जिनसे मिलने के लिए लाइन में खड़े रहते हैं दुनियाभर के रईस, वो PM मोदी खुद कितने हैं अमीर?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी हलफनामे में अपनी संपत्ति का ब्यौरा दिया है. उन्होंने बताया है कि उनके पास कुल कितनी संपत्ति है.

Last Modified:
Wednesday, 15 May, 2024
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) ने वाराणसी लोकसभा सीट (Varanasi Lok Sabha Seat) से नामांकन दाखिल कर दिया है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और कैबिनेट के साथियों की मौजूदगी में PM मोदी ने मंगलवार को अपना नॉमिनेशन फाइल किया. सभी प्रत्याशियों को नामांकन के साथ एक हलफनामा भी देना होता है, जिसमें उनकी संपत्ति का ब्यौरा होता है. PM मोदी ने भी चुनाव आयोग को बताया है कि उनके पास कुल कितनी दौलत है. चलिए आपको बताते हैं कि देश चलाने वाले मोदी कितने अमीर हैं.

SBI में हैं दो अकाउंट    
प्रधानमंत्री मोदी के पास 3.02 करोड़ रुपए की कुल संपत्ति है. हालांकि, उनके पास न तो अपना कोई घर है और न ही गाड़ी. कैश के तौर पर मोदी के पास 52,920 रुपए हैं. जबकि बैंक में उनके करीब 2.85 करोड़ रुपए ज्यादा जमा हैं. PM मोदी के स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) में दो खाते हैं. एक गुजरात के गांधीनगर में और वाराणसी की शिवाजी नगर शाखा में. गुजरात वाले खाते में 73 हजार 304 और वाराणसी वाले अकाउंट में सात हजार रुपए हैं. मोदी ने गोल्ड में 2.67 रुपए निवेश किया हुआ है. उनके पास सोने की 4 अंगूठियां हैं. 

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PM के ऊपर कोई कर्ज नहीं  
वाराणसी से चुनावी मैदान में उतरा मोदी ने नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट (NSC) में 9.12 लाख रुपए का इन्वेस्टमेंट किया है. एनएससी में उनका निवेश 2019 में 7.61 लाख रुपए था, जिसमें लगभग 2 लाख रुपए का इजाफा हुआ है. मोदी के ऊपर कोई देनदारी नहीं है. उन्होंने कोई लोन नहीं लिया है. उन्होंने अपनी आय के स्रोतों के रूप में सरकार से मिलने वाला वेतन और बैंक से मिलने वाला ब्याज का हवाला दिया है. प्रधानमंत्री ने घोषणा की है कि उनके पास गुजरात विश्वविद्यालय से MA की डिग्री है. वहीं, उन्होंने 1978 में दिल्ली विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन किया है.  

इनसे है मोदी का मुकाबला
लोकसभा चुनाव के लिए इस बार भी प्रधानमंत्री मोदी ने उत्तर प्रदेश की वाराणसी सीट को ही चुना है. वह पहली बार 2014 में वाराणसी से ही सांसद चुने गए थे और फिर देश के प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी संभाली. इसके बाद 2019 में भी मोदी इसी सीट से चुनावी मैदान में उतरे और प्रचंड जीत हासिल की. अब 2024 के चुनावी रण में भी उन्होंने वाराणसी को ही चुना है. कांग्रेस के अजय राय और बहुजन समाज पार्टी के अतहर जमाल लारी भी वाराणसी से किस्मत अजमाने के लिए नामांकन दाखिल कर चुके हैं. वाराणसी में 1 जून को वोट डाले जाएंगे. 


केनरा बैंक का मुनाफा 8.4% बढ़कर ₹5,175 करोड़, शेयर में तेजी

बैंक की ओर से स्टॉक एक्सचेंज को दी गई जानकारी के मुताबिक, सितंबर तिमाही में कुल आय सालाना आधार पर 6.04% बढ़कर ₹40,931 करोड़ हो गई.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 14 October, 2026
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Wednesday, 14 October, 2026
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केनरा बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में मजबूत प्रदर्शन किया है. सितंबर तिमाही में बैंक का शुद्ध मुनाफा सालाना आधार पर 8.40% बढ़कर ₹5,175 करोड़ हो गया, जबकि पिछले साल की समान अवधि में यह ₹4,774 करोड़ था. बैंक की शुद्ध ब्याज आय में भी 20% से ज्यादा की बढ़ोतरी दर्ज की गई. बेहतर नतीजों के बीच शेयर बाजार में केनरा बैंक के शेयर इंट्राडे कारोबार के दौरान 5% से अधिक चढ़ गए. 

बैंक की ओर से स्टॉक एक्सचेंज को दी गई जानकारी के मुताबिक, सितंबर तिमाही में कुल आय सालाना आधार पर 6.04% बढ़कर ₹40,931 करोड़ हो गई. पिछले वित्त वर्ष की इसी तिमाही में बैंक ने ₹38,598 करोड़ की कुल आय दर्ज की थी. वहीं, शुद्ध ब्याज आय (NII) 20.39% बढ़कर ₹11,005 करोड़ पहुंच गई, जो एक साल पहले ₹9,141 करोड़ थी.

बैंक का वैश्विक कारोबार भी मजबूत हुआ है. सितंबर 2026 के अंत तक कुल वैश्विक कारोबार 15.88% की सालाना बढ़ोतरी के साथ ₹30.72 लाख करोड़ हो गया. इसमें वैश्विक जमा ₹16.97 लाख करोड़ और वैश्विक कर्ज ₹13.75 लाख करोड़ रहा.

खराब कर्ज में आई कमी

केनरा बैंक के एसेट क्वालिटी के मोर्चे पर भी सुधार देखने को मिला. सितंबर 2026 में बैंक का ग्रॉस एनपीए अनुपात घटकर 1.33% रह गया, जबकि जून 2026 में यह 1.57% और सितंबर 2025 में 2.35% था. इसी तरह, नेट एनपीए अनुपात एक साल पहले के 0.54% से घटकर 0.30% पर आ गया.

बैंक का ग्रॉस एनपीए सितंबर तिमाही में ₹18,299 करोड़ रहा, जो जून तिमाही में ₹20,354 करोड़ और पिछले साल की समान अवधि में ₹27,040 करोड़ था. हालांकि, खराब कर्ज में आई पूरी कमी को नकद वसूली नहीं माना जा सकता. इसमें ₹719 करोड़ की नकद वसूली, ₹452 करोड़ के खातों का दोबारा सामान्य होना और ₹2,800 करोड़ के कर्ज को बट्टे खाते में डालना भी शामिल है.

तिमाही के दौरान ₹1,844 करोड़ के नए कर्ज खराब कर्ज की श्रेणी में आए. जून तिमाही में यह आंकड़ा ₹1,781 करोड़ था. वहीं, प्रोविजन कवरेज रेश्यो बढ़कर 95.34% हो गया, जो पिछले साल सितंबर में 93.59% था.

कर्ज और जमा में कितनी बढ़ोतरी?

बैंक के वैश्विक कर्ज में सालाना आधार पर 19.46% की बढ़ोतरी हुई और यह ₹13.75 लाख करोड़ पर पहुंच गया. दूसरी ओर, वैश्विक जमा 13.13% बढ़कर ₹16.97 लाख करोड़ हो गई. इससे स्पष्ट है कि बैंक के कर्ज में बढ़ोतरी जमा की तुलना में तेज रही.

खुदरा कर्ज में सबसे ज्यादा तेजी देखने को मिली. यह सालाना आधार पर 31.61% बढ़कर ₹3.31 लाख करोड़ हो गया. आवास कर्ज 17.35% बढ़कर ₹1.35 लाख करोड़ और वाहन कर्ज 25.50% बढ़कर ₹29,326 करोड़ पर पहुंच गया. छोटे एवं मझोले कारोबारों को दिया गया कर्ज 15.49% बढ़कर ₹1.78 लाख करोड़ रहा, जबकि कृषि और संबंधित क्षेत्रों का कर्ज 14.26% बढ़कर ₹3.04 लाख करोड़ हो गया.

कर्ज की तेज वृद्धि के बीच बैंक का वैश्विक क्रेडिट-डिपॉजिट अनुपात बढ़कर 81.01% हो गया. जून तिमाही में यह 80.25% और पिछले साल सितंबर में 76.72% था.

शुद्ध ब्याज मार्जिन में भी सुधार

सितंबर तिमाही में बैंक का शुद्ध ब्याज मार्जिन (NIM) बढ़कर 2.55% हो गया. जून तिमाही में यह 2.52% और पिछले वित्त वर्ष की सितंबर तिमाही में 2.50% था. शुद्ध ब्याज मार्जिन बैंक की ब्याज से होने वाली कमाई और ब्याज पर किए जाने वाले खर्च के बीच के अंतर को दर्शाता है.

हालांकि, कम लागत वाली जमा के मोर्चे पर बैंक को अभी और सुधार करना है. घरेलू चालू और बचत खातों की जमा (CASA) सालाना आधार पर 4.85% बढ़कर ₹4,48,889 करोड़ हो गई. घरेलू जमा में इसकी हिस्सेदारी 29% रही, जबकि बैंक ने मार्च 2027 तक इसे 30-32% तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है.

गैर-ब्याज आय में गिरावट

कुछ मोर्चों पर बैंक का प्रदर्शन कमजोर भी रहा. गैर-ब्याज आय सालाना आधार पर 18.17% घटकर ₹5,772 करोड़ रह गई. ट्रेजरी आय में 68.48% की गिरावट आई और यह ₹499 करोड़ रही. निवेश बेचने से होने वाला मुनाफा भी पिछले साल के ₹1,217 करोड़ से घटकर ₹153 करोड़ रह गया.

वहीं, शुल्क आधारित आय 6.54% बढ़कर ₹2,755 करोड़ पहुंच गई. कुल प्रावधान और कर संबंधी मदों का आंकड़ा सालाना आधार पर 6.06% घटकर ₹3,583 करोड़ रहा.

पूंजी की स्थिति मजबूत, पूरे साल के लक्ष्य से आगे कारोबार

सितंबर 2026 में बैंक का पूंजी पर्याप्तता अनुपात 17.19% रहा, जो पिछले साल की समान अवधि में 16.20% था. मुख्य इक्विटी पूंजी अनुपात 12.80% दर्ज किया गया.

बैंक का वैश्विक कारोबार, कर्ज और जमा में वृद्धि वित्त वर्ष 2026-27 के लिए तय लक्ष्यों से आगे चल रही है. मार्च 2027 तक वैश्विक कारोबार में 10-11%, वैश्विक कर्ज में 11-12% और वैश्विक जमा में 9-10% वृद्धि का लक्ष्य रखा गया है. सितंबर तक इनकी सालाना वृद्धि दर क्रमशः 15.88%, 19.46% और 13.13% रही.

खराब कर्ज के मामले में भी बैंक की स्थिति तय लक्ष्यों से बेहतर है. मार्च 2027 तक ग्रॉस एनपीए 1.50%, नेट एनपीए 0.40% और क्रेडिट कॉस्ट 0.75% तक रखने का लक्ष्य है. सितंबर तिमाही में ये आंकड़े क्रमशः 1.33%, 0.30% और 0.47% रहे.

नतीजों के बाद शेयर में तेजी

केनरा बैंक के तिमाही नतीजों के बाद शेयर में खरीदारी बढ़ी. खबर लिखे जाने तक शेयर 3.55% की तेजी के साथ ₹124.72 पर कारोबार कर रहा था, जबकि इंट्राडे कारोबार के दौरान इसमें 5% से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई. बैंक के मुनाफे, शुद्ध ब्याज आय और एसेट क्वालिटी में सुधार ने निवेशकों का ध्यान खींचा. खबर लिखे जाने के दौरान यह 3.19 प्रतिशत की तेजी पर कारोबार कर रहा था.
 


ईंधन महंगा, खाद्य वस्तुओं पर दबाव; चार साल बाद थोक महंगाई 11% के पार

सितंबर के थोक महंगाई के आंकड़े संशोधित सूचकांक सीरीज के तहत जारी किए गए हैं. इस सीरीज में 2022-23 को आधार वर्ष बनाया गया है, ताकि अर्थव्यवस्था में हो रहे बदलावों को बेहतर तरीके से शामिल किया जा सके.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 14 October, 2026
Last Modified:
Wednesday, 14 October, 2026
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देश में खुदरा महंगाई के बाद अब थोक महंगाई ने भी चिंता बढ़ा दी है. सितंबर 2026 में थोक महंगाई दर बढ़कर 11.39% हो गई, जो अगस्त में 9.92% थी. सितंबर 2022 के बाद पहली बार थोक महंगाई दोहरे अंकों में पहुंची है. कच्चे तेल, ईंधन और बिजली की कीमतों में तेजी के साथ खाद्य पदार्थों और विनिर्मित उत्पादों की महंगाई ने भी इस बढ़ोतरी में योगदान दिया है.

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय की ओर से बुधवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में थोक मूल्य सूचकांक (WPI) आधारित महंगाई दर सालाना आधार पर 11.39% रही. यह अर्थशास्त्रियों के 10.18% के अनुमान से भी अधिक है. इससे पहले अगस्त में थोक महंगाई दर 9.92% दर्ज की गई थी. वहीं, इस सप्ताह जारी आंकड़ों के अनुसार, खुदरा महंगाई दर भी अगस्त के 4.83% से बढ़कर सितंबर में 5.54% पर पहुंच गई. खाद्य पदार्थों, खासकर सब्जियों की कीमतों में बढ़ोतरी को इसकी प्रमुख वजह माना गया.

चार साल के उच्च स्तर पर पहुंची थोक महंगाई

सितंबर 2022 के बाद पहली बार थोक महंगाई दर 10% के पार पहुंची है. उस समय यह 10.70% दर्ज की गई थी. सितंबर 2026 का आंकड़ा पिछले चार वर्षों में थोक महंगाई का सबसे ऊंचा स्तर है. इसके साथ ही थोक महंगाई में लगातार दूसरे महीने बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

इससे पहले नवंबर 2025 से जून 2026 तक थोक महंगाई में लगातार इजाफा हुआ था, जबकि जुलाई में मामूली गिरावट आई थी. अब एक बार फिर महंगाई में तेजी ने अर्थव्यवस्था और आम लोगों की लागत पर दबाव बढ़ने की आशंका पैदा कर दी है.

ईंधन और बिजली की महंगाई में सबसे ज्यादा तेजी

आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में ईंधन और बिजली की महंगाई दर बढ़कर 25.85% हो गई, जो अगस्त में 22.93% थी. इसी तरह, विनिर्मित उत्पादों की महंगाई दर अगस्त के 8.37% से बढ़कर सितंबर में 9.76% पर पहुंच गई.

प्राथमिक वस्तुओं की महंगाई दर भी 7.76% से बढ़कर 8.67% हो गई. इस श्रेणी में खाद्य पदार्थों के अलावा गैर-खाद्य वस्तुएं और खनिज शामिल हैं. वहीं, खाद्य पदार्थों और विनिर्मित खाद्य उत्पादों को मिलाकर तैयार थोक खाद्य सूचकांक की महंगाई दर सितंबर में 8.66% रही, जबकि अगस्त में यह 7.05% थी.

मंत्रालय के मुताबिक, थोक महंगाई बढ़ाने वाले प्रमुख कारकों में खनिज तेल, खाद्य पदार्थ, कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस, कोयला, लिग्नाइट, बुनियादी धातुएं, रसायन, कपड़ा, रबर एवं प्लास्टिक उत्पाद और बिजली के उपकरण शामिल रहे.

कच्चे तेल की कीमतें कैसे बढ़ा रही हैं महंगाई?

कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता. इससे परिवहन, खेती, सिंचाई और माल ढुलाई की लागत भी बढ़ सकती है. जब कंपनियों की उत्पादन और परिवहन लागत बढ़ती है, तो उसका असर उत्पादों की थोक कीमतों पर पड़ सकता है.

इसके अलावा, प्राकृतिक गैस की ऊंची कीमतों से उर्वरकों की लागत बढ़ने की आशंका रहती है. भारत खाद्य तेलों के आयात पर भी काफी निर्भर है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर घरेलू बाजार पर पड़ सकता है. पैकेजिंग, फसल सुरक्षा और माल ढुलाई की बढ़ती लागत भी खाद्य पदार्थों की कीमतों को प्रभावित कर सकती है.

इस तरह ऊर्जा की कीमतों में बढ़ोतरी का असर अर्थव्यवस्था के अलग-अलग क्षेत्रों तक पहुंच सकता है. यदि कंपनियां बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डालती हैं, तो आने वाले समय में खुदरा कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है.

खाद्य महंगाई पर अल नीनो और कमजोर मानसून का खतरा

अर्थशास्त्रियों ने खाद्य महंगाई के लिए अल नीनो और मानसून की असमान बारिश को प्रमुख जोखिमों में शामिल किया है. मौसम में बदलाव से खरीफ फसलों की पैदावार प्रभावित होने और रबी की बुआई में देरी की आशंका बढ़ सकती है.

ICRA की अदिति नायर और ANZ के धीरज निम के मुताबिक, जलाशयों में पानी का स्तर औसत से कम रहना सर्दियों की फसलों के लिए चिंता का विषय है. हालांकि, खाद्य पदार्थों की कीमतों पर इसका वास्तविक असर फसल उत्पादन और आगे मौसम की स्थिति पर निर्भर करेगा.

इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा और अन्य जिंसों की कीमतें बढ़ने से भी खाद्य पदार्थों की लागत पर दबाव पड़ सकता है. ऐसे में आने वाले महीनों में महंगाई की दिशा तय करने में घरेलू फसल उत्पादन और वैश्विक कमोडिटी कीमतों की अहम भूमिका रहेगी.

महंगाई के मोर्चे पर RBI की चुनौती बढ़ी

थोक और खुदरा, दोनों तरह की महंगाई में बढ़ोतरी भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए भी चुनौती बढ़ा सकती है. रिपोर्ट के मुताबिक, अक्टूबर की शुरुआत में RBI ने बेंचमार्क रेपो रेट बढ़ाकर 5.50% कर दिया था. फरवरी 2023 के बाद यह पहली बढ़ोतरी बताई गई है. गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी संकेत दिया था कि महंगाई और उसके अनुमान पिछले साल की तुलना में उतने अनुकूल नहीं हैं.

हालांकि, थोक महंगाई में बढ़ोतरी का खुदरा कीमतों पर कितना और कब असर पड़ेगा, यह कंपनियों की लागत, मांग और बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा. यदि कच्चे तेल और अन्य इनपुट की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो उत्पादन लागत के साथ उपभोक्ताओं पर भी महंगाई का दबाव बढ़ सकता है.

नई आधार वर्ष वाली सीरीज में जारी हुए आंकड़े

सितंबर के थोक महंगाई के आंकड़े संशोधित सूचकांक सीरीज के तहत जारी किए गए हैं. इस सीरीज में 2022-23 को आधार वर्ष बनाया गया है, ताकि अर्थव्यवस्था में हो रहे बदलावों को बेहतर तरीके से शामिल किया जा सके.

नई सीरीज में वस्तुओं की संख्या 697 से बढ़ाकर 957 कर दी गई है. इसमें सौर, पवन और परमाणु ऊर्जा जैसे ऊर्जा के नए स्रोतों को भी शामिल किया गया है. इससे थोक कीमतों में होने वाले बदलावों का आकलन पहले की तुलना में अधिक व्यापक आधार पर किया जा सकेगा.
 


सितंबर में FII ने दो महीने की खरीदारी का 84% बेचा, वित्तीय क्षेत्र में हुए न्यूट्रल

घरेलू म्यूचुअल फंड में निवेश 25% बढ़कर ₹59,200 करोड़ पहुंचा, सितंबर में निफ्टी 50 में 6.1% की गिरावट

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 14 October, 2026
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Wednesday, 14 October, 2026
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विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने सितंबर में भारतीय शेयर बाजार से 4.1 अरब डॉलर की निकासी की. इसके साथ ही उन्होंने पिछले दो महीनों के दौरान की गई खरीदारी का करीब 84% हिस्सा वापस निकाल लिया. उभरते बाजारों की तुलना में भारतीय शेयर बाजार के कमजोर प्रदर्शन के बीच विदेशी निवेशकों ने यह कदम उठाया. हालांकि, इस दौरान वित्तीय क्षेत्र के शेयरों में उनकी हिस्सेदारी बढ़ी और इस क्षेत्र को लेकर उनका रुख तटस्थ हो गया. वहीं, घरेलू म्यूचुअल फंड में निवेश सितंबर में 25% बढ़कर ₹59,200 करोड़ पहुंच गया. ब्रोकरेज फर्म CLSA की रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है.

सितंबर में 6.1% गिरा निफ्टी 50

सितंबर में निफ्टी 50 इंडेक्स 6.1% की गिरावट के साथ बंद हुआ. अमेरिकी डॉलर के लिहाज से इसका प्रदर्शन उभरते बाजारों और जापान को छोड़कर एशिया के अन्य बाजारों की तुलना में करीब छह प्रतिशत अंक कमजोर रहा. महीने के दौरान सभी सेक्टर गिरावट के साथ बंद हुए. सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) और ऑटोमोबाइल शेयरों में सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई, जबकि दूरसंचार और हेल्थकेयर क्षेत्र के शेयरों में अपेक्षाकृत कम कमजोरी रही.

CLSA की रिपोर्ट के मुताबिक, अक्टूबर में भी विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी है. महीने में अब तक वे भारतीय शेयर बाजार से 3.6 अरब डॉलर की निकासी कर चुके हैं.

सितंबर में भारत पर विशेष रूप से निवेश करने वाले सक्रिय फंडों के अलावा अन्य सक्रिय फंडों ने 9 अरब डॉलर के शेयर बेचे. हालांकि, भारत पर केंद्रित नहीं रहने वाले निष्क्रिय फंडों की ओर से 5.8 अरब डॉलर की खरीदारी ने इस बिकवाली के असर को कुछ हद तक कम किया.

वित्तीय क्षेत्र में एफआईआई का रुख हुआ तटस्थ

भारतीय शेयर बाजार में व्यापक बिकवाली के बावजूद विदेशी निवेशकों ने अपने पोर्टफोलियो में सेक्टर के हिसाब से बदलाव किए. उन्होंने वित्तीय क्षेत्र में अपनी सापेक्ष हिस्सेदारी 56 आधार अंक बढ़ाई. इसके साथ ही लगातार तीन महीनों तक इस क्षेत्र में कम निवेश रखने के बाद उनका रुख तटस्थ हो गया.

विदेशी निवेशकों ने ऊर्जा क्षेत्र में अपनी कम हिस्सेदारी 35 आधार अंक और ऑटोमोबाइल क्षेत्र में 20 आधार अंक कम की. वहीं, आईटी सेक्टर में अपनी सापेक्ष हिस्सेदारी 18 आधार अंक बढ़ाई. इससे आईटी क्षेत्र में उनका कम निवेश वाला रुख घटकर 1.2 प्रतिशत अंक के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया.

इन बदलावों के लिए विदेशी निवेशकों ने उपभोक्ता विवेकाधीन क्षेत्र (ऑटोमोबाइल को छोड़कर) और हेल्थकेयर में अपनी अधिक हिस्सेदारी कम की. इन दोनों क्षेत्रों में उनकी सापेक्ष हिस्सेदारी क्रमशः 47 आधार अंक और 30 आधार अंक घटी. इसके अलावा, कम्युनिकेशन सर्विसेज में आठ आधार अंक और यूटिलिटी सेक्टर में छह आधार अंक की कमी आई.

रिपोर्ट के मुताबिक, औद्योगिक क्षेत्र विदेशी संस्थागत निवेशकों के पोर्टफोलियो में अब भी सबसे अधिक वरीयता वाला सेक्टर बना हुआ है. इसमें उनकी हिस्सेदारी बेंचमार्क से 1.8 प्रतिशत अंक अधिक है.

घरेलू म्यूचुअल फंड में निवेश 25% बढ़ा

विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बीच घरेलू म्यूचुअल फंड भारतीय शेयर बाजार को सहारा देते रहे. एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) सहित घरेलू म्यूचुअल फंड में सितंबर के दौरान निवेश मासिक आधार पर 25% बढ़कर ₹59,200 करोड़ हो गया.

सक्रिय फंडों में निवेश 21% बढ़कर ₹40,900 करोड़ रहा, जबकि निष्क्रिय फंडों में निवेश 35% की बढ़ोतरी के साथ ₹18,300 करोड़ पहुंच गया.

एसआईपी निवेश रिकॉर्ड स्तर पर, लेकिन बंद होने वाले प्लान की संख्या बढ़ी

सितंबर में सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) के जरिए मासिक निवेश रिकॉर्ड ₹32,500 करोड़ पर पहुंच गया. हालांकि, एसआईपी बंद करने वाले निवेशकों की संख्या और नए एसआईपी की संख्या के अनुपात में बढ़ोतरी चिंता का विषय बनी हुई है.

अगस्त में यह अनुपात 81% था, जो सितंबर में बढ़कर 116% हो गया. यह पिछले 18 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है. इससे संकेत मिलता है कि खुदरा निवेशकों की भागीदारी को लंबे समय तक बनाए रखने की चुनौती बढ़ सकती है.

मिड-कैप और स्मॉल-कैप फंडों में भी निवेश बढ़ा. सितंबर में मिड-कैप फंडों में ₹7,800 करोड़ और स्मॉल-कैप फंडों में ₹9,000 करोड़ का निवेश आया, जो इन दोनों श्रेणियों के लिए अब तक का उच्चतम स्तर है.

इसके विपरीत, लार्ज-कैप फंडों में केवल ₹860 करोड़ का निवेश आया. इससे पहले लगातार दो महीनों तक इन फंडों से शुद्ध निकासी दर्ज की गई थी.

कुल मिलाकर, आंकड़े दिखाते हैं कि विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली के बावजूद घरेलू निवेशक बाजार को सहारा दे रहे हैं. हालांकि, एसआईपी बंद होने के अनुपात में बढ़ोतरी पर नजर रखना जरूरी होगा, क्योंकि यह घरेलू निवेश प्रवाह की स्थिरता और खुदरा निवेशकों के भरोसे का एक अहम संकेतक है.
 


पीएम गतिशक्ति के तहत ₹20.23 लाख करोड़ की 400 परियोजनाएं मंजूरी के लिए विचाराधीन

सड़क, रेलवे समेत कई बुनियादी ढांचा क्षेत्रों की परियोजनाओं का आकलन कर रहा नेटवर्क प्लानिंग ग्रुप, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर 58 केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों समेत सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों का डेटा उपलब्ध

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Published - Wednesday, 14 October, 2026
Last Modified:
Wednesday, 14 October, 2026
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केंद्र सरकार की पीएम गतिशक्ति पहल के तहत ₹20.23 लाख करोड़ की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को समीक्षा के दायरे में लाया गया है. इनमें से 400 परियोजनाओं का नेटवर्क प्लानिंग ग्रुप (एनपीजी) मंजूरी के लिए आकलन कर चुका है. इन परियोजनाओं में सड़क, रेलवे और अन्य बुनियादी ढांचा क्षेत्र शामिल हैं. इस पहल का उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे की योजना को एकीकृत करना, विभागों के बीच समन्वय बढ़ाना और लॉजिस्टिक्स की लागत कम करना है.

बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की एकीकृत योजना पर जोर

पीएम गतिशक्ति की शुरुआत 13 अक्टूबर 2021 को हुई थी. इसके तहत विभिन्न क्षेत्रों की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की योजना और विकास को एक साझा ढांचे में लाने पर जोर दिया गया है. इस पहल के अंतर्गत ₹500 करोड़ से अधिक के निवेश वाली लॉजिस्टिक्स और कनेक्टिविटी संबंधी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का नेटवर्क प्लानिंग ग्रुप आकलन करता है.

एनपीजी परियोजनाओं की योजना का मूल्यांकन पीएम गतिशक्ति के निर्धारित सिद्धांतों के आधार पर करता है. इसका उद्देश्य अलग-अलग सरकारी विभागों और बुनियादी ढांचा क्षेत्रों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना है, ताकि परियोजनाओं की योजना और क्रियान्वयन में समन्वय बढ़ाया जा सके.

हालांकि, ₹20.23 लाख करोड़ की परियोजनाओं को समीक्षा के दायरे में शामिल किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि सभी परियोजनाओं को अंतिम मंजूरी या वित्तीय स्वीकृति मिल चुकी है.

डिजिटल प्लेटफॉर्म पर 1,800 से अधिक डेटा लेयर

पीएम गतिशक्ति के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर 1,800 से अधिक डेटा लेयर एकीकृत की गई हैं. इसमें 58 केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों के साथ सभी 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का डेटा शामिल है.

इस प्लेटफॉर्म पर भूमि रिकॉर्ड, बंदरगाहों, जंगलों, स्कूलों, रेलवे स्टेशनों, जल निकायों, दूरसंचार टावरों और राजमार्गों से संबंधित जानकारी उपलब्ध है. इसका उद्देश्य बुनियादी ढांचे और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़े विभिन्न आंकड़ों को एक साझा डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराना है, जिससे परियोजनाओं की योजना और आकलन में मदद मिल सके.

इस व्यवस्था के जरिए परिवहन नेटवर्क, सार्वजनिक सुविधाओं, भूमि रिकॉर्ड और दूरसंचार बुनियादी ढांचे से जुड़ी जानकारियों को एक साथ देखा जा सकता है.

65 से अधिक सॉफ्टवेयर मॉड्यूल और 100 से ज्यादा ऐप विकसित

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार, पीएम गतिशक्ति पहल के तहत 65 से अधिक सॉफ्टवेयर मॉड्यूल और टूल विकसित कर एकीकृत किए गए हैं. इसके अलावा 100 से अधिक मोबाइल और वेब एप्लिकेशन भी तैयार किए गए हैं.

ये डिजिटल संसाधन विभिन्न मंत्रालयों, विभागों और क्षेत्रों से संबंधित बुनियादी ढांचे के आंकड़ों को एक साझा ढांचे में लाने में मदद करते हैं. सरकार की इस पहल का व्यापक उद्देश्य बुनियादी ढांचा विकास में बेहतर समन्वय स्थापित करना और लॉजिस्टिक्स की दक्षता बढ़ाना है.
 


महाराष्ट्र के किसानों को दिवाली से पहले मिलेंगे ₹5,000, सूखे से राहत के लिए सरकार का बड़ा फैसला

राज्य सरकार ने सूखे से संबंधित ताजा रिपोर्टों के आधार पर 40 नए तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित किया है. इन क्षेत्रों में बारिश की कमी के कारण खेती प्रभावित हुई है और किसानों को फसल नुकसान की आशंका का सामना करना पड़ रहा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 14 October, 2026
Last Modified:
Wednesday, 14 October, 2026
BWHindia

महाराष्ट्र में बारिश की कमी और सूखे की मार झेल रहे किसानों को दिवाली से पहले आर्थिक राहत मिलेगी. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की सरकार ने प्रभावित किसानों के बैंक खातों में ₹5,000 की अग्रिम सहायता राशि ट्रांसफर करने का फैसला किया है. इसके साथ ही राज्य के 40 नए तालुकों को भी सूखाग्रस्त घोषित किया गया है. सरकार ने इस बार नवंबर के बजाय अक्टूबर में ही सूखे को लेकर सरकारी आदेश जारी किया है, ताकि किसानों तक जल्द राहत पहुंचाई जा सके.

दिवाली से पहले किसानों को मिलेगी आर्थिक मदद

महाराष्ट्र के कई हिस्सों में बारिश की कमी के कारण फसलों पर असर पड़ा है. इससे किसानों के सामने आर्थिक संकट गहरा गया है. त्योहारी सीजन को देखते हुए राज्य सरकार ने किसानों को तत्काल आर्थिक सहायता देने का फैसला किया है. मुंबई के सह्याद्रि गेस्ट हाउस में हुई कैबिनेट बैठक में सूखे से प्रभावित किसानों को ₹5,000 की अग्रिम राशि देने पर सहमति बनी. सरकार का उद्देश्य राहत राशि को जल्द से जल्द किसानों के खातों तक पहुंचाना है, ताकि सूखे के कारण आर्थिक परेशानी झेल रहे किसान दिवाली के खर्चों को पूरा कर सकें.

अक्टूबर में ही सूखा घोषित, जारी हुआ सरकारी आदेश

महाराष्ट्र में आमतौर पर सूखे की आधिकारिक घोषणा नवंबर के आखिर तक की जाती है. हालांकि, इस साल हालात की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार ने अक्टूबर में ही सूखा घोषित कर दिया है. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बताया कि इस संबंध में सरकारी आदेश (जीआर) भी जारी कर दिया गया है.

सरकार का मानना है कि सूखे से राहत देने की प्रशासनिक प्रक्रिया में समय लग सकता है. ऐसे में पूरी प्रक्रिया का इंतजार करने के बजाय किसानों को पहले अग्रिम सहायता देने का फैसला किया गया है. इससे प्रभावित किसानों को तत्काल आर्थिक मदद मिल सकेगी.

40 नए तालुका भी सूखाग्रस्त घोषित

राज्य सरकार ने सूखे से संबंधित ताजा रिपोर्टों के आधार पर 40 नए तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित किया है. इन क्षेत्रों में बारिश की कमी के कारण खेती प्रभावित हुई है और किसानों को फसल नुकसान की आशंका का सामना करना पड़ रहा है.

सरकार ने प्रभावित इलाकों में राहत कार्यों में तेजी लाने पर जोर दिया है, ताकि किसानों को समय पर सहायता मिल सके. ₹5,000 की अग्रिम राशि के अलावा फसल नुकसान की भरपाई के लिए आगे भी आर्थिक मदद दिए जाने की बात कही गई है.

एकनाथ शिंदे बोले- किसानों की दिवाली फीकी नहीं होने देंगे

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने कहा कि सरकार किसानों से किए गए वादे को पूरा कर रही है. उन्होंने कहा कि सरकार ने पहले ही तय किया था कि किसानों की दिवाली फीकी नहीं होने दी जाएगी. इसी प्रतिबद्धता के तहत किसानों के बैंक खातों में ₹5,000 की अग्रिम सहायता राशि भेजने का फैसला किया गया है.

शिंदे ने यह भी स्पष्ट किया कि यह तत्काल राहत है और आने वाले समय में किसानों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए अतिरिक्त आर्थिक सहायता देने पर भी कदम उठाए जाएंगे.
 


बॉम्बे रेयॉन: प्रमोटर परिवार का समानांतर साम्राज्य

बॉम्बे रेयॉन पर ₹7,358 करोड़ का सार्वजनिक धन बकाया रहते हुए कंपनी का अंत हो गया. तारापुर में एक समानांतर कपड़ा साम्राज्य अब भी चल रहा है. क्या बॉम्बे रेयॉन के कर्जदाताओं, परिसमापक और जांच एजेंसियों को इसकी जानकारी है?

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Published - Wednesday, 14 October, 2026
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Wednesday, 14 October, 2026
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पलक शाह

तारापुर में कपड़ा साम्राज्य

बॉम्बे रेयॉन के परिसमापक के पास नीलामी के लिए फ्लैट, दो कारें और 196 लूम कार्ड बचे थे. कंपनी के कर्मचारियों को प्रति रुपये के दावे पर सिर्फ 14 पैसे मिले. लेकिन उसी औद्योगिक क्षेत्र में कपड़ा कारोबार की एक दूसरी कंपनी चल रही है. इसमें 41.13% हिस्सेदारी रखने वाली निजी कंपनी ने कभी कंपनी रजिस्ट्रार के पास बॉम्बे रेयॉन के अपने ईमेल पते का इस्तेमाल करते हुए दस्तावेज दाखिल किए थे.

बॉम्बे रेयॉन फैशंस लिमिटेड खुद को भारत की सबसे बड़ी शर्ट निर्माता कंपनी बताती थी. इसके 13 प्लांट थे. कंपनी हर साल 10 करोड़ मीटर कपड़ा बनाती थी और इसमें करीब 38,000 कर्मचारी काम करते थे. एक समय इसके शेयर ₹400 से ऊपर कारोबार करते थे.

2013 से 2017 के बीच भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की अगुवाई वाले सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के एक समूह ने कंपनी को तीन बार संकट से उबारा. अगस्त 2018 में एसबीआई ने ₹2,260.79 करोड़ के अपने कर्ज एक्सपोजर को ₹900 करोड़ में बेच दिया. जून 2022 में ₹1.61 करोड़ का बकाया रखने वाले एक धागा कारोबारी की याचिका पर कंपनी को दिवाला प्रक्रिया में शामिल किया गया. 9 नवंबर 2023 को ₹7,358.95 करोड़ के स्वीकार किए गए दावों के साथ कंपनी को परिसमापन में भेजने का आदेश दिया गया.

बैंकों की ओर से कंपनी को बचाने की ये तीनों कोशिशें सामान्य प्रक्रिया नहीं थीं. 2013 में एसबीआई के नेतृत्व वाले कर्जदाताओं के समूह ने कॉरपोरेट डेट रिस्ट्रक्चरिंग (सीडीआर) व्यवस्था के तहत बॉम्बे रेयॉन के करीब ₹4,000 करोड़ के कर्ज का पुनर्गठन किया. 2016 में मामला ज्वाइंट लेंडर्स फोरम के पास पहुंचा. 2017 में एक खबर आई कि कंपनी ने कर्मचारियों के भविष्य निधि (पीएफ) अंशदान का दुरुपयोग किया है. इसके बाद एसबीआई ने कंपनी को स्ट्रेस्ड एसेट्स के सस्टेनेबल स्ट्रक्चरिंग की योजना (एस4ए) के तहत रखा. इस व्यवस्था में प्रमुख बैंक को प्रमाणित करना होता है कि मौजूदा नकदी प्रवाह से कम से कम आधे कर्ज का भुगतान किया जा सकता है.

इस प्रमाणन के 14 महीने बाद एसबीआई ने ₹1,361 करोड़ के डिस्काउंट पर कर्ज बेच दिया. पांच साल बाद कंपनी का परिसमापन हो गया.

2,027 कर्मचारियों ने कुल ₹29.93 करोड़ का दावा किया था, लेकिन इनमें से सिर्फ ₹4.10 करोड़ स्वीकार किए गए.

जुलाई 2024 में परिसमापक ने पूरी बची हुई कंपनी को चालू कारोबार के रूप में ₹18.32 करोड़ के आरक्षित मूल्य पर बेचने की पेशकश की. इसके बाद से वह बेंगलुरु में फ्लैट, एक टोयोटा इनोवा, एक स्कोडा कोडियाक, बेल्लारी में एक पवनचक्की और 196 इलेक्ट्रिकल लूम कार्ड की नीलामी करता रहा है. रिकॉर्ड में सबसे हालिया नोटिस 10 जून 2026 का है.

बॉम्बे रेयॉन का अंत यहीं हो गया

लेकिन कॉरपोरेट पतन का एक ऐसा पहलू भी है, जिसकी कोई जांच नहीं करता.

बैंक अपने नुकसान को बट्टे खाते में डाल देता है, कर्मचारियों को प्रति रुपये पर 14 पैसे मिलते हैं, फाइल परिसमापक के पास चली जाती है और कहानी खत्म हो जाती है. लेकिन इस मामले में सार्वजनिक रिकॉर्ड बताते हैं कि कहानी खत्म नहीं हुई. बॉम्बे रेयॉन से जुड़े लोग और उसके आसपास की संरचनाएं कंपनी के साथ गायब नहीं हुईं.

प्रमोटर परिवार के उपनाम वाली एक कंपनी, जिसमें बॉम्बे रेयॉन के अपने वित्त प्रमुख और कर्मचारी हिस्सेदार हैं, उसी औद्योगिक क्षेत्र में एक चालू स्पिनिंग मिल को नियंत्रित करती है. इस तथ्य को साबित करने वाले सभी दस्तावेज सार्वजनिक रिकॉर्ड में उपलब्ध हैं. कोई भी बैंक अधिकारी, समाधान पेशेवर या जांचकर्ता इन्हें देख सकता है. इनके लिए किसी विशेष वारंट या समन की जरूरत नहीं है.

गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (एसएफआईओ) ने जांच शुरू कर दी है. फाइलों में उसे क्या मिलेगा, यह इस रिपोर्ट में बताया गया है.

समानांतर साम्राज्य: लिनेन आर्ट

मुंबई से 80 किलोमीटर उत्तर में एमआईडीसी तारापुर औद्योगिक क्षेत्र स्थित है. इसी क्षेत्र में बॉम्बे रेयॉन का प्रोसेसिंग कॉम्प्लेक्स था. यहां एक दूसरी कपड़ा कंपनी भी चल रही है.

लिनेन आर्ट प्राइवेट लिमिटेड प्लॉट डी-8 में 12,544 स्पिंडल संचालित करती है. एक क्रेडिट रेटिंग आकलन में इसे भारत का तीसरा सबसे बड़ा लिनेन यार्न निर्माता बताया गया है. इसका परिचालन लाभ 2020-21 में ₹24.64 करोड़ से बढ़कर 2022-23 में ₹35.21 करोड़ हो गया. कंपनी के पास मशीनरी, कर्मचारी और ऑडिट किए गए खाते हैं.

लिनेन आर्ट का गठन 27 दिसंबर 2013 को हुआ था. यह बॉम्बे रेयॉन के बोर्ड द्वारा 19 जुलाई 2013 को पहले कॉरपोरेट डेट रिस्ट्रक्चरिंग को मंजूरी दिए जाने के पांच महीने बाद की बात है.

कंपनी के रिकॉर्ड में इसके संस्थापक निदेशकों के रूप में प्रशांत जनार्दन अग्रवाल और अमन अग्रवाल के नाम दर्ज हैं. उस समय दोनों बॉम्बे रेयॉन फैशंस के निदेशक थे.

31 मार्च 2023 की स्थिति के अनुसार, लिनेन आर्ट के सदस्यों का रजिस्टर 11 नामों का है. कुल 3.89 करोड़ शेयरों में से सबसे बड़ी हिस्सेदारी एशवेल टेक्सटाइल्स प्राइवेट लिमिटेड के पास है. इसके पास 1.60 करोड़ शेयर यानी 41.13% हिस्सेदारी है.

इसके अतिरिक्त 21.98% हिस्सेदारी छह कंपनियों के पास है. इन सभी कंपनियों का पंजीकृत पता एक ही है: रूम नंबर 5, सातवीं मंजिल, 2ए गणेश चंद्र एवेन्यू, कोलकाता 700013.

लेकिन इस कहानी में एशवेल टेक्सटाइल्स सबसे महत्वपूर्ण है.

8 दिसंबर 2007 को एशवेल टेक्सटाइल्स प्राइवेट लिमिटेड, जिसका सीआईएन U17299MH2006PTC163103 है, ने कंपनी रजिस्ट्रार के पास फॉर्म 20बी पर अपना वार्षिक रिटर्न दाखिल किया.

कंपनी के वैधानिक ईमेल पते वाले कॉलम में, जिसके माध्यम से कंपनी रजिस्ट्रार उससे संपर्क करता है, यह पता दर्ज था: [mail@bombayrayon.com]

इस रिटर्न पर निदेशक चंद्रेश कल्याणजी देधिया ने डिजिटल हस्ताक्षर किए थे. उनका डीआईएन 01436487 है. हस्ताक्षर के साथ जुड़े प्रमाणपत्र में ईमेल पता [chandresh.dedhia@bombayrayon.com]दर्ज है.

उस वर्ष की शेयरधारिता एक ही श्रेणी में दर्ज की गई थी: “निदेशक या निदेशकों के रिश्तेदार — 100.00”. दो शेयरधारक थे. चुकता पूंजी ₹1,00,000 थी, जबकि अधिकृत पूंजी ₹3.5 करोड़ थी.

यानी प्रमोटर परिवार के उपनाम वाली एक निजी कंपनी कंपनी रजिस्ट्रार से उसी सूचीबद्ध कंपनी के ईमेल डोमेन के जरिए संपर्क कर रही थी.

बारह साल बाद एशवेल टेक्सटाइल्स के पास 29,19,150 शेयर और 21 शेयरधारक थे. इनमें से चार नाम सामान्य निवेशकों के नहीं हैं.

ए. आर. मुंद्रा — आशाराम मुंद्रा, डीआईएन 00019234 — बॉम्बे रेयॉन फैशंस के कार्यकारी निदेशक (वित्त) और मुख्य वित्त अधिकारी थे. वह 31 दिसंबर 2021 तक इस पद पर रहे. कंपनी के पतन के दौरान उसके खातों पर हस्ताक्षर करने वाले इस व्यक्ति के पास उस कंपनी के 23,450 शेयर हैं, जो लिनेन आर्ट को नियंत्रित करती है.

5.93% हिस्सेदारी रखने वाले गंगाधर कोटियन बॉम्बे रेयॉन के कर्मचारी हैं. उनका नाम 5 अगस्त 2026 के एसएफआईओ समन में भी है, जिसने इस जांच की शुरुआत की. बॉम्बे रेयॉन की दिवाला प्रक्रिया के दौरान उन्होंने खुद ₹28,64,199 का दावा दाखिल किया, जिसे पूरी तरह स्वीकार कर लिया गया. उन्होंने 33 कर्मचारियों के दावों के लिए अधिकृत प्रतिनिधि के रूप में भी काम किया. इनमें कंपनी के चेयरमैन अमन जनार्दन अग्रवाल का ₹2,15,15,008 का दावा भी शामिल था. पूरी फाइल में यह एकमात्र कर्मचारी दावा था, जिस पर “संबंधित पक्ष: हां” का निशान लगा था. इसे भी पूरी तरह स्वीकार किया गया.

सुधीर गोयल और स्मिता गोयल के पास नवी मुंबई के ऐरोली स्थित एक ही फ्लैट के पते पर दर्ज हिस्सेदारी है. दोनों के पास मिलाकर 8.54% हिस्सेदारी है. सुधीर गोयल ने बॉम्बे रेयॉन के खिलाफ कर्मचारी के रूप में ₹22,81,041 का दावा किया था, जिसे पूरा स्वीकार कर लिया गया. वह प्राध्वी मल्टीट्रेड और ग्रीन शील्ड एंटरप्राइजेज के निदेशक भी हैं. ये उन चार कंपनियों में शामिल हैं, जिनके बॉम्बे रेयॉन के खिलाफ ₹162 करोड़ के दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया गया था.

चंद्रेश देधिया और नाजिम खान, जो 2007 में मूल शेयरधारक थे और जिन्होंने बॉम्बे रेयॉन के ईमेल पते वाले दस्तावेज दाखिल किए थे, अब भी शेयरधारकों के रजिस्टर में मौजूद हैं.

बाकी शेयरधारकों के पते सामान्य आवासीय इलाकों के हैं. इनमें कांदिवली, बोरीवली, मलाड, मुलुंड, ठाणे, वसई और गोरेगांव के फ्लैट शामिल हैं. एक शेयरधारक, जिसके पास 5.20% हिस्सेदारी है, ने घाटकोपर पश्चिम में एक चॉल का पता दिया है.

21 में से 19 शेयरधारकों की हिस्सेदारी 3.6% से 7.0% के बीच है. किसी की भी हिस्सेदारी 7.04% से अधिक नहीं है. रजिस्टर में किसी भी कॉरपोरेट इकाई का नाम नहीं है. कागजों पर कोई भी कंपनी को नियंत्रित नहीं करता.

एशवेल टेक्सटाइल्स ने अपने 2019 के लेटरहेड पर पंजीकृत कार्यालय का पता 402, चौथी मंजिल, कमला हब, एन.एस. रोड नंबर 1, जुहू स्कीम, विले पार्ले (पश्चिम) दर्ज किया है. यही पता एपिक यार्न्स प्राइवेट लिमिटेड ने कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय को दिया है. एपिक यार्न्स का गठन अगस्त 2019 में प्रशांत अग्रवाल के बेटों आयुष और अक्षत अग्रवाल ने किया था.

दोनों रजिस्टरों पर हस्ताक्षर करने वाला व्यक्ति

31 मार्च 2019 की तारीख वाली एशवेल टेक्सटाइल्स के 21 शेयरधारकों की सूची के निचले हिस्से में निदेशक शितांशु बिपिन वोरा के हस्ताक्षर हैं.

लिनेन आर्ट के सदस्यों का रजिस्टर, जिसकी तारीख 9 अगस्त 2023 है और जिसमें एशवेल टेक्सटाइल्स की 41.13% हिस्सेदारी दर्ज है, उस पर भी उसी व्यक्ति ने उसी पदनाम से हस्ताक्षर किए हैं.

वह इस हिस्सेदारी के दोनों पक्षों में मौजूद हैं. वह प्रमाणित करते हैं कि लिनेन आर्ट की मालिक कंपनी का मालिक कौन है और यह भी प्रमाणित करते हैं कि उसी कंपनी के पास लिनेन आर्ट की हिस्सेदारी है.

शितांशु वोरा खुद भी लिनेन आर्ट के दूसरे सबसे बड़े शेयरधारक हैं. उनके नाम पर 19.52% हिस्सेदारी है. माटुंगा के उसी पते पर रहने वाली शीतल वोरा के पास अतिरिक्त 5,000 शेयर हैं. लिनेन आर्ट की 15.42% हिस्सेदारी रखने वाली मेयूबेन वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक भी वोरा दिसंबर 2012 से हैं.

उनकी व्यक्तिगत हिस्सेदारी और जिन दो कंपनियों के बोर्ड में वह हैं, उनकी हिस्सेदारी को जोड़ने पर लिनेन आर्ट की करीब 76% हिस्सेदारी शितांशु वोरा या उनके द्वारा निर्देशित कंपनियों के नियंत्रण में आती है.

डीआईएन 00054986 के तहत दाखिल उनके कॉरपोरेट रिकॉर्ड में 22 कंपनियों का उल्लेख है. इनमें से तीन संबंध महत्वपूर्ण हैं.

वह जनवरी 2006 से जनवरी 2017 तक क्लिनवेंट रियल एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड के पूर्णकालिक निदेशक थे. नवंबर 2018 तक वह इसके बोर्ड में बने रहे. सार्वजनिक निदेशक रिकॉर्ड के अनुसार, यह कंपनी प्रशांत अग्रवाल से जुड़ी हुई है. यानी लिनेन आर्ट के अस्तित्व में आने से सात साल पहले से वह इस कंपनी में पूर्णकालिक कार्यकारी थे.

वह अगस्त 2019 में एपिक यार्न्स के गठन के दिन से अप्रैल 2021 तक इसके निदेशक रहे. एपिक यार्न्स ने कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय के पास जो ईमेल पता दर्ज कराया था, वह [shitanshu.vora@linenart.in] है.

अक्टूबर 2019 में वह स्कॉट्स गारमेंट्स लिमिटेड के बोर्ड में शामिल हुए.** बेंगलुरु की इस कंपनी के पूर्व निदेशकों में प्रशांत और अमन अग्रवाल दोनों शामिल थे. लिनेन आर्ट में उनके सह-निदेशक विमल कुमार गोयनका भी इससे जुड़े थे. अग्रवाल आठ साल पहले इस कंपनी से जा चुके थे. लेकिन यहां एक समान क्रम दिखाई देता है: दो अलग-अलग कंपनियों में पहले अग्रवाल बोर्ड में आते हैं और बाद में वोरा तथा गोयनका.

दिसंबर 2018 से फरवरी 2020 के बीच, यानी बॉम्बे रेयॉन के तारापुर कारोबार को उससे अलग किए जाने से पहले के 18 महीनों में, वोरा ने कपड़ा और उससे जुड़े क्षेत्रों की आठ कंपनियों के बोर्ड में पद संभाले. इनमें एशवेल टेक्सटाइल्स भी शामिल थी.

एशवेल टेक्सटाइल्स की शेयरधारिता, बॉम्बे रेयॉन के ईमेल डोमेन से 2007 में दाखिल दस्तावेज और अग्रवाल परिवार की कंपनियों से उनके संबंधों पर शितांशु बिपिन वोरा और लिनेन आर्ट प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक विमल कुमार गोयनका को ईमेल के जरिए विस्तृत सवाल भेजे गए. दोनों ने कोई जवाब नहीं दिया.

एशवेल नाम की दो कंपनियां

एशवेल नाम दो अलग-अलग कंपनियों में दिखाई देता है. इन दोनों के बीच का अंतर इस पूरी कहानी का अहम हिस्सा है.

एशवेल होल्डिंग कंपनी प्राइवेट लिमिटेड बॉम्बे रेयॉन की घोषित प्रमोटर इकाई थी, जिसके पास सूचीबद्ध कंपनी की 7.92% हिस्सेदारी थी. 31 मार्च 2016 की स्थिति के अनुसार, इसके शेयरधारकों के रजिस्टर में नीदरलैंड के एम्स्टेलवीन स्थित क्रिज्समैन 15-8 के पते वाली एएए यूनाइटेड बी.वी. के पास इसके कुल 86.38 करोड़ शेयरों में से 85.84 करोड़ शेयर थे. यानी 99.38% हिस्सेदारी. शेष हिस्सेदारी रेनॉल्ड शर्टिंग लिमिटेड के पास थी. अमन अग्रवाल और प्रशांत अग्रवाल के नाम पर भी 25,000-25,000 शेयर थे.

नीदरलैंड की कंपनी एएए यूनाइटेड बी.वी. ने अप्रैल 2009 में ₹333 करोड़ में बॉम्बे रेयॉन की 20.67% हिस्सेदारी खरीदी थी. बाद में उसके पास परिवार की घोषित प्रमोटर इकाई एशवेल होल्डिंग की 99.38% हिस्सेदारी और सूचीबद्ध कंपनी की सीधे अपने नाम पर 13.83% हिस्सेदारी आ गई. इस डच कंपनी के पीछे कौन है और उसने प्रमोटर होल्डिंग कंपनी का नियंत्रण किस कीमत पर हासिल किया, इसका विवरण भारतीय रिकॉर्ड में नहीं है. एसएफआईओ, सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय इसकी जांच कर सकते हैं.

दोनों कॉरपोरेट शेयरधारक खुद बॉम्बे रेयॉन के प्रमोटर समूह का हिस्सा थे. एएए यूनाइटेड बी.वी. के पास सूचीबद्ध कंपनी की सीधे 13.83% हिस्सेदारी थी, जबकि रेनॉल्ड शर्टिंग के पास 3.98% हिस्सेदारी थी.

इस तरह एक एशवेल कंपनी का स्वामित्व खुले तौर पर परिवार और एक डच इकाई के पास था. इसी कंपनी के पास उस कंपनी में परिवार की घोषित हिस्सेदारी थी, जो बाद में विफल हो गई.

दूसरी एशवेल कंपनी ने बॉम्बे रेयॉन के ईमेल पते का इस्तेमाल कर दस्तावेज दाखिल किए. इसमें कंपनी के वित्त प्रमुख और कर्मचारी हिस्सेदार हैं और यह उस कारोबार में नियंत्रणकारी हिस्सेदारी रखती है, जो अब भी चल रहा है.

दोनों कंपनियों के दस्तावेजों पर, जहां जरूरी था, एक ही निदेशक के हस्ताक्षर हैं.

यह जानने के लिए गहन जांच जरूरी है कि क्या बॉम्बे रेयॉन से कोई पैसा दूसरी जगह भेजा गया था, क्या एशवेल टेक्सटाइल्स एक नाममात्र की स्वामित्व संरचना है या इन कंपनियों का संचालन एक इकाई के रूप में किया गया था.

एसएफआईओ बॉम्बे रेयॉन की जांच कर रहा है, लेकिन उसकी प्रक्रिया और कामकाज बेहद धीमा है. जांच को अधिकृत करने वाला एसएफआईओ का आदेश 30 अक्टूबर 2025 का है. रिकॉर्ड में पहला समन नौ महीने से अधिक समय बाद, 5 अगस्त 2026 को जारी किया गया.

रिकॉर्ड एक सवाल खड़ा करते हैं, जिसका जवाब दस्तावेजों में मौजूद है.

एशवेल टेक्सटाइल्स में 21 शेयरधारकों की हिस्सेदारी के लिए पैसा किसने दिया और इसका लाभ किसे मिल रहा है?

2007 में इस कंपनी के दो शेयरधारक और ₹1 लाख की पूंजी थी. 2019 तक इसके 21 शेयरधारक, 29.19 लाख शेयर और तारापुर की एक स्पिनिंग मिल में नियंत्रणकारी हिस्सेदारी थी.

इन दोनों स्थितियों के बीच की दूरी तय करने के लिए किसी ने पैसा लगाया था.

अगली कड़ी: एक ही साल में लिनेन आर्ट में आए ₹100 करोड़, वह कर्जदाता जिसने बॉम्बे रेयॉन का कर्ज ₹1,361 करोड़ के डिस्काउंट पर खरीदा और सप्लायर के ₹483 करोड़ के वे बिल, जिनका हिसाब बॉम्बे रेयॉन की अपनी बहीखातों में नहीं मिल सका.

यह रिपोर्ट कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय, भारतीय दिवाला एवं शोधन अक्षमता बोर्ड और स्टॉक एक्सचेंजों के पास दाखिल रिकॉर्ड तथा बॉम्बे रेयॉन फैशंस लिमिटेड की वार्षिक रिपोर्टों पर आधारित है. शितांशु बिपिन वोरा और विमल कुमार गोयनका को ईमेल के जरिए विस्तृत सवाल भेजे गए थे, लेकिन उन्होंने जवाब नहीं दिया.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.

19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)


AI और डेटा सेंटर उपकरण बनाएगा अडानी ग्रुप, अमेरिकी कंपनी के साथ 50:50 JV की तैयारी

AI रैक, सर्वर, स्टोरेज और कूलिंग सिस्टम का होगा निर्माण, भारत के साथ विदेशी बाजारों में भी सप्लाई की योजना

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Published - Wednesday, 14 October, 2026
Last Modified:
Wednesday, 14 October, 2026
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अडानी ग्रुप अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डेटा सेंटर से जुड़े उपकरणों के निर्माण कारोबार में उतरने की तैयारी कर रहा है. ग्रुप की फ्लैगशिप कंपनी अडानी एंटरप्राइजेज ने अमेरिकी कंपनी Jabil Inc. के साथ 50:50 जॉइंट वेंचर (JV) बनाने के लिए समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं. इस साझेदारी के तहत भारत में AI और डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े उपकरणों का निर्माण किया जाएगा. कंपनियों की योजना इन उपकरणों की आपूर्ति घरेलू बाजार के साथ दूसरे देशों में भी करने की है.

प्रस्तावित जॉइंट वेंचर के तहत AI रैक, सर्वर, स्टोरेज और नेटवर्किंग उपकरण बनाए जाएंगे. इसके अलावा, पावर डिस्ट्रीब्यूशन यूनिट, लिक्विड कूलिंग सिस्टम और ट्रांसफॉर्मर का भी निर्माण किया जाएगा. ये उपकरण बड़े डेटा सेंटर और हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग सिस्टम के संचालन के लिए जरूरी होते हैं. हालांकि, इस साझेदारी को आगे बढ़ाने के लिए दोनों कंपनियों को अंतिम समझौता करना होगा और आवश्यक मंजूरियां हासिल करनी होंगी.

कई गीगावॉट क्षमता वाले AI रैक बनाने की योजना

प्रस्तावित JV के तहत कई गीगावॉट क्षमता वाले AI रैक बनाने की योजना है. AI रैक में हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग सिस्टम को एकीकृत किया जाता है, जिनका इस्तेमाल बड़े AI मॉडल को प्रशिक्षित करने, डेटा प्रोसेसिंग और अन्य कंप्यूटिंग कार्यों में होता है. कंपनियां उपकरणों के निर्माण के साथ उनकी इंस्टॉलेशन और कमीशनिंग से जुड़ी सेवाएं भी उपलब्ध कराएंगी.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस साझेदारी से अडानी ग्रुप को AI और डेटा सेंटर के लिए जरूरी हार्डवेयर निर्माण के क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाने का अवसर मिलेगा. वहीं, Jabil की मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं का इस्तेमाल भारत में उपकरणों के उत्पादन और उनकी आपूर्ति के लिए किया जा सकेगा.

2030 तक 8 गीगावॉट तक पहुंच सकती है डेटा सेंटर क्षमता

भारत में डेटा सेंटर की क्षमता 2030 तक 5 से 8 गीगावॉट तक पहुंचने का अनुमान है. AI का बढ़ता इस्तेमाल, क्लाउड सेवाओं का विस्तार और देश के भीतर डेटा स्टोर करने की जरूरत इस क्षेत्र की मांग बढ़ा रही है.

कंपनियों के मुताबिक, डेटा सेंटर, क्लाउड और AI से जुड़े क्षेत्रों में हाइपरस्केलर्स का प्रस्तावित निवेश 50 अरब डॉलर से अधिक हो सकता है. वहीं, अगले सात वर्षों में वैश्विक AI कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर बाजार में 3 लाख करोड़ डॉलर से अधिक के अवसर पैदा होने का अनुमान है. ऐसे में AI और डेटा सेंटर उपकरणों का निर्माण भारत में उभरते इंफ्रास्ट्रक्चर बाजार का अहम हिस्सा बन सकता है.

AI कारोबार में अडानी ग्रुप की बढ़ेगी मौजूदगी

अडानी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अडानी ने कहा कि AI के विकास के लिए केवल बेहतर एल्गोरिदम पर्याप्त नहीं हैं. इसके लिए ऊर्जा, डेटा सेंटर और एडवांस्ड कंप्यूटिंग से जुड़ा मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर भी जरूरी है. उनके मुताबिक, प्रस्तावित जॉइंट वेंचर से ग्रुप को AI के लिए आवश्यक उपकरणों के निर्माण के क्षेत्र में अवसर मिलेगा. Jabil के CEO माइक डस्टूर ने कहा कि इस साझेदारी से भारत और दुनिया के अन्य बाजारों में डेटा सेंटर उपकरणों की बढ़ती मांग को पूरा करने में मदद मिलेगी.

छह महीने में अडानी एंटरप्राइजेज के शेयर ने दिया 26.59% रिटर्न

इस घोषणा के बीच अडानी एंटरप्राइजेज का शेयर भी निवेशकों के रडार पर है. मंगलवार को BSE पर कंपनी का शेयर 2.39% की बढ़त के साथ 2,694 रुपये पर बंद हुआ. शेयर ने पिछले छह महीनों में 26.59% रिटर्न दिया है. हालांकि, जॉइंट वेंचर का वास्तविक कारोबारी असर उत्पादन क्षमता, अंतिम समझौते, जरूरी मंजूरियों और उपकरणों की मांग जैसे कारकों पर निर्भर करेगा. केवल साझेदारी की घोषणा के आधार पर कंपनी के भविष्य के प्रदर्शन का अनुमान नहीं लगाया जा सकता.
 


कमजोर मानसून से खरीफ फसलों पर संकट, मक्का-दालों की पैदावार घटी तो बढ़ सकती है महंगाई: रिपोर्ट

धान की बोआई में 3.5% और मक्के के रकबे में 2.9% की गिरावट, खाद्य आपूर्ति से लेकर कारोबार की लागत तक पर पड़ सकता है असर

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 14 October, 2026
Last Modified:
Wednesday, 14 October, 2026
BWHindia

कमजोर मानसून और अल नीनो की आशंका ने देश में खरीफ फसलों के उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ा दी है. जून से सितंबर के बीच दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान दीर्घकालीन औसत से 12.6% कम बारिश दर्ज की गई. इसका असर फसलों की बोआई पर भी दिखाई दे रहा है. 5 अक्टूबर तक खरीफ फसलों का कुल बोआई क्षेत्र पिछले साल की तुलना में 1.1% और कुल खाद्यान्न फसलों का रकबा 1.6% घट गया. धान, मक्का और दालों की पैदावार प्रभावित होने पर खाद्य आपूर्ति, कारोबार की लागत और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है.

डन एंड ब्रैडस्ट्रीट की रिपोर्ट के अनुसार, उत्पादन पर मौसम का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि फसलों के विकास के महत्वपूर्ण चरणों में बारिश, मिट्टी की नमी और तापमान की स्थिति कैसी रहती है. यदि प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में नमी की कमी और अधिक तापमान का असर लंबे समय तक बना रहता है, तो फसलों की पैदावार घट सकती है. इसका प्रभाव केवल कृषि क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खाद्य प्रसंस्करण, पशु आहार और अन्य कृषि आधारित उद्योगों की लागत पर भी पड़ सकता है.

धान की बोआई में 3.5% की गिरावट

भारत में चावल प्रमुख खाद्यान्न होने के साथ सार्वजनिक वितरण प्रणाली का भी अहम हिस्सा है. चावल मिलों और पैकेटबंद खाद्य पदार्थों के कारोबार में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है. रिपोर्ट के मुताबिक, 5 अक्टूबर तक धान का बोआई क्षेत्र पिछले साल के मुकाबले 3.5% कम रहा.

धान की फसल को विकास के दौरान पर्याप्त पानी और मिट्टी में नमी की जरूरत होती है. खासकर फसल के महत्वपूर्ण चरणों में पानी की कमी होने पर उसकी पैदावार प्रभावित हो सकती है. हालांकि, उत्पादन में संभावित गिरावट का आकलन इस बात से होगा कि फसल की स्थिति आगे कैसी रहती है और प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में बारिश की कमी कितनी गंभीर होती है.

सरकारी भंडार से चावल की आपूर्ति को सहारा

रिपोर्ट में कहा गया है कि दूसरे क्षेत्रों में फसलों की बेहतर स्थिति और सरकार के पास चावल का पर्याप्त भंडार होने से उत्पादन में मामूली गिरावट की भरपाई की जा सकती है. इससे खाद्यान्न की उपलब्धता पर तत्काल बड़े संकट की आशंका कम हो जाती है.

हालांकि, यदि उत्पादन में कमी अनुमान से अधिक होती है, तो सरकारी भंडार पर दबाव बढ़ सकता है. ऐसे में बाजार में चावल की उपलब्धता और कीमतों पर पड़ने वाले असर पर नजर रखना जरूरी होगा. फिलहाल सरकारी भंडार चावल की आपूर्ति में संभावित बाधाओं से निपटने के लिए एक अहम सुरक्षा कवच है.

मक्के का रकबा 2.9% घटा, उद्योगों की बढ़ सकती है लागत

मक्के के बोआई क्षेत्र में भी गिरावट दर्ज की गई है. 5 अक्टूबर तक इसका रकबा पिछले साल की तुलना में 2.9% कम रहा. मक्के की फसल में फूल आने और दाने भरने के दौरान मौसम प्रतिकूल रहने पर पैदावार को नुकसान पहुंचने की आशंका अधिक होती है.

मक्का केवल खाद्यान्न के रूप में ही इस्तेमाल नहीं होता, बल्कि पोल्ट्री, पशु आहार, मछली पालन, स्टार्च, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों और एथेनॉल उत्पादन के लिए भी महत्वपूर्ण कच्चा माल है. ऐसे में इसकी उपलब्धता घटने से कई उद्योगों की लागत बढ़ सकती है.

चावल के मुकाबले मक्के के लिए बड़ा सार्वजनिक भंडार उपलब्ध नहीं है, जिससे उत्पादन में कमी की भरपाई करना मुश्किल हो सकता है. यदि बाजार में मक्के की आपूर्ति घटती है, तो पोल्ट्री और पशुपालन क्षेत्र में चारे की कीमतें बढ़ सकती हैं. इसके अलावा, स्टार्च और एथेनॉल बनाने वाली कंपनियों की लागत पर भी दबाव पड़ सकता है.

हालांकि, कारोबार पर वास्तविक असर इस बात से तय होगा कि आपूर्ति में कितनी कमी आती है और कंपनियां दूसरे स्रोतों से खरीद, वैकल्पिक कच्चे माल या बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों तक पहुंचाने में कितनी सक्षम हैं.

अनाजों के बोआई क्षेत्र में भी गिरावट

रिपोर्ट के अनुसार, अनाजों के कुल बोआई क्षेत्र में 2.3% की कमी दर्ज की गई है. ऐसे में प्रमुख उत्पादक राज्यों में बारिश, मिट्टी की नमी और फसलों की मौजूदा स्थिति पर नजर रखना जरूरी है. यदि कई अनाज उत्पादक क्षेत्रों में एक साथ पैदावार प्रभावित होती है, तो दूसरे क्षेत्रों से आपूर्ति बढ़ाकर कमी की भरपाई करना कठिन हो सकता है.

दालों के मामले में घरेलू उत्पादन में कमी को आयात के जरिए पूरा किया जा सकता है. हालांकि, इससे आपूर्ति वैश्विक कीमतों और रुपये की विनिमय दर पर निर्भर हो जाती है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने या रुपये में कमजोरी आने पर आयात महंगा हो सकता है. ऐसे में दालों की आपूर्ति बनाए रखने के बावजूद घरेलू बाजार में लागत बढ़ने का जोखिम बना रहेगा.

पांच राज्यों की फसल स्थिति पर टिकी नजरें

मौसम की मार का कुल कृषि उत्पादन पर कितना असर पड़ेगा, यह प्रमुख उत्पादक राज्यों में फसलों की स्थिति पर निर्भर करेगा. रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश का 2025-26 में विश्लेषण किए गए 20 राज्यों के कुल खाद्यान्न उत्पादन में 37.7% योगदान रहा. इन राज्यों का संयुक्त उत्पादन 1,400.3 लाख टन था.

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इन प्रमुख उत्पादक राज्यों में फसलों की स्थिति एक साथ बिगड़ती है या नहीं. यदि कई राज्यों में एक साथ उत्पादन घटता है, तो दूसरे क्षेत्रों से अतिरिक्त आपूर्ति के जरिए इसकी भरपाई करना मुश्किल हो सकता है.

इन राज्यों में कृषि आधारित उद्योगों की मौजूदगी भी जोखिम को बढ़ाती है. महाराष्ट्र में अनाज और बीज आधारित पशु आहार बनाने वाले 21% उद्योग स्थित हैं, जबकि आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में चावल मिलों की बड़ी संख्या है. ऐसे में किसी एक क्षेत्र में फसल खराब होने के मुकाबले कई प्रमुख क्षेत्रों में एक साथ उत्पादन प्रभावित होना कारोबार के लिए ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकता है.

गेहूं-चावल के मुकाबले मक्का और दालों पर ज्यादा जोखिम

रिपोर्ट के अनुसार, गेहूं, चावल, मक्का, मोटे अनाज और दालों की अलग-अलग आपूर्ति व्यवस्थाओं के कारण कमजोर मानसून का असर पूरे खाद्यान्न बाजार में समान रूप से दिखाई देना जरूरी नहीं है. इसका प्रभाव कुछ खास कृषि जिंसों और उनसे जुड़े उद्योगों पर अधिक पड़ सकता है.

चावल और गेहूं के पर्याप्त सरकारी भंडार होने से उत्पादन में मामूली गिरावट का उपभोक्ता कीमतों पर तत्काल असर सीमित रह सकता है. इसके विपरीत, मक्का, दालों और कुछ खास क्षेत्रों से होने वाली आपूर्ति पर निर्भर कारोबार को उतनी सुरक्षा नहीं मिलती. इसलिए खाद्य महंगाई के सरकारी आंकड़ों में असर दिखने से पहले ही कंपनियों और कारोबारियों को कच्चे माल की बढ़ती लागत का सामना करना पड़ सकता है.

उत्पादन घटने से कब बढ़ेगी महंगाई?

कमजोर फसल का मतलब यह नहीं है कि महंगाई में तुरंत तेज उछाल आएगा. कीमतों पर वास्तविक दबाव तब बढ़ता है, जब उत्पादन में गिरावट इतनी बड़ी हो जाए कि मौजूदा भंडार, आयात और बाजार में उपलब्ध आपूर्ति से मांग पूरी करना मुश्किल होने लगे.

चावल और गेहूं के मामले में सरकारी भंडार अस्थायी कमी से निपटने में मदद कर सकते हैं. लेकिन मक्का और दालों जैसी फसलों के लिए यह सुरक्षा अपेक्षाकृत कमजोर है. इनकी मांग खाद्य पदार्थों, पशु आहार और औद्योगिक इस्तेमाल, तीनों क्षेत्रों से आती है. इसलिए आपूर्ति में कमी आने पर इनकी कीमतों में तेजी का असर अपेक्षाकृत जल्दी दिखाई दे सकता है.

आने वाले समय में मानसून की स्थिति, मिट्टी में नमी, प्रमुख राज्यों में फसलों की सेहत और उत्पादन के सरकारी अनुमानों पर नजर रहेगी. यदि मौसम संबंधी जोखिम बढ़ते हैं और पैदावार प्रभावित होती है, तो खाद्य आपूर्ति के साथ कृषि आधारित उद्योगों की लागत और महंगाई पर भी दबाव बढ़ सकता है.
 


शेयर बाजार में आज दबाव के संकेत, कच्चा तेल 107 डॉलर के करीब; इन शेयरों पर नजर

मंगलवार, 13 अक्टूबर को बीएसई सेंसेक्स 1,109.10 अंक यानी 1.54 फीसदी चढ़कर 73,033.78 पर बंद हुआ था. एनएसई निफ्टी भी 358.60 अंक यानी 1.60 फीसदी बढ़कर 22,721.95 पर पहुंच गया था.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 14 October, 2026
Last Modified:
Wednesday, 14 October, 2026
BWHindia

घरेलू शेयर बाजार में मंगलवार को जोरदार तेजी के बाद बुधवार को कमजोर शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं. गिफ्ट निफ्टी करीब 70 अंक गिरकर 22,800 के नीचे आ गया है, जबकि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच ब्रेंट क्रूड 107 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है. कच्चे तेल की महंगाई से भारत में महंगाई बढ़ने और बाहरी भुगतान संतुलन पर दबाव पड़ने की आशंका है. ऐसे में निवेशकों की नजर वैश्विक बाजारों के संकेतों, कंपनियों के तिमाही नतीजों और चुनिंदा शेयरों से जुड़ी खबरों पर रहेगी.

कल बाजार में आई थी जोरदार तेजी

मंगलवार, 13 अक्टूबर को बीएसई सेंसेक्स 1,109.10 अंक यानी 1.54 फीसदी चढ़कर 73,033.78 पर बंद हुआ था. एनएसई निफ्टी भी 358.60 अंक यानी 1.60 फीसदी बढ़कर 22,721.95 पर पहुंच गया था. इस तेजी से निवेशकों की संपत्ति में करीब 3 लाख करोड़ रुपये का इजाफा हुआ और सेंसेक्स की कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण बढ़कर लगभग 469 लाख करोड़ रुपये हो गया.

आईटी शेयरों में खरीदारी बाजार की तेजी की प्रमुख वजह रही. एचसीएल टेक्नोलॉजीज के मजबूत तिमाही नतीजों के बाद निफ्टी आईटी इंडेक्स में 5 फीसदी से अधिक की तेजी दर्ज की गई. सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 27 बढ़त के साथ बंद हुए. एचसीएल टेक्नोलॉजीज 8.28 फीसदी, टीसीएस 6.59 फीसदी, टेक महिंद्रा 4.90 फीसदी और इन्फोसिस 4.44 फीसदी चढ़े. दूसरी ओर, कोटक महिंद्रा बैंक, मारुति और इटरनल गिरावट के साथ बंद हुए.

कच्चे तेल और वैश्विक संकेतों पर नजर

बुधवार को बाजार के लिए कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें चिंता का विषय बनी हुई हैं. पश्चिम एशिया में तनाव और सऊदी अरब पर मिसाइल व ड्रोन हमलों के बाद आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका से ब्रेंट क्रूड करीब 1.2 फीसदी बढ़कर 106.86 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. अमेरिकी WTI क्रूड भी करीब 1.2 फीसदी चढ़कर 95.25 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता दिखा.

एशियाई बाजारों में मिला-जुला रुख रहा. जापान का निक्केई शुरुआती कारोबार में करीब 200 अंक चढ़ा और कोस्पी में 0.8 फीसदी की तेजी रही, जबकि हैंगसेंग और शंघाई बाजारों में कमजोरी दिखी. अमेरिकी बाजार मंगलवार को बैंकिंग और चिप कंपनियों के शेयरों में दबाव के बीच गिरावट के साथ बंद हुए.

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, कंपनियों के बेहतर नतीजे और आईटी शेयरों में तेजी घरेलू बाजार को सहारा दे रहे हैं, लेकिन पश्चिम एशिया का तनाव और महंगा कच्चा तेल सतर्कता बनाए रख सकते हैं. कमजोर वैश्विक संकेतों के कारण बाजार की शुरुआत दबाव में रह सकती है. आईटी शेयरों में तेजी निवेशकों की चुनिंदा कंपनियों की कमाई की संभावनाओं पर आधारित खरीदारी को दिखाती है.

इन कंपनियों के शेयरों पर रखें नजर

बायोकॉन: Genentech के साथ वैश्विक पेटेंट समझौते के बाद कंपनी को Pebrilzo को लाइसेंस के तहत लॉन्च करने की तारीखें मिली हैं.

हीरो मोटर्स: सितंबर तिमाही में कंपनी का शुद्ध मुनाफा बढ़कर 10.2 करोड़ रुपये हो गया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 4.73 करोड़ रुपये था. आय 24.9 फीसदी बढ़कर 319.3 करोड़ रुपये और EBITDA 92 फीसदी बढ़कर 35.9 करोड़ रुपये रहा. EBITDA मार्जिन 7.3 फीसदी से बढ़कर 11.3 फीसदी हो गया.

हुंडई मोटर समूह: कंपनी समूह ने 2026 से 2032 के बीच भारत में 15.5 अरब डॉलर निवेश करने की योजना बनाई है.

रेलटेल: कंपनी को ओडिशा सरकार के उच्च शिक्षा विभाग से 48.98 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट मिला है. इसके तहत 83 डिजिटल एप्लिकेशन मॉड्यूल तैयार किए जाएंगे और काम पूरा करने की समयसीमा 10 मई 2027 है.

भारत इलेक्ट्रॉनिक्स (BEL): कंपनी को 17 सितंबर के बाद से 533 करोड़ रुपये के अतिरिक्त ऑर्डर मिले हैं.

अडानी एंटरप्राइजेज: कंपनी ने भारत में एआई और डेटा सेंटर उपकरणों के निर्माण व असेंबली के लिए जैबिल के साथ शुरुआती गैर-बाध्यकारी समझौता किया है. प्रस्तावित संयुक्त उद्यम में दोनों कंपनियों की 50-50 फीसदी हिस्सेदारी होगी.

जायडस लाइफसाइंसेज: कंपनी के मोरैया संयंत्र में अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (US FDA) की 5 से 13 अक्टूबर तक हुई जांच में पांच टिप्पणियां दर्ज की गईं.

पॉलीकैब इंडिया: राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) ने कंपनी के खिलाफ दिवाला समाधान प्रक्रिया शुरू करने के 7 अक्टूबर के आदेश पर रोक लगा दी है. मामले में 2.79 करोड़ रुपये के कथित परिचालन बकाये का विवाद है.

बैंक ऑफ बड़ौदा: बैंक और 25 अन्य प्रतिवादियों के खिलाफ एनएमसी हेल्थकेयर समूह और यूएई एक्सचेंज के संस्थापक बीआर शेट्टी ने 15 अरब डॉलर के हर्जाने का मुकदमा दायर किया है. मामले में आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकला है.

एसबीआई फंड्स मैनेजमेंट: कंपनी ने आरएस श्रीनिवास जैन को संयुक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी और प्रमुख प्रबंधकीय कार्मिक नियुक्त किया है. नियुक्ति 13 अक्टूबर से प्रभावी है.

उज्जीवन स्मॉल फाइनेंस बैंक: बैंक का बोर्ड 16 अक्टूबर को सितंबर तिमाही और छमाही के अनऑडिटेड नतीजों पर विचार करेगा. साथ ही चुनिंदा निवेशकों को इक्विटी शेयर जारी कर पूंजी जुटाने के प्रस्ताव पर भी चर्चा होगी.

भारत कोकिंग कोल: कंपनी ने गैर-नियंत्रित क्षेत्र को आपूर्ति किए जाने वाले कच्चे कोकिंग कोल की कुछ श्रेणियों की कीमतों में 0.1 से 14 फीसदी तक बढ़ोतरी को मंजूरी दी है.

आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ इंश्योरेंस: सितंबर तिमाही में कंपनी का कर पश्चात मुनाफा 25 फीसदी बढ़कर 374 करोड़ रुपये रहा. नए कारोबार की वैल्यू 22.3 फीसदी बढ़कर 1,283 करोड़ रुपये हो गई.

टाटा एलेक्सी: कंपनी का तिमाही मुनाफा 10 फीसदी बढ़कर 170.3 करोड़ रुपये रहा, जबकि राजस्व 15 फीसदी बढ़कर 1,055.7 करोड़ रुपये पहुंच गया.

आनंद राठी शेयर एंड स्टॉक ब्रोकर्स: कंपनी का सितंबर तिमाही में मुनाफा 50.3 फीसदी बढ़कर 41.9 करोड़ रुपये और राजस्व 20.3 फीसदी बढ़कर 273.2 करोड़ रुपये रहा.

ट्रांसफॉर्मर्स एंड रेक्टिफायर्स इंडिया: कंपनी का तिमाही मुनाफा 135.3 फीसदी बढ़कर 79.8 करोड़ रुपये और राजस्व 60.7 फीसदी बढ़कर 739.4 करोड़ रुपये हो गया.

आज इन कंपनियों के नतीजों पर रहेगी नजर

बुधवार को आईसीआईसीआई लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस, एचडीबी फाइनेंशियल सर्विसेज, केनरा बैंक, बजाज कंज्यूमर केयर, भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स (BHEL), आदित्य बिड़ला मनी, सिएट, एलेकॉन इंजीनियरिंग, बिलियनब्रेन्स गैराज वेंचर्स (ग्रो की पेरेंट कंपनी) और टाटा टेक्नोलॉजीज के तिमाही नतीजे आने की उम्मीद है. निवेशक इन कंपनियों के मुनाफे, राजस्व और प्रबंधन की टिप्पणियों पर नजर रखेंगे, जिनसे संबंधित शेयरों की दिशा तय हो सकती है.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
 


JIO कैश मशीन: भारत का पहला ₹10 लाख करोड़ का IPO, नेट डेट से लगभग मुक्त

जियो के ₹27,500 करोड़ के कर्ज खत्म हो जाएंगे. फ्री कैश फ्लो 29 गुना बढ़ गया है. 524 मिलियन ग्राहक. एयरटेल से कम कीमत पर वैल्यूएशन. वे आंकड़े, जिन पर सुर्खियों में ध्यान नहीं दिया गया.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 13 October, 2026
Last Modified:
Tuesday, 13 October, 2026
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पलक शाह

वह कहानी, जिस पर सुर्खियों में ध्यान नहीं दिया गया

जियो प्लेटफॉर्म्स (JIO) के आईपीओ को लेकर पिछले दो सप्ताह से सुर्खियों में वैल्यूएशन में कटौती, निवेशकों की सौदेबाजी और एलन मस्क पर ध्यान केंद्रित किया गया है. सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा अब तक छिपा रहा है: ₹27,500 करोड़. यह वह राशि है, जिसका इस्तेमाल जियो अपनी टेलीकॉम इकाई रिलायंस जियो इन्फोकॉम द्वारा लिए गए कर्ज को समय से पहले चुकाने के लिए करेगा. 31 मार्च, 2026 को जियो का नेट डेट ₹27,579 करोड़ था.

चेक क्लियर होने के बाद लगभग ₹79 करोड़ का कर्ज बचेगा. कंपनी की नेट डेट की अपनी परिभाषा के अनुसार, जियो लगभग नेट-डेट-फ्री स्थिति में शेयर बाजार में सूचीबद्ध होगा.

एक कैश मशीन

कर्ज का आंकड़ा कहानी का सिर्फ एक हिस्सा है. इससे बड़ा बदलाव कैश फ्लो में आया है.

दो साल पहले जियो अपनी कमाई का लगभग पूरा हिस्सा 5G पर खर्च कर रहा था. वित्त वर्ष 2024 में EBITDA में से पूंजीगत खर्च घटाने पर मिलने वाली राशि, जो फ्री कैश का एक मोटा अनुमान है, केवल ₹1,449 करोड़ थी. यह वित्त वर्ष 2025 में बढ़कर ₹19,902 करोड़ और वित्त वर्ष 2026 में ₹42,071 करोड़ हो गई. यानी दो साल में लगभग 29 गुना वृद्धि हुई.

5G नेटवर्क तैयार हो चुका है. इसी अवधि में पूंजीगत खर्च ₹53,510 करोड़ से घटकर ₹34,184 करोड़ रह गया, जबकि कमाई लगातार बढ़ती रही. वित्त वर्ष 2026 में जियो ने ₹1.47 लाख करोड़ का राजस्व दर्ज किया, जो 15% अधिक है. कंपनी का EBITDA 51.9% मार्जिन के साथ ₹76,255 करोड़ रहा और शुद्ध लाभ ₹30,049 करोड़ दर्ज किया गया. दो साल में मुनाफा 40% बढ़ा है.

यही वजह है कि आईपीओ से एक भी रुपया आने से पहले जियो का नेट डेट वित्त वर्ष 2024 के ₹48,440 करोड़ से घटकर ₹27,579 करोड़ रह गया. मार्च में जियो के पास ₹43,202 करोड़ की नकदी और निवेश थे.

रुपये में गिरावट के बीच डॉलर का कर्ज चुकाना

जिन कर्जों को चुकाया जा रहा है, वे 16 वैश्विक बैंकों से डॉलर और येन में लिए गए कर्ज हैं. इनमें बैंक ऑफ अमेरिका, सिटी, एचएसबीसी, एमयूएफजी और एसबीआई शामिल हैं. 2020 के बाद से रुपये में लगभग 29% की गिरावट के कारण विदेशी मुद्रा में लिया गया कर्ज हर साल रुपये के लिहाज से महंगा होता गया है. आईपीओ से जियो इस जोखिम को खत्म कर सकेगा.

समय से पहले कर्ज चुकाने पर कोई जुर्माना भी नहीं लगेगा. कर्ज समझौतों में समय से पहले भुगतान की अनुमति "बिना किसी प्रीमियम या ब्रेक कॉस्ट" के दी गई है.

भारती से सस्ता

₹1,119 प्रति शेयर की कीमत पर जियो का वैल्यूएशन वित्त वर्ष 2026 की प्रति शेयर आय के लगभग 33 गुना पर है. इसके सबसे करीबी प्रतिद्वंद्वी भारती एयरटेल का वैल्यूएशन इसी प्रॉस्पेक्टस में 42 गुना था.

इस तुलना के आधार पर, ग्राहकों की संख्या के लिहाज से भारत का सबसे बड़ा टेलीकॉम ऑपरेटर, जिसके 524 मिलियन सब्सक्राइबर हैं, 268 मिलियन ग्राहक 5G का इस्तेमाल करते हैं और 27 मिलियन ग्राहक होम ब्रॉडबैंड से जुड़े हैं (जो भारत में सबसे अधिक है), अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी से सस्ता है.

प्रति यूजर औसत राजस्व (ARPU) दो साल में ₹182 से बढ़कर ₹214 प्रति माह हो गया है और प्रत्येक ग्राहक हर महीने 42 GB डेटा का इस्तेमाल करता है.

देश की चौथी सबसे मूल्यवान कंपनी बनने की राह पर

₹10.3 लाख करोड़ के वैल्यूएशन पर जियो भारत की चौथी सबसे मूल्यवान कंपनी के रूप में सूचीबद्ध होगा. इससे आगे रिलायंस (₹15.84 लाख करोड़), भारती एयरटेल (₹11.27 लाख करोड़) और एचडीएफसी बैंक (₹10.90 लाख करोड़) होंगे, जबकि जियो आईसीआईसीआई बैंक (₹9.72 लाख करोड़) से आगे होगा. यह भारत का पहला आईपीओ होगा, जिसका मूल्यांकन ₹10 लाख करोड़ से अधिक होगा. इससे पहले एलआईसी का वैल्यूएशन लगभग ₹6 लाख करोड़ था, जो उस समय एक मानक बना था.

इन कंपनियों के बीच अंतर कम है. लिस्टिंग के बाद जियो के शेयर में 6% की वृद्धि उसे एचडीएफसी बैंक से आगे कर देगी और 10% से भी कम की बढ़त उसे भारती एयरटेल से आगे पहुंचा देगी.

रिलायंस की छिपी हुई वैल्यू

रिलायंस के शेयरधारकों को भी वैल्यूएशन में बढ़ोतरी का फायदा मिलेगा. जियो में रिलायंस की लगभग 65% हिस्सेदारी आईपीओ मूल्य पर करीब ₹6.6 लाख करोड़ की है, जो रिलायंस के कुल बाजार मूल्य का लगभग 42% है. इसमें उसके तेल से लेकर केमिकल, रिटेल और न्यू-एनर्जी कारोबार की वैल्यू शामिल नहीं है.

2020 के निवेशकों का पैसा दोगुना हुआ

2020 में जियो में ₹1.52 लाख करोड़ निवेश करने वाले 13 वैश्विक निवेशकों का पैसा रुपये के लिहाज से दोगुने से अधिक हो गया है. ₹549 प्रति शेयर की कीमत पर निवेश करने वाले फंड का निवेश 2.04 गुना हो गया है, जबकि ₹488 प्रति शेयर की कीमत पर निवेश करने वाले मेटा और गूगल का निवेश 2.29 गुना हो गया है.

कर्ज-मुक्त होने के आंकड़े में क्या शामिल नहीं है

इसमें एक बड़ी अपवाद वाली देनदारी भी है. जियो पर अभी भी सरकार का ₹1.05 लाख करोड़ बकाया है, जो स्थगित स्पेक्ट्रम भुगतान से संबंधित है. इसका भुगतान आने वाले वर्षों में किस्तों में किया जाना है और इसे कंपनी के नेट डेट के आंकड़े में शामिल नहीं किया गया है. वित्त वर्ष 2026 में वित्त लागत बढ़कर ₹8,653 करोड़ होने की मुख्य वजह इस बकाया राशि पर लगने वाला ब्याज है. आईपीओ से इस देनदारी पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

कर्ज-मुक्त होने का यह मतलब भी नहीं है कि "विकास पर खर्च होने वाला हर रुपया मुनाफे में बदल जाएगा." जिन कर्जों को चुकाया जा रहा है, उन पर ब्याज दरें 1.4–5.18% के बीच हैं, इसलिए सालाना ब्याज की बचत सीमित होगी. आईपीओ से वास्तव में कंपनी की बैलेंस शीट में बदलाव आएगा. 4G और 5G नेटवर्क बनाने के लिए भारी कर्ज लेने वाली कंपनी अब सालाना ₹40,000 करोड़ से अधिक का फ्री कैश पैदा कर रही है और उस पर बैंक का नेट डेट लगभग न के बराबर है.

यह इश्यू 21 अक्टूबर को खुलेगा, लिस्टिंग से पता चलेगा कि निवेशक इस बदलाव को कितना महत्व देते हैं.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.

19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)