जून में भारत के व्‍यापार घाटे में हुई कमी, ये रही वजह 

भारत के मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट में कमी हुई है जो 20.13 बिलियन डॉलर रहा है, जो मई में 22.1 बिलियन डॉलर था. वहीं जून में भारत का आयात 17 फीसदी घटकर 53.10 बिलियन रहा है. 

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Friday, 14 July, 2023
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जून महीने के व्‍यापार के आंकड़े जारी हो गए हैं. इस महीने में भारत का मर्चेंडाइज व्यापार घाटा जून में कम होकर 20.13 अरब डॉलर हो गया है, जबकि मई में यह 22.1 अरब डॉलर था. इसके पीछे की वजह ये है कि भारत में आयात में गिरावट हुई है. जून में व्यापारिक निर्यात 32.97 अरब डॉलर रहा, जबकि आयात 53.10 अरब डॉलर रहा. पिछले महीने व्यापारिक निर्यात 34.98 अरब डॉलर था, जबकि आयात 57.10 अरब डॉलर था.

क्‍या बोले वाणिज्‍य सचिव 
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सुनील बर्थवाल ने 14 जुलाई को व्यापार डेटा जारी करने के दौरान कहा, दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में मंदी सहित कई कारणों से भारत का निर्यात कमजोर रहा है. उन्‍होंने कहा कि डब्ल्यूटीओ का मंदी का अनुमान सच हो गया है. दुनिया की उन प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में मंदी है जहां अमेरिका और यूरोपीय संघ सहित हमारे निर्यात केंद्रित हैं. सचिव के अनुसार, मौद्रिक नीति के सख्त होने का असर शायद व्यापार नीति पर भी पड़ रहा है. उन्होंने कहा, दुनिया मंदी और मुद्रास्फीति के दबाव की दोहरी दुविधा में है, जिसका असर मैन्‍युफैक्‍चरिंग गतिविधियों पर पड़ रहा है,  जो बदले में व्यापार गतिविधियों को प्रभावित कर रहा है.

कैसा रहा सर्विस सेक्‍टर का हाल
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार जून में सर्विस एक्‍सपोर्ट 27.12 अरब डॉलर था, जबकि आयात 15.88 अरब डॉलर था. मई में सेवा निर्यात 25.30 अरब डॉलर और आयात 13.53 अरब डॉलर था. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, उन्‍होंने कहा कि तेल के साथ-साथ रत्न और आभूषण निर्यात में गिरावट के कारण निर्यात में गिरावट बढ़ रही है. जून 2022 की तुलना में जून 2023 में निर्यात में आधी गिरावट के लिए पेट्रोलियम उत्पाद जिम्मेदार थे.

जून 2023 में निर्यात में 45 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि का प्रमुख कारण इलेक्ट्रॉनिक सामान था.अप्रैल-जून 2023 में मसाले के निर्यात के साथ-साथ कृषि निर्यात में भी मजबूत वृद्धि दर्ज की गई, जिसमें वर्ष 2022 के मुकाबले 18.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई, फलों और सब्जियों के निर्यात में 14.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई, और तिलहन और तेल भोजन के निर्यात में क्रमशः 25.1 प्रतिशत और 33.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. 

अप्रैल-जून के लिए संयुक्त लेंस के तहत

हालाँकि, पिछले साल 2022 के मुकाबले अगर इस आंकड़े पर नजर डालें तो इसमें 28.26 प्रतिशत का सुधार हुआ है. 2022 में ये जहां 31.49 बिलियन डॉलर था वहीं 2023 में ये 22.59 बिलियन डॉलर पर आ गया.  सरकारी आंकड़ों से पता चला कि माल व्यापार घाटा भी अप्रैल-जून 2023 में 7.9 प्रतिशत बढ़कर 57.6 बिलियन डॉलर हो गया, जबकि अप्रैल-जून 2022 में यह 62.6 बिलियन डॉलर था.

 इस बीच, इलेक्ट्रॉनिक सामान के निर्यात में पिछले वर्ष के 45.4 प्रतिशत के मुकाबले इस साल ये 47.1 प्रतिशत तक जा पहुंचा है. वहीं लौह अयस्क निर्यात की बात करें तो में भी अप्रैल-जून 2022 की तुलना में जून 2023 में सालाना आधार पर 1664.3 प्रतिशत और अप्रैल-जून 2023 के दौरान 35 प्रतिशत का सुधार हुआ है. 

जून 2023 में भारत का कुल निर्यात (मर्चेंडाइज और सर्विस सेक्‍टर) $60.09 बिलियन होने का अनुमान है, जो जून 2022 की तुलना में 13.16 प्रतिशत कम है. वहीं अगर आयात की बात करें तो जून 2023 में कुल आयात $68.98 बिलियन होने का अनुमान है, इसमें पिछले साल के मुकाबले 13.91 प्रतिशत की कमी देखने को मिल रही है.

 

 


 


म्यूचुअल फंड में नए निवेशकों की रफ्तार घटी, NFO से 5 साल में सबसे कम रकम जुटी

सितंबर 2026 तक म्यूचुअल फंड उद्योग से जुड़े 44 लाख नए निवेशक, कुल संख्या 6.33 करोड़ पहुंची; अप्रैल-जून तिमाही में नए फंड ऑफरिंग से केवल 1,759 करोड़ रुपये जुटे

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Monday, 26 October, 2026
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म्यूचुअल फंड उद्योग में नए निवेशकों के जुड़ने की रफ्तार लगातार दूसरे साल धीमी बनी हुई है. सितंबर 2026 तक इस साल उद्योग से 44 लाख नए निवेशक जुड़े हैं. यह कोविड प्रभावित वर्ष 2020 के बाद नए निवेशकों की सबसे कम संख्या है. वहीं, अप्रैल-जून 2026 की तिमाही में नए फंड ऑफरिंग (NFO) के जरिए जुटाई गई रकम घटकर करीब 1,759 करोड़ रुपये रह गई, जो पांच साल का निचला स्तर है. हालांकि, कुल निवेशकों की संख्या बढ़कर 6.33 करोड़ हो गई है.

बाजार की सुस्ती का असर

म्यूचुअल फंड में निवेशकों की संख्या बढ़ने की रफ्तार शेयर बाजार के प्रदर्शन से काफी हद तक जुड़ी रहती है. जब बाजार में तेजी होती है, तो नए निवेशक निवेश के लिए आकर्षित होते हैं. वर्ष 2021 और 2024 में बाजार में तेजी के दौरान म्यूचुअल फंड उद्योग ने करीब एक-एक करोड़ नए निवेशक जोड़े थे. इसके मुकाबले कोविड के बाद के अन्य वर्षों में यह संख्या लगभग 50-60 लाख रही.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वर्ष 2024 असाधारण रहा था. उस दौरान बाजार में तेज उछाल ने पहली बार निवेश करने वाले लोगों और कम अवधि के लिए निवेश करने वालों को आकर्षित किया. ऐसे में उस साल को सामान्य मानक के रूप में देखने के बजाय अपवाद के तौर पर देखना चाहिए.

नए निवेशकों का बाजार में आना काफी हद तक निवेशकों की धारणा पर निर्भर करता है. पिछले दो वर्षों में बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ा है और नियामक ने अधिक जोखिम वाली ट्रेडिंग पर नियम सख्त किए हैं. इन परिस्थितियों का असर नए निवेशकों के जुड़ने की रफ्तार पर पड़ा है.

44 लाख नए निवेशकों को भी मजबूत वृद्धि मान रहे विशेषज्ञ

बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि बाजार में उतार-चढ़ाव और वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद 44 लाख नए निवेशकों का जुड़ना उद्योग के लिए मजबूत संकेत है. उनके मुताबिक, ब्याज दरों में बढ़ोतरी और भूराजनीतिक अनिश्चितता वाले माहौल में निवेशकों की यह संख्या कमजोरी के बजाय उद्योग की मजबूती को दर्शाती है.

उन्होंने कहा कि वर्ष 2024 में नए निवेशकों की संख्या असाधारण रूप से अधिक रही थी. आम तौर पर निवेशक हाल के रिटर्न को देखकर निवेश का फैसला लेते हैं. पिछले दो वर्षों में बाजार का प्रदर्शन अस्थिर रहने से नए निवेशकों के आने की रफ्तार प्रभावित हुई है.

NFO से जुटाई रकम पांच साल के निचले स्तर पर

नए निवेशकों की संख्या बढ़ने पर बाजार के प्रदर्शन के साथ-साथ म्यूचुअल फंड कंपनियों की ओर से लॉन्च किए जाने वाले नए फंडों का भी असर पड़ता है. पिछले दो वर्षों में नए फंड लॉन्च करने की संख्या और उनमें निवेशकों की दिलचस्पी दोनों में कमी आई है.

चॉइस वेल्थ में रिसर्च एंड प्रोडक्ट के प्रमुख अक्षत गर्ग के अनुसार, अप्रैल-जून 2026 की तिमाही में नए फंड ऑफरिंग (NFO) के जरिए जुटाई गई रकम घटकर करीब 1,759 करोड़ रुपये रह गई. यह पांच साल का निचला स्तर है.

उन्होंने बताया कि नियामकीय सख्ती के कारण थीमैटिक फंडों के लॉन्च में कमी आई है. पहले ऐसे फंड बड़ी संख्या में नए निवेशकों को आकर्षित करते थे. नए फंड लॉन्च करना निवेशकों को म्यूचुअल फंड उद्योग से जोड़ने का एक अहम माध्यम रहा है, लेकिन अब इस माध्यम की रफ्तार धीमी पड़ गई है.

कुल मिलाकर, म्यूचुअल फंड उद्योग में निवेशकों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन नए निवेशकों के जुड़ने और NFO के जरिए रकम जुटाने की गति पहले की तुलना में सुस्त है. बाजार में उतार-चढ़ाव, वैश्विक अनिश्चितता और नए फंड लॉन्च की घटती संख्या इस रुझान को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं.

 


इंफोसिस का मुनाफा 6% बढ़कर ₹7,823 करोड़, AI से कमाई में 29% की तेजी

इंफोसिस के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) कारोबार ने भी दूसरी तिमाही में बेहतर प्रदर्शन किया. कंपनी का AI रेवेन्यू पिछली तिमाही के मुकाबले 29% बढ़ा और कुल रेवेन्यू में इसकी हिस्सेदारी 10.5% रही.

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Monday, 26 October, 2026
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आईटी कंपनी इंफोसिस ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में मुनाफे और रेवेन्यू, दोनों में बढ़ोतरी दर्ज की है. जुलाई-सितंबर तिमाही में कंपनी का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 6% बढ़कर 7,823 करोड़ रुपये हो गया, जबकि ऑपरेशंस से रेवेन्यू में 11% की वृद्धि हुई. कंपनी के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) कारोबार से होने वाली कमाई भी पिछली तिमाही के मुकाबले 29% बढ़ी है. हालांकि, इंफोसिस ने पूरे वित्त वर्ष के लिए अपना रेवेन्यू ग्रोथ अनुमान घटा दिया है. कंपनी ने शेयरधारकों के लिए 26 रुपये प्रति शेयर के अंतरिम डिविडेंड का भी ऐलान किया है.

रेवेन्यू 11% बढ़कर 49,244 करोड़ रुपये

इंफोसिस ने शुक्रवार को वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही के नतीजे जारी किए. इस दौरान कंपनी का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट बढ़कर 7,823 करोड़ रुपये रहा, जबकि पिछले साल की समान तिमाही में यह 7,364 करोड़ रुपये था. इस तरह कंपनी के मुनाफे में सालाना आधार पर करीब 6% की बढ़ोतरी हुई.

जुलाई-सितंबर तिमाही में कंपनी का ऑपरेशंस से रेवेन्यू सालाना आधार पर 11% बढ़कर 49,244 करोड़ रुपये हो गया. पिछले साल की समान अवधि में यह 44,485 करोड़ रुपये था. जून तिमाही के मुकाबले कंपनी का नेट प्रॉफिट 0.7% बढ़ा, जबकि रेवेन्यू में करीब 2% की वृद्धि दर्ज की गई.

ऑपरेटिंग प्रॉफिट में 10.4% की बढ़ोतरी

कंपनी का ऑपरेटिंग प्रॉफिट सालाना आधार पर 10.4% बढ़कर 10,330 करोड़ रुपये रहा. वहीं, ऑपरेटिंग मार्जिन 21% पर स्थिर रहा, जो पिछले साल की समान तिमाही के बराबर है. कंपनी ने पूरे वित्त वर्ष के लिए ऑपरेटिंग मार्जिन का अनुमान 20% से 22% के बीच बरकरार रखा है.

AI कारोबार से कमाई 29% बढ़ी

इंफोसिस के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) कारोबार ने भी दूसरी तिमाही में बेहतर प्रदर्शन किया. कंपनी का AI रेवेन्यू पिछली तिमाही के मुकाबले 29% बढ़ा और कुल रेवेन्यू में इसकी हिस्सेदारी 10.5% रही.

कंपनी के मुताबिक, ग्राहक कामकाज को ऑटोमेट करने, उत्पादकता बढ़ाने और कारोबारी प्रक्रियाओं में बदलाव लाने के लिए AI का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं. इससे इस क्षेत्र में आईटी सेवाओं की मांग को समर्थन मिल रहा है.

शेयरधारकों को 26 रुपये प्रति शेयर का डिविडेंड

इंफोसिस ने शेयरधारकों के लिए 26 रुपये प्रति शेयर के अंतरिम डिविडेंड की घोषणा की है. इसके लिए 3 नवंबर 2026 को रिकॉर्ड डेट तय की गई है. इसी तारीख के आधार पर यह तय होगा कि किन शेयरधारकों को डिविडेंड का लाभ मिलेगा.

हालांकि, कंपनी ने पूरे वित्त वर्ष के लिए अपने रेवेन्यू ग्रोथ अनुमान में कटौती की है. ऐसे में निवेशकों की नजर कंपनी की आगे की कारोबारी संभावनाओं, AI सेवाओं की मांग और रेवेन्यू ग्रोथ पर बनी रहेगी.


2047 तक भारत की बंदरगाह क्षमता चार गुना करने का लक्ष्य, पीयूष गोयल ने पेश किया रोडमैप

गोयल के मुताबिक, भारत को वैश्विक व्यापार में अपनी भूमिका मजबूत करने के लिए आधुनिक बंदरगाह सुविधाओं और बेहतर समुद्री संपर्क व्यवस्था में निवेश करना होगा. इसके साथ ही बंदरगाहों की परिचालन दक्षता बढ़ाना भी जरूरी है.

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Monday, 26 October, 2026
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केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने 2047 तक भारत की बंदरगाह क्षमता को चार गुना करने की योजना का खाका पेश किया है. उन्होंने कहा कि देश की बढ़ती अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की जरूरतों को पूरा करने के लिए बंदरगाहों के आधुनिकीकरण, समुद्री कनेक्टिविटी और परिचालन दक्षता में सुधार पर जोर देना होगा. इसके लिए भारत नीदरलैंड के रॉटरडैम बंदरगाह की विशेषज्ञता का लाभ उठाने के साथ-साथ हरित ऊर्जा, कार्बन कैप्चर और टिकाऊ समुद्री व्यापार के क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएं तलाश रहा है.

बंदरगाह क्षमता बढ़ाने पर जोर

नीदरलैंड की यात्रा के दौरान रॉटरडैम में पीयूष गोयल ने कहा कि पिछले एक दशक में भारत ने अपनी बंदरगाह क्षमता दोगुनी की है, लेकिन बढ़ती आर्थिक गतिविधियों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को देखते हुए अभी और विस्तार की जरूरत है. उन्होंने उम्मीद जताई कि अगले दो दशकों में भारत की बंदरगाह क्षमता फिर दोगुनी होगी. इससे 2047 तक क्षमता को चार गुना करने का लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलेगी.

गोयल के मुताबिक, भारत को वैश्विक व्यापार में अपनी भूमिका मजबूत करने के लिए आधुनिक बंदरगाह सुविधाओं और बेहतर समुद्री संपर्क व्यवस्था में निवेश करना होगा. इसके साथ ही बंदरगाहों की परिचालन दक्षता बढ़ाना भी जरूरी है.

रॉटरडैम के साथ सहयोग की संभावनाएं

भारत और यूरोप के बीच समुद्री सहयोग को महत्वपूर्ण बताते हुए गोयल ने कहा कि भारत बंदरगाहों के विकास और संचालन में रॉटरडैम की विशेषज्ञता से लाभ उठा सकता है. भारत अपने मौजूदा बंदरगाहों का आधुनिकीकरण करने के साथ अत्याधुनिक सुविधाएं विकसित कर रहा है. ऐसे में रॉटरडैम के अनुभवों से सीखने और दोनों पक्षों के बीच सहयोग बढ़ाने के अवसर मौजूद हैं.

रॉटरडैम बंदरगाह यूरोप के प्रमुख समुद्री व्यापार केंद्रों में शामिल है और वैश्विक शिपिंग नेटवर्क को यूरोपीय बाजारों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. भारत के बढ़ते समुद्री क्षेत्र के लिए इसके साथ सहयोग व्यापार और लॉजिस्टिक्स की क्षमता मजबूत करने में मददगार हो सकता है.

ग्रीन एनर्जी और कार्बन कैप्चर पर फोकस

गोयल ने टिकाऊ समुद्री विकास की जरूरत पर भी जोर दिया. उन्होंने कहा कि कार्बन कैप्चर और ग्रीन एनर्जी जैसे क्षेत्रों में काम करने से पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के साथ हरित ऊर्जा व्यापार के नए अवसर भी खुल सकते हैं.

भारत अपनी आर्थिक वृद्धि के साथ गुणवत्ता, उत्पादकता और परिचालन दक्षता के मानकों को बेहतर बनाने पर जोर दे रहा है. ऐसे में टिकाऊ तकनीकों को अपनाना समुद्री बुनियादी ढांचे के विकास का अहम हिस्सा है.

'ये दिल मांगे मोर' को बताया लक्ष्य

भारत की समुद्री महत्वाकांक्षाओं का जिक्र करते हुए गोयल ने कहा कि देश को अपनी उपलब्धियों से संतुष्ट होकर नहीं रुकना चाहिए, बल्कि लगातार आगे बढ़ने की कोशिश करनी चाहिए. उन्होंने 'ये दिल मांगे मोर' को इसी सोच का प्रतीक बताया.

मंत्री ने सागरमाला पहल का भी उल्लेख किया, जिसका उद्देश्य बंदरगाहों के बुनियादी ढांचे और समुद्री कनेक्टिविटी में सुधार करना है. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत अपने समुद्री इकोसिस्टम का विस्तार और आधुनिकीकरण कर रहा है.

समुद्री क्षेत्र के लिए कुशल कार्यबल तैयार करने की योजना

गोयल ने मुंबई में मैरीटाइम इंस्टीट्यूट ऑफ एक्सीलेंस स्थापित करने की योजना का भी जिक्र किया. इसका उद्देश्य वैश्विक शिपिंग उद्योग की जरूरतों के अनुरूप कुशल नाविकों और समुद्री क्षेत्र के पेशेवरों को तैयार करना है.

भारत की योजना बंदरगाह क्षमता बढ़ाने के साथ समुद्री क्षेत्र में प्रशिक्षित कार्यबल विकसित करने की भी है. बंदरगाहों के आधुनिकीकरण, बेहतर लॉजिस्टिक्स, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और हरित तकनीकों पर जोर देकर भारत वैश्विक समुद्री व्यापार में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहता है.
 


भारतीय बाजार में बिकवाली: वॉशिंगटन से नजर हटाएं, 27 अक्टूबर पर दें ध्यान

इजरायल में मतदान, एफएंडओ की एक्सपायरी और जियो का पैसा वापस. भू-राजनीतिक परिस्थितियों के कारण कच्चे तेल में किया गया कारोबार जरूरत से ज्यादा भीड़भाड़ वाला हो गया है और यह तेजी से पलटने वाला है.

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Monday, 26 October, 2026
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पलक शाह

इस सप्ताह क्यों बदल सकता है बाजार का रुख

हर कोई 3 नवंबर पर नजर रख रहा है. समझदार निवेशक 27 अक्टूबर पर नजर रख रहे हैं.

अमेरिका में मध्यावधि चुनाव से पहले इजरायल में मतदान होगा और इस सप्ताह आपके निवेश पोर्टफोलियो के लिए यह मतदान वॉशिंगटन से आने वाली किसी भी खबर से ज्यादा मायने रखता है. इसी मंगलवार को अक्टूबर सीरीज के एफएंडओ कॉन्ट्रैक्ट्स की एक्सपायरी होगी और जियो आईपीओ का पैसा निवेशकों के खातों में वापस आएगा. बुधवार को जियो की लिस्टिंग होगी और इजरायल के चुनाव नतीजे भी स्पष्ट हो जाएंगे.

बाजार की तीन सबसे बड़ी चिंताएं 48 घंटे के भीतर निर्णायक मोड़ पर पहुंचने वाली हैं. यहां बताया गया है कि हमें क्यों लगता है कि इन तीनों का अंत एक ही दिशा में होगा.

बीबी की अग्निपरीक्षा: तीन रास्ते, एक मंजिल

अंतिम चुनावी सर्वेक्षणों से त्रिशंकु संसद के संकेत मिल रहे हैं. गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाला नेतन्याहू-विरोधी गठबंधन ज्यादातर मुख्यधारा के सर्वेक्षणों में आगे है, लेकिन कोई भी पक्ष सरकार बनाने के लिए जरूरी 61 सीटों के करीब नहीं है. हर संभावित नतीजे को लेकर हमारा आकलन इस प्रकार है.

त्रिशंकु संसद या बीबी की मामूली हार: यह सबसे जोखिम भरा रास्ता है और हम इस बात को छिपाना नहीं चाहते. कार्यवाहक प्रधानमंत्री नेतन्याहू के पास अब भी सेना का नियंत्रण रहेगा और ऐसी चर्चा है कि बहुमत वाली साझा सरकार बनाने के लिए 'ईरान कार्ड' खेला जा सकता है. लेकिन तेहरान लड़ाई नहीं चाहता. ईरान के राष्ट्रपति खुले तौर पर कह चुके हैं कि ईरान अमेरिका के मध्यावधि चुनाव से पहले समझौता करना चाहता है. सबसे संभावित नतीजा बातचीत है. सबसे खराब स्थिति में भी अगर थोड़े समय के लिए तेज हमला होता है, तो संभवतः उसके तुरंत बाद समझौता हो जाएगा. इससे कच्चे तेल की कीमतों में आने वाला उछाल भागने के बजाय बिकवाली के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए.

बीबी की हार: वॉशिंगटन अपने सबसे आक्रामक सहयोगी को खो देगा, जबकि ट्रंप मध्यावधि चुनाव से पहले विदेश नीति के मोर्चे पर कोई बड़ी सफलता हासिल करना चाहते हैं. सैन्य कार्रवाई की संभावना कमजोर होगी और समझौते की कोशिश तेज हो जाएगी. उम्मीद है कि होर्मुज के बदले नाकेबंदी खत्म करने से जुड़ी बातचीत तेजी से आगे बढ़ेगी.

बीबी की जीत: इसके बाद तेहरान के सामने फिर से निर्वाचित नेतन्याहू और मध्यावधि चुनाव की ओर बढ़ रहे अमेरिकी राष्ट्रपति होंगे. दोनों के पास सख्त रुख अपनाने की वजह होगी. ईरान के सामने विकल्प स्पष्ट है: अभी समझौते पर हस्ताक्षर करे या टॉमहॉक मिसाइलों का सामना करे. तेहरान से मिलने वाले सभी संकेत बताते हैं कि वह बातचीत का रास्ता चुनेगा.

निष्कर्ष: तीनों संभावित नतीजे होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के समझौते और रुख में नरमी की ओर ले जाते हैं. कच्चे तेल की कीमतों में भू-राजनीतिक जोखिम के कारण जुड़ा प्रीमियम बाजार के सबसे ज्यादा भीड़भाड़ वाले कारोबारों में से एक है और अब जोखिम का झुकाव तेल की कीमतें नीचे जाने की ओर है. भारत के लिए प्रति बैरल तेल की कीमत में हर एक डॉलर की गिरावट का मतलब है कि रुपये को बचाने के लिए उतनी ही कम मेहनत करनी पड़ेगी.

रुपया: दिल्ली कमजोर रुपये का बोझ नहीं उठा सकती

आरबीआई की फॉरवर्ड मार्केट में डॉलर की नेट शॉर्ट पोजिशन 200 अरब डॉलर के पार पहुंच गई है. इस स्तर पर रुपये में कमजोरी केंद्रीय बैंक की बैलेंस शीट को सीधे नुकसान पहुंचाती है, यह कोई मामूली परेशानी नहीं है.

इससे दिल्ली में हाल की गतिविधियों को समझा जा सकता है. वित्त मंत्री ने वित्तीय क्षेत्र के प्रतिनिधियों के साथ कई बैठकें की हैं और प्रधानमंत्री भी इसमें शामिल रहे हैं. जब सरकार बाजारों के साथ इतनी नजदीकी से जुड़ती है, तो आमतौर पर इसका मतलब होता है कि वह कदम उठाने का इरादा रखती है. हमें उम्मीद है कि बाजार में भरोसा कायम रखने के लिए कुछ कदम उठाए जाएंगे और रुपये को स्थिर रखना मुख्य प्राथमिकता होगी. तेल की कीमतें घटने से यह काम काफी आसान हो जाएगा. मजबूत रुपया विदेशी निवेश को वापस आकर्षित करता है, जिससे रुपये को और समर्थन मिलता है. यह भी याद रखें कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पहले ही संकेत दे चुकी हैं कि सरकार दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ कर (एलटीसीजी) और प्रतिभूति लेनदेन कर (एसटीटी) को तर्कसंगत बनाने से जुड़े सुझावों पर विचार करने के लिए तैयार है.

वित्त मंत्री के इस बयान के बाद वित्तीय बाजार के विशेषज्ञों और विदेशी निवेशकों के साथ बैठकों की झड़ी लग गई. क्या मोदी सरकार बाजार में और बड़ी बिकवाली का जोखिम उठा सकती है?

जियो: पैसा वापस आएगा

भारत के अब तक के सबसे बड़े आईपीओ को करीब 30,000 करोड़ रुपये के इश्यू के मुकाबले 4 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बोलियां मिलीं. शेयरों का आवंटन सोमवार को होगा, रिफंड और अनब्लॉक हुई रकम मंगलवार को निवेशकों के खातों में आएगी और बुधवार को शेयर बाजार में लिस्ट होंगे.

इसका मतलब है कि ज्यादातर पैसा निवेशकों के पास वापस आ जाएगा. इसका कुछ हिस्सा आईपीओ फाइनेंसिंग के कर्ज चुकाने में इस्तेमाल होगा. कुछ पैसा संस्थागत निवेशकों के पास नकदी के रूप में रहेगा. लेकिन बोली लगाने वाले निवेशक अपनी पूंजी निवेश करना चाहते थे. इस रकम का एक छोटा हिस्सा भी अगर द्वितीयक बाजार में आता है, तो इससे पहले से दबाव झेल रहे बाजार को अच्छी मांग मिल सकती है.

एक वास्तविक समस्या: एमटीएफ पोजिशन का समापन

निकट अवधि में एकमात्र गंभीर दबाव मार्जिन ट्रेडिंग (एमटीएफ) बुक से जुड़ा है, जो करीब 140 लाख करोड़ रुपये का था. मार्जिन कॉल के कारण निवेशकों को लगातार शेयर बेचने पड़े हैं या ब्रोकरों को उनकी पोजिशन खत्म करनी पड़ी हैं. इस तरह की बिकवाली आमतौर पर एक्सपायरी के आसपास चरम पर पहुंचती है. मजबूरी में होने वाली इस बिकवाली का कंपनियों के बुनियादी प्रदर्शन से कोई संबंध नहीं है और यह अंततः खत्म हो जाती है. मंगलवार को अक्टूबर सीरीज की एक्सपायरी के बाद इस दबाव का बड़ा हिस्सा खत्म हो जाना चाहिए.

मजबूरी में बिकवाली करने वाले निवेशकों के दबाव को हटाएं, तेल की कम कीमतों, रुपये को मिलने वाले सहारे और नई नकदी को जोड़ें, तो नवंबर के लिए बाजार की तस्वीर अक्टूबर के माहौल से काफी अलग दिखाई देती है.

रणनीति

मंगलवार और बुधवार तक बाजार में उतार-चढ़ाव की उम्मीद रखें. चुनाव नतीजे, एक्सपायरी और जियो की लिस्टिंग, ये सभी घटनाएं दो कारोबारी सत्रों के भीतर होंगी. घबराहट में आई गिरावट पर खरीदारी करें, तेजी के पीछे भागने से बचें.

तेल की कम कीमतों से इन क्षेत्रों को फायदा होगा: तेल विपणन कंपनियां, विमानन, पेंट, टायर और विशेष रसायन.

स्थिर रुपये से इन क्षेत्रों को फायदा होगा: निजी बैंक, एनबीएफसी और विदेशी निवेशकों की बड़ी हिस्सेदारी वाली कंपनियों के शेयर.

तेल की कम कीमतों से अपस्ट्रीम उत्पादकों को नुकसान होगा. अगर कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट जारी रहती है, तो इन शेयरों में निवेश घटाएं.

किन स्थितियों में बदल सकता है हमारा आकलन

- चुनाव की रात ईरान पर ऐसा हमला होना, जिससे जल्द समझौते के बजाय लंबा संघर्ष शुरू हो जाए.
- इजरायल में गठबंधन को लेकर लंबे समय तक गतिरोध बने रहना, जिससे नवंबर तक तनाव बना रहे.
- मध्यावधि चुनाव से पहले अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत विफल हो जाना.
- जियो की कमजोर लिस्टिंग होना और बाजार में नकदी वापस आने के बजाय उसमें कमी आना.
- एक्सपायरी के बाद भी मार्जिन कॉल के कारण बिकवाली जारी रहना.

निष्कर्ष: बाजार पहले ही सबसे खराब स्थिति को कीमतों में शामिल कर चुका है.

इस सप्ताह अनिश्चितता दूर होगी और हमारा आकलन है कि इसका नतीजा कच्चे तेल की कम कीमतों, रुपये में मजबूती और भारतीय शेयरों में तेजी के रूप में सामने आएगा.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स 

पलक शाह अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और द मार्केट माफिया: क्रॉनिकल ऑफ इंडियाज हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कैबल दैट वेंट स्कॉट-फ्री के लेखक हैं. यह पुस्तक भारत के वित्तीय बाजारों के अंधेरे पहलुओं को उजागर करते हैं. मुंबई में करीब दो दशक तक जमीनी स्तर पर रिपोर्टिंग करने वाले पलक ने धन, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की पड़ताल की है. उनके लेख भारत के प्रमुख वित्तीय समाचार पत्रों, जिनमें द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं. 19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुए पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक में मुंबई की गैंगवार की जगह संगठित अपराध के अधिक परिष्कृत रूप ने ले ली है. इसमें कॉरपोरेट इमारतों के भीतर चलने वाली सफेदपोश वित्तीय धोखाधड़ी शामिल है. इसी अनुभव ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया, जहां उन्होंने भारत की 'सफेद धन' अर्थव्यवस्था की जटिल कार्यप्रणाली को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम वित्तीय दुनिया की चमकदार सतह के पीछे काम करने वाले समूहों को उजागर करता है. सच सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे लोग नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें भारतीय पत्रकारिता में एक ऐसी प्रभावशाली आवाज बनाती है जो यथास्थिति को चुनौती देने और खुद को कानून से ऊपर समझने वालों को बेनकाब करने से नहीं हिचकती.


सेंसेक्स-निफ्टी पर दबाव के संकेत, महंगा क्रूड बढ़ाएगा चिंता; आज इन शेयरों में हलचल

शुक्रवार, 23 अक्टूबर को बीएसई सेंसेक्स 125.56 अंक यानी 0.17 फीसदी गिरकर 73,123.83 पर बंद हुआ.

Last Modified:
Monday, 26 October, 2026
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भारतीय शेयर बाजार में सोमवार, 26 अक्टूबर को कमजोर शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं. गिफ्ट निफ्टी 22,600 के नीचे कारोबार कर रहा है, जबकि ब्रेंट क्रूड की कीमत 115 डॉलर प्रति बैरल के पार बनी हुई है. एशियाई बाजारों में कमजोरी और शुक्रवार को अमेरिकी शेयर बाजारों में हुई बिकवाली से घरेलू बाजार पर दबाव पड़ सकता है. पिछले सप्ताह सेंसेक्स और निफ्टी में दो फीसदी से अधिक की गिरावट दर्ज की गई थी. ऐसे में इस सप्ताह निवेशकों की नजर कंपनियों के सितंबर तिमाही के नतीजों, कच्चे तेल की कीमतों, वैश्विक संकेतों और कॉरपोरेट अपडेट पर रहेगी.

पिछले हफ्ते सेंसेक्स 2% और निफ्टी 2.35% टूटा

भारतीय शेयर बाजार में पिछले सप्ताह लगातार चार कारोबारी सत्रों तक बिकवाली का दबाव बना रहा. इससे पहले लगातार दो सप्ताह से जारी तेजी भी थम गई. शुक्रवार, 23 अक्टूबर को बीएसई सेंसेक्स 125.56 अंक यानी 0.17 फीसदी गिरकर 73,123.83 पर बंद हुआ. कारोबार के दौरान निचले स्तर से सेंसेक्स ने करीब 670 अंकों की रिकवरी की, लेकिन अंत में गिरावट के साथ बंद हुआ. वहीं, एनएसई निफ्टी 50 में 87.65 अंक यानी 0.39 फीसदी की गिरावट आई और यह 22,600 पर बंद हुआ. निफ्टी भी दिन के निचले स्तर से करीब 228 अंक संभला था. पूरे सप्ताह सेंसेक्स में करीब 2 फीसदी और निफ्टी में 2.35 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.

गिफ्ट निफ्टी और वैश्विक बाजारों से कमजोर संकेत

सोमवार सुबह गिफ्ट निफ्टी में कमजोरी से घरेलू बाजार की गिरावट के साथ शुरुआत होने की आशंका है. एशियाई बाजारों में जापान का निक्केई करीब 0.30 फीसदी गिरकर 62,500 के नीचे कारोबार कर रहा था. दक्षिण कोरिया का कोस्पी, हांगकांग का हैंगसेंग और शंघाई कंपोजिट भी लाल निशान में थे. इससे पहले शुक्रवार को अमेरिकी बाजारों में भी बिकवाली हुई थी और नैस्डैक तथा डाउ जोन्स समेत प्रमुख इंडेक्स गिरावट के साथ बंद हुए थे.

HST वेल्थ के संस्थापक और सीईओ हरीसेल्वन राधाकृष्णन के मुताबिक, अमेरिकी बाजारों में व्यापक गिरावट, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के कारण भारतीय बाजार की शुरुआत सतर्कता के साथ हो सकती है. केंद्रीय बैंकों के फैसलों और कंपनियों के तिमाही नतीजों से भरे सप्ताह में निवेशक बड़े दांव लगाने से बच सकते हैं.

कच्चे तेल की कीमतें बढ़ा सकती हैं बाजार की चिंता

ब्रेंट क्रूड 115 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बना हुआ है. हालांकि, हालिया ऊंचे स्तरों से कीमतों में कुछ नरमी आई है, लेकिन पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव और तेल आपूर्ति को लेकर चिंताओं के कारण कीमतें ऊंचे स्तर पर हैं. कच्चे तेल की महंगाई से भारत के आयात बिल, महंगाई दर और चालू खाते के घाटे पर दबाव बढ़ सकता है. इसके अलावा परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ने से कई कंपनियों के मार्जिन पर भी असर पड़ सकता है.

निफ्टी के लिए 22,400 का स्तर अहम

तकनीकी विश्लेषकों के मुताबिक, निफ्टी 50 के लिए 22,750 से 22,800 का दायरा तत्काल रेजिस्टेंस है. इस स्तर के ऊपर टिकाऊ बढ़त मिलने पर इंडेक्स 23,000 की ओर बढ़ सकता है. वहीं, 22,400 से 22,300 का दायरा अहम सपोर्ट जोन है. यदि निफ्टी इस स्तर के नीचे फिसलता है, तो बिकवाली बढ़ने पर यह 22,200 से 22,000 तक जा सकता है.

इन शेयरों पर रहेगी नजर

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, सोमवार को इन्फोसिस, कोटक महिंद्रा बैंक, कोफोर्ज, इंडसइंड बैंक, बैंक ऑफ इंडिया, टाटा मोटर्स, डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज, BPCL, IDFC फर्स्ट बैंक और AU स्मॉल फाइनेंस बैंक के शेयरों में हलचल रह सकती है. इन कंपनियों ने सितंबर तिमाही के नतीजे जारी किए हैं. इन्फोसिस का शुद्ध मुनाफा सालाना आधार पर 6.2 फीसदी बढ़कर 7,823 करोड़ रुपये रहा, जबकि कोटक महिंद्रा बैंक का मुनाफा 29.5 फीसदी बढ़कर 4,212 करोड़ रुपये पहुंच गया. कोफोर्ज का मुनाफा 56.5 फीसदी बढ़कर 588.1 करोड़ रुपये हो गया. इंडसइंड बैंक पिछले साल के घाटे से उबरकर 1,176.1 करोड़ रुपये के मुनाफे में लौट आया, जबकि बैंक ऑफ इंडिया का मुनाफा 25.4 फीसदी बढ़कर 3,202.4 करोड़ रुपये रहा. दूसरी ओर, डॉ. रेड्डीज का मुनाफा 36 फीसदी गिरकर 913.4 करोड़ रुपये और BPCL का मुनाफा 22.5 फीसदी घटकर 4,993 करोड़ रुपये रह गया. टाटा मोटर्स के कमर्शियल वाहन कारोबार ने पिछले साल के घाटे के मुकाबले इस बार 1,257 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किया.

KEC इंटरनेशनल और JSW स्टील भी चर्चा में

KEC इंटरनेशनल को पावर ग्रिड से 765 केवी बिजली पारेषण लाइनों से जुड़े कारोबार में 2,872 करोड़ रुपये के नए ऑर्डर मिले हैं. BL कश्यप एंड संस को भी सिग्नेचर ग्लोबल से 495.86 करोड़ रुपये का ऑर्डर मिला है. वहीं, JSW स्टील और जापान की JFE स्टील ओडिशा में अपने संयुक्त उपक्रम की उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए 7,500 करोड़ रुपये का निवेश करेंगी. इस विस्तार से सालाना इस्पात उत्पादन क्षमता में 50 लाख टन की बढ़ोतरी करने की योजना है. सेनको गोल्ड ने मेलोरा ब्रांड चलाने वाली ऑगस्ट ज्वेलरी में 68 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने की योजना बनाई है. ल्यूपिन के गोवा संयंत्र के निरीक्षण के बाद अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (USFDA) ने एक आपत्ति दर्ज की है, जिस पर निवेशकों की नजर रहेगी.

इन कंपनियों के नतीजों पर भी नजर

सोमवार को टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स, पेटीएम, मैनकाइंड फार्मा, REC, नजारा टेक्नोलॉजीज, ITC होटल्स, टोरेंट फार्मा, DCB बैंक, भारत कोकिंग कोल और SBI फंड्स समेत कई कंपनियों के नतीजे और कारोबारी अपडेट भी चर्चा में रह सकते हैं. नेटवेब टेक्नोलॉजीज, अपोलो माइक्रो सिस्टम्स और AU स्मॉल फाइनेंस बैंक के मजबूत नतीजों के साथ निवेशक कंपनियों की आय, मार्जिन और आगे के कारोबार के अनुमान पर भी ध्यान देंगे.

इसके अलावा इंडिगो की कुछ अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को नवी मुंबई हवाई अड्डे पर स्थानांतरित करने की योजना और सहजानंद मेडिकल टेक्नोलॉजीज तथा टोंबो इमेजिंग इंडिया में बड़े शेयर सौदे भी निवेशकों के लिए अहम रहेंगे.

विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले सप्ताह की गिरावट के बाद बाजार में रिकवरी की संभावना बनी हुई है, लेकिन महंगे कच्चे तेल, वैश्विक बाजारों की कमजोरी और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बीच कारोबार में उतार-चढ़ाव रह सकता है. ऐसे में निवेशकों की नजर तिमाही नतीजों, नए ऑर्डर और निफ्टी के अहम सपोर्ट स्तरों पर रहेगी.
 


फेस्टिव सीजन में मेकअप के नए ट्रेंड, लोटस का स्किनकेयर के साथ खूबसूरती निखारने पर जोर

त्योहारों में पारंपरिक परिधानों के साथ मेकअप भी व्यक्तिगत स्टाइल का अहम हिस्सा बन जाता है. इस बार फेस्टिव ब्यूटी ट्रेंड में ऐसे मेकअप उत्पादों पर जोर है, जो रंगों और आकर्षक लुक के साथ त्वचा की देखभाल को भी ध्यान में रखते हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 24 October, 2026
Last Modified:
Saturday, 24 October, 2026
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फेस्टिव सीजन में बाजारों में खरीदारी के साथ ब्यूटी और मेकअप से जुड़े ट्रेंड भी चर्चा में हैं. दिवाली और अन्य त्योहारों के दौरान लोग अपने परिधानों, रंगों और व्यक्तिगत स्टाइल के अनुरूप मेकअप चुनते हैं. ऐसे में मेकअप उत्पादों में केवल रंग और कवरेज ही नहीं, बल्कि त्वचा की देखभाल से जुड़े गुणों पर भी ध्यान दिया जा रहा है.

इस फेस्टिव सीजन में मेकअप के साथ स्किनकेयर को जोड़ने का चलन भी देखने को मिल रहा है. लोटस मेकअप ने अभिनेत्री शहनाज गिल के साथ अपने फेस्टिव अभियान के जरिए इसी पहलू को सामने रखा है. दिल्ली के लाजपत नगर में त्योहारों की खरीदारी के दौरान शहनाज गिल की ब्रांड से मुलाकात को इस अभियान का हिस्सा बनाया गया है.

फेस्टिव मेकअप में रंगों और स्किनकेयर का मेल

त्योहारों के दौरान बोल्ड लिप कलर, उभरी हुई आंखों का मेकअप और लंबे समय तक टिकने वाले उत्पादों की मांग रहती है. हालांकि, अब मेकअप चुनते समय उत्पादों के फॉर्मूलेशन और त्वचा पर उनके प्रभाव को लेकर भी जागरूकता बढ़ रही है.

इसी संदर्भ में 'स्किनिफिकेशन ऑफ मेकअप' यानी मेकअप उत्पादों में स्किनकेयर से जुड़े तत्वों को शामिल करने की अवधारणा सामने आई है. इसका उद्देश्य मेकअप के रंग, कवरेज और टिकाऊपन के साथ त्वचा की देखभाल से जुड़े गुणों को जोड़ना है. लोटस मेकअप भी अपने उत्पादों के जरिए इस अवधारणा पर काम कर रहा है. कंपनी का कहना है कि उसके मेकअप उत्पाद 100% वीगन हैं.

त्योहारों में व्यक्तिगत स्टाइल पर जोर

फेस्टिव सीजन में मेकअप का चुनाव पारंपरिक और आधुनिक स्टाइल के मेल से भी प्रभावित होता है. कोई हल्का और प्राकृतिक लुक पसंद करता है, तो कोई गहरे रंगों और आकर्षक आई मेकअप के जरिए अपने लुक को अलग बनाना चाहता है. ऐसे में मेकअप के विकल्प भी अलग-अलग पसंद और जरूरतों के अनुरूप विकसित किए जा रहे हैं.

लोटस मेकअप की मार्केटिंग जनरल मैनेजर पूजा सिंह के मुताबिक, मेकअप में बेहतर प्रदर्शन, आराम और स्किनकेयर के गुणों को साथ लेकर चलना कंपनी की सोच का हिस्सा है. उन्होंने कहा कि त्योहारों का मौसम व्यक्तिगत स्टाइल, परंपरा और अपनी पहचान को जाहिर करने का अवसर देता है.

ब्यूटी बाजार में बदलती पसंद

पूजा सिंह के अनुसार, स्किनकेयर और मेकअप के बीच बढ़ता तालमेल ब्यूटी बाजार में बदलती उपभोक्ता पसंद को भी दर्शाता है. त्योहारों के दौरान ग्राहक ऐसे उत्पादों में दिलचस्पी लेते हैं, जो उनके लुक के अनुरूप हों और इस्तेमाल के लिहाज से भी उनकी जरूरतों को पूरा करें.

लोटस मेकअप की यह पहल फेस्टिव सीजन में मेकअप और स्किनकेयर के मेल को रेखांकित करती है. हालांकि, अलग-अलग उत्पादों के लाभ उनके फॉर्मूलेशन और त्वचा की जरूरतों पर निर्भर करते हैं. इसलिए मेकअप चुनते समय अपनी त्वचा के अनुकूल उत्पादों पर ध्यान देना जरूरी है.
 


तमिलनाडु में विमान ईंधन पर टैक्स में बड़ी कटौती, चेन्नई एयरपोर्ट पर वैट 29% से घटकर 16% हुआ

नई दरें 1 नवंबर 2026 से लागू होंगी और 31 अक्टूबर 2027 तक प्रभावी रहेंगी. इस फैसले से एयरलाइंस की परिचालन लागत घटाने और क्षेत्रीय हवाई कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 24 October, 2026
Last Modified:
Saturday, 24 October, 2026
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तमिलनाडु सरकार ने विमानन कंपनियों को ईंधन खर्च में राहत देने के लिए एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) पर वैल्यू एडेड टैक्स (VAT) की दरों में बड़ी कटौती की है. नई व्यवस्था के तहत चेन्नई एयरपोर्ट पर निर्धारित उड़ानें संचालित करने वाली एयरलाइंस के लिए एटीएफ पर वैट 29% से घटाकर 16% कर दिया गया है. वहीं, राज्य के अन्य एयरपोर्ट पर यह दर 29% से घटाकर सिर्फ 1% कर दी गई है.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य के वाणिज्यिक कर एवं पंजीकरण विभाग ने 23 अक्टूबर को तमिलनाडु वैल्यू एडेड टैक्स अधिनियम, 2006 के तहत इस बदलाव की अधिसूचना जारी की. नई दरें 1 नवंबर 2026 से 31 अक्टूबर 2027 तक लागू रहेंगी. विमानन उद्योग लंबे समय से ईंधन पर अधिक टैक्स का बोझ कम करने की मांग कर रहा था. एयरलाइंस का कहना है कि ईंधन की बढ़ती कीमतों और अन्य परिचालन खर्चों के कारण उनके कारोबार पर दबाव बढ़ रहा है.

छोटे विमानों को भी मिलेगी राहत

तमिलनाडु सरकार के फैसले से छोटे विमानों को भी राहत मिलेगी. चेन्नई के अलावा राज्य के अन्य एयरपोर्ट पर अधिकतम टेक-ऑफ वजन 40,000 किलोग्राम से कम वाले निर्धारित विमानों को दिए जाने वाले एटीएफ पर वैट 5% से घटाकर 1% कर दिया जाएगा.

नई कर व्यवस्था में एयरपोर्ट के आधार पर अलग-अलग दरें निर्धारित की गई हैं. चेन्नई में एटीएफ पर 16% वैट लागू होगा, जबकि राज्य के अन्य एयरपोर्ट पर ईंधन भरवाने वाली निर्धारित उड़ानों के लिए यह दर 1% रहेगी.

इस बदलाव से मदुरै, तिरुचिरापल्ली और कोयंबटूर जैसे एयरपोर्ट की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति बेहतर हो सकती है. पहले लागू 29% की वैट दर एयरलाइंस के लिए लंबे समय से चिंता का विषय थी. कंपनियों का तर्क रहा है कि ईंधन पर अधिक टैक्स के कारण परिचालन खर्च बढ़ता है और विमानों में ईंधन भरवाने के स्थान का चयन भी प्रभावित होता है.

एयरलाइंस को ईंधन खरीद से जुड़े दस्तावेज देने होंगे

नई व्यवस्था के तहत निर्धारित उड़ानों के लिए एटीएफ की आपूर्ति करने वाली तेल कंपनियों को अपनी मासिक टैक्स रिटर्न के साथ संबंधित दस्तावेज जमा करने होंगे. इनमें ईंधन खरीदने वाली एयरलाइन के हस्ताक्षर वाला घोषणा पत्र भी शामिल होगा.

इस घोषणा पत्र में उस घरेलू उड़ान की जानकारी देनी होगी, जिसके लिए ईंधन खरीदा गया है. इन दस्तावेजों को संबंधित क्षेत्राधिकार वाले कर निर्धारण अधिकारी के पास जमा करना होगा.

बढ़ती लागत के बीच एयरलाइंस को राहत

एटीएफ पर टैक्स में कटौती ऐसे समय में की गई है, जब एयरलाइंस ईंधन की बढ़ती लागत और परिचालन संबंधी अन्य चुनौतियों का सामना कर रही हैं. हवाई क्षेत्र पर प्रतिबंध और उड़ानों के लंबे रूट के कारण भी विमानन कंपनियों का खर्च बढ़ रहा है.

सितंबर में फेडरेशन ऑफ इंडियन एयरलाइंस ने तमिलनाडु समेत कई राज्यों में एटीएफ पर टैक्स कम करने की मांग की थी. संगठन ने कहा था कि लागत में लगातार बढ़ोतरी के कारण एयरलाइंस पर वित्तीय दबाव बढ़ रहा है. समय पर राहत नहीं मिलने पर कंपनियां उन रूटों पर उड़ानें बंद करने के लिए मजबूर हो सकती हैं, जिनका संचालन आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं रह गया है.

पश्चिम एशिया संकट के मद्देनजर केंद्र सरकार ने भी निर्धारित उड़ानें संचालित करने वाली भारतीय एयरलाइंस के लिए कीमतों में स्थिरता लाने से जुड़ी सहायता व्यवस्था शुरू की है. हालांकि, तमिलनाडु में टैक्स कटौती का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि एयरलाइंस ईंधन खरीद और परिचालन संबंधी अपनी रणनीति में किस तरह बदलाव करती हैं.

दक्षिण भारत के अन्य राज्यों के करीब आई तमिलनाडु की टैक्स दरें

तमिलनाडु की नई टैक्स दरें दक्षिण भारत के पड़ोसी राज्यों की नीतियों के करीब हैं. उद्योग से जुड़े सूत्रों के हवाले से प्रकाशित रिपोर्टों के मुताबिक, केरल में एटीएफ पर 1% वैट लगाया जाता है. आंध्र प्रदेश और तेलंगाना ने भी इसकी दर घटाकर 1% कर दी है.

तमिलनाडु के इस फैसले से राज्य के क्षेत्रीय एयरपोर्ट से उड़ानें संचालित करना एयरलाइंस के लिए अधिक किफायती हो सकता है. ईंधन पर टैक्स कम होने से कंपनियों को नई सीधी उड़ानें शुरू करने, उड़ानों की संख्या बढ़ाने और यात्रियों की मांग के अनुरूप सेवाओं का विस्तार करने की गुंजाइश मिल सकती है.

इससे चेन्नई के अलावा राज्य के अन्य एयरपोर्ट की भूमिका मजबूत होने और क्षेत्रीय हवाई संपर्क बढ़ने की संभावना है. हालांकि, इसका वास्तविक लाभ यात्री मांग, एयरलाइंस की कारोबारी रणनीति और ईंधन की कीमतों पर भी निर्भर करेगा.
 


टाटा मोटर्स के कमर्शियल व्हीकल कारोबार को ₹1,254 करोड़ का मुनाफा, रेवेन्यू 36.5% बढ़ा

कंपनी ने दूसरी तिमाही के दौरान अपने प्रोडक्ट पोर्टफोलियो को भी मजबूत किया. Prawaas 5.0 में अगली पीढ़ी के पैसेंजर मोबिलिटी सॉल्यूशन पेश किए गए.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 24 October, 2026
Last Modified:
Saturday, 24 October, 2026
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टाटा मोटर्स के कमर्शियल व्हीकल (CV) कारोबार ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में शानदार वापसी करते हुए घाटे से मुनाफे में जगह बनाई है. जुलाई से सितंबर 2026 के दौरान कंपनी का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट ₹1,254 करोड़ रहा, जबकि एक साल पहले इसी अवधि में ₹561 करोड़ का घाटा हुआ था. इस दौरान कंपनी का ऑपरेशंस से रेवेन्यू सालाना आधार पर 36.5% बढ़कर ₹25,232 करोड़ पहुंच गया. घरेलू बाजार में कमर्शियल वाहनों की बिक्री और निर्यात में मजबूत बढ़ोतरी से कंपनी के प्रदर्शन को सहारा मिला. हालांकि, मैनेजमेंट ने वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में ग्रोथ की रफ्तार कुछ धीमी रहने की आशंका जताई है.

घाटे से मुनाफे में लौटा टाटा मोटर्स का कारोबार

टाटा मोटर्स के कमर्शियल व्हीकल कारोबार के वित्तीय प्रदर्शन में सालाना आधार पर बड़ा सुधार देखने को मिला है. वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में कंपनी का कंसोलिडेटेड प्रॉफिट आफ्टर टैक्स (PAT) ₹1,254 करोड़ रहा. पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में कंपनी को ₹561 करोड़ का घाटा हुआ था.

कंपनी के मुताबिक, टाटा कैपिटल लिमिटेड में किए गए निवेश पर बाजार के उतार-चढ़ाव से होने वाले नुकसान में कमी ने भी मुनाफे को मजबूती दी. वहीं, 30 सितंबर 2026 तक कंपनी की नेट कैश पोजिशन ₹15,900 करोड़ रही, जो उसकी मजबूत नकदी स्थिति को दर्शाती है.

कंपनी के ऑपरेशंस से रेवेन्यू में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई. पिछले साल की दूसरी तिमाही में यह ₹18,491 करोड़ था, जो इस बार बढ़कर ₹25,232 करोड़ हो गया. इस तरह रेवेन्यू में सालाना आधार पर 36.5% की वृद्धि हुई.

घरेलू बिक्री में 30%, निर्यात में 177% की बढ़ोतरी

टाटा मोटर्स के कमर्शियल व्हीकल कारोबार को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों, दोनों से समर्थन मिला. वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में कंपनी की घरेलू बिक्री की मात्रा सालाना आधार पर 30% बढ़ी, जबकि निर्यात में 177% का उछाल दर्ज किया गया. वित्त वर्ष की पहली छमाही में कंपनी की घरेलू कमर्शियल व्हीकल बाजार हिस्सेदारी 36.2% रही. वित्त वर्ष 2025-26 की तुलना में इसमें 1.10 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी हुई.

भारी कमर्शियल व्हीकल सेगमेंट में 55.7% बाजार हिस्सेदारी

टाटा मोटर्स ने कमर्शियल व्हीकल की विभिन्न श्रेणियों में अपनी मजबूत स्थिति बनाए रखी. कंपनी की बाजार हिस्सेदारी में भारी कमर्शियल व्हीकल सेगमेंट सबसे आगे रहा. भारी कमर्शियल व्हीकल (HCV) श्रेणी में कंपनी की बाजार हिस्सेदारी 55.7% रही. इंटरमीडिएट, लाइट और मीडियम कमर्शियल व्हीकल सेगमेंट में यह 36.3% दर्ज की गई. छोटे कमर्शियल व्हीकल और पिकअप श्रेणी में कंपनी की हिस्सेदारी 27.6%, जबकि कमर्शियल पैसेंजर व्हीकल सेगमेंट में 41.1% रही.

नए प्रोडक्ट और तकनीक पर कंपनी का फोकस

कंपनी ने दूसरी तिमाही के दौरान अपने प्रोडक्ट पोर्टफोलियो को भी मजबूत किया. Prawaas 5.0 में अगली पीढ़ी के पैसेंजर मोबिलिटी सॉल्यूशन पेश किए गए. इसके अलावा, Ultra Prime और Starbus Prime रेंज लॉन्च की गई.

Bauma CONEXPO India 2026 में कंपनी ने अपने नए वाहन पार्ट्स और तकनीक से जुड़ी रेंज प्रदर्शित की. कंपनी को संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में Logistics & Transport Award 2026 के दौरान ‘बेस्ट ट्रक ऑफ द ईयर’ का पुरस्कार भी मिला.

30 अक्टूबर तक पूरा हो सकता है Iveco सौदा

टाटा मोटर्स ने बताया कि Iveco के साथ प्रस्तावित सौदे को अक्टूबर के अंत तक पूरा करने की दिशा में काम आगे बढ़ रहा है. कंपनी के अनुसार, सभी जरूरी नियामकीय मंजूरियां मिल चुकी हैं और शेयर खरीदने के लिए टेंडर ऑफर शुरू हो गया है.

यह ऑफर 26 अक्टूबर 2026 तक खुला रहेगा. Iveco की 16 अक्टूबर को हुई बैठक में शेयरधारकों ने सभी प्रस्तावों को मंजूरी दे दी थी. टेंडर ऑफर सफलतापूर्वक पूरा होने की शर्त पर सौदे का भुगतान और निपटान 30 अक्टूबर 2026 को निर्धारित किया गया है.

कंपनी की योजना अगले चरण में दोनों कारोबारों को एकीकृत करने की है. इस दौरान कामकाज को सुचारु बनाए रखने, कारोबारी अवसरों का लाभ उठाने और लंबी अवधि में कारोबार की वैल्यू बढ़ाने पर ध्यान दिया जाएगा.

मजबूत नतीजों के बावजूद टाटा मोटर्स के शेयर में गिरावट

तिमाही नतीजों में सुधार के बावजूद शुक्रवार को टाटा मोटर्स के शेयर में गिरावट दर्ज की गई. NSE पर कंपनी का शेयर 4.41% टूटकर ₹396 पर बंद हुआ, जबकि पिछले कारोबारी सत्र में इसका भाव ₹414.25 था.

साल 2026 की शुरुआत से अब तक शेयर में 7.89% की गिरावट आ चुकी है. NSE पर उपलब्ध भाव के आधार पर कंपनी का बाजार पूंजीकरण ₹1,45,838.46 करोड़ रहा. कंपनी के वित्तीय नतीजे जहां मुनाफे में वापसी और बिक्री में बढ़ोतरी का संकेत देते हैं, वहीं शेयर में गिरावट और दूसरी छमाही में ग्रोथ धीमी रहने की आशंका निवेशकों के लिए अहम पहलू बने रहेंगे.
 


RBI ने बैंकिंग सिस्टम में डाले ₹2.5 लाख करोड़, SBI रिसर्च ने मौद्रिक नीति के रुख पर उठाए सवाल

SBI रिसर्च के मुताबिक, आरबीआई की ओर से नकदी डालने और मौद्रिक सख्ती की रणनीति एक-दूसरे से मेल नहीं खाती. कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और वैश्विक अनिश्चितता के बीच सरकारी बॉन्ड पर यील्ड ऊंची बनी रह सकती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 24 October, 2026
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Saturday, 24 October, 2026
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भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति और नकदी प्रबंधन के बीच विरोधाभास नजर आ रहा है. भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय बैंक ने एक ओर मौद्रिक नीति के तहत धीरे-धीरे सख्ती बरतने का रुख अपनाया है, वहीं दूसरी ओर बैंकिंग सिस्टम में 2.5 लाख करोड़ रुपये की नकदी डाली है. इससे आरबीआई की नीतिगत रणनीति की निरंतरता पर सवाल खड़े हो रहे हैं.

23 अक्टूबर 2026 को जारी अपनी ताजा Ecowrap रिपोर्ट में एसबीआई रिसर्च ने कहा कि अक्टूबर की मौद्रिक नीति में आरबीआई के संचार में अगस्त के मुकाबले अधिक स्पष्टता और एकरूपता दिखी है. हालांकि, नकदी प्रबंधन के लिए उठाए गए कदमों ने केंद्रीय बैंक के मौद्रिक रुख को लेकर असमंजस पैदा किया है.

अक्टूबर की मौद्रिक नीति में दिखी एकरूपता

एसबीआई रिसर्च के अनुसार, अगस्त में मौद्रिक नीति से जुड़े दस्तावेज, आरबीआई गवर्नर का बयान और मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक के मिनट्स अलग-अलग संकेत देते नजर आए थे. इसके विपरीत, अक्टूबर की नीति में इन तीनों के संदेश अपेक्षाकृत एकसमान रहे.

अक्टूबर की मौद्रिक नीति के प्रस्ताव में महंगाई को लेकर अधिक सख्त रुख अपनाया गया. इसमें कहा गया कि महंगाई की स्थिति अब पहले जैसी अनुकूल नहीं है और नीतिगत रुख में बदलाव की जरूरत है. मौद्रिक नीति समिति के सभी छह सदस्यों ने नीतिगत दर में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी कर इसे 5.50 फीसदी करने का समर्थन किया.

हालांकि, एसबीआई रिसर्च के मुताबिक, समिति के छह में से चार सदस्य ही मौद्रिक नीति में संतुलित और चरणबद्ध सख्ती के रुख के पक्ष में थे, जबकि दो सदस्य तटस्थ रुख बनाए रखने के पक्षधर थे.

रिपोर्ट के अनुसार, आरबीआई गवर्नर के बयान में महंगाई संबंधी चिंताओं के साथ आर्थिक वृद्धि, वित्तीय स्थिरता और बाहरी आर्थिक सुरक्षा को भी महत्व दिया गया. वहीं, बैठक के मिनट्स में सदस्यों के बीच महंगाई की उम्मीदों, लागत बढ़ने का असर कीमतों पर पड़ने और भविष्य में ब्याज दरों की दिशा को लेकर अलग-अलग विचार सामने आए.

₹2.5 लाख करोड़ की नकदी डालने पर सवाल

एसबीआई रिसर्च ने आरबीआई के नकदी प्रबंधन को लेकर चिंता जताई है. रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय बैंक खुले बाजार परिचालन (OMO) और वैरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) नीलामी जैसे उपायों के जरिए नकदी की स्थिति को नियंत्रित कर रहा था. इसके बावजूद 19 अक्टूबर से आरबीआई ने तीन रेपो परिचालन के जरिए बैंकिंग सिस्टम में कुल 2.5 लाख करोड़ रुपये डाले.

रिपोर्ट में कहा गया कि यह कदम मौद्रिक सख्ती के घोषित रुख से पूरी तरह मेल नहीं खाता. एसबीआई रिसर्च ने सवाल उठाया कि क्या आरबीआई अब 'चरणबद्ध सख्ती' से हटकर अपेक्षाकृत नरम रुख की ओर बढ़ रहा है.

रिसर्च टीम ने माना कि वित्तीय स्थिरता से जुड़ी चिंताओं के कारण केंद्रीय बैंक को नकदी डालने की जरूरत महसूस हुई होगी. हालांकि, उसका तर्क है कि नकदी प्रबंधन के तहत एक साथ नकदी डालने और निकालने की रणनीति बाजार के लिए भ्रम की स्थिति पैदा कर सकती है.

एसबीआई रिसर्च ने नकदी समायोजन सुविधा (LAF) के कॉरिडोर को व्यापक बनाने की अपनी सिफारिश भी दोहराई. रिपोर्ट के मुताबिक, इससे अनिश्चितता के दौर में नकदी प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाने और वित्तीय प्रणाली में स्थिरता बनाए रखने में मदद मिल सकती है.

सरकारी बॉन्ड पर यील्ड ऊंची रहने की आशंका

एसबीआई रिसर्च का मानना है कि अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड में गिरावट आने के बावजूद भारतीय सरकारी प्रतिभूतियों (G-sec) की यील्ड में बड़ी कमी की संभावना सीमित है. रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय सरकारी बॉन्ड की यील्ड का ऊपरी स्तर करीब 7.6 फीसदी रह सकता है.

रिपोर्ट में भारतीय और अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की यील्ड के बीच करीब 250 आधार अंकों के अंतर का भी उल्लेख किया गया है. यह अंतर धीरे-धीरे सामान्य स्तर की ओर बढ़ रहा है.

हालांकि, एसबीआई रिसर्च ने आगाह किया कि अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में हालिया गिरावट अस्थायी साबित हो सकती है. अमेरिका में सरकारी बॉन्ड की नीलामी का कैलेंडर और लंबी अवधि के बॉन्ड में निवेशकों की दिलचस्पी इस दिशा को प्रभावित कर सकती है.

रिपोर्ट में अमेरिका के 20 साल की अवधि वाले ट्रेजरी बॉन्ड की हालिया नीलामी का भी जिक्र किया गया. इसमें कट-ऑफ यील्ड 5.47 फीसदी रही, जबकि बिड-टू-कवर अनुपात 2.73 दर्ज किया गया. यह बॉन्ड के लिए निवेशकों की अच्छी मांग का संकेत देता है.

इसके अलावा, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भी भारतीय सरकारी बॉन्ड की यील्ड में गिरावट की गुंजाइश सीमित कर सकती हैं. तेल की कीमतों में तेजी से महंगाई और देश के बाहरी संतुलन पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है, जिसका असर बाजार की धारणा पर पड़ सकता है.

रुपये में निचले स्तर से करीब 2 फीसदी की रिकवरी

एसबीआई रिसर्च ने रुपये की चाल का भी आकलन किया है. रिपोर्ट के मुताबिक, 20 मई को 96.8 रुपये प्रति डॉलर के निचले स्तर पर पहुंचने के बाद रुपये में करीब 2 फीसदी की मजबूती आई है. हालांकि, 31 मार्च 2026 के स्तर की तुलना में रुपया अब भी करीब 0.1 फीसदी कमजोर है.

रिपोर्ट में कहा गया कि वैश्विक बॉन्ड यील्ड, भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता बनी रह सकती है. ऐसे माहौल में आरबीआई के लिए महंगाई पर नियंत्रण और आर्थिक वृद्धि को समर्थन देने के बीच संतुलन बनाए रखना अहम होगा.

दूसरी तिमाही में 7.5 फीसदी GDP ग्रोथ का अनुमान

एसबीआई रिसर्च के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में भारत की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि दर 7.5 फीसदी रहने की संभावना है. हालांकि, वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और भू-राजनीतिक जोखिमों के कारण वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता बनी रह सकती है.

रिपोर्ट के अनुसार, आरबीआई की अक्टूबर की मौद्रिक नीति में महंगाई को लेकर चिंता स्पष्ट रूप से दिखाई दी. साथ ही, बाहरी स्थिरता पर जोर से यह संकेत मिलता है कि केंद्रीय बैंक बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव से पैदा होने वाले जोखिमों को भी ध्यान में रख रहा है.

एसबीआई रिसर्च का निष्कर्ष है कि मौद्रिक नीति के संचार में स्पष्टता और एकरूपता सकारात्मक है, लेकिन नकदी प्रबंधन के कदम केंद्रीय बैंक के सख्त मौद्रिक रुख को समझने में बाजार के सामने चुनौती पैदा कर सकते हैं. रिपोर्ट एसबीआई की आर्थिक शोध टीम का आकलन है और इसे भारतीय स्टेट बैंक का आधिकारिक नीतिगत बयान नहीं माना जाना चाहिए.


खाद्य प्रसंस्करण बाजार 2030 तक 600 अरब डॉलर पहुंचने का अनुमान, किसानों की आय बढ़ाने पर जोर

पंजाब सरकार के खाद्य प्रसंस्करण विभाग की प्रधान सचिव राखी गुप्ता भंडारी ने कहा, खेतों के नजदीक भंडारण और प्रसंस्करण सुविधाओं की कमी से हर साल करीब 1.53 लाख करोड़ रुपये की कृषि उपज बर्बाद होती है.

रितु राणा by
Published - Friday, 23 October, 2026
Last Modified:
Friday, 23 October, 2026
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खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र किसानों की आय बढ़ाने, कृषि उपज की बर्बादी रोकने और रोजगार के नए अवसर पैदा करने में अहम भूमिका निभा सकता है. इसके लिए खेतों के नजदीक पर्याप्त भंडारण और प्रसंस्करण सुविधाएं विकसित करने के साथ-साथ किसानों को बाजार से जोड़ना जरूरी है. पंजाब सरकार के खाद्य प्रसंस्करण विभाग की प्रधान सचिव राखी गुप्ता भंडारी ने केपीएमजी इन इंडिया (KPMG) द्वारा आयोजित ‘अग्रसर भारत: टर्निंग इंडियाज एस्पिरेशंस इंटू एक्शन’ में एक सत्र के दौरान खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र की संभावनाओं और चुनौतियों पर चर्चा करते हुए ये बातें कहीं.

उन्होंने कहा कि अब केवल अधिक खाद्यान्न उत्पादन पर ध्यान देने के बजाय कृषि उपज का बेहतर इस्तेमाल और उसमें मूल्य संवर्धन करना जरूरी है. खाद्य प्रसंस्करण से किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिल सकता है. साथ ही, इससे रोजगार बढ़ाने और भारतीय उत्पादों के लिए नए बाजार तैयार करने में भी मदद मिलेगी.

हर साल 1.53 लाख करोड़ रुपये की उपज का नुकसान

राखी गुप्ता के अनुसार, कृषि उपज के जल्द खराब होने और पर्याप्त भंडारण, प्रसंस्करण तथा विपणन सुविधाओं की कमी के कारण किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है. जब किसी फसल का उत्पादन अधिक होता है, तो किसानों को कई बार कम कीमत पर अपनी उपज बेचनी पड़ती है. दूसरी ओर, उपभोक्ताओं को पूरे साल उचित कीमत पर अच्छी गुणवत्ता वाले उत्पाद उपलब्ध नहीं हो पाते.

उन्होंने बताया कि भारत में फसल कटाई के बाद होने वाला नुकसान सालाना करीब 1.53 लाख करोड़ रुपये का है. देश में कोल्ड स्टोरेज की क्षमता विकसित होने के बावजूद पैक हाउस, रेफ्रिजरेटेड परिवहन और अन्य जरूरी सुविधाओं की कमी बनी हुई है.

उन्होंने यह भी कहा कि भारत की करीब 75 फीसदी कोल्ड स्टोरेज क्षमता केवल आलू के भंडारण के लिए समर्पित है. ऐसे में अन्य कृषि उत्पादों के भंडारण और प्रसंस्करण के लिए सुविधाओं का विस्तार करना जरूरी है. उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी इस तरह के बुनियादी ढांचे की कमी दिखाई देती है.

2030 तक 600 अरब डॉलर का हो सकता है बाजार

खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में बढ़ती मांग और निवेश की संभावनाओं का उल्लेख करते हुए राखी गुप्ता ने कहा कि इस क्षेत्र का बाजार मूल्य 382.2 अरब डॉलर आंका गया है, जिसके 2030 तक बढ़कर 600 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है.

पैकेज्ड फूड, पौष्टिक खाद्य उत्पादों और आसानी से इस्तेमाल किए जा सकने वाले खाद्य विकल्पों की मांग बढ़ रही है. उन्होंने कहा कि पोषण और स्वास्थ्य से जुड़े खाद्य उत्पादों का बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है. इसके अलावा, ऑनलाइन माध्यमों के जरिए बड़े शहरों में खाद्य खुदरा कारोबार तक पहुंच बढ़ने की भी संभावना है.

उन्होंने खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में मूल्य संवर्धन, उपयुक्त बुनियादी ढांचे और राज्यों के स्तर पर योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन को प्रमुख प्राथमिकताएं बताया. उनके मुताबिक, केवल सुविधाएं विकसित करना पर्याप्त नहीं है. यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वे किसानों के नजदीक हों, उनका सही इस्तेमाल हो और उनका बाजारों से बेहतर संपर्क हो.

पंजाब में 66 हजार से अधिक छोटे खाद्य उद्यम

पंजाब की कृषि क्षमता का उल्लेख करते हुए राखी गुप्ता ने कहा कि राज्य में गेहूं और धान के अलावा किन्नू, बासमती चावल, लाल मिर्च, गुड़ और दूसरे क्षेत्र-विशेष के कृषि उत्पादों में मूल्य संवर्धन की व्यापक संभावनाएं हैं.

उनके अनुसार, पंजाब में 52 खाद्य प्रसंस्करण परियोजनाएं और मेगा फूड पार्क हैं. इसके अलावा, राज्य में करीब 66 हजार से अधिक छोटे और सूक्ष्म खाद्य उद्यम मौजूद हैं. बेहतर प्रसंस्करण, उत्पादों की गुणवत्ता, ब्रांडिंग और बाजार तक पहुंच बढ़ाकर इन उद्यमों की क्षमता का अधिक प्रभावी इस्तेमाल किया जा सकता है.

उन्होंने प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम उन्नयन योजना (PMFME) का उल्लेख करते हुए कहा कि यह योजना छोटे उद्यमियों को कारोबार के औपचारिककरण, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और विपणन में सहायता देने का महत्वपूर्ण माध्यम है.

उन्होंने बताया कि पंजाब में इस योजना के तहत सब्सिडी वितरण की दर 95 फीसदी रही है. प्रति परियोजना करीब 8.49 लाख रुपये की सब्सिडी का भी उल्लेख किया गया.

फसल विविधीकरण और स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग पर जोर

राखी गुप्ता ने कहा कि पंजाब में कृषि क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए फसल विविधीकरण और नई तकनीकों को अपनाने की जरूरत है. राज्य में किन्नू, गाजर, शकरकंद, डेयरी और मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों में भी प्रसंस्करण की संभावनाएं मौजूद हैं.

उन्होंने अमृतसरी कुलचे को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग दिलाने की संभावना का उदाहरण देते हुए कहा कि स्थानीय खाद्य उत्पादों को विशिष्ट पहचान देकर उनका मूल्य बढ़ाया जा सकता है. इसके अलावा, खाद्य प्रदर्शनियों और शेफ से जुड़े आयोजनों के जरिए भी नए उत्पादों, तकनीकों और बाजारों को प्रोत्साहित किया जा सकता है.

उन्होंने चंडीगढ़ में आयोजित शेफ एक्स जैसे आयोजनों का जिक्र करते हुए कहा कि खाद्य प्रसंस्करण को पारंपरिक तरीकों तक सीमित रखने के बजाय नए प्रयोगों और व्यावसायिक अवसरों को बढ़ावा देना चाहिए.

महिला किसानों और उद्यमियों की भागीदारी जरूरी

खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में समावेशी विकास की जरूरत पर जोर देते हुए राखी गुप्ता ने कहा कि महिला किसानों और महिला उद्यमियों को भी कृषि कारोबार और बाजारों में अधिक अवसर मिलने चाहिए.

उन्होंने कहा कि कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका को पहचानने और उन्हें मूल्य संवर्धन की प्रक्रिया से जोड़ने की जरूरत है. इसके लिए ऐसे प्रयास होने चाहिए, जिनसे महिला किसान केवल उत्पादन तक सीमित न रहें, बल्कि प्रसंस्करण, ब्रांडिंग और विपणन में भी भागीदारी कर सकें.

उन्होंने फाइव रिवर्स और पंजाब मार्ट जैसी पहलों का भी उल्लेख किया, जिनका इस्तेमाल उत्पादों के विपणन के लिए किया जा रहा है. इसके अलावा, मार्कफेड ने सियाल पैलेस में अपने सोना ब्रांड के तहत नमकीन पानी में संरक्षित छोले और राजमा उत्पाद पेश किए हैं.

राखी गुप्ता ने कहा कि खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए बुनियादी ढांचे का विकास वास्तविक मांग के आधार पर करना होगा. इसके साथ ही सरकार और उद्योग के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है, ताकि किसानों की उपज का अधिकतम मूल्य सुनिश्चित किया जा सके और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र की विकास क्षमता का लाभ उठाया जा सके.