यदि आप इस लोकसभा चुनाव में पहली बार वोट करने वाले हैं, तो आपके लिए एयर इंडिया एक्सप्रेस खास गिफ्ट लेकर आई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Election 2024) में मतदाताओं को वोटिंग के लिए प्रोत्सहित करने के लिए तरह-तरह के अभियान चल रहे हैं. इस बीच, टाटा (Tata Group) की एयर एयरलाइन इंडिया एक्सप्रेस (Air India Express) फर्स्ट टाइम वोटर्स के लिए एक खास ऑफर लेकर आई है. एयर इंडिया एक्सप्रेस की तरफ से बताया गया है कि कंपनी लोकसभा चुनाव में पहली बार अपना मताधिकार का उपयोग करने वालों को किराए में 19% तक की विशेष छूट दी जाएगी. बता दें कि आम चुनाव के लिए पहले चरण की वोटिंग कल से शुरू हो रही है.
ये होंगे स्पेशल डिस्काउंट के पात्र
एयर इंडिया एक्सप्रेस युवाओं को मतदान को प्रेरित करने के लिए #VoteAsYouAre अभियान शुरू कर रही है. इसके तहत 18 से 22 साल के उन युवाओं को किराये में विशेष छूट मिलेगी, जो पहली बार मतदान के लिए हवाई यात्रा करेंगे. कंपनी की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि मतदाता को संबंधित निर्वाचन क्षेत्र के निकटतक हवाई अड्डे की यात्रा के लिए यह छूट मिलेगी. छूट की अवधि 18 अप्रैल से एक जून 2024 के बीच की होगी. डिस्काउंट वाले टिकटों की बुकिंग एयरलाइन के मोबाइल ऐप ओर वेबसाइट से कराई जा सकती है.
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कल डालेंगे 102 सीटों पर वोट
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एयर इंडिया एक्सप्रेस के सीईओ अंकुर गर्ग ने बताया कि एयर इंडिया एक्सप्रेस ने हमेशा बदलाव के लिए आगे बढ़ कर काम किया है. कंपनी अपनी 19वीं वर्षगांठ सेलिब्रेट करने जा रही है. ऐसे में कंपनी ने खास पहल #VoteAsYouAre अभियान की शुरुआत की है. टाटा ग्रुप की कंपनी एयर इंडिया एक्सप्रेस देश के राज्यों में 31 डेस्टिनेशंस के लिए उड़ान भरती है. बता दें कि लोकसभा चुनाव के पहले चरण का प्रचार अभियान बुधवार को थम गया है. पहले चरण का मतदान कल यानी 19 अप्रैल को होगा. पहले चरण के चुनाव में 21 राज्यों की कुल 102 सीटों पर वोटिंग होनी है.
पर्सनलाइज्ड स्किनकेयर स्टार्टअप फंडिंग का इस्तेमाल क्लिनिकल टीम के विस्तार, डायग्नोसिस तकनीक को मजबूत करने और स्किन व हेयर केयर उत्पादों की रेंज बढ़ाने में करेगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
बेंगलुरु स्थित पर्सनलाइज्ड प्रिस्क्रिप्शन स्किनकेयर स्टार्टअप फॉर्मियल लैब्स (Formial Labs) ने प्री-सीड फंडिंग राउंड में 2.88 करोड़ रुपये जुटाए हैं. इस फंडिंग राउंड का नेतृत्व जीरोपर्ल वीसी (Zeropearl VC) ने किया. इसमें OZiva की संस्थापक और Giga Capital से जुड़ी आरती गिल, सोशल अल्फा में पार्टनरशिप्स के डायरेक्टर अरविंद राधाकृष्णन और डॉक्टर सुशील सेल्वराजन, अशोक रे चौधरी, शेखर नीमा तथा दीप्ति ठाकुर ने भी निवेश किया.
कंपनी इस पूंजी का इस्तेमाल अपनी क्लिनिकल टीम और परामर्श सेवाओं की क्षमता बढ़ाने, बीमारी की पहचान और व्यक्तिगत जरूरतों के अनुरूप उपचार तय करने वाली तकनीक को मजबूत करने तथा त्वचा और बालों की देखभाल से जुड़े उत्पादों की रेंज का विस्तार करने में करेगी. इसके अलावा, कंपनी अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म, त्वचा रोग विशेषज्ञों के क्लीनिक और फार्मेसी पार्टनर्स के जरिए वितरण नेटवर्क बढ़ाने की योजना बना रही है.
त्वचा और बालों की समस्याओं के लिए कस्टमाइज्ड फॉर्मूलेशन
जीत पटेल द्वारा स्थापित फॉर्मियल लैब्स त्वचा संबंधी अलग-अलग समस्याओं के लिए व्यक्तिगत जरूरतों के अनुरूप स्किनकेयर फॉर्मूलेशन तैयार करती है. इनमें मुंहासे, पिगमेंटेशन, त्वचा पर निशान और बढ़ती उम्र के लक्षण जैसी समस्याएं शामिल हैं.
कंपनी अपने फॉर्मूलेशन तैयार करने की प्रक्रिया को डिजिटल परामर्श और क्लिनिकल समीक्षा के साथ जोड़ती है. इसके जरिए मरीजों की जरूरतों के अनुसार उपचार योजनाओं में बदलाव किया जाता है. कंपनी का मॉडल प्रिस्क्रिप्शन आधारित स्किनकेयर और लगातार मरीजों की देखभाल पर केंद्रित है.
5,000 से अधिक फॉर्मूलेशन का वितरण
कंपनी के मुताबिक, वह अब तक 87 से अधिक स्टॉक कीपिंग यूनिट्स (SKUs) के तहत 5,000 से अधिक फॉर्मूलेशन वितरित कर चुकी है. कंपनी ने महीने-दर-महीने 40 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज करने की जानकारी दी है. उसके कुल कारोबार में दोबारा खरीदारी करने वाले ग्राहकों की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत है.
फॉर्मियल लैब्स ने दो पीयर-रिव्यूड क्लिनिकल अध्ययन भी किए हैं. इनमें उसके एक फॉर्मूलेशन से जुड़ा रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल भी शामिल है. कंपनी के परिचालन में उसकी अपनी बेस व्हीकल टेक्नोलॉजी और गुणवत्ता सुनिश्चित करने की प्रक्रियाएं भी शामिल हैं. इसके अलावा, कंपनी के पास फार्मेसी और टेलीहेल्थ सेवाओं के लिए LegitScript सर्टिफिकेशन हैं.
क्लिनिकल सेवाओं और तकनीक के विस्तार की योजना
जीरोपर्ल वीसी के संस्थापक और मैनेजिंग पार्टनर बिपिन शाह ने कहा कि फर्म ने फॉर्मियल लैब्स में उसके क्लिनिकल दृष्टिकोण, प्रिस्क्रिप्शन आधारित फॉर्मूलेशन और मरीजों की निरंतर देखभाल पर ध्यान देने के कारण निवेश किया है. उन्होंने कंपनी के कारोबार में बार-बार खरीदारी करने वाले ग्राहकों की हिस्सेदारी को भी निवेश का एक महत्वपूर्ण आधार बताया.
फंडिंग के जरिए फॉर्मियल लैब्स अपनी क्लिनिकल और तकनीकी क्षमताओं को मजबूत करने के साथ भारत में व्यक्तिगत जरूरतों के अनुरूप प्रिस्क्रिप्शन स्किनकेयर की पहुंच बढ़ाना चाहती है. कंपनी की योजना त्वचा और बालों के उपचार से जुड़ी अपनी सेवाओं का विस्तार करने की है.
ऑडियंस मेजरमेंट, मीडिया ट्रेडिंग में बदलाव और कनेक्टेड टीवी जैसे मुद्दों पर होगा फोकस, विज्ञापन एजेंसियों और इंडस्ट्री के अन्य हितधारकों के बीच सहयोग बढ़ाने की पहल
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
विज्ञापन एजेंसियों के राष्ट्रीय संगठन एडवर्टाइजिंग एजेंसिज एसोसिएशन ऑफ इंडिया (AAAI) ने 2026-27 के एजेंडे के तहत नई मीडिया काउंसिल गठित की है. ओम्निकॉम मीडिया इंडिया के सीईओ कार्तिक शर्मा को इसकी अध्यक्षता सौंपी गई है. इस काउंसिल का उद्देश्य मीडिया कारोबार से जुड़े प्रमुख मुद्दों पर चर्चा के लिए साझा मंच तैयार करना और इंडस्ट्री के भविष्य से जुड़े फैसलों में सदस्य एजेंसियों की भागीदारी बढ़ाना है.
नई काउंसिल में बड़े मीडिया नेटवर्क, स्वतंत्र एजेंसियों और क्षेत्रीय कारोबार से जुड़ी एजेंसियों को एक साथ लाने की योजना है. इसके तहत ऑडियंस रिसर्च और मेजरमेंट, पारदर्शिता और जवाबदेही, मीडिया ट्रेडिंग के बदलते तौर-तरीकों, प्रतिभाओं के विकास तथा मीडिया प्लानिंग और बाइंग पर तकनीक के प्रभाव जैसे मुद्दों पर चर्चा की जाएगी.
CTV और क्रॉस-स्क्रीन मेजरमेंट पर रहेगा जोर
मीडिया काउंसिल विज्ञापनदाताओं, मीडिया मालिकों, रिसर्च संस्थानों और इंडस्ट्री के अन्य हितधारकों के साथ संवाद को बढ़ावा देगी. बदलते ऑडियंस व्यवहार, नए मीडिया प्लेटफॉर्म और ग्राहकों की बदलती अपेक्षाओं के अनुरूप एजेंसियों को तैयार करने के लिए ज्ञान और अनुभव साझा करने पर भी जोर रहेगा.
काउंसिल के अध्यक्ष कार्तिक शर्मा ने कहा कि वह अगली पीढ़ी के नेताओं के साथ काम करने को लेकर उत्साहित हैं. उनके मुताबिक, अनुभवी लोगों, उद्यमशील सोच और विविध नजरियों को एक मंच पर लाने से भारतीय विज्ञापन जगत के लिए अधिक मजबूत और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप मीडिया इकोसिस्टम तैयार करने में मदद मिल सकती है.
शर्मा ने बताया कि काउंसिल भारत में स्थानीय और वैश्विक ज्ञान साझेदारियों के माध्यम से बेहतर प्रशिक्षण और सीखने के अवसर उपलब्ध कराने पर काम करेगी. इसके अलावा, इंडस्ट्री में सहयोग और विचारों के आदान-प्रदान के लिए एक प्रमुख वार्षिक मंच विकसित करने तथा नए विषयों पर व्यावहारिक दिशा-निर्देश तैयार करने की योजना है. इनमें कनेक्टेड टीवी (CTV) और क्रॉस-स्क्रीन मेजरमेंट भी शामिल हैं.
मीडिया क्षेत्र में 30 साल से अधिक का अनुभव
कार्तिक शर्मा ओम्निकॉम मीडिया इंडिया के सीईओ हैं, जो ओम्निकॉम ग्रुप का हिस्सा है. उन्हें मीडिया रणनीति, कम्युनिकेशन प्लानिंग, बिहेवियरल इकोनॉमिक्स, एनालिटिक्स और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में 30 साल से अधिक का अनुभव है.
वह AAAI के बोर्ड और BARC की डिसिप्लिनरी कमेटी के सदस्य हैं. इसके अलावा, वह मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल इंडिया (MRUCI) के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में भी शामिल हैं. इससे पहले वह TAM मीडिया रिसर्च और इंडियन रीडरशिप सर्वे में महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके हैं. उन्हें 2026 में IAA मीडिया इन्फ्लुएंसर ऑफ द ईयर और 2025 में e4m इन्फ्लुएंसर ऑफ द ईयर के सम्मान से नवाजा गया था.
इंडस्ट्री में विचार-विमर्श और सीखने का मंच बनेगी काउंसिल
AAAI के अध्यक्ष डॉ. संदीप गोयल ने कहा कि मीडिया काउंसिल को इंडस्ट्री के साझा मंच और सीखने के केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए. यहां विज्ञापन जगत के मीडिया विशेषज्ञ नए विचारों पर चर्चा कर सकेंगे, प्रचलित तौर-तरीकों की समीक्षा कर सकेंगे और अपने अनुभवों से मिली सीख अगली पीढ़ी के स्टोरीटेलर्स तथा ब्रांड निर्माण से जुड़े पेशेवरों तक पहुंचा सकेंगे.
शहान ने कहा कि मुनाफे में चल रहे स्टार्ट-अप्स के लिए वेंचर कैपिटल जुटाना मुश्किल हो रहा है, क्योंकि उन्हें निवेशकों की अपेक्षाओं के अनुरूप अपने मौजूदा परिचालन ढांचे में बदलाव करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
शहान सूद ने JAFCO Asia में साढ़े तीन साल काम करने के बाद अपनी भूमिका छोड़ दी है. इस दौरान उन्होंने जापानी वेंचर कैपिटल फर्म की भारत में उपस्थिति स्थापित करने में मदद की. वह जुलाई 2022 में भारत में फर्म के पहले कर्मचारी और इसकी वैश्विक निवेश टीम के पांचवें सदस्य के रूप में शामिल हुए थे.
अपने कार्यकाल के दौरान सूद ने निवेश के अवसर तलाशने, उचित जांच-पड़ताल, नियुक्तियों, टीम निर्माण, समुदाय के साथ जुड़ाव, विचार नेतृत्व और सीमित भागीदारों के साथ संबंधों सहित विभिन्न क्षेत्रों में काम किया. उन्होंने भारत में JAFCO Asia का ब्रांड स्थापित करने और भारत तथा जापान के बीच निवेश संबंधों को मजबूत करने में भूमिका निभाई.
फर्म छोड़ने के बाद सूद तीन क्षेत्रों में काम कर रहे हैं: कॉरपोरेट कंपनियों के लिए बिजनेस डेवलपमेंट, फैमिली ऑफिस के लिए एडवाइजरी और मुनाफे में चल रहे स्टार्ट-अप्स को परिचालन संबंधी सहायता.
कॉरपोरेट क्षेत्र में वह विभिन्न सेक्टरों में बिजनेस डेवलपमेंट के जरिए कंपनियों के लिए राजस्व बढ़ाने में मदद कर रहे हैं. फिलहाल वह रक्षा और इंजीनियरिंग, खरीद एवं निर्माण (EPC) क्षेत्र की उन कंपनियों को सहयोग दे रहे हैं, जिनके पास करीब 4,100 करोड़ रुपये के सक्रिय ऑर्डर हैं.
भारत में फैमिली ऑफिस का इकोसिस्टम विकसित होने के साथ सूद चुनिंदा फैमिली ऑफिस के साथ भी काम कर रहे हैं. उन्होंने करीब 100 फैमिली ऑफिस के साथ बातचीत की है, ताकि उनकी निवेश प्राथमिकताओं, सीधे निवेश में रुचि और फंड ऑफ फंड्स में निवेश को लेकर बदलती दिलचस्पी को समझा जा सके. वह चुनिंदा फैमिली ऑफिस को बिना किसी शुल्क के सलाह दे रहे हैं.
उनका तीसरा प्रमुख क्षेत्र मुनाफे में चल रहे स्टार्ट-अप्स को अपने परिचालन को मजबूत करने और फंड जुटाने तथा संभावित शुरुआती सार्वजनिक निर्गम (IPO) की तैयारी में मदद करना है. वेंचर कैपिटल, इन्वेस्टमेंट बैंकिंग और ट्रेंड एनालिसिस के अपने अनुभव के आधार पर सूद संस्थापकों के साथ काम कर रहे हैं, ताकि वे अपने कारोबारी ढांचे को सुव्यवस्थित कर सकें और निवेशकों के लिए बेहतर तैयारी कर सकें.
उन्होंने कहा कि मुनाफे में चल रहे स्टार्ट-अप्स के लिए वेंचर कैपिटल जुटाना मुश्किल हो रहा है, क्योंकि उन्हें निवेशकों की अपेक्षाओं के अनुरूप अपने मौजूदा परिचालन ढांचे में बदलाव करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. उनकी एडवाइजरी का उद्देश्य ऐसे कारोबारों को वेंचर कैपिटल फंडिंग और शेयर बाजार में लिस्टिंग, दोनों के लिए तैयार करने में मदद करना है.
सूद का यह कदम JAFCO Asia में उनके दूसरे वर्ष के चुनौतीपूर्ण रहने के बाद आया है, जिसे उन्होंने सीखने का एक महत्वपूर्ण अनुभव बताया. उन्होंने कहा कि मुश्किल दौर में किसी निवेशक के चरित्र की परीक्षा होती है और पेशेवर रूप से बाहर निकलना भी किसी व्यक्ति की यात्रा का एक महत्वपूर्ण पैमाना है.
फर्म के नए नाम JIF Capital में बदलाव के दौरान सूद ने भारत में निवेश की जिम्मेदारी सुप्रिया को सौंप दी है. सूद ने कहा कि वह उचित समय पर अपने अगले कदमों के बारे में और जानकारी साझा करेंगे
भारत का पहला 10 लाख करोड़ रुपये के मूल्यांकन वाला आईपीओ लिस्टिंग के करीब है. ऐसे में बाजार के कुछ खिलाड़ी इस बात पर दांव लगा रहे हैं कि मूल कंपनी रिलायंस, उसकी सहायक कंपनी जियो से बेहतर प्रदर्शन करेगी. प्रॉस्पेक्टस से पता चलता है कि इस दांव के पीछे क्या वजह है और यह दांव चर्चा के मुकाबले लगाना कितना मुश्किल है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
जियो प्लेटफॉर्म्स के 30,000 करोड़ रुपये के आईपीओ के खुलने में एक सप्ताह बाकी है. मुंबई और अहमदाबाद के डीलिंग रूम में एक ट्रेड की चर्चा बार-बार हो रही है: रिलायंस में लॉन्ग पोजीशन और जियो में शॉर्ट पोजीशन.
इसका विचार सरल है. 1,119 रुपये के इश्यू प्राइस पर जियो में रिलायंस की लगभग 65 प्रतिशत हिस्सेदारी का मूल्य करीब 6.6 लाख करोड़ रुपये है, जो रिलायंस के 15.84 लाख करोड़ रुपये के बाजार मूल्य का लगभग 42 प्रतिशत है. भारत में होल्डिंग कंपनियों के शेयर आमतौर पर उन सूचीबद्ध कंपनियों के मुकाबले डिस्काउंट पर कारोबार करते हैं, जिनमें उनकी हिस्सेदारी होती है. इस जोड़ी पर दांव लगाने वाले ट्रेडरों को उम्मीद है कि जियो की लिस्टिंग से रिलायंस के शेयर सस्ते या जियो के शेयर महंगे नजर आएंगे और दोनों के मूल्यांकन के बीच का अंतर रिलायंस के पक्ष में कम होगा.
यह दांव लगाना मुश्किल क्यों है
जियो में शॉर्ट पोजीशन लेना सुनने में जितना आसान लगता है, वास्तव में उतना है नहीं. भारत में बिना शेयर उधार लिए शॉर्ट सेलिंग की अनुमति नहीं है और किसी नए सूचीबद्ध शेयर में कई महीनों तक फ्यूचर्स और ऑप्शंस उपलब्ध नहीं होते. व्यावहारिक रूप से, लिस्टिंग के दिन जियो में शॉर्ट पोजीशन लेने का मतलब आईपीओ में मिले शेयरों को तेजी से बेचना या इंट्राडे ट्रेडिंग करना है, न कि बड़ी शॉर्ट पोजीशन बनाए रखना.
कौन बेच सकता है और कब
2020 के निवेशकों के जल्द बाहर निकलने की चर्चाओं के सामने भी प्रॉस्पेक्टस एक बाधा है. रिलायंस के अलावा अन्य निवेशकों के पास आईपीओ से पहले मौजूद शेयरों पर आवंटन की तारीख से छह महीने की लॉक-इन अवधि लागू है. इसमें केवल कुछ पंजीकृत वेंचर और वैकल्पिक निवेश फंडों को छूट दी गई है. इश्यू में लगभग 8,000 करोड़ रुपये का निवेश करने वाले एंकर निवेशक अपने आधे शेयर 30 दिन बाद और बाकी शेयर 90 दिन बाद बेच सकते हैं.
इसलिए शेयरों की आपूर्ति की पहली लहर, जो कीमत पर दबाव डाल सकती है, शुरुआती दिनों में आईपीओ पाने वाले निवेशकों से और नवंबर के आखिरी हिस्से से एंकर निवेशकों से आने की संभावना है. पहले सप्ताह में सिल्वर लेक या मुबाडाला जैसे निवेशकों की ओर से बिक्री की उम्मीद नहीं है.
कोई सुरक्षा कवच नहीं
इस इश्यू में कीमत को सहारा देने की कोई व्यवस्था भी नहीं है. जियो के प्रॉस्पेक्टस में स्पष्ट रूप से कहा गया है, “इस इश्यू के तहत कोई ग्रीन शू विकल्प नहीं है.” यह वह व्यवस्था होती है, जिसके तहत बैंकर गिरती हुई लिस्टिंग कीमत को सहारा देने के लिए शेयर खरीद सकते हैं. इसके अभाव में कारोबार के शुरुआती दिनों में कीमत पूरी तरह मांग पर निर्भर करेगी.
इससे घरेलू वेल्थ मैनेजरों पर ध्यान केंद्रित हो गया है, जो अमीर ग्राहकों के बीच इस इश्यू का प्रचार कर रहे हैं. ग्रे मार्केट प्रीमियम लगभग 50 रुपये है, जो इश्यू प्राइस से 5 प्रतिशत से भी कम अधिक है. इससे संकेत मिलता है कि फिलहाल बाजार को लिस्टिंग के दिन शेयर में बड़ी तेजी की उम्मीद नहीं है.
किन बातों पर नजर रखें
28 अक्टूबर को होने वाली लिस्टिंग से पता चलेगा कि यह ट्रेड सफल होता है या नहीं. अगर जियो अपनी कीमत बनाए रखता है और रिलायंस के शेयरों का मूल्यांकन बढ़ता है, तो लॉन्ग-शॉर्ट ट्रेड करने वाले निवेशकों को फायदा होगा. अगर पहले सप्ताह में जियो गिरता है और रिलायंस अपनी कीमत बनाए रखता है, तब भी यह दांव सफल रहेगा. दोनों ही स्थितियों में, स्टॉक एक्सचेंजों के बल्क और ब्लॉक डील के आंकड़ों से पता चलेगा कि शुरुआती कुछ दिनों में किसने शेयर बेचे.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.
19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)
आयात में 8% की बढ़ोतरी के बावजूद घटा व्यापार घाटा, चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में वस्तु निर्यात 18.51% बढ़कर 259.89 अरब डॉलर हुआ.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के निर्यात में सितंबर में मजबूत बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिससे देश का व्यापार घाटा कम करने में मदद मिली. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर 2026 में भारत का वस्तु निर्यात सालाना आधार पर 23 प्रतिशत बढ़कर 44.4 अरब डॉलर पर पहुंच गया. इस दौरान आयात 8 प्रतिशत बढ़कर 74.61 अरब डॉलर रहा. निर्यात में आयात के मुकाबले अधिक वृद्धि के कारण देश का व्यापार घाटा घटकर 30.21 अरब डॉलर रह गया, जबकि सितंबर 2025 में यह 33 अरब डॉलर था. इस तरह सालाना आधार पर व्यापार घाटे में 2.79 अरब डॉलर की कमी आई है.
पहली छमाही में निर्यात 18.51% बढ़ा
चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही यानी अप्रैल से सितंबर के दौरान भी निर्यात में बढ़ोतरी का रुझान बना रहा. इस अवधि में भारत का वस्तु निर्यात 18.51 प्रतिशत बढ़कर 259.89 अरब डॉलर हो गया. वहीं, आयात 16.31 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 437.53 अरब डॉलर पर पहुंच गया.
अप्रैल से सितंबर के बीच निर्यात और आयात के बीच का अंतर यानी व्यापार घाटा 177.64 अरब डॉलर रहा. इस अवधि में निर्यात की वृद्धि दर आयात की तुलना में अधिक रही, हालांकि आयात का कुल मूल्य निर्यात से काफी ज्यादा बना हुआ है.
निर्यात में बढ़ोतरी का सिलसिला जारी
वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने कहा कि देश के निर्यात में बढ़ोतरी का सिलसिला जारी है. सितंबर के आंकड़े ऐसे समय में आए हैं, जब वैश्विक व्यापार की परिस्थितियां और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मांग निर्यात प्रदर्शन को प्रभावित करने वाले अहम कारक बने हुए हैं.
क्या होता है व्यापार घाटा?
जब किसी देश का आयात उसके निर्यात से अधिक होता है, तो दोनों के बीच के अंतर को व्यापार घाटा कहा जाता है. सितंबर 2026 में भारत ने 74.61 अरब डॉलर का वस्तु आयात किया, जबकि निर्यात से 44.4 अरब डॉलर की कमाई हुई. इस तरह आयात और निर्यात के बीच 30.21 अरब डॉलर का अंतर रहा, जिसे देश का व्यापार घाटा कहा जाता है.
2023 में 3,500 हेक्टेयर से शुरू हुआ कार्यक्रम 2026 में 81,000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र तक पहुंचा, किसानों को कम लागत और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल वाली खेती अपनाने में मदद
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
धान की खेती में पानी की खपत, बढ़ती लागत और कृषि मजदूरों की कमी किसानों के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है. ऐसे में धान की सीधी बुवाई (DSR) को खेती के एक वैकल्पिक तरीके के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है. इसी दिशा में बायर का डायरेक्टएकर्स प्रोग्राम 2026 में 2 लाख एकड़ यानी 81,000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र तक पहुंच गया है. कंपनी के मुताबिक, इस पहल के तहत किसानों को बीज, फसल सुरक्षा, डिजिटल तकनीक और कृषि विशेषज्ञता के जरिए धान की सीधी बुवाई अपनाने में मदद दी जा रही है. इसका उद्देश्य पानी और अन्य संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने के साथ खेती की लागत कम करने और परिचालन दक्षता बढ़ाने में सहायता करना है.
भारत में धान की पारंपरिक खेती में पानी और श्रम की अधिक जरूरत होती है. जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव, कृषि लागत में वृद्धि और मजदूरों की उपलब्धता में कमी के कारण किसानों के लिए मौजूदा तरीकों से खेती करना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है. बायर के अनुसार, धान की सीधी बुवाई से पारंपरिक रोपाई की तुलना में पानी का इस्तेमाल 30-40 प्रतिशत तक और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन 45 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है. इसके अलावा, कृषि मजदूरों पर निर्भरता में 50 प्रतिशत तक कमी लाने में भी मदद मिल सकती है. हालांकि, इसके वास्तविक परिणाम भौगोलिक क्षेत्र, खेती के तरीके और खेत की परिस्थितियों के आधार पर अलग-अलग हो सकते हैं.
तकनीक और कृषि सलाह के जरिए किसानों की मदद
डायरेक्टएकर्स प्रोग्राम में धान की सीधी बुवाई को केवल एक तकनीक के तौर पर नहीं देखा जाता, बल्कि इसे खेती की पूरी व्यवस्था में बदलाव के रूप में अपनाने पर जोर दिया जाता है. इसके तहत बायर बीज और उन्नत गुणों वाली किस्मों, फसल सुरक्षा उत्पादों, डिजिटल खेती के समाधानों और कृषि विशेषज्ञता को मशीनीकरण तथा डिजिटल सलाह के साथ जोड़ती है.
इस मॉडल के तहत किसानों और स्थानीय कृषि उद्यमियों को मशीनरी उपलब्ध कराने वाले साझेदारों, डिजिटल सलाहकार सेवाओं और सरकारी तथा निजी क्षेत्र की सहयोगी संस्थाओं से जोड़ा जाता है. इसका उद्देश्य खरपतवार प्रबंधन, मशीनों तक पहुंच और खेती से जुड़ी अन्य चुनौतियों को दूर करना है, ताकि छोटे किसान भी धान की सीधी बुवाई को अपना सकें. कंपनी का कहना है कि इस एकीकृत व्यवस्था से खेती में संसाधनों का अधिक कुशल इस्तेमाल करने और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप खेती की क्षमता बढ़ाने में मदद मिल सकती है.
चार साल में तेजी से बढ़ा कार्यक्रम का दायरा
बायर ने 2021 में डायरेक्टएकर्स का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया था. इसके बाद कार्यक्रम का विस्तार तेजी से हुआ. वर्ष 2023 में यह 3,500 हेक्टेयर क्षेत्र तक पहुंचा था, जो 2024 में बढ़कर 17,000 हेक्टेयर और 2025 में 46,000 हेक्टेयर हो गया. वर्ष 2026 में इसका दायरा 81,000 हेक्टेयर से अधिक हो चुका है.
यह कार्यक्रम पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में संचालित है. कंपनी के अनुसार, अलग-अलग राज्यों में इसकी मौजूदगी धान की खेती से जुड़ी विभिन्न परिस्थितियों में इस मॉडल को अपनाने की संभावना को दर्शाती है.
किसानों की लाभप्रदता बढ़ाने पर जोर
बायर फॉर इंडिया, बांग्लादेश और श्रीलंका के क्रॉप साइंस डिवीजन के कंट्री डिविजनल हेड साइमन वीबुश ने कहा कि डायरेक्टएकर्स का 2 लाख एकड़ तक पहुंचना केवल एक उपलब्धि नहीं, बल्कि यह दिखाता है कि सही तकनीक, सेवाओं और सहयोग के जरिए धान की सीधी बुवाई को अलग-अलग क्षेत्रों में विस्तार दिया जा सकता है.
उन्होंने कहा कि इस पहल में बीज, फसल सुरक्षा, डिजिटल समाधान और कृषि विशेषज्ञता को एकीकृत किया गया है, ताकि किसानों की लाभप्रदता और परिचालन दक्षता बढ़ाने में मदद मिल सके. कंपनी का लक्ष्य भारत में संसाधन-कुशल धान की खेती को बढ़ावा देना है.
डायरेक्टएकर्स बायर की पुनर्योजी कृषि (रीजेनरेटिव एग्रीकल्चर) से जुड़ी व्यापक रणनीति का भी हिस्सा है. इसके तहत कंपनी ऐसी खेती को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है, जिसमें उत्पादकता बढ़ाने के साथ पानी और अन्य संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल हो तथा खेती बदलती परिस्थितियों का सामना करने में सक्षम बने. कंपनी के मुताबिक, आने वाले समय में इस कार्यक्रम की पहुंच और साझेदारियों का विस्तार किया जाएगा, ताकि संसाधन-कुशल खेती के तरीकों को अधिक किसानों तक पहुंचाया जा सके.
जियो के 30,213 करोड़ रुपये के इश्यू का 90 फीसदी से ज्यादा हिस्सा कर्ज चुकाने में जाएगा, कोई भी मौजूदा निवेशक एक भी शेयर नहीं बेच रहा है और रिलायंस के शेयरधारक तीन साल से ठहराव के बाद भी इंतजार कर रहे हैं. देश का सबसे बड़ा IPO अपने सबसे बड़े सवालों को अनुत्तरित छोड़ रहा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
जब जियो प्लेटफॉर्म्स का 27,000 करोड़ रुपये का पब्लिक इश्यू 21 अक्टूबर को खुलेगा, तो इसे भारतीय पूंजी बाजार के परिपक्व होने के एक अहम पड़ाव के रूप में पेश किया जाएगा. भारत का सबसे बड़ा IPO. करीब 10.3 लाख करोड़ रुपये के मूल्यांकन वाली कंपनी. 52.4 करोड़ से ज्यादा ग्राहक. रिलायंस की लंबे समय से वादा की जा रही ‘वैल्यू अनलॉकिंग’ आखिरकार पूरी हो रही है. लेकिन प्रेस रिलीज के बजाय आंकड़ों को देखें, तो एक कम आकर्षक तस्वीर सामने आती है.
आपका पैसा, उनका कर्ज
सबसे पहले यह देखें कि पैसा कहां जाएगा. इश्यू दस्तावेज के रिपोर्ट किए गए विवरण के मुताबिक, इश्यू से मिलने वाली रकम में से 27,500 करोड़ रुपये तक का इस्तेमाल रिलायंस जियो इन्फोकॉम के कर्ज को चुकाने या समय से पहले भुगतान करने में किया जाएगा. यह इश्यू के कुल आकार का 90 फीसदी से ज्यादा है. बची हुई छोटी रकम सामान्य कॉरपोरेट उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल होगी. नई स्पेक्ट्रम खरीद या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी उन महत्वाकांक्षाओं के लिए कोई खास रकम निर्धारित नहीं की गई है, जिनका जिक्र रिलायंस की सालाना बैठकों में होता है.
मार्च 2026 तक जियो पर कुल 70,781 करोड़ रुपये का कर्ज था. IPO की रकम मिलने के बाद भी कंपनी की बैलेंस शीट पर 43,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज बना रहेगा. नए शेयरधारक जियो के भविष्य को वित्तपोषित नहीं कर रहे हैं. वे उसके अतीत के कर्ज का पुनर्वित्तपोषण कर रहे हैं.
यह न तो गैरकानूनी है और न ही असामान्य. लेकिन निवेशकों को यह बात साफ-साफ बताई जानी चाहिए.
कोई शेयर नहीं बेच रहा. सवाल पूछिए क्यों
यह इश्यू पूरी तरह नए शेयर जारी करने पर आधारित है. इसमें ऑफर फॉर सेल (OFS) नहीं है. करीब 66 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज कोई शेयर नहीं बेच रही है. मौजूदा रिपोर्टों के मुताबिक, मेटा, गूगल या 2020 में जियो में बड़ी रकम लगाने वाले वैश्विक फंड भी अपने शेयर नहीं बेच रहे हैं.
जब शुरुआती निवेशकों में से कोई भी रिकॉर्ड मूल्यांकन पर अपने शेयर नहीं बेच रहा है, तो आम निवेशकों को यह पूछने का अधिकार है कि ऐसा क्यों है. उन्हें यह भी जानना चाहिए कि शेयरों पर लगी लॉक-इन अवधि कब खत्म होगी, क्योंकि अंततः बाजार में इन शेयरों की आपूर्ति आएगी.
कंपनी का बहुत छोटा हिस्सा
प्राइस बैंड के ऊपरी स्तर पर यह इश्यू जियो की कुल हिस्सेदारी के 3 फीसदी से भी कम का प्रतिनिधित्व करता है. बाजार में इतने कम शेयर उपलब्ध होने के कारण लिस्टिंग के दिन शेयर की कीमत कंपनी के वास्तविक मूल्य से ज्यादा शेयरों की कमी और इंडेक्स फंडों की खरीदारी को दर्शा सकती है. न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता के नियमों को पूरा करने के लिए भविष्य में जारी किए जाने वाले शेयरों की हर किस्त भी आगे चलकर बाजार पर दबाव डाल सकती है.
एक ऐसा ब्रांड, जिसका मालिकाना हक उसके पास नहीं
जोखिम से जुड़े खुलासों में एक ऐसी बात है, जिसे हर खरीदार को दो बार पढ़ना चाहिए. इश्यू दस्तावेज का विश्लेषण करने वाली ब्रोकरेज फर्मों की रिपोर्टों के मुताबिक, ‘जियो’ ट्रेडमार्क का मालिकाना हक रिलायंस ग्रुप के केंद्रीय स्तर पर है और जियो प्लेटफॉर्म्स का इस बात पर नियंत्रण नहीं है कि समूह की अन्य कंपनियां इसका इस्तेमाल कैसे करती हैं. जियोमार्ट, जियो फाइनेंशियल और समूह की दूसरी कंपनियां भी यही नाम इस्तेमाल करती हैं. इनमें से किसी भी कंपनी की समस्या का असर उस सूचीबद्ध कंपनी पर पड़ सकता है, जिसके अल्पांश शेयरधारकों की इसमें कोई भूमिका नहीं थी.
ट्रेडमार्क का मालिक कौन है? क्या जियो प्लेटफॉर्म्स इसका इस्तेमाल करने के लिए भुगतान करती है? क्या लिस्टिंग के बाद यह शुल्क लगाया जा सकता है या बढ़ाया जा सकता है? ये विरोध जताने वाले सवाल नहीं हैं. ये बुनियादी सवाल हैं.
यही बात संबंधित पक्षों के साथ होने वाले लेनदेन पर भी लागू होती है. जियो अपनी सेवाओं के वितरण और बिक्री के लिए रिलायंस रिटेल समेत रिलायंस के व्यापक कारोबारी नेटवर्क पर निर्भर है. जब प्रमोटर किसी अनुबंध के दोनों पक्षों में शामिल हो, तो स्वतंत्र निदेशकों को कीमत तय करते हुए स्पष्ट रूप से देखा जाना चाहिए. साथ ही, हर तिमाही में ऐसे लेनदेन की कुल रकम सार्वजनिक की जानी चाहिए.
इधर, मूल कंपनी का हाल
अगर जियो का IPO नए निवेशकों के लिए सवाल खड़े करता है, तो यह रिलायंस इंडस्ट्रीज के मौजूदा शेयरधारकों के लिए और भी कठिन सवाल उठाता है.
14 अक्टूबर को RIL के शेयर करीब 1,176 रुपये पर बंद हुए. यह 1,611.80 रुपये के 52 सप्ताह के उच्चतम स्तर से एक चौथाई से भी ज्यादा नीचे है. हाल के सप्ताहों में शेयर ने 52 सप्ताह का नया निचला स्तर भी छुआ है. तीन साल के दौरान शेयर में कुल मिलाकर कोई खास बढ़त नहीं हुई है. डिविडेंड यील्ड करीब आधा फीसदी है.
पूंजी पर मिलने वाला रिटर्न भी यही कहानी बताता है. Screener.in के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी का समेकित नियोजित पूंजी पर रिटर्न (ROCE) करीब 10 फीसदी रहा. यह लगभग उसी स्तर पर है, जहां एक दशक पहले था. अरबों डॉलर खर्च करने के बाद भी कंपनी हर रुपये की पूंजी पर करीब उतना ही कमा रही है, जितना उसने खर्च शुरू करने से पहले कमाया था.
इसके बाद वादों का सवाल है. 2019 की वार्षिक आम बैठक (AGM) में मुकेश अंबानी ने कहा था कि रिलायंस का लक्ष्य पांच साल के भीतर जियो और रिलायंस रिटेल को शेयर बाजार में सूचीबद्ध कराना है. जियो की लिस्टिंग 2026 के आखिर में हो रही है. अब रिपोर्टों के मुताबिक, रिलायंस रिटेल 2028 के आसपास लिस्टिंग की तैयारी कर रही है. हर देरी के साथ शेयरधारकों से उसी वादे के पूरा होने का और इंतजार करने को कहा जा रहा है, जिससे उनके शेयरों के मूल्यांकन में बढ़ोतरी की उम्मीद है.
होल्डिंग कंपनी का पेच
यहां एक असहज विडंबना है. जियो के शेयर बाजार में अलग से सूचीबद्ध होने के बाद जो निवेशक जियो में निवेश करना चाहेंगे, वे सीधे उसके शेयर खरीद सकेंगे. कुछ विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि इसके बाद RIL के शेयर होल्डिंग कंपनी डिस्काउंट पर कारोबार कर सकते हैं. इसके करीब 25 फीसदी होने के अनुमान भी सामने आए हैं. जिस कदम से RIL के शेयरधारकों के लिए मूल्य बढ़ाने की उम्मीद है, वही उनके शेयर की कीमत पर सीमा लगा सकता है.
इस व्यवस्था से ही सवाल उठता है. RIL के शेयरधारकों के पास पहले से ही जियो में अप्रत्यक्ष हिस्सेदारी है. डीमर्जर के जरिए उन्हें सीधे जियो के शेयर दिए जा सकते थे. इसके बजाय, नए शेयर नए निवेशकों को मिलेंगे और उससे मिलने वाली रकम जियो का कर्ज चुकाने में जाएगी. क्या डीमर्जर पर विचार किया गया था? अगर हां, तो इसे क्यों खारिज किया गया?
और अगर प्राइस बैंड जानबूझकर कम रखा गया है, जबकि कई ब्रोकरेज फर्मों ने 10.3 लाख करोड़ रुपये से काफी ज्यादा मूल्यांकन का अनुमान जताया था, तो नए निवेशकों के लिए छोड़ा गया हर अतिरिक्त रुपया बड़े पैमाने पर RIL के मौजूदा शेयरधारकों के हिस्से से ही जाता है.
वे जवाब, जो मायने रखते हैं
जियो के पक्ष में मजबूत तर्क मौजूद हैं. कंपनी लाभ कमाने वाली बाजार की अग्रणी कंपनी है. वित्त वर्ष 2025-26 में उसने 1,46,885 करोड़ रुपये का राजस्व और 30,049 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा दर्ज किया. उसका कर्ज का बोझ भी कम हुआ है. RIL का बचाव करने वाले यह तर्क देते हैं कि व्यापक बाजार के लिए 2026 मुश्किल रहा है और पूंजीगत खर्च के अब अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचने की उम्मीद है.
लेकिन मजबूत कारोबार होने से कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़े सवालों के जवाब नहीं मिल जाते. इसी तरह, रिकॉर्ड IPO होने से RIL के शेयरधारकों के तीन साल के ठहराव की भरपाई नहीं हो जाती.
इसलिए जब रिलायंस का नेतृत्व मीडिया के सामने आए, तो सवाल सीधे होने चाहिए. शेयरधारकों को नकद रिटर्न कब मिलेगा? समूह पूंजी पर कितने रिटर्न का लक्ष्य तय करेगा और किस साल तक? AI, डेटा सेंटर और सैटेलाइट ब्रॉडबैंड जैसे नए कारोबार जियो को दिए जाएंगे या समूह की अन्य कंपनियों के पास रहेंगे, इसका फैसला कौन करेगा? और अगली पीढ़ी के नेतृत्व का पारिश्रमिक किस पर निर्भर करेगा: कारोबारी साम्राज्य के आकार पर या उससे मिलने वाले रिटर्न पर?
भारत के सबसे बड़े IPO की सबसे कड़ी जांच होनी चाहिए. निवेशकों को आंकड़े और समयसीमा मांगनी चाहिए. साथ ही, ‘दीर्घकालिक दृष्टिकोण’ को उसी रूप में देखना चाहिए, जैसा कि अक्सर होता है: किसी दूसरे सवाल का जवाब.
यह लेख 15 अक्टूबर 2026 तक सार्वजनिक रूप से रिपोर्ट किए गए आंकड़ों पर आधारित है और निवेश संबंधी सलाह नहीं है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.
19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)
पीयूष गोयल ने कहा कि भारत चीन के साथ एक बार फिर संबंध विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है, लेकिन इस यात्रा का अंतिम परिणाम अभी तय नहीं है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत और चीन के बीच संबंधों को फिर से बेहतर बनाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन दोनों देशों के बीच आगे की बातचीत किस दिशा में बढ़ेगी, इसे लेकर अभी अनिश्चितता बनी हुई है. केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने बुधवार को नई दिल्ली में ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में यह बात कही. चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा वित्त वर्ष 2025-26 में 112 अरब डॉलर रहा. ऐसे में भारत की कोशिश व्यापार असंतुलन दूर करने, निर्यात बढ़ाने और अपने उत्पादों के लिए चीनी बाजार में बेहतर पहुंच हासिल करने की है.
चीन के साथ संबंधों को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश
पीयूष गोयल ने कहा कि भारत चीन के साथ एक बार फिर संबंध विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है, लेकिन इस यात्रा का अंतिम परिणाम अभी तय नहीं है. उन्होंने कहा कि भारत दुनिया के देशों के साथ व्यापार और सहयोग के लिए तैयार है, बशर्ते उसे उचित शर्तें मिलें, बातचीत में निरंतरता बनी रहे और भू-राजनीतिक माहौल स्थिर हो.
भारत और चीन के संबंधों में 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद तनाव बढ़ गया था. इसके बाद भारत ने चीन से होने वाले निवेश की जांच और निगरानी सख्त कर दी थी. हालांकि, दोनों देशों के बीच व्यापार जारी रहा.
सितंबर में नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात हुई थी. इस दौरान दोनों नेताओं ने व्यापार में संरचनात्मक असंतुलन, आपूर्ति शृंखला से जुड़े मुद्दों और बाजारों तक सार्थक एवं अनुमानित पहुंच की जरूरत पर चर्चा की थी. शी जिनपिंग का यह सात साल में पहला भारत दौरा था. इस सम्मेलन के दौरान पीयूष गोयल ने भी अपने चीनी समकक्ष से मुलाकात की थी.
चीन से भारत का व्यापार घाटा 112 अरब डॉलर
चीन भारत के लिए आयात का सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है. मार्च 2026 में समाप्त वित्त वर्ष के दौरान भारत के कुल आयात में चीन की हिस्सेदारी करीब 17 फीसदी रही. इस अवधि में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 112 अरब डॉलर दर्ज किया गया. यह भारत की चीनी वस्तुओं पर निर्भरता को भी दर्शाता है.
हालांकि, चीन को भारत का निर्यात भी बढ़ा है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का चीन को निर्यात करीब 37 फीसदी बढ़कर 19.47 अरब डॉलर हो गया. वहीं, अप्रैल से अगस्त 2026 के दौरान चीन भारत के तीन सबसे बड़े निर्यात बाजारों में शामिल रहा. इस अवधि में भारत ने चीन को 9.61 अरब डॉलर का सामान निर्यात किया.
अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर भी बातचीत जारी
गोयल ने भारत और अमेरिका के संबंधों को भी महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि दोनों देशों के रिश्ते आगे मजबूत होंगे. उन्होंने भरोसा जताया कि दोनों देशों में राजनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव के बावजूद द्विपक्षीय संबंधों में सुधार जारी रहेगा.
अमेरिका के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते पर बातचीत के बीच उनकी यह टिप्पणी अहम है. अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर ने इसी महीने कहा था कि दोनों पक्षों ने बातचीत में प्रमुख मतभेदों की पहचान कर ली है, लेकिन निकट भविष्य में समझौते पर पहुंचने की संभावना कम है.
भारत और अमेरिका ने मार्च 2025 में द्विपक्षीय व्यापार समझौते के लिए बातचीत शुरू की थी. दोनों देशों का लक्ष्य 2025 की शरद ऋतु तक अंतरिम समझौता करने का था. हालांकि, तय समयसीमा बीतने के एक साल से अधिक समय बाद भी बातचीत जारी है.
अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार
अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है. भारत के कुल सालाना निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी करीब पांचवां हिस्सा है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने अमेरिका के साथ 33.86 अरब डॉलर का व्यापार अधिशेष दर्ज किया.
ऐसे में अमेरिकी बाजार तक बेहतर पहुंच भारत के लिए व्यापार वार्ता का अहम मुद्दा है. चीन के साथ व्यापार घाटे को कम करने और अमेरिका के साथ प्रस्तावित समझौते को आगे बढ़ाने की कोशिशें भारत की व्यापक व्यापार रणनीति के लिए महत्वपूर्ण हैं.
रेडिफ्यूजन ब्रांड सॉल्यूशंस का प्रतिनिधित्व करने वाले डॉ. संदीप गोयल AAAI के अध्यक्ष हैं, जबकि अनदर आइडिया के जयदीप गांधी उपाध्यक्ष के रूप में बोर्ड में शामिल हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
एडवरटाइजिंग एजेंसीज एसोसिएशन ऑफ इंडिया (AAAI) ने 2026-27 के लिए अपने नए बोर्ड की घोषणा की है. इसमें स्वतंत्र विज्ञापन एजेंसियों, क्षेत्रीय कंपनियों, क्रिएटिव विशेषज्ञों और प्रमुख विज्ञापन एवं मीडिया नेटवर्क के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया है. एसोसिएशन का उद्देश्य विज्ञापन उद्योग में विभिन्न आकार और विशेषज्ञता वाली एजेंसियों को अधिक प्रतिनिधित्व देना और उनके बीच सहयोग को मजबूत करना है. डॉ. संदीप गोयल को अध्यक्ष और जयदीप गांधी को उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है.
संदीप गोयल अध्यक्ष, जयदीप गांधी उपाध्यक्ष
रेडिफ्यूजन ब्रांड सॉल्यूशंस का प्रतिनिधित्व करने वाले डॉ. संदीप गोयल AAAI के अध्यक्ष हैं, जबकि अनदर आइडिया के जयदीप गांधी उपाध्यक्ष के रूप में बोर्ड में शामिल हैं. नए बोर्ड में स्वतंत्र एजेंसियों और क्षेत्रीय विज्ञापन कारोबार से जुड़े प्रतिनिधियों को जगह दी गई है, ताकि उद्योग से जुड़े अलग-अलग दृष्टिकोणों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जा सके.
स्वतंत्र एजेंसियों की ओर से रतन बत्रा प्राइवेट लिमिटेड के पुनीत बत्रा, पैम एडवरटाइजिंग के सुनील छाबड़ा, 3 ब्रदर्स एंड फिल्स के हेमेंद्र पारेख, नवनीतलाल एंड कंपनी के देवांग एम. गांधी और सिचुएशंस एडवरटाइजिंग एंड मार्केटिंग के अंजन चटर्जी बोर्ड में शामिल हैं.
क्षेत्रीय विज्ञापन कारोबार का प्रतिनिधित्व स्टैंडर्ड पब्लिसिटी की प्रियंका चटर्जी, स्लोका एडवरटाइजिंग के के. श्रीनिवास, मैत्री एडवरटाइजिंग के सी. मुथु और क्रेयॉन्स एडवरटाइजिंग के कुनाल ललानी करेंगे.
अंजन चटर्जी को बोर्ड में सह-चयनित सदस्य के रूप में शामिल किया गया है. विज्ञापन क्षेत्र में अनुभव के साथ उन्होंने Oh! Calcutta और Mainland China जैसे रेस्तरां ब्रांड भी विकसित किए हैं. उनका अनुभव ब्रांड निर्माण, उद्यमिता और उपभोक्ता अनुभव से जुड़े पहलुओं को बोर्ड के विचार-विमर्श में शामिल करेगा.
क्रिएटिव और मीडिया विशेषज्ञता को मिलेगी मजबूती
नए बोर्ड में विज्ञापन जगत के अनुभवी नामों को भी शामिल किया गया है. BBDO India के जोसी पॉल और ऑर्चर्ड एडवरटाइजिंग के अमितेश राव क्रिएटिव और रणनीतिक विशेषज्ञता को मजबूत करेंगे. वहीं, लियो बर्नेट के ललाटेंदु दास मीडिया क्षेत्र का अनुभव लेकर बोर्ड से जुड़ेंगे.
इसके अलावा, आर.के. स्वामी के श्रीनिवासन के. स्वामी, मैडिसन कम्युनिकेशंस के सैम बलसारा, WPP मीडिया के प्रशांत कुमार, मैट्रिक्स पब्लिसिटीज एंड मीडिया इंडिया के विष्णुदास हरदसानी, FCB उल्का एडवरटाइजिंग के धीरज सिन्हा, ओगिल्वी एंड माथर की हेप्जिबा पाठक, इनोशन वर्ल्डवाइड कम्युनिकेशन के संतोष कुमार, एवरेस्ट ब्रांड सॉल्यूशंस की तान्या गोयल, प्लेटिनम एडवरटाइजिंग के अजीत वर्गीज, ओम्निकॉम मीडिया के कार्तिक शर्मा, हवास मीडिया के मोहित जोशी और पब्लिसिस कम्युनिकेशंस की अनुप्रिया आचार्य बोर्ड में अपनी भूमिका जारी रखेंगे. शशि सिन्हा और विक्रम सखूजा को विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में शामिल किया गया है.
प्रमुख विज्ञापन और मीडिया नेटवर्क की भागीदारी
नए बोर्ड में ओगिल्वी, रेडिफ्यूजन, इनोशन और साची एंड साची जैसी प्रमुख फुल-सर्विस विज्ञापन एजेंसियों का प्रतिनिधित्व बना रहेगा. मीडिया कारोबार की ओर से WPP मीडिया, ओम्निकॉम मीडिया, हवास मीडिया, पब्लिसिस मीडिया और मैडिसन कम्युनिकेशंस की विशेषज्ञता भी बोर्ड को मिलेगी.
एसोसिएशन के मुताबिक, बोर्ड में व्यापक प्रतिनिधित्व का उद्देश्य उद्योग के भीतर सहयोग बढ़ाना और प्रतिभा विकास, कारोबार की वृद्धि तथा तकनीकी बदलाव से पैदा हो रहे अवसरों पर काम करना है.
क्रिएटिव, मीडिया और AI पर नई पहल की तैयारी
AAAI के अध्यक्ष डॉ. संदीप गोयल ने कहा कि नए बोर्ड में अनुभवी उद्योग नेतृत्व, स्वतंत्र उद्यमियों की ऊर्जा और विज्ञापन क्षेत्र की प्रतिभाओं को एक साथ लाया गया है. उन्होंने कहा कि एसोसिएशन का लक्ष्य उद्योग की विविधता को प्रतिबिंबित करना और स्वतंत्र एजेंसियों को अधिक प्रभावी भूमिका तथा भागीदारी के अवसर देना है.
गोयल के मुताबिक, एसोसिएशन आने वाले सप्ताह में क्रिएटिव, मीडिया, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और टेक्नोलॉजी से जुड़ी कुछ नई पहलों की घोषणा करेगा. इन पहलों में स्वतंत्र विज्ञापन एजेंसियों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा.
AIMRA) के मुताबिक, स्मार्टफोन की कमजोर मांग का असर केवल ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक सीमित नहीं है. नवरात्रि शुरू होने के बाद से ऑफलाइन दुकानों पर स्मार्टफोन की बिक्री में करीब 20 फीसदी की गिरावट आई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
त्योहारी सीजन में स्मार्टफोन की बिक्री बढ़ने की उम्मीदों को झटका लगा है. नवरात्रि के दौरान ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर स्मार्टफोन की बिक्री में 16 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है, जबकि ऑफलाइन बाजार में भी बिक्री करीब 20 फीसदी तक घटी है. फोन की बढ़ती कीमतें, मेमोरी चिप महंगी होने और त्योहारी ऑफर्स में मिलने वाली छूट कम होने से ग्राहक खरीदारी टाल रहे हैं. इसका असर मोबाइल कंपनियों से लेकर रिटेलर्स तक के कारोबार पर पड़ रहा है. कई ग्राहक नया फोन खरीदने के बजाय पुराने फोन की मरम्मत करा रहे हैं या सेकंड हैंड फोन का विकल्प चुन रहे हैं. हालांकि, 45,000 रुपये से अधिक कीमत वाले प्रीमियम स्मार्टफोन की मांग अब भी बनी हुई है.
कम डिस्काउंट और बढ़ती कीमतों से घटी मांग
मार्केट रिसर्च फर्म काउंटरपॉइंट रिसर्च के मुताबिक, ई-कॉमर्स कंपनियों की नवरात्रि सेल के दौरान स्मार्टफोन की बिक्री में 16 फीसदी की गिरावट आई है. रिपोर्ट के अनुसार, ग्राहकों में फोन खरीदने की दिलचस्पी है, लेकिन बढ़ती कीमतों के कारण उनका बजट खरीदारी में बाधा बन रहा है. अमेजन, फ्लिपकार्ट और जियोमार्ट जैसे प्लेटफॉर्म के लिए त्योहारी सीजन अहम होता है, लेकिन इस बार स्मार्टफोन की बिक्री उम्मीद के मुताबिक नहीं रही.
पहले त्योहारी सेल में ग्राहकों को 25 से 40 फीसदी तक की छूट मिल जाती थी, लेकिन इस बार डिस्काउंट घटकर करीब 10 से 25 फीसदी रह गया है. इसकी प्रमुख वजह स्मार्टफोन बनाने की लागत में बढ़ोतरी है. मेमोरी चिप की कीमतें दो से तीन गुना तक बढ़ने के साथ रुपये की कमजोरी और माल ढुलाई की लागत ने भी कंपनियों पर दबाव बढ़ाया है. रिपोर्ट के मुताबिक, इन वजहों से स्मार्टफोन की कीमतों में औसतन 35 से 40 फीसदी तक बढ़ोतरी हुई है. लागत बढ़ने के कारण कंपनियां पहले की तरह भारी छूट देने से बच रही हैं.
ऑफलाइन बाजार में भी बिक्री सुस्त
स्मार्टफोन की कमजोर मांग का असर केवल ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक सीमित नहीं है. ऑल इंडिया मोबाइल रिटेलर्स एसोसिएशन (AIMRA) के मुताबिक, नवरात्रि शुरू होने के बाद से ऑफलाइन दुकानों पर स्मार्टफोन की बिक्री में करीब 20 फीसदी की गिरावट आई है. संगठन ने त्योहारी सीजन में कुल रिटेल बिक्री पिछले साल के मुकाबले 15 फीसदी से अधिक घटने की आशंका जताई है.
AIMRA के फाउंडर चेयरमैन कैलाश लख्यानी के मुताबिक, महंगाई के कारण सितंबर में दुकानों पर आने वाले ग्राहकों की संख्या में भी 40 से 50 फीसदी तक की कमी देखी गई थी. कमजोर मांग के चलते कुछ ब्रांड अपने स्टॉक को निकालने के लिए सेल की अवधि बढ़ा रहे हैं.
नया फोन खरीदने के बजाय पुराने से चला रहे काम
स्मार्टफोन की बढ़ती कीमतों का असर ग्राहकों के खरीदारी के फैसलों पर भी दिख रहा है. रिटेल बाजार में बड़ी संख्या में फोन किस्तों यानी कंज्यूमर फाइनेंसिंग के जरिए बेचे जाते हैं, लेकिन बढ़ते खर्च के कारण ग्राहक अब नई खरीदारी को टाल रहे हैं. कई लोग पुराने फोन की मरम्मत कराकर उसका इस्तेमाल जारी रख रहे हैं, जबकि कुछ ग्राहक सेकंड हैंड स्मार्टफोन खरीद रहे हैं. इससे नए स्मार्टफोन की मांग प्रभावित हो रही है.
प्रीमियम स्मार्टफोन की मांग बरकरार
बाजार में सुस्ती के बावजूद 45,000 रुपये से अधिक कीमत वाले प्रीमियम स्मार्टफोन की मांग बनी हुई है. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 2026 के शुरुआती आठ महीनों में स्मार्टफोन की कुल बिक्री में 10 फीसदी की गिरावट आई, लेकिन बिक्री के मूल्य में 4 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. इसकी एक वजह फोन की औसत बिक्री कीमत (ASP) में इजाफा होना है.
रिटेलर्स के अनुसार, एप्पल, सैमसंग, वीवो, ओप्पो और शाओमी जैसे ब्रांड के स्मार्टफोन की औसत कीमत अब 35,000 से 37,000 रुपये के बीच पहुंच गई है. यानी कम संख्या में फोन बिकने के बावजूद बढ़ी हुई कीमतों के कारण कंपनियों की कुल बिक्री के मूल्य में गिरावट सीमित रही है.
दिवाली के बाद महंगे हो सकते हैं स्मार्टफोन
जानकारों को उम्मीद है कि दिवाली के आसपास स्मार्टफोन की बिक्री में कुछ सुधार देखने को मिल सकता है, लेकिन पूरे त्योहारी सीजन में बिक्री पर दबाव बने रहने की आशंका है. वहीं, मेमोरी चिप की बढ़ती कीमतों और अन्य लागतों के कारण दिवाली के बाद स्मार्टफोन की कीमतों में एक बार फिर बढ़ोतरी हो सकती है. यदि ऐसा होता है, तो बजट और मिड-रेंज स्मार्टफोन खरीदने वाले ग्राहकों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ सकता है.