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अब Alcohol इंडस्ट्री ने भी बताई अपनी परेशानी, सरकार से की ये मांग
इससे सप्लायरर्स और इनका बिजनेस करने वालों को अपनी ऑपरेशन कॉस्ट निकालना भी मुश्किल हो जाता है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago
नई दिल्लीः इंटरनेशनल स्पिरिट्स एंड वाइन्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ISWAI) ने प्रीमियम ब्रैंड्स के अल्कोहोल उत्पादों पर लगने वाले ज्यादा टैक्स के बारे में चिंता जताते हुए सरकार से इसे कम करने की गुजारिश की है.
इतना है टैक्स का हिस्सा
एसोसिएशन का कहना है कि AlcoBev इंडस्ट्री में प्रीमियम ब्रैंड्स पर 67 से 80 फीसदी टैक्स लगता है. इससे सप्लायरर्स और इनका बिजनेस करने वालों को अपनी ऑपरेशन कॉस्ट निकालना भी मुश्किल हो जाता है. टैक्स की इतनी ज्यादा दर होने के कारण यह ब्रैंड्स कम बिकते हैं. अगर टैक्स को कम कर दिया जाए तो सेल्स में बढ़ोतरी दिख सकती है.
जल्द से जल्द कम हो टैक्स
ISWAI की सीईओ नीता कपूर ने कहा कि महंगाई और उच्च टैक्स दरों के चलते भारतीय एल्कोबेव इंडस्ट्री एक गहरे संकट में है. जब तक टैक्स को कम करके या उत्पाद की कीमतों में वृद्धि करके स्थिति को उलटने के लिए त्वरित कार्रवाई नहीं की जाती, तब तक भारत जल्द ही एक ऐसी स्थिति का सामना कर सकता है जो एक सुनहरे हंस को मारने के समान होगा.
सरकार को मिलता है शराब से 40 फीसदी तक राजस्व
कपूर ने कहा कि हर सेक्टर को अपने उत्पादों की कीमतों को बढ़ाने की आजादी है, लेकिन शराब एक ऐसी इंडस्ट्री है जहां कीमतों का निर्धारण सरकारों द्वारा किया जाता है. राज्य व केंद्र सरकारों को शराब इंडस्ट्री से करबी 25 से 40 फीसदी तक रेवेन्यू जेनरेट होती है. अब कीमतों में अगर बढ़ोतरी की जाए तो इंडस्ट्री संकट से बाहर आ सकती है. जहां वाइन, बीयर व व्हिस्की को तैयार करने वाले कच्चे माल जैसे शीरा और अनाज भी महंगा हो गया है.
दुनिया का नौवां सबसे बड़ा बाजार
भारतीय एल्कोबेव उद्योग 1.5 मिलियन लोगों को रोजगार देता है और इसका अनुमानित बाजार आकार 52.5 बिलियन अमरीकी डालर (2020) है, जो दुनिया में नौवां सबसे बड़ा है. ISWAI के महासचिव सुरेश मेनन ने कहा, “सितंबर में समाप्त तिमाही के दौरान भारतीय निर्मित विदेशी शराब के निर्माताओं के लिए सकल मार्जिन सामग्री की उच्च लागत के कारण एक साल पहले की समान अवधि की तुलना में कम था. ISWAI का अनुमान है कि एक्स्ट्रा न्यूट्रल अल्कोहल (ENA) और जौ जैसे अनाज पिछले साल की तुलना में 12% और 46.2% अधिक महंगे हैं, जबकि पैकेजिंग सामग्री जैसे ग्लास और मोनो कार्टन की लागत क्रमशः 24.9% और 19% बढ़ी है. केंद्र सरकार और राज्य सरकार अगर टैक्स को कम कर दें तो भारत में संकटग्रस्त एल्कोबेव निर्माताओं को काफी मदद मिलेगी.
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