मिला है. कंपनी वर्ष 2030 तक अपनी आयरन ओर उत्पादन क्षमता 10 करोड़ टन सालाना (MTPA) तक बढ़ाने की योजना पर काम कर रही है. इसी विस्तार कार्यक्रम के तहत छत्तीसगढ़ में 18 MTPA क्षमता वाले आयरन ओर हैंडलिंग प्लांट के पैकेज BE-01C का ठेका L&T को दिया गया है.
इस परियोजना के तहत L&T डिजाइन और इंजीनियरिंग, उपकरणों की खरीद, डाउनहिल कन्वेयर सिस्टम, स्क्रीनिंग प्लांट, स्टॉकपाइल, यार्ड उपकरण, रैपिड वैगन लोडिंग सिस्टम (RWLS) समेत अन्य संबंधित सुविधाओं की स्थापना और कमीशनिंग का काम करेगी.
स्टील प्लांट विस्तार का भी मिला ठेका
कंपनी को दूसरा बड़ा ऑर्डर एक नवरत्न सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी से मिला है, जो पश्चिम बंगाल स्थित अपने स्टील प्लांट की क्षमता 2.5 MTPA से बढ़ाकर 7.1 MTPA कर रही है. इस विस्तार परियोजना के लिए L&T को डिजाइन एंड बिल्ड और बैलेंस ऑफ प्लांट से जुड़े कई पैकेज सौंपे गए हैं.
जिंक प्रोसेसिंग प्लांट के लिए भी मिला EPC ऑर्डर
इसके अलावा L&T को निजी क्षेत्र की एक प्रमुख मेटल कंपनी से जिंक प्रोसेसिंग प्लांट के लिए EPC कॉन्ट्रैक्ट भी मिला है. इस प्रोजेक्ट में डिजाइन, इंजीनियरिंग, उपकरणों की खरीद, स्थापना, कमीशनिंग और साइट से जुड़ी अन्य सेवाएं शामिल हैं. कंपनी का कहना है कि इससे नॉन-फेरस मेटल प्रोजेक्ट्स में उसकी विशेषज्ञता और मजबूत होगी.
EPC कारोबार में मजबूत स्थिति का प्रमाण
L&T के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक एस. एन. सुब्रह्मण्यन ने कहा कि ये नए ऑर्डर मेटल्स और मिनरल्स EPC क्षेत्र में कंपनी की मजबूत स्थिति को दर्शाते हैं. उन्होंने कहा कि इससे यह भी साबित होता है कि ग्राहक बड़े और जटिल औद्योगिक प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा करने की L&T की क्षमता पर भरोसा करते हैं.
उन्होंने कहा कि भारत में मेटल और माइनिंग सेक्टर में बढ़ते निवेश के बीच L&T विश्वस्तरीय औद्योगिक ढांचा तैयार करने के लिए देश की प्रमुख कंपनियों के साथ मिलकर काम करने के लिए प्रतिबद्ध है.
शेयर में दिखी तेजी
मेगा ऑर्डर की घोषणा का असर कंपनी के शेयर पर भी देखने को मिला. सोमवार को L&T का शेयर 3,825 रुपये पर खुला, जबकि पिछले कारोबारी सत्र में यह 3,815 रुपये पर बंद हुआ था. कारोबार के दौरान शेयर करीब 1% चढ़कर 3,850 रुपये के इंट्राडे हाई तक पहुंच गया. कंपनी का बाजार पूंजीकरण (मार्केट कैप) 5.28 लाख करोड़ रुपये से अधिक है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि मध्य पूर्व के हालिया घटनाक्रम और RBI की नीतिगत पहल कुछ जोखिमों को कम कर सकती हैं, लेकिन एल नीनो का असर, कृषि उत्पादन और खाद्य कीमतों पर मौसम से जुड़ी अनिश्चितताएं अब भी अर्थव्यवस्था के लिए प्रमुख जोखिम हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वैश्विक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनावों के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था मौजूदा वित्त वर्ष 2026-27 में 6.5% से 6.8% की दर से बढ़ सकती है. वैश्विक प्रोफेशनल सर्विसेज फर्म डेलॉयट इंडिया ने अपनी ताजा 'इकोनॉमिक आउटलुक' रिपोर्ट में यह अनुमान जताया है. रिपोर्ट के मुताबिक, त्योहारी मांग, ब्याज दरों में कमी और वैश्विक हालात में सुधार के चलते वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में आर्थिक गतिविधियों में तेजी आने की उम्मीद है.
दूसरी छमाही में रफ्तार पकड़ सकती है अर्थव्यवस्था
रविवार को जारी रिपोर्ट में डेलॉयट ने कहा कि भारत ने वर्ष 2026 की शुरुआत अपेक्षाकृत मजबूत व्यापक आर्थिक (मैक्रोइकोनॉमिक) आधार के साथ की थी. हालांकि, मध्य पूर्व में बढ़े भू-राजनीतिक तनाव ने प्रमुख समुद्री व्यापार मार्गों को प्रभावित किया, जिससे कमोडिटी कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ा और निवेशकों का भरोसा कमजोर पड़ा.
रिपोर्ट के अनुसार, इन परिस्थितियों के कारण भारत का व्यापार घाटा बढ़ा, विदेशी पूंजी का बहिर्वाह जारी रहा और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में तेज गिरावट देखने को मिली.
RBI के अनुमान के करीब है डेलॉयट का आकलन
डेलॉयट का अनुमान भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के संशोधित GDP अनुमान के करीब है. RBI ने पिछले महीने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए विकास दर का अनुमान 6.9% से घटाकर 6.6% कर दिया था. इससे पहले वित्त वर्ष 2025-26 में भारतीय अर्थव्यवस्था ने 7.7% की वृद्धि दर्ज की थी.
पहली छमाही में रहेगी सुस्ती, बाद में आएगी तेजी
डेलॉयट इंडिया की मुख्य अर्थशास्त्री रुमकी मजूमदार ने कहा कि मौजूदा वैश्विक माहौल पहले की तुलना में काफी अधिक अनिश्चित हो गया है. उन्होंने कहा कि वित्त वर्ष की पहली छमाही में आर्थिक वृद्धि अपेक्षाकृत धीमी रह सकती है, लेकिन त्योहारी सीजन में बढ़ते उपभोक्ता खर्च, मौद्रिक नीति में नरमी और वैश्विक परिस्थितियों के धीरे-धीरे स्थिर होने से दूसरी छमाही में विकास दर मजबूत हो सकती है.
एल नीनो और महंगाई बने हुए हैं बड़े जोखिम
रिपोर्ट में कहा गया है कि मध्य पूर्व के हालिया घटनाक्रम और RBI की नीतिगत पहल कुछ जोखिमों को कम कर सकती हैं, लेकिन एल नीनो का असर, कृषि उत्पादन और खाद्य कीमतों पर मौसम से जुड़ी अनिश्चितताएं अब भी अर्थव्यवस्था के लिए प्रमुख जोखिम हैं.
डेलॉयट ने महंगाई को भी आर्थिक वृद्धि के लिए बड़ी चुनौती बताया है. रिपोर्ट के अनुसार, कच्चे तेल, उर्वरक, महत्वपूर्ण खनिजों और खाद्य तेलों की बढ़ती कीमतें तथा रुपये की कमजोरी घरेलू महंगाई को बढ़ा सकती है.
कमजोर मानसून बढ़ा सकता है महंगाई का दबाव
रिपोर्ट के मुताबिक, जून में भारत की खुदरा महंगाई बढ़कर 18 महीने के उच्चतम स्तर 4.38% पर पहुंच गई, जिसका मुख्य कारण खाद्य और ईंधन की बढ़ती कीमतें रहीं.
डेलॉयट ने चेतावनी दी कि यदि मानसून कमजोर रहता है तो खाद्य महंगाई और बढ़ सकती है. चूंकि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में खाद्य वस्तुओं की हिस्सेदारी करीब 46% है, इसलिए खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी व्यापक महंगाई और वेतन वृद्धि की मांग को भी प्रभावित कर सकती है.
मुक्त व्यापार समझौतों से मिलेगी मजबूती
रिपोर्ट में भारत की मध्यम अवधि की आर्थिक संभावनाओं को लेकर सकारात्मक रुख अपनाया गया है. डेलॉयट का मानना है कि प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) को तेजी से अंतिम रूप देने की भारत की रणनीति विकास को नई गति दे सकती है.
हालांकि, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि केवल FTA ही पर्याप्त नहीं होंगे. दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए मजबूत औद्योगिक नीतियां, घरेलू सप्लाई चेन को सशक्त करना, विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचे का विकास, नियमों को सरल बनाना और नवाचार व कौशल विकास में निरंतर निवेश भी जरूरी होगा.
राजीव मेहरिश के निधन पर दुबई के कई उद्योगपतियों और कारोबारी नेताओं ने शोक व्यक्त किया. वरिष्ठ उद्योगपति कमल वाचानी ने उन्हें "बेहद विनम्र और अच्छे इंसान" के रूप में याद किया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
दुबई स्थित लोकप्रिय रेस्टोरेंट चेन 'राजू ऑमलेट' के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) भारतीय मूल के राजीव मेहरिश का 19 जुलाई को संक्षिप्त बीमारी के बाद निधन हो गया. वह 67 वर्ष के थे. उनके निधन के साथ यूएई के सबसे चर्चित घरेलू रेस्टोरेंट ब्रांड्स में से एक की स्थापना करने वाले उद्यमी का सफर भी समाप्त हो गया.
बीमारी के बाद हुआ निधन, रेस्टोरेंट का संचालन जारी
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राजू ऑमलेट के कर्मचारियों ने राजीव मेहरिश के निधन की पुष्टि की है. हालांकि, उन्होंने बताया कि रेस्टोरेंट की सभी शाखाएं पहले की तरह सामान्य रूप से संचालित हो रही हैं. परिवार के एक करीबी ने भी बताया कि मेहरिश पिछले कुछ समय से अस्वस्थ थे, लेकिन उनकी मृत्यु के सटीक कारण का खुलासा नहीं किया गया है.
मुंबई से दुबई तक का सफर
राजीव मेहरिश ने मुंबई विश्वविद्यालय से कॉमर्स में पोस्टग्रेजुएशन पूरा करने के बाद 1980 में दुबई का रुख किया. वहां उन्होंने अपने करियर की शुरुआत सेल्स प्रोफेशनल के रूप में की. इसके बाद उन्होंने कई वर्षों तक मीडिया इंडस्ट्री में काम किया और खलीज टाइम्स सहित कई अंग्रेजी और अरबी अखबारों के लिए विज्ञापन बिक्री का कार्य संभाला.
मीडिया कारोबार से रेस्टोरेंट बिजनेस तक
साल 1990 में उन्होंने अपनी मीडिया कंपनी शुरू की, जो अखबारों और कॉर्पोरेट ग्राहकों के लिए विशेष प्रकाशन तैयार करती थी. उनकी कंपनी ने दुबई एयरपोर्ट, दुबई चैंबर, दुबई म्युनिसिपैलिटी और रोड्स एंड ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी जैसी कई सरकारी और सरकारी सहयोगी संस्थाओं के साथ काम किया. वर्ष 2013 में उन्होंने इस कारोबार से बाहर निकलने का फैसला किया.
इसी वर्ष उन्होंने 'राजू ऑमलेट' की शुरुआत की. रेट्रो थीम वाले इस रेस्टोरेंट में अंडे से बने विभिन्न व्यंजन परोसे जाते हैं. देखते ही देखते यह ब्रांड दुबई में सात आउटलेट्स तक पहुंच गया और दो नई शाखाएं खोलने की योजना पर काम चल रहा था. मेहरिश का लक्ष्य 'राजू ऑमलेट' को एक अंतरराष्ट्रीय रेस्टोरेंट चेन के रूप में स्थापित करना था.
कारोबारी जगत ने दी श्रद्धांजलि
राजीव मेहरिश के निधन पर दुबई के कई उद्योगपतियों और कारोबारी नेताओं ने शोक व्यक्त किया. वरिष्ठ उद्योगपति कमल वाचानी ने उन्हें "बेहद विनम्र और अच्छे इंसान" के रूप में याद किया.
वहीं, डेन्यूब ग्रुप के वाइस चेयरमैन अनीस साजन ने कहा, "राजीव के निधन की खबर सुनकर मुझे गहरा दुख हुआ है. उन्होंने साधारण अंडे के व्यंजनों को अपनी रचनात्मकता और खास स्वाद के दम पर एक बेहद लोकप्रिय घरेलू ब्रांड में बदल दिया. उनकी विरासत उनके बनाए ब्रांड और उनसे प्रेरित अनगिनत लोगों के जरिए हमेशा जीवित रहेगी."
बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच निवेशकों का भरोसा पुरानी और बेहतर प्रदर्शन करने वाली योजनाओं पर बढ़ा, 2026 की पहली छमाही में नए फंड ऑफर का योगदान छह साल के निचले स्तर पर पहुंचा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
साल 2026 की पहली छमाही में इक्विटी म्यूचुअल फंड योजनाओं में निवेश का प्रवाह मजबूत बना रहा. निवेशकों ने बाजार में जारी उतार-चढ़ाव के बावजूद इक्विटी फंड्स में जमकर पैसा लगाया, जिससे कुल सकल निवेश ₹4 लाख करोड़ के पार पहुंच गया. हालांकि, नए फंड ऑफर (NFO) को लेकर निवेशकों का उत्साह कमजोर रहा और इनसे जुटाई गई रकम छह साल के निचले स्तर पर आ गई.
आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी से जून 2026 के दौरान ऐक्टिव इक्विटी म्यूचुअल फंड योजनाओं में कुल ₹4.07 लाख करोड़ का निवेश आया. यह आंकड़ा 2024 की दूसरी छमाही में दर्ज किए गए रिकॉर्ड ₹4.34 लाख करोड़ के निवेश के काफी करीब रहा. यह दूसरी बार है जब किसी छह महीने की अवधि में इक्विटी फंड्स में निवेश ₹4 लाख करोड़ के पार पहुंचा है.
SIP और एकमुश्त निवेश ने संभाला मोर्चा
इक्विटी फंड्स में निवेश की मजबूती के पीछे लगातार बढ़ता सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) योगदान और मौजूदा योजनाओं में हुआ बड़ा एकमुश्त निवेश प्रमुख कारण रहे. इन दोनों ने NFO से आने वाले निवेश में आई गिरावट की भरपाई कर दी.
2026 की पहली छमाही में NFO के जरिए सिर्फ ₹7,092 करोड़ जुटाए गए, जबकि 2025 की दूसरी छमाही में यह आंकड़ा ₹22,026 करोड़ और 2024 की दूसरी छमाही में ₹53,000 करोड़ से अधिक था.
इसके चलते कुल ऐक्टिव इक्विटी निवेश में NFO की हिस्सेदारी घटकर केवल 1.7 फीसदी रह गई, जो पिछले कम से कम छह वर्षों में सबसे निचला स्तर है.
निवेशकों ने थीमैटिक फंड के बजाय भरोसेमंद योजनाओं को चुना
फंड उद्योग के विशेषज्ञों का कहना है कि 2026 में निवेशकों ने नई और जोखिम भरी थीमैटिक या सेक्टोरल योजनाओं के बजाय पहले से स्थापित और विविधीकृत फंड्स को प्राथमिकता दी. निवेश का प्रवाह लगातार बना हुआ है, लेकिन अब ज्यादा पैसा मौजूदा योजनाओं में जा रहा है. 2023 और 2024 में लॉन्च हुए कई सेक्टोरल और थीमैटिक NFO उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाए, जबकि फ्लेक्सीकैप, मल्टीकैप और मिडकैप जैसी विविधीकृत योजनाओं ने बेहतर प्रदर्शन किया है.
फ्लेक्सीकैप, स्मॉलकैप और मिडकैप फंड में सबसे ज्यादा निवेश
2026 की पहली छमाही में फ्लेक्सीकैप, स्मॉलकैप और मिडकैप फंड निवेशकों की पसंद बने रहे. इन तीनों श्रेणियों ने मिलकर करीब ₹1.8 लाख करोड़ के कुल शुद्ध इक्विटी निवेश में लगभग 60 फीसदी हिस्सेदारी हासिल की. वहीं, मौजूदा योजनाओं में एकमुश्त निवेश बढ़ने से भी इक्विटी फंड्स में कुल निवेश को मजबूती मिली.
एकमुश्त निवेश ₹2.5 लाख करोड़ तक पहुंचा
SIP, एकमुश्त निवेश और NFO के जरिए इक्विटी फंड्स में आए कुल निवेश के विश्लेषण से पता चलता है कि 2026 की पहली छमाही में अनुमानित एकमुश्त निवेश बढ़कर ₹2.5 लाख करोड़ हो गया. यह किसी भी छह महीने की अवधि के लिए दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा है. इससे पहले 2024 की दूसरी छमाही में एकमुश्त निवेश ₹2.6 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा था.
वहीं, 2026 की पहली छमाही में शुद्ध इक्विटी निवेश करीब ₹1.8 लाख करोड़ रहा, जो पिछली छह महीने की अवधि के मुकाबले लगभग 5 फीसदी कम है. बावजूद इसके, निवेशकों का भरोसा इक्विटी म्यूचुअल फंड बाजार में कायम रहा है.
दिल्ली हाई कोर्ट ने 28 मार्च 2025 को 'नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य' मामले में फैसला सुनाते हुए CCPA की गाइडलाइंस को वैध ठहराया था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
उपभोक्ताओं की जेब पर अतिरिक्त बोझ डालने वाले रेस्टोरेंट्स के खिलाफ केंद्र सरकार ने सख्त रुख अपनाया है. सेंट्रल कंज्यूमर प्रोटेक्शन अथॉरिटी (CCPA) ने चायोस, बार्बेक्यू नेशन और ल'ओपेरा फ्रेंच बेकरी समेत देशभर के 41 रेस्टोरेंट्स के खिलाफ कार्रवाई शुरू की है. आरोप है कि इन रेस्टोरेंट्स ने ग्राहकों की स्पष्ट सहमति के बिना बिल में डिफॉल्ट रूप से सर्विस चार्ज जोड़कर उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन किया. कई मामलों में जुर्माना भी लगाया गया है और वसूला गया सर्विस चार्ज लौटाने के निर्देश दिए गए हैं.
शिकायतों के आधार पर हुई कार्रवाई
उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री प्रह्लाद जोशी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर कार्रवाई की जानकारी साझा की. उन्होंने बताया कि चायोस, बार्बेक्यू नेशन, ल'ओपेरा फ्रेंच बेकरी प्राइवेट लिमिटेड सहित कई रेस्टोरेंट्स पर कार्रवाई की गई है. यह कदम नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन (NCH) पर मिली शिकायतों के आधार पर उठाया गया. शिकायतों के साथ जमा किए गए बिलों से पता चला कि ग्राहकों की स्पष्ट मंजूरी के बिना ही सर्विस चार्ज स्वतः जोड़ दिया गया था.
CCPA ने माना गाइडलाइंस का उल्लंघन
शिकायतों की जांच के बाद CCPA ने पाया कि रेस्टोरेंट्स द्वारा डिफॉल्ट रूप से सर्विस चार्ज जोड़ना 'होटल और रेस्टोरेंट में सर्विस चार्ज लगाने के संबंध में गलत व्यापारिक तरीकों को रोकने और उपभोक्ता हितों की सुरक्षा के लिए जारी गाइडलाइंस' का उल्लंघन है. अथॉरिटी ने इसे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 2(47) के तहत 'अनुचित व्यापारिक व्यवहार' भी माना.
दिल्ली हाई कोर्ट ने भी CCPA की गाइडलाइंस को दी थी मंजूरी
दिल्ली हाई कोर्ट ने 28 मार्च 2025 को 'नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य' मामले में फैसला सुनाते हुए CCPA की गाइडलाइंस को वैध ठहराया था. अदालत ने कहा था कि सर्विस चार्ज की अनिवार्य वसूली कानून के अनुरूप नहीं है. साथ ही सभी होटल और रेस्टोरेंट्स को इन गाइडलाइंस का पालन करने का निर्देश दिया गया था.
क्या कहती हैं CCPA की गाइडलाइंस?
4 जुलाई 2022 को जारी गाइडलाइंस के अनुसार:
1. कोई भी होटल या रेस्टोरेंट बिल में डिफॉल्ट या स्वतः सर्विस चार्ज नहीं जोड़ सकता.
2. किसी अन्य नाम से भी सर्विस चार्ज की वसूली नहीं की जा सकती.
3. ग्राहकों को सर्विस चार्ज देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. यह पूरी तरह स्वैच्छिक और ग्राहक की इच्छा पर निर्भर होगा.
4. सर्विस चार्ज न देने पर ग्राहक को सेवा देने से इनकार नहीं किया जा सकता.
5. बिल में जोड़े गए सर्विस चार्ज पर GST नहीं लगाया जा सकता.
चायोस पर लगा जुर्माना
CCPA ने एक मामले में चायोस (सनशाइन टीहाउस प्राइवेट लिमिटेड) के खिलाफ अंतिम आदेश जारी करते हुए 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया है. साथ ही कंपनी को ग्राहकों से वसूला गया सर्विस चार्ज वापस करने का भी निर्देश दिया गया है. यह कार्रवाई उपभोक्ता अधिकारों के उल्लंघन और अनुचित व्यापारिक व्यवहार के खिलाफ CCPA की सख्ती को दर्शाती है.
बीएसई सेंसेक्स 964.58 अंक यानी 1.25% उछलकर 78,151.45 अंक पर बंद हुआ था. वहीं, निफ्टी 50 भी 261.55 अंक यानी 1.09% की बढ़त के साथ 24,334.30 अंक पर बंद हुआ था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सप्ताह के पहले कारोबारी दिन भारतीय शेयर बाजार की शुरुआत कमजोर रहने के संकेत मिल रहे हैं. शुक्रवार को घरेलू बाजार में जोरदार तेजी देखने को मिली थी, लेकिन आज वैश्विक संकेत नकारात्मक हैं. अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव से कच्चे तेल की कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं, जबकि गिफ्ट निफ्टी (GIFT Nifty) भी गिरावट के साथ कारोबार कर रहा है. ऐसे में सोमवार को बाजार दबाव के साथ खुल सकता है.
शुक्रवार को बाजार में रही थी जोरदार तेजी
शुक्रवार को भारतीय शेयर बाजार शानदार बढ़त के साथ बंद हुए थे. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स 964.58 अंक यानी 1.25% उछलकर 78,151.45 अंक पर बंद हुआ था. वहीं, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी 50 भी 261.55 अंक यानी 1.09% की बढ़त के साथ 24,334.30 अंक पर बंद हुआ था.
सेंसेक्स के 30 में से 25 शेयर बढ़त के साथ बंद हुए थे. टेक महिंद्रा, कोटक महिंद्रा बैंक, टीसीएस, रिलायंस इंडस्ट्रीज, हिंदुस्तान यूनिलीवर, एक्सिस बैंक और महिंद्रा एंड महिंद्रा जैसे दिग्गज शेयरों में अच्छी खरीदारी देखने को मिली थी. रिलायंस इंडस्ट्रीज का शेयर 2.59% चढ़कर 1,326.50 रुपये पर बंद हुआ था. सेक्टोरल इंडेक्स में निजी बैंक, आईटी, ऑटो और रियल्टी शेयरों ने बाजार को मजबूत सहारा दिया था.
आज GIFT Nifty ने दिए कमजोर शुरुआत के संकेत
सोमवार सुबह GIFT Nifty 24,295 के स्तर पर कारोबार करता दिखा, जो अपने पिछले बंद स्तर से 28 अंक नीचे था. इससे संकेत मिल रहे हैं कि निफ्टी 50 की शुरुआत कमजोरी के साथ हो सकती है. निवेशकों की नजर पश्चिम एशिया के हालात और वैश्विक बाजारों पर बनी हुई है.
एशियाई बाजारों में मिला-जुला कारोबार
सोमवार को एशियाई बाजारों में मिश्रित रुख देखने को मिला. दक्षिण कोरिया का Kospi करीब 2.8% टूट गया, जबकि हांगकांग का Hang Seng लगभग 1.7% की बढ़त के साथ कारोबार करता दिखा. निवेशक अमेरिका-ईरान तनाव के आर्थिक प्रभाव का आकलन कर रहे हैं.
अमेरिकी बाजार शुक्रवार को लाल निशान में बंद
शुक्रवार को अमेरिकी शेयर बाजारों में बिकवाली रही. Dow Jones 0.77%, S&P 500 1.01% और Nasdaq Composite 1.4% की गिरावट के साथ बंद हुए. इससे सोमवार को एशियाई और भारतीय बाजारों पर भी दबाव देखने को मिल रहा है.
शुक्रवार के मुकाबले आज कच्चे तेल में बड़ा उछाल
शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड करीब 85.60 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था. उस समय अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ने से कीमतों में हल्की तेजी देखने को मिली थी.
हालांकि, आज हालात और बिगड़ने के बाद ब्रेंट क्रूड 2.5% उछलकर 90.29 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है. अमेरिका की ओर से लगातार नौवीं रात ईरानी ठिकानों पर हमले किए जाने के बाद वैश्विक सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ गई है. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारत जैसे आयातक देशों के लिए महंगाई और चालू खाते के मोर्चे पर चिंता बढ़ा सकती हैं.
आज इन कंपनियों के आएंगे तिमाही नतीजे
आज कई कंपनियां अप्रैल-जून तिमाही (Q1 FY27) के नतीजे जारी करेंगी. इनमें UltraTech Cement, Indian Overseas Bank, Mahindra Logistics, Sobha, Rallis India, Karur Vysya Bank, Shyam Metalics & Energy, Swaraj Engines, Vimta Labs और Venus Remedies शामिल हैं. इन कंपनियों के नतीजों के आधार पर संबंधित शेयरों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है.
इन शेयरों पर रखें नजर
नई दिल्ली. सप्ताह के पहले कारोबारी दिन शेयर बाजार में कई कंपनियों से जुड़े अहम कॉरपोरेट अपडेट निवेशकों के रडार पर रहेंगे. NATCO Pharma को USFDA से Olaparib 100 mg और 150 mg टैबलेट के लिए अस्थायी मंजूरी मिली है. GAIL (India) ने रणनीतिक खनिजों के क्षेत्र में सहयोग के लिए KABIL के साथ समझौता किया है. Samvardhana Motherson को जापान की अदालत से Yutaka Giken में 81% हिस्सेदारी के अधिग्रहण की मंजूरी मिल गई है. Aditya Birla Capital ने अपनी सहयोगी कंपनी Aditya Birla Sun Life Insurance के राइट्स इश्यू में 484.5 करोड़ रुपये का निवेश किया है. Cipla की सहायक कंपनी InvaGen Pharmaceuticals के न्यूयॉर्क प्लांट का USFDA निरीक्षण पूरा हुआ, जिसके बाद कंपनी को Form 483 के तहत एक ऑब्जर्वेशन जारी किया गया है. Power Grid को Fatehgarh-II Transmission Project मिला है, जबकि Force Motors के एसोसिएट वाइस प्रेसिडेंट अमित प्रमोद जोशी ने इस्तीफा दे दिया है. CCPA ने SpiceJet पर डार्क पैटर्न के इस्तेमाल को लेकर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है. Karur Vysya Bank ने 22 जुलाई से MCLR दरों में 5 से 10 बेसिस प्वाइंट तक बढ़ोतरी की है. JSW Steel ने JSW Cement के प्रस्तावित IPO में अधिकतम 811 करोड़ रुपये के शेयर बेचने को मंजूरी दी है, जबकि Piramal Finance ने विभिन्न माध्यमों से 4,000 करोड़ रुपये जुटाने के प्रस्ताव को मंजूरी के लिए रखा है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रल्हाद जोशी ने एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए बताया कि इस उपलब्धि में सबसे बड़ा योगदान सौर ऊर्जा क्षेत्र का रहा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत ने स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है. वर्ष 2026 की पहली छमाही में देश की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में 25 फीसदी की रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई है. यह वृद्धि पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 30.6 गीगावाट अधिक है. इस वृद्धि में सबसे बड़ा योगदान सौर ऊर्जा का रहा, जिसकी क्षमता एक साल में 43 फीसदी बढ़ी है. इससे भारत का स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ता कदम और मजबूत हुआ है.
यह जानकारी केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रल्हाद जोशी ने एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए दी है. उन्होंने अपने एक्स हैंडल पर पोस्ट करके बताया है कि जनवरी से जून 2026 के बीच देश में 26.34 गीगावाट नई सौर ऊर्जा क्षमता जोड़ी गई, जिससे सौर ऊर्जा क्षमता में सालाना आधार पर 43 फीसदी की वृद्धि दर्ज हुई.
कुल बिजली क्षमता में 52% हिस्सेदारी
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के आंकड़ों के अनुसार, 30 जून 2026 तक देश की कुल अक्षय ऊर्जा क्षमता (बड़ी पनबिजली परियोजनाओं सहित) बढ़कर 288 गीगावाट पहुंच गई है. यह भारत की कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता का 52 फीसदी हिस्सा है.
इसमें सौर ऊर्जा की स्थापित क्षमता 162 गीगावाट और पवन ऊर्जा क्षमता 57 गीगावाट तक पहुंच चुकी है, जो देश के स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र की मजबूत प्रगति को दर्शाती है.
IEA ने भी की भारत की सराहना
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में भारत को दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते नवीकरणीय ऊर्जा बाजारों में शामिल किया है. रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2025 में भारत की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में करीब 60 फीसदी की सालाना वृद्धि दर्ज की गई, जो प्रमुख वैश्विक बाजारों में सबसे अधिक रही.
रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में भारत ने करीब 50 गीगावाट सौर पीवी (Solar PV) क्षमता स्थापित की, जो पिछले वर्ष की तुलना में दोगुनी है. इसी अवधि में पवन ऊर्जा क्षमता भी दोगुनी होकर 6 गीगावाट से अधिक हो गई.
अपतटीय पवन ऊर्जा अब भी चुनौती
हालांकि, IEA ने यह भी कहा कि भारत में अपतटीय (Offshore) पवन ऊर्जा परियोजनाओं की रफ्तार उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ सकी. कई परियोजनाएं रद्द होने और उनमें देरी के कारण इस क्षेत्र में अपेक्षित प्रगति नहीं हो पाई है.
वैश्विक स्तर पर भी अपतटीय पवन ऊर्जा उद्योग कई चुनौतियों का सामना कर रहा है. IEA के अनुसार, अमेरिका सहित कई देशों में नीतिगत बदलाव, बढ़ती लागत, आपूर्ति श्रृंखला में बाधाओं और परियोजनाओं के रद्द होने के कारण डेवलपर्स अपने 2030 तक के उत्पादन लक्ष्यों में कटौती कर रहे हैं.
बिजली ग्रिड पर बढ़ रहा दबाव
नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में तेज बढ़ोतरी के साथ भारत के बिजली ग्रिड पर दबाव भी बढ़ रहा है. हाल ही में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के एक वर्किंग पेपर में कहा गया था कि तेजी से बढ़ती सौर ऊर्जा क्षमता के कारण ग्रिड प्रबंधन नई चुनौती बनता जा रहा है.
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि ऊर्जा भंडारण (Energy Storage) क्षमता का तेजी से विस्तार किया जाए और बिजली की मांग व आपूर्ति के बेहतर संतुलन के लिए अतिरिक्त नीतिगत कदम उठाए जाएं, ताकि बढ़ती नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का अधिकतम लाभ उठाया जा सके.
विक्रम-1 की सफल लॉन्चिंग भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए मील का पत्थर मानी जा रही है. अब तक देश में सैटेलाइट लॉन्चिंग की जिम्मेदारी मुख्य रूप से ISRO निभाता था, लेकिन निजी कंपनियों की सक्रिय भागीदारी से इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा और क्षमता दोनों बढ़ेंगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत ने अंतरिक्ष क्षेत्र में एक और ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है. हैदराबाद की निजी कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace) का पहला ऑर्बिटल रॉकेट 'विक्रम-1' सफलतापूर्वक लॉन्च हो गया है. इस उपलब्धि के साथ भारत के निजी स्पेस सेक्टर ने एक नए दौर में प्रवेश कर लिया है. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे सैटेलाइट लॉन्चिंग, निवेश, स्टार्टअप्स, रोजगार और वैश्विक स्पेस मार्केट में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने में बड़ी मदद मिलेगी.
मिशन आगमन
हैदराबाद स्थित स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा विकसित इस रॉकेट को दोपहर 12 बजे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के श्रीहरिकोटा स्थित लॉन्च सेंटर से लॉन्च किया गया. इस मिशन को 'मिशन आगमन' नाम दिया गया है. इस मिशन के तहत विक्रम-1 टेक्नोलॉजी और कला से जुड़े विभिन्न पेलोड अंतरिक्ष में लेकर गया है. मिशन की कुल लागत लगभग 20 से 30 लाख डॉलर (करीब 19 से 28 करोड़ रुपये) बताई जा रही है. इससे पहले कंपनी ने वर्ष 2022 में 'विक्रम-एस' नाम के सब-ऑर्बिटल रॉकेट का सफल परीक्षण किया था, जिसके बाद यह अगला बड़ा कदम माना जा रहा है.
ISRO के पूर्व वैज्ञानिकों ने रखी कंपनी की नींव
स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना वर्ष 2018 में ISRO के दो पूर्व वैज्ञानिकों पवन कुमार चंदना और नागा भरत डाका ने की थी. दोनों ने सरकारी नौकरी छोड़कर भारत की पहली निजी रॉकेट लॉन्च कंपनी बनाने का सपना देखा था.
पवन कुमार चंदना कंपनी के सह-संस्थापक (Co-founder) और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) हैं, जबकि नागा भरत डाका सह-संस्थापक और मुख्य परिचालन अधिकारी (COO) हैं. दोनों ISRO में रॉकेट और लॉन्च सिस्टम से जुड़े महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स पर काम कर चुके हैं. पवन कुमार चंदना का नाम फोर्ब्स की '30 अंडर 30 एशिया' सूची में भी शामिल हो चुका है. उन्होंने IIT खड़गपुर से पढ़ाई की है. वर्तमान में स्काईरूट एयरोस्पेस का मूल्यांकन करीब 10,500 करोड़ रुपये है.
भारतीय स्पेस सेक्टर को क्या होगा फायदा?
विक्रम-1 की सफल लॉन्चिंग भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए मील का पत्थर मानी जा रही है. अब तक देश में सैटेलाइट लॉन्चिंग की जिम्मेदारी मुख्य रूप से ISRO निभाता था, लेकिन निजी कंपनियों की सक्रिय भागीदारी से इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा और क्षमता दोनों बढ़ेंगी.
कम लागत पर सैटेलाइट लॉन्च करने की क्षमता विकसित होने से दुनिया भर की कंपनियां अपने उपग्रह लॉन्च कराने के लिए भारत का रुख कर सकती हैं. इससे भारत वैश्विक कमर्शियल स्पेस मार्केट में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकेगा.
स्टार्टअप्स, निवेश और रोजगार को मिलेगा बढ़ावा
निजी कंपनियों की बढ़ती भागीदारी से स्पेस टेक्नोलॉजी से जुड़े स्टार्टअप्स के लिए नए अवसर पैदा होंगे. साथ ही घरेलू और विदेशी निवेश में बढ़ोतरी होने की संभावना है. इससे उच्च तकनीक आधारित रोजगार भी बढ़ेंगे और भारत का अंतरिक्ष उद्योग नई ऊंचाइयों तक पहुंच सकेगा.
नई स्पेस पॉलिसी से मिला बढ़ावा
केंद्र सरकार ने वर्ष 2023 में भारतीय अंतरिक्ष नीति (Indian Space Policy) लागू की थी, जिसके बाद निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स के लिए अंतरिक्ष क्षेत्र में काम करने के नए अवसर खुले. सरकार ने 2024 से अंतरिक्ष क्षेत्र में 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की भी अनुमति दे दी है. इससे विदेशी कंपनियों के लिए भारत के स्पेस सेक्टर में निवेश करना और आसान हो गया है.
तेजी से बढ़ रहा भारतीय स्पेस इकोसिस्टम
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले 12 वर्षों में देश में 400 से अधिक स्पेस स्टार्टअप्स शुरू हो चुके हैं. इंडियन नेशनल स्पेस प्रमोशन एंड ऑथराइजेशन सेंटर (IN-SPACe) के मुताबिक, 30 सितंबर 2025 तक 376 स्टार्टअप्स ने पंजीकरण के लिए आवेदन किया था.
वहीं, 2015 से 2024 के बीच ISRO ने 393 विदेशी और 3 भारतीय वाणिज्यिक उपग्रह लॉन्च किए, जिससे भारत को करीब 439 मिलियन डॉलर (लगभग 4,227 करोड़ रुपये) की आय हुई.
2040 तक 100 अरब डॉलर की स्पेस इकोनॉमी का लक्ष्य
वर्ष 2021 में वैश्विक स्पेस इंडस्ट्री में भारत की हिस्सेदारी करीब 2 फीसदी (8.4 अरब डॉलर) थी. सरकार का अनुमान है कि 2030 तक भारत की स्पेस इकोनॉमी 40-45 अरब डॉलर और 2040 तक 100 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है. वहीं, स्पेस एक्सपोर्ट 11 अरब डॉलर तक पहुंचने की संभावना है. विक्रम-1 की सफल लॉन्चिंग को इसी लक्ष्य की दिशा में भारत का एक बड़ा और निर्णायक कदम माना जा रहा है.
अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव लगातार बढ़ता जा रहा है. इस घटनाक्रम ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों की चिंता बढ़ा दी है. दक्षिणी ईरान में अमेरिकी हमलों में आठ लोगों की मौत की खबरों के बाद आशंका बढ़ गई है कि संघर्ष आगे बढ़ने पर दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य से कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है. इसका असर तेल कीमतों, महंगाई और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है.
बढ़ते हमले और जवाबी कार्रवाई से क्षेत्र में व्यापारिक जहाजों और ऊर्जा ढांचे पर खतरा बढ़ रहा है. बाजारों को डर है कि यदि संघर्ष और तेज हुआ तो होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले समुद्री यातायात पर असर पड़ सकता है, जिससे वैश्विक कच्चे तेल की आपूर्ति, व्यापार और वित्तीय बाजारों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है.
होर्मुज जलडमरूमध्य बना ऊर्जा बाजार का केंद्र
वैश्विक ऊर्जा बाजारों के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक मार्गों में से एक है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, वर्ष 2025 में इस जलमार्ग से प्रतिदिन औसतन करीब 2 करोड़ बैरल कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की आवाजाही हुई, जो दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का लगभग 25 फीसदी हिस्सा है. इस मार्ग से जाने वाली बड़ी मात्रा में तेल की आपूर्ति एशियाई देशों, जिसमें भारत, चीन और जापान जैसे प्रमुख उपभोक्ता शामिल हैं, तक पहुंचती है.
यदि इस मार्ग से तेल परिवहन लंबे समय तक बाधित होता है तो कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है. हालांकि कुछ तेल को वैकल्पिक पाइपलाइनों के जरिए भेजा जा सकता है, लेकिन IEA के मुताबिक उनकी क्षमता होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाली कुल मात्रा की तुलना में काफी सीमित है.
कच्चे तेल और शिपिंग लागत पर नजर
निवेशक अब पश्चिम एशिया की स्थिति पर करीबी नजर बनाए हुए हैं. भू-राजनीतिक जोखिम बढ़ने से ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता बढ़ रही है. यदि तेल आपूर्ति प्रभावित होती है तो ब्रेंट क्रूड की कीमतों में तेजी आ सकती है. लंबे समय तक संघर्ष जारी रहने की स्थिति में क्षेत्र में काम करने वाले जहाजों के लिए माल ढुलाई लागत और युद्ध जोखिम बीमा (War Risk Insurance) का प्रीमियम भी बढ़ सकता है.
इसका असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा. कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से विमानन, रसायन, उर्वरक, लॉजिस्टिक्स और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों की लागत बढ़ सकती है. वहीं, बढ़ती शिपिंग लागत वैश्विक महंगाई पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है.
केंद्रीय बैंकों के लिए बढ़ेगी चुनौती
अगर ऊर्जा कीमतों में लंबे समय तक तेजी बनी रहती है तो दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों के लिए मौद्रिक नीति को लेकर नई चुनौती पैदा हो सकती है. महंगाई को नियंत्रित करने और आर्थिक विकास को गति देने के बीच संतुलन बनाना उनके लिए मुश्किल हो सकता है.
भारत पर भी पड़ सकता है असर
भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक देश है, इसलिए लंबे समय तक तेल कीमतों में बढ़ोतरी का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है. महंगा कच्चा तेल भारत के आयात बिल को बढ़ा सकता है, जिससे चालू खाते के घाटे पर दबाव बढ़ सकता है. इसके अलावा रुपये पर दबाव, कंपनियों की लागत में वृद्धि और परिवहन खर्च में तेजी देखने को मिल सकती है.
यदि तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी होती है तो सरकार के वित्तीय प्रबंधन और ईंधन कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है.
बाजारों में जारी रह सकती है अस्थिरता
विशेषज्ञों का कहना है कि बाजार पर संघर्ष का दीर्घकालिक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या इससे तेल आपूर्ति और होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए जहाजों की आवाजाही वास्तव में लंबे समय तक प्रभावित होती है.
अगर व्यावसायिक जहाजों की आवाजाही सामान्य बनी रहती है तो कच्चे तेल की कीमतों में शुरुआती जोखिम प्रीमियम धीरे-धीरे कम हो सकता है. लेकिन यदि टैंकरों पर हमले होते हैं या होर्मुज मार्ग से यातायात में बड़ी गिरावट आती है तो वैश्विक ऊर्जा संकट की स्थिति बन सकती है.
मध्य पूर्व में जारी संकट के कारण पहले ही तेल आपूर्ति प्रभावित हुई है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, संघर्ष शुरू होने के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल शिपमेंट में तेज गिरावट दर्ज की गई है.
राजनयिक प्रयासों से अभी तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है. ऐसे में वैश्विक बाजारों की नजर पश्चिम एशिया के घटनाक्रमों पर बनी रहेगी, खासकर ऊर्जा ढांचे और समुद्री व्यापार मार्गों पर होने वाली किसी भी नई कार्रवाई पर.
ऑटो उद्योग का मानना है कि SUV और यूटिलिटी व्हीकल की बढ़ती मांग, बेहतर मॉडल लॉन्च और ग्राहकों की बदलती प्राथमिकताओं के चलते यात्री वाहन बाजार में आगे भी तेजी बनी रह सकती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत का यात्री वाहन उद्योग 2026 में रिकॉर्ड प्रदर्शन की ओर बढ़ रहा है. वाहन निर्माताओं से डीलरों तक गाड़ियों की आपूर्ति यानी थोक बिक्री में पहली छमाही के दौरान जबरदस्त तेजी देखने को मिली है. जनवरी से जून के बीच वाहनों की थोक बिक्री छह में से पांच महीनों में 4 लाख यूनिट के पार रही. यूटिलिटी व्हीकल (UV) की मजबूत मांग और ग्राहकों की बदलती पसंद के चलते ऑटो सेक्टर अब तक के सबसे बेहतर साल की ओर बढ़ता नजर आ रहा है.
वाहन उद्योग संगठन सियाम (SIAM) के आंकड़ों के अनुसार, जून 2026 में यात्री वाहनों की थोक बिक्री 3.88 लाख यूनिट रही. हालांकि यह सालाना आधार पर 24.1 फीसदी अधिक थी, लेकिन साल की शुरुआत में दर्ज किए गए रिकॉर्ड स्तरों की तुलना में इसमें गिरावट आई.
जनवरी में सबसे ज्यादा बिक्री
पहली छमाही में जनवरी सबसे मजबूत महीना रहा, जब यात्री वाहनों की थोक बिक्री 4.50 लाख यूनिट तक पहुंच गई. इसके बाद मार्च में 4.42 लाख और मई में 4.39 लाख वाहनों की बिक्री दर्ज की गई.
अप्रैल में भी यात्री वाहन बाजार ने शानदार प्रदर्शन किया. इस महीने बिक्री 4.37 लाख यूनिट रही, जो पिछले साल के इसी महीने के मुकाबले 25.4 फीसदी अधिक थी. ऑटो उद्योग में इस बढ़ोतरी का सबसे बड़ा कारण यूटिलिटी व्हीकल सेगमेंट की मजबूत मांग रही.
SUV और UV की मांग ने बढ़ाई रफ्तार
यात्री वाहन बाजार में यूटिलिटी व्हीकल (UV) सेगमेंट लगातार ग्रोथ का प्रमुख आधार बना हुआ है. कैलेंडर वर्ष 2026 की पहली तिमाही यानी जनवरी से मार्च के दौरान UV बिक्री सालाना आधार पर 20.1 फीसदी बढ़कर 8,99,255 यूनिट हो गई. इस दौरान UV की बिक्री ने पैसेंजर कारों को पीछे छोड़ दिया. पहली तिमाही में पैसेंजर कारों की बिक्री 0.3 फीसदी घटकर 3,75,659 यूनिट रही.
दूसरी तिमाही में भी जारी रही तेजी
अप्रैल से जून 2026 की दूसरी तिमाही में भी UV सेगमेंट का प्रदर्शन मजबूत बना रहा. इस दौरान UV बिक्री 28.6 फीसदी बढ़कर 8,61,918 यूनिट पहुंच गई. वहीं, पैसेंजर कारों की बिक्री में भी सुधार देखने को मिला और इसमें सालाना आधार पर 21.3 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई. हालांकि, ग्रोथ के मामले में UV सेगमेंट सबसे आगे रहा.
ऑटो उद्योग का मानना है कि SUV और यूटिलिटी व्हीकल की बढ़ती मांग, बेहतर मॉडल लॉन्च और ग्राहकों की बदलती प्राथमिकताओं के चलते यात्री वाहन बाजार में आगे भी तेजी बनी रह सकती है.
नीति आयोग का कहना है कि राज्यों में निवेश के लिए बेहतर माहौल तैयार होने से घरेलू और विदेशी निवेश में बढ़ोतरी होगी. इससे औद्योगिकीकरण को गति मिलेगी, नवाचार को बढ़ावा मिलेगा और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश में निवेश को बढ़ावा देने और राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धी एवं सहकारी संघवाद को मजबूत करने की दिशा में नीति आयोग (NITI Aayog) ने पहली बार 'इन्वेस्टमेंट फ्रेंडलीनेस इंडेक्स' (Investment Friendliness Index-IFI) जारी किया है. इस रैंकिंग में गुजरात निवेश के लिए सबसे अनुकूल राज्य बनकर उभरा है. महाराष्ट्र दूसरे और तमिलनाडु तीसरे स्थान पर रहे, जबकि गोवा और ओडिशा भी शीर्ष प्रदर्शन करने वाले राज्यों में शामिल हैं. सरकार का मानना है कि यह इंडेक्स राज्यों में निवेश से जुड़े सुधारों को गति देगा और भारत को वैश्विक निवेश के प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित करने में मदद करेगा.
28 राज्य और 8 केंद्रशासित प्रदेशों का हुआ मूल्यांकन
इस इंडेक्स में देश के सभी 28 राज्यों और 8 केंद्रशासित प्रदेशों का मूल्यांकन किया गया है. इसके लिए आठ प्रमुख स्तंभों और 84 संकेतकों (Indicators) को आधार बनाया गया. इनमें बुनियादी ढांचा, कारोबारी माहौल, संसाधनों की उपलब्धता, सरकारी नीतियां, नियामकीय सुगमता, संस्थागत व्यवस्था, वित्तीय स्थिति और पर्यावरणीय मजबूती जैसे पहलुओं का आकलन किया गया. रिपोर्ट तैयार करने के लिए सरकारी आंकड़ों के साथ निवेशकों से प्राप्त फीडबैक और सर्वेक्षण को भी शामिल किया गया है.
चार श्रेणियों में बांटे गए राज्य
कुल स्कोर के आधार पर राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है. 50 से अधिक अंक हासिल करने वाले राज्यों को टॉप परफॉर्मर्स की श्रेणी में रखा गया है. 45 से 50 अंक प्राप्त करने वाले राज्यों को फ्रंटरनर्स, 40 से 45 अंक के बीच रहने वाले राज्यों को इमर्जिंग परफॉर्मर्स, जबकि 40 से कम अंक पाने वाले राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को एस्पायरिंग स्टेट्स की श्रेणी में रखा गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, 15 राज्य फ्रंटरनर्स श्रेणी में शामिल हुए हैं, जबकि 8-8 राज्य और केंद्रशासित प्रदेश इमर्जिंग परफॉर्मर्स तथा एस्पायरिंग स्टेट्स श्रेणी में हैं.
बड़े राज्यों में गुजरात नंबर-1
बेहतर तुलना के लिए नीति आयोग ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को तीन अलग-अलग समूहों में भी बांटा है. बड़े राज्यों की श्रेणी में गुजरात ने पहला स्थान हासिल किया, जबकि महाराष्ट्र दूसरे और तमिलनाडु तीसरे स्थान पर रहे. पहाड़ी और पूर्वोत्तर राज्यों में उत्तराखंड शीर्ष पर रहा. इसके बाद असम और हिमाचल प्रदेश का स्थान रहा. वहीं, केंद्रशासित प्रदेश और सिटी स्टेट्स की श्रेणी में गोवा पहले, दिल्ली दूसरे और चंडीगढ़ तीसरे स्थान पर रहा.
राज्यों की भूमिका सबसे अहम
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के निवेश माहौल को मजबूत बनाने में राज्य सरकारों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. राष्ट्रीय स्तर पर बनाई गई आर्थिक नीतियां निवेश का व्यापक ढांचा तैयार करती हैं, लेकिन औद्योगिक भूमि की उपलब्धता, भौतिक और डिजिटल बुनियादी ढांचा, नियामकीय दक्षता, संस्थागत क्षमता और नीतियों की स्थिरता जैसे कारक निवेशकों के फैसलों को सीधे प्रभावित करते हैं.
नीति आयोग का कहना है कि राज्यों में निवेश के लिए बेहतर माहौल तैयार होने से घरेलू और विदेशी निवेश में बढ़ोतरी होगी. इससे औद्योगिकीकरण को गति मिलेगी, नवाचार को बढ़ावा मिलेगा और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे. यह 'विकसित भारत @2047' के लक्ष्य को हासिल करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.
सिर्फ रैंकिंग नहीं, सुधार का रोडमैप
नीति आयोग के मुताबिक, यह इंडेक्स केवल राज्यों की रैंकिंग करने का माध्यम नहीं है, बल्कि इसे सुधारों को आगे बढ़ाने वाले एक रणनीतिक उपकरण के रूप में तैयार किया गया है. इसका उद्देश्य राज्यों की ताकत और कमजोरियों की पहचान करना, एक-दूसरे से सीखने की प्रक्रिया को बढ़ावा देना और बेहतर नीतियों व प्रक्रियाओं को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना है.
रिपोर्ट में प्रत्येक राज्य और केंद्रशासित प्रदेश की विस्तृत प्रोफाइल भी शामिल की गई है. इसमें समान भौगोलिक और प्रशासनिक परिस्थितियों वाले राज्यों के साथ तुलना करते हुए उनकी उपलब्धियों, निवेशकों की प्रतिक्रिया और सुधार की जरूरत वाले क्षेत्रों का विश्लेषण किया गया है.
निवेश माहौल को और मजबूत करने की तैयारी
नीति आयोग ने कहा कि इन्वेस्टमेंट फ्रेंडलीनेस इंडेक्स को एक सतत सुधारात्मक ढांचे के रूप में विकसित किया जाएगा, जिससे केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, उद्योग जगत और अन्य हितधारकों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित हो सके. इसका अंतिम उद्देश्य भारत में अधिक पारदर्शी, स्थिर और निवेश-अनुकूल माहौल तैयार करना, देश को वैश्विक निवेश का पसंदीदा गंतव्य बनाना और समावेशी एवं टिकाऊ आर्थिक विकास को गति देना है.