UN के अनुसार दुनिया में आज कोई एक बिलियन से ज्यादा लोग मेंटल हेल्थ की समस्या से जूझ रहे हैं. कामकाजी क्षेत्रों में मेंटल हेल्थ की समस्या के कारण के कंपनियों की प्रोडक्टिविटी प्रभावित हो रही है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
मेंटल हेल्थ से जुड़ा मामला सभी के लिए महत्वपूर्ण है. जब भी कहीं इस पर बात होती है तो हर कोई इस पर बड़ी गंभीरता से बात करता है. लेकिन सवाल ये है कि क्या मेंटल हेल्थ के विषय को हमारे वर्कप्लेस में आज भी गंभीरता से लिया जा रहा है. क्या इसकी अवेयरनेस को लेकर किसी तरह का कोई प्रयास हो रहा है.
बड़ी संख्या में लोग जूझ रहे हैं इस समस्या से
यूनाइटेड नेशन के अनुसार पूरी दुनिया में आज कोई एक बिलियन से ज्यादा लोग मेंटल हेल्थ की समस्या से जूझ रहे हैं. कामकाजी क्षेत्रों में मेंटल हेल्थ की समस्या के कारण के आज कंपनियों की प्रोक्डिटिविटी भी प्रभावित हो रही है. यही नहीं इसके कारण आज लोग वर्कप्लेस से अबसेंट भी हो रहे हैं. इसलिए अब समय आ गया है कि जब कॉरपोरेट जगत को अपने कर्मचारियों की मेंटल हेल्थ पर ध्यान देने की जरूरत है.
एसटीएलओ की सीएचआरओ अंजली बाइस कहती है कि महामारी ने कर्मचारियों के दिमाग पर बुरा असर डाला है. ऐसे में हमें उनके ओवरऑल हेल्थ के साथ- साथ मेंटल हेल्थ को लेकर भी ध्यान देने की जरूरत है.
आखिर कंपनी कैसे पहचाने समस्या को
जानकार बताते हैं कि इसे किसी भी कमर्चारी की बातों में पॉजिटीव और नेगेटिव बातों के जरिए जाना जा सकता है. कमर्चारी अपनी कंपनी को अपनी खराब मानसिक स्थिति को बताने में घबराता है. क्यों कि उसे लगता है कि ये बताने के बाद उसकी कंपनी से उसे निकाला जा सकता है या उसके खिलाफ कोई कार्रवाई की जा सकती है.
इंगेज्ड स्ट्रेटजी के फाउंडर और एमडी क्रिस्टीफर क्रिस रावर्ट कहते हैं कि इसे वर्कप्लेस में कर्मचारी के अलग-अलग तरह के व्यवहार से भी जाना जा सकता है। विशेष तौर उसके नकारात्मक भावानाओं जैसे परेशानी, डर,तनाव और उलझन इनसे जाना जा सकता है. वो कहते हैं कि संस्थानों के पास अपने कर्मचारियों की मेंटल हेल्थ से लेकर दूसरी समस्याओं के लिए योजना होनी चाहिए, जिससे इसके चलते संस्थान में कोई हादसा न हो और उसके चलते कोई तनाव ना फैले.
अलग-अलग कार्यक्रम से मिल सकती है राहत
कर्मचारियों की इस समस्या को कई तरह से दूर किया जा सकता है. कंपनी इसके लिए अपने इंप्लॉई के ट्रेनिंग प्रोग्राम ऑफर कर सकती हैं. जिसमें उन्हें सेल्फ लीडरशिप और सेंस ऑफ हैप्पीनेस जैसे कार्यक्रम शामिल हैं. इसके अतिरिक्त इंप्लॉई असिस्टेंट प्रोग्राम जैसे कार्यक्रम चलाकर उन्हें इससे दूर किया जा सकता है. बास कहते हैं कि टीम्स का मेंटल हेल्थ चेकअप, उनकी बातचीत के लिए एक ओपन स्पेस बनाने के अतिरिक्त सेल्फ हेल्प टूल बनाकर भी इस समस्या को दूर किया जा सकता है.
योगा भी दे सकता है बड़ी राहत
इस समस्या से खुद इंप्लॉय भी यागा जैसी एक्टिविटी करके काफी हद तक नियंत्रण पा सकते हैं. रोज ना सही लेकिन इसे वैकल्पिक दिनों में करके भी इस पर नियंत्रण पाया जा सकता है. योग के अंतर्गत किए जाने वाले आसन आपको फिजिकली स्वस्थ रख सकते हैं और आलस्य को दूर रख सकते हैं. प्राणायाम आपके मन और मस्तिष्क को स्वस्थ रखने में मददगार साबित हो सकता है.
विदेशी निवेशक SEBI और सरकार पर 2023 के एक सख्त सर्कुलर को कमजोर करने के लिए आक्रामक रूप से दबाव बना रहे हैं, जो अपारदर्शी ऑफशोर संरचनाओं के पीछे छिपे वास्तविक मालिकों का खुलासा कर सकता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
विदेशी निवेशक चुपचाप सेबी (SEBI) और सरकार पर 2023 के एक सर्कुलर को कमजोर करने के लिए दबाव डाल रहे हैं, जो रेगुलेटर्स को उन वास्तविक अल्टीमेट बेनिफिशियल ओनर्स को उजागर करने की शक्ति देता है जो अपारदर्शी ऑफशोर वाहनों के पीछे छिपे होते हैं. यह दबाव ऐसे समय में आया है जब भारत का सबसे शक्तिशाली एक्सचेंज, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज, सार्वजनिक होने की तैयारी कर रहा है. यह बाजार अखंडता की वह लड़ाई है जिसके बारे में कोई खुलकर चर्चा नहीं करना चाहता. फिर भी ट्रेडिंग स्क्रीन के पीछे एक शांत युद्ध चल रहा है, एक ऐसा युद्ध जो यह तय कर सकता है कि विदेशी निवेशक भारत के इक्विटी बाजारों की डोर कैसे अपने हाथ में रखते हैं.
गोपनीय सूत्रों के अनुसार नॉर्थ ब्लॉक और SEBI के मुंबई कार्यालयों में एक तनावपूर्ण गतिरोध की स्थिति है. एक ओर: वे रेगुलेटर्स हैं जिनके पास अपतटीय गोपनीयता की परतों को काटने के लिए बनाया गया नियम है. दूसरी ओर: शक्तिशाली विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक हैं जिन्होंने लंबे समय से अदृश्य बने रहने की कला में महारत हासिल कर रखी है.
SEBI का 24 अगस्त 2023 का सर्कुलर सिर्फ एक सामान्य अनुपालन नोट नहीं है, यह अपारदर्शिता के खिलाफ एक सर्जिकल स्ट्राइक है. यह विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के एक सीमित लेकिन शक्तिशाली हिस्से को उनके वास्तविक अल्टीमेट बेनिफिशियल ओनर्स का खुलासा करने के लिए मजबूर करता है, यानी उन प्राकृतिक व्यक्तियों तक जो अंततः पैसे को नियंत्रित करते हैं. इसके ट्रिगर पॉइंट स्पष्ट और गैर-परक्राम्य हैं: कोई भी FPI जिसके भारत AUM का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा किसी एक कॉरपोरेट समूह में लगा हो, या कोई भी FPI जो भारतीय इक्विटी में ₹25,000 करोड़ से अधिक का प्रबंधन करता हो, उसे बिना किसी थ्रेशहोल्ड और बिना किसी सुरक्षित छूट के पूर्ण ‘लुक-थ्रू’ डिस्क्लोजर देना होगा. सॉवरेन वेल्थ फंड, सार्वजनिक रिटेल स्कीम्स और वास्तव में विविधीकृत पूल्ड वाहन स्पष्ट रूप से इससे बाहर रखे गए हैं. एक ही कदम में, रेगुलेटर ने स्वामित्व को कई संस्थाओं में बांटकर डिस्क्लोजर सीमा के ठीक नीचे रखने के पुराने खेल को खत्म कर दिया.
इसके केंद्र में SEBI का 24 अगस्त 2023 का “अतिरिक्त खुलासों” वाला सर्कुलर है. यह सामान्य कागजी कार्रवाई से कहीं आगे जाकर कुछ FPIs को जटिल संरचनाओं के पीछे मौजूद वास्तविक मानव व्यक्तियों का खुलासा करने के लिए मजबूर करता है, बिना किसी थ्रेशहोल्ड के, बिना किसी सुरक्षित छूट के, प्राकृतिक व्यक्तियों तक पूरा लुक-थ्रू.
ट्रिगर क्या है? वर्षों से भारतीय कंपनियों में केंद्रित हिस्सेदारी को लेकर चिंता, जो अपतटीय वाहनों में बिखरे रूप में रखी जाती थी और डिस्क्लोजर नियमों से बच निकलती थी. हिंडनबर्ग-अडानी प्रकरण के बाद SEBI ने जोखिम देखा: एक ही समूह में विशाल पोजिशन, जो कागज पर तो विविध दिखती थीं लेकिन संभवतः प्रमोटर या समन्वित नियंत्रण को छिपा सकती थीं, जिससे टेकओवर नियमों या सार्वजनिक शेयरधारिता आवश्यकताओं से बचाव हो सकता था. यह नियम उच्च-जोखिम मामलों को लक्षित करता है, वे फंड जिनका भारत AUM का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा एक कॉरपोरेट समूह में है, या वे जो भारतीय इक्विटी में ₹25,000 करोड़ से अधिक का प्रबंधन करते हैं. सॉवरेन वेल्थ फंड, रिटेल फंड और विविधीकृत वाहन इससे मुक्त हैं.
FPIs इस कदम को कमजोर करने के लिए जोरदार कोशिश कर रहे हैं. उनका तर्क है कि इससे पूंजी का पलायन होगा और ‘ईज ऑफ डूइंग बिज़नेस’ को नुकसान पहुंचेगा. असली मुद्दा, सूत्रों के अनुसार, यह है कि यह संभाव्य इनकार (plausible deniability) को तोड़ देता है और कानूनी स्वामित्व तथा आर्थिक वास्तविकता के बीच तालमेल को मजबूर करता है.
समय का चयन कोई संयोग नहीं है. NSE की लंबे समय से लंबित लिस्टिंग आखिरकार आगे बढ़ रही है. अधिकांश कंपनियों के विपरीत, NSE का कोई स्पष्ट प्रमोटर समूह नहीं है, इसकी स्वामित्व संरचना बिखरी हुई है, जिसमें संस्थागत निवेशकों, जिनमें FPIs भी शामिल हैं, की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है जो मौरिशस जैसे टैक्स हेवन के जरिए संरचित हैं. इनमें से कुछ हिस्से वर्षों पहले भारतीय सार्वजनिक संस्थानों से सस्ते में खरीदे गए थे. गहरी पारदर्शिता के बिना, वास्तविक विकेंद्रीकरण और छिपे नियंत्रण के बीच अंतर करना कठिन है.
यही वह अंतर है जिसे 2023 का सर्कुलर बंद करने के लिए बनाया गया था. कुछ अपारदर्शी संरचनाओं ने इसके लागू होने के बाद Adani स्टॉक्स से कथित रूप से बाहर निकलना शुरू कर दिया. SEBI ने 2024-25 में पहले ही फ्रेमवर्क के कुछ हिस्सों को आसान किया है, थ्रेशहोल्ड बढ़ाकर और अनुपालन को व्यापार-अनुकूलता के नाम पर नरम करके. लेकिन डर यह है कि आगे की कमजोरियाँ इसकी धार को खत्म कर सकती हैं.
सभ्य भाषा और परामर्शों को हटाकर देखें तो यह शक्ति और सूचना पर एक सीधी लड़ाई है. ऑफशोर पूंजी गति, लचीलापन और अधिकार क्षेत्र की परतदार अस्पष्टता पर टिकी रही है. यह नियम तस्वीर को उलट देता है: यदि आप भारत में बड़े या अत्यधिक केंद्रित हैं, तो पूरी तरह खुलासा करें या बाहर निकलें. NSE के सूचीबद्ध होने के करीब आते ही दांव एक IPO से कहीं आगे बढ़ जाते हैं. यह इस बारे में है कि वास्तव में बाजार के हिस्सों का मालिक कौन है और क्या रेगुलेटर के पास इसे पता करने के उपकरण बने रहेंगे. बाजार की अखंडता गैर-परक्राम्य है, खासकर अब. सवाल अब एक धार की तरह लटक रहा है: जैसे ही NSE लिस्ट होने की तैयारी कर रहा है, क्या रेगुलेटर उस नियम को, जो बाजार की अखंडता की रक्षा के लिए बनाया गया था, चुपचाप कमजोर होने देगा या वह अपनी स्थिति पर कायम रहेगा?
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
सनथ आर पुलिक्कल का इस्तीफा बजाज कंज्यूमर केयर के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है. हालांकि, कंपनी की ओर से अभी उनके उत्तराधिकारी को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश की प्रमुख पर्सनल केयर कंपनी बजाज कंज्यूमर केयर (Bajaj Consumer Care Limited) में बड़ा प्रबंधन बदलाव हुआ है. कंपनी के चीफ मार्केटिंग ऑफिसर (CMO) सनथ आर पुलिक्कल ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है.
सनथ आर पुलिक्कल जून 2024 में बजाज कंज्यूमर केयर से जुड़े थे. अपने कार्यकाल के दौरान वे कंपनी के पर्सनल केयर पोर्टफोलियो के प्रमुख ब्रांड्स की मार्केटिंग रणनीतियों का नेतृत्व कर रहे थे. उनके नेतृत्व में ब्रांड पोजिशनिंग और मार्केट विस्तार पर विशेष ध्यान दिया गया.
दाबर इंडिया में भी निभा चुके हैं जिम्मेदारी
डबजाज कंज्यूमर केयर से पहले पुलिक्कल डावर इंडिया Dabur India Limited के साथ जुड़े हुए थे. जहां वे जनरल मैनेजर – मार्केटिंग (होम केयर) के पद पर कार्यरत थे. इस दौरान उन्होंने ओडोमॉस (Odomos) और ओडोनिल (Odonil) जैसे लोकप्रिय ब्रांड्स की जिम्मेदारी संभाली.
दो दशकों से अधिक का अनुभव
पुलिक्कल के पास मार्केटिंग क्षेत्र में दो दशकों से अधिक का अनुभव है. उन्होंने टाटा मोटर्स (Tata Motors), ज्योति लैब्स (Jyothy Labs) और महिंद्रा (Mahindra & Mahindra) जैसी बड़ी कंपनियों में भी काम किया है. उनका अनुभव एफएमसीजी और ऑटोमोबाइल दोनों क्षेत्रों में फैला हुआ है.
सनथ आर पुलिक्कल का इस्तीफा बजाज कंज्यूमर केयर के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है. हालांकि, कंपनी की ओर से अभी उनके उत्तराधिकारी को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है.
कंपनी के अनुसार, नए ट्विन फ्यूल वेरिएंट उन्नत तकनीक से लैस हैं, जो वाहनों को CNG और पेट्रोल के बीच आसानी से स्विच करने की सुविधा देते हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश की अग्रणी कमर्शियल वाहन निर्माता अशोक लेलैंड (Ashok Leyland) ने लाइट कमर्शियल व्हीकल (LCV) सेगमेंट में एक बड़ा कदम उठाते हुए अपने लोकप्रिय मॉडल DOST और DOST+ XL के नए ‘ट्विन फ्यूल’ वेरिएंट लॉन्च कर दिए हैं. यह लॉन्च ऐसे समय पर हुआ है जब बाजार में किफायती, पर्यावरण-अनुकूल और भरोसेमंद ट्रांसपोर्ट समाधानों की मांग तेजी से बढ़ रही है.
ग्राहकों की जरूरतों के हिसाब से नई तकनीक
कंपनी के अनुसार, नए ट्विन फ्यूल वेरिएंट उन्नत तकनीक से लैस हैं, जो वाहनों को CNG और पेट्रोल के बीच आसानी से स्विच करने की सुविधा देते हैं. यह फीचर खासतौर पर उन ऑपरेटरों के लिए फायदेमंद है जो सीएनजी स्टेशन की सीमित उपलब्धता के कारण रेंज को लेकर चिंतित रहते हैं.
अब ड्राइवर बिना किसी रुकावट के लंबी दूरी तय कर सकते हैं और जरूरत पड़ने पर तुरंत पेट्रोल मोड में शिफ्ट हो सकते हैं. इससे न सिर्फ परिचालन में लचीलापन बढ़ता है, बल्कि यात्रा भी अधिक भरोसेमंद बनती है.
कंपनी नेतृत्व ने क्या कहा
लॉन्च के दौरान कंपनी के प्रेसिडेंट (LCV, IO, डिफेंस और पावर सॉल्यूशंस) अमनदीप सिंह ने कहा कि यह कदम कंपनी की ग्राहक-केंद्रित और टिकाऊ मोबिलिटी की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है. उनके अनुसार, ट्विन फ्यूल तकनीक ऑपरेटरों को कम लागत और कम उत्सर्जन के साथ बेहतर विकल्प देती है. उन्होंने कहा, “हमने सिर्फ गाड़ियां नहीं बनाई, बल्कि एक पूरी मार्केट का नजरिया बदल दिया और आज वही बदलाव हमें आगे बढ़ा रहा है.”
वहीं, LCV बिजनेस हेड विपलव शाह ने बताया कि DOST रेंज पहले से ही छोटे व्यवसायों और फ्लीट ऑपरेटरों के बीच बेहद लोकप्रिय है, और नया वेरिएंट उन्हें अधिक दक्षता और विकल्प प्रदान करेगा.
दमदार परफॉर्मेंस और बढ़ी हुई रेंज
1. DOST ट्विन फ्यूल
- पेलोड क्षमता: 1218 किलोग्राम
- ड्राइविंग रेंज: लगभग 400 किमी
- सीएनजी टैंक: 120 लीटर
- पेट्रोल टैंक: 5 लीटर (इमरजेंसी बैकअप)
2. DOST+ XL ट्विन फ्यूल
- पेलोड क्षमता: 1410 किलोग्राम
- ड्राइविंग रेंज: लगभग 500 किमी
- सीएनजी टैंक: 148 लीटर
- पेट्रोल टैंक: 5 लीटर
इन स्पेसिफिकेशंस के साथ दोनों मॉडल शहरी और अर्ध-शहरी लॉजिस्टिक्स, लास्ट-माइल डिलीवरी और छोटे व्यवसायों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकते हैं.
छोटे व्यापारियों के लिए गेम-चेंजर
ट्विन फ्यूल तकनीक से ऑपरेटर अब कम लागत में सीएनजी पर संचालन कर सकते हैं और जरूरत पड़ने पर पेट्रोल का सहारा लेकर लंबी दूरी तय कर सकते हैं. इससे न केवल ईंधन खर्च घटता है, बल्कि काम के अवसर और आय की संभावनाएं भी बढ़ती हैं. साथ ही, कम उत्सर्जन के चलते ये वाहन भारत के सस्टेनेबिलिटी लक्ष्यों को भी समर्थन देते हैं.
कीमत और उपलब्धता
कंपनी ने इन नए वेरिएंट्स को प्रतिस्पर्धी कीमत पर लॉन्च किया है.
- DOST ट्विन फ्यूल: ₹8.20 लाख (एक्स-शोरूम)
- DOST+ XL ट्विन फ्यूल: ₹8.75 लाख (एक्स-शोरूम)
बाजार में मजबूत होगी पकड़
DOST रेंज में ट्विन फ्यूल तकनीक जोड़कर Ashok Leyland ने यह साफ कर दिया है कि वह बदलती बाजार जरूरतों के साथ तेजी से खुद को ढाल रही है. भरोसेमंद प्रदर्शन, बेहतर माइलेज और नई तकनीक का यह संयोजन कंपनी की LCV सेगमेंट में स्थिति को और मजबूत कर सकता है.
यूरोपीय संसद के भीतर पेश एक ड्राफ्ट प्रस्ताव के अनुसार, CBAM के तहत स्टील और एल्युमिनियम आधारित करीब 180 अतिरिक्त उत्पादों को शामिल किया जा सकता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
यूरोपीय संघ (European Union) अपने कार्बन प्राइसिंग ढांचे को और व्यापक बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. प्रस्ताव है कि आयातित स्टील और एल्युमिनियम से जुड़े उत्पादों पर कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) का दायरा बढ़ाया जाए, जिससे वैश्विक निर्यातकों पर बड़ा असर पड़ सकता है.
दायरे में आएंगे और अधिक उत्पाद
यूरोपीय संसद (European Parliament) के भीतर पेश एक ड्राफ्ट प्रस्ताव के अनुसार, CBAM के तहत स्टील और एल्युमिनियम आधारित करीब 180 अतिरिक्त उत्पादों को शामिल किया जा सकता है. यह बदलाव 1 जनवरी 2028 से लागू होने की सिफारिश के साथ सामने आया है. यह कदम मौजूदा व्यवस्था से आगे बढ़कर सिर्फ कच्चे माल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि प्रोसेस्ड और मैन्युफैक्चर्ड उत्पादों को भी अपने दायरे में ले आएगा.
उद्योगों पर बढ़ेगा दबाव
European Parliament Committee on the Environment, Climate and Food Safety की रिपोर्ट के अनुसार, यदि यह प्रस्ताव लागू होता है तो कई औद्योगिक सेक्टरों पर कार्बन आधारित शुल्क का प्रभाव और गहरा होगा. इसका मतलब यह है कि अब केवल बेस मेटल ही नहीं, बल्कि वैल्यू-ऐडेड उत्पादों के निर्यातकों को भी यूरोपीय बाजार में प्रवेश के लिए अतिरिक्त नियमों और लागत का सामना करना पड़ सकता है.
भारत सहित कई देशों की चिंता
यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया है जब भारत और यूरोपीय संघ के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को अंतिम रूप देने की दिशा में बातचीत चल रही है. इन वार्ताओं में CBAM एक विवादित मुद्दा बना हुआ है, क्योंकि यह जलवायु आधारित कर प्रणाली व्यापार प्रतिस्पर्धा और बाजार पहुंच को प्रभावित कर सकती है.
क्या है CBAM
कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) एक ऐसी व्यवस्था है, जिसके तहत आयातित उत्पादों पर उनके उत्पादन के दौरान हुए कार्बन उत्सर्जन के आधार पर शुल्क लगाया जाता है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी उत्पादक भी वही पर्यावरण मानक अपनाएं, जो यूरोपीय संघ अपने घरेलू उद्योगों पर लागू करता है.
2030 तक और बढ़ सकता है दायरा
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (Global Trade Research Initiative) ने चेतावनी दी है कि यदि CBAM का दायरा इसी तरह बढ़ता रहा, तो 2030 तक यूरोपीय संघ में जाने वाले अधिकांश औद्योगिक उत्पाद इस कार्बन टैक्स के दायरे में आ सकते हैं. ऐसे में निर्यातकों को प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए अपनी उत्पादन तकनीक और कीमतों में बदलाव करना पड़ सकता है.
व्यापार पर दूरगामी असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम वैश्विक व्यापार के नियमों को नया आकार दे सकता है. बढ़ते पर्यावरणीय मानकों के बीच कंपनियों को न केवल लागत बल्कि रणनीति के स्तर पर भी बदलाव करने होंगे. यूरोपीय संघ का यह प्रस्ताव आने वाले वर्षों में अंतरराष्ट्रीय व्यापार और उद्योग जगत के लिए एक बड़ा निर्णायक कारक बन सकता है.
इस निवेश के जरिए HDFC Bank और HDFC Life Insurance दोनों ही आने वाले समय में स्थिरता और ग्रोथ को संतुलित करने की रणनीति पर आगे बढ़ते नजर आ रहे हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश के प्रमुख निजी बैंक एचडीएफसी (HDFC Bank) ने अपनी सहयोगी कंपनी HDFC Life Insurance Company में ₹1,000 करोड़ का निवेश करने का फैसला किया है. यह निवेश प्रेफरेंशियल शेयर अलॉटमेंट के जरिए किया जाएगा, जिसका मकसद कंपनी की सॉल्वेंसी स्थिति को मजबूत करना है.
हिस्सेदारी में होगी बढ़ोतरी
इस निवेश के तहत HDFC Life Insurance Company अपने पैरेंट HDFC Bank को ₹688.52 प्रति शेयर के हिसाब से 1.45 करोड़ इक्विटी शेयर जारी करेगी. इसके बाद बैंक की हिस्सेदारी कंपनी में 50.21 प्रतिशत से बढ़कर 50.54 प्रतिशत हो जाएगी.
सॉल्वेंसी रेश्यो में गिरावट के बाद कदम
यह पूंजी निवेश ऐसे समय पर किया जा रहा है जब कंपनी का सॉल्वेंसी रेश्यो मार्च 2026 के अंत तक घटकर 177 प्रतिशत रह गया है, जो एक साल पहले 194 प्रतिशत था. हालांकि, यह अभी भी नियामकीय न्यूनतम 150 प्रतिशत से ऊपर है.
फंडिंग से मिलेगा मजबूती का सहारा
कंपनी के अनुसार, इस फंडिंग से सॉल्वेंसी रेश्यो में करीब 900 बेसिस पॉइंट्स का इजाफा होने की उम्मीद है, जिससे यह बढ़कर लगभग 186 प्रतिशत तक पहुंच सकता है. इससे भविष्य की ग्रोथ के लिए अतिरिक्त वित्तीय क्षमता मिलेगी. जीवन बीमा कंपनियों के पास साल के दौरान सबऑर्डिनेट डेट के जरिए भी पूंजी जुटाने का विकल्प होता है, जिससे उनकी पूंजी संरचना और मजबूत हो सकती है.
बदलते नियमों के लिए तैयारी
HDFC Life Insurance Company ने कहा कि यह अतिरिक्त पूंजी उसे रिस्क-बेस्ड कैपिटल फ्रेमवर्क की ओर बढ़ने में मदद करेगी. इस दिशा में विस्तृत नियामकीय दिशा-निर्देश अभी आने बाकी हैं. साथ ही, यह निवेश कंपनी को देनदारियों से अधिक रखी गई परिसंपत्तियों के लिए बढ़ी हुई पूंजी आवश्यकताओं को पूरा करने में भी सहायक होगा.
ग्रोथ पर रहेगा फोकस
इस निवेश के जरिए HDFC Bank और HDFC Life Insurance Company दोनों ही आने वाले समय में स्थिरता और ग्रोथ को संतुलित करने की रणनीति पर आगे बढ़ते नजर आ रहे हैं. बदलते रेगुलेटरी माहौल में यह कदम कंपनी की दीर्घकालिक मजबूती के लिए अहम माना जा रहा है.
RBI का यह कदम अस्थिर वैश्विक परिस्थितियों के बीच रुपये को स्थिर करने की एक रणनीतिक कोशिश माना जा रहा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ईरान तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के बीच भारतीय रुपये पर बने दबाव को कम करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने एक अहम रणनीतिक कदम उठाया है. केंद्रीय बैंक ने सरकारी तेल विपणन कंपनियों को खुले बाजार से सीधे डॉलर खरीदने पर रोक लगाने का निर्णय लिया है. अब इन कंपनियों को विदेशी मुद्रा जरूरतों के लिए स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की विशेष क्रेडिट लाइन का इस्तेमाल करना होगा.
तेजी से कमजोर होते रुपये पर RBI की नजर
हाल के महीनों में वैश्विक तनाव और विदेशी पूंजी की निकासी के चलते रुपये में भारी दबाव देखा गया है. स्थिति ऐसी बनी कि मार्च के अंतिम सप्ताह में डॉलर के मुकाबले रुपया ऐतिहासिक निचले स्तर 95 के करीब पहुंच गया था. लगातार बढ़ते तेल आयात बिल और विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने इस गिरावट को और तेज कर दिया. इसी स्थिति को नियंत्रित करने के लिए RBI ने अब उन आपातकालीन उपायों को दोबारा सक्रिय किया है, जिन्हें पहले वैश्विक संकट के दौरान भी इस्तेमाल किया गया था.
तेल कंपनियों की डॉलर खरीद पर नई व्यवस्था
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, RBI ने देश की प्रमुख सरकारी तेल कंपनियों, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC), हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) और भारत पेट्रोलियम (BPCL) से कहा है कि वे अब सीधे स्पॉट मार्केट से डॉलर की खरीदारी न करें. ये कंपनियां भारत की बड़ी तेल आयातक इकाइयां हैं और विदेशी मुद्रा बाजार में सबसे बड़े डॉलर खरीदारों में शामिल हैं. उनकी सीधी खरीदारी से रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जिसे नियंत्रित करने के लिए यह कदम उठाया गया है.
SBI के जरिए मिलेगा विदेशी मुद्रा का रास्ता
नई व्यवस्था के तहत तेल कंपनियों को अब स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के माध्यम से विशेष क्रेडिट लाइन का उपयोग करना होगा. SBI पहले से ही बड़े सरकारी और व्यापारिक लेन-देन को संभालता रहा है. इस प्रणाली के जरिए डॉलर की मांग को नियंत्रित चैनल में लाया जाएगा, जिससे खुले बाजार में अचानक मांग बढ़ने से रुपये पर दबाव नहीं बनेगा.
बाजार में अस्थिरता कम करने की कोशिश
RBI ने केवल तेल कंपनियों की खरीद पर ही नहीं, बल्कि विदेशी मुद्रा बाजार में सट्टेबाजी और अस्थिरता बढ़ाने वाली गतिविधियों पर भी सख्ती बढ़ाई है. बैंकों को कॉरपोरेट्स के साथ कुछ प्रकार के फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट करने से भी रोका गया है, ताकि अनावश्यक उतार-चढ़ाव को सीमित किया जा सके. इसके साथ ही केंद्रीय बैंक ने जरूरत पड़ने पर अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर की बिक्री भी की है, ताकि बाजार में स्थिरता बनी रहे.
रुपये में दिखने लगे शुरुआती सुधार के संकेत
इन कदमों का असर अब बाजार में दिखने लगा है. विदेशी मुद्रा ट्रेडर्स के अनुसार, तेल कंपनियों की स्पॉट डॉलर खरीदारी में हाल के दिनों में कमी आई है, जिससे दबाव घटा है. रुपया अपने निचले स्तर से करीब 2% मजबूत होकर रिकवरी की ओर बढ़ा है और हाल ही में यह लगभग 93.20 प्रति डॉलर के स्तर पर दर्ज किया गया.
RBI के आंकड़ों के मुताबिक, 2016 की नोटबंदी के बाद भी नकदी का चलन लगातार बढ़ा है. हालांकि 2,000 रुपये के नोट को 2023 में वापस लेने का फैसला किया गया था, लेकिन अब तक उसके 98% से ज्यादा नोट बैंकिंग सिस्टम में लौट चुके हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश में डिजिटल पेमेंट तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन नकदी की पकड़ अभी भी मजबूत बनी हुई है. वित्त वर्ष 2025-26 में चलन में मौजूद मुद्रा में जोरदार बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो यह दिखाती है कि डिजिटल क्रांति के बावजूद कैश की अहमियत कम नहीं हुई है.
ताजा आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 के अंत तक देश में चलन में मौजूद नकदी 11.9% बढ़कर 41.68 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई. यह बढ़ोतरी कोविड-19 महामारी के बाद सबसे तेज मानी जा रही है. सिर्फ FY26 में ही चलन में मुद्रा 4.44 लाख करोड़ रुपये बढ़ी, जो नोटबंदी के बाद 2017-18 के बाद की सबसे बड़ी बढ़ोतरी है.
डिजिटल पेमेंट के बावजूद क्यों बढ़ रहा कैश
भारतीय स्टेट बैंक (State Bank of India) के मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्य कांति घोष के अनुसार, डिजिटल भुगतान ने लेनदेन का तरीका जरूर बदला है, लेकिन लोगों की बचत और सुरक्षा की सोच अभी भी नकदी पर आधारित है. उनका कहना है कि नकदी में बढ़ोतरी ‘एहतियाती मांग’ और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था की गतिविधियों को दर्शाती है
UPI में भी जबरदस्त उछाल
एक तरफ नकदी बढ़ रही है, वहीं डिजिटल पेमेंट में भी रिकॉर्ड तेजी जारी है. FY26 में UPI ट्रांजैक्शन वैल्यू 21% बढ़कर 314.23 लाख करोड़ रुपये हो गई, जबकि ट्रांजैक्शन की संख्या 30% बढ़कर 241.6 अरब तक पहुंच गई. यानी साफ है कि देश में कैश और डिजिटल दोनों समानांतर रूप से मजबूत हो रहे हैं.
ग्रामीण अर्थव्यवस्था बनी बड़ी वजह
विशेषज्ञों के अनुसार नकदी की मांग बढ़ने की बड़ी वजह ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार है. IDFC First Bank की मुख्य अर्थशास्त्री Gaura Sen Gupta का कहना है कि लगातार अच्छे मॉनसून और बढ़ती ग्रामीण आय ने नकदी के उपयोग को बढ़ाया है. ग्रामीण इलाकों में अभी भी कैश लेनदेन का प्रमुख माध्यम बना हुआ है.
नोटबंदी के बाद भी कैश का दबदबा कायम
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों के मुताबिक, 2016 की नोटबंदी के बाद भी नकदी का चलन लगातार बढ़ा है. हालांकि 2,000 रुपये के नोट को 2023 में वापस लेने का फैसला किया गया था, लेकिन अब तक उसके 98% से ज्यादा नोट बैंकिंग सिस्टम में लौट चुके हैं.
क्यों बढ़ी नकदी की मांग
विशेषज्ञों के मुताबिक कई कारणों से नकदी की मांग बढ़ी है:
1. शादी और फेस्टिव सीजन में खर्च
2. ग्रामीण आय में सुधार
3. टैक्स और जीएसटी से जुड़ी चिंताएं
4. एहतियात के तौर पर कैश रखने की आदत
हालांकि GDP के अनुपात में नकदी का स्तर थोड़ा घटा है, लेकिन कुल मात्रा में तेजी यह दिखाती है कि भारत की अर्थव्यवस्था में कैश अभी भी अहम भूमिका निभा रहा है. डिजिटल और कैश, दोनों का संतुलन ही फिलहाल भारतीय अर्थव्यवस्था की असली तस्वीर पेश करता है.
वित्त वर्ष 2025-26 में Wipro का शुद्ध लाभ 13,197.4 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले साल की तुलना में मामूली 0.47% अधिक है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आईटी सेक्टर की दिग्गज कंपनी Wipro ने निवेशकों के लिए बड़ा ऐलान किया है. कंपनी ने अपने इतिहास के सबसे बड़े शेयर बायबैक प्लान को मंजूरी दे दी है. 15,000 करोड़ रुपये के इस बायबैक के जरिए कंपनी न सिर्फ शेयरधारकों को रिटर्न देना चाहती है, बल्कि बाजार में अपने मजबूत भरोसे का संकेत भी दे रही है.
बोर्ड ने दी सबसे बड़े बायबैक को मंजूरी
कंपनी के निदेशक मंडल ने 15,000 करोड़ रुपये तक के शेयर बायबैक प्रस्ताव को हरी झंडी दी है. यह अब तक का सबसे बड़ा बायबैक प्रोग्राम है. इसके तहत कंपनी 2 रुपये फेस वैल्यू वाले करीब 60 करोड़ इक्विटी शेयर वापस खरीदेगी, जो कुल चुकता पूंजी का लगभग 5.7% है. यह बायबैक 250 रुपये प्रति शेयर के भाव पर किया जाएगा, हालांकि इसे लागू करने के लिए शेयरधारकों की मंजूरी जरूरी होगी.
आईटी सेक्टर में मुकाबले की तस्वीर
भले ही यह Wipro का सबसे बड़ा बायबैक है, लेकिन आईटी सेक्टर की अन्य कंपनियों की तुलना में यह थोड़ा छोटा है. Infosys ने हाल ही में 18,000 करोड़ रुपये का बायबैक ऑफर दिया था, जो अब तक का सबसे बड़ा रहा है. वहीं Tata Consultancy Services (TCS) ने दिसंबर 2023 में 17,000 करोड़ रुपये का बायबैक पूरा किया था.
क्यों किया जाता है बायबैक
शेयर बायबैक आमतौर पर कंपनियां अतिरिक्त नकदी को शेयरधारकों को लौटाने के लिए करती हैं. इससे प्रति शेयर कमाई (EPS) बेहतर होती है और बाजार में कंपनी के वित्तीय स्वास्थ्य को लेकर भरोसा मजबूत होता है. इस कदम से यह भी संकेत मिलता है कि कंपनी अपने शेयर को मौजूदा कीमत पर आकर्षक मान रही है.
नतीजों के साथ आया बड़ा ऐलान
बायबैक की घोषणा ऐसे समय पर हुई है जब Wipro ने अपने चौथी तिमाही के नतीजे भी जारी किए हैं. जनवरी-मार्च तिमाही में कंपनी का शुद्ध लाभ 1.89% घटकर 3,501.8 करोड़ रुपये रह गया. हालांकि, कंपनी की आय में 7.6% की बढ़ोतरी हुई और यह 24,236.3 करोड़ रुपये पर पहुंच गई. तिमाही आधार पर मुनाफे और राजस्व में क्रमश: 12.2% और 2.8% की बढ़त दर्ज की गई.
कंपनी के सीईओ और एमडी Srini Pallia ने माना कि वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक और नीतिगत अनिश्चितताएं अब ‘न्यू नॉर्मल’ बन चुकी हैं. इसके बावजूद आईटी खर्च में मजबूती बनी हुई है, जो सेक्टर के लिए सकारात्मक संकेत है.
पूरे साल का प्रदर्शन
वित्त वर्ष 2025-26 में Wipro का शुद्ध लाभ 13,197.4 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले साल की तुलना में मामूली 0.47% अधिक है. वहीं कंपनी का कुल राजस्व 3.96% बढ़कर 92,624 करोड़ रुपये हो गया. वहीं, चौथी तिमाही में Wipro का प्रदर्शन मिला-जुला रहा, जहां कंपनी का शुद्ध लाभ सालाना आधार पर 1.9% घटकर 3,502 करोड़ रुपये रह गया, जबकि राजस्व 7.7% बढ़कर 24,236 करोड़ रुपये पर पहुंचा; हालांकि तिमाही आधार पर राजस्व में 2.9% और सालाना आधार पर कुल मिलाकर 12.3% की बढ़त दर्ज की गई. कंपनी का प्रदर्शन ब्लूमबर्ग के अनुमान के आसपास रहा, लेकिन राजस्व उम्मीदों से थोड़ा कम रहा. स्थिर मुद्रा के आधार पर आईटी सेवा राजस्व में सालाना 0.2% की गिरावट आई,
लॉन्ग टर्म निवेशकों को फायदा
यह मेगा बायबैक निवेशकों के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है. इससे न केवल शेयर की कीमत को सपोर्ट मिल सकता है, बल्कि लॉन्ग टर्म निवेशकों को बेहतर रिटर्न की उम्मीद भी बढ़ती है. आने वाले समय में बाजार की नजर इस बात पर रहेगी कि कंपनी इस बायबैक को कैसे और कितनी तेजी से लागू करती है.
गुरुवार को सेंसेक्स 122.56 अंक यानी 0.16% गिरकर 77,988.68 पर बंद हुआ. वहीं निफ्टी 34.55 अंक यानी 0.14% फिसलकर 24,196.75 के स्तर पर आ गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अमेरिका और ईरान के बीच संभावित बातचीत की उम्मीदों से भारतीय शेयर बाजार ने गुरुवार को मजबूत शुरुआत की, लेकिन दिन चढ़ने के साथ निवेशकों की सतर्कता हावी हो गई. बैंकिंग और ऑटो शेयरों में बिकवाली के दबाव ने बाजार की दिशा पलट दी और आखिरकार प्रमुख सूचकांक गिरावट के साथ बंद हुए. आज शेयर बाजार की शुरुआत मिले-जुले संकेतों के बीच हो सकती है. एक तरफ अमेरिका और ईरान के बीच संभावित बातचीत से ग्लोबल सेंटिमेंट को सपोर्ट मिल रहा है. वहीं एशियाई बाजारों में कमजोरी और घरेलू संस्थागत निवेशकों की बिकवाली बाजार पर दबाव बना सकती है. गिफ्ट निफ्टी मामूली बढ़त के साथ 24,179 के आसपास कारोबार कर रहा है, जिससे निफ्टी-50 के फ्लैट ओपन का अनुमान है. ऐसे में निवेशकों के लिए आज का दिन सतर्कता के साथ ट्रेडिंग का रह सकता है. शुरुआती कारोबार में हल्की मजबूती दिख सकती है, लेकिन ऊपरी स्तरों पर मुनाफावसूली से उतार-चढ़ाव बना रहने की संभावना है.
शुरुआती तेजी टिक नहीं पाई
गुरुवार को बीएसई सेंसेक्स 500 अंकों से अधिक चढ़कर खुला, जबकि निफ्टी50 में करीब 150 अंकों की मजबूती देखी गई. हालांकि, यह तेजी ज्यादा देर टिक नहीं सकी और दोपहर तक बाजार ने अपनी बढ़त गंवा दी. दिन के अंत में सेंसेक्स 122.56 अंक यानी 0.16% गिरकर 77,988.68 पर बंद हुआ. वहीं निफ्टी 34.55 अंक यानी 0.14% फिसलकर 24,196.75 के स्तर पर आ गया.
किन शेयरों ने दिखाया दम, कौन रहा कमजोर
सेंसेक्स के 30 में से 15 शेयर गिरावट के साथ बंद हुए. तेजी वाले शेयरों में ट्रेंट, अडानी पोर्ट्स, बीईएल, लार्सन एंड टुब्रो, इन्फोसिस, टाटा स्टील, टीसीएस, एशियन पेंट्स, आईटीसी और बजाज फिनसर्व शामिल रहे. वहीं गिरावट वाले शेयरों में एचडीएफसी बैंक, टाइटन, महिंद्रा एंड महिंद्रा, भारती एयरटेल, कोटक बैंक और बजाज फाइनेंस प्रमुख रहे. निफ्टी में एचडीएफसी बैंक, ओएनजीसी और एचडीएफसी लाइफ में सबसे ज्यादा दबाव देखने को मिला.
वैश्विक संकेतों का मिला-जुला असर
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजारों से मिले-जुले संकेतों ने भी भारतीय बाजार की दिशा को प्रभावित किया. एशियाई बाजारों में कमजोरी का रुख रहा. जहां जापान का निक्केई, हैंग सेंग और शंघाई कंपोजिट गिरावट में रहे. वहीं अमेरिकी बाजारों में मजबूती देखने को मिली. S&P 500 और नैस्डैक लगातार दूसरे दिन रिकॉर्ड ऊंचाई पर बंद हुए. इसकी वजह मिडिल ईस्ट में तनाव कम होने की उम्मीद और अमेरिका-ईरान वार्ता की संभावनाएं रहीं.
कमोडिटी बाजार: सोना और कच्चा तेल फिसला
कमोडिटी बाजार में भी नरमी देखने को मिली. सोने की कीमतों में हल्की गिरावट आई. जबकि कच्चे तेल के दाम भी नीचे आए. अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते की उम्मीदों ने तेल की सप्लाई को लेकर चिंता कम की है. जिससे कीमतों पर दबाव पड़ा.
FII और DII का रुख
विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) ने लगातार दूसरे दिन खरीदारी की. और करीब ₹382 करोड़ के शेयर खरीदे. इसके उलट घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने ₹3,400 करोड़ से ज्यादा की बिकवाली की. जिससे बाजार पर दबाव बना रहा.
इन शेयरों पर रखें नजर
कॉर्पोरेट मोर्चे पर भी कुछ खबरों ने निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया. HDFC लाइफ के चौथी तिमाही नतीजे कमजोर रहे, जिससे शेयर पर दबाव दिखा. विप्रो ने भी कमजोर गाइडेंस दी. हालांकि कंपनी ने बायबैक का ऐलान किया. वहीं, वेदांता से जुड़ी कानूनी खबरों ने भी निवेशकों की चिंता बढ़ाई. वहीं, आज बाजार में कई अहम स्टॉक्स फोकस में रहेंगे, जिनमें विप्रो, एंजेल वन, जियो फाइनेंशियल सर्विसेज, एचडीएफसी लाइफ, बीपीसीएल, वारी रिन्यूएबल टेक्नोलॉजीज और आरवीएनएल शामिल हैं. जियो फाइनेंशियल, बजाज कंज्यूमर, आदित्य बिड़ला मनी, हैथवे केबल और मास्टेक जैसी कंपनियां आज अपने Q4 नतीजे जारी करेंगी, जिससे स्टॉक्स में हलचल बढ़ सकती है. वहीं विप्रो और एचडीएफसी लाइफ के कमजोर नतीजों, बीपीसीएल के बड़े निवेश प्लान, वारी रिन्यूएबल और एंजेल वन की मजबूत कमाई, और आरवीएनएल को मिले बड़े ऑर्डर जैसे फैक्टर्स इन शेयरों में एक्शन ला सकते हैं. कुल मिलाकर आज का बाजार खबरों के दम पर स्टॉक-स्पेसिफिक मूवमेंट दिखा सकता है.
बाजार के लिए फिलहाल संकेत मिले-जुले बने हुए हैं. एक तरफ वैश्विक स्तर पर तनाव कम होने की उम्मीद है. वहीं दूसरी ओर घरेलू स्तर पर संस्थागत बिकवाली और कमजोर कॉर्पोरेट नतीजे बाजार को सीमित कर सकते हैं. निवेशकों को सलाह है कि किसी भी ट्रेड से पहले वैश्विक संकेतों, कच्चे तेल की कीमतों और संस्थागत निवेशकों की गतिविधियों पर नजर बनाए रखें.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
भारतीय तेल कंपनियों ने इस वेवर विंडो का तेजी से उपयोग करते हुए रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीद लिया. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस दौरान करीब 30 मिलियन बैरल तेल का ऑर्डर दिया गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक बड़ा बदलाव सामने आया है, जहां अमेरिका ने रूस और ईरान से सस्ते कच्चे तेल की खरीद पर दी जा रही छूट खत्म करने का फैसला किया है. इस फैसले से अंतरराष्ट्रीय सप्लाई और कीमतों पर असर पड़ने की आशंका है. हालांकि, भारत ने पहले ही रणनीतिक कदम उठाते हुए पर्याप्त तेल आयात कर अपने भंडार को मजबूत कर लिया है.
अमेरिका ने खत्म की सैंक्शन छूट
अमेरिका के ट्रंप प्रशासन ने रूस और ईरान से तेल खरीद पर दी गई अस्थायी छूट को आगे न बढ़ाने का निर्णय लिया है. अमेरिकी ट्रेजरी अधिकारियों ने साफ कर दिया है कि मार्च की शुरुआत में दी गई ‘जनरल लाइसेंस’ सुविधा अब जारी नहीं रहेगी. इस कदम का सीधा असर वैश्विक तेल सप्लाई पर पड़ सकता है.
तनाव के बीच मिली थी अस्थायी राहत
फरवरी के अंत में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य के पास हालात बिगड़ने की आशंका के चलते अमेरिका ने अस्थायी राहत दी थी. इसका मकसद वैश्विक तेल कीमतों को स्थिर रखना था. इसी अवधि को ‘वेवर विंडो’ कहा गया, जिसका कई देशों ने फायदा उठाया.
भारत ने मौके का उठाया पूरा फायदा
भारतीय तेल कंपनियों ने इस वेवर विंडो का तेजी से उपयोग करते हुए रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीद लिया. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस दौरान करीब 30 मिलियन बैरल तेल का ऑर्डर दिया गया, जिससे देश का स्टॉक काफी मजबूत हो गया.
मार्च में रूस से भारत का तेल आयात करीब 1.98 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया, जो जून 2023 के बाद सबसे ऊंचा स्तर था. हालांकि अप्रैल में यह आंकड़ा कुछ घटा, जिसकी वजह रिफाइनरी मेंटेनेंस रही.
7 साल बाद ईरान से तेल आयात
इस अवधि में भारत ने एक और अहम कदम उठाते हुए सात साल बाद ईरान से भी कच्चा तेल आयात किया. करीब 4 मिलियन बैरल तेल भारत लाया गया, जिसे पूर्वी और पश्चिमी तट के बंदरगाहों पर उतारा गया. इंडियन ऑयल, रिलायंस इंडस्ट्रीज और भारत पेट्रोलियम जैसी कंपनियों ने इस सप्लाई को अपने सिस्टम में सफलतापूर्वक शामिल किया.
भारत की ऊर्जा जरूरत और रणनीति
भारत अपनी कुल तेल जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत आयात करता है और इसके लिए होर्मुज जलडमरूमध्य पर काफी निर्भर है. ऐसे में किसी भी वैश्विक संकट का सीधा असर देश पर पड़ सकता है. यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूस से सस्ता तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा जरूरतों को संतुलित किया था. लेकिन अब अमेरिकी दबाव और नीतिगत बदलाव के चलते यह विकल्प सीमित हो सकता है.
कूटनीतिक स्तर पर सक्रिय भारत
भारत ने इस छूट को बढ़ाने की मांग की थी, लेकिन अमेरिका ने इसे स्वीकार नहीं किया. इसके बावजूद कूटनीतिक बातचीत जारी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से फोन पर बातचीत कर वैश्विक ऊर्जा सप्लाई और होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा पर जोर दिया.
आगे की चुनौतियां और तैयारी
छूट खत्म होने के बाद भारत को महंगे तेल विकल्पों की ओर जाना पड़ सकता है. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय रिफाइनरियां नई परिस्थितियों से निपटने के लिए तैयार हैं. सरकार और तेल कंपनियों ने मिलकर यह सुनिश्चित किया है कि वैश्विक बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद देश की ऊर्जा सप्लाई और अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर न पड़े.