महंगाई फिर बढ़ाएगी टेंशन! अक्टूबर-नवंबर में 6% के पार जा सकती है खुदरा महंगाई

SBI रिसर्च के मुताबिक अगस्त में खुदरा महंगाई बढ़कर 4.7% हो सकती है. बेहतर मानसून और खरीफ फसलों की मजबूत बुवाई से साल के अंत में खाद्य महंगाई पर दबाव कम होने की उम्मीद

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Thursday, 20 August, 2026
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भारत में खुदरा महंगाई आने वाले महीनों में फिर बढ़ सकती है और अक्टूबर-नवंबर में यह 6 फीसदी के स्तर को पार कर सकती है. हालांकि, इसके बाद महंगाई में नरमी आने की उम्मीद है और वित्त वर्ष 2026-27 की चौथी तिमाही में यह करीब 5 फीसदी रह सकती है. भारतीय स्टेट बैंक की शोध रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई में 4.45 फीसदी रही उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई अगस्त में बढ़कर 4.7 फीसदी हो सकती है.

अक्टूबर-नवंबर में महंगाई बढ़ने का अनुमान

रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले महीनों में खुदरा महंगाई पर खाद्य कीमतों का दबाव बढ़ सकता है. इसके चलते अक्टूबर और नवंबर में महंगाई 6 फीसदी के पार जा सकती है. हालांकि, साल के आगे बढ़ने के साथ खाद्य आपूर्ति बेहतर होने से कीमतों पर दबाव कम होने की संभावना है. एसबीआई रिसर्च ने कहा कि मानसून की स्थिति में सुधार और खरीफ फसलों की मजबूत बुवाई आने वाले महीनों में खाद्य महंगाई को नियंत्रित करने में मदद कर सकती है.

बारिश में हुआ सुधार

जून में बारिश की कमी करीब 40 फीसदी थी, जो अब घटकर लगभग 13 फीसदी रह गई है. जुलाई में बारिश सामान्य से अधिक रही, जबकि अगस्त में अब तक मानसून सामान्य रहा है. खरीफ फसलों के तहत बोया गया क्षेत्र पिछले मौसम की तुलना में करीब 2 फीसदी कम है. इसके बावजूद कुछ प्रमुख खाद्यान्न उत्पादक राज्यों में सामान्य से कम बारिश के बीच भी बुवाई में अपेक्षाकृत मजबूती बनी हुई है. रिपोर्ट के मुताबिक, यह राज्यों में सिंचाई सुविधाओं में सुधार का संकेत देता है.

ऐतिहासिक रुझानों से भी संकेत मिलता है कि वित्त वर्ष 2026-27 की चौथी तिमाही में महंगाई मौजूदा अनुमानों से कम रह सकती है. साल आगे बढ़ने के साथ खाद्य आपूर्ति मजबूत होने से उपभोक्ता कीमतों पर बढ़ता दबाव कम होने की उम्मीद है.

महंगाई पर आरबीआई की नजर

महंगाई का रुख भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति के लिए भी महत्वपूर्ण रहेगा. आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने संकेत दिया है कि नीतिगत दरों में बदलाव को लेकर कोई नया फैसला लेने से पहले महंगाई की दिशा को लेकर अधिक स्पष्टता जरूरी होगी.

हाल की मौद्रिक नीति समिति की बैठक के विवरण के मुताबिक, मल्होत्रा ने कहा कि पहले की नरम महंगाई दरों के बाद अब कीमतों में सामान्य स्थिति लौटने के संकेत दिखाई दे रहे हैं. ऐसे में मौद्रिक नीति की आगे की दिशा तय करने से पहले और आंकड़ों का इंतजार करना उचित होगा. एसबीआई रिसर्च ने केंद्रीय बैंक के संचार को लेकर भी चिंता जताई है. रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले समय में मौद्रिक नीति के वास्तविक कदम आगे के संकेतों की तुलना में बाजार के लिए अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं. इनमें परिवर्तनीय दर वाली रिवर्स रेपो परिचालन और विदेशी मुद्रा अनिवासी जमा जुटाने की व्यवस्था जैसे कदम शामिल हैं.

वैश्विक बाजारों से भी जोखिम

रिपोर्ट में अमेरिकी ट्रेजरी बाजार में हो रहे बदलावों को भी वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है. अमेरिकी सरकार की ओर से लंबी अवधि के सरकारी कर्ज की पुनर्खरीद बढ़ाने जैसे कदमों से अमेरिकी ट्रेजरी की लंबी अवधि की प्रतिफल दरों को स्थिर रखने में मदद मिल सकती है और इसका असर वैश्विक बाजारों पर भी पड़ सकता है.

बेंचमार्क 10 वर्षीय अमेरिकी सरकारी बॉन्ड सहित लंबी अवधि की प्रतिफल दरों में गिरावट आई है. यह गिरावट अमेरिकी सरकार की छोटी और लंबी अवधि की परिपक्वता वाले कर्ज की आपूर्ति में संभावित बदलाव की उम्मीदों के बीच आई है.

मानसून और खाद्य आपूर्ति रहेगी अहम

भारत में आने वाले महीनों में महंगाई का रुख मुख्य रूप से खाद्य आपूर्ति और मानसून की स्थिति पर निर्भर करेगा. बेहतर बारिश और खरीफ उत्पादन में मजबूती से खाद्य कीमतों पर दबाव कम हो सकता है. वहीं, आरबीआई की मौद्रिक नीति की दिशा भी इस बात पर निर्भर करेगी कि आने वाले महीनों में महंगाई किस तरह आगे बढ़ती है. इसलिए अक्टूबर-नवंबर के दौरान महंगाई में संभावित उछाल के बाद चौथी तिमाही में इसमें आने वाली नरमी बाजार और केंद्रीय बैंक दोनों के लिए महत्वपूर्ण होगी.
 


भारत में औद्योगिक और वेयरहाउसिंग लीजिंग में 15% की बढ़ोतरी, छह महीने में 36.8 मिलियन वर्गफुट पर पहुंची

विनिर्माण और थर्ड पार्टी लॉजिस्टिक्स की बढ़ती मांग से बाजार को मिला सहारा, मुंबई सबसे बड़ा बाजार बनकर उभरा; दूसरी छमाही में भी मजबूत मांग की उम्मीद

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 20 August, 2026
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Thursday, 20 August, 2026
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भारत के औद्योगिक और वेयरहाउसिंग क्षेत्र में मांग लगातार मजबूत बनी हुई है. नाइट फ्रैंक इंडिया की ‘इंडिया वेयरहाउसिंग मार्केट रिपोर्ट-एच1 2026’ के मुताबिक, 2026 की पहली छमाही में देश के आठ प्रमुख बाजारों में औद्योगिक और वेयरहाउसिंग लीजिंग सालाना आधार पर 15 फीसदी बढ़कर 36.8 मिलियन वर्गफुट हो गई. वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, ऊंची माल ढुलाई लागत, मुद्रा में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बावजूद इस क्षेत्र ने बेहतर प्रदर्शन किया है.

विनिर्माण से सबसे ज्यादा मांग

विनिर्माण क्षेत्र औद्योगिक और वेयरहाउसिंग परिसंपत्तियों की मांग का सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है. कुल लीजिंग में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी 46 फीसदी रही और इसने 17 मिलियन वर्गफुट क्षेत्र दर्ज किया. यह पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 17 फीसदी अधिक है.

इसके बाद थर्ड पार्टी लॉजिस्टिक्स यानी 3पीएल क्षेत्र का स्थान रहा. इस क्षेत्र ने 11.1 मिलियन वर्गफुट की लीजिंग की, जो कुल लेनदेन का 30 फीसदी है. 3पीएल क्षेत्र में सालाना आधार पर 27 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई.

मुंबई सबसे आगे

मुंबई 10.7 मिलियन वर्गफुट के साथ औद्योगिक और वेयरहाउसिंग लीजिंग का सबसे बड़ा बाजार रहा. यह शहर के लिए अब तक की सबसे अधिक छमाही लीजिंग है और पिछले साल की समान अवधि से 44 फीसदी अधिक है. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में 5.9 मिलियन वर्गफुट लीजिंग हुई, जो 17 फीसदी अधिक है. वहीं बेंगलूरु में 4 मिलियन वर्गफुट लीजिंग दर्ज की गई, जिसमें 36 फीसदी की बढ़ोतरी हुई.

कोलकाता ने प्रमुख बाजारों में सबसे तेज वृद्धि दर्ज की. यहां लीजिंग 69 फीसदी बढ़कर 2.4 मिलियन वर्गफुट हो गई. अहमदाबाद में यह 15 फीसदी बढ़कर 4.1 मिलियन वर्गफुट रही. इसके विपरीत पुणे, चेन्नई और हैदराबाद में लीजिंग गतिविधियों में क्रमशः 12 फीसदी, 27 फीसदी और 10 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.

समर्पित माल ढुलाई गलियारे से मिला फायदा

पश्चिमी समर्पित माल ढुलाई गलियारे के पूरा होने से भी इस क्षेत्र को फायदा मिला है. इससे विनिर्माण केंद्रों, बंदरगाहों और उपभोक्ता केंद्रों के बीच माल की आवाजाही बेहतर हुई है. नाइट फ्रैंक के मुताबिक, बेहतर संपर्क व्यवस्था ने विनिर्माताओं और लॉजिस्टिक्स कंपनियों को अपनी आपूर्ति श्रृंखला को अधिक प्रभावी ढंग से संचालित करने में मदद की है. इससे भारत उत्पादन और वितरण केंद्र के रूप में और मजबूत हुआ है.

नाइट फ्रैंक इंडिया के अंतरराष्ट्रीय साझेदार, अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक शिशिर बैजल ने कहा कि चुनौतीपूर्ण वैश्विक माहौल के बावजूद औद्योगिक और वेयरहाउसिंग बाजार मजबूत बना हुआ है. विनिर्माण गतिविधियों, बेहतर बुनियादी ढांचे और मजबूत घरेलू मांग से कंपनियों का भरोसा कायम है.

सभी प्रमुख बाजारों में किराये बढ़े

रिपोर्ट के मुताबिक, आठों प्रमुख बाजारों में औद्योगिक और वेयरहाउसिंग परिसंपत्तियों के किराये में बढ़ोतरी हुई. चेन्नई में किराये में सबसे ज्यादा 7 फीसदी की सालाना वृद्धि दर्ज की गई और औसत किराया 25.7 रुपये प्रति वर्गफुट प्रति माह पहुंच गया. पुणे 28.7 रुपये प्रति वर्गफुट प्रति माह के औसत किराये के साथ देश का सबसे महंगा वेयरहाउसिंग बाजार रहा.

मुंबई और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में किराये में 5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. वहीं बेंगलूरु और अहमदाबाद में किराये 6 फीसदी बढ़े. नाइट फ्रैंक ने इसका कारण मजबूत मांग के साथ जमीन खरीद, निर्माण और वित्तपोषण की लागत में लगातार वृद्धि को बताया.

कुल वेयरहाउसिंग स्टॉक 584.9 मिलियन वर्गफुट

2026 की पहली छमाही में भारत का औद्योगिक और वेयरहाउसिंग स्टॉक सालाना आधार पर 14 फीसदी बढ़कर 584.9 मिलियन वर्गफुट हो गया. वहीं रिक्तता दर पिछले साल की समान अवधि के 12.1 फीसदी से घटकर 11.4 फीसदी रह गई. इससे संकेत मिलता है कि नई आपूर्ति के साथ मांग भी मजबूत बनी हुई है.

देश के कुल औद्योगिक और वेयरहाउसिंग स्टॉक में उच्च गुणवत्ता वाली ‘ग्रेड ए’ सुविधाओं की हिस्सेदारी 47 फीसदी रही. यह बेहतर बुनियादी ढांचे वाली परिसंपत्तियों के प्रति कंपनियों की बढ़ती प्राथमिकता को दर्शाता है. कुल राष्ट्रीय स्टॉक में मुंबई की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा 33 फीसदी रही, जबकि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र 20 फीसदी हिस्सेदारी के साथ दूसरे स्थान पर रहा.

दूसरी छमाही में भी मजबूत मांग की उम्मीद

रिपोर्ट के अनुसार, 2026 की दूसरी छमाही में भी औद्योगिक और वेयरहाउसिंग क्षेत्र में मांग मजबूत रहने की उम्मीद है. विनिर्माण क्षमता के विस्तार, लॉजिस्टिक्स सेवाओं की बढ़ती आउटसोर्सिंग, नीतिगत समर्थन और बेहतर बहु-माध्यम परिवहन बुनियादी ढांचे से बाजार को सहारा मिलने की संभावना है. हालांकि, नई और उच्च गुणवत्ता वाली आपूर्ति तैयार करने के सामने जमीन की उपलब्धता, बिखरे हुए भू-स्वामित्व, नियामकीय जटिलताएं और परियोजनाओं की मंजूरी में लगने वाला लंबा समय बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं.
 


डॉलर में कमजोरी से रुपया मजबूत, 17 पैसे चढ़कर 95.56 प्रति डॉलर पर पहुंचा

अमेरिकी मुद्रा के मई के बाद के सबसे निचले स्तर पर आने और घरेलू शेयर बाजार में मजबूती से रुपये को मिला सहारा, अमेरिकी मौद्रिक नीति और ट्रेजरी के नए कदमों पर बाजार की नजर

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 20 August, 2026
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Thursday, 20 August, 2026
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अमेरिकी डॉलर में कमजोरी और घरेलू शेयर बाजार में तेजी के बीच भारतीय रुपया गुरुवार को शुरुआती कारोबार में 17 पैसे मजबूत होकर 95.56 रुपये प्रति डॉलर पर पहुंच गया. डॉलर मई के बाद के अपने सबसे निचले स्तर पर आ गया है, जिससे भारतीय मुद्रा को मजबूती मिली. इसके अलावा अमेरिकी ट्रेजरी के लंबी अवधि के सरकारी बॉन्ड की पुनर्खरीद बढ़ाने के फैसले ने भी डॉलर पर दबाव बनाया.

95.57 पर खुला रुपया

अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया 95.57 प्रति डॉलर पर खुला और कारोबार के दौरान 95.56 के स्तर तक पहुंच गया. यह पिछले बंद भाव के मुकाबले 17 पैसे की बढ़त है. बुधवार को रुपया मामूली रूप से मजबूत हुआ था और एक पैसे की बढ़त के साथ 95.73 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था. हाल के कारोबारी सत्रों में रुपये पर दबाव बना हुआ था और इसकी विनिमय दर 95 रुपये प्रति डॉलर के आसपास बनी हुई थी.

डॉलर में गिरावट से रुपये को फायदा

गुरुवार को रुपये की मजबूती की प्रमुख वजह अमेरिकी डॉलर में आई गिरावट रही. अमेरिकी ट्रेजरी ने लंबी अवधि के सरकारी बॉन्ड की पुनर्खरीद बढ़ाने का फैसला किया है. इससे डॉलर पर दबाव बढ़ा है. इसके साथ ही निवेशक अमेरिकी मौद्रिक नीति के अगले कदमों का भी आकलन कर रहे हैं. फेडरल रिजर्व की ओर से आगे ब्याज दरों में बढ़ोतरी की उम्मीद कम होने से भी डॉलर कमजोर हुआ है.

हालांकि, फेडरल रिजर्व की जुलाई में हुई बैठक के विवरण से पता चला है कि नीति निर्माता अभी भी महंगाई को लेकर चिंतित हैं. ऐसे में आने वाले समय में ब्याज दरों को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुई है.

घरेलू शेयर बाजार से भी मिला सहारा

भारतीय शेयर बाजार में शुरुआती कारोबार में आई तेजी ने भी रुपये को समर्थन दिया. घरेलू शेयर बाजार में मजबूती से भारतीय परिसंपत्तियों के प्रति निवेशकों का भरोसा बढ़ सकता है और स्थानीय मुद्रा की मांग को सहारा मिल सकता है. आने वाले कारोबार में रुपये की दिशा पर वैश्विक स्तर पर डॉलर की चाल, अमेरिकी मौद्रिक नीति को लेकर उम्मीदें और घरेलू वित्तीय बाजारों की स्थिति का असर रहेगा.
 


₹960 करोड़ का ब्लाइंड प्ले: सेबी के सेंसेक्स हेरफेर मामले के पीछे वॉल स्ट्रीट बैंक

वॉल स्ट्रीट की एक दिग्गज कंपनी उस मॉरीशस इकाई की मालिक है, जिस पर सेबी ने हाल ही में सेंसेक्स की क्लोजिंग में कथित हेरफेर करने के आरोप में प्रतिबंध लगाया है. यह भारत में दो खाते संचालित करती है, एक बैंक के अपने पैसे के लिए और दूसरा छिपे हुए ग्राहकों के लिए, क्योंकि सार्वजनिक रिकॉर्ड में वास्तविक नाम कभी सामने नहीं आते.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 20 August, 2026
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Thursday, 20 August, 2026
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पलक शाह

एक ही नाम के तहत दो खाते. सेबी के 46 पन्नों के आदेश में यह नहीं बताया गया है कि इनमें से किस खाते ने सेंसेक्स को प्रभावित किया.

13 अगस्त को कारोबार के आखिरी दस मिनट में किसी ने सेंसेक्स को करीब 240 अंक ऊपर धकेल दिया. यह सभी 30 सेंसेक्स कंपनियों में खरीद आदेशों के जरिए किया गया, जिनकी कीमत नियमों के तहत अनुमत अधिकतम स्तर पर थी और इन आदेशों का एक बड़ा हिस्सा बाद में रद्द कर दिया गया. सेबी के आदेश में ऐसे लेनदेन के खिलाफ नियम का हवाला दिया गया है, जिनमें लेनदेन को पूरा करने का कोई इरादा नहीं था, ऑर्डर स्पूफिंग. यह डेरिवेटिव्स एक्सपायरी का दिन था, इसलिए इंडेक्स और शेयरों की क्लोजिंग कीमत ने यह तय किया कि हजारों ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट्स पर किसे भुगतान मिलेगा. छह दिन बाद सेबी ने ₹3.68 करोड़ फ्रीज कर दिए और दो कंपनियों को बाजार से बाहर कर दिया.

यह सब रिपोर्ट किया जा चुका है. यहां बड़ी कहानी है. क्या किसी ने पूछा है कि कॉप्थॉल मॉरीशस वास्तव में कौन है?

कॉप्थॉल ही जेपी मॉर्गन है

Copthall Mauritius Investment Limited मॉरीशस में सिर्फ एक पोस्टबॉक्स वाला कोई स्वतंत्र फंड नहीं है. इसका पूर्ण स्वामित्व *JPMorgan Chase & Co, अमेरिका के सबसे प्रभावशाली वित्तीय संस्थान* के पास है.

यह किसी कंपनी डेटाबेस से निकाला गया अनुमान नहीं है. JPMorgan अमेरिकी सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन के पास अपनी सहायक कंपनियों की सूची दाखिल करता है. इसमें Copthall Mauritius Investment Limited का नाम है, जिसका अधिकार क्षेत्र मॉरीशस और स्वामित्व 100 प्रतिशत है. कंपनी के Legal Entity Identifier रिकॉर्ड में भी, जिसे इस साल फरवरी में अपडेट किया गया था, यही अंतिम मूल कंपनी दर्ज है.

सेबी के आदेश के 46 पन्नों में कहीं भी JPMorgan का उल्लेख नहीं है. फिलहाल सेबी ने एकपक्षीय आदेश के जरिए Copthall पर रोक लगाई है,यह एक आपात निर्देश है, जिसे संबंधित पक्षों की सुनवाई से पहले बाजार की अखंडता की रक्षा के लिए जारी किया जाता है.

दोहरा खेल

Copthall भी एक नहीं, बल्कि दो खाते हैं. भारतीय शेयरहोल्डिंग डिस्क्लोजर और बल्क-डील रिकॉर्ड्स में Copthall दो अलग-अलग नामों के तहत दिखाई देता है:

Copthall Mauritius Investment Limited – ODI Account

Copthall Mauritius Investment Limited – NON ODI Account

ये सिर्फ क्लेरिकल वैरिएंट नहीं हैं. ये अलग-अलग काम करने वाले अलग-अलग खाते हैं और इनके बीच का अंतर ही पूरी कहानी है.

ODI अकाउंट क्या होता है, आसान भाषा में

मान लीजिए लंदन का कोई हेज फंड भारतीय शेयरों पर दांव लगाना चाहता है. वह सेबी के साथ रजिस्टर कर सकता है, अपने मालिकों का खुलासा कर सकता है, भारतीय नियमों का पालन कर सकता है और अपना खाता खोल सकता है. इसमें महीनों लगते हैं और इसका स्थायी रिकॉर्ड बन जाता है कि वह कौन है.

या फिर वह यह सब छोड़ सकता है. वह ऐसे बैंक को कॉल करता है, जिसके पास पहले से ही भारत में खाता है. वह उस बैंक से एक कॉन्ट्रैक्ट खरीदता है, एक पार्टिसिपेटरी नोट. बैंक अपने नाम से भारतीय शेयर खरीदने जाता है. अगर शेयर बढ़ते हैं, तो बैंक फंड को मुनाफे का भुगतान करता है. अगर वे गिरते हैं, तो नुकसान फंड उठाता है. भारत के सार्वजनिक रिकॉर्ड में बैंक दिखाई देता है. फंड कभी दिखाई नहीं देता.

यह कॉन्ट्रैक्ट एक ऑफशोर डेरिवेटिव इंस्ट्रूमेंट है. ज्यादातर लोग इसे अभी भी इसके पुराने नाम से जानते हैं: *P-note (Participatory Notes).*

हॉट मनी को लेकर वर्षों के विवाद के बावजूद भारत ने इन्हें कानूनी बनाए रखा है. इनकी रिपोर्टिंग होती है, इन्हें कुछ हद तक रेगुलेट किया जाता है. लेकिन ये एक खास काम करते हैं और इससे बचने का कोई रास्ता नहीं है. ये उस इकाई के बीच दूरी पैदा करते हैं, जिसका नाम ट्रेड पर दिखाई देता है और उस व्यक्ति के बीच, जिसका पैसा वास्तव में जोखिम में है. Copthall इसी उद्देश्य के लिए बनाए गए एक खाते का संचालन करता है.

सेबी के आदेश में किसी भी खाते का नाम नहीं

आदेश में इकाई की पहचान "Copthall Mauritius Investment Limited", PAN AAACC4303M के रूप में की गई है. कोई प्रत्यय नहीं. कोई खाता विवरण नहीं. इसमें यह नहीं बताया गया है कि सेंसेक्स को प्रभावित करने वाले ऑर्डर उस खाते से आए थे, जिसमें JPMorgan का अपना पैसा था, या उस खाते से जिसमें ऐसे ग्राहकों का पैसा था, जिनके नाम भारत के सार्वजनिक रिकॉर्ड में कहीं दिखाई नहीं देते.

46 पन्ने और यह अंतर एक बार भी सामने नहीं आता, लेकिन सार्वजनिक शेयरहोल्डिंग डिस्क्लोजर रिकॉर्ड में Copthall दो अलग-अलग नामों के तहत दिखाई देता है: इनमें से एक खुद को ODI अकाउंट के रूप में बताता है.

क्लोजिंग पर वास्तव में क्या दांव पर था

सेबी के आदेश में उस दोपहर सेंसेक्स ऑप्शंस में Copthall की होल्डिंग का विवरण दिया गया है. तीन स्तरों, 7,500, 78,000 और 78,500 पर उसने कॉल ऑप्शंस खरीदे और समान मात्रा में पुट ऑप्शंस बेचे.

एक ही स्तर पर समान आकार में कॉल खरीदना और पुट बेचना इस बात पर दांव लगाने का एक सामान्य तरीका है कि इंडेक्स ऊपर जाएगा. यह इंडेक्स को एक-के-बदले-एक ट्रैक करता है, चाहे इंडेक्स जहां भी समाप्त हो. तीनों को जोड़ने पर सेंसेक्स की हर एक अंक की चाल पर पोजीशन को ₹1,23,400 का फायदा या नुकसान होता था. करीब 78,000 के इंडेक्स स्तर पर यह लगभग ₹960 करोड़ की नॉशनल एक्सपोजर है, यह उस इंडेक्स की फेस वैल्यू है जिसे पोजीशन ट्रैक कर रही थी, न कि वह पैसा जो Copthall ने लगाया था.

सेबी यह संख्या प्रिंट नहीं करता. यह सीधे आदेश की अपनी तालिकाओं में दिए गए आंकड़ों से निकलती है.

इसका सबसे बड़ा हिस्सा 84,200 यूनिट, करीब ₹657 करोड़, सेबी की तालिका में "position built during the day" के रूप में दर्ज है. Copthall ने इसे एक्सपायरी की सुबह 78,000 के स्तर पर बनाया. सेंसेक्स 78,080 पर बंद हुआ, यानी उससे 80 अंक ऊपर.

सेबी के आदेश में इन छह कॉन्ट्रैक्ट्स को दोपहर 3:20 बजे Copthall के बकाया एक्सपायरी-डे सेंसेक्स ऑप्शंस के रूप में सूचीबद्ध किया गया है. इसमें यह नहीं बताया गया है कि Copthall के पास कहीं और ऑफसेटिंग पोजीशन थीं या नहीं. इंडेक्स के हर अंक की चाल उस पोजीशन के मालिक के लिए ₹1,23,400 के बराबर थी. सेबी का आकलन है कि इंडेक्स 240 अंक अधिक ऊपर बंद हुआ. 240 को ₹1,23,400 से गुणा करने पर ₹2,96,16,000 मिलते हैं, यही वह सटीक राशि है, रुपये तक, जिसे सेबी ने अब फ्रीज किया है.

इंडेक्स को ऊपर ले जाने में अधिक कीमत वाले शेयरों पर ₹57 लाख खर्च हुए. सेबी का अपना आदेश इस खर्च को नुकसान नहीं, बल्कि "expenditure" यानी व्यय कहता है.

57 लाख खर्च करें. 2.96 करोड़ हासिल करें. सेबी के आदेश में जिस सवाल का जवाब नहीं दिया गया है, वह यह है कि यह पैसा किसे मिला.

खाता जुर्माने से ज्यादा महत्वपूर्ण क्यों है

अगर पोजीशन प्रोपराइटरी अकाउंट में थी, तो यह बैंक का अपना ट्रेडिंग डेस्क है और JPMorgan इस गतिविधि का मालिक है. अगर यह ODI अकाउंट में थी, तो ₹2.96 करोड़ वास्तव में Copthall के थे ही नहीं. यह उस व्यक्ति का पैसा था, जिसने कॉन्ट्रैक्ट खरीदा था, कोई ऐसा व्यक्ति, जिसका नाम सेबी ने अभी तक नहीं बताया है.

इश्यूअर्स सेबी के पास सब्सक्राइबर की जानकारी जरूर दाखिल करते हैं और यह रिपोर्टिंग सार्वजनिक नहीं होती. लेकिन 46 पन्नों में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि रेगुलेटर ने यह पूछा कि इस पोजीशन के पीछे कोई था तो कौन था. सेबी ने शायद मॉरीशस में ऐसा पैसा फ्रीज कर दिया हो, जो मूल लाभार्थी का था ही नहीं.

इसके महत्व का एक और कारण है, जिसे किसी ने नहीं उठाया

दिसंबर 2024 में सेबी ने इन इंस्ट्रूमेंट्स से जुड़े अपने नियमों को दोबारा लिखा था. दो प्रावधान सीधे तौर पर प्रासंगिक हैं. बैंक अब ऐसे ऑफशोर डेरिवेटिव इंस्ट्रूमेंट जारी नहीं कर सकते, जिनका संदर्भ डेरिवेटिव्स से हो. वे भारतीय एक्सचेंजों पर ट्रेड होने वाले डेरिवेटिव्स का इस्तेमाल करके ऐसे इंस्ट्रूमेंट्स को हेज भी नहीं कर सकते, हेज वास्तविक शेयरों में एक-के-बदले-एक होना चाहिए.

सेंसेक्स ऑप्शंस से बनी पोजीशन एक डेरिवेटिव्स पोजीशन है. अगर इसे किसी ऑफशोर कॉन्ट्रैक्ट के खिलाफ रखा गया था, तो यह कोई फुटनोट नहीं है. यह एक दूसरा उल्लंघन होगा, उस नियम का जिसे ठीक 20 महीने पहले इस रास्ते को बंद करने के लिए लिखा गया था. सेबी के आदेश में इसका जिक्र नहीं है.

जो बात अभी बाकी है

रेगुलेटर ने छह दिनों में कार्रवाई की, जो वास्तव में तेज है और इसके लिए उसे श्रेय दिया जाना चाहिए. उसने ट्रेड्स की पहचान की, सेकंड-दर-सेकंड ऑक्शन को दोबारा तैयार किया और अगली एक्सपायरी से पहले पैसा फ्रीज कर दिया.

लेकिन उसने मॉरीशस में एक ऐसे अकाउंट होल्डर का नाम लिया है, जिसका पूर्ण स्वामित्व एक अमेरिकी बैंक के पास है, ऐसा बैंक जो वहां एक अकाउंट अपने पैसे के लिए और दूसरा ऐसे लोगों के पैसे के लिए संचालित करता है, जो भारत के रिकॉर्ड में दिखाई नहीं देते. उसके आदेश में दोनों के बीच अंतर नहीं किया गया है.

भारत में इसी ढांचे के जरिए ट्रेडिंग करने वाली अमेरिकी स्वामित्व वाली इकाइयों में Copthall अकेली नहीं है. यह अगली कहानी है.

खुलासे

19 अगस्त, 2026 के सेबी के एकपक्षीय अंतरिम आदेश में केवल प्रथम दृष्टया निष्कर्ष दिए गए हैं. Copthall Mauritius Investment Limited के पास जवाब देने के लिए 21 दिन हैं और वह व्यक्तिगत सुनवाई की मांग कर सकती है. आदेश में JPMorgan Chase & Co का नाम नहीं है.

हम ₹960 करोड़ तक कैसे पहुंचे

यह आंकड़ा सेबी के अपने आदेश में छपे पोजीशन साइज से हमारी गणना है. सेबी ने इसे नहीं बताया है. आदेश की तालिका 22 में 13 अगस्त को दोपहर 3:20 बजे Copthall की बकाया सेंसेक्स ऑप्शन पोजीशन सूचीबद्ध है: 77,500 कॉल के 26,560 यूनिट लॉन्ग और 77,500 पुट के 26,560 यूनिट शॉर्ट; 78,000 कॉल के 84,200 यूनिट लॉन्ग और 78,000 पुट के 84,200 यूनिट शॉर्ट; 78,500 कॉल के 12,640 यूनिट लॉन्ग और 78,500 पुट के 12,640 यूनिट शॉर्ट.

यूनिट्स इंडेक्स पॉइंट के हिसाब से रुपये हैं. सेबी खुद इसे पैराग्राफ 81 में स्थापित करता है, जहां वह 77,500 कॉल के पेऑफ को "340*26560 = ₹90,30,400" लिखता है.

एक ही स्ट्राइक और समान मात्रा में लॉन्ग कॉल और शॉर्ट पुट, इंडेक्स जिस स्तर पर भी हो, इंडेक्स स्तर माइनस स्ट्राइक के हिसाब से सेटल होते हैं. इसलिए पोजीशन सेंसेक्स के साथ एक-के-बदले-एक चलती है. तीनों जोड़ियों को मिलाने पर 26,560 प्लस 84,200 प्लस 12,640  प्रति इंडेक्स पॉइंट 1,23,400 रुपये होते हैं. इसे इंडेक्स से गुणा करने पर 13 अगस्त के 3:15 के संदर्भ मूल्य 77,829.60 पर ₹960.4 करोड़ और क्लोजिंग 78,080 पर ₹963.5 करोड़ होते हैं. हमने निचले स्तर का इस्तेमाल किया है.

एक जांच के तौर पर: सेबी के अपने गलत लाभ के आंकड़े ₹2,96,16,000 को उस 240 अंकों की विकृति से विभाजित करने पर, जिसे सेबी हेरफेर के लिए जिम्मेदार ठहराता है, 1,23,400 मिलता है, यही संख्या. हमने सेबी की सभी छह लाइन आइटम्स को स्वतंत्र रूप से दोबारा तैयार किया और रुपये तक ₹2,96,16,000 पर पहुंचे.

₹960 करोड़ नॉशनल एक्सपोजर है: यह उस इंडेक्स की फेस वैल्यू है जिसे पोजीशन ट्रैक कर रही थी. यह लगाया गया पूंजीगत धन नहीं है, सेबी ने कैश-मार्केट की लागत ₹57 लाख बताई है, न ही जोखिम में लगा पैसा है और न ही लाभ. लेकिन इसका यह भी मतलब है कि जांच का बड़ा हिस्सा कहीं बड़ी तस्वीर तय करेगा.

 

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


भारत-जापान की बड़ी रक्षा साझेदारी, युद्धपोत निर्माण और समुद्री सुरक्षा पर बढ़ेगा सहयोग

नई दिल्ली में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी की बैठक में समुद्री सुरक्षा, नौसैनिक सहयोग और युद्धपोतों के डिजाइन व निर्माण में साझेदारी बढ़ाने पर सहमति बनी.

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Published - Thursday, 20 August, 2026
Last Modified:
Thursday, 20 August, 2026
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भारत और जापान ने रक्षा और समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में अपनी रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. दोनों देशों ने नौसेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाने के साथ-साथ युद्धपोतों के डिजाइन, निर्माण और रखरखाव के क्षेत्र में संयुक्त सहयोग की संभावनाओं पर सहमति जताई है. यह फैसला रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी के बीच हुई बैठक में लिया गया.

राजनाथ  सिंह से इस समझौते को लेकर अपने एक्स हैंडल पर एक पोस्ट भी शेयर करते हुए लिखा, हिंद-प्रशांत क्षेत्र की स्थिरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव! नई दिल्ली में जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी सान के साथ बेहद सार्थक और सकारात्मक बैठक हुई. हमारी बातचीत का मुख्य फोकस समुद्री सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने, ‘मेक इन इंडिया’ के तहत रक्षा तकनीक को बढ़ावा देने और रणनीतिक विश्वास को और गहरा करने पर रहा. 

समुद्री सुरक्षा सहयोग के लिए नया समझौता

बैठक के दौरान दोनों देशों ने समुद्री सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए. इसके तहत भारतीय नौसेना और जापान की समुद्री आत्मरक्षा सेना के बीच सहयोग का एक व्यापक ढांचा तैयार किया जाएगा. इस साझेदारी के तहत समुद्री गतिविधियों की निगरानी, खोज एवं बचाव अभियान और मानवीय सहायता व आपदा राहत कार्यों में दोनों देश मिलकर काम करेंगे. समुद्री संचार मार्गों की सुरक्षा के लिए भी आपसी तालमेल बढ़ाया जाएगा.

युद्धपोत निर्माण में साथ आएंगे भारत और जापान

भारत और जापान ने समुद्र में बिछाई गई बारूदी सुरंगों का पता लगाने और उन्हें निष्क्रिय करने की क्षमता विकसित करने में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति जताई. इसके अलावा जापान की तकनीकी विशेषज्ञता और भारत की विनिर्माण क्षमता को मिलाकर नौसेना के जहाजों के डिजाइन और निर्माण में संयुक्त विकास की संभावनाओं पर विचार किया जाएगा. दोनों देश भारत की ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत जहाज निर्माण क्षेत्र में साझेदारी बढ़ाने के विकल्प तलाशेंगे. जहाजों की मरम्मत और रखरखाव सुविधाओं तक एक-दूसरे की पहुंच बढ़ाने की दिशा में भी काम किया जाएगा.

सैन्य अभ्यासों को मिलेगा नया विस्तार

बैठक में दोनों देशों ने संयुक्त सैन्य अभ्यासों के विस्तार का स्वागत किया. थलसेना के ‘धर्म गार्जियन’ और समुद्री अभ्यास ‘जैमेक्स’ के अलावा इस वर्ष के अंत में होने वाले वायुसेना अभ्यास ‘वीर गार्जियन 26’ की तैयारियों पर भी चर्चा हुई. इस अभ्यास में पहली बार जापान की वायु आत्मरक्षा सेना के लड़ाकू विमान भारत पहुंचेंगे. दोनों देश भविष्य में अपने सैन्य अभ्यासों को और जटिल बनाने, बिना चालक वाले प्रणालियों को शामिल करने और जरूरत पड़ने पर कम समय की सूचना पर संयुक्त अभ्यास आयोजित करने की दिशा में भी काम करेंगे.

रक्षा तकनीक और उपकरणों पर भी जोर

भारत और जापान ने रक्षा तकनीक के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई. दोनों देशों ने जहाजों पर लगाए जाने वाले ‘यूनिकॉर्न’ एकीकृत संचार एंटीना प्रणाली परियोजना को अपनी बढ़ती रक्षा साझेदारी का महत्वपूर्ण उदाहरण बताया. यह भारत और जापान के बीच रक्षा उपकरण हस्तांतरण से जुड़ी पहली परियोजना है. दोनों पक्षों ने इसे जल्द लागू करने की दिशा में काम करने पर सहमति जताई. इसके साथ ही भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन और जापान की अधिग्रहण, प्रौद्योगिकी एवं रसद एजेंसी के बीच रक्षा अनुसंधान और विकास सहयोग को भी मजबूत किया जाएगा.

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ेगा रणनीतिक तालमेल

भारत और जापान ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्वतंत्र और सुरक्षित समुद्री मार्गों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई. दोनों देशों ने क्षेत्र में बल प्रयोग या दबाव के जरिए मौजूदा स्थिति बदलने की किसी भी कोशिश का विरोध किया. दोनों पक्षों ने परिचालन, खुफिया जानकारी, रक्षा उपकरण, प्रौद्योगिकी और रक्षा उद्योग के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए एक संयुक्त कार्य समूह बनाने पर भी सहमति जताई. यह समूह दोनों देशों के बीच तय रक्षा सहयोग परियोजनाओं के क्रियान्वयन और उनकी प्रगति की निगरानी करेगा.

भारत-जापान के बीच बढ़ती यह रक्षा साझेदारी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दोनों देशों के रणनीतिक हितों को मजबूती देगी. खासतौर पर समुद्री सुरक्षा, युद्धपोत निर्माण, रक्षा तकनीक और संयुक्त सैन्य अभ्यासों में बढ़ता सहयोग क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है.
 


स्टारलिंक का भारत में बड़ा प्लान! 30 हजार उपग्रहों के लिए फिर मांगी मंजूरी, सीधे मोबाइल से जुड़ेगा नेटवर्क

दूसरी पीढ़ी के उपग्रह नेटवर्क के लिए दोबारा आवेदन, नई तकनीक से दूरदराज इलाकों तक सीधे मोबाइल कनेक्टिविटी पहुंचाने की तैयारी

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Published - Thursday, 20 August, 2026
Last Modified:
Thursday, 20 August, 2026
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एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स की सैटेलाइट इंटरनेट सेवा स्टारलिंक (Starlink) ने भारत में अपने दूसरी पीढ़ी के उपग्रह नेटवर्क के लिए एक बार फिर मंजूरी मांगी है. कंपनी ने करीब 30 हजार उपग्रह तैनात करने का प्रस्ताव दिया है. खास बात यह है कि नए आवेदन में ऐसी तकनीक भी शामिल है, जिसके जरिए भविष्य में मोबाइल फोन और अन्य उपकरण सीधे उपग्रह नेटवर्क से जुड़ सकेंगे.

दूसरी पीढ़ी के नेटवर्क के लिए फिर किया आवेदन

स्टारलिंक ने भारत में अपने पहले और दूसरे चरण के उपग्रह नेटवर्क के लिए पहले भी आवेदन किया था. भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र यानी इन-स्पेस ने कंपनी के पहली पीढ़ी के नेटवर्क को मंजूरी दी थी.

इस नेटवर्क में 4,408 निम्न पृथ्वी कक्षा वाले उपग्रह शामिल हैं. इनके जरिए स्टारलिंक भारत में उपग्रह आधारित ब्रॉडबैंड सेवा शुरू करने की तैयारी कर रही है. हालांकि, दूसरी पीढ़ी के नेटवर्क के लिए पहले किया गया आवेदन मंजूर नहीं हो पाया था. अब कंपनी नए आवेदन के जरिए दूसरी पीढ़ी के उपग्रह नेटवर्क को भारत में मंजूरी दिलाने की एक और कोशिश कर रही है.

सीधे मोबाइल से जुड़ सकेगा उपग्रह नेटवर्क

नए प्रस्ताव की सबसे खास बात सीधे उपकरण से जुड़ने वाली कनेक्टिविटी है. इस तकनीक के जरिए विशेष रूप से तैयार मोबाइल फोन और अन्य उपकरण सीधे उपग्रह से जुड़ सकेंगे. इससे हर बार अलग उपग्रह डिश या टर्मिनल की जरूरत नहीं पड़ेगी. खासकर पहाड़ी, दूरदराज और उन इलाकों में यह तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है, जहां मोबाइल नेटवर्क कमजोर है या मोबाइल टावर पहुंचाना मुश्किल है.

नियमों का इंतजार

भारत में मोबाइल को सीधे उपग्रह से जोड़ने वाली सेवाओं के लिए नियामकीय ढांचा अभी पूरी तरह तय नहीं हुआ है. दूरसंचार नियामक प्राधिकरण इस मुद्दे पर विचार कर रहा है और सरकार को स्पेक्ट्रम बैंड तथा अन्य जरूरी नियमों पर फैसला करना है.

पारंपरिक दूरसंचार कंपनियों ने भी ऐसी उपग्रह सेवाओं को लेकर चिंता जताई है. उनका कहना है कि अगर उपग्रह कंपनियां सीधे मोबाइल उपभोक्ताओं को कनेक्टिविटी उपलब्ध कराती हैं, तो उन पर भी दूरसंचार कंपनियों के समान नियम लागू होने चाहिए.

लंबे समय में 42 हजार उपग्रहों की योजना

स्पेसएक्स की योजना दूसरी पीढ़ी के नेटवर्क के तहत लंबे समय में करीब 42 हजार उपग्रह तैनात करने की है. भारत में फिलहाल कंपनी ने करीब 30 हजार उपग्रहों के लिए मंजूरी मांगी है. जरूरत के आधार पर भविष्य में अतिरिक्त उपग्रहों के लिए भी आवेदन किया जा सकता है.

भारत के उपग्रह इंटरनेट बाजार में बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा

भारत में उपग्रह आधारित इंटरनेट बाजार को लेकर प्रतिस्पर्धा लगातार तेज हो रही है. रिलायंस जियो, भारती समर्थित यूटेलसैट वनवेब और अमेजन जैसी कंपनियां भी इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की तैयारी कर रही हैं. स्टारलिंक को पहली पीढ़ी के नेटवर्क के लिए पहले ही इन-स्पेस से मंजूरी मिल चुकी है. हालांकि, व्यावसायिक सेवाएं शुरू करने से पहले कंपनी को स्पेक्ट्रम, सुरक्षा मंजूरी और अन्य नियामकीय प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी.

ब्रॉडबैंड के साथ मोबाइल कनेक्टिविटी पर भी नजर

अगर स्टारलिंक के दूसरी पीढ़ी के नेटवर्क और सीधे मोबाइल से जुड़ने वाली सेवा को भारत में मंजूरी मिलती है, तो कंपनी का दायरा केवल उपग्रह आधारित ब्रॉडबैंड तक सीमित नहीं रहेगा. वह सीधे मोबाइल उपकरणों तक कनेक्टिविटी पहुंचाने वाले क्षेत्र में भी कदम रख सकेगी.

भारत के दूरदराज और कमजोर नेटवर्क वाले इलाकों को देखते हुए यह तकनीक स्टारलिंक के लिए बड़ा अवसर बन सकती है. हालांकि, इसकी शुरुआत और विस्तार सरकार के नियमों, स्पेक्ट्रम आवंटन और जरूरी मंजूरियों पर निर्भर करेगा.
 


रत्न एवं आभूषण निर्यात को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य, 2040 के लिए तैयार हुआ बड़ा रोडमैप

पीयूष गोयल की देखरेख में बना थिंक टैंक, उत्पादन दोगुना कर सेक्टर की इकोनॉमिक वैल्यू ₹60 लाख करोड़ तक ले जाने की तैयारी

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 20 August, 2026
Last Modified:
Thursday, 20 August, 2026
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भारत के रत्न एवं आभूषण उद्योग को वैश्विक स्तर पर नई ऊंचाई देने की तैयारी शुरू हो गई है. सरकार ने 2040 तक इस सेक्टर का निर्यात बढ़ाकर 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है. इसके लिए वाणिज्य विभाग और जेम्स एंड ज्वेलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (GJEPC) की उच्च स्तरीय बैठक में एक विशेष थिंक टैंक गठित करने का फैसला किया गया है, जो उत्पादन क्षमता बढ़ाने, नए बाजारों तक पहुंच बनाने और भारतीय ज्वेलरी को ग्लोबल ब्रांड के रूप में स्थापित करने की रणनीति तैयार करेगा.

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल की देखरेख में तैयार इस रोडमैप के तहत अगले कुछ वर्षों में उत्पादन को दोगुना कर करीब ₹15 लाख करोड़ तक पहुंचाने और पूरे सेक्टर की आर्थिक वैल्यू को करीब ₹60 लाख करोड़ तक ले जाने की योजना है.

28 अरब डॉलर से 100 अरब डॉलर तक पहुंचने का लक्ष्य

वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रत्न एवं आभूषण निर्यात करीब 28 अरब डॉलर रहा. अब सरकार और उद्योग मिलकर इसे 2040 तक 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने की दिशा में काम करेंगे. अनुमान है कि तब तक यह सेक्टर भारत की GDP में करीब 1.2 फीसदी और देश के कुल व्यापारिक निर्यात में 14 फीसदी का योगदान दे सकता है. बैठक में भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता मजबूत करने, वैश्विक बाजारों तक पहुंच बढ़ाने और 'Crafted in India' ज्वेलरी को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने पर विशेष जोर दिया गया.

कारीगरों की ताकत पर टिका है भारत का ज्वेलरी सेक्टर

वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने कहा कि भारत की सबसे बड़ी ताकत सोने, चांदी या हीरे की खदानें नहीं, बल्कि देश के कुशल कारीगर हैं. उन्होंने कहा कि अब उद्योग को केवल बेसिक मैन्युफैक्चरिंग तक सीमित रहने के बजाय डिजाइन, इनोवेशन और ग्लोबल ब्रांडिंग के जरिए ज्यादा वैल्यू-एडेड उत्पादों पर ध्यान देना होगा.

सरकार का जोर कम मार्जिन वाले पारंपरिक कारोबार से आगे बढ़कर डिजाइन और तकनीक आधारित ज्वेलरी मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने पर है. इसके लिए शैक्षणिक संस्थानों और उद्योग के बीच सहयोग बढ़ाने तथा एंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट सेंटर्स के माध्यम से नए टैलेंट को तैयार करने की भी योजना है.

AI और 3D प्रिंटिंग से मजबूत होगी सप्लाई चेन

'विकसित भारत 2047' के विजन के तहत रत्न एवं आभूषण उद्योग में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और 3D प्रिंटिंग जैसी आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जाएगा. इन तकनीकों के जरिए डिजाइन, उत्पादन और सप्लाई चेन को अधिक मजबूत और प्रतिस्पर्धी बनाने की तैयारी है.

डीजीएफटी महानिदेशक लव अग्रवाल ने कहा कि भारत पहले ही वैश्विक जेम्स और ज्वेलरी कारोबार में मजबूत स्थिति बना चुका है. अब देश को वैल्यू चेन में आगे बढ़ते हुए उच्च मूल्य वाले उत्पादों और वैश्विक ब्रांड निर्माण पर फोकस करना होगा.

FTA और नीतिगत समर्थन से मिलेगी रफ्तार

GJEPC के चेयरमैन किरीट भंसाली के मुताबिक, जेम्स और ज्वेलरी उद्योग इस समय एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है. नए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTA), स्पेशल नोटिफाइड जोन के जरिए रफ डायमंड की बिक्री पर 15 साल की टैक्स छूट और MSME सेक्टर को मिल रहे समर्थन ने उद्योग की वृद्धि के लिए मजबूत आधार तैयार किया है. सरकार और उद्योग जगत का मानना है कि इन नीतिगत पहलों से भारतीय ज्वेलरी की वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और नए बाजारों में निर्यात का विस्तार करने में मदद मिलेगी.

अप्रैल-जुलाई में निर्यात में 2.44% की बढ़ोतरी

GJEPC के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल-जुलाई की अवधि में भारत का रत्न एवं आभूषण निर्यात 2.44 फीसदी बढ़कर 9.17 अरब डॉलर हो गया. रुपये के लिहाज से निर्यात 13.58 फीसदी बढ़कर ₹87,078.01 करोड़ पहुंच गया.

इस दौरान जड़ाऊ आभूषणों की बिक्री में करीब 21 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई. किरीट भंसाली ने कहा कि चुनौतीपूर्ण वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद वैल्यू-एडेड सेगमेंट, खासकर जड़ाऊ आभूषण, सिल्वर ज्वेलरी और प्लेटिनम ज्वेलरी में भारतीय निर्यातकों का प्रदर्शन मजबूत रहा है.
 


वेदांता का ग्रीन एनर्जी पर बड़ा दांव, ₹9,500 करोड़ का निवेश; 2030 तक 2.5 GW का लक्ष्य

रिन्यूएबल एनर्जी का इस्तेमाल 52% बढ़ा, 2030 तक 2.5 GW राउंड-द-क्लॉक ग्रीन पावर क्षमता का लक्ष्य

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 20 August, 2026
Last Modified:
Thursday, 20 August, 2026
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अनिल अग्रवाल की अगुवाई वाली वेदांता लिमिटेड ने अपने नेट-जीरो लक्ष्य की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. कंपनी ने वित्त वर्ष 2025-26 में रिन्यूएबल एनर्जी, कम कार्बन वाले ईंधन, ऊर्जा दक्षता और नई तकनीकों पर 1 अरब डॉलर यानी करीब 9,500 करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश किया. कंपनी की रिन्यूएबल एनर्जी खपत भी इस दौरान 52 फीसदी बढ़कर 400 करोड़ यूनिट हो गई, जिससे करीब 30 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड समकक्ष उत्सर्जन को रोकने में मदद मिली.

2030 तक 2.5 GW ग्रीन एनर्जी क्षमता का लक्ष्य

वेदांता के पास फिलहाल करीब 2,000 मेगावाट यानी 2 GW की इंस्टॉल्ड और कॉन्ट्रैक्टेड रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता है. कंपनी ने 2030 तक इसे बढ़ाकर 2.5 GW राउंड-द-क्लॉक रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता करने का लक्ष्य तय किया है. राउंड-द-क्लॉक रिन्यूएबल एनर्जी का मतलब ऐसी हरित बिजली से है, जिसकी उपलब्धता केवल सूरज की रोशनी या मौसम पर निर्भर नहीं रहती. इसके लिए सोलर और विंड जैसे रिन्यूएबल स्रोतों के साथ एनर्जी स्टोरेज तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, ताकि जरूरत के मुताबिक लगातार बिजली उपलब्ध कराई जा सके.

एक साल में 52% बढ़ा रिन्यूएबल एनर्जी का इस्तेमाल

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में वेदांता ने 400 करोड़ यूनिट रिन्यूएबल एनर्जी का इस्तेमाल किया, जो एक साल पहले की तुलना में 52 फीसदी अधिक है. कंपनी के मुताबिक, बिजली की यह मात्रा करीब 3 करोड़ भारतीय परिवारों की सालाना बिजली खपत के बराबर है. वेदांता का कहना है कि रिन्यूएबल एनर्जी के बढ़ते इस्तेमाल और अन्य पर्यावरण-अनुकूल पहलों की मदद से कंपनी ने वित्त वर्ष 2025-26 में करीब 30 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड समकक्ष उत्सर्जन को रोकने में सफलता हासिल की.

भारत के नेट-जीरो लक्ष्य में अहम भूमिका

भारत ने 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली क्षमता हासिल करने और अपनी ऊर्जा जरूरतों का 50 फीसदी रिन्यूएबल स्रोतों से पूरा करने का लक्ष्य रखा है. देश ने 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन हासिल करने का भी लक्ष्य तय किया है.

खनन और धातु क्षेत्र इस ऊर्जा बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. रिन्यूएबल पावर प्लांट, ट्रांसमिशन ग्रिड और एनर्जी स्टोरेज जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के लिए तांबा, एल्युमीनियम, जस्ता और स्टील जैसी धातुओं की बड़ी मात्रा में जरूरत होती है. ऐसे में वेदांता के लिए ग्रीन एनर्जी में निवेश पर्यावरणीय लक्ष्यों के साथ-साथ भविष्य की औद्योगिक मांग को पूरा करने की रणनीति का भी हिस्सा है.
 


SEBI का बड़ा दांव: विदेशी निवेशकों को वापस लाने के लिए ट्रेडिंग नियमों में बदलाव की तैयारी

शॉर्ट सेलिंग आसान करने से लेकर मार्जिन घटाने तक पर विचार, 9 महीने में लागू हो सकते हैं प्रस्तावित सुधार

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Published - Thursday, 20 August, 2026
Last Modified:
Thursday, 20 August, 2026
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भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी के बीच बाजार नियामक सेबी (SEBI) ट्रेडिंग सिस्टम में बड़े बदलाव की तैयारी कर रहा है. प्रस्तावित सुधारों का मकसद विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय बाजार में कारोबार आसान बनाना, लागत और पूंजी की जरूरत घटाना और लंबी अवधि की निवेश रणनीतियों को बढ़ावा देना है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इन बदलावों में नकद बाजार में जमानत की जरूरत कम करना, शॉर्ट सेलिंग को आसान बनाना और लंबी अवधि के डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट को अधिक आकर्षक बनाना शामिल है.

विदेशी निवेशकों की निकासी बनी बड़ी चिंता

ये प्रस्ताव ऐसे समय सामने आए हैं, जब भारतीय शेयरों में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी करीब 17 साल के निचले स्तर पर पहुंच गई है. वहीं, इस साल रुपया करीब 6 फीसदी कमजोर हुआ है. नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर 2024 से जून 2026 के बीच विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से 50 अरब डॉलर से अधिक की निकासी कर चुके हैं.

वैश्विक MSCI Emerging Markets Index में भारत का भार भी सितंबर 2024 के करीब 21 फीसदी के उच्च स्तर से घटकर 12 फीसदी से नीचे आ गया है. माना जा रहा है कि सेबी के प्रस्तावित सुधारों से वैश्विक सूचकांकों में भारत का वजन बढ़ाने में मदद मिल सकती है.

शॉर्ट सेलिंग को आसान बनाने की तैयारी

सेबी सिक्योरिटीज लेंडिंग एंड बॉरोइंग व्यवस्था को मजबूत करने पर भी विचार कर रहा है. इसके तहत उधार लेने और देने के लिए पात्र शेयरों की संख्या करीब दोगुनी की जा सकती है. इससे नकद बाजार में शॉर्ट सेलिंग करना विदेशी और संस्थागत निवेशकों के लिए आसान हो सकता है.

विदेशी निवेशक लंबे समय से भारत के बाजार नियमों को चीन, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे प्रमुख एशियाई बाजारों के अनुरूप बनाने की मांग करते रहे हैं. इन बाजारों में शेयरों की लेंडिंग-बॉरोइंग और क्लोजिंग ऑक्शन जैसी व्यवस्थाएं पहले से विकसित हैं.

15-20 फीसदी तक घट सकती है शुरुआती पूंजी जरूरत

सेबी अत्यधिक लिक्विड शेयरों में कारोबार के लिए जमानत यानी मार्जिन की जरूरत घटाने पर भी विचार कर रहा है. सूत्रों के मुताबिक, इससे निवेशकों की शुरुआती पूंजी आवश्यकता 15 से 20 फीसदी तक कम हो सकती है.

इसके अलावा एक साल से अधिक अवधि वाले डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट के लिए शुरुआती जमानत घटाने का भी प्रस्ताव है. विदेशी एसेट मैनेजरों का मानना है कि मौजूदा व्यवस्था छोटी अवधि, खासकर साप्ताहिक डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट में ज्यादा कारोबार को बढ़ावा देती है. इससे लंबी अवधि की हेजिंग रणनीतियों के लिए भारतीय बाजार अपेक्षाकृत कम आकर्षक बनता है.

संस्थागत निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर

सेबी पिछले दो वर्षों में डेरिवेटिव बाजार में छोटे निवेशकों की सट्टेबाजी सीमित करने के लिए कई कदम उठा चुका है. अब नियामक संस्थागत और पेशेवर निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दे रहा है. NSE के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय बाजार के कारोबार में खुदरा निवेशकों की हिस्सेदारी 35 फीसदी से अधिक है. इसके मुकाबले अमेरिका में यह हिस्सेदारी करीब 20 फीसदी है, जहां संस्थागत और पेशेवर निवेशकों की भूमिका ज्यादा बड़ी है.

विश्लेषकों का मानना है कि कारोबार की लागत और प्रक्रियागत अड़चनें कम होने से भारत विदेशी संस्थागत निवेश और पैसिव इन्वेस्टमेंट के लिए ज्यादा आकर्षक बन सकता है.

9 महीने में लागू हो सकते हैं बदलाव

सूत्रों के अनुसार, सेबी उद्योग से सलाह लेने और बाजार से जुड़े संस्थानों को अपनी मौजूदा प्रणालियों में बदलाव के लिए समय देने के बाद करीब 9 महीने में इन सुधारों को लागू कर सकता है. हालांकि, कुछ बदलावों के शुरुआती चरण में बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ने की आशंका भी है.

हाल ही में डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट वाले शेयरों के क्लोजिंग प्राइस को तय करने के लिए शुरू की गई नई क्लोजिंग ऑक्शन व्यवस्था के शुरुआती दौर में निफ्टी में तेज उतार-चढ़ाव देखा गया था. बाजार निर्माताओं और निवेशकों की इसमें भागीदारी भी सीमित रही.

सिर्फ नियमों में बदलाव से नहीं लौटेंगे विदेशी निवेशक

विशेषज्ञों का कहना है कि बाजार को नई व्यवस्थाओं के अनुरूप ढलने में समय लगेगा. लंबी अवधि में प्रस्तावित सुधारों से कारोबार की लागत और प्रक्रियागत बाधाएं कम हो सकती हैं. हालांकि, सिर्फ ट्रेडिंग नियमों में बदलाव से विदेशी निवेशकों की बड़ी वापसी सुनिश्चित नहीं होगी. विदेशी निवेशक रुपये की चाल, भारतीय कंपनियों के वैल्यूएशन, आर्थिक वृद्धि और वैश्विक बाजार की परिस्थितियों जैसे कई अन्य कारकों को भी ध्यान में रखते हैं.
 


FSSAI की सख्ती बढ़ी, Zandu Honey समेत 5 कंपनियों ने हटाए ‘100%’ वाले दावे

FSSAI का कहना है कि ऐसे दावे उपभोक्ताओं को भ्रमित कर सकते हैं और इन्हें वैज्ञानिक या तय मानकों के आधार पर साबित करना जरूरी है.

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Published - Thursday, 20 August, 2026
Last Modified:
Thursday, 20 August, 2026
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फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) ने खाद्य उत्पादों की पैकेजिंग और विज्ञापनों में किए जाने वाले ‘100%’ दावों को लेकर कंपनियों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है. अथॉरिटी की कार्रवाई के बाद BONN BISCUITS, Zandu Honey, AMWAY INDIA और JUZA FOODS समेत पांच कंपनियों ने अपने प्रोडक्ट्स और प्रचार सामग्री से ‘100% Pure’, ‘100% Natural’ जैसे दावे हटा लिए हैं. FSSAI का कहना है कि ऐसे दावे उपभोक्ताओं को भ्रमित कर सकते हैं और इन्हें वैज्ञानिक या तय मानकों के आधार पर साबित करना जरूरी है.

‘100%’ दावों पर FSSAI की नजर

कंपनियां अपने खाद्य उत्पादों के पैकेट, लेबल, विज्ञापनों और अन्य प्रचार सामग्री में अक्सर ‘100% Pure’ या ‘100% Natural’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करती हैं. FSSAI के मुताबिक, इस तरह के दावे उपभोक्ताओं के मन में उत्पाद की शुद्धता या प्राकृतिक होने को लेकर ऐसी धारणा बना सकते हैं, जिसे हर मामले में प्रमाणित करना आसान नहीं होता.

अथॉरिटी लगातार खाद्य उत्पादों की पैकेजिंग और विज्ञापनों की निगरानी कर रही है. FSSAI का कहना है कि खाद्य पदार्थों से जुड़े दावे स्पष्ट, सटीक और ऐसे होने चाहिए जिन्हें उचित प्रमाण के साथ सत्यापित किया जा सके. ऐसी भाषा से बचना जरूरी है, जिससे ग्राहकों को गलत या बढ़ा-चढ़ाकर जानकारी मिलने की संभावना हो.

पांच कंपनियों ने हटाए दावे

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, FSSAI की कार्रवाई के बाद पांच कंपनियों ने अपने प्रोडक्ट्स और विज्ञापनों से ‘100%’ वाले दावे हटा लिए हैं. इनमें BONN BISCUITS, Zandu Honey, AMWAY INDIA और JUZA FOODS समेत अन्य कंपनी शामिल है. इन कंपनियों के उत्पादों की पैकेजिंग और प्रचार सामग्री में इस्तेमाल किए जा रहे दावों को लेकर FSSAI ने हस्तक्षेप किया था. इसके बाद कंपनियों ने संबंधित दावों को हटाने या उनमें बदलाव करने की प्रक्रिया अपनाई.

Dabur पर भी हुई थी कार्रवाई

‘100%’ दावों को लेकर FSSAI की कार्रवाई का सामना Dabur India भी कर चुकी है. अथॉरिटी ने कंपनी को कुछ खाद्य उत्पादों की बिक्री रोकने का निर्देश दिया था. इनमें शहद, एप्पल साइडर विनेगर, वर्जिन नारियल तेल, तिल का तेल, गाय का घी, नारियल पानी और नारियल दूध जैसे उत्पाद शामिल थे.

इनमें से कुछ उत्पादों पर ‘100% Natural’, ‘100% Pure’, ‘100% Purity Guaranteed’, ‘100% Organic’ और ‘100% Tender Coconut Water’ जैसे दावे किए गए थे. FSSAI की सख्ती के बाद कंपनियों के लिए ऐसे दावों के इस्तेमाल को लेकर नियमों के अनुरूप बदलाव करना जरूरी हो गया है.

ग्राहकों को भ्रमित करने वाले दावों पर सख्ती

FSSAI का रुख साफ है कि खाद्य उत्पादों की पैकेजिंग और विज्ञापनों में इस्तेमाल होने वाली भाषा उपभोक्ताओं को गुमराह करने वाली नहीं होनी चाहिए. खास तौर पर ‘100%’ जैसे पूर्ण दावों के लिए कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनका दावा संबंधित मानकों और प्रमाणों के आधार पर सही साबित किया जा सके.
 


HDFC Bank में LIC का बड़ा दांव, RBI से 9.99% तक हिस्सेदारी बढ़ाने की मंजूरी

14 अगस्त 2026 तक LIC के पास HDFC Bank की 4.11 फीसदी हिस्सेदारी थी. RBI की नई मंजूरी के बाद बीमा कंपनी अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर अधिकतम 9.99 फीसदी तक कर सकती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 20 August, 2026
Last Modified:
Thursday, 20 August, 2026
BWHindia

भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) अब HDFC Bank में अपनी हिस्सेदारी करीब 10 फीसदी तक बढ़ा सकता है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने LIC को बैंक की कुल पेड-अप शेयर कैपिटल या वोटिंग राइट्स में 9.99 फीसदी तक हिस्सेदारी खरीदने की मंजूरी दे दी है. 14 अगस्त 2026 तक LIC के पास HDFC Bank की 4.11 फीसदी हिस्सेदारी थी. ऐसे में नई मंजूरी के बाद LIC के पास बैंक के करीब 5.88 फीसदी अतिरिक्त शेयर खरीदने की गुंजाइश है.

19 अगस्त को RBI ने दी मंजूरी

HDFC Bank ने बुधवार, 19 अगस्त 2026 को शेयर बाजार को दी जानकारी में बताया कि RBI ने उसी दिन एक पत्र के जरिए LIC को हिस्सेदारी बढ़ाने की मंजूरी दी. LIC ने HDFC Bank में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए केंद्रीय बैंक के पास आवेदन किया था. हालांकि, यह मंजूरी कुछ शर्तों के साथ दी गई है. LIC को हिस्सेदारी बढ़ाते समय बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, 1949, RBI के 2025 के शेयरहोल्डिंग नियमों, FEMA, SEBI के नियमों और अन्य लागू कानूनों का पालन करना होगा.

अभी LIC के पास 4.11% हिस्सेदारी

14 अगस्त 2026 तक LIC के पास HDFC Bank की 4.11 फीसदी हिस्सेदारी थी. RBI की नई मंजूरी के बाद बीमा कंपनी अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर अधिकतम 9.99 फीसदी तक कर सकती है. यानी मौजूदा हिस्सेदारी के मुकाबले LIC करीब 5.88 फीसदी अतिरिक्त हिस्सेदारी खरीद सकती है.

HDFC Bank का प्रदर्शन कैसा रहा?

LIC को यह मंजूरी ऐसे समय मिली है जब HDFC Bank ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के नतीजे जारी किए हैं. अप्रैल-जून 2026 तिमाही में बैंक का स्टैंडअलोन नेट प्रॉफिट 19,059.72 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले साल की समान तिमाही के मुकाबले करीब 4.98 फीसदी अधिक है.

इस दौरान बैंक की नेट इंटरेस्ट इनकम (NII) 6.7 फीसदी बढ़कर 33,535.95 करोड़ रुपये हो गई. हालांकि, यह बाजार के 34,353 करोड़ रुपये के अनुमान से कम रही. बैंक का नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) कुल एसेट के आधार पर 3.26 फीसदी और ब्याज कमाने वाले एसेट के आधार पर 3.40 फीसदी रहा.

डिपॉजिट और लोन बुक में भी बढ़ोतरी

HDFC Bank के औसत डिपॉजिट में सालाना आधार पर 10.8 फीसदी की बढ़ोतरी हुई और यह 30,386 अरब रुपये पर पहुंच गया. वहीं, बैंक की कुल लोन बुक यानी एडवांस 13.3 फीसदी बढ़कर 30,115 अरब रुपये हो गई. हालांकि, बैंक की एसेट क्वालिटी में मामूली दबाव देखने को मिला. जून 2026 के अंत में बैंक का ग्रॉस NPA बढ़कर 1.17 फीसदी हो गया, जो मार्च 2026 में 1.15 फीसदी था.