कोटक म्युचुअल फंड की रिपोर्ट में एक नई उपभोक्ता तस्वीर सामने आई है, जिसमें अनाज पर खर्च घटा और डिजिटल लाइफस्टाइल पर लोगों की निर्भरता बढ़ी है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
भारत में लोगों के खर्च करने का तरीका तेजी से बदल रहा है. अब परिवार सिर्फ खाने-पीने और जरूरी सामान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि मोबाइल, ऑनलाइन मनोरंजन, यात्रा, प्रीमियम गैजेट्स और डिजिटल सेवाओं पर पहले से कहीं ज्यादा खर्च कर रहे हैं. कोटक म्युचुअल फंड की रिपोर्ट ‘द ग्रेट कंजम्प्शन शिफ्ट’ में भारतीय उपभोक्ताओं की बदलती प्राथमिकताओं की तस्वीर सामने आई है. रिपोर्ट के मुताबिक देश की खपत कहानी अब पारंपरिक जरूरतों से आगे बढ़कर सुविधाओं, अनुभवों और डिजिटल लाइफस्टाइल की ओर मुड़ चुकी है.
खाने-पीने से घटा खर्च. डिजिटल सेवाओं पर बढ़ा फोकस
रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण भारत में कुल खर्च में खाने की हिस्सेदारी 1999-2000 के 59% से घटकर 2022-23 में 46% रह गई है. वहीं शहरी भारत में यह हिस्सा 48% से घटकर 39% पर आ गया. सबसे ज्यादा गिरावट अनाज और जरूरी खाद्य पदार्थों पर खर्च में दर्ज की गई है.
इसके उलट मोबाइल, डेटा सेवाएं, टिकाऊ उपभोक्ता सामान, वाहन, किराया और शिक्षा पर लोगों का खर्च तेजी से बढ़ा है. रिपोर्ट का कहना है कि जैसे-जैसे आय बढ़ती है, लोग बुनियादी जरूरतों से आगे बढ़कर सुविधाओं और बेहतर अनुभवों पर अधिक पैसा खर्च करने लगते हैं.
ओटीटी, ऑनलाइन शॉपिंग और प्रीमियम गैजेट्स का बढ़ता बाजार
भारतीय उपभोक्ताओं के बजट में अब मोबाइल फोन, ऑनलाइन मनोरंजन प्लेटफॉर्म, इंस्टेंट डिलीवरी सेवाएं और डिजिटल सब्सक्रिप्शन की बड़ी हिस्सेदारी देखने को मिल रही है. पिछले कुछ वर्षों में ओटीटी सदस्यता, ऑनलाइन खरीदारी, प्रीमियम स्मार्टफोन और डिजिटल ऑडियो डिवाइसेज के बाजार में तेज विस्तार हुआ है. रिपोर्ट के मुताबिक डिजिटल सेवाएं अब शहरी ही नहीं, ग्रामीण भारत के उपभोक्ताओं की जीवनशैली का भी अहम हिस्सा बनती जा रही हैं.
‘अनुभवों’ पर बढ़ रहा भारतीयों का खर्च
रिपोर्ट में कहा गया है कि अब लोग केवल सामान खरीदने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अनुभवों पर भी खुलकर खर्च कर रहे हैं. कॉन्सर्ट, लाइव शो, यात्रा और आउटडोर गतिविधियों पर खर्च में तेजी से उछाल आया है. भारत में टिकट आधारित लाइव कार्यक्रमों की संख्या 2022 के 19 हजार से बढ़कर 2025 में 34 हजार तक पहुंच गई. बड़े अंतरराष्ट्रीय संगीत कार्यक्रमों के लिए करीब 1.3 करोड़ लोगों ने टिकट हासिल करने की कोशिश की, जबकि टिकट सिर्फ 1.5 लाख लोगों को ही मिल सके.
विदेश यात्राओं पर भारतीयों का खर्च भी तेजी से बढ़ रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2026 में फरवरी तक भारतीयों ने विदेश यात्रा पर लगभग 1.45 लाख करोड़ रुपये खर्च किए.
प्रीमियम स्मार्टफोन की बढ़ती मांग
कोटक म्युचुअल फंड की रिपोर्ट में एप्पल और हिंदुस्तान यूनिलीवर के कारोबार की तुलना भी की गई है. रिपोर्ट के अनुसार एप्पल इंडिया का कारोबार पिछले पांच वर्षों में 6.2 गुना बढ़ा है और वित्त वर्ष 2026 में कंपनी का अनुमानित राजस्व हिंदुस्तान यूनिलीवर से लगभग दोगुना हो सकता है.
रिपोर्ट बताती है कि देश में कुल मोबाइल बिक्री लगभग स्थिर बनी हुई है, लेकिन प्रीमियम स्मार्टफोन की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है. वर्ष 2020 में कुल मोबाइल बिक्री में प्रीमियम फोन का हिस्सा 20% था, जो 2025 तक बढ़कर 26% हो गया. यह संकेत देता है कि देश का एक बड़ा उपभोक्ता वर्ग अब महंगे और प्रीमियम उत्पादों की ओर तेजी से आकर्षित हो रहा है.
आय बढ़ रही, लेकिन सभी की नहीं
रिपोर्ट का सबसे अहम निष्कर्ष यह है कि देश में आय बढ़ जरूर रही है, लेकिन उसका फायदा सभी वर्गों को समान रूप से नहीं मिल रहा. रिपोर्ट के अनुसार शहरी अमीर वर्ग की आय 18% की दर से बढ़ रही है, जबकि शहरी मध्यम और सामान्य वर्ग की आय वृद्धि करीब 6% के आसपास है.
ग्रामीण क्षेत्रों में भी संपन्न वर्ग की आय, मजदूर वर्ग की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ रही है. रिपोर्ट ने इस स्थिति को “एक देश, दो आर्थिक यात्राएं” बताया है. यानी खपत तो बढ़ रही है, लेकिन उसका लाभ सीमित वर्ग तक ज्यादा केंद्रित होता जा रहा है.
किराया, मोबाइल बिल और ईएमआई ने बढ़ाया दबाव
रिपोर्ट के मुताबिक शहरों में किराया अब परिवारों के बजट का बड़ा हिस्सा बन चुका है. शहरी परिवारों के कुल खर्च में किराए की हिस्सेदारी 1999-2000 के 4.5% से बढ़कर 2022-23 में 6.6% तक पहुंच गई है.
मोबाइल डेटा पर खर्च में भी तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है. पिछले आठ वर्षों में डेटा खर्च की वृद्धि ग्रामीण मजदूरी की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक रही. इसके अलावा परिवारों पर कर्ज और ईएमआई का दबाव भी तेजी से बढ़ा है.
रिपोर्ट के अनुसार पिछले सात वर्षों में पांच साल ऐसे रहे, जब ईएमआई का बोझ आय वृद्धि से अधिक तेजी से बढ़ा. इसका असर घरेलू बचत पर भी दिखाई दे रहा है और वित्तीय बचत लगातार दबाव में बनी हुई है.
शेयर बाजार और साइबर फ्रॉड में बढ़ा नुकसान
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बड़ी संख्या में लोग डेरिवेटिव ट्रेडिंग और ऑनलाइन धोखाधड़ी में पैसा गंवा रहे हैं. सेबी के आंकड़ों के हवाले से बताया गया है कि वित्त वर्ष 2025 में 91% खुदरा निवेशकों को F&O ट्रेडिंग में नुकसान हुआ.
सिर्फ FY25 में खुदरा निवेशकों का कुल नुकसान 1.05 लाख करोड़ रुपये रहा, जबकि FY22 से FY25 के बीच यह आंकड़ा 2.87 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया.
वहीं डिजिटल धोखाधड़ी के मामलों में भी तेजी आई है. रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2024 में साइबर फ्रॉड के कारण लोगों को 22,849 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.
क्या संकेत देती है यह रिपोर्ट?
कोटक म्युचुअल फंड की रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि भारत की उपभोक्ता अर्थव्यवस्था तेजी से बदल रही है. अब लोगों का खर्च खाने और जरूरी सामान से हटकर डेटा, मोबाइल, यात्रा, मनोरंजन और बेहतर अनुभवों की ओर शिफ्ट हो रहा है.
हालांकि इसके साथ किराया, ईएमआई और डिजिटल खर्च का दबाव भी लगातार बढ़ रहा है. रिपोर्ट यह भी दिखाती है कि देश में बढ़ती खपत और आय का बड़ा हिस्सा उच्च आय वर्ग के पास केंद्रित होता जा रहा है. यानी भारत में खर्च तो बढ़ रहा है, लेकिन इसकी रफ्तार और फायदा हर वर्ग तक बराबरी से नहीं पहुंच पा रहा.
29 मई की रिकॉर्ड डेट वाली कंपनियों में कई बड़े और मिडकैप नाम शामिल हैं. कुछ कंपनियां निवेशकों को आकर्षक फाइनल डिविडेंड दे रही हैं, जबकि कुछ अंतरिम डिविडेंड का ऐलान कर चुकी हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
शेयर बाजार में डिविडेंड का इंतजार कर रहे निवेशकों के लिए 29 मई बेहद अहम रहने वाला है. इस दिन 12 कंपनियों ने डिविडेंड के लिए रिकॉर्ड डेट तय की है. इनमें कुछ कंपनियां फाइनल डिविडेंड देंगी, जबकि कुछ अंतरिम डिविडेंड का भुगतान करेंगी. कई कंपनियां निवेशकों को ₹150 प्रति शेयर तक का डिविडेंड देने जा रही हैं. अगर आप भी इन कंपनियों के डिविडेंड का फायदा उठाना चाहते हैं, तो रिकॉर्ड डेट और एक्स-डेट को समझना जरूरी है. ध्यान रहे कि 29 मई को शेयर खरीदने वाले निवेशकों को इस घोषित डिविडेंड का लाभ नहीं मिलेगा.
क्या होती है रिकॉर्ड डेट?
रिकॉर्ड डेट वह तारीख होती है, जिस दिन कंपनी अपने रिकॉर्ड में यह तय करती है कि किन निवेशकों के पास उसके शेयर मौजूद हैं. जिन निवेशकों का नाम कंपनी के रिकॉर्ड या डिपॉजिटरी के डेटा में दर्ज होता है, वही डिविडेंड पाने के हकदार माने जाते हैं.
29 मई को शेयर खरीदने पर क्यों नहीं मिलेगा डिविडेंड?
भारतीय शेयर बाजार में ट्रेडिंग T+1 सेटलमेंट सिस्टम पर होती है. यानी अगर कोई निवेशक रिकॉर्ड डेट वाले दिन शेयर खरीदता है, तो उसका नाम अगले कारोबारी दिन कंपनी के रिकॉर्ड में जुड़ता है. ऐसे में 29 मई को शेयर खरीदने वाले निवेशकों को इस डिविडेंड का फायदा नहीं मिलेगा.
किन कंपनियों ने घोषित किया डिविडेंड?
29 मई की रिकॉर्ड डेट वाली 12 कंपनियों के डिविडेंड के लिए रिकॉर्ड डेट तय की गई है, जिनमें बजाज ऑटो, टोरेंट फार्मा, ICICI लोंबार्ड जनरल इंश्योरेंस, ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन फार्मा और बैंक ऑफ इंडिया जैसे बड़े नाम शामिल हैं. बजाज ऑटो निवेशकों को ₹150 प्रति शेयर का फाइनल डिविडेंड दे रही है, जबकि ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन फार्मा ₹57, टोरेंट फार्मा ₹9, ICICI लोंबार्ड ₹7, बैंक ऑफ इंडिया ₹4.65 और UNO Minda ₹1.75 प्रति शेयर का डिविडेंड देगी. इसके अलावा JB Chemicals ₹9.30, Eris Lifesciences ₹7.21, Home First Finance ₹5.20, S Chand and Company ₹4, Advani Hotels ₹0.80 और BCPL Railway Infrastructure ₹1 प्रति शेयर डिविडेंड देने जा रही हैं. कुछ कंपनियां फाइनल तो कुछ अंतरिम डिविडेंड का भुगतान करेंगी. कुछ कंपनियां निवेशकों को आकर्षक फाइनल डिविडेंड दे रही हैं, जबकि कुछ अंतरिम डिविडेंड का ऐलान कर चुकी हैं. इनमें प्रति शेयर डिविडेंड ₹150 तक पहुंच रहा है, जिससे निवेशकों के बीच इन शेयरों को लेकर काफी चर्चा है.
डिविडेंड निवेशकों के लिए क्यों अहम है?
डिविडेंड उन निवेशकों के लिए अतिरिक्त कमाई का जरिया माना जाता है, जो लंबे समय तक शेयर होल्ड करते हैं. नियमित डिविडेंड देने वाली कंपनियां आमतौर पर मजबूत वित्तीय स्थिति और स्थिर कारोबार का संकेत देती हैं. यही वजह है कि कई निवेशक डिविडेंड देने वाले शेयरों को अपने पोर्टफोलियो में प्राथमिकता देते हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार, केवल डिविडेंड देखकर किसी शेयर में निवेश करना सही रणनीति नहीं माना जाता. निवेशकों को कंपनी के बिजनेस मॉडल, मुनाफे, कर्ज और भविष्य की ग्रोथ संभावनाओं का भी विश्लेषण करना चाहिए. साथ ही रिकॉर्ड डेट और एक्स-डेट की जानकारी पहले से रखना जरूरी है, ताकि डिविडेंड का लाभ सही समय पर मिल सके.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
करीब ₹15,000 करोड़ की लागत वाले इस प्रोजेक्ट को भारत के रक्षा क्षेत्र के लिए गेमचेंजर माना जा रहा है. इसका उद्देश्य देश को अत्याधुनिक पांचवीं पीढ़ी के स्वदेशी स्टील्थ फाइटर जेट से लैस करना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय वायुसेना की ताकत को नई ऊंचाई देने की दिशा में केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. रक्षा मंत्रालय ने देश के महत्वाकांक्षी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) प्रोजेक्ट के लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP) यानी आधिकारिक टेंडर जारी कर दिया है. करीब ₹15,000 करोड़ की लागत वाले इस प्रोजेक्ट को भारत के रक्षा क्षेत्र के लिए गेमचेंजर माना जा रहा है. इसका उद्देश्य देश को अत्याधुनिक पांचवीं पीढ़ी के स्वदेशी स्टील्थ फाइटर जेट से लैस करना है.
टाटा, L&T और भारत फोर्ज के बीच कड़ी टक्कर
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस मेगा रक्षा परियोजना के लिए तीन बड़े औद्योगिक समूहों और उनके कंसोर्टियम को शॉर्टलिस्ट किया गया है. इसमें टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, लार्सन एंड टुब्रो (L&T)-भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) कंसोर्टियम और भारत फोर्ज-बेमल (BEML) साझेदारी शामिल हैं. देश के सबसे बड़े रक्षा कॉन्ट्रैक्ट्स में शामिल इस परियोजना को हासिल करने के लिए इन कंपनियों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिल रहा है.
भारत का पहला पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट
AMCA प्रोजेक्ट भारत के रक्षा इतिहास में मील का पत्थर साबित हो सकता है. अब तक भारत अपनी रक्षा जरूरतों के लिए विदेशी लड़ाकू विमानों पर काफी हद तक निर्भर रहा है, लेकिन यह परियोजना आत्मनिर्भर भारत अभियान को नई मजबूती देगी.
यह भारत का पहला स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट होगा, जिसे ऐसी तकनीक से तैयार किया जाएगा कि दुश्मन के रडार सिस्टम इसे आसानी से पकड़ नहीं पाएंगे. इससे भारतीय वायुसेना की युद्ध क्षमता और रणनीतिक ताकत में बड़ा इजाफा होगा.
सरकारी और निजी कंपनियां मिलकर करेंगी काम
पिछले वर्ष रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने AMCA प्रोग्राम के एक्जीक्यूशन मॉडल को मंजूरी दी थी. इस मॉडल के तहत एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) निजी और सरकारी क्षेत्र की कंपनियों के साथ मिलकर इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाएगी.
सरकार का उद्देश्य रक्षा निर्माण क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाना और हाई-टेक रक्षा तकनीक को देश के भीतर विकसित करना है. इससे घरेलू रक्षा उद्योग को भी बड़ा बढ़ावा मिलेगा.
AI तकनीक से लैस होगा नया लड़ाकू विमान
AMCA फाइटर जेट को भविष्य की युद्ध चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया जा रहा है. एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) के मुताबिक, विमान में अत्याधुनिक स्टील्थ तकनीक के साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित सिस्टम भी लगाए जाएंगे.
यह AI तकनीक पायलट को युद्ध के दौरान तेजी से निर्णय लेने, दुश्मन की गतिविधियों का विश्लेषण करने और मिशन की क्षमता बढ़ाने में मदद करेगी. रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इन आधुनिक तकनीकों के जरिए भारत का AMCA दुनिया के सबसे उन्नत लड़ाकू विमानों की श्रेणी में शामिल हो सकता है.
एयरो इंडिया 2025 में दिखी थी ताकत की झलक
बेंगलुरु में आयोजित एयरो इंडिया 2025 प्रदर्शनी के दौरान AMCA फाइटर जेट का फुल-स्केल मॉडल भी पेश किया गया था. इस मॉडल ने भारत की तेजी से बढ़ती रक्षा तकनीकी क्षमता और स्वदेशी सैन्य निर्माण की ताकत को दुनिया के सामने प्रदर्शित किया था.
आंध्र प्रदेश में बनेगा हाईटेक टेस्टिंग सेंटर
इस महत्वाकांक्षी परियोजना को समय पर पूरा करने के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी तेजी से काम शुरू हो गया है. हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने पुट्टपर्थी में ‘कोर इंटीग्रेशन एंड फ्लाइट टेस्टिंग सेंटर’ की आधारशिला रखी.
करीब ₹2,000 करोड़ की लागत से बनने वाला यह सेंटर स्वदेशी विमानों की टेस्टिंग और डेवलपमेंट प्रक्रिया को तेज करने में अहम भूमिका निभाएगा. रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, यह केंद्र भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में शामिल करेगा, जहां पांचवीं पीढ़ी के आधुनिक लड़ाकू विमानों की टेस्टिंग और विकास की क्षमता मौजूद है.
आत्मनिर्भर भारत अभियान को मिलेगा बड़ा बढ़ावा
विशेषज्ञों का मानना है कि AMCA प्रोजेक्ट सिर्फ एक रक्षा परियोजना नहीं, बल्कि भारत के आत्मनिर्भर रक्षा निर्माण अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक बन सकता है. इससे रक्षा उत्पादन, रोजगार, तकनीकी विकास और वैश्विक रक्षा बाजार में भारत की स्थिति मजबूत होगी.
यह मिशन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, परमाणु ऊर्जा, नवीकरणीय ऊर्जा, क्लीन टेक्नोलॉजी, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में साझेदारी के अवसर तलाशेगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत और कनाडा ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 50 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है. साथ ही दोनों देशों ने व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (CEPA) पर इस साल के अंत तक बातचीत पूरी करने की प्रतिबद्धता दोहराई है. यह घोषणा केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और कनाडा के अंतरराष्ट्रीय व्यापार मंत्री Maninder Sidhu के बीच हुई उच्चस्तरीय बैठकों के दौरान की गई.
2030 तक 50 अरब डॉलर व्यापार का लक्ष्य
कनाडा दौरे के दूसरे दिन टोरंटो में आयोजित विभिन्न कारोबारी कार्यक्रमों में पीयूष गोयल ने भारतीय और कनाडाई उद्योग जगत के प्रतिनिधियों से मुलाकात की. दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार और निवेश संबंधों को नई गति देने पर जोर दिया.
पीयूष गोयल ने कहा कि भारत और कनाडा की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे की पूरक हैं और मजबूत व्यापारिक माहौल के लिए सरकार तथा उद्योगों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है. वहीं, मनींदर सिद्धू ने कनाडा पहुंचे अब तक के सबसे बड़े भारतीय कारोबारी प्रतिनिधिमंडल का स्वागत किया.
CEPA समझौते को जल्द अंतिम रूप देने पर जोर
भारत और कनाडा के बीच लंबे समय से व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (CEPA) पर बातचीत चल रही है. दोनों देशों ने इस वर्ष के अंत तक इस समझौते को अंतिम रूप देने की दिशा में तेजी से काम करने पर सहमति जताई. विशेषज्ञों का मानना है कि CEPA लागू होने से व्यापारिक शुल्क में कमी आएगी और निवेश, तकनीक तथा सेवाओं के क्षेत्र में सहयोग बढ़ेगा.
कनाडा का ट्रेड मिशन नवंबर में भारत आएगा
कनाडा सरकार ने नवंबर 2026 में “टीम कनाडा ट्रेड मिशन” भारत भेजने की घोषणा की है. यह मिशन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, परमाणु ऊर्जा, नवीकरणीय ऊर्जा, क्लीन टेक्नोलॉजी, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में साझेदारी के अवसर तलाशेगा.
निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर पर हुई चर्चा
दोनों मंत्रियों ने कनाडा-भारत निवेश गोलमेज बैठक की भी सह-अध्यक्षता की, जिसमें कनाडा के प्रमुख पेंशन फंड, बैंक और वरिष्ठ सरकारी अधिकारी शामिल हुए. बैठक में भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार, वित्तीय सुधारों और कारोबार सुगमता उपायों पर चर्चा हुई.
पीयूष गोयल ने कनाडाई कंपनियों को स्वच्छ ऊर्जा, तकनीक, विनिर्माण, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और सप्लाई चेन विविधीकरण में निवेश बढ़ाने का न्योता दिया. उन्होंने भारत की PLI योजनाओं, STEM प्रतिभाओं और तेजी से बढ़ते ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC) नेटवर्क को भी निवेशकों के लिए बड़ा अवसर बताया.
भारतीय समुदाय से भी मिले पीयूष गोयल
अपने दौरे के दौरान पीयूष गोयल ने टोरंटो स्थित कनिष्क मेमोरियल पहुंचकर एयर इंडिया AI-182 आतंकी हमले के पीड़ितों को श्रद्धांजलि दी. उन्होंने पीड़ित परिवारों से भी मुलाकात की.
दौरे के अंतिम चरण में गोयल ने ब्रैम्पटन में भारतीय समुदाय से संवाद किया और कहा कि कनाडा में बसे भारतीय दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं.
100 से अधिक भारतीय कंपनियां दौरे में शामिल
पीयूष गोयल के नेतृत्व में 100 से अधिक भारतीय कंपनियों का प्रतिनिधिमंडल कनाडा पहुंचा है. यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा कारोबारी प्रतिनिधिमंडल माना जा रहा है. तीन दिवसीय यह दौरा 25 मई को ओटावा से शुरू हुआ और इसका मुख्य उद्देश्य भारत-कनाडा आर्थिक संबंधों को नई मजबूती देना है.
बढ़ती लागत का असर ग्राहकों पर, अलग-अलग मॉडल्स पर लागू होगी नई कीमतें
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश की प्रमुख ऑटोमोबाइल कंपनी हुंडई (Hyundai Motor India) ने अपनी कारों की कीमतों में बढ़ोतरी करने का ऐलान किया है. कंपनी ने बुधवार को कहा कि वह अपने विभिन्न मॉडल्स और वेरिएंट्स की कीमतों में अधिकतम ₹12,800 तक की बढ़ोतरी करेगी.
क्यों बढ़ाई गई कीमतें
कंपनी के मुताबिक यह फैसला बढ़ती उत्पादन लागत, महंगे कच्चे माल और ऑपरेशनल खर्चों में इजाफे के कारण लिया गया है. नई कीमतें अलग-अलग मॉडल और वेरिएंट के आधार पर लागू होंगी. हालांकि कंपनी ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि संशोधित कीमतें किस तारीख से प्रभावी होंगी.
यह फैसला ऐसे समय आया है जब Hyundai पहले ही अप्रैल में अपने पूरे पोर्टफोलियो पर 1 प्रतिशत कीमत बढ़ाने की घोषणा कर चुकी थी, जो अगले महीने से लागू होनी है. उस समय कंपनी ने इसकी जानकारी नियामकीय फाइलिंग में दी थी.
कंपनी ने बयान में कहा कि वह लगातार लागत को नियंत्रित करने और ग्राहकों पर बोझ कम रखने की कोशिश कर रही है, लेकिन बढ़ते खर्चों के कारण कुछ अतिरिक्त लागत बाजार में ट्रांसफर करना जरूरी हो गया है.
कंपनी की प्रतिक्रिया
Hyundai ने कहा कि यह बढ़ोतरी “नाममात्र” की है और इसका असर मॉडल तथा वेरिएंट के अनुसार अलग-अलग होगा. हाल के महीनों में ऑटो सेक्टर में स्टील, एल्युमीनियम और अन्य कमोडिटी की कीमतों में तेजी देखी गई है. इसके अलावा लॉजिस्टिक्स और मैन्युफैक्चरिंग लागत भी बढ़ी है, जिसका असर वाहन कंपनियों की लागत संरचना पर पड़ा है. इसी वजह से कई वाहन निर्माता कंपनियां कीमतों में संशोधन कर रही हैं.
सरकार इस योजना के तहत PDS सिस्टम को हाई-टेक बनाने की तैयारी कर रही है. योजना में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), मशीन लर्निंग (ML) और ब्लॉकचेन जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्र सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) को आधुनिक और ज्यादा पारदर्शी बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली केंद्रीय कैबिनेट ने ‘सार्थक-PDS’ योजना को मार्च 2031 तक बढ़ाने को मंजूरी दे दी है. इस योजना पर अगले पांच वर्षों में केंद्र सरकार ₹25,530 करोड़ खर्च करेगी. सरकार का उद्देश्य राशन वितरण व्यवस्था को तकनीक से जोड़कर अधिक प्रभावी, पारदर्शी और लोगों के लिए सुविधाजनक बनाना है.
कैबिनेट ने दी योजना विस्तार को मंजूरी
केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्निनी वैष्णव ने बताया कि कैबिनेट ने ‘स्कीम फॉर असिस्टेंस इन राशन ट्रांसपोर्ट एंड हैंडलिंग-इनकम विद ऑटोमेशन इन PDS’ यानी ‘सार्थक-PDS’ योजना को मंजूरी दे दी है. यह योजना मार्च 2031 तक लागू रहेगी और 16वें वित्त आयोग की अवधि के दौरान संचालित की जाएगी. सरकार ने इस योजना के लिए केंद्र की हिस्सेदारी के रूप में ₹25,530 करोड़ का प्रावधान किया है.
दो बड़ी योजनाओं को मिलाकर बनाया गया नया ढांचा
सरकार ने ‘सार्थक-PDS’ को एक अम्ब्रेला स्कीम के रूप में तैयार किया है, जिसमें दो प्रमुख योजनाओं को एकीकृत किया गया है. इसमें राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के तहत राज्यों के भीतर खाद्यान्न परिवहन और उचित मूल्य की दुकानों के डीलरों को सहायता देने वाली योजना शामिल है. इसके साथ ही SMART-PDS योजना को भी इसमें जोड़ा गया है, जो तकनीकी सुधारों और ऑटोमेशन पर केंद्रित थी. सरकार का मानना है कि दोनों योजनाओं के एकीकरण से राशन वितरण प्रणाली ज्यादा मजबूत और प्रभावी बनेगी.
राशन पहुंचाने में राज्यों को मिल रही थी दिक्कत
अश्विनी वैष्णव ने कहा कि कई राज्य सरकारों की एजेंसियों को भारतीय खाद्य निगम (FCI) के बड़े गोदामों से जिलों और राशन दुकानों तक खाद्यान्न पहुंचाने में आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था. इसी समस्या को देखते हुए केंद्र सरकार ने राज्यों को वित्तीय सहायता देने का फैसला किया है, ताकि राशन परिवहन और हैंडलिंग की लागत को आसानी से पूरा किया जा सके.
AI और ब्लॉकचेन जैसी तकनीकों का होगा इस्तेमाल
सरकार इस योजना के तहत PDS सिस्टम को हाई-टेक बनाने की तैयारी कर रही है. योजना में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), मशीन लर्निंग (ML) और ब्लॉकचेन जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा. इन तकनीकों की मदद से राशन वितरण की रियल-टाइम मॉनिटरिंग संभव होगी. साथ ही शिकायतों का तेजी से समाधान किया जा सकेगा और सिस्टम में गड़बड़ियों व भ्रष्टाचार को कम करने में मदद मिलेगी.
राज्यों में बनेंगे कमांड एंड कंट्रोल सेंटर
योजना के तहत राज्यों में आधुनिक कमांड एंड कंट्रोल सेंटर स्थापित किए जाएंगे. इसके अलावा एकीकृत डेटाबेस भी तैयार किया जाएगा, जिससे पूरे PDS नेटवर्क की निगरानी आसान होगी. सरकार का दावा है कि इससे राशन वितरण प्रणाली अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और जवाबदेह बनेगी.
गरीबों तक आसान और पारदर्शी राशन पहुंचाना लक्ष्य
‘सार्थक-PDS’ योजना का मुख्य उद्देश्य गरीब और जरूरतमंद लोगों तक खाद्यान्न वितरण को अधिक सुगम बनाना है. सरकार चाहती है कि राशन वितरण में देरी, गड़बड़ी और फर्जीवाड़े जैसी समस्याओं को तकनीक की मदद से कम किया जाए. नई व्यवस्था के लागू होने से करोड़ों लाभार्थियों को सीधे फायदा मिलने की उम्मीद है.
रिपोर्ट के अनुसार, HDFC Bank के एमडी और सीईओ शशिधर जगदीशन के स्तर पर भी इस मामले को लेकर चर्चा हुई थी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश के सबसे बड़े निजी बैंकों में शामिल एचडीएफसी बैंक (HDFC) एक नए विवाद में घिरता नजर आ रहा है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बैंक पर महाराष्ट्र स्टेट रोड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (MSRDC) को करीब 45 करोड़ रुपये का भुगतान मार्केटिंग बजट के जरिए करने के आरोप लगे हैं. दावा किया गया है कि यह रकम “डिफरेंशियल इंटरेस्ट” यानी अतिरिक्त ब्याज के भुगतान के तौर पर दी गई थी, लेकिन इसे सीधे ब्याज भुगतान दिखाने के बजाय मार्केटिंग खर्च के रूप में पेश किया गया.
इंटरनल ऑडिट में सामने आया मामला
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह मामला FY24 और FY25 के दौरान बैंक के मार्केटिंग विभाग के इंटरनल ऑडिट में सामने आया. ऑडिट में इन लेनदेन पर सवाल उठाए गए और विभाग के प्रदर्शन को “असंतोषजनक” बताया गया. रिपोर्ट के मुताबिक, ऑडिट के बाद बैंक की ऑडिट कमेटी ने 12 मार्च को औपचारिक आंतरिक सतर्कता जांच (Internal Vigilance Investigation) शुरू करने का आदेश दिया.
‘रोड सेफ्टी कैंपेन’ के नाम पर भुगतान का आरोप
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि MSRDC को यह भुगतान उसके डिपॉजिट पर “डिफरेंशियल इंटरेस्ट” की भरपाई के लिए किया गया था. हालांकि, रकम को सीधे ब्याज आय के तौर पर ट्रांसफर करने के बजाय इसे कथित तौर पर रोड सेफ्टी अवेयरनेस कैंपेन में योगदान के नाम पर वेंडर्स के जरिए भेजा गया. जांच में यह भी आरोप लगाया गया कि मार्केटिंग बजट का इस्तेमाल वास्तविक उद्देश्य को छिपाने के लिए किया गया.
CEO और वरिष्ठ अधिकारियों पर भी सवाल
रिपोर्ट के अनुसार, HDFC Bank के एमडी और सीईओ सशिधर जगदीशन के स्तर पर भी इस मामले को लेकर चर्चा हुई थी. जांच से जुड़े अधिकारियों ने कथित तौर पर बताया कि उन्होंने इस बात पर बातचीत में हिस्सा लिया था कि अतिरिक्त भुगतान को मार्केटिंग बजट के जरिए कैसे संरचित किया जा सकता है.
वहीं बैंक के चीफ मार्केटिंग ऑफिसर रवि संथनम ने अपनी गवाही में कथित तौर पर माना कि मार्केटिंग विभाग ने “डिफरेंशियल इंटरेस्ट रीइम्बर्समेंट को मार्केटिंग खर्च की तरह दिखाने में मदद की.” रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ खर्च वास्तव में मार्केटिंग गतिविधियों पर भी किए गए ताकि पूरी व्यवस्था वैध दिखाई दे सके. इसे “वन-ऑफ केस” यानी एक अपवाद के रूप में बताया गया.
CFO समेत कई अधिकारियों के नाम का जिक्र
विजिलेंस रिपोर्ट में बैंक के सीएफओ श्रीनिवासम वैद्यनाथन समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों के नाम भी सामने आने का दावा किया गया है. रिपोर्ट में कहा गया कि इस पूरी व्यवस्था के लिए न तो पर्याप्त दस्तावेजी प्रक्रिया अपनाई गई और न ही जरूरी कंप्लायंस और इंटरनल अप्रूवल लिए गए. जांच रिपोर्ट में इसे बैंक के स्वीकृत गवर्नेंस मानकों से बाहर बताया गया.
ऑडिट कमेटी को सौंपी गई रिपोर्ट
बताया गया है कि जांच के निष्कर्ष अप्रैल महीने में बैंक की ऑडिट कमेटी और नॉमिनेशन एंड रेम्यूनरेशन कमेटी को सौंप दिए गए थे. रिपोर्ट में चेतावनी दी गई कि इस तरह की व्यवस्था से बैंक को रेगुलेटरी, ऑपरेशनल और प्रतिष्ठा से जुड़े गंभीर जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है.
पूर्व चेयरमैन के इस्तीफे के बाद बढ़ी चर्चा
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब कुछ हफ्ते पहले ही एचडीएफसी बैंक के पूर्व चेयरमैन अतानु चक्रवर्ती ने इस्तीफा दिया था. उन्होंने बैंक के भीतर कुछ ऐसी प्रक्रियाओं पर चिंता जताई थी, जो उनके व्यक्तिगत नैतिक मूल्यों के अनुरूप नहीं थीं. हालांकि, इससे पहले भारतीय रिजर्व बैंक ने कहा था कि बैंक के गवर्नेंस को लेकर उसे कोई बड़ी चिंता नहीं है. रिपोर्ट प्रकाशित होने तक HDFC Bank, RBI और MSRDC की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी.
कोर्ट ने कहा कि ऑनलाइन पैसे वाले गेम्स पर टैक्स लगाना कानून और संविधान दोनों के तहत वैध है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है. देश की सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार के उस फैसले को सही ठहराया है, जिसके तहत रियल-मनी गेमिंग प्लेटफॉर्म्स पर पिछली तारीखों से 28 फीसदी GST लगाया गया था. कोर्ट के इस फैसले के बाद गेमिंग कंपनियों को अब हजारों करोड़ रुपये के पुराने टैक्स नोटिसों का सामना करना पड़ेगा. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े लेनदेन ‘एक्शनेबल क्लेम’ की श्रेणी में आते हैं और उन पर टैक्स लगाना पूरी तरह संवैधानिक है.
सुप्रीम कोर्ट ने कंपनियों की याचिका खारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने डेल्टा कॉर्प समेत कई ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों की याचिकाओं को खारिज कर दिया. कंपनियों ने सरकार के उस फैसले का विरोध किया था, जिसमें रियल-मनी गेमिंग प्लेटफॉर्म्स पर 28 फीसदी ‘रेट्रोस्पेक्टिव GST’ यानी पिछली तारीख से टैक्स लगाने का प्रावधान किया गया था. कोर्ट ने कहा कि ऑनलाइन पैसे वाले गेम्स पर टैक्स लगाना कानून और संविधान दोनों के तहत वैध है. साथ ही अदालत ने यह भी माना कि राज्य सरकारें चाहें तो ऐसे गेम्स पर प्रतिबंध या कड़े नियंत्रण लगा सकती हैं, भले ही उनमें स्किल यानी कौशल का तत्व शामिल हो.
हाई कोर्ट के फैसले भी रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु और कर्नाटक सरकारों की अपील स्वीकार करते हुए मद्रास हाई कोर्ट और कर्नाटक हाई कोर्ट के उन फैसलों को रद्द कर दिया, जिनमें ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े राज्य कानूनों को राहत दी गई थी. इसके अलावा अदालत ने गेमिंग कंपनियों को जारी GST के ‘कारण बताओ नोटिस’ को भी सही ठहराया. कोर्ट ने जीएसटी अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई करें. हालांकि कंपनियों को नोटिस का जवाब देने की स्वतंत्रता भी दी गई है.
2.5 लाख करोड़ रुपये के टैक्स विवाद पर फैसला
यह मामला देश के सबसे बड़े टैक्स विवादों में से एक बन चुका है. रियल-मनी गेमिंग कंपनियों के खिलाफ करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये के रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स नोटिस जारी किए गए थे. असल विवाद इस बात को लेकर था कि GST पूरे जमा अमाउंट पर लगाया जाए या केवल कंपनियों के कमीशन पर. टैक्स विभाग का कहना था कि खिलाड़ियों द्वारा जमा की गई पूरी राशि पर 28 फीसदी GST लगेगा. वहीं, गेमिंग कंपनियों का तर्क था कि उन्हें सिर्फ अपने कमीशन यानी ‘ग्रॉस गेमिंग रेवेन्यू’ (GGR) पर टैक्स देना चाहिए, जो आमतौर पर कुल जमा राशि का 5 से 15 फीसदी होता है.
कंपनियों ने बताया कारोबार के लिए खतरा
गेमिंग कंपनियों का दावा था कि टैक्स विभाग द्वारा मांगी गई GST राशि उनके कुल राजस्व से कई गुना ज्यादा है. कंपनियों के मुताबिक, अगर पूरे जमा अमाउंट पर टैक्स वसूला गया तो इंडस्ट्री के लिए कारोबार चलाना बेहद मुश्किल हो जाएगा. इंडस्ट्री पहले से ही बढ़ते रेगुलेशन, कानूनी चुनौतियों और कम होती कमाई के दबाव का सामना कर रही है.
सरकार के नए कानून से पहले ही लगा था झटका
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान ही केंद्र सरकार ने ऑनलाइन गेमिंग को लेकर नया कानून लागू कर दिया था. ‘Promotion and Regulation of Online Gaming Act’ (PROGA) के तहत ऐसे ऑनलाइन गेम्स पर रोक लगा दी गई, जिनमें खिलाड़ी पैसे जमा कर जीतने की उम्मीद रखते हैं.
1 मई 2026 से लागू हुए इन नियमों का सीधा असर देश की करीब 3.5 अरब डॉलर की रियल-मनी गेमिंग इंडस्ट्री पर पड़ा. कई कंपनियों ने लागत घटाने के लिए बड़े स्तर पर कर्मचारियों की छंटनी की और 3,000 से ज्यादा लोगों की नौकरियां चली गईं.
इंडस्ट्री के सामने बढ़ा अस्तित्व का संकट
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों पर कानूनी और वित्तीय दबाव और बढ़ सकता है. भारी टैक्स देनदारी, सख्त नियम और लगातार बढ़ती निगरानी के बीच इंडस्ट्री के सामने अब अस्तित्व बचाने की चुनौती खड़ी हो गई है.
बायजू रवींद्रन की मुश्किलें सिर्फ सिंगापुर तक सीमित नहीं हैं. अमेरिका में भी कंपनी और उसके संस्थापक पर 1.2 बिलियन डॉलर के बड़े कर्ज विवाद को लेकर कानूनी दबाव बना हुआ है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
कभी भारत की सबसे चर्चित एडटेक कंपनी रही बायजू (Byju’s) अब गंभीर कानूनी और वित्तीय संकट में फंसती नजर आ रही है. कंपनी के फाउंडर बायजू रवींद्रन को सिंगापुर की अदालत ने कोर्ट की अवमानना के मामले में 6 महीने जेल की सजा सुनाई है. इसके साथ ही उन पर करीब 70,500 अमेरिकी डॉलर (करीब 59.2 लाख रुपये) का भारी जुर्माना भी लगाया गया है. अदालत का यह फैसला ऐसे समय आया है, जब रवींद्रन पहले से ही विदेशी निवेशकों, कर्जदाताओं और कई अंतरराष्ट्रीय मुकदमों का सामना कर रहे हैं.
कोर्ट के आदेशों की अनदेखी पड़ी भारी
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सिंगापुर की अदालत ने बायजू रवींद्रन के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए उन्हें अधिकारियों के सामने सरेंडर करने का निर्देश दिया है. अदालत ने पाया कि रवींद्रन ने अप्रैल 2024 से अपनी संपत्तियों और निवेश से जुड़े कई अहम कोर्ट आदेशों का पालन नहीं किया. कोर्ट ने उन्हें तुरंत जुर्माने की राशि जमा करने और ‘Beeaar Investco Pte’ के कानूनी स्वामित्व से जुड़े दस्तावेज पेश करने को भी कहा है. यह कंपनी एक संबंधित फर्म के शेयरों की मालिक बताई जा रही है.
कतर इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी की सहायक कंपनी ने दायर किया मामला
रवींद्रन के खिलाफ यह कानूनी लड़ाई कतर इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी (QIA) की एक सहायक कंपनी की ओर से लड़ी जा रही है. कतर के इस सॉवरेन वेल्थ फंड ने उस दौर में Byju’s में निवेश किया था, जब कंपनी वित्तीय दबाव और कर्मचारियों की छंटनी जैसी चुनौतियों से जूझ रही थी. इस हाई-प्रोफाइल मामले में कतर होल्डिंग्स की ओर से ‘Drew & Napier’ लॉ फर्म ने पैरवी की, जबकि बायजू इन्वेस्टमेंट्स का पक्ष ‘Fervent Chambers’ ने रखा.
अमेरिका में भी फंसा है अरबों डॉलर का विवाद
रवींद्रन की मुश्किलें सिर्फ सिंगापुर तक सीमित नहीं हैं. अमेरिका में भी कंपनी और उसके संस्थापक पर 1.2 बिलियन डॉलर के बड़े कर्ज विवाद को लेकर कानूनी दबाव बना हुआ है. कर्जदाता लंबे समय से अपने पैसे की वसूली के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं. एक समय भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम की सबसे बड़ी सफलता की कहानी मानी जाने वाली Byju’s अब लगातार वित्तीय संकट, निवेशकों के विवाद और कानूनी मामलों में उलझती जा रही है.
स्टार्टअप स्टार से कानूनी संकट तक का सफर
रवींद्रन ने ‘Think & Learn Pvt Ltd’ के जरिए भारतीय एडटेक सेक्टर में बड़ी पहचान बनाई थी. कंपनी ने तेजी से विस्तार करते हुए दुनिया भर के निवेशकों से अरबों डॉलर जुटाए और Byju’s देश की सबसे वैल्यूएबल स्टार्टअप कंपनियों में शामिल हो गई. हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में कंपनी पर बढ़ते कर्ज, कैश फ्लो संकट, कर्मचारियों की छंटनी और निवेशकों के साथ विवादों ने उसकी स्थिति को कमजोर कर दिया.
रवींद्रन कहां हैं? बना हुआ है सस्पेंस
सिंगापुर कोर्ट के इस बड़े फैसले के बाद अब तक बायजू रवींद्रन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. मीडिया के सवालों का भी उन्होंने जवाब नहीं दिया. सबसे बड़ी बात यह है कि फिलहाल किसी को यह स्पष्ट जानकारी नहीं है कि रवींद्रन इस समय सिंगापुर में हैं या किसी अन्य देश में, ऐसे में उनकी गिरफ्तारी और आगे की कानूनी प्रक्रिया को लेकर भी सस्पेंस बना हुआ है.
NSE की मई 2026 मार्केट पल्स रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय कंपनियों में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी घटकर 15.8 फीसदी रह गई है, जो पिछले 17 वर्षों का सबसे निचला स्तर है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में इस समय एक दिलचस्प तस्वीर देखने को मिल रही है. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) लगातार पैसा निकाल रहे हैं, लेकिन घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) की रिकॉर्ड खरीदारी बाजार को मजबूती से थामे हुए है. खास बात यह है कि मौजूदा हालात बिल्कुल साल 2003 जैसे संकेत दे रहे हैं, जब विदेशी निवेशकों की वापसी के बाद बाजार में ऐतिहासिक तेजी आई थी. ऐसे में अब निवेशकों की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराने वाला है.
17 साल के निचले स्तर पर पहुंची विदेशी हिस्सेदारी
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) की मई 2026 मार्केट पल्स रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय कंपनियों में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी घटकर 15.8 फीसदी रह गई है, जो पिछले 17 वर्षों का सबसे निचला स्तर है. पूरे वित्त वर्ष 2025-26 (FY26) के दौरान विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से करीब 19 अरब डॉलर की बिकवाली की. सबसे ज्यादा दबाव वित्त वर्ष की आखिरी तिमाही में देखने को मिला, जब कुल बिकवाली का लगभग 72 फीसदी हिस्सा इसी अवधि में हुआ.
मार्केट एक्सपर्ट्स के अनुसार, विदेशी निवेशकों के इस रुख के पीछे कई वैश्विक कारण हैं. दक्षिण कोरिया, ताइवान, जापान और हांगकांग जैसे एशियाई बाजार फिलहाल भारत की तुलना में ज्यादा सस्ते और आकर्षक दिखाई दे रहे हैं. वहीं अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स की बढ़ती यील्ड ने भी निवेशकों को इक्विटी बाजार से पैसा निकालकर सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर मोड़ दिया है. हालांकि, एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि 2020 के बाद से अब तक भारत में FPI निवेश की कुल वैल्यू में 18 फीसदी से ज्यादा की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ (CAGR) दर्ज की गई है.
घरेलू निवेशकों ने संभाला बाजार
विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली के बावजूद भारतीय शेयर बाजार में कोई बड़ी गिरावट नहीं आई. इसकी सबसे बड़ी वजह घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) की मजबूत खरीदारी रही. जहां FPIs ने FY26 में करीब 19.7 अरब डॉलर के शेयर बेचे, वहीं DII ने रिकॉर्ड 95.8 अरब डॉलर का निवेश किया. यानी घरेलू निवेशकों की खरीदारी विदेशी बिकवाली से लगभग पांच गुना ज्यादा रही. इसी मजबूत घरेलू नकदी प्रवाह ने बाजार को स्थिर बनाए रखा. नतीजतन, Q4FY26 तक कंपनियों में DII की हिस्सेदारी बढ़कर 19.6 फीसदी तक पहुंच गई, जो FPI हिस्सेदारी से भी अधिक है.
किन सेक्टर्स से दूर हो रहे विदेशी निवेशक?
विदेशी निवेशकों की रणनीति में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. अब वे उन NIFTY50 शेयरों से दूरी बना रहे हैं, जहां पहले से भारी निवेश मौजूद है. Ace Equity के आंकड़ों के मुताबिक, लगातार चार तिमाहियों से विदेशी निवेशक केवल चुनिंदा कंपनियों में ही हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं, जबकि 10 प्रमुख कंपनियों से लगातार पैसा निकाल रहे हैं.
सेक्टोरल स्तर पर इंडस्ट्रियल सेक्टर में सबसे ज्यादा बिकवाली हुई है. वहीं कंज्यूमर स्टेपल्स और आईटी सेक्टर में दबाव अपेक्षाकृत कम रहा. फाइनेंशियल सेक्टर में विदेशी निवेशकों का भरोसा अब भी बना हुआ है, जबकि कम्युनिकेशन सेक्टर में उनकी ओवरवेट पोजीशन लगातार 17वीं तिमाही तक कायम है.
2003 जैसा ऐतिहासिक संकेत क्यों अहम?
घरेलू निवेशकों की बढ़ती ताकत बाजार में एक बड़े ऐतिहासिक ट्रेंड की ओर इशारा कर रही है. यह लगातार छठी तिमाही है जब DII की हिस्सेदारी FPI से ज्यादा रही है. भारतीय शेयर बाजार के इतिहास में ऐसा आखिरी बार साल 2003 में देखने को मिला था. उस समय भी विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी कमजोर हुई थी, लेकिन बाद में उनकी जोरदार वापसी ने बाजार में अगले 12 महीनों के भीतर करीब 70 फीसदी की तेजी ला दी थी.
क्या फिर लौटेगी बड़ी तेजी?
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इतिहास हमेशा खुद को पूरी तरह नहीं दोहराता, लेकिन मौजूदा परिस्थितियां भविष्य में विदेशी निवेशकों की मजबूत वापसी की जमीन जरूर तैयार कर रही हैं. अगर आने वाले समय में भारतीय कंपनियों की कमाई मजबूत रहती है और शेयरों का वैल्युएशन आकर्षक बना रहता है, तो विदेशी निवेशक दोबारा भारतीय बाजार की ओर रुख कर सकते हैं. ऐसे में बाजार में एक और बड़ी तेजी देखने को मिल सकती है.
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि अगर इन आदेशों के तहत अमेजन से कोई रकम जमा कराई गई थी या वसूली गई थी, तो उसे आठ सप्ताह के भीतर वापस किया जाए.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अमेरिकी ई-कॉमर्स कंपनी अमेजन को फ्यूचर ग्रुप डील मामले में सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है. शीर्ष अदालत ने भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग और राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें अमेजन पर 202 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया था और फ्यूचर ग्रुप के साथ उसकी निवेश डील पर रोक लगाई गई थी. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से अमेजन को लंबे समय से चल रहे कानूनी विवाद में अहम राहत मिली है.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण का 13 जून 2022 का आदेश और भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग का 17 दिसंबर 2021 का फैसला रद्द किया जाता है. अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि अगर इन आदेशों के तहत अमेजन से कोई रकम जमा कराई गई थी या वसूली गई थी, तो उसे आठ सप्ताह के भीतर वापस किया जाए.
क्या था पूरा मामला?
यह विवाद अमेजन और फ्यूचर ग्रुप के बीच 2019 में हुए निवेश समझौते से जुड़ा है. अमेजन ने फ्यूचर कूपंस प्राइवेट लिमिटेड में 49 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदी थी, जो फ्यूचर रिटेल लिमिटेड की प्रवर्तक कंपनी थी.
भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग ने दिसंबर 2021 में आरोप लगाया था कि अमेजन ने डील से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां छिपाईं और निवेश के रणनीतिक उद्देश्यों का पूरा खुलासा नहीं किया. इसके बाद नियामक ने डील की मंजूरी निलंबित कर दी थी और अमेजन पर 202 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था.
अपीलीय न्यायाधिकरण ने भी बरकरार रखा था फैसला
जून 2022 में राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण ने भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के फैसले को सही ठहराते हुए अमेजन की अपील खारिज कर दी थी. न्यायाधिकरण ने कहा था कि कंपनी ने फ्यूचर रिटेल से जुड़ी अपनी रणनीतिक योजनाओं और डील के वास्तविक उद्देश्य का पूरा खुलासा नहीं किया. न्यायाधिकरण ने प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 के तहत लगाए गए जुर्माने को भी बरकरार रखा था.
अमेजन की दलील क्या थी?
अमेजन का कहना था कि उसने निवेश से जुड़े सभी जरूरी दस्तावेज और जानकारी भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के सामने पेश की थी. कंपनी ने आरोपों को गलत बताते हुए कहा था कि डील के बारे में कोई तथ्य छिपाया नहीं गया. इसी के खिलाफ अमेजन सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था, जहां अब उसे राहत मिल गई है.
फ्यूचर ग्रुप और आयोग ने क्या कहा था?
भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग और फ्यूचर ग्रुप ने अदालत में दलील दी थी कि अमेजन ने डील के आर्थिक और रणनीतिक उद्देश्यों को पूरी तरह स्पष्ट नहीं किया था. नियामक का कहना था कि कंपनी ने फ्यूचर रिटेल में अपनी वास्तविक रणनीतिक रुचि को छिपाया. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अब दोनों आदेशों को रद्द करते हुए अमेजन के पक्ष में फैसला सुनाया है.
लंबे विवाद में अमेजन को राहत
अमेजन और फ्यूचर ग्रुप के बीच यह विवाद भारतीय कॉरपोरेट जगत के सबसे चर्चित कानूनी मामलों में शामिल रहा है. सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से अमेजन को बड़ी राहत मिली है और कंपनी पर लगा भारी जुर्माना भी हट गया है.