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चाबहार पोर्ट को लेकर होने वाले समझौते से भारत को होने जा रहे हैं कई फायदे…ये है मकसद

चाबहार पोर्ट को लेकर इससे पहले 2016 में सरकार की ओर से एक समझौता किया गया था. लेकिन उस समझौते की अपनी सीमाएं थी. इस बार अगले 10 सालों के लिए सरकार समझौता कर रही है. 

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago

ईरान में बने चाबहार पोर्ट को लेकर भारत सरकार आज एक अहम कदम उठाने जा रही है. भारत सरकार इस पोर्ट का मैनेजमेंट अपने हाथों में लेने को लेकर समझौते पर हस्‍ताक्षर करने जा रही है.इससे पहले पीएम मोदी के 2016 में ईरान दौरे के समय ये समझौता किया था. इस समझौते के जरिए सरकार सेंट्रल एशिया तक अपने कारोबार को और आसान बनाने की तैयारी कर रही है. जानकारों का मानना है कि ये भारत सरकार का एक अहम रणनीतिक कदम साबित हो सकता है. 

आज होने जा रहा है ये अहम समझौता 
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, आज इसे लेकर अहम समझौता हो जाएगा. ईरान में बना चाबहार पोर्ट रणनीतिक मकसद से एक अहम पोर्ट है. ये पोर्ट जहां अपनी लोकेशन के कारण कई मायनों में अहम है तो वहीं दुनिया से कारोबार को और बढ़ाने और उसे जल्‍द से जल्‍द भारत में पहुंचाने को लेकर ये काफी अहम साबित हो सकता है. इसी का नतीजा है कि इस समझौते को करने के लिए लोकसभा चुनाव के व्‍यस्‍त कार्यक्रम के बीच शिपिंग मंत्री सर्वानंद सोनोवाल ईरान के लिए रवाना हो चुके हैं. जहां वो इस समझौते को आगे बढ़ाएंगे. आज समझौता होने के बाद इसका मैनेजमेंट पूरी तरह से भारत के पास आ जाएगा और भारत इसका प्रबंधन संभालेगा. 

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आखिर भारत की क्‍या है तैयारी 
सबसे अहम बात है कि इस पोर्ट को लेकर होने वाला समझौता क्‍यों अहम है. दरअसल भारत इस पोर्ट के जरिए सेंट्रल एशिया तक अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए करना चाहता है. इस पोर्ट के जरिए भारत सीआईएस (कॉमनवेल्‍थ इंडीपेंडेंट देशों) तक पहुंचने के लिए नॉर्थ-साउथ परिवहन गलियारे को विकसित करना चाहता है. भारत इससे पहले 2016 में भी इस पोर्ट को लेकर ईरान के साथ समझौता कर चुका है. लेकिन उसमें भारत के पास ज्‍यादा अधिकार नहीं थे. उस समझौते में भारत के पास केवल शहीद बेहेस्‍ती टर्मिनल का विकास करना था. 2016 में ये समझौता भारत, ईरान, और अफगानिस्‍तान के बीच हुआ था. ये समझौता एक साल में रिन्‍यू होता था लेकिन इस बार होने वाला समझौता अगले 10 सालों के लिए होने वाला है.  

चाबहार से कैसी है कनेक्टिविटी? 
चाबहार पोर्ट एक ऐसी लोकेशन पर मौजूद है जहां से सेंट्रल एशिया और साउथ एशिया क्षेत्र के बीच में कारोबार को बेहतर तरीके से कनेक्‍ट किया जा सकता है. ये पोर्ट महज कारोबार को ही और बेहतर बनाने में मददगार साबित नहीं हो सकता है बल्कि लोगों को आपस में जोड़ने में भी मदद करता है. इससे लॉजिस्टिक नेटवर्क को भी आसानी से जोड़ा जा सकता है. भारत का मानना है कि ये पोर्ट रीजनल और इंटरनेशनल ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर को आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है. इस समझौते का मकसद यहां कानूनी राज स्‍थापित करने से लेकर समन्‍यव स्‍थापित करना भी है 

बेहद अहम है ये समझौता 

विदेश मामलों के जानकार संजीव श्रीवास्‍तव कहते हैं कि ये समझौता भारत और ईरान के संबंधों के लिहाज से बेहद अहम है. भारत पहले से चाबहार पोर्ट को विकसित कर रहा था लेकिन अब वो इसका प्रबंधन भी कर पाएगा. ऐसा पहली बार हो रहा है जब भारत विदेश के किसी भी पोर्ट का प्रबंधन करने जा रहा है. संजीव श्रीवास्‍तव कहते हैं कि ये समझौता भारत और ईरान के गहरे होते संबंधों को भी दर्शाता है. ऐसी रिपोर्ट भी हैं कि इस चाबहार पोर्ट को इंटरनेशन नॉर्थ साउथ फ्रेट कॉरिडोर से भी जोड़ा जाएगा, अगर ऐसा होता है तो भारत की कनेक्टिविटी मध्‍य एशिया और रूस तक हो जाएगी.

मुझे लगता है कि इसका सबसे बड़ा लाभ अफगानिस्‍तान को मिलने जा रहा है. अभी तक भारत को पाकिस्‍तान के साथ तनावपूर्ण रिश्‍तों के कारण अफगानिस्‍तान में एक्‍सेस नहीं मिल पाता था. लेकिन अब ऐसा नहीं होगा और भारत की अफगानिस्‍तान तक पहुंच आसान हो जाएगी. चाबहार का जिस तरह से निर्माण किया है और अब उसका प्रबंधन किया है उससे ये पता चलता है कि भारत के रिश्‍ते मीडिल ईस्‍ट में बेहतर और मजबूत हो रहे हैं. आज भारत के सउदी अरब, ईरान जैसे देशों के साथ मजबूत हो रहे हैं. 

भारत की इस उपलब्धि से लगेगा चीन को झटका 

The Imagindia Institute के अध्‍यक्ष और विदेश मामलों के जानकार रोबिन्‍द्र सचदेव कहते हैं कि ईरान के चाबहार पोर्ट को लेकर 10 साल के लिए होने वाला ये समझौता बेहद अहम है. ऐसा पहली बार होने जा रहा है कि जब भारत पहली बार विदेश में किसी पोर्ट को मैनेज करने जा रहा है. इस पोर्ट का प्रबंधन मिलने से भारत की एंट्री सेंट्रल एशिया और रशिया तक कारोबार करने को लेकर हो जाएगी. यही नहीं इस उपलब्धि से भारत यूरोप तक आसानी से कारोबार कर पाएगा और स्विस कैनाल के बावजूद यूरोप पहुंचने में हमारे जहाजों को 15 दिन कम लगेंगे.

इस चाबहार पोर्ट की ये भी उपलब्धि है कि हम चाइना के बीआरएस प्रोजेक्‍ट को भी बायपास कर लेंगे. जैसा कि हम जानते हैं कि चाइना ईरान के साथ संबंध बढ़ाकर अपने प्रभाव को और मजबूत करने की कोशिश कर रहा है. बावजूद चीन की इस कोशिश के चाबहार पोर्ट का टेंडर भारत को टेंडर मिलना बड़ी बात है.  मौजूदा समय में दुनिया की जियोपालिटिक्‍स जिस तरीके से चल रही है उसमें तेहरान को लेकर तनाव है और अमेरिका-ईरान के बीच तनाव है, उसे देखते हुए ये समझौता और अहम हो जाता है. भारत ईरान के संबंध मजबूत हो रहे हैं. हर देश अपना पार्टनर ढूढ रहा है. उसे जो ठीक लगता है वो उसके साथ काम कर रहा है. 

 


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