सरकार के आंकड़ों से साफ है कि प्रत्यक्ष कर संग्रह में स्थिर वृद्धि जारी है. यह न केवल अर्थव्यवस्था की मजबूती को दर्शाता है, बल्कि सरकार के राजस्व लक्ष्यों की दिशा में एक उत्साहजनक संकेत भी है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
कॉरपोरेट कर संग्रह में मजबूती और रिफंड दर में कमी के चलते सरकार का शुद्ध प्रत्यक्ष कर राजस्व चालू वित्त वर्ष में 7 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 12.92 लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुंच गया है. वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 1 अप्रैल से 10 नवंबर 2025 के बीच शुद्ध कॉरपोरेट कर संग्रह लगभग 5.37 लाख करोड़ रुपये रहा, जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह 5.08 लाख करोड़ रुपये था. इसी अवधि में व्यक्तियों और एचयूएफ (HUF) सहित गैर-कॉरपोरेट कर संग्रह लगभग 7.19 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा, जो बीते वर्ष 6.62 लाख करोड़ रुपये था.
रिफंड जारी करने की दर में 18% की गिरावट
रिपोर्ट के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष में अब तक रिफंड जारी करने की दर 18 प्रतिशत घटकर 2.42 लाख करोड़ रुपये से कुछ अधिक रही. यह कमी कुल शुद्ध कर संग्रह में वृद्धि का एक बड़ा कारण मानी जा रही है.
एसटीटी संग्रह में मामूली गिरावट
समीक्षाधीन अवधि में प्रतिभूति लेनदेन कर (STT) संग्रह 35,682 करोड़ रुपये दर्ज किया गया, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 35,923 करोड़ रुपये से थोड़ा कम है.
सरकार का वार्षिक लक्ष्य और अनुमान
रिफंड समायोजित करने से पहले सकल प्रत्यक्ष कर संग्रह चालू वित्त वर्ष में 15.35 लाख करोड़ रुपये से अधिक रहा, जो बीते वर्ष की तुलना में 2.15 प्रतिशत अधिक है. सरकार ने पूरे वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 25.20 लाख करोड़ रुपये के प्रत्यक्ष कर संग्रह का लक्ष्य रखा है, जो पिछले वर्ष से लगभग 12.7 प्रतिशत अधिक है. साथ ही, सरकार ने एसटीटी से 78,000 करोड़ रुपये जुटाने का अनुमान लगाया है.
विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले वर्ष ब्याज दरों में कमी के बावजूद गैर-कॉरपोरेट कर संग्रह में निरंतर वृद्धि एक सकारात्मक संकेत है. यह दर्शाता है कि देश में आय स्तर में मजबूत वृद्धि जारी है.
टाटा विवाद के केंद्र में 18% हिस्सेदारी और इसके इर्द-गिर्द परिवारों, दोस्तों, वकीलों और निदेशकों का असाधारण नेटवर्क
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
भारत के प्रमुख कारोबारी परिवारों की कहानी, जिनके हाथों में ताकत है, साथ ही उन पेशेवरों की, जिन्होंने दशकों तक उनकी मेजों पर बैठकर काम किया है.
17 सितंबर को टाटा संस के बोर्ड ने अपने चेयरमैन एन चंद्रशेखरन को पांच और वर्षों के लिए पद पर बनाए रखने और भारत की सबसे प्रतिष्ठित निजी कंपनी को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करने की तैयारी करने के पक्ष में मतदान किया. टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा, जिनके ट्रस्ट के पास कंपनी की दो-तिहाई हिस्सेदारी है, ने इसके खिलाफ वोट किया. बोर्ड में ट्रस्ट्स के दूसरे प्रतिनिधि ने इसके पक्ष में वोट किया. रात होते-होते ट्रस्ट्स ने पूरे मतदान को अवैध घोषित कर दिया. और लगभग कोई भी उस चीज के बारे में बात नहीं कर रहा था, जिसने इस पूरे मामले को इतना महत्वपूर्ण बनाया: टाटा संस में 18.37% हिस्सेदारी, जो एक ऐसे परिवार के पास है जिसे पैसों की सख्त जरूरत है.
यह हिस्सेदारी शापूरजी पालोनजी समूह के पास है, वह परिवार जिसने कभी टाटा संस को साइरस मिस्त्री के रूप में चेयरमैन दिया था और 2016 में टाटा द्वारा उन्हें पद से हटाए जाने को देखा. टाटा संस का मूल्य करीब 12 लाख करोड़ रुपये आंका जाए तो मिस्त्री परिवार की हिस्सेदारी करीब 2.2 लाख करोड़ रुपये की है, जो इसे भारतीय कारोबार की सबसे मूल्यवान संपत्तियों में से एक बनाती है. लेकिन यह ऐसी संपत्ति भी है जिसे शापूर या मिस्त्री परिवार खर्च नहीं कर सकता, क्योंकि यह एक ऐसी कंपनी में फंसी हुई है जिसका शेयर बाजार में कोई भाव नहीं है और जिससे निकलने का कोई आसान रास्ता नहीं है. दूसरी ओर टाटा ट्रस्ट्स हैं, जिनके पास टाटा संस की करीब दो-तिहाई हिस्सेदारी है और जो इसे निजी कंपनी बनाए रखना चाहते हैं.
इन दोनों के बीच आरबीआई का एक फैसला, बोर्ड का एक मतदान, चेयरमैन का दूसरा कार्यकाल और वह सवाल है, जिसे मुंबई के डिनर टेबलों पर वर्षों से बेहद शालीनता से टाला जाता रहा है: क्या टाटा संस को सूचीबद्ध होना चाहिए?
यह कहानी लिस्टिंग की नहीं है. यह इस बारे में है कि किसे इसकी जरूरत है, किसे नहीं है और जब यह फैसला लिया जाता है तो मेज के आसपास कौन बैठता है. मुंबई के कॉरपोरेट जंगल में कमरे में मौजूद लोग शायद ही कभी अजनबी होते हैं. यह किसी साजिश का चार्ट नहीं है और किसी पर डोर खींचने का आरोप लगाने की जरूरत नहीं है. डोर पहले से दिखाई दे रहे हैं.
18%
शुरुआत पैसे से करते हैं.
एसपी ग्रुप की हिस्सेदारी स्टर्लिंग इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन और साइरस इन्वेस्टमेंट्स के जरिए रखी गई है और इसे कर्ज के बदले गिरवी रखा गया है.
इस गिरवी का लंबा इतिहास है. 2020 में समूह की मुख्य होल्डिंग कंपनी पर करीब 9,280 करोड़ रुपये का बाहरी कर्ज था, जबकि पूरे समूह का कर्ज 30,000 करोड़ रुपये से अधिक आंका गया था. उसी साल खबरें आई थीं कि रतन टाटा मिस्त्री परिवार की हिस्सेदारी खरीदने के लिए किसी साझेदार की तलाश कर रहे थे और एसपी ग्रुप ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि 70 साल से अधिक समय बाद अब टाटा समूह से अलग होने का समय आ गया है. तब भी बाधा स्पष्ट थी. एक प्रॉक्सी एडवाइजर ने कहा था कि टाटा समूह को कोई जल्दबाजी नहीं थी, जबकि एसपी ग्रुप को पैसों की सख्त जरूरत थी.
यह अलगाव कभी नहीं हुआ.
कर्ज भी खत्म नहीं हुआ. 2022 में एरेस एसएसजी और फैरालॉन ने टाटा संस के शेयरों के बदले समूह को 15,000 करोड़ रुपये तक का कर्ज देने पर सहमति जताई, जिसकी ब्याज दर 24% सालाना थी. इसका इस्तेमाल भारतीय बैंकों का कर्ज चुकाने के लिए किया जाना था. इस जुलाई में समूह ने 21,500 करोड़ रुपये का पुनर्वित्त पूरा किया और निवेशकों को बताया कि वह 18 महीनों के भीतर लिस्टिंग या शेयर बिक्री के जरिए टाटा संस की अपनी हिस्सेदारी के एक हिस्से को नकदी में बदल देगा.
यही केंद्रीय तनाव है. एसपी ग्रुप को नकदी चाहिए. टाटा ट्रस्ट्स लिस्टिंग नहीं चाहते.
बाहर निकलने का शांत रास्ता एक छोटी बिक्री थी. एसपी ग्रुप ने नोएल टाटा के साथ टाटा संस की करीब 2.5% हिस्सेदारी बेचने पर चर्चा की थी. इसके लिए बैंक या वित्तीय संस्थान को शामिल करते हुए कर-कुशल ढांचे का इस्तेमाल किया जाना था. इससे मिलने वाली रकम धीरे-धीरे एसपी ग्रुप तक पहुंचती और टाटा संस शायद पूरी तरह लिस्टिंग से बच जाता. यह प्रस्ताव टाटा संस में अटक गया और आरबीआई के निर्देश के बाद ही बोर्ड तक पहुंचा, जिसने लिस्टिंग को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया.
यहीं से कहानी व्यक्तिगत हो जाती है. 17 सितंबर को टाटा संस की बोर्ड बैठक में नोएल टाटा ने मिस्त्री परिवार को एक प्रस्ताव दिया: टाटा संस उनके इतने शेयर वापस खरीद लेगा कि उन्हें कम से कम 25,000 करोड़ रुपये मिल जाएं. यह भुगतान 18 महीनों में दो किस्तों में किया जाता. परिवार को उसका पैसा मिल जाता. टाटा संस निजी कंपनी बना रहता. ट्रस्ट्स का नियंत्रण कायम रहता.
नोएल टाटा उन ट्रस्ट्स के चेयरमैन हैं जो लिस्टिंग का विरोध करते हैं. वह साइरस मिस्त्री की बहन से विवाहित भी हैं. उनका प्रस्ताव एक साथ दोनों परिवारों को संतुष्ट करने की कोशिश था. मिस्त्री परिवार पहले ही अपना मन बना चुका था: छोटी हिस्सेदारी की बिक्री में देरी के बाद उसने लिस्टिंग के पक्ष में आना चुना, जिससे वह अपनी हिस्सेदारी को नकदी में बदल सकता था और अपने कर्ज को आसानी से संभाल सकता था. बोर्ड ने उसी दिन नोएल को जवाब दिया और लिस्टिंग के पक्ष में मतदान किया.
इसके बाद आने वाला हर संबंध उसी 18% हिस्सेदारी तक पहुंचता है.
बिक्री से पहले की बिक्री
18% हिस्सेदारी पहली एसपी संपत्ति नहीं है जिसे खरीदार की जरूरत पड़ी, और आखिरी बड़ा खरीदार एक जाना-पहचाना नाम था.
अक्टूबर 2021 में रिलायंस की एक सहायक कंपनी ने शापूरजी पालोनजी एंड कंपनी, दारूवाला परिवार और स्टर्लिंग एंड विल्सन सोलर के साथ चरणबद्ध तरीके से सोलर कंपनी में 40% हिस्सेदारी खरीदने पर सहमति जताई. कर्ज कम करने के लिए यह एक महीने में एसपी ग्रुप की दूसरी बड़ी संपत्ति बिक्री थी. इससे पहले यूरेका फोर्ब्स को एडवेंट इंटरनेशनल ने 4,400 करोड़ रुपये में खरीदा था.
शापूर मिस्त्री ने रिलायंस का कंपनी में स्वागत किया.
जिस कर्ज का बोझ अब 18% हिस्सेदारी पर है, उसी ने पहले भी एसपी की संपत्तियों को बिक्री के लिए बाजार में पहुंचाया था और रिलायंस पहले ही एक खरीदार बन चुका था.
शादियां
मुंबई के कारोबारी परिवार सिर्फ एक-दूसरे के साथ कारोबार नहीं करते. वे एक-दूसरे के परिवारों में भी शादी करते हैं.
नोएल टाटा की पत्नी आलू, साइरस मिस्त्री की बहन हैं. इसका मतलब है कि टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन उस परिवार के बहनोई हैं, जिसके पास 18% हिस्सेदारी है. इसका मतलब यह भी है कि वह साइरस के बेटों, फिरोज और जहान के मामा हैं, जिन्हें मिस्त्री परिवार की हिस्सेदारी में साइरस का आधा हिस्सा विरासत में मिला. ट्रस्ट्स की लिस्टिंग के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व करने वाला व्यक्ति उन युवा वारिसों का मामा है, जिन्हें लिस्टिंग से फायदा होने की संभावना है.
अजय पीरामल के बेटे आनंद ने 2018 में ईशा अंबानी से शादी की, जिससे मुकेश अंबानी और अजय पीरामल समधी बन गए. यहां यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके बाद के वर्षों में पीरामल कहां रहे.
और करण अडानी ने पारिधि श्रॉफ से शादी की, जो सिरिल श्रॉफ की बेटी हैं. सिरिल श्रॉफ की लॉ फर्म अब 18% हिस्सेदारी के भविष्य को लेकर चल रही लड़ाई में टाटा ट्रस्ट्स को सलाह दे रही है.
बोर्डरूम
2016 में टाटा ने घोषणा की कि अजय पीरामल और वेणु श्रीनिवासन टाटा संस के बोर्ड में गैर-कार्यकारी निदेशक के रूप में शामिल हुए हैं. पीरामल को 2019 में दूसरा तीन साल का कार्यकाल मिला. वर्षों तक मुकेश अंबानी की बेटी के ससुर उस बोर्ड में बैठे रहे, जिसे एक दिन 18% हिस्सेदारी के साथ क्या करना है, यह तय करना था.
टीवीएस के चेयरमैन श्रीनिवासन इस सवाल के दोनों पक्षों में हैं. वह टाटा संस बोर्ड में ट्रस्ट्स के नामित सदस्य और टाटा ट्रस्ट्स के ट्रस्टी हैं. पिछले अक्टूबर में सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट ने उनके ट्रस्टी पद का नवीनीकरण किया और उन्हें आजीवन ट्रस्टी बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया. जब लिस्टिंग के लिए मतदान हुआ, तो वही व्यक्ति अपने चेयरमैन से अलग जाकर वोट करने वाला था.
पुराने दोस्त
कुछ रिश्ते कभी शेयरधारकों के रजिस्टर में दिखाई नहीं देते, लेकिन फिर भी यह तय करते हैं कि कौन किसके साथ खड़ा है.
जब सितंबर 2022 में एक सड़क दुर्घटना में साइरस मिस्त्री की मौत हुई, तो शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले ने ट्वीट किया कि उनके भाई साइरस का निधन हो गया. द ट्रिब्यून ने उन्हें उन कुछ लोगों में बताया जो बोर्डरूम की लड़ाई के दौरान उनके साथ खड़े रहे थे और सबसे पहले शोक व्यक्त करने वालों में शामिल थीं.
फिर हैं मेहली मिस्त्री, जो साइरस के फर्स्ट कजिन हैं और रतन टाटा के करीबी विश्वासपात्र बने तथा उनके अंतिम वर्षों में उनकी देखभाल में मदद की. अक्टूबर 2024 में रतन टाटा के निधन के बाद मेहली को वकील डेरियस खंबाटा और टाटा की सौतेली बहनों, शिरीन और डियाना जेजीभॉय के साथ उनकी वसीयत का एक्जीक्यूटर बनाया गया.
खंबाटा, जो महाराष्ट्र के पूर्व एडवोकेट जनरल रह चुके हैं, ने कभी रतन टाटा और साइरस मिस्त्री के बीच मध्यस्थता की थी, जैसा कि बिजनेसवर्ल्ड ने रिपोर्ट किया था. जुलाई में खबरें आई थीं कि नवंबर में उनका ट्रस्टी कार्यकाल समाप्त होने के बाद वह हट सकते हैं. लेकिन पिछले साल ट्रस्ट्स को लिखे एक पत्र में उन्होंने एक ऐसे पल को याद किया, जो अब एक त्रासदी की शुरुआत जैसा लगता है: रतन टाटा की मौत के बाद मेहली मिस्त्री ने नोएल टाटा को ट्रस्ट्स का चेयरमैन बनाने का प्रस्ताव रखा और खंबाटा ने इसका समर्थन किया.
एक साल बाद नोएल टाटा, वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह ने मेहली की दो प्रमुख ट्रस्ट्स में पुनर्नियुक्ति का विरोध किया, जो टाटा संस की बहुमत हिस्सेदारी को नियंत्रित करती हैं. मेहली का कार्यकाल समाप्त हो गया. जिस व्यक्ति ने नोएल का नाम प्रस्तावित किया था, उसे नोएल के वोट के साथ ही बाहर कर दिया गया.
आरबीआई की मेज
लिस्टिंग की लड़ाई अपने मौजूदा चरण तक पहुंचने से बहुत पहले वही कॉरपोरेट दुनिया रिजर्व बैंक की केंद्रीय मेज पर मौजूद थी.
जब एस. गुरुमूर्ति 2018 में आरबीआई बोर्ड में शामिल हुए, तब एन चंद्रशेखरन पहले से ही सदस्य थे. गुरुमूर्ति चेन्नई के चार्टर्ड अकाउंटेंट, तमिल साप्ताहिक तुगलक के संपादक और व्यापक रूप से आरएसएस के प्रमुख विचारक के रूप में जाने जाते हैं. कुछ महीने बाद शक्तिकांत दास गवर्नर बने. भुवनेश्वर में जन्मे दास ने अपने आईएएस करियर का बड़ा हिस्सा तमिलनाडु कैडर में बिताया था, जिसमें राज्य के उद्योग विभाग के प्रधान सचिव के रूप में काम करना भी शामिल था. 2022 में सरकार ने आनंद महिंद्रा, वेणु श्रीनिवासन, पंकज पटेल और रवींद्र ढोलकिया को बोर्ड में शामिल किया. इससे एक और चेन्नई के उद्योगपति और टाटा ट्रस्ट्स के ट्रस्टी इस मेज पर आ गए.
दास ने दिसंबर 2024 में मिंट स्ट्रीट छोड़ी और अब प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव-2 के रूप में कार्यरत हैं. टाटा संस के लिए सबसे महत्वपूर्ण फैसला बाद में उनके उत्तराधिकारी के कार्यकाल में आया, जब आरबीआई ने टाटा संस को अपना पंजीकरण छोड़ने और उस नियम से बचने की अनुमति देने से इनकार कर दिया, जिसके तहत उसे सूचीबद्ध होना जरूरी है.
वकील
मुंबई का कानूनी जगत इससे भी छोटा है.
सिरिल श्रॉफ, जिन्होंने अंबानी से लेकर अडानी तक भारत के ज्यादातर अरबपति परिवारों को सलाह दी है, व्यक्तिगत रूप से नोएल टाटा और ट्रस्ट्स को सलाह दे रहे हैं. उनकी टीम में भारत वासनी भी हैं, जो 17 वर्षों से अधिक समय से टाटा संस के ग्रुप जनरल काउंसल हैं. वरिष्ठ अधिवक्ता अस्पी चिनॉय, जनक द्वारकादास, अभिषेक मनु सिंघवी और मुकुल रोहतगी के भी इसी पक्ष में रहने की खबर है.
दूसरी ओर शुभा मंडल हैं. सिरिल श्रॉफ के भाई द्वारा संचालित शार्दुल अमरचंद मंगलदास में उन्होंने 2016 में साइरस मिस्त्री को हटाए जाने के समय टाटा संस को सलाह दी थी और बाद में समूह के जनरल काउंसल बने. इससे पहले AZB & Partners में उनके ग्राहकों में रिलायंस शामिल था. उनकी फर्म एनाग्राम पार्टनर्स अब टाटा संस और चंद्रशेखरन का प्रतिनिधित्व करती है.
फिर हरीश साल्वे हैं, जो वर्षों से रिलायंस की ओर से पेश होते रहे हैं और साइरस मिस्त्री के खिलाफ टाटा संस की ओर से दलीलें दे चुके हैं. अब वह टाटा संस और चंद्रा को सलाह देते हैं और सार्वजनिक रूप से यह तर्क दे चुके हैं कि टाटा संस को एक सार्वजनिक कंपनी बनना चाहिए, जो वही नतीजा है जिसे 18% हिस्सेदारी रखने वाले परिवार अब चाहते हैं.
इस तरह दो भाई ऐसी प्रतिद्वंद्वी फर्में चलाते हैं जो एक ही बोर्डरूम में एक-दूसरे के विरोधी पक्षों में रह चुकी हैं. टाटा के दो पूर्व जनरल काउंसल विरोधी खेमों को सलाह दे रहे हैं. ट्रस्ट्स के वकील अडानी परिवार के समधी हैं और टाटा संस के वकीलों के रिज्यूमे में रिलायंस भी है.
मतदान
17 सितंबर को टाटा संस के बोर्ड ने चंद्रशेखरन को फरवरी 2027 से पांच और वर्षों के लिए कार्यकारी चेयरमैन के रूप में फिर से नियुक्त करने और लिस्टिंग की दिशा में कदम उठाने के पक्ष में 4-1 से मतदान किया.
नोएल टाटा ने दोनों प्रस्तावों के खिलाफ वोट किया, जबकि ट्रस्ट्स के दूसरे नामित सदस्य वेणु श्रीनिवासन ने पक्ष में मतदान किया. ट्रस्ट्स के अपने निदेशक भी बंट गए. इसके बाद ट्रस्ट्स ने मतदान को अमान्य घोषित कर दिया और तर्क दिया कि उनके नामित सदस्यों की सकारात्मक मंजूरी जरूरी थी.
पांच दिन बाद शरद पवार ने सार्वजनिक रूप से ट्रस्ट्स का समर्थन किया और कहा कि उनके अधिकारों और समूह के धर्मार्थ स्वामित्व की रक्षा की जानी चाहिए. जिस परिवार ने साइरस मिस्त्री को भाई की तरह शोक मनाया था, वही अब उस ट्रस्ट्स का बचाव कर रहा था, जिसके चेयरमैन उनके बहनोई हैं, जबकि साइरस का अपना परिवार उस लिस्टिंग के पक्ष में था, जिसका ट्रस्ट्स विरोध कर रहे थे. पवार की राजनीति एक अलग कहानी है. और वह अच्छी तरह जानते हैं कि मौजूदा सरकार शायद उससे बिल्कुल उलट चाहती हो, जिसका वह प्रस्ताव कर रहे हैं.
घटनाक्रम
पूरी समयरेखा को एक साथ रखने पर यह अपने आप में एक कहानी बताती है.
2016: साइरस मिस्त्री को टाटा संस के चेयरमैन पद से हटाया गया. अजय पीरामल और वेणु श्रीनिवासन टाटा संस के बोर्ड में शामिल हुए.
2018: गुरुमूर्ति आरबीआई बोर्ड में शामिल हुए, जहां चंद्रशेखरन पहले से सदस्य थे. शक्तिकांत दास गवर्नर बने. ईशा अंबानी ने आनंद पीरामल से शादी की.
2020: एसपी ग्रुप ने कहा कि अब टाटा से अलग होने का समय आ गया है. खबरों के मुताबिक रतन टाटा मिस्त्री परिवार की हिस्सेदारी के लिए खरीदार की तलाश कर रहे थे.
2021: रिलायंस ने एसपी की स्टर्लिंग एंड विल्सन सोलर में हिस्सेदारी खरीदी.
2022: एसपी ग्रुप ने टाटा संस के शेयरों के बदले 24% ब्याज पर कर्ज लिया. वेणु श्रीनिवासन आरबीआई बोर्ड में शामिल हुए. साइरस मिस्त्री की मौत हुई.
अक्टूबर 2024: रतन टाटा का निधन हुआ. मेहली मिस्त्री के प्रस्ताव और डेरियस खंबाटा के समर्थन से नोएल टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन बने.
अक्टूबर 2025: मेहली मिस्त्री को ट्रस्ट्स से बाहर कर दिया गया.
जुलाई 2026: एसपी ग्रुप ने 21,500 करोड़ रुपये का पुनर्वित्त पूरा किया और 18 महीनों के भीतर टाटा संस की अपनी हिस्सेदारी को नकदी में बदलने का वादा किया.
सितंबर 2026: आरबीआई ने टाटा संस की डीरजिस्ट्रेशन की कोशिश को खारिज कर दिया. एसपी ग्रुप ने लिस्टिंग का समर्थन किया. नोएल टाटा ने 25,000 करोड़ रुपये के बायबैक का प्रस्ताव दिया. बोर्ड ने चंद्रशेखरन को 4-1 से फिर नियुक्त किया, जिसमें नोएल ने विरोध किया और वेणु ने समर्थन किया. ट्रस्ट्स ने मतदान को अमान्य घोषित कर दिया. शरद पवार ने ट्रस्ट्स का समर्थन किया.
संबंध साफ दिखाई देते हैं
क्या यह सिर्फ एक जटिल स्वामित्व ढांचे की वह प्रक्रिया थी, जो आखिरकार नियमन से टकरा गई? या मेज के आसपास मौजूद लोगों के पास 18% हिस्सेदारी के भविष्य को लेकर बिल्कुल अलग विचार थे?
रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं दिखता कि किसी ने कुछ योजना बनाई थी और ये संबंध हर दिशा में फैले हुए हैं. ट्रस्ट्स के अपने नामित सदस्यों ने अलग-अलग वोट दिए. ट्रस्ट्स के चेयरमैन ने अपने रिश्तेदारों को ऐसा रास्ता दिया, जिससे टाटा संस निजी बनी रहती; उन्होंने बाजार का रास्ता चुना. पवार परिवार ने एक मिस्त्री के निधन पर शोक जताया और ट्रस्ट्स का समर्थन किया. वकीलों ने सभी के लिए काम किया है.
18% हिस्सेदारी का पीछा कीजिए और यह आपको मुंबई के आधे से अधिक अभिजात कारोबारी वर्ग तक ले जाती है: उनकी शादियों, उनके बोर्डरूम, उनके केंद्रीय बैंक, उनकी अदालतों और उनके अंतिम संस्कारों तक.
क्लब छोटा है. हिस्सेदारी बड़ी है. और ये संबंध हमेशा से सबके सामने रहे हैं. टाटा क्लब उन वंशानुगत कारोबारी अभिजात वर्ग की कहानी है, जिनके हाथों में सारी ताकत है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
SEBI ने REIT और InvIT की यूनिट्स पर डिपॉजिटरी रिसीट जारी करने की भी मंजूरी दी है. इसका उद्देश्य इन निवेश साधनों में विदेशी पूंजी की भागीदारी बढ़ाने से जुड़ा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (PMS) से जुड़े नियमों में कई अहम बदलावों को मंजूरी दी है. इसके तहत PMS कंपनियां अब पोर्टफोलियो मैनेजर रूट फॉर इन्वेस्टमेंट इन म्यूचुअल फंड्स (PRIM) के जरिए ग्राहकों का पैसा म्युचुअल फंड की डायरेक्ट योजनाओं और स्पेशलाइज्ड इनवेस्टमेंट फंड (SIF) में लगा सकेंगी. इसके अलावा नियामकीय मामलों के सेटलमेंट, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI), PMS के निवेश विकल्पों और विज्ञापन नियमों में भी बदलाव किए गए हैं.
PMS के जरिए म्युचुअल फंड में निवेश का विकल्प
SEBI ने म्युचुअल फंड यूनिट्स में निवेश के लिए पोर्टफोलियो मैनेजर रूट यानी PRIM शुरू करने की मंजूरी दी है. इसके तहत मौजूदा PMS कंपनियां इसे अलग निवेश रणनीति के रूप में पेश कर सकेंगी और ग्राहकों की ओर से म्युचुअल फंड की डायरेक्ट योजनाओं तथा SIF में निवेश कर सकेंगी.
PRIM के तहत न्यूनतम निवेश सीमा 25 लाख रुपये तय की गई है. इससे बड़ी रकम निवेश करने वाले निवेशकों के लिए PMS के जरिए म्युचुअल फंड योजनाओं में निवेश का एक नया विकल्प उपलब्ध होगा.
स्वतंत्र फंड मैनेजर की नई कैटेगरी
SEBI ने इंडिपेंडेंट फंड मैनेजर यानी स्वतंत्र फंड मैनेजर की नई श्रेणी को भी मंजूरी दी है. ये फंड मैनेजर किसी रजिस्टर्ड पोर्टफोलियो मैनेजर के साथ मिलकर ग्राहकों के पोर्टफोलियो का प्रबंधन कर सकेंगे. इसके लिए निवेशकों के हितों की सुरक्षा से जुड़ी निर्धारित शर्तों का पालन करना होगा.
इसके अलावा डिस्क्रिशनरी PMS को ग्राहक की सहमति से उसके कुल एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) का अधिकतम 10 फीसदी हिस्सा बेहतर क्रेडिट रेटिंग वाली अनलिस्टेड डेट सिक्योरिटीज में निवेश करने की अनुमति होगी.
PMS कंपनियां IPO, प्राइमरी मार्केट में जारी होने वाले डेट इंस्ट्रूमेंट्स और एक्सचेंज पर कारोबार करने वाले डेरिवेटिव्स में भी निवेश कर सकेंगी. SEBI ने PMS से जुड़े नियमों की भाषा को सरल बनाने और अप्रासंगिक प्रावधानों को हटाने का भी फैसला किया है.
SEBI मामलों के सेटलमेंट की प्रक्रिया बदली
SEBI ने नियामकीय मामलों को सेटलमेंट यानी समझौते के जरिए निपटाने से जुड़े नियमों में भी बदलाव किया है. नए नियमों के तहत कारण बताओ नोटिस जारी करने से पहले संबंधित कंपनी या व्यक्ति को सेटलमेंट नोटिस दिया जाएगा. इसके बाद सेटलमेंट के लिए आवेदन करने को 60 दिन का समय मिलेगा. हालांकि, ऐसे मामले जिनमें अंतरिम आदेश जारी होने की संभावना हो, इस सुविधा के दायरे में नहीं आएंगे.
वित्तीय विवरण में गलत जानकारी देने या कंपनी के फंड को दूसरी जगह भेजने से जुड़े मामलों को भी सेटलमेंट के दायरे में शामिल किया गया है. सेटलमेंट राशि तय करने के लिए नया फॉर्मूला बनाया जाएगा, जबकि गलत तरीके से हुई कमाई को अलग आधार पर देखा जाएगा. डिस्क्लोजर से जुड़े छोटे मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक सेटलमेंट की सुविधा भी शुरू की जाएगी. यह उन मामलों में उपलब्ध होगी, जिनमें समझौता राशि 10 लाख रुपये तक होगी.
FPI को कमोडिटी डेरिवेटिव्स में निवेश की अनुमति
SEBI ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) को गैर-कृषि कमोडिटी इंडेक्स डेरिवेटिव्स में निवेश की अनुमति देने का फैसला किया है. वे ऐसे गैर-कृषि कमोडिटी सौदों में भी हिस्सा ले सकेंगे, जिनका निपटारा नकदी के बजाय अन्य तरीके से होता है. हालांकि, वास्तविक डिलिवरी की जिम्मेदारी आने से पहले उन्हें अपनी पोजीशन बंद करनी होगी.
इसके अलावा SEBI ने REIT और InvIT की यूनिट्स पर डिपॉजिटरी रिसीट जारी करने की भी मंजूरी दी है. इसका उद्देश्य इन निवेश साधनों में विदेशी पूंजी की भागीदारी बढ़ाने से जुड़ा है.
विज्ञापन नियमों में भी बदलाव
SEBI ने कुछ पंजीकृत संस्थाओं के लिए एक समान विज्ञापन संहिता को मंजूरी दी है. इसके तहत ब्रांड या संस्था के प्रचार के लिए मशहूर हस्तियों का इस्तेमाल किया जा सकेगा. कई तरह के विज्ञापनों के लिए पहले से मंजूरी लेने की अनिवार्यता भी हटाई जाएगी. हालांकि, मशहूर हस्तियों वाले विज्ञापनों के लिए पूर्व मंजूरी की शर्त जारी रहेगी.
इसके अलावा SEBI ने रिसर्च एनालिस्ट और रिसर्च संस्थाओं को संस्थागत ग्राहकों के साथ हुई बातचीत की कॉल रिकॉर्डिंग रखने की अनिवार्यता से राहत दी है. वॉल्ट मैनेजर, REIT, InvIT और पहली बार सूचीबद्ध बॉन्ड जारी करने वाली कंपनियों से जुड़े कुछ नियमों में भी बदलाव किए गए हैं.
बैंक द्वारा ऑफलाइन भुगतान की सुविधा भी उपलब्ध कराई जाएगी. इसके लिए ग्राहक बैंक की किसी भी शाखा में जाकर चेक, डिमांड ड्राफ्ट या नकद के जरिए टैक्स का भुगतान कर सकते हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
IDFC फर्स्ट बैंक ने केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) के डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन के लिए अपने पेमेंट गेटवे का इंटीग्रेशन पूरा कर लिया है. इसके साथ ही देशभर के करदाता अब कई डिजिटल और ऑफलाइन माध्यमों से सीधे टैक्स का भुगतान कर सकेंगे.
बैंक के मुताबिक, करदाता डायरेक्ट टैक्स जमा करने के लिए UPI, क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड और IDFC FIRST Bank की रिटेल व कॉरपोरेट इंटरनेट बैंकिंग सेवाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं. ऑफलाइन भुगतान की सुविधा भी उपलब्ध है. इसके लिए ग्राहक बैंक की किसी भी शाखा में जाकर चेक, डिमांड ड्राफ्ट या नकद के जरिए टैक्स का भुगतान कर सकते हैं.
दूसरे बैंकों के ग्राहक भी कर सकेंगे भुगतान
इस सुविधा का लाभ केवल IDFC FIRST Bank के ग्राहकों तक सीमित नहीं है. दूसरे बैंकों के ग्राहक भी बैंक के पेमेंट गेटवे के जरिए डायरेक्ट टैक्स का भुगतान कर सकते हैं. इसके लिए वे अपने संबंधित बैंक की इंटरनेट बैंकिंग सुविधा का इस्तेमाल कर सकेंगे.
बैंक के अनुसार, पेमेंट पूरा होने के बाद करदाताओं को चालान और पेमेंट कन्फर्मेशन डाउनलोड करने की सुविधा भी मिलेगी. इससे अलग-अलग बैंकिंग सेवाओं का इस्तेमाल करने वाले करदाताओं के लिए डायरेक्ट टैक्स भुगतान की प्रक्रिया को आसान बनाया जा सकेगा.
ग्राहकों को भुगतान के विकल्प में मिलेगी सुविधा
IDFC फर्स्ट बैंक के हेड-रिटेल लाइबिलिटीज, कार्ड्स एंड पेमेंट्स, शिरीष भंडारी ने कहा, "ग्राहक आज भुगतान के तरीके को लेकर लचीलापन और विकल्प चाहते हैं. इस इंटीग्रेशन के साथ करदाता अपनी पसंद के माध्यम से टैक्स का भुगतान कर सकते हैं, चाहे वह UPI, इंटरनेट बैंकिंग, डेबिट कार्ड या क्रेडिट कार्ड हो. यह ग्राहक-केंद्रित डिजिटल बैंकिंग समाधान तैयार करने की हमारी प्रतिबद्धता की दिशा में एक और कदम है."
IDFC फर्स्ट बैंक CBDT की ओर से डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन के लिए अधिकृत निजी क्षेत्र के बैंकों में शामिल है. बैंक के अनुसार, वह डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के साथ व्यक्तिगत ग्राहकों और कारोबारों की जरूरतों के अनुरूप बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध कराने पर काम कर रहा है.
ऐसे कर सकेंगे डायरेक्ट टैक्स का भुगतान
1. सबसे पहले इनकम टैक्स ई-फाइलिंग पोर्टल पर लॉगिन करें.
2. चालान बनाकर "Payment Gateway" विकल्प चुनें.
3. भुगतान के विकल्प के तौर पर *IDFC FIRST Bank* चुनें.
4. UPI, क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड या इंटरनेट बैंकिंग में से पसंदीदा माध्यम चुनकर भुगतान पूरा करें.
5. भुगतान पूरा होने के बाद चालान डाउनलोड या प्रिंट कर लें और भविष्य के संदर्भ के लिए सुरक्षित रखें.
सेक्स 1,247.71 अंक यानी 1.67 फीसदी टूटकर 73,580.54 पर आ गया, जबकि निफ्टी 383.70 अंक यानी 1.64 फीसदी गिरकर 23,063.10 के स्तर पर बंद हुआ.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
घरेलू शेयर बाजार में गुरुवार को भारी बिकवाली के चलते सेंसेक्स और निफ्टी 1.6 फीसदी से ज्यादा की गिरावट के साथ बंद हुए. सेंसेक्स 1,247.71 अंक यानी 1.67 फीसदी टूटकर 73,580.54 पर आ गया, जबकि निफ्टी 383.70 अंक यानी 1.64 फीसदी गिरकर 23,063.10 के स्तर पर बंद हुआ. बाजार में इस तेज गिरावट से निवेशकों की संपत्ति करीब 4.02 लाख करोड़ रुपये घट गई. वैश्विक बाजारों में दबाव के साथ अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी, ब्याज दरों को लेकर बढ़ती चिंता, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और रुपये में कमजोरी ने घरेलू बाजार के सेंटीमेंट को प्रभावित किया.
30 में 29 सेंसेक्स शेयर लाल निशान में
गुरुवार को सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 29 गिरावट के साथ बंद हुए. बजाज फाइनेंस 5.47 फीसदी की गिरावट के साथ सबसे ज्यादा नुकसान में रहा. इसके अलावा एक्सिस बैंक 4.67 फीसदी, बजाज फिनसर्व 4.06 फीसदी, इंडिगो 2.78 फीसदी और ट्रेंट 2.75 फीसदी टूटे. एनटीपीसी लगभग सपाट रहा और इसमें 0.00 फीसदी की मामूली बढ़त दर्ज की गई.
निफ्टी पर एचडीएफसी लाइफ सबसे ज्यादा टूटा
निफ्टी के शेयरों में एचडीएफसी लाइफ 6.16 फीसदी की गिरावट के साथ सबसे ज्यादा नुकसान में रहा. बजाज फाइनेंस 5.87 फीसदी, एक्सिस बैंक 4.56 फीसदी, बजाज फिनसर्व 4.56 फीसदी और अडानी एंटरप्राइजेज 3.11 फीसदी की गिरावट के साथ बंद हुए. दूसरी ओर, सिप्ला 1.16 फीसदी और ओएनजीसी 0.89 फीसदी की बढ़त में रहे, जबकि एनटीपीसी 0.18 फीसदी चढ़ा.
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में उछाल से बाजार पर दबाव
बाजार में गिरावट की प्रमुख वजहों में अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेज बढ़ोतरी रही. अमेरिका में सितंबर की बिजनेस एक्टिविटी से जुड़े आंकड़ों के बाद 10 साल के अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड 2007 के बाद के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई. बेंचमार्क 10 साल की यील्ड 13.89 बेसिस प्वाइंट बढ़कर 5.106 फीसदी हो गई. अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी से वैश्विक निवेशकों के लिए अमेरिकी डेट इंस्ट्रूमेंट्स का आकर्षण बढ़ सकता है. इससे इक्विटी बाजारों में निवेश पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है.
फेड की ब्याज दरों को लेकर बढ़ी चिंता
अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों को लेकर भी बाजार में चिंता बढ़ी. फेड फंड्स फ्यूचर्स के अनुसार, अक्टूबर में ब्याज दर बढ़ने की संभावना 66 फीसदी तक पहुंच गई, जबकि दिन की शुरुआत में यह करीब 53 फीसदी थी. दरों में बढ़ोतरी की आशंका बढ़ने से वैश्विक बाजारों में जोखिम से बचने की प्रवृत्ति मजबूत हुई.
कच्चे तेल की कीमतें 102 डॉलर के पार
कच्चे तेल की कीमतों में फिर तेजी ने भी घरेलू बाजार पर दबाव बढ़ाया. तेल की कीमतें 102 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गईं. ईरान और अमेरिका के बीच तनाव तथा होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बनी अनिश्चितता के कारण तेल बाजार में चिंता बढ़ी है.
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है. ऐसे में तेल की कीमतों में तेजी से देश के आयात बिल और मुद्रास्फीति पर दबाव बढ़ सकता है.
रुपये में भी कमजोरी
बाजार में बिकवाली के बीच रुपया भी कमजोर हुआ. रुपया डॉलर के मुकाबले 95.96 के स्तर तक फिसल गया, जो 17 सितंबर के बाद इसका सबसे कमजोर स्तर था. कारोबार के अंत में रुपया 95.9550 प्रति डॉलर पर बंद हुआ.
निवेशकों की संपत्ति ₹4.02 लाख करोड़ घटी
शेयर बाजार में तेज गिरावट के बीच निवेशकों की संपत्ति 4,02,173.32 करोड़ रुपये घट गई. गुरुवार को सेंसेक्स 74,272.40 के स्तर पर खुला था, जबकि निफ्टी 23,221.80 पर खुला. कारोबार के दौरान बिकवाली बढ़ने के साथ दोनों प्रमुख सूचकांक लगातार दबाव में रहे और 1.6 फीसदी से ज्यादा की गिरावट के साथ बंद हुए.
आज इन शेयरों पर रहेगी नजर
25 सितंबर के कारोबार में PB Fintech, Inox Green Energy Services, Dr Lal PathLabs, JSW Cement और Bharat Dynamics समेत कई शेयर कंपनी-विशेष खबरों के चलते फोकस में रह सकते हैं. PB Fintech के शेयर में 24 सितंबर को करीब 36 फीसदी की तेज गिरावट आई थी. यह गिरावट IRDAI की इंश्योरेंस डिस्ट्रीब्यूशन की कमाई और कमीशन व्यवस्था में प्रस्तावित बदलावों से जुड़ी चिंताओं के बीच आई.
Inox Green Energy Services ने QIP शुरू किया है और इसके लिए ₹174.36 प्रति शेयर का फ्लोर प्राइस तय किया है. वहीं, Dr Lal PathLabs ने जीनोमिक्स डायग्नोस्टिक्स कंपनी SN Genelab में 70 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने को मंजूरी दी है. कंपनी का FY26 टर्नओवर ₹57.96 करोड़ रहा था.
JSW Cement भी क्षमता विस्तार और लागत दक्षता से जुड़े अपडेट्स के चलते बाजार की नजर में रह सकता है. दूसरी ओर, Bharat Dynamics ने रक्षा मंत्रालय के साथ भारतीय वायुसेना के लिए SAT-SAAW और संबंधित उपकरणों की सप्लाई के लिए ₹810.79 करोड़ का कॉन्ट्रैक्ट साइन किया है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
क्रूड सोयाबीन और पाम ऑयल पर ड्यूटी 10 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी कर दी गई है, जबकि क्रूड सूरजमुखी तेल पर इसे 10 फीसदी से घटाकर शून्य कर दिया गया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
त्योहारी सीजन से पहले खाद्य तेल की बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने क्रूड और रिफाइंड खाद्य तेलों के आयात पर बेसिक कस्टम ड्यूटी में कटौती की है. क्रूड सोयाबीन और पाम ऑयल पर ड्यूटी 10 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी कर दी गई है, जबकि क्रूड सूरजमुखी तेल पर इसे 10 फीसदी से घटाकर शून्य कर दिया गया है. सरकार के इस फैसले से आयातित खाद्य तेल की लागत कम होने और घरेलू बाजार में कीमतों पर दबाव घटने की उम्मीद है.
कुछ क्रूड तेलों पर ड्यूटी आधी
केंद्रीय वित्त मंत्रालय की ओर से जारी गजट नोटिफिकेशन के मुताबिक, क्रूड सोयाबीन और क्रूड पाम ऑयल के आयात पर बेसिक कस्टम ड्यूटी 10 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी कर दी गई है. इसका मतलब है कि बिना रिफाइन किए गए इन तेलों का आयात पहले के मुकाबले सस्ता होगा. वहीं, क्रूड सूरजमुखी तेल के मामले में सरकार ने इससे भी बड़ी कटौती की है. इस पर बेसिक कस्टम ड्यूटी 10 फीसदी से घटाकर शून्य कर दी गई है. इससे सूरजमुखी तेल के आयातकों की लागत में कमी आने की संभावना है.
रिफाइंड तेल पर भी शुल्क घटा
सरकार ने केवल क्रूड तेलों पर ही राहत नहीं दी है, बल्कि रिफाइंड खाद्य तेलों पर भी कस्टम ड्यूटी कम की है. रिफाइंड सोयाबीन और रिफाइंड पाम ऑयल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी 32.5 फीसदी से घटाकर 27.5 फीसदी कर दी गई है. यानी इन दोनों तेलों के आयात पर ड्यूटी में 5 प्रतिशत अंक की कमी हुई है.
इसी तरह रिफाइंड सूरजमुखी तेल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी 32.5 फीसदी से घटाकर 22.5 फीसदी कर दी गई है. यानी यहां भी ड्यूटी में 10 प्रतिशत अंक की कटौती हुई है.
खाद्य तेल पहले बेसिक कस्टम ड्यूटी अब बेसिक कस्टम ड्यूटी
क्रूड सोयाबीन ऑयल 10% 5%
क्रूड पाम ऑयल 10% 5%
क्रूड सूरजमुखी ऑयल 10% 0%
रिफाइंड सोयाबीन ऑयल 32.5% 27.5%
रिफाइंड पाम ऑयल 32.5% 27.5%
रिफाइंड सूरजमुखी ऑयल 32.5% 22.5%
24 सितंबर से लागू होगी नई दर
गजट नोटिफिकेशन के अनुसार, कस्टम ड्यूटी में की गई यह कटौती 24 सितंबर 2026 से प्रभावी होगी. भारत खाद्य तेलों की घरेलू मांग को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में आयात पर निर्भर है. ऐसे में आयात शुल्क कम होने से खाद्य तेल की लैंडेड लागत में कमी आ सकती है.
इसका असर घरेलू बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों पर पड़ सकता है. हालांकि, उपभोक्ताओं को मिलने वाली वास्तविक राहत इस बात पर भी निर्भर करेगी कि आयात लागत में कमी का कितना हिस्सा कंपनियां और कारोबारी आगे कीमतों में पास करते हैं. इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे खाद्य तेल की कीमतें, रुपये की विनिमय दर और वैश्विक आपूर्ति भी घरेलू कीमतों को प्रभावित करती हैं.
त्योहारों से पहले आया फैसला
सरकार का यह फैसला ऐसे समय आया है जब दशहरा और दिवाली जैसे प्रमुख त्योहार नजदीक हैं. इन त्योहारों के दौरान खाद्य तेल की मांग आमतौर पर बढ़ जाती है. ऐसे में आयात लागत कम होने से बाजार में कीमतों पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती है.
इंडियन वेजिटेबल ऑयल प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (IVPA) के अध्यक्ष सुधाकर देसाई ने सरकार के फैसले का स्वागत किया है. उन्होंने कहा कि कुछ खाद्य तेलों के आयात पर सीमा शुल्क में कटौती महत्वपूर्ण समय पर की गई है. उनके मुताबिक, दशहरा और दिवाली जैसे बड़े त्योहार आने वाले हैं और इस कदम से क्रूड ऑयल के आयातकों को राहत मिलेगी.
महंगाई पर भी पड़ सकता है असर
खाद्य तेल घरेलू खाद्य महंगाई की अहम कड़ी है. आयात शुल्क में कमी से आयातित तेल की लागत कम होने पर घरेलू बाजार में कीमतों को राहत मिल सकती है. इसका असर खाद्य मुद्रास्फीति पर भी पड़ने की संभावना है.
हालांकि, कस्टम ड्यूटी में कटौती का पूरा फायदा उपभोक्ताओं तक कितनी जल्दी पहुंचेगा, यह अंतरराष्ट्रीय कीमतों और घरेलू बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा. फिलहाल सरकार के इस कदम से त्योहारी सीजन में खाद्य तेल की उपलब्धता और कीमतों को लेकर कुछ राहत की उम्मीद बढ़ी है.
भारत के सबसे बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ने प्रशांत अग्रवाल परिवार को बार-बार एक और मौका क्यों दिया? ₹4,000 करोड़ का CDR. ₹934 करोड़ का डेट-फॉर-शेयर्स स्वैप. फिर ₹5,600 करोड़ का S4A, जिसमें ₹2,249.74 करोड़ को "असस्टेनेबल" घोषित कर शेयरों और डिबेंचर्स में बदल दिया गया. पांच साल बाद दिवालिया प्रक्रिया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस (SFIO) ने बॉम्बे रेयॉन फैशन्स लिमिटेड (BRFL) की जांच शुरू कर दी है. मुंबई स्थित यह टेक्सटाइल समूह कभी खुद को भारत का सबसे बड़ा शर्ट निर्माता बताता था और अब परिसमापन में है. कंपनी पर स्वीकार की गई देनदारियां ₹7,358 करोड़ हैं, जिसमें वित्तीय लेनदारों का ₹6,690 करोड़ शामिल है.
BW द्वारा देखे गए 5 अगस्त 2026 के समन के अनुसार, केंद्र सरकार ने कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 212(1)(c) के तहत 30 अक्टूबर 2025 को SFIO को BRFL के मामलों की जांच करने का आदेश दिया था. SFIO के निदेशक ने एक जांच अधिकारी और दो निरीक्षकों की नियुक्ति की है और जांचकर्ता कंपनी से जुड़े लोगों को नई दिल्ली में पूछताछ के लिए बुला रहे हैं.
हालांकि, कुछ ऐसे सूत्र, जिनके पास आपत्तिजनक दस्तावेज हैं, मानते हैं कि SFIO को बॉम्बे रेयॉन और उसके प्रमोटरों, प्रशांत और जनार्दन अग्रवाल परिवार, को SBI की ओर से बार-बार दिए गए बचाव और जीवनदान की भी पूरी तरह जांच करनी चाहिए. सूत्रों के अनुसार, फंड के डायवर्जन का भी मामला है और अग्रवाल परिवार की कंपनियों के व्यापक नेटवर्क, "यार्न सप्लायर बिलों", कॉरपोरेट कनेक्शनों और सहायक कंपनियों के बीच धन के हस्तांतरण की जांच की जानी चाहिए. SFIO को अग्रवाल परिवार के सदस्यों, करीबी रिश्तेदारों और उनके नेटवर्क की संपत्तियों की भी जांच करनी चाहिए और जांच की शुरुआत SBI की मुंबई शाखा के उन अधिकारियों से होनी चाहिए, जिन पर सूत्रों ने बार-बार पुनर्गठन में मदद करने का आरोप लगाया है.
SFIO के आदेश में कंपनी का नाम है. लेकिन BRFL अकेले नहीं गिरी और न ही यह तेजी से गिरी. इसे बार-बार बचाया गया, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के एक कंसोर्टियम ने, जिसकी अगुवाई स्टेट बैंक ऑफ इंडिया कर रहा था.
SBI सिर्फ एक पर्यवेक्षक नहीं था
BW द्वारा देखे गए पुनर्गठन दस्तावेजों के अनुसार, पहले पुनर्गठन के तहत यह लीड बैंक और मॉनिटरिंग संस्था था, यानी यह देखने के लिए जिम्मेदार बैंक कि कंपनी अपने वादे पूरे कर रही है या नहीं. तीसरे बचाव में उसे इक्विटी का सबसे बड़ा हिस्सा मिला. और अगस्त 2018 में, S4A के बमुश्किल 15 महीने बाद, SBI ने अपने ₹2,260.79 करोड़ के लोन एक्सपोजर को बिक्री के लिए रख दिया. JM Financial ARC ने अंततः इसे ₹900 करोड़ में खरीदा. यह अंतर ₹1,361 करोड़ था, SBI द्वारा पहले से किए गए प्रावधानों को शामिल किए बिना. सार्वजनिक धन का इतना प्रत्यक्ष नुकसान हुआ.
बचाव की कोशिशें रिकवरी पर खत्म नहीं हुईं. वे दिवालिया प्रक्रिया पर खत्म हुईं. आगे वह रिकॉर्ड है कि हर चरण में बैंक क्या देख सकता था और फिर भी उसने क्या किया.
रेड फ्लैग नंबर एक: मुनाफा कमाने वाली कंपनी जो भुगतान नहीं कर सकी
कागजों पर BRFL अब भी मुनाफा दर्ज कर रही थी. मार्च 2013 को समाप्त तिमाही में शुद्ध मुनाफा 16.6% बढ़कर ₹48.36 करोड़ हो गया था और शुद्ध बिक्री 12.5% बढ़कर ₹895.55 करोड़ हो गई थी. इसके बावजूद कुछ ही हफ्तों के भीतर कंपनी ने अपने ऋणदाताओं से पुनर्गठन के लिए संपर्क किया. विरोधाभास साफ था: एक तरफ लेखांकन मुनाफा और दूसरी तरफ ₹4,000 करोड़ की कर्ज समस्या.
19 जुलाई 2013 को बाजार बंद होने के बाद कंपनी ने जानकारी दी कि उसके बोर्ड ने कॉरपोरेट डेट रिस्ट्रक्चरिंग प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. शेयर करीब 8% गिरकर ₹203.25 पर आ गया. मई 2008 में यह एक समय ₹418 तक कारोबार कर चुका था.
बढ़ता मुनाफा दिखाने वाली लेकिन अपने कर्ज का भुगतान करने में असमर्थ कंपनी के सामने ऋणदाताओं के पास दो संभावनाएं होती हैं: या तो उसका मुनाफा नकदी में नहीं बदल रहा था, या उसने कारोबार की क्षमता से कहीं अधिक कर्ज ले लिया था. दोनों ही स्थितियों में इस बात की कड़ी जांच होनी चाहिए थी कि पैसा कहां जा रहा था. इसके बजाय उसे SBI की निगरानी में बचाव मिला. पहला पुनर्गठन कर्ज की समस्या हल करने के लिए था. ऐसा नहीं हुआ.
लेकिन कंपनी की ओर से संकट की अपनी व्याख्या में एक और बात दर्ज थी: "सहायक कंपनियों को दिए गए अग्रिम". BRFL ने इसे बड़े पैमाने पर विस्तार, कमर्शियल पेपर के भुगतान, सरकारी सब्सिडी में देरी और बढ़ती कर्ज लागत के साथ उन कारणों में शामिल किया था, जिन्होंने उसके कैश फ्लो को प्रभावित किया और उसे ₹4,000 करोड़ के CDR की ओर धकेला.
यह सवाल कंपनी के केवल जरूरत से ज्यादा कर्ज लेने से कहीं बड़ा है. ₹4,000 करोड़ के बैंक बचाव की ओर बढ़ रही कंपनी अपनी सहायक कंपनियों को पैसा क्यों दे रही थी? किन कंपनियों को यह पैसा मिला? कितना मिला? किन शर्तों पर मिला? उन कंपनियों का नियंत्रण किसके पास था? और उस पैसे में से कितना वापस आया?
अग्रवाल परिवार का कंपनियों का नेटवर्क
यह नेटवर्क व्यापक था और सीमाओं के पार तक फैला था. कंपनी की फाइलिंग के अनुसार, BRFL की सहायक कंपनियों में Bombay Rayon Holdings Ltd, STI India Ltd, ब्रिटेन की DPJ Clothing Ltd, BRFL Bangladesh Pvt Ltd और दो इतालवी संस्थाएं BRFL Italia S.r.l तथा BRFL Italia Licensee S.r.l शामिल थीं, जिनके पास "GURU" गारमेंट ब्रांड था. प्रमोटर समूह में एक विदेशी कंपनी AAA United B.V. भी शामिल थी, जिसके पास BRFL की 13.83% हिस्सेदारी थी और कंपनी की अपनी फाइलिंग में इसे विदेशी प्रमोटर कंपनी के रूप में वर्गीकृत किया गया था.
अंत तक कंपनी इनमें से कई के बारे में हिसाब तक नहीं दे सकी. उसके ऑडिटरों और सेक्रेटेरियल ऑडिटरों ने दर्ज किया कि BRFL Textiles, BRFL Italia Licensee, STI India और DPJ Clothing के वित्तीय विवरण "उपलब्ध नहीं थे", BRFL Italia का कारोबार बंद हो चुका था और BRFL Bangladesh में कोई परिचालन नहीं था. जिस समूह की अपनी सहायक कंपनियों के खातों तक पहुंच नहीं थी, वह बैंक से हजारों करोड़ रुपये मांगते हुए उन्हें पैसा दे रहा था.
इसके जवाब संबंधित पक्षों के खुलासों और सहायक कंपनियों की किताबों में छिपे हैं. और यहीं से कहानी सिर्फ मंदी में फंसी एक टेक्सटाइल कंपनी की नहीं रह जाती, बल्कि अग्रवाल परिवार के व्यापक कॉरपोरेट नेटवर्क की ओर बढ़ती है.
रेड फ्लैग नंबर दो: बकाया ब्याज को शेयरों में बदलना
2015 के अंत तक ऋणदाता फिर सामने आए. 4 नवंबर 2015 की जॉइंट लेंडर्स फोरम की सिफारिश पर BRFL के बोर्ड ने ₹712.67 करोड़ के वर्किंग कैपिटल टर्म लोन और ₹221.58 करोड़ के फंडेड इंटरेस्ट टर्म लोन, यानी कुल ₹934.26 करोड़, को ऋणदाताओं के लिए इक्विटी में बदलने की मंजूरी दी.
जिस ब्याज का कंपनी भुगतान नहीं कर सकी, उसे पहले नए कर्ज में बदल दिया गया. अब उस कर्ज को शेयरों में बदल दिया गया. बैंक ऐसे कर्जदार के आंशिक मालिक बन गए थे, जो उन्हें भुगतान नहीं कर पा रहा था.
रेड फ्लैग नंबर तीन: कर्मचारियों का पैसा
अप्रैल 2016 में चेतावनी को नजरअंदाज करना मुश्किल हो गया.
बोइसर MIDC पुलिस ने BRFL के तीन निदेशकों, प्रशांत अग्रवाल, जनार्दन अग्रवाल और अमन अग्रवाल के खिलाफ मामला दर्ज किया. उन पर अक्टूबर 2014 से दिसंबर 2015 के बीच कंपनी के तारापुर संयंत्र में करीब 1,400 कर्मचारियों से काटे गए ₹1.90 करोड़ के प्रोविडेंट फंड योगदान के गबन का आरोप लगाया गया. उस समय मुंबई मिरर की एक रिपोर्ट के अनुसार, आरोप था कि यह पैसा सरकार के पास जमा करने के बजाय निदेशकों के बीच बांट दिया गया, जबकि जमा SBI की अपनी बोइसर शाखा में किया जाना था. प्रोविडेंट फंड निरीक्षक की शिकायत पर भारतीय दंड संहिता की धारा 406 के तहत आपराधिक विश्वासघात का मामला दर्ज किया गया था.
जिस समय ऋणदाता दूसरे बचाव पर बातचीत कर रहे थे, उन्हीं महीनों में कथित तौर पर कर्मचारियों का पैसा गायब हुआ. जॉइंट लेंडर्स फोरम की बैठक भी इसी अवधि में हुई थी. शेयरधारकों द्वारा इस बदलाव पर मतदान करने से कुछ सप्ताह पहले यह मामला सार्वजनिक हुआ. तब तक शेयर गिरकर ₹133.60 पर आ चुका था, जो पहले बचाव के समय के स्तर से एक तिहाई कम था.
आरोप किसी कारोबारी गलत फैसले का नहीं था. यह कर्मचारियों के वेतन से उनकी सेवानिवृत्ति के लिए काटे गए पैसे से जुड़ा था. हजारों करोड़ रुपये का और कर्ज देने पर विचार कर रहे किसी ऋणदाता के लिए इससे ज्यादा स्पष्ट संकेत की कल्पना करना मुश्किल है.
और यह यहीं नहीं रुका. छह साल बाद कंपनी की अपनी वार्षिक रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि 31 मार्च 2022 तक छह महीने से अधिक समय से बकाया प्रोविडेंट फंड देनदारी ₹18.60 करोड़ थी, कर्मचारी राज्य बीमा की देनदारी ₹4.46 करोड़ थी और PF, ESIC तथा TDS पर ब्याज और जुर्माना ₹15.02 करोड़ था. 2016 में आपराधिक मामला शुरू कराने वाले ₹1.90 करोड़ के मुकाबले 2022 तक कर्मचारियों की बकाया देनदारी लगभग दस गुना हो चुकी थी.
निदेशक पूरे समय पद पर बने रहे. 27 सितंबर 2019 की वार्षिक आम बैठक में शेयरधारकों ने पुलिस मामले के तीन साल बाद भी प्रशांत अग्रवाल को दो और वर्षों के लिए प्रबंध निदेशक के रूप में फिर नियुक्त किया. 2021-22 की वार्षिक रिपोर्ट में भी अमन अग्रवाल और प्रशांत अग्रवाल का कार्यकाल रोटेशन के आधार पर समाप्त हो रहा था और दोनों ने फिर नियुक्ति की पेशकश की थी.
रेड फ्लैग नंबर चार: घाटा और सिकुड़ता कारोबार
आंकड़े भी गलत दिशा में जा रहे थे. सितंबर 2016 को समाप्त तिमाही में BRFL ने ₹53.56 करोड़ का शुद्ध घाटा दर्ज किया.
यह वही कंपनी थी जिसके सामने बैठकर ऋणदाताओं ने अगले बचाव की योजना तैयार की.
तीसरा बचाव: S4A
अप्रैल 2017 में, PF मामले के एक साल बाद, बैंकों ने RBI की स्ट्रेस्ड एसेट्स की सस्टेनेबल स्ट्रक्चरिंग योजना यानी S4A के तहत अब तक का सबसे व्यापक बचाव मंजूर किया. यह RBI की S4A योजनाओं के तहत सबसे बड़े कर्ज पुनर्गठनों में से एक था.
S4A दस्तावेजों के अनुसार, इस पैकेज में करीब ₹5,600 करोड़ का कर्ज शामिल था. इसमें से ₹2,249.74 करोड़ को असस्टेनेबल घोषित किया गया और इक्विटी तथा डिबेंचर्स में बदल दिया गया. BRFL के बोर्ड ने 25 अप्रैल 2017 की बैठक में S4A योजना के तहत ऋणदाताओं को तरजीही आधार पर अधिकतम 126,655,304 शेयर जारी करने को मंजूरी दी. ये विस्तारित शेयर पूंजी का 39.89% थे. इसके अलावा ₹1,000 अंकित मूल्य वाले वैकल्पिक रूप से परिवर्तनीय डिबेंचर्स भी जारी किए जाने थे, जिनकी कुल राशि ₹410 करोड़ से अधिक नहीं होनी थी. इसे मंजूरी देने के लिए 20 मई 2017 को असाधारण आम बैठक बुलाई गई.
योजना को एक और मंजूरी भी मिली
1 जून 2017 को CNBC-TV18 ने बताया कि बॉम्बे रेयॉन को बैंकों की ओवरसाइट कमेटी से S4A की मंजूरी मिल गई है. यह RBI द्वारा अनिवार्य संस्था थी, जिसका उद्देश्य ऐसे पैकेजों की स्वतंत्र समीक्षा करना था. उस समिति में कौन था, उसे कौन-सी सामग्री दिखाई गई और उसने क्या जांचा, ये सभी सवाल अब इसी जांच की कड़ी का हिस्सा हैं. इसकी जांच होनी चाहिए और इससे पूरी तस्वीर सामने आ सकती है.
SBI को सबसे बड़ा हिस्सा मिला. दस्तावेजों के अनुसार, S4A के तहत उसे 43.74 मिलियन शेयर और डिबेंचर्स आवंटित किए गए और बाद में 19.31 मिलियन अतिरिक्त शेयर तथा 106,732 डिबेंचर्स भी दिए गए.
आम शेयरधारकों के लिए यह भारी हिस्सेदारी कमी थी. जनवरी 2018 तक BRFL की इक्विटी पूंजी 2013 के ₹134.60 करोड़ से बढ़कर ₹317.48 करोड़ हो गई थी. शेयरों की संख्या दोगुने से अधिक हो गई थी और नए शेयर मुख्य रूप से नए पैसे लाने वाले निवेशकों को नहीं, बल्कि खराब कर्ज के बदले शेयर लेने वाले ऋणदाताओं को दिए गए थे. नतीजा यह हुआ कि मार्च 2022 तक वित्तीय संस्थानों और बैंकों के पास बॉम्बे रेयॉन फैशन्स की 51.88% हिस्सेदारी थी. ऋणदाता कंपनी के मालिक बन चुके थे.
S4A उन दबावग्रस्त कर्जदारों के लिए था जिनके कारोबार को कम से कम आधे कर्ज की सर्विसिंग करने में सक्षम माना जाता था. BRFL के मामले में ऋणदाताओं ने ₹5,600 करोड़ के पैकेज में से ₹3,390 करोड़, यानी करीब 60%, को सस्टेनेबल माना.
उन्होंने यह आकलन उस कंपनी के लिए किया था जो एक CDR में विफल रही थी, जिसे डेट-फॉर-शेयर्स स्वैप की जरूरत पड़ी थी, जो तिमाही घाटा दर्ज कर रही थी और जिसके निदेशकों पर कर्मचारियों के पैसे से जुड़े आपराधिक मामले में आरोप थे.
कंपनी के अपने नतीजों ने जल्द ही दिखा दिया कि ये कैश फ्लो वास्तव में क्या थे. सितंबर 2017 को समाप्त तिमाही में BRFL को ₹14.56 करोड़ का घाटा हुआ और उसकी शुद्ध बिक्री 31.2% घटकर ₹675.05 करोड़ रह गई.
शेयर कीमत में उछाल और फिर गिरावट
इसके बाद शेयर में ऐसी तेजी आई जिसे बुनियादी कारोबारी प्रदर्शन से समझाना मुश्किल था.
17 अक्टूबर 2017 को ₹111 के निचले स्तर से BRFL के शेयर लगभग दो महीने में दोगुने हो गए और 18 दिसंबर को ₹232.50 तक पहुंच गए. कारोबार में कोई सुधार नहीं हुआ था; कंपनी अब भी घाटे में थी और उसका कारोबार सिकुड़ रहा था.
फिर शेयर की कीमत गिरने लगी. 15 दिसंबर 2017 को ₹224.75 के बंद भाव से शेयर 11 कारोबारी सत्रों में 49.96% गिरकर 2 जनवरी 2018 को ₹112.45 पर आ गया. उस दिन शेयर निचले सर्किट पर बंद हुआ.
यह तेजी S4A की कीमत तय होने के महीनों बाद आई थी, इसलिए इसका कन्वर्जन पर असर नहीं पड़ा. लेकिन एक घाटे में चल रही कंपनी का शेयर कुछ ही हफ्तों में दोगुना और फिर आधा हो जाना, खासकर तब जब देश का सबसे बड़ा बैंक उसका एक बड़ा शेयरधारक बन चुका था, ऐसे सवाल खड़े करता है जिनका जवाब SEBI के ट्रेडिंग रिकॉर्ड से मिल सकता है: तेजी के दौरान किसने खरीदा और गिरावट के दौरान किसने बेचा?
बाहर निकलने की कोशिश जो पूरी नहीं हुई
2018 के मध्य तक SBI के पास BRFL की 29.28% हिस्सेदारी थी, जो किसी भी अन्य संस्थान से अधिक थी. Axis Bank के पास 8.04% और छह अन्य ऋणदाताओं के पास 1.61% से 3.35% के बीच हिस्सेदारी थी.
अगस्त 2018 में, S4A को मंजूरी दिए जाने के बमुश्किल 15 महीने बाद, SBI ने अपना खाता एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियों, बैंकों और NBFCs को बिक्री के लिए रखा. इसमें ₹2,260.79 करोड़ की देनदारी दिखाई गई थी, जिसमें उसकी इक्विटी शामिल नहीं थी. JM Financial ARC ने यह कर्ज खरीदा. Capitalmind के विश्लेषण के अनुसार, उसने SBI के ₹2,261 करोड़ के एक्सपोजर के लिए ₹900 करोड़ का भुगतान किया. इसमें करीब 60% की हेयरकट थी, जिसमें ₹840 करोड़ नकद और बाकी सिक्योरिटी रिसीट्स के रूप में थे.
मई 2017 में ऋणदाताओं ने इस कंपनी के ₹3,390 करोड़ कर्ज को सस्टेनेबल प्रमाणित किया था. 15 महीने बाद SBI इसे एक रुपये के 40 पैसे के बराबर कीमत पर बेच रहा था, लेकिन बैंक पूरी तरह बाहर नहीं निकला.
लोन बेचने के काफी समय बाद भी SBI BRFL का सबसे बड़ा एकल शेयरधारक बना रहा. कंपनी की 2021-22 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 31 मार्च 2022 को State Bank of India के पास 91,352,087 शेयर यानी 28.77% हिस्सेदारी थी, जबकि Axis Bank के पास 25,520,484 शेयर यानी 8.04% हिस्सेदारी थी. तब तक इन शेयरों की कीमत उस कर्ज की तुलना में बहुत कम रह गई थी, जिसे उन्होंने बदला था.
अन्य ऋणदाता बाहर निकलने की कोशिश में लगे रहे. Punjab National Bank ने अक्टूबर 2021 से फरवरी 2022 के बीच कई सौदों में अपनी करीब 75.8 लाख शेयरों की पूरी हिस्सेदारी बेच दी और अंत में उसके पास कोई हिस्सेदारी नहीं बची. प्रमोटर शेयर भी बेचे जा रहे थे. प्रमोटर इकाई Ashwell Holding Company Pvt Ltd ने 2021-22 के दौरान अपनी हिस्सेदारी 7.92% से घटाकर 1.39% कर दी. प्रशांत अग्रवाल की अपनी हिस्सेदारी भी उस समय घट गई, जब कंपनी ने इसे ऋणदाता द्वारा गिरवी रखे शेयरों के आह्वान के रूप में बताया.
₹888 करोड़ जो राइट-ऑफ में गायब हो गए
इसके बाद अकाउंटिंग का हिसाब सामने आया और यह सीधे सूत्रों की ओर से लगाए गए सप्लायर बिलों तथा कंपनी से बाहर धन जाने के आरोपों की ओर इशारा करता है.
2021-22 में BRFL का घाटा ₹299.95 करोड़ से बढ़कर ₹1,147.20 करोड़ हो गया. कंपनी की निदेशकों की रिपोर्ट में इसका कारण बताया गया: घाटा "मुख्य रूप से कंपनी द्वारा अप्रचलित और गैर-गतिशील इन्वेंट्री में हुए नुकसान तथा वसूल न किए जा सकने वाले कर्ज को राइट ऑफ करने" के कारण हुआ. अकेले असाधारण मद ₹888.07 करोड़ की थी.
एक ही साल में करीब ₹900 करोड़ की इन्वेंट्री और रिसीवेबल्स को राइट ऑफ किया गया. इन गैर-वसूली योग्य देनदारियों का भुगतान किसे करना था? कौन-सी इन्वेंट्री बेकार हो गई और उसे कब खरीदा गया? यही वे सवाल हैं जो SFIO और CBI के जांचकर्ता कंपनी के ऑडिटरों से पूछ सकते हैं और यही वे लेजर हैं जिन्हें सूत्रों के अनुसार यार्न सप्लायर बिलों के साथ जांचा जाना चाहिए.
इस राइट-ऑफ के साथ दो तथ्य भी जुड़े हैं.
पहला, उसी साल की निदेशकों की रिपोर्ट में कहा गया है कि कंपनी के वैधानिक ऑडिटरों ने कंपनी अधिनियम की धारा 143(12) के तहत धोखाधड़ी की कोई घटना रिपोर्ट नहीं की थी. दूसरा, ₹1,147 करोड़ के घाटे और ₹18.60 करोड़ के बकाया प्रोविडेंट फंड के उसी साल में चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर अमन अग्रवाल ने वेतन और भत्तों के रूप में ₹2.35 करोड़ लिए.
वह संपत्ति जो बाहर चली गई
जब मूल कंपनी डूब रही थी, उसी समय उसका सबसे अच्छा कारोबार एक नई इकाई में स्थानांतरित कर दिया गया.
BRFL Textiles Private Limited को 20 अगस्त 2020 को शामिल किया गया और 30 सितंबर 2020 की वार्षिक आम बैठक में शेयरधारकों ने तारापुर कारोबार को स्लंप सेल के जरिए एक चालू कारोबार के रूप में BRFL Textiles को हस्तांतरित करने की मंजूरी दी.
इसका असर आंकड़ों में दिखता है. 2021-22 में BRFL ने खुद केवल ₹83.08 करोड़ का राजस्व अर्जित किया, क्योंकि "तैयार कपड़े के निर्माण का प्रमुख कारोबार वित्त वर्ष 2020-21 के दौरान कंपनी से अलग कर दिया गया था." नई कंपनी, जिसमें BRFL की 70% हिस्सेदारी थी, ने ₹731.67 करोड़ का टर्नओवर, ₹1,101.61 करोड़ की कुल संपत्ति और ₹218.36 करोड़ का घाटा दर्ज किया, ये आंकड़े अस्थायी थे और ऑडिटेड नहीं थे, क्योंकि इसके वित्तीय विवरण खुद इसकी मूल कंपनी को उपलब्ध नहीं थे.
जिस सूचीबद्ध कंपनी से यह कारोबार निकला था, उसकी तुलना में नौ गुना राजस्व, ऐसी इकाई में था जिसके खाते सूचीबद्ध मूल कंपनी हासिल नहीं कर सकी, और यह सब उस मूल कंपनी के दिवालिया प्रक्रिया में जाने से दो साल पहले हुआ.
पतन
कंपनी ने बाद में स्वीकार किया कि बचाव की कोशिशें विफल हो चुकी थीं. 2020 के एक बयान में उसने कहा कि उसके कर्ज को RBI की योजनाओं के तहत दो बार पुनर्गठित किया गया, लेकिन इनसे उसे जरूरी कार्यशील पूंजी नहीं मिली, इसलिए उसकी फैक्ट्रियां कभी पूरी क्षमता से इस्तेमाल नहीं हो सकीं.
सितंबर 2020 तक BRFL पर करीब ₹5,110 करोड़ का कर्ज था और एक साल में उसका राजस्व 61% गिरकर ₹251 करोड़ रह गया था. कंपनी को ब्याज और कर से पहले भी घाटा हो रहा था. उसकी अपनी वार्षिक रिटर्न के अनुसार 1 अप्रैल 2021 तक कुल देनदारी ₹4,704.74 करोड़ थी, जिसमें ₹4,692.29 करोड़ ब्याज था, जिसका भुगतान नहीं किया गया था.
अगस्त 2021 में मैनेजिंग डायरेक्टर प्रशांत अग्रवाल को मुंबई इकाई के डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ GST इंटेलिजेंस ने कथित ₹55.8 करोड़ के इनपुट टैक्स क्रेडिट फ्रॉड के मामले में गिरफ्तार किया. उन पर CGST Act के तहत मामला दर्ज किया गया और उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजा गया.
मई 2022 तक कंपनी एक कामकाजी सूचीबद्ध इकाई भी नहीं रह गई थी. SEBI के लिस्टिंग नियमों के अनुपालन और जुर्माने तथा लिस्टिंग फीस का भुगतान न करने के कारण शेयर बाजारों ने 23 मई 2022 से उसके सिक्योरिटीज में कारोबार निलंबित कर दिया.
अंत एक यार्न कारोबारी की ओर से आया, जिसे ₹1.61 करोड़ का भुगतान किया जाना था. 7 जून 2022 को NCLT ने चिरंजीलाल यार्न ट्रेडर्स के एकमात्र मालिक विकास परासरम्पुरिया की याचिका पर BRFL को दिवालिया प्रक्रिया में भेज दिया. प्रशांत अग्रवाल की अपील को NCLAT ने 15 जुलाई 2022 को खारिज कर दिया. JM Financial के ₹6,080 करोड़ के स्वीकृत दावे ने उसे क्रेडिटर्स कमेटी में 90.80% वोट दिए, जबकि Axis Bank के ₹610.86 करोड़ के स्वीकृत दावे से बाकी हिस्सा था. Donear, Welspun और Arvind ने रुचि दिखाई थी, लेकिन ऋणदाताओं ने हर योजना को खारिज कर दिया और 9 नवंबर 2023 को ट्रिब्यूनल ने परिसमापन का आदेश दिया.
जो शेयर कभी ₹418 पर कारोबार करता था, वह 5 दिसंबर 2022 को ₹1.58 के सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुंच गया. उस समय पूरी कंपनी का मूल्य करीब ₹58 करोड़ था.
SFIO और CBI को बैंक के भीतर भी जांच क्यों करनी चाहिए
चेतावनी संकेतों को एक साथ रखिए: बढ़ते मुनाफे के आधार पर पुनर्गठन का अनुरोध; ऐसी सहायक कंपनियों को पैसा देना जिनके खातों तक मूल कंपनी की पहुंच नहीं थी; ब्याज को कैपिटलाइज कर शेयरों में बदलना; कर्मचारियों के रिटायरमेंट के पैसे लेने के आरोप में निदेशकों के खिलाफ आपराधिक शिकायत; तिमाही घाटा; शेयर की लगातार गिरती कीमत. इनमें से हर संकेत SBI और उसके साझेदारों द्वारा S4A को मंजूरी देने से पहले मौजूद था. बैंक को बाद की जानकारी की जरूरत नहीं थी. उसे केवल अपनी फाइलें पढ़ने की जरूरत थी.
तो SBI लगातार हां क्यों कहता रहा?
हो सकता है बैंक अधिकारियों को सबूतों के विपरीत यह भरोसा रहा हो कि एक और बचाव काम करेगा. हो सकता है पुनर्गठित खराब कर्ज को अभी खराब कर्ज के रूप में दर्ज न करना किसी की बैलेंस शीट या करियर के लिए बेहतर हो. या फिर कुछ और हो सकता है. यह निर्णय की विफलता थी, जांच-पड़ताल की विफलता थी या कुछ और गंभीर, यह जांच से ही तय होना चाहिए और यही वह सवाल है जिसका जवाब अभी किसी से नहीं मांगा गया है.
SFIO कंपनियों की जांच करता है और उसके आदेश में BRFL का नाम है. लेकिन कंपनी अधिनियम उसके निरीक्षकों को कंपनी के मामलों से जुड़े रिकॉर्ड और लोगों की जांच करने के व्यापक अधिकार देता है. और BRFL के मामलों से उसके लीड बैंक की लोन फाइलों से ज्यादा जुड़े रिकॉर्ड कोई नहीं हैं: प्रत्येक बचाव के लिए आंतरिक मंजूरी नोट, जॉइंट लेंडर्स फोरम की बैठक के मिनट्स, CDR Empowered Group के दस्तावेज, S4A का viability assessment और techno-economic viability report, RBI द्वारा अनिवार्य Oversight Committee के सामने रखे गए दस्तावेज, "सस्टेनेबल" कर्ज के आंकड़े के पीछे के कैश-फ्लो अनुमान और प्रमोटरों से बैंकों द्वारा मांगी गई या न मांगी गई पूंजी.
अगर ये फाइलें बैंकों के भीतर किसी चूक की ओर इशारा करती हैं, तो CBI, RBI और SBI की अपनी विजिलेंस विंग को इसकी जांच आगे बढ़ानी होगी.
सवाल सरल हैं और इनका जवाब शपथ के तहत मिलना चाहिए
SBI में किसने प्रत्येक बचाव की सिफारिश और मंजूरी दी?
क्या उन्होंने S4A को मंजूरी देने से पहले 2016 की पुलिस शिकायत पढ़ी थी? अगर हां, तो उन्होंने उन्हीं निदेशकों को पद पर क्यों बने रहने दिया?
किस कैश-फ्लो आंकड़ों के आधार पर घाटे में चल रही और सिकुड़ती कंपनी के कर्ज को "60% सस्टेनेबल" माना गया और Oversight Committee के सामने क्या रखा गया था?
क्या किसी ऋणदाता ने सहायक कंपनियों को दिए गए अग्रिमों या एक ही साल में राइट ऑफ किए गए ₹888.07 करोड़ के इन्वेंट्री और रिसीवेबल्स की जांच की?
क्या किसी ने 2017 में उस शेयर की तेजी और गिरावट की जांच की, जिसका बैंक कुछ ही समय पहले बड़ा शेयरधारक बना था?
और एक खाते पर ₹1,300 करोड़ से अधिक गंवाने के बाद भी, जब वह ₹58 करोड़ मूल्य वाली कंपनी में 28.77% हिस्सेदारी रखता था, क्या भारत के सबसे बड़े बैंक ने किसी एक अधिकारी से इसका स्पष्टीकरण मांगा?
BW ने SBI को विस्तृत सवाल भेजे, लेकिन उसे कोई जवाब नहीं मिला है. SBI की ओर से जवाब मिलने पर उसे शामिल किया जाएगा.
अगली कड़ी: आज बॉम्बे रेयॉन की सबसे मूल्यवान संपत्ति को कौन नियंत्रित करता है.
बॉम्बे रेयॉन ने ₹4,000 करोड़ के बैंक बचाव को एक ऐसे कॉरपोरेट खेल में बदल दिया, जिसमें कंपनी की असली संपत्ति और नियंत्रण की तस्वीर लगातार बदलती रही.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
वित्त मंत्रालय के बजट विभाग की ओर से जारी कार्यक्रम के अनुसार, प्री-बजट बैठकें 12 अक्टूबर से शुरू होकर 13 नवंबर तक चलेंगी. इन बैठकों में विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के साथ उनके खर्च और आगामी वित्त वर्ष के लिए आवश्यक बजट आवंटन पर चर्चा की जाएगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वित्त मंत्रालय ने केंद्रीय बजट 2027-28 की तैयारियों की प्रक्रिया शुरू कर दी है. इसके तहत 12 अक्टूबर से 13 नवंबर 2026 तक विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के साथ बजट-पूर्व बैठकें होंगी. इन बैठकों में वित्त वर्ष 2026-27 के संशोधित अनुमान (RE) और वित्त वर्ष 2027-28 के बजट अनुमान (BE) पर चर्चा कर उन्हें अंतिम रूप देने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी.
मंत्रालय ने 23 सितंबर को जारी नोटिस में सभी केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों को बैठकों से संबंधित जरूरी वित्तीय आंकड़े और खर्च के प्रस्ताव 6 अक्टूबर 2026 तक जमा करने को कहा है. बजट-पूर्व चर्चा व्यय सचिव की अध्यक्षता में होगी और इसमें संबंधित मंत्रालयों की वित्तीय जरूरतों, मौजूदा खर्च और अगले वित्त वर्ष की प्राथमिकताओं पर विचार किया जाएगा.
12 अक्टूबर से शुरू होंगी प्री-बजट बैठकें
वित्त मंत्रालय के बजट विभाग की ओर से जारी कार्यक्रम के अनुसार, प्री-बजट बैठकें 12 अक्टूबर से शुरू होकर 13 नवंबर तक चलेंगी. इन बैठकों में विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के साथ उनके खर्च और आगामी वित्त वर्ष के लिए आवश्यक बजट आवंटन पर चर्चा की जाएगी.
इन बैठकों का एक प्रमुख उद्देश्य वित्त वर्ष 2026-27 के संशोधित अनुमानों को अंतिम रूप देना है. इसके साथ ही 2027-28 के लिए बजट आवंटन और खर्च से जुड़े प्रस्तावों पर भी विचार किया जाएगा. मंत्रालयों को बैठक से पहले जरूरी जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं.
मंत्रालयों को 6 अक्टूबर तक देनी होगी जानकारी
वित्त मंत्रालय ने सभी संबंधित मंत्रालयों और विभागों से आवश्यक वित्तीय विवरण और प्रस्ताव 6 अक्टूबर तक जमा करने को कहा है. इन आंकड़ों के आधार पर व्यय विभाग संबंधित मंत्रालयों की मांगों और प्रस्तावों की समीक्षा करेगा.
प्री-बजट बैठकों के दौरान मंत्रालयों की ओर से विभिन्न योजनाओं, कार्यक्रमों और अन्य खर्चों के लिए अतिरिक्त बजट की जरूरत भी बताई जा सकती है. इसके बाद वित्त वर्ष 2027-28 के बजट अनुमानों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी.
1 फरवरी 2027 को पेश हो सकता है बजट
केंद्रीय बजट 2027-28 को 1 फरवरी 2027 को संसद में पेश किए जाने की संभावना है. यह नरेंद्र मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल का चौथा पूर्ण बजट होगा. वहीं, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण लगातार 10वीं बार केंद्रीय बजट पेश करेंगी.
आगामी बजट में आर्थिक वृद्धि को गति देने, रोजगार के अवसर बढ़ाने और घरेलू मांग को मजबूत करने से जुड़े उपायों पर सरकार का ध्यान रहने की उम्मीद है. इसके अलावा राजकोषीय अनुशासन बनाए रखने और सरकारी खर्च को प्राथमिकताओं के अनुरूप रखने पर भी जोर रह सकता है.
हालांकि, बजट में किन क्षेत्रों के लिए कितना आवंटन किया जाएगा और सरकार की प्रमुख प्राथमिकताएं क्या होंगी, इसका स्पष्ट पता बजट दस्तावेज और संसद में पेश किए जाने वाले प्रस्तावों से ही चलेगा. फिलहाल प्री-बजट बैठकें इसी प्रक्रिया की शुरुआती कड़ी हैं.
बैठक में राइट्स इश्यू के आकार, शर्तों और इससे जुड़े अन्य पहलुओं पर चर्चा की जा सकती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहन कंपनी ओला इलेक्ट्रिक मोबिलिटी एक बार फिर पूंजी जुटाने की तैयारी कर रही है. कंपनी ने बताया है कि राइट्स इश्यू के जरिए फंड जुटाने के प्रस्ताव पर विचार करने के लिए 28 सितंबर को बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की बैठक होगी. बैठक में राइट्स इश्यू के आकार, शर्तों और इससे जुड़े अन्य पहलुओं पर चर्चा की जा सकती है.
बोर्ड बैठक में राइट्स इश्यू पर विचार
ओला इलेक्ट्रिक ने एक्सचेंज फाइलिंग में बताया है कि उसके बोर्ड की 28 सितंबर को बैठक प्रस्तावित है. इसमें पात्र शेयरधारकों को इक्विटी शेयर जारी कर पूंजी जुटाने के प्रस्ताव पर विचार किया जाएगा. हालांकि, राइट्स इश्यू की अंतिम राशि, शेयरों की संख्या, इश्यू प्राइस और अन्य शर्तों की जानकारी बोर्ड की मंजूरी के बाद ही स्पष्ट होगी. राइट्स इश्यू में कंपनी नए शेयर अपने मौजूदा पात्र शेयरधारकों को खरीदने का अधिकार देती है. शेयरधारक तय अनुपात और निर्धारित कीमत पर इन शेयरों के लिए आवेदन कर सकते हैं. इस प्रक्रिया में मौजूदा शेयरधारकों के साथ प्रमोटर समूह की भागीदारी भी अहम होती है.
पहले QIP के जरिए जुटा चुकी है 780 करोड़ रुपये
ओला इलेक्ट्रिक इससे पहले भी पूंजी जुटा चुकी है. कंपनी को कुल 1,500 करोड़ रुपये तक जुटाने की मंजूरी मिली थी. इसमें से करीब 780 करोड़ रुपये कंपनी ने जून 2026 में क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट यानी QIP के जरिए जुटाए थे.
अब राइट्स इश्यू के प्रस्ताव के जरिए कंपनी की ओर से पूंजी जुटाने की अगली प्रक्रिया पर विचार किया जा रहा है. इस फंड का इस्तेमाल कंपनी की कारोबारी जरूरतों, विस्तार और अन्य कॉरपोरेट उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है. हालांकि, प्रस्तावित राशि और फंड के इस्तेमाल की विस्तृत जानकारी बोर्ड के फैसले के बाद सामने आएगी.
राइट्स इश्यू की खबर से शेयर में तेजी
राइट्स इश्यू के प्रस्ताव की खबर के बीच बुधवार को ओला इलेक्ट्रिक के शेयर में तेजी देखने को मिली. NSE पर कंपनी का शेयर 10.83 फीसदी बढ़कर 41.87 रुपये पर बंद हुआ. कारोबार के दौरान शेयर 42.49 रुपये के उच्च स्तर और 38.25 रुपये के निचले स्तर तक गया. NSE पर करीब 3.90 करोड़ शेयरों में कारोबार हुआ.
पिछले छह महीनों में शेयर में करीब 77 फीसदी की तेजी दर्ज की गई है. हालांकि, शेयर बाजार में किसी कंपनी के फंड जुटाने के फैसले का असर अलग-अलग समय में अलग हो सकता है और सिर्फ शेयर में तेजी को कंपनी की वित्तीय स्थिति में सुधार का संकेत नहीं माना जा सकता.
प्रमोटर समूह की करीब 33 फीसदी हिस्सेदारी
ओला इलेक्ट्रिक में प्रमोटर समूह की हिस्सेदारी करीब 32.97 फीसदी बताई गई है. कंपनी के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर भाविश अग्रवाल प्रमोटर समूह का नेतृत्व करते हैं. राइट्स इश्यू में प्रमोटर और मौजूदा शेयरधारकों की भागीदारी से कंपनी को नई पूंजी जुटाने में मदद मिल सकती है.
अब 28 सितंबर की बोर्ड बैठक महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी बैठक में राइट्स इश्यू के प्रस्ताव को आगे बढ़ाने से जुड़े प्रमुख फैसले लिए जा सकते हैं. इश्यू का आकार, कीमत, रिकॉर्ड डेट और शेयरधारकों के लिए पात्रता जैसे अहम विवरण बोर्ड की मंजूरी और बाद की नियामकीय प्रक्रिया के बाद स्पष्ट होंगे.
बुधवार को सेंसेक्स 299.17 अंक यानी 0.40 फीसदी बढ़कर 74,828.25 पर बंद हुआ. निफ्टी भी 117.80 अंक यानी 0.50 फीसदी की बढ़त के साथ 23,446.80 पर बंद हुआ.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार ने बुधवार को पिछले सत्र की गिरावट से वापसी करते हुए मजबूती के साथ कारोबार खत्म किया. सेंसेक्स 299 अंक चढ़ा, जबकि निफ्टी में करीब 118 अंकों की तेजी रही. टाटा स्टील, बजाज फाइनेंस और आईटीसी जैसे शेयरों में खरीदारी से बाजार को सहारा मिला. हालांकि, गुरुवार को ग्लोबल संकेत कमजोर नजर आ रहे हैं. GIFT Nifty में करीब 190 अंकों की गिरावट, अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड के 5.11 फीसदी तक पहुंचने और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से भारतीय बाजार में कमजोर शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं. इसके साथ ही आज NSE के शेयरों की BSE पर लिस्टिंग भी बाजार के लिए अहम घटनाक्रम रहेगी.
आज बाजार पर क्यों है दबाव?
24 सितंबर को भारतीय शेयर बाजार की शुरुआत पर ग्लोबल संकेतों का असर देखने को मिल सकता है. GIFT Nifty में करीब 190 अंकों की गिरावट दर्ज की गई है, जो घरेलू बाजार में कमजोर शुरुआत का संकेत दे रही है.
अमेरिकी बॉन्ड बाजार से भी दबाव के संकेत मिले हैं. अमेरिका की 10 साल की ट्रेजरी यील्ड 15 बेसिस पॉइंट बढ़कर 5.11 फीसदी पर पहुंच गई है. एक दिन में यह बढ़ोतरी अप्रैल 2025 के बाद सबसे बड़ी बताई जा रही है. वहीं, 5 साल की अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड भी 5 फीसदी के पार पहुंच गई है.
बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी से वैश्विक बाजारों में निवेशकों की धारणा प्रभावित हो सकती है. इसके अलावा कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भी भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि लंबे समय तक ऊंची कीमतों से आयात बिल और कंपनियों की लागत पर दबाव बढ़ सकता है.
कल बाजार ने की थी मजबूत वापसी
इन कमजोर संकेतों से पहले बुधवार को घरेलू बाजार ने मजबूत वापसी की थी. 23 सितंबर को सेंसेक्स 299.17 अंक यानी 0.40 फीसदी बढ़कर 74,828.25 पर बंद हुआ. कारोबार के दौरान सेंसेक्स 74,973.74 के उच्च स्तर और 74,599.88 के निचले स्तर तक गया. निफ्टी भी 117.80 अंक यानी 0.50 फीसदी की बढ़त के साथ 23,446.80 पर बंद हुआ. दिन के कारोबार में निफ्टी 23,466.90 के उच्च स्तर और 23,349.55 के निचले स्तर तक गया. सेंसेक्स के 30 शेयरों में 21 बढ़त के साथ बंद हुए, जबकि 9 शेयरों में गिरावट रही. मेटल और वित्तीय शेयरों में खरीदारी ने बाजार को सहारा दिया.
टाटा स्टील समेत इन शेयरों में रही तेजी
बुधवार को सेंसेक्स में टाटा स्टील सबसे ज्यादा 3.28 फीसदी चढ़ा. बजाज फाइनेंस में 3.07 फीसदी, आईटीसी में 1.77 फीसदी, अल्ट्राटेक सीमेंट में 1.73 फीसदी और पावरग्रिड में 1.65 फीसदी की तेजी रही.
निफ्टी में बजाज फाइनेंस 3.41 फीसदी की बढ़त के साथ टॉप गेनर रहा. हिंडाल्को 3.17 फीसदी, टाटा स्टील 3.16 फीसदी, अपोलो हॉस्पिटल्स 2.64 फीसदी और JSW स्टील 2.43 फीसदी चढ़े. हालांकि, आईटी शेयरों में दबाव देखने को मिला. सेंसेक्स में एचसीएल टेक 1.10 फीसदी, इन्फोसिस 1.03 फीसदी और टीसीएस 0.95 फीसदी गिरकर बंद हुए. टाइटन और महिंद्रा एंड महिंद्रा में भी गिरावट रही.
मंगलवार की गिरावट के बाद आई थी तेजी
बुधवार की तेजी से पहले मंगलवार को बाजार में गिरावट दर्ज की गई थी. 22 सितंबर को सेंसेक्स 329.91 अंक यानी 0.44 फीसदी गिरकर 74,529.08 पर बंद हुआ था. निफ्टी भी 85.30 अंक यानी 0.36 फीसदी की गिरावट के साथ 23,329 पर बंद हुआ.
मंगलवार को सेंसेक्स के 30 में से सिर्फ 7 शेयर बढ़त में रहे थे, जबकि 23 शेयर गिरावट के साथ बंद हुए. निफ्टी के 50 शेयरों में 15 में तेजी और 35 में गिरावट रही थी. ऐसे में बुधवार की तेजी ने पिछले सत्र की कमजोरी को कुछ हद तक संभाला.
आज NSE की लिस्टिंग पर भी नजर
गुरुवार को बाजार के लिए एक बड़ा कॉरपोरेट इवेंट NSE की लिस्टिंग है. नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के शेयर आज प्रतिद्वंद्वी BSE पर लिस्ट होंगे. करीब एक दशक के इंतजार के बाद NSE का IPO आया था और इसे कुल 5.7 गुना सब्सक्रिप्शन मिला था.
ऐसे में NSE की लिस्टिंग और शुरुआती कारोबार बाजार की नजर में रहेगा. इसके अलावा दिनभर ग्लोबल मार्केट के संकेत, कच्चे तेल की कीमतें और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बाजार की दिशा को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक रहेंगे.
इन शेयरों पर रखें नजर
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आज Bharti Airtel, NTPC, NLC India, Ola Electric Mobility, PhysicsWallah, Rainbow Children’s Medicare, Meesho, Bharat Dynamics, Oswal Pumps, Jindal Stainless, Exide Industries, SBI Card, Welspun Living और Concord Biotech समेत कई शेयर कॉरपोरेट अपडेट के कारण फोकस में रहेंगे. Bharti Airtel की सहयोगी Airtel Money ने लंदन स्टॉक एक्सचेंज पर संभावित IPO की योजना की घोषणा की है. NTPC ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए ₹3,393.83 करोड़ के अंतिम लाभांश का भुगतान किया है, जबकि NLC India ने ₹500 करोड़ का कमर्शियल पेपर जारी कर फंड जुटाया है. Ola Electric ने प्रस्तावित राइट्स इश्यू के लिए बोर्ड की मंजूरी की प्रक्रिया शुरू की है. Meesho में RPS Ventures ने करीब 1 फीसदी हिस्सेदारी लगभग ₹900 करोड़ की ब्लॉक डील के जरिए बेची है. Bharat Dynamics को रक्षा मंत्रालय से ₹810.79 करोड़ का कॉन्ट्रैक्ट मिला है, जबकि Oswal Pumps को तेलंगाना में ₹273 करोड़ का सोलर रूफटॉप प्रोजेक्ट मिला है. Exide Energy Solutions ने बेंगलुरु के देवनहल्ली में अपनी 6 GWh क्षमता वाली लिथियम-आयन सेल मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी के Phase-I की कमीशनिंग पूरी कर ली है. Welspun Living में 2.59 फीसदी हिस्सेदारी ₹525.88 करोड़ में बेची गई है, जबकि Concord Biotech के बोर्ड ने 1:1 बोनस शेयर जारी करने को मंजूरी दी है.
बाजार की आज की दिशा किन संकेतों से तय होगी?
बुधवार की तेजी के बाद गुरुवार को बाजार के सामने घरेलू मजबूती और कमजोर ग्लोबल संकेतों के बीच संतुलन की स्थिति है. शुरुआती कारोबार में GIFT Nifty, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और कच्चे तेल की चाल महत्वपूर्ण रहेगी. इसके अलावा NSE की लिस्टिंग और कंपनियों से जुड़े कॉरपोरेट अपडेट भी खास शेयरों में हलचल बढ़ा सकते हैं.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
निप्पॉन इंडिया MF को करीब ₹92.46 करोड़ का भुगतान करना होगा. कंपनी के सीईओ सुंदीप सिक्का और फंड मैनेजर अमित त्रिपाठी को 2.1-2.1 करोड़ रुपये देने होंगे. सूत्रों के मुताबिक, इस मामले में कुल भुगतान करीब ₹97 करोड़ होगा. सेबी का आदेश जल्द जारी होने की उम्मीद है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
भारतीय प्रतिभूति एवं विनियम बोर्ड (SEBI) ने निप्पॉन इंडिया म्यूचुअल फंड (Nippon India Mutual Fund) और उसके तीन शीर्ष अधिकारियों के साथ सहमति के आधार पर निपटान को मंजूरी दे दी है. यह मामला यस बैंक के Additional Tier-1 (AT1) बॉन्ड में फंड हाउस के निवेश से जुड़ा है. मामले से परिचित लोगों के अनुसार, इससे करीब दो साल पहले नियामक की ओर से जारी किया गया कारण बताओ नोटिस बंद हो जाएगा.
सूत्रों ने कहा कि कारण बताओ नोटिस दो साल पहले जारी किया गया था, लेकिन इस पूरे समय में न तो फंड हाउस और न ही उसके अधिकारियों ने कोई जवाब दाखिल किया और सेबी ने भी उनसे ऐसा करने के लिए दबाव नहीं डाला. दो साल, कोई जवाब नहीं. क्या किसी छोटे खिलाड़ी को भी इतनी ही गुंजाइश दी जाती? यह एक ऐसा सवाल है जो उद्योग के बाकी हिस्से में उठ सकता है.
निपटान के तहत निप्पॉन लाइफ इंडिया एस्सेट मैनेजमेंट करीब ₹92.46 करोड़ का भुगतान करेगी, सूत्रों ने कहा. फंड हाउस के सीईओ और वर्तमान में एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया (AMFI) के चेयरमैन सुंदीप सिक्का ₹2.1 करोड़ का भुगतान करेंगे. हेड फंड मैनेजर अमित त्रिपाठी भी ₹2.1 करोड़ का भुगतान करेंगे और पूर्व चीफ रिस्क ऑफिसर मिलिंद नेसारिकर ₹25.83 लाख का भुगतान करेंगे. कुल मिलाकर राशि करीब ₹97 करोड़ है. सूत्रों के अनुसार कुल आंकड़ा ₹97-100 करोड़ के बीच है.
सेबी की सेटलमेंट प्रोसीडिंग्स रेगुलेशन्स के तहत सभी सहमति-आधारित निपटारों की तरह, आवेदक आरोपों को स्वीकार या अस्वीकार किए बिना निपटान राशि का भुगतान करते हैं. आदेश पारित होने के बाद सेबी की ओर से उनके खिलाफ कार्यवाही समाप्त हो जाती है. यह बाजार नियामक का यह कहने का तरीका है कि "आइए, इस बारे में बात करना बंद करने पर सहमत होते हैं."
वह फाइल जिसने डेस्क बदले
निपटान आदेशों पर सेबी के पूर्णकालिक सदस्य हस्ताक्षर करते हैं. सूत्रों के अनुसार, इस मामले ने वहां पहुंचने के लिए थोड़ा लंबा रास्ता तय किया. सूत्रों के अनुसार, फाइल सबसे पहले पूर्णकालिक सदस्य वर्षनी के पास गई. उन्होंने खुद को इस मामले से अलग कर लिया क्योंकि उस समय उनके कार्यकाल में कुछ ही दिन बचे थे और बाद में उन्हें कार्यकाल में विस्तार मिला. इसके बाद फाइल KVR मूर्ति के पास गई, जिन्होंने अपने साथी पूर्णकालिक सदस्य संदीप प्रधान के साथ मिलकर इस पर हस्ताक्षर किए, सूत्रों ने कहा.
सेबी के नियम किसी फाइल को नए हस्ताक्षरकर्ता तक पहुंचने से नहीं रोकते. लेकिन इतने संवेदनशील मामले में यह एक ऐसा विवरण है जिस पर बाजार पर नजर रखने वाले ध्यान दे सकते हैं.
इस बीच, सीबीआई
यह निपटान ऐसे आपराधिक मामले के साथ असहज रूप से जुड़ा हुआ है, जिसमें निपटारे के कोई संकेत नहीं हैं. सीबीआई पहले ही इस मामले में आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है. यह मामला कथित ₹2,797 करोड़ के quid pro quo arrangement से जुड़ा है, जिसमें उस समय रिलायंस निप्पॉन MF के नाम से जाने जाने वाले फंड हाउस और यस बैंक के बीच संबंध था. एजेंसी ने यस बैंक के पूर्व प्रमुख राणा कपूर और उद्योगपति अनिल अंबानी के खिलाफ आरोप लगाए हैं. सूत्रों ने कहा कि एजेंसी EPFO फंड के कथित दुरुपयोग की भी जांच कर रही है और एक और आरोपपत्र दाखिल किए जाने की उम्मीद है.
सेबी का निपटान, सेबी की अपनी कार्यवाही को समाप्त करता है. यह सीबीआई पर बाध्यकारी नहीं है और न ही इसका आपराधिक अभियोजन पर कोई असर पड़ता है. इसलिए नियामक ने अपना मामला बंद कर दिया है, जबकि जांच एजेंसी अपनी जांच को आगे बढ़ा रही है.
कई कानूनी विशेषज्ञों ने कहा कि घटनाक्रम का यह क्रम असहज मिसाल कायम कर सकता है. यदि किसी नियामक द्वारा उसी तथ्यों पर चल रही आपराधिक जांच के दौरान मामला निपटाया जाता है, तो इससे मिले-जुले संकेत जाने का जोखिम रहता है. आखिरकार, इसका असर मायने रख सकता है.
दो आवेदक अंदर, दो बाहर
सूत्रों ने कहा कि इसी मामले में सेबी ने अनिल अंबानी और राणा कपूर के निपटान आवेदनों को खारिज कर दिया.
सिक्योरिटीज वकीलों ने कहा कि इस विभाजित नतीजे को चुनौती दिए जाने की संभावना है. दोनों व्यक्ति अदालतों (Securities Appellate Tribunal) के सामने यह तर्क दे सकते हैं कि एक ही लेनदेन में शामिल आवेदकों के साथ अलग-अलग व्यवहार किया गया. एक वकील ने कहा कि सेबी जैसी अनुभवी नियामक संस्था इस संभावना से अच्छी तरह वाकिफ होगी. अधिक दिलचस्प सवाल यह है कि वह इस अंतर का बचाव किस तरह करेगी.
इन आवेदनों की समीक्षा सेबी की हाई पॉवर्ड एडवाइजरी कमेटी (HPAC) ने की, जो निपटान आदेशों और अपराधों के समझौते से जुड़े मामलों पर विचार करती है. समिति की अध्यक्षता कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जय नारायण पटेल करते हैं. इसके अन्य सदस्यों में पूर्व कानून सचिव पी.के. मल्होत्रा, एस.के मोहंती, IRS (सेवानिवृत्त) और सेबी के पूर्व पूर्णकालिक सदस्य, तथा डेलॉइट इंडिया के पूर्व मैनेजिंग पार्टनर और सीईओ एन. वेंकटराम शामिल हैं. समिति निपटान की शर्तों की सिफारिश करती है और अंतिम फैसला पूर्णकालिक सदस्य करते हैं.
सयोनारा, कारण बताओ नोटिस
सूत्रों के मुताबिक, समय का यह मेल शायद ही इससे अधिक सौहार्दपूर्ण हो सकता था. भारत-जापान संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं. 22 जुलाई को मुंबई में जापान की कॉन्सुल-जनरल सातो हितोमी ने सेबी के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे से शिष्टाचार मुलाकात की. जापानी कॉन्सुलेट के अनुसार, दोनों पक्षों ने वित्तीय क्षेत्र की गतिविधियों और दोनों देशों के बीच सहयोग पर चर्चा की.
सूत्रों ने कहा कि फंड हाउस की जापानी पैरेंट कंपनी निप्पॉन लाइफ भी भारत और जापान के बीच एक क्रिकेट मैच आयोजित कर रही है. सेबी के चेयरमैन ने हाल ही में उत्तर भारत के एक राज्य में निप्पॉन इंडिया की एक शाखा का दौरा किया. सेबी के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने सितंबर 2026 में लेह, जम्मू-कश्मीर/लद्दाख क्षेत्र का दौरा किया था, जहां उन्होंने सेना के जवानों के लिए AMFI की ओर से आयोजित इन्वेस्टर्स अवेयरनेस प्रोग्राम को संबोधित किया.
मामले से परिचित एक व्यक्ति ने कहा कि जापान के सबसे बड़े वित्तीय समूहों में से एक के साथ निपटान द्विपक्षीय संबंधों के लिए "काफी मददगार साबित हो सकता है." बेशक, कोई भी इन घटनाक्रमों के बीच किसी संबंध का सुझाव नहीं दे रहा है. ये महज संयोग हैं.
सिक्का के लिए यह निपटान ऐसे समय में नियामकीय दबाव को हटा देता है, जब उनका प्रोफाइल पहले कभी इतना ऊंचा नहीं रहा. AMFI के चेयरमैन के तौर पर वह ऐसे उद्योग का सार्वजनिक चेहरा हैं, जो ₹75 लाख करोड़ से अधिक की परिसंपत्तियों का प्रबंधन करता है.
अगली कतार में: Quant
निप्पॉन का आदेश इस सीजन का एकमात्र बड़ा निपटान नहीं हो सकता. सूत्रों के अनुसार, सेबी से क्वांट म्यूचुअल फंड (Quant Mutual Fund) के फ्रंट रनिंग मामले में निपटान आवेदन पर भी फैसला आने की उम्मीद है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)